कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री के सुपुत्र पूज्य श्री देवांश ठाकुर जी ने भक्तों को श्रीमद्भागवत चिंतन का दिव्य रसपान कराया। अपनी सरल, सहज और भावपूर्ण वाणी से उन्होंने भागवत महापुराण के गूढ़ रहस्यों को अत्यंत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि श्रीमद्भागवत केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की प्राप्ति का साक्षात् मार्ग है। जो व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति के साथ भागवत कथा का श्रवण करता है, उसके हृदय की मलिनता दूर होती है, मन निर्मल बनता है और जीवन में भगवान के प्रति प्रेम तथा समर्पण का भाव जागृत होता है।
श्री देवांश ठाकुर जी ने भजन गाकर भक्तों का मन मोह लिया। उनके मधुर गायन से पूरा वातावरण भक्ति और आनंद से ओत-प्रोत हो गया।
राजा परीक्षित धर्मात्मा, न्यायप्रिय और भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त थे, लेकिन एक क्षण के क्रोध में उन्होंने ऋषि शमीक के गले में मृत सर्प डाल दिया। जब राजा परीक्षित को सात दिन में मृत्यु का श्राप मिला, तब उन्होंने न तो किसी को दोष दिया और न ही अपने पद और शक्ति का अहंकार दिखाया। राजा परीक्षित की कथा हमें तीन महत्वपूर्ण शिक्षाएँ देती है—पहली, क्रोध से सदैव बचना चाहिए; दूसरी, अपनी गलती स्वीकार करने में कभी संकोच नहीं करना चाहिए; और तीसरी, मृत्यु आने से पहले भगवान की भक्ति में जीवन को लगाना चाहिए।
पवित्र सोमनाथ धाम में पितरों का तर्पण करने से पितृ एक करोड़ वर्ष के लिए तृप्त हो जाते है और उनकी कृपा से परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। अपने पितरों के कल्याण हेतु तर्पण अवश्य करें तथा भगवान के नाम का स्मरण करते हुए धर्म, सेवा और भक्ति के मार्ग पर चलें। पितरों का आशीर्वाद जीवन की अनेक बाधाओं को दूर करने में सहायक होता है और व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करता है।
जीवन में किसी व्यक्ति की चमचागिरी करने के बजाय भगवान की भक्ति और सेवा में अपना समय लगाना चाहिए। संसार के लोग स्वार्थ के अनुसार साथ देते हैं, लेकिन भगवान बिना किसी स्वार्थ के अपने भक्तों का कल्याण करते हैं। जो व्यक्ति लोगों को प्रसन्न करने में जीवन बिताता है, उसे कभी स्थायी सुख नहीं मिलता, जबकि जो भगवान को प्रसन्न करने का प्रयास करता है, उसके जीवन में शांति, संतोष और आनंद का आगमन होता है।
कलियुग में अधिकांश संबंध स्वार्थ पर आधारित होते जा रहे हैं। इसलिए मनुष्य को संसार के अस्थायी संबंधों पर अत्यधिक आश्रित होने के बजाय भगवान पर विश्वास रखना चाहिए। इस संसार में धन, पद, प्रतिष्ठा और स्वार्थ के कारण लोग जुड़ते और बिछड़ते रहते हैं, परंतु भगवान श्रीकृष्ण ही ऐसे सच्चे हितैषी हैं जो हर परिस्थिति में अपने भक्त का साथ नहीं छोड़ते।
अधिक मास के पावन माह में श्रीमद्भागवत कथा का भव्य आयोजन
दिनांक: 29 मई से 04 जून 2026 तक
समय: दोपहर 3:30 बजे से सायं 6:30 बजे तक
स्थान: सोमनाथ मंदिर परिसर, गुजरात