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2Jul 2020

जीवन में सबसे अनमोल रत्न है मधुर वाणी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 28 जून से 4 जुलाई 2020 तक प्रतिदिन सायं 4 बजे से 7 बजे तक स्थान - ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर, वृन्दावन में पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि रामचरितमानस में नवधा भक्ति वर्णन करते समय कहा गया नौ भक्तियों में से जो मेरी तीसरी भक्ति है। वो गुरु के चरणों की सेवा है। गुरु के चरणों की सेवा हमें कमल के पुष्प की तरह करनी चाहिए। गुरु के चरण क्या है ? कमल के पुष्प और उनकी सेवा बढ़े मन योग से करनी चाहिए। मन क्रम वचन तीनो से गुरु के चरणों की सेवा करनी चाहिए। गुरु हमें इस भव सागर के बंधन से मुक्त करने का मार्ग बताते है। आप लोग नदी पार करते होंगे तो नाव में बैठकर आपने देखा होगा की नाव बह जाती है कब जब उसे कोई किसी से बांधे न। तो कोई ना हो और नाव बंधी ना हो तो नाव पानी में बह जाती है। अपनी जगह पर नहीं रहती। बैसे ही जीवन जो है खुली नाव है। ये संसार सागर ही नदिया है, हमारा जीवन ही नाव है। अगर इसे हमने कही बांधा नहीं तो ये संसार के किस कोने पर जाकर ठहरेगी कोई अता पता नहीं है। भक्ति , प्रेम समर्पण ही रस्सी है। और गुरु के प्रति श्रद्धा, विश्वाश गुरु के दिए हुए मन्त्र रुपी खुटे से बंधे रहो। तो संसार में कितने भी तूफ़ान आ जाये जीवन रूपी नईया बहेगी नहीं बल्कि डटी रहेगी।

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है। भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए। अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं। कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां !

कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है। श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

3Jul 2020

अगर वेद, पुराण, भागवत, ऋषिवाणी, भगवत प्रवचन सत्य है तो वो यक्ति कभी खाली हाथ नहीं जायेगा।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 28 जून से 4 जुलाई 2020 तक प्रतिदिन सायं 4 बजे से 7 बजे तक स्थान - ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर, वृन्दावन में पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने घर बैठे सभी भक्तों को भजन " प्रियाकांत जू हमारो हमें तेरो ही सहारो श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा गुरु पूर्णिमा महोत्सव में श्रीमद् भागवत का श्रवण आप सभी कर रहे है। इस भागवत कथा श्रवण में गुरु तत्व की गुरुदेव भगवान की कृपा होने पर किन - किन लोगो को भगवत प्राप्ति हुई। गुरु जिसके सामने आप अपने मन की बात कर सके। और मन की बात कहकर वहां से आज्ञा मिले उसे स्वीकार कर सके। तो निश्चित तौर पर आपको भी हरि मिलेंगे। गुरुदेव का सत्कार कैसा हो ,अनजाने में भी अपमान हो जाये तो भगवान क्षमा में नहीं करते। इन सब चीजों का ध्यान रखते हुए गुरु के बताये गए मार्ग पर चलना। महाराज जी ने क्रम बढ़ाते हुए कहा की सिंहनी का दूध या तो सिंहनी के बच्चे के पेट में ठहरता है या सोने के पात्र में। वैसे ही गुरु तो कृपा सहज करते ही है। लेकिन गुरु कृपा तभी होती है जब व्यक्ति उसका पात्र हो। और हमारे शास्त्रों में पात्रता का बहुत महत्त्व है। आप कुछ भी पाना चाहते हो पात्रता होना अनिवार्य है। तो वैसे ही शिष्य गुरु में पात्रता है की नहीं। जिनमे पात्रता नहीं है उन्हें कृपा कैसे मिलेगी।
पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा।

1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं।

2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे।

3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।

4Jul 2020

जो जीव श्रीमद्भागवत मन से सुनते हैं उनके जन्म जन्मांतर की प्यास हमेशा के लिए तृप्त हो जाती है।

“जीवन में गुरूर नहीं, गुरू की जरूरत है ।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 28 जून से 4 जुलाई 2020 तक प्रतिदिन सायं 4 बजे से 7 बजे तक स्थान - ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर, वृन्दावन में पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई।

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने घर बैठे सभी भक्तों को भजन "प्रियाकांत जू चरणों की" श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की सम्पूर्णता पर यज्ञ की फल की प्राप्ति जीव को होती है। जिन जीवो के ह्रदय में अपने गुरु के प्रति सच्ची निष्ठा होती है। उन्हें असंभव से असंभव लक्ष्य की भी प्राप्ति हो जाती है। हमें ये बात मन क्रम से समझ नहीं चाहिए। सबसे सबसे अगर कठिन कार्य कुछ है तो वो है भगवत प्राप्ति। धन दौलत तो कठिन प्रयास करो तो उससे मिल जाता है। परन्तु सबसे कठिन अगर कोई कार्य है तो वो है भगवत प्राप्ति। भगवान श्री कृष्ण के गुरु जी जिनके पास जाकर भगवान श्री कृष्ण ने विद्या अध्ययन किया। जब स्वयं संधिपन शिष्य थे। और अपने गुरु के यहाँ विद्या अध्ययन किया करते थे। उस समय बड़ी निष्ठा के साथ वो अपने गुरु के चरणों सेवा में रद्द थे। विद्या अध्ययन करने में चतुर थे ही साथ में सेवा करने में बढ़े चतुर थे। जब भी अवसर मिलता था सेवा कार्य से वंचित नहीं होते थे बस तत्व पर रहते थे। एक बार गुरु जी ने सभी शिष्यों को बुलाया और सभी शिष्यों से कहा की आप लोग कुछ दिनों के लिए अपने - अपने घर चले जाओं। बोले गुरु जी अभी विद्या अध्ययन तो पूरा नहीं हुआ गुरु जी बोले नहीं हुआ लेकिन मेरा समय विपरीत आने वाले है गुरु जी ने कहा मेरा समय कुछ उचित नहीं रहने वाला है उस समय मेरा स्वाथ्य बढ़ा विचित्र हो जायेगा। इसलिए तुम अपने - अपने घर चले जाओ और जब में स्वस्थ्य हो जाओगा तो तुमको बुला लूंगा। उस स्थिति में बहुत से लोग चले गए। लेकिन उनमे भी 10 -15 लोग गुरु भक्ति में निष्ट थे,अपने गुरु के प्रति सच्ची निष्ठा थी। इसलिए वो 10 - 15 लोग कम से कम नहीं गए। और कहा की अभी हम यही रहेंगे। आपकी सेवा करेंगे। समय विपरीत होगा तो क्या हुआ हम अपने गुरु की सेवा करेंगे। सत्य यह की सभी ऐसे नहीं होते। कुछ ही जो होते है वही श्रेष्ठ होते है। कुछ रुक गए गुरु जी ने फिर कहा की चले जाओ। अब धीरे - धीरे गुरु जी का स्वस्थ्य थोड़ा बिगड़ने लगा तो मानसिक स्थिति उनकी विचलित होने लगी और वो ऐसी होने लगी की कुछ भी उठाते किसी में भी मार देते। दो चार दिन जब थप्पड़ पड़ा तब तो ठीक रहा जब डण्डे पड़ने लगे तो बचे कूचे भी भाग गए, सब भाग गए। लेकिन अकेले एक डटे रहे शांति पूर्वक। और उन्होंने उस पथ को त्याग नहीं किया अपने गुरु के चरणों में एक दम निष्ठा के साथ बैठे रहे। स्थिति गुरु जी की ये हो गयी की वो मल मूत्र भी विस्तर त्यागने करने लगे। और वो मलमूत्र भी साफ करने लगे उनको स्नान भी कराते, उनके वस्त्र भी धोते और जब - जब गुरु जी के हाथ में डंडा या पत्थर आ जाता मारते भी तमाम शरीर पर चोट भी खाते। इसके बावजूद भी उन्होंने अपने गुरु जी की सेवा से मुँह नहीं मोड़ा। हर दर्द, हर दुःख सहते हुए हर कठनाई का सामना करते हुए संधिपन ने गुरदेव की पूजा करना, सेवा करना,उनकी देखभाल करना नहीं छोड़ा। समय फिर बदला धीरे - धीरे गुरुदेव स्वस्थ होने लगे गुरुदेव एक दम स्वस्थ हो गए। जब गुरु ठीक हो गए तो एक दिन संधिपन को देखा उनके शरीर पर तमाम घाव थे। संधिपन को अपने पास बैठाला पूछा तुम गए क्यों नहीं। तो संधिपन ने कहा गुरूजी आपकी सेवा से अधिक प्रिय मुझे प्राण नहीं लगे इसलिए में आपकी सेवा में रहा। अगर आपकी सेवा से प्रिय मुझे प्राण लगते तो में छोड़ के चला जाता। मेरे प्राणो का क्या मोल है आपकी सेवा का बड़ा मोल है गुरु देव। गुरुदेव ने ह्रदय से लगा लिया मेरे पास देने के लिए कुछ नहीं अब से मेरी जगह तुम यहाँ रहोगे तुम ही गुरु बनोगे मेरी जगह तुम पढ़ाओगे और मेरा आशीर्वाद है।की अखिल

नायक एक दिन तेरे इस गुरुकुल में आएंगे और तुमसे विद्या अध्यन करेंगे ये तेरी सेवा का ही फल है। गुरु भी अपने शिष्य को पुत्र वत प्यार करते है। अगर सच्चा शिष्य हो कोई तो।

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंत: सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा।

श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

5Jul 2020

भक्तों ने गुरु पूर्णिमा पर घर बैठे लाइव किया गुरु पूजन

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने घर बैठे सभी भक्तों को भजन "प्रियाकांत जू हमारो हमें तेरो ही सहारो" श्रवण कराया।

महाराज जी ने कहा की जब सनकादि ऋषियों के मन में एक ऐसा प्रश्न उभरा जिस प्रश्न का उत्तर ब्रह्मा जी भी देने में असमर्थ थे। जब ब्रह्मा जी की तीन पुकार सुनकर स्वयं भगवान हंस अवतार धारण करके आएं और उन्होंने सनकादि ऋषियों के उस प्रश्न का उत्तर दिया और उत्तर के साथ - साथ जो सबसे सुन्दर बात थी उन्होंने भक्ति योग को ही सर्वप्रथम मान्य किया। भगवान ने कहा की मैं भक्ति के ही द्वारा सहज प्राप्त हो सकता हूँ। योग के द्वारा नहीं, ज्ञान के द्वारा नहीं और भी संसार में जितने भी संसाधन है वो साधन मुझे सहज प्राप्त करा देंगे इस बात का कोई पता नहीं लेकिन भक्ति योग के माध्यम से मैं सहज ही जीव को प्राप्त हो सकता हूँ। भक्ति ही सर्वोपरे है। महाराज श्री ने कहा की जब जीव के मन यह भाव आये की मुझे भगवत प्राप्ति करनी है तो गुरु ही प्रथम श्रेणी है। जब गुरुदेव के द्वारा मंत्र प्राप्त हो तभी भगवान की प्राप्ति हो सकती है। परन्तु जिन लोगो के ह्रदय में ईश्वर प्राप्त करने की जिज्ञासा है। उन्हें ईश्वर हर हालत में मिलेंगे ही इसमें कोई संदेहे नहीं है। ध्यान मूलं गुरु मूर्ति , पूजा मूलं गुरु पदम् ! मन्त्र मूलं गुरु:वाक्यं , मोक्ष मूलं गुरु कृपा !! जब ध्यान करने बैठे तो गुरूजी की छवि हमारे नेत्रों में उसी समय आ जानी चहिए।

गुरदेव के चरणों की ही पूजा सर्व श्रेष्ठ है। तो जिनका सर गुरूजी चरणों में झुकता है। जो गुरूजी के चरणों में नमन करना जानते है। उनका सर दुनिया में कभी नहीं झुकता। कई बड़े घमंडी होते गुरु जी के पास में जाकर भी उनका सर नहीं झुकता। गुरूजी राधे राधे ऐसे बोलते है। उनका सर झुकेगा नहीं और सर झुकेगा नहीं तो पाप गिरेगा नहीं। पाप कैसे गिरे निचे इसके लिए तो आपको सर झुकना ही पड़ेगा। सर पर ही ना पाप रहता है। स्त्री हो अथवा परुष, पुरुष हो साक्षात् गुरु के आगे, गोविन्द के आगे सर झुकाकर प्रणाम करें। और स्त्री हो तो अर्ध प्रणाम जो किया जाता वैसे प्रणाम करें। तो आपके सर का पाप तुरंत आपको छोड़ देंगा। और आप निष्पाप हो जायेगें। प्रणाम करने की विधि से भी आपका रजोगुण समाप्त होता है। सतोगुण की जग्रति होती है। तो सतोगुण से ही गोविन्द की प्राप्ति होती है। जो गुरु जी ने कहे दिया उससे बड़ा कोई मंत्र नहीं है। सबसे बड़ा मंत्र जो गुरूजी ने कहे दिया। अरे बेटा तुम ये सेवा करलो ये भी मंत्र ही है। जो गुरुदेव के मुँह निकला प्रत्येक शब्द है वो सभी मंत्रो में श्रेष्ठ है। गुर के प्रत्येक वाक्य को वेद वाक्य समझकर जो जीव उसका पालन करता है क्या भगवान उससे दूर रहे पाएंगे। बिना सोचे समझे जिसको अपने गुरु के वाक्यों पर भरोसा है। भरत जी महाराज कहते है गुरु और माता - पिता के वाक्यों को जो सोचता है की ये मैं करूँ या न करूँ इतने में ही हमारे जीवन भर के सारा धर्म नष्ट हो जाता है। कब जब हम ये सोचते है की हमारे माता - पिता गुरु यह कहा तो मैं इसे करूं या नहीं उचित है या अनुचित है। इतने में ही हमारे सर पर पापों का भार बढ़ जाता है और धर्म हमारे को छोड़ देता है। हमें मोक्ष चाहिए और भगवत भक्तों को भगवान की सायुज्य भक्ति चाहिए। नित्य बैकुंठ वास चाहिए। जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी।बल्कि सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है।

28Jun 2020

धार्मिक परंपरा, संस्कृति आदि का पालन करना हम सबका दायित्व है।

धर्म व सत्य की सदैव रक्षा करते हैं भगवान

हमें हर स्थिति में अपने धर्म का निर्वहन पालन करना चाहिए।

धार्मिक परंपरा, संस्कृति आदि का पालन करना हम सबका दायित्व है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 28 जून से 4 जुलाई 2020 तक प्रतिदिन सायं 4 बजे से 7 बजे तक स्थान - ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर, वृन्दावन में पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के प्रथम दिवस पर घर बैठे सभी भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने घर बैठे सभी भक्तों को भजन श्रवण " श्री राधे गोविंद भजमन श्री राधे कराया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि संसार की बिषम परिस्थितियों के मध्य में रखकर हमको और आपको सभी को इस बात को समझना है परिस्थितियां अनुकूल हो या प्रतिकूल हो किसी भी स्थिति में धर्म नहीं छूटना चाहिए। क्योंकी शास्त्रों के मुताबिक सिर्फ धर्म ही जो कठिन परिस्थितियों में हमारा साथ निभाता है। संसार में परिस्थितियां तो बदलती रहती है। कभी अनुकूल तो कभी प्रतिकूल परिस्थितियां तो रहेगी ही परन्तु प्रेत्यक स्थिति पर परिस्तिथि में अगर हम और आप सभी धर्म का पालन करें। तो धर्म हमारी हर जगह से सुरक्षा करता है। भगवान ने मनुष्य को ही इतना श्रेष्ठ बनाया है की वो धर्म की रक्षा करें, धर्म की रक्षा करते हुए आगे बढ़े। जब मनुष्य धर्म की रक्षा करता है कठिन परिस्थितियों को भी सहता है। और कठिन परिस्थितियों में भी रहकर धर्म का कभी परित्याग नहीं करता तब उस स्तिथि में उस व्यक्ति की रक्षा स्वयं भगवान ही आकर करते है। वो फिर उसे असुरक्षित नहीं होने देते। धर्म रक्षा हम करें तो धर्म हमारी रक्षा करें।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

29Jun 2020

भोग विलास में रहने वाला व्यक्ति अंत में दुःख ही पाता है।

"भोग विलास में रहने वाला व्यक्ति अंत में दुःख ही पाता है।"

“साधु के एक क्षण का संग आपका जीवन सुधार सकता है।”

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 28 जून से 4 जुलाई 2020 तक प्रतिदिन सायं 4 बजे से 7 बजे तक स्थान - ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर, वृन्दावन में पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई। द्वितीय दिवस की भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया गया। कथा के द्वितीय दिवस पर घर बैठे सभी भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने घर बैठे सभी भक्तों को भजन श्रवण " हे मेरे गुरुदेव करुणा सिन्धु करुणा कीजिये।

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जीवन का सबसे बड़ा उत्सव हमारा जीवन अगर सन्दर्भ में कहा जाएँ, क्योंकि ज़िन्दगी तो पशु भी जी लेते है ।अब आ गए है तो जीना तो पड़ेगा ही लेकिन कोई मुस्कुराकर जीता है कोई परेशान होकर जीता है। तो हम अगर इस संसार में आये तो जिन्हें गुरुदेव की कृपा प्राप्त हुई है । उनका जीवन उत्सव है, महोत्सव है। सत्संग का बहुत बड़ा महत्त्व है हमारे जीवन में, सत्संग हमें बहुत कुछ देता है, जिन्हे जीवन में संतो का संग मिल जाये उन का जीवन क्या से क्या हो जाता है। इस संसार में सबसे बड़ा अगर सत्य है तो वह है। जितने भी युवा जीवन में सफलता चाहते हैं तो सबकुछ आपके विचारों पर निर्भर करता है। कई बार लोग निराश होते हैं,आपकी विचारधारा आपको सुख देती है, आपकी विचार धारा आपको दुख देती है। इस संसार में सब अपने अपने कर्मों का फल भोगते हैं। हमारे युवा बहुत जल्दी अपनी विचारधारा बदल लेते हैं, सुखी हो जाएं तो मेहनत का फल है, दुखी हो जाएं तो भगवान ये दुख मुझे क्यों दिया है। भगवान आपको दुख देते हैं, मेहनत आपको सुख देती है ऐसा नहीं है, ये सारा कमाल नजरिए का है, आप सिर्फ अपनी सोच बदलिए, सारी व्यवस्थाएं, सुविधाएं सब बदल जाएंगी।

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है। श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।

30Jun 2020

कलयुग में संत गुरूदेव के विचार ही हमे तार सकते हैं : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

कलयुग में संत गुरूदेव के विचार ही हमे तार सकते हैं : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 28 जून से 4 जुलाई 2020 तक प्रतिदिन सायं 4 बजे से 7 बजे तक स्थान - ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर, वृन्दावन में पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया। कथा के तृतीय दिवस पर घर बैठे सभी भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने घर बैठे सभी भक्तों को भजन "इक कोर कृपा की कर दो लाडली श्री राधे श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जो भी आधुनिक युग में आधुनिक संसाधनों के माध्यम से जो श्रीधाम वृन्दावन प्रियाकांत जू मंदिर से जुड़े है सभी हाथ जोड़े। मेरे प्यारे श्री प्रियाकांत जू की असीम अनुकम्पा गुरु शिष्य की इस परम्परा में युग युगान्तर से चली आ रही ये परम्परा निश्चित बात ये है कि अगर गुरु न हो तो मानव मानवता के सन्दर्भ में कुछ जान ही नहीं सकता। चाहे वो माँ गुरु हो चाहे गुरु पिता हो, चाहे वो गुरु अध्यापक हो कोई कला जो आप जानते हो कोई भी कला उसका कोई न कोई मूल जरूर है। जो भी आज तक आपने सीखा है। वो किसी कृपा है। स्वतः ही आपको प्राप्त नहीं हुआ है। जिनकी वजह से मेरा जीवन सुन्दर हुआ है। सांसारिक गुरु जैसे माँ - पिता अध्यापक महोदय और जो आधुनिक चीजे सिखाने वाले उनको में गुरु मानता हूँ। २ इस अध्यात्म जगत के गुरु जो आपको संसार में रहते हुए ईश्वर की रूप रेखा के बिषय में समझाते है। उनके गुणों के बिषय में समझाते है और उनसे कैसे मिला जा सकता इस सन्दर्भ को भी वो समझाते है। तो इस दृष्टि से देखा जाये तो वो गुरु जिन गुरु ने हमें ईश्वर के बिषय में ज्ञान दिया वो हमारे लिए महत्वपूर्ण है। इस भवसागर को पार करना है तो एक ऐसा सहारा चाहिए जिसके माध्यम से आप भवसागर से पार हो सके।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।

तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।

1Jul 2020

गुरु, माता - पिता इनकी आज्ञा का पालन बिना विचार करना चाहिए।

"गुरु, माता - पिता इनकी आज्ञा का पालन बिना विचार करना चाहिए।"

"सत्य कर्मों से ही सुख की प्राप्ति हो सकती है।"

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 28 जून से 4 जुलाई 2020 तक प्रतिदिन सायं 4 बजे से 7 बजे तक स्थान - ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर, वृन्दावन में पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। कथा के चतुर्थ दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने घर बैठे सभी भक्तों को भजन " गोविन्द जय-जय गोपाल जय-जय " श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि गुरु वो है जो ईश्वर और तत्व का दर्शन, बोध कराते है। और रामायण इसका एक प्रमाण देती है। ईश्वर के बोध को ईश्वर ही करा सकता है कोई और नहीं करा सकता। और ईश्वर का बोध कराता कौन है ? कथा, गुरु की वाणी में विराजमान होकर स्वयं भगवान ने ही आपके कल्याण के लिए ये परियोजन किया। ये कारण बनाया। गुरु कृपा के बगैर ना हरि को जाना जा सकता है, ना हरि को पाया जा सकता है। इसलिए गुरु में और गोविन्द में किंचित मात्र भी अंतर नहीं है। और जो अंतर समझते है वो भगवान से मिलने योग्य नहीं है। जो मार्ग गुरु देव बताये उस मार्ग को आखरी मार्ग समझकर उसपर चल पड़ना चाहिए। महाराज जी ने कहा की गुरु, माता - पिता इनकी आज्ञा का पालन बिना विचारे करना चाहिए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।

महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।

शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।

इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।

महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे। महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।

महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।

उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।" जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।

इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में घर बैठे सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

11Jun 2020

विश्व शांति मिशन ने 1 लाख से ज्यादा जरूरतमंदों तक पहुॅंचायी कोरोना राहत सेवा

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के आह्वान पर पूरे लाॅकडाउन के दौरान जारी रहे सेवा कार्य 
 
संस्था समितियों और शिष्यों ने देश के विभिन्न स्थानों पर सूखा राशन, भोजन, मास्क, सैनेटाईजर का किया वितरण 
 
कोविड-19 वायरस के चलते देशभर में लागू लाॅकडाउन के बीच विश्व शांति सेवा मिशन द्वारा जरूरतमंद परिवारों एवं व्यक्तियों को दी जा रही राहत सेवा का समापन किया गया। अंतिम दिवस संस्था पदाधिकारियों ने ब्रज के दर्जनों जरूरमंद लोक कलाकारों को राशन सामग्री प्रदान की । मिशन द्वारा सम्पूर्ण लाॅकडाउन में भोजन, राशन, मास्क, सैनिटाईजर, आदि के रूप में में 1 लाख से ज्यादा लागों तक राहत सहायता पहुॅंचायी गयी है ।
 
मंगलवार को विश्व शांति सेवा चैरीटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में कोविड-19 राहत सेवा के अंतर्गत कृष्णानगर स्थित पार्क में लाॅक डाउन से प्रभावित लोक कलाकारों को आटा, दाल, चावल, मिर्च मसाले आदि की राशन किट प्रदान की गयी। संस्था सचिव विजय शर्मा जी ने तीन दर्जन से ज्यादा कलाकारों को यह राहत सामग्री भेंट की। इस मौके पर डा0 दीपक गौस्वामी, लोक कलाकार खेमचन्द यदुवंशी, वार्ड पार्षद मोनू अरोड़ा, अतुल उपाध्याय एवं अन्य विशिष्टजन उपस्थित रहे । 
 
इस अवसर पर विजय शर्मा जी ने कहा कि संस्था अध्यक्ष पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के निर्देशन में लाॅकडाउन के प्रारम्भ से ही राहत सामग्री का वितरण किया गया है। महाराजश्री के आव्हान पर देशभर में विभिन्न स्थानों पर संचालित संस्था सेवा समिति सदस्यों ने भी जरूरतमंद एवं निर्धन परिवारों की सेवा में बढ़चढ़कर सहयोग किया है।
 
1 लाख से ज्यादा लोगों तक पहुॅंचायी सेवा राहत - 
 
संस्था सचिव विजय शर्मा जी ने जानकारी देते हुये बताया कि पूरे लाॅकडाउन के दौरान संस्था एवं समिति सदस्यों ने 1 लाख से ज्यादा लोगों को राहत सेवा प्रदान कर स्वयं को गौरवान्वित किया है। ब्रज के अतिरिक्त अन्य स्थानों पर भी सेवा कार्य किये गये। इसमें औसतन 4 सदस्यों वाले 11 हजार 300 परिवारों को कच्चे भोजन सामग्री की राशन किट, मथुरा-वृन्दावन में संस्था द्वारा वितरिक की गयी वहीं संस्था की अन्य प्रदेशों में कार्यरत सेवा समितियों ने भी ऐसे 5 हजार से अधिक परिवारों को सूखा राशन वितरित किया। इसके साथ ही संस्था, समितियों द्वारा विभिन्न स्थानों पर 22 हजार करीब लोगों को पका हुआ भोजन एवं 20 हजार से ज्यादा लोगों को मास्क, सैनिटाईजर आदि वितरित किये गये। 
 
उन्होने कहा कि संस्था द्वारा पूरी राहत सेवा हेतु किसी भी प्रकार का दान ग्रहण नहीं किया गया। सदस्य, शिष्यों सेे अपने आस-पास के जरूरतमंद लोगों की मदद करने का संदेश देवकीनंदन महाराज द्वारा किया गया।
 
पीएम केयर्स में 50 लाख का योगदान -
 
मीडिया प्रभारी जगदीश वर्मा ने बताया कि संस्था द्वारा कोरोना राहत हेतु 11 लाख रूपये पीएम केयर्स में जमा कराये गये । संस्था प्रमुख एवं भागवत प्रवक्ता पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने देशभर में फैले अपने शिष्यों से भी इस आपदा में देश एवं प्रदेश सरकार को सीधे सहायता भेजकर योगदान देने का आव्हान किया था। जिसमें 22 लाख रूपये की एकमुश्त राशि बैंगलौर निवासी उनके शिष्य मुकेश शर्मा ने हरियाणा एवं कर्नाटक सरकार के राहत कोष में जमा करायी । इसके अतिरिक्त अन्य स्थानों के शिष्यगगण भी अलग-अलग सहयोग राशि सीधे पीएमकेयर्स को भेंट कर इस सेवा कार्य में शामिल हुये । 
 
वास्तविक जरूरतमंद परिवारों को चयन कर दी सहायता -
 
लाॅकडाउन के दौरोन विश्व शांति मिशन के सेवा प्रकल्प में संस्था के सदस्यों ने वास्तवित जरूरतंद परिवारों का चयन कर उन्हें प्राथमिकता से सूखा राशन पहुॅंचाया । संस्था प्रबंधक गजेन्द्र सिंह ने बताया कि कार्यकर्ताओं ने सड़क किनारे रह रहे निराश्रित परिवारों एवं बस्तियों में निर्धन परिवारों को उनके पास जाकर राशन प्रदान किया । इनमें विकलांग एवं अशक्तजनों को विशेष रूप से शामिल किया गया । संस्था के पास मथुरा-वृन्दावन में कार्यरत विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं, निगम पाषर्द, मीडिया कर्मियों एवं राजनैतिक प्रतिनिधियों के माध्यम से भी जरूरतमंद व्यक्तियों की सूची पहुॅंचायीं गयीं । जिन पर उनकी उपस्थिति में समयानुसार राहत सामग्री वितरित की गयी । 
 
लाॅकडाउन नियमों को लेकर करते रहे जागरूक -
 
पूरे लाॅकडाउन के दौरान भागवत प्रवक्ता देवकीनदंन महाराज शोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को लाॅकडाउन में घरों में रहने एवं सरकार द्वारा जारी सुरक्षा नियमों का पालन करने के प्रति जागरूरक करते रहे । वहीं संस्था कार्यकर्ताओं ने लोगों में राशन वितरण से पूर्व मास्क पहनाकर एवं सेनेटाईजर से हाथ धुलवाकर शोशल डिस्टैंसिंग एवं सफाई के प्रति संदेश फैलाया । 
 
सफाई एवं पुलिस कर्मियों का सम्मान करने स्वयं पहुॅंचे पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज -
 
लाॅकडाउन के दौरान संस्था ने वृन्दावन में 5 दर्जन से ज्यादा सफाई कमिर्यों को राशन सामग्री एवं सैनिटाइजर वितरित किया। इस अवसर पर श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज सफाई कर्मियों एंव पुलिस कर्मियों का सम्मान करने स्वयं पहुॅचे। उन्होने स्वच्छता कमिर्यों पर पुष्पवर्षा कर उनका मनोबल बढ़ाया वहीं उपस्थित पुलिसकर्मियों का ऐसे मुश्किल समय में अनवरत सेवा करने के लिये आभार व्यक्त किया । इसके अतिरिक्त संस्था ने मथुरा में कार्यरत 150 से ज्यादा मीडियाकर्मिर्यों को मास्क, सैनिटाईजर, ग्लब्स आदि की सुरक्षा किट प्रदान कर उनका अभिनंदन किया ।
 
मथुरा-वृन्दावन में प्रमुख कार्यकर्ताओं ने सम्भाले रखी वितरण की जिम्मेदारी -
 
70 दिन के लाॅकडाउन में संस्था द्वारा किये गये राहत सामग्री वितरण में 1 दर्जन से ज्यादा प्रमुख कार्यकर्ताओं ने संक्रामक माहौल में भी निरन्तर अपनी सेवा प्रदान की । वृन्दावन स्थित शांति सेवा धाम में राहत सामग्री पैकेट तैयार किये गये । यहाँ से इन्हें मथुरा-वृन्दावन के विभिन्न स्थानों तक वितरण हेतु पहुॅंचाया जाता था।
 
प्रमुख कार्यकर्ता विष्णु शर्मा ने बताया कि शुरूआत में प्रतिदिन मिलते कोरोना मरीज की खबरें डराने वाली थीं लेकिन बाद में सेवा में आनंद आने लगा तो यह सब सामान्य लगने लगा । कहा कि संस्था सचिव विजय शर्मा के नैतृत्व में सुरक्षा प्रबन्धों का विशेष ध्यान रखकर सेवा संकल्प को पूर्ण किया गया । बीच में एक बार देवकीनंदन महाराज ने आकर स्वंय व्यवस्थाओं को परखा और तारीफ की तो हमारा हौंसला और भी बढ़ गया ।
 
कार्यकर्ताओं में प्रमुख रूप से कमल शर्मा, विष्णु दत्त, राहित, अमित शर्मा, नीरज भारती, दिनेश शर्मा, धमेन्द्र सिंह, अंकित, शिवम, रामजीवन, भूदेव शर्मा, राहुल मिश्रा, संजय, परसोती शर्मा, गौरी, अरविन्द आदि शामिल रहे ।

2Jun 2020

हमें अपने दिल और दिमाग का अच्छी जगह इस्तेमाल करना चाहिए

श्रीमद भागवत कथा साक्षात् भगवान श्री कृष्ण ही है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 27 मई से 2 जून 2020 तक प्रतिदिन सुबह 9: 00 बजे से स्थान - ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर, वृन्दावन में पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई।कथा के सप्तम दिवस पर घर बैठे सभी भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने घर बैठे सभी भक्तों को भजन " हरि शरणम, हरि शरणम " श्रवण कराया”।

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि शिष्य और गुरु का सम्बन्ध ही जुड़ता है अध्यात्म के लिए परमात्मा के लिए जो इस जीवन में सही मायने में गुरु और शिष्य परम्परा का मतलब जानते है। वो धर्म के कार्यो को आगे बढ़ाने में पीछे नहीं रहते। क्यों की गुरु मंत्र लिया ही है इसलिए भगवत प्राप्ति के लिए तो गुरु पूर्णिमा पर हजारो - हजारो लोग यहाँ आते थे। यह इस बार संभव नहीं हो पायेगा। इसलिए सभी शिष्यों के लिए श्रीमद भगवत कथा क्योंकी यह मुक्ति, भक्ति समस्त फलों को प्रदान करने वाली है। इसलिए भगवत कथा का आयोजन होगा।

1Jun 2020

आयु, विद्या, यश और शक्ति ये चार चीजे बड़ों का आदर करने पर मिलती हैं।

उत्सव वही जो मेरे जीवन के सम्बंध को गोविन्द से जोड़ दे।

"आयु, विद्या, यश और शक्ति ये चार चीजे बड़ों का आदर करने पर मिलती हैं।"

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 27 मई से 2 जून 2020 तक प्रतिदिन सुबह 9: 00 बजे से स्थान - ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर, वृन्दावन में पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के षष्ठम दिवस पर घर बैठे सभी भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने घर बैठे सभी भक्तों को भजन "करनी है दो बातें तुमसे, फिर से दर्शन पाना है,. हे गोविन्द सब ठीक करो, हमे वृंदावन में आना है।" श्रवण कराया”।

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि उत्सव वही जो मेरे जीवन के सम्बंध को गोविन्द से जोड़ दे। होटलो में, बोतलों में जीवन गवाना व्यर्थ है नष्ट हो जाता है मानव जीवन। उत्सव वही है की कोई भी उत्सव मानाने की घड़ी हो सीधे ठाकुर जी से जोड़ दिया जाएँ। हमारे धर्म में बच्चों के लिए बड़ो से आशीर्वाद लेने का बहुत महत्व है। जब हम बड़ों से आशीर्वाद लेते हैं तो हमारे जीवन में यदि अमंगल होना होता है तो वो भी टल जाता है क्योंकि सतपुरुष के आशीर्वाद में अमंगल को मंगल करने की शक्ति होती है। आयु, विद्या, यश और शक्ति ये चार चीजे बड़ों का आदर करने पर मिलती हैं। इनमे सभी बड़ी दौलत यश है की आपके जाने के बाद आपके बारे में समाज बात करें।

31May 2020

उत्सव में सम्मिलित होते है उनके सभी अमंगल नष्ट हो जाते है।

विश्व के किसी भी कोने में चले जाइये लेकिन भगवान को मत भूलिए यही मानव की बड़ी सफलता है। विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 27 मई से 2 जून 2020 तक प्रतिदिन सुबह 9: 00 बजे से स्थान - ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर, वृन्दावन में पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के पंचम दिवस पर घर बैठे सभी भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने घर बैठे सभी भक्तों को भजन " जिसको नही है बोध तो,गुरु ज्ञान क्या करे " श्रवण कराया । पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि देश में विदेश में प्रदेश में रहो राधा रमण राधा रमण कहो। विश्व के किसी भी कोने में चले जाइये लेकिन भगवान को मत भूलिए यही मानव की बड़ी सफलता है। उत्सव में सम्मिलित होते है उनके सभी अमंगल नष्ट हो जाते है। सत्संग का बहुत बड़ा महत्त्व है हमारे जीवन में, सत्संग हमें बहुत कुछ देता है, जिन्हे जीवन में संतो का संग मिल जाये उन का जीवन क्या से क्या हो जाता है। इस संसार में सबसे बड़ा अगर सत्य है तो वह है मृत्यु।

30May 2020

कोरोना काल में संस्था लगातार कर रही है जरुरतमंदो की सहायता

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में मथुरा के एक गाँव में राशन सामग्री वितरण की गयी। संस्था पदाधिकारियों ने सैकड़ों जरूरतमंद परिवारों को दाल, आटा, चावल, तेल, मसाले आदि सूखे राशन की किट प्रदान की।

 

30May 2020

कोरोना के संकट से कई गुना बड़ा है भक्तों का साहस

सभी भक्तों का साहस कोरोना के संकट से कई गुना बड़ा है।

"धैर्य रखने से उन परिस्थितियों में भी सफल हो जाते हैं जो कि एक निश्चित असफलता जान पड़ती है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 27 मई से 2 जून 2020 तक प्रतिदिन सुबह 9: 00 बजे से स्थान - ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर, वृन्दावन में पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को श्रवण करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। कथा के चतुर्थ दिवस पर घर बैठे सभी भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने घर बैठे सभी भक्तों को भजन अच्चुतम "केशवं कृष्ण दामोदरं" श्रवण कराया”।

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि कोरोना के चले कुछ लोगो के मन अस्थिरता जाग्रत हुई।कुछ लोगो को लगता है हमारी नौकरी का, हमारे काम का क्या होगा। काफी लोग तो इतना नकारात्मक सोच लेते है। अब तो भूख के मारे हमारे प्राण ही चले जायेंगे। हमारे बच्चो का लालन - पालन कौन करेगा। महाराज जी ने कहा की मैं आपके इस दुःख में आपके साथ हूँ। परन्तु आपको भी मेरे विचारों में थोड़ी सी अपनी सहमति रखनी चाहिए। और वह सहमति वह है। आप हमेशा निगेटिव मत सोचिए हमेशा पॉजिटिव सोचिए। पॉजिटिव सोचने के लिए बहुत कुछ है। मैं ठाकुर जी के समक्ष बैठकर ठाकुर जी ही शायद मुझे प्रेरणा दे रहे ये बोलने के लिए। हमारे करने से होता क्या है। होता तो वही है जो श्री कृष्ण चाहते है।

26May 2020

धार्मिक कार्यों से जुड़े कलाकारों को लाॅकडाउन में दी गई राशन सामग्री

ठा. श्री प्रियाकान्तजू मंदिर की ओर से रासमण्डली में कार्यरत एवं विभिन्न धार्मिक कार्यों से जुड़े कलाकारों को लाॅकडाउन में राशन सामग्री का वितरण किया गया। पूज्य श्री Devkinandan Thakur Ji महाराज के निर्देशन में संचालित सेवा सहायता के अन्तर्गत जरूरतमंद परिवारों को यह सामग्री भेंट की गयी।

शनिवार को रमणरेती मार्ग स्थित राधा विनोद लीला संस्थान पर विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के द्वारा संस्था के सचिव श्री विजय शर्मा जी ने सभी को सूखा राशन प्रदान किया। संस्था द्वारा 60 परिवारों को आटा, दाल, चावल,आलू, तेल, मिर्च मसाले आदि की राशन किट का वितरण किया गया। श्री विजय शर्मा जी ने कहा कि प्रियाकान्तजू भगवान की प्रेरणा पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज के निर्देशन में जरूरतमंद परिवारों को राशन सहायता प्रदान की जा रही है।

रासलीला मण्डली से जुड़े हुये जगदीश शर्मा जी, लक्ष्मण स्वामी जी, गोकुल गोस्वामी जी ,तुलसी स्वामी जी आदि ने कहा कि लाॅकडाउन के चलते धार्मिक आयोजन एवं मंदिर पट बंद होने से इनसे जुड़े लोगों के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है। इस अवसर पर शांति सेवा धाम प्रबंधक गजेन्द्र सिंह जी, कमल शर्मा जी, विष्णु शर्मा जी, संजू जादौन जी, जगदीश वर्मा जी आदि उपस्थित थे।

27May 2020

मनवांछित इच्छाओं को पूर्ण करती है भागवत - पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज

“मनवांछित इच्छाओं को पूर्ण करती है भागवत :पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज

श्रीमद भागवत कथा ही भक्ति का गंगा सागर है। : पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 27 मई से 2 जून 2020 तक प्रतिदिन सुबह 9: 00 बजे से स्थान - ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर वृन्दावन में पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के प्रथम दिवस पर घर बैठे सभी भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने घर बैठे सभी भक्तों को भजन "हमारो धन प्रियाकांत जू प्यारो" श्रवण कराया”।

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि सच्चिदानंद स्वरूप भगवान श्री कृष्ण को हम नमस्कार करते है। उनको नमन करते है। जो जगत की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश के हेतु है। तथा आध्यात्मिक
आदिदैविक और आदिभौतिक इन तीनो प्रकार के तापो का जो नाश करने वाले है। उन सच्चिदानंद परमात्मा सर्वेश्वर को हम कोटि - कोटि नमन करते है।

28May 2020

जब जीव असत्य बोलता है तो होती है अधर्म की वृद्धि

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 27 मई से 2 जून 2020 तक प्रतिदिन सुबह 9: 00 बजे से स्थान - ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर, वृन्दावन में पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई। द्वितीय दिवस की भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया गया। कथा के द्वितीय दिवस पर घर बैठे सभी भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने घर बैठे सभी भक्तों को भजन " राधे राधे गाले मनवा " श्रवण कराया”।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान की भक्ति दिनों - दिन कैसे बढे ? अपने तीन कामो पर ध्यान देंगे तो आपकी भक्ति बढ़ जाएगी। जब व्यक्ति ये तीन काम करते है। तो इन तीन काम के करने से भक्ति कम होती है। और न करने से भक्ति बढ़ती है। है तो बड़ा महत्वपूर्ण जो सुनने समझने वालो के लिए जो साधक है उनके लिए। जो साधक इस बात को मन से समझेंगे निश्चित तौर पर ये तीन गुण आपको भगवान के बहुत करीब लेकर जायेंगे।

ये तीन अवगुण जो नहीं करने चाहिए। भक्ति बढ़ेगी। पहला अवगुण असत्य भाषा - जब जीव असत्य बोलता है। तो अधर्म की वृद्धि होती है। और अधर्म की वृद्धि होने पर भक्ति कम होती है। असत्य भाषा जीवन में नहीं होनी चाहिए। दूसरा - संसार में भौतिक सुखो में अशक्ति नहीं होनी चाहिए। किसी में भी दर्शन में, श्रवण में, वर्णन में अगर इनमे हमारी अशक्ति हो तो भी हम भक्ति से दूर हो जायेंगे। भजन के प्रति रूचि रहे। शक्ति किसमे हो सत्कर्मो में, वैराग्य किसमे हो संसार से और सत्य से प्रेम हो जाएँ तो भक्ति आपकी अपने आप बढ़ जाएगी। आपको कोई अधिक प्रयास नहीं करना होगा।

29May 2020

आपकी विचारधारा आपको सुख देती है

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 27 मई से 2 जून 2020 तक प्रतिदिन सुबह 9: 00 बजे से स्थान - ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर, वृन्दावन में पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया। कथा कथा के तृतीय दिवस पर घर बैठे सभी भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने घर बैठे सभी भक्तों को भजन "गोविंद हरे गोपाल हरे, सर्वेश्वर दीनदयाल हरे " श्रवण कराया”।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जितने भी युवा जीवन में सफलता चाहते हैं तो सबकुछ आपके विचारों पर निर्भर करता है। कई बार लोग निराश होते हैं, आपकी विचारधारा आपको सुख देती है, आपकी विचार धारा आपको दुख देती है। इस संसार में सब अपने अपने कर्मों का फल भोगते हैं। हमारे युवा बहुत जल्दी अपनी विचारधारा बदल लेते हैं, सुखी हो जाएं तो मेहनत का फल है, दुखी हो जाएं तो भगवान ये दुख मुझे क्यों दिया है। भगवान आपको दुख देते हैं, मेहनत आपको सुख देती है ऐसा नहीं है, ये सारा कमाल नजरिए का है, आप सिर्फ अपनी सोच बदलिए, सारी व्यवस्थाएं, सुविधाएं सब बदल जाएंगी।

23May 2020

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा लॉकडाउन 4 में राशन वितरण सामग्री

शांति सेवा धाम, ठा•श्री प्रियाकान्त जु मंदिर , वृन्दावन और विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट व पूज्य श्री Devkinandan Thakur Ji महाराज के दिशानिर्देशन में निरंतर लॉकडाउन_4 में राशन सामग्री का वितरण किया जा रहा है।

19Mar 2020

जीव वो है जो समय के भाव में बहता हुआ चला जाता है और सतपुरूष वो है जो समय को अपने साथ चलने को विवश कर देता है।  

जीव वो है जो समय के भाव में बहता हुआ चला जाता है और सतपुरूष वो है जो समय को अपने साथ चलने को विवश कर देता है।  

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एंव राधा कृष्ण सत्संग समिति बेमेतरा के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 13 से 19 मार्च 2020 तक कृषि उपज मंडी प्रांगण, बेमेतरा, छत्तीसगढ़ में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।
श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे हुए सभी भक्तों को भजन "अरे अभिमानी तेरी यही जिंदगानी" श्रवण कराया।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भारतीय हिन्दू संस्कृति का हमारे जीवन से बहुत बड़ा ताल्लुकात है। हमारी भारतीय संस्कृति जीवन को बड़ी सुन्दर दिशा दिखाने वाली है। हमारे द्वारा किए हुए कोई भी कर्म हमें अच्छा जीवन, रोगों से दूर और सुन्दर दिनचर्या जीने का अधिकार देते है। दुर्भाग्य से जो अपने आपको कुछ लोग पढ़ा लिखा समझते थे। बुद्धिजीवी उन्होंने हमारी भारतीय परंपरा का उपहास करना प्रारम्भ किया।और वो हमारी संस्कृति का उपहास उड़ाने लगें। जब हम किसी से मिलने के लिए हाथ जोड़कर नमस्ते करते थे। तो वो लोग हँसते थे। जब हम अंदर जाने से पहले अपने जूते घर से बाहर उतारे थे। और ढंग से हाथ मुँह धुलते थे। तो वो लोग है हम पर हँसते थे। जब हम गाय की पूजा करते थे तो वो लोग हम पर हँसते थे। जब हम किसी का अंतिम संस्कार करके हम घर आकर स्नान करते थे। तो वो लोग हम पर हसंते थे। हमारा मजाक उड़ाते थे। उपहास करते थे। लेकिन आज वही पूरा विश्व भारतीय संस्कृति का आदर करते हुए लोहा मान रहा है। और जो - जो हमारे ऋषि - मुनि करते थे वो हमें सलहा दे रहे। क्या यूरोप, क्या अमेरिका, क्या पेरिस, क्या डोनाल्ड ट्रम्प और जो भी है। आज हाथ मिलाने से सबको डर लग रहा है। क्यों ? क्योंकि आज सब ने ये मान लिया की सब हमें रोग दे सकते है। निरोग नहीं रख सकते। और हमारे ऋषि - मुनियों ने निरोगी जीवन जीने के लिए बहुत पहले ही ये उत्तम मार्ग बता दिए थे।
महाराज जी ने कहा कि आज हमारे ऋषि - मुनियों ने हमारे जीवन के लिए जो दिया है। वो कम नहीं है। बहुत ज्यादा है। अपने ऋषि मुनियों का कभी भी अनादर मत करों। उस संस्कृति को स्वीकार करों और आदर करों। प्रेम से उसका पालन करों जिसे पूरा विश्व आज मान रहा है। जो उस समय हम पर हँसते थे वो आज हम पर गर्व कर रहे है। आज वो हमारे दिनचर्या को अपना रहे है। कब ? जब वो विपत्ति में आ गए तब। तो विपत्ति में अच्छाई को अपनाना ये तो अलग बात है। लेकिन जीवन भर अगर हम अच्छाई को अपना ले। तो विपत्ति कभी आएगी ही नहीं।महाराज जी कहा की भारतीय सरकार जो भी आप से कहे कृपया उसका पालन करें। आपका शरीर, आपका जीवन आपके लिए महत्वपूर्ण है। आप स्वस्थ रहेंगे तो आगे भी अच्छे काम कर सकेंगे।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंत: सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

18Mar 2019

वही जीवन धन्य है जो भगवान के उत्सव में सम्मिलित हो।

वही जीवन धन्य है जो भगवान के उत्सव में सम्मिलित हो।

साफ दिल और शांत दिमाग से ही परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एंव राधा कृष्ण सत्संग समिति बेमेतरा के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 13 से 19 मार्च 2020 तक कृषि उपज मंडी प्रांगण, बेमेतरा, छत्तीसगढ़ में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के षष्टम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के षष्टम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे हुए सभी भक्तों को भजन "तेरी बिगड़ी बना देगी चरण रज राधा प्यारी की" श्रवण कराया।

आज कथा पंडाल में छत्तीसगढ़ सरकार मंत्री ताम्रध्वज साहू जी एवं विधायक आशीष छाबड़ा जी, पूर्व मंत्री डॉ.सियाराम साहू जी ने अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज जी से आर्शीवाद प्राप्त किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत में कहा कि श्रीमद भागवत कथा निश्चित तौर पर अगर श्रद्धा से श्रवण किया जायें तो फल मिलता ही है। भागवत महापुराण की कथा श्रवण करने का आपको भी प्रतक्ष्य में बहुत बड़ा फल मिला है। अब आप सोच रहे होंगे हमें क्या मिला है। महाराज जी ने तृतीय दिवस की कथा का क्रम याद दिलाते हुए कहा की भागवत कथा में कि बेजुबान पशुओं की बलि नहीं देनी चाहिए। और उससे हमारे देवी - देवता कभी प्रसन्न नहीं होते। लेकिन आज षष्टम दिवस है। और आज आपने अखबार में पढ़ा होगा की जिस जगह बहुत बड़ी संख्या में बलि दी जाती थी वहां के ट्रस्ट ने ही कहा की अभी हम इस साल बलि नहीं देंगे।महाराज जी ने कहा की भागवत में प्रार्थना की गई तीसरे दिन और पांचवे दिन तक भगवान ने वो सब स्वीकार करली। और हम सबके सामने ये प्रमाण आ गया की लीजिए। एक बात मैं धर्म के अनुसार कहना चाहूंगा। जिस पृथ्वी पर किसी भी पशु का रक्त गिरता है। बेजुबान पशुओं का रक्त गिरता है, निरअपराध पशुओं का रक्त गिरता है, वो पृथ्वी कभी भी सुख नहीं दे सकती हम सब को किसी को भी नहीं दे सकती । ये मेरे शास्त्र कहते है। प्रमाण है इस बात का। वे मौसम बारिश होती है, फसल खड़े होने पर बारिश आती है, ओले गिरते है, अँधिया आती है, तूफ़ान आ जाते है। और जितना भी नुक्सान प्रजा का हो सकता है। वो होता है। जानते हो क्यों ? क्यों कि देवी देवता प्रसन्न नहीं होते। तो आप से मैं एक आग्रह करूँगा ना सिर्फ छत्तीसगढ़ सरकार से ही अपितु भारत सरकार से भी प्रेत्यक प्रदेश की सरकार से की हम सबको चाहिए की हम अपने - अपने प्रदेशो में और अपने देश में किसी भी पशु बलि अर्थात हत्या को हमें पूर्ण रूप से विश्राम दे देना चाहिए। की कोई जीव हत्या कही नहीं होगी अगर होगी तो पहले मानव - मानव की हत्या करके देखे मानव की बलि चढ़ाकर देखो। जीव की पशु की बलि बाद में चढाओ पहले अपनी बलि चढ़ाकर देखो तब पता चलेगा की जीवन कितना प्रिय लगता है हम सबको। महाराज जी ने कहा की देखो पशुबलि बंद है उसका फल देखो बारिश होने वाली थी सूरज निकल आया। अगर बलि होती रहती तो आज फिर बारिश होती। ये बात भागवत महापुराण प्रतक्ष्य सुनते है श्री कृष्ण के रूप में। और आपको तो प्रतक्ष्य प्रमाण मिल गया इस बात का। इस भूमि को तो प्रतक्ष्य प्रमाण मिला। मैं उस ट्रस्ट को भी धन्यबाद उनके अधिकारियों को भी कहूंगा। की आप लोगो ने भागवत से की प्रार्थना में सहयोग किया।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।

17Mar 2020

भगवान का अवतार धर्म की स्थापना के लिए हुआ 

भगवान का अवतार धर्म की स्थापना के लिए हुआ 

जो अपने अहम् का त्याग नहीं करता वो कभी भगवान को नहीं पा सकता। 

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एंव राधा कृष्ण सत्संग समिति बेमेतरा के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 13 से 19 मार्च 2020 तक कृषि उपज मंडी प्रांगण, बेमेतरा, छत्तीसगढ़ में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के पांचवे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे हुए सभी भक्तों को भजन "मीठे रस से भरीयो री, राधा रानी लागे" श्रवण कराया।
आज कथा पंडाल में बीजेपी पूर्व मंत्री श्री ब्रजमोहन अग्रवाल जी ने अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज जी से आर्शीवाद प्राप्त किया।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि आप शाकाहारी बनिए और अपने बच्चो को भी शाकाहारी बनाइये यही मेरा आग्रह है आप सभी से। ये जो मौसम बदलते ही वायरस आते है। ये मासांहारी लोगो पर जल्दी असर होता है। जो शाकाहारी लोग होते है। उन पर इतनी जल्दी इसका असर नहीं होता है। इसलिए आप शाकाहारी बने रहे और अपने बच्चो को भी बनाकर रखे। एक जीव हत्या के पाप से आप बच जाइये। दूसरा आपका शरीर स्वस्थ रहेगा। और वैसे भी हमारा जो शरीर है मासांहार के लिए नहीं बना है।हमारा यह शरीर भगवान ने हर किसी को उसके शरीर के हिसाब से ही दांत दिए है। और पाचन शक्ति दी है। किस व्यक्ति को क्या खाना चाहिए। उस हिसाब से ही भगवान ने हम सबको इस संसार में भोजन उपलब्ध कराया है। हमारी पाचन शक्ति भी उतनी ही है।

महाराज जी ने कहा की मैंने कल आपको कहा था गाय घास खाती है। बहुत से लोग कहते है ताकत आएगी हम इसलिए मांस खाते है। लेकिन एक बात बताये जब आप गाड़ी खरीदते है तो उसमे शक्ति का एक नाम होता है कितने हौर्स पावर की है। हार्स पावर मतलब घोड़े की जान और वो घोडा हम मानवो कहता है अरे मानवो अगर ताकत बढ़ानी है तो मुझसे सीखो मांस में ताकत नहीं है। शाकाहारी सब्जियों में ज्यादा ताकत होती है। पहले तो जीव हत्या करों फिर मांस खाकर अपने शरीर की हत्या करों उसमे 500 रोग लगाओ। यह ठीक नहीं है। जो लोग मांसहार करने वाले है वो कभी शुद्ध ह्रदय वाले नहीं हो सकते। वो कभी भगवान की भक्ति सच्चे मन से नहीं कर सकते यह ध्यान रखना।

महाराज जी ने कहा की आप अपने शरीर पर काला रंग डालों और बहुत सा डालते ही चले जाओं क्या वो एक दो बार नहाने से साफ होगा ?? और जब काला रंग डालों ही नहीं तो कितना आसानी से साफ हो जायेगा। साफ करने की जरुरत ही नहीं पड़ेगी। वैसे ही अगर हम मांसवक्षण करें तो हमारा ह्रदय उसी काले रंग में रंगता चला जायेगा। तामसिक होता चला जायेगा तामसी को सात्विक होने में समय लगेगा। और अगर आप सात्विक आहार करेंगे शाकाहार करेंगे। तो मैं यकीन के साथ कहता हूँ एक बार कथा सुनोगे और आपका ह्रदय निर्मल हो जायेगा। और फिर आप भगवान का भजन निर्मल मन से कर सकोगे। तो मैं आशा रखता हूँ की आप व्यासपीठ से कही हुई बताओं का आदर करोगे। और अपने घर में शाकाहार बढ़ाओंगे। मांस खाना यह सब बंद करोगे। क्यों ? इससे न तो आप यह सुखी होगें और न आप वहा सुखी होगें।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।
महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।

17Mar 2020

युवा शांति सन्देश बेमेतरा, छत्तीसगढ़ 2020

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 13 से 19 मार्च 2020 तक कृषि उपज मंडी प्रांगण, बेमेतरा, छत्तीसगढ़ में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस से पूर्व युवा शांति सन्देश का आयोजन किया जिसमें युवाओं ने धर्म से जुड़े व अन्य कई "सवाल" किये जिसका महाराज श्री ने शास्त्रानुसार जवाब दिया। पूज्य महाराज श्री ने युवा पीढ़ी को धर्म के प्रति जवाबदेह बताते हुये कहा कि हमारे युवा सनातन धर्म और देश का भविष्य हैं।आधुनिकता का ताना देकर इन्हें दोषी मानकर छोड़ा नहीं जा सकता। युवा शक्ति केवल तब तक ही अदृश्य रहती है जब तक कि उन्हें जीवन के असली अर्थ से परिचित ना कराया जाये। यह जिम्मेदारी गुरू के साथ-साथ माता-पिता की भी बनती है। जिसने भागवत न सुनी हो, जिसने रामायण का सार न समझा हों उसे आध्यात्म का मर्म कैसे पता चलेगा।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

16Mar 2020

दूसरों की निंदा करना, दुनिया का सबसे बड़ा अवगुण है।

दूसरों की निंदा करना, दुनिया का सबसे बड़ा अवगुण है।

"सत्य कर्मों से ही सुख की प्राप्ति हो सकती है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एंव राधा कृष्ण सत्संग समिति बेमेतरा के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 13 से 19 मार्च 2020 तक कृषि उपज मंडी प्रांगण, बेमेतरा, छत्तीसगढ़ में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। कथा के चतुर्थ दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे हुए सभी भक्तों को भजन "सब छोड़ दिया सावरे तेरे पीछे ओह रसिया तेरे पीछे " श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि अगर हम भगवान के कथा मण्डव में जाए तो सबसे पहला काम होना चाहिए की हम शांति का दान दे । अगर हम शांति रखेंगे तो हमारे ह्रदय में शांति आएगी। वैसे भी मानवता की सुरक्षा के लिए मांसाहार सबसे बड़ा दुखदाई है। आज पूरा विश्व कोरोना के बजह से अगर परेशानी में है तो उसका कारण मांसवक्षण ही महत्वपूर्ण रोल पूरा कर रहा है। एक बात समझ लजिए अगर आप किसी को दुःख देंगे। तो आपको सुख मिलेगा इस बात की कोई गारंटी नहीं है। मांस खाने वाला आदमी बीमारी में सबसे ज्यादा गिरता है। पहले स्वीनफ़्लू आया था, अब ये कोरोना आया। ये ऐसी - ऐसी बीमारियाँ सबसे पहले उन्ही के ऊपर पराक्रमण करती है जो मांस खाते है। और मेरे भारत के माताएं - बहन भाई - बंधु ये नहीं चाहेंगे। की हमारी वजह से हमारी एक जीभ के स्वाद के वजह से हमारे बच्चों को भी इसका सामना ना करना पड़े। क्योंकि अगर आपको बीमारी लग गई तो बच्चो तक भी ये बीमारी पहुंच जायेंगी। क्यूंकि रहना तो उसी घर में है। तो इसलिए मानव जाति के कल्याण के लिए अपने परिवार के कल्याण लिए हमें मांस खाना बंद कर देना चाहिए। अब तो अमेरिका में भी लोग शाकाहारी हो रहे है। वह भी शाकाहारी को बड़े प्रेम से स्वीकार कर रहे है। शाकाहार हमारे ऋषि मुनियों की देन है। ये मांसवक्षण करना ये तो आश्रुरी प्रवर्ति है। ये हमको नहीं करना चाहिए। पशु बलि हमको नहीं देनी चाहिए, जीव हत्या हमको नहीं करनी चाहिए। ये सब इसलिय नहीं करना चाहिए। जिससे आपका और आपके परिवार का और आपके गांव का भला हो सके। जिससे देवी देवताओं की कृपा आपके ऊपर बनी रहे। यही मेरा उद्देश्य है। आप लोगो को पाप से दूर रखा जायें यही तो व्यासपीठ चाहती है।
महाराज श्री ने कहा कि हम इस कलिकाल में एक चीज देखते है। की जब हम भक्ति करने जाते है तो दुनिया वाले कहते अभी तुम्हारी उम्र नहीं है। स्पेशली यंग बच्चे, जवान जब कथा सुनने जाये। या आप लोग आये होंगे। आपके मित्र आपसे कहते होंगे अरे ! कोई उम्र है आपकी कथा सुनने की। कथा सुनने का मलतब लोग क्या समझते है। बुढ़ापे में सुनो लेकिन हाथ पैर काम न करें तो कथा सुनने का तो कोई लाभ ही नहीं। अगर कथा बचपन में सुने, तो बचे हुए जीवन में आप उस कथा में आपने जो सीखा है उसे आप अपने जीवन में उतार सके। अच्छा या बुरा आप अपने जीवन उतार सकेंगे। जब अच्छा और बुरा आप अपने जीवन में उतरेंगे तो वो पूरे जीवन में प्रियंत्र आपके काम आने वाला है। सीखेगे ही बुढ़ापे में तो उतरेंगे कब? पूरा जीवन तो पाप करते और बुढ़ापे में आकर एक अच्छी बात सिख ली तो जीवन में उतारने का समय ही नहीं मिला। तो कर्म का फल मिलेगा। सिखने का फल नहीं मिलेगा। फल तो मिलेगा आपने जो अच्छा सिखा है उसका कि अपने अच्छा सीखकर अपने जीवन में उसे उतारा। जब जीवन में उतारा ही जब कुछ अच्छा किया ही नहीं तो उसका क्या फल होगा। तो बहुत ज्यादा जरुरी है की हम जितना जल्दी हो सके और जितना अच्छा हो सके हमें अपने जीवन के प्रारंभिक समय में ही सिख लेना चाहिए। आपने अगर बचपन में सिख लिया तो जवानी में कोई गलत कदम आप उठाएंगे ही नहीं। क्योंकि आपको बचपन में सीखा दिया गया है। गलत का फल गलत ही होने वाला है। और अच्छे का फल अच्छा ही होगा।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।
महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।
शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।
इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।
दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।
महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

15Mar 2020

भोग विलास में रहने वाला व्यक्ति अंत में दुःख ही पाता है।

भोग विलास में रहने वाला व्यक्ति अंत में दुःख ही पाता है।

कलयुग में संत गुरूदेव के विचार ही हमे तार सकते हैं।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एंव राधा कृष्ण सत्संग समिति बेमेतरा के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 13 से 19 मार्च 2020 तक कृषि उपज मंडी प्रांगण, बेमेतरा, छत्तीसगढ़ में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया। कथा के तृतीय दिवस परहजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
आज कथा पंडाल में जिला बेमेतरा, जिला न्यायाधीश अविनाश त्रिपाठी जी ने अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज जी से आर्शीवाद प्राप्त किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे हुए सभी भक्तों को भजन "मेरे सिर पे हाथ रख दो राधा रानी" श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए इस संसार में बड़ा हो या छोटा अपनी मृत्यु कोई नहीं टाल सकता। चाहे रोड़ पर अपनी पूरी जिंदगी काटने वाला कोई दीनहीन हो, चाहे महलों में रखकर कोई राजा अपना पूरा जीवन विसर करने वाला हो। बावजूद इसके दोनों में समानता है की मृत्यु दोनों को ही हानि है, दोनों टाल नहीं सकेंगे।

महाराज जी ने कहा की सिंकंदर ने जब सारी दुनिया जीत ली थी और जब जीतने के बाद जब वो अपने घर को गया तो मृत्यु करीब थी उसकी। मरने से पहले वो अपनी माँ से मिलना चाहता था। और उसकी माँ उससे ज्यादा दूर पर थी। तो उसे लाने में 24 घंटे लगने थे। सिकंदर ने कहा की मैं मरने से पहले अपनी माँ का दर्शन करना चाहता हूँ। जिस माँ ने मुझे जन्म दिया है। जितने भी व्यक्ति लगे हुए थे उन्होंने कहा हम छमा चाहते है हमारे पास में इतना समय नहीं की हम आपको ये कहे सके। क्योंकि उनको लाने में 24 घंटे लगेंगे। सिकंदर ने कहा थोड़ा द्रव्य ज्यादा लेलो। आपकी जितनी फीस है उससे ज्यादा ले लीजिये। नहीं ! बोले ठीक है अगर नहीं मानते हो तो मैं अपना आधा साम्राज्य तुमको देता हूँ। लेकिन कम से कम कोई ऐसी व्यवस्था करों। जिससे मैं अपनी माँ का दर्शन कर सकूँ। जिसने मुझे जन्म दिया कम से कम उनसे दर्शन करलूँ । वैद्य डॉक्टर हकीम मौन रहे। उसके बाद सिकंदर ने कहा की अपना में पूरा साम्राज्य देता हूँ। पर मुझे 24 घंटे का जीवन देदो। वैद्य डॉक्टर हकीम ने कहा हम अपना पूरा बरक्स अपना पूरा 100 % भी दे रहे है आपको और भी कोशिश करें तो हम आपको 24 घंटे नहीं दे सकते। क्योंकि यह हमारे हाथ में नहीं है। हम सिर्फ इलाज कर सकते है। जीवन नहीं दे सकते। जीवन देने का काम तो किसी और का है। और उसकी एक - एक सेकेण्ड कीमती है। उसने जितना देना है उतना ही देना है। उससे ज्यादा नहीं। तो सिकंदर ने कहा मेरे पास इतना बड़ा सम्राज्य है किस काम का इतने बड़े साम्राज्य का मैं क्या करूँ। जिस साम्राज्य को प्राप्त करने के बाद में मैं अपनी माँ से भी ना मिल सकूँ। ये तो मेरे लिए बेकार ही है। किसी काम नहीं।

महाराज श्री ने कहा कि "संसार कहते ही उसको है जिसमे कोई सार नहीं है। दिखने में जो लगता कि हमारा है वास्तविक हामारा वो है ही नहीं। और जो दीखता ही नहीं जिसकी तरफ कभी सोचा ही नहीं वही हमारा है। आपकी आत्मा पर असर ईश्वर का है, आपके मन पर असर माया का है। और माया के चक्कर में संसार के चक्कर में हम अपना सर्व जितना भी हमें प्राप्त होता है या प्राप्त कर सकते है सबको गवा देते है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।

तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।

12Mar 2020

आज भव्य कलश यात्रा का आयोजन माँ भद्रकाली मंदिर बेमेतरा से चलकर कृषि उपज मंडी प्रांगण, कथा स्थल तक जिसमें महिलाओं ने सिर पर कलश रखकर विशाल शोभा यात्रा निकाली। इस दौरान भारी संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं राधा कृष्ण सत्संग समिति बेमेतरा के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 13 से 19 मार्च 2020 तक प्रतिदिन श्रीमद भागवत कथा का स्थान - बेमेतरा, छत्तीसगढ़ में विशाल आयोजन किया जा रहा है।

आज भव्य कलश यात्रा का आयोजन माँ भद्रकाली मंदिर बेमेतरा से चलकर कृषि उपज मंडी प्रांगण, कथा स्थल तक जिसमें महिलाओं ने सिर पर कलश रखकर विशाल शोभा यात्रा निकाली। इस दौरान भारी संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया।

जहां जहां से कलश यात्रा गुजरी, उसे देखने के लिए लोगों का ताता लग गया। कलश यात्रा इतनी भव्य थी कि जिसकी भी नजर पड़ी, वो अपने स्थान पर थम सा गया। जहां देखो माताएं और बहनें सिर पर कलश रखे नजर आ रही थीं। कलश यात्रा में राधे राधे के जोर जोर से जयकारे लगाए गए।

13Mar 2020

यदि हम भारतीय संस्कृति के पद चिन्हों पर चलते हैं तो कोरोना वायरस 0% होता है।

यदि हम भारतीय संस्कृति के पद चिन्हों पर चलते हैं तो कोरोना वायरस 0% होता है।

भारतीय संस्कृति ही हमें हर रोगों से सुरक्षित रख सकती है।

सनातन संस्कृति की नमस्ते परम्परा का लोहा मान रही है दुनिया

कोरोना वायरस से हजारों जान तो हमारा नमस्ते ही बचा देगा

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट और राधा कृष्ण सत्संग समिति बेमेतरा के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 13 से 19 मार्च 2020 तक कृषि उपज मंडी प्रांगण, बेमेतरा, छत्तीसगढ़ में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्मम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण बना दिया।

कथा के प्रथम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए विशुद्धान के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे हुए सभी भक्तों को भजन "तेरी बारी तक तकदीर तू राधे राधे बोल ज़रा" श्रवण बना दिया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि यह तो सत्य है जब भी आप यज्ञ करने वालेगे, कुछ सत्कर्म करने जाएंगे विघ्न तो आएंगे और उन विघ्नों को हराकर जब यज्ञ करते हैं तो उसका आनंद ही कुछ और होता है। और भगवान की भक्ति में छापना बहुत बड़ा विषय है। मेरी सुविधाओं के अनुसार मैं भक्ति करूं वह एक अलग बात है। लेकिन मेरी सुविधाओं के विपरीत परिस्थितियाँ हो सकती हैं और उसके बावजूद मैं भक्ति करूँ तो उसका कहना ही क्या है। असली भक्ति तो वही है। इतिहास उठाकर देखिए जिन - जिन ने भक्ति की है उनसे विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ा है। पर उन्होंने भक्ति छोड़ी नहीं। भयंकर बारिश, भयंकर आंधी फिर भी एकाग्र होकर वो अपने आप को उस ईश्वर में समर्पित करें बैठे है।

महाराज श्री ने कहा कि आज हम क्यों, आज तो पूरी दुनिया मान गई हमारी ऋषियों की परंपरा। एक कोरोना क्या आया पूरी दुनिया भर की पीछे - पीछे पद चिन्हों पर चल पड़ी। आप यकीन नहीं मान रहे होंगे। आज कल अमेरिका के राष्ट्रपति, फ़्रांस के राष्ट्रपति, इंग्लैंड के प्रिंस चार्ल्स भी हाथ नहीं मिला है हर किसी से नमस्ते कर रहा है। और सीखा भी रहा है। हाथ मिलाना ठीक नहीं है। हमारे ऋषि तो कब से समझा जा रहा है। आज कोरोना के माध्यम से सही पर पूरी दुनिया को पता चल गया है हमारे ऋषि मुनियों की परंपरा मानव जाति की सुरक्षा के लिए है। मानव जिससे सुरक्षित रह सके एक दूसरे का सक्रमण रोग एक दूसरे तक पहुंच न जाएँ हजारों - हजारों वर्ष पहले हमारे ऋषि मुनियों ने यह हमको बता दिया दुर्भाग्य से कुछ दिखावे के चक्कर में हम लोग भी उनके पीछे चले गए। इसलिए विचित्र हमारा यह भी आ गया। 75 हमारे यहाँ है अगर हमारे ऋषि मुनियों की बात मान लेते हैं तो 75 भी नहीं होते 0% होते हैं क्योंकि हमारी संस्कृति ऐसी है, हमारी संसार ऐसी है। महाराज श्री ने कहा कि भारत में भारतीय संस्कृति ऋषिमुनियों की परम्पराओं अगर हम दिल से निर्वाहन करें, उनका पालन करें। तो संसार में ऐसा कोई रोग नहीं है जो हमारा स्पर्श कर सके। प्रारम्भ से लेकर रात्रि तक अगर हम वही पद्ति अपना ले। तो हमें कोई बीमारी लगने वाली नहीं।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलूँ के लोगों का कल्याण कैसे होगा? आप देख रहे हैं किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलगो के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई वजह क्या है? क्योकि कलea का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस उसी कार्य करता है और फिर कल रविवार के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक काल का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री अर्थात जब धन का अहंकार हो जाएगा तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर होगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छा कर्म करते हैं। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मान्यताओं को भी सुनो। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने, गीता की सुनो और उसके मानों भी, माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनके मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार के कोई भी वस्तु कभी भी दुखी नहीं कर फाउंडगी। और जब आप को संसार की किसी बात का मामला पड़ना बंद हो जाएगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जाएगी और तब ईश्वर को पाना सरल हो जाएगा।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

5Mar 2020

मेरा दोष यही है कि मेरा कोई दोष नहीं है।

मेरा दोष यही है कि मेरा कोई दोष नहीं है।

“दुनिया की हर चीज झूठी है केवल भगवान का भजन सच्चा है ।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 02 मार्च से 09 मार्च तक प्रतिदिन विश्व शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड, वृंदावन में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं होली महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
आज कथा पंडाल में श्रद्धेय श्री सुतीक्षण दास जी महाराज पीठाधीश्वर सुदामा कुटी वृंदावन, पूज्य भागवताचार्य पंडित श्री डॉ. श्याम सुंदर पाराशर जी महाराज , भागवताचार्य पंडित शिवम विष्णु पाठक जी, धर्म रक्षासंघ सौरभ गौड़ जी, तुलसी स्वामी जी, इत्यादि सभी संत महापुरुष पधारे एवं व्यास पीठ से आशीर्वाद प्राप्त किया और कथा श्रवण करने आये सभी भक्तो को आशीर्वचन दिए। उन्होंने कहा कि युवाओं को कथा सुनने के लिए प्रेरित किया है उसके लिए मैं महाराज श्री का अभिनंदन करता हूँ। ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन " कृष्णा प्रेम मई राधा " श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुये कहा कि होली है और होली पर रंग की होली होती है, गुलाल की होली होती है, लाडूडो की होली होती है। जलेबी की होली होती है। और जब होली पूरी होने जा रही होती है। तब धूल की होली होती है। हमारे यहाँ जिसे दुल्हंडी कहते है।
महाराज श्री ने कहा अनेक संतों का आशीर्वचन हमें और आप सभी को प्राप्त हुआ संसार में दो ही चीज दुर्लभ है। संत मिलन और हरि कथा तुलसी दुर्लभ दोय सूत दारा और लक्ष्मी पापी के भी होय जय सिया राम भाइयो। पुत्र का होना, धन का होना परिवार का होना, ये बड़ी बात नहीं है । लेकिन बड़ी बात अगर है तो जीवन में संतों का दर्शन और भगवान की कथा। अगर भगवान की कथा और संत दर्शन ये अपने आप में महत्त्वपूर्ण है। और वो हमें इस कथा के माध्यम से प्राप्त हो रहा है। जो जहां - जहां बैठे है वहा - वहा प्राप्त हो रहा है। बहुत कुछ हम सभी के जीवन सब दिन एक सामान नहीं होते है। पर दिन वही श्रेब्ठ होते है जिन दिनों में हमारा चित्त परमात्मा में लगा रहे, भगवान की कथा में लगा रहे। उससे अच्छा दिन नहीं हो सकता। उससे पवित्र दिन नहीं हो सकता।
महाराज श्री ने आगे कहा कि जिस समय भगवान व्यक्ति को जैसा बनाते हैं वो वैसा बन जाता है, इसलिए ये बात ध्यान रखें की काला वो नहीं जिसका रंग काला है,काला वो है जिसने भगवान का भजन नहीं किय़ा। भगवान का भजन नहीं कियो तोआप मरे के समान हो, दुनिया की हर चीज झूठी है भगवान का भजन सच्चा है। जब इंद्र को झूकना पड़ा था, ब्रह्मा को भी पछताना पड़ा था तो हमारी औकात क्या है ?महाराज श्री ने कहा कि जब तक हम और आप संसार में सुख ढूंढ़ते रहेंगे तब तक दुखी रहेंगे, सुखी तब होंगे जब प्रियाकांत जू के चरणों में सुख की तलाश करेंगे तो निश्चित सुखी होने लग जाएंगे। पूर्ण आनंद केवल परमात्मा के चरणों में है इसलिए गोपियां परमात्मा को प्राप्त करने के लिए रास में सम्मितिल होने के लिए जाती थी।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।

 

8Mar 2020

जीव को बुरे वक्त में हमेशा धैर्य रखना चाहिए ।

जीव को बुरे वक्त में हमेशा धैर्य रखना चाहिए ।

शांति पाने के लिए सत्संग करना ही एकमात्र साधन है ।

“भगवान् वही प्रकट होते है जहा भक्तों की श्रद्धा होती है।

“साधु के एक क्षण का संग आपका जीवन सुधार सकता है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 02 मार्च से 09 मार्च तक प्रतिदिन विश्व शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड, वृंदावन में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं होली महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
विश्व शांति सेवा मिशन ने 125 कन्याओं को गोद लिया 5 बर्ष के लिए, वो आज पूरे हो गये है। तो इस अवसर पर विश्व शांति मिशन के द्वारा और पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज, सिटी मजिस्ट्रेट मनोज कुमार सिंह जी एवं लक्ष्मी गौतम जी सामाजिक संस्था कनकधारा फाउंडेशन की संस्थापक, डॉक्टर कल्पना जी कई सामाजिक कार्यकर्त्ता मथुरा - वृन्दावन से और संस्था के ट्रस्टी श्री एचपी अग्रवाल जी द्वारा सभी बहन बेटीओं को चैक भेट किया।

