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15Feb 2020

"श्रीमद भागवत कथा साक्षात् भगवान श्री कृष्ण ही है।

"श्रीमद भागवत कथा साक्षात् भगवान श्री कृष्ण ही है।

"हमें अपने दिल और दिमाग का अच्छी जगह इस्तेमाल करना चाहिए "

"कथा के पहले दिन की जैसी ललक अगर सातवे दिन हो गई तो समझना गोविंद की कृपा हो गई"

"भारत में जन्मे व्यक्ति ईमानदारी से अपना जीवन पवित्र करना चाहते है, तो जहाँ - जहाँ अपने तीर्थ है सिर्फ वही - वही जाएं"

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 9 से 15 फरवरी 2020 तक प्रतिदिन शाम 4 बजे से 7 बजे तक स्थान - सीडी पार्क, सॉल्ट लेक, कोलकाता में पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा के सम्पूर्ण दिवस की शुरुआत में कोलकाता (बंगाल) के शिष्य परिवार द्वारा गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु , गुरुर देवो महेश्वरः गुरुर साक्षात परम ब्रह्म , तस्मै श्री गुरुवे नमः और चरणों में रहूं हरदम गुरु देव कृपा कर दो भजन गाकर महाराज श्री को नमन किया। उसके बाद पंडित श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन "कुछ नहीं बिगड़ेगा तेरा हरी शरण आने के बाद " श्रवण कराया”। "श्रीमद भागवत कथा साक्षात् भगवान श्री कृष्ण ही है। जो सात दिन विधि - विधान से श्रीमद भागवत कथा सुने। उसे मुक्ति मिल जाती है ,अगर कुछ और न चाहें तो ! कितनी बड़ी बात है मानव जीवन का उद्देश्य मात्र सात दिन में पूरा हो सकता है। अगर व्यक्ति मन लगाकर "श्रीमद भागवत कथा" अपने चित में धारण कर ले। याद रखिये इस बात को सिर्फ इच्छा पूर्ति करने का ही एक पुराण नहीं है। की आप जो मांगे वो प्राप्त हो जायेगा। मुक्ति प्राप्त कराने वाला ये ग्रंथ साक्षात् श्री कृष्ण ही है। प्रत्यक्ष श्री कृष्ण ही है। भागवत में और कृष्ण में कोई अंतर नहीं है। कलिकाल में पुराणरूपी कृष्ण हम सबके समस्त पापों का हरण करने के लिए भागवत के रूप विराजमान है। वो जीव कितने अभागे है जो ईश्वर को त्याग कर संसार के बंधनों में फसे पड़े है। आज सप्तम दिवस है आज एक सत्य समझ लीजिये। इस संसार में आपने अब तक जो भी कमाया है। वो सब यही रहे जाना है। खाली हाथ जाना है लेकिन हमारे शात्र ऐसा कहते है। तुम्हारें पास जितनी लक्ष्मी है आयेगी - जाएगी। तुम्हारा शरीर हर - एक दिन बदल रहा है। हर एक चीज यहां पर छूट जानी है। मात्र धर्म ही तुम्हारें साथ जायेगा और कोई तुम्हारें साथ नहीं जायेगा। इसलिए धर्म युक्त होकर जीवन के उद्देश्य बना लो। जब - जब अवसर मिलेगा हम भागवत कथा स्वयं तो सुनेगे ही पर स्वयं यजमान बनकर भी जैसे अष्टोतर भागवत कथा होती है।चाहे जन्माष्टमी हो, चाहे होली हो कही पर भी हो ये कोशिश अपनी तरफ से करते रहे अगर ठाकुर जी हमारे ऊपर कृपा करते रहे तो हम बार - बार जाकर यजमान बनने का एक लाभ ये है कि एक तो अपने तरफ से कथा हो गई दूसरा लाभ ये है कि इस बहाने किसी तीर्थ में एक सप्ताह रुकने का अवसर मिलता है।
महाराज जी ने कथा क्रम आगे बढ़ाते हुए कहा कि बहुत से लोग कहते है घर में पड़े - पड़े हम उव जाते है घूमने तो जाना चाहिए। जरुरी है की घूमने सिर्फ यूरोप ही जाना चाहिए ? भारत में जन्मे व्यक्ति को घूमने के लिए कही जाने की आवश्यकता नहीं है अगर भारत में जन्मे व्यक्ति ईमानदारी से अपना जीवन पवित्र करना चाहते है। तो जहाँ - जहाँ अपने तीर्थ है सिर्फ वही - वही जाएं उतने में ही बेडा पार है। क्या जरुरत है देश - विदेश में भ्रमण करने की। कोई आवश्यकता नहीं है, मन करें वृंदावन चले जाओं, मन करें हरिद्वार चले जाओं मन करें तो हिमालय चले जाओं ऐसे जहाँ - जहाँ जा सकते हो चले जाओं विदेश जाओंगे तो गलत ही सीखोगे गलत ही खाओगे मज़बूरी हो जाएगी ये खाना पड़ेगा। क्यूंकि विदेश में तो वही मिलता है। इसलिए अपने भ्रमण पर भी अपने ही तीर्थों को चुनना चाहिए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंत: सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

15Feb 2020

आज विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में कथा से पूर्व सीडी पार्क, सॉल्ट लेक, कोलकाता में युवा शांति सेवा संदेश का आयोजन किया गया।

आज विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में कथा से पूर्व सीडी पार्क, सॉल्ट लेक, कोलकाता में युवा शांति सेवा संदेश का आयोजन किया गया। महाराज श्री ने सभी युवाओं एवं बच्चों के धर्म और संस्कृति से जुड़े सवालों का एक-एक करके जवाब दिया। युवा शांति संदेश के इस आयोजन में युवाओं ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। युवाओं ने देश के धर्म, संस्कृत, संस्कृति और संस्कारों से जुड़े हुए कई सवाल किए जिनका महाराज श्री द्वारा युवाओं की ही भाषा में बड़ी ही सरलता से उत्तर दिया गया। पूज्य महाराज श्री ने सभी युवाओं को गलत संगत एवं प्रव्रतियों को त्यागने और धर्म, देश व समाज के प्रति समर्पित रहने के लिए प्रेरित किया और सनातन धर्म का इतिहास एवं संस्कारों की जानकारी दी।

12Feb 2020

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सुपुत्र देवांश जी ने अपने पिताश्री द्वारा मिले संस्कारों का पालन करते हुए अपने जन्मदिवस पर असहाय लोगों को भोजन कराकर आशीर्वाद लिया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सुपुत्र देवांश जी ने अपने पिताश्री द्वारा मिले संस्कारों का पालन करते हुए अपने जन्मदिवस पर असहाय लोगों को भोजन कराकर आशीर्वाद लिया। इसी के साथ देवांश जी ने ग़रीब एवं असहाय लोगों को उपहार भी दिया।

12Feb 2020

“स्वास्थ्य जीवन और मन की शांति चाहिए तो क्रोध पर नियंत्रण करो।

“स्वास्थ्य जीवन और मन की शांति चाहिए तो क्रोध पर नियंत्रण करो।

क्रोध से होगा जीवन का विनाश।

विनाश का कारण क्रोध।

“ठाकुर जी की कृपा के बगैर यह संभव नहीं है "

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 9 से 15 फरवरी 2020 तक प्रतिदिन शाम 4: 00 बजे से 7 बजे तक स्थान - सीडी पार्क, सॉल्ट लेक, कोलकाता में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के चतुर्थ दिवस पर कथा के मुख्य यजमान गोपाल स्नेही जी का पूरा परिवार व हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
कथा प्रारंभ से पूर्व कथा के मुख्य यजमान गोपाल स्नेही जी ने आज महाराज श्री को फूल की माला पहनाकर एवं दुपट्टा उड़ाकर सम्मानित किया गया ।

आज कथा पंडाल में मलूक पीठ वृन्दावन से श्री गोपेश बाबा जी ने अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज जी से आर्शीवाद प्राप्त किया।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन " मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है " श्रवण कराया”।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि इस संसार में जीव यूँही अपने आप को कहता रहते है सब मैंने किया है, मैंने किया है। बड़ा विचित्र है जीव ! अच्छा करें तो मैंने किया। बुरा हो जाये तो भगवान ने बुरा कर दिया। बड़ा विचित्र है व्यक्ति अच्छा किया तो मैंने किया बुरा करें तो बोले भगवान ने किया। जीवन भर एक चीज सिखलों इस संसार में जो कुछ करते है ठाकुर जी करते है। हमें तो श्रेय का वो भागीदार बना देता है। ये कथा हो रही है बोले गोपाल जी आयोजित करवा रहे है। ये कथा कौन कर रहे है पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी कर रहे है। अगर ठाकुर जी की कृपा न करें तो ये विचार कहा से आये कथा करवाने का । ठाकुर जी शक्ति प्रदान न करें तो हिम्मत कहा से हो बोलने की ।

महाराज श्री ने कहा की जब हम कोलकाता की कथा करने आ रहे थे। देवांश जी ने कहा की आप हमारे जन्मदिन पर नहीं रहे गए। आप सुबह आ जाना शाम को फिर कथा कर लेना वहां जाकर। हमने कहा कोलकाता दूर है हम नहीं आ सकते, उन्होंने कहा फिर वही से बधाई दे देना। ठाकुर जी की कृपा से हम तो यही प्रार्थना करते है। अब पिता की भूमिका दी है तो उस नाते आशीर्वाद देते है। हे गोविन्द ऐसी कृपा करना की सतोगुणी बनकर सबको अपना समझते हुए हरि नाम को आगे बढ़ाते हुए अपने जीवन में गोविन्द को पाना है। ऐसे उद्देश्य के साथ वो अपने जीवन को जिए और धर्म को आगे बढ़ाएं। आप सब भी आशीर्वाद दे कि वो सत्कर्म में लगे रहे हमेशा अच्छाई को बढ़ाये।

महाराज श्री ने कथा क्रम आगे बढ़ाते हुए कहा की क्रोध पर काबू कैसे करें ? और ये क्रोध किसका नुकशान करता है। क्रोध करने वाले का, जिसपर क्रोध आये उसका ! जब पता ही है जिसको क्रोध आता है नुकसान उसी का है। क्रोध करते ही क्यों हो । मानते तो नहीं ! बहुत से लोग कहते है की कथाओ में क्या मिलेगा। मैंने कहा बहुत कुछ बोले दिखता तो नहीं है मैंने कहा कोई लेता नहीं । इसलिए दीखता नहीं। अब कोई स्कूल जाएं कक्षा में जाएं और वहा से कुछ ले ही न । तो स्कूल का कुसूर है या अध्यापक का दोष है। या बच्चो को दोष है। ज्यादा तर क्रोध सबको आता है लेकिन कोई क्रोध की वजह से अपना भी नुकसान कर लेता है। कोई दूसरो का तो बाद में करते हो पहले खुद का नुक्सान होता है। कैसे जिस समय आपको क्रोध आ रहा होता है उस समय सिर्फ अपनी सांसो को महसूस करो कैसे है। ठंडी - ठंडी या गरम - गरम उस समय कैसे गरम हो जाती है। जब जीव क्रोध करता है तो अंदर एक तरीके से उबाल होता है। और उससे रक्त ताप तेज हो जाता है। सांसे हो जाती है गरम । प्रसन्न रहने वाला व्यक्ति परेशान हो जाता है। एक उदाहरण है एक साहब थे दुकान बंद करके आ रहे थे साहब की नजर नहीं पड़ी दुकान बंद करते समय एक सांप दुकान में प्रवेश कर गया। वो दुकान में ताला लगा कर चले गए। सांप अंदर घूमता रहा घूमता रहा कुछ दिखाई नहीं पड़ा वहां पड़ी थी एक कुल्हाड़ी अब उसने कुछ और समझा उसने कुल्हाड़ी मारली उसकी और जब कुल्हाड़ी मारी तो वो काट था उस विचारे का क्या बिगड़ना था और आगे तो लोहा था उसका क्या बिगड़ना था अब उसको लगा इसको तो कुछ हो ही नहीं रहा तो उसको क्रोध आ गया। सांप बोला मेरी शक्ति को समझता नहीं फिर सांप ने फिर क्या किया वो जोर - जोर से वो अपना फ़न लोहे की उस जगह पर जहाँ से आप पेड़ काटते हो वहा जोर - जोर से मारने लगा। अब बताये लोहे का क्या होगा नुकसान ! तो उसी का नुकसान हो रहा है। जब - जब रक्त की बून्द निकले तब - तब और क्रोध और आएं। फिर जोर से मारें ऐसे ही रात भर मरता रहा। सुबह साहब आये दूकान का शटर उठाया देख कर दंग रहे गए की वो सांप अपनी ही वजह से खुद मर गया। उसे किसी ने मारा नहीं किसी ने नहीं मारा अपने क्रोध की वहज मर गया। वो सांप ही नहीं मरा हम सब भी ऐसे ही मरते है क्रोध की वजह से। हम अपनों से ही दूर हो जातें है क्रोध की वजह से, हम अपना ही नुकसान कर बैठते है क्रोध की वजह से, हम अपना स्वास्थ्य ख़राब कर लेते है क्रोध की वजह से, हम कईयो की नजरों में गिर जातें क्रोध की वजह से, क्रोध को कण्ट्रोल करने का एक बहुत अच्छा तरीका है। जब क्रोध आएं तो उसी समय उसको प्रकट मत करों। 11 बार भगवान का नाम लो जो आपके गुरु का मंत्र है उसे जपों। थोड़ा जल पिलो। थोड़ी बातों को नजर अंदाज करों।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।
महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।
शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।
इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।
दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।
महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

13Feb 2020

“प्रभु से आपका संबंध कैसा भी हो वो आपका भला ही करेंगे,

“प्रभु से आपका संबंध कैसा भी हो वो आपका भला ही करेंगे,

"पद प्रतिष्ठा मिलने पर अभिमान नहीं करना चाहिए, अभिमान करोगे तो सबकुछ बेकार हो जाएगा।

"करोड़ो जन्म निकलने के बाद भी हमे अपने कर्मो का फल भोगना ही पड़ेगा चाहे वो अच्छा हो या बुरा हो।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 9 से 15 फरवरी 2020 तक प्रतिदिन शाम 4: 00 बजे से 7 बजे तक स्थान - सीडी पार्क, सॉल्ट लेक, कोलकाता में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के पांचवे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि विप्र, वेदों, साधू-संतो की निंदा करना, गायों पर अत्याचार करने वाला व्यक्ति हरी को अप्रिय है। जो लोग मनगढंत धर्म को, मान्यताओं को मानते हैं और वेदों को नहीं मानते हैं वो भी लोग भगवान को अप्रिय है। हमारे धर्म को विक्षिप्त करने की तमाम कोशिश बॉलीवुड द्वारा बहुत की गई है। धर्म के खिलाफ फिल्मो में इसीलिए गलत दिखाया जाता है क्योंकि हम उसके खिलाफ आवाज नहीं उठाते। हम अपने धर्म के प्रति समर्पित नहीं है। यदि धर्म चला गया तो हमारा अस्तित्व भी समाप्त हो जाएगा।

हमारे घर में हमारे बच्चे भजन या पूजा पाठ नहीं कर रहे हैं क्योंकि हम स्वयं नहीं करते है इसलिए वो क्या करेंगे। आजकल कोई कह दें की मैं भजन या पूजा-पाठ करते हैं तो उसे बड़े आश्चर्य से देखते हैं। आजकल हम माथे पर तिलक नहीं लगाते हैं ना ही गले में तुलसी की माला डालते हैं क्योंकि हमे डर है की लोग क्या कहेंगे? हमे ये सोचना होगा की हमे लोगों के लिए जीना है या फिर अपने भगवान् श्री कृष्ण के लिए।

आजकल का समय देखिये जिस घर में गाय पलटी थी उस घर में आज कुत्ते पलने लग गए है इससे बड़ा दुर्भागय और क्या हो सकता है। यदि गाय की बात कर दी जाए तो हम सेक्युलर नहीं रहते। यदि हम गाय को कटने दें तो हम सेक्युलर हैं और यदि उसकी हिफाजत के लिए बोल दें तो हम सेक्युलर नहीं है।

हमे हमारे वेदों में, पुराणों में सिखाया गया है की ब्राह्मण, गाय, साधु- संतों का, धर्म का सम्मान करना है। जीव मात्र पर दया करने का स्वभाव हमारा होना चाहिए। मात्र अपने परिवार तक सिमित नहीं होना चाहिए। पृथ्वी पर सम्पूर्ण मानव और समस्त जीव पर दया होनी चाहिए। जब हम सभी के प्रति अपने हृदय में दया का भाव रखते हैं तो भगवान नारायण हमारा कल्याण करते हैं। हम अपनी जिस क्षमता से जीवों पर दया करते हैं भगवान अपनी क्षमता अनुसार उसका फल हमे देता है। जीवों पर जो दया नहीं करता वो भी भगवान नारायण का शत्रु है। जिसके जीवन में सत्य नहीं है वो भी भगवान का शत्रु है।

अधिक से अधिक सत्य बोलना चाहिए। हमे झूठ नहीं बोलना चाहिए। जबसे मोबाईल आया है तब से बात बात पर लोगों ने झूठ बोलना शुरू कर दिया। जो आर्टिफिशियल भक्त होते हैं उनका कथा में से जाने का मन करता है। जो सच्चे भक्त होते हैं उनका मन कथा से जाने है उनके लिए तो कथा चलती रहे, भजन चलते रहे घडी रुक जाए ऐसा सोचते हैं। वो हमेशा चाहते हैं की सदैव कथा होती रहे। ये रसिको का भाव है सच्चे भक्तों का भाव है।

भगवान श्री कृष्ण की महिमा का गुणगान करते हुए कहा की जो लोग भी भगवान श्री कृष्ण के बाल स्वरूप के दर्शन करने लिए बाबा के घर आये उनका जाने का मन नहीं कर रहा था। जिस भगवान के बाल स्वरूप के दर्शन हो जाए तो उसके पश्चात किसी को क्या चाहत शेष रहेगी।
महाराज श्री ने कहा की श्री रामकृष्ण परमहंस जी के एक बार गले का कैंसर हो गया था। भक्तों ने कहा गुरुदेव रामकृष्ण परमहंस से कहा कि " आप माँ काली से अपने लिए प्रार्थना क्यों नही करते ? क्षणभर की बात है, आप कह दें, और गला ठीक हो जाएगा ! तो रामकृष्ण हंसते रहते , कुछ बोलते नहीं। एक दिन बहुत आग्रह किया तो रामकृष्ण परमहंस ने कहा - " तू समझता नहीं है। जो अपना किया है, उसका निपटारा कर लेना जरूरी है। नहीं तो उसके निपटारे के लिए फिर से आना पड़ेगा। तो जो हो रहा है, उसे हो जाने देना उचित है। उसमें कोई भी बाधा डालनी उचित नहीं है।"
हमने जो कर्म किया है उसे तो भोगना ही पड़ेगा। कर्मो का फल जीव को भोगना ही होगा। करोड़ो जन्म निकलने के बाद भी हमे अपने कर्मो का फल भोगना ही पड़ेगा चाहे वो अच्छा हो या बुरा हो।

पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख घर में हो माया, तीजा सुख सुलक्षणा नारी, गृहस्थी का सबसे बड़ा सुख ये होता है की घर में नारी अच्छे कर्मो वाली और मृदभाषी होनी चाहिए। यही लागू पति के ऊपर भी लागु होता है।

पंडित श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।

11Feb 2020

“मानव होना, भारत का मानव होना और सत्संग से जुड़ जाना ये तीन चीज जिसे मिल जाएं उसका भगवान से मिलना तय है।“

“मानव होना, भारत का मानव होना और सत्संग से जुड़ जाना ये तीन चीज जिसे मिल जाएं उसका भगवान से मिलना तय है।“

ज्ञान और भगवान को प्राप्त करना हो तो तुम्हे भारत का ही महो करना पड़ेगा।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 9 से 15 फरवरी 2020 तक प्रतिदिन शाम 4: 00 बजे से 7 बजे तक स्थान - सीडी पार्क, सॉल्ट लेक, कोलकाता में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के तृतीय दिवस पर कथा के मुख्य यजमान गोपाल स्नेही जी का पूरा परिवार व हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

आज कथा पंडाल में माननीय मंत्री श्री साधन पाण्डे जी ने अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज जी से आर्शीवाद प्राप्त किया।

कथा प्रारंभ से पूर्व आज कोलकाता समिति ने महाराज श्री को पगड़ी पहनाकर सम्मानित किया।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन " श्री कृष्णा गोविन्द हरे मुरारी" श्रवण कराया”।

कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत में कोलकाता (बंगाल) के शिष्य परिवार द्वारा धर्म प्रचार की एक सुन्दर प्रस्तुति कर महाराज श्री को नमन किया। उसके बाद पंडित श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि मृत्यु हम सब की निश्चित है। हमें कोई बचा नहीं सकता। राजा परीक्षित गंगा के ही तट पर क्यों गए ? गंगा के तट पर हमेशा संतों का वास रहता है। कही न कही संत महात्मा आपको मिल ही जायेंगे। अगर आप गंगा के तट पर, तीर्थ धाम पर जायेगे। कही न कही संत मिलेंगे ही। और निश्चित तौर पर विषम परिस्थितियों में अगर कोई हमारा सहयोग कर सकता है तो कोई सद विचार वाले संत महात्मा गुरुजन ही हमारी सहयता कर सकते है। जीवन में कठिन परिस्थितिया तो सबके आती है। उन कठिन परिस्थितियों में अगर सलाह संसार से लोगें तो सांसारिक सलाह मिलेगी और अगर किसी आध्यत्मिक आत्मा से सलाह लोगें तो निश्चित जन कल्याण का ही नहीं बल्कि कल्याणकारी ऐसा मार्ग मिलेगा की गोविन्द तक आपको पहुंचने में अधिक बिलंभ नहीं लगेगा। महाराज श्री ने कथा क्रम बढ़ाते हुए कहा कि आप सभी लोगो ने कई बार कथा सुनी होगी। अनेको पुराण सुने होंगे, अनेको बार आपने कथा सुनी होगी क्या किसी भी कथा में आपने सुना है की भगवान का मिलना असंभव है। जवाब दीजिये। महाराज जी ने कहा कि तीन चीजे मेरी नजर में असंभव है। और अगर ये तीन चीजे आपको मिल जाएं तो संसार में कुछ भी असंभव नहीं। ईश्वर को पाना बहुत ही सरल हो जायेगा। तीन चीजे बहुत ही कठिन है। 1 एक तो मानव होना बहुत ही मुश्किल काम है। देवताओं को भी संभव नहीं। एक बार देवता तपस्या कर रहे थे। विष्णु भगवान ने पूछा। तुम स्वर्ग के रहने वाले देवता हो, सब सुविधाएं है। सारे सुखो की चरम सीमा जहाँ पर कोई सीमा ही नहीं है हर सीमा से पार तुम्हे हर सुख सुविधा मिल रही है। इसके बाद भी तुम्हे अब क्या चाहिए ? तपस्या क्यों कर रहे हो ? बोले महाराज हमें कुछ चाहिए इसलिए तपस्या कर रहे है। विष्णु भगवान बोले क्या चाहिए? बोले हमें मानव तन चाहिए। भगवान बोले मानव ? अरे मानव से ही तो देवता बनते है। तुम फिर नीचे जाना चाहते हो। बोले महाराज जो बिषय मानव योनि में संभव है। वो देव योनि में सम्भव है ही नहीं। पूछा क्या ? मानव योनि में क्या सम्भव है। बोले मानव योनि में सहज संभव है। मुक्ति आपके पास आना, आपके धाम आना, हम देवता है पर आपकी मर्जी के बगैर आपके धाम नहीं आ सकते। और मानव योनि में ये शक्ति है की वो आपके धाम आ सकते है। वो मुक्ति प्राप्त कर सकता है। 1 मानव होना दुर्लभ है असंभव है अगर ये मिल जाए तो भारत का मानव होना असंभव है। ये पुराणिक बात कर रहा हूँ। ये पुराणों में लिखा है। मानव होना मुश्किल है और मानव हो भी जाये तो भारत का मानव होना मुश्किल है। भोग विलासिताओं की तरफ अगर आपको जाना हो तो निश्चित चले जाइए यूरोप अमेरिका की साइड। और किसी कंट्री में आप भोग विलासिताओं की कोई सीमा नहीं है जहाँ मन करें जाना चाहो चले जाओं। लेकिन ज्ञान और भगवान को प्राप्त करना हो तो तुम्हे भारत का ही महो करना पड़ेगा। अगर आपको ज्ञान चाहिए, भगवान चाहिए तो दोनों के लिए तुम्हे यहाँ आना पड़ेगा। १ मानव होना, 2 फिर भारत का मानव होना । 3भारत के मानव होने के बाद भी सत्संग से बंधन होना बहुत मुश्किल है। ये तीज जिसको मिल जाये भगवान से कोई दूर नहीं कर सकता। और महाराज जी ने कहा की मेरे प्यारे मानव बन गए भारत के बन गए बस एक चीज बाकि है, भगवन से बंधन। किसी - किसी को तीनो चीजे मिल गई है। इसका मतलब है यात्रा प्रारम्भ हो चुकी है बस मंजिल का इंतजार है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।

तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।

9Feb 2020

कल रात पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज कोलकाता पहुँचे जहां एयरपोर्ट पर विश्व शांति सेवा समिति कोलकाता के सदस्यों, यजमान एवं भक्तों द्वारा महाराज श्री का पुष्प गुच्छ देकर व माला पहनाकर स्वागत किया।

कल रात पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज कोलकाता पहुँचे जहां एयरपोर्ट पर विश्व शांति सेवा समिति कोलकाता के सदस्यों, यजमान एवं भक्तों द्वारा महाराज श्री का पुष्प गुच्छ देकर व माला पहनाकर स्वागत किया। इसके पश्चात महाराज श्री के निवास स्थान पर भी भक्तों द्वारा पुष्प माला इत्यादि द्वारा स्वागत किया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 09 से 15 फरवरी 2020 तक सायं 4 :00 बजे से 7:00 बजे तक कोलकाता में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। आप सभी भक्तगण सादर आमंत्रित है।

देश-विदेश में सभी भक्त, कथा का सीधा प्रसारण आस्था चैनल एवं महाराज श्री के यूट्यूब चैनल "श्री देवकीनंदन ठाकुर जी" को सब्सक्राइब कर के देख सकते हैं।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

9Feb 2020

आज कोलकाता में कथा से पूर्व पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सी.आर.पी कैंट, सॉल्ट लेक से कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई।

आज कोलकाता में कथा से पूर्व पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सी.आर.पी कैंट, सॉल्ट लेक से कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई। कलश यात्रा में हजारों की संख्या में माताओं - बहनों और भाई -बंधुओं ने भाग लिया। इस भव्य कलश यात्रा में सैंकड़ों माताएं बहने कलश उठाकर कथा पंडाल पहुंची। कलश यात्रा ढ़ोल नगाड़ों, के साथ बड़ी धूमधाम से निकाली गई। कलश यात्रा जिन मार्गों से होकर गुजरी वहां इस भव्य कलश यात्रा को देखने के लिए लोग थम गए, हर किसी ने इस अद्भुत यात्रा का आनंद लिया। महाराज श्री के सानिध्य में कोलकाता में 09 से 15 फरवरी 2020 तक श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। सभी कोलकाता वासियों से निवेदन है की बढ़-चढ़कर कथा पंडाल में आकर कथा का रसपान करें।

10Feb 2020

“कलयुग में संत गुरूदेव के विचार ही हमे तार सकते हैं।

“कलयुग में संत गुरूदेव के विचार ही हमे तार सकते हैं।"

“संसार में कोई भी वस्तु अगर आपको प्राप्त है और उस वस्तु के समय रहते हुए अगर आपने प्रयोग नहीं किया तो हम समझदार नहीं कहे लायेंगे।"

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 9 से 15 फरवरी 2020 तक प्रतिदिन शाम 4: 00 बजे से 7 बजे तक स्थान - सीडी पार्क , सॉल्ट लेक, कोलकाता में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर कथा के मुख्य यजमान गोपाल स्नेही जी का पूरा परिवार व हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

द्वितीय दिवस की भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया गया।

कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत में कोलकाता (बंगाल) के शिष्य परिवार द्वारा गुरु वंदना" गाकर एवं नृत्य कर महाराज श्री को नमन किया और उनका स्वागत किया। उसके बाद पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि स्वास्थ्य दो प्रकार के होते है। एक शारीरिक स्वास्थ , एक मानसिक स्वास्थ। ह्रदय का भी स्वस्थ रहना परम आवश्यक है और शरीर का भी स्वस्थ रहना परम आवश्यक है। जब शरीर स्वस्थ होगा तो ह्रदय स्वस्थ होकर भगवान में लगेगा। शरीर में कही रोग हो तो फिर भगवान में, कथाओं में मन कम लगता है। तो यहां शरीर की भी परिक्षण, व्यवस्था, सुरक्षा, दवाई सब यहां पर है। डॉक्टर आपका यहाँ फ्री चेकअप कर रहे है। इलाज भी कर रहे है। महाराज श्री ने आगे कहा की कोरोना वायरस बहुत तीव्रता से पुरे विश्व को अपने प्रभाव से हम सबको परेशान कर रहा है। लगभग 1 हजार के करीब सिर्फ अकेले चीन में लोगो की मृत्यु हो गई है। ये वायरस एनिमल्स, के माध्यम से हम तक पंहुचा। और इस वायरस की विशेषता ये है की व्यक्ति में से व्यक्ति में चला जाता है। और इसी वजह से ये तेज गति से फैल रहा है। स्तिथि देखिए कितनी भया- भय है। की कई कॉन्ट्रियों में पहुंच गया है। यहां तक की हमारे भारत में भी 2 - 3 इसके केस पाएंगे है। जिसके लिए भारत सरकार भी काम कर रही है। महाराज जी ने आगे बताया की हमारे ऋषि - मुनियों का विज्ञान कितना तेज था। उंहोने पहले ही मना किया था कि मांसाहार मत करों। उन्होंने कहा की किसी से भी हाथ मत मिलाओं। आज ये चीजे हम तक कहा तक पहुंच गई। ये आप कल्पना नहीं कर सकते। पशुओं को खा- खाकर हम लोगो ने अपने शरीर को इतना दुर्बल कर दिया है। की कोई भी वायरस हमें बहुत जल्दी पकड़ लेता है। पहले लोग मांसहार नहीं करते थे। पशु तो पहले भी थे बीमारियां तो उनमे पहले भी थी जैसे स्वाइनफ्लू इससे कितने लोगो की मृत्यु हो गई है। ये भी, इसके भी, इस बीमारी के लक्षण भी स्वाइनफ्लू जैसे है। जैसे की छींक आना, बहुत जल्दी नाक बहना, बुखार आ जाना, पेट में थोड़ी अकड़न हो जाना सर में अचानक से दर्द हो जाना ये बहुत सारे चिन्ह है जिनसे आप पहचान सकते है। जैसे स्वाइनफ्लू लगभग - लगभग भी लक्षण इसके भी है। स्वाइनफ्लू भी पशुओं से आया। और ये कोरोना वायरस भी पशुओं से आया। और हम फिर भी नहीं मानते मांसाहार करने से। अरे भाई जिंदगी ज्यादा कीमती है कि जीभ का स्वाद ज्यादा कीमती है। और कोरोना वायरस आया कहा जानते हो ? जहाँ पर जिस मार्किट में जिन्दा सांप चाइना में खाये जाते है। उसी स्पेशल मार्किट से ये कोरोना वायरस वायरल हो रहा है। हमारे ऋषिमुनियों की बातों पर हम को विश्वाश नहीं होता है लेकिन जब साइंटिस्ट, जब डॉक्टर पढ़े लिखे चार लोग कहे देते है कि वो लोग ठीक थे तो हम बात को मानने लग जाते है। चलो उन्ही की बात मन लो आप सभी से मेरा निवेदन है। महाराज जी ने इस क्रम को समाप्त करते हुए व्यास पीठ सहित प्रार्थना करी की न सिर्फ भारतियों के लिए पुरे विश्व के लिए हे मेरे ठाकुर जी मेरे देश के ही नहीं बल्कि पूरे दुनिया के जितने भी जीव आत्माएं इस समय संसार में आप सब की रक्षा करें आप सबको सुरक्षा प्रदान करें, आप सब इन बिमारियों से मुक्त करें यही मेरी प्रार्थना है।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं।

भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।

9Feb 2020

“मनवांछित इच्छाओं को पूर्ण करती है भागवत

“मनवांछित इच्छाओं को पूर्ण करती है भागवत

श्रीमद भागवत कथा ही भक्ति का गंगा सागर है।

ईश्वर को जाने बिना ये जीवन सफल नहीं होगा

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 9 से 15 फरवरी 2020 तक प्रतिदिन शाम 4: 00 बजे से 7 बजे तक स्थान - सीडी पार्क , सॉल्ट लेक, कोलकाता में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के प्रथम दिवस पर कथा के मुख्य यजमान गोपाल स्नेही जी का पूरा परिवार व हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत गणेश वंदना ,दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

आज कथा के प्रथम दिवस में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज एवं मुख्य यजमान गोपाल स्नेही जी का पूरा परिवार व साल्ट लेक सिटी तुलसी सिन्हा रॉय जी ने दीप प्रज्जवलन किया। कथा प्रारंभ से पूर्व आज कोलकाता समिति ने महाराज श्री को 31 किलो पुष्पहार अर्पण कर सम्मानित किया ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन "मेरी सुन लो दीनदयाल मेरे साँवरिया" श्रवण कराया”।

कथा की शुरुआत में कोलकाता (बंगाल ) के शिष्य परिवार द्वारा गुरु वंदना "हमारे है श्री गुरु देव हमें किस बात की चिंता" गा कर महाराज श्री को नमन किया और उनका स्वागत किया। उसके बाद महाराज श्री ने बताया की जिस भाग्य में भागवत कथा सुनने का सौभाग्य होता है उस भाग्य के वर्णन कौन कर सकता है, "श्रीमद् भागवत कथा साधारण ग्रंथ नहीं है। "भागवत कथा अगर श्रद्धा से सुनेंगे तो यह भागवत कल्प वृक्ष है आपको वो मिल सकता जिसकी आपने कल्पना भी नहीं की होगी। अगर आप अपने धर्म का सम्मान करेंगे तभी आप सम्माननीय बनेगे। महाराज श्री ने आगे बताया कि "श्रीमद भागवत कथा आखिर है क्या ?" उन्होंने कहा कि भक्ति ज्ञान वैराग्य से ओत प्रोत है श्रीमद भागवत कथा। भगवान की सेवा के बिना कल्याण नहीं है। जीवन की पूरी यात्रा संसार की गतिविधियों से चलती हुई भगवत चरणों में अनुराग के साथ गंगा सागर में जब लीन हो जाती है। तो जीवन यात्रा संपन्न हो जाती है। तो भागवत के माध्यम से यात्रा को संपन्न करने की चेष्ठा श्रीमद भागवत कथा ही भक्ति का गंगा सागर है। जहाँ पहुंचकर हम सब की यात्रा पूरी हो जाती है। सर्वप्रथम महाराज श्री ने भागवत के प्रथम श्लोक का उच्चारण किया। भगवान का स्वरूप कैसा है ? सद्घन, चिद्घन और आनंदघन ऐसे भगवान सच्चिदानंद स्वरुप जो समस्त विश्व का पालन सर्जन संघारण करते है। तीनो के जो हेतु है तथा जिनकी पावन चरण - शरण ग्रहण करने से ही जीव की मुक्ति, कल्याण होता है। और जीव के तापत्र समाप्त होते है। ऐसे गोविन्द के पाद - पद्मो में उनके श्रीचरण कमलों में हम सभी नमन करते है। महाराज श्री ने बताया की श्रीमद भागवत महापुराण का प्रचार - प्रसार इस समय भारत में ही नहीं पूरे विश्व में बड़े जोर - शोर से हो रहा है। श्रीमद भागवत कथा की क्या महिमा है ? और ये भागवत किस माध्यम से हम तक पहुंची है। इस भागवत को श्रवण करने से हमें प्राप्त क्या होता है। श्री राजा परीक्षित न होते तो हमें ये भागवत न प्राप्त होती है। निश्चित ये भागवत ग्रन्थ राजा परीक्षित के श्रवण करने की जिज्ञासा के साथ जो उनके मन में भगवान की कथा को श्रवण करने की लालसा है। उस लालसा की वजह से हमें ये भागवत श्रवण करने को अधिकार प्राप्त हुआ है। अब पूरे भागवत ग्रन्थ में एक चरित्र बड़ा सुन्दर है। प्रमुख भूमिका अगर हम कहे भागवत की तो एक “राजा परीक्षित” दूसरे “श्री शुकदेव जी महाराज” ये दो प्रमुख भूमिकाएं है। मुझे राजा परीक्षित से इसलिए ज्यादा मित्रता है की राजा ने उस भागवत को तब सुना जब उन्हें श्राप लगा सातमे दिन तक्षक डस लेगा। अब तक्षक डस लेगा राजा परीक्षित इतने सक्षम है तक्षक को अपने पास आने तक न दे वो इतने सक्षम है। महाराज जी ने आगे कहा की श्राप पूरा होगा ही तो श्राप लगते ही राजा परीक्षित गए कहा ? राजा परीक्षित गए गंगा के तट पर। गंगा का महात्म्य क्या है। जो भगवान के चरणपादको का जो जल है। गंगा भगवान के श्री चरण से प्रकट हुई है। जो व्यक्ति मर भी जाएँ उसके मुख में गंगा जल डाल दिया जाए तो उसका पुनर्जन्म नहीं होता है इतना बड़ा महात्यम है। मरे हुए व्यक्ति की हड्डिया भी अगर गंगा में डाल दी जाये तो व्यक्ति की मुक्ति हो जाती है।

