खरगोन, मध्य प्रदेश में पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में श्री राम कथा का समापन दिवस अत्यंत भावपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ।
कथा के दौरान महाराज श्री ने मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय कैलाश जोशी जी को व्यासपीठ से श्रद्धापूर्वक स्मरण किया। उन्होंने कहा कि जोशी जी ऐसे विरले नेता थे जो सत्ता के लिए नहीं, बल्कि आदर्शों और सम्मान के लिए जीवन जीते थे।
कथा में महाराज श्री ने मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय कैलाश जोशी जी को व्यासपीठ से श्रद्धापूर्वक स्मरण किया। उन्होंने कहा कि जोशी जी ऐसे विरले नेता थे जो पद या सत्ता के लिए नहीं, बल्कि सम्मान और आदर्शों के लिए जीवन जीते थे। उनका संपूर्ण जीवन सादगी, ईमानदारी और संत स्वरूप आचरण का उदाहरण रहा। उन्होंने राजनीति में रहते हुए भी अपने चरित्र को निष्कलंक बनाए रखा और कभी भी किसी प्रकार के आरोप या दाग से स्वयं को दूर रखा।
महाराज श्री ने आगे कहा कि राजनीति को अक्सर “काजल की कोठरी” कहा जाता है, जहां बिना दाग के निकलना बहुत कठिन होता है, लेकिन स्व. जोशी जी उन चुनिंदा नेताओं में से थे जिन्होंने इस कोठरी से भी अपनी पवित्र छवि बनाए रखी। “राजनीति के संत” के रूप में प्रसिद्ध जोशी जी ने अपने व्यवहार, विनम्रता और उच्च आदर्शों से समाज के सामने एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया। उनका जीवन हमें सिखाता है कि किसी भी क्षेत्र में रहकर ईमानदारी, सादगी और नैतिकता के साथ कार्य किया जा सकता है।
जब अयोध्या में श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी चल रही थी, तभी माता कैकेयी के वचनों के कारण उन्हें 14 वर्ष के वनवास का आदेश मिला। फिर भी उन्होंने बिना किसी विरोध के अपने पिता महाराज दशरथ की आज्ञा को स्वीकार किया। राम ने अपने सुख, राज्य और अधिकार को त्यागकर धर्म और मर्यादा को सर्वोपरि रखा। श्रीराम ने दिखाया कि माता-पिता की आज्ञा का सम्मान, त्याग, धैर्य और सत्य के मार्ग पर चलना ही जीवन की सच्ची सफलता है। चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, हमें अपने धर्म और कर्तव्य से कभी विचलित नहीं होना चाहिए। यही कारण है कि श्रीराम को “मर्यादा पुरुषोत्तम” कहा जाता है और उनका जीवन आज भी हम सभी के लिए एक आदर्श बना हुआ है।
शबरी एक साधारण वनवासी महिला थीं, लेकिन उनके हृदय में भगवान श्रीराम के प्रति अटूट प्रेम और श्रद्धा थी। जब भगवान श्रीराम उनके आश्रम में पहुंचे, तो शबरी ने अत्यंत प्रेम से उन्हें बेर अर्पित किए। उन्होंने हर बेर को पहले चखकर देखा कि वह मीठा है या नहीं, ताकि प्रभु को केवल सर्वोत्तम ही मिल सके। यह देखकर श्रीराम अत्यंत प्रसन्न हुए और प्रेमपूर्वक उन जूठे बेरों को स्वीकार किया। इस प्रसंग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि भगवान को भोग की नहीं, बल्कि सच्चे प्रेम और निष्कपट भावना की आवश्यकता होती है।
अपने बच्चों को कथा में अवश्य लाना चाहिए, क्योंकि यही स्थान उन्हें सही संस्कार और जीवन की दिशा देता है। उन्होंने समझाया कि कथा केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह बच्चों के चरित्र निर्माण का एक सशक्त माध्यम है। जब बच्चे कथा सुनते हैं, तो उन्हें सत्य, धर्म, मर्यादा और अच्छे-बुरे का ज्ञान मिलता है, जो उनकी सोच और व्यवहार को सकारात्मक बनाता है। आज के समय में बच्चे मोबाइल और बाहरी प्रभावों में जल्दी भटक जाते हैं, ऐसे में कथा जैसे सत्संग उन्हें सही मार्ग दिखाते हैं। कथा में आने से बच्चों के मन में भगवान के प्रति श्रद्धा, माता-पिता के प्रति सम्मान और समाज के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित होती है।
गाय को राष्ट्र माता घोषित किया जाए। गाय की सेवा करना केवल धार्मिक कार्य ही नहीं, बल्कि यह हमारे जीवन और परिवार के लिए भी अत्यंत शुभ और कल्याणकारी माना जाता है। जो व्यक्ति श्रद्धा और प्रेम से गौ सेवा करता है, उसके जीवन में सुख-शांति आती है और उसके वंश की वृद्धि होती है। गाय की सेवा से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे घर में समृद्धि और संतोष बना रहता है। गौ माता में सभी देवी-देवताओं का वास माना गया है, इसलिए उनकी सेवा करने से अनेक पुण्यों की प्राप्ति होती है। अपने सामर्थ्य अनुसार गाय को चारा खिलाएं, उनकी देखभाल करें और उन्हें सम्मान दें।
देश में सनातन बोर्ड का निर्माण सनातन धर्म की रक्षा और उसके शाश्वत मूल्यों को सुरक्षित रखने के लिए होना चाहिए। इससे ही हमारा सनातन सुरक्षित होगा , यह बोर्ड शिक्षा के माध्यम से बच्चों और युवाओं को वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण, महाभारत और गीता जैसे ग्रंथों के मूल संदेश से परिचित कराएगा, जिससे उनमें नैतिकता, संस्कार और राष्ट्रप्रेम का भाव विकसित हो सके।
आज देश में कुछ हिन्दू ही राम जी का अपमान करते है। रामायण और गीता को जला देते है। यह काफी चिंता का विषय है। समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए ज़रूरी है कि हम अपने मूल्यों को समझें और दूसरों के विश्वासों का भी आदर करें। रामायण जैसे ग्रंथों के संदेश—मर्यादा, करुणा, कर्तव्य और सत्य को व्यवहार में उतारना ही उनकी सच्ची रक्षा है। जब हम बच्चों और युवाओं को इन मूल्यों के बारे में सही तरीके से शिक्षित करते हैं, तो उनमें नैतिकता, सहिष्णुता और जिम्मेदारी की भावना विकसित होती है।
बच्चों को प्रतिदिन सूर्य भगवान को जल अर्पित करने की आदत डालनी चाहिए। यह केवल धार्मिक परंपरा ही नहीं, बल्कि अनुशासन और सकारात्मक जीवनशैली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। सुबह के समय उगते सूर्य को जल चढ़ाने से मन में शांति, एकाग्रता और ऊर्जा का संचार होता है। इससे बच्चे दिन की शुरुआत सकारात्मक भाव के साथ करते हैं और उनमें नियमितता तथा श्रद्धा का विकास होता है।