आज कथा पंडाल में महाराज श्री ने कहा की जैसा की आप सभी जानते है कोरोना वायरस हम सब के लिए नहीं पुरे विश्व के लिए थोड़ा कठिन हो गया है। भारत में भी कही ना - कही ना इसके लक्षण पाए जाएं जा रहे है। सुरक्षा अगर हम लोग करें तो हम इसको बहुत ही आसानी से नजरंदाज कर सकते है। हम कही भी पब्लिक प्लेस में जाये तो हम मास्क लागले। किसी को टच न करें। और जो सार्वजानिक स्थान में सामूहिक वस्तुएं है उनको ज्यादा टच ना करें, लोगो को टच ना करें, उनको हाथ न मिलाएं। सुरक्षा अपने हाथ में है, हम और आप अगर चाहेंगे तो हम भी सुरक्षित रहेंगे और हमारे परिवार भी सुरक्षित रहेंगे। और जब परिवार सुरक्षित रहेगा तो हमारे जो मेमेबर्स है कॉलोनी में है, शहर में है वो भी सुरक्षित रहेंगे। और भारतीय सभी सुरक्षित रहेंगे। 2 - 4 दिन की बात है जैसे ही थोड़े दिन में तापमान थोड़ा बढ़ेगा निश्चित ये वायरस अपने आप ही दूर भाग जाएगा। बहुत जल्दी हमारे भारत में तापमान भी मेरे विचार से अप होगा। हमारे यहाँ तो कहते है की जैसे ही होली में आग लगती तो तापमान फिर बढ़ने लग जाता है। तो कल होलिकादहन है। उसके बाद भगवान ने चाहा तो अपने आप भारत का तापमान थोड़ा सा ऊचाँ बढ़ेगा जिससे हम लोग इस वायरस से बच सकेंगे। पर फिर भी हमें हमारी सुरक्षा अपने परिवार की सुरक्षा रखनी है ज्यादा से ज्यादा स्वक्छ्ता रखे। मछरों को पनपने न दे। अपने हाथ साफ रखे बार - बार साबुन से हाथ धोए। और भोजन से पहले तो निश्चित आप लोग हाथ साबुन से हाथ धोए। और अपने बच्चो पर ज्यादा ध्यान दे। ज्यादा से ज्यादा हो सके सुरक्षित जगह पर रहे। जरुरत नहीं है तो घर से बहार न जाएँ कल यहाँ होली होगी। इसी को यहाँ ध्यान में रखते हुए हम लोगो ने यहाँ निर्णय लिया है की होली पर भी कण्ट्रोल करेंगे। जैसा यहाँ पर हमेशा होली होती है। परन्तु कल यहाँ पानी की रंग की होली नहीं करेंगे। और कल यहाँ हम लोग कोरोना वायरस को हारने के लिए होली का रंग बदलेंगे।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि पिछले सात दिन से चला आ रहा ये श्रीमद भागवत महापुराण प्रियाकांत जू की शरण में हम सभी लोग यहाँ विराजे वृन्दावन में और ये अपने आप में बहुत महत्त्वपूर्ण है। श्रीधाम वृन्दावन में यहाँ पर विराजमान होकर प्रियाकांत जू चरणों में उपस्थित रहकर श्रीमद भागवत सत्संग निश्चित जीवन का बहुमूल्य पल है।
महाराज जी कहा की सत्संग जीवन में महत्पूर्ण क्यों है। बहुत से लोग कहते है जितना समय हम सत्संग में ख़राब करते है। उतना तो हम काम में लगाएं तो कुछ अच्छा पैसा आएगा। कुछ अच्छा होगा। बुरी तरीके से बुरा जीवन दुसरो के लिए बुरा वही जीते है वही करते है जिनके जीवन में सत्संग नहीं है। जो अपना और दुसरो का भला कर सकते है मानों वो सत्संग में जाते है। उतनी क्षामता सत्संग देता है। और जो वार्तालाप करते हो सत्संग की बातें ही करते हो जीवन में उतारते हो, क्यूंकि लोग दिखाने के लिए धर्मात्मा है। जिसके जीवन में धर्म है वो किसी का बुरा कर ही नहीं सकता। धर्म का बुरा तो बिल्कुल नहीं कर सकता।
महाराज जी आगे कहा की एक व्यक्ति ने बाबा से पूछा कि जब सत्संग पूरा हो जाता है तो हम संसार में जाते है। और संसार में जाते है फिर वही सांसारिक बातें हमारे जीवन में, मन आ जाती है। इससे सत्संग का लाभ क्या हुआ। कोई लाभ नहीं हुआ। तो बाबा ने बहुत सुन्दर जवाब दिया। उन्होंने कहा एक पत्थर धूप में पड़ा है सूरज की तेज किरणे उसको तपा रही है तो वो गर्म होगा। और उस पर आकर बैठ जाये तो उसको सुख मिलेगा या दुःख मिलेगा ? दुःख क्यों मिलेगा क्योंकि वो गरम है।और जब वो पहुंचेगा दुःख में कोई बैठे और उसे दुःख मिले तो उस पत्थर का होना या ना होना बराबर ही है। कोई लाभ ही नहीं है। लेकिन उसी पत्थर को नदी में रख दो माना की वो जल में रहता हुआ पत्थर गलेगा नहीं। लेकिन इतना जरूर कि जब तक नदी में रहेगा तब तक वो ठंडा रहेगा। तब तक वो शीतल रहेगा, और तब तक किसी को दुःख नहीं देगा। अगर कोई आकर बैठ भी गया तो शीतलता ही प्रदान करेगा। इसका मतलब है चाहये सत्संग में आकर कुछ भी हो जाएँ। सत्संग में आके चाहे सत्संग के बाद जीवन में कोई भी चर्चा रहे। एक बहुत अच्छी बात है जब तक आप सत्संग मे बैठे रहोगे तब तक आप अपने जीवन में किसी का बुरा तो नहीं करने वाले। और जब तुम किसी का बुरा करोगे ही नहीं तो इसमें संदेह नहीं की आपका भी बुरा होगा नहीं। तो ये सत्संग देता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंत: सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

8Mar 2020

वृंदावन में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में आयोजित 108 श्रीमद्भागवत कथा एवं होली महोत्सव के सप्तम दिवस की कथा को सम्पूर्ण कर पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज एवं सभी भक्तगणों ने भी ठा. श्री प्रियाकांत जू भगवान के दर्शन कर आर्शीवाद प्राप्त किया।

शांति सेवा धाम, वृंदावन में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में आयोजित 108 श्रीमद्भागवत कथा एवं होली महोत्सव के सप्तम दिवस की कथा को सम्पूर्ण कर पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज एवं सभी भक्तगणों ने भी ठा. श्री प्रियाकांत जू भगवान के दर्शन कर आर्शीवाद प्राप्त किया।

9Mar 2020

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज व ब्रज के सुप्रसिद्व कलाकारों संग लोगों ने मनाई हर्षोउल्लास से होली

कोरोना वायरस के चलते प्रियाकांत जू मंदिर में पानी वं रंगो से नहीं खेली गई होली।

रंगों व पानी के बिना मनाई गई प्रियाकांत जू में होली।

हजारों लोगों ने रंगों व पानी के बिना मनाई प्रियाकांत जू मंदिर में होली

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज व ब्रज के सुप्रसिद्व कलाकारों संग लोगों ने मनाई हर्षोउल्लास से होली

होली महोत्सव के पावन अवसर पर पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने सर्वप्रथम ठा. श्री प्रियाकांत जू भगवान को गुलाल लगाकर आशीर्वाद प्राप्त किया। महाराज जी नें कहा की भक्त प्रह्लाद ने भक्ति करके ईश्वर को याद किया जिससे उसकी सदैव रक्षा हुई। तो क्यों ना हम भी उस ईश्वर को सदा याद करें जिससे हमारी भी सदैव रक्षा हो। आइए इन नकली रंगों को छोड़कर, ठा. श्री प्रियाकांत जू भगवान के नाम के रंग की वास्तविक होली खेलें।
इसके पश्चात ठा श्री प्रियाकांत जू भगवान की आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना की गई।

आज महाराज श्री ने कहा की जैसा की आप सभी जानते है कोरोना वायरस हम सब के लिए नहीं पुरे विश्व के लिए थोड़ा कठिन हो गया है। तो कोरोना वायरस को ध्यान में रखते हुए हम लोग यहाँ रंग की होली, पानी की होली नहीं खेलेंगे और यहाँ आज हम लोग कोरोना वायरस को हराने के लिए होली का रंग बदलें। वैसे वृन्दावन वायरस नहीं बल्कि कृष्ण है जो सभी भक्तों पर चढ़ा हुआ है।

होली के पावन अवसर पर आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर के प्रांगण में होली महोत्सव मनाया गया। जिसमें देश-विदेश से हजारों भक्त मौजूद रहे। इस अवसर पर भगवान ठा. प्रियाकान्त जू के दर्शन करने और पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में होली मनाने के लिए भक्त सुबह से ही प्रागण में एकत्रित होने लग गए, प्रातः 7 बजे से मंदिर में हजारों भक्त पहुंच गए थे। महोत्सव की शुरूआत महाराज श्री द्वारा ठा. प्रियाकांत जू भगवान को रंग लगाकर की गई। आज प्रियाकांत जू मंदिर के ठीक सामने ब्रज के सुप्रसिद कलाकारों के द्वारा प्रस्तुति दी गई। इसमें ढोल - नगाड़ों के साथ में ब्रज के सुन्दर - सुन्दर भजन गाकर रसियाओं के साथ में नृत्य करते रहे। और सभा ग्रह में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के होली के भजनों पर सभी भक्त आनंद लेते रहे।

महाराज जी ने कहा कि आज का रंग बड़ा ही सुन्दर है। होली का रंग प्रियाकांत जू के संग। हमने देखा है की होली के समय या किसी भी त्यौहार में सब अपने - अपने रिश्तेदारों के यहाँ जाते है बधाईया देते है रंग लगाते है। वैसे तो सब रिश्तेदार यही है सब अपने ही है। पर ठाकुर प्रियाकांत जू से बड़ा रिश्तेदार हमारा कोई हो नहीं सकता। तो आप सबको प्रियाकांत जू के आशीर्वाद और उनकी कृपा की अनुभूति करते हुए सर्वप्रथम देश विदेश में रह रहे सभी भक्तों को होली की बहुत - बहुत शुभकामनाएं दी। उसके बाद महाराज श्री ने एक सुंदर भजन “मुझे श्याम के रंग में रंग दे ऐसा कोई संत मिले” भक्तों को श्रवण कराया जिसपर सभी भक्त झूमते नाचते हुए होली के रंग उडाकर होली मनाने लगे।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि ये जो रंग है साबुन लगाएं उतर जाते है। लेकिन जिसके आत्मा पर मेरे श्याम की भक्ति का रंग चढ़ा है दुनिया में कोई साबुन नहीं जो उसे उतार सके। तो रंगने का मन होतो होली है ही । रंग तो पाडेंगा ही, तन भीगेगा ही, तन का थोड़ा सा फोटो भी चेंज आएगा। लेकिन कुछ दिन बाद फिर से पहले जैसा हो जायेगा। लेकिन रंगने का मन हो तो ऐसा रंग में रंगिये श्याम भक्ति का, कि एक बार रंगे तो जन्मजन्मातर तक उतरे ना। और मैं उसी होली की शुभकामनाएं दे रहा हूँ। जिसके रंग में रंग जाने के बाद तुम्हे कोई पहचान ना सके क्या तुम वो हो जो इस रंगने से पहले थे। तुम्हे कोई ना पहचान सके।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि एक राजा के मन राज्य करते - करते विचार आया की अब परमात्मा के तलाश करनी चाहिए। अब परमात्मा से मिलने की इच्छा है अब क्या करें। तो बोले संतों के पास चले। संत ही बतायेगे की परमात्मा से मिलने का रास्ता क्या है। तो संत के पास गए। और जब संत के पास में तो गए संत से पहुंचा संत से मिलना है, भगवान से मिलना है, टेढ़ी टांग मुरली वाले से मिलना है, संत बोले अच्छा कैसे मिलोगे। राजा बोले आप जैसे कहोगे वैसे मिलेगें। तो उस टेढ़ी टांग वाले से मिलना आसान नहीं है। सब छोड़ना पड़ेगा। राजा को लगा बहुत सस्ता है उनसे मिलना। सब छोड़ने में कौन सी बड़ी बात है। राजा सब कुछ छोड़ आया। महल छोड़ दिया, सुख छोड़ दिया, एक लगोटी पहनकर राजा माहत्मा के पास गया। लीजिये महाराज छोड़ दिया। तो माहत्मा जी बोले सब तो लेकर आये हो भगवान से मिलना था तो संत से कुछ कहा नहीं। राजा मन में सोच रहा सब कुछ तो मैंने छोड़ दिया और ये कहे रहे है कि सब कुछ लेकर आया। राजा ने सोचा फिर भी कोई गलती हो गयी हो गई। माहत्मा बातएंगे। तो संत ने कहा एक काम करों आज से तुम आश्रम में झाड़ू लगाओगे। और आश्रम में जो रहते थे आश्रम वासियों को लगा आज कुछ ज्यादा अनीति कर रहे है इसके साथ। एक विचारा राजा आदमी यहाँ आने जाने वाले इसके नौकर चाकर सब है। और इसके कितने सेवक है इसे तो पानी का गिलास भी उठाकर देने वाले लोग है। झाड़ू लगाओ। बहुत बुरी बात है। पर कहे कौन गुरु जी से ! राजा भी कहे रहा था लगवाओ - लगवाओ झाडूं अगर भगवान से मिलना है। अगर ये इच्छा नहीं होती तो फिर देखता तुमको झाडूं लगाई। मनतो है न 15 से 20 दिन झाड़ू लगवाई। राजा को लगा महाराज सायद इसलिए कहे रहे है। इनको ऐसा लग रहा। कि जैसे और व्यक्ति काम कर सकते है। वैसे में नहीं कर सकता। जैसे और साधारण व्यक्ति काम कर सकते वैसे मैं नहीं कर सकता । मैं राजा हूँ मैं नहीं कर पाऊंगा। इसलिए सायद महाराज जी मेरी परीक्षा ले रहे है। 20 दिन बाद महाराज जी ने कहा सुनो ये झाडूं लगाना बंद करों तो राजा बोला तो जितना तुमने ये कूड़ा आश्रम में इकट्ठा किया सर पर रख कर गावं - गावं में जाकर फेक आओ। अरे महाराज ऐसी अनीति मत करों। बोले नहीं - नहीं करो। राजा बोले अच्छा भगवान से मिलने आये हैं तो कूड़ा उठवा रहे है महाराज। फिरभी भगवान से मिलने की इच्छा थी। सर पर कूड़ा उठाया गावं में छोड़ने जा रहे थे सामने से एक व्यक्ति टकरा गया। तो उसने कहा राजा ने तू जनता है। आज से 15 दिन पहले मुझसे टकरा गया होता ना तेरा सारे होश ठिकाने लगा देता। महाराज जी को पता चली बात ऐसा हुआ है। महाराज जी ने कहा कोई बात नहीं। ऐसे ही राजा से कूड़ा उठवाते रहे - उठवाते रहे। एक दिन फिर राजा से तीसरा व्यक्ति टकराया अबकी बार राजा बोला नहीं आखें उठाकर घूर कर देखा, देखकर नहीं चल सकता अँधा है क्या मन ही मन में कहा महाराज जी को पता चला महाराज ऐसे ही कूड़ा उठवाते रहे। 10 -15 दिन बाद फिर एक आदमी टकराया राजा ने दोनों हाथ जोड़े और कहा कोई गलती हो गई जो तो छमा करना मैं नीचे देखकर चल रहा था इसलिए आपको देख नहीं पाया अपराध हो गया छमा करना। जब महात्मा जी को ये बात पता चली तो महात्मा जी उस राजा को पास बुलाकर बैठा कर कहने लगे अब तूने सब कुछ छोड़ दिया है। आज छोड़ दिया तूने सब कुछ। वस्तु छोड़ने का मतलब सब कुछ छोड़ना नहीं है। आप अपना घर परिवार सब कुछ छोड़ आएं और यहाँ आये लेकिन फिरभी अहम् है। की वो मेरा है वो भी छोड़ कर भी छोड़ नहीं सके। आप अपने मन से त्याग दे की मैं भी मेरा नहीं हूँ। उस दिन परमात्मा में और आपमें ज्यादा दूरी नहीं होगी। उस दिन आप परमात्मा के रंग में रंगेगें। उस दिन आप कृष्ण के रंग में रंग जायेंगे। और वो जिसदिन आप कृष्ण के रंग में रंगेगे वो होली आपकी सबसे कीमती होली होगी। और तब आनंद आएगा, तब आप गा भी सके, तब आप नाच भी सकेगे, तब आपको कोई दर्द नहीं दे पायेगा।

महाराज श्री ने होली पर नशा ना करने का संदेश देते हुए कहा कि ये होली प्रेम का उत्सव है इसे नशा करके बर्बाद ना करें। होली का त्यौहार प्रेम से भरा हुआ है, इसे प्यार से मनाएं, एक दूसरे पर रंग गुलाल लगाएं, पुरानी दुश्मनी को भुलाएं और प्यार से अपने जीवन की यात्रा प्रारंभ करें। ये जीवन छोटा सा है इसे दुश्मनी करके बर्बाद ना करें।

कार्यक्रम के अंत में महाराज श्री मंदिर के ठीक सामने पहुंचे जहाँ फूलों की होली का आनंद, गुलाल की होली का आनंद सभी भक्तों को दिलाया।

9Feb 2020

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के पावन सानिध्य में 09 मार्च 2020 को फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा पर "पूर्णिमा महोत्सव" का सुंदर एवं भव्य आयोजन ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर के प्रांगण में बड़ी हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के पावन सानिध्य में 09 मार्च 2020 को फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा पर "पूर्णिमा महोत्सव" का सुंदर एवं भव्य आयोजन ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर के प्रांगण में बड़ी हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। जिसमें हजारों की तादाद में देश विदेश से भक्त पधारे। जिसमें सभी भक्तों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया एवं सर्वप्रथम गणेश वंदना कर कार्यक्रम की शुरुआत की गई तथा ठाकुर श्री प्रियाकांतजू भगवान, सर्वेश्वरीश्री राधा रानी के प्यारे प्यारे भजनों की प्रस्तुति दी गई। महाराज श्री द्वारा गाये गये भजनो पर सभी भक्तगण झूमते नाचते रहे। अंत में ठाकुर श्री प्रियाकांतजू भगवान की आरती का कार्यक्रम का समापन किया गया। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

6Mar 2020

दशम स्कंध भागवत का हृदय है।

“संसार में आप जो भी मांगना चाहते हैं। तो ठाकुर जी से कहना जो मेरे भाग्य में हो आप सिर्फ मुझको वही देना”।

अगर आप प्रसन्न रहना चाहते हैं तो जितना आपके भाग्य में है उतना ही स्वीकार करें ।

दशम स्कंध भागवत का हृदय है।

भोजन ग्रहण करने से पहले भगवान को भोग जरूर लगाएं।  

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 02 मार्च से 09 मार्च तक प्रतिदिन विश्व शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड, वृंदावन में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं होली महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के पंचम
दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

आज कथा पंडाल में मांट क्षेत्र, मथुरा से विधायक पण्डित श्री श्याम सुंदर शर्मा जी पूर्व मंत्री उत्तर प्रदेश सरकार एवं संत महापुरुष महामंडलेश्वर बालयोगी स्वामी श्री प्रकाशानंद जी महाराज और ग्वालियर सें राजपुरोहित श्री राकेश नारायण आचार्य जी महाराज, पधारे एवं व्यास पीठ से आशीर्वाद प्राप्त किया और कथा श्रवण करने आये सभी भक्तो को आशीर्वचन दिए। उन्होंने कहा कि युवाओं को कथा सुनने के लिए प्रेरित किया है उसके लिए मैं महाराज श्री का अभिनंदन करता हूँ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन "अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरं । हृदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं " श्रवण कराया।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि भागवत को प्राण है दशम स्कंध, दशम स्कंध भागवत का हृदय है। दशम स्कंध को भी प्राण है यह ब्रज की बाल लीलाएं गोपी गीत। मन की शांति के लिए हम सब के ह्रदय में शांति रहे उसके लिए प्रार्थना करें ईश्वर से।
महाराज जी कहा कि आज कल के बच्चों को आप देखते होंगे जब भी मम्मी भोजन बनाकर देती है। तो मुँह सिकोड़ कर कहते है मम्मी मुझे ये पसंद नहीं है। और फिर वो जो खाते है वो भोजन उनके अंग को नहीं लगता। हमारे सामने परोसे हुए अन्न का अनादर कभी नहीं करना चाहिए। उसमे किन्तु - परन्तु कभी नहीं करना चाहिए। प्रसाद,अन्न जो है उसी को अपना सर्वस्य समझना चाहिए। क्योंकि बिना अन्न के हम जीवित नहीं रहे सकते। अन्न हमारा जीवन है। अन्न का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए और अन्न भगवान का स्वरूप है।इसलिए अन्न में कभी भी कमी नहीं देखनी चाहिए। परोसा हुआ अन्न सहज स्वीकार करना चाहिए। चाहे उसमे स्वाद हो अथवा ना हो अगर हम उसमे कोई कमी देखते है। तो वो भोजन राक्षस लोग ग्रहण कर लेते है। जाता हमारे ही अंदर लेकिन जैसे ही हम उस भोजन में कमी देखते है कमिया गिनाते है तो उस भोजन को राक्षस लोग ग्रहण कर लेते है। तो वो भोजन हमारे शरीर को नहीं लगता है। वो हमारे शरीर को स्वस्थ नहीं रखता है। हष्ट पुष्ट नहीं करता है इसलिए जो भी प्रसाद जो भी भोजन आपके सामने आये आपको दो प्रमुखता से कार्य करना चाहिए खुद खाने से पहले भगवान के सामने चाहे मंदिर नहीं तो भी सामने रखिये आखे बंद करिये और बोलिये हे गोविन्द ये आपका है पहले आप इसे आरोगों इसके बाद में इसको स्वीकार करूँगा आपका प्रसाद बन जाएंगा तब। और जब जीव उसे भगवान के समर्पित करके स्वयं पाता है प्रसाद समझकर पाता है तो वह अन्न देवतुल्य हो जाता है। और ईश्वर का प्रसाद हमारे शरीर में जाता है तो वह हमें हष्ट पुष्ट तंदुरुस्त करता है। इसलिए हम को चाहिए कि हम हमारे सामने आये हुए प्रसाद को अन्न को बिना कोई कमी देखे, बिना कोई त्रुटि देखे, बिना कोई स्वाद देखे आप हमारे जैन मुनियों को देखो। अनेक संतों को देखो जब उनके सामने प्रसाद जाता है तो कई तो अपना पात्र भी नहीं रखते ऐसे ही हाथ फैला देते है उसी में सब्जी दाल दो उसी में रोटी दाल दो। जो प्रसाद दे देंगे आप उसी को स्वीकार कर लेंगे। वो स्वाद लेने के लिए नहीं भोजन करते वो भगवान का भोजन स्वीकार करते है। हर मम्मी की हर पिता की यह जिम्मेदारी है अपने बच्चे को सिखाएं की भगवान को भोग लगाएं भोजन जैसा बन जाएँ उसमे बिल्कुल कमी मत देखों प्रसाद समझ कर स्वीकार करों। प्रसाद समझकर स्वीकार करोगें तो एक दम हष्ट - पुष्ट आपका बच्चा होगा।
महाराज जी ने कहा कि ज्यादा से ज्यादा वृन्दावन में आने के बाद भजन करना चाहिए जो की आप लोग चर्चा करते रहते है। अरे वंसी वाले ने कितनी कृपा की है आपके ऊपर। ना जाने कौन - कौन से गावों में शहरों में आप रह रहे हो वह पकड़ लाएं हो चलो भैया वृन्दावन अपनी सोई हुई किस्मत जगा। कृपा करके आपको खींच लाया है वृन्दावन में आकर अगर हम यहा सांसारिक क्रिया कलापों में हम व्यस्थ रहे। ये तो जैसे है जैसे हीरा हाथ में हो पहचान करी न हो ऐसे ही कोड़ी के दाम में बेच दीं हो। आपको लोगो बड़ा सुन्दर अवसर मिला है। आज पंचम दिवस की कथा सुन रहे है। ये छोटा भाग्य नहीं है आपका। बड़े सौभाग्य शाली हो आप लोग। संसार में आप जो भी मांगना चाहते है तो ठाकुर जी से कहना जो मेरे भाग्य में हो आप सिर्फ मुझको वही देना। जो मेरे भाग्य में ना हो वो मुझे बिल्कुल मत देना। क्यूंकि मांगने पर दे तो देगा। लेकिन यकीन मानिए अधर्म से की हुई कमाई या जमरदास्ती ली गयी धन दौलत हमारा कभी भला नहीं करती। हमारे पुराणों में हमारे शास्त्रों में इस चीज का विरोध है आज व्यक्ति की दृस्टि अपनी संपत्ति पर नहीं दुसरो की संपत्ति पर है। अपने आप में प्रसन्न नहीं है वो और यही उसकी अशांति का सबसे बड़ा कारण है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।
महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।

2Mar 2020

आज प्रातः पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने और सभी भक्तगणों ने भी कथा से पूर्व ठा. श्री प्रियाकांत जू भगवान के दर्शन कर आर्शीवाद प्राप्त किया।

आज प्रातः पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने और सभी भक्तगणों ने भी कथा से पूर्व ठा. श्री प्रियाकांत जू भगवान के दर्शन कर आर्शीवाद प्राप्त किया।

शांति सेवा धाम, वृंदावन में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में आयोजित 108 श्रीमद्भागवत कथा एवं होली महोत्सव में प्रथम दिवस की कथा से पूर्व भागवत पूजन करवाते हुए समस्त यजमान।

 

2Mar 2020

"ये भागवत जिज्ञासुओं का ग्रन्थ है"

"ये भागवत जिज्ञासुओं का ग्रन्थ है"

“ ईश्वर को मनाना बहुत आसान है और जीव को मनाना बहुत मुश्किल है

“ भगवान तुम्हे कुछ भी दे उसका अहंकार मत करो, बल्कि उसमें सरलता बनी रहनी चाहिए

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 02 मार्च से 09 मार्च तक प्रतिदिन विश्व शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड, वृंदावन में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं होली महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

आज भागवत कथा के प्रथम दिवस पर "पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज "भागवत पीठाधीश्वर सद्गुरूदेव पूज्य श्री पुरुषोत्तमशरण शास्त्री जी महाराज, पूज्य आचार्य प्रवर मंगल मूर्ति श्री राजेश पांडेय जी महाराज, मुख्य यजमान कोलकाता श्री पशुपति नाथ जी ने दीप प्रज्जवलन,भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

आज कथा पंडाल में पूज्य आचार्य प्रवर मंगल मूर्ति श्री राजेश पांडेय जी महाराज, श्री दाऊ दयाल जी महाराज ने अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराजश्री की लम्बी उम्र की कामना की।

“भागवत पीठाधीश्वर सद्गुरूदेव पूज्य श्री पुरुषोत्तमशरण शास्त्री जी महाराज, ने कहा की भागवत धर्म का, सनातन धर्म का, और सर्वोपरि धर्म राष्ट्रसेवा है और राष्ट्रसेवा में वो सदैव लगे रहे यही मेरी प्रार्थना है और आशीर्वाद प्रदान किया एवं कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को अपनी वाणी से आर्शीवाद दिया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन " प्यारो लागे री वृंदावन धाम की राधे राधे गाओं " श्रवण कराया”।
कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि श्री वृन्दावन में यह होली महोत्सव प्रियाकांत जू की असीम अनुकम्पा का दर्शन ही है। अगर शिष्य के घर गरू पधारे, वैसे तो घर भी गुरु का ही स्थान भी गुरु का ही है जब गुरुदेव भगवान कृपा करके पधार जाएं तो समझना चाहिए वो मंगलकारी है और अमंगलों का नाश करने वाला है। गुरुदेव भगवान की कृपा उनका आर्शीवाद वचन आप लोगो को और मुझे प्राप्त हुआ। महाराज जी ने कथा क्रमबढ़ाते हुए कहा की जैसे आप कोई प्रोपट्री खरीदते है तो उसकी रजिस्ट्री कर वाते है तो उसका मतलब होता की वो स्थान आपका है। वैसे ही जब शिष्य दीक्षा लेता है। इसका मतलब है कि पुरे जीवन ही नहीं “जन्म-जन्मान्तर” तक उस प्रोपट्री को अपने गुरु के चरणों में समर्पित कर देता है।

श्री धाम वृन्दावन में आकर कन्हैया के रंगो में रंगने की इच्छा, फिर भगवान की कथा सुनने की इच्छा, भगवान का हो जाने की इच्छा, भगवान को अपना बना लेने की इच्छा, या ये कहे उनके बिना एक क्षण ना जीने की इच्छा जब मन में आ जाये समझना वही दिन हमारा सबसे श्रेष्ठ दिन है। जब आपके मन में ये संकल्प हुआ की हम वृन्दावन जायेंगे उसी समय, उसी वक्त आपके पितृ आपके प्रसन्न हो गए। आये तब नहीं जब आपके मन में संकल्प आया तभी। बहुत से लोग समझ रहे होंगे हमें पितरो से क्या मतलब। उन्होंने हमें पत्र थोड़े ही भेजा की हम खुश हो जाए।

महाराज जी ने कहा की माँ ने अपने बेटा से कहा की यह आपके पिता है। तो अपने मान लिया। मानना तो पड़ेगा ही जब कोई बड़ा व्यक्ति कहता है तो हम मानते है क्यों मानते है क्यूंकि हमसे ज्यादा ज्ञान उनको है। बड़ा व्यक्ति जो कभी अनुचित नहीं कहता सीधी सी बात है। अगर आपको अपने बड़ो पर, संतों पर, महात्माओं पर ग्रंथो पर, वेदो पर, पुराणों पर विश्वास नहीं है इसका मतलब है। आपको अपने ऊपर ही विश्वास नहीं है। क्योंकि इनपर विश्वास ना होने का मतलब ही है अपने ऊपर अविश्वास होना।

महाराज श्री ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

2Mar 2020

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान एवं पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 02 से 09 मार्च 2020 तक प्रतिदिन श्रीमद भागवत कथा का आयोजन शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड, वृंदावन में विशाल आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद भागवत कथा की शुरूआत से पूर्व वृंदावन में भव्य कलश यात्रा का आयोजन किया गया जिसमें महिलाओं ने सिर पर कलश रखकर विशाल शोभा यात्रा निकाली।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान एवं पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 02 से 09 मार्च 2020 तक प्रतिदिन श्रीमद भागवत कथा का आयोजन शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड, वृंदावन में विशाल आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद भागवत कथा की शुरूआत से पूर्व वृंदावन में भव्य कलश यात्रा का आयोजन किया गया जिसमें महिलाओं ने सिर पर कलश रखकर विशाल शोभा यात्रा निकाली। इस दौरान हजारों की संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया। जहां - जहां से कलश यात्रा गुजरी, उसे देखने के लिए लोगों का ताता लग गया।
कलश यात्रा इतनी भव्य थी कि जिसकी भी नजर पड़ी, वो अपने स्थान पर थम सा गया। जहां देखो माताएं और बहनें सिर पर कलश रखे नजर आ रही थीं। कलश यात्रा में राधे राधे के जोर जोर से जयकारे लगाए गए।

3Mar 2020

“भवसागर का रोग दूर करना हो तो कृष्ण नाम की औषधि लिजिए ”

“भवसागर का रोग दूर करना हो तो कृष्ण नाम की औषधि लिजिए ”

“राधा नाम महामंत्र है”

“ जिसके विचार श्रेष्ठ है वही जीव श्रेष्ठ है”

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 02 मार्च से 09 मार्च तक प्रतिदिन विश्व शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड, वृंदावन में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं होली महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।

द्वितीय दिवस की भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया गया । कथा के द्वितीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

कथा पंडाल में परम पूज्य श्री नेत्रपाल जी महाराज ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं कथा श्रवण करने आये हुए सभी भक्तों को आशीर्वचन दिए।मुख यजमान ऋषिराज जी की ओर से उन्हें शॉल देकर सम्मानित किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन जय जय श्यामा, जय जय श्याम, जय जय श्री वृन्दावन धाम।" श्रवण कराया”।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा जिनके द्वारा चलित है जिनके द्वारा रचित है अर्थात जिनके बिना हम कुछ नहीं है आज उन्ही की परम कथा में हम बैठे है और उनकी कथा सुनने का अवसर हमें प्राप्त हुआ है। और अगर वो नहीं होते तो हम लोग भी नहीं होते। उस परम पूज्य परमात्मा की अनुकम्पा का ये दिव्य दर्शन है। वृन्दावन में विराजमान है और ये श्रीधाम वृंदावन प्रेम का किला है।, ठाकुर जी का घर है। भाव बहुत है वृन्दावन के, कथा वृन्दावन में है तो कथा वृन्दावन से ही प्रारंभ की जाएं। क्यों कि कथा के अनुसार जिन भगवान का, श्री शुकदेव जी महाराज का "प्राकट्य महोत्सव "होना चाहिए। कथा प्रसंग में वो भी सर्वेश्वर श्री राधा रानी जी के निजसेचर ही है। श्री शुकदेव जी महाराज को जब गोलोक में वो सुख रूपत थे। तो राधा रानी के हाथ से राधा रानी के करकमलो पर विराजमान होकर भाग्य की कौन सरहाना कर सकता है। कौन प्रसन्ता करे इनके। किशोरी जी करकमलो पर विराजमान होकर किशोरी जी करकमलो से ही वो दाना चूकते है। किशोरी जी उन्हें अपने हाथों चुकती है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज कहा की राधा रानी इनको इतना प्यार क्यों करती है ? इसलिए करती है क्योंकि ये जो सुख है ये आहारनेस कृष्ण की चर्चा कृष्ण - कृष्ण कहते रहते है। अच्छा जितने प्रिय ये राधा जी के है, उतने ही प्रिय कृष्ण जी के है। क्योंकि जब वहां जातें है वहां जाकर राधा जी के नाम की चर्चा करते है। सर्वेश्वर जी की चर्चा उनसे करते है। और श्री कृष्ण का ऐसा मानना है कई पुराणों में भी आया है जो जीव राधा - राधा गाता है। वो मुझे भी प्रिय है। मैंने एक बार आपसे कहा था जब राधा कहने के लिए पहला अक्षर का उच्चारण करता है जीव "र" तो हमारे प्रियाकांत जू कान खड़े हो जाते की हमारी प्रियतमा का नाम लेगा ये। जैसे कहता है र कन्हैया तुरंत खड़े हो जाते है,जब तक होता है "ध" धावत कृष्ण दौड़ कर तुम्हारे पीछे आकर खड़े हो जाते है। हमसे एक मनभाव कहे रहे थे राधे राधे बोल बाते हो मंत्र नहीं है राधे - राधे क्यों बोल बातें हो हमने कहा खतरनाक कलियुग चल रहा है, बड़ा खतरनाक युग चल रहा है जो दिख रहा है वो है नहीं, जो है वो दिख नहीं रहा। तो मैंने कहा कई बार ऐसा होता है मंत्रो से काम चलता है। कलियुग खतरनाक हो सडयंत्रो से काम चलता है। कही मंत्र से काम चलता कही सडयंत्र से काम चलेगा। लेकिन वृन्दावन में आने वालों लिए एक बिशेष बात ये है कि ना मंत्र की बात है, ना सडयंत्र की बात है राधा नाम न मंत्र है ना हमारा बनाया हुआ सडयंत्र है ये तो महामंत्र है। " राधानाम महामंत्र है। " हम में इतनी समर्थ नहीं है की हम अपने आप से कुछ कहे सके। हर जगह आपको कृष्ण सुनने को मिलेगा। कही राधे राधे सुनने को मिला पुराणों में क्यों नहीं मिला बताये ? कई बार लोग कहते भागवत में राधा नाम ही नहीं है। भागवत में है राधा नाम।अगर हम मान भी ले तो क्यों नहीं ? डायमंड अगर आपके पास हो तो या आपके पास कोई बहुत कीमती कोई वास्तु हो आप ऐसे कही पहुंच जाएंगे लेकर सबके सामने बताये। कहा रखोगे अपने घर में कही कीमती जगह पर। क्यों क्यूंकि किसी की नजर जाये इसलिए। तो प्यारे राधा नाम बहुत कीमती है। परम् धन राधा नाम आधार, याहे श्याम मुरली में टेरत सुमिरत बारम बार, परम् धन राधा नाम आधार। पूरी दुनिया कहती है कृष्ण - कृष्ण कृष्ण जी से पूछो तुम किसका ध्यान करते हो। बोले हम राधा रानी ध्यान करते है। राधा नाम का अद्भुत महत्तम है ? ये मंत्र नहीं ये महामंत्र है। अगर इस महामंत्र को जाप करने लग जाओं तो त्रिलोकीनाथ आपके आगे - पीछे यूं चक्कर काटता है।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं।

भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।

श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।

3Mar 2020

कल शाम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने और सभी भक्तगणों ने भी द्वितीय दिवस की कथा सम्पूर्ण कर ठा. श्री प्रियाकांत जू भगवान के दर्शन कर आर्शीवाद प्राप्त किया।

कल शाम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने और सभी भक्तगणों ने भी द्वितीय दिवस की कथा सम्पूर्ण कर ठा. श्री प्रियाकांत जू भगवान के दर्शन कर आर्शीवाद प्राप्त किया।

4Mar 2020

आज शांति सेवा धाम, वृंदावन में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में आयोजित 108 श्रीमद्भागवत कथा एवं होली महोत्सव में तृतीय दिवस की कथा से पूर्व भागवत पाठ करते हुए समस्त संत।

आज शांति सेवा धाम, वृंदावन में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में आयोजित 108 श्रीमद्भागवत कथा एवं होली महोत्सव में तृतीय दिवस की कथा से पूर्व भागवत पाठ करते हुए समस्त संत।

4Mar 2020

“सुखी गृहस्थ जीवन हमें ईश्वर प्राप्ति का सुगम मार्ग प्राप्त करा देंगा

“सुखी गृहस्थ जीवन हमें ईश्वर प्राप्ति का सुगम मार्ग प्राप्त करा देंगा

"खुश रहना है तो जितना है उतने में ही संतोष करो।

"अधिक मांग शादी को दुःख का कारण बना देती है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 02 मार्च से 09 मार्च तक प्रतिदिन विश्व शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड, वृंदावन में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं होली महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।
भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया। कथा के तीसरे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन "अपनी धुन में रहता हूँ, राधे राधे कहता हूँ" श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की ब्रज कीहोली तो पूरे विश्व में विख्यात है और आज बरसाने में लठमार होली का दिन है। कि प्रियाकांत जू के शरणागति हम सभी निश्चित तौर पर जब गोविन्द वहा पकड़ लें तभी सामर्थ प्राप्त होती है की हम वृन्दावन चले और भागवत कथा सुने। ये जो व्यक्ति सत्य से दूर जाकर भाग - दौड़ करता है। और भाग - दौड़ करता है खाने - पीने, सोने व्यवस्थाओं को बढ़ाने के लिए । वो उस व्यक्ति का स्वाभाव है। और इस सत्य को भुला हुआ है की मेरी मृत्यु है। जब मेरी मृत्यु होगी तो साधन नहीं, सत्य मेरे साथ जायेगा। इसका मतलब ये विल्कुल नहीं है कि सभी व्यवस्थाओं का परित्याग कर दे। परित्याग करदे पर दूसरों की व्यवस्थाओं को छीनना नहीं है। पराया धन मिट्टी के बराबर है। उससे हमारा कोई लेना देना नहीं है दूसरे के साधन हमारे किसी काम का नहीं है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा की हमें जितना मिल जाएँ हम उसी में प्रसन्न हो। जितना मिल जाये, जब मिल जाये, जो मिल जाये खाने के लिए उसमे संतुष्टि होनी चाहिए। आपके के दुःख का कारण है दूसरे की थाली को देखना। सुख के दो बड़े कारण, और दुःख यही है बड़े कारण अगर चाहते हो आप कभी दुखी न हो तो दूसरे की थाली में झाकना छोड़ दो। दूसरे की थाली में देखो की उसमे कितने व्यंजन है। दूसरी बात दूसरे की तिजौरी में झाकना बंद कर दो की उसके पास कितना धन। आप एक बात समझ लीजिये न तो दूसरे की थाली, ना ही व्यंजन मेरे काम के है। न तो दूसरे की तिजौरी का धन मेरे किसी काम है। किसी काम नहीं अगर वो आपको व्यंजन ना दे धन ना दे तो आप क्या करोगे। आप उसे अपना मित्र मानोगे ? क्या मानोगे अपना शस्त्रु।
महाराज जी ने कहा की लेकिन जब हम दूसरे की थाली में तिजौरी में झाकते है तो हम अपने मन में दुःख, ईर्ष्या उत्पन्न कर लेते है। रात दिन यही सोच - सोच कर घुटते रहते है हाय - हाय हमारे पास क्यों नहीं जो उनके पास है। सुखी होने का एक मात्र तरीका है। जितने व्यंजन आपकी थाली में है उन्ही में संतुष्ट हो जाओ की यही मेरे। सिर्फ यही मेरे है, यही मेरे काम आने वाले है।दूसरा अपने घर की तिजौरी में देखो की तुम्हारे पास धन कितना है और वही आपके काम है। उससे बड़ा सांसर में कोई सुखी नहीं, जितना मिले उसी में संतुष्ट हो जाये उससे बड़ा संसार मे कोई प्रसन्न नहीं। और इसके लिए एक काम आपको करना पड़ेगा। दूसरे की तिजौरी, दूसरे की थाली में झाकना बंद करना होगा। हा अगर झाकना हो तो दूसरे की नामरूपी धन के बिषय में जानो ये बहुत भजन करता है, हम क्यों नहीं करते। ये इतना भजन करता है, इतना स्मरण करता है, हम क्यों नहीं कर पाते, वो जलन होनी चाहिए, वो बढ़ना चाहिए आपके अंदर । और ये दौलत आपकी जितनी बढ़ेगी उतना ही आपको ठाकुर जी की प्राप्ति होगी। सुखी होने का एकमात्र तरीका आपके ही पास में है। जितना आपको लाभ हुआ उसी में संतोष करो यही आपका है और ये भगवान की भक्ति भी है। ये अठमी भक्ति है कि जितना मिले उसी में संतुष्ट हो जाएँ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।

तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।

5Mar 2020

“भगवान से पहले संत का आना यही हमारे मंगल का दर्शक है।

“भगवान से पहले संत का आना यही हमारे मंगल का दर्शक है।

“आपके बुरे समय में सिर्फ आपका धर्म काम आता है

संत - महात्मा, गुरु इनके विचारों को अपने जीवन में उतारकर अपने जीवन को पवित्र कीजिए।

आपके बच्चे ही आपके धर्म - संस्कृति को जीवित रख सकते है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 02 मार्च से 09 मार्च तक प्रतिदिन विश्व शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड, वृंदावन में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं होली महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। कथा के चतुर्थ दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
कथा पंडाल में निरंजनी अखाड़ा वृंदावन से परम पूज्य महामंडलेश्वर डॉक्टर स्वामी श्री आदित्यनाथ गिरिजी महाराज एवं परम पूज्य मौनी शरण जी महाराज, वृंदावन से परम पूज्य स्वामी श्री सत्यानंद सरस्वती जी महाराज, कटिया बाबा आश्रम वृन्दावन से परम पूज्य स्वामी श्री सद्गुरु देवदास जी महाराज, वृन्दावन से बिहारी लाल वशिष्ठ जी पधारे एवं व्यास पीठ से आशीर्वाद प्राप्त किया और कथा श्रवण करने आये सभी भक्तो को आशीर्वचन दिए। उन्होंने कहा कि युवाओं को कथा सुनने के लिए प्रेरित किया है उसके लिए मैं महाराज श्री का अभिनंदन करता हूँ।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ब्रज भूमि कल्याण परिसद के द्वारा, सभी कृष्ण भक्तों के द्वारा, अपने आराध्य श्री लीला भूमि ब्रज 84 कोश की रक्षा करने तथा ब्रज रक्षा कार्यक्रम में आपके द्वारा सहयोग दिए जाने पर एवं जन आंदोलन में सक्रीय रूप से सहभागता प्रदान करने पर परिसद श्री भागवतचार्य पंडित देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज को "सनातन गौरव" की उपाधि से अलंकृत करती है। इसके साथ ही आपकी दीर्घायु मंगलकामनाएं ठाकुर श्री गिरिजी महाराज, ठाकुर श्री बाकें बिहारी जी महाराज, ठाकुर श्री प्रियाकांत जू महाराज जी के चरणों में करते है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि भगवान से पहले संत का आना यही हमारे मंगल का दर्शक है। जब महाराज श्री ने अपने देश धर्म के बिषय में अपने वचन से अलंकृत कर रहे थे तो उससे पता चल रहा था की महाराज जी के ह्रदय में कितनी देशभक्ति कूट - कूट कर भरी हुई है। निश्चित तौर आज सभी को जितने भी इस भारत में संत, महात्मा कथाकार उनको अपने देश और संस्कृति की चिंता है। और चितना होनी भी चाहिए। और सिर्फ ये चिंता संत महात्मा कथाकारों तक ही सीमित न रहे जाये। ये चिंता हम सब हिन्दुओं के घरों में पहुंचनी चाहिए। और इस चिंता के साथ - साथ चिंतन भी करना चाहिए।

महाराज श्री ने कहा कि आप लोग एक बात समझिए अगर भारतीय संस्कार मेरे बच्चो में मैं नहीं दूंगा। मेरी संस्कृति को मेरे बच्चे नहीं जानेगें तो आप ये नहीं कहे सकते कि आप धर्मात्मा थे। क्यों कि आपके जाते ही आपके घर से वो संस्कृति - धर्म समाप्त हो जायेगा। आप के बाद अगर आपके बच्चे मंदिर में पूजा नहीं करते है, आप के बाद अगर आपके बच्चे बड़ो का आदर नहीं करते है। आपके बाद अगर आपके बच्चे पितरों का श्राद्ध नहीं करते है तर्पण नहीं करते है। तो फिर आप कैसे कहे सकोगे की हम भारतीय परंपरा को मानने वाले लोग है। उसी दिन सब समाप्त हो जायेगा जब हम समाप्त हो जायेगे। और जिनके बच्चे ऐसा नहीं करते है उन्हें आज से ही चिंता करनी चाहिए। धर्म कोई वस्तु नहीं जो आप खरीद कर अपने बच्चो को देकर चले जाओगें। संस्कृति कोई वस्तु नहीं जो आप अपने बच्चो के लिए तिजौरी में रखकर चले जाओगें धर्म और संस्कृति आचरण से, कर्म से, वाणी से तुम्हारे घर आएगी। और वो आपको अपने बच्चो को सीखना पड़ेगा ।

महाराज श्री ने आगे कहा कि क्यों विरोध हो रहा है दिल्ली में ? क्यों 42 - 50 लोग मर गए ? CAA का क्यों विरोध हो रहा है ? एक बात का विरोध है हिन्दू भारत में आना नहीं चाहिए। भारत में हिन्दुओं की संख्या बढ़नी नहीं चाहिए। यह बजह है। प्लान ये है की 15 - 20 साल बाद इस देश में मुस्लिम प्रधानमंत्री, मुस्लिम राष्ट्रपति होना चाहिए। प्लेन गलत नहीं है अभी तक तो वो राष्ट्रपति रहे ही है। हम लोग तो एक्सेप्ट तो करते ही है। हमने कभी अपमान नहीं किया। “ए॰ पी॰ जे॰ अब्दुल कलाम जी” हमारे देश के राष्ट्रपति थे लेकिन अगर हिम्मत है। तो कोई रामदीन उपाध्याय, मुकेश उपाध्याय या मुकेश अग्रवाल, राकेश अग्रवाल, दीपक अग्रवाल जी को एक बार पकिस्तान में बनाकर दिखाओं।

महाराज श्री ने आगे कहा कि मैं कहे रहा हूँ कोई एक हिन्दू नाम किसी वरण से नीचे से लेकर ऊपर तक एक पाकिस्तान में प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति बना कर दिखाओं। हम मान लेंगे आपका विरोध जायज है। सम्भव है ? संभव ? नहीं। वहां कुछ करना नहीं चाहते यहाँ कुछ करने देना नहीं चाहते ऐसा नहीं चलेगा। ! तो हमें जागरूक रहना ही पड़ेगा उसके लिए । हम टारगेट भी होंगे उसके लिए हमें फसाया भी जायेगा। क्या पता मुझे गोली भी मर दी जायें तो । महाराज जी ने कहा की मैं तैयार हूँ। अगर मेरे देश के लिये मुझे अपना बलिदान देना पड़ा तो मेरा बलिदान कोई बहुत बड़ा बलिदान नहीं होगा। मेरे जैसे बहुत लोग आएंगे इस संसार में लेकिन मैं पहले नहीं हूँ मेरी देश पहले है। तो यही आग्रह है आप सब से संत महात्मा जब कोई हमें उपदेश दे तो उसे बजह दूसरे तरीके से समझने से एक अच्छे तरीके से समझना चाहिए। और संत महात्माओं की दिशा निर्देश सत्य रहा है ये कि भारत - भारत रहा है। और आगे भी यह भारत- भारत तभी तक रहेगा जब तक संत महात्मा गुरुजनों के बताये हुए मार्ग पर चलेगा। तो ये देश हमेशा अखंड रहेगा हमेशा ऐसे ही पुरे विश्व को मार्ग दर्शक देता रहेगा।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।
महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।
शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।
इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”। महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।" जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।
दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।
महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

19Feb 2020

कल पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज इंदौर में भारतीय जनता पार्टी के माननीय राष्ट्रीय महासचिव श्री कैलाश विजयवर्गीय जी के सुपुत्र श्री कल्पेश विजयवर्गीय जी के विवाह समारोह में सम्मिलित हुए।

कल पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज इंदौर में भारतीय जनता पार्टी के माननीय राष्ट्रीय महासचिव श्री कैलाश विजयवर्गीय जी के सुपुत्र श्री कल्पेश विजयवर्गीय जी के विवाह समारोह में सम्मिलित हुए। इस पावन अवसर पर उन्होंने वर-वधु को दीर्घ, समृद्ध और खुशहाल वैवाहिक जीवन के लिए आशीर्वाद दिया एवं ठा. प्रियाकांत जू भगवान से उज्जवल भविष्य की कामना की। यहां पर पूज्य महाराज श्री से मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह जी, छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री श्री रमन सिंह जी, उत्तराखंड के पर्यटन मंत्री श्री सतपाल जी महाराज एवं बीजेपी के अन्य प्रमुख लोगों ने भेंट की।

18Feb 2020

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज माननीय राष्ट्रीय महासचिव भाजपा श्री कैलाश विजयवर्गीय जी के सुपुत्र के शादी के लिए इंदौर पहुंचे जहां पर पूज्य महाराज श्री का स्वागत इंदौर के माननीय विधायक श्री रमेश मंडोला जी द्वारा किया गया।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज माननीय राष्ट्रीय महासचिव भाजपा श्री कैलाश विजयवर्गीय जी के सुपुत्र के शादी के लिए इंदौर पहुंचे जहां पर पूज्य महाराज श्री का स्वागत इंदौर के माननीय विधायक श्री रमेश मंडोला जी द्वारा किया गया। यहां पर महाराज श्री से माननीय लोकसभा स्पीकर श्री ओम बिरला जी, माननीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्यमंत्री श्री अश्वनी चौबे जी एवं बीजेपी के अन्य प्रमुख गणमान्यों ने भी भेंट की।

 

18Feb 2020

हमें दूसरे देशों की तरह अपने देश में भी यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू करना चाहिएः पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

हमें दूसरे देशों की तरह अपने देश में भी यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू करना चाहिएः पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

यूनिफार्म सिविल कोड (समान नागरिक सहिंता) पर आईआईएमटी ग्रुप ऑफ कॉलेज के विधि विभाग में मंगलवार से दो दिन के लिए विधि विभाग में यूनिफॉर्म सिविल कोड पर राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है। इस कार्यक्रम में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज मुख्य अतिथि के तौर पर शिरकत की। साथ यही इस कार्यक्रम में श्री राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के सदस्य कामेश्वर चौपाल, वरिष्ठ अधिवक्ता, उच्चतम न्यायालय, आदिश अग्रवाल, राष्ट्रीय सचिव शिक्षा संस्कृति उत्तथान न्यास अतुल कोठारी, सहयोजक भारतीय भाषा अभियान कामेशवर नाथ मिश्रा, सामाजिक कार्यकर्ता सुबोही खान, जिला उपभोक्ता फोरम अध्यक्ष आर बी शर्मा, ने भाग लिया। वहीं आईआईएमटी ग्रुप ऑफ कॉलेज के प्रबंध निदेशक श्री मयंक अग्रवाल जी ने पूज्य महाराज श्री का शाल पहना कर उनका स्वागत किया।

इस मौके पर पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा हमें दूसरे देशों की तरह अपने देश में भी यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू करना चाहिए । इस कानून को देश में लागू करने से सभी को समान रूप से अधिकार मिल जाएंगे। यूरोप के कई देशों में समान नागरिकता कानून को लागू किया गया है। महाराज जी ने कहा कि जब भगवान समदर्शी है तो हमारे देश के कानून को भी समदर्शी होना चाहिए सभी को समान दृष्टि से देखा जाना चाहिए। इसके बाद उन्होंने कहा कि हमें अपनी संस्कृति को नहीं भूलना चाहिए क्योंकि देश की पहचान देश की संस्कृति से होती है। इसके बाद उन्होंने कहा कि यूनिफार्म सिविल कोड को लागू करने के बाद सरकार को जनसंख्या नियंत्रण को लेकर भी कानून लाना चाहिए।

दूसरी तरफ कार्यक्रम के गेस्ट ऑफ ऑनर रहे राष्ट्रीय सचिव शिक्षा संस्कृति उत्तथान न्यास अतुल कोठारी ने समान नागरिकात कानून को लेकर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा देश के अंदर इस कानून को लागू करने की सख्त जरूरत है। यूनिफॉर्म सिविल कोड का मतलब है देश में हर नागरिक के लिए एक समान कानून का होना, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति से ताल्लुक क्यों न रखता हो. फिलहाल देश में अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ हैं। यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होने से हर धर्म के लिए एक जैसा कानून आ जाएगा। सिविल कोड को लेकर श्री राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के सदस्य कामेश्वर चौपाल ने कहा कि हमारे देश में एक खास धर्म के नोजवानों को उनके धर्म गुरूओं ने इतना दबा रखा है कि वह चाहकर भी समान नागरिकता कानून का समर्थन नहीं कर सकते। देश को श्रेष्ठ बनाने के लिए एक देश, एक कानून बनाना होगा। वहीं आईआईएमटी ग्रुप ऑफ कॉलेज के प्रबंध निदेशक मयंक अग्रवाल ने इस मौके पर कहा कि समान नागरिकता कानून देश के ज्वलंत मुद्दों में से एक है।

सरकार को देश के अंदर इस कानून को पूर्ण रूप से लागू करना चाहिए। इस दौरान सहयोजक भारतीय भाषा अभियान कामेशवर नाथ मिश्रा, सामाजिक कार्यकर्ता सुबोही खान, जिला उपभोक्ता फोरम अध्यक्ष आर बी शर्मा, लॉ विभाग के डॉयरेक्टर डॉ पंकज द्वेदी, लॉ विभाग के डीन राकेश जोली ने भी समान नागरिकता कानून को लेकर अपने विचार रखे। इस मौके पर प्रशांत मावी, विशेष भारद्वाज, कोशकी रॉय सहित विभाग के कई लोग मौजूद रहे।

21Feb 2020

महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने आज अपने सुपुत्र देवांश जी एवं विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी के साथ भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक कर विधिवत पूजा-अर्चना कर आर्शीवाद प्राप्‍त किया।

महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने आज अपने सुपुत्र देवांश जी एवं विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी के साथ भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक कर विधिवत पूजा-अर्चना कर आर्शीवाद प्राप्‍त किया, भगवान शिव की आराधना का आज विशेष महत्‍व है, इस दिन पूजा कर सारी मनोकामना पूरी होती हैं। भगवान शिव आप सभी को सुख-समृद्धि प्रदान करें, ऐसी मेरी कामना है। पुन: समस्‍त श्रद्धालुओं को महाशिवरात्रि की हार्दिक बधाई। भगवान भोलेनाथ सब पर अपना आशीर्वाद बनाए रखें।

 

15Feb 2020

"श्रीमद भागवत कथा साक्षात् भगवान श्री कृष्ण ही है।

"श्रीमद भागवत कथा साक्षात् भगवान श्री कृष्ण ही है।

"हमें अपने दिल और दिमाग का अच्छी जगह इस्तेमाल करना चाहिए "

"कथा के पहले दिन की जैसी ललक अगर सातवे दिन हो गई तो समझना गोविंद की कृपा हो गई"

"भारत में जन्मे व्यक्ति ईमानदारी से अपना जीवन पवित्र करना चाहते है, तो जहाँ - जहाँ अपने तीर्थ है सिर्फ वही - वही जाएं"

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 9 से 15 फरवरी 2020 तक प्रतिदिन शाम 4 बजे से 7 बजे तक स्थान - सीडी पार्क, सॉल्ट लेक, कोलकाता में पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा के सम्पूर्ण दिवस की शुरुआत में कोलकाता (बंगाल) के शिष्य परिवार द्वारा गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु , गुरुर देवो महेश्वरः गुरुर साक्षात परम ब्रह्म , तस्मै श्री गुरुवे नमः और चरणों में रहूं हरदम गुरु देव कृपा कर दो भजन गाकर महाराज श्री को नमन किया। उसके बाद पंडित श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन "कुछ नहीं बिगड़ेगा तेरा हरी शरण आने के बाद " श्रवण कराया”। "श्रीमद भागवत कथा साक्षात् भगवान श्री कृष्ण ही है। जो सात दिन विधि - विधान से श्रीमद भागवत कथा सुने। उसे मुक्ति मिल जाती है ,अगर कुछ और न चाहें तो ! कितनी बड़ी बात है मानव जीवन का उद्देश्य मात्र सात दिन में पूरा हो सकता है। अगर व्यक्ति मन लगाकर "श्रीमद भागवत कथा" अपने चित में धारण कर ले। याद रखिये इस बात को सिर्फ इच्छा पूर्ति करने का ही एक पुराण नहीं है। की आप जो मांगे वो प्राप्त हो जायेगा। मुक्ति प्राप्त कराने वाला ये ग्रंथ साक्षात् श्री कृष्ण ही है। प्रत्यक्ष श्री कृष्ण ही है। भागवत में और कृष्ण में कोई अंतर नहीं है। कलिकाल में पुराणरूपी कृष्ण हम सबके समस्त पापों का हरण करने के लिए भागवत के रूप विराजमान है। वो जीव कितने अभागे है जो ईश्वर को त्याग कर संसार के बंधनों में फसे पड़े है। आज सप्तम दिवस है आज एक सत्य समझ लीजिये। इस संसार में आपने अब तक जो भी कमाया है। वो सब यही रहे जाना है। खाली हाथ जाना है लेकिन हमारे शात्र ऐसा कहते है। तुम्हारें पास जितनी लक्ष्मी है आयेगी - जाएगी। तुम्हारा शरीर हर - एक दिन बदल रहा है। हर एक चीज यहां पर छूट जानी है। मात्र धर्म ही तुम्हारें साथ जायेगा और कोई तुम्हारें साथ नहीं जायेगा। इसलिए धर्म युक्त होकर जीवन के उद्देश्य बना लो। जब - जब अवसर मिलेगा हम भागवत कथा स्वयं तो सुनेगे ही पर स्वयं यजमान बनकर भी जैसे अष्टोतर भागवत कथा होती है।चाहे जन्माष्टमी हो, चाहे होली हो कही पर भी हो ये कोशिश अपनी तरफ से करते रहे अगर ठाकुर जी हमारे ऊपर कृपा करते रहे तो हम बार - बार जाकर यजमान बनने का एक लाभ ये है कि एक तो अपने तरफ से कथा हो गई दूसरा लाभ ये है कि इस बहाने किसी तीर्थ में एक सप्ताह रुकने का अवसर मिलता है।
महाराज जी ने कथा क्रम आगे बढ़ाते हुए कहा कि बहुत से लोग कहते है घर में पड़े - पड़े हम उव जाते है घूमने तो जाना चाहिए। जरुरी है की घूमने सिर्फ यूरोप ही जाना चाहिए ? भारत में जन्मे व्यक्ति को घूमने के लिए कही जाने की आवश्यकता नहीं है अगर भारत में जन्मे व्यक्ति ईमानदारी से अपना जीवन पवित्र करना चाहते है। तो जहाँ - जहाँ अपने तीर्थ है सिर्फ वही - वही जाएं उतने में ही बेडा पार है। क्या जरुरत है देश - विदेश में भ्रमण करने की। कोई आवश्यकता नहीं है, मन करें वृंदावन चले जाओं, मन करें हरिद्वार चले जाओं मन करें तो हिमालय चले जाओं ऐसे जहाँ - जहाँ जा सकते हो चले जाओं विदेश जाओंगे तो गलत ही सीखोगे गलत ही खाओगे मज़बूरी हो जाएगी ये खाना पड़ेगा। क्यूंकि विदेश में तो वही मिलता है। इसलिए अपने भ्रमण पर भी अपने ही तीर्थों को चुनना चाहिए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंत: सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

15Feb 2020

आज विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में कथा से पूर्व सीडी पार्क, सॉल्ट लेक, कोलकाता में युवा शांति सेवा संदेश का आयोजन किया गया।

आज विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में कथा से पूर्व सीडी पार्क, सॉल्ट लेक, कोलकाता में युवा शांति सेवा संदेश का आयोजन किया गया। महाराज श्री ने सभी युवाओं एवं बच्चों के धर्म और संस्कृति से जुड़े सवालों का एक-एक करके जवाब दिया। युवा शांति संदेश के इस आयोजन में युवाओं ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। युवाओं ने देश के धर्म, संस्कृत, संस्कृति और संस्कारों से जुड़े हुए कई सवाल किए जिनका महाराज श्री द्वारा युवाओं की ही भाषा में बड़ी ही सरलता से उत्तर दिया गया। पूज्य महाराज श्री ने सभी युवाओं को गलत संगत एवं प्रव्रतियों को त्यागने और धर्म, देश व समाज के प्रति समर्पित रहने के लिए प्रेरित किया और सनातन धर्म का इतिहास एवं संस्कारों की जानकारी दी।

12Feb 2020

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सुपुत्र देवांश जी ने अपने पिताश्री द्वारा मिले संस्कारों का पालन करते हुए अपने जन्मदिवस पर असहाय लोगों को भोजन कराकर आशीर्वाद लिया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सुपुत्र देवांश जी ने अपने पिताश्री द्वारा मिले संस्कारों का पालन करते हुए अपने जन्मदिवस पर असहाय लोगों को भोजन कराकर आशीर्वाद लिया। इसी के साथ देवांश जी ने ग़रीब एवं असहाय लोगों को उपहार भी दिया।

12Feb 2020

“स्वास्थ्य जीवन और मन की शांति चाहिए तो क्रोध पर नियंत्रण करो।

“स्वास्थ्य जीवन और मन की शांति चाहिए तो क्रोध पर नियंत्रण करो।

क्रोध से होगा जीवन का विनाश।

विनाश का कारण क्रोध।

“ठाकुर जी की कृपा के बगैर यह संभव नहीं है "

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 9 से 15 फरवरी 2020 तक प्रतिदिन शाम 4: 00 बजे से 7 बजे तक स्थान - सीडी पार्क, सॉल्ट लेक, कोलकाता में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के चतुर्थ दिवस पर कथा के मुख्य यजमान गोपाल स्नेही जी का पूरा परिवार व हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
कथा प्रारंभ से पूर्व कथा के मुख्य यजमान गोपाल स्नेही जी ने आज महाराज श्री को फूल की माला पहनाकर एवं दुपट्टा उड़ाकर सम्मानित किया गया ।

आज कथा पंडाल में मलूक पीठ वृन्दावन से श्री गोपेश बाबा जी ने अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज जी से आर्शीवाद प्राप्त किया।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन " मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है " श्रवण कराया”।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि इस संसार में जीव यूँही अपने आप को कहता रहते है सब मैंने किया है, मैंने किया है। बड़ा विचित्र है जीव ! अच्छा करें तो मैंने किया। बुरा हो जाये तो भगवान ने बुरा कर दिया। बड़ा विचित्र है व्यक्ति अच्छा किया तो मैंने किया बुरा करें तो बोले भगवान ने किया। जीवन भर एक चीज सिखलों इस संसार में जो कुछ करते है ठाकुर जी करते है। हमें तो श्रेय का वो भागीदार बना देता है। ये कथा हो रही है बोले गोपाल जी आयोजित करवा रहे है। ये कथा कौन कर रहे है पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी कर रहे है। अगर ठाकुर जी की कृपा न करें तो ये विचार कहा से आये कथा करवाने का । ठाकुर जी शक्ति प्रदान न करें तो हिम्मत कहा से हो बोलने की ।

महाराज श्री ने कहा की जब हम कोलकाता की कथा करने आ रहे थे। देवांश जी ने कहा की आप हमारे जन्मदिन पर नहीं रहे गए। आप सुबह आ जाना शाम को फिर कथा कर लेना वहां जाकर। हमने कहा कोलकाता दूर है हम नहीं आ सकते, उन्होंने कहा फिर वही से बधाई दे देना। ठाकुर जी की कृपा से हम तो यही प्रार्थना करते है। अब पिता की भूमिका दी है तो उस नाते आशीर्वाद देते है। हे गोविन्द ऐसी कृपा करना की सतोगुणी बनकर सबको अपना समझते हुए हरि नाम को आगे बढ़ाते हुए अपने जीवन में गोविन्द को पाना है। ऐसे उद्देश्य के साथ वो अपने जीवन को जिए और धर्म को आगे बढ़ाएं। आप सब भी आशीर्वाद दे कि वो सत्कर्म में लगे रहे हमेशा अच्छाई को बढ़ाये।

महाराज श्री ने कथा क्रम आगे बढ़ाते हुए कहा की क्रोध पर काबू कैसे करें ? और ये क्रोध किसका नुकशान करता है। क्रोध करने वाले का, जिसपर क्रोध आये उसका ! जब पता ही है जिसको क्रोध आता है नुकसान उसी का है। क्रोध करते ही क्यों हो । मानते तो नहीं ! बहुत से लोग कहते है की कथाओ में क्या मिलेगा। मैंने कहा बहुत कुछ बोले दिखता तो नहीं है मैंने कहा कोई लेता नहीं । इसलिए दीखता नहीं। अब कोई स्कूल जाएं कक्षा में जाएं और वहा से कुछ ले ही न । तो स्कूल का कुसूर है या अध्यापक का दोष है। या बच्चो को दोष है। ज्यादा तर क्रोध सबको आता है लेकिन कोई क्रोध की वजह से अपना भी नुकसान कर लेता है। कोई दूसरो का तो बाद में करते हो पहले खुद का नुक्सान होता है। कैसे जिस समय आपको क्रोध आ रहा होता है उस समय सिर्फ अपनी सांसो को महसूस करो कैसे है। ठंडी - ठंडी या गरम - गरम उस समय कैसे गरम हो जाती है। जब जीव क्रोध करता है तो अंदर एक तरीके से उबाल होता है। और उससे रक्त ताप तेज हो जाता है। सांसे हो जाती है गरम । प्रसन्न रहने वाला व्यक्ति परेशान हो जाता है। एक उदाहरण है एक साहब थे दुकान बंद करके आ रहे थे साहब की नजर नहीं पड़ी दुकान बंद करते समय एक सांप दुकान में प्रवेश कर गया। वो दुकान में ताला लगा कर चले गए। सांप अंदर घूमता रहा घूमता रहा कुछ दिखाई नहीं पड़ा वहां पड़ी थी एक कुल्हाड़ी अब उसने कुछ और समझा उसने कुल्हाड़ी मारली उसकी और जब कुल्हाड़ी मारी तो वो काट था उस विचारे का क्या बिगड़ना था और आगे तो लोहा था उसका क्या बिगड़ना था अब उसको लगा इसको तो कुछ हो ही नहीं रहा तो उसको क्रोध आ गया। सांप बोला मेरी शक्ति को समझता नहीं फिर सांप ने फिर क्या किया वो जोर - जोर से वो अपना फ़न लोहे की उस जगह पर जहाँ से आप पेड़ काटते हो वहा जोर - जोर से मारने लगा। अब बताये लोहे का क्या होगा नुकसान ! तो उसी का नुकसान हो रहा है। जब - जब रक्त की बून्द निकले तब - तब और क्रोध और आएं। फिर जोर से मारें ऐसे ही रात भर मरता रहा। सुबह साहब आये दूकान का शटर उठाया देख कर दंग रहे गए की वो सांप अपनी ही वजह से खुद मर गया। उसे किसी ने मारा नहीं किसी ने नहीं मारा अपने क्रोध की वहज मर गया। वो सांप ही नहीं मरा हम सब भी ऐसे ही मरते है क्रोध की वजह से। हम अपनों से ही दूर हो जातें है क्रोध की वजह से, हम अपना ही नुकसान कर बैठते है क्रोध की वजह से, हम अपना स्वास्थ्य ख़राब कर लेते है क्रोध की वजह से, हम कईयो की नजरों में गिर जातें क्रोध की वजह से, क्रोध को कण्ट्रोल करने का एक बहुत अच्छा तरीका है। जब क्रोध आएं तो उसी समय उसको प्रकट मत करों। 11 बार भगवान का नाम लो जो आपके गुरु का मंत्र है उसे जपों। थोड़ा जल पिलो। थोड़ी बातों को नजर अंदाज करों।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।
महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।
शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।
इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।
दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।
महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

13Feb 2020

“प्रभु से आपका संबंध कैसा भी हो वो आपका भला ही करेंगे,

“प्रभु से आपका संबंध कैसा भी हो वो आपका भला ही करेंगे,

"पद प्रतिष्ठा मिलने पर अभिमान नहीं करना चाहिए, अभिमान करोगे तो सबकुछ बेकार हो जाएगा।

"करोड़ो जन्म निकलने के बाद भी हमे अपने कर्मो का फल भोगना ही पड़ेगा चाहे वो अच्छा हो या बुरा हो।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 9 से 15 फरवरी 2020 तक प्रतिदिन शाम 4: 00 बजे से 7 बजे तक स्थान - सीडी पार्क, सॉल्ट लेक, कोलकाता में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के पांचवे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि विप्र, वेदों, साधू-संतो की निंदा करना, गायों पर अत्याचार करने वाला व्यक्ति हरी को अप्रिय है। जो लोग मनगढंत धर्म को, मान्यताओं को मानते हैं और वेदों को नहीं मानते हैं वो भी लोग भगवान को अप्रिय है। हमारे धर्म को विक्षिप्त करने की तमाम कोशिश बॉलीवुड द्वारा बहुत की गई है। धर्म के खिलाफ फिल्मो में इसीलिए गलत दिखाया जाता है क्योंकि हम उसके खिलाफ आवाज नहीं उठाते। हम अपने धर्म के प्रति समर्पित नहीं है। यदि धर्म चला गया तो हमारा अस्तित्व भी समाप्त हो जाएगा।

हमारे घर में हमारे बच्चे भजन या पूजा पाठ नहीं कर रहे हैं क्योंकि हम स्वयं नहीं करते है इसलिए वो क्या करेंगे। आजकल कोई कह दें की मैं भजन या पूजा-पाठ करते हैं तो उसे बड़े आश्चर्य से देखते हैं। आजकल हम माथे पर तिलक नहीं लगाते हैं ना ही गले में तुलसी की माला डालते हैं क्योंकि हमे डर है की लोग क्या कहेंगे? हमे ये सोचना होगा की हमे लोगों के लिए जीना है या फिर अपने भगवान् श्री कृष्ण के लिए।

आजकल का समय देखिये जिस घर में गाय पलटी थी उस घर में आज कुत्ते पलने लग गए है इससे बड़ा दुर्भागय और क्या हो सकता है। यदि गाय की बात कर दी जाए तो हम सेक्युलर नहीं रहते। यदि हम गाय को कटने दें तो हम सेक्युलर हैं और यदि उसकी हिफाजत के लिए बोल दें तो हम सेक्युलर नहीं है।

हमे हमारे वेदों में, पुराणों में सिखाया गया है की ब्राह्मण, गाय, साधु- संतों का, धर्म का सम्मान करना है। जीव मात्र पर दया करने का स्वभाव हमारा होना चाहिए। मात्र अपने परिवार तक सिमित नहीं होना चाहिए। पृथ्वी पर सम्पूर्ण मानव और समस्त जीव पर दया होनी चाहिए। जब हम सभी के प्रति अपने हृदय में दया का भाव रखते हैं तो भगवान नारायण हमारा कल्याण करते हैं। हम अपनी जिस क्षमता से जीवों पर दया करते हैं भगवान अपनी क्षमता अनुसार उसका फल हमे देता है। जीवों पर जो दया नहीं करता वो भी भगवान नारायण का शत्रु है। जिसके जीवन में सत्य नहीं है वो भी भगवान का शत्रु है।

अधिक से अधिक सत्य बोलना चाहिए। हमे झूठ नहीं बोलना चाहिए। जबसे मोबाईल आया है तब से बात बात पर लोगों ने झूठ बोलना शुरू कर दिया। जो आर्टिफिशियल भक्त होते हैं उनका कथा में से जाने का मन करता है। जो सच्चे भक्त होते हैं उनका मन कथा से जाने है उनके लिए तो कथा चलती रहे, भजन चलते रहे घडी रुक जाए ऐसा सोचते हैं। वो हमेशा चाहते हैं की सदैव कथा होती रहे। ये रसिको का भाव है सच्चे भक्तों का भाव है।

भगवान श्री कृष्ण की महिमा का गुणगान करते हुए कहा की जो लोग भी भगवान श्री कृष्ण के बाल स्वरूप के दर्शन करने लिए बाबा के घर आये उनका जाने का मन नहीं कर रहा था। जिस भगवान के बाल स्वरूप के दर्शन हो जाए तो उसके पश्चात किसी को क्या चाहत शेष रहेगी।
महाराज श्री ने कहा की श्री रामकृष्ण परमहंस जी के एक बार गले का कैंसर हो गया था। भक्तों ने कहा गुरुदेव रामकृष्ण परमहंस से कहा कि " आप माँ काली से अपने लिए प्रार्थना क्यों नही करते ? क्षणभर की बात है, आप कह दें, और गला ठीक हो जाएगा ! तो रामकृष्ण हंसते रहते , कुछ बोलते नहीं। एक दिन बहुत आग्रह किया तो रामकृष्ण परमहंस ने कहा - " तू समझता नहीं है। जो अपना किया है, उसका निपटारा कर लेना जरूरी है। नहीं तो उसके निपटारे के लिए फिर से आना पड़ेगा। तो जो हो रहा है, उसे हो जाने देना उचित है। उसमें कोई भी बाधा डालनी उचित नहीं है।"
हमने जो कर्म किया है उसे तो भोगना ही पड़ेगा। कर्मो का फल जीव को भोगना ही होगा। करोड़ो जन्म निकलने के बाद भी हमे अपने कर्मो का फल भोगना ही पड़ेगा चाहे वो अच्छा हो या बुरा हो।

पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख घर में हो माया, तीजा सुख सुलक्षणा नारी, गृहस्थी का सबसे बड़ा सुख ये होता है की घर में नारी अच्छे कर्मो वाली और मृदभाषी होनी चाहिए। यही लागू पति के ऊपर भी लागु होता है।

पंडित श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।

11Feb 2020

“मानव होना, भारत का मानव होना और सत्संग से जुड़ जाना ये तीन चीज जिसे मिल जाएं उसका भगवान से मिलना तय है।“

“मानव होना, भारत का मानव होना और सत्संग से जुड़ जाना ये तीन चीज जिसे मिल जाएं उसका भगवान से मिलना तय है।“

ज्ञान और भगवान को प्राप्त करना हो तो तुम्हे भारत का ही महो करना पड़ेगा।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 9 से 15 फरवरी 2020 तक प्रतिदिन शाम 4: 00 बजे से 7 बजे तक स्थान - सीडी पार्क, सॉल्ट लेक, कोलकाता में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के तृतीय दिवस पर कथा के मुख्य यजमान गोपाल स्नेही जी का पूरा परिवार व हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

आज कथा पंडाल में माननीय मंत्री श्री साधन पाण्डे जी ने अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज जी से आर्शीवाद प्राप्त किया।

कथा प्रारंभ से पूर्व आज कोलकाता समिति ने महाराज श्री को पगड़ी पहनाकर सम्मानित किया।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन " श्री कृष्णा गोविन्द हरे मुरारी" श्रवण कराया”।

कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत में कोलकाता (बंगाल) के शिष्य परिवार द्वारा धर्म प्रचार की एक सुन्दर प्रस्तुति कर महाराज श्री को नमन किया। उसके बाद पंडित श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि मृत्यु हम सब की निश्चित है। हमें कोई बचा नहीं सकता। राजा परीक्षित गंगा के ही तट पर क्यों गए ? गंगा के तट पर हमेशा संतों का वास रहता है। कही न कही संत महात्मा आपको मिल ही जायेंगे। अगर आप गंगा के तट पर, तीर्थ धाम पर जायेगे। कही न कही संत मिलेंगे ही। और निश्चित तौर पर विषम परिस्थितियों में अगर कोई हमारा सहयोग कर सकता है तो कोई सद विचार वाले संत महात्मा गुरुजन ही हमारी सहयता कर सकते है। जीवन में कठिन परिस्थितिया तो सबके आती है। उन कठिन परिस्थितियों में अगर सलाह संसार से लोगें तो सांसारिक सलाह मिलेगी और अगर किसी आध्यत्मिक आत्मा से सलाह लोगें तो निश्चित जन कल्याण का ही नहीं बल्कि कल्याणकारी ऐसा मार्ग मिलेगा की गोविन्द तक आपको पहुंचने में अधिक बिलंभ नहीं लगेगा। महाराज श्री ने कथा क्रम बढ़ाते हुए कहा कि आप सभी लोगो ने कई बार कथा सुनी होगी। अनेको पुराण सुने होंगे, अनेको बार आपने कथा सुनी होगी क्या किसी भी कथा में आपने सुना है की भगवान का मिलना असंभव है। जवाब दीजिये। महाराज जी ने कहा कि तीन चीजे मेरी नजर में असंभव है। और अगर ये तीन चीजे आपको मिल जाएं तो संसार में कुछ भी असंभव नहीं। ईश्वर को पाना बहुत ही सरल हो जायेगा। तीन चीजे बहुत ही कठिन है। 1 एक तो मानव होना बहुत ही मुश्किल काम है। देवताओं को भी संभव नहीं। एक बार देवता तपस्या कर रहे थे। विष्णु भगवान ने पूछा। तुम स्वर्ग के रहने वाले देवता हो, सब सुविधाएं है। सारे सुखो की चरम सीमा जहाँ पर कोई सीमा ही नहीं है हर सीमा से पार तुम्हे हर सुख सुविधा मिल रही है। इसके बाद भी तुम्हे अब क्या चाहिए ? तपस्या क्यों कर रहे हो ? बोले महाराज हमें कुछ चाहिए इसलिए तपस्या कर रहे है। विष्णु भगवान बोले क्या चाहिए? बोले हमें मानव तन चाहिए। भगवान बोले मानव ? अरे मानव से ही तो देवता बनते है। तुम फिर नीचे जाना चाहते हो। बोले महाराज जो बिषय मानव योनि में संभव है। वो देव योनि में सम्भव है ही नहीं। पूछा क्या ? मानव योनि में क्या सम्भव है। बोले मानव योनि में सहज संभव है। मुक्ति आपके पास आना, आपके धाम आना, हम देवता है पर आपकी मर्जी के बगैर आपके धाम नहीं आ सकते। और मानव योनि में ये शक्ति है की वो आपके धाम आ सकते है। वो मुक्ति प्राप्त कर सकता है। 1 मानव होना दुर्लभ है असंभव है अगर ये मिल जाए तो भारत का मानव होना असंभव है। ये पुराणिक बात कर रहा हूँ। ये पुराणों में लिखा है। मानव होना मुश्किल है और मानव हो भी जाये तो भारत का मानव होना मुश्किल है। भोग विलासिताओं की तरफ अगर आपको जाना हो तो निश्चित चले जाइए यूरोप अमेरिका की साइड। और किसी कंट्री में आप भोग विलासिताओं की कोई सीमा नहीं है जहाँ मन करें जाना चाहो चले जाओं। लेकिन ज्ञान और भगवान को प्राप्त करना हो तो तुम्हे भारत का ही महो करना पड़ेगा। अगर आपको ज्ञान चाहिए, भगवान चाहिए तो दोनों के लिए तुम्हे यहाँ आना पड़ेगा। १ मानव होना, 2 फिर भारत का मानव होना । 3भारत के मानव होने के बाद भी सत्संग से बंधन होना बहुत मुश्किल है। ये तीज जिसको मिल जाये भगवान से कोई दूर नहीं कर सकता। और महाराज जी ने कहा की मेरे प्यारे मानव बन गए भारत के बन गए बस एक चीज बाकि है, भगवन से बंधन। किसी - किसी को तीनो चीजे मिल गई है। इसका मतलब है यात्रा प्रारम्भ हो चुकी है बस मंजिल का इंतजार है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।

तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।

9Feb 2020

कल रात पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज कोलकाता पहुँचे जहां एयरपोर्ट पर विश्व शांति सेवा समिति कोलकाता के सदस्यों, यजमान एवं भक्तों द्वारा महाराज श्री का पुष्प गुच्छ देकर व माला पहनाकर स्वागत किया।