महाराज श्री ने कहा कि अपने आपको पहचानो यही से भागवत कथा प्रारम्भ हुई है। भक्ति का प्रारम्भिकरण दो ही प्रश्नो से है। या तो में कौन हूँ ये जानने की शुरुआत कर लो या फिर वो भगवान कौन है जिसने इतनी सुन्दर दुनिया बनाई है। तुम दोनों में से किसी को जान गए तो तुम्हारा मन भक्ति और कथा, भजन दोनों में लग जायेगा।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

5Feb 2020

जीवन में अगर कोई चीज अधिक हो जाए तो उसे सेवा भाव में लगाइए : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

जीवन में अगर कोई चीज अधिक हो जाए तो उसे सेवा भाव में लगाइए ।

जो भगवान के उत्सव में सम्मिलित होते है उनके सभी अमंगल नष्ट हो जाते है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 31 जनवरी से 06 फरवरी 2020 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का सेक्टर- जे, रेल नगर, आशियाना निकट नहर चौराहा, बंगला बाजार, लखनऊ में विशाल आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के षष्टम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

आज कथा पंडाल में उत्तर प्रदेश के माननीय विधि एवं न्याय मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता श्री बृजेश पाठक जी एवं माननीय पूर्व मंत्री उत्तर प्रदेश सरकार श्री शारदा प्रताप शुक्ला जी एवं माननीय प्रवक्ता लोकदल श्री अनिल दुबे जी एवं माननीय वरिष्ठ नेता भाजपा श्री राजकुमार सिंह चौहान जी एवं माननीय ब्लॉक प्रमुख नवाबगंज लखनऊ श्री अरुण सिंह जी ने अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज जी से आर्शीवाद प्राप्त किया।

कथा प्रारंभ से पूर्व आज लखनऊ समिति ने महाराज श्री को पगड़ी पहनाकर सम्मानित किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन " प्रेम रस जिसने पिया श्री राधे के नाम का" श्रवण कराया”।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत कहा कि पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत कहा कि भगवान के उत्सव में सम्मिलित होते है उनके सभी अमंगल नष्ट हो जाते है। "हमारे ठाकुर जी की शादी ऐसी है जुड़ती तो है पर टूटती कभी नहीं है।" वैसे भी सच तो यही है जो दुनिया से जुड़े उसे टूटना पड़ेगा आज नहीं तो कल छूटना पड़ेगा, रूठना पड़ेगा लेकिन जो गोविन्द से जुड़ जाये वो जुड़ने तक की देर है। टूटती कभी नहीं ! ये बात पक्की है। भागवत में सभी देवी - देवता पधारते है। भगवान की कथा जहां होती है वहा 33 करोड़ देवी - देवता आ जाते है। कई बार देवी प्रतक्ष प्रकट हो जाती है। हमें प्रेम से देवी मैया का दर्शन करना चाहिए। कथा में ध्यान लगाना चाहिए। तो "हो गया - हो गया वो दीवाना राधे श्याम का"भगवान की कथा श्रवण करने से जीव का ह्रदय शुद्ध होता है। विचार शुद्ध होते है, जब विचार शुद्ध होता है, ह्रदय शुद्ध होता है उसके बाद व्यक्ति के कर्म में बदलाव आता है। एक बहुत अच्छी बात हमने समझी है। जैसा आपका विचार होते है वैसा ही आपके जीवन में आपके साथ व्यबहार होता है। क्योंकि जब नकारात्मक विचार बनते है तो वो वाणी के माध्यम से बहार आते है। और बहार आकर वो आकाश में भ्रमण करने लग जाते है। क्योंकि आपका शब्द आपके आस - पास रहता है। कही जाता नहीं है। आप जो भी बोलते है वो सब आपके आस - पास रहता है। और जब शब्द आपके मुख से निकलता है। तो वो प्रकृति में मिक्स होता है। प्रकृति में मिक्स होने के बाद वायु में वातावरण में आपके घर के आस - पास जहां आते जाते वहा वो वातावरण मिल जाता है। उसके बाद में प्रकृति आपको वापस वही देती है। जो आपके विचार होते है। आपके नकारात्मक विचार होयेगे तो वापस आपको वो नकारात्मक विचार ही मिलेंगे। और आपके सकारात्मक विचार होंगे तो नकारात्मक विचार मिलेंगे। जैसे आपके विचार होंगे। इसलिए नकारात्मक विचार कभी रखने नहीं चाहिए। सकारात्मक विचार रखने चाहिए। भगवान की कथा क्या करती है ? हमारी नकारात्मक सोच को ह्रदय से दिमाग से बहार कर देती है। और सकारात्मक विचारधारा हमारे अंदर कथा के माध्यम से प्रवष्टित होती है। और जब सकारात्मक विचारधारा हमारे विचारो में आएगी ह्रदय में आएगी तो शब्दों के माध्यम से बहार जाएगी और वो इस प्रकृति में मिक्स हो जाएगी। आपके घर में है ऑफिस में है वो पॉजिटिव एनर्जी भ्रमित होगी और भ्रमण करने लगेगी आपके आस - पास जब भ्रमण करने लगेगी तो वही पॉजिटिव एनर्जी आपको वापस कर्म के रूप में और फल के रूप में आपको प्राप्त होने लगेगी। आज का व्यक्ति नेगेटिव ही सोचता है। मेरे साथ अच्छा नहीं होता मेरे साथ बुरा होता है। मैं कितना भी अच्छा करलूं लोग मेरी बढ़ाई , प्रसन्ता नहीं करते। मतलब नेगेटिव ही सोचता है और उसका फल भी नेगेटिव ही मिलता है। बोले क्या करें पहले अपने विचार बदलो। उसे पॉजिटिव करों। पॉजिटिव सोचोगे तो उसका फल भी पॉजिटिव ही प्राप्त होगा।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।

4Feb 2020

युवाओं को अपने जीवन में जीने के लिए बहुत सारी चीजो का अनुभव बड़ो से प्राप्त करना चाहिए।

युवाओं को अपने जीवन में जीने के लिए बहुत सारी चीजो का अनुभव बड़ो से प्राप्त करना चाहिए।

बहुत जल्दी किसी के विषय में जाने बगैर आप अपनी विचार धारा बनाले ये गलत है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 31 जनवरी से 06 फरवरी 2020 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का सेक्टर- जे, रेल नगर, आशियाना निकट नहर चौराहा, बंगला बाजार, लखनऊ में विशाल आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के पांचवे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन " घनश्याम तुम्हारे दर्शन को, ये दिल मेरा दीवाना है!" श्रवण कराया”।

आज कथा पंडाल में राम जन्मभूमि न्यास एवं कृष्ण जन्मभूमि न्यास के अध्य्क्ष मणिराम दास जी छावनी के पीठाधीश्वर महंत श्री श्री 10008 स्वामी श्री नृत्य गोपाल दास जी अयोध्या ने अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई एवं व्यासपीठ जी से आर्शीवाद प्राप्त किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि युवाओं को अपने जीवन में जीने के लिए बहुत सारी चीजो का अनुभव बड़ो से प्राप्त करना चाहिए। आज के युग में बहुत सारी चीजे हम लोग सिर्फ देखकर अच्छा और बुरे का निर्णय करते है। कई बार ऐसा होता है कि आँखों से देखा हुआ भी सच नहीं होता। युवाओं को बताना इसलिए जरुरी है कि आपके आगे ज़िन्दगी बहुत बड़ी है। और उस जीवन को सुंदर बनाने के लिए जितना जल्दी अनुभव बड़ो से अगर हमें कुछ मिल जाये वो हमें जीवन जीने में मदद करता है। सयोंग करता है। परन्तु कई बार ऐसा होता है। कि आज कल के युवाओं को देखो की वो बड़ो के साथ नहीं बैठते। आज कल के युवा अपने मित्र अपने फ़ोन के साथ बैठते है। महाराज जी कहा की आपके बड़े जो आपको सीखा सकते है कम शब्दों में, कम समय में वो आपका मोबाईल जीवन भर नहीं सीखा सकेगा। आपके मित्र भी आपके उम्र के होंगे वो आपको कितना सिखाएंगे। जितना उनको मालून है। लेकिन आपके बड़ो के साथ बैठने से आप समय से पहले अनुभव कर लेते है। बहुत जल्दी हम निर्णय करते है। अपने बड़ो और अपने छोटो को भी कुछ भी दृश्य देखने के बाद बहुत जल्दी हम लोग दूसरो पर दोषारोपण करना और दूसरो को बुरा कहे देना या अच्छा कहे देना बहुत जल्दी होता है। महाराज जी ने कहा की किसी को जाने बगैर आप बहुत अच्छा मत कहिये और आप किसी को जाने बगैर बहुत बुरा भी मत कहिये। जब तक आप पूरी तरह से ना जानले अच्छा और बुरा करने का निर्णय आप बहुत जल्दी मत लीजिये।
महाराज जी ने कथा क्रम आगे बढ़ाते हुए कहा की एक वृद्ध माता - पिता अपने पुत्र के साथ ट्रेन में यात्रा कर रहे थे । 24 - 25 साल का युवा बेटा उनका , वो ट्रेन की शीट पर वहां बैठा था जहां से खिड़की थी और खिड़की से वो आउट साइड देख रहा था ट्रेन की स्पीड अच्छी थी। ट्रेन चल रही थी बड़ी स्पीड से बो बच्चा बड़ा खुश हो रहा था बच्चा कहे रहा था पिता जी देखों - देखों ये वृक्ष कितनी तेजी से पीछे भागे चले जा रहे है। पिता जी देखों ये वृक्ष पीछे भागे चले रहे है। पिता जी मुस्कुरा दिए उसकी बात सुनकर, सामने वाली शीट पर एक युवा दंपत्ति बैठे हुए थे। वो उस बच्चे की बात को सुनकर ज्यादा खुश नहीं हुए बल्कि दुखी हुए। लेकिन उस बात से ज्यादा दुखी हुए की उनका बेटा ही ये कहे रहा है कि वृक्ष भागे जा रहे है पीछे की तरफ पर उनके पिता सिर्फ मुस्कुरा दिए इस बात से वो बड़ा परेशान हुआ पर बोलै कुछ नहीं । की इनका बेटा हमको क्या मतलब बैठा रहा। थोड़ी देर बाद उस पुत्र ने फिर कहा पिता जी - पिता जी देखो ये बादल हमारे साथ - साथ भाग रहे है। ये बादल हमारे साथ भाग रहे है। पिता जी ने फिर कुछ नहीं कहा और मुस्कुरा दिए। और जब पिता जी मुस्कुरा दिए उस युवा दंपत्ति जो वह पति - पत्नी सामने वाली शीट पर बैठे थे। उन से नहीं रहा गया। और उन्होंने कहा कमाल करते हो आपका बेटा पागल बनने की बात कर रहा है और आप मुस्कुरा देते हो आप इसका किसी डॉक्टर से इलाज क्यों नहीं कराते। हमको लगता है ये मेंटली डिस्टर्ब है। आप इस बच्चे को किसी डॉक्टर के पास लेकर जाइये। पिता जी ने मुस्कुराते हुए कहा डॉक्टर के पास से ही आ रहा हूँ। आप इस बच्चे के बिषय में कुछ जानते नहीं अपने इसे पागल घोषित कर दिया।आप जानते हो ये जो बच्चा है ये जन्मांत अँधा है। जन्मांत अँधा ये बच्चा इसका इलाज अच्छे डॉक्टर के पास हुआ और आज ये पहेली बार दुनिया देख रहा है। जन्म से इसने दुनिया नहीं देखी । आज पहेली बार इसने दुनिया देखी है इसलिए इसे यह इसे यह नहीं पता वृक्ष भाग रहे है या ट्रेन भाग रही है। इसे ये नहीं पता कि बदल तो यत्र - तत्र सर्वत्र है। ये पागल नहीं ये इसने पहेली बार दुनिया देखी है। इसलिए इसका ज्ञान कम है पागल नहीं है। वो युगल दम्पत्ति युवा पति -पत्नी अपनी बात पर सकंकोचित हो गए। शर्म आ गयी कि हमने बिना जाने - पहचाने इसको पागल समझ लिया। बात सच है की वृक्ष नहीं भाग रहे। बात ये भी सच है की बादल नहीं भाग रहे। पर बात ये भी सच है वो जो युवा दम्पति है वो नहीं जानते की बच्चे का दर्द क्या है। अधूरा ज्ञान है उसे इसलिए बहुत जल्दी किसी के विषय में जाने बगैर आप अपनी विचार धारा बनाले ये गलत है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।
महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।

3Feb 2020

“आपका एक दृश्य आपका चरित्र बदल सकता है : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

“आपका एक दृश्य आपका चरित्र बदल सकता है

भाग्यशाली है वो लोग जो भगवान के उत्सवों में सम्मिलित होते है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 31 जनवरी से 06 फरवरी 2020 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का सेक्टर- जे, रेल नगर, आशियाना निकट नहर चौराहा, बंगला बाजार, लखनऊ में विशाल आयोजन किया जा रहा है।

कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। कथा के चतुर्थ दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा प्रारंभ से पूर्व आज महाराज श्री को पगड़ी पहनाकर सम्मानित किया गया ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन " मेरे दिल की है एक आवाज दास हुँ राधे का" श्रवण कराया”।

आज कथा पंडाल में प्राख्या उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष धर्म प्रचारक कृष्णा पंडित जी एवं पूर्व एमएलसी अरविन्द त्रिपाठी जी और (माननीय मुलायम सिंह यादव जी की पुत्रवधू) श्रीमती अपर्णा यादव जी ने अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज जी से आर्शीवाद प्राप्त किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भाग्यशाली है वो लोग जो भगवान के उत्सवों में सम्मिलित होते है। निश्चिंत बात ये है कि सिर्फ मृत्युलोक में ही मानवों को ही ये अवसर प्राप्त है। की वो भगवान के उत्सव में सम्मिलित हो सकते है उन्ही को यह अधिकार प्राप्त है, हर किसी को ये अधिकार प्राप्त नहीं है। कलयुग में सबसे बड़ा जो भक्ति में बादक है वो है प्रमाद। जो जीव कलयुग में प्रमाद करता है। वो भक्ति नहीं कर सकता और इतना प्रमाद है की यहां से 10 किलो मीटर पर कथा हो रही है तो हम कैसे जाये। कितना बड़ा प्रमाद है। मुक्ति प्राप्त करने के लिए, भक्ति प्राप्त करने के लिए, गोविन्द की प्राप्ति के लिए भी 10 किलो मीटर भी यक्ति चलना नहीं चाहता। घर बैठे ही कल्याण चाहता है। और व्यक्ति कहता की भगवान दया नहीं करते, भगवान ने तो बहुत बड़ी दया कर दी तुमको मानव बनाया अब उस दया को बनाये रखने का काम तो तुम्ही को करना पड़ेगा। भगवान ने हमें मानव जीवन दिया है, अब उसमे सत्कर्मो के द्वारा इस जीवन को सफल करना है। आलश्य, प्रमाद, निद्रा , इन सब झंझटो में पड़कर उस सुन्दर अवसर को गवा देना है, यह हमारे ऊपर निर्भर है। चार युग कौन से है ? 1 जो व्यक्ति सोता रहे वो कलयुग है। 2 कुछ उठ जाए और फिर भी जम्हाई लेते रहे वो द्वापुर है। 3 चलना है ये विचार मन में आ जाए, कुछ कर्म करने की इच्छा मन में हो, वो त्रेता है और खड़ा होकर चल पड़े वो सतयुग है।
महाराज श्री ने कहा कि अगर हम मंदिरों में, तीर्थों में कथा पंडालों में अशांति देंगे तो ये अशांति हमारे जीवन में आ जाएगी और अगर हम वहां जाकर शांति का परिचय देंगे तो हमारे जीवन में शांति आ जाएगी। बहुत ज्यादा जरूरी है की कथा में जाकर हम शांति का परिचय दें। महाराज श्री ने कहा कि भरत जी महाराज के तीन जन्मो का वर्णन पुनरपि जननम, पुनरपि मनरम, पुररपी जननी, ये संसार का जो आवागमन है इसी से मुक्त होने के लिए मानव जीवन मिला है। व्यक्ति जैसे पाप करता, कर्म करता है, सत्कर्मो का फल स्वर्ग की प्राप्ति है। और बुरे कर्मो का फल नर्क की प्राप्ति है। जिस तरीके से भी व्यक्ति जैसे भी कर्म करता है उसे उन कर्मो का फल भोगने के लिए यथावत स्थानों पर जाना पड़ता है। सुन्दर कर्म करने पर स्वर्ग की प्राप्ति होती जरूर है परन्तु उसके बावजूद भी पुनर्जन्म होता है। और पुनर्जन्म होने के बाद फिर कैसे कर्म होयेगे ये कोई कहे नहीं सकता ये कोई बता नहीं सकता।

महाराज श्री ने कहा कि भरत जी महाराज के तीन जन्मो का वर्णन पुनरपि जननम, पुनरपि मनरम, पुररपी जननी, ये संसार का जो आवागमन है इसी से मुक्त होने के लिए मानव जीवन मिला है। व्यक्ति जैसे पाप करता, कर्म करता है, सत्कर्मो का फल स्वर्ग की प्राप्ति है। और बुरे कर्मो का फल नर्क की प्राप्ति है। जिस तरीके से भी व्यक्ति जैसे भी कर्म करता है उसे उन कर्मो का फल भोगने के लिए यथावत स्थानों पर जाना पड़ता है। सुन्दर कर्म करने पर स्वर्ग की प्राप्ति होती जरूर है परन्तु उसके बावजूद भी पुनर्जन्म होता है। और पुनर्जन्म होने के बाद फिर कैसे कर्म होयेगे ये कोई कहे नहीं सकता ये कोई बता नहीं सकता। अभी आप थोड़ी कल्पना करें कि 20 साल पहले जैसा समय था वैसा आज है क्या ? और आज जैसा समय है क्या 20 साल बाद वैसा रहेगा ? 20 साल वाला समय अभी नहीं है और अभी वाला समय 20 साल बाद नहीं होगा। अगर आज भी मर जाए। और फिर जन्म हो दुवारा और फिर समझदारी तो कम से कम 20 - 21 साल बाद ही आएगी और तब तक समय और बदल गया होगा स्थितियां और बदल गई होगी, विचार धारा और महान हो गई होगी। तो जो व्यक्ति अभी अपना कल्याण नहीं कर सकता वो नेक्स्ट 20 साल बाद अगर उसे दूसरा जन्म मिल भी जाये तो मनुष्य क्या कल्याण कर पायेगा ? यही एक ऐसा जन्म है शायद भगवान ने हम सबको ये बड़ी करुणा करके यह अवसर दिया है इस समय पर हमें इस सुन्दर समय जन्म दे दिया जहाँ भगवान की अनंत कथाएं, जहाँ भगवान के अनेक भक्त है। जहाँ हमारे ह्रदय में भी प्रेणना उत्पन्न हो जाती। की चलो भगवान कथा सुनकर अपना जीवन को धन्य करें। तो इस समय को गवाना नहीं चाहिए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।

महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।

शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।
इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।
दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।
महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

2Feb 2020

“परम कल्याण करने वाली है भागवत": पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

“परम कल्याण करने वाली है भागवत"

"सात दिनों का उत्सव है भागवत"

“वेद रूपी वृक्ष का पका हुआ फल जो है वो है श्रीमद भागवत"

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 31 जनवरी से 06 फरवरी 2020 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का सेक्टर- जे, रेल नगर, आशियाना निकट नहर चौराहा, बंगला बाजार, लखनऊ में विशाल आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया गया। भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई।

कथा के द्वितीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन "हम तेरे राधा रानी, हमे तेरा ही सहारा " श्रवण कराया”।

आज कथा पंडाल में भाजपा विधायक श्री सुरेश तिवारी जी एवं चेयरमैन श्री सुरेंद्र तिवारी जी ने अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आर्शीवाद प्राप्त किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि वेदो का नाम ही है निगम। वेद रूपी वृक्ष का पका हुआ फल जो है वो है श्रीमद भागवत, श्रीमद भागवत कथा बार - बार सुनने से क्या होगा ? एक बार सुनो, दो बार सुनो, हजार बार सुनो, तीन गुण है। सत, रज, तम ईश्वर सतोगुणी के ह्रदय में निवास करते है। सतगुण परमात्मा से मिलाने का कार्य करते है, सतगुण जो है वो हमें ईश्वर के करीब ले जाता है। और सतगुण में आती है भगवान की कथा सुनना, रज में आप देखेंगे जैसा भी मन करता है हम वही करते है। रज से सत में आया जा सकता है। पर तम से सत में नहीं आया जा सकता। वो बड़ा कठिन कार्य है। अगर आप रजोगुणी है तो आप सतोगुणी हो सकते है। अगर आप तमोगुणी है तो सतोगुणी होना मुश्किल कार्य है। रज में तो आप कथा भी सुन आये लेकिन ध्यान रहे कथा में हमें बात चित नहीं करनी है। कथा सुनना, मंदिर जाना, ठाकुर जी की पूजा करना, तुलसी पूजा करना ये सब छोड़ा नहीं, बीच में ये सब काम भी करना। लेकिन तमोगुण मंदिर तो कभी गये नहीं, कथा में कभी गए नहीं, अच्छे - भले काम तो कभी किये नहीं, और बुरे काम करते रहे। बुरे कार्य जैसे की मदिरा पीते रहे। मंदिर के नाम पर बिदग गए नहीं - नहीं हम नहीं जायेगे। क्या रखा है मंदिर में भगवान तो हमारे ह्रदय में है। भगवान तो सबके ह्रदय में है पर भगवान ह्रदय में दिख जाये इसके लिए जरुरी है की हम मंदिर जाये।
महाराज श्री ने आगे कहा कि भगवान की भक्ति के बगैर अगर हम सोचें की हमे कुछ मिल गया। इस संसार और संसार के लोगों को आजतक मिला क्या है? काम किसी के पूरे हुए नहीं, भगवान की भक्ति है जो हमे पूर्ण करती है। मानव जीवन में जब भी अवसर मिले सुधरने का काम किजिए, अच्छी बात सिखने को मिले तो सीख लिजिए, बुरे बातों पर ध्यान मत दिजिए। समस्या वही है जो नहीं करनी चाहिए वो कर रहे हैं और जो करना चाहिए उसके लिए ही समय नहीं है। मानव जीवन हमें भगवान की भक्ति के लिए मिला है, इससे निकलने के लिए गुरू द्वारा बताए गए मार्ग पर चलिए, उससे जो आप चाहते हैं वो आपको प्राप्त होगा। मानव जीवन का उद्देश्य हमे प्राप्त होगा, सफलता हमे प्राप्त होगी।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं।
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।

3Feb 2020

लखनऊ में श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस से पूर्व युवा शांति सन्देश का आयोजन किया गया।

आज विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सेक्टर- जे, रेल नगर, आशियाना निकट नहर चौराहा, बंगला बाजार, लखनऊ में श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस से पूर्व युवा शांति सन्देश का आयोजन किया गया।महाराज श्री ने सभी युवाओं एवं बच्चों के धर्म और संस्कृति से जुड़े सवालों का एक-एक करके जवाब दिया। युवा शांति संदेश के इस आयोजन में युवाओं ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। युवाओं एवं माता - बहनों ने देश के धर्म, संस्कृत, संस्कृति और संस्कारों से जुड़े हुए कई सवाल किए जिनका महाराज श्री द्वारा युवाओं की ही भाषा में बड़ी ही सरलता से उत्तर दिया गया। पूज्य महाराज श्री ने सभी युवाओं को गलत संगत एवं प्रव्रतियों को त्यागने और धर्म, देश व समाज के प्रति समर्पित रहने के लिए प्रेरित किया।

 

3Feb 2020

“जो परोपकार के लिए कर्म किया जाता है वो सर्वश्रेष्ठ कर्म कहा जाता है।"

“जो परोपकार के लिए कर्म किया जाता है वो सर्वश्रेष्ठ कर्म कहा जाता है।"

"सत्संग का बहुत बड़ा महत्व है हमारे जीवन में।"

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 31 जनवरी से 06 फरवरी 2020 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का सेक्टर- जे, रेल नगर, आशियाना निकट नहर चौराहा, बंगला बाजार, लखनऊ में विशाल आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया। कथा के तीसरे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन " मेरा तार प्रभु से जोड़े ऐसा कोई संत मिले" श्रवण कराया”।

आज कथा पंडाल में कैबिनेट मंत्री ग्राम विकास विभाग एवं समग्र विकास विभाग उत्तर प्रदेश सरकार श्री राजेंद्र प्रताप सिंह जी अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई एवं व्यासपीठ से आर्शीवाद प्राप्त किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि सत्संग का बहुत बड़ा महत्त्व है हमारे जीवन में, सत्संग हमें बहुत कुछ देता है, जिन्हे जीवन में संतो का संग मिल जाये उन का जीवन क्या से क्या हो जाता है। इस संसार में सबसे बड़ा अगर सत्य है तो वह है मृत्यु, मृत्यु की तीन चीजे होती है जिसके बिना मृत्यु नहीं होती। 1 मृत्यु किस स्थान पर होगी 2 किस वजह से होगी 3 किस समय होगी ये तीनो फिक्स है। तो जब पहले ही फिक्स हो गई है ये तीनो चीजे तो हमें मृत्यु को कभी भूलना नहीं चाहिए। महाराज जी ने कहा की जो मृत्यु भूलते है वो पाप करते है। जो लोग मृत्यु को याद रखते है वो कभी पाप नहीं कर पाते है। हम लोगो से पाप कैसे हो जाते है? कई लोग तो कहते है जिंदगी मिली है तो मजे कर लो पता नहीं फिर दुबारा थोड़ी मिलनी है एक ही बार जन्म मिलता है,जन्म कई बार मिलेगा अगर कर्म अच्छे नहीं हुए तो, जन्म एक बार उन्ही को मिलता है जिनके कर्म अच्छे होते है। उन्हें दुबारा नहीं आना होता वो ठाकुर जी के धाम चले जाते है।
जितने भी युवा जीवन में सफलता चाहते हैं तो सबकुछ आपके विचारों पर निर्भर करता है। कई बार लोग निराश होते हैं, आपकी विचारधारा आपको सुख देती है, आपकी विचार धारा आपको दुख देती है। इस संसार में सब अपने अपने कर्मों का फल भोगते हैं। हमारे युवा बहुत जल्दी अपनी विचारधारा बदल लेते हैं, सुखी हो जाएं तो मेहनत का फल है, दुखी हो जाएं तो भगवान ये दुख मुझे क्यों दिया है। भगवान आपको दुख देते हैं, मेहनत आपको सुख देती है ऐसा नहीं है, ये सारा कमाल नजरिए का है, आप सिर्फ अपनी सोच बदलिए, सारी व्यवस्थाएं, सुविधाएं सब बदल जाएंगी।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।

तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।

31Jan 2020

“अपना वास्तविक स्वरूप भूल रहा है मनुष्य”– पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

“हम विश्व गुरु थे, विश्व गुरु हैं और आगे भी विश्व गुरु रहेंगे”- पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान एवं पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 31 जनवरी से 06 फरवरी 2020 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का सेक्टर- जे, रेल नगर, आशियाना निकट नहर चौराहा, बंगला बाजार, लखनऊ में विशाल आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज जी ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

आज कथा पंडाल में भाजपा प्रदेश महामंत्री श्री विद्यासागर सोनकर जी ने अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज जी से आर्शीवाद प्राप्त किया।

कथा के प्रथम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा के प्रथम दिवस पर महाराज जी ने वर्तमान में देश की स्थिति पर बोलते हुए पूछा कि कौन-कौन चाहता है कि सीएए बना रहे? कौन-कौन है जो सीएए का समर्थन करता है? मीडिया में वही दिख रहा है जो नहीं चाहते। वो क्यों नहीं दिख रहा जो चाहते हैं। जो इसके पक्ष में है वो भी तो दिखना चाहिए। शाहीनबाग में सीएए और एनआरसी के विरोध में लगातार चल रहे प्रदर्शन पर बोलते हुए कहा कि कोई भी आता है और कुछ भी बोलकर चला जाता है। पार्टी बाद में होनी चाहिए और देश पहले होना चाहिए। जब देश की बात हो तो कंट्री फस्ट। पार्टी तो एक चुनाव हारेगी तो दूसरा जीत जाएगी। पार्टी का तो आना जाना लगा रहता है। याद रहे कि अगर देश हार गया तो कोई पार्टी नहीं जीत पाएगी। सरकार जो कानून बनाती है वो देश के हित में ही बनाती है। अगर देश के हित में ये कानून बना है तो सिर्फ हम ही नहीं, पूरे सनातन धर्म का संत समाज आपकी सरकार के साथ खड़ा है। पूरे विश्व में कहीं भी चले जाओ हिंदुओं को कोई नहीं पूछता है। दुनिया में कई मुस्लिम और ईसाई देश हैं लेकिन कोई हिंदू देश नहीं है। ऐसे में अगर हम लोगों पर विपदा आएगी तो हम कहां जाएंगे। भारत में सभी धर्म के लोग रहें, हमें किसी से कोई बैर नहीं है। अगर हमें आपके खुदा से कोई समस्या नहीं है तो आपको भी हमारे राम, कृष्ण से कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। ये जिम्मेदारी सबकी है। खुद का सम्मान करना अगर हिंदू सीख लेगा, तो पूरी दुनिया को दिखा देगा कि हम विश्व गुरु थे, विश्व गुरु हैं और आगे भी विश्वगुरु रहने की पूरी क्षमता है। महाराज जी ने कहा कि हम सभी सीएए के पक्ष में है और जल्द से जल्द इसका विरोध खत्म हो और पुन: भारत प्रगति की ओर बढ़े।

महाराज जी ने आगे कहा कि जब कोई जीव इस पृथ्वी पर आता है तो उससे एक गलती होती है वो भी छोटी नहीं बड़ी होती है। जिस काम के लिए मनुष्य इस धरती पर आता है उसे भूल जाता है और जिनके लिए मना किया है उनमें लग जाता है। इस कारण वो अपना वास्तविक स्वरूप भूल जाता है। एक उदाहरण देते हुए महाराज जी ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति पढ़ लिखकर अमेरिका चला जाए और वहां उसे नौकरी,मकान सब मिल जाए। जब तो वापस अपने गांव लौटे और उसमें गांव के व्यक्तित्व की परछाई ना दिखे तो ये उसकी अच्छाई है या बुराई? लोगों ने कहा कि ये तो बुराई है। जिसे हम कह रहे हैं कि वो बुराई है वहीं बुराई तो हम भी कर रहे हैं।

हमें अपने घर और ऑफिस का पता तो मालूम है लेकिन अपना खुद का पता क्या है ये कोई नहीं जानता। हम कहां से आएं है यही बताने के लिए होती है भागवत कथा। भागवत के माध्यम से हम जानते हैं कि असली में हमारा सही पता क्या है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए बताया कि भागवत का महात्यम क्या है? एक बार सनकादि ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे। उन्होंने ये प्रश्न किया कि कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगों की चिंता नहीं की, पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई है। कारण क्या है? क्योंकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूलकर केवल अपने मन की ही करता है। जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा हैं तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है।

महाराज जी ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं, बल्कि भागवत की मानो भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने, गीता की सुने और उसकी माने भी। माँ-बाप, गुरु की सुने तो उनकी माने भी। तब आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे, तो आपको संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी और जब आपको संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा, तो निश्चित ही आप वैराग्य की ओर अग्रसर हो जाएंगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

21Jan 2020

ठा. श्री प्रियाकांत जू मंदिर के ‘चतुर्थ पाटोत्सव’ के पावन अवसर पर संत महात्मा पधारे। उनकी उपस्थिति में चतुर्थ पाटोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया गया। सर्वप्रथम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने मंत्रोच्चार के साथ भगवान प्रियाकांत जू का पंचामृत से अभिषेक कर उन्हें रत्नजड़ित सुंदर पोशाक पहनाई।

ठा. श्री प्रियाकांत जू मंदिर के ‘चतुर्थ पाटोत्सव’ के पावन अवसर पर संत महात्मा पधारे। उनकी उपस्थिति में चतुर्थ पाटोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया गया। सर्वप्रथम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने मंत्रोच्चार के साथ भगवान प्रियाकांत जू का पंचामृत से अभिषेक कर उन्हें रत्नजड़ित सुंदर पोशाक पहनाई।


आयोजन से पूर्व ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर की आकर्षक साज-सज्जा की गयी एवं मंदिर गर्भगृह पर फूल बंगला सजाया गया। प्रातः ठाकुर जी के विग्रह का अभिषेक एवं श्रृंगार दर्शन के पश्चात आरती हुई। इसके पश्चात भगवान श्री प्रियाकान्त जू के छप्पन भोग दर्शन भक्तों के लिये खोले गये।
इस अवसर पर पूज्य महाराज श्री के साथ अयोध्या मणिराम छावनी उत्तराधिकारी पूज्य श्री कमलनयन शास्त्री जी महाराज, वृन्दावन भागवत पीठाधीश्वर सद्गुरूदेव पूज्य श्री पुरुषोत्तमशरण शास्त्री जी महाराज, भागवत वक्ता पूज्य श्री नेत्रपालजी महाराज एवं अन्य संतजनों ने श्री प्रियाकान्त जू भगवान की आरती की।


इस दौरान महाराज जी ने अपने गुरूदेव पूज्य श्री पुरुषोत्तम शरण शास्त्री जी महाराज एवं संत महात्माओं से आशीर्वाद प्राप्त करते हुए उन्हें सम्मान के रूप में शॉल एंव ठा. प्रियाकांत जूं की फोटो भेंट की। इस सुअवसर पर हजारों की संख्या में देश-विदेश से भक्तगण पधारे। सभी ने भगवान श्री प्रियाकान्त जू से आशीर्वाद लेते हुए, संत महात्माओं से आर्शीवचन प्राप्त किए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर महाराज जी ने आर्शीवचन देते हुए कहा कि भक्तों की भावना से साधारण से पत्थर में भी भगवान की प्राण प्रतिष्ठा हो जाती है। लाखों भक्तों की आस्था और भक्ति का ही परिणाम है कि 8 फरवरी 2016 को वृन्दावन में कमलपुष्प मंदिर के रूप में ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर का सपना साकार हुआ। उन्होंने आगे कहा कि सच्चे मन से की गई भक्ति कभी खाली नहीं जाती। अच्छा शिष्य वही होता है जो अपने गुरू से कुछ ना छिपाए। चाहे सुख हो या दुख, सब कुछ अपने गुरुजनों से साझा करना चाहिए। वहीं अयोध्या से आये पूज्य कमलनयन जी महाराज ने कहा कि वृन्दावन धाम में भक्तिभाव हृदय लेकर आने वाले श्रद्धालुओं के चित्त में श्री युगल जोड़ी सरकार स्वंय विराजमान हो जाते हैं।
इस अवसर पर पूज्य श्री पुरुषोत्तम शरण शास्त्री जी महाराज ने श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज को डॉक्ट्रेट की उपाधि मिलने पर बधाई देते हुये कहा कि वे भगवान की कथाओं से मानव समाज के अशांत चित्त का उपचार कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि शिष्य की हर उपलब्धि से गुरू का मान बढ़ता है। आर्शीवचन के पश्चात कृष्ण भजनों पर मंदिर परिसर में मौजूद सभी भक्तजन झूम उठे।

