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7Dec 2019

“भक्ति ज्ञान वैराग्य से ओत-प्रोत है श्रीमद भागवत कथा”

“भक्ति ज्ञान वैराग्य से ओत-प्रोत है श्रीमद भागवत कथा” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज


“जहां भगवान की कथा होती है वहां सभी तीर्थ वास करते हैं” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति सोलापुर के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 7 से 14 दिसम्बर 2019 तक स्व. लिंगराज बालईरय्या वल्याव्ठ क्रीडांगण, सोलापुर महाराष्ट्र में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया गया।

श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई।

आज कथा पंडाल में आमदार श्री विजय कुमार देशमुख जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

 

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को श्री हरी विठला जय हरि विठला भजन श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भागवत स्वयं भगवान श्री कृष्ण का स्वरुप है। भगवान विठल में और भागवत में कोई अंतर नहीं है। भगवान विठल मंदिर में विराजमान होकर हम सभी का कल्याण करते हैं लेकिन भागवत के रूप में विठल शहर-शहर में जाकर हम सब प्राणी मात्र का कल्याण करते है। भगवान विठल श्री कृष्ण का ही स्वरुप है और भगवान विठल रुक्मणि जी के साथ में यहाँ पर विराजमान है।
महाराज श्री ने कहा कि हमारी भक्ति दृढ क्यों नहीं होती ? वो इसलिए नहीं होती क्योंकि मूर्ति मंव जो हैं उन्हें हम भगवान मान बैठते हैं और चलती फिरती मूर्ति में हम भगवान नहीं देखते उनको हम अपना दुश्मन मानते हैं तो फिर भगवान कहां से प्रकट होंगे। इसका मतलब यह नहीं है की मूर्ति में भगवान नहीं है, वह भगवान की छवि है, वहां भी भगवान है और यहां पंडाल में जो लोग बैठे हैं उनमें भी भगवान हैं, जब यह दृष्टि हो जाएगी की कण कण में भगवान बैठा हुआ है उस दिन भगवान आपसे दूर नहीं होंगे, तब आप जो मांगोगे भगवान वो आपको देंगे।
महाराज श्री ने कहा कि जहां भगवान की कथा होती है वहां सभी तीर्थ वास करते हैं। इसिलिए जब भी कथा मंडप में जाएं जो जैसे मंदिर की सीढियों को प्रणाम करते हैं वैसे ही प्रणाम कर लेना चाहिए।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत भागवत के प्रथम श्लोक सच्चिदानन्दरूपाय विश्वोत्पत्त्यादिहेतवे। तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुम: के उच्चारण के साथ की। महाराज श्री ने कहा कि भगवान का स्वरूप कैसा है ? सतघन, चितघन, आनन्द, ऐसे भगवान सच्चिदानंद स्वरूप, समस्त विश्व का पालन पोषण सृजन करने वाले तीनो के जो हेतु हैं तथा जिनके पावन चरण ग्रहण करने पर जीव का त्रापत्य समाप्त हो जाता है, ऐसे गोविंद को हम सब मिलकर बारम्बार नमन करते हैं, प्रणाम करते हैं।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की प्रारम्भ में यह की भागवत का महात्यम क्या है ? एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। इस सांसारिक जीवन में जो कुछ भी प्राप्त किये हो सब किराए के मकान की तरह है। खाली करना ही पड़ेगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

5Dec 2019

“जीवन में सबसे अनमोल रत्न है मधुर वाणी” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

“जीवन में सबसे अनमोल रत्न है मधुर वाणी”

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति आगरा के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 29 से 5 दिसम्बर 2019 तक नवीन गल्ला मंडी स्थल NH-2 फिरोजाबाद रोड आगरा, उत्तर प्रदेश में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया गया।

कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

आज कथा पंडाल में पूर्व मंत्री श्री राजा महेंद्र अरिदमन सिंह जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थित दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।


पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन " मेरे गिनियों न अपराध लाडली श्री राधे " श्रवण कराया ।


पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान ने बड़ी कृपा करके हमे मानव जीवन दिया है। इस संसार में मानव जीवन मिल भी गया है, इस संसार में हमे जो भी यश मिलता है, मान सम्मान मिलता है वो सभी ठाकुर की कृपा से मिलता है। कुछ लोग मान लेते हैं और कुछ लोग नहीं मानते। लेकिन हम और आप सभी आस्तिक लोग हैं, आस्थावान लोग हैं, हम सभी को यह बात मान लेनी चाहिए कि ठाकुर की कृपा के बगैर यह संभव नहीं है।

 

महाराज श्री ने कहा कि बहुत से लोग यह कहते हैं या भटके हुए लोग यह कहते हैं कि जीवन के अंतिम पड़ाव यानि वृद्धावस्था में हम करेंगे ही क्या ? भगवान का नाम ही तो जपना है। कुछ ओर तो करने को बचेगा नही, अभी तो हमारी खाने कमाने की उम्र है, अभी तो हमें धन कमाने दो, जब हम वृद्ध हो जाएंगे तब हम भगवान का भजन किया करेंगे। लेकिन कभी सोचा है आपने जिस समय जीव की वृद्ध अवस्था होती है वो रोग ग्रसित हो जाता है, वात पित्त उसका साथ नहीं देता है, रात को वो चैन से सो नहीं सकता, उस कठिन परिस्थिति में अगर जीव ये कहे कि मैं अंतिम समय पर भगवान का नाम लूंगा तो वो मुर्खता कर रहा है। पहले तो हमे यही नहीं पता की हमारा अंतिम समय कब आएगा। ये कहना की मैं बुढ़ापे में करूंगा तो बुढ़ापे तक जिंदा रहने की कोई गारंटी है। कोई कह सकता है कि मुझे बुढ़ापे तक कुछ नहीं होगा, कोई नहीं कह सकता क्योंकि कोई जानता ही नहीं है। ना जाने किसी दिन और कब हमारी मौत आ जाए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

6Dec 2019

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सोलापुर में श्री वेंकटेश्वर देवस्थानम से कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई। इस कलश यात्रा में हजारों की संख्या में माताओं-बहनो और भाई-बंधुओं ने भाग लिया।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सोलापुर में श्री वेंकटेश्वर देवस्थानम से कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई। इस कलश यात्रा में हजारों की संख्या में माताओं-बहनो और भाई-बंधुओं ने भाग लिया। कलश यात्रा ढ़ोल नगाड़े के साथ निकाली गई। हर किसी ने इस अद्भुत यात्रा का आनंद लिया। जहां तक दृष्टि जा रही थी वहाँ तक माताएं-बहने कलश सिर पर लिए दिख रही थी। सोलापुर में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 7 दिसंबर से 14 दिसंबर 2019 तक श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा का सीधा प्रसारण आप आस्था टीवी चैनल पर सायं 4:30 बजे से देख सकते हैं।

|| राधे-राधे बोलना पड़ेगा ||

7Dec 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सोलापुर में 7 से 14 दिसंबर 2019 तक स्थान - स्वर्गीय लिंगराज बालईरय्या वल्याड क्रीडांगड, सोलापुर, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का भव्य आयोजन किया जा रहा है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सोलापुर में 7 से 14 दिसंबर 2019 तक स्थान - स्वर्गीय लिंगराज बालईरय्या वल्याड क्रीडांगड, सोलापुर, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का भव्य आयोजन किया जा रहा है जिसके तहत महाराज श्री प्रातः काल दिल्ली एयरपोर्ट से पुणे के लिए प्रस्थान किया। जहाँ भक्तों एवं विश्व शांति सेवा समिति पुणे के सदस्यों द्वारा पुष्प गुच्छ देकर उनका स्वागत किया। उसके बाद महाराज श्री ने सोलापुर के लिए प्रस्थान किया। जहाँ विश्व शांति सेवा समिति सोलापुर के भक्तों ने पुष्प गुच्छ देकर उनका स्वागत किया। कथा का सीधा प्रसारण आस्था चैनल एवं महाराज श्री के यूट्यूब चैनल "श्री देवकीनंदन ठाकुर जी" को सब्सक्राइब कर के देख सकते हैं।

|| राधे-राधे बोलना पड़ेगा ||

2Dec 2019

“आपका एक दृश्य आपका चरित्र बदल सकता है :पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

“आपका एक दृश्य आपका चरित्र बदल सकता है :पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

“जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है” पूज्यश्री देवकीनंदन ठाकुर जी

“गुरु और धर्म के बिना गति नहीं है।” ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति आगरा के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 29 नवंबर से 05 दिसंबर 2019 तक नवीन गल्ला मंडी स्थल NH-2 फिरोजाबाद रोड़ आगरा ,उत्तर –प्रदेश में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। कथा के चतुर्थ दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

आज कथा पंडाल में आई. ए .एस नगर आगरा से श्री आयुक्त अरुण प्रकाश जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन "दूर नगरी बड़ी दूर नगरी " श्रवण कराया”।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि कई लोगों के समझ में आती है कथा, कई लोगों के समझ नहीं आती है कथा, कईयों के मन भाती है कथा, कईयों के मन लुभाती है कथा, क्या मिलता है कथा सुनने से ? कथा बार श्रवण करली तो, हजार बार श्रवण करली तो बात तो बराबर है। पर सच ये नहीं है जिनके मन बिषयायुक्त हो चुके है उनको कथा में अमृत भी तुक्ष लगता है। जिनका मन कथा में ललायत न रहता हो, आनंदित न रहता हो,बिषयायुक्त जीव जो रहते हो, वो ही लोग यमराज के द्वार पर जाते। यमराज के दूत उनकी बहुत सेवा करते है।

महाराज श्री ने कहा कि अब कथा में मन क्यों नहीं लगता ? एक महात्मा जी जंगल में रहते थे जंगल में तो झरने का ही जल मिलता है। एक जगह गए जल को झरने से लिया और पिया लेकिन जल बहुत कड़वा है। दूसरे झरने की तरफ गये वहां भी जल को पात्र में भरा फिर पिया फिर महात्मा जी बोले अरे राम - राम ये तो उससे भी ज्यादा कड़वा है। फिर महात्मा जी को एक संत जी मिले उन्होंने कहा की आज पता नहीं क्या हो गया। हरे झरने बड़े कड़वे हो गए। संत जी ने कहा ऐसे कैसे हो सकता है हम भी चैक करते है। तो उन्होंने हाथ से अंजुली भर जलपान किया जब जलपान किया तो देखा अरे जल तो बहुत ठंडा है, बड़ा मीठा है , कड़वा नहीं है। तो इस बात सुनकर महात्मा जी बोले अरे ये कैसे हो सकता है मैंने भी तो पिया है। महात्मा जी ने फिर से जल पिया और फिर से उन्हें जल कड़वा लगा। तो अरे राम - राम आप इसको कैसे मीठा कहे सकते हो ये तो बहुत ही ज्यादा कड़वा है। तो संत ने विचार दिया की एक काम करों इस पात्र से तुम जल पी रहे हो इस पात्र को तुम रख दो। हाथ से पियो। महात्मा जी ने बैसा ही किया। जब एक अंजुली जल पिया तो पूरा जल पी गए। अबकी बार महात्मा जी उगला नहीं तो संत जी महात्मा जी से पूछा कैसा है जल तब महात्मा जी ने कहा रुक जाइए पहले पियास भुजा लेने दो। पेट भर के जब जल पीलिया तब महात्मा जी ने पूछा भैया अब तो बता दो जल कैसा था। तब महात्मा जी ने कहां जल बहुत ठंडा, मीठा था। तृप्त हो गए आनंद हो गए बोले कैसे आनंद आ गया अभी तो कहे रहे है थे कड़वा है अब मीठा कैसे हो गया तो ये बात तो समझ में नहीं आई। बोले मेरे समझ में आ गई। जल तो मीठा पहले भी झरने वाले थे ये भी मीठा ही है तेरे पात्र में ही कुछ गलत लगा हुआ है जिससे जल कड़वा लग रहा है जल तो मीठा ही था। इसी जल को तुम इस पात्र से पिया तो आपने कड़वा कहा और जब इसी जल को तुमने हाथ से पिया तो तुमने कहां मीठा है। इसका अभिप्राय क्या है? अभिप्राय बहुत सीधा सा है मेरे प्यारे। जिसके मनरूपी पात्र पर पाप सवार हो गया है उसके लिए कथा कड़वी है, उसके लिए कथा खट्ठी है। उसका मन कथा में नहीं लगता है, उसके लिए कथा में कुछ है ही नहीं। और जिनके मनरूपी पात्र से पाप समाप्त हो चूका है हरि नाम जपने से वो पात्र स्वच्छ हो चूका है। उस पात्र में पतत्रता है। जब बो बैठता है तो हरि नाम कथा अमृतपान करके वो धन्य -धन्य हो उठता है, आनंददित हो उठता है। तो मेरी पात्रता क्या है, मुझे क्या अधिकार मिला है, जिस कथा में ध्रुव का मन लगा, जिस कथा में प्रहलाद का मन लगा, जिस कथा में मीरा का मन लगा, उस कथा में मेरा मन क्यों नहीं लग रहा है ? मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो ना कोई जाके सर मोर-मुकुट, एक बात याद रखना। मेरे जीवन में पूजा पथ क्या है ? पैसा हमारों परमेश्वर, पत्नी हमारी गुरु बेटा हमारों शालिग्राम तो सेवा क्यों करें। पर सच यही है धर्म के बिना गति नहीं है।

महाराज श्री ने कहा कि कौन - कौन सुख पाना चाहते है? अगर सुख पाना चाहते हो तो कभी पता किया है सुख मिलता कहा है ? कथा पंडाल में ही सच्चा सुख मिलता है। सच्चा सुख कथा पंडाल में भगवान की कथा सुनकर ही प्राप्त होता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।

महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।

शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।

बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।

इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।

इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।

महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।

महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।

उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।

महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"

जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।
दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।

महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"

भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।

इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

3Dec 2019

कुछ भी अच्छा करना है तो अब से करो कल तो काल का है। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

कुछ भी अच्छा करना है तो अब से करो कल तो काल का है। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

दिल और दिमाग को समझने वाला ग्रन्थ है भागवत - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति आगरा के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 29 नवंबर से 05 दिसंबर 2019 तक नवीन गल्ला मंडी स्थल NH-2 फिरोजाबाद रोड़ आगरा ,उत्तर –प्रदेश में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।
श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के पंचम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन " जगत सब छोड़ दिया सांवरे तेरे पीछे "श्रवण कराया”।

आज कथा पंडाल में सिटी मजिस्ट्रेट श्री अरुण कुमार जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

 


पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि यहाँ कथा करने का मतलब ये है वृन्दावन से आप लोगो का सम्बन्ध जोड़ना। ये कथा ही सफल तब है जब तुम्हारा सम्बन्ध ठाकुर जी से जुड़ जाएं। ये कथा को सफल होने का प्रणाम है। महाराज जी कहा की आप लोग याद करों जिसे कृष्ण जी से सच्चा प्यार हो जाये उसे पद - प्रतिष्ठा और धन की याद नहीं आएं। लेकिन जब कृष्ण की भक्ति सर चढ़ कर बोलेगी तो पद प्रतिष्ठा को महो नहीं रहता सिर्फ कृष्ण - कृष्ण बोला करें। और महाराज जी कहा की कृष्ण भक्ति ही वो है दुनिया को भुला दे और कृष्ण में लगा दें। मत सोचो दुनिया क्या कहे गई। सोचना बस ये की मेरा कन्हैया क्या है। महाराज जी कहा की जो लोग ये कहते है हम बुढ़ापे में भजन करेंगे तो बुढ़ापे में इतनी बीमारिया लग जाती है हमारा कफ आकर गले में अटक जाता है। स्थिति नाजुक हो जाती है बीमारिया हजार आक्रमण कर देती है। तब तुम्हे भगवान की याद कैसे आएगी। आएगी की नहीं ? बोले क्या करें जिस दिन अकल का दाना खुल जाएँ उसी दिन से ठाकुर जी का नाम लेना प्रारम्भ कर दो। कल नाम “काल” का है आज ही सत्य है जो करना आज ही, अभी करों।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है। भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए। अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है। श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

 

4Dec 2019

“जो जीव श्रीमद्भागवत मन से सुनते हैं उनके जन्म जन्मांतर की प्यास हमेशा के लिए तृप्त हो जाती है” : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

“जो जीव श्रीमद्भागवत मन से सुनते हैं उनके जन्म जन्मांतर की प्यास हमेशा के लिए तृप्त हो जाती है” : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

अगर वेद, पुराण, भागवत, ऋषिवाणी, भगवत प्रवचन सत्य है तो वो यक्ति कभी खाली हाथ नहीं जायेगा। : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति आगरा के तत्वाधान में पंडित श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 29 नवंबर से 05 दिसंबर 2019 तक नवीन गल्ला मंडी स्थल NH-2 फिरोजाबाद रोड़ आगरा ,उत्तर –प्रदेश में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
आज कथा पंडाल में युवा मोर्चा बीजेपी जिला महामंत्री राजन गुप्ता जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

 


पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत कहा कि कुछ ऐसी कमाई कर लो जो संग जा सके, मुश्किल पड़े तो रहा में भी काम आ सके। जेब में पैसे हो तो यात्रा में कितने भी मुश्किलें हो आप परेशान नहीं होंगे तब आप हैंडल कर सकते है। जब जेब में पैसे ही न हो तो व्यवस्था - व्यवस्था में बदल जाती है। महाराज जी ने कथा क्रम आगे बढ़ाते हुए कहा की एक नगर में वहां का एक राजा सिर्फ एक साल रहता था जब उसकी साल पूरी हो जाती थी। तो उस राज्य के सेवक - मंत्री इत्यादि उसे गद्दी से उतारते और एक घने जंगलों में जो मिलों फैला हुआ था। उस घने जंगल उसे छोड़कर आ जातें थे। और वहां पर बड़े जंगली जानवर रहते थे। या वो उसे खा जातें या फिर भूक प्यास के खातिर ऐसे ही मर जाता था। कहने का मतलब था एक साल का ही सुख था। बाकि की तो जिंदगी बेकार ही थी। उस राज्य का ये नियम भी था। एक ही साल रहेगा एक ही राजा। ऐसे ही नियम चलता रहा एक दिन बात है एक परायें नगर से एक युवा व्यक्ति था समझदार, बुद्धिमान था। तो वो बुद्धिमान भाव उस नगर में प्रवेश किये तो राजा अपने मन से तो बनेगा नहीं। तो जो नगर में पहले प्रवेश करता था उसे राजा बना दिया जाता था। जैसे राजा का कार्य हो गया उसे छोड़ आएं। उसके बाद पहला व्यक्ति जो नगर में पहले प्रवेश करेगा वही राजा बना दिया जाता था उस व्यक्ति को पता नहीं था उसने उस नगर में प्रवेश का लिया। सब लोग मंत्री एकत्रित हो गए। बड़े खुश हुए राजा मिल गया राजा मिल गया । और वो भी बड़ा खुश हुआ। की मैं राजा बन गया। उस मानभाव को तो पता नहीं था पीछे तो कुछ और था। जैसे ही गद्दी पर बैठे झट मंत्रियों ने नियम बताएं और कहा इस राज्य में यह - यह एक साल ही तक रहोगें उसके बाद जंगल में छोड़ दिया जायेगा। वह जो भी आपका हमें उससे कोई मतलब नहीं। राजा परेशान हो गया बड़ा खुश था जब गद्दी पर बैठा गद्दी पर बैठते ही नियम सुने हो परेशान हो गया। इससे तो हम पहले ही बड़िया थे। कम से कम मरने का दुःख तो नहीं था। अब तो एक साल बाद मरना ही पड़ेगा। तो उसने रात भर सोचा तो उसने बुध्दि लगाई उसने बोले भाई ठीक है एक साल तो हम ही है न राजा यहाँ वही होगा जो हम आज्ञा करेंगे। एक दम सब करेंगे जो आप कहेंगे तो बुद्धिमान ने कहा की चलो हम जंगल की शहर करने चल रहे है। उसी जंगल की तो सभी मंत्री - सेवक सभी कहने लगे किसी और दिन चलेंगे। तो राजा ने कहा की हम देखना चाहते है वो जंगल कैसा है। बोले ठीक है महाराज उन्हें लेकर गए। बो देख दाख आ गया। सारा निरक्षण करके आ गए। समझ में आ गया यहाँ मरे बिना पीछा नहीं छूटेगा यहाँ तो मरना ही पड़ेगा। तो उसने अपनी बुद्धि लगाई और बुध्दि लगा कर अपने उन मंत्रियों को बुलाकर आया और बोला सुनो 6 महीने के भीतर- भीतर जैसा ये महल है न उस जंगल को भी बैसा ही बनाओ। और अभी से यहां इस महल से लेकर उस महल तक की सड़क बनवाओ। दोनों सड़क मिलती झूलती हो। कहते है न बलि का बकरा बना रही है। गलती सड़क की नहीं है गलती चालकों की है। सड़क तो बहुत अच्छी बानी है चालक ख़राब है बिना सोचे समझे स्पीड से चलाओगे। और कण्ट्रोल करना आपको नहीं आएगा तो फिर सेल्फी के चक्कर में वीडियो के चक्कर, उसी जंगल में एक बगीचा बनवाओ पूरी व्यवस्था करवाओं। 6 महीने में हो जाना चाइये बोले हो गया महाराज। राजा ने आज्ञा करी सब लोग व्यवस्था में लग गए। एक साल पूरी हुई राजा जाने को तैयार। राजा बोले चलो। तब मंत्रियों ने कहा अब आप कही नहीं जायेंगे। तब राजा ने कहा एक साल में हम उन मूर्खो को छोड़के आते थे। बुध्दि जीवियों को नहीं। जैसे आपको बताया गया एक साल बाद उधर फेक दिया जायेगा। बैसे ही उस सभी को बताया गया लेकिन उसके बाबजूद भी खाने - पीने सोने में ही लगे रहे। एक दूसरे के साथ नाचने में ही लगे रहे। आप धन्य है जो आपने अपनी व्यवस्था पहले ही दिन कर प्रारम्भ कर दिया। आप ग्रेट हो। आप जैसे बुध्दि जीवी की जंगल में नहीं यहाँ की आवश्यकता है।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।

1Dec 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति मुंबई के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 15 से 22 दिसंबर 2019 बाला साहेब ठाकरे मैदान, इंद्रलोक,फेज-3, भायंदर ईस्ट में होने वाली विशाल श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों को लेकर आज विश्व शांति सेवा समिति मुम्बई के लोगो ने और विश्व शांति मिशन के सचिव श्री विजय शर्माजी ने समिति, कार्यकर्ता एवं शिष्य परिवार के साथ शाम 3 बजे से एस.एम.पब्लिक स्कूल, नगरपालिका के सामने, तलाव रोड, भायंदर ईस्ट में मीटिंग की।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति मुंबई के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 15 से 22 दिसंबर 2019 बाला साहेब ठाकरे मैदान, इंद्रलोक,फेज-3, भायंदर ईस्ट में होने वाली विशाल श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों को लेकर आज विश्व शांति सेवा समिति मुम्बई के लोगो ने और विश्व शांति मिशन के सचिव श्री विजय शर्माजी ने समिति, कार्यकर्ता एवं शिष्य परिवार के साथ शाम 3 बजे से एस.एम.पब्लिक स्कूल, नगरपालिका के सामने, तलाव रोड, भायंदर ईस्ट में मीटिंग की। इसमे कथा की तैयारी एवं प्रचार - प्रसार , पंडाल की तैयारी, एवं आयोजक समिति की जिम्मेदारियां लोगो को दी गई। विश्व शांति मिशन के सचिव श्री विजय शर्माजी ने कहाँ कि शिष्य परिवार के अलावा जो भी इस कथा से जुड़ना चाहे वो उन्हें भी कथा की तैयारियों जिम्मेदारियां दी जायेंगी। गौरतलब है कि पिछले 2 साल से पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज द्वारा श्रीमद भागवत का रस पान बालासाहेब ठाकरे मैदान,भायंदर पर करवाया जा रहा है इसमे हज़ारों की संख्या में लोग कथा का आनंद लेते है।

1Dec 2019

"दोनों हाथो की सेवा है कीर्तन में ताली : पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज "

"विनाश नहीं विकास का जो मार्गदर्शन है वो सनातनियों ने ही दिया है” : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

"धन इत्यादि के मद में ईश्वर को भूल जाते है। : ठाकुर जी महाराज "

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति आगरा के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 29 नवंबर से 05 दिसंबर 2019 तक नवीन गल्ला मंडी स्थल NH-2 फिरोजाबाद रोड़ आगरा ,उत्तर –प्रदेश में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।कथा के तृतीय दिवस हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
आज कथा पंडाल में बीजेपी विधायक श्रीमति हेमलता दिवाकर जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन "जब सुरत देखू मोहन की " श्रवण कराया”।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि जितने भी युवा जीवन में सफलता चाहते हैं तो आप सभी को अपने सनातन धर्म का आदर करना आना चाहिए। हम और आप सभी धर्म का आदर करेंगे तभी हमारे आने वाले बच्चे हमारी परम्पराओं से अवगत होएगें और वो इस परम्परा पर चल सकेंगे। ये तमाशा नहीं ये भगवान की कथा है। और भगवान की कथा अच्छे श्रोता बनके सुननी चाहिए। खड़े होके तमाशा नहीं बनना चाहिए। सर्वजीव का मंगल होए ऐसी प्रार्थना करें। सर्वजीव प्रसन्न होए ऐसी प्रार्थना करें, विश्व के लिए प्रार्थना करें, सभी लोगों का चित ईश्वर में लगा रहे इस के लिए प्रार्थना करें, सभी लोग सदमार्ग के गामी हो इसलिए प्रार्थना करें और सभी लोगो को मानव जीवन का उद्देश्य प्राप्त हो इसलिए प्रार्थना करें।

महाराज श्री ने कहा कि कितनी अच्छी बात कही है अपने बच्चो को हम सिखाएं सर्वप्रथम पृथ्वी माँ को बंधन करें और अपने माँ - पिता को बंधन करें। क्यों की वो एक माँ है वो जानती है की अपनी माँ को कैसे संस्कार देने चाहिए हर माँ दायित्व बनता है की बच्चो को संस्कार कैसे देने चाहिए। जब जीव प्रार्थना करता है तो निश्चित उसे लगता की भगवान मुझे सुन रहा है मुझे देख रहे है। जब जीव पाप करता है तब उसे भगवान की याद भी नहीं आती तब उसको ये भी नहीं लगता भगवान मुझे देख रहा है। एक वही जीव है, पुण्य करते समय, मंदिर जातें समय, कथा श्रवण करते समय, प्रार्थना करते समय मानता है की भगवान मुझे देख रहा है। वो जरूर सुनेगा मेरी लेकिन जब पाप करता है तो फिर उसे भगवान की याद नहीं आती फिर उसे ये नहीं लगता भगवान उसे देख रहा फिर तो लगता की में ही स्वतंत्र हूँ। पर ऐसा नहीं जो आप की प्रार्थना के समय देखता सुनता है वो आपको पाप के समय भी देखता रहता है। उसकी दृष्टि कभी बंद नहीं होती वो तुम्हे देख रहा है। जहाँ भी आप है वो वहां तुम्हे देख रहा। आपको जो भी करना समझदारी के साथ करना है। निश्चित पाप अगर कर रहे हो तो उसका प्राश्चित आप ही करना होगा।

महाराज श्री ने कहा कि जीवन से सम्बंधित प्रश्न हम संत महात्माओं से करते हैं लेकिन एक प्रश्न मृत्यु से सम्बंधित नहीं करते जबकि जीवन झूठा मृत्य सत्य है और सत्य के विषय में कोई प्रश्न नहीं किया जाता। जीवन में एक कर्म अपने लिए किया जाता है, एक कर्म सबके लिए किया जाता है। जो परोपकार के लिए कर्म किया जाता है वो सर्वश्रेष्ठ कर्म कहा जाता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।

तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।

2Dec 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति नागपुर के तत्वावधान पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी के सानिध्य में श्रीमद्भागवत कथा का विशाल आयोजन 2 से 8 जनवरी 2020 तक स्थान - रेशम बाग मैदान, नागपुर में किया जाएगा।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति नागपुर के तत्वावधान पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी के सानिध्य में श्रीमद्भागवत कथा का विशाल आयोजन 2 से 8 जनवरी 2020 तक स्थान - रेशम बाग मैदान, नागपुर में किया जाएगा। श्रीमद्भागवत कथा की तैयारियों के लिए आज ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी एवं समिति के सदस्यों, भक्तों के साथ मीटिंग की गई। यहाँ पर संस्था के कार्यालय का उद्घाटन भी किया गया। अब नागपुर वासी संस्था से जुड़ी या श्रीमद भागवत कथा की सभी जानकारी इस कार्यालय से प्राप्त कर सकते है। नागपुर में कथा से पूर्व भव्य कलश यात्रा निकाली जाएंगी। आप सभी भक्तगण, भागवत कृपा प्राप्त करने और कथा को अपने जीवन में उतारने के लिए ज्यादा से ज्यादा संख्या में पधाकर पुण्य के भागीदार बने।

29Nov 2019

आगरा में परम पूज्य शांतिदूत धर्मरत्न श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में श्रीमद्भागवत का भव्य आयोजन किया जा रहा है।

आगरा में परम पूज्य शांतिदूत धर्मरत्न श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में श्रीमद्भागवत का भव्य आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद भागवत कथा 29 नवंबर से 05 दिसंबर 2019 तक नवीन गल्ला मंडी स्थल NH-2 फिरोजाबाद रोड़ आगरा ,उत्तर -प्रदेश में किया जाएगा। आज आगरा में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा से पूर्व भव्य मंगल कलश यात्रा निकाली गई। जहां अनगिनत माताओं बहनों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। कलश यात्रा में जहां तक नज़र जा रही थी वहां तक माताएं-बहनें नज़र आ रहीं थी। इस यात्रा में ढोल-नगाड़े, इत्यादि के साथ सुंदर सुंदर झांकिया भी निकाली गई। कलश यात्रा जिन मार्गों से होकर गुजरी,वहां इस भव्य यात्रा को देखने के लिये लोग थम गए।
 

29Nov 2019

श्रीमद भागवत जो की कलिकाल के समस्त पापों का नाश करने वाली है। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