कल रात पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज कोलकाता पहुँचे जहां एयरपोर्ट पर विश्व शांति सेवा समिति कोलकाता के सदस्यों, यजमान एवं भक्तों द्वारा महाराज श्री का पुष्प गुच्छ देकर व माला पहनाकर स्वागत किया। इसके पश्चात महाराज श्री के निवास स्थान पर भी भक्तों द्वारा पुष्प माला इत्यादि द्वारा स्वागत किया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 09 से 15 फरवरी 2020 तक सायं 4 :00 बजे से 7:00 बजे तक कोलकाता में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। आप सभी भक्तगण सादर आमंत्रित है।

देश-विदेश में सभी भक्त, कथा का सीधा प्रसारण आस्था चैनल एवं महाराज श्री के यूट्यूब चैनल "श्री देवकीनंदन ठाकुर जी" को सब्सक्राइब कर के देख सकते हैं।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

9Feb 2020

आज कोलकाता में कथा से पूर्व पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सी.आर.पी कैंट, सॉल्ट लेक से कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई।

आज कोलकाता में कथा से पूर्व पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सी.आर.पी कैंट, सॉल्ट लेक से कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई। कलश यात्रा में हजारों की संख्या में माताओं - बहनों और भाई -बंधुओं ने भाग लिया। इस भव्य कलश यात्रा में सैंकड़ों माताएं बहने कलश उठाकर कथा पंडाल पहुंची। कलश यात्रा ढ़ोल नगाड़ों, के साथ बड़ी धूमधाम से निकाली गई। कलश यात्रा जिन मार्गों से होकर गुजरी वहां इस भव्य कलश यात्रा को देखने के लिए लोग थम गए, हर किसी ने इस अद्भुत यात्रा का आनंद लिया। महाराज श्री के सानिध्य में कोलकाता में 09 से 15 फरवरी 2020 तक श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। सभी कोलकाता वासियों से निवेदन है की बढ़-चढ़कर कथा पंडाल में आकर कथा का रसपान करें।

10Feb 2020

“कलयुग में संत गुरूदेव के विचार ही हमे तार सकते हैं।

“कलयुग में संत गुरूदेव के विचार ही हमे तार सकते हैं।"

“संसार में कोई भी वस्तु अगर आपको प्राप्त है और उस वस्तु के समय रहते हुए अगर आपने प्रयोग नहीं किया तो हम समझदार नहीं कहे लायेंगे।"

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 9 से 15 फरवरी 2020 तक प्रतिदिन शाम 4: 00 बजे से 7 बजे तक स्थान - सीडी पार्क , सॉल्ट लेक, कोलकाता में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर कथा के मुख्य यजमान गोपाल स्नेही जी का पूरा परिवार व हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

द्वितीय दिवस की भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया गया।

कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत में कोलकाता (बंगाल) के शिष्य परिवार द्वारा गुरु वंदना" गाकर एवं नृत्य कर महाराज श्री को नमन किया और उनका स्वागत किया। उसके बाद पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि स्वास्थ्य दो प्रकार के होते है। एक शारीरिक स्वास्थ , एक मानसिक स्वास्थ। ह्रदय का भी स्वस्थ रहना परम आवश्यक है और शरीर का भी स्वस्थ रहना परम आवश्यक है। जब शरीर स्वस्थ होगा तो ह्रदय स्वस्थ होकर भगवान में लगेगा। शरीर में कही रोग हो तो फिर भगवान में, कथाओं में मन कम लगता है। तो यहां शरीर की भी परिक्षण, व्यवस्था, सुरक्षा, दवाई सब यहां पर है। डॉक्टर आपका यहाँ फ्री चेकअप कर रहे है। इलाज भी कर रहे है। महाराज श्री ने आगे कहा की कोरोना वायरस बहुत तीव्रता से पुरे विश्व को अपने प्रभाव से हम सबको परेशान कर रहा है। लगभग 1 हजार के करीब सिर्फ अकेले चीन में लोगो की मृत्यु हो गई है। ये वायरस एनिमल्स, के माध्यम से हम तक पंहुचा। और इस वायरस की विशेषता ये है की व्यक्ति में से व्यक्ति में चला जाता है। और इसी वजह से ये तेज गति से फैल रहा है। स्तिथि देखिए कितनी भया- भय है। की कई कॉन्ट्रियों में पहुंच गया है। यहां तक की हमारे भारत में भी 2 - 3 इसके केस पाएंगे है। जिसके लिए भारत सरकार भी काम कर रही है। महाराज जी ने आगे बताया की हमारे ऋषि - मुनियों का विज्ञान कितना तेज था। उंहोने पहले ही मना किया था कि मांसाहार मत करों। उन्होंने कहा की किसी से भी हाथ मत मिलाओं। आज ये चीजे हम तक कहा तक पहुंच गई। ये आप कल्पना नहीं कर सकते। पशुओं को खा- खाकर हम लोगो ने अपने शरीर को इतना दुर्बल कर दिया है। की कोई भी वायरस हमें बहुत जल्दी पकड़ लेता है। पहले लोग मांसहार नहीं करते थे। पशु तो पहले भी थे बीमारियां तो उनमे पहले भी थी जैसे स्वाइनफ्लू इससे कितने लोगो की मृत्यु हो गई है। ये भी, इसके भी, इस बीमारी के लक्षण भी स्वाइनफ्लू जैसे है। जैसे की छींक आना, बहुत जल्दी नाक बहना, बुखार आ जाना, पेट में थोड़ी अकड़न हो जाना सर में अचानक से दर्द हो जाना ये बहुत सारे चिन्ह है जिनसे आप पहचान सकते है। जैसे स्वाइनफ्लू लगभग - लगभग भी लक्षण इसके भी है। स्वाइनफ्लू भी पशुओं से आया। और ये कोरोना वायरस भी पशुओं से आया। और हम फिर भी नहीं मानते मांसाहार करने से। अरे भाई जिंदगी ज्यादा कीमती है कि जीभ का स्वाद ज्यादा कीमती है। और कोरोना वायरस आया कहा जानते हो ? जहाँ पर जिस मार्किट में जिन्दा सांप चाइना में खाये जाते है। उसी स्पेशल मार्किट से ये कोरोना वायरस वायरल हो रहा है। हमारे ऋषिमुनियों की बातों पर हम को विश्वाश नहीं होता है लेकिन जब साइंटिस्ट, जब डॉक्टर पढ़े लिखे चार लोग कहे देते है कि वो लोग ठीक थे तो हम बात को मानने लग जाते है। चलो उन्ही की बात मन लो आप सभी से मेरा निवेदन है। महाराज जी ने इस क्रम को समाप्त करते हुए व्यास पीठ सहित प्रार्थना करी की न सिर्फ भारतियों के लिए पुरे विश्व के लिए हे मेरे ठाकुर जी मेरे देश के ही नहीं बल्कि पूरे दुनिया के जितने भी जीव आत्माएं इस समय संसार में आप सब की रक्षा करें आप सबको सुरक्षा प्रदान करें, आप सब इन बिमारियों से मुक्त करें यही मेरी प्रार्थना है।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं।

भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।

9Feb 2020

“मनवांछित इच्छाओं को पूर्ण करती है भागवत

“मनवांछित इच्छाओं को पूर्ण करती है भागवत

श्रीमद भागवत कथा ही भक्ति का गंगा सागर है।

ईश्वर को जाने बिना ये जीवन सफल नहीं होगा

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 9 से 15 फरवरी 2020 तक प्रतिदिन शाम 4: 00 बजे से 7 बजे तक स्थान - सीडी पार्क , सॉल्ट लेक, कोलकाता में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के प्रथम दिवस पर कथा के मुख्य यजमान गोपाल स्नेही जी का पूरा परिवार व हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत गणेश वंदना ,दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

आज कथा के प्रथम दिवस में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज एवं मुख्य यजमान गोपाल स्नेही जी का पूरा परिवार व साल्ट लेक सिटी तुलसी सिन्हा रॉय जी ने दीप प्रज्जवलन किया। कथा प्रारंभ से पूर्व आज कोलकाता समिति ने महाराज श्री को 31 किलो पुष्पहार अर्पण कर सम्मानित किया ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन "मेरी सुन लो दीनदयाल मेरे साँवरिया" श्रवण कराया”।

कथा की शुरुआत में कोलकाता (बंगाल ) के शिष्य परिवार द्वारा गुरु वंदना "हमारे है श्री गुरु देव हमें किस बात की चिंता" गा कर महाराज श्री को नमन किया और उनका स्वागत किया। उसके बाद महाराज श्री ने बताया की जिस भाग्य में भागवत कथा सुनने का सौभाग्य होता है उस भाग्य के वर्णन कौन कर सकता है, "श्रीमद् भागवत कथा साधारण ग्रंथ नहीं है। "भागवत कथा अगर श्रद्धा से सुनेंगे तो यह भागवत कल्प वृक्ष है आपको वो मिल सकता जिसकी आपने कल्पना भी नहीं की होगी। अगर आप अपने धर्म का सम्मान करेंगे तभी आप सम्माननीय बनेगे। महाराज श्री ने आगे बताया कि "श्रीमद भागवत कथा आखिर है क्या ?" उन्होंने कहा कि भक्ति ज्ञान वैराग्य से ओत प्रोत है श्रीमद भागवत कथा। भगवान की सेवा के बिना कल्याण नहीं है। जीवन की पूरी यात्रा संसार की गतिविधियों से चलती हुई भगवत चरणों में अनुराग के साथ गंगा सागर में जब लीन हो जाती है। तो जीवन यात्रा संपन्न हो जाती है। तो भागवत के माध्यम से यात्रा को संपन्न करने की चेष्ठा श्रीमद भागवत कथा ही भक्ति का गंगा सागर है। जहाँ पहुंचकर हम सब की यात्रा पूरी हो जाती है। सर्वप्रथम महाराज श्री ने भागवत के प्रथम श्लोक का उच्चारण किया। भगवान का स्वरूप कैसा है ? सद्घन, चिद्घन और आनंदघन ऐसे भगवान सच्चिदानंद स्वरुप जो समस्त विश्व का पालन सर्जन संघारण करते है। तीनो के जो हेतु है तथा जिनकी पावन चरण - शरण ग्रहण करने से ही जीव की मुक्ति, कल्याण होता है। और जीव के तापत्र समाप्त होते है। ऐसे गोविन्द के पाद - पद्मो में उनके श्रीचरण कमलों में हम सभी नमन करते है। महाराज श्री ने बताया की श्रीमद भागवत महापुराण का प्रचार - प्रसार इस समय भारत में ही नहीं पूरे विश्व में बड़े जोर - शोर से हो रहा है। श्रीमद भागवत कथा की क्या महिमा है ? और ये भागवत किस माध्यम से हम तक पहुंची है। इस भागवत को श्रवण करने से हमें प्राप्त क्या होता है। श्री राजा परीक्षित न होते तो हमें ये भागवत न प्राप्त होती है। निश्चित ये भागवत ग्रन्थ राजा परीक्षित के श्रवण करने की जिज्ञासा के साथ जो उनके मन में भगवान की कथा को श्रवण करने की लालसा है। उस लालसा की वजह से हमें ये भागवत श्रवण करने को अधिकार प्राप्त हुआ है। अब पूरे भागवत ग्रन्थ में एक चरित्र बड़ा सुन्दर है। प्रमुख भूमिका अगर हम कहे भागवत की तो एक “राजा परीक्षित” दूसरे “श्री शुकदेव जी महाराज” ये दो प्रमुख भूमिकाएं है। मुझे राजा परीक्षित से इसलिए ज्यादा मित्रता है की राजा ने उस भागवत को तब सुना जब उन्हें श्राप लगा सातमे दिन तक्षक डस लेगा। अब तक्षक डस लेगा राजा परीक्षित इतने सक्षम है तक्षक को अपने पास आने तक न दे वो इतने सक्षम है। महाराज जी ने आगे कहा की श्राप पूरा होगा ही तो श्राप लगते ही राजा परीक्षित गए कहा ? राजा परीक्षित गए गंगा के तट पर। गंगा का महात्म्य क्या है। जो भगवान के चरणपादको का जो जल है। गंगा भगवान के श्री चरण से प्रकट हुई है। जो व्यक्ति मर भी जाएँ उसके मुख में गंगा जल डाल दिया जाए तो उसका पुनर्जन्म नहीं होता है इतना बड़ा महात्यम है। मरे हुए व्यक्ति की हड्डिया भी अगर गंगा में डाल दी जाये तो व्यक्ति की मुक्ति हो जाती है।

महाराज श्री ने कहा कि अपने आपको पहचानो यही से भागवत कथा प्रारम्भ हुई है। भक्ति का प्रारम्भिकरण दो ही प्रश्नो से है। या तो में कौन हूँ ये जानने की शुरुआत कर लो या फिर वो भगवान कौन है जिसने इतनी सुन्दर दुनिया बनाई है। तुम दोनों में से किसी को जान गए तो तुम्हारा मन भक्ति और कथा, भजन दोनों में लग जायेगा।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

5Feb 2020

जीवन में अगर कोई चीज अधिक हो जाए तो उसे सेवा भाव में लगाइए : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

जीवन में अगर कोई चीज अधिक हो जाए तो उसे सेवा भाव में लगाइए ।

जो भगवान के उत्सव में सम्मिलित होते है उनके सभी अमंगल नष्ट हो जाते है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 31 जनवरी से 06 फरवरी 2020 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का सेक्टर- जे, रेल नगर, आशियाना निकट नहर चौराहा, बंगला बाजार, लखनऊ में विशाल आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के षष्टम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

आज कथा पंडाल में उत्तर प्रदेश के माननीय विधि एवं न्याय मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता श्री बृजेश पाठक जी एवं माननीय पूर्व मंत्री उत्तर प्रदेश सरकार श्री शारदा प्रताप शुक्ला जी एवं माननीय प्रवक्ता लोकदल श्री अनिल दुबे जी एवं माननीय वरिष्ठ नेता भाजपा श्री राजकुमार सिंह चौहान जी एवं माननीय ब्लॉक प्रमुख नवाबगंज लखनऊ श्री अरुण सिंह जी ने अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज जी से आर्शीवाद प्राप्त किया।

कथा प्रारंभ से पूर्व आज लखनऊ समिति ने महाराज श्री को पगड़ी पहनाकर सम्मानित किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन " प्रेम रस जिसने पिया श्री राधे के नाम का" श्रवण कराया”।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत कहा कि पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत कहा कि भगवान के उत्सव में सम्मिलित होते है उनके सभी अमंगल नष्ट हो जाते है। "हमारे ठाकुर जी की शादी ऐसी है जुड़ती तो है पर टूटती कभी नहीं है।" वैसे भी सच तो यही है जो दुनिया से जुड़े उसे टूटना पड़ेगा आज नहीं तो कल छूटना पड़ेगा, रूठना पड़ेगा लेकिन जो गोविन्द से जुड़ जाये वो जुड़ने तक की देर है। टूटती कभी नहीं ! ये बात पक्की है। भागवत में सभी देवी - देवता पधारते है। भगवान की कथा जहां होती है वहा 33 करोड़ देवी - देवता आ जाते है। कई बार देवी प्रतक्ष प्रकट हो जाती है। हमें प्रेम से देवी मैया का दर्शन करना चाहिए। कथा में ध्यान लगाना चाहिए। तो "हो गया - हो गया वो दीवाना राधे श्याम का"भगवान की कथा श्रवण करने से जीव का ह्रदय शुद्ध होता है। विचार शुद्ध होते है, जब विचार शुद्ध होता है, ह्रदय शुद्ध होता है उसके बाद व्यक्ति के कर्म में बदलाव आता है। एक बहुत अच्छी बात हमने समझी है। जैसा आपका विचार होते है वैसा ही आपके जीवन में आपके साथ व्यबहार होता है। क्योंकि जब नकारात्मक विचार बनते है तो वो वाणी के माध्यम से बहार आते है। और बहार आकर वो आकाश में भ्रमण करने लग जाते है। क्योंकि आपका शब्द आपके आस - पास रहता है। कही जाता नहीं है। आप जो भी बोलते है वो सब आपके आस - पास रहता है। और जब शब्द आपके मुख से निकलता है। तो वो प्रकृति में मिक्स होता है। प्रकृति में मिक्स होने के बाद वायु में वातावरण में आपके घर के आस - पास जहां आते जाते वहा वो वातावरण मिल जाता है। उसके बाद में प्रकृति आपको वापस वही देती है। जो आपके विचार होते है। आपके नकारात्मक विचार होयेगे तो वापस आपको वो नकारात्मक विचार ही मिलेंगे। और आपके सकारात्मक विचार होंगे तो नकारात्मक विचार मिलेंगे। जैसे आपके विचार होंगे। इसलिए नकारात्मक विचार कभी रखने नहीं चाहिए। सकारात्मक विचार रखने चाहिए। भगवान की कथा क्या करती है ? हमारी नकारात्मक सोच को ह्रदय से दिमाग से बहार कर देती है। और सकारात्मक विचारधारा हमारे अंदर कथा के माध्यम से प्रवष्टित होती है। और जब सकारात्मक विचारधारा हमारे विचारो में आएगी ह्रदय में आएगी तो शब्दों के माध्यम से बहार जाएगी और वो इस प्रकृति में मिक्स हो जाएगी। आपके घर में है ऑफिस में है वो पॉजिटिव एनर्जी भ्रमित होगी और भ्रमण करने लगेगी आपके आस - पास जब भ्रमण करने लगेगी तो वही पॉजिटिव एनर्जी आपको वापस कर्म के रूप में और फल के रूप में आपको प्राप्त होने लगेगी। आज का व्यक्ति नेगेटिव ही सोचता है। मेरे साथ अच्छा नहीं होता मेरे साथ बुरा होता है। मैं कितना भी अच्छा करलूं लोग मेरी बढ़ाई , प्रसन्ता नहीं करते। मतलब नेगेटिव ही सोचता है और उसका फल भी नेगेटिव ही मिलता है। बोले क्या करें पहले अपने विचार बदलो। उसे पॉजिटिव करों। पॉजिटिव सोचोगे तो उसका फल भी पॉजिटिव ही प्राप्त होगा।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।

4Feb 2020

युवाओं को अपने जीवन में जीने के लिए बहुत सारी चीजो का अनुभव बड़ो से प्राप्त करना चाहिए।

युवाओं को अपने जीवन में जीने के लिए बहुत सारी चीजो का अनुभव बड़ो से प्राप्त करना चाहिए।

बहुत जल्दी किसी के विषय में जाने बगैर आप अपनी विचार धारा बनाले ये गलत है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 31 जनवरी से 06 फरवरी 2020 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का सेक्टर- जे, रेल नगर, आशियाना निकट नहर चौराहा, बंगला बाजार, लखनऊ में विशाल आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के पांचवे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन " घनश्याम तुम्हारे दर्शन को, ये दिल मेरा दीवाना है!" श्रवण कराया”।

आज कथा पंडाल में राम जन्मभूमि न्यास एवं कृष्ण जन्मभूमि न्यास के अध्य्क्ष मणिराम दास जी छावनी के पीठाधीश्वर महंत श्री श्री 10008 स्वामी श्री नृत्य गोपाल दास जी अयोध्या ने अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई एवं व्यासपीठ जी से आर्शीवाद प्राप्त किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि युवाओं को अपने जीवन में जीने के लिए बहुत सारी चीजो का अनुभव बड़ो से प्राप्त करना चाहिए। आज के युग में बहुत सारी चीजे हम लोग सिर्फ देखकर अच्छा और बुरे का निर्णय करते है। कई बार ऐसा होता है कि आँखों से देखा हुआ भी सच नहीं होता। युवाओं को बताना इसलिए जरुरी है कि आपके आगे ज़िन्दगी बहुत बड़ी है। और उस जीवन को सुंदर बनाने के लिए जितना जल्दी अनुभव बड़ो से अगर हमें कुछ मिल जाये वो हमें जीवन जीने में मदद करता है। सयोंग करता है। परन्तु कई बार ऐसा होता है। कि आज कल के युवाओं को देखो की वो बड़ो के साथ नहीं बैठते। आज कल के युवा अपने मित्र अपने फ़ोन के साथ बैठते है। महाराज जी कहा की आपके बड़े जो आपको सीखा सकते है कम शब्दों में, कम समय में वो आपका मोबाईल जीवन भर नहीं सीखा सकेगा। आपके मित्र भी आपके उम्र के होंगे वो आपको कितना सिखाएंगे। जितना उनको मालून है। लेकिन आपके बड़ो के साथ बैठने से आप समय से पहले अनुभव कर लेते है। बहुत जल्दी हम निर्णय करते है। अपने बड़ो और अपने छोटो को भी कुछ भी दृश्य देखने के बाद बहुत जल्दी हम लोग दूसरो पर दोषारोपण करना और दूसरो को बुरा कहे देना या अच्छा कहे देना बहुत जल्दी होता है। महाराज जी ने कहा की किसी को जाने बगैर आप बहुत अच्छा मत कहिये और आप किसी को जाने बगैर बहुत बुरा भी मत कहिये। जब तक आप पूरी तरह से ना जानले अच्छा और बुरा करने का निर्णय आप बहुत जल्दी मत लीजिये।
महाराज जी ने कथा क्रम आगे बढ़ाते हुए कहा की एक वृद्ध माता - पिता अपने पुत्र के साथ ट्रेन में यात्रा कर रहे थे । 24 - 25 साल का युवा बेटा उनका , वो ट्रेन की शीट पर वहां बैठा था जहां से खिड़की थी और खिड़की से वो आउट साइड देख रहा था ट्रेन की स्पीड अच्छी थी। ट्रेन चल रही थी बड़ी स्पीड से बो बच्चा बड़ा खुश हो रहा था बच्चा कहे रहा था पिता जी देखों - देखों ये वृक्ष कितनी तेजी से पीछे भागे चले जा रहे है। पिता जी देखों ये वृक्ष पीछे भागे चले रहे है। पिता जी मुस्कुरा दिए उसकी बात सुनकर, सामने वाली शीट पर एक युवा दंपत्ति बैठे हुए थे। वो उस बच्चे की बात को सुनकर ज्यादा खुश नहीं हुए बल्कि दुखी हुए। लेकिन उस बात से ज्यादा दुखी हुए की उनका बेटा ही ये कहे रहा है कि वृक्ष भागे जा रहे है पीछे की तरफ पर उनके पिता सिर्फ मुस्कुरा दिए इस बात से वो बड़ा परेशान हुआ पर बोलै कुछ नहीं । की इनका बेटा हमको क्या मतलब बैठा रहा। थोड़ी देर बाद उस पुत्र ने फिर कहा पिता जी - पिता जी देखो ये बादल हमारे साथ - साथ भाग रहे है। ये बादल हमारे साथ भाग रहे है। पिता जी ने फिर कुछ नहीं कहा और मुस्कुरा दिए। और जब पिता जी मुस्कुरा दिए उस युवा दंपत्ति जो वह पति - पत्नी सामने वाली शीट पर बैठे थे। उन से नहीं रहा गया। और उन्होंने कहा कमाल करते हो आपका बेटा पागल बनने की बात कर रहा है और आप मुस्कुरा देते हो आप इसका किसी डॉक्टर से इलाज क्यों नहीं कराते। हमको लगता है ये मेंटली डिस्टर्ब है। आप इस बच्चे को किसी डॉक्टर के पास लेकर जाइये। पिता जी ने मुस्कुराते हुए कहा डॉक्टर के पास से ही आ रहा हूँ। आप इस बच्चे के बिषय में कुछ जानते नहीं अपने इसे पागल घोषित कर दिया।आप जानते हो ये जो बच्चा है ये जन्मांत अँधा है। जन्मांत अँधा ये बच्चा इसका इलाज अच्छे डॉक्टर के पास हुआ और आज ये पहेली बार दुनिया देख रहा है। जन्म से इसने दुनिया नहीं देखी । आज पहेली बार इसने दुनिया देखी है इसलिए इसे यह इसे यह नहीं पता वृक्ष भाग रहे है या ट्रेन भाग रही है। इसे ये नहीं पता कि बदल तो यत्र - तत्र सर्वत्र है। ये पागल नहीं ये इसने पहेली बार दुनिया देखी है। इसलिए इसका ज्ञान कम है पागल नहीं है। वो युगल दम्पत्ति युवा पति -पत्नी अपनी बात पर सकंकोचित हो गए। शर्म आ गयी कि हमने बिना जाने - पहचाने इसको पागल समझ लिया। बात सच है की वृक्ष नहीं भाग रहे। बात ये भी सच है की बादल नहीं भाग रहे। पर बात ये भी सच है वो जो युवा दम्पति है वो नहीं जानते की बच्चे का दर्द क्या है। अधूरा ज्ञान है उसे इसलिए बहुत जल्दी किसी के विषय में जाने बगैर आप अपनी विचार धारा बनाले ये गलत है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।
महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।

3Feb 2020

“आपका एक दृश्य आपका चरित्र बदल सकता है : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

“आपका एक दृश्य आपका चरित्र बदल सकता है

भाग्यशाली है वो लोग जो भगवान के उत्सवों में सम्मिलित होते है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 31 जनवरी से 06 फरवरी 2020 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का सेक्टर- जे, रेल नगर, आशियाना निकट नहर चौराहा, बंगला बाजार, लखनऊ में विशाल आयोजन किया जा रहा है।

कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। कथा के चतुर्थ दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा प्रारंभ से पूर्व आज महाराज श्री को पगड़ी पहनाकर सम्मानित किया गया ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन " मेरे दिल की है एक आवाज दास हुँ राधे का" श्रवण कराया”।

आज कथा पंडाल में प्राख्या उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष धर्म प्रचारक कृष्णा पंडित जी एवं पूर्व एमएलसी अरविन्द त्रिपाठी जी और (माननीय मुलायम सिंह यादव जी की पुत्रवधू) श्रीमती अपर्णा यादव जी ने अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज जी से आर्शीवाद प्राप्त किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भाग्यशाली है वो लोग जो भगवान के उत्सवों में सम्मिलित होते है। निश्चिंत बात ये है कि सिर्फ मृत्युलोक में ही मानवों को ही ये अवसर प्राप्त है। की वो भगवान के उत्सव में सम्मिलित हो सकते है उन्ही को यह अधिकार प्राप्त है, हर किसी को ये अधिकार प्राप्त नहीं है। कलयुग में सबसे बड़ा जो भक्ति में बादक है वो है प्रमाद। जो जीव कलयुग में प्रमाद करता है। वो भक्ति नहीं कर सकता और इतना प्रमाद है की यहां से 10 किलो मीटर पर कथा हो रही है तो हम कैसे जाये। कितना बड़ा प्रमाद है। मुक्ति प्राप्त करने के लिए, भक्ति प्राप्त करने के लिए, गोविन्द की प्राप्ति के लिए भी 10 किलो मीटर भी यक्ति चलना नहीं चाहता। घर बैठे ही कल्याण चाहता है। और व्यक्ति कहता की भगवान दया नहीं करते, भगवान ने तो बहुत बड़ी दया कर दी तुमको मानव बनाया अब उस दया को बनाये रखने का काम तो तुम्ही को करना पड़ेगा। भगवान ने हमें मानव जीवन दिया है, अब उसमे सत्कर्मो के द्वारा इस जीवन को सफल करना है। आलश्य, प्रमाद, निद्रा , इन सब झंझटो में पड़कर उस सुन्दर अवसर को गवा देना है, यह हमारे ऊपर निर्भर है। चार युग कौन से है ? 1 जो व्यक्ति सोता रहे वो कलयुग है। 2 कुछ उठ जाए और फिर भी जम्हाई लेते रहे वो द्वापुर है। 3 चलना है ये विचार मन में आ जाए, कुछ कर्म करने की इच्छा मन में हो, वो त्रेता है और खड़ा होकर चल पड़े वो सतयुग है।
महाराज श्री ने कहा कि अगर हम मंदिरों में, तीर्थों में कथा पंडालों में अशांति देंगे तो ये अशांति हमारे जीवन में आ जाएगी और अगर हम वहां जाकर शांति का परिचय देंगे तो हमारे जीवन में शांति आ जाएगी। बहुत ज्यादा जरूरी है की कथा में जाकर हम शांति का परिचय दें। महाराज श्री ने कहा कि भरत जी महाराज के तीन जन्मो का वर्णन पुनरपि जननम, पुनरपि मनरम, पुररपी जननी, ये संसार का जो आवागमन है इसी से मुक्त होने के लिए मानव जीवन मिला है। व्यक्ति जैसे पाप करता, कर्म करता है, सत्कर्मो का फल स्वर्ग की प्राप्ति है। और बुरे कर्मो का फल नर्क की प्राप्ति है। जिस तरीके से भी व्यक्ति जैसे भी कर्म करता है उसे उन कर्मो का फल भोगने के लिए यथावत स्थानों पर जाना पड़ता है। सुन्दर कर्म करने पर स्वर्ग की प्राप्ति होती जरूर है परन्तु उसके बावजूद भी पुनर्जन्म होता है। और पुनर्जन्म होने के बाद फिर कैसे कर्म होयेगे ये कोई कहे नहीं सकता ये कोई बता नहीं सकता।

महाराज श्री ने कहा कि भरत जी महाराज के तीन जन्मो का वर्णन पुनरपि जननम, पुनरपि मनरम, पुररपी जननी, ये संसार का जो आवागमन है इसी से मुक्त होने के लिए मानव जीवन मिला है। व्यक्ति जैसे पाप करता, कर्म करता है, सत्कर्मो का फल स्वर्ग की प्राप्ति है। और बुरे कर्मो का फल नर्क की प्राप्ति है। जिस तरीके से भी व्यक्ति जैसे भी कर्म करता है उसे उन कर्मो का फल भोगने के लिए यथावत स्थानों पर जाना पड़ता है। सुन्दर कर्म करने पर स्वर्ग की प्राप्ति होती जरूर है परन्तु उसके बावजूद भी पुनर्जन्म होता है। और पुनर्जन्म होने के बाद फिर कैसे कर्म होयेगे ये कोई कहे नहीं सकता ये कोई बता नहीं सकता। अभी आप थोड़ी कल्पना करें कि 20 साल पहले जैसा समय था वैसा आज है क्या ? और आज जैसा समय है क्या 20 साल बाद वैसा रहेगा ? 20 साल वाला समय अभी नहीं है और अभी वाला समय 20 साल बाद नहीं होगा। अगर आज भी मर जाए। और फिर जन्म हो दुवारा और फिर समझदारी तो कम से कम 20 - 21 साल बाद ही आएगी और तब तक समय और बदल गया होगा स्थितियां और बदल गई होगी, विचार धारा और महान हो गई होगी। तो जो व्यक्ति अभी अपना कल्याण नहीं कर सकता वो नेक्स्ट 20 साल बाद अगर उसे दूसरा जन्म मिल भी जाये तो मनुष्य क्या कल्याण कर पायेगा ? यही एक ऐसा जन्म है शायद भगवान ने हम सबको ये बड़ी करुणा करके यह अवसर दिया है इस समय पर हमें इस सुन्दर समय जन्म दे दिया जहाँ भगवान की अनंत कथाएं, जहाँ भगवान के अनेक भक्त है। जहाँ हमारे ह्रदय में भी प्रेणना उत्पन्न हो जाती। की चलो भगवान कथा सुनकर अपना जीवन को धन्य करें। तो इस समय को गवाना नहीं चाहिए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।

महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।

शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।
इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।
दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।
महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

2Feb 2020

“परम कल्याण करने वाली है भागवत": पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

“परम कल्याण करने वाली है भागवत"

"सात दिनों का उत्सव है भागवत"

“वेद रूपी वृक्ष का पका हुआ फल जो है वो है श्रीमद भागवत"

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 31 जनवरी से 06 फरवरी 2020 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का सेक्टर- जे, रेल नगर, आशियाना निकट नहर चौराहा, बंगला बाजार, लखनऊ में विशाल आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया गया। भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई।

कथा के द्वितीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन "हम तेरे राधा रानी, हमे तेरा ही सहारा " श्रवण कराया”।

आज कथा पंडाल में भाजपा विधायक श्री सुरेश तिवारी जी एवं चेयरमैन श्री सुरेंद्र तिवारी जी ने अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आर्शीवाद प्राप्त किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि वेदो का नाम ही है निगम। वेद रूपी वृक्ष का पका हुआ फल जो है वो है श्रीमद भागवत, श्रीमद भागवत कथा बार - बार सुनने से क्या होगा ? एक बार सुनो, दो बार सुनो, हजार बार सुनो, तीन गुण है। सत, रज, तम ईश्वर सतोगुणी के ह्रदय में निवास करते है। सतगुण परमात्मा से मिलाने का कार्य करते है, सतगुण जो है वो हमें ईश्वर के करीब ले जाता है। और सतगुण में आती है भगवान की कथा सुनना, रज में आप देखेंगे जैसा भी मन करता है हम वही करते है। रज से सत में आया जा सकता है। पर तम से सत में नहीं आया जा सकता। वो बड़ा कठिन कार्य है। अगर आप रजोगुणी है तो आप सतोगुणी हो सकते है। अगर आप तमोगुणी है तो सतोगुणी होना मुश्किल कार्य है। रज में तो आप कथा भी सुन आये लेकिन ध्यान रहे कथा में हमें बात चित नहीं करनी है। कथा सुनना, मंदिर जाना, ठाकुर जी की पूजा करना, तुलसी पूजा करना ये सब छोड़ा नहीं, बीच में ये सब काम भी करना। लेकिन तमोगुण मंदिर तो कभी गये नहीं, कथा में कभी गए नहीं, अच्छे - भले काम तो कभी किये नहीं, और बुरे काम करते रहे। बुरे कार्य जैसे की मदिरा पीते रहे। मंदिर के नाम पर बिदग गए नहीं - नहीं हम नहीं जायेगे। क्या रखा है मंदिर में भगवान तो हमारे ह्रदय में है। भगवान तो सबके ह्रदय में है पर भगवान ह्रदय में दिख जाये इसके लिए जरुरी है की हम मंदिर जाये।
महाराज श्री ने आगे कहा कि भगवान की भक्ति के बगैर अगर हम सोचें की हमे कुछ मिल गया। इस संसार और संसार के लोगों को आजतक मिला क्या है? काम किसी के पूरे हुए नहीं, भगवान की भक्ति है जो हमे पूर्ण करती है। मानव जीवन में जब भी अवसर मिले सुधरने का काम किजिए, अच्छी बात सिखने को मिले तो सीख लिजिए, बुरे बातों पर ध्यान मत दिजिए। समस्या वही है जो नहीं करनी चाहिए वो कर रहे हैं और जो करना चाहिए उसके लिए ही समय नहीं है। मानव जीवन हमें भगवान की भक्ति के लिए मिला है, इससे निकलने के लिए गुरू द्वारा बताए गए मार्ग पर चलिए, उससे जो आप चाहते हैं वो आपको प्राप्त होगा। मानव जीवन का उद्देश्य हमे प्राप्त होगा, सफलता हमे प्राप्त होगी।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं।
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।

3Feb 2020

लखनऊ में श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस से पूर्व युवा शांति सन्देश का आयोजन किया गया।

आज विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सेक्टर- जे, रेल नगर, आशियाना निकट नहर चौराहा, बंगला बाजार, लखनऊ में श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस से पूर्व युवा शांति सन्देश का आयोजन किया गया।महाराज श्री ने सभी युवाओं एवं बच्चों के धर्म और संस्कृति से जुड़े सवालों का एक-एक करके जवाब दिया। युवा शांति संदेश के इस आयोजन में युवाओं ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। युवाओं एवं माता - बहनों ने देश के धर्म, संस्कृत, संस्कृति और संस्कारों से जुड़े हुए कई सवाल किए जिनका महाराज श्री द्वारा युवाओं की ही भाषा में बड़ी ही सरलता से उत्तर दिया गया। पूज्य महाराज श्री ने सभी युवाओं को गलत संगत एवं प्रव्रतियों को त्यागने और धर्म, देश व समाज के प्रति समर्पित रहने के लिए प्रेरित किया।

 

3Feb 2020

“जो परोपकार के लिए कर्म किया जाता है वो सर्वश्रेष्ठ कर्म कहा जाता है।"

“जो परोपकार के लिए कर्म किया जाता है वो सर्वश्रेष्ठ कर्म कहा जाता है।"

"सत्संग का बहुत बड़ा महत्व है हमारे जीवन में।"

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 31 जनवरी से 06 फरवरी 2020 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का सेक्टर- जे, रेल नगर, आशियाना निकट नहर चौराहा, बंगला बाजार, लखनऊ में विशाल आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया। कथा के तीसरे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन " मेरा तार प्रभु से जोड़े ऐसा कोई संत मिले" श्रवण कराया”।

आज कथा पंडाल में कैबिनेट मंत्री ग्राम विकास विभाग एवं समग्र विकास विभाग उत्तर प्रदेश सरकार श्री राजेंद्र प्रताप सिंह जी अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई एवं व्यासपीठ से आर्शीवाद प्राप्त किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि सत्संग का बहुत बड़ा महत्त्व है हमारे जीवन में, सत्संग हमें बहुत कुछ देता है, जिन्हे जीवन में संतो का संग मिल जाये उन का जीवन क्या से क्या हो जाता है। इस संसार में सबसे बड़ा अगर सत्य है तो वह है मृत्यु, मृत्यु की तीन चीजे होती है जिसके बिना मृत्यु नहीं होती। 1 मृत्यु किस स्थान पर होगी 2 किस वजह से होगी 3 किस समय होगी ये तीनो फिक्स है। तो जब पहले ही फिक्स हो गई है ये तीनो चीजे तो हमें मृत्यु को कभी भूलना नहीं चाहिए। महाराज जी ने कहा की जो मृत्यु भूलते है वो पाप करते है। जो लोग मृत्यु को याद रखते है वो कभी पाप नहीं कर पाते है। हम लोगो से पाप कैसे हो जाते है? कई लोग तो कहते है जिंदगी मिली है तो मजे कर लो पता नहीं फिर दुबारा थोड़ी मिलनी है एक ही बार जन्म मिलता है,जन्म कई बार मिलेगा अगर कर्म अच्छे नहीं हुए तो, जन्म एक बार उन्ही को मिलता है जिनके कर्म अच्छे होते है। उन्हें दुबारा नहीं आना होता वो ठाकुर जी के धाम चले जाते है।
जितने भी युवा जीवन में सफलता चाहते हैं तो सबकुछ आपके विचारों पर निर्भर करता है। कई बार लोग निराश होते हैं, आपकी विचारधारा आपको सुख देती है, आपकी विचार धारा आपको दुख देती है। इस संसार में सब अपने अपने कर्मों का फल भोगते हैं। हमारे युवा बहुत जल्दी अपनी विचारधारा बदल लेते हैं, सुखी हो जाएं तो मेहनत का फल है, दुखी हो जाएं तो भगवान ये दुख मुझे क्यों दिया है। भगवान आपको दुख देते हैं, मेहनत आपको सुख देती है ऐसा नहीं है, ये सारा कमाल नजरिए का है, आप सिर्फ अपनी सोच बदलिए, सारी व्यवस्थाएं, सुविधाएं सब बदल जाएंगी।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।

तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।

31Jan 2020

“अपना वास्तविक स्वरूप भूल रहा है मनुष्य”– पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

“हम विश्व गुरु थे, विश्व गुरु हैं और आगे भी विश्व गुरु रहेंगे”- पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान एवं पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 31 जनवरी से 06 फरवरी 2020 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का सेक्टर- जे, रेल नगर, आशियाना निकट नहर चौराहा, बंगला बाजार, लखनऊ में विशाल आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज जी ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

आज कथा पंडाल में भाजपा प्रदेश महामंत्री श्री विद्यासागर सोनकर जी ने अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज जी से आर्शीवाद प्राप्त किया।

