भोपाल में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के पावन सानिध्य में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा का भव्य एवं दिव्य शुभारंभ अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और उल्लासपूर्ण वातावरण में हुआ। कथा के प्रथम दिवस ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु दूर–दूर से कथा पंडाल में एकत्रित हुए। जैसे ही पूज्य महाराज श्री ने व्यासपीठ से अपनी अमृतवाणी में कथा का रसपान भक्तों को श्रवण कराना शुरु किया , संपूर्ण कथा पंडाल भक्तिरस से सराबोर हो गया। “जय श्री राधे-राधे” के गगनभेदी जयकारों से पूरा कथा पंडाल गूंज उठा और उपस्थित भक्तजन भाव-विभोर होकर भक्ति में लीन हो गए।

कथा में “नो तिलक, नो एंट्री।” का नियम बनाया है। बिना तिलक के कोई पूजा भगवान स्वीकार नहीं करते है। पूज्य महाराज श्री ने समस्त भक्तों से भावपूर्ण अनुरोध किया था कि जो भी भक्त कथा श्रवण के लिए पधारें, वे सिर पर तिलक लगाकर ही आएं, ताकि कोई बिधर्मी कथा में प्रवेश न करे। तिलक को भारतीय परंपरा में भक्ति, पवित्रता और ईश्वर के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाता है। कथा स्थल पर उपस्थित सभी श्रद्धालु तिलक धारण किए हुए नजर आए, जिससे संपूर्ण पंडाल एक दिव्य और सनातनी स्वरूप में परिवर्तित हो गया।

अधिक मास में किए गए दान-पुण्य अनंत काल तक फल देते हैं। अधिक मास में प्रत्येक सत्कर्म का फल कई गुना अधिक प्राप्त होता है। इस पावन मास में किया गया दान, जप, तप, व्रत और सेवा कार्य न केवल इस जीवन में सुख-शांति प्रदान करता है, बल्कि इसे अनंत काल तक पुण्यफल देने वाला बताया गया है।अधिक मास में अन्नदान, वस्त्रदान, गौ-सेवा, जल सेवा, मंदिर निर्माण या किसी भी प्रकार की जरूरतमंदों की सहायता करने से व्यक्ति के पापों का नाश होता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। अधिक मास में किया गया छोटा सा पुण्य कार्य भी कई जन्मों के पापों को समाप्त करने की क्षमता रखता है।

आज संसार में लोगों के पास धन की कोई कमी नहीं है, फिर भी लोग अशांत और दुखी हैं। मनुष्य जितना अधिक धन के पीछे भागता है, उतना ही वह चिंताओं, अपेक्षाओं और असंतोष के जाल में उलझता चला जाता है। वास्तविक सुख न तो धन में है और न ही भौतिक उपलब्धियों में, बल्कि वह भगवान श्रीकृष्ण के प्रेम और भक्ति में है। जिसने अपने जीवन में श्रीकृष्ण को अपना लिया, उनके नाम का स्मरण करना सीख लिया और उनके चरणों में प्रेम स्थापित कर लिया, वही वास्तव में सुखी है। कृष्ण प्रेम मन को शांति, हृदय को संतोष और जीवन को सही दिशा प्रदान करता है।

बच्चों को संस्कार हमारे आचरण से प्राप्त होते हैं। यदि हम स्वयं अपने धर्म, संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों का पालन करेंगे, तभी हमारी आने वाली पीढ़ी भी उन संस्कारों को अपनाएगी। बच्चे अपने माता-पिता और परिवार को देखकर सीखते हैं, इसलिए हमें अपने जीवन में सदाचार, भक्ति, सम्मान और अनुशासन को स्थान देना चाहिए। यदि घर में भगवान का स्मरण, पूजा-पाठ, बड़ों का सम्मान और सनातन परंपराओं का पालन होगा, तो बच्चे भी स्वाभाविक रूप से उन्हीं मूल्यों को ग्रहण करेंगे। लेकिन यदि हम स्वयं अपने संस्कारों की उपेक्षा करेंगे, तो बच्चों से उनके पालन की अपेक्षा करना व्यर्थ है।

हमारे मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जाये। मंदिरों की आय का उपयोग मूल रूप से धार्मिक कार्यों, साधु-संतों की सेवा, गोशालाओं, वेद-पाठशालाओं, संस्कृत शिक्षा, अन्नदान, चिकित्सा और समाज सेवा के लिए होना चाहिए। किंतु जब मंदिर सरकारी नियंत्रण में होते हैं, तब उनकी आय का उपयोग कई बार ऐसे कार्यों में हो जाता है जिनका धर्म और भक्तों की भावना से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता।

श्रीमद्भागवत कथा का भव्य आयोजन

दिनांक: 13 से 19 जून 2026 तक

समय: प्रतिदिन दोपहर 3:30 बजे से सायं 6:30 बजे तक

स्थान: रुद्राक्ष किंग्स्टन, अपोलो हॉस्पिटल के पास बावड़िया कलाँ, भोपाल (म.प्र.)

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