भगवान आपके कर्मों से ही प्रसन्न होते हैं” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

जीवन में सुख पाने का एक ही मार्ग है ठाकुर जी : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति आगरा के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य 29 नवंबर से 05 दिसंबर 2019 तक नवीन गल्ला मंडी स्थल NH-2 फिरोजाबाद रोड़ आगरा ,उत्तर –प्रदेश में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के प्रथम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया । प्रथम दिवस के कथा की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन "हरि का भजन करो हरि है तुम्हारा" श्रवण कराया”।

आज कथा पंडाल में विधानसभा क्षेत्र से विधायक श्री रामप्रताप सिंह जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि "मानव धर्म क्या सिखाता है ? मानव धर्म ये नहीं की 24 घंटे खाओ - कमाओ अपने बच्चे को पालों, और आओ सो जाओ और दुनिया से चले जाओ ये मानव धर्म नहीं इसके अलावा भी बहुत कुछ है जो हम नहीं करते, जो हमें करना वो क्या है, "दीन दुखियों पर दया करों बने तो सेवा भी करों" महो सब दूर करों, प्रेम हरि ही से करों यही हरि भक्ति युग,यही ज्ञान धारा। यही मानव धर्म है।

महाराज श्री ने कहा कि जितने नियम और मर्यादा के साथ आप कथा श्रवण करेंगे उतना ही लाभ आपको अधिक मिलेगा। ये निर्भर है आप सबके ऊपर और कहा की जो जितनी श्रद्धा के साथ कथा श्रवण करेंगे उसको उतनी जल्दी फल की प्राप्ति होगी। श्रीमद भागवत जो की कलिकाल के समस्त पापों का नाश करने वाली है। निश्चित तौर पर कृष्ण का प्रेम प्रदान करने वाली है। उस भागवत के शरण हम और आप विराजमान है।

 

महाराज श्री ने कहा कि जिनको ठाकुर का स्पोर्ट चाहिए वो क्या मंदिर नहीं जा सकते। जिन्हे अगर सच्चा गोविन्द का प्रेम और स्नेह चाहिए वो लोग तो विदेशों में भी कथा सुनने चले जाते है जिन्हे सच्ची चाहा है वो कही भी चले जाते है और जिन्हे चाहा नही है वो घर के बाहर कथा होती रहे वो वहां भी नही जाते।

महाराज श्री ने कहा कि भागवत सम्पूर्ण भक्तों का सरल ग्रंथ है जो सोवत है वो खोवत है जो जागत है वही पावत है दो ही विकल्प है या तो अपने इस जीवन को जबरदस्त बर्बाद कर लो। या इतना अवाद कर लो फिर मरना ही न पड़े यही सिखाती है , यही समझती है भागवत कथा। जिस भागवत के शरण में होने के बाद निश्चित तौर पर फल एक जैसा सबको नहीं मिलता। "भागवत हमें वो सब देती है जो हम चाहते है लेकिन सत्य ये है की सबको एक जैसा नहीं देती जो जैसे श्रद्धा रखता है वो बैसा ही फल पाता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

29Nov 2019

श्रीमद भागवत जो की कलिकाल के समस्त पापों का नाश करने वाली है। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

भगवान आपके कर्मों से ही प्रसन्न होते हैं” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

जीवन में सुख पाने का एक ही मार्ग है ठाकुर जी : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति आगरा के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य 29 नवंबर से 05 दिसंबर 2019 तक नवीन गल्ला मंडी स्थल NH-2 फिरोजाबाद रोड़ आगरा ,उत्तर –प्रदेश में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के प्रथम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया । प्रथम दिवस के कथा की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन "हरि का भजन करो हरि है तुम्हारा" श्रवण कराया”।

आज कथा पंडाल में विधानसभा क्षेत्र से विधायक श्री रामप्रताप सिंह जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि "मानव धर्म क्या सिखाता है ? मानव धर्म ये नहीं की 24 घंटे खाओ - कमाओ अपने बच्चे को पालों, और आओ सो जाओ और दुनिया से चले जाओ ये मानव धर्म नहीं इसके अलावा भी बहुत कुछ है जो हम नहीं करते, जो हमें करना वो क्या है, "दीन दुखियों पर दया करों बने तो सेवा भी करों" महो सब दूर करों, प्रेम हरि ही से करों यही हरि भक्ति युग,यही ज्ञान धारा। यही मानव धर्म है।

महाराज श्री ने कहा कि जितने नियम और मर्यादा के साथ आप कथा श्रवण करेंगे उतना ही लाभ आपको अधिक मिलेगा। ये निर्भर है आप सबके ऊपर और कहा की जो जितनी श्रद्धा के साथ कथा श्रवण करेंगे उसको उतनी जल्दी फल की प्राप्ति होगी। श्रीमद भागवत जो की कलिकाल के समस्त पापों का नाश करने वाली है। निश्चित तौर पर कृष्ण का प्रेम प्रदान करने वाली है। उस भागवत के शरण हम और आप विराजमान है।

 

महाराज श्री ने कहा कि जिनको ठाकुर का स्पोर्ट चाहिए वो क्या मंदिर नहीं जा सकते। जिन्हे अगर सच्चा गोविन्द का प्रेम और स्नेह चाहिए वो लोग तो विदेशों में भी कथा सुनने चले जाते है जिन्हे सच्ची चाहा है वो कही भी चले जाते है और जिन्हे चाहा नही है वो घर के बाहर कथा होती रहे वो वहां भी नही जाते।

महाराज श्री ने कहा कि भागवत सम्पूर्ण भक्तों का सरल ग्रंथ है जो सोवत है वो खोवत है जो जागत है वही पावत है दो ही विकल्प है या तो अपने इस जीवन को जबरदस्त बर्बाद कर लो। या इतना अवाद कर लो फिर मरना ही न पड़े यही सिखाती है , यही समझती है भागवत कथा। जिस भागवत के शरण में होने के बाद निश्चित तौर पर फल एक जैसा सबको नहीं मिलता। "भागवत हमें वो सब देती है जो हम चाहते है लेकिन सत्य ये है की सबको एक जैसा नहीं देती जो जैसे श्रद्धा रखता है वो बैसा ही फल पाता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

30Dec 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्त्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के श्रीमुख से 15 से 22 दिसंबर 2019 बाला साहेब ठाकरे मैदान, इंद्रलोक,फेज-3, भायंदर ईस्ट में होने वाली विशाल श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों को लेकर आज विश्व शांति मिशन के सचिव श्री विजय शर्मा जी मुम्बई एयरपोर्ट पहुँचे, जहाँ विश्व शांति सेवा समिति मुम्बई के भक्तों ने पुष्प गुच्छ देकर उनका स्वागत किया।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्त्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के श्रीमुख से 15 से 22 दिसंबर 2019 बाला साहेब ठाकरे मैदान, इंद्रलोक,फेज-3, भायंदर ईस्ट में होने वाली विशाल श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों को लेकर आज विश्व शांति मिशन के सचिव श्री विजय शर्मा जी मुम्बई एयरपोर्ट पहुँचे, जहाँ विश्व शांति सेवा समिति मुम्बई के भक्तों ने पुष्प गुच्छ देकर उनका स्वागत किया। कथा की तैयारियों के लिए कल 3 बजे से एस.एम.पब्लिक स्कूल, नगरपालिका के सामने, तलाव रोड, भायंदर ईस्ट में मीटिंग रखी गई है। इसमें कथा की तैयारी एवं प्रचार-प्रसार, पंडाल की तैयारी एवं आयोजक समिति की जिम्मेदारियां के सम्बंधित चर्चा की जायेगी। 

30Nov 2019

“जीवन पूरा हो जाता है, कामनाएं पूरी नहीं होती : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

"निश्चित हम सभी के जीवन में तमाम संकटों को हरण करने वाली श्री किशोरी जी है। : ठाकुर जी महाराज

"ये भागवत जिज्ञासुओं का ग्रन्थ है" पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति आगरा के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 29 नवंबर से 05 दिसंबर 2019 तक नवीन गल्ला मंडी स्थल NH-2 फिरोजाबाद रोड़ आगरा ,उत्तर –प्रदेश में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया गया। कथा के द्वितीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई।

आज कथा पंडाल में पूर्व मंत्री आगरा सांसद श्री एस० पी० सिंह बघेल जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि श्रीमद भागवत कथा के प्रारम्भ में हम कीर्तन इस लिए करते है जिससे हमारा मन फिर सत्संग में लग जाएँ, कथा में लग जाएँ। "निश्चित हम सभी के जीवन में तमाम संकटों को हरण करने वाली श्री किशोरी जी है।" श्रद्धा से किशोरी जी के नाम को पुकारें , जिससे हमारे भी सब संकट दूर हो जाये। किसी को संसार का वैद्य मिल जाता है किसी को संसार बनाने वाला वैद्य मिल जाता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन "तेरे संकट हरेगी भेली रे वृषभानु की लल्ली " श्रवण कराया”।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जीवन में भगवत संबंधी कुछ प्रश्न हमें अपने आप से करने चाहिए। निश्चित तौर पर जब तक ये संसार रहेगा का हमे चैन नहीं लेने देगा । अगर हम ये सोचे की काम से फ्री होकर हम भक्ति करेंगे, तो ये सोचिए की काम पूरे ही कब होते हैं। ये कामनाए ही हैं जो कभी पूरी नहीं होती, जीवन पूरा हो जाता है।

महाराज श्री ने आगे कहा कि मानव योनि में जन्म लेने के बाद, मनुष्य बनने के बाद जिस व्यक्ति ने धर्म को जानने की कोशिश नहीं की, अपने आप को जानने की कोशिश नहीं की, जन्म लेना न लेना, संसार में आना या न आना बराबर ही है। धन्य वही है, वही धन्य बाद के पात्र है जिन्होंने मनुष्य जीवन प्राप्त करने के बाद अपने आप को और ईश्वर को धर्म को जानने की कोशिश की । ये भागवत जिज्ञासुओं का ग्रन्थ है। इसका प्रारम्भिक करण ही प्रश्न से होता है। उत्तर देने से ज्यादा अच्छा है प्रश्न करना ? क्यों की प्रश्न जब आप करते हो तो ये पता चलता है की आपके अंदर जिज्ञासा है आप कुछ जानना चाहते हो। और अगर जानने का विषय भी अच्छा हो, क्यों की आप जानना तो बहुत कुछ चाहते हो किसी की रूचि, भोजन बनाने में, किसी की रूचि कमाने में, किसी की व्यापार को आगे बढ़ाने में है, लेकिन बहुत अच्छे लोग है ईश्वर से कैसे मिला जाये, जिसके अंदर ये जानने की रूचि है वही रूचि वही जिज्ञासा, वो जिज्ञासा सर्वश्रेठ जिज्ञासा है। गोविन्द से कैसे मिले कोई हमें बतादे अगर ये मानव जीवन यहाँ से चले गयो तो ये अवसर दुबारा नहीं मिलेगा। हे गोविन्द, हे ऋषि मुनि, हे गुरु देव, हे तीर्थो जो भी याद आये जिसकी शरण में जाये मात्र एक ही प्रश्न की मैं गोविन्द से मिलूं कैसे। यही प्रश्न सबसे बढ़िया है ये सर्वश्रेठ जिज्ञासा जिनके अंदर है उनको अपनी वह जिज्ञासा को जीवित रखना चाहिए। इस प्रश्न अच्छा संसार में कोई भी प्रश्न नहीं है। ये जिज्ञासा गजब की है अथातु उस ब्रह्म को जानने के लिए ऋषियों ने, सनकादिक ऋषियों ने नैमिषारण्य में , सूत जी महाराज से यही तो प्रश्न किया। ये प्रश्न सनकादिक ऋषियों का है "प्राणी मात्र का पहला ही प्रश्न कितना महत्पूर्ण है, " इसको कहते है संत हृदय। स्वार्थी व्यक्ति हमेशा अपने बारें सोचता है की मेरा भला कैसे हो मैं क्या करूँ में कहा जाऊं ? स्वार्थी व्यक्ति सिर्फ अपने बिषय में सोचता है लेकिन ऋषि मुनि परोपकारी लोग कभी अपने बारें में नहीं सोचते बल्कि समाज, देश, प्राणियों, संस्था के बिषय में सबसे पहले सोचते है। उनकी नजर में हम कुछ नहीं और स्वार्थी लोगो की नजर में देश, समाज, धर्म कोई कुछ नहीं है। लेकिन ऋषि मुनि परोपकारी लोगों की नजरों ये जीवन का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।

महाराज श्री ने आगे कहा कि आज के मानव के सबसे बड़े दुःख का कारण क्या है ? मुझे लगता है सबसे बड़े दुःख का कारण है स्वार्थी व्यक्ति है । आप लोग मानष तो पढते हो। मानष में इसका प्रणाम है, स्वार्थी व्यक्ति कभी प्रसन्न नहीं रहे सकता। चाहे तुम उसे कुछ भी बना दो ,वो लोग कभी भी खुश नहीं रहे सकते। रामायण में लिखा है की जो परोपकारी व्यक्ति होते है वो कभी दुखी नहीं रहते है। स्वार्थी व्यक्ति होते वो कभी खुश नहीं रहते।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं।
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।

27Nov 2019

“जीवन में सबसे अनमोल रत्न है मधुर वाणी” : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति पटना के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 नवंबर 2019 तक गर्दनीबाग, संजय गांधी स्टेडियम पटना में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया गया।

कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

आज कथा पंडाल में बिहार सरकार में कृषि मंत्री श्री प्रेम कुमार जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थित दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जीवन बहुमुल्य रत्न है, व्यक्ति बहुत सारी चीजों के पीछे पड़ा है। इस ब्रह्माण्ड में सबसे बहुमुल्य कुछ है तो वो तीन चीजे हैं। सर्वप्रथम जल, द्वितीय जल और तृतीय मीठी वाणी। लोग सिर्फ महंगे पत्थरों को ही रत्न मान बैठते हैं, कागज के टुकडों को बहुत बड़ा धन मान बैठते हैं। लेकिन जल के बिना, अन्न के बिना जीवन है क्या ? और तुम्हारे पास सबकुछ हो और फिर भी कोई तुमसे मधुर ना बोलता हो तो क्या करोगे इन सब का ? आप अपने जीवन में अपने बच्चों को सिखाइए अगर तुम्हे प्रयाप्त जल और अन्न प्राप्त कर सको इतना धन तुम्हारे पास है तो सबसे अनमोल रत्न मीठी वाणी आप बनाइए, खुद भी सुखी होइए और दूसरों को भी सुखी बनाइए।

महाराज श्री ने कहा कि संसार मे दो प्रकार के प्राणी होते हैं, एक जो किसी की बात मानते हैं और एक जो किसी की भी बात नहीं मानते । जो किसी की भी नहीं मानते उनका तो भगवान जाने, लेकिन जो किसी की अच्छी बातों का अनुसरण करते हैं निश्चित वो अपने जीवन में बहुत कुछ प्राप्त कर सकते हैं। आपको अपने माता-पिता, सास-ससुर, गुरूजनों की बात को मानना चाहिए। जब हम इनकी बात मानते हैं तो निश्चित हमारा जीवन एक सुखद मार्ग की ओर चलता है।

महाराज श्री ने आगे कहा कि आप भले ही कितने बड़े क्यों ना हो लेकिन कही भी जाओ तो छोटे बनकर जाओ। आप जितने छोटे बनकर जाओगे उतने सुखी रहोगे, उतना ही आपको प्राप्ति होगी। मंदिर में जाएं, कथा सुनने आएं, तीर्थ में जाएं तो छोटे बनकर जाएं, एकदम विनम्र बनकर जाएं फिर देखिए उसका कितना लाभ आपको प्राप्त होगा, आप इसे अपने जीवन में अनुभव करेंगे।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

25Nov 2019

“रास को श्रवण करने के लिए दिमाग की नहीं ह्रदय की आवश्यकता पड़ती है” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति पटना के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 नवंबर 2019 तक गर्दनीबाग, संजय गांधी स्टेडियम पटना में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।

श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

आज कथा पंडाल में बिहार सरकार में सहकारिता मंत्री श्री राणा रणधीर सिंह जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। उन्हें संस्था की ओर से स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

 

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि सुमती और कुमती सबके भीतर रहती है, ये कोई बड़ी बात नहीं है। अच्छे और बुरे विचार दोनों हमारे भीतर ही हैं लेकिन किसको हम प्रकट करना चाहें यह हम पर निर्भर करता है। हम किसको अपना साथी बनाना चाहते हैं अच्छे विचारों को या बुरे विचारों को। जहां सुमती होती है वहां सब सुख है, वहां परमानंद है, वहां परमात्मा मौजूद है और जहां कुमती हैं वहां विपत्ती आएंगी ही आएंगी। जो धर्म की राह पर चले वो सुमती और जो अधर्म का मार्ग पकड़े वो कुमती। जो सुमती और कुमती आपके संग से मिलती है। आपको अच्छा संग मिलेगा तो सुमती मिलेगी और बुरा संग मिलेगा तो कुमती मिलेगी।

महाराज श्री ने कहा कि जीवन की सफलता यह नहीं है की आप बहुत धनवान होकर अपने ही शरीर की पुष्टी करते रहें। शरीर की उपलब्धता यह है की जो भी तुम्हे प्राप्त है वो परमात्मा को समर्पित ना किया जाए तो वह सब व्यर्थ है, उसका होना ना होना बराबर ही है।

महाराज श्री ने की रास के बारे में बताते हुए कहा कि रास को श्रवण करने के लिए दिमाग की नहीं ह्रदय की आवश्यकता पड़ती है। अगर भगवान के इस रास में अकेले दिमाग का इस्तेमाल करेंगे सुनने में तो आपको इस रास में भगवान पर संदेह हो जाएगा और अगर आपको भगवान पर संदेह हो गया तो आपको नरकगामी बनना पड़ेगा। भगवान की ये रासलीला बड़ी उत्तम है, श्रेष्ठ है. बडे बड़े ऋषि भी इस रास को सुनकर ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।

23Nov 2019

“भागवत आपको सत्य की राह पर चलना सिखाती है” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

“भागवत आपको सत्य की राह पर चलना सिखाती है” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति पटना के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 नवंबर 2019 तक गर्दनीबाग, संजय गांधी स्टेडियम पटना में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान का ध्यान करें, कथा सुनें और अपने जीवन को कृतार्थ करें। भगवान की भागवत आपको सत्य की राह पर चलना सिखाती है। भागवत में कहा गया है कि सत्य ही है जिसका ध्यान करना चाहिए क्योंकि भगवान ही सत्य स्वरूप हैं। जो जीव सत्य का अनुसरण करते हैं, सत्य पर चलते हैं ईश्वर की कृपा उनपर अवश्य होती है।

 

महाराज श्री ने कहा कि जीव जीवन में दुख इसलिए पाता है क्योंकि वह कहता कुछ है और करता कुछ है। भगवान से भी झूठ बोलने में हमे संकोच नहीं होता, भगवान के शुभ कार्यों में भी अपराध करने से बचते नहीं हैं। कहा जाता है एक घर को तो डायन भी छोड़ देती है, तो हमे कम से कम धर्म को छोड़कर ही, वैसे तो झूठ कही नहीं बोलना चाहिए परन्तु जो भगवत सम्बंधित विषय हो तो वहां हमे झूठ नहीं बोलना चाहिए। वहां सत्यही स्वीकार करना चाहिए।

महाराज श्री ने कहा कि आजकल के माता पिता को लगता है कि बच्चों को धन दे दो तो सारी परेशानियां दूर हो जाएंगी लेकिन ऐसा कभी नहीं हो सकता। धन समस्याओं को हल नहीं करता है बल्कि आज के युग में धन भी अपने आप में बहुत बड़ी समस्या है। आप जब तक गरीब रहते हैं आपको कोई देखता नहीं है और जब आप धनवान होजाते हैं तो उम्मीदों की नजरों से सब देखते हैं। जब तक आप इन संसार के लोगों की इच्छाएं पूरी नहीं करोगे तब तक ये आपके शत्रु बनकर आपको परेशान करते रहेंगे। हल पैसा नहीं है बल्कि आपके संस्कार है, आप अपने बच्चों को पैसे देने से अच्छा है संस्कारवान बनाइए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपने मन्त्रो से जीवित कर दिया था।

महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।

शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।

बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।

इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।

महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।

महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।

महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।

दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।
महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"

भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

22Nov 2019

“अपनी नजर बदलिए आपके नजारे बदल जाएंगे : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

सन्यास का मतलब ही है मोह माया से मुक्ति : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति पटना के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 नवंबर 2019 तक गर्दनीबाग, संजय गांधी स्टेडियम पटना में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।

भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

कथा के तृतीय दिवस हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन "मेरे दिल की है एक आवाज दास हुँ राधे का " श्रावण कराया”।

आज कथा पंडाल में सांस्कृतिक मंत्री बिहार सरकार से श्री प्रमोद कुमार जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया।

महाराज जी ने कहा की आज कल गुरु जी अपने आपको ही मंदिरों में सजवाने में मस्त है । गुरु का मतलब जो गोविन्द से मिला दे , गुरु का मतलब ये नहीं है जो अपने आपको ही मंदिर में सजा दें। गुरुर साक्षात परम ब्रह्म "इस बात को तो मानेगें, गुरुर साक्षात परम ब्रह्म है कौन ? जब ब्रह्म की पूजा ही नहीं करने दोगें। गुरुर देवो महेश्वरः कहते है शिवलिंग को छूना नहीं देते, न शिव की पूजा करने दे रहे है न नारायण की पूजा करने दे रहे है महाराज जी ने कथा क्रम आगे बढ़ाते हुए कहा की इसी श्लोक के तीन चरणों को हम झूठा बता देते है और आखरी चरण को कहे देते है गुरुर साक्षात परम ब्रह्म है। एक चरण सत्य तीन चरण झूठे ये कैसे हो सकता है। संभव है नहीं तो यहाँ "साबधानी". आप सभी को रखनी चाहिए। वही गुरु श्रेष्ठ है जो गुरु गोबिंद की राह पर चलने के लिए हमें प्रसन्नता दे। भगवान से मांगना ही तो ये मांगो कि ऐसी दया करो “मेरा ही आत्म कल्याण हो जाये”। कभी कभी भगवान से भगवान को भी मांग लेना चाहिए। तब आनद आता है ।

महाराज श्री ने कहा कथा क्रम बढ़ाते हुए कहा की एक दुकान पर एक सेठ जी सामान बेच रहे थे वही पर एक महात्मा आ गये। महात्मा राम राम कर रहे थे ग्रहको की लाइन लगी थी और संत खड़े थे राम- राम कहे रहे थे। सेठ जी की दुकान पर ग्राहकों की भीड़ लगी थी क्या वो संत जी की राम - राम सुनेंगे। सेठ जी गुस्सा कर के मुनीम जी से बोले दे - दे इनको जो भी देना है, देकर विदा करों इनको। मुनीम जी बोले क्या चाहिए बताएं तो महात्मा जी बोले कुछ नहीं चाहिए हम तुम्हारें सेठ जी को सत्य बताने आये थे। महात्मा जी बोले हमें क्या पता था तुम्हारे सेठ जी अपना सत्य सुनने में दिलचस्पी ही नहीं लेंगे। तो मुनीम जी बोले क्या सत्य है, तो महात्मा जी बोले तुम्हारे सेठ की मृत्युं सातवे दिन होगी। मुनीम जी दौड़ते दौड़ते बोले सेठ जी , सेठ जी बोले क्या हुआ तो मुनीम जी बोले ये संत बहुत ज्ञानी लग रहे है तो सेठ जी बोले दान देकर विदा कर दो तो मुनीम जी बोले वो दान लेने नहीं आये वो आपको कुछ देने आये है। तो सेठ जी बोले मुझे नहीं चाहिए ज्ञान देख नहीं रहे कितनी लाइन लगी है ग्राहकों की मेरा तो यही ज्ञान है ईमान है। तो मुनीम जी ने कहा की महात्मा जी ये कहे रहे है। महात्मा जी बोले हमें तुमसे कुछ नहीं चाहिए था हम आपको ये बात बताने आये थे। पहले बाबा से राम राम अच्छा नहीं लग रहा था अब ग्रहक अच्छे नहीं लग रहे।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।

तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।

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21Nov 2019

भगवान में परम धर्म का निरूपण किया गया है : पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

श्रीमद भागवत में रस धर्म का निरूपण किया गया है। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

श्रीमद्भागवत कथा देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति पटना के तत्वाधान में पं श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 नवंबर 2019 तक गर्दनीबाग, संजय गांधी स्टेडियम पटना में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया गया । कथा के द्वितीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई।

आज कथा पंडाल पदाधिकारी जय नारायण सिंह जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि द्वितीय दिवस की कथा श्रवण कर अपने जीवन को धन्य करें। जीवन को पवित्र और धन्य करने के लिए उसी भागवत ग्रंथ को श्रावण करने के लिए आज इस कथा पंडाल में उपस्थित हुए है। महाराज जी ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन "हम भी कहे राधे श्याम तुम भी कहो राधे श्याम " श्रावण कराया”।

श्रीमद भागवत महापुराण के माध्यम से जीव को सर्वेश्वर श्री कृष्ण जी के स्मरण के सन्दर्भ में पूर्णरूपी ज्ञान प्रदान किया गया। जीव को श्री कृष्ण जी को स्मरण करें इसके लिए प्रेरित किया गया है। जीव को ज्ञान भी दिया गया, जिन लोगों ने श्री कृष्ण जी का स्मरण किया है उनकी गति क्या हुई है, उनके जीवन का आनंद कैसा रहा। निश्चिन्त वो जीव परम शौभाग्यशाली है। जो मनुष्य जीवन प्राप्त करने के बाद गोविन्द के चरण, चरण कमलरूपी रस का रसपान करने के लिए हमेशा ललायत रहते है। उनके पदम, पाद उनके श्री चरणकमल निश्चिन्त तौर पर जीव को आश्रय देने के लिए, जिन जीवो ने उनके चरण कमलो का आश्रय लिया है। उन्हें यत्र - तत्र भटकने की कोई आवश्यकता नहीं है,कही भी भटकने की आवश्यकता नहीं है।

महाराज श्री ने कहा कि इस भागवत महापुराण में मोक्ष परियन्त की कामनाओ से रहित परम धर्म का निरूपण किया गया है। परम धर्म क्या है? कही बार भगवान की भी बात भगवान की सेवा के लिए न मानी जाएं तो भी ठीक है वही परम धर्म है। भगवान तो करुणामय है, भगवान तो दयालु है, उनकी दयालुता का कोई ठिकाना नहीं है वो तो जब दया करते है तो अपना सर्वस्य लूटा देते है।

महाराज श्री ने कहा कि लक्ष्मण खड़े है राम के साथ वन जाने के लिए और राम जी कहते है तुम हमारी सेवा के लिए वन मत चलो। तुम्हे चलने की कोई आवश्यकता नहीं लेकिन राम की सेवा करने के लिए लक्ष्मण जी ने राम जी की ही बात नहीं मानी ये ही परम धर्म है। राजाबलि ने दान देने के लिए गुरु जी की ही बात नहीं मानी यही परम धर्म है। राम जी की सेवा करनी है इसलिए राम जी की ही बात नहीं मानी ये परम धर्म है। जो आहारनेस अपने स्वामी के प्रति सचेत रहे, जागरूक रहे, धर्म को और सेवा को हमेशा महत्त्व देता रहे वही परम धर्म है।

महाराज श्री ने कहा कि भगवान में परम धर्म का निरुपण किया गया है। व्यास जी कहते है श्रीमद भागवत में निष्कपट परम धर्म का निरुपण किया है। परम धर्म भागवत में जो जीव उस परम धर्म का पालन करते है। सुनने के लिए प्रयासरत रहते है, संसार के दैहिक - दैविक और भौतिक तीनो तापों से मुक्त हो जाया करते है। इस प्रकार भगवान जब जीव ये सुन परम धर्म को धारण करता है। और वेद व्यास जी महाराज के द्वारा रचित श्रीमद भागवत कथा को श्रावण करने जाऊंगा ऐसे मन में जब भाव आता है तो भगवान की स्तिथि क्या हो जाती है। सीग्रह ही भगवान उनके स्थल में विराजमान हो जाते है। उनके बंदी बन जाते है, उनके बंदी बनकर उनके ह्रदय में हमेशा के लिए उनके साथ में रहते है अपने ह्रदय में संसार को नहीं, संसार के रचिया को बना लेना चाहिए।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं।
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