कथा के प्रथम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा के प्रथम दिवस पर महाराज जी ने वर्तमान में देश की स्थिति पर बोलते हुए पूछा कि कौन-कौन चाहता है कि सीएए बना रहे? कौन-कौन है जो सीएए का समर्थन करता है? मीडिया में वही दिख रहा है जो नहीं चाहते। वो क्यों नहीं दिख रहा जो चाहते हैं। जो इसके पक्ष में है वो भी तो दिखना चाहिए। शाहीनबाग में सीएए और एनआरसी के विरोध में लगातार चल रहे प्रदर्शन पर बोलते हुए कहा कि कोई भी आता है और कुछ भी बोलकर चला जाता है। पार्टी बाद में होनी चाहिए और देश पहले होना चाहिए। जब देश की बात हो तो कंट्री फस्ट। पार्टी तो एक चुनाव हारेगी तो दूसरा जीत जाएगी। पार्टी का तो आना जाना लगा रहता है। याद रहे कि अगर देश हार गया तो कोई पार्टी नहीं जीत पाएगी। सरकार जो कानून बनाती है वो देश के हित में ही बनाती है। अगर देश के हित में ये कानून बना है तो सिर्फ हम ही नहीं, पूरे सनातन धर्म का संत समाज आपकी सरकार के साथ खड़ा है। पूरे विश्व में कहीं भी चले जाओ हिंदुओं को कोई नहीं पूछता है। दुनिया में कई मुस्लिम और ईसाई देश हैं लेकिन कोई हिंदू देश नहीं है। ऐसे में अगर हम लोगों पर विपदा आएगी तो हम कहां जाएंगे। भारत में सभी धर्म के लोग रहें, हमें किसी से कोई बैर नहीं है। अगर हमें आपके खुदा से कोई समस्या नहीं है तो आपको भी हमारे राम, कृष्ण से कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। ये जिम्मेदारी सबकी है। खुद का सम्मान करना अगर हिंदू सीख लेगा, तो पूरी दुनिया को दिखा देगा कि हम विश्व गुरु थे, विश्व गुरु हैं और आगे भी विश्वगुरु रहने की पूरी क्षमता है। महाराज जी ने कहा कि हम सभी सीएए के पक्ष में है और जल्द से जल्द इसका विरोध खत्म हो और पुन: भारत प्रगति की ओर बढ़े।

महाराज जी ने आगे कहा कि जब कोई जीव इस पृथ्वी पर आता है तो उससे एक गलती होती है वो भी छोटी नहीं बड़ी होती है। जिस काम के लिए मनुष्य इस धरती पर आता है उसे भूल जाता है और जिनके लिए मना किया है उनमें लग जाता है। इस कारण वो अपना वास्तविक स्वरूप भूल जाता है। एक उदाहरण देते हुए महाराज जी ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति पढ़ लिखकर अमेरिका चला जाए और वहां उसे नौकरी,मकान सब मिल जाए। जब तो वापस अपने गांव लौटे और उसमें गांव के व्यक्तित्व की परछाई ना दिखे तो ये उसकी अच्छाई है या बुराई? लोगों ने कहा कि ये तो बुराई है। जिसे हम कह रहे हैं कि वो बुराई है वहीं बुराई तो हम भी कर रहे हैं।

हमें अपने घर और ऑफिस का पता तो मालूम है लेकिन अपना खुद का पता क्या है ये कोई नहीं जानता। हम कहां से आएं है यही बताने के लिए होती है भागवत कथा। भागवत के माध्यम से हम जानते हैं कि असली में हमारा सही पता क्या है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए बताया कि भागवत का महात्यम क्या है? एक बार सनकादि ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे। उन्होंने ये प्रश्न किया कि कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगों की चिंता नहीं की, पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई है। कारण क्या है? क्योंकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूलकर केवल अपने मन की ही करता है। जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा हैं तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है।

महाराज जी ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं, बल्कि भागवत की मानो भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने, गीता की सुने और उसकी माने भी। माँ-बाप, गुरु की सुने तो उनकी माने भी। तब आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे, तो आपको संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी और जब आपको संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा, तो निश्चित ही आप वैराग्य की ओर अग्रसर हो जाएंगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

21Jan 2020

ठा. श्री प्रियाकांत जू मंदिर के ‘चतुर्थ पाटोत्सव’ के पावन अवसर पर संत महात्मा पधारे। उनकी उपस्थिति में चतुर्थ पाटोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया गया। सर्वप्रथम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने मंत्रोच्चार के साथ भगवान प्रियाकांत जू का पंचामृत से अभिषेक कर उन्हें रत्नजड़ित सुंदर पोशाक पहनाई।

ठा. श्री प्रियाकांत जू मंदिर के ‘चतुर्थ पाटोत्सव’ के पावन अवसर पर संत महात्मा पधारे। उनकी उपस्थिति में चतुर्थ पाटोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया गया। सर्वप्रथम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने मंत्रोच्चार के साथ भगवान प्रियाकांत जू का पंचामृत से अभिषेक कर उन्हें रत्नजड़ित सुंदर पोशाक पहनाई।


आयोजन से पूर्व ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर की आकर्षक साज-सज्जा की गयी एवं मंदिर गर्भगृह पर फूल बंगला सजाया गया। प्रातः ठाकुर जी के विग्रह का अभिषेक एवं श्रृंगार दर्शन के पश्चात आरती हुई। इसके पश्चात भगवान श्री प्रियाकान्त जू के छप्पन भोग दर्शन भक्तों के लिये खोले गये।
इस अवसर पर पूज्य महाराज श्री के साथ अयोध्या मणिराम छावनी उत्तराधिकारी पूज्य श्री कमलनयन शास्त्री जी महाराज, वृन्दावन भागवत पीठाधीश्वर सद्गुरूदेव पूज्य श्री पुरुषोत्तमशरण शास्त्री जी महाराज, भागवत वक्ता पूज्य श्री नेत्रपालजी महाराज एवं अन्य संतजनों ने श्री प्रियाकान्त जू भगवान की आरती की।


इस दौरान महाराज जी ने अपने गुरूदेव पूज्य श्री पुरुषोत्तम शरण शास्त्री जी महाराज एवं संत महात्माओं से आशीर्वाद प्राप्त करते हुए उन्हें सम्मान के रूप में शॉल एंव ठा. प्रियाकांत जूं की फोटो भेंट की। इस सुअवसर पर हजारों की संख्या में देश-विदेश से भक्तगण पधारे। सभी ने भगवान श्री प्रियाकान्त जू से आशीर्वाद लेते हुए, संत महात्माओं से आर्शीवचन प्राप्त किए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर महाराज जी ने आर्शीवचन देते हुए कहा कि भक्तों की भावना से साधारण से पत्थर में भी भगवान की प्राण प्रतिष्ठा हो जाती है। लाखों भक्तों की आस्था और भक्ति का ही परिणाम है कि 8 फरवरी 2016 को वृन्दावन में कमलपुष्प मंदिर के रूप में ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर का सपना साकार हुआ। उन्होंने आगे कहा कि सच्चे मन से की गई भक्ति कभी खाली नहीं जाती। अच्छा शिष्य वही होता है जो अपने गुरू से कुछ ना छिपाए। चाहे सुख हो या दुख, सब कुछ अपने गुरुजनों से साझा करना चाहिए। वहीं अयोध्या से आये पूज्य कमलनयन जी महाराज ने कहा कि वृन्दावन धाम में भक्तिभाव हृदय लेकर आने वाले श्रद्धालुओं के चित्त में श्री युगल जोड़ी सरकार स्वंय विराजमान हो जाते हैं।
इस अवसर पर पूज्य श्री पुरुषोत्तम शरण शास्त्री जी महाराज ने श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज को डॉक्ट्रेट की उपाधि मिलने पर बधाई देते हुये कहा कि वे भगवान की कथाओं से मानव समाज के अशांत चित्त का उपचार कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि शिष्य की हर उपलब्धि से गुरू का मान बढ़ता है। आर्शीवचन के पश्चात कृष्ण भजनों पर मंदिर परिसर में मौजूद सभी भक्तजन झूम उठे।

इस अवसर पर विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी, रवि रावत जी, श्रीपाल जिंदल जी, धमेन्द्र शर्मा धन्नू भईया, डा. यू.पी.सिंह, विपिन वाजपेयी, सावित्री सिंह, गजेन्द्र सिंह, तरूण खत्री, राजू यादव, मंजु शुक्ला, शिव शंकर झा, किशन गौड़, विवेक शर्मा, बच्चू सिंह, धमेन्द्र यदुवंशी जी आदि उपस्थित रहे।
देश के कोने-कोने से आये भक्तों ने अपने अराध्य के दर्शन कर बधाई गाते हुये पाटोत्सव पर खुशियाँ मनायीं। इस दौरान राधे राधे के जयकारों से पूरा मंदिर गूंज उठा।

श्री प्रियाकांत जू मंदिर के चतुर्थ पाटोत्सव पर हजारों की संख्या में देश-विदेश से भक्तगण पधारे और कृष्ण भजनों का आनंद लिया। इस अवसर पर भक्तजनों के लिए मंदिर परिसर में विशाल भंडारे का आयोजन भी किया गया। जिसमें हजारों भक्तों ने भारतीय परंपरा को निभाते हुए जमीन पर बैठकर प्रसाद ग्रहण किया। इस दौरान राधे राधे के जयकारे भी लगाए गए।

19Jan 2020

पूज्य श्री श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 22 से 30 मार्च 2020 दिल्ली में होने वाले भव्य श्री राम कथा का आयोजन को लेकर आज ट्रस्ट के सचिव श्री Vijay Sharma Vssct जी के द्वारा दिल्ली में एक मीटिंग का आयोजन किया गया।

पूज्य श्री श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 22 से 30 मार्च 2020 दिल्ली में होने वाले भव्य श्री राम कथा का आयोजन को लेकर आज ट्रस्ट के सचिव श्री Vijay Sharma Vssct जी के द्वारा दिल्ली में एक मीटिंग का आयोजन किया गया, जिसमें श्री राम कथा के इस भव्य आयोजन को विशाल भव्य और सुंदर बनाने को लेकर चर्चा की गई जिसमें सभी समिति सदस्य और भक्तजन उपस्थित रहे और कथा की प्रचार सामग्री का भी विमोचन किया गया।

20Jan 2020

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारविंद से लुधियाना में आयोजित होने वाली श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों को लेकर लुधियाना पंजाब में विश्व शांति सेवा समिति परिवार और शिष्य परिवार लुधियाना के सभी भक्तों ने एक मीटिंग कि।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारविंद से लुधियाना में आयोजित होने वाली श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों को लेकर लाल बहादुर शास्त्री सीनीयर सैक स्कूल नानक पुरी, धुरी लाईन, मिलर गंज, लुधियाना पंजाब में विश्व शांति सेवा समिति परिवार और शिष्य परिवार लुधियाना के सभी भक्तों ने एक मीटिंग का आयोजन किया और उसमें आगामी कार्यक्रम को लेकर चर्चा की। जिसमें काफी संख्या में लोगों ने भाग लिया।। इस मीटिंग में भारी संख्या में भक्तगण मौजूद रहे।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

20Jan 2020

विश्व शांति सेवा समिति बेंगलुरु एवं विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारविंद से बेंगलुरु में इस वर्ष हुई श्री राम कथा को भव्य रूप में सफल बनाने के लिए समिति सदस्यो ने सभी भक्तो को धन्यवाद किया।

विश्व शांति सेवा समिति बेंगलुरु एवं विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारविंद से बेंगलुरु में इस वर्ष हुई श्री राम कथा को भव्य रूप में सफल बनाने के लिए समिति सदस्यो ने सभी भक्तो को धन्यवाद किया और उसके बाद अगले वर्ष 16 से 22 दिसंबर 2021 में होने वाली श्रीमद् भागवत कथा के आयोजन को लेकर उसको भव्य और विशाल बनाने के लिये इसी विषय पर सभी लोगों ने चर्चा की इस मौके पर सभी समिति के सदस्य उपस्थित रहे।

20Jan 2020

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने आज वृंदावन में सर्दी में गरीब असहाय व्यक्तियों को कंबल वितरित किए ताकि उन्हें ठंड से राहत मिल सके। अगर हमें भगवान ने कुछ सामर्थ्य प्रदान किया है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने आज वृंदावन में सर्दी में गरीब असहाय व्यक्तियों को कंबल वितरित किए ताकि उन्हें ठंड से राहत मिल सके। अगर हमें भगवान ने कुछ सामर्थ्य प्रदान किया है तो हमें उस कृपा में से एक हिस्सा ऐसे असहाय गरीब साथियों के साथ बांटना चाहिए l सदैव जरुरतमंदो की सहायता के लिए आगे आना चाहिए। मानवता की सेवा ही सच्चा धर्म है।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

17Jan 2020

ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी पटना होते हुए नन्दनी ग्राम पहुंचे जहां उन्होंने 1 से 7 अप्रैल 2020 तक नंदनी ग्राम, समस्तीपुर, बिहार में आयोजित होने जा रही श्रीमद् भागवत कथा के लिए कथा स्थल का जायज़ा लिया।

आज ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी पटना होते हुए नन्दनी ग्राम पहुंचे जहां उन्होंने 1 से 7 अप्रैल 2020 तक नंदनी ग्राम, समस्तीपुर, बिहार में आयोजित होने जा रही श्रीमद् भागवत कथा के लिए कथा स्थल का जायज़ा लिया। इसी के साथ आयोजक समिति के मेंबर्स के साथ श्री विजय शर्मा जी ने कथा की तैयारियों को लेकर मीटिंग की। इस मौके पर मुखिया जी श्री रामाश्रय ठाकुर जी, श्री प्रमोद ठाकुर जी, श्री रामदरश ठाकुर जी, श्री शिवनाथ ठाकुर, श्री नवल किशोर ठाकुर जी, श्री कमलेश ठाकुर जी, श्री अनिल ठाकुर जी, श्री सुबोध ठाकुर जी, श्री बिट्टू ठाकुर जी और सभी नन्दनी ग्रामवासी, श्री कौशल किशोर राय जी बस्ती हाजीपुर से, श्री टुनटुन सिंह जी, श्री राजीव ठाकुर जी मुम्बई से एवं श्री अमित कुमार जी भी उपस्थित रहें।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

19Jan 2020

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी के सानिध्य में 9 से 15 फरवरी 2020 तक कोलकाता में होने वाले भव्य श्री मद भागवत कथा के आयोजन को लेकर कल 18/01/2020 को ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी ने कोलकाता समिति के साथ आयोजन को भव्य और विशाल बनाने को लेकर एक मीटिंग की।

"राधे राधे" पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी के सानिध्य में 9 से 15 फरवरी 2020 तक कोलकाता में होने वाले भव्य श्री मद भागवत कथा के आयोजन को लेकर कल 18/01/2020 को ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी ने कोलकाता समिति के साथ आयोजन को भव्य और विशाल बनाने को लेकर एक मीटिंग की जिसमें वहाँ के समिति सदस्य और वहां के कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया । और फिर वहां से श्री विजय शर्मा जी ने 19 जनवरी 2020 को दिल्ली में होने वाली मीटिंग के लिए प्रस्थान किया।

16Jan 2020

‘भगवान के विशेष प्रिय हैं कलयुग के भक्त’ – पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

‘दिल में होनी चाहिए आदर की भावना’ 


‘आदर मन से होता है भय से नहीं’ 


‘सबसे बड़ी समस्या है सांस्कृतिक आतंकवाद’ 


‘दूसरों का आदर करना ही हमारी संस्कृति है’ 

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति बैंगलोर के तत्वाधान एवं पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 10 से 16 जनवरी 2020 तक प्रतिदिन श्री राम कथा का प्रिंसेस श्राईन, गेट नं.- 9, पैलेस ग्राउण्ड, बैंगलोर में विशाल आयोजन किया गया। महाराज श्री ने कथा के सप्तम दिवस पर रावण वध एवं राम जी के राजतिलक का वृतांत भक्तों को श्रवण कराया।
सप्तम एवं अंतिम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से राम कथा का श्रवण किया।
श्रीराम कथा के सप्तम दिवस की शुरूआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
महाराज श्री ने राम कथा की शुरूआत करते हुए भक्तों को हरे रामा रामा राम...सीता राम राम राम....भजन श्रवण कराया। महाराज जी ने कहा कि कहते हैं कि जिन्होंने भगवान श्रीराम के वनवास की कथा सुनी है उन्हें भगवान के राज्याभिषेक की कथा अवश्य सुननी चाहिए। भगवान श्रीराम के संपूर्ण चरित्रों का वर्णन करना असंभव है। जब तक ये सृष्टि है तब तक भगवान की नित्य नई लीला होती रहेंगी। ये बात अलग है कि हम सभी उसे नहीं पहचान पाते। भगवान हमारे साथ नित्य नई लीला करते हैं।
महाराज जी ने भक्तों को ‘जाना था गंगा पार प्रभु केवट की नाव चढे.... भजन भक्तों को श्रवण कराया।
महाराज जी ने आगे कहा कि यह जरूरी नहीं कि भक्तों को भी भगवान से काम पड़ता है। कभी कभी भगवान को भी पड़ता है। अगर भक्त ना हों तो भगवान की कौन पूजा करेगा। कलयुग के भक्त तो भगवान के विशेष प्रिय हैं। जिस जिस गांव से होते हुए भगवान राम जी जाते हैं और दूर दूर से लोग उनका दर्शन करने के लिए दौड़ पड़ते हैं।
हमेशा आदर की भावना दिल में रहनी चाहिए। आदर हमेशा दिल से, मन से करना चाहिए। हमें भाव से राम जी की पूजा करनी चाहिए। बड़ों का आदर करना चाहिए। कल्चर टेररिज्म का अर्थ समझाते हुए कहा कि हमारे अच्छे कल्चर को मिटाकर बुरे कल्चर को हमारे ऊपर थोप देना। वर्तमान में यह हर जगह मौजूद है। ये हम सभी पर इतनी बुरी तरह हावी हो गया है कि हम सोच भी नहीं सकते है कि हम इससे निकल पाएं। मात्र 70 साल में हमारे मूल विचारों में बहुत गिरावट आ गई है। इन 70 सालों में हम आगे जाने के बजाय बहुत पीछे चले गए हैं। हम सभी को सोचना चाहिए कि हम आजादी से पहले ज्यादा अच्छे थे या फिर आजादी के बाद ज्यादा अच्छे हैं।


महाराज जी ने चीन, यूरोप, मलेशिया आदि का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने अपनी संस्कृति को खत्म होने नहीं दिया। वहीं अगर हम अपनी संस्कृति की बात करें लोग हमारे ऊपर प्रश्नचिन्ह लगा देते हैं। ये गलत है। हमारी संस्कृति है कि दूसरों का आदर करना। अगर हम दूसरों का आदर करेंगे तो निश्चित है कि आपको आदर मिलेगा। बंदूक के भय से आप आदर करवा सकते हैं लेकिन भाव से नहीं। भय के की गई पूजा, प्रशंसा ज्यादा समय नहीं टिकती। जब भी कोई आदरणीय मिले तो सबको नतमस्तक होकर प्रणाम करो। महाराज जी ने युवाओं को समझाते हुए कहा कि हमेशा अपनी संस्कृति पर भरोसा करो। जब हम अपने धर्म और संस्कृति पर पूर्ण विश्वास करेंगे, तब आप कभी अकेला महसूस नहीं करेंगे। आपको बिल्कुल नहीं लगेगा की आप अकेले हैं।
महाराज जी ने कथा प्रसंग सुनाते हुए बताया कि भक्ति हो तो सबरी जैसी जिसने हज़ारों वर्ष इंतज़ार किया प्रभु श्री राम का क्योंकि सबरी एक अछूत थी और वह साधु - संतों की सेवा करना चाहती थी, पर कोई उसकी सेवा कोई स्वीकार नहीं करता था। परन्तु वह साधु- संतों के आने जाने वाले मार्ग में झाड़ू लगाकर उसको साफ़ करती थी। इस बात से प्रसन्न होकर मतंग ऋषि ने उसको अपने आश्रम में सबरी को स्थान दिया। जब गुरु जी वैकुंठ धाम को प्रस्थान करने लगे, तो सबरी ने कहा गुरु जी आप के सिवा मेरा कोई नहीं है अब आप भी जा रहे हो अब में किसके सहारे रहूँगी। तब उसके गुरु जी कहा की तुम यह आश्रम छोड़ कर कही नहीं जाना दुनिया भगवान् को ढूंढ़ती पर सबरी प्रभु राम तो स्वयं ढूंढते हुए आएंगे। तो देखिये सबरी को अपने गुरु के वाक्यों पर कितना विश्वास है कि उसने हज़ारो वर्ष तक भगवान् की राह देखि और भगवान श्री राम माता सीता को खोजते हुए लक्ष्मण के साथ सबरी के आश्रम आये और देखिये सबरी के प्रेमभाव में डुबे हुए झूठे बेर खाये। ऐसा है भक्त का भाव और प्रभु का प्रेम।
श्री रघुनाथजी फिर आगे चले। ऋष्यमूक पर्वत निकट आ गया। वहाँ मंत्रियों सहित सुग्रीव रहते थे। अतुलनीय बल की सीमा श्री रामचंद्रजी और लक्ष्मणजी को आते देखकर,सुग्रीव अत्यंत भयभीत होकर बोले- हे हनुमान्‌! सुनो, ये दोनों पुरुष बल और रूप के निधान हैं। तुम ब्रह्मचारी का रूप धारण करके जाकर देखो। हनुमान जी जब उनके पास गए तो प्रभु को पहचानकर हनुमान्‌जी उनके चरण पकड़कर पृथ्वी पर गिर पड़े। हनुमान जी ने सुग्रीव से प्रभु की मित्रता कराई और बाली का वध कर सुग्रीव की किष्किंधा का राजा बनाया।सुग्रीव ने अपनी सभी बानर सेना को चारो दिशाओं में भेजा धीरबुद्धि और चतुर नील, अंगद, जाम्बवान्‌ और हनुमान! तुम सब श्रेष्ठ योद्धा मिलकर दक्षिण दिशा को जाओ और सब किसी से सीताजी का पता पूछना।
हनुमान जी ने समुद्र लाँघ कर रावण के भाई बिभीषन से मिले जिन्होंने बताया की माता जानकी को रावण ने अशोक वाटिका में रखा है।तब हनुमान्‌जी विदा लेकर चले सीताजी को देखकर हनुमान्‌जी ने उन्हें मन ही में प्रणाम किया। उन्हें बैठे ही बैठे रात्रि के चारों पहर बीत जाते हैं। शरीर दुबला हो गया है, सिर पर जटाओं की एक वेणी (लट) है। हृदय में श्री रघुनाथजी के गुण समूहों का जाप (स्मरण) करती रहती हैं। हनुमान जी ने सीता को राम जी की मुद्रिका दी और उनकी चूड़ामणि ले कर लंका में आग लगाकर प्रभु राम के पास पहुंचे।

राम जी ने समुद्र पर सेतु का निर्माण किया और लंका पर चढाई की और रावण सहित सारे कुल का नाश कर दिया और सीता जी को लेकर अयोध्या लौटे अपने चौदह वर्ष का वनवास को पूरा कर। उधर भरत जी ने अयोध्या के सिंहासन से प्रभु की पादुका को हटाकर रख दिया और पूरे विधि विधान से राम जी का राजतिलक किया गया और राम जी अयोध्या के राजा बने अपनी सारी मर्यादा का निर्वाह करते हुए। राम जी का सारा जीवन एक सीख है मानव जीवन को जीने के लिए हमें प्रभु श्री राम का अनुसरण करते हुए जीवन को जीना चाहिए, इससे हमारा कल्याण हो जायेगा।

15Jan 2020

‘डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किए गए पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी’

‘मन के रोग का ईलाज करती है कथा’ - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी


बैंगलोर की यूनिवर्सिटी ने किया पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज का सम्मान, डॉक्टरेट की उपाधि से किया सम्मानित


‘ऐतिहासिक रही बैंगलोर में आयोजित श्री राम कथा’


बैंगलोर में आयोजित श्रीराम कथा का षष्टम दिवस ऐतिहासिक रहा। धर्मप्रचार एवं प्रसार के लिए विभिन्न उपाधियों से अलंकृत किए जा चुके धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज को आज कथा से पूर्व देश दुनिया में शांति के प्रचार के लिए आध्यात्म के क्षेत्र में ग्लोबल ट्राइम्प वर्चुअल यूनिवर्सिटी की ओर से मानद डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया गया।
कथा पंडाल में यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर डॉ. संजीव बंसल जी एवं यूनिवर्सिटी के एडवाइजर डॉ. नवल किशोर शर्मा जी भी मौजूद रहे। महाराज जी को डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित करते हुए यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर जी ने कहा कि हमारी हैसियत नहीं है कि हम महाराज जी को सम्मानित करें। ठाकुर श्री ने इस सम्मान को लेकर हम सबको सम्मानित किया है।
डॉक्टरेट की उपाधी ग्रहण करने के बाद महाराज श्री ने सभी भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि डॉक्टर का काम है रोगी को स्वस्थ करना। ठीक इसी तरह ठाकुर जी ने भी हमें मानव की समस्याओं का ईलाज करने का कार्य दिया है। अगर किसी के शरीर में रोग लग जाएं तो इसे डॉक्टर ठीक करते हैं और अगर किसी के मन में रोग लग जाएं तो उसे भगवान की कथा ठीक करती है। महाराज जी ने आगे कहा कि मैं ये सम्मान अपने मां को समर्पित करता हूं और मैं सभी का दिल से आभार व्यक्त करता हूं।
आपको बात दें की पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने विश्व में शांति का प्रचार प्रसार करने हेतु मात्र 17 वर्ष की उम्र में ही भागवत कथा कहना शुरू कर दिया था। उन्होने सन् 1997 में दिल्ली से प्रेरणादायी कथाओं का प्रारम्भ किया जो आज तक अनवरत चल रहा है।
पूज्य श्री देवकीनंदन जी महाराज को दी गई उपाधि की श्रृंखला यहीं नहीं रूकती बल्कि अन्य सामाजिक संगठनों के द्वारा भी महाराज श्री को सम्मानित किया जा चुका है। वर्ष 2016 में श्रीकृष्ण सेवा समिति के द्वारा ब्रज गौरव सम्मान से अलंकृत किया गया, वर्ष 2015 में समाज सेवा के कार्यों के लिए अंतरराष्ट्रीय ब्राह्मण संसद द्वारा सम्मानित किया गया। वर्ष 2012 में अखिल भारतीय बुद्धिजीवी सम्मेलन में ‘यू.पी रत्न’ का खिताब दिया गया। वर्ष 2014 में अखिल भारतीय बुद्धिजीवी सम्मेलन में ‘ग्रेट सन ऑफ इंडिया’ का खिताब दिया गया। कई संस्थाओं द्वारा अलग अलग समय पर विशिष्ट सेवा सम्मान और ‘ब्रज सेवा सम्मान’ से भी अलंकृत किया गया। केवल देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी महाराज श्री को सम्मानित किया जा चुका है। धार्मिक प्रवचनों के माध्यम से विदेश में रह रहे लोगों को धर्म का मार्ग दिखाने के लिए ब्रेम्पटन कनाडा के सांसद श्री रमेश सांघा जी के द्वारा सम्मानित किया गया है।

15Jan 2020

‘हर कोई आजादी चाहता है, किसी का साथ देना नहीं’- पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

‘बदलती जा रही है संयुक्त परिवार की परिभाषा’ - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

‘सबसे उत्तम है गुरुकुलम की व्यवस्था’ - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

‘संस्कारी बनाती है गुरुकुल की शिक्षा’ - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति बैंगलोर के तत्वाधान एवं पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 10 से 16 जनवरी 2020 तक प्रतिदिन श्री राम कथा का प्रिंसेस श्राईन, गेट नं.- 9, पैलेस ग्राउण्ड, बैंगलोर में विशाल आयोजन किया जा रहा है। कथा के षष्टम दिवस पर प्रभु श्रीराम का विवाहोत्सव बड़ी ही धूमधाम से मनाया गया।
षष्टम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से राम कथा का श्रवण किया।
श्रीराम कथा के षष्टम दिवस की शुरूआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
महाराज श्री ने राम कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि लोग कहते हैं कि हम संयुक्त परिवार में रहते हैं। संयुक्त परिवार को अंग्रेजी में ज्वाइंट फैमली कहते हैं। पहले के समय में जो संयुक्त परिवार होता था उसमें कई सदस्य होते थे जैसे चारा, ताऊ, भैया आदि। आजकल हम मां बाप,पति पत्नी और बच्चों को हम संयुक्त परिवार कहते हैं। भले ही भाई अलग रहता हो, तब भी हम उसे संयुक्त परिवार कहते हैं। वो दिन दूर नहीं जब पति-पति भी साथ में रहते होंगे, तब भी उसे संयुक्त परिवार माना जाएगा। फ्रीडम का जूनून हम सभी पर इस तरह हावी है कि हम किसी का साथ नहीं देना चाहते हैं। अगर बच्चे भी अलग रहे और पति-पत्नी भी अलग रहे तब भी हम यही कहते हैं कि हम सभी ज्वाइंट फैमली में रहते हैं। सोचने वाली बात है कि इतना बड़ा अंतर कैसे आया, इसकी क्या वजह हो सकती है? ये सब हमारे एजुकेशन सिस्टम से आया है। महाराज श्री ने इसे एक उदाहरण के माध्यम से समझाते हुए कहा कि पहले हमारे यहां गुरुकुलम की शिक्षा प्रणाली थी। गुरुकुलम में प्रारंभ से ही परिवार का महत्व हमें समझाया जाता है। गुरुकुलम में माता-पिता का महत्व, गुरूजनों का महत्व है,सामूहिक रहने का महत्व है आदि के बारे में बताया जाता था।


महाराज श्री ने आगे कहा कि अंग्रेजी मीडियम स्कूल में आप तिलक लगाकर नहीं जा सकते हैं, लोग हंसते हैं। वहां संस्कारों की बात नहीं होती। वहां केवल यहा सिखाया जाता है कि पैसा कैसे कमाया जाएं। ये नहीं सिखाया जाता है कि जीवन कैसे जीना चाहिए। आपको अपने बच्चों को अंग्रेजी मीडियम में भेजना जरूरी है, अनिवार्य है तो बेशक भेजे लेकिन बच्चों के लिए गुरुकुलम की व्यवस्था अपने घर में जरूर करनी चाहिए। आपके बच्चों को चाहे कितनी भी संपत्ति मिल जाएं, लेकिन अगर उन्हें संस्कार नहीं मिले और वो संस्कारी नहीं बने तो बहुत कुछ पाने के बाद भी हाथ में केवल जीरो ही मिलेगा।
महाराज श्री ने प्रभु श्रीराम के विवाहोत्सव का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि विश्वामित्र जी के साथ प्रभु श्री राम जनकपुरी पहुंचे। वहां पहुंचने पर जैसे ही राजा जनक ने श्रीराम जी को देखा तो उनके हृदय में एक तरफ राम जी और दूसरी तरफ सीता जी की छवि उमड़ आई। राजा जनक ने विश्वामित्र जी से राम जी के विषय में पूछा कि ये कौन हैं ? तो उन्होंने कहा कि ये दशरथ महाराज के पुत्र हैं और उन्हें मेरे यज्ञ की रक्षा के लिए भेजा है। आज देखिए यज्ञ भी सम्पन्न हो गया। बड़े बलवान हैं ये राम, लक्ष्मण।
कुछ दिनों बाद सीता स्वयंवर का समय आया। राजा जनक ने राम जी को उच्च सिंहासन पर बैठाया। मानो यूं बता रहे हों कि मिथिलावासियों देख लो, ये सीता के योग्य वर हैं। स्वयंवर का समय आया, राजा जनक ने सभी राजाओं से कहा, जाओ जिसके लिए आए हो वो कार्य करो। सभी राजा उठकर धनुष तोड़ने के लिए गए, लेकिन कोई भी राजा धनुष तोड़ना तो दूर, धनुष को हिला भी नहीं सका। यह देख जनक जी को क्रोध आ गया, जब क्रोध आया तो वो बोले हमको ऐसा लगता है जैसे ये पृथ्वी वीरों से विहिन हो गई है। अब इस पृथ्वी पर योद्धा नहीं बचे क्या, कोई ऐसा योद्धा नहीं है जो इस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाए और मेरी पुत्री से विवाह करे।
राजा जनक की बात सुनकर वहां बैठे लक्ष्मण जी ने प्रभु श्री राम की तरफ देखा, लेकिन वो तो मर्यादापुरूषोत्तम थे, वो कैसे बोलते। तो लक्ष्मण जी ने सोचा कि प्रभु भी ना बोले और हम भी ना बोलें, तो कैसे काम चलेगा। लक्म्ाण जी बोले उठे, उन्होंने कहा कि जनक महाराज बिना सोचे समझे कुछ नहीं बोलना चाहिए। हमारे गुरूजी ने आज्ञा नहीं दी है, हमने अपने धनुष उठाए नहीं हैं। अभी हम यहां बैठे हैं और रघुवंशियों का एक भी बच्चा जहां बैठा हो, वहां ऐसे शब्द कोई बोल नहीं सकता कि पृथ्वी पर कोई वीर नहीं है। मुझे इस धनुष को तोड़ने में एक क्षण भी नहीं लगेगा। लक्ष्मण जी ने जब यह कहा तो धरती कांप उठी, राजा भी भयभीत हो गए। राजा जनक को लगा कि बात तो सही है अभी रघुवंशी बैठे हैं। लक्ष्मण जी के बढ़ते क्रोध को देखते हुए राम जी ने उन्हें शांत करवाकर बैठाया।
विश्वामित्र जी ने उचित समय जानते हुए श्री राम को आदेश दिया कि हे राम, उठो और राजा जनक की दुविधा को समाप्त करो। श्री राम जी उठे और अपने गुरू को मन ही मन प्रणाम किया। जब श्री राम धनुष की तरफ बढ़ने लगे, तो सब सोचने लगे कि अब क्या होगा ? क्या धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ेगी, जिस धनुष को हजारों लोग मिलकर नहीं उठा पाए, क्या यह वनवासी उसे उठा पाएगा। जब राम जी धनुष उठाने गए तो उन्होंने धनुष उठाने से पूर्व गुरू चरणों में प्रणाम किया और धनुष को एक पल में उठा दिया। प्रत्यंचा चढ़ायी और धनुष को तोड़ दिया। पूरे संसार में बधाईयां गायी जाने लगी। सीता मईया प्रभु श्रीराम की हो गईं और राम सीता विवाह संपन्न हुआ।

14Jan 2020

हमेशा दूसरों की बुराई ना करें, उनसे कुछ सीखे भी’ 


‘जो राम जी को मना ले, उससे बड़ा बुद्धिजीवी कोई नहीं’ 

 
‘बच्चों को अच्छा मानव बनाया जाता है गुरुकुल में’ 


‘विडंबना है कि बच्चों को पैसा कैसे कमाया जाए सिखाया जाता है लेकिन जीवन जीना नहीं’  


‘सबसे उत्तम है गुरुकुल शिक्षा पद्धति’  

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति बैंगलोर के तत्वाधान एवं पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 10 से 16 जनवरी 2020 तक प्रतिदिन श्री राम कथा का प्रिंसेस श्राईन, गेट नं.- 9, पैलेस ग्राउण्ड, बैंगलोर में विशाल आयोजन किया जा रहा है। कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु श्री राम के बाल्यकाल का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।
पंचम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से राम कथा का श्रवण किया।
श्रीराम कथा के पंचम दिवस की शुरूआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
महाराज श्री ने राम कथा की शुरूआत करते हुए भक्तों को हरे रामा रामा राम...सीता राम राम राम....भजन श्रवण कराया।
महाराज श्री ने कहा कि रामायण में लिखा है कि ‘अल्पकाल विद्या सब पाई’ अर्थात भगवान राम ने बाल्य अवस्था में अल्प समय में ही सारी विद्याएं ग्रहण कर लीं थीं। भगवान जी अपने गुरू के यहां शिक्षा ग्रहण करने के लिए गए, गुरूजी भगवान के महल में पढ़ाने के लिए नहीं आए। संस्कारी और असंस्कारी में बड़ा अंतर है। जब कोई अपने से बड़ों के सामने ऊंची आवाज में बोलने लगे तो किसी को बताने की जरूर नहीं है कि आप संस्कार विहीन हैं। इंसान के गुणों से पता चलता है कि वो कितना संस्कारी है। दूसरों को तो सब बोलते हैं लेकिन खुद क्या करते हैं कोई ये क्यों नहीं देखता। हमेशा दूसरों की बुराई ही नहीं करना चाहिए, दूसरों से कुछ सीखना भी चाहिए।


