पूतना भगवान श्रीकृष्ण को मारने के उद्देश्य से अपने स्तनों पर कालकूट विष लगाकर उन्हें दूध पिलाने के लिए आती है, किंतु भगवान ने उसका भी उद्धार कर दिया। यह दर्शाता है कि भगवान केवल अपराध नहीं देखते, बल्कि भाव को देखते हैं। जो उन्हें विष पिलाने के लिए आया, यदि उसका भी उद्धार कर सकते है तो तुम्हारा क्यों नहीं कर सकते है। जब मानव अहंकार और स्वार्थ छोड़कर भगवान की शरण में जाते हैं, तो वे अवश्य हमारा उद्धार करते हैं, हमारे पापों का नाश करते हैं और हमें जीवन के दुखों से मुक्त कर मोक्ष की ओर ले जाते हैं।

जो व्यक्ति सच्चे मन से भगवान की शरण में आ जाता है, उसकी रक्षा स्वयं भगवान करते हैं। महाभारत में पांडवों के जीवन को इसका सबसे बड़ा उदाहरण बताया गया है। अनेक कठिनाइयों, षड्यंत्रों और संघर्षों के बावजूद पांडव कभी धर्म के मार्ग से नहीं हटे और भगवान श्रीकृष्ण पर अटूट विश्वास बनाए रखा। इसी कारण अंततः विजय पांडवों की हुई। जीवन में कितनी भी बड़ी चुनौती क्यों न आए, यदि हमारी श्रद्धा भगवान में अटल है और हम धर्म के मार्ग पर चल रहे हैं, तो कोई भी शक्ति हमें पराजित नहीं कर सकती।

कथा में गोवर्धन परिक्रमा महोत्सव धूमधाम से मनाया गया। इस पावन अवसर पर भक्तों ने गिरिराज महाराज की परिक्रमा कर पुण्य लाभ प्राप्त किया। पूरा कथा पंडाल भजन-कीर्तन, जयकारों और भक्तिमय वातावरण से पूरा क्षेत्र गुंजायमान हो उठा। भक्तों ने गिरिराज महाराज के चरणों में अपनी आस्था अर्पित करते हुए सुख, शांति और समृद्धि की कामना की। भक्ति , उत्साह और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण इस महोत्सव ने सभी भक्तों के हृदय को आनंद और श्रद्धा से भर दिया।

अपने बच्चों को अवश्य कथा में लेकर आएं। उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में बच्चों को केवल आधुनिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि धार्मिक और नैतिक संस्कारों की भी आवश्यकता है। श्रीमद्भागवत कथा, सत्संग और संतों का सान्निध्य बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कथा श्रवण से बच्चों के मन में भगवान के प्रति श्रद्धा, माता-पिता के प्रति सम्मान, बड़ों के प्रति आदर और समाज के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित होती है। जिस प्रकार हम अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए उन्हें विद्यालय भेजते हैं, उसी प्रकार उनके चरित्र और संस्कारों के निर्माण के लिए उन्हें कथा और सत्संग से जोड़ना भी आवश्यक है।

देश में सनातन बोर्ड का निर्माण होना चाहिए। जिस दिन सनातन बोर्ड का निर्माण हो जाएगा और देश के सभी मंदिर उस बोर्ड के अधीन आ जाएंगे, उस दिन मंदिरों की अपार धन-संपत्ति, दान और संसाधनों का उपयोग मानवता की सेवा और सनातन धर्म के उत्थान में किया जा सकेगा। इन संसाधनों से गौसेवा, निशुल्क भोजन वितरण, विद्यालयों की स्थापना, धर्मशालाओं का निर्माण, गरीब कन्याओं के विवाह, असहाय रोगियों की चिकित्सा, वृक्षारोपण तथा समाज के कमजोर वर्गों के कल्याण जैसे अनेक पुण्य कार्य किए जा सकेंगे।

तिलक को शुभता, सम्मान और धार्मिक पहचान का प्रतीक माना गया है। तिलक लगाने से व्यक्ति को अपने धर्म, कर्तव्यों और संस्कारों की स्मृति बनी रहती है। पूजा, पाठ, यज्ञ, कथा या किसी भी शुभ कार्य से पहले तिलक लगाना चाहिए। तिलक मस्तक के उस स्थान पर लगाया जाता है जिसे आज्ञा चक्र कहा जाता है, जो एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का केंद्र माना जाता है।

यदि हमें अपने जीवन और चरित्र का सही निर्माण करना है, तो हमें श्रीमद्भगवद्गीता और रामायण के आदर्शों को अपनाना होगा। रामायण हमें मर्यादा, कर्तव्य और आदर्श जीवन जीने की शिक्षा देती है, जबकि गीता हमें कठिन परिस्थितियों में भी सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। आज की युवा पीढ़ी यदि इन महान ग्रंथों का अध्ययन कर उनके संदेशों को अपने जीवन में उतारे, तो वह एक सफल, संस्कारी और चरित्रवान व्यक्ति बन सकती है।

मनुष्य खाली हाथ इस संसार में आता है और खाली हाथ ही जाता है। इसलिए धन के अहंकार में पड़कर धर्म और मानवता को नहीं भूलना चाहिए। भगवान ने हमें जो सामर्थ्य और संपन्नता दी है, उसका एक भाग धर्म कार्यों में अवश्य लगाना चाहिए। धर्म के मार्ग पर चलकर किया गया दान, सेवा और सत्कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाता, बल्कि वह ईश्वर की कृपा और आत्मिक शांति का कारण बनता है।

श्रीमद्भागवत कथा का भव्य आयोजन

दिनांक: 06 से 12 जून 2026 तक

समय: दोपहर 3:30 बजे से

स्थान: मेला ग्राउंड, रेलवे स्टेशन के पास, मुलताई, बैतूल (म.प्र.)

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *