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19Oct 2019

"जिसने श्रीमद्भागवत की शरण ग्रहण कर ली है उनका कल्याण निश्चित है"

"जिसने श्रीमद्भागवत की शरण ग्रहण कर ली है उनका कल्याण निश्चित है"

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 18 से 24 अक्टूबर 2019 तक प्रतिदिन गोमती नदी के निकट, खुनशेखपुर, सुल्तानपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के दूसरे दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा कि शुरूआत करते हुए कहा कि भागवत कथा को सुनने के बाद हम जो भी मांगते हैं वो हमें भागवत कथामृत से प्राप्त होता है। यहां एक ही समस्या है की हम दूसरे की समस्या को अपनी नहीं समझते, दूसरे की प्राप्ति हम अपनी प्राप्ति नहीं समझते, ये सबसे बड़ी समस्या है। लोग कहते हैं उसे मिला हमें क्या मिला, जब आप कुछ करोगे तभी तो आपको मिलेगा, बिना करे कुछ प्राप्त नहीं होता है। बनी हुई रोटी को भी खाने के लिए हाथ चलाना पड़ता है। यह भागवत आपको सबकुछ दे सकती है लेकिन उसके लिए आपको भी मेहनत करनी पडेगी, भागवत श्रवण करनी पडेगी।

महाराज श्री ने कहा कि जीवन में अगर एक दूसरे पर संदेह तो कोई बात नहीं लेकिन संदेह ज्यादा दिन तक हो तो बड़ी बात है। संदेह हो तो बात उसी समय खत्म कर देनी चाहिए तभी रिश्ते चलते हैं, किसी भी बात को लंबा खिचोगे तो रिश्ते बिगड़ जाएंगे। आप गृहस्थ में हैं तो सबसे ज्यादा जरूरी है उस संबंध को निभाना क्योंकि हमारे यहां बनाया जाता है बिगाड़ा नहीं जाता। हमारे संस्कारों में एक ही संबंध है जुड़ गया तो निभाओ।

महाराज श्री ने आगे कहा कि आप अपने बच्चों को साधु संतों से, महात्माओ से, गुरूजनों से आशीर्वाद दिलवाओ, तभी आपके बच्चे संस्कारवान बनेंगे। अपने बच्चों से कहिए की रोज माता पिता, दादा, दादी को प्रणाम किया करें। बेटियों को कहो की हाथ जोड़ कर राम राम, राधे राधे किया करें।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं।

भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।

श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।

यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।

18Oct 2019

“राम हमारे पूर्वज थे, हैं और रहेंगे, उनकी समस्या हम सब की समस्या है

“राम हमारे पूर्वज थे, हैं और रहेंगे, उनकी समस्या हम सब की समस्या है"

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 18 से 24 अक्टूबर 2019 तक प्रतिदिन गोमती नदी के निकट, खुनशेखपुर, सुल्तानपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के प्रथम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया

भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने भागवत प्रसंग की शुरूआत भागवत के प्रथम श्लोक से की
सच्चिदानन्द रूपाय विश्वोत्पत्यादि हेतवे तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयम नुमः
वासुदेव सुतं देवम् कंस चानुर मर्दनम् देवकी परमानंदम् कृष्णम् वंदे जगदगुरुम्।।

महाराज श्री ने कहा कि भागवत के प्रथम श्लोक में भगवान को प्रणाम किया गया है, उनके स्वभाव का वर्णन किया गया है, उनकी लीलाओं का वर्णन किया गया है। भागवत को समझना भगवान को समझने के बराबर है।

पूज्य महाराज श्री ने कथा में बताया की अगर हमारे बच्चों को शिक्षा ना दी जाए तो यह संसार कैसा होगा ? जो अनपढ़ लोग होते हैं जिन्हे अक्षर का ज्ञान नहीं होता है जब वो किसी बोध वाले व्यक्ति के पास जाते है तो उन्होंने शर्म महसूस होती है की यह सबकुछ जानता है, हम कुछ नहीं जानते, यह अच्छा बोलता है हम अच्छा बोल नहीं सकते क्योंकि वो साक्षर है और हम निराक्षर हैं। उस अक्षर का कितना महत्व है जो शुरू में हमे अ सिखाती है। अगर बच्चों को जबरदस्ती स्कूल भेजो तो वह मना कर देते हैं, शुरुआत में बच्चे स्कूल जाना पसंद नहीं करते। वैसे ही भागवत रूप यह कथा पंडाल ज्ञान का एक स्कूल है, आपका प्राइमरी स्कूल सिखाता है पैसा कैसे कमाएं लेकिन भागवत का यह कथा पंडाल आपको सिखाता है जीवन कैसे जीना चाहिए ? आप स्कूली और कथा पंडाल दोनों की शिक्षाओं से असहमत नहीं हो सकते।
महाराज श्री ने राम मंदिर पर भी अपनी बात रखते हुए कहा कि कुछ लोगों को लगता है राम मंदिर से हमारा लेना देना क्या है ? कुछ भारतीय जो तथाकथित रूप से अपने आपको सेक्यूलर समझते हैं वो कहते हैं राम से हमारा मतलब क्या है, राम मंदिर बना तो ठीक, नहीं बना तो ठीक। इस समाज में देश में कुछ भी घटना घट रही हो आप उससे पलला नहीं झाड सकते, वरना एक दिन वो आएगा ये समस्या आपके घर तक पहुंच जाएगी और आपको बचाने वाला फिर कोई नहीं होगा। आपके देश में अगर वो समस्या है तो वो आपकी समस्या है।

महाराज श्री ने कहा कि राम हमारी अस्मिता है, राम हमारी आस्था है आप अपना घर बदल सकते हैं, काम बदल सकते हैं लेकिन जन्म स्थान नहीं बदल सकते, अपने पूर्वज आप नहीं बदल सकते और राम हमारे पूर्वज थे, राम हमारे पूर्वज हैं और राम हमारे पूर्वज रहेंगे, उनकी समस्या हम सब की समस्या है। हम सबको यह प्रार्थना करनी चाहिए अब बहुत हो चुका अब राम का वनवास नहीं होगा, अब राम मंदिर का निर्माण होगा।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की एक बात सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगो का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा ।

कथा पंडाल में श्रीमद् भागवत कथा के यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

13Oct 2019

हरी की शरणागति जो लोग करते है और कल्याण उन्ही का हुआ।

सनातन धर्म मंदिर कैंट, Seattle Kent के द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के श्रीमुख से 06 से 12 अक्टूबर 2019 तक Sanatan Dharm Mandir Kent, Seattle Kent, WA में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।
श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन श्रवण कराया "तुम पग पग पर समझाते, हम फिर भी समझ न पाते" और फिर महाराज जी बताया की अरे मनुष्य जीवन का जो उत्तम अवसर तुम्हें मिला हैं, यह बार-बार नहीं मिलने वाला। गोविन्द का चिंतन करले ये समय बार बार नहीं मिलेगा। नहीं तो पछताना पड़ेगा, बार-बार जीना,बार-बार जन्म,बार-बार मरना पड़ेगा।इसलिए राजाओं ने भी अपने राज्य पद का भी त्याग किया। बड़े - बड़े धनवान लोगो ने धन का त्याग किया। हरी की शरणागति जो लोग करते है और कल्याण उन्ही का हुआ जिन्होंने हरी की शरणागति स्वीकार करी। जो लोग अपने इतिहास में रूचि नहीं रखते वो लोग पछताते है। उन्हें दुःख पाना ही पड़ेगा। हम अपने इतिहास को इग्नोर नहीं कर सकते।
अब एक बात बताइये शांति किसको नहीं चाहिए ? जब तक आप अपने लक्ष्य पर ध्यान नहीं देंगे तब तक आपको शांति प्राप्त नहीं होगी। महाराज जी बताया की सब कुछ छोड़ कर जो लोग गोविन्द की भक्ति - भजन और गोविन्द में खो गये उन्हें शांति प्राप्त हो गयी। जिन लोगो ने कृष्ण भगवान की भक्ति करली उन सभी भक्तों का कल्याण हुआ है। और शांति प्राप्त हुई है। और बताया की जो सबसे महत्पूर्ण है उसकी तरफ चलना चाहिए। वो है शांति, वो है आत्म, वो है कल्याण, वो है मोक्ष ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंत: सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

13Oct 2019

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज और श्री विजय शर्मा जी ने Seattle Kent में श्रीमद भागवत कथा की समाप्ति के बाद न्यूयॉर्क के लिए प्रस्थान किया।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज और श्री विजय शर्मा जी ने Seattle Kent में श्रीमद भागवत कथा की समाप्ति के बाद न्यूयॉर्क के लिए प्रस्थान किया।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

14Oct 2019

शरद पूर्णिमा महोत्सव का सुंदर एवं भव्य आयोजन ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर के प्रांगण में बड़ी हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।

।। राधे राधे ।। कल आश्विन शुक्ल पक्ष पर "शरद पूर्णिमा महोत्सव" का सुंदर एवं भव्य आयोजन ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर के प्रांगण में बड़ी हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। जिसमें हजारों की तादाद में देश विदेश से भक्त पधारे। जिसमें सभी भक्तों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया एवं सर्वप्रथम गणेश वंदना कर कार्यक्रम की शुरुआत की गई तथा जानेमाने कलाकारों के द्वारा ठाकुर श्री प्रियाकांतजू भगवान, सर्वेश्वरीश्री राधा रानी के प्यारे प्यारे भजनों की प्रस्तुति दी गई। अंत में ठाकुर श्री प्रियाकांतजू भगवान की आरती का कार्यक्रम का समापन किया गया। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

14Oct 2019

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज एवं श्री विजय शर्मा जी ने अमेरिका में शान्ति संदेश यात्रा 2019 को सम्पूर्ण करने के बाद भारत के लिए प्रस्थान किया।

पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज एवं श्री विजय शर्मा जी ने अमेरिका में शान्ति संदेश यात्रा 2019 को सम्पूर्ण करने के बाद भारत के लिए प्रस्थान किया।

 

15Oct 2019

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज एवं श्री विजय शर्मा जी का अमेरिका में आयोजित शांति संदेश यात्रा 2019 की समाप्ति के बाद भारत वापसी पर दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशन एयरपोर्ट पर फूलमाला पहनाकर सेकड़ो भक्तों ने भव्य स्वागत किया ।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज एवं श्री विजय शर्मा जी का अमेरिका में आयोजित शांति संदेश यात्रा 2019 की समाप्ति के बाद भारत वापसी पर दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशन एयरपोर्ट पर फूलमाला पहनाकर सेकड़ो भक्तों ने भव्य स्वागत किया । महाराज श्री के स्वागत के लिए सैकड़ों की तादाद में भक्त एयरपोर्ट पर उपस्थित रहे, सभी ने महाराज श्री को गुलदस्ते भेंट कर एवं राधे राधे के नारे लगाकर स्वागत किया। राधे राधे के नारों से पूरा एयरपोर्ट परिसर गुंजायमान हो उठा। पूज्य महाराज श्री ने अपनी माताजी एवं पूज्य पिताजी से आशीर्वाद प्राप्त कर अपने परिवारजनों के साथ ठा. श्री प्रियाकांत जू भगवान की आरती में सम्मिलित होकर दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। #WelcomeThakurJi

18Oct 2019

आज पूज्य महाराज श्री सुल्तानपुर पहुँचे जहां पर कथा के यजमान एवं अन्य भक्तों द्वारा महाराज श्री का स्वागत किया गया।

आज पूज्य महाराज श्री सुल्तानपुर पहुँचे जहां पर कथा के यजमान एवं अन्य भक्तों द्वारा महाराज श्री का स्वागत किया गया। पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में यहां 18-24 अक्टूबर तक श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। आप सभी भक्तगण महाराज श्री के यूट्यूब चैनल पर दोपहर 3 बजे से इसका सीधा प्रसारण देख सकते हैं।

 

10Oct 2019

हम जिन चीजों पर अभिमान करते हैं वह हैं क्या ?

सनातन धर्म मंदिर कैंट, Seattle Kent के द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के श्रीमुख से 06 से 12 अक्टूबर 2019 तक Sanatan Dharm Mandir Kent, Seattle Kent, WA में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया
भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि हम लोग खुशनसीब हैं की हमें मानव जीवन मिला है लेकिन जिन्हें जीवन का उद्देश्य समझ रहे हैं वही प्रर्याप्त नहीं है। हम जिन चीजों पर अभिमान करते हैं वह हैं क्या ? जवानी, धन औप पद ये तीन चीजें ऐसी हैं जो व्यक्ति को राह से भटकाती हैं, ये तीनों चीजें आती हैं तो व्यक्ति राह से भटक जाता है। जवानी पर कभी इतराना नहीं चाहिए क्योंकि जिस जवानी पर इतराते हो मत भूलना की कभी तुम्हारे पिता दादा भी जवान थे, जो पहले अकड़ कर चलते थे आज झूक कर चलते हैं। जो जवानी में झूक जाता है उसे बुढ़ापे में झूकने की जरूरत नहीं पड़ती। जिस प्रकार से कपूर उड़ जाता है कुछ दिखाई नहीं पड़ता उसी प्रकार से जीवन में से जवानी ऐसे उड़ जाती है पता भी नहीं चलता। इसिलिए ना जवानी पर, ना धन पर और ना ही पद पर कभी अहंकार किजिए, ये सब हमेशा नहीं रहती।
महाराज श्री ने आगे कहा कि अगर द्वार पर आया हुआ अतिथि निराश होकर चला जाए तो जीवन भर के सारे स्वीकृत नष्ट हो जाते हैं। गृहस्थी को ड्यूटी है की चाहे हमारे वहां कुछ भी होता रहे पर मेरे द्वार पर आया हुआ अतिथि निराश होकर नहीं जाना चाहिए, तभी हम गृहस्थी हैं, तभी हम लोग बड़े हैं क्योंकि हम अपने साथ-साथ समाज के लिए भी जीते हैं। जो अपने लिए जीता है वो पशुवत जीवन जीत है और जो सबके लिए जीता है वही सही मायने में गृहस्थी जीवन जीता है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली ने भगवान ब्रह्मा वरदान मांगा की मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने उसे वरदान दे दिया। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने विष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली से कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का सुंदर वर्णन श्रवण कराया। सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

11Oct 2019

कौन आपके साथ है और कौन नहीं।

सनातन धर्म मंदिर कैंट, Seattle Kent के द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के श्रीमुख से 06 से 12 अक्टूबर 2019 तक Sanatan Dharm Mandir Kent, Seattle Kent, WA में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जब तक जीवन में मुसीबते ना आएं तब तक आप निखर नहीं सकते और मुसीबतें आपको निखारने के साथ साथ समझदार भी बनाती हैं, साथ ही यह दिखाती भी हैं कि कौन आपके साथ है और कौन नहीं। सच मानो तो सिर्फ कृष्ण तुम्हारा है।

महाराज जी ने कहा कि भगवान उसको नहीं देखते जो बनावटी होता है। पुतना भगवान के सामने आई लेकिन भगवान ने उसे देखा तक नहीं क्योंकि वो कपट रूप बनाकर आई थी। हम भगवान के समक्ष जब भी जाते हैं तो जैसे हैं वैसे नहीं जाते, दिखाने के लिए जाते हैं। कभी कभार तो भक्ति भी दूसरों को दिखाने के लिए करते हैं खुद के लिए तो भक्ति भी नहीं करते।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

9Oct 2019

महाराज श्री ने बताया की दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ?

सनातन धर्म मंदिर कैंट, Seattle Kent के द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के श्रीमुख से 06 से 12 अक्टूबर 2019 तक Sanatan Dharm Mandir Kent, Seattle Kent, WA में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

पूज्य महाराज श्री ने कथा के तृतीय दिवस पर भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जिनका सम्बंध भगवान से है वो महत्वपूर्ण है। अगर आपका सीधा सम्बंध भगवान से ना हो तो जिनका सम्बंध भगवान से है आप उनसे अपना सम्बंध मजबूत कर लो। गुरू का सम्बंध गोविंद से है इसलिए अगर आपका सम्बंध गुरू के साथ हो जाएगा तो स्वत: ही गोविंद के साथ जुड़ जाएगा और जिनका सम्बंध गोविंद से जुड़ गया उन्हें पछताना नहीं पड़ेगा।

महाराज श्री ने बताया की दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा कि संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि हम लोग अपने हाथों से अपने ही लोगों को शमशान में जलाकर, मिट्टी को पानी में रखकर आते हैं और खुद ऐसे रहते हैं जैसे हम हमेशा अमर रहेंगे, कभी नहीं मरेंगे यही सबसे बड़ा आश्चर्य है।

महाराज श्री ने कहा कि ये मन बहुत गरीब है फंसा देता है। ये मन अगर इच्छाओं में लग गया तो मार देगा और मन अगर जरूरतें पूरी करके एक जरूरत बना ले की ठाकुर के बिना कुछ नहीं है तो यह मन तुम्हे तार देगा।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।

राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

26Sep 2019

कल जो बीत गया उसके बारे में सोचकर अपना आज बर्बाद ना करें।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 सितम्बर 2019 तक Texas में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीमद्भागवत कथा की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत में बताया की अगर कोई आपसे पूछे की आप नित्य इतनी मेहनत कर रहे हो ये किसके लिए कर रहे हो, तो आपका उत्तर क्या होगा ? सच्चाई तो यह है की हम शरीर को तोड़ कर कितनी भी कमाई कर लें ये शरीर के काम नहीं आने वाली, अंत में तो चाहे वो अमीर हो या गरीब हो सबके शरीर मिट्टी में मिल जाना है। आखिर हम इतनी मेहनत क्यों कर रहे हैं, सच तो यह है की हमे भी नहीं मालूम की हम यह क्यों कर रहे हैं, दुनिया भाग रही है इसलिए हम भी भाग रहे हैं, एक होड़ है एक दूसरे से आगे निकलने की।
महाराज श्री ने आगे कहा कि आज के व्यक्ति को टेंशन बहुत है, डिप्रेशन में चले जाते हैं। अगर आप अपनी चिंताओं से मुक्ति चाहते हैं तो इन तीन बातों का ध्यान रखें। पहली यह की आपने पहले तो अपराध किए हैं, पाप किए हैं उनके बारे में अब सोचकर चिंतित ना हो, क्यूंकि जो पीछे हो चुका है उसे आप बदल नहीं सकते। कल जो बीत गया उसके बारे में सोचकर अपना आज बर्बाद ना करें। दूसरा यह की जो आज है उस आज को जिएं, आने वाले कल के विषय में ना सोचें। कल के विषय में मत सोचिए क्योंकि कल भी हमने देखा नहीं है, कल कैसा होगा इसके बारे में अगर आप चिंता करेंगे तो अपना आज खराब करेंगे। ना पीछे के विषय में सोचें ना कल के विषय में सोचें बल्कि जो भी रचनात्मक कार्य हैं वो आज करें। जो आज आप रचनात्मक कार्य करेंगे तो निश्चित तौर पर आपका कल सूंदर, सफल होगा। तीसरी बात यह की यह संसार एक मंच है और हम सब उसमें अभिनय निभा रहे हैं, हमे जो भी अभिनय मिला हुआ है उस अभिनय को ईमानदारी से निभाना चाहिए उसमें बेईमानी नहीं होनी चाहिए। एक सबसे बड़ा सूत्र यह है की दिन में चार बार, तीन बार, दो बार, एक बार अपने आप को ठाकुर के समक्ष जरूर लेकर जाएं, उनके समक्ष बैठकर अपनी अब तक के किए गए कार्यों की जानकारी उन्हें दें।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

27Oct 2019

हर अंधेरे के बाद प्रकाश निश्चित है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 सितम्बर 2019 तक Texas में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया गया।

कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

श्रीमद्भागवत कथा की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि हमारे संतों ने एक बात कही है की बहुत मत चाहो, उसकी चाहत में अपनी चाह मिला दो तो सारी चाहत पूरी हो जाएंगी। रोज रोज नई नई चाहत उसके सामने प्रस्तुत करोगे तो चाहत कभी पूरी नहीं होगी, क्योंकि इस संसार में कोई भी कभी भी संतुष्ट नहीं होता है। सबका मन अशांत है और यह मन शांत होगा धीर गंभीर की शरणागती स्वीकार करने से, जिसने हरि की शरणागति स्वीकार कर ली वो प्रसन्न है और जिसने नहीं की वो प्रसन्न नहीं है। इच्छाएं बहुत हैं और इन इच्छाओं के पूर्ति के लिए उसकी मर्जी में अपनी मर्जी मिला दिजिए।
महाराज श्री ने कहा कि हर अंधेरे के बाद प्रकाश निश्चित है, लेकिन अगर अंधेरे में डगमगा जाएं, अंधेरे में आगर डुबने की तैयारी कर लें तो वो लोग कायर हैं। सबसे अच्छा काम ठाकुर पर भरोसा करना चाहिए, अपने आप को भगवान को समर्पित कर दो फिर आप देखेंगे तो वो हमेशा आप के साथ हैं।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

27Oct 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज एवं श्री विजय शर्मा जी ने टेक्सस में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के समापन के बाद Apple Valley, California के लिए प्रस्थान किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज एवं श्री विजय शर्मा जी ने टेक्सस में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के समापन के बाद Apple Valley, California के लिए प्रस्थान किया। 27 सितंबर से 01 अक्टूबर तक Sri Krishna Cultural Center, Apple Valley,CA में श्री शिव कथा का आयोजन किया जा रहा है।

27Sep 2019

जो राम, कृष्ण, नारायण की पूजा करते हैं उन्हें वैष्णव कहा जाता है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 27 सितंबर से 01 अक्टूबर 2019 तक श्रीकृष्ण कल्चरल सेंटर, एप्पल वैली में शिव कथा का आयोजन किया जा रहा है।

शिव कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जो राम, कृष्ण, नारायण की पूजा करते हैं उन्हें वैष्णव कहा जाता है और जो शिव जी की पूजा करते हैं उन्हें शैव्य कहा जाता है। लेकिन पुराणों में ऐसा वर्णन है वैष्णवा नाम शंभू। जैसे नदियों में गंगा सर्वश्रेष्ठ है वैसे ही वैष्णवों में बाबा भोलेनाथ श्रेष्ठ हैं। बाबा भोलेनाथ से बड़ा कोई वैष्णव नहीं है, हम और आप भोलेनाथ जैसी भक्ति नहीं कर सकते, उनसे श्रेष्ठ वैष्णव नहीं है कोई। हमारी वाणी को, चित्त को यह सौभाग्य ठाकुर जी ने दिया है कि हम बाबा भोलेनाथ से सीखें की वो कृष्ण भक्ति, राम भक्ति, नारायण भक्ति कैसे करते हैं।
महाराज श्री ने कहा कि शिव कथा हमे यह सीखाती है की हमें अपने आराध्य की सेवा कैसे करनी चाहिए ? हम लोग पूजा करते हैं हम वैष्णव है लेकिन हमने अपनी इच्छाएं कितनी बड़ा रखी हैं। भगवान की सेवा में तो कमी आ जाएगी लेकिन खुद की इच्छाओं में कभी कमी नहीं आएगी। शिव जी वैष्णवों के आचार्य हैं उन्होंने कहा है कि भले ही अपने लिए कपड़े ना हों लेकिन राम को राम को कभी मत भूलो, कृष्ण को कभी मत भूलों। अगर आप उनको याद रखोगे तो आपको कभी कोई कमी नहीं आएगी। महादेव सिखाते हैं की हमें अपने ईष्ट का किस तरह से आदर करना चाहिए।
महाराज श्री ने कहा कि हम लोग अपना जीवन खोते जा रहे हैं लेकिन उद्देश्य के करीब नहीं जा पा रहे हैं क्योंकि ना उद्देश्य है, ना ही विश्वास है। श्रद्धा होनी चाहिए, विश्वास होनी चाहिए लेकिन दोनों ही हमारे हाथ से जा रही है। आप जब कथा में बैठते हैं तो आपकी श्रद्धा उत्पन्न होती है, आपका उद्देश्य दृढ होता है। जब तक हम ठाकुर से ना जुड़े तब तक नेगेटिव बातें अच्छी लगती हैं और जब कथा से जुड़ जाएं और कथा सुनने लग जाएं तब हमें पॉजिटिव बातें ही अच्छी लगेंगी। समस्या है की आप संग किसका कर रहे हो, श्रवण क्या कर रहे हो।
महाराज श्री ने कहा कि शिव जी शीतलता का प्रतिक हैं, त्याग का प्रतिक हैं, मृत्यु का प्रतिक हैं। शीतलता रूपी गंगा को अपने सिर पर धारण किया हुआ हैऔर मृत्यु रूपी भस्म को अपने शरीर पर धारण किया हुआ है । बाबा भोलेनाथ भस्म इसलिए रमाते हैं की क्योंकि उनको लगता है कि जितनी भी चीजें हैं इस संसार की ये सब मिट्टी है, भस्म तो, सबसे बड़ी सम्मपत्ति अगर कोई है तो वो राम नाम है। राम नाम से बड़ी कोई सम्पत्ति संसार में नहीं है इसलिए शिव ने सिर्फ राम नाम को अपने पास रखा और कुछ नहीं रखा।

28Sep 2019

महाराज श्री ने बताया की सच्चा साधक बनने के लिए क्या करना चाहिए ?

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 27 सितंबर से 01 अक्टूबर 2019 तक श्रीकृष्ण कल्चरल सेंटर, एप्पल वैली में श्री शिव कथा का आयोजन किया जा रहा है।

शिव कथा के द्वितीय दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने शिव महापुराण की विशेष कथाओं का श्रवण भक्तो को कराया।

शिव कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान भोलेनाथ सच्चा विश्वास और मां पार्वती श्रद्धा हैं। हम लोग सिर्फ भगवत भक्ति की ही बात ना करें, नीजि जीवन की भी बात करें और हमारे रिश्तों में विश्वास ना हो, भरोसा ना हो तो वो रिश्ते कैसे होते हैं ? वो रिश्ते कभी अच्छे नहीं होते हैं। यहां पर विश्वास की बात हो रही है, आप जो भी भक्ति करते हैं चाहे राम की करें, शिव की करें, कृष्ण की करें लेकिन बिना विश्वास के करेंगे तो उस भक्ति का कोई लाभ नहीं है। आपका विश्वास आपका भरोसा आपका विकास करता है। जिस रिश्ते में आपका भरोसा होता है वो रिश्ता सुंदर होता है और जिस रिश्ते में आपका भरोसा नहीं होता है आप परेशान रहते हैं। अगर पति को पत्नी पर भरोसा ना हो, भाई को भाई पर भरोसा ना हो, पिता को पुत्र पर भरोसा ना हो तो वो रिश्ता कैसा होगा ? जब साधारण रिश्ते भी बिना भरोसे के अच्छे नहीं होते तो फिर यह तो भक्त भगवान का रिश्ता है इसमें तो भरोसा बहुत महत्वपूर्ण है।

महाराज श्री ने कहा कि राम, कृष्ण, नारायण को चाहने वाले लोगों को महादेव की पूजा अवश्य करनी चाहिए । अगर आप उनकी पूजा करेंगे, वो आपसे प्रसन्न होंगे तो वो आपको कृष्ण भक्ति, राम भक्ति सहज में प्रदान करेंगे।

महाराज श्री ने आगे कहा कि जब आप भक्ति रूप बीज बो दें तो कोई भी साधन रूप आसन पर ऊंचा बैठना चाहिए और ऊंचा बैठकर इंद्रियों पर नियंत्रण करना चाहिए क्योंकि जब आप भक्ति करने जाते हो तो इच्छाएं उत्पन्न होने लगती हैं, इंद्रियां दौड़ने लगती हैं, उन इंद्रियों को नियंत्रित करने के लिए संयम होना चाहिए। जब कान गलत सुनना चाहिए तो मत सुनिए, जब आंखें गलत देखना चाहें तो मत देखिए, वाणी कुछ गलत कहना चाहे तो मत कहिए। ये सब संयम के कोड़े हैं जो कोई और नहीं मारेगा बल्कि आपको खुद मारने पड़ेगे।

महाराज श्री ने बताया की सच्चा साधक बनने के लिए क्या करना चाहिए ? तीन कार्य प्रमुखता से करने चाहिए। सबसे पहला काम श्रवण करें, दूसरा कीर्तन करे, तीसरा मनन करें।

29Sep 2019

शास्त्रों में लिखा है जहां देवियों का सम्मान होता है वहां देवता रमण करते हैं।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 27 सितंबर से 01 अक्टूबर 2019 तक श्रीकृष्ण कल्चरल सेंटर, एप्पल वैली में श्री शिव कथा का आयोजन किया जा रहा है।

शिव कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य महाराज श्री ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि नवरात्रे प्रारंभ हुए सर्वप्रथम सभी भक्तो को शुभरात्रियों की मां दुर्गा के पूजा की आप सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं। माता रानी आप सभी पर कृपा करे। निश्चित बात तो ये है कि जब मां की कृपा होती है तो पिता जी की कृपा अपने आप हो जाती है। ये शुभ नवरात्रियां हैं, नवरात्र प्रारंभ हो गए हैं। निश्चित तौर पर ये विशेष दिन होते हैं मां दुर्गा के लिए ये शक्ति पूजा होती है इन दिनों में। मां की पूजा शक्ति की पूजा सबको सुख देने वाली सबको मंगल देने वाली मां दुर्गा, मां पार्वती जिनके 9 रूपों की पूजा इन 9 दिनों में की जाती है। उनमें से आज जो दिन में शैलपुत्री के रूप में की जाती है। मां लक्षमी की पूजा एक दिन दिपावली के दिन करते हैं। ब्रह्मा जी की पत्नी का पूजन कभी हम करते ही नही है। लेकिन पार्वती जी की पूजा हर दिन होती है। यहां सोचने की बात है कि पार्वती की पूजा हम हर दिन करते हैं। स्पेशल देवियां तो हमेशी करती है। शास्त्रों में लिखा है जहां देवियों का सम्मान होता है वहां देवता रमण करते हैं और अधिकांश इसकी वजह मां पार्वती ने हर वो कार्य किया है जिसकी वजह से व्यक्ति पूजा का अधिकारी हो जाता है। चाहे उसका संयमित जीवन हो हमेशा अपने पति के प्रति समर्पित हो। चाहे उनकी तपस्या करने का अपना स्थान हो। मां पर्वती ने भी तपस्या करने में कोई कमी नहीं छोड़ी। हम लोग तो एक बात जरूर समझ लें बिना कुछ शुभ कार्य किये न तो सम्मान प्राप्त कर सकते हैं और न तो पूजा प्राप्त कर सकते हैं। और कर भी लें तो वो हमेशा स्थिर नहीं होगा। जैसे कोई कर भी दें क्योंकि आजकल तो चापलूसों की कमी नहीं है। जहां आज कोई देखे आप को जेब में कोई डॉलर है तो आपकी चापलूसी करने में मस्त हो जाते हैं और प्रकार का व्यक्ति आप की चापलूसी करता है। लेकिन वो चापलूसी आपका सम्मान नहीं है और वो आपका तो नही है उस सम्पत्ति का है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति सम्पत्ति की जगह व्यक्ति का सम्मान करता है तो वे आपके सतगुणों का सम्मान करता है। आपके सतक्रमो का आदर है। मां पार्वती कितनी सतगुणी है। कई बार पिता को भी प्रेरित करती है आप ये भी कर दीजिए। धर्म पत्नी ऐसी ही होती है। जो अपने पति को भी शुभ कार्यों के लिए प्रेरित करती है। उनका नाम है धर्म-पत्नी अधर्म-पत्नी नही। आज कल घरों में व्यवचार क्यों हो रहे हैं। क्योंकि हम अधर्म पत्नी होते जा रहे हैं। हम लोगों को हॉटल के खाने के लिए प्रेरित करते हैं अपने पति को, हम डिस्को ले जाने के लिए प्रेरित करते हैं अपने पति को, हमें मूवी ले जाने के लिए प्रेरित करती हैं। लेकिन धर्म पत्नी इतनी अच्छी हैं। बाबा को पाने के लिए मां कितनी तपस्या करती है। फिर जो भी दीनहीन इनको दिखता है मां पार्वती प्रेरित करती है इस पर दया कर दीजिए। ऐसे कितने उदाहरण है शिव महापुराण में और यत्र-तत्र जहां मां पार्वती धर्म के लिए बाबा खुद धर्मात्मा नही है।

 

30Sep 2019

भक्ति कैसे करनी चाहिए ?

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 27 सितंबर से 01 अक्टूबर 2019 तक श्रीकृष्ण कल्चरल सेंटर, एप्पल वैली में श्री शिव कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के चतुर्थ दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भगवान शिव के परिवार की विशेषता का विस्तार पूर्वक वर्णन किया।

शिव कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जब तक मन नहीं सुधरेगा तब तक हमारा कोई भी कार्य सफल नहीं होगा, खासतौर पर आध्यात्मिक कार्य तो सफल होने वाला नहीं है।
महाराज श्री ने कहा कि वैष्णवों के परम आचार्य बाबा भोलेनाथ है जिन्होंने भक्ति कैसे करनी चाहिए ? वैष्णव की रहन सहन कैसी होनी चाहिए उसका स्वभाव कैसा होना चाहिए ? यह सबकुछ बाबा ने अपने जीवन से दर्शन करवाकर हमें प्रेरित किया है। शिव कथा शिवत्व को प्राप्त करवाती है, शिवत्व ही वैष्णवता है।
महाराज श्री ने कहा कि जीव को शिव कथा गुरू से समझनी चाहिए, अगर गुरू हमें सिखाएं तो निश्चित में हमारी भक्ति उत्तम होगी। अगर आप अपने आप से समझने की कोशिश करेंगे तो समझ में आएगा वहीं समझेंगे।
महाराज श्री ने कहा कि भगवान भोलेनाथ का परिवार भी वैष्णवता का सुंदर उदाहरण देता है जहां चुहा भी, सर्प भी, सिंह भी और नंद भी, जहां एक दुसरे में स्वाभाविक वैमनुष्यता रहती है, उसमें रहते हुए भी यहां स्वभाव परिवर्तन है। यहां सिंह हिंसक नहीं है, यहां सर्प विषैला नहीं है, यहां चुहा भय युक्त नहीं है।
महाराज श्री ने आगे कहा कि भगवान की कथा तीन चीजें देती है, निर्भयता, निश्चिंतता और निशोक, एक तो आपको भगवान की कथा निशोक कर देती है, आपको ज्ञान के उस लेवल पर लेकर जाती है जहां आपको कोई शोक नहीं होगा। दूसरा निश्चिंतता, कथा आपको निश्चिंत कर देती है, आपको किसी बात की चिंता करने की आवश्यकता नहीं होती, ठाकुर आपकी सारी चिंताओं को हर लेते हैं। तीसरा निर्भयता, कथा आपको निर्भय बना देती है, जिनका हाथ भगवान ने पकड़ लिया हो उन्हें किस बात से भय रखने की आवश्यकता है। इस संसार में भगवान राम कहते हैं, श्रीकृष्ण कहते हैं काल भी मेरा नाम सुनकर भयभीत हो जाता है तो जिनसे काल भयभीत हो जाए तो हम तो उनके दास हैं हमे भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। इसिलिए चुहा, सर्प के सामने बैठकर भी निर्भय है। यह भगवान शिव का परिवार हमें सिखाता है। बात उठती है की उस चुहे की तरह हम निर्भय क्यों नहीं है ? वह इसलिए क्योंकि शायद उस चुहें की तरह हमारा भरोसा नहीं है ना गणेश पर, ना शिव पर। उस मुष्क को पता है की मैं गजानन का हूं, मेरा यह सर्प कुछ नहीं बिगाड़ सकता, उसकी सीमा कहीं और होगी यहां तो शिव की सीमा है। भगवान शिव का परिवार में कितना सुंदर वैष्णव धर्म का ज्ञान करवाता है।
।। राधे –राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

1Oct 2019

पूज्य महाराज श्री ने भगवान शिव और माता पार्वति के बीच के संवाद का भी वर्णन किया।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 27 सितंबर से 01 अक्टूबर 2019 तक श्रीकृष्ण कल्चरल सेंटर, एप्पल वैली में श्री शिव कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के पंचम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने महाकालेश्वर शिवलिंग की महिमा का वर्णन भक्तों को कराया।

शिव कथा के पंचम दिवस की शुरुआत विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जिस परिवार में अच्छा व्यवहार नहीं होता वह परिवार नहीं है। अगर आप परिवार में रह रहे हैं तो आपको सबके साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए, जब तक हम अपने व्यवहार को नहीं संभालेंगे तब तक परिवार अच्छा नहीं बन सकता। वैसे गीता के दृष्टिकोण से देखें तो यह समूचा संसार ही हमारा परिवार है लेकिन अगर हम उस लेबल तक नहीं भी पहुंचे तो जिस परिवार में हम रहते हैं उसमें नित्य हमारी ममता होगी तो वो भक्ति नहीं होगी। यह परिवार परमात्मा की कृपा से हमें प्रसाद रूप प्राप्त हुआ है, अगर इस तरह की भावना आप रखेंगे तो वह परिवार नहीं उस परिवार की सेवा भी आपकी भक्ति होगी।