बच्चों को संस्कारी बनाने के लिए शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण हैं। ध्यान दें कि भगवान श्री राम राजकुमार हैं और विश्व में कौन सा ऐसा टीचर है जिसे भगवान अपने महल में नहीं बुला सकते। दशरथ जी की हैसियत के बारे में सभी जानते हैं लेकिन फिर भी गुरु जी के यहां राम जी पढ़ने के लिए गए। एक आज का समय देख लो, यहां बच्चों को पढ़ाने के लिए ट्यूशन टीचर आते हैं। अब आप ये बताओ कि आपके बच्चों अपने टीचर का ज्यादा सम्मान करते हैं या राम जी? आपके बच्चें अपने टीचर का कितना सम्मान करते हैं ? बच्चों को पता है कि उनके माता-पिता ने उनके लिए एक नौकर रखा है, वह टीचर नहीं है। बच्चों को ये पता है कि मेरे पिता जी उसे सैलरी देते हैं तब वो हमें पढ़ाने आता है। तो जिसमें ये ईगो होगा कि ये सैलरी के लिए हो रहा है, मेरे लिए नहीं हो रहा है, तब रिस्पैक्ट लेने वाला भी खो देगा और देने वाला भी खो देगा। लेकिन याद रखे कि ये हमारी संस्कृति नहीं है।
हमारी संस्कृति है कि हम टीचर के यहां जाएं ना कि वो हमारे यहां आएं। आप अपने गुरु जी के पास जाएं और वहां अध्ययन करें। वैसे तो भगवान राम को शिक्षा ग्रहण कने के लिए कहीं जाने की आवश्यकता नहीं थी लेकिन फिर भी वो मानव बनकर धरती पर अवतरित हुए थे। इसलिए उन्होंने बताया कि कैसा जीवन जीना चाहिए। पहले बच्चें गुरुओं के पास जाते थे अध्ययन के लिए, लेकिन आजकल टीचर्स के यहां जाते हैं। टीचर्स ना कि गुरु जी। और टीचर को आपके बच्चों के भविष्य से कोई लेना देना नहीं है। उन्हें केवल इस बात से मतलब है कि मेरे विषय में ये बच्चा अच्छे नंबर लेकर आएं ताकि स्कूल प्रबंधन टीचर को अच्छी सैलरी दें।
टीचर बच्चे को विषय का पूरा ज्ञान नहीं देता है। वह जानता है कि परीक्षा में कौन कौन से प्रश्न आएंगे, वह उन्हीं सवालों के उत्तर बच्चों को रटाता रहता है। ये एक तरह से नकल है। लेकिन हम खुश हैं क्योंकि हमारा बच्चा अच्छे नंबर ला रहा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि असली मायने में आपका बच्चा इस लायक है क्या? प्रत्येक मां-बाप जानते हैं कि उनका बच्चा कैसा है। आजकल बच्चों को सिर्फ यहीं पढाया जा रहा है कि तुम पैसे कैसे कमा सकते हो? लेकिन जीवन कैसे जीना चाहिए ये कोई नहीं पढ़ाता। अगर तुमने ज्यादा पैसा कमा लिया है तो अपने आपको ज्यादा बुद्धिजीवी मत समझो। मनुष्य जीवन पाने के बाद जो राम को मनाने की हिम्मत कर सके, राम को मना सके, उससे ज्यादा चतुर कोई नहीं। उससे बड़ा बुद्दिजीवी कोई नहीं।
हमारी एजुकेशन हमें सिखाती है कि जीवन जीनने के साथ साथ तुम अपने उद्देश्य को कैसे प्राप्त कर सकोगे। अच्छा जीवन जीकर तुम भगवान से कैसे मिलो, उसके लिए गुरुकुलम की पढ़ाई महत्वपूर्ण हैं। गुरुकुल में इंजीनियर, डॉक्टर ही नहीं बनाया जाता बल्कि इनसे पहले एक अच्छा मानव बनाया जाता है। गुरुकुल में सतगुणी बेटा बनाया जाता है।
महाराज जी ने प्रभु श्री राम के बाल्यकाल का वर्णन सुनाते हुए कहा कि प्रभु श्री राम जब बाल्यकाल में पढ़ने गए, तो बहुत कम समय में शिक्षा प्राप्त कर ली। एक बार भगवान श्री राम अपने भाईयों, मित्रों को लेकर सरयु के तट पर पहुंचे। वहां एक सुंदर मैदान था, तो राम जी का मन गेंद खेलने का हुआ। अब राम जी की इच्छा जानते ही लक्ष्मण जी ने सोचा कहीं ऐसा ना हो कि राम जी मुझे विपक्षी टीम में डाल दें। तो वो बोले प्रभु हम तो आपकी ही टीम में रहेंगे क्योंकि बचपन से लक्ष्मण जी राम जी की तरफ ही रहे हैं। अब राम जी ने सोचा कि यहां कोई भी ऐसा नहीं है तो मेरी तरफ से ना खेले। सभी को मेरी तरफ से ही खेलना है। अब जब सभी मेरी तरफ से ही खेलेंगे तो खेल होगा कैसे ? लक्ष्मण जी तो राम की तरफ हो गए, तब राम जी ने भरत जी की ओर देखा। लेकिन कहा कुछ नहीं...यहां भाईयों का प्रेम देखिए कि रामजी के देखते ही भरत जी बोले, हां मैं विपक्षी टीम में रहूंगा।
लेकिन भड़काने वाले हर युग में होते हैं। जैसे ही भरत जी ने विपक्ष चुना, तो भड़काने वालों ने कहा लो जी लक्ष्मण जी को तो अपने साथ ले लिया और आपको विपक्ष में कर दिया। लेकिन भरत जी भड़कने वालों में से नहीं थे। वो बोले अगर मैं राम जी के साथ रहूंगा तो मुझे कभी उनके बगल का दर्शन होता, कभी राम जी की पीठ का दर्शन होता। लेकिन अगर मैं उनके विपक्ष में रहूंगा, तो मुझे उनके मुख का ही दर्शन होता रहेगा ।
खेल शुरू हुआ तो राम जी ने चरण का प्रहार किया और गेंद सीधे भरत की तरफ गई। जब गेंद भरत जी की ओर गई तो उन्होंने देखा कि राम जी के चरण से स्पर्श हुई गेंद मेरी तरफ आ रही है तो उन्होंने जितनी जोर से राम जी ने मारा थी उससे ज्यादा तेज गति से उस गेंद पर प्रहार किया और राम जी की तरफ वापस कर दी। जब वो गेंद राम जी के पास पहुंची, तो राम जी ने प्रहार नहीं किया।
बात ये हुई कि जब गेंद वापस नहीं गई, तो भरत जी जीत गए। अब वहां भी भड़काने वाले मौजूद थे। उन्होंने कहा कि वाह राम जी, कितना बुरा किया आपने। ये गेंद सब कुछ सोच के आई कि दुनिया की शरण में जाने से कुछ नहीं मिलना, राम की शरण में चलना चाहिए। वो सब कुछ छोड़कर आपकी शरण में आई पर आपने क्या किया, उसे लात मारकर बाहर कर दिया। ऐसा आपने क्यों किया ? तो राम जी ने कहा कि भईया, तुम नहीं समझोगे मैंने इसलिए पैर मारा क्योंकि जहां भरत जैसा संत मौजूद हो, तुझे मेरी शरण में नहीं आना चाहिए। तुझे भरत की शरण में जाना चाहिए। जहां गुरू और गोविंद दोनों हो, वहां पहले गुरू की शरण में जाना चाहिए।
वहीं दूसरी ओर भरत जी को भड़काने वाले बोले, कमाल कर दिया। राम जी ने इतने धीरे से चरण का प्रहार किया और आपने इतनी तेज प्रहार किया। इसका मतलब है आप राम जी को हराकर खुद जीतना चाहते हो। तो भरत जी बोले- मैं जीतना नहीं चाहता, मैं तो इस गेंद के दुर्भाग्य को कह रहा था कि जहां साक्षात जगत के पालनहार खड़े हों, तुझे मौका मिला था उनके चरणों में रहने का और तेरा दुर्भाग्य है कि तू उनके चरण छोड़कर मेरे पास चली आई। तुझे वहीं जाना चाहिए क्योंकि दुनिया में आप कहीं घूम लो, अन्त में आपको शांति केवल गोविंद के चरणों में आकर ही प्राप्त होगी।
भड़काने वाले राम जी से बोले अब जब यह गेंद आपके पास आई तो आपने चरणों का प्रहार क्यों नहीं किया ? तो भगवान श्री राम ने बहुत ही प्यारा जवाब दिया। उन्होंने कहा कि मैंने पहले चरण का प्रहार किया, संत के पास भेजने के लिए। फिर संत ने चरण का प्रहार किया और मेरे पास भेज दिया। तो जिसपर संत का चरण स्पर्श हो गया हो और फिर वो मेरे पास आए, तो फिर मैं उसका त्याग नहीं करता, उसे स्वीकार करता हूं। फिर चाहे उसे स्वीकार करने में मेरी हार ही क्यों ना हो जाए। यही भरत और राम जी का प्रेम है।

13Jan 2020

‘सिंगल यूज प्लास्टिक मुक्त होगा भारत’- पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

‘2020 में 5 लाख कपड़े से निर्मित बैग का वितरण करेगा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन’ - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति बैंगलोर के सौजन्य से आज प्रिंसेस श्राईन, गेट नं.- 9, पैलेस ग्राउण्ड, बैंगलोर में भारत सरकार के अभियान ‘नो प्लास्टिक अभियान’ को आगे बढ़ाते हुए कथा पंडाल में हजारों की संख्या में लोगों को कपड़े से निर्मित बैग का वितरण किया गया। साथ ही महाराज जी के अलावा कथा पंडाल में मौजूद हजारों की संख्या में भक्तजनों ने सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल ना करने का संकल्प लिया।

बता दें ‘मेरा भारत मेरा स्वाभिमान’ के तहत साल 2020 में 5 लाख कपड़े से निर्मित बैग को वितरित कर देश को सिंगल यूज प्लास्टिक से मुक्त बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

इस दौरान महाराज जी ने सभी लोगों को प्लास्टिक से होने वाले नुकसान के बारे में बताते हुए अपील की कि ‘प्लास्टिक से बने बैग का इस्तेमाल ना करें और ज्यादा से ज्यादा कपड़े से बने बैग का प्रयोग करें’। कपड़े से निर्मित बैग की खासियत है कि उन्हें धोकर दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। कपड़े से बने बैग ना जल्दी खराब होते हैं और ना ही फटते हैं।

महाराज श्री ने कहा कि प्लास्टिक ना केवल पृथ्वी के लिए बल्कि सभी के लिए बहुत नुकसानदायक है। प्लास्टिक गलती नहीं है जिसके कारण धरती की उपजाऊ शक्ति भी कम होती जा रही है। वर्तमान में प्लास्टिक मानव जीवन के लिए बहुत बड़ा खतरा बन चुकी है। अगर हम पृथ्वी की देखभाल नहीं करेंगे, तो निश्चित है कि ना तो जल रहेगा और ना जीवन। प्लास्टिक के इस्तेमाल से धरती बंजर होती जा रही है इसलिए हमें इसका इस्तेमाल रोकना होगा।
महाराज श्री ने आगे कहा कि अगर आपको अच्छा जीवन चाहिए तो उसके लिए अनिवार्य है कि हम पृथ्वी पर रहकर पृथ्वी का श्रृंगार करें। अगर धरती मां, जल, वृक्ष आदि हमें जीवन देते हैं तो हमें भी उनका ध्यान रखना चाहिए। इसके लिए हमें वृक्ष लगाने होंगे, सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल बंद करना होगा। बहुत बड़ी बड़ी कंपनियां हैं जो प्लास्टिक का बड़ी संख्या में इस्तेमाल करती हैं। हम जो चिप्स, कुरकुरे खाते हैं सभी प्लास्टिक में आते हैं वो सब नुकसानदायक होता है।
महाराज श्री ने मोदी सरकार द्वारा ‘स्वच्छ भारत’ अभियान को बढ़ावा देते हुए कहा कि सिंगल यूज प्लास्टिक बैन करने से मानव जीवन सुरक्षित होगा। इसलिए बहुत जरूरी है कि हम प्लास्टिक का प्रयोग ना करें।
इस दौरान छोटे बच्चों ने नो प्लास्टिक पर एक सुंदर कार्यक्रम भी प्रस्तुत किया।

13Jan 2020

‘प्रभु की कृपा के बिना सत्संग नहीं होता’

‘अपने दुखों को स्वयं निमंत्रण दे रहा है व्यक्ति’

‘गुरूजनों से सुख, दुख कुछ भी नहीं छिपाना चाहिए’

‘वो घर श्मशान के समान होता है जहां संतों को आना-जाना ना हो’
‘बड़ा स्वार्थी हो गया है आज का इंसान’

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति बैंगलोर के तत्वाधान एवं पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 10 से 16 जनवरी 2020 तक प्रतिदिन श्री राम कथा का प्रिंसेस श्राईन, गेट नं.- 9, पैलेस ग्राउण्ड, बैंगलोर में विशाल आयोजन किया जा रहा है।

चतुर्थ दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से राम कथा का श्रवण किया।

श्रीराम कथा के चतुर्थ दिवस की शुरूआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

 

महाराज श्री ने राम कथा की शुरूआत करने से पूर्व प्रभु श्री राम को याद करते हुए हरे रामा रामा राम... सीता राम राम राम....भजन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज जी ने कहा कि प्रभु की कृपा के बिना सत्संग नहीं होता। हमारा जीवन धीरे धीरे व्यतीत तो हो रहा है लेकिन अगर पूरे जीवन में राम जी के महत्व को नहीं समझा या राम का प्राप्त करने की इच्छा को जाग्रत नहीं किया, तो कोई लाभ नहीं। जो भी आपके इष्ट देव हैं या आराध्य है जब तक उनके प्रति आपका समर्पण नहीं होगा, तब तक जीवन व्यर्थ है। लोग कहते है कि क्या नाम आसन पर बैठकर ही जपना चाहिए, क्या माला लेकर ही जपने से कल्याण होगा क्या। तब गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि भाव से जपो या कुभाव से जपो, आलस में रहकर जपो या बिना आलस के जपो....नाम तो तुम्हारा कल्याण ही करने वाला है। कबीरदास जी कहते हैं कि माला फेरत जग गया, गया ना मन का फेर.... अर्थात माला फेरते फेरते समय चला गया। तो मन को लगाओ। अर्थात मन लगाकर भजन करो। भगवान के नाम का प्रभाव इतना है कि कालकूट विष भी फेल हो गया। प्रश्न यह है कि कैसे जपे?

महाराज श्री ने समझाते हुए कहा कि अग्नि का स्वभाव ही है जलाना। जो भी अग्नि में डाला जाएगा तो अग्नि जलाएगी ही। इसलिए कहते हैं कि जैसे अग्नि में जो भी, जैसे भी स्वभाव से डालेगे, वह सब स्वहा कर देगी। ठीक वैसे ही तुम अपने पाप को जान के डालो या ना जान के डालो, बिना जाने डालो, तुम जैसे ही अपने पाप को मेरा नाम लेकर डालोगे मैं उसे भी स्वहा कर दूंगा। मैं उस पाप को समाप्त कर दूंगा।
महाराज जी ने एक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि एक गांव में कुछ संत गए। पहले जहां जहां संत आ जाते थे उसे स्वर्ग माना जाता था। लेकिन आजकल समय बदल रहा है। अपने दुख को व्यक्ति स्वयं निमंत्रण दे रहा है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि जिस घर में संतों का आना जाना ना हो, उसे घर नहीं श्मशान समझना चाहिए। आजकल लोग घरों के आगे प्लेट लगा देते हैं कि डिस्टर्ब ना करें। महाराज जी ने प्रसंग को आगे बढाते हुए कहा कि पहले संत जिस घर में जाते थे, वहां कीर्तन करते थे। भगवान के नाम से सभी गांव वाले बड़े प्रसन्न थे। लेकिन एक व्यक्ति आया और बोला का मैं बहुत दुखी हूं। आजकल का इंसान बड़ा स्वार्थी है सुख के बारे में किसी को कुछ नहीं बताता लेकिन दुख को हमेशा सुनाता है। मतलब गुरू, गोविंद का नाम सिर्फ परेशानी में ही लिया जाता है। कभी भी संत से कुछ नहीं छिपाना चाहिए। गुरू, संत को सारा सुख दुख बताना चाहिए। कभी कभी दुखों को सहन भी करना चाहिए। अगर सौ जन्म भी गुरू के चरणों में अर्पित कर दें, तो भी हम उनकी बराबरी नहीं कर सकते।

इस दौरान महाराज जी ने भक्तों को मदन गोपाल, मदन गोपाल... शरण तेरी आयो....भजन भक्तों को श्रवण कराया।

महाराज श्री ने प्रभु श्री राम के जन्म का वृतांत सुनाते हुए कहा कि राजा दशरथ अपने गुरू जी का पास गए और कहा कि हे गुरूवर मेरा पुत्र नहीं है, मैं दु:खी हूं। तो गुरू जी ने कहा कि चिंता मत कर, तुम्हारे दु:ख का निवारण हो जाएगा। तुम्हें यज्ञ करना होगा। गुरू जी ने कहा कि धैर्य धरो तुम्हारे चार पुत्र होंगे। राजा दशरथ ने पुत्रिष्ठी यज्ञ किया, इस यज्ञ के बाद राजा दशरथ के चार पुत्र राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न हुए। पुत्र होने की खुशी ने राजा दशरथ ने अपना सर्वस्व दान दे दिया। यहां सवाल है की सर्वस्व क्या है ? सर्वस्व परमात्मा के अलावा कुछ हो नहीं सकता, सर्वस्व राम है और राम राज दशरथ को मिले हैं तो राजा दशरथ ने राम जी को पूरी प्रजा की गोद में दे दिया मानो सब से कह रहे हों ये मेरा राम नहीं सब का राम है। किसी ने भी उस दान को अपने पास नहीं रखा सब ने एक दूसरे को देते हुए उस दान को राजा दशरथ को वापस दे दिया।

दशरथ के चारों पुत्र में दो गौर वर्ण के हैं और दो श्याम वर्ण के हैं। कैकयी और कौश्ल्या के पुत्र श्याम वर्ण के हैं और सुमित्रा के दोनो पुत्र गौर वर्ण के हैं। पुत्रों के होने के बाद राजा दशरथ ने गुरू जी से कहा आप इनका नामकरण कर दिजिए। जब नामकरण की बारी आई तो कौशल्या के पुत्र जब महाराज जी के गोद में आए तो राजा दशरथ ने कहा इनका मैं क्या नाम रखूं। तो गुरू जी ने कहा कि जो सुख का नाम है उसका नाम राम है, उसके बाद कैकयी के पुत्र की बारी आई तो कैकयी के पुत्र का नाम रखते हुए कहा जो विश्व का पालन करता है पोषण करता है उसका नाम भरत है। उसके बाद बारी आई सुमित्रा के दोनों के पुत्रों के नाम रखने की, महाराज जी ने कहा जो शत्रुओं का नाश करेगा उसका नाम शत्रुघ्न है, सुमित्रा के दूसरे पुत्र का नाम रखते हुए गुरू जी ने कहा जो राम का होगा प्रिय उनका नाम है लक्ष्मण। इस तरह से राजा दशरथ के चारों पुत्रों का नामकरण सम्पन्न हुआ।

4Jan 2020

‘वर्तमान में लोगों का ज़मीर मर गया है।

‘आदरणीय लोगों का कभी अपमान ना करें, नहीं तो उसका दंड भोगना ही पड़ेगा’।

‘जीवन के केवल तीन ही दिन हैं बचपन, जवानी और बुढ़ापा’।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति नागपुर के तत्वाधान में 2 से 8 जनवरी 2020 तक प्रतिदिन डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति, महर्षि व्यास सभाग्रह, रेशमबाग मैदान के पीछे, नागपुर में पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया कि जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो, उसको क्या करना चाहिए? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।कथा के तृतीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। कथा की शुरूआत भागवत आरती एवं विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। आज कथा पंडाल में कमिश्नर ऑफ पुलिस नागपुर डॉ. भूषण कुमार उपाध्याय जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थित दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कल का कथाक्रम याद कराते हुए कहा कि जीवन में हमेशा याद रखे कि आदर करने योग्य जो लोग हैं अगर हम उनका अपमान करते हैं तो निश्चित है कि हमें कभी सुख नहीं मिलेगा। हमें उसका दंड भोगना ही पड़ेगा। आज के समाज की सबसे बड़ी समस्या है कि दूसरों का अपमान करने में लोग अपनी शान समझते हैं। दूसरों का बुरा करने में लोगों को बड़ा आनंद आता है। लेकिन यह बिल्कुल भी सही नहीं है। भगवान कहते हैं कि गिव एंड टेक। जब हम अपने से बड़ों का अनादर करते हैं तो यह तय है कि हमारे जीवन में, हमारी बुद्धि में हमारे साथ कलियुग बैठा है। जब भी आप किसी का अपमान करते हैं, अपशब्द बोलते हैं, धर्म की निंदा करतें हैं, धर्म से जुड़े लोगों की निंदा करते हैं तो यह निश्चित है कि आपके सिर पर कलियुग बैठा है। ये सब कलियुग का ही प्रभाव है।


महाराज श्री ने आगे कहा कि ध्यान रहे कि जीवन के केवल तीन ही दिन हैं बचपन, जवानी और बुढ़ापा। चौथा दिन तो मृत्यु का है। आजकल लोग इधर उधर की बातों पर ज्यादा ध्यान देते हैं लेकिन अगर ध्यान ही देना हैं तो देश और धर्म के ऊपर बात करें। इसपर ध्यान देना चाहिए कि हमारे समाज में बेटियां सुरक्षित क्यों नहीं हैं? हमारा समाज इतना दूषित हो गया है कि उसपर किसी बात का कोई असर नहीं होता। जो लोग दो नाव में सवार होते हैं वो हमेशा डूबते हैं। आजकल लोगों का ज़मीर मरा हुआ है ना किसी को धर्म की परवाह है और ना ही संस्कारों की।
महाराज श्री ने मोदी जी के संघर्ष से भरे जीवन को याद करते हुए कहा कि कब छोटा आदमी बड़ा बन जाए कोई नहीं जानता। आज माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी इतने बड़े आदमी बन गए हैं कि उनके पास समय नहीं है। अर्थात छोटे से छोटा व्यक्ति कब कितना बड़ा बन जाए, कोई नहीं जानता। हमेशा बडप्पन का सदुपयोग करना चाहिए।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल का कथाक्रम याद कराया कि जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये कि उसकी मृत्यु सातवें दिन हो, वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जानकर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम कि आपकी मृत्यु कब होगी, मृत्यु तो निश्चित है पर कब, ये आपको नहीं पता। तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योंकि इसमें हमें नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। इसलिए मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सौंप दें, तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।
राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर, गंगा के तट पर मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी हैं चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव, जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...
अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा कि हे राजन, ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं, अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए, तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर, आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।
भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं कि ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत में कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण ही पृथ्वी के लोगों को भागवत कथा सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।
श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।

5Jan 2020

नागपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस से पूर्व युवा शांति संदेश एवं गुरु दीक्षा समारोह का आयोजन किया गया।

नागपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस से पूर्व युवा शांति संदेश एवं गुरु दीक्षा समारोह का आयोजन किया गया। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने सभी भक्तों को गुरू दीक्षा प्रदान की एवं दीक्षा प्राप्त करने आये हुए भक्तों को अपने श्रीवचनों से अलंकृत किया जिसमें सैकड़ों युवा सम्मिलित हुए। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने युवा पीढ़ी को संदेश देते हुए कहा कि हमेशा भारतीय संस्कृति और धर्म की रक्षा करना चाहिए, भारतीय संस्कार को कभी - कभी नहीं भूलना चाहिए। हमेशा गुरूजनों, माता पिता और भगवान का आदर-सत्कार करना चाहिए, सत्य वचन बोलना चाहिए। साथ ही युवाओं को देश और संस्कृति की रक्षा के लिए सदैव आगे आना चाहिए। इस दौरान युवाओं ने पूज्य महाराज श्री से आध्यात्मिक एवं सामाजिक विषयों पर सवाल भी किए जिनका महाराज जी ने बड़े प्रेमपूर्वक उत्तर दिया।

5Jan 2020

आपका एक दृश्य आपका चरित्र बदल सकता है।

“आपका एक दृश्य आपका चरित्र बदल सकता है :

मनुष्य के द्वारा किया गया दान, हमारी मानवता को आगे बढ़ाते है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति नागपुर के तत्वाधान में 2 से 8 जनवरी 2020 तक प्रतिदिन रेशम बाग मैदान नागपुर में पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। कथा के चतुर्थ दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
आज कथा पंडाल में उपमहापौर श्रीमती मनीषा कोठे जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।
पंडित श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को "तेरी बदल जाये तकदीर तू राधे राधे बोल ज़रा " भजन श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान की कृपा से जीव के हृदय में भागवत कथा श्रवण करने का मन होता है। करोड़ों - करोड़ों जन्मों के पुण्य जब एकत्रित होते है तो कथा पंडाल में जाते है और वहां बैठकर भगवान की कथा सुनते है। और जिनके ऊपर उनके पूर्वजों उनके कर्मों की कृपा हो वो सातों दिन कथा श्रवण कर पाते है। निश्चित तौर पर जीवन आसान तो नहीं है, बहुत मुश्किल है उस मुश्किल समय में अपने उद्देश्य को याद रखना कि मेरा कल्याण हो। इसके लिए मानव जीवन मिला है। इस भाग- दौड़ के जीवन में व्यक्ति सब कुछ ध्यान रखता है सिवाये अपने कल्याण के। हमें सब कुछ याद है जिन्हे भुलाने के लिए कहा गया था वही हमें याद है। जिन्हे याद करने के लिए कहा गया था वही हम भूले हुए है। हमारे जीवन में सबसे ज्यादा मोक्ष बहुत जरुरी है हमारा कल्याण, हमारी मुक्ति, हमारा उद्धार हो जाये। क्योंकि ये मनुष्य योनि में ही संभव है। और किसी योनि में संभव ही नहीं। लेकिन अब जब गोविन्द ने कृपा कर दी है। मनुष्य योनि प्राप्त हो गयी है। तो अपने हरि को, अपने गोविन्द को, अपने इष्ट को, अपने आराध्य को, मानाने से बिल्कुल मत झुकिए। अगर इस बार गलती हो गयी तो अगली बार बक्त बहुत कठिन हो जायेगा। तब तो बिल्कुल भी संभव नहीं हो पायेगा। इसलिए भगवान ने जो कृपा की है उसका सदुपयोग करें दुरुपयोग न करें। आप सब बाकई सदुपयोग कर रहे है।
महाराज श्री ने कहा कि आज यहाँ पर सुबह में जब मैं यहाँ आया तब देखा की रक्त दान शिविर भी लगा है, आखों के चश्मे भी बाटे गए। और ह्रदय इत्यादि चैकप भी किये गये। निश्चित विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति नागपुर या जहाँ - जहाँ भी हमारी समितिया है हमने एक उद्देश्य बनाया हुआ है जितना भी हो सके मानवता की सेवा करों, जितना भी आप मदद कर सकेंगे मानवता की। भजन में कही कमी रहे जाये फिर भी मेरे ठाकुर जी जब सेवा भाव देखेंगे तो आपके ऊपर कृपा देंगे कैसा भी सही पर सेवा में पीछे नहीं रहा। सेवा करता रहा, इसलिए विश्व शांति सेवा समिति के माध्यम से मथुरा, वृंदावन में लोगो को कम्बल वितरित किये गये। मनुष्य के द्वारा किया गया दान हमारी मानवता को आगे बढ़ाते है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।
महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।


शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।
इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।
दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।
महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

6Jan 2020

‘कभी मुसीबतों से भागना नहीं चाहिए’।

‘कभी मुसीबतों से भागना नहीं चाहिए’

‘दुनिया में सच्चा बैट्समैन वही है जो हर मुसीबत का डटकर सामना करता है’

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति नागपुर के तत्वाधान में 2 से 8 जनवरी 2020 तक प्रतिदिन रेशमबाग मैदान, नागपुर में पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी के सानिध्य में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पूतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के पंचम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
मेरी भई श्याम संग प्रीत ये दुनिया क्या जाने.... भजन पर कथा पंडाल में मौजूद भक्तगण झूम उठे।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी ने कथा की शुरूआत करते कहा कि अधिकांश लोगों का यही प्रश्न होता है कि भगवान ने दुनियाभर के सारे दुख मुझे ही क्यों दे दिए? क्या मेरी ही किस्मत में सारे दुख लिखे हैं? मुझे ही ऐसे लोग क्यों मिलते हैं? मैं तो सभी के साथ भला करता हूं लेकिन मेरे साथ बुरा क्यों होता है? मुझे तो ऐसा लगता है महाराज कि इस संसार के जितने भी दुख हैं उन्हें भगवान ने मेरी ही किस्मत में लिख दिया है।


इस प्रश्न का जवाब देते हुए महाराज श्री ने कहा कि मान लिजिए आप अपने बचपन में हो और बचपन में जाकर कल्पना करें कि उस समय आप कैसे थे। आप पढ़ने की जिद्द करते थे या फिर खेलने की। बचपन में अधिकांश सभी को खेलना ही अच्छा लगता है। गेम के माध्यम से महाराज जी ने इस प्रश्न का जवाब समझाते हुए कहा कि ज्यादातर लोगों को क्रिकेट खेलना प्रिय होता है। सोचिए आपका 10 साल का बेटा है। और उसने कहा कि मैं क्रिकेट खेलना चाहता हूं, बैटिंग करना चाहता हूं। बेटे ने कहा कि मेरे साथ खेलने के लिए कोई नहीं है इसलिए आज मेरे साथ क्रिकेट खेले। बेटा पिता से कहता है कि आप बॉलिंग करो और मैं बैटिंग करता हूं। हालांकि पिता अपने काम पर जाना चाहते थे, लेकिन बेटे के शौक की खातिर उसकी इच्छा पूरी करते हुए कहा कि ठीक है, मैं तैयार हूं। पिता जी ने बॉल करना शुरू किया और एक ही बॉल में बेटा आउट हो गया। आइट होने पर बेटा मायूस हो गया।
पिता ने कहा कि तुम फिर से खेलो मैं बॉलिंग कराता हूं। बेटा फिर से खेलने लगा और पिता ने अपनी बॉलिंग की स्पीड बढ़ा दी। बेटा बॉल को संभालना सीखने लगा और पिता भी फास्ट बॉलिंग कराने लगे हैं। बाप-बेटे के बीच अच्छा गेम चल रहा है। सच यह कि पिता जी बेटे को दुख देना नहीं चाहते। इसी तरह इस संसार में आप आए हैं तो कोई तो विपक्षी होना चाहिए। जो आपको बॉलिंग करा सके। जब सामने बॉलिंग कराने वाला ही नहीं होगा, तो बैटिंग कैसे होगी। जब कोई कैच करने वाला ही नहीं होगा, तो किसी को आउट होने का डर ही नहीं होगा। जैसे जैसे बॉल की स्पीड बढ़ने लगी, तो बेटा भी उनसे लड़ना सीखने लगा। दरअसल वो बॉल नहीं। इसे आप कुछ ऐसे समझ सकते हैं कि परम पिता परमात्मा ने मुझे संसार में भेजा है और ये संसार ही एक स्टेडियम है, मैं ही बैटिंग कर रहा हूं और जिन लोगों को हम ये मानते कि वो हमें दुख दे रहे हैं बल्कि वो हमें दुख नहीं बॉलिंग कर रहे हैं। अगर वो बॉलिंग नहीं करेंगे तो आप गेम नहीं खेल सकोगे।
महाराज श्री ने आगे कहा कि कभी मुसीबतों से भागना नहीं चाहिए। सच्चा बैट्समैन वही है जो हर मुसीबत का डटकर सामना करता है, भागता नहीं है। सच्चा बैट्समैन पिच को छोड़कर जाता नहीं है वो वहां डटा रहता है। जब आप डर की सारी हदों को पार कर जाएंगे, तो आपको डर से भी डर नहीं लगेगा। हमेशा अपने और अपने भगवान पर विश्वास बनाएं रखे। भगवान हमारे सहने लायक मुसीबतें देता रहता है जिनसे हम लड़-लड़कर अपनी हिम्मत को बढ़ाते हैं। जिस दिन हम हर मुसीबत से लड़ने के लायक हो जाएंगे, उस दिन हम स्ट्रोंग खिलाड़ी बन जाते हैं। इसलिए संसार में ये कभी ना सोचे, कि सारी मुसीबतें मुझ पर ही क्यों आती हैं? ये सब भगवान का गेम हैं हमें मजबूत करने का। भगवान हमें अच्छा खिलाड़ी बनाने के लिए ऐसा करते हैं। हमें मजबूत बनाने के लिए मुसीबतों में डालते हैं।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा कि जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुनकर पूरा गोकुल झूम उठा।
महाराज श्री ने कथाक्रम को आगे बढ़ाते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि पूतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पूतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई, तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योंकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बनकर। कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्धार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आंखे फेर ली क्योंकि वो मित्र का भेष रखकर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पूतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पूतना का वध कर उसका कल्याण किया।

महाराज श्री ने आगे कहा कि संतों ने कई भाव बताए हैं कि भगवान ने नेत्र बंद किसलिए किए? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकता है। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।
अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा, तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।
श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली, तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हो जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप, समुद्रों, सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महत्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्व ही पहचान लिया।
श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रुक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।

 

7Jan 2020

कथा सुनना अपने आप में साधना है।

कथा सुनना अपने आप में साधना है। 

 
साधना ही है जो मन को ऊंचाई तक ले जाती है । 


गोविंद से मिलन का मार्ग है साधना। 

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति नागपुर के तत्वाधान में 2 से 8 जनवरी 2020 तक प्रतिदिन रेशमबाग मैदान, नागपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।
श्रीमद्भागवत कथा के षष्टम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।
कथा के षष्टम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
भागवत कथा के षष्टम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जैसे चुंबक सहज स्वभाव से लोहे को अपनी ओर खींच लेती है वैसे ही मोहन की ये मोहनी कथा सबके मन को अचानक से, जो भी एक बार शरण में आता है उसे हमेशा के लिए मोह लेती है और फिर उसे कभी नहीं छोड़ती। वो आत्माएं पवित्र हैं, धन्य हैं जो अपने पवित्र मन को गोविंद और उसकी कथाओं में लगा देती हैं। हमारा मन स्वभाविकतौर पर ना चाहते हुए भी कुमार्गगामी है। महाराज जी ने इसे एक उदाहरण के माध्यम से समझाते हुए कहा कि जैसे जल को कही भी गिरा दो, जहां ढलान होगा वो वहीं जाएगा। ये जल का स्वभाव है। ठीक वैसे ही हमारे मन की स्थिति होती है। मन स्वभाविक तौर पर गलत रास्ते पर ही जाना पसंद करता है जो अनुचित है, मन स्वभाविक ही उधर ही जाता है। जैसे जल का स्वभाव है कि नीचे की ओर जाना, वैसे ही मन का स्वभाव है बुरे मार्ग पर जाना। लेकिन क्या जल ऊपर नहीं जाता? 50, 100 वें मंजिल पर जल को पहुंचने की कोशिश की जाती है। जब प्रयास और साधन एकत्रित किए जाते हैं तब वो जल जिसका स्वभाव नीचे जाने का है वह कोशिश और संसाधनों से 150 वीं मंजिल तक भी पहुंच जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उसके लिए प्रयास किया गया है। ठीक वैसे ही जैसे जल साधनों से ऊपर पहुंच गया, वैसे ही मन भी साधना से ऊपर पहुंचेगा। जल को पहुंचाने के लिए साधन लगेंगे, लेकिन मन को पहुंचाने के लिए साधना लगेगी। कथा सुनना अपने आपमें साधना है। जब हम निर्भीक, निर्भय होकर, संसार को भूलकर भगवान की शरण में बैठते हैं और जब तक बैंठते हैं, संसार को याद नहीं करते। तब यह आपकी साधना बन जाती है और ये साधना मन की गति को ऊंचा कर देती है। साधना हमें गोविंद तक ले जाने में मदद करती है।


महाराज श्री ने आगे कहा कि साधन मिले या ना मिले, कोई बात नहीं। लेकिन साधना मिलनी चाहिए। साधना का संबंध ईश्वर से है। आज का इंसान साधनाहीन हो गया है वह सबकुछ करता है लेकिन साधना नहीं करता है। सा ध ना.....का मतलब है कि मैं अपने मन को साध रहा हूं और मन को साधना से साधा जाएगा। जब लगे कि संसार में बहुत कलेश, परेशानियां हैं तो कभी कभी एकांत में भी बैठना चाहिए। एक दिन में कम से कम 10 मिनट अकेले में बैठना चाहिए। अकेले बैठकर खुद की साधना बढ़ानी चाहिए। अकेले बैठने से मन को बहुत शांति मिलती है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं- राजन जो इस कथा को सुनता है उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता है। उसके भीतर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता है। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो है जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता है। 2 . दूसरा व्यक्ति वो है जो सबसे प्रेम करता है चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नहीं रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध है ही नहीं। आप इन तीनों में से कौन से व्यक्ति की श्रेणी में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता है वहां प्रेम नहीं है, वहां स्वार्थ झलकता है। केवल व्यापार है वहां। आपने किसी को प्रेम किया और उसने आपसे प्रेम किया। ये केवल स्वार्थ है। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा तो वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान में भले ही अपने माता-पिता व गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती है। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा कि ये किसी से प्रेम नहीं करते, तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता है। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त है। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं है। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता है। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता है। श्री कृष्ण कहते हैं कि गोपियों, इनमें से मैं कोई भी नहीं हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म-जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्ज को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्ज को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएंगी, वहां तुम्हें अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था, लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे। लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया।
श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए महाराज श्री ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दें। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी जरूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना, आत्मा कितनी खुश होती है।
श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।

 

8Jan 2020

मुंबई में 2020 में होगा भव्य आयोजन, कल मीटिंग के दौरान हुई घोषणा 23 से 31 दिसंबर 2020 मुंबई में होगा श्रीमद् भागवत कथा का विशाल भव्य आयोजन

मुंबई में 2020 में होगा भव्य आयोजन, कल मीटिंग के दौरान हुई घोषणा 23 से 31 दिसंबर 2020 मुंबई में होगा श्रीमद् भागवत कथा का विशाल भव्य आयोजन....
विश्व शांति सेवा मुम्बई आयोजक समिति द्वारा पिछले साल हुई श्रीमद भागवत कथा को भव्य रूप में सफल बनाने के लिए सभी कार्यकर्ताओ और भक्तो का धन्यवाद किया गया और दिसंबर 2020 में होने वाली विशाल श्रीमद भागवत कथा की तारीख की घोषणा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्माजी के द्वारा कल की मीटिंग में की गई। 2020 दिसंबर में यह विशाल श्रीमद भागवत कथा 23 से 31 दिसंबर तक मीरा-भायंदर में और भी भव्य रूप में की जाएगी और अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार इस साल नव वर्ष मुम्बई में बनाया जाएगा जिसमे देश के कोने कोने से अनेकानेक भक्तो द्वारा उपस्थिति दर्ज करवाई जाएगी, भक्तो को किसी भी प्रकार की असुविधा ना हो इसका ध्यान अभी से मुम्बई आयोजक समिति रख रही है। इस तारीख की घोषणा होने के बाद मुम्बई आयोजक समिति, कार्यकरता एवं सभी भक्तो में एक हर्ष का माहौल देखा गया साथ ही पूरे एक साल पहले से ही पूरी मुम्बई आयोजक समिति स्वमसेवको के साथ पूरे जोर शोर में कथा की तैयारी में लग गई है।

8Jan 2020

“भागवत वेद रूपी पेड़ का पका हुआ फल है। “जीवन में गुरूर नहीं, गुरू की जरूरत है।

“भागवत वेद रूपी पेड़ का पका हुआ फल है। “जीवन में गुरूर नहीं, गुरू की जरूरत है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति नागपुर के तत्वाधान में 2 से 8 जनवरी 2020 तक प्रतिदिन रेशमबाग मैदान, नागपुर में पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी के सानिध्य में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन " मीठे रस से भरी रे राधा रानी लागे" श्रवण कराया”।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि "यूं तो भगवान बहुतों को बहुत कुछ देता है पर किस्मत वाले वही है जिनको देकर कुछ उनसे अपनी सेवा में लेता है"। वही भाग्यवान है। किस पर क्या नहीं है, बहुतों पर बहुत कुछ है लेकिन उनकी चवन्नी भी भगवान सेवा में नहीं लेता। उन्ही की सेवा लेते है जिनको भगवान अपना समझते है। ऐसे सुन्दर आयोजनों में जिनकी भी तन से, धन से मन से कोई सेवा लगती है। ये ऐसे आयोजन जो है वो हमारी संस्कृति सभ्यता और हमारे देश के इतिहास को बताने वाले होते है। हमारे बाल गोपाल न सिर्फ इसे जानते है की मेरे भारत का इतिहास क्या है। हम कौन से देश पर गर्व कर रहे है।


महाराज जी आगे कहा कि हमें समाज में जीना कैसे चाहिए ? ये भी हमारा धर्म हमें सिखाता है। बुजुर्गो की सेवा करनी चाहिए , साथ वालो का आदर करना चाहिए , किसी के प्रति द्वेष नहीं रखना चाहिए, ऐसा सदग्रंथ श्रीमद भागवत जो हमें हमारे हर कदम को सुन्दर बनाना सिखाता है। ये श्रीमद भागवत कथा जैसे दिव्य आयोजन तभी आयोजित हो पाते है। जब हम सब एकाग्र होते है, इस ग्रन्थ के प्रति श्रद्धा होती है। श्रीमद भागवत महापुराण के प्रति क्योंकि जब आप सत्य पर चलते है निश्चित आपको सत्य के मार्ग पर चलने पर कभी - कभी थोड़ी परेशानी आती है। आपको परेशान किया जाता है, आप परेशान भी होते है। आप परेशान तो हो सकते है लेकिन परास्थ नहीं हो सकते। सत्य पर चलने वाले लोग।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंत: सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

9Jan 2020

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज बैंगलौर पहुँचे जहां एयरपोर्ट पर विश्व शांति सेवा समिति बैंगलोर के सदस्यों, यजमान एवं भक्तों द्वारा महाराज श्री का पुष्प गुच्छ देकर व माला पहनाकर स्वागत किया।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज बैंगलौर पहुँचे जहां एयरपोर्ट पर विश्व शांति सेवा समिति बैंगलोर के सदस्यों, यजमान एवं भक्तों द्वारा महाराज श्री का पुष्प गुच्छ देकर व माला पहनाकर स्वागत किया। इसके पश्चात महाराज श्री के निवास स्थान पर भी भक्तों द्वारा पुष्प माला इत्यादि द्वारा स्वागत किया। यहां महाराज श्री ने भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि आप सभी भक्त ज्यादा से ज्यादा संख्या में अपने ईष्ट मित्रों, परिजनों के साथ श्रीराम कथा में पधारे।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 10 जनवरी से 16 जनवरी 2020 तक दोपहर 3:30 बजे से शाम 7:15 बजे तक बैंगलोर, कर्नाटक में प्रथम बार श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है। आप सभी भक्तगण सादर आमंत्रित है।