22Nov 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के पावन सानिध्य में “विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी एवं विश्व शांति सेवा समिती आगरा के सदस्यों के द्वारा आज आगरा में भूमि पूजा का आयोजन किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के पावन सानिध्य में “विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी एवं विश्व शांति सेवा समिती आगरा के सदस्यों के द्वारा आज आगरा में भूमि पूजा का आयोजन किया गया। सभी ने भूमि पूजन बड़े ही हर्षो-उल्लास के साथ किया। आगरा की पावन सरजमी पर पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज से श्रीमुख से श्रीमदभागवत कथा का आयोजन होने जा रहा है। कथा दिनांक 29 नबंवर 2019 से 05 दिसंबर 2019 तक की जायेगी। समय दोपहर 1:30 बजे से शाम 4:30 बजे तक रहेगा, स्थान- नवीन गल्ला मंडी स्थल, एन.एच-2, फिरोजाबाद रोड, आगरा (उ.प्र)। कथा की तैयरियां आज से ही जोरों पर हैं। कथा की ओर लोगों को प्रेरित करने के लिए आगरा में जगह-जगह पर होल्डिंस लगाये गये। तकि लोग ज्यादा से ज्यादा संख्या में आकर कथा का आनंद उठा सकें। लोगों को कथा के प्रति जाग्रत करने का काम समिती के सदस्यों के द्वारा पिछले कई दिनों से किया जा रहा है। पूज्य महाराज श्री जी के श्रीमुख से की जाने वाली कथा को सुनने के लिए काफी बड़ी संख्या में भक्तों के आने की उम्मीद जताई जा रही है। जिसको देखते हुए समिती के सदस्यों ने भव्य पंडाल लगाना आज से ही शुरु कर दिया है। यह पंडाल एक विशेष पंडाल होगा, जो वॉटर प्रूफ होगा। जिसमें भक्तजन बड़ी संख्या में आराम से बैठकर कथा का रसपान कर सकेंगे। समिती से जुड़े शहर के गणमान्य लोगों को जागरुक करने के लिए आज एक प्रेसवार्ता भी की गई। जिसमें श्री विजय शर्मा जी की अध्यक्षता में मुख्य यजमान श्री सतीश गर्ग जी, विश्व शांति सेवा समिती आगरा के अध्यक्ष श्री हरिचंद गर्ग जी, उपाध्यक्ष श्री रामप्रकाश जी, उपाध्यक्ष श्री प्रमोद अग्रवाल जी, महामंत्री श्री रामनाथ जी, मंत्री श्री नरेश चंद जी, मंत्री श्री राकेश अग्रवाल जी, मंत्री श्री सत्यप्रकाश बंसल जी, मंत्री श्री सतीश शाह जी, मंत्री श्री दिनेश चंद जी, मंत्री श्री प्रकाश चंद अग्रवाल, मण्डी अध्यक्ष श्री जयप्रकाश अग्रवाल जी, मण्डी सचिव श्री शिव कुमार राघव जी, साथ में श्री बृजमोहन अग्रवाल जी ने भाग लिया। कलश यात्रा 29 दिसंबर को सुबह 10 बजे शिव शक्ति मन्दिर मण्डी प्रांगण से कथा स्थल तक निकाली जायेगी। जिसमें बड़ी संख्या में माताएं-बहने भाग लेगीं।
कथा के पहले दिन श्रीमदभागवत महात्म्यम व्यास नारद सम्वाद कुन्ती स्तुति, दूसरे दिन कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत, तीसरे दिन जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत, चौथे दिन श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत, पांचवे दिन भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जायेगा, छठे दिन उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत और सातवें दिन द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।
आप सभी भक्तगण इस कथा का लाइव प्रसारण महाराज श्री के यूट्यूब चैनल पर देख सकते हैं औरआस्था भजन चैनल पर सुबह 9:30 से देख सकते है।

20Nov 2019

“भागवत सम्पूर्ण भक्तों का सरल ग्रंथ है” "पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

“भगवान आपके कर्मों से ही प्रसन्न होते हैं” "पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति पटना के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 नवंबर 2019 तक गर्दनीबाग, संजय गांधी स्टेडियम पटना में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।

श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के प्रथम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया ।
प्रथम दिवस के कथा की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

आज कथा पंडाल में दीघा से विधायक श्री संजीव चौरसिया जी, बीजेपी एमएलसी और पूर्व मंत्री श्री संजय पासवान जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

 

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि इस दुनिया में कोई भी पद हो, धन हो, रूप, रंग, जवानी ये स्थायी नहीं है, ना जाने कब तक रहे और कब छूट जाए। लेकिन जो धर्म है वो जन्म से लेकर मृत्यु तक आपका था, आपका है और आपका ही रहने वाला है।

महाराज श्री ने कहा कि जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य क्या है ? भव में डूबे नहीं पार हो जाएं। नाव पर आप सवार हो जाकर जा रहे हैं उस पार तो आपका उद्देश्य होता है उस पार चले जाएं लेकिन ये ध्यान रखते हैं की उसमें छेद ना हो डूब ना जाएं। वैसे ही ये संसार एक गंगा है, जीव एक यात्री है, माया और मुक्ति दो किनारे हैं। माया के घाट पर हम खड़े हैं और मुक्ति के घाट तक पहुंचना है लेकिन नाव ऐसी चाहिए जो हमें पार कर दे और भागवत नाम और श्रीकृष्ण के नाम से बड़ी कोई नाव इस संसार में नहीं है।

महाराज श्री ने कहा कि जाति, जाति में जन्म लेना ये आपके कर्मों का फल हो सकता है लेकिन उस जाति से तुम्हें परमात्मा मिल जाएगा इस बात का कोई प्रमाण नहीं है। भगवान आपके कर्मों से ही प्रसन्न होने वाला है। आप पूर्ण समर्पित होते हैं, शरणागति लेते हैं, सत्कर्म, परोपकार करते हैं। तो जब परोपकार करते हैं या स्वयं संसार से विरकत होकर ईश्वर से स्मरण कथा श्रवण करते हैं तो फिर आप किस जाति के हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है। जो नित्य मांस बेचता है ईश्वर उसके वहां भी आना स्वीकार करते है और उसके हाथ से भोग लगाना भी स्वीकार करते हैं।

महाराज श्री ने कहा कि भागवत सम्पूर्ण भक्तों का सरल ग्रंथ है, जब भागवत ग्रहण करता है तो उसकी निश्चित उसकी भक्ति सर्वोपरि होती है, भक्ति के प्रति उसकी आशक्ति होती है, भगवान के प्रति वो समर्पित होता चला जाता है। जब तक जीव कथाओं से, सत्संग से, हरि से जुडा रहता है फिर उसको जीवन का उद्देश्य तो पता रहता ही है, साथ ही भगवान का दिव्य प्रेम भी प्राप्त हो जाता है जिस प्रेम को प्राप्त होने के बाद हरि स्थिर नहीं रह पाते अपने लोक में वो अपने भक्त के पास दौड़े चले आते हैं।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत भागवत के प्रथम श्लोक सच्चिदानन्दरूपाय विश्वोत्पत्त्यादिहेतवे। तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुम: के उच्चारण के साथ की। महाराज श्री ने कहा कि भगवान का स्वरूप कैसा है ? सतघन, चितघन, आनन्द, ऐसे भगवान सच्चिदानंद स्वरूप, समस्त विश्व का पालन पोषण सृजन करने वाले तीनो के जो हेतु हैं तथा जिनके पावन चरण ग्रहण करने पर जीव का त्रापत्य समाप्त हो जाता है, ऐसे गोविंद को हम सब मिलकर बारम्बार नमन करते हैं, प्रणाम करते हैं।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की प्रारम्भ में यह की भागवत का महात्यम क्या है ? एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। इस सांसारिक जीवन में जो कुछ भी प्राप्त किये हो सब किराए के मकान की तरह है। खाली करना ही पड़ेगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

 

17Nov 2019

“उचित अनुचित का बोध कराती हैं कथाए” : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

झांसी के मुक्ताकाशी मंच मेला ग्राउंड, झांसी उत्तर प्रदेश में विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।
श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई।

आज कथा पंडाल में गुजरात से सांसद श्री दीप सिंह राठौर जी, विधायक श्री जवाहर राजपूत जी महाराज, विधायक श्री कमलेश द्विवेदी जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं पूज्य महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया, संस्था के द्वारा स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

 

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि हरि को याद करना और खुद से प्रेम करना सबसे बड़ी सम्मपत्ति है, वैसे तो संसार आपको छोड़ने वाला नही है। कोई ना कोई विपदा, कोई ना कोई परेशानी लगती रहेगी लेकिन जब स्मरण हो हरि का तो एक ही बात याद रखो की सबसे बड़ी संपत्ति को नुकसान में नहीं होने दूंगा, हरि स्मरण भूल जाऊं ये कभी होने नहीं दूंगा।
महाराज श्री ने आगे कहा कि जब भगवान किसी को ज्ञान देते हैं या किसी पर अपनी कृपा करते हैं तो उसके लिए किताबों की आवश्यकता नहीं पड़ती है, उसके लिए प्रयास की जरूरत होती है। भगवत कृपा प्राप्त करने के लिए आप प्रयत्नशील रहें तो ठाकुर जी आप पर कृपा जरूर करेंगे।

महाराज श्री ने कहा कि जीव को भजन जरूर करना चाहिए, सुबह स्नान आदि से निवृत होने के बाद आपको भजन करना ही चाहिए। जीवन में आपका साथ चाहे कोई ना दे लेकिन भगवान का भजन आपका साथ जरूर देगा, जब कठिन परिस्थितियों में होगे तो यह भजन ही आपका साथ निभाएगा। भगवान भी ध्यान करते हैं, भगवान ध्यान करके विद्वान ब्राह्मणों को बुलाते हैं और फिर उनसे वेद पुराणों की कथा सुनते हैं। इन कथाओं को सुनने से उचित और अनुचित का बोध होता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंत: सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की। #DnThakurJiInJhansi #VijaySharmaVssct

16Nov 2019

"रास को श्रवण करने के लिए दिमाग की नहीं ह्रदय की आवश्यकता पड़ती है” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

“जो जीव श्रीमद्भागवत मन से सुनते हैं उनके जन्म जन्मांतर की प्यास हमेशा के लिए तृप्त हो जाती है”

"रास को श्रवण करने के लिए दिमाग की नहीं ह्रदय की आवश्यकता पड़ती है”

झांसी के मुक्ताकाशी मंच मेला ग्राउंड, झांसी उत्तर प्रदेश में विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।

श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

 

आज कथा पंडाल में भोपाल से सांसद साध्वी प्रज्ञा जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं व्यास पीठ से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

साध्वी प्रज्ञा जी ने भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि झांसी की धरा इतिहास की धरा है इसिलए कभी ओज और जोश अपना भूलना मत, जब जय श्री राम का नारा लगता है तो अयोध्या दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि जिसने भी भगवा को आतंकवाद कहा, जिस संस्था ने कहा, जिस व्यक्ति ने कहा वो समापन की ओर आ गए हैं। मैने संत महात्माओं से कहा कि भगवा क्या सिर्फ मैने पहना है, जब भगवा का नाम आया आतंकवाद के साथ जोडा तो क्यों पीड़ा नहीं हुई आप लोगों को, जब सन्यासी दल एक साथ खड़ा होकर हुंकार भरता तो शायद राम मंदिर बनने में इतने वर्ष नहीं लगते। उन्होंने कहा कि देश से बड़ा कुछ नहीं होता, देश है तो हम पूजा पाठ स्वतंत्रता से करते हैं और आपको विश्वास ना हो तो जाइए हमारी एक माता पाकिस्तान में भी विराजमान है, उनके कितने लोग दर्शन कर पाते हैं, इसिलिए राष्ट्र की रक्षा अनिवार्य है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि आप लोगों के भाग्य की सराहना कोई नहीं कर सकता, आप लोगों के भाग्य को देखकर देवता भी जल रहे होंगे। झांसी के लोगों के भाग्य की सराहना हम कितनी करें की एक तरफ मां पीताम्बरा विराजमान है। दूसरी तरफ राम राजा सरकार विराजमान हैं और आप उनके मध्य में बैठकर श्रीमद्भागवत महापुराण श्रवण कर रहे हैं।
महाराज श्री ने कहा कि जो जीव सच्चे मन से भगवान की कथा सुनते हैं उन लोगों को ना भूख लगती है, ना प्यास लगती है बल्कि मैं यह कहूं की जो जीव श्रीमद्भागवत मन से सुनते हैं उनके जन्म जन्मांतर की प्यास हमेशा के लिए तृप्त हो जाती है। जितनी कथा आप सुनते जाएंगे उतनी प्यास आपकी बढ़ती जाएगी। जितना सुनते हैं उतनी प्यास बढ़ती है यह भक्ति का सूत्र है।

महाराज श्री ने प्रभु की रास के बारे में बताते हुए कहा कि रास को श्रवण करने के लिए दिमाग की नहीं ह्रदय की आवश्यकता पड़ती है। अगर भगवान के इस रास में अकेले दिमाग का इस्तेमाल करेंगे सुनने में तो आपको इस रास में भगवान पर संदेह हो जाएगा और अगर आपको भगवान पर संदेह हो गया तो आपको नरकगामी बनना पड़ेगा। भगवान की ये रासलीला बड़ी उत्तम है, श्रेष्ठ है. बडे बड़े ऋषि भी इस रास को सुनकर ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।

15Nov 2019

“आपके दु:ख का कारण दुनिया से आपका बंधन है” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

“आपके दु:ख का कारण दुनिया से आपका बंधन है” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

“जीवन में सुख पाने का एक ही मार्ग है ठाकुर की शरणागति”

 

झांसी के मुक्ताकाशी मंच मेला ग्राउंड, झांसी उत्तर प्रदेश में विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।

 

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के पंचम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

आज कथा पंडाल में झांसी से सांसद श्री अनुराग शर्मा जी, विधायक श्री रवि शर्मा जी, महापौर श्री रामतीर्थ सिंघल जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि हमारे द्वारा किए गए वेद मंत्रों से वातावरण शुद्ध होता है लेकिन आजकल वेद मंत्रों का उतना उच्चारण नहीं होता जितना होना चाहिए। जब जब भागवत के श्लोकों का उच्चारण होता है, भागवत नाम उच्चारण होता है उससे वायुमंडल शुद्ध होता है। वैज्ञानिकों ने भी कहा कि जो यज्ञ होते हैं उससे वायुमंडल शुद्ध होता है, क्योंकि यज्ञ में अधिकांश पीपल की लकड़ियां जलाई जाती हैं। हमारे ऋषियों का कोई भी कार्य ऐसा नहीं था जो इस प्रकृति के विपरित हो। हमारे ऋषियों का विज्ञान इतना श्रेष्ठ था की कोई भी विज्ञान उनका सामना नहीं कर सकता। ऋषियों के विज्ञान को नजर अंदाज करना बहुत बड़ा अनर्थ है।

महाराज श्री ने कहा कि आजकल हमें वो व्यक्ति पढ़ा लिखा लगता है जो चार शब्द अंग्रेजी के बोल दे। सब यही चाहते हैं की हमारा बच्चा हिंदी बोले या ना बोले, संस्कृति बोले या ना बोले लेकिन इंग्लिश जरुर बोले। इस तरह तो आज भी हम अंग्रेजों के गुलाम ही हैं। हमारे पूर्वज तो सिर्फ शारीरिक गुलाम थे लेकिन हम तो मेंटली गुलाम हैं। अपने बच्चों को सिखाइए की जेंटलमेन सिर्फ कोर्ट पैंट पहनकर, इंग्लिश बोलकर नहीं होता जिसका आचरण श्रेष्ठ होता है वही जेंटलमेन होता है।

महाराज श्री ने कहा कि हम और आप जन्म जन्मांतर से परेशान हैं, एक ही जन्म में नहीं बल्कि हर जन्म में परेशान हैं क्योंकि हमें बंधनों से मुक्त होने का मार्ग नहीं मिल रहा है। जिसे हम आनंद समझ रहे हैं वो आनंद नहीं बल्कि बंधन है। जब तक आप संसार के बंधनों में बंधे रहोगे कभी सुखी नहीं होगे, सुखी होने का एक ही मार्ग है ठाकुर जी की शरणागति स्वीकार कर लो और अपना सम्बंध भगवान से जोड़ लो उसही दिन सारे बंधन मुक्त हो जाएंगे और आप सुखी हो जाओगे।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराजा ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।

14Nov 2019

“जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

“जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है”

झांसी के मुक्ताकाशी मंच मेला ग्राउंड, झांसी उत्तर प्रदेश में विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जब अपने धर्म की बात हो तो एक साथ ही खड़ा रहना चाहिए कभी दो बातें नहीं करनी चाहिए। गीता में भगवान ने कहा है अपने धर्म की रक्षा करना हम सब की जिम्मेदारी है, किसी एक व्यक्ति की नहीं। जो जीव अपने धर्म की रक्षा करते हैं हमारे शास्त्रों में कहा है जो व्यक्ति धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है, इसलिए धर्म परायण हर जीव को रहना चाहिए।

महाराज श्री ने कहा कि भगवान उस व्यक्ति को कभी माफ नहीं करते हैं जो धर्म को नष्ट करने का प्रयास करता है। भगवान कहते हैं मुझे कष्ट पहुंचाओगे मैं सह लूंगा लेकिन धर्म को नुकसान पहुंचाओगे, मेरे भक्तो को नुकसान पहुंचाओगे तो मैं कदापि सहन नहीं करूंगा। ये भगवान का स्वभाव है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपने मन्त्रो से जीवित कर दिया था।

महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।

शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।

बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।

इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।

महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।

महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।

महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।

दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।
महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"

भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

 

13Nov 2019

“ कथा आपको ईश्वर से मिलाती है ईश्वरवादी बनाती है” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज 

“ कथा आपको ईश्वर से मिलाती है ईश्वरवादी बनाती है” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज 

झांसी के मुक्ताकाशी मंच मेला ग्राउंड, झांसी उत्तर प्रदेश में विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।

श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया ।

कथा के तृतीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

 

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि मृत्यु के वशीभूत जीव ना मृत्यु के संदर्भ में सोचता है, ना मोझ के संदर्भ में सोचता है। संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य यह है की अपनों को जलाने के बाद भी खुद ऐसे जिंदा रहते हैं जैसे हम कभी नहीं मरेंगे। कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसने अपने घरवालों को विदा ना किया हो। संसार को सबसे प्यारा नियम है जो आता है उसे जाना पड़ता है। हम इसलिए यहां नहीं आए हैं की यही रहना है, हम आएं हैं तो हमें एक ना एक दिन जाना ही है।

आप जितनी व्यवस्था अपने जीने के लिए करते हैं, खाने के लिए करते हैं, तन ढ़कने के लिए करते हैं उनकी व्यवस्था अपनी मोक्ष की भी कर लिजिए, कभी मृत्यु को सुंदर बनाने की भी व्यवस्था कर लो। उस व्यवस्था के बिना काम नहीं होने वाला है।

महाराज श्री ने कहा कि मायावादी जीव कभी ईश्वर के लिए त्याग नहीं करता और ईश्वरवादी जीव माया के लिए ईश्वर का त्याग नहीं करता। कथा ही आपको ईश्वरवादी बना देती है, ईश्वर से मिला देती है इसलिए सब का त्याग करो लेकिन कथा का त्याग कभी मत करो।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।

राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।

12Nov 2019

“युवा मॉर्डन बनें लेकिन अपनी संस्कृति को कभी ना भूलें” : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

“युवा मॉर्डन बनें लेकिन अपनी संस्कृति को कभी ना भूलें” : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

झांसी के मुक्ताकाशी मंच मेला ग्राउंड, झांसी उत्तर प्रदेश में विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। कथा के द्वितीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

द्वितीय दिवस के कथा की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि हमें अपने तीज त्योहारों को हमेशा याद रखना चाहिए। आप कितने भी मॉर्डन हो जाएं लेकिन अपनी तीज, त्योहार, संस्कृति को कभी नहीं भुलना चाहिए और उन्हें कभी नजर अंदाज नहीं करना चाहिए। आज का युवा मॉर्डन है उसमें कोई बुराई नहीं है लेकिन आपको यह भी समझना होगा की हमें अपनी संस्कृति, संस्कारों को नहीं भूलना है। हमारी संस्कृति हमारी विरासत है, हमारा आधार है। जो लोग अपनी संस्कृति भूल जाते हैं उन्हें मिटने में, उनके समाज को मिटने में ज्यादा समय नहीं लगता। आपकी संस्कृति ही आपकी पहचान है इसिलिए इसे कभी ना भूलाएं। महाराज श्री ने सभी भक्तों को देव दीपावली एवं सिखों के प्रथम गुरू गुरूनानक देव जी के 550वें प्रकाश पर्व की शुभकामनाएं दी। महाराज श्री ने कहा कि कार्तिक मास में दीप दान का विशेष महत्व है, आपके शहर में जो भी नदी हो, सरोवर हो उसके तट पर जाकर दीप दान करना ही चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि गुरूनानक देव जी ने तीन सिद्धांत अपने भक्तों को बताए एक नाम जपो, दूसरा किरत करो, तीसरा वंड छको । नाप जपो इसका मतलब है गुरू वही है जो अपने सानिध्य में आने वाले जीव को सत्कर्म करने के लिए प्रेरित करें, गुरूनानक देव जी ने भी सभी से कहा है नाम जपो। कीरत करो का मतलब है परमात्मा ने जो भी संसाधन इस संसार में दिए हैं कड़ी मेहनत और ईमानदारी के साथ वो अर्जित करो। वंड चखो मतलब जो भी तुमने ईमानदारी से ग्रहण किया है उसे अकेले मत खाओ, उसे दीन दुखी, जरूरत मंद, बेसहारा के साथ बाटो। किसी जरूरतमंद की मदद करो, बेसहारा का सहारा बनो, प्यासे को जल पिलाओ, भूखे को खाना खिलाओ। महाराज श्री ने कहा कि कोई आपको भोजन देता है तो आपको उसको भोजन देते हो, कोई सम्मान देता है तो उसे सम्मान देते हो, कोई आपकी मदद करता है तो उसकी मदद करते हो लेकिन अगर आपको कोई जीवन देता है तो आप उसे क्या दोगे ? हम उसे जीवन ही देंगे। हम अपने जीवन में परम पिता परमात्मा को स्थान देंगे वहीं उसको जीवन देगा। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है। श्री शुक जी की कथा सुनाते महाराज श्री ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ मंक छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए। यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।

12Nov 2019

कल कार्तिक शुक्ल पक्ष पर "पूर्णिमा महोत्सव" का सुंदर एवं भव्य आयोजन ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर के प्रांगण में बड़ी हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।

|। राधे राधे ।। कल कार्तिक शुक्ल पक्ष पर "पूर्णिमा महोत्सव" का सुंदर एवं भव्य आयोजन ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर के प्रांगण में बड़ी हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। जिसमें हजारों की तादाद में देश विदेश से भक्त पधारे। जिसमें सभी भक्तों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया एवं सर्वप्रथम गणेश वंदना कर कार्यक्रम की शुरुआत की गई तथा ठाकुर श्री प्रियाकांतजू भगवान, सर्वेश्वरीश्री राधा रानी के प्यारे प्यारे भजनों की प्रस्तुति दी गई। अंत में ठाकुर श्री प्रियाकांतजू भगवान की आरती का कार्यक्रम का समापन किया गया। #PurnimaMahotsav2019 #PriyakantJuMandir #Vrindavan #ThakurJi #priyakant_ju #vrindavan_darshan #vijaysharmavssct #VssctOnline #Vsscm #KartikPurnima #कार्तिकपूर्णिमा2019

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

12Nov 2019

।। राधे राधे।।कल कार्तिक शुक्ल पक्ष पर "पूर्णिमा महोत्सव" के पावन अवसर पर ठा. श्री प्रियाकान्त जू मन्दिर में संकीर्तन का आयोजन किया गया।

।। राधे राधे।।कल कार्तिक शुक्ल पक्ष पर "पूर्णिमा महोत्सव" के पावन अवसर पर ठा. श्री प्रियाकान्त जू मन्दिर में संकीर्तन का आयोजन किया गया जिसमें हजारों की संख्या में भक्तों ने प्रसाद ग्रहण किया। पूर्णिमा के पावन अवसर पर हर महीने ट्रस्ट के द्वारा हजारों भक्तों के लिए भंडारे का आयोजन किया जाता हैं। ।। राधे राधे।।

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11Nov 2019

“आपके कथा श्रवण करने मात्र से पितरों का कल्याण हो जाता है” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

“आपके कथा श्रवण करने मात्र से पितरों का कल्याण हो जाता है” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

“मन के अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करती है भागवत” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

झांसी के मुक्ताकाशी मंच मेला ग्राउंड, झांसी उत्तर प्रदेश में विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के प्रथम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया । प्रथम दिवस के कथा की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

 

कथा के प्रथम दिवस पर कथा पंडाल में भाजपा प्रदेश महामंत्री विद्या सागर सोनकर जी एवं पूर्व बेसिक शिक्षा राज्य मंत्री रविंद्र शुक्ल जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई। उन्होंने पूज्य महाराज श्री के साथ दीप प्रज्वलित कर कथा का शुभारंभ किया एवं पूज्य महाराज श्री और व्यास पीठ से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत में राम मंदिर पर आए फैसले पर अपनी बात रखी । उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के माध्यम से बहुत बड़ा फैसला पूरे भारत के लिए आया है। हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने बहुत अच्छी बात कही है की यह ना किसी के लिए जीत है और ना ही किसी के लिए हार है, यह मानवता की जीत है। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत भागवत के प्रथम श्लोक सच्चिदानन्दरूपाय विश्वोत्पत्त्यादिहेतवे। तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुम: के उच्चारण के साथ की। महाराज श्री ने कहा कि भगवान का स्वरूप कैसा है ? सतघन, चितघन, आनन्द, ऐसे भगवान सच्चिदानंद स्वरूप, समस्त विश्व का पालन पोषण सृजन करने वाले तीनो के जो हेतु हैं तथा जिनके पावन चरण ग्रहण करने पर जीव का त्रापत्य समाप्त हो जाता है, ऐसे गोविंद को हम सब मिलकर बारम्बार नमन करते हैं, प्रणाम करते हैं। पूज्य महाराज श्री ने कहा कि अगर मात्र आपके ह्रदय में यह विचार आ जाए की आप भागवत सुनने जाएंगे इतने विचार से ही हमारे पूर्वज जो पितृ लोक में है वह आनंदित हो उठते हैं। जब आप भागवत सुनते हैं है तो आपके पितरों का कल्याण होता है, उन्हें मुक्ति मिलती है। महाराज श्री ने कहा कि हमारे घर में अगर अंधेरा होता है तो हम लाइट जलाते हैं तो प्रकाश हो जाता है लेकिन मन के अंधेरा हो तो उसे कैसे दूर करें ? मन के बाहर अंधेरा हो तो लाइट जलाओ प्रकाश हो जाएगा लेकिन तन के भीतर अंधेरा है तो उसका क्या करें ? और यह सच है की हमारे मन के भीतर ज्यादा अंधेरा है बाहर कम है। आप जन्मजन्मांतर के अंधेरे को लेकर अपने ह्रदय में घूम रहे हैं लेकिन जैसे ही भागवत की शरणागति लेंगे अज्ञान रूपी अंधकार ज्ञान रूपी दीपक से जलकर स्वाहा हो जाएगा और आपका ज्ञान प्रकाशित हो जाएगा। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की प्रारम्भ में यह की भागवत का महात्यम क्या है ? एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। इस सांसारिक जीवन में जो कुछ भी प्राप्त किये हो सब किराए के मकान की तरह है। खाली करना ही पड़ेगा। व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

4Nov 2019

आज दामोदर नगर, कानपुर के “द गुरूकुल इंग्लिश स्कूल” में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सम्मान में अभिनंदन समारोह का आयोजन किया गया।

आज दामोदर नगर, कानपुर के “द गुरूकुल इंग्लिश स्कूल” में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सम्मान में अभिनंदन समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर पूज्य महाराज श्री ने छात्र छात्राओं को अपने आशीर्वचन से अलंकृत किया एवं जीवन में उचित अनुचित का मार्गदर्शन कराया। पूज्य महाराज श्री ने सभी बच्चों को अपने माता-पिता, गुरू का सम्मान करना सिखाया, साथ ही साथ भारतीय संस्कृति और संस्कारों का बोध कराते हुए उन्हें बड़ो का आदर करना, धर्म का पालन करना और समाज में एक सम्मानीय व्यक्ति बनने की सीख दी।

4Nov 2019

“हिंदूओं की आत्मा हैं राम और उनका जीवन चरित्र हम लोगों का प्रेरणास्त्रोत” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

“हिंदूओं की आत्मा हैं राम और उनका जीवन चरित्र हम लोगों का प्रेरणास्त्रोत”

विश्व शांति सेवा समिति कानपुर एवं विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 30 अक्टूबर से 05 नवंबर 2019 तक मोतीझील ग्राउंड में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से राम मंदिर के लिए संकल्पित श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है। षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

श्री राम कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की कभी कभी ऐसा लगता है भारत में रहकर भारतीय आत्मा से इतनी छेड़छाड़ क्यों की गई। राम हमारी आत्मा हैं, राम हमारी आस्था हैं, राम हमारा जीवन है और इतने दिनों तक केस भारत में ही चला। मुझे लगता है कही ना कही हम लोगो का आलस्य हैं, हम लोगों को जितना जागरुक होना चाहिए, उतने जागरूक हम नहीं हैं। हमारी दृष्टि में हमारे जीवन में रोटी कपड़ा और मकान ही सर्वोपरी है, इससे जब कुछ बचे तो धर्म के बारे में सोचेंगे वो भी सब नहीं बल्कि कुछ लोग जिनके संस्कार अभी जिंदा हैं। अगर भारत में हम सभी एक होते तो जब भारत आजाद हुआ था तो क्या अयोध्या में राम मंदिर बनने से हमे कोई रोक सकता था ? पाकिस्तान का बटवारा धर्म के नाम पर हुआ था और हिंदुस्तान में अधिकतर हिंदूओं को मिला और अगर भारत मिला ही इसलिए की यहां पर हिंदू अधिक हैं तो जहां हिंदू रहेंगे वहां राम मंदिर ना बने ये हो ही नहीं सकता। हिंदूओं की आत्मा हैं राम और उनका जीवन चरित्र हम लोगों का प्रेरणास्त्रोत है।

महाराज श्री ने आगे कहा कि राम मंदिर अयोध्या में बनेगा ही दूसरा कोई उपाय नहीं है लेकिन एक आस्था, विश्वास, समर्पण का मंदिर ह्रदय में भी बनना चाहिए और उस ह्रदय में ऐसा मंदिर बने जहां मेरे प्रभु नित्य विराजमान रहें और ये तभी संभव है जब आप अपने धर्म के प्रति पूर्ण समर्पित होंगे। धर्म के प्रति आपकी जिम्मेदारी रोटी-कपड़ा और मकान से पहले है।

महाराज श्री ने भगवान को प्रेम प्रिय है और जो व्यक्ति धर्म को जानते हैं वो प्रेम करते हैं और सब में ईश्वरमय दर्शन करते हैं, उन्हें राम और राम की कृपा का अनुभव होता है। काफी लोग कहते हैं की भजन करने लगे तब से मुसीबतें बढ़ गई हैं। जब से अच्छे बने तब से बुराईयों ने आक्रमण कर दिया है, जब तक हम बुरे थे तब तक कोई हमारी तरफ बुरी नजरों से देखता तक नहीं था। जो लोग यह सोचते हैं उन्हें बता दूं ऐसा कभी नहीं होता है । जब आप धर्म के मार्ग पर चलते हैं तो थोड़ी परेशानियां आती हैं लेकिन उसके बाद आपको प्रभु प्राप्ति की अनुभूति होगी ही होगी यह नितानत सत्य है। हमने जो बुराईयों का भण्डार भर रखा है उसे प्रभु अल्प में ही सही लेकिन भुगतवाते तो हैं ही इसलिए भक्ति की राह में अगर परेशानियां आए तो भी भागो मत बल्कि डटे रहो, तो कुछ समय बाद वह परेशानियां स्वत: ही दूर हो जाएंगी, जीवन सुखद हो जाएगा।