महाराज श्री ने कहा कि जहां से हमने शिव कथा की शुरूआत की वह हमारी भक्ति की जड़ है और जब तक जड़ मजबूत नहीं होगी हमारी तब तक कोई फल मिलने वाला नहीं है। हमें मन से यह विश्वास होना चाहिए की यह जो कथा है यह सत्य है, यह भगवान ने दिया हुआ है। यह भगवान ने दिया है तो भगवान का प्रसाद है और भगवान के प्रसाद का निरादर नहीं करते हैं।

पूज्य महाराज श्री ने भगवान शिव और माता पार्वति के बीच के संवाद का भी वर्णन किया। उन्होंने कहा कि एक बार माता पार्वती ने बाबा से पूछा की भगवान के अवतरण का क्या उद्देश्य है। बाबा बोले आपने बहुत सुंदर बात पूछी है इससे बाकी जीवों का भी कल्याण होगा। तो भगवान शिव ने बहुत सुंदर उत्तर दिया की राक्षसों के वध के लिए और देवताओं की सुरक्षा के लिए भगवान इस पृथ्वी पर आते हैं और भगवान के आने का एकमात्र जो उद्देश्य है वह है धर्म की स्थापना । जब जब इस पृथ्वी पर अत्याचार बढ़ते हैं, अधर्म बढ़ता है तब तब प्रभु अवतार लेते हैं। अनेको रूपों में भगवान आते हैं और भगवान का एकमात्र उद्देश्य धर्म की स्थापना और अधर्म का नाश।

महाराज श्री ने आगे कहा कि भगवान जो कार्य हमारे लिए करते हैं वह कार्य हमें भी करना चाहिए। यह संसार एक कुरूक्षेत्र है, हम ही अर्जुन है और हमको भगवान ने अर्जुन बनाकर इसलिए ख़ड़ा किया ही अपने जीते जी धर्म का उत्थान करो और अधर्म का विनाश करो। हम लोगों को लगता है की धर्म की स्थापना करना, धर्म की रक्षा करना भगवान का ही काम है। ऐसा नहीं है धर्मात्मा होकर धर्म की रक्षा कर सकते हैं, आप अधर्मी होंगे तो अधर्म को बढ़ावा देंगे। आपका प्रत्येक कर्म धर्म को बढ़ाने और घटाने का कार्य करता है। आपके प्रत्येक कर्म पर निर्भर है की भगवान की योजना सफल है की असफल। हालांकि हमारे हाथ में इतना कुछ नहीं है, हम कृष्ण नहीं बन सकते, गीता का उपदेश नहीं दे सकते लेकिन हम अपने आप को गीता का बताए हुए मार्ग पर चला सकते हैं।
।। राधे – राधे बोलना पड़ेगा ।।

2Oct 2019

आज पटना में भारी जलभराव के कारण आई परेशानी को देखते हुए विश्व शांति सेवा चैरिटेबल समिति पटना एवं मेरा भारत मेरा स्वाभिमान के मेंबरों ने वहा के लोगो को भोजन वितरण किया।

आज पटना में भारी जलभराव के कारण आई परेशानी को देखते हुए विश्व शांति सेवा चैरिटेबल समिति पटना एवं मेरा भारत मेरा स्वाभिमान के मेंबरों के द्वारा जो लोग घर से बाहर नहीं आ पा रहे हैं उन जरूरतमंद लोगों को घर घर जाकर खाने के पैकेट, पानी की बोतल एवं जरूरतमंद चीजों का वितरण किया।

2Oct 2019

जो भगवान का भजन करता है भगवान उनका भजन करते है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 02 से 05 अक्टूबर 2019 तक स्थान – Bhakta Temple, Norwalk CA में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीकृष्ण कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के प्रथम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीकृष्ण कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जब तक प्रभु की कृपा हमारे जीवन में ना हो तब तक सत्संग हमें प्राप्त नहीं होता। सत्संग प्रभु कृपा से प्राप्त होता है। यहां दो चीजें हैं एक तो सत्संग पा लिया और दूसरा सत्संग जी लिया। जिनको जीवन में सत्संग मिल जाता है वो अपने जीवन के मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं लेकिन जिनका जीवन ही सत्संग बन जाए वो दूसरों के मोक्ष के कारण बन जाते हैं।

महाराज श्री ने कहा कि हरि को छोड़कर व्यक्ति अपनी चतुरता समझता है धन कमाने में, दूसरों को बेनकूफ बनाने में। धन कमाना चतुराई नहीं है, दूसरों को बेवकूफ बनाना चतुराई नहीं है, चतुराई तो एक ही चीज में है जो इस संसार में आने के बाद लोक भी संभाल ले और परलोक भी संभाल ले, जिसने दोनों संभाल लिए वहीं सबसे बड़ा चतुर है।

महाराज श्री ने कहा कि कथा श्रवण मात्र से मंगल करती है। एक उम्र में पहुंच जाने के बाद कथा नहीं छुटनी चाहिए। कथा अगर श्रवणरंधों में पड़ती रही तो जीवनभर तुम्हारे कदम रूकेंगे नहीं और जिनके श्रवणरंधों में कथा नही पड़ती कुछ और पड़ जाता है वो भटक जाते हैं। वैसे तो कथा सुनने की शुरूआत बचपने से, जवानी से होनी चाहिए और वो इतनी जबरदस्त होनी चाहिए जिससे आपका बुढ़ापा सुधर जाए। जब जब आप कथा में आकर बैठोगे एक नया संगीत, एक नई राह आपको मिलेगी।

महाराज श्री ने आगे कहा कि जब भी हम भगवान की कथा सुनते हैं तो एक नई कमी हमारे आगे आती है की ये हमारी गलती है इसको परिवर्तित कर लिया जाए तो और भी सुंदर हुआ जा सकता है।

महाराज श्री ने कहा कि भगवान ने स्वयं इस बात को कहा है कि जो भी जीव मेरा भजन करता है मैं उसका भजन करता हूं और जो मेरी कथा सुनता है मैं उसकी कथा सुनता हूं।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

3Oct 2019

ये मानव जीवन ही ऐसा है जहां आप प्रयास भी कर सकते हैं और प्राप्त भी कर सकते हैं।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 02 से 05 अक्टूबर 2019 तक स्थान – Bhakta Temple, Norwalk CA में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीकृष्ण कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के द्वितीय दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भक्तों को बताया की प्रभु को किस प्रकार से प्राप्त किया जा सकता है।

श्रीकृष्ण कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान को जब जीव के ऊपर असीम अनुकमपा करनी होती है तब भगवान जीव को मानव शरीर देते हैं। शरीर तो अनेकों योनियों में मिलेगा ही वृक्ष भी शरीर ही है, मछली बना दे तो वो भी शरीर ही है। परंतु मानव शरीर जब देते हैं तो अपनी असीम करूणा बिखरते हैं। या हम यह भी कहते हैं की जब जिस आत्मा से मिलने का मन परमात्मा का करता है उसे विकल्प देते हैं की मैं तुझे श्रेष्ठ विकल्प दे रहा हूं की जाओ अब कुछ ऐसा करो जैसे मेरा मन कर रहा हैं तुमसे मिलने का वैसे तुम्हारा मन भी करे, फिर हम दोनों मिलेंगे। मानव जीवन मिलने के बाद यह आपकी जिम्मेदारी है की आप प्रभु को प्राप्त करें। ये मानव जीवन ही ऐसा है जहां आप प्रयास भी कर सकते हैं और प्राप्त भी कर सकते हैं।

महाराज श्री ने आगे कहा कि भगवत प्राप्त के साधन तो बहुत हैं लेकिन वह आसानी से प्राप्त नहीं होते हैं। भगवान को आसानी से प्राप्त करने का सिर्फ एक ही मार्ग है और वो है सत्संग। जीव को सद्पुरूषों का, संतों का संग करना चाहिए क्योंकि संतों का संग आपको भक्ति की ओर लेकर जाता है।

महाराज श्री ने कहा कि हमे अपने बच्चों का लालन पोषण बहुत ही सावधानी के साथ करना चाहिए। वो मां बाप बहुत भाग्यशाली हैं जो धनवान तो हैं की साथ ही उनके बच्चे संस्कारी है। जिन धनवान मां बाप के बच्चे संस्कारी है उनके पास वह सबसे बड़ी समपत्ति है। आपके अपने बच्चों को कितना भी पैसा दे दो कोई बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात है की क्या वो ऐसे इंसान बन पाए की वो इंसान होकर इंसान की इज्जत कर सके। इंसान होकर भी जो इंसान की इज्जत ना कर सके वो कितना भी धनवान हो जाए वो किसी काम का नहीं है। संस्कार बच्चों को माता पिता से ही मिलते हैं और माता पिता को चाहिए की वो इस लायक बनें की वो अपने बच्चो को धन चाहे दे या ना दें लेकिन अच्छे संस्कार अवश्य दें।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

4Oct 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया की सत्संग से लोगों का जीवन बदल गया है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 02 से 05 अक्टूबर 2019 तक स्थान – Bhakta Temple, Norwalk CA में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीकृष्ण कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के तृतीय दिवस पर पूज्य महाराज श्री कृष्ण जन्म का वृतांत भक्तों को सुनाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव मनाया।

श्रीकृष्ण कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि अगर आपको भगवान पर विश्वास है तो वह हर जगह है। भक्त पुकारते हैं तो भगवान दौड़े चले आते हैं। प्रह्लाद ने सच्चे मन से पुकारा था तो भगवान खम्बा फाड़ कर बाहर निकल आए थे। आपको भगवान पर विश्वास करना पड़ेगा, अगर आपको विश्वास नहीं है तो वो आपको कभी नहीं मिलेंग। प्रह्लाद ने सत्संग से गोविंद को पहचाना और भगवान ने हर जगह प्रह्लाद की रक्षा की, वैसे ही हमे भी भगवान को सत्संग से पहचानना चाहिए, भगवान हमारी भी रक्षा करेंगे।

महाराज श्री ने कहा कि हमे एक साथ दो कार्य नहीं करना चाहिए, एक बार में एक कार्य करोगे तो कार्य उत्तम होगा। अगर आप सत्संग के साथ दूसरा कार्य करेंगे तो कुछ समझ में नहीं आएगा। सत्संग का मतलब है की उस समय सत्संग ही करें, जब हम सत्संग करते हैं तो हमारे भीतर तक उसका असर होता है। जब हम सत्संग करें और साथ ही कुछ और कार्य करें तो कुछ भी समझ नहीं आएगा। ऐसे कई उदाहरण है जिसमें सत्संग से लोगों का जीवन बदल गया है।

महाराज श्री ने कहा कि सम्पूर्ण शरीर की क्रियाओं से अहंकार का परित्याग कर भगवान की लिलाओं में, भगवान की क्रियाओं में चित्त को लगाना चाहिए और यह सब जो मेरे पास है यह परमात्मा का है ऐसा विचार मन में रखना चाहिए। बंधन में वो है जो कहता है ये मेरा है और बंधन मुक्त वो है जो कहता है मेरा कुछ भी नहीं है। मैं संसार में खाली हाथ आया और खाली हाथ जाऊंगा, जब खाली हाथ आया और खाली हाथ जाना है तो संसार में मेरा है क्या ?

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

6Oct 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज और श्री विजय शर्मा जी ने श्री कृष्ण कथा की समाप्ति के बाद California से Seattle को प्रस्थान किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज और श्री विजय शर्मा जी ने श्री कृष्ण कथा की समाप्ति के बाद California से Seattle को प्रस्थान किया। Seattle में 06 से 12 अक्टूबर तक श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जाएगा।

 

6Oct 2019

आज पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज एवं श्री विजय शर्मा जी Seattle पहुँचे, जहां पर आयोजको के द्वारा महाराज श्री का स्वागत किया गया।

आज पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज एवं श्री विजय शर्मा जी Seattle पहुँचे, जहां पर आयोजको के द्वारा महाराज श्री का स्वागत किया गया। Seattle में महाराज श्री के सानिध्य में 06 से 12 अक्टूबर 2019 तक श्री मदभागवत कथा का आयोजन किया जाएगा।

5Oct 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया की "संसारिक चर्चा करने वाला मित्र सिर्फ संसार में ही फंसा रहता है।"

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 02 से 05 अक्टूबर 2019 तक Norwalk CA में श्रीकृष्ण कथा का आयोजन किया गया। कथा के चतुर्थ दिवस पर पूज्य महाराज श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को सुनाया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि संसारिक चर्चा करने वाला मित्र सिर्फ संसार में ही फंसा रहता है। लेकिन भागवत की चर्चा करने वाले हमें ईश्वर से मिलाने की बात करेंगे है तो मित्र उन्हें ही बनाओ जो भगवत की चर्चा करने वाले हैं। जो कृष्ण प्रेमी है, जो रसिक जिज्ञासु हैं, जो पिपासु है उन्हें भगवत कथाओं का रसास्वादन हमेशा करना चाहिए, ये एक सबसे बड़ा काम है।

महाराज श्री ने कहा कि ईश्वर सब जगह है लेकिन वही व्यक्ति दर्शन कर सकता है जिस पर गुरु की कृपा होती है। ईश्वर किसी की सिफारिश नही करता, लेकिन संत भक्तों की सिफारिश करता है ईश्वर से, इसलिए ईश्वर से ज्यादा संतों में ज्यादा गुण है। जो गुण भगवान में नही वो गुण संतो में होते है। संत वो कर सकते हैं जो आज साइंस भी नहीं कर सकती है। भगवान सिर्फ व्यक्ति के क्रम पर फल देते हैं। लेकिन संत वो होते हैं जो एक बार सिफारिश कर दें तो ईश्वर उसे जरूर करता है। संत की कृपा से आपको दुनिया में भी मौज है स्वर्ग में भी। ईश्वर कहता है मुझसे ज्यादा संतो का आदर और सम्मान करो।

7Oct 2019

आपके जीवन का उद्देश्य क्या है ।

सनातन धर्म मंदिर कैंट, Seattle Kent के द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के श्रीमुख से 06 से 12 अक्टूबर 2019 तक Sanatan Dharm Mandir Kent, Seattle Kent, WA में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

श्रीमद्बागवत कथा से पूर्व सुबह पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में भागवत पूजन किया गया एवं कलश यात्रा निकाली गई जिसमें भक्तों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।

श्रीमद्भागवत कथा की शुरूआत विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के कथा की शुरूआत भागवत के प्रथम श्लोक से की

सच्चिदानन्द रूपाय विश्वोत्पत्यादि हेतवे तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयम नुमः

वासुदेव सुतं देवम् कंस चानुर मर्दनम् देवकी परमानंदम् कृष्णम् वंदे जगदगुरुम्।।

पूज्य महाराज श्री कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि यह जो भागवत कथा है यह इतनी सरल नहीं है, करोड़ो जन्मों का पुण्य जब अर्जित होता है तब जाकर तब जाकर भागवत श्रवण करने का अवसर प्राप्त होता है।

महाराज श्री ने कहा कि भगवान की प्राप्ति बिना साधन के नहीं होती और यह मानव जीवन धन कमाने के लिए नहीं मिला है। जीवन जीना है इसलिए कमाना जरूरी है लेकिन यह मेरा उद्देश्य नहीं होना चाहिए। अपने उद्देश्य को नहीं भूलना चाहिए, सबसे पहले पता करें की आपके जीवन का उद्देश्य क्या है ? अगर आपको नहीं पता है तो आप अपने जीवन के साथ खेल रहे हैं। हमारा जन्म जीवन के साथ खेलने के लिए नहीं हुआ है, यह जीवन बहुत सुंदर है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार नैमिषारणय में सनकादिक ऋषि विराजमान थे तभी वहां परम श्रद्धेय सूद जी महाराज पधारे। जब सूद जी महाराज वहां पधारे तो उन्हें एक बहुत सुंदर आसन दिया और वहां पर उनको बैठाया। तो सभी ऋषियों ने सूद जी महाराज से ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

8Oct 2019

हम जिसे भाग्य कहते हैं वो कर्म से बनता है।

सनातन धर्म मंदिर कैंट, Seattle Kent के द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के श्रीमुख से 06 से 12 अक्टूबर 2019 तक Sanatan Dharm Mandir Kent, Seattle Kent, WA में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

भागवत के द्वितीय दिवस की शुरूआत विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि आजकल हम लोग कही ओर ही खोए बैठे हैं। किताबों, उपन्यासों को पड़ते रहते हैं, टीवी देखते रहेंगे, टाइम खराब करते रहेंगे। हमे ना लोक की परवाह है ना ही परलोक की परवाह है, हम अपने कल्याण के संदर्भ में नहीं सोचते हैं। कई लोग बड़े गर्व के साथ कहते हैं मरने के बाद क्या जाने क्या होता है, किसने देखा है ? यह मत सोचिए की कुछ नहीं होता है, बहुत कुछ होता है। अगर कुछ नहीं होता, आपके जन्मों का प्रारब्ध नहीं होता तो जो आपको इस जन्म में मिला है वो कैसे मिल गया ? हम जिसे भाग्य कहते हैं वो कर्म से बनता है, आपके कर्म ऐसे थे जो आपको यहां सबकुछ मिल गया। अगर कर्म बिगड़ जाएंगे तो मिला हुआ भी नष्ट हो सकता है।

महाराज श्री ने कहा कि आजकल के माता पिता अपने बच्चे को पैदा होते ही मोबाइल पकड़ा देते हैं। अगर आगे जाकर आपका बच्चा मोबाइल का दिवाना हो जाता है तो इसमें गलती माता पिता की है। कम से कम जब तक बच्चा 12th ना कर ले तब तक उसे मोबाइल नहीं देना चाहिए। बच्चों के पैदा होते ही उनमें संस्कार डालने का कार्य किजिए ना की उनके हाथ में मोबाइल दिजिए। अगर आपका बच्चा मोबाइल प्रेमी ना होकर संस्कारी होगा तो कितना अच्छा होगा। अगर बच्चों को बहुत जरूरी है और मोबाइल देना ही है तो उन्हें उसका इस्तेमाल बताइए।
महाराज श्री ने कहा कि जिन लोगों को कथा में नींद आती है वो उन्हें उनके कर्मों की वजह से आती है और जो सचेत हों उन्हें कथा में नींद नहीं आती है। उन्होंने आगे कहा कि राम पर संदेह करना सबसे बड़ा गुनाह है, आप धर्म पर संदेह करते हैं। यहां बहुत से लोग मिल जाएंगे जिन्हें धर्म पर, भगवान पर संदेह रहता है। लेकिन जो भगवान के सच्चे भक्त होते हैं वो एक बात जानते हैं की मेरे ठाकुर जी तुमसे बढ़िया कोई कर नहीं सकता।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओं का गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं।
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