इस अवसर पर विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी, रवि रावत जी, श्रीपाल जिंदल जी, धमेन्द्र शर्मा धन्नू भईया, डा. यू.पी.सिंह, विपिन वाजपेयी, सावित्री सिंह, गजेन्द्र सिंह, तरूण खत्री, राजू यादव, मंजु शुक्ला, शिव शंकर झा, किशन गौड़, विवेक शर्मा, बच्चू सिंह, धमेन्द्र यदुवंशी जी आदि उपस्थित रहे।
देश के कोने-कोने से आये भक्तों ने अपने अराध्य के दर्शन कर बधाई गाते हुये पाटोत्सव पर खुशियाँ मनायीं। इस दौरान राधे राधे के जयकारों से पूरा मंदिर गूंज उठा।

श्री प्रियाकांत जू मंदिर के चतुर्थ पाटोत्सव पर हजारों की संख्या में देश-विदेश से भक्तगण पधारे और कृष्ण भजनों का आनंद लिया। इस अवसर पर भक्तजनों के लिए मंदिर परिसर में विशाल भंडारे का आयोजन भी किया गया। जिसमें हजारों भक्तों ने भारतीय परंपरा को निभाते हुए जमीन पर बैठकर प्रसाद ग्रहण किया। इस दौरान राधे राधे के जयकारे भी लगाए गए।

19Jan 2020

पूज्य श्री श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 22 से 30 मार्च 2020 दिल्ली में होने वाले भव्य श्री राम कथा का आयोजन को लेकर आज ट्रस्ट के सचिव श्री Vijay Sharma Vssct जी के द्वारा दिल्ली में एक मीटिंग का आयोजन किया गया।

पूज्य श्री श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 22 से 30 मार्च 2020 दिल्ली में होने वाले भव्य श्री राम कथा का आयोजन को लेकर आज ट्रस्ट के सचिव श्री Vijay Sharma Vssct जी के द्वारा दिल्ली में एक मीटिंग का आयोजन किया गया, जिसमें श्री राम कथा के इस भव्य आयोजन को विशाल भव्य और सुंदर बनाने को लेकर चर्चा की गई जिसमें सभी समिति सदस्य और भक्तजन उपस्थित रहे और कथा की प्रचार सामग्री का भी विमोचन किया गया।

20Jan 2020

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारविंद से लुधियाना में आयोजित होने वाली श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों को लेकर लुधियाना पंजाब में विश्व शांति सेवा समिति परिवार और शिष्य परिवार लुधियाना के सभी भक्तों ने एक मीटिंग कि।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारविंद से लुधियाना में आयोजित होने वाली श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों को लेकर लाल बहादुर शास्त्री सीनीयर सैक स्कूल नानक पुरी, धुरी लाईन, मिलर गंज, लुधियाना पंजाब में विश्व शांति सेवा समिति परिवार और शिष्य परिवार लुधियाना के सभी भक्तों ने एक मीटिंग का आयोजन किया और उसमें आगामी कार्यक्रम को लेकर चर्चा की। जिसमें काफी संख्या में लोगों ने भाग लिया।। इस मीटिंग में भारी संख्या में भक्तगण मौजूद रहे।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

20Jan 2020

विश्व शांति सेवा समिति बेंगलुरु एवं विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारविंद से बेंगलुरु में इस वर्ष हुई श्री राम कथा को भव्य रूप में सफल बनाने के लिए समिति सदस्यो ने सभी भक्तो को धन्यवाद किया।

विश्व शांति सेवा समिति बेंगलुरु एवं विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारविंद से बेंगलुरु में इस वर्ष हुई श्री राम कथा को भव्य रूप में सफल बनाने के लिए समिति सदस्यो ने सभी भक्तो को धन्यवाद किया और उसके बाद अगले वर्ष 16 से 22 दिसंबर 2021 में होने वाली श्रीमद् भागवत कथा के आयोजन को लेकर उसको भव्य और विशाल बनाने के लिये इसी विषय पर सभी लोगों ने चर्चा की इस मौके पर सभी समिति के सदस्य उपस्थित रहे।

20Jan 2020

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने आज वृंदावन में सर्दी में गरीब असहाय व्यक्तियों को कंबल वितरित किए ताकि उन्हें ठंड से राहत मिल सके। अगर हमें भगवान ने कुछ सामर्थ्य प्रदान किया है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने आज वृंदावन में सर्दी में गरीब असहाय व्यक्तियों को कंबल वितरित किए ताकि उन्हें ठंड से राहत मिल सके। अगर हमें भगवान ने कुछ सामर्थ्य प्रदान किया है तो हमें उस कृपा में से एक हिस्सा ऐसे असहाय गरीब साथियों के साथ बांटना चाहिए l सदैव जरुरतमंदो की सहायता के लिए आगे आना चाहिए। मानवता की सेवा ही सच्चा धर्म है।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

17Jan 2020

ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी पटना होते हुए नन्दनी ग्राम पहुंचे जहां उन्होंने 1 से 7 अप्रैल 2020 तक नंदनी ग्राम, समस्तीपुर, बिहार में आयोजित होने जा रही श्रीमद् भागवत कथा के लिए कथा स्थल का जायज़ा लिया।

आज ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी पटना होते हुए नन्दनी ग्राम पहुंचे जहां उन्होंने 1 से 7 अप्रैल 2020 तक नंदनी ग्राम, समस्तीपुर, बिहार में आयोजित होने जा रही श्रीमद् भागवत कथा के लिए कथा स्थल का जायज़ा लिया। इसी के साथ आयोजक समिति के मेंबर्स के साथ श्री विजय शर्मा जी ने कथा की तैयारियों को लेकर मीटिंग की। इस मौके पर मुखिया जी श्री रामाश्रय ठाकुर जी, श्री प्रमोद ठाकुर जी, श्री रामदरश ठाकुर जी, श्री शिवनाथ ठाकुर, श्री नवल किशोर ठाकुर जी, श्री कमलेश ठाकुर जी, श्री अनिल ठाकुर जी, श्री सुबोध ठाकुर जी, श्री बिट्टू ठाकुर जी और सभी नन्दनी ग्रामवासी, श्री कौशल किशोर राय जी बस्ती हाजीपुर से, श्री टुनटुन सिंह जी, श्री राजीव ठाकुर जी मुम्बई से एवं श्री अमित कुमार जी भी उपस्थित रहें।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

19Jan 2020

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी के सानिध्य में 9 से 15 फरवरी 2020 तक कोलकाता में होने वाले भव्य श्री मद भागवत कथा के आयोजन को लेकर कल 18/01/2020 को ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी ने कोलकाता समिति के साथ आयोजन को भव्य और विशाल बनाने को लेकर एक मीटिंग की।

"राधे राधे" पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी के सानिध्य में 9 से 15 फरवरी 2020 तक कोलकाता में होने वाले भव्य श्री मद भागवत कथा के आयोजन को लेकर कल 18/01/2020 को ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी ने कोलकाता समिति के साथ आयोजन को भव्य और विशाल बनाने को लेकर एक मीटिंग की जिसमें वहाँ के समिति सदस्य और वहां के कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया । और फिर वहां से श्री विजय शर्मा जी ने 19 जनवरी 2020 को दिल्ली में होने वाली मीटिंग के लिए प्रस्थान किया।

16Jan 2020

‘भगवान के विशेष प्रिय हैं कलयुग के भक्त’ – पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

‘दिल में होनी चाहिए आदर की भावना’ 


‘आदर मन से होता है भय से नहीं’ 


‘सबसे बड़ी समस्या है सांस्कृतिक आतंकवाद’ 


‘दूसरों का आदर करना ही हमारी संस्कृति है’ 

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति बैंगलोर के तत्वाधान एवं पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 10 से 16 जनवरी 2020 तक प्रतिदिन श्री राम कथा का प्रिंसेस श्राईन, गेट नं.- 9, पैलेस ग्राउण्ड, बैंगलोर में विशाल आयोजन किया गया। महाराज श्री ने कथा के सप्तम दिवस पर रावण वध एवं राम जी के राजतिलक का वृतांत भक्तों को श्रवण कराया।
सप्तम एवं अंतिम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से राम कथा का श्रवण किया।
श्रीराम कथा के सप्तम दिवस की शुरूआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
महाराज श्री ने राम कथा की शुरूआत करते हुए भक्तों को हरे रामा रामा राम...सीता राम राम राम....भजन श्रवण कराया। महाराज जी ने कहा कि कहते हैं कि जिन्होंने भगवान श्रीराम के वनवास की कथा सुनी है उन्हें भगवान के राज्याभिषेक की कथा अवश्य सुननी चाहिए। भगवान श्रीराम के संपूर्ण चरित्रों का वर्णन करना असंभव है। जब तक ये सृष्टि है तब तक भगवान की नित्य नई लीला होती रहेंगी। ये बात अलग है कि हम सभी उसे नहीं पहचान पाते। भगवान हमारे साथ नित्य नई लीला करते हैं।
महाराज जी ने भक्तों को ‘जाना था गंगा पार प्रभु केवट की नाव चढे.... भजन भक्तों को श्रवण कराया।
महाराज जी ने आगे कहा कि यह जरूरी नहीं कि भक्तों को भी भगवान से काम पड़ता है। कभी कभी भगवान को भी पड़ता है। अगर भक्त ना हों तो भगवान की कौन पूजा करेगा। कलयुग के भक्त तो भगवान के विशेष प्रिय हैं। जिस जिस गांव से होते हुए भगवान राम जी जाते हैं और दूर दूर से लोग उनका दर्शन करने के लिए दौड़ पड़ते हैं।
हमेशा आदर की भावना दिल में रहनी चाहिए। आदर हमेशा दिल से, मन से करना चाहिए। हमें भाव से राम जी की पूजा करनी चाहिए। बड़ों का आदर करना चाहिए। कल्चर टेररिज्म का अर्थ समझाते हुए कहा कि हमारे अच्छे कल्चर को मिटाकर बुरे कल्चर को हमारे ऊपर थोप देना। वर्तमान में यह हर जगह मौजूद है। ये हम सभी पर इतनी बुरी तरह हावी हो गया है कि हम सोच भी नहीं सकते है कि हम इससे निकल पाएं। मात्र 70 साल में हमारे मूल विचारों में बहुत गिरावट आ गई है। इन 70 सालों में हम आगे जाने के बजाय बहुत पीछे चले गए हैं। हम सभी को सोचना चाहिए कि हम आजादी से पहले ज्यादा अच्छे थे या फिर आजादी के बाद ज्यादा अच्छे हैं।


महाराज जी ने चीन, यूरोप, मलेशिया आदि का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने अपनी संस्कृति को खत्म होने नहीं दिया। वहीं अगर हम अपनी संस्कृति की बात करें लोग हमारे ऊपर प्रश्नचिन्ह लगा देते हैं। ये गलत है। हमारी संस्कृति है कि दूसरों का आदर करना। अगर हम दूसरों का आदर करेंगे तो निश्चित है कि आपको आदर मिलेगा। बंदूक के भय से आप आदर करवा सकते हैं लेकिन भाव से नहीं। भय के की गई पूजा, प्रशंसा ज्यादा समय नहीं टिकती। जब भी कोई आदरणीय मिले तो सबको नतमस्तक होकर प्रणाम करो। महाराज जी ने युवाओं को समझाते हुए कहा कि हमेशा अपनी संस्कृति पर भरोसा करो। जब हम अपने धर्म और संस्कृति पर पूर्ण विश्वास करेंगे, तब आप कभी अकेला महसूस नहीं करेंगे। आपको बिल्कुल नहीं लगेगा की आप अकेले हैं।
महाराज जी ने कथा प्रसंग सुनाते हुए बताया कि भक्ति हो तो सबरी जैसी जिसने हज़ारों वर्ष इंतज़ार किया प्रभु श्री राम का क्योंकि सबरी एक अछूत थी और वह साधु - संतों की सेवा करना चाहती थी, पर कोई उसकी सेवा कोई स्वीकार नहीं करता था। परन्तु वह साधु- संतों के आने जाने वाले मार्ग में झाड़ू लगाकर उसको साफ़ करती थी। इस बात से प्रसन्न होकर मतंग ऋषि ने उसको अपने आश्रम में सबरी को स्थान दिया। जब गुरु जी वैकुंठ धाम को प्रस्थान करने लगे, तो सबरी ने कहा गुरु जी आप के सिवा मेरा कोई नहीं है अब आप भी जा रहे हो अब में किसके सहारे रहूँगी। तब उसके गुरु जी कहा की तुम यह आश्रम छोड़ कर कही नहीं जाना दुनिया भगवान् को ढूंढ़ती पर सबरी प्रभु राम तो स्वयं ढूंढते हुए आएंगे। तो देखिये सबरी को अपने गुरु के वाक्यों पर कितना विश्वास है कि उसने हज़ारो वर्ष तक भगवान् की राह देखि और भगवान श्री राम माता सीता को खोजते हुए लक्ष्मण के साथ सबरी के आश्रम आये और देखिये सबरी के प्रेमभाव में डुबे हुए झूठे बेर खाये। ऐसा है भक्त का भाव और प्रभु का प्रेम।
श्री रघुनाथजी फिर आगे चले। ऋष्यमूक पर्वत निकट आ गया। वहाँ मंत्रियों सहित सुग्रीव रहते थे। अतुलनीय बल की सीमा श्री रामचंद्रजी और लक्ष्मणजी को आते देखकर,सुग्रीव अत्यंत भयभीत होकर बोले- हे हनुमान्‌! सुनो, ये दोनों पुरुष बल और रूप के निधान हैं। तुम ब्रह्मचारी का रूप धारण करके जाकर देखो। हनुमान जी जब उनके पास गए तो प्रभु को पहचानकर हनुमान्‌जी उनके चरण पकड़कर पृथ्वी पर गिर पड़े। हनुमान जी ने सुग्रीव से प्रभु की मित्रता कराई और बाली का वध कर सुग्रीव की किष्किंधा का राजा बनाया।सुग्रीव ने अपनी सभी बानर सेना को चारो दिशाओं में भेजा धीरबुद्धि और चतुर नील, अंगद, जाम्बवान्‌ और हनुमान! तुम सब श्रेष्ठ योद्धा मिलकर दक्षिण दिशा को जाओ और सब किसी से सीताजी का पता पूछना।
हनुमान जी ने समुद्र लाँघ कर रावण के भाई बिभीषन से मिले जिन्होंने बताया की माता जानकी को रावण ने अशोक वाटिका में रखा है।तब हनुमान्‌जी विदा लेकर चले सीताजी को देखकर हनुमान्‌जी ने उन्हें मन ही में प्रणाम किया। उन्हें बैठे ही बैठे रात्रि के चारों पहर बीत जाते हैं। शरीर दुबला हो गया है, सिर पर जटाओं की एक वेणी (लट) है। हृदय में श्री रघुनाथजी के गुण समूहों का जाप (स्मरण) करती रहती हैं। हनुमान जी ने सीता को राम जी की मुद्रिका दी और उनकी चूड़ामणि ले कर लंका में आग लगाकर प्रभु राम के पास पहुंचे।

राम जी ने समुद्र पर सेतु का निर्माण किया और लंका पर चढाई की और रावण सहित सारे कुल का नाश कर दिया और सीता जी को लेकर अयोध्या लौटे अपने चौदह वर्ष का वनवास को पूरा कर। उधर भरत जी ने अयोध्या के सिंहासन से प्रभु की पादुका को हटाकर रख दिया और पूरे विधि विधान से राम जी का राजतिलक किया गया और राम जी अयोध्या के राजा बने अपनी सारी मर्यादा का निर्वाह करते हुए। राम जी का सारा जीवन एक सीख है मानव जीवन को जीने के लिए हमें प्रभु श्री राम का अनुसरण करते हुए जीवन को जीना चाहिए, इससे हमारा कल्याण हो जायेगा।

15Jan 2020

‘डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किए गए पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी’

‘मन के रोग का ईलाज करती है कथा’ - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी


बैंगलोर की यूनिवर्सिटी ने किया पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज का सम्मान, डॉक्टरेट की उपाधि से किया सम्मानित


‘ऐतिहासिक रही बैंगलोर में आयोजित श्री राम कथा’


बैंगलोर में आयोजित श्रीराम कथा का षष्टम दिवस ऐतिहासिक रहा। धर्मप्रचार एवं प्रसार के लिए विभिन्न उपाधियों से अलंकृत किए जा चुके धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज को आज कथा से पूर्व देश दुनिया में शांति के प्रचार के लिए आध्यात्म के क्षेत्र में ग्लोबल ट्राइम्प वर्चुअल यूनिवर्सिटी की ओर से मानद डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया गया।
कथा पंडाल में यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर डॉ. संजीव बंसल जी एवं यूनिवर्सिटी के एडवाइजर डॉ. नवल किशोर शर्मा जी भी मौजूद रहे। महाराज जी को डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित करते हुए यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर जी ने कहा कि हमारी हैसियत नहीं है कि हम महाराज जी को सम्मानित करें। ठाकुर श्री ने इस सम्मान को लेकर हम सबको सम्मानित किया है।
डॉक्टरेट की उपाधी ग्रहण करने के बाद महाराज श्री ने सभी भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि डॉक्टर का काम है रोगी को स्वस्थ करना। ठीक इसी तरह ठाकुर जी ने भी हमें मानव की समस्याओं का ईलाज करने का कार्य दिया है। अगर किसी के शरीर में रोग लग जाएं तो इसे डॉक्टर ठीक करते हैं और अगर किसी के मन में रोग लग जाएं तो उसे भगवान की कथा ठीक करती है। महाराज जी ने आगे कहा कि मैं ये सम्मान अपने मां को समर्पित करता हूं और मैं सभी का दिल से आभार व्यक्त करता हूं।
आपको बात दें की पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने विश्व में शांति का प्रचार प्रसार करने हेतु मात्र 17 वर्ष की उम्र में ही भागवत कथा कहना शुरू कर दिया था। उन्होने सन् 1997 में दिल्ली से प्रेरणादायी कथाओं का प्रारम्भ किया जो आज तक अनवरत चल रहा है।
पूज्य श्री देवकीनंदन जी महाराज को दी गई उपाधि की श्रृंखला यहीं नहीं रूकती बल्कि अन्य सामाजिक संगठनों के द्वारा भी महाराज श्री को सम्मानित किया जा चुका है। वर्ष 2016 में श्रीकृष्ण सेवा समिति के द्वारा ब्रज गौरव सम्मान से अलंकृत किया गया, वर्ष 2015 में समाज सेवा के कार्यों के लिए अंतरराष्ट्रीय ब्राह्मण संसद द्वारा सम्मानित किया गया। वर्ष 2012 में अखिल भारतीय बुद्धिजीवी सम्मेलन में ‘यू.पी रत्न’ का खिताब दिया गया। वर्ष 2014 में अखिल भारतीय बुद्धिजीवी सम्मेलन में ‘ग्रेट सन ऑफ इंडिया’ का खिताब दिया गया। कई संस्थाओं द्वारा अलग अलग समय पर विशिष्ट सेवा सम्मान और ‘ब्रज सेवा सम्मान’ से भी अलंकृत किया गया। केवल देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी महाराज श्री को सम्मानित किया जा चुका है। धार्मिक प्रवचनों के माध्यम से विदेश में रह रहे लोगों को धर्म का मार्ग दिखाने के लिए ब्रेम्पटन कनाडा के सांसद श्री रमेश सांघा जी के द्वारा सम्मानित किया गया है।

15Jan 2020

‘हर कोई आजादी चाहता है, किसी का साथ देना नहीं’- पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

‘बदलती जा रही है संयुक्त परिवार की परिभाषा’ - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

‘सबसे उत्तम है गुरुकुलम की व्यवस्था’ - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

‘संस्कारी बनाती है गुरुकुल की शिक्षा’ - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति बैंगलोर के तत्वाधान एवं पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 10 से 16 जनवरी 2020 तक प्रतिदिन श्री राम कथा का प्रिंसेस श्राईन, गेट नं.- 9, पैलेस ग्राउण्ड, बैंगलोर में विशाल आयोजन किया जा रहा है। कथा के षष्टम दिवस पर प्रभु श्रीराम का विवाहोत्सव बड़ी ही धूमधाम से मनाया गया।
षष्टम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से राम कथा का श्रवण किया।
श्रीराम कथा के षष्टम दिवस की शुरूआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
महाराज श्री ने राम कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि लोग कहते हैं कि हम संयुक्त परिवार में रहते हैं। संयुक्त परिवार को अंग्रेजी में ज्वाइंट फैमली कहते हैं। पहले के समय में जो संयुक्त परिवार होता था उसमें कई सदस्य होते थे जैसे चारा, ताऊ, भैया आदि। आजकल हम मां बाप,पति पत्नी और बच्चों को हम संयुक्त परिवार कहते हैं। भले ही भाई अलग रहता हो, तब भी हम उसे संयुक्त परिवार कहते हैं। वो दिन दूर नहीं जब पति-पति भी साथ में रहते होंगे, तब भी उसे संयुक्त परिवार माना जाएगा। फ्रीडम का जूनून हम सभी पर इस तरह हावी है कि हम किसी का साथ नहीं देना चाहते हैं। अगर बच्चे भी अलग रहे और पति-पत्नी भी अलग रहे तब भी हम यही कहते हैं कि हम सभी ज्वाइंट फैमली में रहते हैं। सोचने वाली बात है कि इतना बड़ा अंतर कैसे आया, इसकी क्या वजह हो सकती है? ये सब हमारे एजुकेशन सिस्टम से आया है। महाराज श्री ने इसे एक उदाहरण के माध्यम से समझाते हुए कहा कि पहले हमारे यहां गुरुकुलम की शिक्षा प्रणाली थी। गुरुकुलम में प्रारंभ से ही परिवार का महत्व हमें समझाया जाता है। गुरुकुलम में माता-पिता का महत्व, गुरूजनों का महत्व है,सामूहिक रहने का महत्व है आदि के बारे में बताया जाता था।


महाराज श्री ने आगे कहा कि अंग्रेजी मीडियम स्कूल में आप तिलक लगाकर नहीं जा सकते हैं, लोग हंसते हैं। वहां संस्कारों की बात नहीं होती। वहां केवल यहा सिखाया जाता है कि पैसा कैसे कमाया जाएं। ये नहीं सिखाया जाता है कि जीवन कैसे जीना चाहिए। आपको अपने बच्चों को अंग्रेजी मीडियम में भेजना जरूरी है, अनिवार्य है तो बेशक भेजे लेकिन बच्चों के लिए गुरुकुलम की व्यवस्था अपने घर में जरूर करनी चाहिए। आपके बच्चों को चाहे कितनी भी संपत्ति मिल जाएं, लेकिन अगर उन्हें संस्कार नहीं मिले और वो संस्कारी नहीं बने तो बहुत कुछ पाने के बाद भी हाथ में केवल जीरो ही मिलेगा।
महाराज श्री ने प्रभु श्रीराम के विवाहोत्सव का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि विश्वामित्र जी के साथ प्रभु श्री राम जनकपुरी पहुंचे। वहां पहुंचने पर जैसे ही राजा जनक ने श्रीराम जी को देखा तो उनके हृदय में एक तरफ राम जी और दूसरी तरफ सीता जी की छवि उमड़ आई। राजा जनक ने विश्वामित्र जी से राम जी के विषय में पूछा कि ये कौन हैं ? तो उन्होंने कहा कि ये दशरथ महाराज के पुत्र हैं और उन्हें मेरे यज्ञ की रक्षा के लिए भेजा है। आज देखिए यज्ञ भी सम्पन्न हो गया। बड़े बलवान हैं ये राम, लक्ष्मण।
कुछ दिनों बाद सीता स्वयंवर का समय आया। राजा जनक ने राम जी को उच्च सिंहासन पर बैठाया। मानो यूं बता रहे हों कि मिथिलावासियों देख लो, ये सीता के योग्य वर हैं। स्वयंवर का समय आया, राजा जनक ने सभी राजाओं से कहा, जाओ जिसके लिए आए हो वो कार्य करो। सभी राजा उठकर धनुष तोड़ने के लिए गए, लेकिन कोई भी राजा धनुष तोड़ना तो दूर, धनुष को हिला भी नहीं सका। यह देख जनक जी को क्रोध आ गया, जब क्रोध आया तो वो बोले हमको ऐसा लगता है जैसे ये पृथ्वी वीरों से विहिन हो गई है। अब इस पृथ्वी पर योद्धा नहीं बचे क्या, कोई ऐसा योद्धा नहीं है जो इस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाए और मेरी पुत्री से विवाह करे।
राजा जनक की बात सुनकर वहां बैठे लक्ष्मण जी ने प्रभु श्री राम की तरफ देखा, लेकिन वो तो मर्यादापुरूषोत्तम थे, वो कैसे बोलते। तो लक्ष्मण जी ने सोचा कि प्रभु भी ना बोले और हम भी ना बोलें, तो कैसे काम चलेगा। लक्म्ाण जी बोले उठे, उन्होंने कहा कि जनक महाराज बिना सोचे समझे कुछ नहीं बोलना चाहिए। हमारे गुरूजी ने आज्ञा नहीं दी है, हमने अपने धनुष उठाए नहीं हैं। अभी हम यहां बैठे हैं और रघुवंशियों का एक भी बच्चा जहां बैठा हो, वहां ऐसे शब्द कोई बोल नहीं सकता कि पृथ्वी पर कोई वीर नहीं है। मुझे इस धनुष को तोड़ने में एक क्षण भी नहीं लगेगा। लक्ष्मण जी ने जब यह कहा तो धरती कांप उठी, राजा भी भयभीत हो गए। राजा जनक को लगा कि बात तो सही है अभी रघुवंशी बैठे हैं। लक्ष्मण जी के बढ़ते क्रोध को देखते हुए राम जी ने उन्हें शांत करवाकर बैठाया।
विश्वामित्र जी ने उचित समय जानते हुए श्री राम को आदेश दिया कि हे राम, उठो और राजा जनक की दुविधा को समाप्त करो। श्री राम जी उठे और अपने गुरू को मन ही मन प्रणाम किया। जब श्री राम धनुष की तरफ बढ़ने लगे, तो सब सोचने लगे कि अब क्या होगा ? क्या धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ेगी, जिस धनुष को हजारों लोग मिलकर नहीं उठा पाए, क्या यह वनवासी उसे उठा पाएगा। जब राम जी धनुष उठाने गए तो उन्होंने धनुष उठाने से पूर्व गुरू चरणों में प्रणाम किया और धनुष को एक पल में उठा दिया। प्रत्यंचा चढ़ायी और धनुष को तोड़ दिया। पूरे संसार में बधाईयां गायी जाने लगी। सीता मईया प्रभु श्रीराम की हो गईं और राम सीता विवाह संपन्न हुआ।

14Jan 2020

हमेशा दूसरों की बुराई ना करें, उनसे कुछ सीखे भी’ 


‘जो राम जी को मना ले, उससे बड़ा बुद्धिजीवी कोई नहीं’ 

 
‘बच्चों को अच्छा मानव बनाया जाता है गुरुकुल में’ 


‘विडंबना है कि बच्चों को पैसा कैसे कमाया जाए सिखाया जाता है लेकिन जीवन जीना नहीं’  


‘सबसे उत्तम है गुरुकुल शिक्षा पद्धति’  

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति बैंगलोर के तत्वाधान एवं पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 10 से 16 जनवरी 2020 तक प्रतिदिन श्री राम कथा का प्रिंसेस श्राईन, गेट नं.- 9, पैलेस ग्राउण्ड, बैंगलोर में विशाल आयोजन किया जा रहा है। कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु श्री राम के बाल्यकाल का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।
पंचम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से राम कथा का श्रवण किया।
श्रीराम कथा के पंचम दिवस की शुरूआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
महाराज श्री ने राम कथा की शुरूआत करते हुए भक्तों को हरे रामा रामा राम...सीता राम राम राम....भजन श्रवण कराया।
महाराज श्री ने कहा कि रामायण में लिखा है कि ‘अल्पकाल विद्या सब पाई’ अर्थात भगवान राम ने बाल्य अवस्था में अल्प समय में ही सारी विद्याएं ग्रहण कर लीं थीं। भगवान जी अपने गुरू के यहां शिक्षा ग्रहण करने के लिए गए, गुरूजी भगवान के महल में पढ़ाने के लिए नहीं आए। संस्कारी और असंस्कारी में बड़ा अंतर है। जब कोई अपने से बड़ों के सामने ऊंची आवाज में बोलने लगे तो किसी को बताने की जरूर नहीं है कि आप संस्कार विहीन हैं। इंसान के गुणों से पता चलता है कि वो कितना संस्कारी है। दूसरों को तो सब बोलते हैं लेकिन खुद क्या करते हैं कोई ये क्यों नहीं देखता। हमेशा दूसरों की बुराई ही नहीं करना चाहिए, दूसरों से कुछ सीखना भी चाहिए।


बच्चों को संस्कारी बनाने के लिए शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण हैं। ध्यान दें कि भगवान श्री राम राजकुमार हैं और विश्व में कौन सा ऐसा टीचर है जिसे भगवान अपने महल में नहीं बुला सकते। दशरथ जी की हैसियत के बारे में सभी जानते हैं लेकिन फिर भी गुरु जी के यहां राम जी पढ़ने के लिए गए। एक आज का समय देख लो, यहां बच्चों को पढ़ाने के लिए ट्यूशन टीचर आते हैं। अब आप ये बताओ कि आपके बच्चों अपने टीचर का ज्यादा सम्मान करते हैं या राम जी? आपके बच्चें अपने टीचर का कितना सम्मान करते हैं ? बच्चों को पता है कि उनके माता-पिता ने उनके लिए एक नौकर रखा है, वह टीचर नहीं है। बच्चों को ये पता है कि मेरे पिता जी उसे सैलरी देते हैं तब वो हमें पढ़ाने आता है। तो जिसमें ये ईगो होगा कि ये सैलरी के लिए हो रहा है, मेरे लिए नहीं हो रहा है, तब रिस्पैक्ट लेने वाला भी खो देगा और देने वाला भी खो देगा। लेकिन याद रखे कि ये हमारी संस्कृति नहीं है।
हमारी संस्कृति है कि हम टीचर के यहां जाएं ना कि वो हमारे यहां आएं। आप अपने गुरु जी के पास जाएं और वहां अध्ययन करें। वैसे तो भगवान राम को शिक्षा ग्रहण कने के लिए कहीं जाने की आवश्यकता नहीं थी लेकिन फिर भी वो मानव बनकर धरती पर अवतरित हुए थे। इसलिए उन्होंने बताया कि कैसा जीवन जीना चाहिए। पहले बच्चें गुरुओं के पास जाते थे अध्ययन के लिए, लेकिन आजकल टीचर्स के यहां जाते हैं। टीचर्स ना कि गुरु जी। और टीचर को आपके बच्चों के भविष्य से कोई लेना देना नहीं है। उन्हें केवल इस बात से मतलब है कि मेरे विषय में ये बच्चा अच्छे नंबर लेकर आएं ताकि स्कूल प्रबंधन टीचर को अच्छी सैलरी दें।
टीचर बच्चे को विषय का पूरा ज्ञान नहीं देता है। वह जानता है कि परीक्षा में कौन कौन से प्रश्न आएंगे, वह उन्हीं सवालों के उत्तर बच्चों को रटाता रहता है। ये एक तरह से नकल है। लेकिन हम खुश हैं क्योंकि हमारा बच्चा अच्छे नंबर ला रहा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि असली मायने में आपका बच्चा इस लायक है क्या? प्रत्येक मां-बाप जानते हैं कि उनका बच्चा कैसा है। आजकल बच्चों को सिर्फ यहीं पढाया जा रहा है कि तुम पैसे कैसे कमा सकते हो? लेकिन जीवन कैसे जीना चाहिए ये कोई नहीं पढ़ाता। अगर तुमने ज्यादा पैसा कमा लिया है तो अपने आपको ज्यादा बुद्धिजीवी मत समझो। मनुष्य जीवन पाने के बाद जो राम को मनाने की हिम्मत कर सके, राम को मना सके, उससे ज्यादा चतुर कोई नहीं। उससे बड़ा बुद्दिजीवी कोई नहीं।
हमारी एजुकेशन हमें सिखाती है कि जीवन जीनने के साथ साथ तुम अपने उद्देश्य को कैसे प्राप्त कर सकोगे। अच्छा जीवन जीकर तुम भगवान से कैसे मिलो, उसके लिए गुरुकुलम की पढ़ाई महत्वपूर्ण हैं। गुरुकुल में इंजीनियर, डॉक्टर ही नहीं बनाया जाता बल्कि इनसे पहले एक अच्छा मानव बनाया जाता है। गुरुकुल में सतगुणी बेटा बनाया जाता है।
महाराज जी ने प्रभु श्री राम के बाल्यकाल का वर्णन सुनाते हुए कहा कि प्रभु श्री राम जब बाल्यकाल में पढ़ने गए, तो बहुत कम समय में शिक्षा प्राप्त कर ली। एक बार भगवान श्री राम अपने भाईयों, मित्रों को लेकर सरयु के तट पर पहुंचे। वहां एक सुंदर मैदान था, तो राम जी का मन गेंद खेलने का हुआ। अब राम जी की इच्छा जानते ही लक्ष्मण जी ने सोचा कहीं ऐसा ना हो कि राम जी मुझे विपक्षी टीम में डाल दें। तो वो बोले प्रभु हम तो आपकी ही टीम में रहेंगे क्योंकि बचपन से लक्ष्मण जी राम जी की तरफ ही रहे हैं। अब राम जी ने सोचा कि यहां कोई भी ऐसा नहीं है तो मेरी तरफ से ना खेले। सभी को मेरी तरफ से ही खेलना है। अब जब सभी मेरी तरफ से ही खेलेंगे तो खेल होगा कैसे ? लक्ष्मण जी तो राम की तरफ हो गए, तब राम जी ने भरत जी की ओर देखा। लेकिन कहा कुछ नहीं...यहां भाईयों का प्रेम देखिए कि रामजी के देखते ही भरत जी बोले, हां मैं विपक्षी टीम में रहूंगा।
लेकिन भड़काने वाले हर युग में होते हैं। जैसे ही भरत जी ने विपक्ष चुना, तो भड़काने वालों ने कहा लो जी लक्ष्मण जी को तो अपने साथ ले लिया और आपको विपक्ष में कर दिया। लेकिन भरत जी भड़कने वालों में से नहीं थे। वो बोले अगर मैं राम जी के साथ रहूंगा तो मुझे कभी उनके बगल का दर्शन होता, कभी राम जी की पीठ का दर्शन होता। लेकिन अगर मैं उनके विपक्ष में रहूंगा, तो मुझे उनके मुख का ही दर्शन होता रहेगा ।
खेल शुरू हुआ तो राम जी ने चरण का प्रहार किया और गेंद सीधे भरत की तरफ गई। जब गेंद भरत जी की ओर गई तो उन्होंने देखा कि राम जी के चरण से स्पर्श हुई गेंद मेरी तरफ आ रही है तो उन्होंने जितनी जोर से राम जी ने मारा थी उससे ज्यादा तेज गति से उस गेंद पर प्रहार किया और राम जी की तरफ वापस कर दी। जब वो गेंद राम जी के पास पहुंची, तो राम जी ने प्रहार नहीं किया।
बात ये हुई कि जब गेंद वापस नहीं गई, तो भरत जी जीत गए। अब वहां भी भड़काने वाले मौजूद थे। उन्होंने कहा कि वाह राम जी, कितना बुरा किया आपने। ये गेंद सब कुछ सोच के आई कि दुनिया की शरण में जाने से कुछ नहीं मिलना, राम की शरण में चलना चाहिए। वो सब कुछ छोड़कर आपकी शरण में आई पर आपने क्या किया, उसे लात मारकर बाहर कर दिया। ऐसा आपने क्यों किया ? तो राम जी ने कहा कि भईया, तुम नहीं समझोगे मैंने इसलिए पैर मारा क्योंकि जहां भरत जैसा संत मौजूद हो, तुझे मेरी शरण में नहीं आना चाहिए। तुझे भरत की शरण में जाना चाहिए। जहां गुरू और गोविंद दोनों हो, वहां पहले गुरू की शरण में जाना चाहिए।
वहीं दूसरी ओर भरत जी को भड़काने वाले बोले, कमाल कर दिया। राम जी ने इतने धीरे से चरण का प्रहार किया और आपने इतनी तेज प्रहार किया। इसका मतलब है आप राम जी को हराकर खुद जीतना चाहते हो। तो भरत जी बोले- मैं जीतना नहीं चाहता, मैं तो इस गेंद के दुर्भाग्य को कह रहा था कि जहां साक्षात जगत के पालनहार खड़े हों, तुझे मौका मिला था उनके चरणों में रहने का और तेरा दुर्भाग्य है कि तू उनके चरण छोड़कर मेरे पास चली आई। तुझे वहीं जाना चाहिए क्योंकि दुनिया में आप कहीं घूम लो, अन्त में आपको शांति केवल गोविंद के चरणों में आकर ही प्राप्त होगी।
भड़काने वाले राम जी से बोले अब जब यह गेंद आपके पास आई तो आपने चरणों का प्रहार क्यों नहीं किया ? तो भगवान श्री राम ने बहुत ही प्यारा जवाब दिया। उन्होंने कहा कि मैंने पहले चरण का प्रहार किया, संत के पास भेजने के लिए। फिर संत ने चरण का प्रहार किया और मेरे पास भेज दिया। तो जिसपर संत का चरण स्पर्श हो गया हो और फिर वो मेरे पास आए, तो फिर मैं उसका त्याग नहीं करता, उसे स्वीकार करता हूं। फिर चाहे उसे स्वीकार करने में मेरी हार ही क्यों ना हो जाए। यही भरत और राम जी का प्रेम है।