5Nov 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक, समय दोपहर 3:30 बजे से शाम 7 बजे तक, स्थान- मुक्ताकाशी मंच मेला ग्राउंड, झाँसी, उत्तर प्रदेश में श्रीमद्भागवत कथा का विशाल आयोजन किया जा रहा है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक, समय दोपहर 3:30 बजे से शाम 7 बजे तक, स्थान- मुक्ताकाशी मंच मेला ग्राउंड, झाँसी, उत्तर प्रदेश में श्रीमद्भागवत कथा का विशाल आयोजन किया जा रहा है जिसके लिए कथा की तैयारियां प्रारंभ हो चुकी है। कथा को भव्य रूप देने के लिए आयोजक समिति के द्वारा विशाल कथा पंडाल लगाया जा रहा है जिसमें हजारों की संख्या में श्रोता कथा का रसपान करेंगे।

#ThakurJiMaharaj #ThakurJiInJhansi

5Nov 2019

“जो राम का नहीं है वो तुम्हारा नहीं है, इस बात को अपने जीवन में धारण करो” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

“जो राम का नहीं है वो तुम्हारा नहीं है, इस बात को अपने जीवन में धारण करो”

विश्व शांति सेवा समिति कानपुर एवं विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 30 अक्टूबर से 05 नवंबर 2019 तक मोतीझील ग्राउंड में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से राम मंदिर के लिए संकल्पित श्री राम कथा का आयोजन किया जा गया। सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
श्री राम कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
कथा पंडाल में कानपुर की महापौर श्रीमती परमिला पाण्डेय और अकबरपुर से सांसद श्री देवेंद्र सिंह भोले जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की और से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।
कथा पंडाल में हिंदू युवा वाहिनी के सदस्यों के द्वारा पूज्य महाराज श्री का शॉल पहनाकर एवं तलवार भेंट कर सम्मान किया गया। संगठन के सभी सदस्यों ने महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया।

 


सप्तम दिवस की कथा से पूर्व सभी कार्यकर्ताओं एवं स्वयं सेवकों के द्वारा महाराज श्री के श्रीचरणों में गुरू वंदना की प्रस्तुती दी गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की यह बात विचारनीय है की राम मंदिर निर्माण को हम कोर्ट में क्यों लेकर चले गए। हिंदू और मुस्लिम दोनों ही इसे लेकर कोर्ट मे चले गए और लड़ रहे हैं। इस दुनिया में सबसे बड़ा मुस्लिम देश इंडोनेशिया है जहां इस विश्व की सबसे बड़ी रामलीला होती है और उसमें अभिनय करने वाले मुस्लमान भाई और बहने होते हैं और तो और वहां के नोटों पर भगवान की छवि भी है। वह इसलिए है क्योंकि उन्होंने यह बात याद रखी की राम हमारे पूर्वज थे और आज भी हैं और हमेशा रहेंगे। लेकिन भारत में मुस्लिम ही क्या हिंदू भी शक करते हैं की भगवान थे की नहीं, राम थे की नहीं, राम कही काल्पनीक तो नहीं। हमारे बच्चों के भी मन में यह भ्रम भर दिया गया की भगवान हैं कहां ? हमारे बच्चे चार क्लास पढ़ लें तो सबसे पहले कहते हैं की हम भगवान को नहीं मानते।

महाराज श्री ने आगे कहा कि सबसे पुराना हमारा देश है, पुरातन संस्कृति है, सभ्यता है। लेकिन अंग्रेजों ने कुचक्र करके हम लोगों के साथ दुव्यवहार किया। हमारे इतिहास को सिर्फ सिंधूकाल से प्रारंभ किया, मात्र 2500-3000 साल पुराना इतिहास हमको पढ़ाया जाता है। लेकिन क्या राम और हमारा इतिहास सिर्फ इतना पुराना है। अंग्रेजों का साल चल रहा है 2019 और हमारा तो संवत ही 2076 हैं, उनसे आगे तो हम संवत में ही चल रहे हैं। कहते हैं जिस संस्कृति को मिटाना हो उस संस्कृति पर प्रश्न चिन्ह लगा दो फिर आपको कुछ करने की आवश्यकता नहीं है उस समाज के लोग ही अपनी संस्कृति को किंतु परंतु करके समाप्त कर देंगे और यही काम अंग्रेजो ने किया हमारे साथ। हम नहीं चाहते हैं की हमारी संस्कृति नष्ट हो क्योंकि जब तक सनातन है तब तक विश्व का कल्याण हो सकता है। आप अगर भारत का भला चाहते हैं तो आज से ही अपने बच्चों को भारतीय संस्कृत, संस्कृति और संस्कारों का ज्ञान देना शुरू करें।

महाराज श्री ने कहा कि कई बार ऐसा होता है की आपने कुछ बुरा नहीं किया होता है लेकिन यह संसार आप पर संदेह करता है। जीवन में एक बात सीख लो जीवन में आप सही होंगे तभी आपको लोग सही समझेंगे यह जरूरी नहीं है और हमेशा गलत होंगे तभी भी आपको गलत समझेंगे यह भी जरूरी नहीं है।

महाराज श्री ने कहा कि जो राम का नहीं है वो तुम्हारा नहीं है, इस बात को अपने जीवन में धारण करो। अगर दुष्टों को संग करोगे तो तुम्हे राम से प्रीति नहीं होगी। जीवन में एक संकल्प करो जो राम का है वहीं काम का है, जो राम का नहीं वो किसी काम का नहीं।
[18:45, 11/5/2019] Kapil Pandey: कथा पंडाल में कानपुर की महापौर श्रीमती प्रमिला पाण्डेय और अकबरपुर से सांसद श्री देवेंद्र सिंह भोले जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की और से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

3Nov 2019

“धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र-शास्त्र दोनों की आवश्यकता पड़ती है : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

“धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र-शास्त्र दोनों की आवश्यकता पड़ती है : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

बड़े भाग्यशाली वो लोग जो भगवान के उत्सवों में सम्मिलित होते है : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा समिति कानपुर एवं विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 30 अक्टूबर से 05 नवंबर 2019 तक मोतीझील ग्राउंड में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से राम मंदिर के लिए संकल्पित श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है। पंचम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

श्री राम कथा के पंचम दिवस की शुरुआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

आज कथा पंडाल में सिद्धनाथ आश्रम के बालयोगी श्री अरुण चैतन्य जी महाराज, पनकी महंत श्री कृष्ण दास जी महाराज, श्री जनार्दन दास जी महाराज, श्री आदित्य ब्रह्मचारी जी महाराज और हमारे बीच विधायक महेश त्रिवेदी जी एवं हिन्दू युवा वाहिनी 12 संगठन और उनकी पूरी टीम , हिन्दू जागरण मंच, कथा का आनंद प्राप्त करने के लिए साथ ही साथ महाराज श्री का आशीर्वाद एवं व्यास पीठ से आशीर्वाद प्राप्त किया। पूज्य शांतिदूत धर्मरत्न श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में कथा की शुरुआत करते हुए सर्वप्रथम कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को " सीता राम राधे श्याम जय जय सीता राम " भजन श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में ने आगे कहा कि कई बार ऐसा लगता है अधिक सहनशील नहीं होना चाहिए जीवन में। हम अपने देवी देवता के विषय में अगर सोचे तो ऐसा कोई देवी देवता नहीं मिलेगा जिसके हाथ में कोई शत्र न हो। भगवान शिव के एक हाथ माला है तो दूसरे हाथ में त्रिशूल भी है इसका मतलब है हमारे देवी देवता यह इशारा भी करते है आप अपने समाज की अपने धर्म की रक्षा अगर करना चाहते है तो आपको शास्त्र- शस्त्र दोनों की आवश्यकता पड़ेगी।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा की जितनी मेहनत आप दो चीजों में करते हो "खाने में" और "कमाने में" उतनी तत्वपर्ता और मेहनत ईमानदारी से धर्म को आगे बढ़ाने में कर दी होती तो आज हमें राम मंदिर के निर्माण की बात छोड़ो कृष्ण मंदिर भी बन गया होता मथुरा में, भगवान शिव का मंदिर भी बन गया होता काशी में। हम लोग ये सोचते है हमारे आगे कोई चले और हम पीछे चले ये सोचते थे दस साल पहले आज तो ये सोचते की अब कोई एक ही कर ले और हम बैठे रहे। हमारे यहाँ शास्त्र- शस्त्र दोनों की आवश्यकता है, शास्त्र कोई प्रेम से माने। श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने राम कथा का उदहारण देते हुए कहा कि रावण ने जैसा अपराध किया शायद कोई करें सीता जी का हरण करके ले गया। तो राम जी शास्त्र- शस्त्र दोनों का प्रयोग किया। राम जी ने शास्त्र का प्रयोग किया। बोलो किनको भेजा सबसे पहले लंका। जब हनुमान जी जा रहे थे सीता जी का पता करने राम जी ने कहा अपने पीछे बुला कर हमें पता है की ये काम तुम्ही करोगे। सबके सामने कहना ठीक नहीं। हनुमान जी कौन है। ज्ञानियों में अग्र, श्री हनुमान जी महाराज ने क्या नहीं किया, हनुमान जी के साथ वहां लोगो ने एक छोटी से रस्सी से बांध दिया बड़ी चतुरता के साथ काम किया। हनुमान जी चाहते तो अपनी पूछ हिलाकर ही सबकी हटा देते लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया इसी को कहते है शास्त्र।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

 

3Nov 2019

आज विधायक श्री राकेश गोस्वामी जी, श्री बंटू मिश्र जी, श्री अनिल जी, श्री अखिलेश तिवारी जी, श्री रामाश्रय गुप्ता जी, श्री जगदीश साहु जी, श्री रामबाबू नाना जी, श्री विवेक पाठक जी, श्री भूपनेश जी, श्री राजेन्द्र साहु जी, श्री बालकिशन कुशवाह जी आदि गणमान्यों ने झांसी में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 11-18 नवंबर 2019 तक आयोजित होने वाली श्रीमद्भागवत कथा के लिए भूमी पूजन किया।

आज विधायक श्री राकेश गोस्वामी जी, श्री बंटू मिश्र जी, श्री अनिल जी, श्री अखिलेश तिवारी जी, श्री रामाश्रय गुप्ता जी, श्री जगदीश साहु जी, श्री रामबाबू नाना जी, श्री विवेक पाठक जी, श्री भूपनेश जी, श्री राजेन्द्र साहु जी, श्री बालकिशन कुशवाह जी आदि गणमान्यों ने झांसी में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 11-18 नवंबर 2019 तक आयोजित होने वाली श्रीमद्भागवत कथा के लिए भूमी पूजन किया।

आप सभी भक्तगण इस कथा का लाइव प्रसारण आस्था चैनल एवं महाराज श्री के यूट्यूब चैनल पर देख सकते हैं।

3Nov 2019

आज कानपुर के SGM International School में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से "स्वधर्म का बोध" नामक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। स्कूल में पहुंचने पर पूज्य महाराज श्री का भव्य स्वागत किया गया एवं सॉल, तिलक, माला पहनाकर एवं स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

राधे राधे,आज कानपुर के SGM International School में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से "स्वधर्म का बोध" नामक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। स्कूल में पहुंचने पर पूज्य महाराज श्री का भव्य स्वागत किया गया एवं सॉल, तिलक, माला पहनाकर एवं स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। महाराजश्री ने सभी को अपने प्रवचनों के माध्यम से बताया कि अपने माता पिता, परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों का पालन कैसे करना चाहिए, साथ ही स्कूली बच्चों को समझाया कि किस प्रकार से अपने धर्म और संस्कृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाएं । राधे राधे।। #Kanpur2019

2Nov 2019

“विनाश नहीं विकास का जो मार्गदर्शन है वो सनातनियों ने ही दिया है”।

“विनाश नहीं विकास का जो मार्गदर्शन है वो सनातनियों ने ही दिया है”

“अच्छे मन से किया हुआ संकल्प कभी अधूरा नहीं रहता”

विश्व शांति सेवा समिति कानपुर एवं विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 30 अक्टूबर से 05 नवंबर 2019 तक मोतीझील ग्राउंड में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से राम मंदिर के लिए संकल्पित श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है। तीसरे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

श्री राम कथा के तीसरे दिन की शुरुआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
आज कथा पंडाल में कानपुर से सांसद श्री सत्यदेव पचौरी जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

 

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की भगवान श्री राम समस्त मानव जाती के कल्याण के लिए इस धराधाम पर अवतरित हुए थे। ये दुखद विषय ही है की अयोध्या में राम मंदिर बने या ना बने या वो भूमि किसकी है। ये एक इतिहास है की कुछ बाहरी लुटेरे आए जिन्होंने भारत में मंदिर तोड़े, हम लोगों को ठेस पहुंचाई। पूरे संसार ने चाहे जितनी भी प्रगति की हो, सांसारिक लोगों ने प्रगति करके केवल विनाश की चीजें ही एकत्रित्र की हैं, लेकिन हमारे भारत ने, भारत के ऋषियों ने, भारत के प्रबुद्ध जीवों ने और तो और बार बार अवतार लेकर भगवान ने भी किस तरह से बाहरी नहीं भीतर विकास किया जाए ये हमारे भगवान, हमारे ऋषियों ने ही समझाया। विनाश नहीं विकास का जो मार्गदर्शन है वो सनातनियों ने ही दिया है और इस बात को पूरी दुनिया मानती भी है की सनातनियों ने शांति के साथ शांतिप्रद विकास, ज्ञान का प्रकाश हम सब को प्रदान किया है।

महाराज श्री ने आगे कहा कि आज जो लोग इस बात को कहते हैं की हम धर्म को नहीं मानते, भगवान को नहीं मानते उनको क्या मिला? चाहे पहले की राम द्रोही हों, चाहे अब के राम द्रोही हों, रोना पहले भी पड़ा था, रोना अब भी पड़े रहा है यह निश्चित है। जो राम को नहीं मानते, राम की नहीं मानते उनकी चाहे लंका सोने की हो लेकिन वहां का माहौल अच्छा नहीं है।
महाराज श्री ने कहा कि ज्ञान मार्ग दो धारी तलवार है, इसमे चलना कठीन है, इस मार्ग पर चलने वालों को अनेक प्रकार की लौकिक सिद्धियां के लालच में लाता है, मोह मिटाता है, माया जाल फैलाता है, अधिकांश ऐसा देखने में आता है की काम पर विजय पाने वालों को काम की कीर्ति में फसा देती है यह संसार, यह माया।

महाराज श्री ने आगे कहा कि ये जो संसार है ये गिने चुने दो चार कामों में ही व्यस्त है, खाओ, कमाओ, बच्चे पालो और सो जाओ इसके अलावा जीव कुछ नहीं कर पाता है। इतना अनमोल जीवन है, हर एक चीज अनमोल है, उसके बावजूद भी इस जीवन को हम व्यर्थ गवाने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। कोई अच्छे उद्देश्य के साथ कोई काम कर रहा हो तो हम उसमें भी उसका साथ नहीं दे सकते। भगवान श्री राम अकेले केवल एक भारतीय के नहीं है, वो पूरी मानवता के हैं। जो मानवता में अच्छाई देखता है भगवान श्री राम उसके लिए सबसे बड़ी धरोहर हैं इस विश्व की। राम आत्मा, राम परमात्मा ऐसे राम का गुणगान करिए। उन भगवान श्री राम के मंदिर का निर्माण हो ऐसी प्रार्थना तो हम और आप कर सकते हैं। अगर कोई मनोरथ हम पूरे ध्यान से करते हैं तो देर से ही सही पर उस मनोरथ में भगवान पूरा जरूर करते हैं, अच्छे मन से किया हुआ संकल्प कभी अधूरा नहीं रहता, आपको अच्छे मन से संकल्प करना चाहिए ।

31Oct 2019

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण से होगा देश के युवाओं में संस्कारों का निर्माण।

भगवान श्रीराम ने अपने कर्म से समाज को उपदेश दिए ना कि वाणी से

• कर्म से उपदेश देने वाला राम जैसा गुण किसी और में नहीं है।

• अयोध्या में राम मंदिर निर्माण से होगा देश के युवाओं में संस्कारों का निर्माण

विश्व शांति सेवा समिति कानपुर एवं विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली के तत्वाधान में परम पूज्य शांतिदूत धर्मरत्न श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के श्रीमुख से श्री राम कथा का दशम् भव्य एवं विशाल आयोजन मोतीझील मैदान, कानपुर में 30 अक्टूबर से 5 नवंबर 2019 तक समय दोपहर 2:30 बजे से 6:30 बजे तक हो रहा है। कथा के द्वितीय दिवस हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

श्री राम कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कानपुर में चल रहे है श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने द्वितीय दिवस की कथा में कानपुर बुंदेलखंड के बीजेपी क्षेत्रीय अध्यक्ष विकास दुबे जी पहुंचे और पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी का श्रीराम मंदिर के निर्माण हेतु संकल्पित श्रीराम कथा के लिए धन्यवाद किया।

पूज्य शांतिदूत धर्मरत्न श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने अपनी कथा के शुरूआत से पहले समिती के लोगों और कार्यकर्ताओं का विशेष धन्यवाद दिया और कहा कि अगर समिति के लोग और कार्यकर्ताएं रात-दिन कड़ी मेहनत न करते तो ये कार्य कभी सफल न हो पाता। इसके बाद कथा का शुभ आरंभ भगवान राम का गुणगान करते हुए किया और बताया कि अयोध्या में भगवान राम का मंदिर आखिर क्यों बनना चाहिए। महाराज जी कहा कि भगवान श्रीराम का मंदिर अयोध्या में इसलिए बनना चाहिए क्योंकि भगवान राम जैसा आदर्श पुरूष, पुत्र, पति, मित्र, कोई नही है। यहां तक की उन जैसा आदर्श शत्रु भी कोई नहीं हो सकता। क्योंकि वे ऐसे महान पुरूष हैं जो अपने शत्रुओं पर भी दया करते हैं। उनके पास अगर रावण का भाई भी शरण ले लें तो वो उन्हें भी अपने भाई जैसा समझ लेते हैं और उनकी रक्षा करते हैं।

उन जैसा प्रीत करने वाला, रिश्ते निभाने वाला, धैर्यवान, बलवान, बुद्धीमान, नीती कुशल यहां तक की धर्मात्मा और कोई नहीं है। क्योंकि जो सबका आदर करता हो, सबका सम्मान करता हो, सबका सत्कार करता हो। ऐसे भगवान के लिए मंदिर का निर्माण अवश्य होना चाहिए। सर्वशास्त्रों के ज्ञाता उन जैसा कोई नहीं हैं। अगर कोई उनके गुणों व्याख्यान करना चाहे भी तो भी नहीं कर सकता। क्योंकि राम अनंत है उनके गुणों की कोई सीमा नहीं है। इस धरती में भगवान राम ने एक आदर्श मानव का चरित्र जीवन जीया है।लोगों को भी उन्होंने एक आदर्श मानव बनने की सीख भी दी है। उपदेश देने वाले दुनिया में बहुत मिलते हैं। सुबह टीवी खोलो कई प्रवचन करने वाले दिख जाते हैं। लेकिन जो अपने चरित्र से उपदेश दें, वाणी से नहीं अपितु अपने कर्म से उपदेश देने वाला राम जैसा गुण किसी और में नहीं है। वो मानवो सर्वोक्षेष्ठ हैं। वो इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने भाईयों और प्रजा से ही नहीं बल्कि अपनी सौतेली मां से भी इतना प्रेम किया जितना आजका पुरूष नहीं कर सकता। ऐसे मर्यादा पुरुषोत्तम राम का मंदिर अयोध्या में अवश्य बनना चाहिए।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

29Oct 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में कानपुर में 30 अक्टूबर से 5 नवंबर तक अयोध्या में भगवान श्रीराम मंदिर के निर्माण हेतु संकल्पित श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है जिसके तहत आज पूज्य महाराज श्री कानपुर पहुँचे

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में कानपुर में 30 अक्टूबर से 5 नवंबर तक अयोध्या में भगवान श्रीराम मंदिर के निर्माण हेतु संकल्पित श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है जिसके तहत आज पूज्य महाराज श्री कानपुर पहुँचे, जहाँ भक्तों एवं विश्व शांति सेवा समिति कानपुर के सदस्यों द्वारा स्वागत किया गया। आप सभी भक्तगण 30 अक्टूबर से दोपहर 3 बजे से सीधा प्रसारण महाराज श्री के यूट्यूब चैनल पर देख सकते हैं एवं विशेष प्रसारण आस्था भजन चैनल पर 31 अक्टूबर से दोपहर 12 बजे से देख सकते हैं।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

16Oct 2019

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में काली मठिया हनुमान मंदिर, 80 फ़ीट रोड़, अशोक नगर, कानपुर से कथा स्थल (मोतीझील ग्राउंड, कानपुर) तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में काली मठिया हनुमान मंदिर, 80 फ़ीट रोड़, अशोक नगर, कानपुर से कथा स्थल (मोतीझील ग्राउंड, कानपुर) तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई। इस कलश यात्रा में हजारों की संख्या में माताओं-बहनो और भाई-बंधुओं ने भाग लिया।

कलश यात्रा ढ़ोल नगाड़े के साथ निकाली गई। कलश यात्रा जिन मार्गों से होकर गुजरी वहां इस भव्य कलश यात्रा को देखने के लिए लोग थम गए, हर किसी ने इस अद्भुत यात्रा का आनंद लिया। जहां तक दृष्टि जा रही थी वहाँ तक माताएं-बहने कलश सिर पर लिए दिख रही थी। यहां पर पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 30अक्टूबर से 5 नवंबर तक श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है।

|| राधे-राधे बोलना पड़ेगा ||

30Oct 2019

भगवान श्रीराम हिन्दुओं के नहीं अपितु पुरे विश्व के आदर्श हैं।

राम का मंदिर बनाने में इतनी तकलीफ क्यों
मक्का मदिना में नही अयोध्या में मंदिर बनाने की हिन्दू कर रहा है बात

भाईचारा की बात है तो हमें अयोध्या के साथ-साथ मथूरा में श्री कृष्ण और काशी में भोलेनाथ का मंदिर बनाकर दें

भगवान श्रीराम हिन्दुओं के नहीं अपितु पुरे विश्व के आदर्श हैं।

विश्व शांति सेवा समिति कानपुर एवं विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली के तत्वाधान में परम पूज्य शांतिदूत धर्मरत्न श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के श्रीमुख से श्री राम कथा का दशम् भव्य एवं विशाल आयोजन मोतीझील मैदान, कानपुर में 30 अक्टूबर से 5 नवंबर 2019 तक समय दोपहर 2:30 बजे से 6:30 बजे तक हो रहा है। प्रभु श्री राम मंदिर को संकल्पित श्री राम कथा में सर्वप्रथम दीप प्रज्वलन का कार्यक्रम किया गया जिसमें कानपुर नगर की महापौर श्रीमती प्रमिला पांडेय जी एवं गोविंद नगर के विधायक श्री सुरेंद्र मैथानी जी ने पूज्य महाराज श्री के साथ मिलकर दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम की शुरुआत की

कार्यक्रम के शुरुआत में महाराज जी ने हरे रामा रामा राम सीता राम राम राम भजन से पूरे कथा पंडाल को मंत्रमुग्ध कर दिया एवं श्री राम मंदिर का कोर्ट से जल्द फैसला हो और राम मंदिर के पक्ष में फैसला हो इसके लिए प्रभु श्रीराम से विनय की एवं सभी भक्तों ने भी महाराज श्री के साथ ऐसी ही कामना की।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा की भगवान श्रीराम हिन्दुओं के नहीं अपितु पुरे विश्व के आदर्श हैं। राम किसी के जैसे नही बल्कि राम अपने आप में ही राम है। राम की उपमा नही दी जा सकती। जैसे सागर जैसा कोई नही है वैसे राम जैसा भी कोई नही। तो हम भारतीयो को राम का मंदिर बनाने में इतनी तकलीफ क्यों होती है। जिसने भाई के लिए राज-पाठ छोड़ा, जिसने सौतेली मां के आदेश पर 14 वर्ष के वनवास पर गए। जिन्होंने ऊंच-नीच को परे रखकर शबरी के जूठे बैर खाए। आज उनके मंदिर के निर्माण के लिए हमें कोट कचहरी के चक्कर काटना पड़ रहा है। हम मक्का मदिना में नही अयोध्या में मंदिर बनाने की बात कर रहे हैं। हमने आपसे कभी नहीं पूछा की आपके भगवान कहां आए थे। तो तुम हमसे ये सवाल क्यों करते हो। अगर आपमें भाईचारा की बात है तो हमें अयोध्या के साथ-साथ मथूरा में श्री कृष्ण और काशी में भोलेनाथ का मंदिर बनाकर भी दें। हमारे लिए तीनो महत्वपूर्ण है। पुरूषों का जीवन राम के जैसा हो और स्त्रियों का जीवन माता सीता जैसा होना चाहिए। धर्म पर चलने से ही शांति और समृद्धी की प्राप्ति होती है, वंश फलता फूलता है। अधर्म के मार्ग पर चलने वाले का जीवन में हमेशा अंधकार और अशांति से भरा रहता है। महाराज श्री ने वाल्मीकि प्रसंग भक्तों को श्रवण कराया।

इसके उपरांत

वर्णानाम संघानाम रसानाम छन्दसामपि ।
मंगलानां च कर्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ ।।
तुलसी चरित्र का पूज्य महाराज श्री ने सविस्तार वर्णन किया,
दुनिया चले ना श्री राम के बिना राम जी चले ना हनुमान के बिना
भजन को गया जिसमें कथा पंडाल में मौजूद सभी भक्तों झूमने लगे।

आज कार्यक्रम में सर्व श्री वीरेंद्र गुप्ता विपिन बाजपेई सतीश गुप्ता शिव शरण वर्मा राम गोपाल बांग्ला सुरेंद्र नाथ त्रिपाठी निरंकार गुप्ता मंजू शुक्ला डॉक्टर यू पी सिंह नीलम सिंह प्रभा शंकर वर्मा राम विनय यादव माया सिंह अजय मिश्रा अनिल श्रीवास्तव विमला दीक्षित राजेश गुप्ता संजीव मंडल संजीव पटेल पूनम पांडे अनुज अवस्थी किरण तिवारी आभा गुप्ता सुमन गुप्ता प्रीति मिश्रा रविंद्र यादव आदि समस्त समिति के सदस्य उपस्थित रहे।

27Oct 2019

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने अनाथ एवं ग़रीब बच्चों के साथ दीपावली मनाई।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने अनाथ एवं ग़रीब बच्चों के साथ दीपावली मनाई। दीपावली के पावन पर्व पर महाराज श्री ने बच्चों को मिठाई, वस्त्र इत्यादि भेंट किये। #DiwaliDuwaonKiDN #Diwali

 

27Oct 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बच्चों को परोसा भोजन, मिष्ठान-कपड़े-पटाखों का किया वितरण

धु्रव तपोस्थली पर विपन्न बच्चों संग मनायी ‘दुआओं की दीवाली’
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बच्चों को परोसा भोजन, मिष्ठान-कपड़े-पटाखों का किया वितरण

मथुरा । विश्व शांति सेवा चैरीटेबल ट्रस्ट एवं मेरा भारत-मेरा स्वाभिमान के तत्वाधान में निर्धन एवं असहाय परिवारों के बच्चों संग दीपावली त्यौहार धूमधाम से मनाया गया । अध्यक्ष पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के अगुवाई में संस्था ने स्ट्रीट स्कूल में पढ़ने वाले 200 से अधिक बच्चों को मथुरा के ग्राम महोली स्थित प्राचीन धु्रुव तपोस्थली मंदिर का भ्रमण कराया ।

पूज्य महाराजश्री ने स्वंय अपने हाथों बच्चों को भोजन परोसा व उनके बीच में बैठकर वन भोज प्रसाद ग्रहण किया । इसके पश्चात संस्था की ओर से सभी बच्चों को मिष्ठान, गर्म कपड़े, पटाखें आदि वितरित किये गये । इस अनूठे आयोजन को पूज्य महाराजश्री ने ‘दुआओं की दीवाली’ का नाम दिया था । सच में उपहार पाकर प्रसन्नता से खिले सैकड़ों चेहरों को देखकर लग रहा था कि अभावों में रह रहे छोटे-छोटे बच्चों की खिलखिलाहट से हजारों दुआयें ही निकल रहीं थीं ।

पूज्य महाराज श्री ने बच्चों के निवास स्थान एवं स्ट्रीट स्कूलों पर रोशनी के लिये दीपक देते हुये कहा कि जिस प्रकार एक जलता हुआ दीपक अपने तले अंधेरा होने के बावजूद दूसरों के लिये प्रकाश फैलाता है, उसी प्रकार हम भी अच्छाईयों और मानवता का प्रकाश चारों ओर फैलाते रहें । दीपावली प्रकाश का त्यौहार है । हमारे पास अगर थोड़ी सी भी खुशियाॅं भगवान की कृपा से हैं तो उनका कुछ प्रकाश हमारे आस-पास रह रहे अभावग्रस्त परिवारों में भी देना चाहिये । यकीन मानियें उन परिवारों की हसीं के रूप में स्वंय परमात्मा आपको आशीष देंगे । पूज्य महाराजश्री ने कहा कि अगर सम्पूर्ण समाज में यह सोच हो जाये तो कोई भी दुखी न रहे । हम सभी एक परिवार के रूप में हैं । परिवार में खुशियाँ बाँटने से ओर बढ़ती हैं ।

इससे पूर्व पूज्य महाराज श्री ने बच्चों के साथ भजनों की अनूठी अंताक्षरी खेली । जिसमें कई बच्चों ने तो बहुत सुरीली आवाज में गाकर अपनी प्रतिभा से सभी को चैंका दिया । प्राकृतिक वातावरण में धार्मिक स्थल पर बच्चों ने खूब आनंद लिया । संस्था सदस्यों ने बच्चों के बीच अनार, चकरी, फुलझड़िया आदि चलाकर बच्चों को आनंदित कर दिया ।