8Oct 2019

हम जिसे भाग्य कहते हैं वो कर्म से बनता है।

सनातन धर्म मंदिर कैंट, Seattle Kent के द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के श्रीमुख से 06 से 12 अक्टूबर 2019 तक Sanatan Dharm Mandir Kent, Seattle Kent, WA में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

भागवत के द्वितीय दिवस की शुरूआत विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि आजकल हम लोग कही ओर ही खोए बैठे हैं। किताबों, उपन्यासों को पड़ते रहते हैं, टीवी देखते रहेंगे, टाइम खराब करते रहेंगे। हमे ना लोक की परवाह है ना ही परलोक की परवाह है, हम अपने कल्याण के संदर्भ में नहीं सोचते हैं। कई लोग बड़े गर्व के साथ कहते हैं मरने के बाद क्या जाने क्या होता है, किसने देखा है ? यह मत सोचिए की कुछ नहीं होता है, बहुत कुछ होता है। अगर कुछ नहीं होता, आपके जन्मों का प्रारब्ध नहीं होता तो जो आपको इस जन्म में मिला है वो कैसे मिल गया ? हम जिसे भाग्य कहते हैं वो कर्म से बनता है, आपके कर्म ऐसे थे जो आपको यहां सबकुछ मिल गया। अगर कर्म बिगड़ जाएंगे तो मिला हुआ भी नष्ट हो सकता है।

महाराज श्री ने कहा कि आजकल के माता पिता अपने बच्चे को पैदा होते ही मोबाइल पकड़ा देते हैं। अगर आगे जाकर आपका बच्चा मोबाइल का दिवाना हो जाता है तो इसमें गलती माता पिता की है। कम से कम जब तक बच्चा 12th ना कर ले तब तक उसे मोबाइल नहीं देना चाहिए। बच्चों के पैदा होते ही उनमें संस्कार डालने का कार्य किजिए ना की उनके हाथ में मोबाइल दिजिए। अगर आपका बच्चा मोबाइल प्रेमी ना होकर संस्कारी होगा तो कितना अच्छा होगा। अगर बच्चों को बहुत जरूरी है और मोबाइल देना ही है तो उन्हें उसका इस्तेमाल बताइए।
महाराज श्री ने कहा कि जिन लोगों को कथा में नींद आती है वो उन्हें उनके कर्मों की वजह से आती है और जो सचेत हों उन्हें कथा में नींद नहीं आती है। उन्होंने आगे कहा कि राम पर संदेह करना सबसे बड़ा गुनाह है, आप धर्म पर संदेह करते हैं। यहां बहुत से लोग मिल जाएंगे जिन्हें धर्म पर, भगवान पर संदेह रहता है। लेकिन जो भगवान के सच्चे भक्त होते हैं वो एक बात जानते हैं की मेरे ठाकुर जी तुमसे बढ़िया कोई कर नहीं सकता।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओं का गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं।
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

25Sep 2019

इस जीवन में कुछ ऐसे कर्म करो, ऐसे धर्म के कार्य करो जिससे इस भवसागर से पार हो जाओ।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 सितम्बर 2019 तक Texas में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि बड़ों को, युवाओं को, बच्चों को एक बार का विशेष तौर पर ध्यान रखना चाहिए वो है आपका समय। जब हमारा अच्छा समय होता है तब हम लापरवाह होते हैं और जब बुरा वक्त होता है तो सचेत रहते हैं। सबसे अच्छा समय होता है हमारी जवानी को जब हम बेपरवाह होते हैं, जो मन किया कर लिया, जो मन ने चाहा खा लिया, जो मन ने चाहा पहन लिया। लेकिन आप यह सोचिए ना की आज का बीज कल फसल बनेगा। जो जवानी में हमने कर्म किए हैं वो बुढ़ापे में हमें काटना पड़ेगा। एक बात समझ लिजिए आपके द्वारा किए गए कर्मों का फल आपको ही भोगना है, चाहे वो अच्छा है या बुरा है। जीवन में अगर कोई विपत्ति आए तो यह नहीं कहना चाहिए की हमने दूसरे ने दुख दिया है, किसी की हिम्मत नहीं है की आपको दुख देदे। जब तक आपने बीज नहीं बोया है आपको दुख नहीं मिलेगा।
महाराज श्री ने कहा कि जो शरण में आए हुए व्यक्ति को हित और अनहित सोचकर उसका त्याग कर देते हैं उनको देखते ही हानि होती है। हमलोग कहते हैं मानव धर्म सबसे बड़ा है, वो तब सबसे बड़ा है जब हम उस धर्म की परिभाषा को ठीक से समझ लें। जो आपकी शरण में आता है उसकी मदद करना आपका धर्म है, आपकी जिम्मेदारी है। उन्होंने आगे कहा कि संसार से आपने तमाम रिश्ते बना रखे हैं उन्हें बनाए रखिए, लेकिन इतने रिश्तों में एक रिश्ता ठाकुर जी से भी जोड़ लो।
महाराज श्री ने कहा कि इस जीवन में कुछ ऐसे कर्म करो, ऐसे धर्म के कार्य करो जिससे इस भवसागर से पार हो जाओ। ऐसे कर्म करना की खुद भी तरना, अपने मां बाप को भी तारना और बड़े कर्म करो तो अपने पूरे परिवार को लेकर तर जाओ ऐसे कर्म करो।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

19Sep 2019

ये मन स्वान की तरह है जैसे स्वान किसी एक का नहीं होता वैसे ही हमारा मन किसी एक जगह पर नहीं टिकता।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 13 से 19 सितंबर 2019 तक Hindu Temple Of Greater Chicago में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीमद्भागवत कथा की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की ये मन जब मोहन से दूर जाता है तो भटकता है और फिर दुःख पाता है जिसके लिए हमारे कविओं ने भी बड़ा सुंदर लिखा है की ये मन स्वान की तरह है जैसे स्वान किसी एक का नहीं होता वैसे ही हमारा मन किसी एक जगह पर नहीं टिकता।

अगर हमारा मन संसार का होकर रहेगा तो ये दर दर भटकेगा ही और इसकी दुर्गति निश्चित होगी ही,और अगर आप अपने सांवरे में मन लगाएंगे तो आपका मन दर- दर नहीं भटकेगा क्यूंकि जो जीव ईश्वर का हो जाता है वो सर्वप्रिय हो जाता है।

महाराज श्री ने रामायण की एक चौपाई का उदहारण देते हुए कहा की जिसपर ईश्वर कृपा करते है उस पर सभी कृपा करते है और जिसपे ईश्वर कृपा नहीं करते उस पर कोई कृपा नहीं करते सब उसका साथ छोड़कर चले जाते है जिनको वो अपना समझता है।

धनबल,जनबल,विवेकबल,ज्ञानबल,भक्तिबल,पदबल,जितने भी संसार में बल है ये सभी हमे ईश्वर के द्वारा प्राप्त है, जो भी बल हमें ईश्वर के द्वारा प्राप्त है उसपर हमें कभी अभिमान नहीं करना चाहिए क्यूंकि जिसने ये सब आपको दिया है वो आप से ये सबकुछ कभी भी वापस ले सकता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

19Sep 2019

शिकागो में आयोजित श्रीमद भागवत कथा को सम्पूर्ण करने के पश्चात टेक्सस में 20 सितम्बर से 26 सितम्बर 2019 तक आयोजित श्रीमद भागवत कथा के चलते महाराज श्री ने आज टेक्सस के लिए प्रस्थान किया।

शिकागो में आयोजित श्रीमद भागवत कथा को सम्पूर्ण करने के पश्चात टेक्सस में 20 सितम्बर से 26 सितम्बर 2019 तक आयोजित श्रीमद भागवत कथा के चलते महाराज श्री ने आज टेक्सस के लिए प्रस्थान किया। महाराज श्री को छोड़ने के लिए शिकागो के भक्त एयरपोर्ट पर आये, इस सफल आयोजन के लिए महाराज श्री ने विश्व शांति सेवा मिशन के सदस्यों ,आयोजकों एवं सभी भक्तों को साधुवाद दिया। #ThakurJiInUSA

20Sep 2019

मनुष्य जीवन पाना बहुत दुर्लभ है - पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 13 से 19 सितंबर 2019 तक Hindu Temple Of Greater Chicago में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

श्रीमद्भागवत कथा की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की भगवान् ने आपको बहुत ही सुन्दर उपहार के रूप में ये मानव जन्म दिया है लेकिन आप इसको सांसारिक भोग विलासों के चक्कर में व्यर्थ कर रहें है, क्यूंकि मानव जीवन का उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ ईश्वर को पाना है।
शास्त्रों में लिखा है की भगवान् कहते है की आपको किसी के बारे में सोचने की जरूरत नहीं है आप सिर्फ मेरा ध्यान करो और आपकी सारी जिम्मेदारियां को मैं पूरा करूँगा।
मानव जीवन ही वो द्वार है जिससे आपको मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है, लेकिन जब जब हमें ये मानव जीवन मिलता है हम भोग विलासों में उलझ कर रह जाते है और सत्संग रुपी कथामृत हमसे छूट जाता है।
महाराज श्री ने बताया की अगर आप पूरे सात दिन विधि -विधान से सम्पूर्ण भागवत कथा का श्रवण करते है और उसके बाद कोई पाप नहीं करते तो आपको मोक्ष की प्राप्ति होना निश्चित है। क्यूंकि श्रीमद भागवत कथा कलयुग के लोगों के लिए सहज कल्याण का मार्ग है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

20Sep 2019

पूज्य महाराजश्री टेक्सास पहुंचे यहां महाराज श्री का स्वागत श्रीराम मंदिर बोर्ड के सदस्यों द्वारा किया गया।

आज पूज्य महाराजश्री टेक्सास पहुंचे यहां महाराज श्री का स्वागत श्रीराम मंदिर बोर्ड के सदस्यों द्वारा किया गया। पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में यहां 20-26 सितंबर तक श्रीमद्भागवत का आयोजन किया जा रहा है।

21Sep 2019

भागवत को समझना भगवान को समझने के बराबर है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 सितम्बर 2019 तक टेक्सास में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

कथा से पूर्व कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई, जिसमें कनाड़ा के भक्त प्रेमियों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।

भागवत के प्रथम दिवस की शुरूआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के कथा की शुरूआत भागवत के प्रथम श्लोक से की
सच्चिदानन्द रूपाय विश्वोत्पत्यादि हेतवे तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयम नुमः
वासुदेव सुतं देवम् कंस चानुर मर्दनम् देवकी परमानंदम् कृष्णम् वंदे जगदगुरुम्।।

महाराज श्री ने कहा कि भागवत के प्रथम श्लोक में भगवान को प्रणाम किया गया है, उनके स्वभाव का वर्णन किया गया है, उनकी लीलाओं का वर्णन किया गया है। भागवत को समझना भगवान को समझने के बराबर है।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की आप लोग बहुत भाग्यशाली है इस वजह से आपको पितृ पक्ष में श्रीमद भागवत कथा श्रवण करने का सुनेहरा अवसर प्राप्त हुआ है, इन सात दिनों में भागवत कथा श्रवण करने का फल ना सिर्फ आपको मिलेगा बल्कि ये फल आपके पितरो को भी मोक्ष की प्राप्ति कराएगा।

महाराज श्री ने पितृ पक्ष का महत्व बताते हुए कहा की पितरो का आशीर्वाद हमारे जीवन में बहुत जरुरी है अगर हमारे पितृ हमसे रूठ जाए तो वंश आगे नहीं बढ़ता, घर में कलेश रहता है, व्यापार में नुक्सान होता है और घर में अशांति का वातावरण फ़ैल जाता है।

महाराज श्री ने बताया की हमें भगवान से पहले अपने पितरो की पूजा करनी चाहिए, पितरो के कल्याण का सबसे सफल और सुंदर मार्ग श्रीमद भागवत कथा है। पितृ पक्ष में जो आप कथा श्रवण कर रहें है ये इससे आपके पितरो का कल्याण निश्चित है इसलिए उन्हें ध्यान में रख कर कथा श्रवण करें।

महाराज श्री ने बताया की जीवन में गुरु और गोविन्द को कभी मत भूलना क्यूंकि जिसने जीवन में गुरु को भुला दिया उसके हजारो -लाखो जीवन बर्बाद हो जायेंगे, कही भी रहो किसी भी स्थति में रहो लेकिन अपने गुरु और गोविन्द को कभी मत भूलो क्यूंकि जिन्हे गुरु और गोविन्द याद रहते है वो कभी गलत काम नहीं करते।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार नैमिषारणय में सनकादिक ऋषि विराजमान थे तभी वहां परम श्रद्धेय सूद जी महाराज पधारे। जब सूद जी महाराज वहां पधारे तो उन्हें एक बहुत सुंदर आसन दिया और वहां पर उनको बैठाया। तो सभी ऋषियों ने सूद जी महाराज से ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

22Sep 2019

कल शाम मुबंई कथा की तैयारियों का निरीक्षण करने मुम्बई पहुँचे श्री श्याम सुंदर शर्मा जी (आचार्य जी ) रविवार को समति के पदाधिकारियों के साथ बैठक करेंगे ।

कल शाम मुबंई कथा की तैयारियों का निरीक्षण करने मुम्बई पहुँचे श्री श्याम सुंदर शर्मा जी (आचार्य जी ) रविवार को समति के पदाधिकारियों के साथ बैठक करेंगे और 15 से 22 दिसंबर तक पूज्य महाराजश्री के श्रीमुख से होने वाले कार्यक्रम को लेकर दिशा निर्देश देंगे । राधे राधे ।

22Sep 2019

इस संसार में जो भी कुछ है उसका कोई न कोई मालिक जरूर है इसी प्रकार इस संसार में जीव का भी मालिक ईश्वर है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 सितम्बर 2019 तक Texas में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज
श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की अगर आपको जीवन में शान्ति और सुख चाहिए तो आपको इनको पाने का मार्ग खुद ही ढूँढना होगा, हम जिस संसार में भटक रहें है हम यहां से बहुत ज्यादा अपेक्षाएं रखते है और फिर ये अपेक्षाएं पूरी न होने पर हमें दुःख मिलता है।

इस संसार में जो भी कुछ है उसका कोई न कोई मालिक जरूर है इसी प्रकार इस संसार में जीव का भी मालिक ईश्वर है, लेकिन कलयुग में मनुष्य मोह -माया के चक्कर में ईश्वर को स्मरण करना भूल जाता है, और यही मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा पाप है।

महाराज श्री ने बताया की इस जीवन में कोई प्रसन्न नहीं है, क्यूंकि संसार में जो भगवान का नहीं हुआ वो जिंदगी भर खुश नहीं रह सकता। इस संसार में प्रसन्न रहने का बस एक ही फॉर्मूला है। बस मैं भगवान का हूँ भगवान मेरे है, मुझे भगवान् को पाना है मैं उनका दास हूँ और वो मेरे भगवान है जिस दिन ये फीलिंग आपके मन में घर कर गई उस दिन से सभी दुःख आपसे दूर हो जाएंगे।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत वही अमर कथा है जोभगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को
जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी।

लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन सेनहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं।भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी।धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय मेंभगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।

श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके सेअमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुपगए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चलेगए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्तहोने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक
आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता
फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जबआपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगाऔर नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।

23Sep 2019

15 से 22 दिसंबर 2019 तक भायंदर, मुम्बई में होने वाली श्रीमद्भागवत कथा की तैयारियों को लेकर श्री श्याम सुन्दर शर्मा जी (आचार्य जी) ने समिति के पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं के साथ बैठक की।

राधे राधे, कल दोपहर 15 से 22 दिसंबर 2019 तक भायंदर, मुम्बई में होने वाली श्रीमद्भागवत कथा की तैयारियों को लेकर श्री श्याम सुन्दर शर्मा जी (आचार्य जी) ने समिति के पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं के साथ बैठक की। सभी ने इस आयोजन के लिए की जा रही तैयारियो को लेकर अपने विचार साझा किए एवं सभी कार्यकर्ताओं के द्वारा वाहन के साथ शहर में प्रचार - प्रसार की प्रकिया भी शुरू की गई। राधे राधे।

23Sep 2019

जिनका सम्बंध भगवान से नहीं होता उनकी मुक्ति नहीं होती है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 सितम्बर 2019 तक Texas में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

पूज्य महाराज श्री ने कथा के तृतीय दिवस पर भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।
भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि आजकल के बच्चों को पता ही नहीं है की अपने माता पिता के साथ किस तरह का व्यवहार करना चाहिए। उनको यह तक नहीं पता है की माता पिता, गुरू के बराबर में कभी नहीं बैठना चाहिए। अगर आप बिस्तर पर भी बैठ रहे हैं तो जहां सर होता है उस ओर ना बैठे, बैठना है तो पैरों की तरफ बैठे जिससे आपको उनके मुख का दर्शन हो सके।
महाराज श्री ने कहा कि जिनका सम्बंध भगवान से नहीं होता उनकी मुक्ति नहीं होती है। भगवान से सम्बंध जुड़ना जरूरी है। हमारा दुर्भाग्य यह है की दुनिया की आबोहवा में हम इस तरह उलझ गए हैं की हमे मालूम है की हमें मरना है लेकिन भगवान से वो रिश्ता हम नहीं बना पाए हैं। गंगा जमुना के तट पर बैठकर भी हम डुबकी नहीं लगा पा रहे हैं। आप जिस भगवान से भाग रहे हो अपनी इच्छाओं को पूरी करने के लिए वो कभी पूरी नहीं होती है। संसार रूपी सागर में इच्छा रूप लहरें कभी नहीं रूकती हैं। सागर में जितनी लहरें हैं उससे ज्यादा व्यक्ति के जीवन में इच्छाएं हैं। इन इच्छाओं के रहते रहते आपके प्रभु को पाना है ये बात अवश्य याद रखिए।
महाराज श्री ने आगे कहा कि गृहस्थ आश्रम सबसे बड़ा आश्रम है इसमें कोई दोराय नहीं है लेकिन गृहस्थ में रहते हुए अगर आप ईश्वर को भूल गए तो यह नरक का द्वार है। गृहस्थ के दो पहिए होते हैं धर्म और कर्म, अगर गृहस्थ में से एक भी पहिया खराब हो गया तो ये गाड़ी नहीं चलेगी। हम लोगों ने एक पहिए को तो उतार कर ही रखा हुआ है। धर्म के पहिए को उतार कर रखा हुआ है और सिर्फ कर्म के पहिए को चलाए जा रहे हैं। याद रखिए एक पहिए पर गाड़ी ज्यादा दिन तक नहीं चलती है। अगर आप कर्म कर रहे हैं तो लगातार उसे अच्छाई के साथ किजिए। धर्म और कर्म को साथ लेकर चलिए वहीं सही गृहस्थ आश्रम है।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।
राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...
अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।
भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