13Jan 2020

‘सिंगल यूज प्लास्टिक मुक्त होगा भारत’- पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

‘2020 में 5 लाख कपड़े से निर्मित बैग का वितरण करेगा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन’ - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति बैंगलोर के सौजन्य से आज प्रिंसेस श्राईन, गेट नं.- 9, पैलेस ग्राउण्ड, बैंगलोर में भारत सरकार के अभियान ‘नो प्लास्टिक अभियान’ को आगे बढ़ाते हुए कथा पंडाल में हजारों की संख्या में लोगों को कपड़े से निर्मित बैग का वितरण किया गया। साथ ही महाराज जी के अलावा कथा पंडाल में मौजूद हजारों की संख्या में भक्तजनों ने सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल ना करने का संकल्प लिया।

बता दें ‘मेरा भारत मेरा स्वाभिमान’ के तहत साल 2020 में 5 लाख कपड़े से निर्मित बैग को वितरित कर देश को सिंगल यूज प्लास्टिक से मुक्त बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

इस दौरान महाराज जी ने सभी लोगों को प्लास्टिक से होने वाले नुकसान के बारे में बताते हुए अपील की कि ‘प्लास्टिक से बने बैग का इस्तेमाल ना करें और ज्यादा से ज्यादा कपड़े से बने बैग का प्रयोग करें’। कपड़े से निर्मित बैग की खासियत है कि उन्हें धोकर दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। कपड़े से बने बैग ना जल्दी खराब होते हैं और ना ही फटते हैं।

महाराज श्री ने कहा कि प्लास्टिक ना केवल पृथ्वी के लिए बल्कि सभी के लिए बहुत नुकसानदायक है। प्लास्टिक गलती नहीं है जिसके कारण धरती की उपजाऊ शक्ति भी कम होती जा रही है। वर्तमान में प्लास्टिक मानव जीवन के लिए बहुत बड़ा खतरा बन चुकी है। अगर हम पृथ्वी की देखभाल नहीं करेंगे, तो निश्चित है कि ना तो जल रहेगा और ना जीवन। प्लास्टिक के इस्तेमाल से धरती बंजर होती जा रही है इसलिए हमें इसका इस्तेमाल रोकना होगा।
महाराज श्री ने आगे कहा कि अगर आपको अच्छा जीवन चाहिए तो उसके लिए अनिवार्य है कि हम पृथ्वी पर रहकर पृथ्वी का श्रृंगार करें। अगर धरती मां, जल, वृक्ष आदि हमें जीवन देते हैं तो हमें भी उनका ध्यान रखना चाहिए। इसके लिए हमें वृक्ष लगाने होंगे, सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल बंद करना होगा। बहुत बड़ी बड़ी कंपनियां हैं जो प्लास्टिक का बड़ी संख्या में इस्तेमाल करती हैं। हम जो चिप्स, कुरकुरे खाते हैं सभी प्लास्टिक में आते हैं वो सब नुकसानदायक होता है।
महाराज श्री ने मोदी सरकार द्वारा ‘स्वच्छ भारत’ अभियान को बढ़ावा देते हुए कहा कि सिंगल यूज प्लास्टिक बैन करने से मानव जीवन सुरक्षित होगा। इसलिए बहुत जरूरी है कि हम प्लास्टिक का प्रयोग ना करें।
इस दौरान छोटे बच्चों ने नो प्लास्टिक पर एक सुंदर कार्यक्रम भी प्रस्तुत किया।

13Jan 2020

‘प्रभु की कृपा के बिना सत्संग नहीं होता’

‘अपने दुखों को स्वयं निमंत्रण दे रहा है व्यक्ति’

‘गुरूजनों से सुख, दुख कुछ भी नहीं छिपाना चाहिए’

‘वो घर श्मशान के समान होता है जहां संतों को आना-जाना ना हो’
‘बड़ा स्वार्थी हो गया है आज का इंसान’

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति बैंगलोर के तत्वाधान एवं पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 10 से 16 जनवरी 2020 तक प्रतिदिन श्री राम कथा का प्रिंसेस श्राईन, गेट नं.- 9, पैलेस ग्राउण्ड, बैंगलोर में विशाल आयोजन किया जा रहा है।

चतुर्थ दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से राम कथा का श्रवण किया।

श्रीराम कथा के चतुर्थ दिवस की शुरूआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

 

महाराज श्री ने राम कथा की शुरूआत करने से पूर्व प्रभु श्री राम को याद करते हुए हरे रामा रामा राम... सीता राम राम राम....भजन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज जी ने कहा कि प्रभु की कृपा के बिना सत्संग नहीं होता। हमारा जीवन धीरे धीरे व्यतीत तो हो रहा है लेकिन अगर पूरे जीवन में राम जी के महत्व को नहीं समझा या राम का प्राप्त करने की इच्छा को जाग्रत नहीं किया, तो कोई लाभ नहीं। जो भी आपके इष्ट देव हैं या आराध्य है जब तक उनके प्रति आपका समर्पण नहीं होगा, तब तक जीवन व्यर्थ है। लोग कहते है कि क्या नाम आसन पर बैठकर ही जपना चाहिए, क्या माला लेकर ही जपने से कल्याण होगा क्या। तब गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि भाव से जपो या कुभाव से जपो, आलस में रहकर जपो या बिना आलस के जपो....नाम तो तुम्हारा कल्याण ही करने वाला है। कबीरदास जी कहते हैं कि माला फेरत जग गया, गया ना मन का फेर.... अर्थात माला फेरते फेरते समय चला गया। तो मन को लगाओ। अर्थात मन लगाकर भजन करो। भगवान के नाम का प्रभाव इतना है कि कालकूट विष भी फेल हो गया। प्रश्न यह है कि कैसे जपे?

महाराज श्री ने समझाते हुए कहा कि अग्नि का स्वभाव ही है जलाना। जो भी अग्नि में डाला जाएगा तो अग्नि जलाएगी ही। इसलिए कहते हैं कि जैसे अग्नि में जो भी, जैसे भी स्वभाव से डालेगे, वह सब स्वहा कर देगी। ठीक वैसे ही तुम अपने पाप को जान के डालो या ना जान के डालो, बिना जाने डालो, तुम जैसे ही अपने पाप को मेरा नाम लेकर डालोगे मैं उसे भी स्वहा कर दूंगा। मैं उस पाप को समाप्त कर दूंगा।
महाराज जी ने एक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि एक गांव में कुछ संत गए। पहले जहां जहां संत आ जाते थे उसे स्वर्ग माना जाता था। लेकिन आजकल समय बदल रहा है। अपने दुख को व्यक्ति स्वयं निमंत्रण दे रहा है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि जिस घर में संतों का आना जाना ना हो, उसे घर नहीं श्मशान समझना चाहिए। आजकल लोग घरों के आगे प्लेट लगा देते हैं कि डिस्टर्ब ना करें। महाराज जी ने प्रसंग को आगे बढाते हुए कहा कि पहले संत जिस घर में जाते थे, वहां कीर्तन करते थे। भगवान के नाम से सभी गांव वाले बड़े प्रसन्न थे। लेकिन एक व्यक्ति आया और बोला का मैं बहुत दुखी हूं। आजकल का इंसान बड़ा स्वार्थी है सुख के बारे में किसी को कुछ नहीं बताता लेकिन दुख को हमेशा सुनाता है। मतलब गुरू, गोविंद का नाम सिर्फ परेशानी में ही लिया जाता है। कभी भी संत से कुछ नहीं छिपाना चाहिए। गुरू, संत को सारा सुख दुख बताना चाहिए। कभी कभी दुखों को सहन भी करना चाहिए। अगर सौ जन्म भी गुरू के चरणों में अर्पित कर दें, तो भी हम उनकी बराबरी नहीं कर सकते।

इस दौरान महाराज जी ने भक्तों को मदन गोपाल, मदन गोपाल... शरण तेरी आयो....भजन भक्तों को श्रवण कराया।

महाराज श्री ने प्रभु श्री राम के जन्म का वृतांत सुनाते हुए कहा कि राजा दशरथ अपने गुरू जी का पास गए और कहा कि हे गुरूवर मेरा पुत्र नहीं है, मैं दु:खी हूं। तो गुरू जी ने कहा कि चिंता मत कर, तुम्हारे दु:ख का निवारण हो जाएगा। तुम्हें यज्ञ करना होगा। गुरू जी ने कहा कि धैर्य धरो तुम्हारे चार पुत्र होंगे। राजा दशरथ ने पुत्रिष्ठी यज्ञ किया, इस यज्ञ के बाद राजा दशरथ के चार पुत्र राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न हुए। पुत्र होने की खुशी ने राजा दशरथ ने अपना सर्वस्व दान दे दिया। यहां सवाल है की सर्वस्व क्या है ? सर्वस्व परमात्मा के अलावा कुछ हो नहीं सकता, सर्वस्व राम है और राम राज दशरथ को मिले हैं तो राजा दशरथ ने राम जी को पूरी प्रजा की गोद में दे दिया मानो सब से कह रहे हों ये मेरा राम नहीं सब का राम है। किसी ने भी उस दान को अपने पास नहीं रखा सब ने एक दूसरे को देते हुए उस दान को राजा दशरथ को वापस दे दिया।

दशरथ के चारों पुत्र में दो गौर वर्ण के हैं और दो श्याम वर्ण के हैं। कैकयी और कौश्ल्या के पुत्र श्याम वर्ण के हैं और सुमित्रा के दोनो पुत्र गौर वर्ण के हैं। पुत्रों के होने के बाद राजा दशरथ ने गुरू जी से कहा आप इनका नामकरण कर दिजिए। जब नामकरण की बारी आई तो कौशल्या के पुत्र जब महाराज जी के गोद में आए तो राजा दशरथ ने कहा इनका मैं क्या नाम रखूं। तो गुरू जी ने कहा कि जो सुख का नाम है उसका नाम राम है, उसके बाद कैकयी के पुत्र की बारी आई तो कैकयी के पुत्र का नाम रखते हुए कहा जो विश्व का पालन करता है पोषण करता है उसका नाम भरत है। उसके बाद बारी आई सुमित्रा के दोनों के पुत्रों के नाम रखने की, महाराज जी ने कहा जो शत्रुओं का नाश करेगा उसका नाम शत्रुघ्न है, सुमित्रा के दूसरे पुत्र का नाम रखते हुए गुरू जी ने कहा जो राम का होगा प्रिय उनका नाम है लक्ष्मण। इस तरह से राजा दशरथ के चारों पुत्रों का नामकरण सम्पन्न हुआ।

4Jan 2020

‘वर्तमान में लोगों का ज़मीर मर गया है।

‘आदरणीय लोगों का कभी अपमान ना करें, नहीं तो उसका दंड भोगना ही पड़ेगा’।

‘जीवन के केवल तीन ही दिन हैं बचपन, जवानी और बुढ़ापा’।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति नागपुर के तत्वाधान में 2 से 8 जनवरी 2020 तक प्रतिदिन डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति, महर्षि व्यास सभाग्रह, रेशमबाग मैदान के पीछे, नागपुर में पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया कि जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो, उसको क्या करना चाहिए? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।कथा के तृतीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। कथा की शुरूआत भागवत आरती एवं विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। आज कथा पंडाल में कमिश्नर ऑफ पुलिस नागपुर डॉ. भूषण कुमार उपाध्याय जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थित दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कल का कथाक्रम याद कराते हुए कहा कि जीवन में हमेशा याद रखे कि आदर करने योग्य जो लोग हैं अगर हम उनका अपमान करते हैं तो निश्चित है कि हमें कभी सुख नहीं मिलेगा। हमें उसका दंड भोगना ही पड़ेगा। आज के समाज की सबसे बड़ी समस्या है कि दूसरों का अपमान करने में लोग अपनी शान समझते हैं। दूसरों का बुरा करने में लोगों को बड़ा आनंद आता है। लेकिन यह बिल्कुल भी सही नहीं है। भगवान कहते हैं कि गिव एंड टेक। जब हम अपने से बड़ों का अनादर करते हैं तो यह तय है कि हमारे जीवन में, हमारी बुद्धि में हमारे साथ कलियुग बैठा है। जब भी आप किसी का अपमान करते हैं, अपशब्द बोलते हैं, धर्म की निंदा करतें हैं, धर्म से जुड़े लोगों की निंदा करते हैं तो यह निश्चित है कि आपके सिर पर कलियुग बैठा है। ये सब कलियुग का ही प्रभाव है।


महाराज श्री ने आगे कहा कि ध्यान रहे कि जीवन के केवल तीन ही दिन हैं बचपन, जवानी और बुढ़ापा। चौथा दिन तो मृत्यु का है। आजकल लोग इधर उधर की बातों पर ज्यादा ध्यान देते हैं लेकिन अगर ध्यान ही देना हैं तो देश और धर्म के ऊपर बात करें। इसपर ध्यान देना चाहिए कि हमारे समाज में बेटियां सुरक्षित क्यों नहीं हैं? हमारा समाज इतना दूषित हो गया है कि उसपर किसी बात का कोई असर नहीं होता। जो लोग दो नाव में सवार होते हैं वो हमेशा डूबते हैं। आजकल लोगों का ज़मीर मरा हुआ है ना किसी को धर्म की परवाह है और ना ही संस्कारों की।
महाराज श्री ने मोदी जी के संघर्ष से भरे जीवन को याद करते हुए कहा कि कब छोटा आदमी बड़ा बन जाए कोई नहीं जानता। आज माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी इतने बड़े आदमी बन गए हैं कि उनके पास समय नहीं है। अर्थात छोटे से छोटा व्यक्ति कब कितना बड़ा बन जाए, कोई नहीं जानता। हमेशा बडप्पन का सदुपयोग करना चाहिए।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल का कथाक्रम याद कराया कि जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये कि उसकी मृत्यु सातवें दिन हो, वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जानकर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम कि आपकी मृत्यु कब होगी, मृत्यु तो निश्चित है पर कब, ये आपको नहीं पता। तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योंकि इसमें हमें नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। इसलिए मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सौंप दें, तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।
राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर, गंगा के तट पर मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी हैं चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव, जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...
अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा कि हे राजन, ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं, अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए, तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर, आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।
भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं कि ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत में कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण ही पृथ्वी के लोगों को भागवत कथा सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।
श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।

5Jan 2020

नागपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस से पूर्व युवा शांति संदेश एवं गुरु दीक्षा समारोह का आयोजन किया गया।

नागपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस से पूर्व युवा शांति संदेश एवं गुरु दीक्षा समारोह का आयोजन किया गया। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने सभी भक्तों को गुरू दीक्षा प्रदान की एवं दीक्षा प्राप्त करने आये हुए भक्तों को अपने श्रीवचनों से अलंकृत किया जिसमें सैकड़ों युवा सम्मिलित हुए। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने युवा पीढ़ी को संदेश देते हुए कहा कि हमेशा भारतीय संस्कृति और धर्म की रक्षा करना चाहिए, भारतीय संस्कार को कभी - कभी नहीं भूलना चाहिए। हमेशा गुरूजनों, माता पिता और भगवान का आदर-सत्कार करना चाहिए, सत्य वचन बोलना चाहिए। साथ ही युवाओं को देश और संस्कृति की रक्षा के लिए सदैव आगे आना चाहिए। इस दौरान युवाओं ने पूज्य महाराज श्री से आध्यात्मिक एवं सामाजिक विषयों पर सवाल भी किए जिनका महाराज जी ने बड़े प्रेमपूर्वक उत्तर दिया।

5Jan 2020

आपका एक दृश्य आपका चरित्र बदल सकता है।

“आपका एक दृश्य आपका चरित्र बदल सकता है :

मनुष्य के द्वारा किया गया दान, हमारी मानवता को आगे बढ़ाते है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति नागपुर के तत्वाधान में 2 से 8 जनवरी 2020 तक प्रतिदिन रेशम बाग मैदान नागपुर में पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। कथा के चतुर्थ दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
आज कथा पंडाल में उपमहापौर श्रीमती मनीषा कोठे जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।
पंडित श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को "तेरी बदल जाये तकदीर तू राधे राधे बोल ज़रा " भजन श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान की कृपा से जीव के हृदय में भागवत कथा श्रवण करने का मन होता है। करोड़ों - करोड़ों जन्मों के पुण्य जब एकत्रित होते है तो कथा पंडाल में जाते है और वहां बैठकर भगवान की कथा सुनते है। और जिनके ऊपर उनके पूर्वजों उनके कर्मों की कृपा हो वो सातों दिन कथा श्रवण कर पाते है। निश्चित तौर पर जीवन आसान तो नहीं है, बहुत मुश्किल है उस मुश्किल समय में अपने उद्देश्य को याद रखना कि मेरा कल्याण हो। इसके लिए मानव जीवन मिला है। इस भाग- दौड़ के जीवन में व्यक्ति सब कुछ ध्यान रखता है सिवाये अपने कल्याण के। हमें सब कुछ याद है जिन्हे भुलाने के लिए कहा गया था वही हमें याद है। जिन्हे याद करने के लिए कहा गया था वही हम भूले हुए है। हमारे जीवन में सबसे ज्यादा मोक्ष बहुत जरुरी है हमारा कल्याण, हमारी मुक्ति, हमारा उद्धार हो जाये। क्योंकि ये मनुष्य योनि में ही संभव है। और किसी योनि में संभव ही नहीं। लेकिन अब जब गोविन्द ने कृपा कर दी है। मनुष्य योनि प्राप्त हो गयी है। तो अपने हरि को, अपने गोविन्द को, अपने इष्ट को, अपने आराध्य को, मानाने से बिल्कुल मत झुकिए। अगर इस बार गलती हो गयी तो अगली बार बक्त बहुत कठिन हो जायेगा। तब तो बिल्कुल भी संभव नहीं हो पायेगा। इसलिए भगवान ने जो कृपा की है उसका सदुपयोग करें दुरुपयोग न करें। आप सब बाकई सदुपयोग कर रहे है।
महाराज श्री ने कहा कि आज यहाँ पर सुबह में जब मैं यहाँ आया तब देखा की रक्त दान शिविर भी लगा है, आखों के चश्मे भी बाटे गए। और ह्रदय इत्यादि चैकप भी किये गये। निश्चित विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति नागपुर या जहाँ - जहाँ भी हमारी समितिया है हमने एक उद्देश्य बनाया हुआ है जितना भी हो सके मानवता की सेवा करों, जितना भी आप मदद कर सकेंगे मानवता की। भजन में कही कमी रहे जाये फिर भी मेरे ठाकुर जी जब सेवा भाव देखेंगे तो आपके ऊपर कृपा देंगे कैसा भी सही पर सेवा में पीछे नहीं रहा। सेवा करता रहा, इसलिए विश्व शांति सेवा समिति के माध्यम से मथुरा, वृंदावन में लोगो को कम्बल वितरित किये गये। मनुष्य के द्वारा किया गया दान हमारी मानवता को आगे बढ़ाते है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।
महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।


शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।
इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।
दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।
महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

6Jan 2020

‘कभी मुसीबतों से भागना नहीं चाहिए’।

‘कभी मुसीबतों से भागना नहीं चाहिए’

‘दुनिया में सच्चा बैट्समैन वही है जो हर मुसीबत का डटकर सामना करता है’

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति नागपुर के तत्वाधान में 2 से 8 जनवरी 2020 तक प्रतिदिन रेशमबाग मैदान, नागपुर में पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी के सानिध्य में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पूतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के पंचम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
मेरी भई श्याम संग प्रीत ये दुनिया क्या जाने.... भजन पर कथा पंडाल में मौजूद भक्तगण झूम उठे।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी ने कथा की शुरूआत करते कहा कि अधिकांश लोगों का यही प्रश्न होता है कि भगवान ने दुनियाभर के सारे दुख मुझे ही क्यों दे दिए? क्या मेरी ही किस्मत में सारे दुख लिखे हैं? मुझे ही ऐसे लोग क्यों मिलते हैं? मैं तो सभी के साथ भला करता हूं लेकिन मेरे साथ बुरा क्यों होता है? मुझे तो ऐसा लगता है महाराज कि इस संसार के जितने भी दुख हैं उन्हें भगवान ने मेरी ही किस्मत में लिख दिया है।


इस प्रश्न का जवाब देते हुए महाराज श्री ने कहा कि मान लिजिए आप अपने बचपन में हो और बचपन में जाकर कल्पना करें कि उस समय आप कैसे थे। आप पढ़ने की जिद्द करते थे या फिर खेलने की। बचपन में अधिकांश सभी को खेलना ही अच्छा लगता है। गेम के माध्यम से महाराज जी ने इस प्रश्न का जवाब समझाते हुए कहा कि ज्यादातर लोगों को क्रिकेट खेलना प्रिय होता है। सोचिए आपका 10 साल का बेटा है। और उसने कहा कि मैं क्रिकेट खेलना चाहता हूं, बैटिंग करना चाहता हूं। बेटे ने कहा कि मेरे साथ खेलने के लिए कोई नहीं है इसलिए आज मेरे साथ क्रिकेट खेले। बेटा पिता से कहता है कि आप बॉलिंग करो और मैं बैटिंग करता हूं। हालांकि पिता अपने काम पर जाना चाहते थे, लेकिन बेटे के शौक की खातिर उसकी इच्छा पूरी करते हुए कहा कि ठीक है, मैं तैयार हूं। पिता जी ने बॉल करना शुरू किया और एक ही बॉल में बेटा आउट हो गया। आइट होने पर बेटा मायूस हो गया।
पिता ने कहा कि तुम फिर से खेलो मैं बॉलिंग कराता हूं। बेटा फिर से खेलने लगा और पिता ने अपनी बॉलिंग की स्पीड बढ़ा दी। बेटा बॉल को संभालना सीखने लगा और पिता भी फास्ट बॉलिंग कराने लगे हैं। बाप-बेटे के बीच अच्छा गेम चल रहा है। सच यह कि पिता जी बेटे को दुख देना नहीं चाहते। इसी तरह इस संसार में आप आए हैं तो कोई तो विपक्षी होना चाहिए। जो आपको बॉलिंग करा सके। जब सामने बॉलिंग कराने वाला ही नहीं होगा, तो बैटिंग कैसे होगी। जब कोई कैच करने वाला ही नहीं होगा, तो किसी को आउट होने का डर ही नहीं होगा। जैसे जैसे बॉल की स्पीड बढ़ने लगी, तो बेटा भी उनसे लड़ना सीखने लगा। दरअसल वो बॉल नहीं। इसे आप कुछ ऐसे समझ सकते हैं कि परम पिता परमात्मा ने मुझे संसार में भेजा है और ये संसार ही एक स्टेडियम है, मैं ही बैटिंग कर रहा हूं और जिन लोगों को हम ये मानते कि वो हमें दुख दे रहे हैं बल्कि वो हमें दुख नहीं बॉलिंग कर रहे हैं। अगर वो बॉलिंग नहीं करेंगे तो आप गेम नहीं खेल सकोगे।
महाराज श्री ने आगे कहा कि कभी मुसीबतों से भागना नहीं चाहिए। सच्चा बैट्समैन वही है जो हर मुसीबत का डटकर सामना करता है, भागता नहीं है। सच्चा बैट्समैन पिच को छोड़कर जाता नहीं है वो वहां डटा रहता है। जब आप डर की सारी हदों को पार कर जाएंगे, तो आपको डर से भी डर नहीं लगेगा। हमेशा अपने और अपने भगवान पर विश्वास बनाएं रखे। भगवान हमारे सहने लायक मुसीबतें देता रहता है जिनसे हम लड़-लड़कर अपनी हिम्मत को बढ़ाते हैं। जिस दिन हम हर मुसीबत से लड़ने के लायक हो जाएंगे, उस दिन हम स्ट्रोंग खिलाड़ी बन जाते हैं। इसलिए संसार में ये कभी ना सोचे, कि सारी मुसीबतें मुझ पर ही क्यों आती हैं? ये सब भगवान का गेम हैं हमें मजबूत करने का। भगवान हमें अच्छा खिलाड़ी बनाने के लिए ऐसा करते हैं। हमें मजबूत बनाने के लिए मुसीबतों में डालते हैं।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा कि जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुनकर पूरा गोकुल झूम उठा।
महाराज श्री ने कथाक्रम को आगे बढ़ाते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि पूतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पूतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई, तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योंकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बनकर। कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्धार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आंखे फेर ली क्योंकि वो मित्र का भेष रखकर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पूतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पूतना का वध कर उसका कल्याण किया।

महाराज श्री ने आगे कहा कि संतों ने कई भाव बताए हैं कि भगवान ने नेत्र बंद किसलिए किए? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकता है। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।
अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा, तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।
श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली, तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हो जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप, समुद्रों, सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महत्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्व ही पहचान लिया।
श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रुक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।

 

7Jan 2020

कथा सुनना अपने आप में साधना है।

कथा सुनना अपने आप में साधना है। 

 
साधना ही है जो मन को ऊंचाई तक ले जाती है । 


गोविंद से मिलन का मार्ग है साधना। 

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति नागपुर के तत्वाधान में 2 से 8 जनवरी 2020 तक प्रतिदिन रेशमबाग मैदान, नागपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।
श्रीमद्भागवत कथा के षष्टम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।
कथा के षष्टम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
भागवत कथा के षष्टम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जैसे चुंबक सहज स्वभाव से लोहे को अपनी ओर खींच लेती है वैसे ही मोहन की ये मोहनी कथा सबके मन को अचानक से, जो भी एक बार शरण में आता है उसे हमेशा के लिए मोह लेती है और फिर उसे कभी नहीं छोड़ती। वो आत्माएं पवित्र हैं, धन्य हैं जो अपने पवित्र मन को गोविंद और उसकी कथाओं में लगा देती हैं। हमारा मन स्वभाविकतौर पर ना चाहते हुए भी कुमार्गगामी है। महाराज जी ने इसे एक उदाहरण के माध्यम से समझाते हुए कहा कि जैसे जल को कही भी गिरा दो, जहां ढलान होगा वो वहीं जाएगा। ये जल का स्वभाव है। ठीक वैसे ही हमारे मन की स्थिति होती है। मन स्वभाविक तौर पर गलत रास्ते पर ही जाना पसंद करता है जो अनुचित है, मन स्वभाविक ही उधर ही जाता है। जैसे जल का स्वभाव है कि नीचे की ओर जाना, वैसे ही मन का स्वभाव है बुरे मार्ग पर जाना। लेकिन क्या जल ऊपर नहीं जाता? 50, 100 वें मंजिल पर जल को पहुंचने की कोशिश की जाती है। जब प्रयास और साधन एकत्रित किए जाते हैं तब वो जल जिसका स्वभाव नीचे जाने का है वह कोशिश और संसाधनों से 150 वीं मंजिल तक भी पहुंच जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उसके लिए प्रयास किया गया है। ठीक वैसे ही जैसे जल साधनों से ऊपर पहुंच गया, वैसे ही मन भी साधना से ऊपर पहुंचेगा। जल को पहुंचाने के लिए साधन लगेंगे, लेकिन मन को पहुंचाने के लिए साधना लगेगी। कथा सुनना अपने आपमें साधना है। जब हम निर्भीक, निर्भय होकर, संसार को भूलकर भगवान की शरण में बैठते हैं और जब तक बैंठते हैं, संसार को याद नहीं करते। तब यह आपकी साधना बन जाती है और ये साधना मन की गति को ऊंचा कर देती है। साधना हमें गोविंद तक ले जाने में मदद करती है।


महाराज श्री ने आगे कहा कि साधन मिले या ना मिले, कोई बात नहीं। लेकिन साधना मिलनी चाहिए। साधना का संबंध ईश्वर से है। आज का इंसान साधनाहीन हो गया है वह सबकुछ करता है लेकिन साधना नहीं करता है। सा ध ना.....का मतलब है कि मैं अपने मन को साध रहा हूं और मन को साधना से साधा जाएगा। जब लगे कि संसार में बहुत कलेश, परेशानियां हैं तो कभी कभी एकांत में भी बैठना चाहिए। एक दिन में कम से कम 10 मिनट अकेले में बैठना चाहिए। अकेले बैठकर खुद की साधना बढ़ानी चाहिए। अकेले बैठने से मन को बहुत शांति मिलती है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं- राजन जो इस कथा को सुनता है उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता है। उसके भीतर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता है। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो है जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता है। 2 . दूसरा व्यक्ति वो है जो सबसे प्रेम करता है चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नहीं रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध है ही नहीं। आप इन तीनों में से कौन से व्यक्ति की श्रेणी में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता है वहां प्रेम नहीं है, वहां स्वार्थ झलकता है। केवल व्यापार है वहां। आपने किसी को प्रेम किया और उसने आपसे प्रेम किया। ये केवल स्वार्थ है। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा तो वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान में भले ही अपने माता-पिता व गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती है। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा कि ये किसी से प्रेम नहीं करते, तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता है। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त है। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं है। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता है। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता है। श्री कृष्ण कहते हैं कि गोपियों, इनमें से मैं कोई भी नहीं हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म-जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्ज को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्ज को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएंगी, वहां तुम्हें अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था, लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे। लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया।
श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए महाराज श्री ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दें। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी जरूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना, आत्मा कितनी खुश होती है।
श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।

 

8Jan 2020

मुंबई में 2020 में होगा भव्य आयोजन, कल मीटिंग के दौरान हुई घोषणा 23 से 31 दिसंबर 2020 मुंबई में होगा श्रीमद् भागवत कथा का विशाल भव्य आयोजन

मुंबई में 2020 में होगा भव्य आयोजन, कल मीटिंग के दौरान हुई घोषणा 23 से 31 दिसंबर 2020 मुंबई में होगा श्रीमद् भागवत कथा का विशाल भव्य आयोजन....
विश्व शांति सेवा मुम्बई आयोजक समिति द्वारा पिछले साल हुई श्रीमद भागवत कथा को भव्य रूप में सफल बनाने के लिए सभी कार्यकर्ताओ और भक्तो का धन्यवाद किया गया और दिसंबर 2020 में होने वाली विशाल श्रीमद भागवत कथा की तारीख की घोषणा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्माजी के द्वारा कल की मीटिंग में की गई। 2020 दिसंबर में यह विशाल श्रीमद भागवत कथा 23 से 31 दिसंबर तक मीरा-भायंदर में और भी भव्य रूप में की जाएगी और अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार इस साल नव वर्ष मुम्बई में बनाया जाएगा जिसमे देश के कोने कोने से अनेकानेक भक्तो द्वारा उपस्थिति दर्ज करवाई जाएगी, भक्तो को किसी भी प्रकार की असुविधा ना हो इसका ध्यान अभी से मुम्बई आयोजक समिति रख रही है। इस तारीख की घोषणा होने के बाद मुम्बई आयोजक समिति, कार्यकरता एवं सभी भक्तो में एक हर्ष का माहौल देखा गया साथ ही पूरे एक साल पहले से ही पूरी मुम्बई आयोजक समिति स्वमसेवको के साथ पूरे जोर शोर में कथा की तैयारी में लग गई है।

8Jan 2020

“भागवत वेद रूपी पेड़ का पका हुआ फल है। “जीवन में गुरूर नहीं, गुरू की जरूरत है।

“भागवत वेद रूपी पेड़ का पका हुआ फल है। “जीवन में गुरूर नहीं, गुरू की जरूरत है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति नागपुर के तत्वाधान में 2 से 8 जनवरी 2020 तक प्रतिदिन रेशमबाग मैदान, नागपुर में पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी के सानिध्य में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन " मीठे रस से भरी रे राधा रानी लागे" श्रवण कराया”।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि "यूं तो भगवान बहुतों को बहुत कुछ देता है पर किस्मत वाले वही है जिनको देकर कुछ उनसे अपनी सेवा में लेता है"। वही भाग्यवान है। किस पर क्या नहीं है, बहुतों पर बहुत कुछ है लेकिन उनकी चवन्नी भी भगवान सेवा में नहीं लेता। उन्ही की सेवा लेते है जिनको भगवान अपना समझते है। ऐसे सुन्दर आयोजनों में जिनकी भी तन से, धन से मन से कोई सेवा लगती है। ये ऐसे आयोजन जो है वो हमारी संस्कृति सभ्यता और हमारे देश के इतिहास को बताने वाले होते है। हमारे बाल गोपाल न सिर्फ इसे जानते है की मेरे भारत का इतिहास क्या है। हम कौन से देश पर गर्व कर रहे है।


महाराज जी आगे कहा कि हमें समाज में जीना कैसे चाहिए ? ये भी हमारा धर्म हमें सिखाता है। बुजुर्गो की सेवा करनी चाहिए , साथ वालो का आदर करना चाहिए , किसी के प्रति द्वेष नहीं रखना चाहिए, ऐसा सदग्रंथ श्रीमद भागवत जो हमें हमारे हर कदम को सुन्दर बनाना सिखाता है। ये श्रीमद भागवत कथा जैसे दिव्य आयोजन तभी आयोजित हो पाते है। जब हम सब एकाग्र होते है, इस ग्रन्थ के प्रति श्रद्धा होती है। श्रीमद भागवत महापुराण के प्रति क्योंकि जब आप सत्य पर चलते है निश्चित आपको सत्य के मार्ग पर चलने पर कभी - कभी थोड़ी परेशानी आती है। आपको परेशान किया जाता है, आप परेशान भी होते है। आप परेशान तो हो सकते है लेकिन परास्थ नहीं हो सकते। सत्य पर चलने वाले लोग।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंत: सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