इस अवसर पर संस्था सचिव श्री विजय शर्मा, आचार्य श्यामसुन्दर शर्मा, गजेन्द्र सिंह, देवांश, जगदीश वर्मा, अवधपुरी स्ट्रीट स्कूल के श्री सतीश शर्मा, वंदना, आदर्श पाठशाला स्ट्रीट स्कूल के अश्वनि राजोरिया, मंदिर महंत लाल दास, बालक रामदास, जगराम, दीपक चैहान आदि प्रमुख रूप से उपस्थित रहे ।

28Oct 2019

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज गोवर्धन पूजा के पावन पर्व पर गोवर्धन की तलहटी में पहुंचे जहां पर पूज्य महाराज श्री ने अपनी माता जी के साथ में गिरिराज भगवान की विधि विधान से पूजा अर्चना की एवं सवा मण दूध से भगवान का अभिषेक किया।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज गोवर्धन पूजा के पावन पर्व पर गोवर्धन की तलहटी में पहुंचे जहां पर पूज्य महाराज श्री ने अपनी माता जी के साथ में गिरिराज भगवान की विधि विधान से पूजा अर्चना की एवं सवा मण दूध से भगवान का अभिषेक किया।

 

23Oct 2019

“जब हरि को जानने के इच्छा मन में जागृत होती है उसी का नाम भागवत है”

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 18 से 24 अक्टूबर 2019 तक प्रतिदिन गोमती नदी के निकट, खुनशेखपुर, सुल्तानपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की जब हरि को जानने के इच्छा मन में जागृत होती है उसी का नाम भागवत है। क्योंकि ईश्वर को जाने बिना आपको प्रित ही नहीं हो सकती। हम किसी को जानते है, उसके स्वभाव को जानने की कोशिश करते हैं, जब उसका स्वभाव अच्छा लगता है तो उससे प्रेम होता है। संसार को व्यवाहर भी विचित्र सा है यह मतलब पर टीके हुए हैं सारे व्यवहार किसी से भी जोड़ लिजिए। शुरूआत में तो बाते बड़ी लम्बी लम्बी कर देते हैं लेकिन जब बारी आती है तो सब किनारे हो जाते हैं। तो ईश्वर को जब तक आप जानने के इच्छा मन में नहीं रखेंगे तब तक प्रित नहीं हो सकती। अगर आप ईश्वर को जानना चाहते हैं, ईश्वर का स्वभाव, उनका गुण, उनसे प्रित लगाना चाहते हैं तो आपको सत्संग मे जाना होगा।

महाराज श्री ने कहा कि हमारे बुजुर्गों ने कहा है कि अन्न का कभी अपमान नहीं करना चाहिए, अन्न को बर्बाद नहीं करना चाहिए। संत का क्षण और अन्न का कण कभी बेकार नहीं करना चाहिए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।

22Oct 2019

जिनका मन निर्मल है वहीं प्रभु को प्राप्त कर सकता है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 18 से 24 अक्टूबर 2019 तक प्रतिदिन गोमती नदी के निकट, खुनशेखपुर, सुल्तानपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के पंचम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि आप सभी को इस बात का सौभाग्य होना चाहिए आप सभी सनातनी हैं और सनातनी पथ पर चलकर अनेकों अवतार हमारे भगवान ने लिए हैं। सनातन धर्म के अलावा किसी भी धर्म में किसी भी भगवान का कोई अवतार नहीं हुआ है।

महाराज श्री ने कहा कि सभी माता पिता को अपने बच्चों को हनुमान चालिसा का पाठ कराना चाहिए, आप अपने बच्चों को कहिए चाहे कुछ भी हो जाए तुम तब तक भोजन नहीं करोगे जब तक हनुमान चालीसा का पाठ नहीं कर लेते। स्नान करो और 5-10 मिनट ठाकुर जी के आगे बैठो उनका धन्यवाद करो की उन्होंने आपको खाने के लिए भोजन दिया है।

महाराज श्री ने कहा कि आप अपना सम्बंध गोविंद से जोड़ कर रखिए, कल तक कितने भी बुरे कर्म किए हों उसकी चिंता मत करो, कल तक जो हो गया उसे भूल जाए, अपना बचा हुआ समय सदुपयोग करो और अपना सम्बंध ठाकुर जी से जोड़ लो, जब ठाकुर जी से सम्बंध जुड़ जाएगा तो ठाकुर जी स्वयं ही तुम्हारा बेड़ा पार कर देंगे, इसके कोई दो राय नहीं है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराजा ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।

 

20Oct 2019

आज कानपुर में 30 अक्टूबर से 5 नवंबर 2019 तक मोतीझील ग्राउंड कानपुर मे आयोजित श्रीराम कथा के प्रचार प्रसार हेतु प्रचार यात्रा निकाली गयी।

आज कानपुर में 30 अक्टूबर से 5 नवंबर 2019 तक मोतीझील ग्राउंड कानपुर मे आयोजित श्रीराम कथा के प्रचार प्रसार हेतु प्रचार यात्रा निकाली गयी। यात्रा का शुभारंभ मुख्य अतिथि विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी ने किया। इस अवसर पर विश्व शांति सेवा समिति कानपुर के पदाधिकारी, सभी कार्यकर्ता और बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे। श्री विजय शर्मा जी ने झंडी दिखाकर यात्रा को प्रारंभ की और उसके बाद में महाराज श्री के आदेश अनुसार बताया कि ये राम कथा राम मंदिर के लिए संकल्पित होगी। इस प्रचार यात्रा में अनेको गाड़ियां पुरे कानपुर में होर्डिन लगाकर कथा का प्रचार करेंगी, साथ ही घर - घर जाकर निमंत्रण भी दिए जा रहे। समिति के लोगों ने आए हुए लोगों को शर्मा जी के साथ में निमन्त्र कार्ड भी दिया और सबको विशेष निमन्त्र देकर आयोजन में सम्मिलित होने के लिए कहा। श्रीराम कथा प्रचार यात्रा 30 अक्टूबर से 5 नवंबर 2019 12 photos

20Oct 2019

 “इस संसार सबसे बड़ी संपत्ति यश है।: पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”


विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 18 से 24 अक्टूबर 2019 तक प्रतिदिन गोमती नदी के निकट, खुनशेखपुर, सुल्तानपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।
भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया। कथा के तीसरे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
भागवत कथा के तीसरे दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
हे प्रभु मुझे बता दो, चरणों मे कैसे आऊँ महाराज श्री ने भजन को आगे बढ़ाते हुए कहा की जितने प्यार से भोजन करते हो उतने ही प्यार से भजन करो। महाराज जी ने बताया की यथार्थ सत्य ये ही है की काल रुपी तक्षक हम सबके पीछे पड़ा है लेकिन हम सब भुलाये बैठे है राजा ने अपनी मुक्ति का प्रयत्न किया। हम प्रयत्न नहीं करना चाहते । जानते सब है की मरना है लेकिन याद नहीं रखना चाहते। अपने हाथो से अपनों को जला कर श्मशान में विदा करके आते है खुद ऐसे जिन्दा रहते जैसे हम कभी मरेंगे ही नहीं। अपनों पर जोर - जोर से रोने वाले अपनों के मरने के बाद उनके मरे हुए शरीर पर सर पटक - पटक कर रोने वाले लोग भी अपने आप को अमर समझते है। कितना दुर्भाग्य है। उस शरीर को सजाने सवारने में पूरा जीवन लगा देते है जो नश्वर है। मिटेगा ही उस आत्म की कोई परवा नहीं जिस आत्मा के लिए ये मानव जीवन मिला है । आप माने या न माने ईश्वर के रूल्स बदलने वाले नहीं है। आप अगर भगवान को नहीं भी माने। तो आपके न मानने से भगवान के सत्ता और भगवान रूल बदलने वाले नहीं है। आप भगवान मानते है तो निश्चित आपका कल्याण होने वाला है। जैसे कर्म करेंगे आप बैसा ही फल पाएंगे । राजा को तो पता चला की सातवे दिन तक्षक डस लेगा तो उसकी मृत्यु हो जाएगी हम सबकी भी तो मृत्यु सातवे दिन में है। ये ही सात दिन है जो हम को ले जायेगा आठमा दिन तो कोई होगा नहीं। इन्ही साथ दिनों में हमारा जन्म होता है इन्ही साथ दिन में हमारी मृत्यु होती है। और इस छोटी सी जीवन में हम लोगो ने व्यर्थ अपवाद - विवाद ही किया कभी प्रभु से मिलने का संवाद नहीं किया।
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।
तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।

21Oct 2019

“आपको भगवान जो कुछ भी दे उसका कभी अभिमान मत किजिए”

 

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 18 से 24 अक्टूबर 2019 तक प्रतिदिन गोमती नदी के निकट, खुनशेखपुर, सुल्तानपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।
कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। कथा के चतुर्थ दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जब व्यक्ति के प्राण निकलते हैं तो सबसे बड़ी विपत्ति होती है। जब प्राण निकलते हैं विपत्ति आती है तो हमारे मुख से आवाज भी निकलती, घर वालों को पता भी नहीं चलता और प्राण निकल जाते हैं। अनेकों ग्रथों में ऐसा माना गया है कि प्राण निकलते हैं तो जीव को सबसे ज्यादा तकलीफ होती है उस समय लेकिन भगवत भक्तों को बिल्कुल भी कष्ट नहीं होता। उन्हें तो ईश्वर भगवत कृपा से सहज ही अपने पास बुला लेते हैं। लेकिन जो ईश्वर को भुलाए बैठे हैं उन्हें अपार कष्ट का सामना करना पड़ता है। इसलिए समझदार व्यक्ति वही है जो अपना परलोक संभाल कर रखे। जिसने अपना परलोक संभाल कर नहीं रखा उसका सर्वस्व ही समाप्त हो जाता है।

महाराज श्री ने कहा कि आपको भगवान जो कुछ भी दे उसका कभी अभिमान मत किजिए। आपको चाहे रूप दे, रंग दे, बल दे, धन दे, चाहे भक्ति ही क्यों ना दे उसका कभी अभिमान किजिए। किसी को तो इस बात का भी अभिमान हो जाता है की हम दिन में इतनी बार माला करते हैं। यह आप अपने भले के लिए करते हैं। आप कुछ पाना चाहते हो इसलिए माला करते हो, गोविंद को पाना चाहते हो इसलिए करते हो, तो उसमें घमंड किस बात का है।

महाराज श्री ने कहा कि हर मानव की आदत है की जब तक विपत्तियों में घिर ना जाए तब तक ईश्वर की याद नहीं आती है। जब तक वाह वाह होती रहे तब तक दुनिया ही अच्छी लगती है। जब दुनिया ठोकर मारने लगती है, अपने भी भुलाने लगते हैं तब ठाकुर की याद आती है की ये हमसे क्या हो गया। लेकिन जो सुख में सुमिरन करे तो दु:ख काहे को आए। अगर हम सुख के समय में ईश्वर को भूले हीं ना तो दुख की स्थिति बनेगी ही नहीं।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।
महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।
शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।
इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।
दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।
महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

19Oct 2019

"जिसने श्रीमद्भागवत की शरण ग्रहण कर ली है उनका कल्याण निश्चित है"

"जिसने श्रीमद्भागवत की शरण ग्रहण कर ली है उनका कल्याण निश्चित है"

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 18 से 24 अक्टूबर 2019 तक प्रतिदिन गोमती नदी के निकट, खुनशेखपुर, सुल्तानपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के दूसरे दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा कि शुरूआत करते हुए कहा कि भागवत कथा को सुनने के बाद हम जो भी मांगते हैं वो हमें भागवत कथामृत से प्राप्त होता है। यहां एक ही समस्या है की हम दूसरे की समस्या को अपनी नहीं समझते, दूसरे की प्राप्ति हम अपनी प्राप्ति नहीं समझते, ये सबसे बड़ी समस्या है। लोग कहते हैं उसे मिला हमें क्या मिला, जब आप कुछ करोगे तभी तो आपको मिलेगा, बिना करे कुछ प्राप्त नहीं होता है। बनी हुई रोटी को भी खाने के लिए हाथ चलाना पड़ता है। यह भागवत आपको सबकुछ दे सकती है लेकिन उसके लिए आपको भी मेहनत करनी पडेगी, भागवत श्रवण करनी पडेगी।

महाराज श्री ने कहा कि जीवन में अगर एक दूसरे पर संदेह तो कोई बात नहीं लेकिन संदेह ज्यादा दिन तक हो तो बड़ी बात है। संदेह हो तो बात उसी समय खत्म कर देनी चाहिए तभी रिश्ते चलते हैं, किसी भी बात को लंबा खिचोगे तो रिश्ते बिगड़ जाएंगे। आप गृहस्थ में हैं तो सबसे ज्यादा जरूरी है उस संबंध को निभाना क्योंकि हमारे यहां बनाया जाता है बिगाड़ा नहीं जाता। हमारे संस्कारों में एक ही संबंध है जुड़ गया तो निभाओ।

महाराज श्री ने आगे कहा कि आप अपने बच्चों को साधु संतों से, महात्माओ से, गुरूजनों से आशीर्वाद दिलवाओ, तभी आपके बच्चे संस्कारवान बनेंगे। अपने बच्चों से कहिए की रोज माता पिता, दादा, दादी को प्रणाम किया करें। बेटियों को कहो की हाथ जोड़ कर राम राम, राधे राधे किया करें।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं।

भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।

श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।

यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।

18Oct 2019

“राम हमारे पूर्वज थे, हैं और रहेंगे, उनकी समस्या हम सब की समस्या है

“राम हमारे पूर्वज थे, हैं और रहेंगे, उनकी समस्या हम सब की समस्या है"

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 18 से 24 अक्टूबर 2019 तक प्रतिदिन गोमती नदी के निकट, खुनशेखपुर, सुल्तानपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के प्रथम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया

भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने भागवत प्रसंग की शुरूआत भागवत के प्रथम श्लोक से की
सच्चिदानन्द रूपाय विश्वोत्पत्यादि हेतवे तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयम नुमः
वासुदेव सुतं देवम् कंस चानुर मर्दनम् देवकी परमानंदम् कृष्णम् वंदे जगदगुरुम्।।

महाराज श्री ने कहा कि भागवत के प्रथम श्लोक में भगवान को प्रणाम किया गया है, उनके स्वभाव का वर्णन किया गया है, उनकी लीलाओं का वर्णन किया गया है। भागवत को समझना भगवान को समझने के बराबर है।

पूज्य महाराज श्री ने कथा में बताया की अगर हमारे बच्चों को शिक्षा ना दी जाए तो यह संसार कैसा होगा ? जो अनपढ़ लोग होते हैं जिन्हे अक्षर का ज्ञान नहीं होता है जब वो किसी बोध वाले व्यक्ति के पास जाते है तो उन्होंने शर्म महसूस होती है की यह सबकुछ जानता है, हम कुछ नहीं जानते, यह अच्छा बोलता है हम अच्छा बोल नहीं सकते क्योंकि वो साक्षर है और हम निराक्षर हैं। उस अक्षर का कितना महत्व है जो शुरू में हमे अ सिखाती है। अगर बच्चों को जबरदस्ती स्कूल भेजो तो वह मना कर देते हैं, शुरुआत में बच्चे स्कूल जाना पसंद नहीं करते। वैसे ही भागवत रूप यह कथा पंडाल ज्ञान का एक स्कूल है, आपका प्राइमरी स्कूल सिखाता है पैसा कैसे कमाएं लेकिन भागवत का यह कथा पंडाल आपको सिखाता है जीवन कैसे जीना चाहिए ? आप स्कूली और कथा पंडाल दोनों की शिक्षाओं से असहमत नहीं हो सकते।
महाराज श्री ने राम मंदिर पर भी अपनी बात रखते हुए कहा कि कुछ लोगों को लगता है राम मंदिर से हमारा लेना देना क्या है ? कुछ भारतीय जो तथाकथित रूप से अपने आपको सेक्यूलर समझते हैं वो कहते हैं राम से हमारा मतलब क्या है, राम मंदिर बना तो ठीक, नहीं बना तो ठीक। इस समाज में देश में कुछ भी घटना घट रही हो आप उससे पलला नहीं झाड सकते, वरना एक दिन वो आएगा ये समस्या आपके घर तक पहुंच जाएगी और आपको बचाने वाला फिर कोई नहीं होगा। आपके देश में अगर वो समस्या है तो वो आपकी समस्या है।

महाराज श्री ने कहा कि राम हमारी अस्मिता है, राम हमारी आस्था है आप अपना घर बदल सकते हैं, काम बदल सकते हैं लेकिन जन्म स्थान नहीं बदल सकते, अपने पूर्वज आप नहीं बदल सकते और राम हमारे पूर्वज थे, राम हमारे पूर्वज हैं और राम हमारे पूर्वज रहेंगे, उनकी समस्या हम सब की समस्या है। हम सबको यह प्रार्थना करनी चाहिए अब बहुत हो चुका अब राम का वनवास नहीं होगा, अब राम मंदिर का निर्माण होगा।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की एक बात सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगो का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा ।

कथा पंडाल में श्रीमद् भागवत कथा के यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

13Oct 2019

हरी की शरणागति जो लोग करते है और कल्याण उन्ही का हुआ।

सनातन धर्म मंदिर कैंट, Seattle Kent के द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के श्रीमुख से 06 से 12 अक्टूबर 2019 तक Sanatan Dharm Mandir Kent, Seattle Kent, WA में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।
श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन श्रवण कराया "तुम पग पग पर समझाते, हम फिर भी समझ न पाते" और फिर महाराज जी बताया की अरे मनुष्य जीवन का जो उत्तम अवसर तुम्हें मिला हैं, यह बार-बार नहीं मिलने वाला। गोविन्द का चिंतन करले ये समय बार बार नहीं मिलेगा। नहीं तो पछताना पड़ेगा, बार-बार जीना,बार-बार जन्म,बार-बार मरना पड़ेगा।इसलिए राजाओं ने भी अपने राज्य पद का भी त्याग किया। बड़े - बड़े धनवान लोगो ने धन का त्याग किया। हरी की शरणागति जो लोग करते है और कल्याण उन्ही का हुआ जिन्होंने हरी की शरणागति स्वीकार करी। जो लोग अपने इतिहास में रूचि नहीं रखते वो लोग पछताते है। उन्हें दुःख पाना ही पड़ेगा। हम अपने इतिहास को इग्नोर नहीं कर सकते।
अब एक बात बताइये शांति किसको नहीं चाहिए ? जब तक आप अपने लक्ष्य पर ध्यान नहीं देंगे तब तक आपको शांति प्राप्त नहीं होगी। महाराज जी बताया की सब कुछ छोड़ कर जो लोग गोविन्द की भक्ति - भजन और गोविन्द में खो गये उन्हें शांति प्राप्त हो गयी। जिन लोगो ने कृष्ण भगवान की भक्ति करली उन सभी भक्तों का कल्याण हुआ है। और शांति प्राप्त हुई है। और बताया की जो सबसे महत्पूर्ण है उसकी तरफ चलना चाहिए। वो है शांति, वो है आत्म, वो है कल्याण, वो है मोक्ष ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंत: सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

13Oct 2019

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज और श्री विजय शर्मा जी ने Seattle Kent में श्रीमद भागवत कथा की समाप्ति के बाद न्यूयॉर्क के लिए प्रस्थान किया।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज और श्री विजय शर्मा जी ने Seattle Kent में श्रीमद भागवत कथा की समाप्ति के बाद न्यूयॉर्क के लिए प्रस्थान किया।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

14Oct 2019

शरद पूर्णिमा महोत्सव का सुंदर एवं भव्य आयोजन ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर के प्रांगण में बड़ी हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।

।। राधे राधे ।। कल आश्विन शुक्ल पक्ष पर "शरद पूर्णिमा महोत्सव" का सुंदर एवं भव्य आयोजन ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर के प्रांगण में बड़ी हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। जिसमें हजारों की तादाद में देश विदेश से भक्त पधारे। जिसमें सभी भक्तों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया एवं सर्वप्रथम गणेश वंदना कर कार्यक्रम की शुरुआत की गई तथा जानेमाने कलाकारों के द्वारा ठाकुर श्री प्रियाकांतजू भगवान, सर्वेश्वरीश्री राधा रानी के प्यारे प्यारे भजनों की प्रस्तुति दी गई। अंत में ठाकुर श्री प्रियाकांतजू भगवान की आरती का कार्यक्रम का समापन किया गया। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

14Oct 2019

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज एवं श्री विजय शर्मा जी ने अमेरिका में शान्ति संदेश यात्रा 2019 को सम्पूर्ण करने के बाद भारत के लिए प्रस्थान किया।

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज एवं श्री विजय शर्मा जी ने अमेरिका में शान्ति संदेश यात्रा 2019 को सम्पूर्ण करने के बाद भारत के लिए प्रस्थान किया।

 

15Oct 2019

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज एवं श्री विजय शर्मा जी का अमेरिका में आयोजित शांति संदेश यात्रा 2019 की समाप्ति के बाद भारत वापसी पर दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशन एयरपोर्ट पर फूलमाला पहनाकर सेकड़ो भक्तों ने भव्य स्वागत किया ।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज एवं श्री विजय शर्मा जी का अमेरिका में आयोजित शांति संदेश यात्रा 2019 की समाप्ति के बाद भारत वापसी पर दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशन एयरपोर्ट पर फूलमाला पहनाकर सेकड़ो भक्तों ने भव्य स्वागत किया । महाराज श्री के स्वागत के लिए सैकड़ों की तादाद में भक्त एयरपोर्ट पर उपस्थित रहे, सभी ने महाराज श्री को गुलदस्ते भेंट कर एवं राधे राधे के नारे लगाकर स्वागत किया। राधे राधे के नारों से पूरा एयरपोर्ट परिसर गुंजायमान हो उठा। पूज्य महाराज श्री ने अपनी माताजी एवं पूज्य पिताजी से आशीर्वाद प्राप्त कर अपने परिवारजनों के साथ ठा. श्री प्रियाकांत जू भगवान की आरती में सम्मिलित होकर दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। #WelcomeThakurJi

18Oct 2019

आज पूज्य महाराज श्री सुल्तानपुर पहुँचे जहां पर कथा के यजमान एवं अन्य भक्तों द्वारा महाराज श्री का स्वागत किया गया।

आज पूज्य महाराज श्री सुल्तानपुर पहुँचे जहां पर कथा के यजमान एवं अन्य भक्तों द्वारा महाराज श्री का स्वागत किया गया। पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में यहां 18-24 अक्टूबर तक श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। आप सभी भक्तगण महाराज श्री के यूट्यूब चैनल पर दोपहर 3 बजे से इसका सीधा प्रसारण देख सकते हैं।

 

10Oct 2019

हम जिन चीजों पर अभिमान करते हैं वह हैं क्या ?

सनातन धर्म मंदिर कैंट, Seattle Kent के द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के श्रीमुख से 06 से 12 अक्टूबर 2019 तक Sanatan Dharm Mandir Kent, Seattle Kent, WA में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया
भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि हम लोग खुशनसीब हैं की हमें मानव जीवन मिला है लेकिन जिन्हें जीवन का उद्देश्य समझ रहे हैं वही प्रर्याप्त नहीं है। हम जिन चीजों पर अभिमान करते हैं वह हैं क्या ? जवानी, धन औप पद ये तीन चीजें ऐसी हैं जो व्यक्ति को राह से भटकाती हैं, ये तीनों चीजें आती हैं तो व्यक्ति राह से भटक जाता है। जवानी पर कभी इतराना नहीं चाहिए क्योंकि जिस जवानी पर इतराते हो मत भूलना की कभी तुम्हारे पिता दादा भी जवान थे, जो पहले अकड़ कर चलते थे आज झूक कर चलते हैं। जो जवानी में झूक जाता है उसे बुढ़ापे में झूकने की जरूरत नहीं पड़ती। जिस प्रकार से कपूर उड़ जाता है कुछ दिखाई नहीं पड़ता उसी प्रकार से जीवन में से जवानी ऐसे उड़ जाती है पता भी नहीं चलता। इसिलिए ना जवानी पर, ना धन पर और ना ही पद पर कभी अहंकार किजिए, ये सब हमेशा नहीं रहती।
महाराज श्री ने आगे कहा कि अगर द्वार पर आया हुआ अतिथि निराश होकर चला जाए तो जीवन भर के सारे स्वीकृत नष्ट हो जाते हैं। गृहस्थी को ड्यूटी है की चाहे हमारे वहां कुछ भी होता रहे पर मेरे द्वार पर आया हुआ अतिथि निराश होकर नहीं जाना चाहिए, तभी हम गृहस्थी हैं, तभी हम लोग बड़े हैं क्योंकि हम अपने साथ-साथ समाज के लिए भी जीते हैं। जो अपने लिए जीता है वो पशुवत जीवन जीत है और जो सबके लिए जीता है वही सही मायने में गृहस्थी जीवन जीता है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली ने भगवान ब्रह्मा वरदान मांगा की मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने उसे वरदान दे दिया। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने विष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली से कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का सुंदर वर्णन श्रवण कराया। सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

11Oct 2019

कौन आपके साथ है और कौन नहीं।

सनातन धर्म मंदिर कैंट, Seattle Kent के द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के श्रीमुख से 06 से 12 अक्टूबर 2019 तक Sanatan Dharm Mandir Kent, Seattle Kent, WA में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जब तक जीवन में मुसीबते ना आएं तब तक आप निखर नहीं सकते और मुसीबतें आपको निखारने के साथ साथ समझदार भी बनाती हैं, साथ ही यह दिखाती भी हैं कि कौन आपके साथ है और कौन नहीं। सच मानो तो सिर्फ कृष्ण तुम्हारा है।

महाराज जी ने कहा कि भगवान उसको नहीं देखते जो बनावटी होता है। पुतना भगवान के सामने आई लेकिन भगवान ने उसे देखा तक नहीं क्योंकि वो कपट रूप बनाकर आई थी। हम भगवान के समक्ष जब भी जाते हैं तो जैसे हैं वैसे नहीं जाते, दिखाने के लिए जाते हैं। कभी कभार तो भक्ति भी दूसरों को दिखाने के लिए करते हैं खुद के लिए तो भक्ति भी नहीं करते।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

9Oct 2019

महाराज श्री ने बताया की दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ?