23Sep 2019

आप सभी प्रभु प्रेमियों को विदित हैं कि नागपुर में 2 से 8 जनवरी 2020 तक श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के श्रीमुख से किया जाएगा।

राधे राधे,जैसा कि आप सभी प्रभु प्रेमियों को विदित हैं कि नागपुर में 2 से 8 जनवरी 2020 तक श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के श्रीमुख से किया जाएगा। इस कथा की तैयारियों का निरीक्षण करने नागपुर पहुंचे श्री श्याम सुन्दर शर्मा जी (आचार्य जी), जहाँ पर समिति के सभी पदाधिकारियों के साथ कार्यकर्ता भी मौजूद थे, सभी को कार्यक्रम हेतु दिशा निर्देश दिए । राधे राधे।

 

24Sep 2019

प्रतिदिन भगवान का नाम जपना ये भी यज्ञ है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 सितम्बर 2019 तक Texas में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया
भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि चाहे अनचाहे जीव से नित्य पाप होते हैं। कुछ का पता चलता है और कुछ का पता नहीं चलता है और उन पापों को मिटाने के लिए कुछ यज्ञ हमेशा प्रत्येक दिन करते रहना चाहिए। जिस तरह पाप नित्य होते हैं उसी तरह यज्ञ भी नित्य होने ही चाहिए। आप गाड़ी चलाकर जाते हैं, पैदल चलते हैं तो ना जाने कितने कीड़े मकौड़े, चीटियां मर जाती हैं। एक चीटी को भी मारने का पाप लगता है, जितनी बड़ी आत्मा आपके अंदर है उतनी ही चीटी के अंदर भी है। जब हम सांस लेते हैं उसमें भी कितने कीटाणु मरते हैं, वो भी हत्या आपकी रोज लगती है, इतने पाप हम अनजाने में रोज करते हैं तो उन अनजाने पापों से मुक्ति के लिए प्रतिदिन यज्ञ करने चाहिए। ये यज्ञ ऐसे हैं जो आप प्रतिदिन कर सकते हैं, सूर्य को जल देना यज्ञ है, पक्षियों, चीटियों के लिए कुछ खाने को डालना भी यज्ञ है, प्रतिदिन भगवान का नाम जपना ये भी यज्ञ है। जो व्यक्ति आसन पर बैठकर थोड़ा भी जप करता है वो नित्य यज्ञ करता है।
महाराज श्री ने कहा कि आज व्यक्ति सबकुछ होने के बाद भी परेशान क्यों है ? उसके पास यश है , वैभव है, सम्पत्ति है फिर भी वह दुखी है, वह इसलिए क्योंकि वह सब कुछ खाए जा रहा है। इतना ही नहीं वह दूसरों का भी खाने की इच्छा रखता है। जो भी व्यक्ति दूसरों की सम्पत्ति पर नजर डालता है, दूसरे के धन को पाने की इच्छा रखता है वो पाप करता है। अगर आप किसी को दुख देते हैं तो आप सुख नहीं पा सकते।
महाराज श्री ने कहा कि हमारे तीन पाप महापाप होते हैं। काम कृत पाप, लोभ कृत पाप और क्रोध कृत पाप। हम जब काम के आधिन होते हैं तो हमारी इंद्रियां विकृत हो उठती हैं और हम उचित अनुचित के बारे में सोचे बगैर कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाते हैं। दूसरा लोभ कृत पाप जिनके मन में लोभ आ जाता है वो व्यक्ति इस हद तक गिर जाते हैं की वो लोभ को पूर्ण करने के लिए किसी का भी कितना भी बुरा कर सकते हैं। तीसरा क्रोध कृत पाप, जब हम क्रोध में होते हैं तो हम बोलने में नहीं चुकते, हम किसी पर हाथ उठाने में भी नहीं चुकते, हम कुछ भी कर जाते हैं। ये तीनों पाप जीव को नरक की और लेकर जाते हैं। इन तीनों पापों से बचने का एक ही उपाय है सत्संग। जब आप सत्संग में जाते हैं तो आपका मानसिक संतुलन, इंद्रियां वश में रहती है, आपको सही गलत की समझ होती है। लेकिन यह तब संभव है जब आप सत्संग को धारण करते हैं।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली ने भगवान ब्रह्मा वरदान मांगा की मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने उसे वरदान दे दिया। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने विष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली से कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का सुंदर वर्णन श्रवण कराया। सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

18Sep 2019

संसार का सबसे बड़ा पाप ईश्वर का विस्मरण है।

 

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 13 से 19 सितंबर 2019 तक Hindu Temple Of Greater Chicago में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की ईश्वर ने जो हमें ये मानव जीवन दिया है इसे और भी अच्छा बनाने के लिए हम क्या कर सकते है? क्यूंकि आप मानव जीवन में जन्म लेकर इसका लाभ ना उठा सकें तो ये मानव जीवन आपकी दुर्गति कराने वाला है। जो जीव इस जीवन का लाभ उठा लेता है वो सद्गति को प्राप्त करता है।

महाराज श्री ने बताया की हमारे जीवन में गुरु का सानिध्य होना बहुत जरुरी है क्यूंकि बहुत सारी चीजे ऐसी है जब तक आप उनका खुद से अनुभव न कर लें तब तक आपको उसका एहसास नहीं होता।

मानव जीवन ही एक मात्र ऐसी योनी है जिससे हम ईश्वर को प्राप्त कर सकते है, ये जीवन आपको संसार की उलझनों में उलझने के लिए नहीं प्राप्त हुआ है, आपके पूर्व जन्मो के अच्छे कर्मो की बदौलत आपको ये जीवन मिला है और इस जीवन में आने के बाद आपको सिर्फ भक्ति का नशा होना चाहिए और हमारे दिल में सिर्फ और सिर्फ गोविन्द होने चाहिए। क्यूंकि संसार का सबसे बड़ा पाप ईश्वर को याद न करना है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

16Sep 2019

मोक्ष मिलना भागवत कृपा पर आधारित है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 13 से 19 सितंबर 2019 तक Hindu Temple Of Greater Chicago में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। पूज्य महाराज श्री ने कथा के तृतीय दिवस पर भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया। भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई । कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की मोक्ष मिलना भागवत कृपा पर आधारित है आप किसी एक साधन की मदद से प्राप्त मोक्ष की प्राप्ति नहीं कर सकते लेकिन अगर आपको मानव जन्म मिल जाए, जीवन में गुरु का संग मिल जाए और आपको उस ईश्वर को पाने की जिज्ञासा हो, ये तीन साधन अगर आपको मिल जाए तो आपके मोक्ष प्राप्ति के द्वार खुल जाते है। महाराज श्री ने बताया की आज के समय में लोगों को ईश्वर से मिलने की लालसा नहीं है बल्कि ईश्वर से पाने की लालसा है, हमें ईश्वर से प्रेम नहीं है, हमें जो ईश्वर से चाहिए उससे प्रेम है और यही हमारे जीवन में सबसे बड़ा दुःख का कारण है। मानव जीवन, गुरु का सानिध्य, ईश्वर से मिलने की तीव्र इच्छा आपके जीवन में जब ये तीनो चीजे एकत्रित हो जाए तो आप समझ लेना की ये मनुष्य जीवन हमारा आखिरी है और इसी जीवन में हमें सदगति प्राप्त हो जायेगी। महाराज श्री ने बताया की ये मानव शरीर ईश्वर के द्वारा हमें किराये के मकान की तरह दिया हुआ है अगर हम इसका ज्यादा गलत फायदा उठाएंगे तो भगवान हमसे ये मानव शरीर कभी भी खाली करा सकता है। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये... अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे। भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं। || राधे -राधे बोलना पड़ेगा ||

15Sep 2019

संतों का सानिध्य हृदय मे भगवान को बसा देता है।

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 13 से 19 सितंबर 2019 तक Hindu Temple Of Greater Chicago में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

महाराज श्री ने बताया की भागवत शब्द ब्रह्म है और जब आप भागवत श्रवण करते है तो इन शब्दों के माध्यम से ये आपके अन्ताकरण तक प्रविष्ठ होते है और हमारे अन्ताकरण को शुद्ध करते है। जब तक हमारा चित्त शुद्ध नहीं होगा तब तक हम भगवान को नहीं पा सकते।

संसारिक शब्द कही न कही हमें दूषित करते है संसार में फसाये रखते है, लेकिन जो भगवान के कथा रुपी शब्द है ये हमें संसार से मुक्त करते है।

भगवान ने हमपर बड़ी कृपा करके हमें ये मानव जीवन उपहार में दिया है ताकि हम यहां जन्म लेकर धर्म के कार्यो को करें, हरी की भक्ति करें और अपने जीवन के उद्देश्य को पूरा करें लेकिन मानव जीवन में जन्म लेने के बाद हम संस्कार में ही फस कर रह गए है।

महाराज श्री ने बताया की जिन लोगों के पूर्व जन्म के पाप हावी होते है वो उन्हें कथा श्रवण नहीं करने देते। लेकिन जिसके जीवन में श्याम न हो उसके जीवन में कभी आराम नहीं हो सकता। इसलिए हमें अपने कल्याण के लिए ईश्वर की भक्ति में अपना चित्त लगाना चाहिए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत वही अमर कथा है जोभगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकरआओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है।

माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन सेनहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं।

भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी।धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय मेभगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।

श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके सेअमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्तहोने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा।

तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुकआप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधताफिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जबआपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगाऔर नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

13Sep 2019

मानव जीवन तो ईश्वर से मिलने का प्रमुख द्वार है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 12 सितंबर 2019 तक Bharat Sevashram Sangha 3490 Route 27 Kendall Park New Jersey - 08824 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया। श्रीमद्भागवत कथा की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि हमें मानव जीवन इसलिए नहीं मिला है की हम इस संसार में जन्म लें, भोग विलासों को भोगे और फिर इस संसार को छोड़ कर चले जाए बल्कि मानव जीवन तो ईश्वर से मिलने का प्रमुख द्वार है। अगर हम इस मानव जीवन को यूँ ही व्यर्थ खो देंगे तो फिर जन्म जन्मांतर तक भटकने के सिवा हमारे हाथ कुछ नहीं लगेगा। सिर्फ मानव जीवन ही वही योनी है जिसमे हरी से मिलने का प्रयत्न किया जा सकता है किन्तु पुरे जीवन में मनुष्य अपने परिवार और जिम्मेदारियों के बीच में ही फंसे रह जाते है और अपने मानव जीवन के मुख्य उद्देश्य को भूल जाता है। भगवान आपको जन्म जन्मांतर के भव बंधनो से मुक्त करने का कार्य भगवान अपनी कृपा से करते है। भगवान के पुरूस्कार के बिना आपको मुक्ति नहीं मिल सकती। जीवन में भक्ति का पदार्पण, ज्ञान का पदार्पण, और किसी साधू की सेवा में आपका चित्त लग जाए ये सब आपको भगवान की किरपा से ही प्राप्त होता है। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की। ।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

14Sep 2019

जो व्यक्ति बिना किसी इच्छा के भागवत श्रवण करता है वो ठाकुर के श्री चरणों में स्थान प्राप्त करता है।

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 13 से 19 सितंबर 2019 तक Hindu Temple Of Greater Chicago में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

भागवत के प्रथम दिवस की शुरूआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के कथा की शुरूआत भागवत के प्रथम श्लोक से की
सच्चिदानन्द रूपाय विश्वोत्पत्यादि हेतवे तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयम नुमः
वासुदेव सुतं देवम् कंस चानुर मर्दनम् देवकी परमानंदम् कृष्णम् वंदे जगदगुरुम्।।

महाराज श्री ने बताया की जो जीव भागवत की शरण में आ जाता है समझो वो कृष्ण की शरण में आ गया है और उनका संरक्षण स्वयं श्री कृष्ण करते है, आप लोग इतने भाग्यशाली है की जिस कथा को देवराज इंद्र श्रवण नहीं कर पाए उसे आप इतनी सहजता से श्रवण कर रहें है।

महाराज श्री ने बताया की अमृत हमारे पुण्यो को नष्ट करता है और कथा अमृत हमारे पापों का नाश करता है, अमृत हमारी वासना बढ़ाता है और कथाअमृत हमारी उपासना को बढ़ाता है अगर आप सच्चे साधक हो तो आपको कथा से अवश्य प्रेम करना चाहिए।

महाराज श्री ने कथा श्रवण करने का लाभ बताते हुए कहा कि अगर दरिद्री व्यक्ति कथा सुनता है तो वो धनवान हो जाता है, रोगी व्यक्ति कथा श्रवण करें तो वो निरोगी काया प्राप्त करता है, पापी व्यक्ति कथा सुने तो वो निश्पाप हो जाता है, निसंतान व्यक्ति कथा सुने तो वो संतान प्राप्त कर लेता है और जो व्यक्ति बिना किसी इच्छा के भागवत श्रवण करता है वो ठाकुर के श्री चरणों में स्थान प्राप्त करता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार नैमिषारणय में सनकादिक ऋषि विराजमान थे तभी वहां परम श्रद्धेय सूद जी महाराज पधारे। जब सूद जी महाराज वहां पधारे तो उन्हें एक बहुत सुंदर आसन दिया और वहां पर उनको बैठाया। तो सभी ऋषियों ने सूद जी महाराज से ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा।

श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

12Sep 2019

शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है।

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 12 सितंबर 2019 तक Bharat Sevashram Sangha 3490 Route 27 Kendall Park New Jersey - 08824 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

महाराज श्री ने कथा की शुरुआत में श्रोताओं की श्रेणी के बारे में बात करते हुए बताया की कुछ श्रोता ऐसे होते है जो कथा तो श्रवण करते है लेकिन एक दिन सुनेंगे दूसरे दिन सुनेंगे लेकिन तीसरे दिन वो उस मार्ग से भटक जाएंगे और कथा श्रवण नहीं करेंगे।

लेकिन जो चातक श्रोता होते है उनका स्वभाव समुन्द्र के समान होता है जैसे समुन्द्र में कितनी भी नदियों का जल आकर उसमे मिल जाए समुन्द्र उस पानी को अपने अंदर समा लेता है और अपनी सीमा कभी नहीं लांगता। इसी प्रकार चातक श्रोता नियम से कथा का श्रवण करते है और वो भक्त भगवान की कथा के अलावा कुछ और श्रवण करना पसंद ही नहीं करते।

महाराज श्री ने हंस का उदहारण देते हुए कहा की हंस को भगवान् के द्वारा प्रकृति शक्ति प्राप्त है अगर आप हंस के सामने दूध में पानी मिलाकर उसे पीने के लिए देंगे तो हंस उसमे से सारा दूध पी जाएगा और पानी को छोड़ देगा उसी तरह दूसरी श्रेणी के श्रोताओं को होना चाहिए उनके आस पास जहाँ -जहां भगवान की कथा हो रही हो उन्हें कथा पंडाल में कथा श्रवण करने के लिए जरूर जाना चाहिए।

महाराज श्री ने तीसरी श्रेणी के श्रोता के बारे में बताते हुए कहा की तीसरी श्रेणी का श्रोता तोते के समान होता है उसे जो व्यक्ति जितना सीखा दे वो उतना ही बोलता है। जब तक पंडाल में कथा श्रवण करते है भगवान की भक्ति में लीन रहते है भगवान् की भक्ति करते है लेकिन जैसे ही कथा पंडाल से बाहर जाते है तो अभक्त हो जाते है।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है।

महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया।
ये बस स्वार्थ हैं।

दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं।

श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

11Sep 2019

जिनके दिलों में निर्मलता होती है ईश्वर उन्ही को प्राप्त होते है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 12 सितंबर 2019 तक Bharat Sevashram Sangha 3490 Route 27 Kendall Park New Jersey - 08824 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की गोविंद की अहित की कृपा के बिना हमें भागवत श्रवण का सौभाग्य प्राप्त नहीं होता।

महाराज श्री ने बताया की ये सम्पूर्ण संसार स्वार्थ से भरा हुआ है, जब तक लोगों की आपसे जरूरते पूरी होती रहेंगी तब तक लोग आपके साथ है लेकिन जैसे ही आपका बुरा समय आएगा तो आपका साथ कोई नहीं देगा सब आपका साथ छोड़ कर चले जाएंगे हमारे बुरे समय में बस हमारे गोविन्द ही हमे सहारा देते है।

महाराज श्री ने बताया की भक्ति के पथ पर हमें सदैव अकेला ही चलना पड़ता है अगर आप अपना कल्याण चाहते हो तो आपको ये नहीं सोचना है कि आपके साथ कौन है आपको बस ये देखना है की मैं जिस गोविन्द के साथ के लिए इस मार्ग पर आया हु उसका साथ मेरे साथ है या नहीं।

महाराज श्री ने बताया की जिनके दिलों में निर्मलता होती है ईश्वर उन्ही को प्राप्त होते है जैसे बच्चो के हृदय, उनके दिल एक दम पाक साफ़ होते है इसलिए उन्हें भगवान का स्वरुप भी कहा जाता है।

इसलिए बच्चों को बचपन से ही भक्ति पथ पर चलना चाहिए। क्यूंकि भक्ति करने की कोई उम्र नहीं होती और अगर वो बचपन से ही होने हृदय में ठाकुर को बसा लेंगे तो उनका जीवन उद्धार निश्चित है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

10Sep 2019

कथा श्रवण करने जाना ही परम सौभाग्य है।

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 12 सितंबर 2019 तक Bharat Sevashram Sangha 3490 Route 27 Kendall Park New Jersey - 08824 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि कथा श्रवण करना जाना ही परम सौभाग्य है, जो लोग भक्ति करने जाएंगे तो उसकी परीक्षाएं तो होंगी है लेकिन आपको उस परीक्षा से भागना नहीं है बल्कि उसका डट कर उनका सामना करना है।

महाराज श्री ने बताया की श्रीमद भागवत महापुराण को श्रवण करने से हमारे जन्म जन्मांतर के अग समाप्त हो जाते है, पाप और अग में बहुत अंतर है क्यूंकि पाप वो होते है जो संसार में हम करते है और किसी तीर्थ स्थान पर जाने के बाद उन पापो की समाप्ति हो जाती है लेकिन तीर्थ स्थानों पर हमसे हुई भूल या पापो को अग कहते है जिनकी समाप्ति कथा श्रवण से ही होती है।

श्रीमद्भागवत कथा ईश्वर को प्राप्त करने का मार्ग है और हमें ईश्वर को प्राप्त करने के लिए इस मार्ग पर अवश्य चलना चाहिए क्यूंकि यही हमारे जीवन का उद्देश्य है।

महाराज श्री ने बताया की किसान और कृष्ण में कोई ज्यादा अंतर नहीं है, कृष्ण कर्म करने का उपदेश देते है इसलिए हमें देवी देवताओं के साथ किसानो का भी आदर सम्मान करना चाहिए क्यूंकि बड़ी मेहनत से किसान खेती करके अन्न एवं फसल पैदा करते है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली ने भगवान ब्रह्मा वरदान मांगा की मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने उसे वरदान दे दिया। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने विष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली से कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"

जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"

भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया। इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का सुंदर वर्णन श्रवण कराया। सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

7Sep 2019

ईश्वर को जानने की जिज्ञासा ही विश्व में सबसे सुंदर है ।

ईश्वर को जानने की जिज्ञासा ही विश्व में सबसे सुंदर है -पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 12 सितंबर 2019 तक Bharat Sevashram Sangha 3490 Route 27 Kendall Park New Jersey - 08824 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

श्रीमद्भागवत कथा की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान की असीम कृपा से इस सृष्टि का सृजन हुआ है उन्ही के दवारा इस दुनिया का पालन पोषण होता है और समय आने पर वही इस सृष्टि का संघार भी करते है।

महाराज श्री ने बताया की भगवान की अद्भुत लीलाओं का वर्णन श्रीमद भागवत कथा है, ये कथा देयिक, दैविक और भौतिक तापो का नाश करने वाली है जो जीव श्रीमद भागवत कथा से अपना चित्त लगता है ये कथा उसको मोक्ष प्राप्त कराती है।

महाराज श्री ने बताया की लोगों के दिल में अपने और अपने परिवार को विकसित करने के लिए भिन्न- भिन्न प्रकार की इच्छा होती है और इच्छाएं ही वो चीज है जो कभी ख़त्म नहीं होती लेकिन जिस दिन जीव के अंदर ईश्वर को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हो जाती है उस दिन उसका कल्याण होना शुरू हो जाता है क्यूंकि ईश्वर के बारे में जानने वाले व्यक्ति का हरी से मिलना तय है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार नैमिषारणय में सनकादिक ऋषि विराजमान थे तभी वहां परम श्रद्धेय सूद जी महाराज पधारे। जब सूद जी महाराज वहां पधारे तो उन्हें एक बहुत सुंदर आसन दिया और वहां पर उनको बैठाया। तो सभी ऋषियों ने सूद जी महाराज से ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा।

श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

8Sep 2019

कथा का अमृतपान करने से आपके पाप नष्ट होते हैं।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 12 सितंबर 2019 तक Bharat Sevashram Sangha 3490 Route 27 Kendall Park New Jersey - 08824 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की कई लोग कहते है की हमारे शास्त्रों और ऋषि मुनियों के द्वारा बताये गए भक्ति के मार्ग एवं साधनो का पालन करने के बाद भी हमें ईश्वर की प्राप्ति क्यों नहीं होती ? महाराज श्री ने बहुत ही सुन्दर जवाब देते हुए बताया की हमें ईश्वर की प्राप्ति इसलिए नहीं होती क्यूंकि हम ईश्वर को पाने वाले मार्ग पर अपने आप को पूर्णता समर्पण किये बिना ही छोड़ देते है। इसलिए हमारे हाथ असफलता लगती है,जब तक आप परमात्मा में विलीन नहीं होंगे तब तक आपकी ये यात्रा मंगलमय नहीं होगी।

महाराज श्री ने बताया की जब तक आप अपने शरीर में अहमता और रिश्तो में ममता से छुटकारा नहीं पा लेंगे तब तक आपको हरी मिलन का आनंद प्राप्त नहीं होगा।

महाराज श्री ने अमृत और कथा अमृत में अंतर बताते हुए कहा की अमृत आपके पुण्य नष्ट करता है और कथा अमृत आपके पापो को नष्ट करता है।


पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है।

भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।

श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।

यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

9Sep 2019

इस संसार में केवल एक चीज निश्चित है, जन्म लेने के बाद मृत्यु।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 12 सितंबर 2019 तक Bharat Sevashram Sangha 3490 Route 27 Ken dall Park New Jersey - 08824 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। पूज्य महाराज श्री ने कथा के तृतीय दिवस पर भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया। भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि इस संसार में आपको जो भी चीजें प्राप्त है या फिर आने वाले समय में आपको जो भी प्राप्त होगा वो सब अनफिक्स है लेकिन इस संसार में जन्म लेने के बाद आपकी मृत्यु तय है। महाराज श्री ने बताया की हम सभी का जन्म एक ही तरीके से होता है, लेकिन हमारी मृत्यु एक तरह से नहीं होती किसी को बहुत सुंदर मौत नसीब होती है और कोई बड़ी दुःख दायी मौत मरता है व्यास जी ने बताया की हमारे जीवन की यात्रा का अंत जीवन की आखरी मंजिल मृत्यु ही है। महाराज श्री ने बताया की मृत्यु को अच्छा बनाने के लिए पूरा जीवन जिया जाता है क्यूंकि जिनकी मृत्यु अच्छी होती है उनका अगला जन्म नहीं होता वो ईश्वर के धाम को प्राप्त करते है और जिनकी मृत्यु बुरी होती है उनका फिर से पुनर्जन्म होता है। शास्त्रों में लिखा है की अंत में मरने वाले की जैसी मती होती है उसकी दूसरे जीवन में वैसी चित्त शुद्धि होती है क्यूंकि जिनका चित्त शुध्द होता है उनकी मुक्ति निश्चित होती है और जिनका चित्त शुद्ध नहीं होता वो फिर से पुनर्जन्म के बंधन में फस जाते है। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये... अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे। भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

6Sep 2019

संत वो महापुरुष होते है जो आपके ऊपर बिना किसी वजह के कृपा करते है।

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 30 अगस्त से 05 सितंबर 2019 तक Shiv Shakti Peeth 264-12 Hillside Avenue Queens, New York 11004 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया। श्रीमद्भागवत कथा की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि संतो का हृदय माखन समान होता है और संत वो होते है जो आपमें आपके अवगुणो की बजाए आपके गुण देखते है। साथ ही बताया की भगवान आपके ऊपर किसी न किसी वजह से कृपा करते है लेकिन संत वो महापुरुष होते है जो आपके ऊपर बिना किसी वजह के कृपा करते है। महाराज श्री ने भक्तो से प्रश्न करते हुए पूछा की आखिर जिस भगवान की हम इतनी पूजा करते है उनकी इतनी सेवा करते है तो उन्हें बार-बार पृथ्वी पर क्यों आना पड़ता है ? उसके बाद उन्होंने भक्तों को बताया की जब -जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है तो भगवान को धर्म की स्थापना करने और अधर्म का विनाश करने के लिए पृथ्वी पर अवतार लेना पड़ता है। महाराज श्री ने कहा की हमें हमेशा धर्म की रक्षा करनी चाहिए और धर्म को आगे बढ़ाने के लिए हमें रोजाना मंदिरो में जाना चाहिए, संतो की सेवा करनी चाहिए ,शास्त्रों के माध्यम से ब्राह्मणो द्वारा बताये गए मार्ग पर चलना चाहिए। लेकिन हम शास्त्रों द्वारा बताये रास्तो पर चलने के बजाए अपनी मनमानी करते है और यही कारण है जिससे अधर्म बढ़ता है इसलिए हमें अपने मन के मुताबिक नहीं बल्कि शास्त्रों के मुताबिक चलना है। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की। ।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

5Sep 2019

बुरे वक्त में केवल भगवान आपका सहारा बनते हैं।

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 30 अगस्त से 05 सितंबर 2019 तक Shiv Shakti Peeth 264-12 Hillside Avenue Queens, New York 11004 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीमद्भागवत कथा की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत में बताया की आज कल के जीव अपने ऊपर थोड़ी सी परेशानी आने पर ही परेशान हो जाते है, लेकिन हमें इन परिस्थतियों से घबराना नहीं चाहिए बल्कि इनका डट कर सामना करना चाहिए क्यूंकि समय के द्वारा हमें जब परेशानिया भोगनी पड़ती है तो इसका मतलब ये है की इस परेशानी के द्वारा हमारे कुछ कर्म भी कट रहें है और भगवान आपको पुनः चलने का एक नया मार्ग दिखा रहें है।

महाराज श्री ने बताया की जब आपका समय विचित्र हो तब सिर्फ ईश्वर ही आपका साथ देते है, क्यूंकि ये संसार बड़ा मतलबी है आपके बुरे समय में सब आपका साथ छोड़ देंगे लेकिन भगवान आपका साथ कभी नहीं छोड़ते वो हमेशा आपके साथ रहते है जब - जब आपको उनकी जरूरत पड़ती है।

महाराज श्री ने बताया की भगवान को अहंकार पसंद नहीं है, लेकिन आज का कलयुगी जीव अगर उसे थोड़ा बहुत धन प्राप्त हो जाए और कुछ लोग उसकी इज्जत करने लगें तो उस व्यक्ति को अपने ऊपर घमंड हो जाता है। लेकिन वो मुर्ख ये नहीं जानता की ये सब उसे ईश्वर का दिया हुआ है उसका खुद का कमाया हुआ कुछ नहीं है। ये सब हमें हमारे पूर्व जन्म के कर्मो के अनुसार प्राप्त होता है।

महाराज श्री ने कहा की जिन लोगों को ईश्वर के बारे में जानने की जिज्ञासा होती है उन लोगों को ईश्वर की प्राप्ति होती है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया।

ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे।

अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

5Sep 2019

जिन पंच तत्वों से आपका ये शरीर बना हुआ है उन पंच तत्वों का आधार भगवान ही है।

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 30 अगस्त से 05 सितंबर 2019 तक Shiv Shakti Peeth 264-12 Hillside Avenue Queens, New York 11004 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान हर जगह मौजूद है, महाराज श्री ने भगवान के नाम की व्याख्या करते हुए बताया की भ का अर्थ है भूमि, ग का अर्थ है गगन, वा का अर्थ है वायु, चौथा अक्षर है अ जिसका अर्थ है अग्नि और आखरी अक्सर है न जिसका अर्थ है नीर। जब आप भगवान के नाम का अर्थ खोजने की कोशिश करेंगे तो आपको ज्ञात होगा की जिन पंच तत्वों से आपका ये शरीर बना हुआ है उन पंच तत्वों का आधार भगवान ही है।

महाराज श्री ने बताया की पंच तत्वों से हमारा ये शरीर बना हुआ है और इसमें ईश्वर ही समाये हुए है, इसका मतलब है की भगवान हर जगह वास करते है। और अगर इन पंच तत्वों में से हमें कोई एक भी तत्व नहीं मिला तो हम उसके बिना जीवित नहीं रह पाएंगे। 
महाराज श्री ने बताया की इन पांच तत्वों में भगवान की सत्ता है और इन्ही पांच तत्वों की वजह से हमारा जीवन चलता है और अगर हमें ये पांच चीजे ना मिले तो इनके बिना हमारा जीवन शून्य है।

महाराज श्री ने बताया की जो भगवान के सच्चे भक्त होते है वो भगवान से कुछ मांगते नहीं है वो तो बस भगवान से मिलने की इच्छा रखते है, उन्हें अपने शरीर से कोई प्यार नहीं होता क्यूंकि ये शरीर भगवान से मिलने का साधन है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

3Sep 2019

महाराज श्री ने बताया की हमें अपने बड़ो के सामने हमेशा पर्दा करना चाहिए क्यूंकि पर्दा किसी से छुपने के लिए नहीं बल्कि बड़ो के सम्मान के लिए होता है।

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 30 अगस्त से 05 सितंबर 2019 तक Shiv Shakti Peeth 264-12 Hillside Avenue Queens, New York 11004 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

कथा के चतुर्थ दिवस पर भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की सभी माँ- बाप अपने बच्चो की ख़ुशी के लिए दिन-रात महनत करते है ताकि उनके बच्चों के जीवन में कोई कठिनाई न आये और वो ख़ुशी ख़ुशी अपना जीवन व्यतीत करे लेकिन अगर आपके बच्चो की किस्मत में वो ख़ुशी होगी ही नहीं तो क्या वह ख़ुशी उन्हें मिल पाएगी और अगर उनके भाग्य में ख़ुशी है तो क्या उन्हें आपकी इस मेहनत का इंतज़ार रहेगा।

महाराज श्री ने बताया की हम जब कभी भी मंदिर में जाए जो अपना सिर ढक लें साथ ही माता बहनो से निवेदन किया की भगवान् शिव जी का अभिषेख कभी भी खुले बालों में ना करें,और भगवान की प्रतिमा को कभी पीठ न दिखाएँ एवं पूजा करते समय अपने बालों को बाँध कर रखें।

महाराज श्री ने बताया की हमें अपने बड़ो के सामने हमेशा पर्दा करना चाहिए क्यूंकि पर्दा किसी से छुपने के लिए नहीं बल्कि बड़ो के सम्मान के लिए होता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था।

महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।

शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया।

पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे। महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।" जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था।

वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया।

वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया। इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

1Sep 2019

जन्म जन्मांतर के पुण्य जब एकत्रित होते हैं, तब कही जीव को जाकर सत्संग की प्राप्ति होती है।

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 30 अगस्त से 05 सितंबर 2019 तक Shiv Shakti Peeth 264-12 Hillside Avenue Queens, New York 11004 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। 
श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। 
भागवत के द्वितीय दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए "भजन बिना बावरा" भजन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज जी बताया की सत्संग की प्राप्ति कैसे करें। जन्म जन्मांतर के पुण्यों का जब सग्रह होता है जन्म जन्मांतर के पुण्य जब एकत्रित होते है। तब कही जीव को जाकर सत्संग की प्राप्ति होती है। सत्संग ऐसे ही नहीं मिल जाता। रामायण में भी सत्संग का बहुत बड़ा महत्व है। गोस्वामी तुलसीदास ने भी लिखा है। भाग्य में न जाने कितने सुख और दुःख आये है। पुण्य के जब सग्रह हो, एकत्रित करण हो तब बहुत कृपा करके सत्संग प्राप्त होता है। हम भवसागर से पार हो जाते है। इतना सरल है सत्संग, इतना दिव्य है सत्संग, सत्संग में भी श्रीमद भगवात श्रावण करने को मिल जाये तो हमारे भाग्य खुल जाते है। जब कोई भी जीव श्रीमद भागवत कथा सुनता है। तो पितृ नाचते हुए झूमते है। और एक दूसरे को बताते है की हम भाग्यशाली है। क्यों हमारे जो वंश है वो भागवत कथा सुनने के लिए है। अगर वो भागवत कथा सुनेगे तो आपको क्या लाभ मिलेगा ? भागवत जब सुनते है तो उनका किया हुआ सुकृत हम तक पहुंच जाएगी। हमें मुक्ति मिल जाएगी। महाराज जी कहा की कथा सुनने के लिए आप यह आये इससे आपके बुरा भला आप तक सिमित नहीं है आपके और हमारे पितरों तक ये लाभ जायेगा। कब जायेगा जब हम भागवत में ध्यान लगाकर सुनेगे। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओं का गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। 
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
#Usakatha #Usakatha2019 #ShantiSandeshYatra2019

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

2Sep 2019

“धार्मिक शिक्षा आपको अंधेरे से प्रकाश की ओर लेकर जाती है” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

“धार्मिक शिक्षा आपको अंधेरे से प्रकाश की ओर लेकर जाती है”

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 30 अगस्त से 05 सितंबर 2019 तक Shiv Shakti Peeth 264-12 Hillside Avenue Queens, New York 11004 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

पूज्य महाराज श्री ने कथा के तृतीय दिवस पर भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि धार्मिक शिक्षा आपको अंधेरे से प्रकाश की ओर लेकर जाती है। धार्मिक शिक्षा हमारे जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है इसलिए उसका आदर करें।

महाराज श्री ने कहा कि आप कथा में आते हैं अगर आपको कथा का एक शब्द भी आ गया तो आपका जीवन बदल सकता है। आपने जब कुछ सीखा तभी आप इंजिनियर, डॉक्टर बने हैं, आप यहां कुछ सीखेंगे तो अच्छे इंसान भी बनेंगे। सत्संग एक ऐसी यूनिवर्सिटी है जहां अच्छे इंसान बनाए जाते हैं, इससे इसिलिए जुड़ते हैं ताकी अच्छे मानव बन सकें। वो लोग भाग्यशाली हैं जो इससे जुड़ते हैं, केवल भाग्यशाली ही नहीं बल्कि वो यहां से सीखते भी हैं।

महाराज श्री ने कहा कि बहुत लोग पूछते हैं हमारा कल कैसा होगा ? कल की चिंता मत करो जो कुछ कर रहे हो आज करो, वही तुम्हारा कल है, आज बीज है तो कल फसल है। महाराज श्री ने कहा कि जब हम स्कूल में पढ़ते हैं तो एक साल की पढ़ाई के बाद, कड़ी मेहनत करने के बाद हमें हमारा परिणाम पता चलता है लेकिन वहीं भक्ति की बात करें तो लोग सोचते हैं की हम आज माला करें और कल भगवान हमें प्रकट होकर दर्शन दे दें।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।

राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

30Aug 2019

"जो जीव भागवत श्रवण करते है उन्हें भागवत सहज ही प्रेम भक्ति का दान देती है" || श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

"जो जीव भागवत श्रवण करते है उन्हें भागवत सहज ही प्रेम भक्ति का दान देती है"

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 30 अगस्त से 05 सितंबर 2019 तक Shiv Shakti Peeth, New York 11004 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

श्रीमद्भागवत कथा की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के कथा की शुरूआत भागवत के प्रथम श्लोक से की
सच्चिदानन्द रूपाय विश्वोत्पत्यादि हेतवे तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयम नुमः 
वासुदेव सुतं देवम् कंस चानुर मर्दनम् देवकी परमानंदम् कृष्णम् वंदे जगदगुरुम्।।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की कई लोगों को ऐसा अजीर्ण हो जाता है की वो अगर एक ही काम बार- बार करते है तो उनके मन में ये विचार आता है की एक ही काम हम बार- बार कब तक करते रहेंगे और फिर उसका मन उस काम को करने में नहीं लगता। वैसे ही लोगों की रूचि भागवत कथा में कम होने लगती है और वो सोचते है की कथा पहले ही हमने सुनी हुई है तो अब बार बार कथा सुनने से क्या मिलेगा?

