कथा के पंचम दिवस पर पूज्य महाराज श्री के सुपुत्र श्री देवांश ठाकुर जी ने भक्तों को श्रीमद्भागवत चिंतन का दिव्य रसपान कराया। उन्होंने श्रीकृष्ण की माखन चोरी लीला का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि भगवान की यह लीला केवल एक बाल-क्रीड़ा नहीं, बल्कि भक्तों के प्रति उनके प्रेम और वात्सल्य का अद्भुत संदेश है। भगवान श्रीकृष्ण की माखन चोरी लीला हमें यह शिक्षा देती है कि भगवान बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि भक्त के निष्कपट प्रेम और श्रद्धा को देखते हैं। जिस प्रकार गोपियों ने अपने हृदय में श्रीकृष्ण को बसाया था, उसी प्रकार हमें भी अपने जीवन में भगवान के प्रति अटूट विश्वास, प्रेम और समर्पण रखना चाहिए।

देवांश ठाकुर जी के भजनों पर कथा में कथा पंडाल में उपस्थित सभी भक्त झूम उठे। उनके सुरीले भजनों पर पूरा कथा पंडाल “जय श्रीकृष्ण” और “हरि नाम” के जयघोष से गूंज उठा। भक्तजन भक्ति के भाव में झूमते हुए भगवान के नाम का संकीर्तन करने लगे।

पूतना भगवान श्रीकृष्ण को मारने के उद्देश्य से अपने स्तनों पर कालकूट विष लगाकर उन्हें दूध पिलाने के लिए आती है, किंतु भगवान ने उसका भी उद्धार कर दिया। यह दर्शाता है कि भगवान केवल अपराध नहीं देखते, बल्कि भाव को देखते हैं। जो उन्हें विष पिलाने के लिए आया, यदि उसका भी उद्धार कर सकते है तो तुम्हारा क्यों नहीं कर सकते है। जब मानव अहंकार और स्वार्थ छोड़कर भगवान की शरण में जाते हैं, तो वे अवश्य हमारा उद्धार करते हैं, हमारे पापों का नाश करते हैं और हमें जीवन के दुखों से मुक्त कर मोक्ष की ओर ले जाते हैं।

देश में गौ हत्या बंद होनी चाहिए , जिस देश में गौ हत्या होती है, वहां धर्म की स्थापना नहीं हो सकती। गौ माता हमारे धर्म और संस्कृति की आत्मा हैं। वे केवल एक पशु नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि के पोषण का आधार हैं। वे हमारे वेदों, पुराणों, शास्त्रों और उपनिषदों में पूज्य मानी गई हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने भी उनका सदा पालन किया और स्वयं को गोपाल कहा। यदि हर सनातनी यह प्रण कर ले कि वह कम से कम एक गाय का पालन करेगा, तो इस देश में एक भी गाय आवारा नहीं रहेगी।

मथुरा में भगवान श्रीकृष्ण का भव्य मंदिर बनना चाहिए। यदि हमारे देश में न्याय और सत्य के आधार पर निर्णय होने लगें, तो मथुरा में भगवान श्रीकृष्ण का भव्य मंदिर कब का बन गया होता। क्योंकि यह निर्विवाद सत्य है कि मथुरा ही भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि है और वहीं उन्होंने अवतार धारण किया था। यह बात देश का बच्चा-बच्चा जानता है तथा इसे कोई झुठला नहीं सकता। मथुरा करोड़ों सनातनियों की आस्था, श्रद्धा और विश्वास का केंद्र है।

देश में सनातन बोर्ड का निर्माण होना चाहिए। जिस दिन सनातन बोर्ड का निर्माण हो जाएगा और देश के सभी मंदिर उस बोर्ड के अधीन आ जाएंगे, उस दिन मंदिरों की अपार धन-संपत्ति, दान और संसाधनों का उपयोग मानवता की सेवा और सनातन धर्म के उत्थान में किया जा सकेगा। इन संसाधनों से गौसेवा, निशुल्क भोजन वितरण, विद्यालयों की स्थापना, धर्मशालाओं का निर्माण, गरीब कन्याओं के विवाह, असहाय रोगियों की चिकित्सा, वृक्षारोपण तथा समाज के कमजोर वर्गों के कल्याण जैसे अनेक पुण्य कार्य किए जा सकेंगे।

मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जाए। हमारे देश में लाखों मंदिर हैं, जो केवल पूजा का स्थान ही नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति, समाज की सेवा, शिक्षा, संस्कार, भंडारे, गौशालाएं, वेद पाठशालाएं, और आध्यात्मिक जागरण के केंद्र रहे हैं। यदि मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया जाए, तो हर मंदिर अपने संसाधनों से समाज की सेवा कर सकता है, गरीबों को भोजन, विद्यार्थियों को शिक्षा, बीमारों को चिकित्सा, असहायों को सहारा, और समाज को सच्चे अर्थों में धर्म और संस्कृति का संरक्षण दे सकता है।

जब-जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है, अन्याय अपने चरम पर पहुँचता है, और सज्जनों की रक्षा कठिन हो जाती है, तब भगवान धरती पर धर्म की रक्षा करने के लिए अवतरित होते है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं — “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत… तदा आत्मानं सृजाम्यहम्।” अर्थात जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अवतार लेता हूँ।

जीवन में पैसा सब कुछ नहीं है, बल्कि मनुष्य के सत्कर्म ही उसकी वास्तविक पहचान और सबसे बड़ी पूंजी होते हैं। धन-संपत्ति यहीं रह जाती है, लेकिन अच्छे कर्म व्यक्ति के साथ चलते हैं और उसे यश, सम्मान तथा ईश्वर की कृपा प्रदान करते हैं। इसलिए मनुष्य को धन अर्जित करने के साथ-साथ धर्म, सेवा, परोपकार और सदाचार के मार्ग पर भी चलना चाहिए।

अपने धर्म की रक्षा के लिए आवश्यकता पड़ने पर प्राणों का भी त्याग कर देना चाहिए। सनातन धर्म का इतिहास ऐसे अनेक महापुरुषों, संतों और वीरों के बलिदानों से भरा पड़ा है जिन्होंने धर्म, संस्कृति और सत्य की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी, लेकिन धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा। धर्म की रक्षा करने वाला व्यक्ति स्वयं भगवान की कृपा का पात्र बनता है और उसका जीवन सफल हो जाता है।

अधिक मास के पावन माह में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन

दिनांक: 29 मई से 04 जून 2026 तक

समय: दोपहर 3:30 बजे से सायं 6:30 बजे तक

स्थान: सोमनाथ मंदिर परिसर, गुजरात

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