सनातन धर्म मंदिर कैंट, Seattle Kent के द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के श्रीमुख से 06 से 12 अक्टूबर 2019 तक Sanatan Dharm Mandir Kent, Seattle Kent, WA में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

पूज्य महाराज श्री ने कथा के तृतीय दिवस पर भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जिनका सम्बंध भगवान से है वो महत्वपूर्ण है। अगर आपका सीधा सम्बंध भगवान से ना हो तो जिनका सम्बंध भगवान से है आप उनसे अपना सम्बंध मजबूत कर लो। गुरू का सम्बंध गोविंद से है इसलिए अगर आपका सम्बंध गुरू के साथ हो जाएगा तो स्वत: ही गोविंद के साथ जुड़ जाएगा और जिनका सम्बंध गोविंद से जुड़ गया उन्हें पछताना नहीं पड़ेगा।

महाराज श्री ने बताया की दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा कि संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि हम लोग अपने हाथों से अपने ही लोगों को शमशान में जलाकर, मिट्टी को पानी में रखकर आते हैं और खुद ऐसे रहते हैं जैसे हम हमेशा अमर रहेंगे, कभी नहीं मरेंगे यही सबसे बड़ा आश्चर्य है।

महाराज श्री ने कहा कि ये मन बहुत गरीब है फंसा देता है। ये मन अगर इच्छाओं में लग गया तो मार देगा और मन अगर जरूरतें पूरी करके एक जरूरत बना ले की ठाकुर के बिना कुछ नहीं है तो यह मन तुम्हे तार देगा।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।

राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

26Sep 2019

कल जो बीत गया उसके बारे में सोचकर अपना आज बर्बाद ना करें।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 सितम्बर 2019 तक Texas में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीमद्भागवत कथा की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत में बताया की अगर कोई आपसे पूछे की आप नित्य इतनी मेहनत कर रहे हो ये किसके लिए कर रहे हो, तो आपका उत्तर क्या होगा ? सच्चाई तो यह है की हम शरीर को तोड़ कर कितनी भी कमाई कर लें ये शरीर के काम नहीं आने वाली, अंत में तो चाहे वो अमीर हो या गरीब हो सबके शरीर मिट्टी में मिल जाना है। आखिर हम इतनी मेहनत क्यों कर रहे हैं, सच तो यह है की हमे भी नहीं मालूम की हम यह क्यों कर रहे हैं, दुनिया भाग रही है इसलिए हम भी भाग रहे हैं, एक होड़ है एक दूसरे से आगे निकलने की।
महाराज श्री ने आगे कहा कि आज के व्यक्ति को टेंशन बहुत है, डिप्रेशन में चले जाते हैं। अगर आप अपनी चिंताओं से मुक्ति चाहते हैं तो इन तीन बातों का ध्यान रखें। पहली यह की आपने पहले तो अपराध किए हैं, पाप किए हैं उनके बारे में अब सोचकर चिंतित ना हो, क्यूंकि जो पीछे हो चुका है उसे आप बदल नहीं सकते। कल जो बीत गया उसके बारे में सोचकर अपना आज बर्बाद ना करें। दूसरा यह की जो आज है उस आज को जिएं, आने वाले कल के विषय में ना सोचें। कल के विषय में मत सोचिए क्योंकि कल भी हमने देखा नहीं है, कल कैसा होगा इसके बारे में अगर आप चिंता करेंगे तो अपना आज खराब करेंगे। ना पीछे के विषय में सोचें ना कल के विषय में सोचें बल्कि जो भी रचनात्मक कार्य हैं वो आज करें। जो आज आप रचनात्मक कार्य करेंगे तो निश्चित तौर पर आपका कल सूंदर, सफल होगा। तीसरी बात यह की यह संसार एक मंच है और हम सब उसमें अभिनय निभा रहे हैं, हमे जो भी अभिनय मिला हुआ है उस अभिनय को ईमानदारी से निभाना चाहिए उसमें बेईमानी नहीं होनी चाहिए। एक सबसे बड़ा सूत्र यह है की दिन में चार बार, तीन बार, दो बार, एक बार अपने आप को ठाकुर के समक्ष जरूर लेकर जाएं, उनके समक्ष बैठकर अपनी अब तक के किए गए कार्यों की जानकारी उन्हें दें।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

27Oct 2019

हर अंधेरे के बाद प्रकाश निश्चित है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 सितम्बर 2019 तक Texas में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया गया।

कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

श्रीमद्भागवत कथा की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि हमारे संतों ने एक बात कही है की बहुत मत चाहो, उसकी चाहत में अपनी चाह मिला दो तो सारी चाहत पूरी हो जाएंगी। रोज रोज नई नई चाहत उसके सामने प्रस्तुत करोगे तो चाहत कभी पूरी नहीं होगी, क्योंकि इस संसार में कोई भी कभी भी संतुष्ट नहीं होता है। सबका मन अशांत है और यह मन शांत होगा धीर गंभीर की शरणागती स्वीकार करने से, जिसने हरि की शरणागति स्वीकार कर ली वो प्रसन्न है और जिसने नहीं की वो प्रसन्न नहीं है। इच्छाएं बहुत हैं और इन इच्छाओं के पूर्ति के लिए उसकी मर्जी में अपनी मर्जी मिला दिजिए।
महाराज श्री ने कहा कि हर अंधेरे के बाद प्रकाश निश्चित है, लेकिन अगर अंधेरे में डगमगा जाएं, अंधेरे में आगर डुबने की तैयारी कर लें तो वो लोग कायर हैं। सबसे अच्छा काम ठाकुर पर भरोसा करना चाहिए, अपने आप को भगवान को समर्पित कर दो फिर आप देखेंगे तो वो हमेशा आप के साथ हैं।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

27Oct 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज एवं श्री विजय शर्मा जी ने टेक्सस में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के समापन के बाद Apple Valley, California के लिए प्रस्थान किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज एवं श्री विजय शर्मा जी ने टेक्सस में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के समापन के बाद Apple Valley, California के लिए प्रस्थान किया। 27 सितंबर से 01 अक्टूबर तक Sri Krishna Cultural Center, Apple Valley,CA में श्री शिव कथा का आयोजन किया जा रहा है।

27Sep 2019

जो राम, कृष्ण, नारायण की पूजा करते हैं उन्हें वैष्णव कहा जाता है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 27 सितंबर से 01 अक्टूबर 2019 तक श्रीकृष्ण कल्चरल सेंटर, एप्पल वैली में शिव कथा का आयोजन किया जा रहा है।

शिव कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जो राम, कृष्ण, नारायण की पूजा करते हैं उन्हें वैष्णव कहा जाता है और जो शिव जी की पूजा करते हैं उन्हें शैव्य कहा जाता है। लेकिन पुराणों में ऐसा वर्णन है वैष्णवा नाम शंभू। जैसे नदियों में गंगा सर्वश्रेष्ठ है वैसे ही वैष्णवों में बाबा भोलेनाथ श्रेष्ठ हैं। बाबा भोलेनाथ से बड़ा कोई वैष्णव नहीं है, हम और आप भोलेनाथ जैसी भक्ति नहीं कर सकते, उनसे श्रेष्ठ वैष्णव नहीं है कोई। हमारी वाणी को, चित्त को यह सौभाग्य ठाकुर जी ने दिया है कि हम बाबा भोलेनाथ से सीखें की वो कृष्ण भक्ति, राम भक्ति, नारायण भक्ति कैसे करते हैं।
महाराज श्री ने कहा कि शिव कथा हमे यह सीखाती है की हमें अपने आराध्य की सेवा कैसे करनी चाहिए ? हम लोग पूजा करते हैं हम वैष्णव है लेकिन हमने अपनी इच्छाएं कितनी बड़ा रखी हैं। भगवान की सेवा में तो कमी आ जाएगी लेकिन खुद की इच्छाओं में कभी कमी नहीं आएगी। शिव जी वैष्णवों के आचार्य हैं उन्होंने कहा है कि भले ही अपने लिए कपड़े ना हों लेकिन राम को राम को कभी मत भूलो, कृष्ण को कभी मत भूलों। अगर आप उनको याद रखोगे तो आपको कभी कोई कमी नहीं आएगी। महादेव सिखाते हैं की हमें अपने ईष्ट का किस तरह से आदर करना चाहिए।
महाराज श्री ने कहा कि हम लोग अपना जीवन खोते जा रहे हैं लेकिन उद्देश्य के करीब नहीं जा पा रहे हैं क्योंकि ना उद्देश्य है, ना ही विश्वास है। श्रद्धा होनी चाहिए, विश्वास होनी चाहिए लेकिन दोनों ही हमारे हाथ से जा रही है। आप जब कथा में बैठते हैं तो आपकी श्रद्धा उत्पन्न होती है, आपका उद्देश्य दृढ होता है। जब तक हम ठाकुर से ना जुड़े तब तक नेगेटिव बातें अच्छी लगती हैं और जब कथा से जुड़ जाएं और कथा सुनने लग जाएं तब हमें पॉजिटिव बातें ही अच्छी लगेंगी। समस्या है की आप संग किसका कर रहे हो, श्रवण क्या कर रहे हो।
महाराज श्री ने कहा कि शिव जी शीतलता का प्रतिक हैं, त्याग का प्रतिक हैं, मृत्यु का प्रतिक हैं। शीतलता रूपी गंगा को अपने सिर पर धारण किया हुआ हैऔर मृत्यु रूपी भस्म को अपने शरीर पर धारण किया हुआ है । बाबा भोलेनाथ भस्म इसलिए रमाते हैं की क्योंकि उनको लगता है कि जितनी भी चीजें हैं इस संसार की ये सब मिट्टी है, भस्म तो, सबसे बड़ी सम्मपत्ति अगर कोई है तो वो राम नाम है। राम नाम से बड़ी कोई सम्पत्ति संसार में नहीं है इसलिए शिव ने सिर्फ राम नाम को अपने पास रखा और कुछ नहीं रखा।

28Sep 2019

महाराज श्री ने बताया की सच्चा साधक बनने के लिए क्या करना चाहिए ?

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 27 सितंबर से 01 अक्टूबर 2019 तक श्रीकृष्ण कल्चरल सेंटर, एप्पल वैली में श्री शिव कथा का आयोजन किया जा रहा है।

शिव कथा के द्वितीय दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने शिव महापुराण की विशेष कथाओं का श्रवण भक्तो को कराया।

शिव कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान भोलेनाथ सच्चा विश्वास और मां पार्वती श्रद्धा हैं। हम लोग सिर्फ भगवत भक्ति की ही बात ना करें, नीजि जीवन की भी बात करें और हमारे रिश्तों में विश्वास ना हो, भरोसा ना हो तो वो रिश्ते कैसे होते हैं ? वो रिश्ते कभी अच्छे नहीं होते हैं। यहां पर विश्वास की बात हो रही है, आप जो भी भक्ति करते हैं चाहे राम की करें, शिव की करें, कृष्ण की करें लेकिन बिना विश्वास के करेंगे तो उस भक्ति का कोई लाभ नहीं है। आपका विश्वास आपका भरोसा आपका विकास करता है। जिस रिश्ते में आपका भरोसा होता है वो रिश्ता सुंदर होता है और जिस रिश्ते में आपका भरोसा नहीं होता है आप परेशान रहते हैं। अगर पति को पत्नी पर भरोसा ना हो, भाई को भाई पर भरोसा ना हो, पिता को पुत्र पर भरोसा ना हो तो वो रिश्ता कैसा होगा ? जब साधारण रिश्ते भी बिना भरोसे के अच्छे नहीं होते तो फिर यह तो भक्त भगवान का रिश्ता है इसमें तो भरोसा बहुत महत्वपूर्ण है।

महाराज श्री ने कहा कि राम, कृष्ण, नारायण को चाहने वाले लोगों को महादेव की पूजा अवश्य करनी चाहिए । अगर आप उनकी पूजा करेंगे, वो आपसे प्रसन्न होंगे तो वो आपको कृष्ण भक्ति, राम भक्ति सहज में प्रदान करेंगे।

महाराज श्री ने आगे कहा कि जब आप भक्ति रूप बीज बो दें तो कोई भी साधन रूप आसन पर ऊंचा बैठना चाहिए और ऊंचा बैठकर इंद्रियों पर नियंत्रण करना चाहिए क्योंकि जब आप भक्ति करने जाते हो तो इच्छाएं उत्पन्न होने लगती हैं, इंद्रियां दौड़ने लगती हैं, उन इंद्रियों को नियंत्रित करने के लिए संयम होना चाहिए। जब कान गलत सुनना चाहिए तो मत सुनिए, जब आंखें गलत देखना चाहें तो मत देखिए, वाणी कुछ गलत कहना चाहे तो मत कहिए। ये सब संयम के कोड़े हैं जो कोई और नहीं मारेगा बल्कि आपको खुद मारने पड़ेगे।

महाराज श्री ने बताया की सच्चा साधक बनने के लिए क्या करना चाहिए ? तीन कार्य प्रमुखता से करने चाहिए। सबसे पहला काम श्रवण करें, दूसरा कीर्तन करे, तीसरा मनन करें।

29Sep 2019

शास्त्रों में लिखा है जहां देवियों का सम्मान होता है वहां देवता रमण करते हैं।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 27 सितंबर से 01 अक्टूबर 2019 तक श्रीकृष्ण कल्चरल सेंटर, एप्पल वैली में श्री शिव कथा का आयोजन किया जा रहा है।

शिव कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य महाराज श्री ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि नवरात्रे प्रारंभ हुए सर्वप्रथम सभी भक्तो को शुभरात्रियों की मां दुर्गा के पूजा की आप सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं। माता रानी आप सभी पर कृपा करे। निश्चित बात तो ये है कि जब मां की कृपा होती है तो पिता जी की कृपा अपने आप हो जाती है। ये शुभ नवरात्रियां हैं, नवरात्र प्रारंभ हो गए हैं। निश्चित तौर पर ये विशेष दिन होते हैं मां दुर्गा के लिए ये शक्ति पूजा होती है इन दिनों में। मां की पूजा शक्ति की पूजा सबको सुख देने वाली सबको मंगल देने वाली मां दुर्गा, मां पार्वती जिनके 9 रूपों की पूजा इन 9 दिनों में की जाती है। उनमें से आज जो दिन में शैलपुत्री के रूप में की जाती है। मां लक्षमी की पूजा एक दिन दिपावली के दिन करते हैं। ब्रह्मा जी की पत्नी का पूजन कभी हम करते ही नही है। लेकिन पार्वती जी की पूजा हर दिन होती है। यहां सोचने की बात है कि पार्वती की पूजा हम हर दिन करते हैं। स्पेशल देवियां तो हमेशी करती है। शास्त्रों में लिखा है जहां देवियों का सम्मान होता है वहां देवता रमण करते हैं और अधिकांश इसकी वजह मां पार्वती ने हर वो कार्य किया है जिसकी वजह से व्यक्ति पूजा का अधिकारी हो जाता है। चाहे उसका संयमित जीवन हो हमेशा अपने पति के प्रति समर्पित हो। चाहे उनकी तपस्या करने का अपना स्थान हो। मां पर्वती ने भी तपस्या करने में कोई कमी नहीं छोड़ी। हम लोग तो एक बात जरूर समझ लें बिना कुछ शुभ कार्य किये न तो सम्मान प्राप्त कर सकते हैं और न तो पूजा प्राप्त कर सकते हैं। और कर भी लें तो वो हमेशा स्थिर नहीं होगा। जैसे कोई कर भी दें क्योंकि आजकल तो चापलूसों की कमी नहीं है। जहां आज कोई देखे आप को जेब में कोई डॉलर है तो आपकी चापलूसी करने में मस्त हो जाते हैं और प्रकार का व्यक्ति आप की चापलूसी करता है। लेकिन वो चापलूसी आपका सम्मान नहीं है और वो आपका तो नही है उस सम्पत्ति का है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति सम्पत्ति की जगह व्यक्ति का सम्मान करता है तो वे आपके सतगुणों का सम्मान करता है। आपके सतक्रमो का आदर है। मां पार्वती कितनी सतगुणी है। कई बार पिता को भी प्रेरित करती है आप ये भी कर दीजिए। धर्म पत्नी ऐसी ही होती है। जो अपने पति को भी शुभ कार्यों के लिए प्रेरित करती है। उनका नाम है धर्म-पत्नी अधर्म-पत्नी नही। आज कल घरों में व्यवचार क्यों हो रहे हैं। क्योंकि हम अधर्म पत्नी होते जा रहे हैं। हम लोगों को हॉटल के खाने के लिए प्रेरित करते हैं अपने पति को, हम डिस्को ले जाने के लिए प्रेरित करते हैं अपने पति को, हमें मूवी ले जाने के लिए प्रेरित करती हैं। लेकिन धर्म पत्नी इतनी अच्छी हैं। बाबा को पाने के लिए मां कितनी तपस्या करती है। फिर जो भी दीनहीन इनको दिखता है मां पार्वती प्रेरित करती है इस पर दया कर दीजिए। ऐसे कितने उदाहरण है शिव महापुराण में और यत्र-तत्र जहां मां पार्वती धर्म के लिए बाबा खुद धर्मात्मा नही है।

 

30Sep 2019

भक्ति कैसे करनी चाहिए ?

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 27 सितंबर से 01 अक्टूबर 2019 तक श्रीकृष्ण कल्चरल सेंटर, एप्पल वैली में श्री शिव कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के चतुर्थ दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भगवान शिव के परिवार की विशेषता का विस्तार पूर्वक वर्णन किया।

शिव कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जब तक मन नहीं सुधरेगा तब तक हमारा कोई भी कार्य सफल नहीं होगा, खासतौर पर आध्यात्मिक कार्य तो सफल होने वाला नहीं है।
महाराज श्री ने कहा कि वैष्णवों के परम आचार्य बाबा भोलेनाथ है जिन्होंने भक्ति कैसे करनी चाहिए ? वैष्णव की रहन सहन कैसी होनी चाहिए उसका स्वभाव कैसा होना चाहिए ? यह सबकुछ बाबा ने अपने जीवन से दर्शन करवाकर हमें प्रेरित किया है। शिव कथा शिवत्व को प्राप्त करवाती है, शिवत्व ही वैष्णवता है।
महाराज श्री ने कहा कि जीव को शिव कथा गुरू से समझनी चाहिए, अगर गुरू हमें सिखाएं तो निश्चित में हमारी भक्ति उत्तम होगी। अगर आप अपने आप से समझने की कोशिश करेंगे तो समझ में आएगा वहीं समझेंगे।
महाराज श्री ने कहा कि भगवान भोलेनाथ का परिवार भी वैष्णवता का सुंदर उदाहरण देता है जहां चुहा भी, सर्प भी, सिंह भी और नंद भी, जहां एक दुसरे में स्वाभाविक वैमनुष्यता रहती है, उसमें रहते हुए भी यहां स्वभाव परिवर्तन है। यहां सिंह हिंसक नहीं है, यहां सर्प विषैला नहीं है, यहां चुहा भय युक्त नहीं है।
महाराज श्री ने आगे कहा कि भगवान की कथा तीन चीजें देती है, निर्भयता, निश्चिंतता और निशोक, एक तो आपको भगवान की कथा निशोक कर देती है, आपको ज्ञान के उस लेवल पर लेकर जाती है जहां आपको कोई शोक नहीं होगा। दूसरा निश्चिंतता, कथा आपको निश्चिंत कर देती है, आपको किसी बात की चिंता करने की आवश्यकता नहीं होती, ठाकुर आपकी सारी चिंताओं को हर लेते हैं। तीसरा निर्भयता, कथा आपको निर्भय बना देती है, जिनका हाथ भगवान ने पकड़ लिया हो उन्हें किस बात से भय रखने की आवश्यकता है। इस संसार में भगवान राम कहते हैं, श्रीकृष्ण कहते हैं काल भी मेरा नाम सुनकर भयभीत हो जाता है तो जिनसे काल भयभीत हो जाए तो हम तो उनके दास हैं हमे भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। इसिलिए चुहा, सर्प के सामने बैठकर भी निर्भय है। यह भगवान शिव का परिवार हमें सिखाता है। बात उठती है की उस चुहे की तरह हम निर्भय क्यों नहीं है ? वह इसलिए क्योंकि शायद उस चुहें की तरह हमारा भरोसा नहीं है ना गणेश पर, ना शिव पर। उस मुष्क को पता है की मैं गजानन का हूं, मेरा यह सर्प कुछ नहीं बिगाड़ सकता, उसकी सीमा कहीं और होगी यहां तो शिव की सीमा है। भगवान शिव का परिवार में कितना सुंदर वैष्णव धर्म का ज्ञान करवाता है।
।। राधे –राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

1Oct 2019

पूज्य महाराज श्री ने भगवान शिव और माता पार्वति के बीच के संवाद का भी वर्णन किया।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 27 सितंबर से 01 अक्टूबर 2019 तक श्रीकृष्ण कल्चरल सेंटर, एप्पल वैली में श्री शिव कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के पंचम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने महाकालेश्वर शिवलिंग की महिमा का वर्णन भक्तों को कराया।

शिव कथा के पंचम दिवस की शुरुआत विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जिस परिवार में अच्छा व्यवहार नहीं होता वह परिवार नहीं है। अगर आप परिवार में रह रहे हैं तो आपको सबके साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए, जब तक हम अपने व्यवहार को नहीं संभालेंगे तब तक परिवार अच्छा नहीं बन सकता। वैसे गीता के दृष्टिकोण से देखें तो यह समूचा संसार ही हमारा परिवार है लेकिन अगर हम उस लेबल तक नहीं भी पहुंचे तो जिस परिवार में हम रहते हैं उसमें नित्य हमारी ममता होगी तो वो भक्ति नहीं होगी। यह परिवार परमात्मा की कृपा से हमें प्रसाद रूप प्राप्त हुआ है, अगर इस तरह की भावना आप रखेंगे तो वह परिवार नहीं उस परिवार की सेवा भी आपकी भक्ति होगी।

महाराज श्री ने कहा कि जहां से हमने शिव कथा की शुरूआत की वह हमारी भक्ति की जड़ है और जब तक जड़ मजबूत नहीं होगी हमारी तब तक कोई फल मिलने वाला नहीं है। हमें मन से यह विश्वास होना चाहिए की यह जो कथा है यह सत्य है, यह भगवान ने दिया हुआ है। यह भगवान ने दिया है तो भगवान का प्रसाद है और भगवान के प्रसाद का निरादर नहीं करते हैं।

पूज्य महाराज श्री ने भगवान शिव और माता पार्वति के बीच के संवाद का भी वर्णन किया। उन्होंने कहा कि एक बार माता पार्वती ने बाबा से पूछा की भगवान के अवतरण का क्या उद्देश्य है। बाबा बोले आपने बहुत सुंदर बात पूछी है इससे बाकी जीवों का भी कल्याण होगा। तो भगवान शिव ने बहुत सुंदर उत्तर दिया की राक्षसों के वध के लिए और देवताओं की सुरक्षा के लिए भगवान इस पृथ्वी पर आते हैं और भगवान के आने का एकमात्र जो उद्देश्य है वह है धर्म की स्थापना । जब जब इस पृथ्वी पर अत्याचार बढ़ते हैं, अधर्म बढ़ता है तब तब प्रभु अवतार लेते हैं। अनेको रूपों में भगवान आते हैं और भगवान का एकमात्र उद्देश्य धर्म की स्थापना और अधर्म का नाश।

महाराज श्री ने आगे कहा कि भगवान जो कार्य हमारे लिए करते हैं वह कार्य हमें भी करना चाहिए। यह संसार एक कुरूक्षेत्र है, हम ही अर्जुन है और हमको भगवान ने अर्जुन बनाकर इसलिए ख़ड़ा किया ही अपने जीते जी धर्म का उत्थान करो और अधर्म का विनाश करो। हम लोगों को लगता है की धर्म की स्थापना करना, धर्म की रक्षा करना भगवान का ही काम है। ऐसा नहीं है धर्मात्मा होकर धर्म की रक्षा कर सकते हैं, आप अधर्मी होंगे तो अधर्म को बढ़ावा देंगे। आपका प्रत्येक कर्म धर्म को बढ़ाने और घटाने का कार्य करता है। आपके प्रत्येक कर्म पर निर्भर है की भगवान की योजना सफल है की असफल। हालांकि हमारे हाथ में इतना कुछ नहीं है, हम कृष्ण नहीं बन सकते, गीता का उपदेश नहीं दे सकते लेकिन हम अपने आप को गीता का बताए हुए मार्ग पर चला सकते हैं।
।। राधे – राधे बोलना पड़ेगा ।।

2Oct 2019

आज पटना में भारी जलभराव के कारण आई परेशानी को देखते हुए विश्व शांति सेवा चैरिटेबल समिति पटना एवं मेरा भारत मेरा स्वाभिमान के मेंबरों ने वहा के लोगो को भोजन वितरण किया।

आज पटना में भारी जलभराव के कारण आई परेशानी को देखते हुए विश्व शांति सेवा चैरिटेबल समिति पटना एवं मेरा भारत मेरा स्वाभिमान के मेंबरों के द्वारा जो लोग घर से बाहर नहीं आ पा रहे हैं उन जरूरतमंद लोगों को घर घर जाकर खाने के पैकेट, पानी की बोतल एवं जरूरतमंद चीजों का वितरण किया।

2Oct 2019

जो भगवान का भजन करता है भगवान उनका भजन करते है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 02 से 05 अक्टूबर 2019 तक स्थान – Bhakta Temple, Norwalk CA में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीकृष्ण कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के प्रथम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीकृष्ण कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जब तक प्रभु की कृपा हमारे जीवन में ना हो तब तक सत्संग हमें प्राप्त नहीं होता। सत्संग प्रभु कृपा से प्राप्त होता है। यहां दो चीजें हैं एक तो सत्संग पा लिया और दूसरा सत्संग जी लिया। जिनको जीवन में सत्संग मिल जाता है वो अपने जीवन के मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं लेकिन जिनका जीवन ही सत्संग बन जाए वो दूसरों के मोक्ष के कारण बन जाते हैं।

महाराज श्री ने कहा कि हरि को छोड़कर व्यक्ति अपनी चतुरता समझता है धन कमाने में, दूसरों को बेनकूफ बनाने में। धन कमाना चतुराई नहीं है, दूसरों को बेवकूफ बनाना चतुराई नहीं है, चतुराई तो एक ही चीज में है जो इस संसार में आने के बाद लोक भी संभाल ले और परलोक भी संभाल ले, जिसने दोनों संभाल लिए वहीं सबसे बड़ा चतुर है।

महाराज श्री ने कहा कि कथा श्रवण मात्र से मंगल करती है। एक उम्र में पहुंच जाने के बाद कथा नहीं छुटनी चाहिए। कथा अगर श्रवणरंधों में पड़ती रही तो जीवनभर तुम्हारे कदम रूकेंगे नहीं और जिनके श्रवणरंधों में कथा नही पड़ती कुछ और पड़ जाता है वो भटक जाते हैं। वैसे तो कथा सुनने की शुरूआत बचपने से, जवानी से होनी चाहिए और वो इतनी जबरदस्त होनी चाहिए जिससे आपका बुढ़ापा सुधर जाए। जब जब आप कथा में आकर बैठोगे एक नया संगीत, एक नई राह आपको मिलेगी।

महाराज श्री ने आगे कहा कि जब भी हम भगवान की कथा सुनते हैं तो एक नई कमी हमारे आगे आती है की ये हमारी गलती है इसको परिवर्तित कर लिया जाए तो और भी सुंदर हुआ जा सकता है।

महाराज श्री ने कहा कि भगवान ने स्वयं इस बात को कहा है कि जो भी जीव मेरा भजन करता है मैं उसका भजन करता हूं और जो मेरी कथा सुनता है मैं उसकी कथा सुनता हूं।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

3Oct 2019

ये मानव जीवन ही ऐसा है जहां आप प्रयास भी कर सकते हैं और प्राप्त भी कर सकते हैं।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 02 से 05 अक्टूबर 2019 तक स्थान – Bhakta Temple, Norwalk CA में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीकृष्ण कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के द्वितीय दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भक्तों को बताया की प्रभु को किस प्रकार से प्राप्त किया जा सकता है।

श्रीकृष्ण कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान को जब जीव के ऊपर असीम अनुकमपा करनी होती है तब भगवान जीव को मानव शरीर देते हैं। शरीर तो अनेकों योनियों में मिलेगा ही वृक्ष भी शरीर ही है, मछली बना दे तो वो भी शरीर ही है। परंतु मानव शरीर जब देते हैं तो अपनी असीम करूणा बिखरते हैं। या हम यह भी कहते हैं की जब जिस आत्मा से मिलने का मन परमात्मा का करता है उसे विकल्प देते हैं की मैं तुझे श्रेष्ठ विकल्प दे रहा हूं की जाओ अब कुछ ऐसा करो जैसे मेरा मन कर रहा हैं तुमसे मिलने का वैसे तुम्हारा मन भी करे, फिर हम दोनों मिलेंगे। मानव जीवन मिलने के बाद यह आपकी जिम्मेदारी है की आप प्रभु को प्राप्त करें। ये मानव जीवन ही ऐसा है जहां आप प्रयास भी कर सकते हैं और प्राप्त भी कर सकते हैं।

महाराज श्री ने आगे कहा कि भगवत प्राप्त के साधन तो बहुत हैं लेकिन वह आसानी से प्राप्त नहीं होते हैं। भगवान को आसानी से प्राप्त करने का सिर्फ एक ही मार्ग है और वो है सत्संग। जीव को सद्पुरूषों का, संतों का संग करना चाहिए क्योंकि संतों का संग आपको भक्ति की ओर लेकर जाता है।

महाराज श्री ने कहा कि हमे अपने बच्चों का लालन पोषण बहुत ही सावधानी के साथ करना चाहिए। वो मां बाप बहुत भाग्यशाली हैं जो धनवान तो हैं की साथ ही उनके बच्चे संस्कारी है। जिन धनवान मां बाप के बच्चे संस्कारी है उनके पास वह सबसे बड़ी समपत्ति है। आपके अपने बच्चों को कितना भी पैसा दे दो कोई बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात है की क्या वो ऐसे इंसान बन पाए की वो इंसान होकर इंसान की इज्जत कर सके। इंसान होकर भी जो इंसान की इज्जत ना कर सके वो कितना भी धनवान हो जाए वो किसी काम का नहीं है। संस्कार बच्चों को माता पिता से ही मिलते हैं और माता पिता को चाहिए की वो इस लायक बनें की वो अपने बच्चो को धन चाहे दे या ना दें लेकिन अच्छे संस्कार अवश्य दें।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

4Oct 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया की सत्संग से लोगों का जीवन बदल गया है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 02 से 05 अक्टूबर 2019 तक स्थान – Bhakta Temple, Norwalk CA में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीकृष्ण कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के तृतीय दिवस पर पूज्य महाराज श्री कृष्ण जन्म का वृतांत भक्तों को सुनाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव मनाया।

श्रीकृष्ण कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि अगर आपको भगवान पर विश्वास है तो वह हर जगह है। भक्त पुकारते हैं तो भगवान दौड़े चले आते हैं। प्रह्लाद ने सच्चे मन से पुकारा था तो भगवान खम्बा फाड़ कर बाहर निकल आए थे। आपको भगवान पर विश्वास करना पड़ेगा, अगर आपको विश्वास नहीं है तो वो आपको कभी नहीं मिलेंग। प्रह्लाद ने सत्संग से गोविंद को पहचाना और भगवान ने हर जगह प्रह्लाद की रक्षा की, वैसे ही हमे भी भगवान को सत्संग से पहचानना चाहिए, भगवान हमारी भी रक्षा करेंगे।

महाराज श्री ने कहा कि हमे एक साथ दो कार्य नहीं करना चाहिए, एक बार में एक कार्य करोगे तो कार्य उत्तम होगा। अगर आप सत्संग के साथ दूसरा कार्य करेंगे तो कुछ समझ में नहीं आएगा। सत्संग का मतलब है की उस समय सत्संग ही करें, जब हम सत्संग करते हैं तो हमारे भीतर तक उसका असर होता है। जब हम सत्संग करें और साथ ही कुछ और कार्य करें तो कुछ भी समझ नहीं आएगा। ऐसे कई उदाहरण है जिसमें सत्संग से लोगों का जीवन बदल गया है।

महाराज श्री ने कहा कि सम्पूर्ण शरीर की क्रियाओं से अहंकार का परित्याग कर भगवान की लिलाओं में, भगवान की क्रियाओं में चित्त को लगाना चाहिए और यह सब जो मेरे पास है यह परमात्मा का है ऐसा विचार मन में रखना चाहिए। बंधन में वो है जो कहता है ये मेरा है और बंधन मुक्त वो है जो कहता है मेरा कुछ भी नहीं है। मैं संसार में खाली हाथ आया और खाली हाथ जाऊंगा, जब खाली हाथ आया और खाली हाथ जाना है तो संसार में मेरा है क्या ?