लेकिन वेद व्यास जी महाराज ने शास्त्रों में ये लिखा है की आप जब तक जीवित रहें श्रीमद भागवत रस अमृत का रसपान करते रहें क्यूंकि जब आप निरंतर श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करेंगे तो आपके हृदय में प्रेम भक्ति जाग्रित होगी। मनुष्य जीवन में अगर हमें ईश्वर से प्रेम हो जाए तो मानव जीवन में इससे बड़ी कोई बात नहीं है और श्रीमद भागवत कथा आपको प्रेम भक्ति का दान देती है।

जो जीव भागवत श्रवण करते है उन्हें भागवत सहज ही प्रेम भक्ति का दान देती है, क्यूंकि श्रीमद भागवत श्रवण का फल ही प्रेम भक्ति है। भागवत श्रवण मात्र से ही आपको कृष्ण की प्रेम भक्ति प्राप्त हो जाती है। 
महाराज श्री ने कहा कि भगवान् की कथा आपको चिंता मुक्त कर देती है, भागवत श्रवण करते रहना हमारे जीवन का महत्वपूर्ण भाग है इस दुनिया में आने के बाद हम अपने परिवार और प्रियजनों के लिए तो बहुत महनत करते है भागा- दौड़ी करते है लेकिन हमे अपने कल्याण के बारे में भी सोचना चाहिए इसलिए हमें अपनी दिनचर्या में भागवत श्रवण जरूर करनी चाहिए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार नैमिषारणय में सनकादिक ऋषि विराजमान थे तभी वहां परम श्रद्धेय सूद जी महाराज पधारे। जब सूद जी महाराज वहां पधारे तो उन्हें एक बहुत सुंदर आसन दिया और वहां पर उनको बैठाया। तो सभी ऋषियों ने सूद जी महाराज से ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

29Aug 2019

आज सुबह यूएसए के समय अनुसार पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज एवं श्री विजय शर्मा जी यूएसए पहुंचे, यहाँ भक्तों ने महाराज श्री का स्वागत किया।

आज सुबह यूएसए के समय अनुसार पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज एवं श्री विजय शर्मा जी यूएसए पहुंचे, यहाँ भक्तों ने महाराज श्री का स्वागत किया। लगभग 45 दिनो की इस शांति संदेश यात्रा में श्रीमद् भागवत कथा, श्री राम कथा, श्री कृष्ण कथा एवं शिव कथा का आयोजन किया जाएगा। 30 अगस्त 2019 से प्रथम श्रीमद भागवत कथा का आयोजन न्यूयार्क में किया जाएगा।
#ShantiSandeshYatra

 

28Aug 2019

आज पूज्य पिताश्री की दूसरी पुण्यतिथि के अवसर पर ठाकुर श्री प्रियाकांत जू प्रांगण में स्वर्गीय पिता जी की मूर्ति पर माल्यार्पण कर आशीर्वाद प्राप्त किया। इस दौरान ब्राहम्णो द्वारा अखंड पाठ किया गया एवं विधि-विधान के साथ पूजा अर्चना की गई।

आज पूज्य पिताश्री की दूसरी पुण्यतिथि के अवसर पर ठाकुर श्री प्रियाकांत जू प्रांगण में स्वर्गीय पिता जी की मूर्ति पर माल्यार्पण कर आशीर्वाद प्राप्त किया। इस दौरान ब्राहम्णो द्वारा अखंड पाठ किया गया एवं विधि-विधान के साथ पूजा अर्चना की गई, इस अवसर पर भंडारे का आयोजन किया गया। साथ ही ब्राहम्णो को भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा देकर विदाई दी गई।

29Aug 2019

राधे राधे,पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज एवं श्री विजय शर्मा जी शांति संदेश यात्रा के माध्यम से यूएसए के विभिन्न शहरों में होने जा रही श्रीमद्भागवत कथा, श्री राम कथा, श्री कृष्ण कथा एवं शिव कथा के लिए यूएसए रवाना हुए।

राधे राधे,पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज एवं श्री विजय शर्मा जी शांति संदेश यात्रा के माध्यम से यूएसए के विभिन्न शहरों में होने जा रही श्रीमद्भागवत कथा, श्री राम कथा, श्री कृष्ण कथा एवं शिव कथा के लिए यूएसए रवाना हुए। कथाओं का आयोजन 30 अगस्त से 12 अक्टूबर तक किया जाएगा। यूएसए रवाना होने से पूर्व ठा. श्री प्रियाकांत जू भगवान और बांके बिहारी जी के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। राधे राधे।। #ShantiSandeshYatra । #Thakur_Ji #Priyakant_Ju_Mandir#Vrindavan

 

24Aug 2019

वृंदावन में श्रीकृष्ण #जन्माष्टमी के पावन पर्व पर मुख्य यजमान श्रीमती मोहिनी देवी एवं श्री सुरेश चंद्र गोयल जी के द्वारा सपरिवार हवन पूजन किया गया। 

आज शांति सेवा धाम, वृंदावन में श्रीकृष्ण #जन्माष्टमी के पावन पर्व पर मुख्य यजमान श्रीमती मोहिनी देवी एवं श्री सुरेश चंद्र गोयल जी के द्वारा सपरिवार हवन पूजन किया गया। 
#JanmashtmiWithPriyakantJu

25Aug 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने शांति संदेश की शुरूआत करते हुए कहा कि कोई भी कार्य अगर तरीके से किया जाए तो उसका लाभ मिलता है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के पावन सानिध्य में शांति सेवा धाम, वृंदावन में युवा शांति संदेश का आयोजन किया गया। शांति संदेश में सैकड़ों की संख्या में युवा शामिल हुए।

कार्यक्रम की शुरूआत विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने शांति संदेश की शुरूआत करते हुए कहा कि कोई भी कार्य अगर तरीके से किया जाए तो उसका लाभ मिलता है। आजकल कई महानुभाव कहते हैं की व्रत की आवश्यकता क्या है ? परमात्मा परमेश्वर बिना किसी साधन व्रत के बिना मिलते नहीं है, कोई ना कोई साधन व्रत तो करना ही पड़ेगा। जिन्हें सिर्फ पेट की चिंता रहती है वो सिर्फ बहाने बनाते हैं की व्रत करके क्या होगा ? महाराज श्री ने बताया की कृष्ण जन्माष्टमी पर रात 12 बजे तक व्रत का पालन करना चाहिए, व्रत में बिल्कुल झूठ नहीं बोलना चाहिए, ज्यादा से ज्यादा भजन करना चाहिए और प्रभु से प्रार्थना करनी चाहिए।

महाराज श्री ने आगे कहा कि जो भी कृष्ण के भक्तों हो वो प्रेम पूर्वक सारे साधन और नियम व्रत करें जिन साधनों से परमात्मा की प्राप्ति हो सकती हो। हम सबको सबसे पहले 5 मिनट तक कीर्तन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि कृष्ण को मानना और कृष्ण की मानना दोनों अलग बात है। अगर हमको जीवन आनंदित करना है तो कृष्ण के साथ साथ कृष्ण की भी माननी पड़ेगी। आजकल व्यक्ति जो मन में आता है उसे ही धर्म समझ लेता है।

महाराज श्री ने कहा कि जब भी किसी का जन्मदिन हो तो उसदिन ना तो मोम्बत्ती जलाएं और ना ही बुझाएं, उसके बदले आप भगवान के आगे अपनी उम्र के बराबर देशी घी के दीपक जलाएं। आज भगवान श्रीकृष्ण का 5247वां जन्मोत्सव है तो आज आप कम से कम 9 या 11 घी के दीपक अपने घर में पूजा के समय अवश्य जलाएं। कहते हैं त्मसो मा ज्योतिर्गमय यानि अंधकार से प्रकाश की और चलो।

युवा शांति संदेश में मंच का संचालन विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी द्वारा किया गया, उन्होंने ट्रस्ट से जुड़ी कई जानकारी लोगों को दी।

24Aug 2019

आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर शांति सेवा धाम, वृंदावन में सैकड़ों की संख्या में भक्तों ने पूज्य महाराज श्री से गुरू दीक्षा प्राप्त की।

आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर शांति सेवा धाम, वृंदावन में सैकड़ों की संख्या में भक्तों ने पूज्य महाराज श्री से गुरू दीक्षा प्राप्त की। गुरू दीक्षा प्राप्त करने के पश्चयात सभी भक्तों ने महाराज श्री के आशीष वचनों पर अमल कर सच्चाई के पथ पर चलने और अपनी संस्कृत, संस्कृति और संस्कारों को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।#JanmashtmiWithPriyakantJu

24Aug 2019

16 कलाओं में निपुण थे भगवान श्रीकृष्ण

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 24 अगस्त 2019 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का ठा. प्रियाकांत जू मंदिर, शांति सेवा धाम, वृंदावन में भव्य आयोजन किया गया। महोत्सव की शुरूआत महाराज श्री द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ की गई। कथा पंडाल में हजारों की संख्या में आए भक्तो ने कन्हैया के आने की खुशियां मनाई। 
श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव की शुरुआत बाल कृष्ण आरती के साथ विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में ठाकुर श्री प ठा. प्रियाकांत जू मंदिर में जन्माष्टमी महोत्सव की शुरुआत बहुत ही सुन्दर बाल रूप श्री राधा के द्वारा दी हुई प्रस्तुति से हुई जिसने सभी श्रद्धालुओं का मन मोह लिया।

विश्व शान्ति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट की के द्वारा श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव की शुरुआत में भाजपा के वरिष्ठ नेता, पूर्व केंद्रीय मंत्री, प्रख्यात वक़ील श्री अरुण जेटली जी के निधन पर महाराज श्री ने सभी श्रद्धालुओं के साथ एक मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी एवं ठा. श्री प्रियाकांत जू उन्हें अपने श्री चरणों मे स्थान दें ऐसी प्रार्थना की।

महोत्सव की शुरुआत में महाराज श्री ने भगवान श्याम सुंदर की 16 कलाओं के बारे में सभी भक्तों को विस्तार से बताया।

पूज्य महाराज श्री देवकीननंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में ठाकुर श्री प्रियाकांत जू मंदिर में बड़ी धूम धाम से श्री कृष्ण प्राकट्योत्सव मनाया गया इस उत्सव में देश- विदेश से आए लाखों श्रद्धालुओं ने श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव में भगवान प्रियाकांत जू के चरणों में अपनी हाजरी लगाई। एवं महाराज श्री के मुखाबिंद से निकले कृष्ण भजनों पर भक्त खूब झूमे और कृष्ण के जन्म की खुशियां मनाई। रंगारंग रोशनी में चमक रहे ठा. प्रियाकांत जू मंदिर की भव्यता भी मन मोह रही थी। इस मौके पर ठाकुर श्री प्रियाकांत जू मंदिर में विशेष सजावट की गई है।

पूज्य महाराज श्री द्वारा ठा. प्रियाकांत जू मंदिर में बाल गोपाल का अभिषेक किया गया और 108 श्रीमद्भावत कथा के मुख्य यजमान श्रीमती एवं श्री सुरेश चंद्र जी व् समस्त यजमानों के द्वारा भी बाल गोपाल का मंत्रोचारण के साथ अभिषेक किया गया उसके बाद सोने का मुकुट, लकुट व् बंशी कन्हैया को धारण कराई गई एवं जन्माष्टमी आयोजन में उपस्थित सभी कृष्ण भक्तों के द्वारा महाआरती की गई। नन्दोत्सव के अवसर पर मंदिर के कपाट खुलने पर, कान्हा के जन्म की खुशी में खिलौने, वस्त्र, रुपये, मिठाई, फल, मेवा लुटाए गए। पूज्य महाराज श्री के साथ देर रात तक चले भजनों में हर कोई उल्लास में डूबा रहा।

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19Aug 2019

आज 108 श्रीमद्भभागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के तृतीय दिवस पर कथा पंडाल में मूलक पीठाधीश्वर स्वामी श्री राजेंद्र दास देवाचार्य जी महाराज ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई, संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

आज 108 श्रीमद्भभागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के तृतीय दिवस पर कथा पंडाल में मूलक पीठाधीश्वर स्वामी श्री राजेंद्र दास देवाचार्य जी महाराज ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई, संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। महाराज श्री ने अपने श्रीवचनों से भक्तों को अलंकृत किया। इसके अलवा महाराज श्री ने ठा. श्री प्रियाकांत जू भगवान के दर्शन कर आशीर्वाद भी प्राप्त किया। #JanmasthamiMahotsav

19Aug 2019

“बिना सोचे समझे किसी की बात पर विश्वास ना करें : विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 17 से 24 अगस्त 2019 तक प्रतिदिन सुबह 9:30 बजे से विश्व शांति सेवा धाम, वृंदावन में 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

“बिना सोचे समझे किसी की बात पर विश्वास ना करें : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

“ऐसा कर्म किजिए जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 17 से 24 अगस्त 2019 तक प्रतिदिन सुबह 9:30 बजे से विश्व शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड, वृंदावन में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

तृतीय दिवस पर कथा पंडाल में मूलक पीठाधीश्वर स्वामी श्री राजेंद्र दास देवाचार्य जी महाराज ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई, संस्था की और से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। महाराज श्री ने अपने श्रीवचनों से भक्तों को अलंकृत भी किया
पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि वेद व्यास जी ने बहुत ही बड़ा अनुग्रह करके यह कथा हम सब के लिए प्रस्तुत की है। वरना आजकल हमारे पास समय ही कहां है अपने कल्याण के विषय में सोचने का, जीव अपना ही अनर्थ कर रहा है। संसार के अल्पज्ञान के चक्कर में अपना विनाश किए जा रहा है। इस संसार में जहां जहां आप गए, जोभी व्यक्ति आपके जीवन में आया सबने आपको ज्ञान दिया और आपने लिया। वो ज्ञान आपने पाने की कोशिश की तब मिला लेकिन जब हरि को मनाने की कोशिश करोगे, संत के पास जाओगो, गुरू के पास जाओगे उनसे पूछोगे की मैं उन्हें कैसे मनाऊं वो भी रास्ता बताएंगे। जैसे संसार को जानने के लिए आप रास्ते पर चले, किसी की बात मानी और उसे माना, उसके बाद में वो आपको मिल भी गए लेकिन भगवान को पाने के रास्ते पर जब आप जाओगे गुरू, संत के बताए हुए मार्ग पर चलोगे तो निश्चित तौर पर आपको हरि मिलेंगे ही मिलेंगे।
महाराज श्री ने कहा कि आजकल हमारे घर बिगड़ रहे हैं, जानते हैं क्यों ? दूसरों की बातों पर विश्वास करने से हमारे घर बिगड़ रहे हैं। हमे किसी की भी बात पर विश्वास करने से पहले उन बातों को छान लेना चाहिए, अगर बिना सोचे समझे किसी की भी बातों पर विश्वास कर लोगे तो भी तो रिश्ते बिगड़ेगे ही।

पं. देवकीनंदन ठाकुर जी ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।
राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

कथा का आयोजन विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है। कथा पंडाल में 108 भागवत कथा के यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

19Aug 2019

आज 108 श्रीमद्भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 2020 में की जाने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा की घोषणा की गई। कैलाश मनसरोवर यात्रा 27 मई से लेकर 06 जून 2020तक हेलकॉप्टर के द्वारा की जायेगी जिसकी सेवा राशि 1,95,000/- रूपए है। एवं 27 मई से 09 जून तक बस द्वारा की जाएगी जिसकी सेवा राशि 1,35,000/- रूपए है।

आज 108 श्रीमद्भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 2020 में की जाने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा की घोषणा की गई। कैलाश मनसरोवर यात्रा 27 मई से लेकर 06 जून 2020तक हेलकॉप्टर के द्वारा की जायेगी जिसकी सेवा राशि 1,95,000/- रूपए है। एवं 27 मई से 09 जून तक बस द्वारा की जाएगी जिसकी सेवा राशि 1,35,000/- रूपए है। यात्रा से पूर्व 20 मई से लेकर 26 मई तक श्रीमद्भागवत कथा का काठमांडू में आयोजन किया जाएगा। आप सभी इस यात्रा में सादर आमंत्रित हैं, जो भी इस यात्रा में सम्मिलित होना चाहते हैं वो 8448444248/07351112221 इन नम्बरों पर संपर्क करके रजिस्ट्रेशन करवा सकते हैं।

20Aug 2019

शांति सेवा धाम, वृंदावन में किया गया नि:शुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर का आयोजन

विश्व शांति सेवा चैरीटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में 17 से 24 अगस्त 2019 तक ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर शांति सेवा धाम छटीकरा रोड वृन्दावन में नि:शुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर का आयोजन किया जा रहा है। शिविर के चतुर्थ दिवस पर सैकड़ों की संख्या में लोगों का नि:शुल्क इलाज किया गया एवं दवाइयां वितरित की गई।

20Aug 2019

वृंदावन में आयोजित 17 से 24 अगस्त 2019 तक 108 श्रीमद्भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव के चतुर्थ दिवस पर कथा से समस्त यजमानों के द्वारा भागवत पूजन किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 17 से 24 अगस्त 2019 तक वृंदावन में आयोजित 108 श्रीमद्भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव के चतुर्थ दिवस पर कथा से समस्त यजमानों के द्वारा भागवत पूजन किया गया।#JanmashtamiMahotsav2019

20Aug 2019

“बुरे वक्त में धैर्य ना खोएं, धैर्य खोने वाला अपना सर्वस्व खो देता है : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

“बुरे वक्त में धैर्य ना खोएं, धैर्य खोने वाला अपना सर्वस्व खो देता है : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

“साधु की पहचान वेशभुषा नहीं सहनशीलता हैं: पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 17 से 24 अगस्त 2019 तक प्रतिदिन सुबह 9:30 बजे से विश्व शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड, वृंदावन में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया
108 भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