9Jan 2020

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज बैंगलौर पहुँचे जहां एयरपोर्ट पर विश्व शांति सेवा समिति बैंगलोर के सदस्यों, यजमान एवं भक्तों द्वारा महाराज श्री का पुष्प गुच्छ देकर व माला पहनाकर स्वागत किया।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज बैंगलौर पहुँचे जहां एयरपोर्ट पर विश्व शांति सेवा समिति बैंगलोर के सदस्यों, यजमान एवं भक्तों द्वारा महाराज श्री का पुष्प गुच्छ देकर व माला पहनाकर स्वागत किया। इसके पश्चात महाराज श्री के निवास स्थान पर भी भक्तों द्वारा पुष्प माला इत्यादि द्वारा स्वागत किया। यहां महाराज श्री ने भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि आप सभी भक्त ज्यादा से ज्यादा संख्या में अपने ईष्ट मित्रों, परिजनों के साथ श्रीराम कथा में पधारे।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 10 जनवरी से 16 जनवरी 2020 तक दोपहर 3:30 बजे से शाम 7:15 बजे तक बैंगलोर, कर्नाटक में प्रथम बार श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है। आप सभी भक्तगण सादर आमंत्रित है।

देश-विदेश में सभी भक्त पूज्य श्री महाराज के यूट्यूब चैनल एवं आस्था भजन चैनल के माध्यम से कथा का लाइव प्रसारण देख सकते हैं।

10Jan 2020

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान एवं पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 10 से 16 जनवरी 2020 तक प्रतिदिन श्री राम कथा का प्रिंसेस श्राईन, गेट नं.- 9, पैलेस ग्राउण्ड, बैंगलोर में विशाल आयोजन किया जा रहा है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान एवं पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 10 से 16 जनवरी 2020 तक प्रतिदिन श्री राम कथा का प्रिंसेस श्राईन, गेट नं.- 9, पैलेस ग्राउण्ड, बैंगलोर में विशाल आयोजन किया जा रहा है।

श्री राम कथा की शुरूआत से पूर्व बैंगलोर में भव्य कलश यात्रा का आयोजन किया गया जिसमें महिलाओं ने सिर पर कलश रखकर विशाल शोभा यात्रा निकाली। इस दौरान हजारों की संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया।जहां जहां से कलश यात्रा गुजरी, उसे देखने के लिए लोगों का ताता लग गया।
कलश यात्रा इतनी भव्य थी कि जिसकी भी नजर पड़ी, वो अपने स्थान पर थम सा गया। जहां देखो माताएं और बहनें सिर पर कलश रखे नजर आ रही थीं। कलश यात्रा में राधे राधे के जोर जोर से जयकारे लगाए गए।

10Jan 2020

‘जीवन जीना सिखाती है रामकथा’

‘जीवन जीना सिखाती है रामकथा’
‘हम सभी के जीवन की कथा है राम कथा’ 
‘हमेशा राम बनकर जियो, जीवन में कभी कलेश नहीं होगा’
‘अच्छा मानव बनाती है राम कथा’

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान एवं पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 10 से 16 जनवरी 2020 तक प्रतिदिन श्री राम कथा का प्रिंसेस श्राईन, गेट नं.- 9, पैलेस ग्राउण्ड, बैंगलोर में विशाल आयोजन किया जा रहा है।
कथा के पहले दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से राम कथा का श्रवण किया।
श्री राम कथा के प्रथम दिन की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने सबसे पहले राम कथा के माध्यम से राम चरित्र, पारिवारिक समस्याएं, सामाजिक जिम्मेदारियां इत्यादि का महत्व समझाया। महाराज जी ने कहा कि कथा इस भाव से सुने कि ये मेरे ही घर, परिवार की कहानी है। भगवान राम प्रत्येक घर के सदस्य हैं, किसी को भी ये नहीं भूलना चाहिए। जिनके मन में मानवता को जगाने का भाव है उन सभी के घर के सदस्य है भगवान श्री राम। ना केवल सनातन धर्म बल्कि इंडोनेशिया समेत कई देशों में राम जी को मानने वाले लोग निवास करते हैं।
महाराज श्री ने राम कथा की शुरूआत करने से पूर्व हरे रामा रामा राम... सीता राम राम राम.... भजन भक्तों को श्रवण कराया।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि राम कथा से हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है। कुछ लोग कहते हैं कि राम कथा गंभीर होती है, उसे सुनने में मन नहीं लगता। लेकिन ये बात जान लें कि जीवन में कई बार ऐसे पल आते हैं जब हमें गंभीर होना पड़ता है। तब हमें राम कथा बहुत बड़ा संभल देती है। ये कथा हम सबके जीवन में बहुत मायने रखती है।
रामकथा का मतलब समझाते हुए महाराज श्री ने आगे कहा कि यह प्रत्येक सनातन धर्म के अनुयायियों की फैमली मेंबर्स की कथा है। ये हम सभी के जीवन की कथा है। हमें मुख्यत दो तरह की कथाएं ज्यादा पसंद होती हैं। पहला आपबीती और दूसरा जगबीती। महाराज जी ने आगे कहा कि राजस्थान, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में अभी भी जब हम एक दूसरे से मिलते हैं तो राम-राम कहते हैं। हालांकि कुछ मार्डन लोग नहीं कहते।


हरियाणवी लड़कियों द्वारा गाया गया गाना अरे मेरे राम सुदामा रे.... का जिक्र करते हुए महाराज जी ने कहा कि उसमें एक पंक्ति है मनै सुना दे राम कहानी। इस तरह राम कहानी का जो संबंध है कि वो हम सभी के जीवन की कहानी है। जो हम सभी से संबंधित है। हमें ये सोचना चाहिए कि हमारा संबंध रामायण के कौन से पात्र से है। माताएं इस पर विचार करें कि रामायण में जितनी भी माताओं का वर्णन किया गया है उनमें से मैं कौन सी माता से मेल खाती हूं। अगर भाई हैं तो आप देखें कि रामायण के कौन से चरित्र से आपका संबंध है। आप सोचे की आप रामायण के कौन से चरित्र से संबंध मेल खाते हैं और जिस चरित्र से मेरा संबंध है क्या मैं उसके जैसा बन पा रहा हूं। अगर नहीं बन पा रहे हैं तो बनने की कोशिश करें।
ऐसे करने पर आपको निश्चित ही पता चलेगा कि रामकथा आपके ही जीवन की कथा है। राम कथा से संबंध को समझाते हुए महाराज जी ने भोजपुरी भाषा का एक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि जब माताएं भोजन पकाती हैं और उसमें नमक मिर्च को लेकर पति-पत्नी में जब तू-तू, मैं-मैं हो जाती है तो घर की बुजुर्ग कहती है कि रामवन के जेवनार और सीता बनके रसोई.....अर्थात जो भोजन कर रहा है वो राम की तरह मर्यादित और एकाग्रचित होकर भोजन करें और जो भोजन बना रही हैं ऐसे करके दोनों को आनंद आएगा।
हमेशा राम बनकर ही जियो, जीवन में कभी कोई कलेश नहीं होगा। छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करना सीखो। राम कथा घर चलाना सिखाती है। घर में शांति कैसे रखी जाएं, ये सब राम कथा हमें सिखाती है। राम कथा हमें अच्छा मानव बनाती है। आशीर्वाद, प्यार और सम्मान अगर ये तीन चीजें किसी को मिल जाएं, तो उस इंसान के जीवन में किसी तरह की कोई कमी नहीं होगी। रामायण हमें समझाती है कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने रामचरित्रमानस की महानता का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रभु श्री राम की कथा गोस्वामी तुलसीदास महाराज जी ने रामचरित्रमानस के माध्यम से , श्री बाल्मिकी महाराज ने बाल्मिकी रामायण के माध्यम से की है। भगवान श्री राम के गुणों का गायन अनेकों बार अनेकों ऋषियों ने अपनी भावना के अनुसार किया है। परन्तु हम सभी की पहुंच में रामचरित्रमानस बहुत आसानी से आ गया है और हम रामचरित्रमानस के इस पवित्र ग्रंथ को सहज स्वीकार करते हैं। कोई अगर ये कहे की तुलसीदास महाराज ने रामचरित्रमानस 500-550 साल पहले लिखी इसकी प्रमाणिकता क्या है, इसकी गजब की प्रमाणिकता है रामायण । सबसे पहली बात स्वयं भगवान श्री राम ने गोस्वामी तुलसीदास बाबा को कहा तुम मेरे चरित्रों का गायन करो, तुलसीदास बाबा ने कहा मैं समर्थ नहीं हूं आपका चरित्र तो अपार है, मेरी पहुंच उतनी नहीं हैं, मैं क्या लिख सकूंगा।
भगवान श्री जानते थे की कलयुग के लोग संस्कृत से धीरे धीरे दूर हो जाएंगे और यह प्रमाण भी है हम सब के मध्य मे की हम सब के घरों में संस्कृत अब पढ़ाई नहीं जाती और बाल्मिकी बाबा ने जो रामायण लिखि है वो संस्कृत में है, वो हमारी पहुंच से थोड़ी दूर है। इसलिए भगवान श्री राम ने गोस्वामी तुलसीदास बाबा को कहा आप मेरे चरित्रों का गायन किजिए, कुछ लिखिए। तुलसीदास बाबा बोले मैं सामर्थयवान नहीं हूं, मैने कुछ भी इधर उधर लिख दिया तो। वहां खड़े हनुमान जी बोले चिंता मत किजिए जब तक रामायण पूरी नहीं हो जाती मैं पल पल आपके साथ रहूंगा और जब भी कहीं इधर उधर हो गए तो मैं आपको सही मार्गदर्शन दूंगा। आज्ञा श्री राम की, निगरानी श्री हनुमान जी महाराज की, जब रामायण लिखकर तैयार हुई उसके बाद भी काशी के विद्वानों ने यह कहकर मना कर दिया की ये आपने क्या लिखा है ये रामायण नहीं है, इसको मान्यता नहीं मिलेगी। तो इस रामचरित्रमानस को मान्यता प्राप्त कराने के लिए काशी विश्वनाथ में नीचे रखा गया दबा कर और जब सुबह मंदिर खुला तो रामचरित्र मानस सबसे ऊपर रखा हुआ था और बाबा भोले नाथ के हस्ताक्षर थे उसमें। इसे भगवान श्री राम ने प्रमाणित किया, हनुमान जी ने प्रमाणित किया और अंत में वैष्णवों में सर्वश्रेष्ठ बाबा भोलेनाथ ने अपने हस्ताक्षर करके कहा कि यह रामचरित्रमानस मान्य है, सुंदर ग्रंथ है, जो इसकी छांव में आएगा उसे अद्भुत शांति की प्राप्ति होगी, ईश्वरीय कृपा प्राप्त होगी।

राम कथा के दौरान राधे राधे के जयकारे भी लगाए गए।

11Jan 2020

पौष मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के पावन अवसर पर ठा. श्री प्रियाकांत जू मंदिर के प्रांगण में 10 जनवरी 2020 को पूर्णिमा महोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया गया।

पौष मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के पावन अवसर पर ठा. श्री प्रियाकांत जू मंदिर के प्रांगण में 10 जनवरी 2020 को पूर्णिमा महोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया गया। जिसमें हजारों की संख्या में देश विदेश से भक्त पधारे। सर्वप्रथम गणेश वंदना कर कार्यक्रम की शुरुआत की गई तथा ठा. श्री प्रियाकांत जू भगवान, सर्वेश्वरी श्री राधा रानी के प्यारे-प्यारे भजनों की प्रस्तुति दी गई। इस भव्य आयोजन में कई गीतकार भी शामिल हुए। श्री तिलक वर्मा जी (हिसार), श्रीमती वीना श्रीजी (झाँसी), श्रीमती अनु चड्ढा जी (दिल्ली), श्रीमती संध्या तोमर जी (दिल्ली), श्रीमती संतोष सादिका जी (बरसानेवाली),सचिन राधे जैसे कलाकारों ने अपने भजनों एवं संकीर्तन से समां बांध दिया। महिलाओं समेत छोटे बच्चे भी भजनों पर झूम उठे। साथ ही सभी भक्तगणों ने राधे - राधे के जयकारे भी लगाए गए। अंत में ठाकुर श्री प्रियाकांतजू भगवान की आरती कर कार्यक्रम का समापन किया गया।

11Jan 2020

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सौजन्य से बैंगलोर में चार दिवसीय ब्लड डोनेशन एवं फ्री मेडिकल कैम्प का आयोजन किया जा रहा है। पहले दिन शिविर में आए लोगों की फ्री ब्लड प्रेशर, ब्लड जांच आदि की गई।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सौजन्य से बैंगलोर में चार दिवसीय ब्लड डोनेशन एवं फ्री मेडिकल कैम्प का आयोजन किया जा रहा है। पहले दिन शिविर में आए लोगों की फ्री ब्लड प्रेशर, ब्लड जांच आदि की गई। साथ ही उन्हें शारीरिक स्वास्थ्य लाभ से संबंधित जानकारी दी गई। साथ की संस्था एवं समिति से जुड़े लोगों ने रक्तदान किया एवं लोगों से भी शिविर में ज्यादा से ज्यादा संख्या में पहुंचकर रक्तदान करने की अपील की

12Jan 2020

युवाओं के प्रेरणास्त्रोत, स्वामी विवेकानंद की आज 157वीं जयंती एवं राष्ट्रीय युवा दिवस के अवसर पर बैंगलोर में एकल विद्यालय द्वारा मैराथन का आयोजन किया गया।

युवाओं के प्रेरणास्त्रोत, स्वामी विवेकानंद की आज 157वीं जयंती एवं राष्ट्रीय युवा दिवस के अवसर पर बैंगलोर में एकल विद्यालय द्वारा मैराथन का आयोजन किया गया जिसमें पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने मुख्य अतिथि के तौर पर शिरकत की। स्वामी विवेकानंद जी की जयंती को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

आज इस अवसर पर ऊर्जा व उत्साह से परिपूर्ण युवाओं को राष्ट्रनिर्माण के प्रति कृतसंकल्पित करने के उद्देश्य से "रन फ़ॉर युथ - युथ फ़ॉर नेशन मैराथन" को महाराज श्री ने हरी झंडी दिखा कर रवाना किया। राष्ट्र निर्माण में युवाओं का अहम रोल है।बच्चों से लेकर बुजुर्गों और महिलाओं ने रन फॉर यूथ मैराथन में भाग लिया।

इस अवसर पर एकल रन की ब्रांड अम्बेसडर ज्योति शर्मा जी, एकल विद्यालय से श्री रमेश अग्रवाल जी, श्री वैभव जी, श्री सचिन पांड्या जी, श्री बिमल सारावागी जी, विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी, विश्व शांति सेवा समिति बैंगलोर की ओर से श्री संजय सिंह जी, श्री गोवर्धन जी, श्री सुरेश जांगिड़ जी, श्री महेश कुमावत जी, श्री संजय अग्रवाल जी और श्री किंवाराम जी मौजूद रहे

12Jan 2020

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति बैंगलोर के सौजन्य से बैंगलोर में चार दिवसीय ब्लड डोनेशन एवं फ्री मेडिकल कैम्प का आयोजन किया जा रहा है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति बैंगलोर के सौजन्य से बैंगलोर में चार दिवसीय ब्लड डोनेशन एवं फ्री मेडिकल कैम्प का आयोजन किया जा रहा है। दूसरे दिन भी शिविर में आए लोगों की फ्री ब्लड प्रेशर, ब्लड जांच आदि की गई। साथ ही उन्हें शारीरिक स्वास्थ्य लाभ से संबंधित जानकारी दी गई।

31Dec 2019

‘हमें अपने दिल और दिमाग का अच्छी जगह इस्तेमाल करना चाहिए ’ पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा समिति पुणे के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 24 से 31 दिसंबर 2019 तक प्रतिदिन महापौर निवास ग्राउंड, भेलपुरी चौक, निगड़ी प्राधिकरण पुणे(महाराष्ट्र) में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं को श्रवण कराया। इस दौरान हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

 

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि मन बड़ा चंचल है, जिन चीजों के लिए मना किया जाता है फिर भी उन्हीं में लगता है। बच्चों द्वारा कम्प्यूटर का अधिकांश इस्तेमाल करने पर बोलते हुए महाराज जी ने कहा कि भगवान के दिए हुए सॉफ्टवेयर का जब हम गलत इस्तेमाल करते हैं तो जीवन गलत दिशा पकड़ लेता है और भगवान के दिए सॉफ्टवेयर का अगर हम सही उपयोग करें, तो हमारा जीवन सही दिशा पकड़ लेगा। ये आपके ऊपर निर्भर करता है कि आप उसका कैसे इस्तेमाल कर रहे हैं। हमारा शरीर एक कंप्यूटर की भांति है जिसमें दिल और दिमाग दो कमाल के सॉफ्टवेयर हैं जो भगवान ने हमें दिए हैं। भगवान ने वेद, पुराण आदि धर्मग्रंथों के माध्यम से दो सॉफ्टवेयर अर्थात दिल और दिमाग का इस्तेमाल करने के बारे में भी समझाया है। लेकिन समस्या ये है कि बिना उन किताबों को पढ़े हम इस्तेमाल करने लगे और फंस गए। भगवान कहते है कि इन दो सॉफ्टवेयर का बड़ी सावधानी से इस्तेमाल करें। अर्थात दिल मुझमें लगाकर रखना और दिमाग दुनिया में लगाकर रखना। ऐसा करने से जीवन अच्छी तरह व्यतीत होगा, कभी फंसोगे नहीं। लेकिन आज हम इसका इस्तेमाल उल्टा ही कर रहे हैं। हम दिमाग भगवान में और दिल दुनिया में लगा बैठे हैं। कर्म ऐसे होने चाहिए कि तुम्हारे जाने के बाद लोगों के दिल से तुम्हारी तस्वीर नहीं निकलनी चाहिए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। उसका परिवार अत्यंत गरीबी और दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे थोड़ा बहुत खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वो चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है। वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना ना रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया। दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली और उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे, जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

1Jan 2020

आज सुबह विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट से सचिव श्री विजय शर्मा जी पुणे से दिल्ली पहुंचे।

आज सुबह विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट से सचिव श्री विजय शर्मा जी पुणे से दिल्ली पहुंचे। वहां समिति के सद्स्यों द्वारा स्वागत किया गया। 23 से 31 मार्च 2020 तक दिल्ली में आयोजित होने वाली विशाल राम कथा के आयोजन के लिए कई जगहों का निरीक्षण किया जिसमें से पांचवा पुस्ता, भजनपुरा स्थित ग्राउंड को कथा के लिए चुना गया। साथ ही 19 जनवरी को होने वाली बैठक के लिए चर्चा की।

1Jan 2020

नव वर्ष उत्सव 2020

विश्व शांति सेवा समिति पुणे एवं विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 24 से 31 दिसंबर 2019 तक महापौर निवास ग्राउंड, भेलपुरी चौक, निगड़ी प्राधिकरण पुणे(महाराष्ट्र) में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा के भव्य समापन के बाद 31 दिसंबर को नव वर्ष का विशाल महोत्सव बड़े हर्षोउल्लास के साथ मनाया गया।
नव वर्ष की शुरूआत विश्व शांति की प्रार्थना के साथ की गई। इस दौरान मधुर गायन प्रस्तुत किया गया, जिसे सुनकर कथा पंडाल में मौजूद सभी कृष्ण प्रेमी झूम उठे। नव वर्ष के भव्य आयोजन के बाद पुणे कोई आम स्थल ना होकर एक तीर्थ स्थल में बदल गया।
महाराज श्री ने कहा कि शुभ दिन शुभ कार्यों के साथ मनाना चाहिए। हालांकि ये नव वर्ष पाश्चात्य कैलेंडर के हिसाब से है। इसमें और हमारे नव वर्ष में बहुत अंतर है। जब ये वर्ष चेंज होता है तो कुछ भी चेंज नहीं होता। जैसे का तैसा ही रहता है। लेकिन जब हिंदू कैलेंडर के हिसाब से मनाया जाने वाले नव वर्ष प्रारंभ होता है तो हमारे यहां सब कुछ बदल जाता है। भारतीय संवत के अनुसार जब नव वर्ष बदलता है तो प्रकृति में बदलाव होता है। किसानों के घर नया अन्न आता है। साथ ही हमारे शरीर में भी कई बदलाव होते हैं। इसलिए भारतीयों का नव वर्ष अद्भुत होता ही है लेकिन संसार के साथ चलना भी जरूरी है।


महाराज श्री ने अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से मनाया जाने वाले नव वर्ष पर बोलते हुए कहा कि यह हमारी एक योजना है। हम इसे इसलिए मनाते हैं ताकि हम ज्यादा से ज्याद लोगों को बुरे काम करने से रोक सकें। उन्हें भक्ति के मार्ग में लगा सके। हमेशा शुभ कार्य की शुरूआत भगवान के साथ ही करनी चाहिए। अच्छे कर्मों के साथ ही शुभ कार्य करने चाहिए, जिसका फल भी बहुत लाभदायक होता है।
महाराज श्री ने आगे कहा कि “ए जाने वाली साल, साल की सभी खताओं को माफ करती जा, ए आने वाली साल मुझे मेरे कन्हैया के और करीब लेती जा”। वैसे तो बीते हुए पल वापस नहीं आते, पर मत भूलो जो पल गुजरे श्याम के चरणों में वो पल कभी छोड़कर नहीं जाते। अगर आप प्राप्त की गई किसी वस्तु का सदुपयोग नहीं कर सकते, तो आप समझदार नहीं कहलाएंगे।
महाराज श्री ने नए साल का संदेश देते हुए कहा कि जब भी कोई नया पल हो, नया साल हो, तो हमें अपने जीवन में कुछ नए परिवर्तन करने चाहिए।
इस दौरान नव वर्ष के उपलक्ष्य में कथा पंडाल में मौजूद महाराज जी, सभी भगतगण, समिति के लोग समेत अन्य लोगों ने बेटी बचाओ, स्वच्छता अभियान, नो प्लास्टिक, जल बचाव, नदी संरक्षण, भारतीय संस्कृति, गौमाता, शहीद, गरीब –असहायों की मदद, छुआछूत जैसे 10 विषयों पर संकल्प लिया।
कथा पंडाल में हजारों की संख्या में भक्तगण मौजूद रहे। नव वर्ष पर महाराज श्री के श्रीमुख से भजनों का सभी कृष्ण प्रेमियों ने खूब आनंद उठाया। पूरा पंडाल राधे राधे के जयकारों से गूंज उठा।

2Jan 2020

आज 2 जनवरी से 8 जनवरी 2020 तक नागपुर में आयोजित होने वाली कथा से पूर्व महाराज जी ने सर्वप्रथम डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति पहुंचकर हेडगेवार जी की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर नमन किया।

विश्व शांति सेवा समिति नागपुर, विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में एवं पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में आज 2 जनवरी से 8 जनवरी 2020 तक नागपुर में आयोजित होने वाली कथा से पूर्व महाराज जी ने सर्वप्रथम डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति पहुंचकर हेडगेवार जी की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर नमन किया।

2Jan 2020

हमें सत्य सनातन धर्म के लिए सोचना चाहिए- पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

हमें सत्य सनातन धर्म के लिए सोचना चाहिए- पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज


‘जीवन में सबसे अनमोल रत्न है मधुर वाणी’ - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज


“कथा में जाएं तो विनम्र बनकर जाएं - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज


विश्व शांति सेवा समिति नागपुर के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 2 से 8 जनवरी 2020 तक प्रतिदिन डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति, महर्षि व्यास सभाग्रह, रेशमबाग मैदान के पीछे, नागपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।
श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।
कथा के प्रथम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। प्रथम दिवस की कथा की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत भागवत के प्रथम श्लोक सच्चिदानन्दरूपाय विश्वोत्पत्त्यादिहेतवे। तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुम: के उच्चारण के साथ की। उन्होंने कहा कि हम सभी सनातनियों को एकत्रित होने की जरूरत है। अपने व्यक्तिगत मत भुलाकर, जातिपंथ सबकुछ भूलकर सिर्फ हमें अपनी भारत माता के लिए सोचना चाहिए। हमें सत्य सनातन धर्म के लिए सोचना चाहिए। साथ ही धर्म को आगे बढ़ाने के लिए हर संभव कोशिश करनी चाहिए।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि इस संसार में भगवान कृष्ण ही सृष्टि का सृजन, पालन और संहार सब वहीं करते हैं। भगवान के चरणों में जितना समय बीत जाए उतना अच्छा है। इस संसार में एक-एक पल बहुत कीमती है। वो बीत गया तो बीत गया। इसलिए जीवन को व्यर्थ में बर्बाद नहीं करना चाहिए। भगवान के द्वारा प्रदान किए गए जीवन को भगवान के साथ और भगवान के सत्संग में ही व्यतीत करनी चाहिए। भागवत प्रश्न से प्रारंभ होती है और पहला ही प्रश्न है कि कलयुग के प्राणी का कल्याण कैसे होगा। इसमें सतयुग, त्रेता और द्वापर युग की चर्चा ही नहीं की गई है। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि बार बार कलयुग के ही कल्याण की चर्चा क्यों की जाती है अन्य किसी की क्यों नहीं। इसके कई कारण हैं जैसे- अल्प आयु, भाग्यहीन और रोगी। इसलिए इस संसार में जो भगवान का भजन ना कर सके, वो सबसे बड़ा भाग्यहीन है। भगवान इस धरती पर बार-बार इसलिए आते हैं ताकि हम कलयुग में उनकी कथाओं में आनंद ले सकें और कथाओं के माध्यम से अपना चित्त शुद्ध कर सकें। भागवत कथा चुंबक की भांति कार्य करती है जो मनुष्य के मन को अपनी ओर खींचती है। इसके माध्यम से हमारा मन भगवान से लग जाता है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि भागवत का महात्यम क्या है? एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे। उन्होंने ये प्रश्न किया कि कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की, पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है? क्योंकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूलकर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए, तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने, गीता की सुनो और उसकी मानों भी। माँ-बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे, तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।
श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

 

3Jan 2020

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं मेरा भारत मेरा स्वाभिमान एवं ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी ने मथुरा, वृंदावन में सर्दी में फुटपाथ पर रह रहे गरीब असहाय व्यक्तियों को कंबल वितिरत किए ताकि उन्हें थोड़ी राहत मिल सके। विजय शर्मा जी ने कहा ये लोग न्यूनतम इच्छाओं के साथ अपना जीवन यापन कर रहे हैं l

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं मेरा भारत मेरा स्वाभिमान एवं ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी ने मथुरा, वृंदावन में सर्दी में फुटपाथ पर रह रहे गरीब असहाय व्यक्तियों को कंबल वितिरत किए ताकि उन्हें थोड़ी राहत मिल सके। विजय शर्मा जी ने कहा ये लोग न्यूनतम इच्छाओं के साथ अपना जीवन यापन कर रहे हैं l अगर हमें भगवान ने कुछ सामर्थ्य प्रदान किया है तो वह हम पर उसकी अनुपम कृपा है l हमें उस कृपा में एक हिस्सा अपने ऐसे असहाय गरीब साथियों के साथ बांटना चाहिए l ऐसे लोगों की मदद में आगे आना चाहिए l वास्तव में यही भगवान की सच्ची पूजा है l

3Jan 2020

भागवत कथा ग्रहण करने से हो जाती है सहज मुक्ति’।

भागवत कथा ग्रहण करने से हो जाती है सहज मुक्ति’।

‘प्रयास करने से ही अच्छा फल प्राप्त होता है’।

‘संसार में रहकर भगवान को पाने की कोशिश करते रहना चाहिए’।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति नागपुर के तत्वाधान में 2 से 8 जनवरी 2020 तक प्रतिदिन डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति, महर्षि व्यास सभाग्रह, रेशमबाग मैदान के पीछे, नागपुर में पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।
श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
कथा के द्वितीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि श्रीमद् भागवत अर्थात भ माने भक्ति ग माने ज्ञान, व माने वैराग्य और त माने तत् श्रण मुक्ति। ये चार अक्षर हैं और इनके मिलने से ‘भागवत’ शब्द बनता है। भक्ति, ज्ञान, वैराग्य से पूर्ण होकर, जो व्यक्ति भागवत कथा अमृत रसास्वाद ग्रहण करता है निश्चित तौर पर सहज उसकी मुक्ति हो जाती है।
महाराज श्री ने कहा कि “इस संसार की गतिविधियों पर नहीं अधिकार किसी का है जिसको हम परमात्मा कहते हैं ये सब खेल उसी का है”। भागवत कथा के माध्यम से व्यक्ति ना सिर्फ ईश्वर को जानता है बल्कि ईश्वर को पाने की इच्छा भी कर बैठता है। जब जीव के मन में उसे पाने की इच्छा होती है तो वह कोई ना कोई प्रयास भी करता है और गोविंद की कृपा से हर प्रयास भी सफल होता है। सत्य यही है जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ अर्थात जिन्होंने उसे खोजने की कोशिश की है उन्हें वो निश्चित मिला है। इस तरह प्रयास करने से ही अच्छा फल मिलता है। अगर आप भगवान को पाना चाहते हैं तो उसके लिए आपको निरंतर प्रयास करना होगा, उनके लिए समय निकालना होगा। ये बात अच्छे से जान लें कि अगर आपके पास भगवान के लिए समय नहीं है तो उनके पास भी आपके लिए समय नहीं है। अगर आप भगवान को प्रिय लगने वाले कार्यों और उसमें मन लगाने लगोगे, तो निश्चय ही आपको भगवान के दर्शन हो जाएंगे। महाराज जी ने आगे कहा कि संसार की बातों को छोड़ों और भगवान को पाने के लिए निकल पड़ो। संसार में रहकर भगवान को पाने की कोशिश करते रहना चाहिए।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता। जब भगवान भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की, तो बाबा भोलेनाथ ने कहा कि जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योंकि यह कथा सबके नसीब में नहीं है। माता पूरा कैलाश देख आईं पर शुक के अपरिपक्व अंडों पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद की गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे, उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते महाराज जी ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया, तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा, मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा कि श्री शुक आप आओ, आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी। उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए। यानि उन्हें माया का बंधन नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारों ओर बांधता फिरता है और बार बार इस माया के चक्कर में धरती पर अलग - अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जन्म मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।

26Dec 2019

‘सूर्य ग्रहण के दौरान किया गया दान कई गुना फल देता है’- पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा समिति पुणे के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 24 से 31 दिसंबर 2019 तक प्रतिदिन महापौर निवास ग्राउंड, भेलपुरी चौक, निगड़ी प्राधिकरण पुणे(महाराष्ट्र) में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो, उसको क्या करना चाहिए? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

कथा के तृतीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। कथा की शुरूआत भागवत आरती एवं विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत आज लगे सूर्यग्रहण से करते हुए कहा कि जो घटना प्रत्यक्ष हो गई, उसके प्रमाण की कोई आवश्यकता नहीं है। जो मान मर्यादाएं पहले से चली आ रही हैं उनका पालन करना चाहिए। जो बातें हमारे ऋषि, मुनियों ने बताई हैं वो आज भी घटित होती हैं, सत्य हैं। उन्हीं का आधार लेकर विज्ञान भी आगे बढ़े। हम विज्ञान की भाषा को भले ही अलग कर सकते हैं लेकिन भगवान और भगवान की सत्ता को कोई नहीं मिटा सकता। भविष्य में जब भी ग्रहण पड़े, तो हमेशा दो बातों का खास ध्यान रखें कि उस समय कुछ भी खाना पीना नहीं चाहिए और उस दौरान भजन और दान पुण्य करें। इस समय किया गया दान कई गुना फल देता है। ऐसे लाभ को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। महाराज जी ने आगे कहा कि अपने आप से एक सवाल करें कि हम मरेंगे कि नहीं, मेरी स्थिति क्या है?
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया कि जो व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।
राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...
अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।
भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।

27Dec 2019

‘नर्क से बचने का एकमात्र सरल तरीका है भगवत भजन’- पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा समिति पुणे के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 24 से 31 दिसंबर 2019 तक प्रतिदिन महापौर निवास ग्राउंड, भेलपुरी चौक, निगड़ी प्राधिकरण पुणे(महाराष्ट्र) में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तारपूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जीवन में कुछ क्षण का संग भी अगर संत, भगवान या सत्संग का हो जाए, तो समझ लेना चाहिए कि ग्रहण करने वालों का वो एक क्षण का संग भी, सत्संग का बेड़ापार करने के लिए पर्याप्त है। सदा अपने नेत्र, श्रवण और वाणी पर नियंत्रण रखना चाहिए क्योंकि जैसा हम सुनते हैं, देखते हैं वैसा ही आचरण करते हैं। ये आपके ऊपर निर्भर करता है कि आप क्या देख रहे हैं क्या सुन रहे हैं। देखना और सुनना अगर सुधरा हुआ हो, अच्छा हो, तो तुम कभी गलत रास्ते पर नहीं जाओगे। जो उचित हो हमेशा वहीं देखो और सुनो। भगवान के नाम का आश्रय लो, सत्संग करो, वहीं हमारे साथ जाएगा।

 


महाराज जी ने नागरिकता कानून पर बोलते हुए कहा कि हमें इस देश को अपना समझना चाहिए और सरकार जो कानून लेकर आई है वो देश में रहने वालों के लिए बिल्कुल भी गलत नहीं है। बाहर से आने वालों के लिए अगर कोई समस्या है तो बाहर से ज्यादा लाने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इस देश में जनसंख्या बहुत ज्यादा है। जो लोग इस देश में रह रहे हैं उन्हें किसी तरह की कोई असुविधा नहीं होगी क्योंकि वो मूलत: भारतीय हैं।
महाराज जी ने आगे कहा कि एक दृश्य से हमारा पूरा आचरण बदल सकता है इसलिए आंख और कान सभी पर नियंत्रण होना बहुत आवश्यक है। नर्क से बचने का एकमात्र सरल तरीका है कि भगवत भजन। जो जीव भगवत भजन करेगा, जो भगवान के नाम में विश्वास रखता है वो आसानी से भव सागर से तर जाएगा। भगवान पर जितना विश्वास करोगे उतना ही अच्छा है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे, तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपने मन्त्रों से जीवित कर दिया।
महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मैं इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।
शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो, तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।
इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने विष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।
दूसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।

महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंसा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

28Dec 2019

‘जीवन में विनम्रता बहुत महत्वूपर्ण हैं’ - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा समिति पुणे के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 24 से 31 दिसंबर 2019 तक प्रतिदिन महापौर निवास ग्राउंड, भेलपुरी चौक, निगड़ी प्राधिकरण पुणे(महाराष्ट्र) में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पूतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के पंचम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

आज कथा पंडाल में पिम्परी के विधायक श्री अन्ना बनसोडे जी ने गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आर्शीवाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

 

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि ईश्वर के ऊपर पूर्ण भरोसा करो, कि अगर तुम ईश्वर के प्रति समर्पित रहोगे, तो वो तुम्हारे किसी भी कार्य को रूकने नहीं देंगे। सबसे बड़ी समस्या ये है कि कभी हमें विश्वास होता है तो कभी नहीं। विश्वास में सबसे बड़ी बात यह है कि जो भी कुछ जीवन में घटित होता है अर्थात अच्छा या बुरा। एक बात अवश्य समझ लें कि भगवान ने तुम्हारी लिए अच्छा ही किया है बुरा नहीं। भगवान के भक्त कभी किसी से शिकायत नहीं करते। अपने कर्म को ईमानदारी से करते चले जाओ, जो होता चला जाए उसे ठाकुर जी की मर्जी समझकर स्वीकार करो।भगवान से कभी ये प्रश्न मत करो कि मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ? जब आप ये प्रश्न करते हो तो उसी समय तुम्हें भगवान पर संदेह होता है कि वो है कि नहीं। जो जीव भगवान पर दृढ़ विश्वास करता है ईश्वर उसे कभी अकेला नहीं छोड़ते। जिस दिन तुम ठाकुर जी के हो जाओगे उस दिन पूरा संसार तुम्हारा हो जाएगा। हमेशा अपने भगवान पर पूरा भरोसा रखे। गुरु, ब्राह्मण, संत और भगवान सभी हृदय से प्रसन्न होते हैं ना कि आपके द्वारा की गई व्यवस्था से। सिर्फ नोट या पद के बल पर अगर आशीर्वाद मांगोगे तो नहीं मिलेगा। जीवन में विनम्रता बहुत महत्वूपर्ण हैं।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि पूतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पूतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई, तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योंकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर। कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्धार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आंखे फेर ली क्योंकि वो मित्र का भेष रखकर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पूतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पूतना का वध कर उसका कल्याण किया।