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

6Oct 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज और श्री विजय शर्मा जी ने श्री कृष्ण कथा की समाप्ति के बाद California से Seattle को प्रस्थान किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज और श्री विजय शर्मा जी ने श्री कृष्ण कथा की समाप्ति के बाद California से Seattle को प्रस्थान किया। Seattle में 06 से 12 अक्टूबर तक श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जाएगा।

 

6Oct 2019

आज पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज एवं श्री विजय शर्मा जी Seattle पहुँचे, जहां पर आयोजको के द्वारा महाराज श्री का स्वागत किया गया।

आज पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज एवं श्री विजय शर्मा जी Seattle पहुँचे, जहां पर आयोजको के द्वारा महाराज श्री का स्वागत किया गया। Seattle में महाराज श्री के सानिध्य में 06 से 12 अक्टूबर 2019 तक श्री मदभागवत कथा का आयोजन किया जाएगा।

5Oct 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया की "संसारिक चर्चा करने वाला मित्र सिर्फ संसार में ही फंसा रहता है।"

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 02 से 05 अक्टूबर 2019 तक Norwalk CA में श्रीकृष्ण कथा का आयोजन किया गया। कथा के चतुर्थ दिवस पर पूज्य महाराज श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को सुनाया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि संसारिक चर्चा करने वाला मित्र सिर्फ संसार में ही फंसा रहता है। लेकिन भागवत की चर्चा करने वाले हमें ईश्वर से मिलाने की बात करेंगे है तो मित्र उन्हें ही बनाओ जो भगवत की चर्चा करने वाले हैं। जो कृष्ण प्रेमी है, जो रसिक जिज्ञासु हैं, जो पिपासु है उन्हें भगवत कथाओं का रसास्वादन हमेशा करना चाहिए, ये एक सबसे बड़ा काम है।

महाराज श्री ने कहा कि ईश्वर सब जगह है लेकिन वही व्यक्ति दर्शन कर सकता है जिस पर गुरु की कृपा होती है। ईश्वर किसी की सिफारिश नही करता, लेकिन संत भक्तों की सिफारिश करता है ईश्वर से, इसलिए ईश्वर से ज्यादा संतों में ज्यादा गुण है। जो गुण भगवान में नही वो गुण संतो में होते है। संत वो कर सकते हैं जो आज साइंस भी नहीं कर सकती है। भगवान सिर्फ व्यक्ति के क्रम पर फल देते हैं। लेकिन संत वो होते हैं जो एक बार सिफारिश कर दें तो ईश्वर उसे जरूर करता है। संत की कृपा से आपको दुनिया में भी मौज है स्वर्ग में भी। ईश्वर कहता है मुझसे ज्यादा संतो का आदर और सम्मान करो।

7Oct 2019

आपके जीवन का उद्देश्य क्या है ।

सनातन धर्म मंदिर कैंट, Seattle Kent के द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के श्रीमुख से 06 से 12 अक्टूबर 2019 तक Sanatan Dharm Mandir Kent, Seattle Kent, WA में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

श्रीमद्बागवत कथा से पूर्व सुबह पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में भागवत पूजन किया गया एवं कलश यात्रा निकाली गई जिसमें भक्तों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।

श्रीमद्भागवत कथा की शुरूआत विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के कथा की शुरूआत भागवत के प्रथम श्लोक से की

सच्चिदानन्द रूपाय विश्वोत्पत्यादि हेतवे तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयम नुमः

वासुदेव सुतं देवम् कंस चानुर मर्दनम् देवकी परमानंदम् कृष्णम् वंदे जगदगुरुम्।।

पूज्य महाराज श्री कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि यह जो भागवत कथा है यह इतनी सरल नहीं है, करोड़ो जन्मों का पुण्य जब अर्जित होता है तब जाकर तब जाकर भागवत श्रवण करने का अवसर प्राप्त होता है।

महाराज श्री ने कहा कि भगवान की प्राप्ति बिना साधन के नहीं होती और यह मानव जीवन धन कमाने के लिए नहीं मिला है। जीवन जीना है इसलिए कमाना जरूरी है लेकिन यह मेरा उद्देश्य नहीं होना चाहिए। अपने उद्देश्य को नहीं भूलना चाहिए, सबसे पहले पता करें की आपके जीवन का उद्देश्य क्या है ? अगर आपको नहीं पता है तो आप अपने जीवन के साथ खेल रहे हैं। हमारा जन्म जीवन के साथ खेलने के लिए नहीं हुआ है, यह जीवन बहुत सुंदर है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार नैमिषारणय में सनकादिक ऋषि विराजमान थे तभी वहां परम श्रद्धेय सूद जी महाराज पधारे। जब सूद जी महाराज वहां पधारे तो उन्हें एक बहुत सुंदर आसन दिया और वहां पर उनको बैठाया। तो सभी ऋषियों ने सूद जी महाराज से ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

8Oct 2019

हम जिसे भाग्य कहते हैं वो कर्म से बनता है।

सनातन धर्म मंदिर कैंट, Seattle Kent के द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के श्रीमुख से 06 से 12 अक्टूबर 2019 तक Sanatan Dharm Mandir Kent, Seattle Kent, WA में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

भागवत के द्वितीय दिवस की शुरूआत विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि आजकल हम लोग कही ओर ही खोए बैठे हैं। किताबों, उपन्यासों को पड़ते रहते हैं, टीवी देखते रहेंगे, टाइम खराब करते रहेंगे। हमे ना लोक की परवाह है ना ही परलोक की परवाह है, हम अपने कल्याण के संदर्भ में नहीं सोचते हैं। कई लोग बड़े गर्व के साथ कहते हैं मरने के बाद क्या जाने क्या होता है, किसने देखा है ? यह मत सोचिए की कुछ नहीं होता है, बहुत कुछ होता है। अगर कुछ नहीं होता, आपके जन्मों का प्रारब्ध नहीं होता तो जो आपको इस जन्म में मिला है वो कैसे मिल गया ? हम जिसे भाग्य कहते हैं वो कर्म से बनता है, आपके कर्म ऐसे थे जो आपको यहां सबकुछ मिल गया। अगर कर्म बिगड़ जाएंगे तो मिला हुआ भी नष्ट हो सकता है।

महाराज श्री ने कहा कि आजकल के माता पिता अपने बच्चे को पैदा होते ही मोबाइल पकड़ा देते हैं। अगर आगे जाकर आपका बच्चा मोबाइल का दिवाना हो जाता है तो इसमें गलती माता पिता की है। कम से कम जब तक बच्चा 12th ना कर ले तब तक उसे मोबाइल नहीं देना चाहिए। बच्चों के पैदा होते ही उनमें संस्कार डालने का कार्य किजिए ना की उनके हाथ में मोबाइल दिजिए। अगर आपका बच्चा मोबाइल प्रेमी ना होकर संस्कारी होगा तो कितना अच्छा होगा। अगर बच्चों को बहुत जरूरी है और मोबाइल देना ही है तो उन्हें उसका इस्तेमाल बताइए।
महाराज श्री ने कहा कि जिन लोगों को कथा में नींद आती है वो उन्हें उनके कर्मों की वजह से आती है और जो सचेत हों उन्हें कथा में नींद नहीं आती है। उन्होंने आगे कहा कि राम पर संदेह करना सबसे बड़ा गुनाह है, आप धर्म पर संदेह करते हैं। यहां बहुत से लोग मिल जाएंगे जिन्हें धर्म पर, भगवान पर संदेह रहता है। लेकिन जो भगवान के सच्चे भक्त होते हैं वो एक बात जानते हैं की मेरे ठाकुर जी तुमसे बढ़िया कोई कर नहीं सकता।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओं का गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं।
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

8Oct 2019

हम जिसे भाग्य कहते हैं वो कर्म से बनता है।

सनातन धर्म मंदिर कैंट, Seattle Kent के द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के श्रीमुख से 06 से 12 अक्टूबर 2019 तक Sanatan Dharm Mandir Kent, Seattle Kent, WA में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

भागवत के द्वितीय दिवस की शुरूआत विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि आजकल हम लोग कही ओर ही खोए बैठे हैं। किताबों, उपन्यासों को पड़ते रहते हैं, टीवी देखते रहेंगे, टाइम खराब करते रहेंगे। हमे ना लोक की परवाह है ना ही परलोक की परवाह है, हम अपने कल्याण के संदर्भ में नहीं सोचते हैं। कई लोग बड़े गर्व के साथ कहते हैं मरने के बाद क्या जाने क्या होता है, किसने देखा है ? यह मत सोचिए की कुछ नहीं होता है, बहुत कुछ होता है। अगर कुछ नहीं होता, आपके जन्मों का प्रारब्ध नहीं होता तो जो आपको इस जन्म में मिला है वो कैसे मिल गया ? हम जिसे भाग्य कहते हैं वो कर्म से बनता है, आपके कर्म ऐसे थे जो आपको यहां सबकुछ मिल गया। अगर कर्म बिगड़ जाएंगे तो मिला हुआ भी नष्ट हो सकता है।

महाराज श्री ने कहा कि आजकल के माता पिता अपने बच्चे को पैदा होते ही मोबाइल पकड़ा देते हैं। अगर आगे जाकर आपका बच्चा मोबाइल का दिवाना हो जाता है तो इसमें गलती माता पिता की है। कम से कम जब तक बच्चा 12th ना कर ले तब तक उसे मोबाइल नहीं देना चाहिए। बच्चों के पैदा होते ही उनमें संस्कार डालने का कार्य किजिए ना की उनके हाथ में मोबाइल दिजिए। अगर आपका बच्चा मोबाइल प्रेमी ना होकर संस्कारी होगा तो कितना अच्छा होगा। अगर बच्चों को बहुत जरूरी है और मोबाइल देना ही है तो उन्हें उसका इस्तेमाल बताइए।
महाराज श्री ने कहा कि जिन लोगों को कथा में नींद आती है वो उन्हें उनके कर्मों की वजह से आती है और जो सचेत हों उन्हें कथा में नींद नहीं आती है। उन्होंने आगे कहा कि राम पर संदेह करना सबसे बड़ा गुनाह है, आप धर्म पर संदेह करते हैं। यहां बहुत से लोग मिल जाएंगे जिन्हें धर्म पर, भगवान पर संदेह रहता है। लेकिन जो भगवान के सच्चे भक्त होते हैं वो एक बात जानते हैं की मेरे ठाकुर जी तुमसे बढ़िया कोई कर नहीं सकता।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओं का गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं।
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

25Sep 2019

इस जीवन में कुछ ऐसे कर्म करो, ऐसे धर्म के कार्य करो जिससे इस भवसागर से पार हो जाओ।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 सितम्बर 2019 तक Texas में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि बड़ों को, युवाओं को, बच्चों को एक बार का विशेष तौर पर ध्यान रखना चाहिए वो है आपका समय। जब हमारा अच्छा समय होता है तब हम लापरवाह होते हैं और जब बुरा वक्त होता है तो सचेत रहते हैं। सबसे अच्छा समय होता है हमारी जवानी को जब हम बेपरवाह होते हैं, जो मन किया कर लिया, जो मन ने चाहा खा लिया, जो मन ने चाहा पहन लिया। लेकिन आप यह सोचिए ना की आज का बीज कल फसल बनेगा। जो जवानी में हमने कर्म किए हैं वो बुढ़ापे में हमें काटना पड़ेगा। एक बात समझ लिजिए आपके द्वारा किए गए कर्मों का फल आपको ही भोगना है, चाहे वो अच्छा है या बुरा है। जीवन में अगर कोई विपत्ति आए तो यह नहीं कहना चाहिए की हमने दूसरे ने दुख दिया है, किसी की हिम्मत नहीं है की आपको दुख देदे। जब तक आपने बीज नहीं बोया है आपको दुख नहीं मिलेगा।
महाराज श्री ने कहा कि जो शरण में आए हुए व्यक्ति को हित और अनहित सोचकर उसका त्याग कर देते हैं उनको देखते ही हानि होती है। हमलोग कहते हैं मानव धर्म सबसे बड़ा है, वो तब सबसे बड़ा है जब हम उस धर्म की परिभाषा को ठीक से समझ लें। जो आपकी शरण में आता है उसकी मदद करना आपका धर्म है, आपकी जिम्मेदारी है। उन्होंने आगे कहा कि संसार से आपने तमाम रिश्ते बना रखे हैं उन्हें बनाए रखिए, लेकिन इतने रिश्तों में एक रिश्ता ठाकुर जी से भी जोड़ लो।
महाराज श्री ने कहा कि इस जीवन में कुछ ऐसे कर्म करो, ऐसे धर्म के कार्य करो जिससे इस भवसागर से पार हो जाओ। ऐसे कर्म करना की खुद भी तरना, अपने मां बाप को भी तारना और बड़े कर्म करो तो अपने पूरे परिवार को लेकर तर जाओ ऐसे कर्म करो।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

19Sep 2019

ये मन स्वान की तरह है जैसे स्वान किसी एक का नहीं होता वैसे ही हमारा मन किसी एक जगह पर नहीं टिकता।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 13 से 19 सितंबर 2019 तक Hindu Temple Of Greater Chicago में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीमद्भागवत कथा की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की ये मन जब मोहन से दूर जाता है तो भटकता है और फिर दुःख पाता है जिसके लिए हमारे कविओं ने भी बड़ा सुंदर लिखा है की ये मन स्वान की तरह है जैसे स्वान किसी एक का नहीं होता वैसे ही हमारा मन किसी एक जगह पर नहीं टिकता।

अगर हमारा मन संसार का होकर रहेगा तो ये दर दर भटकेगा ही और इसकी दुर्गति निश्चित होगी ही,और अगर आप अपने सांवरे में मन लगाएंगे तो आपका मन दर- दर नहीं भटकेगा क्यूंकि जो जीव ईश्वर का हो जाता है वो सर्वप्रिय हो जाता है।

महाराज श्री ने रामायण की एक चौपाई का उदहारण देते हुए कहा की जिसपर ईश्वर कृपा करते है उस पर सभी कृपा करते है और जिसपे ईश्वर कृपा नहीं करते उस पर कोई कृपा नहीं करते सब उसका साथ छोड़कर चले जाते है जिनको वो अपना समझता है।

धनबल,जनबल,विवेकबल,ज्ञानबल,भक्तिबल,पदबल,जितने भी संसार में बल है ये सभी हमे ईश्वर के द्वारा प्राप्त है, जो भी बल हमें ईश्वर के द्वारा प्राप्त है उसपर हमें कभी अभिमान नहीं करना चाहिए क्यूंकि जिसने ये सब आपको दिया है वो आप से ये सबकुछ कभी भी वापस ले सकता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

19Sep 2019

शिकागो में आयोजित श्रीमद भागवत कथा को सम्पूर्ण करने के पश्चात टेक्सस में 20 सितम्बर से 26 सितम्बर 2019 तक आयोजित श्रीमद भागवत कथा के चलते महाराज श्री ने आज टेक्सस के लिए प्रस्थान किया।

शिकागो में आयोजित श्रीमद भागवत कथा को सम्पूर्ण करने के पश्चात टेक्सस में 20 सितम्बर से 26 सितम्बर 2019 तक आयोजित श्रीमद भागवत कथा के चलते महाराज श्री ने आज टेक्सस के लिए प्रस्थान किया। महाराज श्री को छोड़ने के लिए शिकागो के भक्त एयरपोर्ट पर आये, इस सफल आयोजन के लिए महाराज श्री ने विश्व शांति सेवा मिशन के सदस्यों ,आयोजकों एवं सभी भक्तों को साधुवाद दिया। #ThakurJiInUSA

20Sep 2019

मनुष्य जीवन पाना बहुत दुर्लभ है - पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 13 से 19 सितंबर 2019 तक Hindu Temple Of Greater Chicago में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

श्रीमद्भागवत कथा की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की भगवान् ने आपको बहुत ही सुन्दर उपहार के रूप में ये मानव जन्म दिया है लेकिन आप इसको सांसारिक भोग विलासों के चक्कर में व्यर्थ कर रहें है, क्यूंकि मानव जीवन का उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ ईश्वर को पाना है।
शास्त्रों में लिखा है की भगवान् कहते है की आपको किसी के बारे में सोचने की जरूरत नहीं है आप सिर्फ मेरा ध्यान करो और आपकी सारी जिम्मेदारियां को मैं पूरा करूँगा।
मानव जीवन ही वो द्वार है जिससे आपको मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है, लेकिन जब जब हमें ये मानव जीवन मिलता है हम भोग विलासों में उलझ कर रह जाते है और सत्संग रुपी कथामृत हमसे छूट जाता है।
महाराज श्री ने बताया की अगर आप पूरे सात दिन विधि -विधान से सम्पूर्ण भागवत कथा का श्रवण करते है और उसके बाद कोई पाप नहीं करते तो आपको मोक्ष की प्राप्ति होना निश्चित है। क्यूंकि श्रीमद भागवत कथा कलयुग के लोगों के लिए सहज कल्याण का मार्ग है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

20Sep 2019

पूज्य महाराजश्री टेक्सास पहुंचे यहां महाराज श्री का स्वागत श्रीराम मंदिर बोर्ड के सदस्यों द्वारा किया गया।

आज पूज्य महाराजश्री टेक्सास पहुंचे यहां महाराज श्री का स्वागत श्रीराम मंदिर बोर्ड के सदस्यों द्वारा किया गया। पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में यहां 20-26 सितंबर तक श्रीमद्भागवत का आयोजन किया जा रहा है।

21Sep 2019

भागवत को समझना भगवान को समझने के बराबर है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 सितम्बर 2019 तक टेक्सास में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

कथा से पूर्व कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई, जिसमें कनाड़ा के भक्त प्रेमियों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।

भागवत के प्रथम दिवस की शुरूआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के कथा की शुरूआत भागवत के प्रथम श्लोक से की
सच्चिदानन्द रूपाय विश्वोत्पत्यादि हेतवे तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयम नुमः
वासुदेव सुतं देवम् कंस चानुर मर्दनम् देवकी परमानंदम् कृष्णम् वंदे जगदगुरुम्।।

महाराज श्री ने कहा कि भागवत के प्रथम श्लोक में भगवान को प्रणाम किया गया है, उनके स्वभाव का वर्णन किया गया है, उनकी लीलाओं का वर्णन किया गया है। भागवत को समझना भगवान को समझने के बराबर है।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की आप लोग बहुत भाग्यशाली है इस वजह से आपको पितृ पक्ष में श्रीमद भागवत कथा श्रवण करने का सुनेहरा अवसर प्राप्त हुआ है, इन सात दिनों में भागवत कथा श्रवण करने का फल ना सिर्फ आपको मिलेगा बल्कि ये फल आपके पितरो को भी मोक्ष की प्राप्ति कराएगा।

महाराज श्री ने पितृ पक्ष का महत्व बताते हुए कहा की पितरो का आशीर्वाद हमारे जीवन में बहुत जरुरी है अगर हमारे पितृ हमसे रूठ जाए तो वंश आगे नहीं बढ़ता, घर में कलेश रहता है, व्यापार में नुक्सान होता है और घर में अशांति का वातावरण फ़ैल जाता है।

महाराज श्री ने बताया की हमें भगवान से पहले अपने पितरो की पूजा करनी चाहिए, पितरो के कल्याण का सबसे सफल और सुंदर मार्ग श्रीमद भागवत कथा है। पितृ पक्ष में जो आप कथा श्रवण कर रहें है ये इससे आपके पितरो का कल्याण निश्चित है इसलिए उन्हें ध्यान में रख कर कथा श्रवण करें।

महाराज श्री ने बताया की जीवन में गुरु और गोविन्द को कभी मत भूलना क्यूंकि जिसने जीवन में गुरु को भुला दिया उसके हजारो -लाखो जीवन बर्बाद हो जायेंगे, कही भी रहो किसी भी स्थति में रहो लेकिन अपने गुरु और गोविन्द को कभी मत भूलो क्यूंकि जिन्हे गुरु और गोविन्द याद रहते है वो कभी गलत काम नहीं करते।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार नैमिषारणय में सनकादिक ऋषि विराजमान थे तभी वहां परम श्रद्धेय सूद जी महाराज पधारे। जब सूद जी महाराज वहां पधारे तो उन्हें एक बहुत सुंदर आसन दिया और वहां पर उनको बैठाया। तो सभी ऋषियों ने सूद जी महाराज से ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

22Sep 2019

कल शाम मुबंई कथा की तैयारियों का निरीक्षण करने मुम्बई पहुँचे श्री श्याम सुंदर शर्मा जी (आचार्य जी ) रविवार को समति के पदाधिकारियों के साथ बैठक करेंगे ।

कल शाम मुबंई कथा की तैयारियों का निरीक्षण करने मुम्बई पहुँचे श्री श्याम सुंदर शर्मा जी (आचार्य जी ) रविवार को समति के पदाधिकारियों के साथ बैठक करेंगे और 15 से 22 दिसंबर तक पूज्य महाराजश्री के श्रीमुख से होने वाले कार्यक्रम को लेकर दिशा निर्देश देंगे । राधे राधे ।

22Sep 2019

इस संसार में जो भी कुछ है उसका कोई न कोई मालिक जरूर है इसी प्रकार इस संसार में जीव का भी मालिक ईश्वर है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 सितम्बर 2019 तक Texas में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज
श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की अगर आपको जीवन में शान्ति और सुख चाहिए तो आपको इनको पाने का मार्ग खुद ही ढूँढना होगा, हम जिस संसार में भटक रहें है हम यहां से बहुत ज्यादा अपेक्षाएं रखते है और फिर ये अपेक्षाएं पूरी न होने पर हमें दुःख मिलता है।

इस संसार में जो भी कुछ है उसका कोई न कोई मालिक जरूर है इसी प्रकार इस संसार में जीव का भी मालिक ईश्वर है, लेकिन कलयुग में मनुष्य मोह -माया के चक्कर में ईश्वर को स्मरण करना भूल जाता है, और यही मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा पाप है।

महाराज श्री ने बताया की इस जीवन में कोई प्रसन्न नहीं है, क्यूंकि संसार में जो भगवान का नहीं हुआ वो जिंदगी भर खुश नहीं रह सकता। इस संसार में प्रसन्न रहने का बस एक ही फॉर्मूला है। बस मैं भगवान का हूँ भगवान मेरे है, मुझे भगवान् को पाना है मैं उनका दास हूँ और वो मेरे भगवान है जिस दिन ये फीलिंग आपके मन में घर कर गई उस दिन से सभी दुःख आपसे दूर हो जाएंगे।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत वही अमर कथा है जोभगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को
जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी।

लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन सेनहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं।भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी।धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय मेंभगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।

श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके सेअमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुपगए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चलेगए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्तहोने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक
आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता
फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जबआपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगाऔर नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।

23Sep 2019

15 से 22 दिसंबर 2019 तक भायंदर, मुम्बई में होने वाली श्रीमद्भागवत कथा की तैयारियों को लेकर श्री श्याम सुन्दर शर्मा जी (आचार्य जी) ने समिति के पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं के साथ बैठक की।

राधे राधे, कल दोपहर 15 से 22 दिसंबर 2019 तक भायंदर, मुम्बई में होने वाली श्रीमद्भागवत कथा की तैयारियों को लेकर श्री श्याम सुन्दर शर्मा जी (आचार्य जी) ने समिति के पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं के साथ बैठक की। सभी ने इस आयोजन के लिए की जा रही तैयारियो को लेकर अपने विचार साझा किए एवं सभी कार्यकर्ताओं के द्वारा वाहन के साथ शहर में प्रचार - प्रसार की प्रकिया भी शुरू की गई। राधे राधे।

23Sep 2019

जिनका सम्बंध भगवान से नहीं होता उनकी मुक्ति नहीं होती है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 सितम्बर 2019 तक Texas में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

पूज्य महाराज श्री ने कथा के तृतीय दिवस पर भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।
भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि आजकल के बच्चों को पता ही नहीं है की अपने माता पिता के साथ किस तरह का व्यवहार करना चाहिए। उनको यह तक नहीं पता है की माता पिता, गुरू के बराबर में कभी नहीं बैठना चाहिए। अगर आप बिस्तर पर भी बैठ रहे हैं तो जहां सर होता है उस ओर ना बैठे, बैठना है तो पैरों की तरफ बैठे जिससे आपको उनके मुख का दर्शन हो सके।
महाराज श्री ने कहा कि जिनका सम्बंध भगवान से नहीं होता उनकी मुक्ति नहीं होती है। भगवान से सम्बंध जुड़ना जरूरी है। हमारा दुर्भाग्य यह है की दुनिया की आबोहवा में हम इस तरह उलझ गए हैं की हमे मालूम है की हमें मरना है लेकिन भगवान से वो रिश्ता हम नहीं बना पाए हैं। गंगा जमुना के तट पर बैठकर भी हम डुबकी नहीं लगा पा रहे हैं। आप जिस भगवान से भाग रहे हो अपनी इच्छाओं को पूरी करने के लिए वो कभी पूरी नहीं होती है। संसार रूपी सागर में इच्छा रूप लहरें कभी नहीं रूकती हैं। सागर में जितनी लहरें हैं उससे ज्यादा व्यक्ति के जीवन में इच्छाएं हैं। इन इच्छाओं के रहते रहते आपके प्रभु को पाना है ये बात अवश्य याद रखिए।
महाराज श्री ने आगे कहा कि गृहस्थ आश्रम सबसे बड़ा आश्रम है इसमें कोई दोराय नहीं है लेकिन गृहस्थ में रहते हुए अगर आप ईश्वर को भूल गए तो यह नरक का द्वार है। गृहस्थ के दो पहिए होते हैं धर्म और कर्म, अगर गृहस्थ में से एक भी पहिया खराब हो गया तो ये गाड़ी नहीं चलेगी। हम लोगों ने एक पहिए को तो उतार कर ही रखा हुआ है। धर्म के पहिए को उतार कर रखा हुआ है और सिर्फ कर्म के पहिए को चलाए जा रहे हैं। याद रखिए एक पहिए पर गाड़ी ज्यादा दिन तक नहीं चलती है। अगर आप कर्म कर रहे हैं तो लगातार उसे अच्छाई के साथ किजिए। धर्म और कर्म को साथ लेकर चलिए वहीं सही गृहस्थ आश्रम है।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।
राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...
अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।
भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

23Sep 2019

आप सभी प्रभु प्रेमियों को विदित हैं कि नागपुर में 2 से 8 जनवरी 2020 तक श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के श्रीमुख से किया जाएगा।

राधे राधे,जैसा कि आप सभी प्रभु प्रेमियों को विदित हैं कि नागपुर में 2 से 8 जनवरी 2020 तक श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के श्रीमुख से किया जाएगा। इस कथा की तैयारियों का निरीक्षण करने नागपुर पहुंचे श्री श्याम सुन्दर शर्मा जी (आचार्य जी), जहाँ पर समिति के सभी पदाधिकारियों के साथ कार्यकर्ता भी मौजूद थे, सभी को कार्यक्रम हेतु दिशा निर्देश दिए । राधे राधे।

 

24Sep 2019

प्रतिदिन भगवान का नाम जपना ये भी यज्ञ है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 सितम्बर 2019 तक Texas में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया
भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि चाहे अनचाहे जीव से नित्य पाप होते हैं। कुछ का पता चलता है और कुछ का पता नहीं चलता है और उन पापों को मिटाने के लिए कुछ यज्ञ हमेशा प्रत्येक दिन करते रहना चाहिए। जिस तरह पाप नित्य होते हैं उसी तरह यज्ञ भी नित्य होने ही चाहिए। आप गाड़ी चलाकर जाते हैं, पैदल चलते हैं तो ना जाने कितने कीड़े मकौड़े, चीटियां मर जाती हैं। एक चीटी को भी मारने का पाप लगता है, जितनी बड़ी आत्मा आपके अंदर है उतनी ही चीटी के अंदर भी है। जब हम सांस लेते हैं उसमें भी कितने कीटाणु मरते हैं, वो भी हत्या आपकी रोज लगती है, इतने पाप हम अनजाने में रोज करते हैं तो उन अनजाने पापों से मुक्ति के लिए प्रतिदिन यज्ञ करने चाहिए। ये यज्ञ ऐसे हैं जो आप प्रतिदिन कर सकते हैं, सूर्य को जल देना यज्ञ है, पक्षियों, चीटियों के लिए कुछ खाने को डालना भी यज्ञ है, प्रतिदिन भगवान का नाम जपना ये भी यज्ञ है। जो व्यक्ति आसन पर बैठकर थोड़ा भी जप करता है वो नित्य यज्ञ करता है।
महाराज श्री ने कहा कि आज व्यक्ति सबकुछ होने के बाद भी परेशान क्यों है ? उसके पास यश है , वैभव है, सम्पत्ति है फिर भी वह दुखी है, वह इसलिए क्योंकि वह सब कुछ खाए जा रहा है। इतना ही नहीं वह दूसरों का भी खाने की इच्छा रखता है। जो भी व्यक्ति दूसरों की सम्पत्ति पर नजर डालता है, दूसरे के धन को पाने की इच्छा रखता है वो पाप करता है। अगर आप किसी को दुख देते हैं तो आप सुख नहीं पा सकते।
महाराज श्री ने कहा कि हमारे तीन पाप महापाप होते हैं। काम कृत पाप, लोभ कृत पाप और क्रोध कृत पाप। हम जब काम के आधिन होते हैं तो हमारी इंद्रियां विकृत हो उठती हैं और हम उचित अनुचित के बारे में सोचे बगैर कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाते हैं। दूसरा लोभ कृत पाप जिनके मन में लोभ आ जाता है वो व्यक्ति इस हद तक गिर जाते हैं की वो लोभ को पूर्ण करने के लिए किसी का भी कितना भी बुरा कर सकते हैं। तीसरा क्रोध कृत पाप, जब हम क्रोध में होते हैं तो हम बोलने में नहीं चुकते, हम किसी पर हाथ उठाने में भी नहीं चुकते, हम कुछ भी कर जाते हैं। ये तीनों पाप जीव को नरक की और लेकर जाते हैं। इन तीनों पापों से बचने का एक ही उपाय है सत्संग। जब आप सत्संग में जाते हैं तो आपका मानसिक संतुलन, इंद्रियां वश में रहती है, आपको सही गलत की समझ होती है। लेकिन यह तब संभव है जब आप सत्संग को धारण करते हैं।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली ने भगवान ब्रह्मा वरदान मांगा की मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने उसे वरदान दे दिया। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने विष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली से कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का सुंदर वर्णन श्रवण कराया। सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

18Sep 2019

संसार का सबसे बड़ा पाप ईश्वर का विस्मरण है।

 

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 13 से 19 सितंबर 2019 तक Hindu Temple Of Greater Chicago में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की ईश्वर ने जो हमें ये मानव जीवन दिया है इसे और भी अच्छा बनाने के लिए हम क्या कर सकते है? क्यूंकि आप मानव जीवन में जन्म लेकर इसका लाभ ना उठा सकें तो ये मानव जीवन आपकी दुर्गति कराने वाला है। जो जीव इस जीवन का लाभ उठा लेता है वो सद्गति को प्राप्त करता है।

महाराज श्री ने बताया की हमारे जीवन में गुरु का सानिध्य होना बहुत जरुरी है क्यूंकि बहुत सारी चीजे ऐसी है जब तक आप उनका खुद से अनुभव न कर लें तब तक आपको उसका एहसास नहीं होता।

