महाराज श्री ने भक्तों को पूज्य शुकदेव जी महाराज का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि शुकदेव जी महाराज जन्म से ही परम ज्ञानी, वैराग्यवान और भगवान के अनन्य भक्त थे। उन्होंने संसार के मोह-माया को त्यागकर भगवान की भक्ति और आत्मज्ञान का मार्ग अपनाया। उनके श्रीमुख से प्रवाहित हुई श्रीमद्भागवत कथा ने राजा परीक्षित सहित असंख्य जीवों का कल्याण किया। शुकदेव जी का जीवन हमें सिखाता है कि सच्चा सुख संसार की वस्तुओं में नहीं, बल्कि भगवान के चरणों में है।
हर व्यक्ति को जीवन में एक बार नहीं, बार-बार श्रीमद्भागवत कथा अवश्य सुननी चाहिए। जैसे शरीर को स्वस्थ रखने के लिए प्रतिदिन भोजन की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार आत्मा की शुद्धि और मन की पवित्रता के लिए कथा श्रवण आवश्यक है। कथा के माध्यम से मनुष्य भगवान की लीलाओं, भक्तों के आदर्श जीवन और धर्म के गूढ़ सिद्धांतों को समझता है। श्रीमद्भागवत कथा वह अमृत है जो मनुष्य को मृत्यु के भय से मुक्त होकर अमर आत्मा के सत्य का बोध कराती है। यह जीवन को केवल सफल ही नहीं, बल्कि सार्थक बनाने का मार्ग दिखाती है।
माथे पर तिलक, हाथ में कलावा और गले में कांठी होना आवश्यक है। शास्त्र कहते हैं कि जिसके माथे पर तिलक नहीं होता, वह पाप का भागी होता है। माथे पर तिलक लगाने से व्यक्ति के मस्तिष्क में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और वह मानसिक शांति का अनुभव करता है। हाथ में बंधा कलावा रक्षा, शुभता और संकल्प का प्रतीक माना जाता है | तिलक लगाने से मन में सकारात्मकता, एकाग्रता और आत्मविश्वास का संचार होता है तथा व्यक्ति को मानसिक शांति और आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति होती है।
बचपन वह अवस्था है जब मन निर्मल, हृदय निष्कपट और विचार पवित्र होते हैं। ऐसे समय में किया गया भजन, कथा-श्रवण या सत्संग केवल एक कर्म नहीं होता, वह संस्कार का बीज होता है, जो आगे चलकर जीवन के हर क्षेत्र में शुभ फल देता है। जो माता-पिता अपने बच्चों को कथा श्रवण कराते हैं, वे उन्हें केवल धर्म नहीं दे रहे, बल्कि एक दिव्य जीवन दृष्टि दे रहे हैं। कथा का श्रवण करने से बच्चों के मन में ईश्वर के प्रति श्रद्धा, माता-पिता के प्रति आदर और समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव जाग्रत होता है।
श्रीमद्भागवत कथा का भव्य आयोजन
दिनांक: 06 से 12 जून 2026 तक
समय: दोपहर 3:30 बजे से
स्थान: मेला ग्राउंड, रेलवे स्टेशन के पास, मुलताई, बैतूल (म.प्र.)