महाराज जी ने कहा संतों ने कई भाव बताए हैं कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण कीआवश्यकताहै।
इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।
श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।
श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।

29Dec 2019

“ जीवन में अगर कोई चीज अधिक हो जाए तो उसे सेवा भाव में लगाइए : देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

विश्व शांति सेवा समिति पुणे के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 24 से 31 दिसंबर 2019 तक प्रतिदिन महापौर निवास ग्राउंड, भेलपुरी चौक, निगड़ी प्राधिकरण पुणे(महाराष्ट्र) में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन प्रेम मयी राधा - राधा प्रेम मयो हरि "श्रवण कराया”।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत कहा कि जो भगवान के उत्सव में सम्मिलित होते है उनके सभी अमंगल नष्ट हो जाते है। इसलिए भगवान के उत्सव में हमेशा सम्मिलित होना चाहिए। बैसे भी अगर कहा जाएं तो ये जो भगवान के उत्सव है ये मृत्यु लोक में संभव है। ये उत्सव यही मनाये हैं। इन उत्सवों को मानाने के लिए स्वर्ग में को विकल्प नहीं है। भगवान कैसे प्रकट हुए उस समय उत्सव कैसे हुआ होगा आनंद क्या रहा होगा उस समय तो हम उपस्थित नहीं थे। पर कथाओं के माध्यम से जब उत्सव हमें सुनने को मिलते है। इन उत्सवों में सम्मिलित होने अवसर मिला। कभी कभी हम ब्रजवासी होने की भावनाओं को महसूस करते है। और राम अवतार में अयोध्यावासी होने की भावनाये महसूस करते है।

 

जीवन में कुछ भी चीज ज्यादा एकत्रित नहीं करना चाहिए, जो भी मिले उसमें ही संतोष करना चाहिए और अधिक हो जाए तो सेवा भाव धर्म में अधिक लगाना शुरू कर दिजिए। विचार अधिक हों तो विचारों से अपने धर्म को आगे बढ़ाइए, बल अधिक हो तो धर्म की रक्षा किजिए, धन अधिक हो तो अपना धन धार्मिक कार्यों में लगाइए। जो भी आपके पास है उसकी अधिकता बढ़ जाए तो सिर्फ भगवान के लिए, धर्म के लिए, सेवा के लिए लगाइए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।

25Dec 2019

“मनुष्य योनि में ही आप नित्य नए पुण्य और पाप कर सकते हैं” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

“मनुष्य योनि में ही आप नित्य नए पुण्य और पाप कर सकते हैं”

विश्व शांति सेवा समिति पुणे के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 24 से 31 दिसंबर 2019 तक प्रतिदिन महापौर निवास ग्राउंड, भेलपुरी चौक,निगड़ी प्राधिकरण पुणे(महाराष्ट्र) में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।कथा के द्वितीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।कथा की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि सभी अपने धर्म के विषय में सबसे महत्वपूर्ण बात समझने की कोशिश करें कि जब तक जीवन में श्रृद्धा और विश्वास की ये दो डोरी नहीं होंगी, तब तक तुम्हारा इस पंथ पर चलना और ना चलना बराबर है। श्रृद्धा और विश्वास सबसे बड़ी बात है और जब ये दोनों साथ हों, तो असंभव भी संभव हो जाता है। धर्म की स्थापना करने के लिए भगवान बार-बार इस धरती पर आते हैं। जिन लोगों की वजह से अधर्म बढ़ता है उन लोगों को समझाने या फिर मिटाने के लिए भगवान आते हैं। जब उन्हें लगता है कि मेरे बिना भी काम चल सकता है तो वो अपने दूतों को भेजते हैं।

महाराज जी ने आगे कहा कि सभी कथाकारों या संतों को, जिनके आप प्रवचन सुनते हो, उन सभी को भगवान का श्रेष्ठ पुत्र समझना चाहिए। क्योंकि वो भगवान के कार्य और संदेश को आप लोगों तक पहुंचाते हैं। पशु योनियों में ना तो कोई नया पुण्य कर सकता है और ना ही पाप। इसमें ना तो किसी पुण्य का फल मिलता है और ना ही पाप का। मनुष्य योनि ही एक ऐसी योनि है जिसमें आप नित्य नए पाप और पुण्य कर सकते हैं। अपने द्वारा किए गए पाप और पुण्य का पूरा फल आपको भोगना ही पड़ेगा। पुण्य का फल श्रेष्ठ मानव जीवन है। श्रेष्ठ मानव या बुद्धिजीवी वहीं लोग हैं जो सिर्फ सत्कर्म में लगे हैं समझदार लोगों को मानव जीवन में पुण्य ही करना चाहिए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता। जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की, तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योंकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता पूरा कैलाश देख आईं पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते महाराज श्री ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया, तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान देकर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा कि श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी। उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारों ओर बांधता फिरता है और बार बार इस माया के चक्कर में धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जन्म मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।

24Dec 2019

कलयुग में संत गुरूदेव के विचार ही हमे तार सकते हैं : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

विश्व शांति सेवा समिति पुणे के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 24 से 31 दिसंबर 2019 तक प्रतिदिन महापौर निवास ग्राउंड, भेलपुरी चौक, निगड़ी प्राधिकरण पुणे (महाराष्ट्र) में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।
श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के प्रथम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। प्रथम दिवस की कथा की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि सभी के जीवन में कथा ही सार होना चाहिए। अपनी जिंदगी में अपने आप से महत्वपूर्ण प्रश्न जरूर करने चाहिए। जिंदगी से भागना नहीं चाहिए। हमें जिंदगी से कभी-कभी ये प्रश्न करने चाहिए कि आपके लिए सफल जीवन का क्या मतलब है? आपकी नजर में असफलता किसे कहते हैं। जिसके कहने से परमात्मा खड़ा रहे क्या उससे भी ज्यादा कोई सफल हो सकता है। गरीबी मिटाओ की तरह एक और आंदोलन चलना चाहिए कि बुराई हटाओ, बुराई हटाओ। गरीबी के साथ साथ बुराई हटाना भी जरूरी है। अपने आप से प्रश्न करना चाहिए कि आपकी नजर में जिंदगी की सफलता के क्या मायने हैं? दूसरा प्रश्न ये कि क्या आपने पृथ्वी पर आने का लक्ष्य पा लिया या पाने की कोशिश कर रहे हैं? एक प्रश्न ये भी उठता है कि आपका पृथ्वी पर आने का क्या उद्देश्य है? हमेशा अपने आपसे एक प्रश्न जरूर करें कि भगवान ने तुम्हें इस धरती पर भेजा है क्या तुमने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है? आप जो पाना चाहते हैं उसकी पात्रता आपमें होनी चाहिए। अगर ईश्वर कुछ दें तो वैसे पात्र बनो। ऐसे पात्र बनो कि कहीं भटकना ना पड़े। जब आप इन प्रश्नों को अपने आप से करने लगेंगे तो विश्वास करें कि आपको भागवत में आने की आवश्यकता नहीं होगी। हमेशा गलत को गलत और सही को सही कहें। किसी को भी दूसरों की जिंदगी में झांकने का अधिकार नहीं है। हमेशा अपनी जिंदगी को सुधारने लिए लड़ो।

पूज्य श्रीदेवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि भागवत का महात्यम क्या है? एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे। उन्होंने ये प्रश्न किया कि कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की, पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है? क्योंकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूलकर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए, तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने, गीता की सुनो और उसकी मानों भी। माँ-बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे, तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।
श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

23Dec 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने मुम्बई में विशाल श्रीमद भागवत कथा का सफल आयोजन करने के बाद पूज्य महाराज श्री ने मुम्बई के सिद्धि विनायक मंदिर में भगवान श्री गणेश के दर्शन कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया। और पुणे के लिए प्रस्थान किया।  

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने मुम्बई में विशाल श्रीमद भागवत कथा का सफल आयोजन करने के बाद पूज्य महाराज श्री ने मुम्बई के सिद्धि विनायक मंदिर में भगवान श्री गणेश के दर्शन कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया। और पुणे के लिए प्रस्थान किया।
 

24Dec 2019

आज पुणे, महाराष्ट्र में कथा से पूर्व पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में हनुमान मंदिर से कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई।

आज पुणे, महाराष्ट्र में कथा से पूर्व पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में हनुमान मंदिर से कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई। कलश यात्रा में हजारों की संख्या में माताओं - बहनों और भाई -बंधुओं ने भाग लिया। इस भव्य कलश यात्रा में सैंकड़ों माताएं बहने कलश उठाकर कथा पंडाल पहुंची। कलश यात्रा ढ़ोल नगाड़ों, के साथ बड़ी धूमधाम से निकाली गई। कलश यात्रा जिन मार्गों से होकर गुजरी वहां इस भव्य कलश यात्रा को देखने के लिए लोग थम गए, हर किसी ने इस अद्भुत यात्रा का आनंद लिया। महाराज श्री के सानिध्य में पुणे में 24 से 31 दिसंबर 2019 तक श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। सभी पुणेवासियों से निवेदन है की बढ़-चढ़कर कथा पंडाल में आकर कथा का रसपान करें।

20Dec 2019

“आनंद किसी का सेवक नहीं है, वो तो हृदय का राग है”: पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

“आनंद किसी का सेवक नहीं है, वो तो हृदय का राग है”: पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

विश्व शांति सेवा समिति मुंबई के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 15 से 22 दिसंबर 2019 तक प्रतिदिन बाला साहेब ठाकरे मैदान, ऑरेंज हॉस्पीटल के सामने, इंद्रलोक फेज-3, भायंदर मुंबई में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के पांचवे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

 

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि महाराज श्री ने कहा कि जन्म, जीवन वही धन्य है जो ठाकुर जी के उत्सव में बीत जाए। आनंद किसी का सेवक नहीं है। आनंद हृदय का राग है जो आनंद हृदय से लेना चाहता है उसी को मिलता है। अगर हमारा मन हरि के चरणों में बंध जाएं, तो इसकी बहुत सम्मान बढ़ जाएगा ।
महाराज श्री ने कहा कि आप दुनिया में आए हो तो क्या आप भगवान से छिप सकते हो, आप दुनिया से छिप सकते हो, घर वालों से छिप सकते हो, संसार में किसी से भी छिप सकते हो लेकिन भगवान से कभी नहीं छिप पाओगे। ऐसा कोई पर्दा नहीं बना जो आपको भगवान से छिपा ले, हर स्थिति में, हर जगह ठाकुर आपको देख सकते हैं, उससे बच नहीं सकते। महाराज श्री ने कथाक्रम बढ़ाते हुए कहा कि भक्ति के पथ में एक ही मार्ग पर चलना चाहिए, दो दिमाग से व्यक्ति यहां नहीं चल पाता है। कभी लोग ऐसे हैं जो कथा सुनने आते हैं और अपनी ही कथा लिख कर चले जाते हैं। तुम्हारा ईश्वर से सम्बंध बना नहीं, जिन संसार के रिश्तों से दुखी होकर यहां आए हो, यहां से भी एक रिश्ता बना कर जाते हो। आप यहां आये इस उद्देश्य के साथ की कथा सुनेंगे, ठाकुर जी को मनाएंगे, गोविंद के हो जाएंगे लेकिन यहां आए थे गोविंद को पाने और संसार को पाने में लग जाएं ये कपट है और ऐसे कपटि लोगों को भगवान की अनुभूति नहीं होती है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।
महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।

21Dec 2019

‘भागवत कथा जीवन का आनंद है, जीवन का फल है’- पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

‘भागवत कथा जीवन का आनंद है, जीवन का फल है’- पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा समिति मुंबई के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 15 से 22 दिसंबर 2019 तक प्रतिदिन बाला साहेब ठाकरे मैदान, ऑरेंज हॉस्पीटल के सामने, इंद्रलोक फेज-3, भायंदर मुंबई में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

आज कथा पंडाल में मीरा भायंदर महापौर श्रीमति डिंपल मेहता जी, भाजपा नगर सेवक श्री हसमुख गहलोत जी, नगर सेविका डॉ प्रीति पाटिल और नगर सेवकश्री अरविंद शेट्टी जी और प्रवासी संदेश समाचार के संपादक अरुण उपाध्याय जी ने अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आर्शीवाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जीवन के अच्छे दिन कब निकल जाते हैं पता नहीं चलता। वो दिन अच्छे होते हैं जो भगवान के साथ और भगवान के चरणों में व्यतीत हों। संसार में रहकर कितने ही दिन व्यतीत कर लो, बहुत मुश्किल होती है। भागवत कथा जीवन का आनंद है, जीवन का फल है। जिन्हें मानव जीवन मिल गया हो, उन्हें भगवान से और भगवान की कथा से बहुत कुछ मिलता है। भागवत कथा से जुड़े रहना चाहिए और इसी में जीवन की सफलता है।

आज जिस तरह से हमारे देश में मानसिकता बिगड़ती जा रही है उस मानसिकता में ऐसे आयोजन की बहुत आवश्यकता है। ताकि हम अपनी पुरानी पुरातन पद्धति को समझे, उसे पहचाने। जिस राजा के राज्य में प्रजा धार्मिक होती है उस राज्य में चोरी चकारी जैसे बुरे काम नहीं होते। जब से हमें सेक्युलर वाला सिक्का मिल गया है और उसे जब से हमने अपनी जेब में डाला है तब से हमारे देश और समाज को कुछ होता जा रहा है। धर्म की निंदा करने में हम अपनी शान समझते हैं। वो बड़ा नेता बन जाता है जो धर्म को उल्टा बोलता है, अनुचित बोलता है। वर्तमान में देश में बहुत गलत काम हो रहे हैं। हमें धार्मिक होना ही चाहिए। धर्म के विषय में हमें समझना ही चाहिए।
महाराज जी ने नागरिकता संशोधन कानून पर बोलते हुए कहा कि देशभर में लोग बुरे तरीके से कानून के खिलाफ व्यवहार कर रहे हैं। जबकि सच यह है कि ये कानून देश के नागरिकों के लिए बिल्कुल भी नुकसानदायक नहीं है। हमें उस कानून का सम्मान करना चाहिए। जितने भी अन्य धर्मों के गुरु हैं उनसे प्रार्थना है कि अपने समाज के लोगों को समझाएं कि सड़कों पर आगजनी ना करें, सरकारी वस्तुओं को ना जलाएं। अपनी बात को पहुंचाने के लिए शांतिपूर्वक आंदोलन करें। सभी भाईचारे को बनाएं रखें।
पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनों में कौन व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।

17Dec 2019

“लोग दुर्भाग्यशाली होते हैं जो भगवान की कथा से दूर भागते हैं” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

“लोग दुर्भाग्यशाली होते हैं जो भगवान की कथा से दूर भागते हैं”

विश्व शांति सेवा समिति मुंबई के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 15 से 22 दिसंबर 2019 तक प्रतिदिन बाला साहेब ठाकरे मैदान, ऑरेंज हॉस्पीटल के सामने, इंद्रलोक फेज-3, भायंदर मुंबई में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

दूसरे दिन की भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया गया।

कथा के दूसरे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि चित जिसका चिंतन करता है, वो बदल जाता है। जो हम चिंतन करेंगे, श्रवण करेंगे, वहीं जीवांत स्थिति के अलावा सोने के दौरान भी बना रहता है, वही चिंतन वही मनन बना रहता है।

महाराज श्री ने कहा कि हमेशा भगवान का नाम स्मरण करते रहने का लाभ है जितना भगवान का नाम आप जाग्रत अवस्था में लेंगे, चित्त उसमें रमण करने लगेगा। चित्त जब उसमें रम जाएगा, तो आप चाहे क्यों ना सो जाएं, लेकिन आपका मन नहीं सोएगा। मन लगातार चिंतन करता रहेगा। इसलिए एक भी क्षण ना गंवाए, जब भी अवसर मिले, हरिनाम स्मरण, भगवत कथा का स्मरण और जाप करते ही रहना चाहिए।

 

महाराज श्री ने आगे कहा कि वो लोग दुर्भाग्यशाली होते हैं जो भगवान की कथा से दूर भागते हैं उनका नाम नहीं जपते हैं और महेशा दूसरों कामों में ही लगे रहते हैं। हालांकि हर कोई संत नहीं बन सकता और हर किसी का कल्याण नहीं हो सकता। अगर संसार को हम लंका समझे, तो हमें उसमें अपने आप को विभीषण बनाकर रखना चाहिए। लंका में भी राम भक्ति होती है। आप पर निर्भर करता है कि आप लंका में रहकर रावण के विचारों को अपनाते हो या फिर लंका में रहकर राम की भक्ति करते हों। राम एक संकल्प प्रभु है वहीं राम सत्य संकल्प है। भगवान के नाम का आश्रय जीव को किसी भी तरह ले लेना चाहिए। भागवतम का ये कथा अमृत जब जब मिले, बिना कुछ सोचे समझे स्वीकार कर लेना चाहिए। जो लोग मनी माइंडेड होते हैं वो ना रिश्तों को मानते हैं ना भक्ति को और ना ही गोविंद को। उनके लिए पैसा ही सबकुछ है। लेकिन जो लोग गोविंद को मानते हैं वो ये जानते हैं कि भक्ति में ही शक्ति है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं।

भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।

यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।

 

18Dec 2019

‘अगर आप धर्म के साथ जीते हैं तभी आप मानव कहलाओगे’ पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

‘अगर आप धर्म के साथ जीते हैं तभी आप मानव कहलाओगे’

विश्व शांति सेवा समिति मुंबई के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 15 से 22 दिसंबर 2019 तक प्रतिदिन बाला साहेब ठाकरे मैदान, ऑरेंज हॉस्पीटल के सामने, इंद्रलोक फेज-3, भायंदर मुंबई में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

कथा के तृतीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। कथा की शुरूआत भागवत आरती एवं विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि अगर धन की स्थिति धर्म हो जाए तो क्या कहने, जो धर्मयुक्त है वही सद्ग्रहस्थी है। जिसके जीवन में धर्म नहीं है उसे सद्ग्रहस्थी नहीं कह सकते। अगर आप धर्म के साथ जीते हैं तभी आप मानव कहलाओगे। आध्यात्मिक जीवन ही मानव बनाता है। धर्म, अर्थ, काम मोक्ष यही सनातन धर्म की परंपरा है। इसे ही हमारे ऋषि मुनियों ने सिखाया है। हमें इसी का पालन करना चाहिए। अपने धर्म के अनुसार आचरण करने से ही धर्मात्मा कहलाते हैं और जो मनगढ़ंत प्रयोग करते हैं तब धर्मात्मा नहीं, पाखंडी कहलाओगे।

 

धर्म मनगढ़ंत नहीं होता। आजकल की बड़ी समस्या है कि जो मन में आ जाए, हम उसी को धर्म मान लेते हैं। स्वंयभू नहीं बनना चाहिए। अगर हम धार्मिक हैं तो हम धार्मिक तभी बनेंगे, जब हमें ले मान लिया जाए कि हम इसलिए धार्मिक हैं क्योंकि हम धर्म का अनुकरण करते हैं, पालन करते हैं और उसपर चलते हैं। जब व्यक्ति अपनी मौत भूल जाता है तो वह पाप करता है। अगर उसे मौत याद हो, तो वह पाप नहीं करेगा।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।

राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।

19Dec 2019

मुंबई में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस से पूर्व युवा शांति संदेश एवं गुरु दीक्षा समारोह का आयोजन किया गया।

मुंबई में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस से पूर्व युवा शांति संदेश एवं गुरु दीक्षा समारोह का आयोजन किया गया। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने सभी भक्तों को गुरू दीक्षा प्रदान की एवं दीक्षा प्राप्त करने आये हुए भक्तों को अपने श्रीवचनों से अलंकृत किया जिसमें सैकड़ों युवा सम्मिलित हुए। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने युवा पीढ़ी को संदेश देते हुए कहा कि हमेशा भारतीय संस्कृति और धर्म की रक्षा करना चाहिए, भारतीय संस्कार को कभी कभी नहीं भूलना चाहिए। हमेशा गुरूजनों, माता पिता और भगवान का आदर-सत्कार करना चाहिए, सत्य वचन बोलना चाहिए। साथ ही युवाओं को देश और संस्कृति की रक्षा के लिए सदैव आगे आना चाहिए। इस दौरान युवाओं ने पूज्य महाराज श्री से आध्यात्मिक एवं सामाजिक विषयों पर सवाल भी किए जिनका महाराज जी ने बड़े प्रेमपूर्वक उत्तर दिया।

 

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

19Dec 2019

‘हमेशा मानव जीवन का सदुपयोग करें, दुरूपयोग नहीं’ - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

‘हमेशा मानव जीवन का सदुपयोग करें, दुरूपयोग नहीं’ - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा समिति मुंबई के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 15 से 22 दिसंबर 2019 तक प्रतिदिन बाला साहेब ठाकरे मैदान, ऑरेंज हॉस्पीटल के सामने, इंद्रलोक फेज-3, भायंदर मुंबई में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।
श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
आज कथा पंडाल में मीरा भायंदर के प्रथम विधायक गिल्बर्ट सेठ ने गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आर्शीवाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।
भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

 


पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि गोविंद की कृपा से प्राप्त ये मानव जीवन बड़ी मुश्किल से मिला है। कहा गया है कि ये दुर्लभ है। या तो इंसान इसका सदउपयोग करे लें या दुरूउपयोग कर लें। अधिकांश व्यक्ति माया के जाल में आकर सुंदर जीवन का दुरूपयोग ही करता है। लेकिन अगर संतसंग में पहुंच जाएं और वो समझ आ जाएं। प्रभु की कृपा के बिना वो सुलभ नहीं है। अगर ईश्वर कृपा कर दें, तो उसका सदुपयोग करना चाहिए। मानव इतना दुर्लभ है कि देवताओं को भी नहीं मिलता। जो देवताओं को भी नहीं मिलता, वो हमें प्राप्त है। हमेशा मानव जीवन का सदुपयोग करें, दुरूपयोग नहीं। मानव जीवन का सदुपयोग एक ही है कि भगवान की कथा, उनका भजन और उन्हें प्राप्त करने की दिव्य लालसा।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।
महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।
शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।
इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने विष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।
दूसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।
महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंसा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

16Dec 2019

“ज्ञानयुक्त होकर जीवन को जीना है उन्हें गीता का पाठ करना चाहिए” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा समिति मुंबई के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 15 से 22 दिसंबर 2019 तक प्रतिदिन बाला साहेब ठाकरे मैदान, ऑरेंज हॉस्पीटल के सामने, इंद्रलोक फेज-3, भायंदर मुंबई में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जिस मानव जीवन में कृष्ण भक्ति ना हो, वो अभाग्यशाली है और जिसके जीवन में गुरूप्रदत्त श्रीकृष्ण मंत्र हो, उससे बड़ा भाग्यशाली संसार में कोई नहीं है। कृष्ण भक्ति के लिए देवता भी तरसते हैं अगर वहीं कृष्ण भक्ति हमें सहजता से प्राप्त हो जाए, तो हमसे बड़ा भाग्यशाली संसार में कोई नहीं है।

महाराज श्री ने कहा कि कलयुग का व्यक्ति भाग्यहीन, अल्प आयु और रोगग्रस्त है इसलिए मंदबुद्धि भी है। मंदबुद्धि वाले लोग ज्यादा सोच नहीं पाते और ना सोच समझकर काम करते हैं। भाग्य में जो भी लिखा है वो अवश्य मिलेगा। लेकिन अगर भाग्य में नहीं है, तो चाहे कितनी भी कोशिश कर लो, नहीं मिलेगा। इंसान को लालची नहीं संतोषी होना चाहिए।

महाराज जी ने आगे कहा कि आत्मा की जिम्मेदारी है कल्याण करा देना। अगर हमने अपने कल्याण के बारे में नहीं सोचा तो कुछ भी पा लो सबकुछ व्यर्थ है। जो मर्यादित जीवन जीना चाहते हैं वो रामायण पढ़े और जो कृष्ण भक्ति में नाचते हुए झूमते हुए जीवन जीना चाहते हैं वो भागवत पढ़े। जिन्हें भगवान की अजीवन सेवा करनी है उन्हें हनुमान चरित्र पढ़ना चाहिए और जिन्हें ज्ञानयुक्त होकर जीवन को जीना है उन्हें गीता का पाठ करना चाहिए।

महाराज श्री ने भागवत कथा की प्रथम श्लोक सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे! तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नम:..... के उच्चारण के साथ की। उन्होंने श्लोक का अर्थ समझाते हुए कहा की जो सत्य नित्य निरंतर जिनके स्वरूप को प्राप्त करके सत्य होता है, जो नित्य निरंतर हैं। जब शृष्टि नहीं थी तब भी वो थे, जब शृष्टि नहीं रहेगी तब भी वो रहेंगे, सत्य कहते ही उसको हैं जो नित्य निरंतर होता है, जो कभी नहीं मिट सकता। एक ब्रह्म सत्य है, एक कृष्ण सत्य है बाकी सब मिथ्या है। इसका एक प्यारा सा भाव समझे तो वो ये है की जिसका चित्त जिसके वश में है, हमारा चित्त हमारे वश में नहीं है, हमारा चित्त हमें भटकाता रहता है लेकिन उनका चित्त उनके वश में रहता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। .

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

15Dec 2019

“जिसका चित्त उसके वश में है वो सच्चिदानंद है पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

“जिसका चित्त उसके वश में है वो सच्चिदानंद है पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

जिन्हें धर्म से प्रीति होती है धर्म उन्हें एक अच्छे रहा तक लेकर जाता है। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

“पुरे विश्व में एक ही धर्म है सनातन धर्म” - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा समिति मुंबई के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 15 से 22 दिसंबर 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 3:30 बजे से 7 बजे तक, स्थान - बाला साहेब ठाकरे मैदान, औरेंज हॉस्पिटल के सामने, इंद्रलोक फेज-3, भायंदर ईस्ट-मुम्बई में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

आज कथा पंडाल में महापौर श्रीमती डिंपल मेहता ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं व्यासपीठ से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को "बिन पिये नशा हो जाता है जब सुरत देखू मोहन की " भजन श्रवण कराया।

भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई। दीप प्रज्वलित महाराज श्री के करकमलो से और महापौर श्रीमती डिंपल मेहता जी, आयोजक समिति द्वारा किया गया। भव्य गणेश वंदना कर कथा की शुरुआत की गई।


पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा "अच्छे लोगों के साथ ही बुरा क्यों होता है" ? भक्ति करें तो हमें शक्ति क्यों नहीं मिलती, श्रीमद्भागवत कथा हमें किन - किन नियमों के साथ सुननी चाहिए? महाराष्ट्र के कुछ भक्तों की चर्चा आज हम जरूर करेंगे। और उन भक्तों के चरित्रों से सीखेगें की भक्ति किसको कहते है। महाराज जी ने कहा की आपने देखा होगा की आप लोग जो पूजा पाठ भक्ति करते है उसका जो फल मिलना चाहिए वो नहीं मिलता है। क्यों नहीं मिलता है? अच्छी धारणा रखने वाले को श्रीमद भागवत कथा जरूर प्राप्त होती है। "सनातन धर्म ही है जो पूरे विश्व की शांति चाहता है"। लेकिन शांति चाहने वाले भी कभी - कभी क्रांति करते है। जब उन्हें शांति से न भक्ति करने दी जाती है। न उन्हें बैठने दिया जाता है। तब वो क्रांति करते है। दूसरे की वस्तु, दूसरे का हक़ कभी नहीं लेना चाहिए। आपको जो मिला उसमे ही प्रसन्न रहना चाहिए जब दूसरे की चीज पर अतिक्रमण करते हो न तुम्हारा भी छीनने का डर प्रारम्भ हो जाता है। भोजन, पैसा ये सब जीवन के लिए है लेकिन जीवन अगर रोगी हो जाएं तो ये किसी काम का नहीं, तो पहला काम क्या करें ? पहला सुख निरोगी काया। महाराज श्री ने कहा की लोग कहते है माया नगरी लेकिन जब - जब मैं मुंबई आया मुझे दिखती है यह माधव की नगरी। यहाँ पर अपार भक्तों का आनंद दीखता है, यहाँ भक्तों की जो श्रद्धा है अजब की है। जो भक्ति का नशा करते है उन्हें और किसी नशे की आवश्यकता नहीं पड़ती।

महाराज जी ने कहा की आप हमेशा भागवत कथा सुनते रहिए, ऐसा नहीं की एक बार सुन लिया तो अब से सुनना ही छोड़ दिया। जैसे सत्संग की पहली शर्त बैठ जाओ तो फिर बोलो मत, आप सत्संग में जाकर चर्चा न करें। वहां हरि चर्चा हो रही है उसे सुने। सत्संग में जाने के बाद भी अगर आप अपनी चर्चा कर रहे है ,इसका मतलब आपका हरि चर्चा में ध्यान नहीं है। और अगर अवसर मिलने पर भी हरि चर्चा में आपका मन न हो तो एक बात समझ लेनी चाहिए। दुर्भाग्य ही है सौभाग्य नहीं है। महाराज जी बताया की एक गरीब आदमी के हाथ में पारस लग जाएं। पारस में एक छमता होती है की किसी भी लोहे को टच होने पर उसे सोना बना सकता है। महाराज श्री ने भागवत कथा की प्रथम श्लोक सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे! तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नम:..... के उच्चारण के साथ की। उन्होंने श्लोक का अर्थ समझाते हुए कहा की जो सत्य नित्य निरंतर जिनके स्वरूप को प्राप्त करके सत्य होता है, जो नित्य निरंतर हैं। जब शृष्टि नहीं थी तब भी वो थे, जब शृष्टि नहीं रहेगी तब भी वो रहेंगे, सत्य कहते ही उसको हैं जो नित्य निरंतर होता है, जो कभी नहीं मिट सकता। एक ब्रह्म सत्य है, एक कृष्ण सत्य है बाकी सब मिथ्या है। इसका एक प्यारा सा भाव समझे तो वो ये है की जिसका चित्त जिसके वश में है, हमारा चित्त हमारे वश में नहीं है, हमारा चित्त हमें भटकाता रहता है लेकिन उनका चित्त उनके वश में रहता है।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

15Dec 2019

कलश यात्रा मुंबई 2019

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में हनुमान मंदिर-नवघर रोड़ से कथा स्थल (भायंदर ईस्ट-मुम्बई ) तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई। इस कलश यात्रा में हजारों की संख्या में माताओं-बहनो और भाई-बंधुओं ने भाग लिया। कलश यात्रा ढ़ोल नगाड़े के साथ निकाली गई।

 

कलश यात्रा जिन मार्गों से होकर गुजरी वहां इस भव्य कलश यात्रा को देखने के लिए लोग थम गए, हर किसी ने इस अद्भुत यात्रा का आनंद लिया। जहां तक दृष्टि जा रही थी वहाँ तक माताएं-बहने कलश सिर पर लिए दिख रही थी।
कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

14Dec 2019

जो जीव धर्म की रक्षा करता है धर्म उसकी रक्षा करता है”।

“जो जीव धर्म की रक्षा करता है धर्म उसकी रक्षा करता है”

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति सोलापुर के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 7 से 14 दिसम्बर 2019 तक स्व. लिंगराज बालईरय्या वल्याव्ठ क्रीडांगण, सोलापुर महाराष्ट्र में प्रतिदिन
श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि अच्छे कर्मों की वजह से ही समाज टिका है, संसार टिका है। संसार को चलाने के लिए अच्छे लोग और अच्छे कर्म की जरूरत है। लगातार अच्छे कर्म करते रहना चाहिए, उन्हें कभी नहीं छोड़ना चाहिए।

महाराज जी ने आगे कहा कि अच्छे कार्यों में एक अच्छा कार्य श्रीमद् भागवत कथा सुनना और उससे भी बड़ा कार्य है भागवत कथा का आयोजन कराना। धन के रूप से आप बड़े नहीं होते, बल्कि दिल के रूप से बड़ा होना चाहिए। ऐसा करके आप कुछ भी कर सकते हैं। जीवन धर्म के लिए मिला है, धन के लिए नहीं। धन केवल एक माध्यम है मंजिल नहीं, धर्म मंजिल है। जो जीव धर्म की रक्षा करता है निश्चित धर्म उसकी रक्षा करता है।

 

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची।

उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

14Dec 2019

“सदैव सत्य बोलें, सत्य से चरित्र का निर्माण होता है”पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

“सदैव सत्य बोलें, सत्य से चरित्र का निर्माण होता है”

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति सोलापुर के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 7 से 14 दिसम्बर 2019 तक स्व. लिंगराज बालईरय्या वल्याव्ठ क्रीडांगण, सोलापुर महाराष्ट्र में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया गया।

कथा के अष्टम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

कथा के अष्टम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि ऐसे लोगों के लिए जीवन महत्वपूर्ण है जो जीवन का सदुपयोग करते हैं। युवाओं को संदेश देते हुए कहा कि जिंदगी एक ही है और उसे सिर्फ पाकर खो देना, सही नहीं है। किसी भी कार्य को सोच समझ ही करे, सोच समझकर जीवन के उद्देश्य तय करे आगे बढ़े। जब आप सोच समझकर तय करेंगे, तो आप जीवन को खोयेंगे नहीं बल्कि आनंद लेंगे। कुछ चीजें हमें बड़ों से सीख लेनी चाहिए उसी में लाभ है, कोई भी फैसला जल्दबाजी में ना ले।

 

महाराज श्री ने आगे कहा कि जीवन जीने के साथ साथ अपने धर्म को जाने बगैर एक भी पल बर्बाद ना करें। निश्चित तौर पर जीवन आपका ही है पर आपका ही नहीं है इसपर परम पिता परमात्मा, माता पिता, देश, समाज और आत्मा का अधिकार है। जो सही हो उसे करने से नहीं चूकना चाहिए और जो गलत हो उसे मना कर देना।

महाराज श्री ने कहा कि धर्म के बिना जीवन शून्य है। अगर जीवन में धर्म नहीं, तो आप कुछ नहीं हैं। धर्म के साथ जीवन जीना चाहिए। जिन घरों में बच्चे धार्मिक होते हैं उनके घरों में धर्म युवा होता है, धर्म जवान होता है। आध्यात्मिक जगत में जीवन का उद्देश्य 84 लाख योनियों से मुक्ति पा लेना है। कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए हमेशा सत्य बोलना चाहिए। जब जब आप सत्य बोलते हैं भगवान को प्रिय लगते हैं। सत्य से चरित्र का निर्माण होता है। झूठ नहीं हमेशा सत्य को स्वीकार करना चाहिए। हालांकि सत्य थोड़ा परेशान करता है लेकिन सच्चा सुख भी यही देता है। जीवन को काटना नहीं, जी भरकर प्रसन्नता के साथ जीना चाहिए। दुनिया भी बड़ी विचित्र है, सत्य बोलो तो झूठ लगता है और झूठ बोलो को सत्य लगता है। हमारा समाज भी ऐसा हो गया है कि सत्य स्वीकार करना नहीं चाहता। हमारे देश की व्यवस्था अब सत्य स्वीकार करने के लिए नहीं है। ऐसा समाज होना चाहिए कि अगर कोई गलती करें, तो उसे स्वीकार करें।