मानव जीवन ही एक मात्र ऐसी योनी है जिससे हम ईश्वर को प्राप्त कर सकते है, ये जीवन आपको संसार की उलझनों में उलझने के लिए नहीं प्राप्त हुआ है, आपके पूर्व जन्मो के अच्छे कर्मो की बदौलत आपको ये जीवन मिला है और इस जीवन में आने के बाद आपको सिर्फ भक्ति का नशा होना चाहिए और हमारे दिल में सिर्फ और सिर्फ गोविन्द होने चाहिए। क्यूंकि संसार का सबसे बड़ा पाप ईश्वर को याद न करना है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

16Sep 2019

मोक्ष मिलना भागवत कृपा पर आधारित है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 13 से 19 सितंबर 2019 तक Hindu Temple Of Greater Chicago में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। पूज्य महाराज श्री ने कथा के तृतीय दिवस पर भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया। भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई । कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की मोक्ष मिलना भागवत कृपा पर आधारित है आप किसी एक साधन की मदद से प्राप्त मोक्ष की प्राप्ति नहीं कर सकते लेकिन अगर आपको मानव जन्म मिल जाए, जीवन में गुरु का संग मिल जाए और आपको उस ईश्वर को पाने की जिज्ञासा हो, ये तीन साधन अगर आपको मिल जाए तो आपके मोक्ष प्राप्ति के द्वार खुल जाते है। महाराज श्री ने बताया की आज के समय में लोगों को ईश्वर से मिलने की लालसा नहीं है बल्कि ईश्वर से पाने की लालसा है, हमें ईश्वर से प्रेम नहीं है, हमें जो ईश्वर से चाहिए उससे प्रेम है और यही हमारे जीवन में सबसे बड़ा दुःख का कारण है। मानव जीवन, गुरु का सानिध्य, ईश्वर से मिलने की तीव्र इच्छा आपके जीवन में जब ये तीनो चीजे एकत्रित हो जाए तो आप समझ लेना की ये मनुष्य जीवन हमारा आखिरी है और इसी जीवन में हमें सदगति प्राप्त हो जायेगी। महाराज श्री ने बताया की ये मानव शरीर ईश्वर के द्वारा हमें किराये के मकान की तरह दिया हुआ है अगर हम इसका ज्यादा गलत फायदा उठाएंगे तो भगवान हमसे ये मानव शरीर कभी भी खाली करा सकता है। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये... अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे। भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं। || राधे -राधे बोलना पड़ेगा ||

15Sep 2019

संतों का सानिध्य हृदय मे भगवान को बसा देता है।

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 13 से 19 सितंबर 2019 तक Hindu Temple Of Greater Chicago में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

महाराज श्री ने बताया की भागवत शब्द ब्रह्म है और जब आप भागवत श्रवण करते है तो इन शब्दों के माध्यम से ये आपके अन्ताकरण तक प्रविष्ठ होते है और हमारे अन्ताकरण को शुद्ध करते है। जब तक हमारा चित्त शुद्ध नहीं होगा तब तक हम भगवान को नहीं पा सकते।

संसारिक शब्द कही न कही हमें दूषित करते है संसार में फसाये रखते है, लेकिन जो भगवान के कथा रुपी शब्द है ये हमें संसार से मुक्त करते है।

भगवान ने हमपर बड़ी कृपा करके हमें ये मानव जीवन उपहार में दिया है ताकि हम यहां जन्म लेकर धर्म के कार्यो को करें, हरी की भक्ति करें और अपने जीवन के उद्देश्य को पूरा करें लेकिन मानव जीवन में जन्म लेने के बाद हम संस्कार में ही फस कर रह गए है।

महाराज श्री ने बताया की जिन लोगों के पूर्व जन्म के पाप हावी होते है वो उन्हें कथा श्रवण नहीं करने देते। लेकिन जिसके जीवन में श्याम न हो उसके जीवन में कभी आराम नहीं हो सकता। इसलिए हमें अपने कल्याण के लिए ईश्वर की भक्ति में अपना चित्त लगाना चाहिए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत वही अमर कथा है जोभगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकरआओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है।

माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन सेनहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं।

भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी।धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय मेभगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।

श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके सेअमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्तहोने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा।

तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुकआप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधताफिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जबआपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगाऔर नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

13Sep 2019

मानव जीवन तो ईश्वर से मिलने का प्रमुख द्वार है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 12 सितंबर 2019 तक Bharat Sevashram Sangha 3490 Route 27 Kendall Park New Jersey - 08824 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया। श्रीमद्भागवत कथा की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि हमें मानव जीवन इसलिए नहीं मिला है की हम इस संसार में जन्म लें, भोग विलासों को भोगे और फिर इस संसार को छोड़ कर चले जाए बल्कि मानव जीवन तो ईश्वर से मिलने का प्रमुख द्वार है। अगर हम इस मानव जीवन को यूँ ही व्यर्थ खो देंगे तो फिर जन्म जन्मांतर तक भटकने के सिवा हमारे हाथ कुछ नहीं लगेगा। सिर्फ मानव जीवन ही वही योनी है जिसमे हरी से मिलने का प्रयत्न किया जा सकता है किन्तु पुरे जीवन में मनुष्य अपने परिवार और जिम्मेदारियों के बीच में ही फंसे रह जाते है और अपने मानव जीवन के मुख्य उद्देश्य को भूल जाता है। भगवान आपको जन्म जन्मांतर के भव बंधनो से मुक्त करने का कार्य भगवान अपनी कृपा से करते है। भगवान के पुरूस्कार के बिना आपको मुक्ति नहीं मिल सकती। जीवन में भक्ति का पदार्पण, ज्ञान का पदार्पण, और किसी साधू की सेवा में आपका चित्त लग जाए ये सब आपको भगवान की किरपा से ही प्राप्त होता है। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की। ।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

14Sep 2019

जो व्यक्ति बिना किसी इच्छा के भागवत श्रवण करता है वो ठाकुर के श्री चरणों में स्थान प्राप्त करता है।

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 13 से 19 सितंबर 2019 तक Hindu Temple Of Greater Chicago में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

भागवत के प्रथम दिवस की शुरूआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के कथा की शुरूआत भागवत के प्रथम श्लोक से की
सच्चिदानन्द रूपाय विश्वोत्पत्यादि हेतवे तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयम नुमः
वासुदेव सुतं देवम् कंस चानुर मर्दनम् देवकी परमानंदम् कृष्णम् वंदे जगदगुरुम्।।

महाराज श्री ने बताया की जो जीव भागवत की शरण में आ जाता है समझो वो कृष्ण की शरण में आ गया है और उनका संरक्षण स्वयं श्री कृष्ण करते है, आप लोग इतने भाग्यशाली है की जिस कथा को देवराज इंद्र श्रवण नहीं कर पाए उसे आप इतनी सहजता से श्रवण कर रहें है।

महाराज श्री ने बताया की अमृत हमारे पुण्यो को नष्ट करता है और कथा अमृत हमारे पापों का नाश करता है, अमृत हमारी वासना बढ़ाता है और कथाअमृत हमारी उपासना को बढ़ाता है अगर आप सच्चे साधक हो तो आपको कथा से अवश्य प्रेम करना चाहिए।

महाराज श्री ने कथा श्रवण करने का लाभ बताते हुए कहा कि अगर दरिद्री व्यक्ति कथा सुनता है तो वो धनवान हो जाता है, रोगी व्यक्ति कथा श्रवण करें तो वो निरोगी काया प्राप्त करता है, पापी व्यक्ति कथा सुने तो वो निश्पाप हो जाता है, निसंतान व्यक्ति कथा सुने तो वो संतान प्राप्त कर लेता है और जो व्यक्ति बिना किसी इच्छा के भागवत श्रवण करता है वो ठाकुर के श्री चरणों में स्थान प्राप्त करता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार नैमिषारणय में सनकादिक ऋषि विराजमान थे तभी वहां परम श्रद्धेय सूद जी महाराज पधारे। जब सूद जी महाराज वहां पधारे तो उन्हें एक बहुत सुंदर आसन दिया और वहां पर उनको बैठाया। तो सभी ऋषियों ने सूद जी महाराज से ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा।

श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

12Sep 2019

शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है।

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 12 सितंबर 2019 तक Bharat Sevashram Sangha 3490 Route 27 Kendall Park New Jersey - 08824 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

महाराज श्री ने कथा की शुरुआत में श्रोताओं की श्रेणी के बारे में बात करते हुए बताया की कुछ श्रोता ऐसे होते है जो कथा तो श्रवण करते है लेकिन एक दिन सुनेंगे दूसरे दिन सुनेंगे लेकिन तीसरे दिन वो उस मार्ग से भटक जाएंगे और कथा श्रवण नहीं करेंगे।

लेकिन जो चातक श्रोता होते है उनका स्वभाव समुन्द्र के समान होता है जैसे समुन्द्र में कितनी भी नदियों का जल आकर उसमे मिल जाए समुन्द्र उस पानी को अपने अंदर समा लेता है और अपनी सीमा कभी नहीं लांगता। इसी प्रकार चातक श्रोता नियम से कथा का श्रवण करते है और वो भक्त भगवान की कथा के अलावा कुछ और श्रवण करना पसंद ही नहीं करते।

महाराज श्री ने हंस का उदहारण देते हुए कहा की हंस को भगवान् के द्वारा प्रकृति शक्ति प्राप्त है अगर आप हंस के सामने दूध में पानी मिलाकर उसे पीने के लिए देंगे तो हंस उसमे से सारा दूध पी जाएगा और पानी को छोड़ देगा उसी तरह दूसरी श्रेणी के श्रोताओं को होना चाहिए उनके आस पास जहाँ -जहां भगवान की कथा हो रही हो उन्हें कथा पंडाल में कथा श्रवण करने के लिए जरूर जाना चाहिए।

महाराज श्री ने तीसरी श्रेणी के श्रोता के बारे में बताते हुए कहा की तीसरी श्रेणी का श्रोता तोते के समान होता है उसे जो व्यक्ति जितना सीखा दे वो उतना ही बोलता है। जब तक पंडाल में कथा श्रवण करते है भगवान की भक्ति में लीन रहते है भगवान् की भक्ति करते है लेकिन जैसे ही कथा पंडाल से बाहर जाते है तो अभक्त हो जाते है।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है।

महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया।
ये बस स्वार्थ हैं।

दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं।

श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

11Sep 2019

जिनके दिलों में निर्मलता होती है ईश्वर उन्ही को प्राप्त होते है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 12 सितंबर 2019 तक Bharat Sevashram Sangha 3490 Route 27 Kendall Park New Jersey - 08824 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की गोविंद की अहित की कृपा के बिना हमें भागवत श्रवण का सौभाग्य प्राप्त नहीं होता।

महाराज श्री ने बताया की ये सम्पूर्ण संसार स्वार्थ से भरा हुआ है, जब तक लोगों की आपसे जरूरते पूरी होती रहेंगी तब तक लोग आपके साथ है लेकिन जैसे ही आपका बुरा समय आएगा तो आपका साथ कोई नहीं देगा सब आपका साथ छोड़ कर चले जाएंगे हमारे बुरे समय में बस हमारे गोविन्द ही हमे सहारा देते है।

महाराज श्री ने बताया की भक्ति के पथ पर हमें सदैव अकेला ही चलना पड़ता है अगर आप अपना कल्याण चाहते हो तो आपको ये नहीं सोचना है कि आपके साथ कौन है आपको बस ये देखना है की मैं जिस गोविन्द के साथ के लिए इस मार्ग पर आया हु उसका साथ मेरे साथ है या नहीं।

महाराज श्री ने बताया की जिनके दिलों में निर्मलता होती है ईश्वर उन्ही को प्राप्त होते है जैसे बच्चो के हृदय, उनके दिल एक दम पाक साफ़ होते है इसलिए उन्हें भगवान का स्वरुप भी कहा जाता है।

इसलिए बच्चों को बचपन से ही भक्ति पथ पर चलना चाहिए। क्यूंकि भक्ति करने की कोई उम्र नहीं होती और अगर वो बचपन से ही होने हृदय में ठाकुर को बसा लेंगे तो उनका जीवन उद्धार निश्चित है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

10Sep 2019

कथा श्रवण करने जाना ही परम सौभाग्य है।

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 12 सितंबर 2019 तक Bharat Sevashram Sangha 3490 Route 27 Kendall Park New Jersey - 08824 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि कथा श्रवण करना जाना ही परम सौभाग्य है, जो लोग भक्ति करने जाएंगे तो उसकी परीक्षाएं तो होंगी है लेकिन आपको उस परीक्षा से भागना नहीं है बल्कि उसका डट कर उनका सामना करना है।

महाराज श्री ने बताया की श्रीमद भागवत महापुराण को श्रवण करने से हमारे जन्म जन्मांतर के अग समाप्त हो जाते है, पाप और अग में बहुत अंतर है क्यूंकि पाप वो होते है जो संसार में हम करते है और किसी तीर्थ स्थान पर जाने के बाद उन पापो की समाप्ति हो जाती है लेकिन तीर्थ स्थानों पर हमसे हुई भूल या पापो को अग कहते है जिनकी समाप्ति कथा श्रवण से ही होती है।

श्रीमद्भागवत कथा ईश्वर को प्राप्त करने का मार्ग है और हमें ईश्वर को प्राप्त करने के लिए इस मार्ग पर अवश्य चलना चाहिए क्यूंकि यही हमारे जीवन का उद्देश्य है।

महाराज श्री ने बताया की किसान और कृष्ण में कोई ज्यादा अंतर नहीं है, कृष्ण कर्म करने का उपदेश देते है इसलिए हमें देवी देवताओं के साथ किसानो का भी आदर सम्मान करना चाहिए क्यूंकि बड़ी मेहनत से किसान खेती करके अन्न एवं फसल पैदा करते है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली ने भगवान ब्रह्मा वरदान मांगा की मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने उसे वरदान दे दिया। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने विष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली से कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"

जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"

भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया। इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का सुंदर वर्णन श्रवण कराया। सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

7Sep 2019

ईश्वर को जानने की जिज्ञासा ही विश्व में सबसे सुंदर है ।

ईश्वर को जानने की जिज्ञासा ही विश्व में सबसे सुंदर है -पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 12 सितंबर 2019 तक Bharat Sevashram Sangha 3490 Route 27 Kendall Park New Jersey - 08824 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

श्रीमद्भागवत कथा की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान की असीम कृपा से इस सृष्टि का सृजन हुआ है उन्ही के दवारा इस दुनिया का पालन पोषण होता है और समय आने पर वही इस सृष्टि का संघार भी करते है।

महाराज श्री ने बताया की भगवान की अद्भुत लीलाओं का वर्णन श्रीमद भागवत कथा है, ये कथा देयिक, दैविक और भौतिक तापो का नाश करने वाली है जो जीव श्रीमद भागवत कथा से अपना चित्त लगता है ये कथा उसको मोक्ष प्राप्त कराती है।

महाराज श्री ने बताया की लोगों के दिल में अपने और अपने परिवार को विकसित करने के लिए भिन्न- भिन्न प्रकार की इच्छा होती है और इच्छाएं ही वो चीज है जो कभी ख़त्म नहीं होती लेकिन जिस दिन जीव के अंदर ईश्वर को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हो जाती है उस दिन उसका कल्याण होना शुरू हो जाता है क्यूंकि ईश्वर के बारे में जानने वाले व्यक्ति का हरी से मिलना तय है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार नैमिषारणय में सनकादिक ऋषि विराजमान थे तभी वहां परम श्रद्धेय सूद जी महाराज पधारे। जब सूद जी महाराज वहां पधारे तो उन्हें एक बहुत सुंदर आसन दिया और वहां पर उनको बैठाया। तो सभी ऋषियों ने सूद जी महाराज से ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा।

श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

8Sep 2019

कथा का अमृतपान करने से आपके पाप नष्ट होते हैं।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 12 सितंबर 2019 तक Bharat Sevashram Sangha 3490 Route 27 Kendall Park New Jersey - 08824 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की कई लोग कहते है की हमारे शास्त्रों और ऋषि मुनियों के द्वारा बताये गए भक्ति के मार्ग एवं साधनो का पालन करने के बाद भी हमें ईश्वर की प्राप्ति क्यों नहीं होती ? महाराज श्री ने बहुत ही सुन्दर जवाब देते हुए बताया की हमें ईश्वर की प्राप्ति इसलिए नहीं होती क्यूंकि हम ईश्वर को पाने वाले मार्ग पर अपने आप को पूर्णता समर्पण किये बिना ही छोड़ देते है। इसलिए हमारे हाथ असफलता लगती है,जब तक आप परमात्मा में विलीन नहीं होंगे तब तक आपकी ये यात्रा मंगलमय नहीं होगी।

महाराज श्री ने बताया की जब तक आप अपने शरीर में अहमता और रिश्तो में ममता से छुटकारा नहीं पा लेंगे तब तक आपको हरी मिलन का आनंद प्राप्त नहीं होगा।

महाराज श्री ने अमृत और कथा अमृत में अंतर बताते हुए कहा की अमृत आपके पुण्य नष्ट करता है और कथा अमृत आपके पापो को नष्ट करता है।


पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है।

भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।

श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।

यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

9Sep 2019

इस संसार में केवल एक चीज निश्चित है, जन्म लेने के बाद मृत्यु।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 12 सितंबर 2019 तक Bharat Sevashram Sangha 3490 Route 27 Ken dall Park New Jersey - 08824 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। पूज्य महाराज श्री ने कथा के तृतीय दिवस पर भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया। भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि इस संसार में आपको जो भी चीजें प्राप्त है या फिर आने वाले समय में आपको जो भी प्राप्त होगा वो सब अनफिक्स है लेकिन इस संसार में जन्म लेने के बाद आपकी मृत्यु तय है। महाराज श्री ने बताया की हम सभी का जन्म एक ही तरीके से होता है, लेकिन हमारी मृत्यु एक तरह से नहीं होती किसी को बहुत सुंदर मौत नसीब होती है और कोई बड़ी दुःख दायी मौत मरता है व्यास जी ने बताया की हमारे जीवन की यात्रा का अंत जीवन की आखरी मंजिल मृत्यु ही है। महाराज श्री ने बताया की मृत्यु को अच्छा बनाने के लिए पूरा जीवन जिया जाता है क्यूंकि जिनकी मृत्यु अच्छी होती है उनका अगला जन्म नहीं होता वो ईश्वर के धाम को प्राप्त करते है और जिनकी मृत्यु बुरी होती है उनका फिर से पुनर्जन्म होता है। शास्त्रों में लिखा है की अंत में मरने वाले की जैसी मती होती है उसकी दूसरे जीवन में वैसी चित्त शुद्धि होती है क्यूंकि जिनका चित्त शुध्द होता है उनकी मुक्ति निश्चित होती है और जिनका चित्त शुद्ध नहीं होता वो फिर से पुनर्जन्म के बंधन में फस जाते है। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये... अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे। भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

6Sep 2019

संत वो महापुरुष होते है जो आपके ऊपर बिना किसी वजह के कृपा करते है।

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 30 अगस्त से 05 सितंबर 2019 तक Shiv Shakti Peeth 264-12 Hillside Avenue Queens, New York 11004 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया। श्रीमद्भागवत कथा की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि संतो का हृदय माखन समान होता है और संत वो होते है जो आपमें आपके अवगुणो की बजाए आपके गुण देखते है। साथ ही बताया की भगवान आपके ऊपर किसी न किसी वजह से कृपा करते है लेकिन संत वो महापुरुष होते है जो आपके ऊपर बिना किसी वजह के कृपा करते है। महाराज श्री ने भक्तो से प्रश्न करते हुए पूछा की आखिर जिस भगवान की हम इतनी पूजा करते है उनकी इतनी सेवा करते है तो उन्हें बार-बार पृथ्वी पर क्यों आना पड़ता है ? उसके बाद उन्होंने भक्तों को बताया की जब -जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है तो भगवान को धर्म की स्थापना करने और अधर्म का विनाश करने के लिए पृथ्वी पर अवतार लेना पड़ता है। महाराज श्री ने कहा की हमें हमेशा धर्म की रक्षा करनी चाहिए और धर्म को आगे बढ़ाने के लिए हमें रोजाना मंदिरो में जाना चाहिए, संतो की सेवा करनी चाहिए ,शास्त्रों के माध्यम से ब्राह्मणो द्वारा बताये गए मार्ग पर चलना चाहिए। लेकिन हम शास्त्रों द्वारा बताये रास्तो पर चलने के बजाए अपनी मनमानी करते है और यही कारण है जिससे अधर्म बढ़ता है इसलिए हमें अपने मन के मुताबिक नहीं बल्कि शास्त्रों के मुताबिक चलना है। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की। ।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

5Sep 2019

बुरे वक्त में केवल भगवान आपका सहारा बनते हैं।

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 30 अगस्त से 05 सितंबर 2019 तक Shiv Shakti Peeth 264-12 Hillside Avenue Queens, New York 11004 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीमद्भागवत कथा की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत में बताया की आज कल के जीव अपने ऊपर थोड़ी सी परेशानी आने पर ही परेशान हो जाते है, लेकिन हमें इन परिस्थतियों से घबराना नहीं चाहिए बल्कि इनका डट कर सामना करना चाहिए क्यूंकि समय के द्वारा हमें जब परेशानिया भोगनी पड़ती है तो इसका मतलब ये है की इस परेशानी के द्वारा हमारे कुछ कर्म भी कट रहें है और भगवान आपको पुनः चलने का एक नया मार्ग दिखा रहें है।

महाराज श्री ने बताया की जब आपका समय विचित्र हो तब सिर्फ ईश्वर ही आपका साथ देते है, क्यूंकि ये संसार बड़ा मतलबी है आपके बुरे समय में सब आपका साथ छोड़ देंगे लेकिन भगवान आपका साथ कभी नहीं छोड़ते वो हमेशा आपके साथ रहते है जब - जब आपको उनकी जरूरत पड़ती है।

महाराज श्री ने बताया की भगवान को अहंकार पसंद नहीं है, लेकिन आज का कलयुगी जीव अगर उसे थोड़ा बहुत धन प्राप्त हो जाए और कुछ लोग उसकी इज्जत करने लगें तो उस व्यक्ति को अपने ऊपर घमंड हो जाता है। लेकिन वो मुर्ख ये नहीं जानता की ये सब उसे ईश्वर का दिया हुआ है उसका खुद का कमाया हुआ कुछ नहीं है। ये सब हमें हमारे पूर्व जन्म के कर्मो के अनुसार प्राप्त होता है।

महाराज श्री ने कहा की जिन लोगों को ईश्वर के बारे में जानने की जिज्ञासा होती है उन लोगों को ईश्वर की प्राप्ति होती है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया।

ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे।

अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

5Sep 2019

जिन पंच तत्वों से आपका ये शरीर बना हुआ है उन पंच तत्वों का आधार भगवान ही है।

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 30 अगस्त से 05 सितंबर 2019 तक Shiv Shakti Peeth 264-12 Hillside Avenue Queens, New York 11004 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान हर जगह मौजूद है, महाराज श्री ने भगवान के नाम की व्याख्या करते हुए बताया की भ का अर्थ है भूमि, ग का अर्थ है गगन, वा का अर्थ है वायु, चौथा अक्षर है अ जिसका अर्थ है अग्नि और आखरी अक्सर है न जिसका अर्थ है नीर। जब आप भगवान के नाम का अर्थ खोजने की कोशिश करेंगे तो आपको ज्ञात होगा की जिन पंच तत्वों से आपका ये शरीर बना हुआ है उन पंच तत्वों का आधार भगवान ही है।

महाराज श्री ने बताया की पंच तत्वों से हमारा ये शरीर बना हुआ है और इसमें ईश्वर ही समाये हुए है, इसका मतलब है की भगवान हर जगह वास करते है। और अगर इन पंच तत्वों में से हमें कोई एक भी तत्व नहीं मिला तो हम उसके बिना जीवित नहीं रह पाएंगे। 
महाराज श्री ने बताया की इन पांच तत्वों में भगवान की सत्ता है और इन्ही पांच तत्वों की वजह से हमारा जीवन चलता है और अगर हमें ये पांच चीजे ना मिले तो इनके बिना हमारा जीवन शून्य है।

महाराज श्री ने बताया की जो भगवान के सच्चे भक्त होते है वो भगवान से कुछ मांगते नहीं है वो तो बस भगवान से मिलने की इच्छा रखते है, उन्हें अपने शरीर से कोई प्यार नहीं होता क्यूंकि ये शरीर भगवान से मिलने का साधन है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

3Sep 2019

महाराज श्री ने बताया की हमें अपने बड़ो के सामने हमेशा पर्दा करना चाहिए क्यूंकि पर्दा किसी से छुपने के लिए नहीं बल्कि बड़ो के सम्मान के लिए होता है।

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 30 अगस्त से 05 सितंबर 2019 तक Shiv Shakti Peeth 264-12 Hillside Avenue Queens, New York 11004 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

कथा के चतुर्थ दिवस पर भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की सभी माँ- बाप अपने बच्चो की ख़ुशी के लिए दिन-रात महनत करते है ताकि उनके बच्चों के जीवन में कोई कठिनाई न आये और वो ख़ुशी ख़ुशी अपना जीवन व्यतीत करे लेकिन अगर आपके बच्चो की किस्मत में वो ख़ुशी होगी ही नहीं तो क्या वह ख़ुशी उन्हें मिल पाएगी और अगर उनके भाग्य में ख़ुशी है तो क्या उन्हें आपकी इस मेहनत का इंतज़ार रहेगा।

महाराज श्री ने बताया की हम जब कभी भी मंदिर में जाए जो अपना सिर ढक लें साथ ही माता बहनो से निवेदन किया की भगवान् शिव जी का अभिषेख कभी भी खुले बालों में ना करें,और भगवान की प्रतिमा को कभी पीठ न दिखाएँ एवं पूजा करते समय अपने बालों को बाँध कर रखें।

महाराज श्री ने बताया की हमें अपने बड़ो के सामने हमेशा पर्दा करना चाहिए क्यूंकि पर्दा किसी से छुपने के लिए नहीं बल्कि बड़ो के सम्मान के लिए होता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था।

महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।

शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया।

पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे। महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।" जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था।

वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया।

वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया। इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

1Sep 2019

जन्म जन्मांतर के पुण्य जब एकत्रित होते हैं, तब कही जीव को जाकर सत्संग की प्राप्ति होती है।

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 30 अगस्त से 05 सितंबर 2019 तक Shiv Shakti Peeth 264-12 Hillside Avenue Queens, New York 11004 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। 
श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। 
भागवत के द्वितीय दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए "भजन बिना बावरा" भजन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज जी बताया की सत्संग की प्राप्ति कैसे करें। जन्म जन्मांतर के पुण्यों का जब सग्रह होता है जन्म जन्मांतर के पुण्य जब एकत्रित होते है। तब कही जीव को जाकर सत्संग की प्राप्ति होती है। सत्संग ऐसे ही नहीं मिल जाता। रामायण में भी सत्संग का बहुत बड़ा महत्व है। गोस्वामी तुलसीदास ने भी लिखा है। भाग्य में न जाने कितने सुख और दुःख आये है। पुण्य के जब सग्रह हो, एकत्रित करण हो तब बहुत कृपा करके सत्संग प्राप्त होता है। हम भवसागर से पार हो जाते है। इतना सरल है सत्संग, इतना दिव्य है सत्संग, सत्संग में भी श्रीमद भगवात श्रावण करने को मिल जाये तो हमारे भाग्य खुल जाते है। जब कोई भी जीव श्रीमद भागवत कथा सुनता है। तो पितृ नाचते हुए झूमते है। और एक दूसरे को बताते है की हम भाग्यशाली है। क्यों हमारे जो वंश है वो भागवत कथा सुनने के लिए है। अगर वो भागवत कथा सुनेगे तो आपको क्या लाभ मिलेगा ? भागवत जब सुनते है तो उनका किया हुआ सुकृत हम तक पहुंच जाएगी। हमें मुक्ति मिल जाएगी। महाराज जी कहा की कथा सुनने के लिए आप यह आये इससे आपके बुरा भला आप तक सिमित नहीं है आपके और हमारे पितरों तक ये लाभ जायेगा। कब जायेगा जब हम भागवत में ध्यान लगाकर सुनेगे। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओं का गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। 
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
#Usakatha #Usakatha2019 #ShantiSandeshYatra2019

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

2Sep 2019

“धार्मिक शिक्षा आपको अंधेरे से प्रकाश की ओर लेकर जाती है” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

“धार्मिक शिक्षा आपको अंधेरे से प्रकाश की ओर लेकर जाती है”

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 30 अगस्त से 05 सितंबर 2019 तक Shiv Shakti Peeth 264-12 Hillside Avenue Queens, New York 11004 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

पूज्य महाराज श्री ने कथा के तृतीय दिवस पर भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि धार्मिक शिक्षा आपको अंधेरे से प्रकाश की ओर लेकर जाती है। धार्मिक शिक्षा हमारे जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है इसलिए उसका आदर करें।

महाराज श्री ने कहा कि आप कथा में आते हैं अगर आपको कथा का एक शब्द भी आ गया तो आपका जीवन बदल सकता है। आपने जब कुछ सीखा तभी आप इंजिनियर, डॉक्टर बने हैं, आप यहां कुछ सीखेंगे तो अच्छे इंसान भी बनेंगे। सत्संग एक ऐसी यूनिवर्सिटी है जहां अच्छे इंसान बनाए जाते हैं, इससे इसिलिए जुड़ते हैं ताकी अच्छे मानव बन सकें। वो लोग भाग्यशाली हैं जो इससे जुड़ते हैं, केवल भाग्यशाली ही नहीं बल्कि वो यहां से सीखते भी हैं।

महाराज श्री ने कहा कि बहुत लोग पूछते हैं हमारा कल कैसा होगा ? कल की चिंता मत करो जो कुछ कर रहे हो आज करो, वही तुम्हारा कल है, आज बीज है तो कल फसल है। महाराज श्री ने कहा कि जब हम स्कूल में पढ़ते हैं तो एक साल की पढ़ाई के बाद, कड़ी मेहनत करने के बाद हमें हमारा परिणाम पता चलता है लेकिन वहीं भक्ति की बात करें तो लोग सोचते हैं की हम आज माला करें और कल भगवान हमें प्रकट होकर दर्शन दे दें।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।

राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण