हमारा जन्म सनातन धर्म में हुआ, जहाँ वेद, उपनिषद, श्रीमद्भगवद्गीता, रामायण और श्रीमद्भागवत जैसे दिव्य ग्रंथ जीवन को सही दिशा प्रदान करते हैं। सनातन धर्म हमें सिखाता है कि ईश्वर तक पहुँचने के अनेक मार्ग हो सकते हैं, परंतु उनका मूल उद्देश्य प्रेम, भक्ति और सदाचार है। इसलिए हमें अपने धर्म पर गर्व करते हुए उसके आदर्शों—सत्य, अहिंसा, दया, सेवा और परोपकार—को अपने जीवन में उतारना चाहिए। जब हम इन मूल्यों का पालन करते हैं, तभी हम वास्तव में सनातन धर्म की महिमा को समझते और उसका सम्मान करते हैं। सनातन केवल एक धर्म नहीं, बल्कि मानवता, संस्कृति और आध्यात्मिक ज्ञान की अमूल्य धरोहर है।

परोपकार से बड़ा कोई पुण्य नहीं माना गया है। हमारे धर्मग्रंथों में भी बताया गया है कि जो व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से दूसरों की सहायता करता है, वह ईश्वर की सच्ची सेवा करता है। किसी भूखे को भोजन कराना, जरूरतमंद की सहायता करना, दुखी व्यक्ति को सहारा देना और समाज के कल्याण के लिए कार्य करना परोपकार के श्रेष्ठ रूप हैं। ऐसे कार्य न केवल दूसरों के जीवन में खुशियाँ लाते हैं, बल्कि करने वाले के जीवन को भी शांति, संतोष और पुण्य से भर देते हैं।

राजा परीक्षित महान धर्मात्मा और भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त थे। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि सात दिनों के भीतर तक्षक नाग के दंश से उनकी मृत्यु होने वाली है, तब उन्होंने सांसारिक मोह-माया का त्याग कर गंगा तट पर बैठकर भगवान की कथा श्रवण का संकल्प लिया। जीवन अनिश्चित है, इसलिए मनुष्य को समय रहते भगवान का स्मरण, सत्संग और भक्ति का आश्रय लेना चाहिए। राजा परीक्षित ने अपने अंतिम सात दिनों में परम ज्ञानी शुकदेव जी से श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण किया और भगवान की भक्ति के द्वारा मोक्ष प्राप्त किया।

हर सनातनी के माथे पर तिलक अवश्य होना चाहिए, क्योंकि तिलक केवल एक चिन्ह नहीं, बल्कि हमारी आस्था, संस्कृति और सनातन पहचान का प्रतीक है। तिलक धारण करने से भगवान के प्रति श्रद्धा प्रकट होती है और व्यक्ति को अपने धार्मिक कर्तव्यों तथा आदर्शों का स्मरण बना रहता है। प्राचीन काल से ऋषि-मुनि, संत और भक्त तिलक धारण करते आए हैं, जो भक्ति और आध्यात्मिकता का प्रतीक माना जाता है।

जिस धरती पर हम चलते हैं, जिस मिट्टी से हमारा शरीर पोषित होता है और जिससे हमारा जीवन जुड़ा है, उसका आदर करना हमारा धर्म है। पृथ्वी की पूजा केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का माध्यम है। जब हम पृथ्वी को माता मानकर उसका सम्मान करते हैं और पर्यावरण की रक्षा करते हैं, तभी हम अपनी संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों के प्रति अपना कर्तव्य निभाते हैं।

हमें सदैव अपने धर्म की रक्षा करनी चाहिए। धर्म की रक्षा का अर्थ केवल उसके बारे में बोलना नहीं, बल्कि उसके आदर्शों को अपने जीवन में अपनाना भी है। सत्य, करुणा, सेवा, सदाचार, परोपकार और संयम जैसे गुणों का पालन करके हम अपने धर्म की वास्तविक रक्षा कर सकते हैं। जब हम अपने आचरण से अच्छे संस्कारों का परिचय देते हैं, तब समाज में धर्म और संस्कृति की प्रतिष्ठा बढ़ती है।

अपने बच्चों को नशे से दूर रखना हर माता-पिता की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। नशा न केवल स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि व्यक्ति के भविष्य, शिक्षा, चरित्र और परिवार पर भी गंभीर प्रभाव डाल सकता है। बच्चों को बचपन से ही अच्छे संस्कार, सही संगति और स्वस्थ जीवनशैली की शिक्षा देनी चाहिए, ताकि वे गलत आदतों से दूर रह सकें।

श्रीमद्भागवत कथा का भव्य आयोजन
दिनांक: 06 से 12 जून 2026 तक
समय: दोपहर 3:30 बजे से
स्थान: मेला ग्राउंड, रेलवे स्टेशन के पास, मुलताई, बैतूल (म.प्र.)

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