महाराज श्री ने कहा कि सबसे बड़ा अपराध है चोरी करना और उससे बड़ा अपराध है असत्य बोलना। सत्य बोलकर अगर कोई समाज स्वीकार ना करें, इसमें समाज का भी दोष है। युवाओं को संदेश देते हुए महाराज जी ने कहा कि अपने जीवन में सत्य को स्वीकार करो। आजतक भगवान राम की पूजा इसलिए की जाती है क्योंकि राम जी ने अपने जीवन में कभी झूठ नहीं बोला। महाराज जी ने आग्रह करते हुए कहा कि हम राम तो नहीं बन सकते लेकिन राम के बताए मार्ग पर जरूर चल सकते हैं। राम के आदर्शों पर चलने की कोशिश करनी चाहिए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में आए लोगों के सवालों का उत्तर भी दिया। लोगों ने पूज्य महाराज श्री ने आध्यात्मिक एवं समाजिक जीवन से जुड़े कई प्रश्न किए जिसका महाराज श्री ने बड़े ही सरल शब्दों में उत्तर दिया।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

12Dec 2019

सत्य सनातन धर्म ही इस देश की जड़ है- पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

सत्य सनातन धर्म ही इस देश की जड़ है- पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज


विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति सोलापुर के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 7 से 14 दिसम्बर 2019 तक स्व. लिंगराज बालईरय्या वल्याव्ठ क्रीडांगण, सोलापुर महाराष्ट्र में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।
श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।
कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत कहा कि सुखी वही है जिन्होंने अपने जीवन की बागडोर भगवान के चरणों में सौंप दी है। जो अपने आप खींचने में लगे है उनसे ज्यादा दुखी कोई नहीं है।
महाराज श्री ने कहा कि भारत में सभी धर्म के लोग रहते हैं और सभी को समझने की जरूरत है कि सत्य सनातन धर्म ही इस देश की जड़ है। भारत सभी धर्म के लोगों का आदर करता है। लेकिन कभी भी किसी को सत्य सनातम धर्म की अवहेलना नहीं करनी चाहिए। फिर चाहे वो इस देश का नागरिक हो या देश की कोई पार्टी हो। जिस देश में हमने जन्म लिया है उस देश की संस्कृति और सभ्यता का आदर करना चाहिए। वरना भगवान कभी माफ नहीं करेंगे। हमें अपने देश का सम्मान और संस्कृति का आदर करना चाहिए। जिसका कोई नहीं है उसका भगवान होता है, भारत है, भारत माता है।
महाराज जी ने आगे कहा कि सन्यास उसी को दिलाया जाएगा, जो गृहस्थ नहीं होगा। दूसरा अगर कोई गृहस्थी, सन्यास लेना चाहता है तो उसके लिए शर्त है कि उसमें उसकी पत्नी की स्वीकृति होनी चाहिए। बिना पत्नी की स्वीकृति के सन्यास नहीं ले सकते।
महाराज श्री ने कहा कि हम वही सुनना चाहते हैं जो हमारे मतलब का है, वो नहीं जो हमारे मतलब का नहीं। अपने धर्म में, अपने भगवान और गुरू से कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए। हमें अपने जीवन में सत्य को निश्चित रखना चाहिए, सत्य का त्याग उचित नहीं। अपने गुरू, गोविंद और संतों से कपट नहीं करना चाहिए। जीवन में कपट का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। धर्म को अपने सामर्थ के अनुसार करना चाहिए। जो व्यक्ति जितने बड़े व्यक्तित्व से कपट करता है उसका फल उसे वैसे ही भोगना पड़ता है। बड़ों से आदर से बात करने का रवैया होना चाहिए। धर्म से पूरा देश, पूरी दुनिया टिकी है इसलिए साधु, संत, महात्मा, गोविंद उनकी पूजा जरूर करनी चाहिए।
महाराज श्री ने सुप्रीम कोर्ट के द्वारा राम मंदिर की पुर्नविचार याचिका खारिज किए जाने पर बोला की अयोध्या सिर्फ राम मंदिर बनना चाहिए और इसलिए मेरे राम चाहते है राम के चाहने का एक मूल कारण आज फिर से राम की इच्छा प्रकट हुई है और सुप्रीमकोर्ट ने उस पुन्रविचार याचिका को ख़ारिज कर दिया है। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट का बहुत बहुत धन्यवाद।
महाराज श्री ने कहा कि जिस देश में रहकर हम लोगों को जन्म मिला है, जीवन जी रहे है या हमारी मट्टी भी इसी मट्टी में मिलेगी। उस देश, उस देश की संस्कृति और उस देश की सभ्यता का आदर कीजिये वरना हम लोग जिन्हे अपना भगवान कहते है वो भी कभी माफ़ नहीं करेंगे। हमें अपने देश, देश की संस्कृति का सम्मान करना चाहिए। हमें ये समझना चाहिए भाईचारा भी दोनों तरफ से निभाया जायेगा। एक तरफ से नहीं।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।
श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।

11Dec 2019

“सत्य का मतलब है धर्म और धर्म का मतलब है सत्य”

“सत्य का मतलब है धर्म और धर्म का मतलब है सत्य”

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति सोलापुर के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 7 से 14 दिसम्बर 2019 तक स्व. लिंगराज बालईरय्या वल्याव्ठ क्रीडांगण, सोलापुर महाराष्ट्र में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के पांचवे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

आज कथा पंडाल में पंडलपुर से पूज्य श्री वासुदेव उत्पाद जी महाराज, श्री मदन हरीदास जी महाराज एवं बिठ्ठल रुक्मणि मंदिर के अधिकारी श्री बिठ्ठल जोशी जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई एवं व्यास पीठ से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को " राधा कृष्ण रतिर्मम " भजन श्रवण कराया।
पंडित श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि "भगवान की भागवत साक्षात् भगवान श्री कृष्ण ही है।" जब भागवत जी की आरती हो तो हमें ऐसा लगना चाहिए की हम स्वयं आरती करने के पहले उपस्थित हुए है। उन्होंने कहा कि सत्य से धर्म की रक्षा होती है पूर्वकाल में अदिकांश व्यक्ति सत्य भाषण करने वाले होते थे इसलिए उन कालों में धर्म अपने चरम पर था। जिन - जिन कालों में असत्य भाषण का प्रयोग किया गया, वहां - वहां धर्म कमजोर हुआ। जो जीव जो मनुष्य अपने जीवन में परिवार में, घर में ,समाज में अपने देश में धर्म की रक्षा करना चाहतें है उन्हें सबसे पहला काम करना चाहिए की पने जीवम में सत्य का प्रयोग करना चाहिए, असत्य का परित्याग करना चाहिए।

 

महाराज श्री ने आगे कहा कि रामायण प्रमाण देती है की कितना महात्म है सत्य का। प्राण देना स्वीकार है, असत्य भाषण करना स्वीकार नहीं, मेरा वचन झूठा नहीं होना चाहिए। वजह हमें असत्य सिर्फ हमें इसी जन्म में दुखी नहीं करता है अपितु असत्य वादी जीव बहुत जन्मों तक कष्ट उठाता है। जिस-जिस जन्म में जाता है असत्य भाषण, असत्य वचन उसे दु:खी रहता है इसलिए वेदो में कहां गया सत्य वचन ही श्रेठ है।

महाराज श्री ने कहा कि और भागवत में तीन वार आदि, मंत्र, यन्त्र प्रारम्भ ही सत्य से हुआ था। आदि, मध्, अंत सत्य से भरा हुआ है भागवत ग्रन्थ। "सत्य का मतलब है धर्म और धर्म का मतलब है सत्य" आज हम लोगो के पास साधन है पर धर्म नहीं है इसलिए व्यक्ति दुखी है। "सत्य बोलने का मतलब है आपकी सुरक्षा" इसलिए आज से अभी से सत्य बोले। जो प्राणी सत्य बोलते है वो धर्म की रक्षा करते है। सत्य ही है जो धर्म की रक्षा करते है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।
भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।

8Dec 2019

“कथा का भी उद्देश्य यही है धर्म की स्थापना : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

“कथा का भी उद्देश्य यही है धर्म की स्थापना : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

“कथा जीव को ईश्वर का बना देती है : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

“जीवन में गुरूर नहीं, गुरू की जरूरत है : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति सोलापुर के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 7 से 14 दिसम्बर 2019 तक स्व. लिंगराज बालईरय्या वल्याव्ठ क्रीडांगण, सोलापुर महाराष्ट्र में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया गया।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

आज कथा पंडाल में सोलापुर महापौर श्रीमती येन्नम कांचना जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को "तेरे नाम की धुन लागी तू मोहन मुरली वाला" भजन श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान विठल की असीम अनुकंपा इस क्षेत्र पर है,भगवान की कृपा का दर्शन हम पर है इसका दर्शन करना हो तो कैसे करें ? महाराज ने कहा हमारा चित्त अगर भगवान की कथानों में, भजन, संत सेवा, में लगे तो हमको समझना चाहिए। की भगवान की पूर्ण कृपा हमारे ऊपर है। उसी की दर्शन ये है की हम सभी के मन कथाओं में लग रहा है। और हमें कथा सुनने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है। रसिकजंतु यहाँ तक भी कहते की आप से अच्छी आपकी कथा है। इसीलिए इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है श्री हनुमान जी महाराज। जब भगवान अपनी लीला पूरी करके अपने धाम जा रहे थे। हनुमान जी से बोले चलो तब हनुमान जी बोले अब नहीं जायेंगे बोले क्यों, बोले आपके धाम में आप तो होंगे पर आपकी कथा नहीं। और इस मृत्युलोक एक बिशेषता है ? और वो बिशेषता ये है यहाँ भगवान भी है और भगवान की कथा भी। ये बिशेषता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा क्रम बढ़ाते हुए कहा की "कथा का भी उद्देश्य यही है धर्म की स्थापना" , "भगवान का भी उद्देश्य यही है धर्म की स्थापना" कथा जीव को ईश्वर का बना देती है। जब जीव मन से कथा सुनता है, तो वह ईश्वर का बन जाता है, कथा उसके हृदय में भक्ति जागृत करती है, भगवान बिना प्रेम बिना - बिना भक्ति के नहीं मिलते। भगवान से मिलाने का कार्य भगवान की कथा करती है और जो कथा देवताओं के लिए दुर्लभ है मुश्किल है जिस कथा को देवता भी नहीं सुन सकते सुकदेव जी महामुनि ने जिन देवताओं को बापस कर दिया। तुम जाओं यहां से तुम्हे कथा नहीं सुनाई जाएगी। ये कथा किसका बिषय है ? बोले ये भक्तों का बिषय है। भगवान में और भगवान के भक्तों में कतई अंतर नहीं करना चाहिए। जो अंतर करता है वो भगवान से मिलने युक्त नहीं है। जैसे भक्त भगवान की सेवा करते है बैसे भक्तों की सेवा, आदर सम्मान से करनी चाहिए। उन्होंने आगे कहा की जीवन में गुरूर नहीं गुरू की जरूरत है और गुरू ऐसे नहीं की कंठी ले ली और फिर झांके ही नहीं। ये सत्संग होता ही उसके लिए है यहां सुनो, पढ़ो और आगे बढ़ो।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं।
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।

9Dec 2019

“सौ काम छोड़कर भोजन करें और एक लाख काम छोड़कर भजन करें”

“सौ काम छोड़कर भोजन करें और एक लाख काम छोड़कर भजन करें”

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति सोलापुर के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 7 से 14 दिसम्बर 2019 तक स्व. लिंगराज बालईरय्या वल्याव्ठ क्रीडांगण, सोलापुर महाराष्ट्र में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया गया।

श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया ।

कथा के तृतीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
कथा की शुरूआत भागवत आरती एवं विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

 

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि गोविंद की कृपा अगर हम पर हो तो उसका यह दर्शन है की हम कथा में अपना मन लगाएं। अपने गृह काज को त्यागकर गोविंद की कथा में सम्मिलित हों। निश्चित तौर पर आप यहां अपनी मर्जी से नहीं आ सकते, आना तो लोग चाहते हैं लेकिन आ नहीं पाते हैं, यहां वही आते हैं जिनको श्याम बुलाते हैं।

महाराज श्री ने आगे कहा कि सौ काम छोड़कर इंसान को भोजन करना चाहिए लेकिन आजकल भोजन भी चैन से नहीं करते हैं। जीवन भर भोजन के लिए कमाते हैं और कमाने के चक्कर में भोजन को ही छोड़ देते हैं। किसी से पूछो की इतनी मेहनत क्यों करत हो तो कहते हैं पापी पेट का सवाल है और उसी पेट के लिए तुम ढ़ंग से भोजन नहीं कर सकते। अन्न भगवान का स्वरूप है, इसिलिए भोजन करते हैं शांति का, प्रेम का दर्शन करना चाहिए। याद रखें सौ काम छोड़कर भोजन करना चाहिए, एक लाख काम छोड़कर भजन करना चाहिए और दुनिया का सारा काम छोड़कर भगवान की भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए । भोजन आपका साथ तब तक देगा जब तक यह शरीर है लेकिन भजन आपका साथ इस शरीर के साथ भी देगा और शरीर ना रहने के बाद भी देगा।

महाराज श्री ने कहा कि जो आपके मुंह पर आपकी बढ़ाई करे उससे ज्यादा सावधान रहिए क्योंकि जो आपकी निंदा करता है उसका तो आपको पता है की वो आपकी बुराई कर रहा है तो आप अपने आप को बदलोगे लेकिन जो आपको सुना कर आपकी बढ़ाई कर रहा है, प्रशंसा कर रहा है उससे कैसे बचोगे ? कानों को प्रशंसा प्रिया है। आप अपने कानों से निंदा भी सुनने की आदत डालिए। हमेशा अपनी प्रशंसा ही सुनते रहोगे तो कभी मुश्किल समय आएगा तो परेशान हो जाओगे।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।

राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।

10Dec 2019

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज सोलापुर के राजीव गांधी मेमोरियल स्कूल फॉर द ब्लाईंड में पहुंचे। पूज्य महाराज श्री ने वहां बच्चों से भेंट की एवं बच्चों के साथ समय बिताते हुए उनसे पढ़ाई लिखाई के सम्बंध में चर्चा की।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज सोलापुर के राजीव गांधी मेमोरियल स्कूल फॉर द ब्लाईंड में पहुंचे। पूज्य महाराज श्री ने वहां बच्चों से भेंट की एवं बच्चों के साथ समय बिताते हुए उनसे पढ़ाई लिखाई के सम्बंध में चर्चा की एवं उन्हें संस्कारवान बनने की प्रेरणा दी। साथ ही महाराज श्री ने बच्चों को अपने हाथों से भोजन कराया एवं उन्हें पढ़ाई संबंधित पुस्तक, पेन आदि सामग्री भी वितरित की। महाराज श्री ने काफी देर तक बच्चों के साथ हंसते खेलते हुए उन्हें महत्वपूर्ण ज्ञान की बातें सिखाई।

 

10Dec 2019

“जिस व्यक्ति के ह्रदय में भगवत भक्ति जागृत ना हो वो प्राणी शव के समान है”

“जिस व्यक्ति के ह्रदय में भगवत भक्ति जागृत ना हो वो प्राणी शव के समान है”

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति सोलापुर के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 7 से 14 दिसम्बर 2019 तक स्व. लिंगराज बालईरय्या वल्याव्ठ क्रीडांगण, सोलापुर महाराष्ट्र में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि अपने जीवन की कुछ परेशानियां भगवान को सौंप देनी चाहिए क्योंकि हमसे ज्यादा कर्मठ, बलिष्ठ, योग्य, सम्पन्न, गुणवान वो है।

महाराज श्री ने कहा कि जीवन में जब मुश्किल घड़ी आए तो हमें घबराना नहीं चाहिए, मुश्किल घड़ी में धैर्य रखकर उस समय को उपयोग में कैसे लाएं, उस संकट से आगे बढ़ने का रास्ता कैसे बनाएं ऐसा सोचना चाहिए। उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति वो होते हैं जो बुरे वक्त में घबराकर चुप बैठ जाते हैं और एक व्यक्ति वो होते हैं जो बुरे वक्त में धैर्य रखकर परेशानियों का समाधान ढूंढते हैं और उसी को आगे बढ़ने का रास्ता बना लेते हैं।

महाराज श्री ने आगे कहा कि जिस व्यक्ति के ह्रदय में भगवत भक्ति जागृत ना हो वो प्राणी शव के समान है। चंद चीजों के खातिर हम अपने जीवन को बर्बाद कर रहे हैं। भगवान ने मानव रूपी पंख तुमहे दिये हैं वो देखना चाहता है की तुम किस दिशा में उड़ना चाहते हैं अच्छी दिशा में या बुरी दिशा में। प्रह्लाद, ध्रूव, मीरा, नामदेव इत्यादि ने अच्छी दिशा मे उड़ान भरी तो आजतक उनका नाम गाया जा रहा है। इन्होंने अच्छी दिशा में उड़ान भरी तो परमात्मा तक पहुंच गए और जिन्होंने बुरी दिशा में उड़ान भरी उनके पंख काट दिए गए चाहे वो रावण हो, ह्रण्यकश्यप हो, मेघनाथ हो। अब यह आपको निर्धारित करना है की अपने पंख कटवाने हैं या अपने पंख जवान बनाए रखने हैं।

 

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।
महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।
शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।
इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।
दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।
महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

7Dec 2019

“भक्ति ज्ञान वैराग्य से ओत-प्रोत है श्रीमद भागवत कथा”

“भक्ति ज्ञान वैराग्य से ओत-प्रोत है श्रीमद भागवत कथा” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज


“जहां भगवान की कथा होती है वहां सभी तीर्थ वास करते हैं” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति सोलापुर के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 7 से 14 दिसम्बर 2019 तक स्व. लिंगराज बालईरय्या वल्याव्ठ क्रीडांगण, सोलापुर महाराष्ट्र में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया गया।

श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई।

आज कथा पंडाल में आमदार श्री विजय कुमार देशमुख जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

 

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को श्री हरी विठला जय हरि विठला भजन श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भागवत स्वयं भगवान श्री कृष्ण का स्वरुप है। भगवान विठल में और भागवत में कोई अंतर नहीं है। भगवान विठल मंदिर में विराजमान होकर हम सभी का कल्याण करते हैं लेकिन भागवत के रूप में विठल शहर-शहर में जाकर हम सब प्राणी मात्र का कल्याण करते है। भगवान विठल श्री कृष्ण का ही स्वरुप है और भगवान विठल रुक्मणि जी के साथ में यहाँ पर विराजमान है।
महाराज श्री ने कहा कि हमारी भक्ति दृढ क्यों नहीं होती ? वो इसलिए नहीं होती क्योंकि मूर्ति मंव जो हैं उन्हें हम भगवान मान बैठते हैं और चलती फिरती मूर्ति में हम भगवान नहीं देखते उनको हम अपना दुश्मन मानते हैं तो फिर भगवान कहां से प्रकट होंगे। इसका मतलब यह नहीं है की मूर्ति में भगवान नहीं है, वह भगवान की छवि है, वहां भी भगवान है और यहां पंडाल में जो लोग बैठे हैं उनमें भी भगवान हैं, जब यह दृष्टि हो जाएगी की कण कण में भगवान बैठा हुआ है उस दिन भगवान आपसे दूर नहीं होंगे, तब आप जो मांगोगे भगवान वो आपको देंगे।
महाराज श्री ने कहा कि जहां भगवान की कथा होती है वहां सभी तीर्थ वास करते हैं। इसिलिए जब भी कथा मंडप में जाएं जो जैसे मंदिर की सीढियों को प्रणाम करते हैं वैसे ही प्रणाम कर लेना चाहिए।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत भागवत के प्रथम श्लोक सच्चिदानन्दरूपाय विश्वोत्पत्त्यादिहेतवे। तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुम: के उच्चारण के साथ की। महाराज श्री ने कहा कि भगवान का स्वरूप कैसा है ? सतघन, चितघन, आनन्द, ऐसे भगवान सच्चिदानंद स्वरूप, समस्त विश्व का पालन पोषण सृजन करने वाले तीनो के जो हेतु हैं तथा जिनके पावन चरण ग्रहण करने पर जीव का त्रापत्य समाप्त हो जाता है, ऐसे गोविंद को हम सब मिलकर बारम्बार नमन करते हैं, प्रणाम करते हैं।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की प्रारम्भ में यह की भागवत का महात्यम क्या है ? एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। इस सांसारिक जीवन में जो कुछ भी प्राप्त किये हो सब किराए के मकान की तरह है। खाली करना ही पड़ेगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

5Dec 2019

“जीवन में सबसे अनमोल रत्न है मधुर वाणी” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

“जीवन में सबसे अनमोल रत्न है मधुर वाणी”

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति आगरा के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 29 से 5 दिसम्बर 2019 तक नवीन गल्ला मंडी स्थल NH-2 फिरोजाबाद रोड आगरा, उत्तर प्रदेश में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया गया।

कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

आज कथा पंडाल में पूर्व मंत्री श्री राजा महेंद्र अरिदमन सिंह जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थित दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।


पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन " मेरे गिनियों न अपराध लाडली श्री राधे " श्रवण कराया ।


पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान ने बड़ी कृपा करके हमे मानव जीवन दिया है। इस संसार में मानव जीवन मिल भी गया है, इस संसार में हमे जो भी यश मिलता है, मान सम्मान मिलता है वो सभी ठाकुर की कृपा से मिलता है। कुछ लोग मान लेते हैं और कुछ लोग नहीं मानते। लेकिन हम और आप सभी आस्तिक लोग हैं, आस्थावान लोग हैं, हम सभी को यह बात मान लेनी चाहिए कि ठाकुर की कृपा के बगैर यह संभव नहीं है।

 

महाराज श्री ने कहा कि बहुत से लोग यह कहते हैं या भटके हुए लोग यह कहते हैं कि जीवन के अंतिम पड़ाव यानि वृद्धावस्था में हम करेंगे ही क्या ? भगवान का नाम ही तो जपना है। कुछ ओर तो करने को बचेगा नही, अभी तो हमारी खाने कमाने की उम्र है, अभी तो हमें धन कमाने दो, जब हम वृद्ध हो जाएंगे तब हम भगवान का भजन किया करेंगे। लेकिन कभी सोचा है आपने जिस समय जीव की वृद्ध अवस्था होती है वो रोग ग्रसित हो जाता है, वात पित्त उसका साथ नहीं देता है, रात को वो चैन से सो नहीं सकता, उस कठिन परिस्थिति में अगर जीव ये कहे कि मैं अंतिम समय पर भगवान का नाम लूंगा तो वो मुर्खता कर रहा है। पहले तो हमे यही नहीं पता की हमारा अंतिम समय कब आएगा। ये कहना की मैं बुढ़ापे में करूंगा तो बुढ़ापे तक जिंदा रहने की कोई गारंटी है। कोई कह सकता है कि मुझे बुढ़ापे तक कुछ नहीं होगा, कोई नहीं कह सकता क्योंकि कोई जानता ही नहीं है। ना जाने किसी दिन और कब हमारी मौत आ जाए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

6Dec 2019

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सोलापुर में श्री वेंकटेश्वर देवस्थानम से कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई। इस कलश यात्रा में हजारों की संख्या में माताओं-बहनो और भाई-बंधुओं ने भाग लिया।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सोलापुर में श्री वेंकटेश्वर देवस्थानम से कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई। इस कलश यात्रा में हजारों की संख्या में माताओं-बहनो और भाई-बंधुओं ने भाग लिया। कलश यात्रा ढ़ोल नगाड़े के साथ निकाली गई। हर किसी ने इस अद्भुत यात्रा का आनंद लिया। जहां तक दृष्टि जा रही थी वहाँ तक माताएं-बहने कलश सिर पर लिए दिख रही थी। सोलापुर में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 7 दिसंबर से 14 दिसंबर 2019 तक श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा का सीधा प्रसारण आप आस्था टीवी चैनल पर सायं 4:30 बजे से देख सकते हैं।

|| राधे-राधे बोलना पड़ेगा ||

7Dec 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सोलापुर में 7 से 14 दिसंबर 2019 तक स्थान - स्वर्गीय लिंगराज बालईरय्या वल्याड क्रीडांगड, सोलापुर, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का भव्य आयोजन किया जा रहा है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सोलापुर में 7 से 14 दिसंबर 2019 तक स्थान - स्वर्गीय लिंगराज बालईरय्या वल्याड क्रीडांगड, सोलापुर, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का भव्य आयोजन किया जा रहा है जिसके तहत महाराज श्री प्रातः काल दिल्ली एयरपोर्ट से पुणे के लिए प्रस्थान किया। जहाँ भक्तों एवं विश्व शांति सेवा समिति पुणे के सदस्यों द्वारा पुष्प गुच्छ देकर उनका स्वागत किया। उसके बाद महाराज श्री ने सोलापुर के लिए प्रस्थान किया। जहाँ विश्व शांति सेवा समिति सोलापुर के भक्तों ने पुष्प गुच्छ देकर उनका स्वागत किया। कथा का सीधा प्रसारण आस्था चैनल एवं महाराज श्री के यूट्यूब चैनल "श्री देवकीनंदन ठाकुर जी" को सब्सक्राइब कर के देख सकते हैं।

|| राधे-राधे बोलना पड़ेगा ||

2Dec 2019

“आपका एक दृश्य आपका चरित्र बदल सकता है :पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

“आपका एक दृश्य आपका चरित्र बदल सकता है :पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

“जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है” पूज्यश्री देवकीनंदन ठाकुर जी

“गुरु और धर्म के बिना गति नहीं है।” ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति आगरा के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 29 नवंबर से 05 दिसंबर 2019 तक नवीन गल्ला मंडी स्थल NH-2 फिरोजाबाद रोड़ आगरा ,उत्तर –प्रदेश में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। कथा के चतुर्थ दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

आज कथा पंडाल में आई. ए .एस नगर आगरा से श्री आयुक्त अरुण प्रकाश जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन "दूर नगरी बड़ी दूर नगरी " श्रवण कराया”।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि कई लोगों के समझ में आती है कथा, कई लोगों के समझ नहीं आती है कथा, कईयों के मन भाती है कथा, कईयों के मन लुभाती है कथा, क्या मिलता है कथा सुनने से ? कथा बार श्रवण करली तो, हजार बार श्रवण करली तो बात तो बराबर है। पर सच ये नहीं है जिनके मन बिषयायुक्त हो चुके है उनको कथा में अमृत भी तुक्ष लगता है। जिनका मन कथा में ललायत न रहता हो, आनंदित न रहता हो,बिषयायुक्त जीव जो रहते हो, वो ही लोग यमराज के द्वार पर जाते। यमराज के दूत उनकी बहुत सेवा करते है।

महाराज श्री ने कहा कि अब कथा में मन क्यों नहीं लगता ? एक महात्मा जी जंगल में रहते थे जंगल में तो झरने का ही जल मिलता है। एक जगह गए जल को झरने से लिया और पिया लेकिन जल बहुत कड़वा है। दूसरे झरने की तरफ गये वहां भी जल को पात्र में भरा फिर पिया फिर महात्मा जी बोले अरे राम - राम ये तो उससे भी ज्यादा कड़वा है। फिर महात्मा जी को एक संत जी मिले उन्होंने कहा की आज पता नहीं क्या हो गया। हरे झरने बड़े कड़वे हो गए। संत जी ने कहा ऐसे कैसे हो सकता है हम भी चैक करते है। तो उन्होंने हाथ से अंजुली भर जलपान किया जब जलपान किया तो देखा अरे जल तो बहुत ठंडा है, बड़ा मीठा है , कड़वा नहीं है। तो इस बात सुनकर महात्मा जी बोले अरे ये कैसे हो सकता है मैंने भी तो पिया है। महात्मा जी ने फिर से जल पिया और फिर से उन्हें जल कड़वा लगा। तो अरे राम - राम आप इसको कैसे मीठा कहे सकते हो ये तो बहुत ही ज्यादा कड़वा है। तो संत ने विचार दिया की एक काम करों इस पात्र से तुम जल पी रहे हो इस पात्र को तुम रख दो। हाथ से पियो। महात्मा जी ने बैसा ही किया। जब एक अंजुली जल पिया तो पूरा जल पी गए। अबकी बार महात्मा जी उगला नहीं तो संत जी महात्मा जी से पूछा कैसा है जल तब महात्मा जी ने कहा रुक जाइए पहले पियास भुजा लेने दो। पेट भर के जब जल पीलिया तब महात्मा जी ने पूछा भैया अब तो बता दो जल कैसा था। तब महात्मा जी ने कहां जल बहुत ठंडा, मीठा था। तृप्त हो गए आनंद हो गए बोले कैसे आनंद आ गया अभी तो कहे रहे है थे कड़वा है अब मीठा कैसे हो गया तो ये बात तो समझ में नहीं आई। बोले मेरे समझ में आ गई। जल तो मीठा पहले भी झरने वाले थे ये भी मीठा ही है तेरे पात्र में ही कुछ गलत लगा हुआ है जिससे जल कड़वा लग रहा है जल तो मीठा ही था। इसी जल को तुम इस पात्र से पिया तो आपने कड़वा कहा और जब इसी जल को तुमने हाथ से पिया तो तुमने कहां मीठा है। इसका अभिप्राय क्या है? अभिप्राय बहुत सीधा सा है मेरे प्यारे। जिसके मनरूपी पात्र पर पाप सवार हो गया है उसके लिए कथा कड़वी है, उसके लिए कथा खट्ठी है। उसका मन कथा में नहीं लगता है, उसके लिए कथा में कुछ है ही नहीं। और जिनके मनरूपी पात्र से पाप समाप्त हो चूका है हरि नाम जपने से वो पात्र स्वच्छ हो चूका है। उस पात्र में पतत्रता है। जब बो बैठता है तो हरि नाम कथा अमृतपान करके वो धन्य -धन्य हो उठता है, आनंददित हो उठता है। तो मेरी पात्रता क्या है, मुझे क्या अधिकार मिला है, जिस कथा में ध्रुव का मन लगा, जिस कथा में प्रहलाद का मन लगा, जिस कथा में मीरा का मन लगा, उस कथा में मेरा मन क्यों नहीं लग रहा है ? मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो ना कोई जाके सर मोर-मुकुट, एक बात याद रखना। मेरे जीवन में पूजा पथ क्या है ? पैसा हमारों परमेश्वर, पत्नी हमारी गुरु बेटा हमारों शालिग्राम तो सेवा क्यों करें। पर सच यही है धर्म के बिना गति नहीं है।

महाराज श्री ने कहा कि कौन - कौन सुख पाना चाहते है? अगर सुख पाना चाहते हो तो कभी पता किया है सुख मिलता कहा है ? कथा पंडाल में ही सच्चा सुख मिलता है। सच्चा सुख कथा पंडाल में भगवान की कथा सुनकर ही प्राप्त होता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।

महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।

शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।

बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।

इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।

इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।

महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।

महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।

उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।

महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"

जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।
दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।

महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"

भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।

इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

3Dec 2019

कुछ भी अच्छा करना है तो अब से करो कल तो काल का है। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

कुछ भी अच्छा करना है तो अब से करो कल तो काल का है। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

दिल और दिमाग को समझने वाला ग्रन्थ है भागवत - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति आगरा के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 29 नवंबर से 05 दिसंबर 2019 तक नवीन गल्ला मंडी स्थल NH-2 फिरोजाबाद रोड़ आगरा ,उत्तर –प्रदेश में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।
श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के पंचम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन " जगत सब छोड़ दिया सांवरे तेरे पीछे "श्रवण कराया”।

आज कथा पंडाल में सिटी मजिस्ट्रेट श्री अरुण कुमार जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

 


पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि यहाँ कथा करने का मतलब ये है वृन्दावन से आप लोगो का सम्बन्ध जोड़ना। ये कथा ही सफल तब है जब तुम्हारा सम्बन्ध ठाकुर जी से जुड़ जाएं। ये कथा को सफल होने का प्रणाम है। महाराज जी कहा की आप लोग याद करों जिसे कृष्ण जी से सच्चा प्यार हो जाये उसे पद - प्रतिष्ठा और धन की याद नहीं आएं। लेकिन जब कृष्ण की भक्ति सर चढ़ कर बोलेगी तो पद प्रतिष्ठा को महो नहीं रहता सिर्फ कृष्ण - कृष्ण बोला करें। और महाराज जी कहा की कृष्ण भक्ति ही वो है दुनिया को भुला दे और कृष्ण में लगा दें। मत सोचो दुनिया क्या कहे गई। सोचना बस ये की मेरा कन्हैया क्या है। महाराज जी कहा की जो लोग ये कहते है हम बुढ़ापे में भजन करेंगे तो बुढ़ापे में इतनी बीमारिया लग जाती है हमारा कफ आकर गले में अटक जाता है। स्थिति नाजुक हो जाती है बीमारिया हजार आक्रमण कर देती है। तब तुम्हे भगवान की याद कैसे आएगी। आएगी की नहीं ? बोले क्या करें जिस दिन अकल का दाना खुल जाएँ उसी दिन से ठाकुर जी का नाम लेना प्रारम्भ कर दो। कल नाम “काल” का है आज ही सत्य है जो करना आज ही, अभी करों।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है। भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए। अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है। श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

 

4Dec 2019

“जो जीव श्रीमद्भागवत मन से सुनते हैं उनके जन्म जन्मांतर की प्यास हमेशा के लिए तृप्त हो जाती है” : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

“जो जीव श्रीमद्भागवत मन से सुनते हैं उनके जन्म जन्मांतर की प्यास हमेशा के लिए तृप्त हो जाती है” : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

अगर वेद, पुराण, भागवत, ऋषिवाणी, भगवत प्रवचन सत्य है तो वो यक्ति कभी खाली हाथ नहीं जायेगा। : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति आगरा के तत्वाधान में पंडित श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 29 नवंबर से 05 दिसंबर 2019 तक नवीन गल्ला मंडी स्थल NH-2 फिरोजाबाद रोड़ आगरा ,उत्तर –प्रदेश में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
आज कथा पंडाल में युवा मोर्चा बीजेपी जिला महामंत्री राजन गुप्ता जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

 


पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत कहा कि कुछ ऐसी कमाई कर लो जो संग जा सके, मुश्किल पड़े तो रहा में भी काम आ सके। जेब में पैसे हो तो यात्रा में कितने भी मुश्किलें हो आप परेशान नहीं होंगे तब आप हैंडल कर सकते है। जब जेब में पैसे ही न हो तो व्यवस्था - व्यवस्था में बदल जाती है। महाराज जी ने कथा क्रम आगे बढ़ाते हुए कहा की एक नगर में वहां का एक राजा सिर्फ एक साल रहता था जब उसकी साल पूरी हो जाती थी। तो उस राज्य के सेवक - मंत्री इत्यादि उसे गद्दी से उतारते और एक घने जंगलों में जो मिलों फैला हुआ था। उस घने जंगल उसे छोड़कर आ जातें थे। और वहां पर बड़े जंगली जानवर रहते थे। या वो उसे खा जातें या फिर भूक प्यास के खातिर ऐसे ही मर जाता था। कहने का मतलब था एक साल का ही सुख था। बाकि की तो जिंदगी बेकार ही थी। उस राज्य का ये नियम भी था। एक ही साल रहेगा एक ही राजा। ऐसे ही नियम चलता रहा एक दिन बात है एक परायें नगर से एक युवा व्यक्ति था समझदार, बुद्धिमान था। तो वो बुद्धिमान भाव उस नगर में प्रवेश किये तो राजा अपने मन से तो बनेगा नहीं। तो जो नगर में पहले प्रवेश करता था उसे राजा बना दिया जाता था। जैसे राजा का कार्य हो गया उसे छोड़ आएं। उसके बाद पहला व्यक्ति जो नगर में पहले प्रवेश करेगा वही राजा बना दिया जाता था उस व्यक्ति को पता नहीं था उसने उस नगर में प्रवेश का लिया। सब लोग मंत्री एकत्रित हो गए। बड़े खुश हुए राजा मिल गया राजा मिल गया । और वो भी बड़ा खुश हुआ। की मैं राजा बन गया। उस मानभाव को तो पता नहीं था पीछे तो कुछ और था। जैसे ही गद्दी पर बैठे झट मंत्रियों ने नियम बताएं और कहा इस राज्य में यह - यह एक साल ही तक रहोगें उसके बाद जंगल में छोड़ दिया जायेगा। वह जो भी आपका हमें उससे कोई मतलब नहीं। राजा परेशान हो गया बड़ा खुश था जब गद्दी पर बैठा गद्दी पर बैठते ही नियम सुने हो परेशान हो गया। इससे तो हम पहले ही बड़िया थे। कम से कम मरने का दुःख तो नहीं था। अब तो एक साल बाद मरना ही पड़ेगा। तो उसने रात भर सोचा तो उसने बुध्दि लगाई उसने बोले भाई ठीक है एक साल तो हम ही है न राजा यहाँ वही होगा जो हम आज्ञा करेंगे। एक दम सब करेंगे जो आप कहेंगे तो बुद्धिमान ने कहा की चलो हम जंगल की शहर करने चल रहे है। उसी जंगल की तो सभी मंत्री - सेवक सभी कहने लगे किसी और दिन चलेंगे। तो राजा ने कहा की हम देखना चाहते है वो जंगल कैसा है। बोले ठीक है महाराज उन्हें लेकर गए। बो देख दाख आ गया। सारा निरक्षण करके आ गए। समझ में आ गया यहाँ मरे बिना पीछा नहीं छूटेगा यहाँ तो मरना ही पड़ेगा। तो उसने अपनी बुद्धि लगाई और बुध्दि लगा कर अपने उन मंत्रियों को बुलाकर आया और बोला सुनो 6 महीने के भीतर- भीतर जैसा ये महल है न उस जंगल को भी बैसा ही बनाओ। और अभी से यहां इस महल से लेकर उस महल तक की सड़क बनवाओ। दोनों सड़क मिलती झूलती हो। कहते है न बलि का बकरा बना रही है। गलती सड़क की नहीं है गलती चालकों की है। सड़क तो बहुत अच्छी बानी है चालक ख़राब है बिना सोचे समझे स्पीड से चलाओगे। और कण्ट्रोल करना आपको नहीं आएगा तो फिर सेल्फी के चक्कर में वीडियो के चक्कर, उसी जंगल में एक बगीचा बनवाओ पूरी व्यवस्था करवाओं। 6 महीने में हो जाना चाइये बोले हो गया महाराज। राजा ने आज्ञा करी सब लोग व्यवस्था में लग गए। एक साल पूरी हुई राजा जाने को तैयार। राजा बोले चलो। तब मंत्रियों ने कहा अब आप कही नहीं जायेंगे। तब राजा ने कहा एक साल में हम उन मूर्खो को छोड़के आते थे। बुध्दि जीवियों को नहीं। जैसे आपको बताया गया एक साल बाद उधर फेक दिया जायेगा। बैसे ही उस सभी को बताया गया लेकिन उसके बाबजूद भी खाने - पीने सोने में ही लगे रहे। एक दूसरे के साथ नाचने में ही लगे रहे। आप धन्य है जो आपने अपनी व्यवस्था पहले ही दिन कर प्रारम्भ कर दिया। आप ग्रेट हो। आप जैसे बुध्दि जीवी की जंगल में नहीं यहाँ की आवश्यकता है।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।

1Dec 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति मुंबई के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 15 से 22 दिसंबर 2019 बाला साहेब ठाकरे मैदान, इंद्रलोक,फेज-3, भायंदर ईस्ट में होने वाली विशाल श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों को लेकर आज विश्व शांति सेवा समिति मुम्बई के लोगो ने और विश्व शांति मिशन के सचिव श्री विजय शर्माजी ने समिति, कार्यकर्ता एवं शिष्य परिवार के साथ शाम 3 बजे से एस.एम.पब्लिक स्कूल, नगरपालिका के सामने, तलाव रोड, भायंदर ईस्ट में मीटिंग की।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति मुंबई के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 15 से 22 दिसंबर 2019 बाला साहेब ठाकरे मैदान, इंद्रलोक,फेज-3, भायंदर ईस्ट में होने वाली विशाल श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों को लेकर आज विश्व शांति सेवा समिति मुम्बई के लोगो ने और विश्व शांति मिशन के सचिव श्री विजय शर्माजी ने समिति, कार्यकर्ता एवं शिष्य परिवार के साथ शाम 3 बजे से एस.एम.पब्लिक स्कूल, नगरपालिका के सामने, तलाव रोड, भायंदर ईस्ट में मीटिंग की। इसमे कथा की तैयारी एवं प्रचार - प्रसार , पंडाल की तैयारी, एवं आयोजक समिति की जिम्मेदारियां लोगो को दी गई। विश्व शांति मिशन के सचिव श्री विजय शर्माजी ने कहाँ कि शिष्य परिवार के अलावा जो भी इस कथा से जुड़ना चाहे वो उन्हें भी कथा की तैयारियों जिम्मेदारियां दी जायेंगी। गौरतलब है कि पिछले 2 साल से पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज द्वारा श्रीमद भागवत का रस पान बालासाहेब ठाकरे मैदान,भायंदर पर करवाया जा रहा है इसमे हज़ारों की संख्या में लोग कथा का आनंद लेते है।

1Dec 2019

"दोनों हाथो की सेवा है कीर्तन में ताली : पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज "

"विनाश नहीं विकास का जो मार्गदर्शन है वो सनातनियों ने ही दिया है” : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

"धन इत्यादि के मद में ईश्वर को भूल जाते है। : ठाकुर जी महाराज "

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति आगरा के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 29 नवंबर से 05 दिसंबर 2019 तक नवीन गल्ला मंडी स्थल NH-2 फिरोजाबाद रोड़ आगरा ,उत्तर –प्रदेश में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।कथा के तृतीय दिवस हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
आज कथा पंडाल में बीजेपी विधायक श्रीमति हेमलता दिवाकर जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन "जब सुरत देखू मोहन की " श्रवण कराया”।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि जितने भी युवा जीवन में सफलता चाहते हैं तो आप सभी को अपने सनातन धर्म का आदर करना आना चाहिए। हम और आप सभी धर्म का आदर करेंगे तभी हमारे आने वाले बच्चे हमारी परम्पराओं से अवगत होएगें और वो इस परम्परा पर चल सकेंगे। ये तमाशा नहीं ये भगवान की कथा है। और भगवान की कथा अच्छे श्रोता बनके सुननी चाहिए। खड़े होके तमाशा नहीं बनना चाहिए। सर्वजीव का मंगल होए ऐसी प्रार्थना करें। सर्वजीव प्रसन्न होए ऐसी प्रार्थना करें, विश्व के लिए प्रार्थना करें, सभी लोगों का चित ईश्वर में लगा रहे इस के लिए प्रार्थना करें, सभी लोग सदमार्ग के गामी हो इसलिए प्रार्थना करें और सभी लोगो को मानव जीवन का उद्देश्य प्राप्त हो इसलिए प्रार्थना करें।

महाराज श्री ने कहा कि कितनी अच्छी बात कही है अपने बच्चो को हम सिखाएं सर्वप्रथम पृथ्वी माँ को बंधन करें और अपने माँ - पिता को बंधन करें। क्यों की वो एक माँ है वो जानती है की अपनी माँ को कैसे संस्कार देने चाहिए हर माँ दायित्व बनता है की बच्चो को संस्कार कैसे देने चाहिए। जब जीव प्रार्थना करता है तो निश्चित उसे लगता की भगवान मुझे सुन रहा है मुझे देख रहे है। जब जीव पाप करता है तब उसे भगवान की याद भी नहीं आती तब उसको ये भी नहीं लगता भगवान मुझे देख रहा है। एक वही जीव है, पुण्य करते समय, मंदिर जातें समय, कथा श्रवण करते समय, प्रार्थना करते समय मानता है की भगवान मुझे देख रहा है। वो जरूर सुनेगा मेरी लेकिन जब पाप करता है तो फिर उसे भगवान की याद नहीं आती फिर उसे ये नहीं लगता भगवान उसे देख रहा फिर तो लगता की में ही स्वतंत्र हूँ। पर ऐसा नहीं जो आप की प्रार्थना के समय देखता सुनता है वो आपको पाप के समय भी देखता रहता है। उसकी दृष्टि कभी बंद नहीं होती वो तुम्हे देख रहा है। जहाँ भी आप है वो वहां तुम्हे देख रहा। आपको जो भी करना समझदारी के साथ करना है। निश्चित पाप अगर कर रहे हो तो उसका प्राश्चित आप ही करना होगा।

महाराज श्री ने कहा कि जीवन से सम्बंधित प्रश्न हम संत महात्माओं से करते हैं लेकिन एक प्रश्न मृत्यु से सम्बंधित नहीं करते जबकि जीवन झूठा मृत्य सत्य है और सत्य के विषय में कोई प्रश्न नहीं किया जाता। जीवन में एक कर्म अपने लिए किया जाता है, एक कर्म सबके लिए किया जाता है। जो परोपकार के लिए कर्म किया जाता है वो सर्वश्रेष्ठ कर्म कहा जाता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।

तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।

2Dec 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति नागपुर के तत्वावधान पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी के सानिध्य में श्रीमद्भागवत कथा का विशाल आयोजन 2 से 8 जनवरी 2020 तक स्थान - रेशम बाग मैदान, नागपुर में किया जाएगा।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति नागपुर के तत्वावधान पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी के सानिध्य में श्रीमद्भागवत कथा का विशाल आयोजन 2 से 8 जनवरी 2020 तक स्थान - रेशम बाग मैदान, नागपुर में किया जाएगा। श्रीमद्भागवत कथा की तैयारियों के लिए आज ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी एवं समिति के सदस्यों, भक्तों के साथ मीटिंग की गई। यहाँ पर संस्था के कार्यालय का उद्घाटन भी किया गया। अब नागपुर वासी संस्था से जुड़ी या श्रीमद भागवत कथा की सभी जानकारी इस कार्यालय से प्राप्त कर सकते है। नागपुर में कथा से पूर्व भव्य कलश यात्रा निकाली जाएंगी। आप सभी भक्तगण, भागवत कृपा प्राप्त करने और कथा को अपने जीवन में उतारने के लिए ज्यादा से ज्यादा संख्या में पधाकर पुण्य के भागीदार बने।

29Nov 2019

आगरा में परम पूज्य शांतिदूत धर्मरत्न श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में श्रीमद्भागवत का भव्य आयोजन किया जा रहा है।

आगरा में परम पूज्य शांतिदूत धर्मरत्न श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में श्रीमद्भागवत का भव्य आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद भागवत कथा 29 नवंबर से 05 दिसंबर 2019 तक नवीन गल्ला मंडी स्थल NH-2 फिरोजाबाद रोड़ आगरा ,उत्तर -प्रदेश में किया जाएगा। आज आगरा में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा से पूर्व भव्य मंगल कलश यात्रा निकाली गई। जहां अनगिनत माताओं बहनों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। कलश यात्रा में जहां तक नज़र जा रही थी वहां तक माताएं-बहनें नज़र आ रहीं थी। इस यात्रा में ढोल-नगाड़े, इत्यादि के साथ सुंदर सुंदर झांकिया भी निकाली गई। कलश यात्रा जिन मार्गों से होकर गुजरी,वहां इस भव्य यात्रा को देखने के लिये लोग थम गए।
 

29Nov 2019

श्रीमद भागवत जो की कलिकाल के समस्त पापों का नाश करने वाली है। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

भगवान आपके कर्मों से ही प्रसन्न होते हैं” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

जीवन में सुख पाने का एक ही मार्ग है ठाकुर जी : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति आगरा के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य 29 नवंबर से 05 दिसंबर 2019 तक नवीन गल्ला मंडी स्थल NH-2 फिरोजाबाद रोड़ आगरा ,उत्तर –प्रदेश में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के प्रथम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया । प्रथम दिवस के कथा की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन "हरि का भजन करो हरि है तुम्हारा" श्रवण कराया”।

आज कथा पंडाल में विधानसभा क्षेत्र से विधायक श्री रामप्रताप सिंह जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि "मानव धर्म क्या सिखाता है ? मानव धर्म ये नहीं की 24 घंटे खाओ - कमाओ अपने बच्चे को पालों, और आओ सो जाओ और दुनिया से चले जाओ ये मानव धर्म नहीं इसके अलावा भी बहुत कुछ है जो हम नहीं करते, जो हमें करना वो क्या है, "दीन दुखियों पर दया करों बने तो सेवा भी करों" महो सब दूर करों, प्रेम हरि ही से करों यही हरि भक्ति युग,यही ज्ञान धारा। यही मानव धर्म है।

महाराज श्री ने कहा कि जितने नियम और मर्यादा के साथ आप कथा श्रवण करेंगे उतना ही लाभ आपको अधिक मिलेगा। ये निर्भर है आप सबके ऊपर और कहा की जो जितनी श्रद्धा के साथ कथा श्रवण करेंगे उसको उतनी जल्दी फल की प्राप्ति होगी। श्रीमद भागवत जो की कलिकाल के समस्त पापों का नाश करने वाली है। निश्चित तौर पर कृष्ण का प्रेम प्रदान करने वाली है। उस भागवत के शरण हम और आप विराजमान है।

 

महाराज श्री ने कहा कि जिनको ठाकुर का स्पोर्ट चाहिए वो क्या मंदिर नहीं जा सकते। जिन्हे अगर सच्चा गोविन्द का प्रेम और स्नेह चाहिए वो लोग तो विदेशों में भी कथा सुनने चले जाते है जिन्हे सच्ची चाहा है वो कही भी चले जाते है और जिन्हे चाहा नही है वो घर के बाहर कथा होती रहे वो वहां भी नही जाते।

महाराज श्री ने कहा कि भागवत सम्पूर्ण भक्तों का सरल ग्रंथ है जो सोवत है वो खोवत है जो जागत है वही पावत है दो ही विकल्प है या तो अपने इस जीवन को जबरदस्त बर्बाद कर लो। या इतना अवाद कर लो फिर मरना ही न पड़े यही सिखाती है , यही समझती है भागवत कथा। जिस भागवत के शरण में होने के बाद निश्चित तौर पर फल एक जैसा सबको नहीं मिलता। "भागवत हमें वो सब देती है जो हम चाहते है लेकिन सत्य ये है की सबको एक जैसा नहीं देती जो जैसे श्रद्धा रखता है वो बैसा ही फल पाता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

29Nov 2019

श्रीमद भागवत जो की कलिकाल के समस्त पापों का नाश करने वाली है। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

भगवान आपके कर्मों से ही प्रसन्न होते हैं” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

जीवन में सुख पाने का एक ही मार्ग है ठाकुर जी : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति आगरा के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य 29 नवंबर से 05 दिसंबर 2019 तक नवीन गल्ला मंडी स्थल NH-2 फिरोजाबाद रोड़ आगरा ,उत्तर –प्रदेश में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के प्रथम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया । प्रथम दिवस के कथा की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन "हरि का भजन करो हरि है तुम्हारा" श्रवण कराया”।

आज कथा पंडाल में विधानसभा क्षेत्र से विधायक श्री रामप्रताप सिंह जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि "मानव धर्म क्या सिखाता है ? मानव धर्म ये नहीं की 24 घंटे खाओ - कमाओ अपने बच्चे को पालों, और आओ सो जाओ और दुनिया से चले जाओ ये मानव धर्म नहीं इसके अलावा भी बहुत कुछ है जो हम नहीं करते, जो हमें करना वो क्या है, "दीन दुखियों पर दया करों बने तो सेवा भी करों" महो सब दूर करों, प्रेम हरि ही से करों यही हरि भक्ति युग,यही ज्ञान धारा। यही मानव धर्म है।

महाराज श्री ने कहा कि जितने नियम और मर्यादा के साथ आप कथा श्रवण करेंगे उतना ही लाभ आपको अधिक मिलेगा। ये निर्भर है आप सबके ऊपर और कहा की जो जितनी श्रद्धा के साथ कथा श्रवण करेंगे उसको उतनी जल्दी फल की प्राप्ति होगी। श्रीमद भागवत जो की कलिकाल के समस्त पापों का नाश करने वाली है। निश्चित तौर पर कृष्ण का प्रेम प्रदान करने वाली है। उस भागवत के शरण हम और आप विराजमान है।

 

महाराज श्री ने कहा कि जिनको ठाकुर का स्पोर्ट चाहिए वो क्या मंदिर नहीं जा सकते। जिन्हे अगर सच्चा गोविन्द का प्रेम और स्नेह चाहिए वो लोग तो विदेशों में भी कथा सुनने चले जाते है जिन्हे सच्ची चाहा है वो कही भी चले जाते है और जिन्हे चाहा नही है वो घर के बाहर कथा होती रहे वो वहां भी नही जाते।

महाराज श्री ने कहा कि भागवत सम्पूर्ण भक्तों का सरल ग्रंथ है जो सोवत है वो खोवत है जो जागत है वही पावत है दो ही विकल्प है या तो अपने इस जीवन को जबरदस्त बर्बाद कर लो। या इतना अवाद कर लो फिर मरना ही न पड़े यही सिखाती है , यही समझती है भागवत कथा। जिस भागवत के शरण में होने के बाद निश्चित तौर पर फल एक जैसा सबको नहीं मिलता। "भागवत हमें वो सब देती है जो हम चाहते है लेकिन सत्य ये है की सबको एक जैसा नहीं देती जो जैसे श्रद्धा रखता है वो बैसा ही फल पाता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

30Dec 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्त्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के श्रीमुख से 15 से 22 दिसंबर 2019 बाला साहेब ठाकरे मैदान, इंद्रलोक,फेज-3, भायंदर ईस्ट में होने वाली विशाल श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों को लेकर आज विश्व शांति मिशन के सचिव श्री विजय शर्मा जी मुम्बई एयरपोर्ट पहुँचे, जहाँ विश्व शांति सेवा समिति मुम्बई के भक्तों ने पुष्प गुच्छ देकर उनका स्वागत किया।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्त्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के श्रीमुख से 15 से 22 दिसंबर 2019 बाला साहेब ठाकरे मैदान, इंद्रलोक,फेज-3, भायंदर ईस्ट में होने वाली विशाल श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों को लेकर आज विश्व शांति मिशन के सचिव श्री विजय शर्मा जी मुम्बई एयरपोर्ट पहुँचे, जहाँ विश्व शांति सेवा समिति मुम्बई के भक्तों ने पुष्प गुच्छ देकर उनका स्वागत किया। कथा की तैयारियों के लिए कल 3 बजे से एस.एम.पब्लिक स्कूल, नगरपालिका के सामने, तलाव रोड, भायंदर ईस्ट में मीटिंग रखी गई है। इसमें कथा की तैयारी एवं प्रचार-प्रसार, पंडाल की तैयारी एवं आयोजक समिति की जिम्मेदारियां के सम्बंधित चर्चा की जायेगी। 

30Nov 2019

“जीवन पूरा हो जाता है, कामनाएं पूरी नहीं होती : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

"निश्चित हम सभी के जीवन में तमाम संकटों को हरण करने वाली श्री किशोरी जी है। : ठाकुर जी महाराज

"ये भागवत जिज्ञासुओं का ग्रन्थ है" पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति आगरा के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 29 नवंबर से 05 दिसंबर 2019 तक नवीन गल्ला मंडी स्थल NH-2 फिरोजाबाद रोड़ आगरा ,उत्तर –प्रदेश में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया गया। कथा के द्वितीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई।

आज कथा पंडाल में पूर्व मंत्री आगरा सांसद श्री एस० पी० सिंह बघेल जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि श्रीमद भागवत कथा के प्रारम्भ में हम कीर्तन इस लिए करते है जिससे हमारा मन फिर सत्संग में लग जाएँ, कथा में लग जाएँ। "निश्चित हम सभी के जीवन में तमाम संकटों को हरण करने वाली श्री किशोरी जी है।" श्रद्धा से किशोरी जी के नाम को पुकारें , जिससे हमारे भी सब संकट दूर हो जाये। किसी को संसार का वैद्य मिल जाता है किसी को संसार बनाने वाला वैद्य मिल जाता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन "तेरे संकट हरेगी भेली रे वृषभानु की लल्ली " श्रवण कराया”।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जीवन में भगवत संबंधी कुछ प्रश्न हमें अपने आप से करने चाहिए। निश्चित तौर पर जब तक ये संसार रहेगा का हमे चैन नहीं लेने देगा । अगर हम ये सोचे की काम से फ्री होकर हम भक्ति करेंगे, तो ये सोचिए की काम पूरे ही कब होते हैं। ये कामनाए ही हैं जो कभी पूरी नहीं होती, जीवन पूरा हो जाता है।

महाराज श्री ने आगे कहा कि मानव योनि में जन्म लेने के बाद, मनुष्य बनने के बाद जिस व्यक्ति ने धर्म को जानने की कोशिश नहीं की, अपने आप को जानने की कोशिश नहीं की, जन्म लेना न लेना, संसार में आना या न आना बराबर ही है। धन्य वही है, वही धन्य बाद के पात्र है जिन्होंने मनुष्य जीवन प्राप्त करने के बाद अपने आप को और ईश्वर को धर्म को जानने की कोशिश की । ये भागवत जिज्ञासुओं का ग्रन्थ है। इसका प्रारम्भिक करण ही प्रश्न से होता है। उत्तर देने से ज्यादा अच्छा है प्रश्न करना ? क्यों की प्रश्न जब आप करते हो तो ये पता चलता है की आपके अंदर जिज्ञासा है आप कुछ जानना चाहते हो। और अगर जानने का विषय भी अच्छा हो, क्यों की आप जानना तो बहुत कुछ चाहते हो किसी की रूचि, भोजन बनाने में, किसी की रूचि कमाने में, किसी की व्यापार को आगे बढ़ाने में है, लेकिन बहुत अच्छे लोग है ईश्वर से कैसे मिला जाये, जिसके अंदर ये जानने की रूचि है वही रूचि वही जिज्ञासा, वो जिज्ञासा सर्वश्रेठ जिज्ञासा है। गोविन्द से कैसे मिले कोई हमें बतादे अगर ये मानव जीवन यहाँ से चले गयो तो ये अवसर दुबारा नहीं मिलेगा। हे गोविन्द, हे ऋषि मुनि, हे गुरु देव, हे तीर्थो जो भी याद आये जिसकी शरण में जाये मात्र एक ही प्रश्न की मैं गोविन्द से मिलूं कैसे। यही प्रश्न सबसे बढ़िया है ये सर्वश्रेठ जिज्ञासा जिनके अंदर है उनको अपनी वह जिज्ञासा को जीवित रखना चाहिए। इस प्रश्न अच्छा संसार में कोई भी प्रश्न नहीं है। ये जिज्ञासा गजब की है अथातु उस ब्रह्म को जानने के लिए ऋषियों ने, सनकादिक ऋषियों ने नैमिषारण्य में , सूत जी महाराज से यही तो प्रश्न किया। ये प्रश्न सनकादिक ऋषियों का है "प्राणी मात्र का पहला ही प्रश्न कितना महत्पूर्ण है, " इसको कहते है संत हृदय। स्वार्थी व्यक्ति हमेशा अपने बारें सोचता है की मेरा भला कैसे हो मैं क्या करूँ में कहा जाऊं ? स्वार्थी व्यक्ति सिर्फ अपने बिषय में सोचता है लेकिन ऋषि मुनि परोपकारी लोग कभी अपने बारें में नहीं सोचते बल्कि समाज, देश, प्राणियों, संस्था के बिषय में सबसे पहले सोचते है। उनकी नजर में हम कुछ नहीं और स्वार्थी लोगो की नजर में देश, समाज, धर्म कोई कुछ नहीं है। लेकिन ऋषि मुनि परोपकारी लोगों की नजरों ये जीवन का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।

महाराज श्री ने आगे कहा कि आज के मानव के सबसे बड़े दुःख का कारण क्या है ? मुझे लगता है सबसे बड़े दुःख का कारण है स्वार्थी व्यक्ति है । आप लोग मानष तो पढते हो। मानष में इसका प्रणाम है, स्वार्थी व्यक्ति कभी प्रसन्न नहीं रहे सकता। चाहे तुम उसे कुछ भी बना दो ,वो लोग कभी भी खुश नहीं रहे सकते। रामायण में लिखा है की जो परोपकारी व्यक्ति होते है वो कभी दुखी नहीं रहते है। स्वार्थी व्यक्ति होते वो कभी खुश नहीं रहते।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं।
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।

27Nov 2019

“जीवन में सबसे अनमोल रत्न है मधुर वाणी” : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति पटना के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 नवंबर 2019 तक गर्दनीबाग, संजय गांधी स्टेडियम पटना में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया गया।

कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

आज कथा पंडाल में बिहार सरकार में कृषि मंत्री श्री प्रेम कुमार जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थित दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जीवन बहुमुल्य रत्न है, व्यक्ति बहुत सारी चीजों के पीछे पड़ा है। इस ब्रह्माण्ड में सबसे बहुमुल्य कुछ है तो वो तीन चीजे हैं। सर्वप्रथम जल, द्वितीय जल और तृतीय मीठी वाणी। लोग सिर्फ महंगे पत्थरों को ही रत्न मान बैठते हैं, कागज के टुकडों को बहुत बड़ा धन मान बैठते हैं। लेकिन जल के बिना, अन्न के बिना जीवन है क्या ? और तुम्हारे पास सबकुछ हो और फिर भी कोई तुमसे मधुर ना बोलता हो तो क्या करोगे इन सब का ? आप अपने जीवन में अपने बच्चों को सिखाइए अगर तुम्हे प्रयाप्त जल और अन्न प्राप्त कर सको इतना धन तुम्हारे पास है तो सबसे अनमोल रत्न मीठी वाणी आप बनाइए, खुद भी सुखी होइए और दूसरों को भी सुखी बनाइए।

महाराज श्री ने कहा कि संसार मे दो प्रकार के प्राणी होते हैं, एक जो किसी की बात मानते हैं और एक जो किसी की भी बात नहीं मानते । जो किसी की भी नहीं मानते उनका तो भगवान जाने, लेकिन जो किसी की अच्छी बातों का अनुसरण करते हैं निश्चित वो अपने जीवन में बहुत कुछ प्राप्त कर सकते हैं। आपको अपने माता-पिता, सास-ससुर, गुरूजनों की बात को मानना चाहिए। जब हम इनकी बात मानते हैं तो निश्चित हमारा जीवन एक सुखद मार्ग की ओर चलता है।

महाराज श्री ने आगे कहा कि आप भले ही कितने बड़े क्यों ना हो लेकिन कही भी जाओ तो छोटे बनकर जाओ। आप जितने छोटे बनकर जाओगे उतने सुखी रहोगे, उतना ही आपको प्राप्ति होगी। मंदिर में जाएं, कथा सुनने आएं, तीर्थ में जाएं तो छोटे बनकर जाएं, एकदम विनम्र बनकर जाएं फिर देखिए उसका कितना लाभ आपको प्राप्त होगा, आप इसे अपने जीवन में अनुभव करेंगे।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

25Nov 2019

“रास को श्रवण करने के लिए दिमाग की नहीं ह्रदय की आवश्यकता पड़ती है” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति पटना के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 नवंबर 2019 तक गर्दनीबाग, संजय गांधी स्टेडियम पटना में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।

श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

आज कथा पंडाल में बिहार सरकार में सहकारिता मंत्री श्री राणा रणधीर सिंह जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। उन्हें संस्था की ओर से स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

 

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि सुमती और कुमती सबके भीतर रहती है, ये कोई बड़ी बात नहीं है। अच्छे और बुरे विचार दोनों हमारे भीतर ही हैं लेकिन किसको हम प्रकट करना चाहें यह हम पर निर्भर करता है। हम किसको अपना साथी बनाना चाहते हैं अच्छे विचारों को या बुरे विचारों को। जहां सुमती होती है वहां सब सुख है, वहां परमानंद है, वहां परमात्मा मौजूद है और जहां कुमती हैं वहां विपत्ती आएंगी ही आएंगी। जो धर्म की राह पर चले वो सुमती और जो अधर्म का मार्ग पकड़े वो कुमती। जो सुमती और कुमती आपके संग से मिलती है। आपको अच्छा संग मिलेगा तो सुमती मिलेगी और बुरा संग मिलेगा तो कुमती मिलेगी।

महाराज श्री ने कहा कि जीवन की सफलता यह नहीं है की आप बहुत धनवान होकर अपने ही शरीर की पुष्टी करते रहें। शरीर की उपलब्धता यह है की जो भी तुम्हे प्राप्त है वो परमात्मा को समर्पित ना किया जाए तो वह सब व्यर्थ है, उसका होना ना होना बराबर ही है।

महाराज श्री ने की रास के बारे में बताते हुए कहा कि रास को श्रवण करने के लिए दिमाग की नहीं ह्रदय की आवश्यकता पड़ती है। अगर भगवान के इस रास में अकेले दिमाग का इस्तेमाल करेंगे सुनने में तो आपको इस रास में भगवान पर संदेह हो जाएगा और अगर आपको भगवान पर संदेह हो गया तो आपको नरकगामी बनना पड़ेगा। भगवान की ये रासलीला बड़ी उत्तम है, श्रेष्ठ है. बडे बड़े ऋषि भी इस रास को सुनकर ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।

23Nov 2019

“भागवत आपको सत्य की राह पर चलना सिखाती है” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

“भागवत आपको सत्य की राह पर चलना सिखाती है” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति पटना के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 नवंबर 2019 तक गर्दनीबाग, संजय गांधी स्टेडियम पटना में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान का ध्यान करें, कथा सुनें और अपने जीवन को कृतार्थ करें। भगवान की भागवत आपको सत्य की राह पर चलना सिखाती है। भागवत में कहा गया है कि सत्य ही है जिसका ध्यान करना चाहिए क्योंकि भगवान ही सत्य स्वरूप हैं। जो जीव सत्य का अनुसरण करते हैं, सत्य पर चलते हैं ईश्वर की कृपा उनपर अवश्य होती है।

 

महाराज श्री ने कहा कि जीव जीवन में दुख इसलिए पाता है क्योंकि वह कहता कुछ है और करता कुछ है। भगवान से भी झूठ बोलने में हमे संकोच नहीं होता, भगवान के शुभ कार्यों में भी अपराध करने से बचते नहीं हैं। कहा जाता है एक घर को तो डायन भी छोड़ देती है, तो हमे कम से कम धर्म को छोड़कर ही, वैसे तो झूठ कही नहीं बोलना चाहिए परन्तु जो भगवत सम्बंधित विषय हो तो वहां हमे झूठ नहीं बोलना चाहिए। वहां सत्यही स्वीकार करना चाहिए।

महाराज श्री ने कहा कि आजकल के माता पिता को लगता है कि बच्चों को धन दे दो तो सारी परेशानियां दूर हो जाएंगी लेकिन ऐसा कभी नहीं हो सकता। धन समस्याओं को हल नहीं करता है बल्कि आज के युग में धन भी अपने आप में बहुत बड़ी समस्या है। आप जब तक गरीब रहते हैं आपको कोई देखता नहीं है और जब आप धनवान होजाते हैं तो उम्मीदों की नजरों से सब देखते हैं। जब तक आप इन संसार के लोगों की इच्छाएं पूरी नहीं करोगे तब तक ये आपके शत्रु बनकर आपको परेशान करते रहेंगे। हल पैसा नहीं है बल्कि आपके संस्कार है, आप अपने बच्चों को पैसे देने से अच्छा है संस्कारवान बनाइए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपने मन्त्रो से जीवित कर दिया था।

महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।

शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।

बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।

इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।

महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।

महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।

महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।

दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।
महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"

भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

22Nov 2019

“अपनी नजर बदलिए आपके नजारे बदल जाएंगे : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

सन्यास का मतलब ही है मोह माया से मुक्ति : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति पटना के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 नवंबर 2019 तक गर्दनीबाग, संजय गांधी स्टेडियम पटना में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।

भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

कथा के तृतीय दिवस हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन "मेरे दिल की है एक आवाज दास हुँ राधे का " श्रावण कराया”।

आज कथा पंडाल में सांस्कृतिक मंत्री बिहार सरकार से श्री प्रमोद कुमार जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया।

महाराज जी ने कहा की आज कल गुरु जी अपने आपको ही मंदिरों में सजवाने में मस्त है । गुरु का मतलब जो गोविन्द से मिला दे , गुरु का मतलब ये नहीं है जो अपने आपको ही मंदिर में सजा दें। गुरुर साक्षात परम ब्रह्म "इस बात को तो मानेगें, गुरुर साक्षात परम ब्रह्म है कौन ? जब ब्रह्म की पूजा ही नहीं करने दोगें। गुरुर देवो महेश्वरः कहते है शिवलिंग को छूना नहीं देते, न शिव की पूजा करने दे रहे है न नारायण की पूजा करने दे रहे है महाराज जी ने कथा क्रम आगे बढ़ाते हुए कहा की इसी श्लोक के तीन चरणों को हम झूठा बता देते है और आखरी चरण को कहे देते है गुरुर साक्षात परम ब्रह्म है। एक चरण सत्य तीन चरण झूठे ये कैसे हो सकता है। संभव है नहीं तो यहाँ "साबधानी". आप सभी को रखनी चाहिए। वही गुरु श्रेष्ठ है जो गुरु गोबिंद की राह पर चलने के लिए हमें प्रसन्नता दे। भगवान से मांगना ही तो ये मांगो कि ऐसी दया करो “मेरा ही आत्म कल्याण हो जाये”। कभी कभी भगवान से भगवान को भी मांग लेना चाहिए। तब आनद आता है ।

महाराज श्री ने कहा कथा क्रम बढ़ाते हुए कहा की एक दुकान पर एक सेठ जी सामान बेच रहे थे वही पर एक महात्मा आ गये। महात्मा राम राम कर रहे थे ग्रहको की लाइन लगी थी और संत खड़े थे राम- राम कहे रहे थे। सेठ जी की दुकान पर ग्राहकों की भीड़ लगी थी क्या वो संत जी की राम - राम सुनेंगे। सेठ जी गुस्सा कर के मुनीम जी से बोले दे - दे इनको जो भी देना है, देकर विदा करों इनको। मुनीम जी बोले क्या चाहिए बताएं तो महात्मा जी बोले कुछ नहीं चाहिए हम तुम्हारें सेठ जी को सत्य बताने आये थे। महात्मा जी बोले हमें क्या पता था तुम्हारे सेठ जी अपना सत्य सुनने में दिलचस्पी ही नहीं लेंगे। तो मुनीम जी बोले क्या सत्य है, तो महात्मा जी बोले तुम्हारे सेठ की मृत्युं सातवे दिन होगी। मुनीम जी दौड़ते दौड़ते बोले सेठ जी , सेठ जी बोले क्या हुआ तो मुनीम जी बोले ये संत बहुत ज्ञानी लग रहे है तो सेठ जी बोले दान देकर विदा कर दो तो मुनीम जी बोले वो दान लेने नहीं आये वो आपको कुछ देने आये है। तो सेठ जी बोले मुझे नहीं चाहिए ज्ञान देख नहीं रहे कितनी लाइन लगी है ग्राहकों की मेरा तो यही ज्ञान है ईमान है। तो मुनीम जी ने कहा की महात्मा जी ये कहे रहे है। महात्मा जी बोले हमें तुमसे कुछ नहीं चाहिए था हम आपको ये बात बताने आये थे। पहले बाबा से राम राम अच्छा नहीं लग रहा था अब ग्रहक अच्छे नहीं लग रहे।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।

तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।

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21Nov 2019

भगवान में परम धर्म का निरूपण किया गया है : पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

श्रीमद भागवत में रस धर्म का निरूपण किया गया है। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

श्रीमद्भागवत कथा देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शांति सेवा समिति पटना के तत्वाधान में पं श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 नवंबर 2019 तक गर्दनीबाग, संजय गांधी स्टेडियम पटना में प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया गया । कथा के द्वितीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई।

आज कथा पंडाल पदाधिकारी जय नारायण सिंह जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि द्वितीय दिवस की कथा श्रवण कर अपने जीवन को धन्य करें। जीवन को पवित्र और धन्य करने के लिए उसी भागवत ग्रंथ को श्रावण करने के लिए आज इस कथा पंडाल में उपस्थित हुए है। महाराज जी ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन "हम भी कहे रा