देश-विदेश में सभी भक्त पूज्य श्री महाराज के यूट्यूब चैनल एवं आस्था भजन चैनल के माध्यम से कथा का लाइव प्रसारण देख सकते हैं।

10Jan 2020

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान एवं पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 10 से 16 जनवरी 2020 तक प्रतिदिन श्री राम कथा का प्रिंसेस श्राईन, गेट नं.- 9, पैलेस ग्राउण्ड, बैंगलोर में विशाल आयोजन किया जा रहा है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान एवं पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 10 से 16 जनवरी 2020 तक प्रतिदिन श्री राम कथा का प्रिंसेस श्राईन, गेट नं.- 9, पैलेस ग्राउण्ड, बैंगलोर में विशाल आयोजन किया जा रहा है।

श्री राम कथा की शुरूआत से पूर्व बैंगलोर में भव्य कलश यात्रा का आयोजन किया गया जिसमें महिलाओं ने सिर पर कलश रखकर विशाल शोभा यात्रा निकाली। इस दौरान हजारों की संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया।जहां जहां से कलश यात्रा गुजरी, उसे देखने के लिए लोगों का ताता लग गया।
कलश यात्रा इतनी भव्य थी कि जिसकी भी नजर पड़ी, वो अपने स्थान पर थम सा गया। जहां देखो माताएं और बहनें सिर पर कलश रखे नजर आ रही थीं। कलश यात्रा में राधे राधे के जोर जोर से जयकारे लगाए गए।

10Jan 2020

‘जीवन जीना सिखाती है रामकथा’

‘जीवन जीना सिखाती है रामकथा’
‘हम सभी के जीवन की कथा है राम कथा’ 
‘हमेशा राम बनकर जियो, जीवन में कभी कलेश नहीं होगा’
‘अच्छा मानव बनाती है राम कथा’

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान एवं पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 10 से 16 जनवरी 2020 तक प्रतिदिन श्री राम कथा का प्रिंसेस श्राईन, गेट नं.- 9, पैलेस ग्राउण्ड, बैंगलोर में विशाल आयोजन किया जा रहा है।
कथा के पहले दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से राम कथा का श्रवण किया।
श्री राम कथा के प्रथम दिन की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने सबसे पहले राम कथा के माध्यम से राम चरित्र, पारिवारिक समस्याएं, सामाजिक जिम्मेदारियां इत्यादि का महत्व समझाया। महाराज जी ने कहा कि कथा इस भाव से सुने कि ये मेरे ही घर, परिवार की कहानी है। भगवान राम प्रत्येक घर के सदस्य हैं, किसी को भी ये नहीं भूलना चाहिए। जिनके मन में मानवता को जगाने का भाव है उन सभी के घर के सदस्य है भगवान श्री राम। ना केवल सनातन धर्म बल्कि इंडोनेशिया समेत कई देशों में राम जी को मानने वाले लोग निवास करते हैं।
महाराज श्री ने राम कथा की शुरूआत करने से पूर्व हरे रामा रामा राम... सीता राम राम राम.... भजन भक्तों को श्रवण कराया।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि राम कथा से हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है। कुछ लोग कहते हैं कि राम कथा गंभीर होती है, उसे सुनने में मन नहीं लगता। लेकिन ये बात जान लें कि जीवन में कई बार ऐसे पल आते हैं जब हमें गंभीर होना पड़ता है। तब हमें राम कथा बहुत बड़ा संभल देती है। ये कथा हम सबके जीवन में बहुत मायने रखती है।
रामकथा का मतलब समझाते हुए महाराज श्री ने आगे कहा कि यह प्रत्येक सनातन धर्म के अनुयायियों की फैमली मेंबर्स की कथा है। ये हम सभी के जीवन की कथा है। हमें मुख्यत दो तरह की कथाएं ज्यादा पसंद होती हैं। पहला आपबीती और दूसरा जगबीती। महाराज जी ने आगे कहा कि राजस्थान, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में अभी भी जब हम एक दूसरे से मिलते हैं तो राम-राम कहते हैं। हालांकि कुछ मार्डन लोग नहीं कहते।


हरियाणवी लड़कियों द्वारा गाया गया गाना अरे मेरे राम सुदामा रे.... का जिक्र करते हुए महाराज जी ने कहा कि उसमें एक पंक्ति है मनै सुना दे राम कहानी। इस तरह राम कहानी का जो संबंध है कि वो हम सभी के जीवन की कहानी है। जो हम सभी से संबंधित है। हमें ये सोचना चाहिए कि हमारा संबंध रामायण के कौन से पात्र से है। माताएं इस पर विचार करें कि रामायण में जितनी भी माताओं का वर्णन किया गया है उनमें से मैं कौन सी माता से मेल खाती हूं। अगर भाई हैं तो आप देखें कि रामायण के कौन से चरित्र से आपका संबंध है। आप सोचे की आप रामायण के कौन से चरित्र से संबंध मेल खाते हैं और जिस चरित्र से मेरा संबंध है क्या मैं उसके जैसा बन पा रहा हूं। अगर नहीं बन पा रहे हैं तो बनने की कोशिश करें।
ऐसे करने पर आपको निश्चित ही पता चलेगा कि रामकथा आपके ही जीवन की कथा है। राम कथा से संबंध को समझाते हुए महाराज जी ने भोजपुरी भाषा का एक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि जब माताएं भोजन पकाती हैं और उसमें नमक मिर्च को लेकर पति-पत्नी में जब तू-तू, मैं-मैं हो जाती है तो घर की बुजुर्ग कहती है कि रामवन के जेवनार और सीता बनके रसोई.....अर्थात जो भोजन कर रहा है वो राम की तरह मर्यादित और एकाग्रचित होकर भोजन करें और जो भोजन बना रही हैं ऐसे करके दोनों को आनंद आएगा।
हमेशा राम बनकर ही जियो, जीवन में कभी कोई कलेश नहीं होगा। छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करना सीखो। राम कथा घर चलाना सिखाती है। घर में शांति कैसे रखी जाएं, ये सब राम कथा हमें सिखाती है। राम कथा हमें अच्छा मानव बनाती है। आशीर्वाद, प्यार और सम्मान अगर ये तीन चीजें किसी को मिल जाएं, तो उस इंसान के जीवन में किसी तरह की कोई कमी नहीं होगी। रामायण हमें समझाती है कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने रामचरित्रमानस की महानता का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रभु श्री राम की कथा गोस्वामी तुलसीदास महाराज जी ने रामचरित्रमानस के माध्यम से , श्री बाल्मिकी महाराज ने बाल्मिकी रामायण के माध्यम से की है। भगवान श्री राम के गुणों का गायन अनेकों बार अनेकों ऋषियों ने अपनी भावना के अनुसार किया है। परन्तु हम सभी की पहुंच में रामचरित्रमानस बहुत आसानी से आ गया है और हम रामचरित्रमानस के इस पवित्र ग्रंथ को सहज स्वीकार करते हैं। कोई अगर ये कहे की तुलसीदास महाराज ने रामचरित्रमानस 500-550 साल पहले लिखी इसकी प्रमाणिकता क्या है, इसकी गजब की प्रमाणिकता है रामायण । सबसे पहली बात स्वयं भगवान श्री राम ने गोस्वामी तुलसीदास बाबा को कहा तुम मेरे चरित्रों का गायन करो, तुलसीदास बाबा ने कहा मैं समर्थ नहीं हूं आपका चरित्र तो अपार है, मेरी पहुंच उतनी नहीं हैं, मैं क्या लिख सकूंगा।
भगवान श्री जानते थे की कलयुग के लोग संस्कृत से धीरे धीरे दूर हो जाएंगे और यह प्रमाण भी है हम सब के मध्य मे की हम सब के घरों में संस्कृत अब पढ़ाई नहीं जाती और बाल्मिकी बाबा ने जो रामायण लिखि है वो संस्कृत में है, वो हमारी पहुंच से थोड़ी दूर है। इसलिए भगवान श्री राम ने गोस्वामी तुलसीदास बाबा को कहा आप मेरे चरित्रों का गायन किजिए, कुछ लिखिए। तुलसीदास बाबा बोले मैं सामर्थयवान नहीं हूं, मैने कुछ भी इधर उधर लिख दिया तो। वहां खड़े हनुमान जी बोले चिंता मत किजिए जब तक रामायण पूरी नहीं हो जाती मैं पल पल आपके साथ रहूंगा और जब भी कहीं इधर उधर हो गए तो मैं आपको सही मार्गदर्शन दूंगा। आज्ञा श्री राम की, निगरानी श्री हनुमान जी महाराज की, जब रामायण लिखकर तैयार हुई उसके बाद भी काशी के विद्वानों ने यह कहकर मना कर दिया की ये आपने क्या लिखा है ये रामायण नहीं है, इसको मान्यता नहीं मिलेगी। तो इस रामचरित्रमानस को मान्यता प्राप्त कराने के लिए काशी विश्वनाथ में नीचे रखा गया दबा कर और जब सुबह मंदिर खुला तो रामचरित्र मानस सबसे ऊपर रखा हुआ था और बाबा भोले नाथ के हस्ताक्षर थे उसमें। इसे भगवान श्री राम ने प्रमाणित किया, हनुमान जी ने प्रमाणित किया और अंत में वैष्णवों में सर्वश्रेष्ठ बाबा भोलेनाथ ने अपने हस्ताक्षर करके कहा कि यह रामचरित्रमानस मान्य है, सुंदर ग्रंथ है, जो इसकी छांव में आएगा उसे अद्भुत शांति की प्राप्ति होगी, ईश्वरीय कृपा प्राप्त होगी।

राम कथा के दौरान राधे राधे के जयकारे भी लगाए गए।

11Jan 2020

पौष मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के पावन अवसर पर ठा. श्री प्रियाकांत जू मंदिर के प्रांगण में 10 जनवरी 2020 को पूर्णिमा महोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया गया।

पौष मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के पावन अवसर पर ठा. श्री प्रियाकांत जू मंदिर के प्रांगण में 10 जनवरी 2020 को पूर्णिमा महोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया गया। जिसमें हजारों की संख्या में देश विदेश से भक्त पधारे। सर्वप्रथम गणेश वंदना कर कार्यक्रम की शुरुआत की गई तथा ठा. श्री प्रियाकांत जू भगवान, सर्वेश्वरी श्री राधा रानी के प्यारे-प्यारे भजनों की प्रस्तुति दी गई। इस भव्य आयोजन में कई गीतकार भी शामिल हुए। श्री तिलक वर्मा जी (हिसार), श्रीमती वीना श्रीजी (झाँसी), श्रीमती अनु चड्ढा जी (दिल्ली), श्रीमती संध्या तोमर जी (दिल्ली), श्रीमती संतोष सादिका जी (बरसानेवाली),सचिन राधे जैसे कलाकारों ने अपने भजनों एवं संकीर्तन से समां बांध दिया। महिलाओं समेत छोटे बच्चे भी भजनों पर झूम उठे। साथ ही सभी भक्तगणों ने राधे - राधे के जयकारे भी लगाए गए। अंत में ठाकुर श्री प्रियाकांतजू भगवान की आरती कर कार्यक्रम का समापन किया गया।

11Jan 2020

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सौजन्य से बैंगलोर में चार दिवसीय ब्लड डोनेशन एवं फ्री मेडिकल कैम्प का आयोजन किया जा रहा है। पहले दिन शिविर में आए लोगों की फ्री ब्लड प्रेशर, ब्लड जांच आदि की गई।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सौजन्य से बैंगलोर में चार दिवसीय ब्लड डोनेशन एवं फ्री मेडिकल कैम्प का आयोजन किया जा रहा है। पहले दिन शिविर में आए लोगों की फ्री ब्लड प्रेशर, ब्लड जांच आदि की गई। साथ ही उन्हें शारीरिक स्वास्थ्य लाभ से संबंधित जानकारी दी गई। साथ की संस्था एवं समिति से जुड़े लोगों ने रक्तदान किया एवं लोगों से भी शिविर में ज्यादा से ज्यादा संख्या में पहुंचकर रक्तदान करने की अपील की

12Jan 2020

युवाओं के प्रेरणास्त्रोत, स्वामी विवेकानंद की आज 157वीं जयंती एवं राष्ट्रीय युवा दिवस के अवसर पर बैंगलोर में एकल विद्यालय द्वारा मैराथन का आयोजन किया गया।

युवाओं के प्रेरणास्त्रोत, स्वामी विवेकानंद की आज 157वीं जयंती एवं राष्ट्रीय युवा दिवस के अवसर पर बैंगलोर में एकल विद्यालय द्वारा मैराथन का आयोजन किया गया जिसमें पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने मुख्य अतिथि के तौर पर शिरकत की। स्वामी विवेकानंद जी की जयंती को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

आज इस अवसर पर ऊर्जा व उत्साह से परिपूर्ण युवाओं को राष्ट्रनिर्माण के प्रति कृतसंकल्पित करने के उद्देश्य से "रन फ़ॉर युथ - युथ फ़ॉर नेशन मैराथन" को महाराज श्री ने हरी झंडी दिखा कर रवाना किया। राष्ट्र निर्माण में युवाओं का अहम रोल है।बच्चों से लेकर बुजुर्गों और महिलाओं ने रन फॉर यूथ मैराथन में भाग लिया।

इस अवसर पर एकल रन की ब्रांड अम्बेसडर ज्योति शर्मा जी, एकल विद्यालय से श्री रमेश अग्रवाल जी, श्री वैभव जी, श्री सचिन पांड्या जी, श्री बिमल सारावागी जी, विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी, विश्व शांति सेवा समिति बैंगलोर की ओर से श्री संजय सिंह जी, श्री गोवर्धन जी, श्री सुरेश जांगिड़ जी, श्री महेश कुमावत जी, श्री संजय अग्रवाल जी और श्री किंवाराम जी मौजूद रहे

12Jan 2020

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति बैंगलोर के सौजन्य से बैंगलोर में चार दिवसीय ब्लड डोनेशन एवं फ्री मेडिकल कैम्प का आयोजन किया जा रहा है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति बैंगलोर के सौजन्य से बैंगलोर में चार दिवसीय ब्लड डोनेशन एवं फ्री मेडिकल कैम्प का आयोजन किया जा रहा है। दूसरे दिन भी शिविर में आए लोगों की फ्री ब्लड प्रेशर, ब्लड जांच आदि की गई। साथ ही उन्हें शारीरिक स्वास्थ्य लाभ से संबंधित जानकारी दी गई।

31Dec 2019

‘हमें अपने दिल और दिमाग का अच्छी जगह इस्तेमाल करना चाहिए ’ पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा समिति पुणे के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 24 से 31 दिसंबर 2019 तक प्रतिदिन महापौर निवास ग्राउंड, भेलपुरी चौक, निगड़ी प्राधिकरण पुणे(महाराष्ट्र) में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं को श्रवण कराया। इस दौरान हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

 

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि मन बड़ा चंचल है, जिन चीजों के लिए मना किया जाता है फिर भी उन्हीं में लगता है। बच्चों द्वारा कम्प्यूटर का अधिकांश इस्तेमाल करने पर बोलते हुए महाराज जी ने कहा कि भगवान के दिए हुए सॉफ्टवेयर का जब हम गलत इस्तेमाल करते हैं तो जीवन गलत दिशा पकड़ लेता है और भगवान के दिए सॉफ्टवेयर का अगर हम सही उपयोग करें, तो हमारा जीवन सही दिशा पकड़ लेगा। ये आपके ऊपर निर्भर करता है कि आप उसका कैसे इस्तेमाल कर रहे हैं। हमारा शरीर एक कंप्यूटर की भांति है जिसमें दिल और दिमाग दो कमाल के सॉफ्टवेयर हैं जो भगवान ने हमें दिए हैं। भगवान ने वेद, पुराण आदि धर्मग्रंथों के माध्यम से दो सॉफ्टवेयर अर्थात दिल और दिमाग का इस्तेमाल करने के बारे में भी समझाया है। लेकिन समस्या ये है कि बिना उन किताबों को पढ़े हम इस्तेमाल करने लगे और फंस गए। भगवान कहते है कि इन दो सॉफ्टवेयर का बड़ी सावधानी से इस्तेमाल करें। अर्थात दिल मुझमें लगाकर रखना और दिमाग दुनिया में लगाकर रखना। ऐसा करने से जीवन अच्छी तरह व्यतीत होगा, कभी फंसोगे नहीं। लेकिन आज हम इसका इस्तेमाल उल्टा ही कर रहे हैं। हम दिमाग भगवान में और दिल दुनिया में लगा बैठे हैं। कर्म ऐसे होने चाहिए कि तुम्हारे जाने के बाद लोगों के दिल से तुम्हारी तस्वीर नहीं निकलनी चाहिए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। उसका परिवार अत्यंत गरीबी और दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे थोड़ा बहुत खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वो चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है। वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना ना रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया। दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली और उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे, जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

1Jan 2020

आज सुबह विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट से सचिव श्री विजय शर्मा जी पुणे से दिल्ली पहुंचे।

आज सुबह विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट से सचिव श्री विजय शर्मा जी पुणे से दिल्ली पहुंचे। वहां समिति के सद्स्यों द्वारा स्वागत किया गया। 23 से 31 मार्च 2020 तक दिल्ली में आयोजित होने वाली विशाल राम कथा के आयोजन के लिए कई जगहों का निरीक्षण किया जिसमें से पांचवा पुस्ता, भजनपुरा स्थित ग्राउंड को कथा के लिए चुना गया। साथ ही 19 जनवरी को होने वाली बैठक के लिए चर्चा की।

1Jan 2020

नव वर्ष उत्सव 2020

विश्व शांति सेवा समिति पुणे एवं विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 24 से 31 दिसंबर 2019 तक महापौर निवास ग्राउंड, भेलपुरी चौक, निगड़ी प्राधिकरण पुणे(महाराष्ट्र) में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा के भव्य समापन के बाद 31 दिसंबर को नव वर्ष का विशाल महोत्सव बड़े हर्षोउल्लास के साथ मनाया गया।
नव वर्ष की शुरूआत विश्व शांति की प्रार्थना के साथ की गई। इस दौरान मधुर गायन प्रस्तुत किया गया, जिसे सुनकर कथा पंडाल में मौजूद सभी कृष्ण प्रेमी झूम उठे। नव वर्ष के भव्य आयोजन के बाद पुणे कोई आम स्थल ना होकर एक तीर्थ स्थल में बदल गया।
महाराज श्री ने कहा कि शुभ दिन शुभ कार्यों के साथ मनाना चाहिए। हालांकि ये नव वर्ष पाश्चात्य कैलेंडर के हिसाब से है। इसमें और हमारे नव वर्ष में बहुत अंतर है। जब ये वर्ष चेंज होता है तो कुछ भी चेंज नहीं होता। जैसे का तैसा ही रहता है। लेकिन जब हिंदू कैलेंडर के हिसाब से मनाया जाने वाले नव वर्ष प्रारंभ होता है तो हमारे यहां सब कुछ बदल जाता है। भारतीय संवत के अनुसार जब नव वर्ष बदलता है तो प्रकृति में बदलाव होता है। किसानों के घर नया अन्न आता है। साथ ही हमारे शरीर में भी कई बदलाव होते हैं। इसलिए भारतीयों का नव वर्ष अद्भुत होता ही है लेकिन संसार के साथ चलना भी जरूरी है।


महाराज श्री ने अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से मनाया जाने वाले नव वर्ष पर बोलते हुए कहा कि यह हमारी एक योजना है। हम इसे इसलिए मनाते हैं ताकि हम ज्यादा से ज्याद लोगों को बुरे काम करने से रोक सकें। उन्हें भक्ति के मार्ग में लगा सके। हमेशा शुभ कार्य की शुरूआत भगवान के साथ ही करनी चाहिए। अच्छे कर्मों के साथ ही शुभ कार्य करने चाहिए, जिसका फल भी बहुत लाभदायक होता है।
महाराज श्री ने आगे कहा कि “ए जाने वाली साल, साल की सभी खताओं को माफ करती जा, ए आने वाली साल मुझे मेरे कन्हैया के और करीब लेती जा”। वैसे तो बीते हुए पल वापस नहीं आते, पर मत भूलो जो पल गुजरे श्याम के चरणों में वो पल कभी छोड़कर नहीं जाते। अगर आप प्राप्त की गई किसी वस्तु का सदुपयोग नहीं कर सकते, तो आप समझदार नहीं कहलाएंगे।
महाराज श्री ने नए साल का संदेश देते हुए कहा कि जब भी कोई नया पल हो, नया साल हो, तो हमें अपने जीवन में कुछ नए परिवर्तन करने चाहिए।
इस दौरान नव वर्ष के उपलक्ष्य में कथा पंडाल में मौजूद महाराज जी, सभी भगतगण, समिति के लोग समेत अन्य लोगों ने बेटी बचाओ, स्वच्छता अभियान, नो प्लास्टिक, जल बचाव, नदी संरक्षण, भारतीय संस्कृति, गौमाता, शहीद, गरीब –असहायों की मदद, छुआछूत जैसे 10 विषयों पर संकल्प लिया।
कथा पंडाल में हजारों की संख्या में भक्तगण मौजूद रहे। नव वर्ष पर महाराज श्री के श्रीमुख से भजनों का सभी कृष्ण प्रेमियों ने खूब आनंद उठाया। पूरा पंडाल राधे राधे के जयकारों से गूंज उठा।

2Jan 2020

आज 2 जनवरी से 8 जनवरी 2020 तक नागपुर में आयोजित होने वाली कथा से पूर्व महाराज जी ने सर्वप्रथम डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति पहुंचकर हेडगेवार जी की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर नमन किया।

विश्व शांति सेवा समिति नागपुर, विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में एवं पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में आज 2 जनवरी से 8 जनवरी 2020 तक नागपुर में आयोजित होने वाली कथा से पूर्व महाराज जी ने सर्वप्रथम डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति पहुंचकर हेडगेवार जी की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर नमन किया।

2Jan 2020

हमें सत्य सनातन धर्म के लिए सोचना चाहिए- पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

हमें सत्य सनातन धर्म के लिए सोचना चाहिए- पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज


‘जीवन में सबसे अनमोल रत्न है मधुर वाणी’ - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज


“कथा में जाएं तो विनम्र बनकर जाएं - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज


विश्व शांति सेवा समिति नागपुर के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 2 से 8 जनवरी 2020 तक प्रतिदिन डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति, महर्षि व्यास सभाग्रह, रेशमबाग मैदान के पीछे, नागपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।
श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।
कथा के प्रथम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। प्रथम दिवस की कथा की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत भागवत के प्रथम श्लोक सच्चिदानन्दरूपाय विश्वोत्पत्त्यादिहेतवे। तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुम: के उच्चारण के साथ की। उन्होंने कहा कि हम सभी सनातनियों को एकत्रित होने की जरूरत है। अपने व्यक्तिगत मत भुलाकर, जातिपंथ सबकुछ भूलकर सिर्फ हमें अपनी भारत माता के लिए सोचना चाहिए। हमें सत्य सनातन धर्म के लिए सोचना चाहिए। साथ ही धर्म को आगे बढ़ाने के लिए हर संभव कोशिश करनी चाहिए।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि इस संसार में भगवान कृष्ण ही सृष्टि का सृजन, पालन और संहार सब वहीं करते हैं। भगवान के चरणों में जितना समय बीत जाए उतना अच्छा है। इस संसार में एक-एक पल बहुत कीमती है। वो बीत गया तो बीत गया। इसलिए जीवन को व्यर्थ में बर्बाद नहीं करना चाहिए। भगवान के द्वारा प्रदान किए गए जीवन को भगवान के साथ और भगवान के सत्संग में ही व्यतीत करनी चाहिए। भागवत प्रश्न से प्रारंभ होती है और पहला ही प्रश्न है कि कलयुग के प्राणी का कल्याण कैसे होगा। इसमें सतयुग, त्रेता और द्वापर युग की चर्चा ही नहीं की गई है। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि बार बार कलयुग के ही कल्याण की चर्चा क्यों की जाती है अन्य किसी की क्यों नहीं। इसके कई कारण हैं जैसे- अल्प आयु, भाग्यहीन और रोगी। इसलिए इस संसार में जो भगवान का भजन ना कर सके, वो सबसे बड़ा भाग्यहीन है। भगवान इस धरती पर बार-बार इसलिए आते हैं ताकि हम कलयुग में उनकी कथाओं में आनंद ले सकें और कथाओं के माध्यम से अपना चित्त शुद्ध कर सकें। भागवत कथा चुंबक की भांति कार्य करती है जो मनुष्य के मन को अपनी ओर खींचती है। इसके माध्यम से हमारा मन भगवान से लग जाता है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि भागवत का महात्यम क्या है? एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे। उन्होंने ये प्रश्न किया कि कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की, पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है? क्योंकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूलकर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए, तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने, गीता की सुनो और उसकी मानों भी। माँ-बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे, तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।
श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

 

3Jan 2020

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं मेरा भारत मेरा स्वाभिमान एवं ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी ने मथुरा, वृंदावन में सर्दी में फुटपाथ पर रह रहे गरीब असहाय व्यक्तियों को कंबल वितिरत किए ताकि उन्हें थोड़ी राहत मिल सके। विजय शर्मा जी ने कहा ये लोग न्यूनतम इच्छाओं के साथ अपना जीवन यापन कर रहे हैं l

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं मेरा भारत मेरा स्वाभिमान एवं ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी ने मथुरा, वृंदावन में सर्दी में फुटपाथ पर रह रहे गरीब असहाय व्यक्तियों को कंबल वितिरत किए ताकि उन्हें थोड़ी राहत मिल सके। विजय शर्मा जी ने कहा ये लोग न्यूनतम इच्छाओं के साथ अपना जीवन यापन कर रहे हैं l अगर हमें भगवान ने कुछ सामर्थ्य प्रदान किया है तो वह हम पर उसकी अनुपम कृपा है l हमें उस कृपा में एक हिस्सा अपने ऐसे असहाय गरीब साथियों के साथ बांटना चाहिए l ऐसे लोगों की मदद में आगे आना चाहिए l वास्तव में यही भगवान की सच्ची पूजा है l

3Jan 2020

भागवत कथा ग्रहण करने से हो जाती है सहज मुक्ति’।

भागवत कथा ग्रहण करने से हो जाती है सहज मुक्ति’।

‘प्रयास करने से ही अच्छा फल प्राप्त होता है’।

‘संसार में रहकर भगवान को पाने की कोशिश करते रहना चाहिए’।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति नागपुर के तत्वाधान में 2 से 8 जनवरी 2020 तक प्रतिदिन डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति, महर्षि व्यास सभाग्रह, रेशमबाग मैदान के पीछे, नागपुर में पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।
श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
कथा के द्वितीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि श्रीमद् भागवत अर्थात भ माने भक्ति ग माने ज्ञान, व माने वैराग्य और त माने तत् श्रण मुक्ति। ये चार अक्षर हैं और इनके मिलने से ‘भागवत’ शब्द बनता है। भक्ति, ज्ञान, वैराग्य से पूर्ण होकर, जो व्यक्ति भागवत कथा अमृत रसास्वाद ग्रहण करता है निश्चित तौर पर सहज उसकी मुक्ति हो जाती है।
महाराज श्री ने कहा कि “इस संसार की गतिविधियों पर नहीं अधिकार किसी का है जिसको हम परमात्मा कहते हैं ये सब खेल उसी का है”। भागवत कथा के माध्यम से व्यक्ति ना सिर्फ ईश्वर को जानता है बल्कि ईश्वर को पाने की इच्छा भी कर बैठता है। जब जीव के मन में उसे पाने की इच्छा होती है तो वह कोई ना कोई प्रयास भी करता है और गोविंद की कृपा से हर प्रयास भी सफल होता है। सत्य यही है जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ अर्थात जिन्होंने उसे खोजने की कोशिश की है उन्हें वो निश्चित मिला है। इस तरह प्रयास करने से ही अच्छा फल मिलता है। अगर आप भगवान को पाना चाहते हैं तो उसके लिए आपको निरंतर प्रयास करना होगा, उनके लिए समय निकालना होगा। ये बात अच्छे से जान लें कि अगर आपके पास भगवान के लिए समय नहीं है तो उनके पास भी आपके लिए समय नहीं है। अगर आप भगवान को प्रिय लगने वाले कार्यों और उसमें मन लगाने लगोगे, तो निश्चय ही आपको भगवान के दर्शन हो जाएंगे। महाराज जी ने आगे कहा कि संसार की बातों को छोड़ों और भगवान को पाने के लिए निकल पड़ो। संसार में रहकर भगवान को पाने की कोशिश करते रहना चाहिए।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता। जब भगवान भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की, तो बाबा भोलेनाथ ने कहा कि जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योंकि यह कथा सबके नसीब में नहीं है। माता पूरा कैलाश देख आईं पर शुक के अपरिपक्व अंडों पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद की गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे, उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते महाराज जी ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया, तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा, मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा कि श्री शुक आप आओ, आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी। उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए। यानि उन्हें माया का बंधन नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारों ओर बांधता फिरता है और बार बार इस माया के चक्कर में धरती पर अलग - अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जन्म मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।

26Dec 2019

‘सूर्य ग्रहण के दौरान किया गया दान कई गुना फल देता है’- पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा समिति पुणे के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 24 से 31 दिसंबर 2019 तक प्रतिदिन महापौर निवास ग्राउंड, भेलपुरी चौक, निगड़ी प्राधिकरण पुणे(महाराष्ट्र) में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो, उसको क्या करना चाहिए? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

कथा के तृतीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। कथा की शुरूआत भागवत आरती एवं विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत आज लगे सूर्यग्रहण से करते हुए कहा कि जो घटना प्रत्यक्ष हो गई, उसके प्रमाण की कोई आवश्यकता नहीं है। जो मान मर्यादाएं पहले से चली आ रही हैं उनका पालन करना चाहिए। जो बातें हमारे ऋषि, मुनियों ने बताई हैं वो आज भी घटित होती हैं, सत्य हैं। उन्हीं का आधार लेकर विज्ञान भी आगे बढ़े। हम विज्ञान की भाषा को भले ही अलग कर सकते हैं लेकिन भगवान और भगवान की सत्ता को कोई नहीं मिटा सकता। भविष्य में जब भी ग्रहण पड़े, तो हमेशा दो बातों का खास ध्यान रखें कि उस समय कुछ भी खाना पीना नहीं चाहिए और उस दौरान भजन और दान पुण्य करें। इस समय किया गया दान कई गुना फल देता है। ऐसे लाभ को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। महाराज जी ने आगे कहा कि अपने आप से एक सवाल करें कि हम मरेंगे कि नहीं, मेरी स्थिति क्या है?
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया कि जो व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।
राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...
अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।
भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।

27Dec 2019

‘नर्क से बचने का एकमात्र सरल तरीका है भगवत भजन’- पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा समिति पुणे के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 24 से 31 दिसंबर 2019 तक प्रतिदिन महापौर निवास ग्राउंड, भेलपुरी चौक, निगड़ी प्राधिकरण पुणे(महाराष्ट्र) में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तारपूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जीवन में कुछ क्षण का संग भी अगर संत, भगवान या सत्संग का हो जाए, तो समझ लेना चाहिए कि ग्रहण करने वालों का वो एक क्षण का संग भी, सत्संग का बेड़ापार करने के लिए पर्याप्त है। सदा अपने नेत्र, श्रवण और वाणी पर नियंत्रण रखना चाहिए क्योंकि जैसा हम सुनते हैं, देखते हैं वैसा ही आचरण करते हैं। ये आपके ऊपर निर्भर करता है कि आप क्या देख रहे हैं क्या सुन रहे हैं। देखना और सुनना अगर सुधरा हुआ हो, अच्छा हो, तो तुम कभी गलत रास्ते पर नहीं जाओगे। जो उचित हो हमेशा वहीं देखो और सुनो। भगवान के नाम का आश्रय लो, सत्संग करो, वहीं हमारे साथ जाएगा।

 


महाराज जी ने नागरिकता कानून पर बोलते हुए कहा कि हमें इस देश को अपना समझना चाहिए और सरकार जो कानून लेकर आई है वो देश में रहने वालों के लिए बिल्कुल भी गलत नहीं है। बाहर से आने वालों के लिए अगर कोई समस्या है तो बाहर से ज्यादा लाने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इस देश में जनसंख्या बहुत ज्यादा है। जो लोग इस देश में रह रहे हैं उन्हें किसी तरह की कोई असुविधा नहीं होगी क्योंकि वो मूलत: भारतीय हैं।
महाराज जी ने आगे कहा कि एक दृश्य से हमारा पूरा आचरण बदल सकता है इसलिए आंख और कान सभी पर नियंत्रण होना बहुत आवश्यक है। नर्क से बचने का एकमात्र सरल तरीका है कि भगवत भजन। जो जीव भगवत भजन करेगा, जो भगवान के नाम में विश्वास रखता है वो आसानी से भव सागर से तर जाएगा। भगवान पर जितना विश्वास करोगे उतना ही अच्छा है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे, तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपने मन्त्रों से जीवित कर दिया।
महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मैं इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।
शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो, तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।
इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने विष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।
दूसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।

महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंसा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

28Dec 2019

‘जीवन में विनम्रता बहुत महत्वूपर्ण हैं’ - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा समिति पुणे के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 24 से 31 दिसंबर 2019 तक प्रतिदिन महापौर निवास ग्राउंड, भेलपुरी चौक, निगड़ी प्राधिकरण पुणे(महाराष्ट्र) में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पूतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के पंचम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

आज कथा पंडाल में पिम्परी के विधायक श्री अन्ना बनसोडे जी ने गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आर्शीवाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

 

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि ईश्वर के ऊपर पूर्ण भरोसा करो, कि अगर तुम ईश्वर के प्रति समर्पित रहोगे, तो वो तुम्हारे किसी भी कार्य को रूकने नहीं देंगे। सबसे बड़ी समस्या ये है कि कभी हमें विश्वास होता है तो कभी नहीं। विश्वास में सबसे बड़ी बात यह है कि जो भी कुछ जीवन में घटित होता है अर्थात अच्छा या बुरा। एक बात अवश्य समझ लें कि भगवान ने तुम्हारी लिए अच्छा ही किया है बुरा नहीं। भगवान के भक्त कभी किसी से शिकायत नहीं करते। अपने कर्म को ईमानदारी से करते चले जाओ, जो होता चला जाए उसे ठाकुर जी की मर्जी समझकर स्वीकार करो।भगवान से कभी ये प्रश्न मत करो कि मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ? जब आप ये प्रश्न करते हो तो उसी समय तुम्हें भगवान पर संदेह होता है कि वो है कि नहीं। जो जीव भगवान पर दृढ़ विश्वास करता है ईश्वर उसे कभी अकेला नहीं छोड़ते। जिस दिन तुम ठाकुर जी के हो जाओगे उस दिन पूरा संसार तुम्हारा हो जाएगा। हमेशा अपने भगवान पर पूरा भरोसा रखे। गुरु, ब्राह्मण, संत और भगवान सभी हृदय से प्रसन्न होते हैं ना कि आपके द्वारा की गई व्यवस्था से। सिर्फ नोट या पद के बल पर अगर आशीर्वाद मांगोगे तो नहीं मिलेगा। जीवन में विनम्रता बहुत महत्वूपर्ण हैं।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि पूतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पूतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई, तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योंकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर। कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्धार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आंखे फेर ली क्योंकि वो मित्र का भेष रखकर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पूतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पूतना का वध कर उसका कल्याण किया।

महाराज जी ने कहा संतों ने कई भाव बताए हैं कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण कीआवश्यकताहै।
इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।
श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।
श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।

29Dec 2019

“ जीवन में अगर कोई चीज अधिक हो जाए तो उसे सेवा भाव में लगाइए : देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

विश्व शांति सेवा समिति पुणे के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 24 से 31 दिसंबर 2019 तक प्रतिदिन महापौर निवास ग्राउंड, भेलपुरी चौक, निगड़ी प्राधिकरण पुणे(महाराष्ट्र) में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन प्रेम मयी राधा - राधा प्रेम मयो हरि "श्रवण कराया”।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत कहा कि जो भगवान के उत्सव में सम्मिलित होते है उनके सभी अमंगल नष्ट हो जाते है। इसलिए भगवान के उत्सव में हमेशा सम्मिलित होना चाहिए। बैसे भी अगर कहा जाएं तो ये जो भगवान के उत्सव है ये मृत्यु लोक में संभव है। ये उत्सव यही मनाये हैं। इन उत्सवों को मानाने के लिए स्वर्ग में को विकल्प नहीं है। भगवान कैसे प्रकट हुए उस समय उत्सव कैसे हुआ होगा आनंद क्या रहा होगा उस समय तो हम उपस्थित नहीं थे। पर कथाओं के माध्यम से जब उत्सव हमें सुनने को मिलते है। इन उत्सवों में सम्मिलित होने अवसर मिला। कभी कभी हम ब्रजवासी होने की भावनाओं को महसूस करते है। और राम अवतार में अयोध्यावासी होने की भावनाये महसूस करते है।

 

जीवन में कुछ भी चीज ज्यादा एकत्रित नहीं करना चाहिए, जो भी मिले उसमें ही संतोष करना चाहिए और अधिक हो जाए तो सेवा भाव धर्म में अधिक लगाना शुरू कर दिजिए। विचार अधिक हों तो विचारों से अपने धर्म को आगे बढ़ाइए, बल अधिक हो तो धर्म की रक्षा किजिए, धन अधिक हो तो अपना धन धार्मिक कार्यों में लगाइए। जो भी आपके पास है उसकी अधिकता बढ़ जाए तो सिर्फ भगवान के लिए, धर्म के लिए, सेवा के लिए लगाइए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।

25Dec 2019

“मनुष्य योनि में ही आप नित्य नए पुण्य और पाप कर सकते हैं” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

“मनुष्य योनि में ही आप नित्य नए पुण्य और पाप कर सकते हैं”

विश्व शांति सेवा समिति पुणे के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 24 से 31 दिसंबर 2019 तक प्रतिदिन महापौर निवास ग्राउंड, भेलपुरी चौक,निगड़ी प्राधिकरण पुणे(महाराष्ट्र) में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।कथा के द्वितीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।कथा की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि सभी अपने धर्म के विषय में सबसे महत्वपूर्ण बात समझने की कोशिश करें कि जब तक जीवन में श्रृद्धा और विश्वास की ये दो डोरी नहीं होंगी, तब तक तुम्हारा इस पंथ पर चलना और ना चलना बराबर है। श्रृद्धा और विश्वास सबसे बड़ी बात है और जब ये दोनों साथ हों, तो असंभव भी संभव हो जाता है। धर्म की स्थापना करने के लिए भगवान बार-बार इस धरती पर आते हैं। जिन लोगों की वजह से अधर्म बढ़ता है उन लोगों को समझाने या फिर मिटाने के लिए भगवान आते हैं। जब उन्हें लगता है कि मेरे बिना भी काम चल सकता है तो वो अपने दूतों को भेजते हैं।

महाराज जी ने आगे कहा कि सभी कथाकारों या संतों को, जिनके आप प्रवचन सुनते हो, उन सभी को भगवान का श्रेष्ठ पुत्र समझना चाहिए। क्योंकि वो भगवान के कार्य और संदेश को आप लोगों तक पहुंचाते हैं। पशु योनियों में ना तो कोई नया पुण्य कर सकता है और ना ही पाप। इसमें ना तो किसी पुण्य का फल मिलता है और ना ही पाप का। मनुष्य योनि ही एक ऐसी योनि है जिसमें आप नित्य नए पाप और पुण्य कर सकते हैं। अपने द्वारा किए गए पाप और पुण्य का पूरा फल आपको भोगना ही पड़ेगा। पुण्य का फल श्रेष्ठ मानव जीवन है। श्