कथा पंडाल में पूज्य श्री राम कमल दास वेदांती जी महाराज बनारस से कथा पंडाल में पधारे एवं व्यास पीठ से आशीर्वाद प्राप्त किया और कथा श्रवण करने आये सभी भक्तो को आशीर्वचन दिए । उन्होंने कहा कि युवाओं को कथा सुनने के लिए प्रेरित किया है उसके लिए मैं महाराज श्री का अभिनंदन करता हूँ। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि व्यक्ति बहुत व्यथित और चिंतित हो जाता है जब जीवन में कुछ बुरा पल आता है। इस संसार में ऐसा कौन है जिसने दुख नहीं झेला है, हमारी स्थित बहुत विचित्र होती है, जब बुरा वक्त आता है हम एक मिनट में अपना धैर्य गवां देते हैं। कई लोग तो बुरे वक्त के लिए भगवान को ही कोसने लगते हैं लेकिन वक्त अगर बुरा हो तो चिंता नहीं बल्कि हरि का चिंतन किजिए। हम कल तक सुखी थे लेकिन वक्त बदला तो दुखी हो गए तो कल तक का इंतजार किजिए वक्त बदलेगा और फिर से सुखी हो जाओगे। यह बात याद रखिए की वक्त हर दिन एक समान नहीं होता है, हर समय कुछ ना कुछ बदलाव तो होता ही है। बुरे वक्त में धैर्य खो देने वाला व्यक्ति अपना सर्वस्व खो देता है।

महाराज श्री ने कहा कि अगर आपको ईश्वरीय कृपा से कोई वस्तु प्राप्त हो तो अच्छा है लेकिन उस वस्तु का अभिमान होना बुरा है। हम लोगों को समस्या यही है की थोड़ी सी भी कोई चीज मिल जाए तो अहंकार किए बिना मानते नहीं है। कई तो ऐसे भी लोग हैं जो रात दिन सत्संग सुनते हैं लेकिन उनके मन से अहंकार मिटता नहीं है। इतना सत्संग सुनने के बाद भी यह अहंकार कहा से आता है ? हमको लगता है कही ना कही अच्छाई के विपरित बुराई भी चल रही है, जब तक अच्छाई चल रही है ठीक है लेकिन उसके विपरित बुराई भी चल रही है जिसकी वजह से हमारा जितना विकास होना चाहिए उतना आध्यात्मिक विकास नहीं हो पाता है। उन बुराईयों से बचने का अथक प्रयास आपको ही करना होगा।

महाराज श्री ने कहा कि एक संत का स्वभाव है सहनशील होना, किसी भी ग्रंथ में भेष को संत नहीं बताया गया है। सिर्फ लाल, सफेद, पीले कपड़े पहनने वाले ही साधु होंगे इस बात की गारंटी नहीं है। साधु वही है जो सहनशील है। सहनशील उसे कहते हैं जो बड़े से बड़े अपमान को सहज स्वीकार कर ले, अपमान के बाद भी कोई प्रतिक्रिया नहीं करते, वही इसलिए नहीं करते क्योंकि जो अपमान हो रहा है वह शरीर का हो रहा है और वह शरीर में स्थित ही नहीं है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली ने भगवान ब्रह्मा वरदान मांगा की मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने उसे वरदान दे दिया। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने विष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली से कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।

महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"

भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।

इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का सुंदर वर्णन श्रवण कराया। सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
कथा का आयोजन विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है। कथा पंडाल में 108 भागवत कथा के यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

#JanmashtamiMahotsav2019

21Aug 2019

108 श्रीमद्भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव के पंचम दिवस पर कथा पंडाल में सांसद श्री साक्षी महाराज जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

108 श्रीमद्भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव के पंचम दिवस पर कथा पंडाल में सांसद श्री साक्षी महाराज जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। श्री Dr. Swami Sakshi Ji Maharaj जी ने सभी भक्तों को अपने आशीर्वचनों से अलंकृत भी किया। #JanmashtamiMahotsav2019

21Aug 2019

“मृत्यु और जीवन ये किसी प्राणी के हाथ में नहीं है:पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

“मृत्यु और जीवन ये किसी प्राणी के हाथ में नहीं है:पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 17 से 24 अगस्त 2019 तक प्रतिदिन सुबह 9:30 बजे से विश्व शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड, वृंदावन में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।


श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पंचम दिवस पर कथा पंडाल में सांसद श्री साक्षी महाराज ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। श्री साक्षी महाराज जी ने सभी भक्तों को अपने आशीर्वचनों से अलंकृत भी किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की मृत्यु और जीवन ये किसी प्राणी के हाथ में नहीं है। आज सिर्फ कोशिश कर सकते हो, आप ना तो किसी को जीवनदान दे सकते हो और ना ही मृत्यु दे सकते हो। मृत्यु तो धूर्व सत्य है इसे कोई मिटा नहीं सकता।

महाराज श्री ने कहा कि बहुत से लोग कहते हैं हम इतना धर्म का कार्य करते हैं फिर भी हमारे मन को शांति क्यों नहीं मिलती ? उसका कारण यह है कि कहीं ना कहीं आप धर्म करते समय सच्चाई नहीं रखते हो मन में। मेरा उद्देश्य केवल आपका हित है, रामायण में लिखा है मेरा हित किसमें होगा, मेरा अनहित किसमें होगा ये पशु पक्षी भी जानते हैं। जब हित अनहित पशु पक्षी भी जानते हैं तो मानव होकर हम अपना हित और अनहित क्यों नहीं पहचानते हैं। 
महाराज श्री ने आगे कहा कि भगवान कपटी लोगों को देखते नहीं है अपनी आंखे बंद कर लेते हैं। कपटी वो होता है जिसके मन में कुछ, जुबान में कुछ होता है और हम भी ऐसा ही व्यवहार करते हैं भगवान के साथ। मन में भगवान के प्रति प्रेम नहीं है लेकिन दिखावे के लिए प्रेम प्रदर्शित करते हैं।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। 
श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है। श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है।

आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है। 
कथा का आयोजन विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है। कथा पंडाल में 108 भागवत कथा के यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

21Aug 2019

जन्माष्टमी के अवसर पर किया गया भण्डारे का आयोजन

विश्व शांति सेवा चैरीटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में 17 से 24 अगस्त श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव 2019 के शुभ अवसर पर ट्रस्ट की ओर से प्रतिदिन विशाल भंडारे का आयोजन किया रहा है जिसमें हजारों की संख्या में भक्तगण प्रसाद ग्रहण कर रहें है।#JanmashtamiMahotsav2019

21Aug 2019

शांति सेवा धाम, वृंदावन में किया गया नि:शुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर का आयोजन

विश्व शांति सेवा चैरीटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में 17 से 24 अगस्त 2019 तक ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर शांति सेवा धाम छटीकरा रोड वृन्दावन में नि:शुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर का आयोजन किया जा रहा है। शिविर के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने शिविर का निरीक्षण कर उचित व्यवस्था का जायजा लिया और उपलब्ध दवाओं एवं अन्य स्वास्थ्य सम्बंधित विषयों पर डाक्टरों से वार्ता की।

22Aug 2019

108 श्रीमद्भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव के अवसर पर आयोजित श्रीमद भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर कथा पंडाल में सुदामा कुटी के महंत श्री सुतीक्ष्ण दास जी महाराज ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई।

108 श्रीमद्भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव के अवसर पर आयोजित श्रीमद भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर कथा पंडाल में सुदामा कुटी के महंत श्री सुतीक्ष्ण दास जी महाराज ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं व्यास पीठ को नमन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित भी किया गया। श्री सुतीक्ष्ण दास जी महाराज ने कथा स्थल में मौजूद सभी भक्तों को अपने आशीर्वचन भी दिए।#JanmashtamiMahotsav2019

23Aug 2019

अमंगलों का नाश करते है संतो के दर्शन - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

अमंगलों का नाश करते है संतो के दर्शन - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 17 से 24 अगस्त 2019 तक प्रतिदिन सुबह 9:30 बजे से विश्व शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड, वृंदावन में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के छठे दिन की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

श्रीमद भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर कथा पंडाल में सुदामा कुटी के महंत श्री सुतीक्ष्ण दास जी महाराज ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं व्यास पीठ को नमन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित भी किया गया। श्री सुतीक्ष्ण दास जी महाराज ने कथा स्थल में मौजूद सभी भक्तों को अपने आशीर्वचन भी दिए।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की हमारे जीवन में परिवार का होना, संतान का होना,लक्ष्मी का होना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन अगर आपको आपके जीवन में संतो का दर्शन और भगवान की कथा का श्रवण मिल जाए तो इससे बड़ा जीवन का कोई उपहार आपको नहीं मिल सकता।

संतो के दर्शन मात्र से हमारे अमंगलों का नाश होता है और हमारे मंगल प्रांरभ होते है। क्यूंकि ईश्वर किसी न किसी वजह से कृपा करते है लेकिन संत बेवजह कृपा करते है।

महाराज श्री ने बताया की जीवन में जिन्हे पद और सम्मान मिल जाता है वो अपने पद को बचाएं रखने के लिए अपने से बड़ो का भी अनादर कर देते है लेकिन वो भूल जाते है की आप अपना सम्मान कभी खरीद नहीं सकते, आप अपने कर्मो के द्वारा उसे प्राप्त कर सकते है। और सम्मान पाने के लिए आप सिर्फ प्रयास कर सकते है सम्मान आपको मिलेगा या नहीं ये आपके हाथ में नहीं है। क्यूंकि अगर आप अपना कर्म करना नहीं भूलेंगे तो भगवान अपना कर्म करना नहीं भूलेंगे इसलिए आपको बिना फल की चिंता किये हुए अपने कर्म करने चाहिए।

श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है। 
कथा का आयोजन विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है। कथा पंडाल में 108 भागवत कथा के यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

23Aug 2019

"ईश्वर के चरणों में चित्त ना लगाने वाले लोगों का हाल बुरा होता है” || श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

"ईश्वर के चरणों में चित्त ना लगाने वाले लोगों का हाल बुरा होता है”

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 17 से 24 अगस्त 2019 तक प्रतिदिन सुबह 9:30 बजे से विश्व शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड, वृंदावन में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। 24 सितंबर को ठा. प्रियाकांत जू मंदिर में जन्माष्टमी का भव्य महोत्सव मनाया जाएगा

कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई । भागवत आरती मुख्य यजमान श्रीमती मोहिनी देवी एवं सुरेश चंद्र गोयल जी द्वारा की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि अंतिम समय में नाम मिल जाए, धाम मिल जाए, भगवान मिल जाए या कथा मिल जाए, होनी तो मुक्त ही हैं। ये चारों बराबर हैं। जीवन भर पाप किए हों और अंत समय में सदबुद्धि आ जाए की हमें धाम में ही रहना है तो कल्याण होना निश्चित है। लेकिन यह भी तभी संभव है जब आप पर किशोरी जी की पूर्ण कृपा हो। 
महाराज श्री ने कहा कि इस संसार में ईश्वर की अहित की कृपा का सबसे बड़ा दर्शन मनुष्य जीवन है। मनुष्य जीवन प्राप्ति के बाद हमारा मन उनकी तरफ आकर्षित हो जाए यह ठाकुर जी की अहित की कृपा है। ईश्वर के चरणों में चित्त ना लगाने वाले लोगों का हाल बुरा होता है।

महाराज श्री ने कहा कि अपने धर्म के प्रति वफादार बनिए और दिखावा मत किजिए, भगवान पर पूर्ण भरोसा किजिए। आपको जब भी समय मिले आपको पुराणों की कथा सुननी चाहिए, इससे हमारा चित्त परमात्मा की तरफ आकर्षित होता है, बुराईयों की तरफ नहीं जाता। अगर चित्त बुराई की तरफ चला गया तो यम के द्वार पर जाना ही पड़ेगा लेकिन चित्त गोविंद के चरणों में चला गया तो हमारा जो उद्देश्य है हमे प्राप्त हो जाएगा। पुराण हमें पुरूषोत्तम की तरफ लेकर जाते हैं।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

कथा पंडाल में मुख्य यजमान श्रीमती मोहिनी देवी एवं सुरेश चंद्र गोयल जी, श्री एच. पी.अग्रवाल जी, श्री जे पी सिंघल जी (मामा), श्री राजेश कुमार सिंह जी, श्री सतीश गर्ग जी, श्री श्रीपाल जिंदल जी, श्री अनिल त्यागी जी, श्री सुरेश जांगिड जी, श्री संजय अग्रवाल जी, श्री संजय चतुर्वेदी जी, श्री शेराराम भादू जी, श्री बिजेंदर सोनी जी, श्री सूरज बंसल जी, श्री अशोक कुमार खुराना जी, श्री रामगोपाल बागला जी, श्री विपिन बाजपाई जी आदि भक्त वृन्द मौजूद रहें।

23Aug 2019

जन्माष्टमी के पावन पर्व पर ठा. श्री प्रियाकांत जू मंदिर, वृन्दावन में जन्माष्टमी महोत्सव मनाया जा रहा है। हजारों की संख्या में श्रद्धालु दिन रात संकीर्तन कर प्रभु की भक्ति में लीन हैं।

जन्माष्टमी के पावन पर्व पर ठा. श्री प्रियाकांत जू मंदिर, वृन्दावन में जन्माष्टमी महोत्सव मनाया जा रहा है। हजारों की संख्या में श्रद्धालु दिन रात संकीर्तन कर प्रभु की भक्ति में लीन हैं। सभी भक्त ठा. प्रियाकांत जू मंदिर प्रांगण में भजन गाकर एवं नृत्य करके गोकुल नंदन के आने का इंतजार कर रहे हैं। 
#HappyJanmashtmi #Priyakant_Ju #Thakurji

18Aug 2019

“जिनका मन निर्मल है वहीं प्रभु को प्राप्त कर सकता है" विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 17 से 24 अगस्त 2019 तक प्रतिदिन सुबह 9:30 बजे से वृंदावन में 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

साधु के एक क्षण का संग आपका जीवन सुधार सकता है : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज 


“जिनका मन निर्मल है वहीं प्रभु को प्राप्त कर सकता है : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज 

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 17 से 24 अगस्त 2019 तक प्रतिदिन सुबह 9:30 बजे से विश्व शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड, वृंदावन में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।


कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।
भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।


कथा के द्वितीय दिवस पर कथा पंडाल में केन्द्रीय पशुपालन, मत्स्य और डेयरी मंत्री श्री गिरिराज सिंह जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई, साथ ही भागवत आरती की एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हे स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।


पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए भक्तों को बहुत ही सुन्दर भजन श्रवण कराया। "भज गोविन्दं भज गोविन्दं, गोविन्दं भज गोविन्द "
महाराज जी ने कहा की भगवान श्याम सुन्दर को ये गोविन्द नाम बहुत प्रिय है। ऐसे तो परमात्मा के बहुत नाम है पर उन सभी नामो में से गोविन्द नाम अधिक प्रिय है। गोविन्द नाम इसलिए अधिक प्रिय है क्योकि गऊ माता ने ये नाम प्रदान किया है, इसका माहात्म्य भी बहुत बड़ा है इसलिए मैंने सोचा की श्री धाम व्रन्दावन में पधारे हुए लोगो को क्यों न माला माल करके वापस भेजा जाये। हम पर तो ये ही नाम का धन है जितना लूट सको लूट लो। जितना कृष्ण नाम जप लोगे उतना ही लोक परलोक सवर जाएगा।
महाराज श्री ने कहा की भक्ति के मार्ग में श्रीमद्भागवत महापुराण का आश्रय निश्चित देव कृपा है, निश्चित पूर्वजनों की कृपा है और निश्चित ही हमारे सद गुरुदेव की कृपा है। भक्ति के मार्ग पर चलने का मन हो भागवत का आश्रय हो तो मार्ग बहुत सुलभ सुगम हो जाता है। एक मार्ग व्यवस्ता युक्त होता है और एक मार्ग अव्यवस्ता युक्त होता है। कठिन मार्ग हो तो परेशानियाँ अधिक होगी, सुगम, सरल मार्ग हो तो आसानी से मंजिल प्राप्त की जा सकती है। सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग इन युगो में सिर्फ चर्चा करना आसान नहीं है, बहुत त्याग किया है लोगो ने हजारो हजारो वर्ष राजभोग भोगने के बाद भी अंत तुगत वो करना पड़ा जो एक संत प्रारम्भ से ही करते है और जिन्होंने तलाश की है उन्हें मिला भी है।

महाराज श्री ने कहा कि एक बड़ा प्रश्न यह है कि हमारा आधुनिक विज्ञान कहता हम बंदरो से इन्सान बने और आध्यात्मिक, ईश्वर वादी व्यक्ति कहते है की हमें ईश्वर ने बनाया है। ये आप पर निर्भर है की आप बनना क्या चाहते हो। अगर आप इसी में प्रसन्न हो की हम बंदर की संतान है तो ऐसे सोच के प्रसन्न हो लो। इस में बुराई क्या है, बुराई तो नहीं है लेकिन एक मंथन तो आपको करना ही पड़ेगा की आपका सम्मान किस में है बंदर की संतान कहलाने में या ईश्वर की संतान कहलाने में। ये तो आपका चिंतन होना चाहिए। ये तो आपका मनन होना चाहिए। आखिर तुम बंदर की संतान कहलाना चाहोगे या ईश्वर की। मुझसे कोई पहुंचेगा तो मैं तो यही कहूंगा ईश्वर की संतान हूँ। अगर इंसान बनना है, तो ईश्वर की संतान बनने में ही लाभ है। अगर बंदर की संतान हो और तुम्हे अग्नि में जलाया जाये तो बचाएगा बंदर कैसे? नहीं बचा पायेगा क्यों की उसे भी डर होगा मैं बचाने जाऊंगा तो भी जल जाऊंगा। लेकिन जब प्रहलाद को अग्नि में जलाया गया तो प्रह्लाद बंदर की संतान नहीं मानते अपने आपको, वो कहते है मैं ईश्वर की संतान हूँ। जब ईश्वर संतान प्रहलाद को अग्नि में जलने का प्रयास किया जाता है तो प्रहलाद को यह भरोशा है की मैं ईश्वर की संतान हूँ मेरा ईश्वर मुझे जलने नहीं देगा।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।

श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।

यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।

कथा का आयोजन विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है। कथा पंडाल में 108 भागवत कथा के यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।
|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

17Aug 2019

“कलयुगी व्यक्ति अच्छाई को टालता है और बुराई के लिए जल्दी कर बैठता है" || देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

“कलयुगी व्यक्ति अच्छाई को टालता है और बुराई के लिए जल्दी कर बैठता है"

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 17 से 24 अगस्त 2019 तक प्रतिदिन सुबह 9:30 बजे से विश्व शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड, वृंदावन में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। कथा के प्रथम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया

भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
भागवत कथा के प्रथम दिवस पर कथा पंडाल में उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री श्री लक्ष्मी नारायण जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई, संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया। इसके अलावा सुदामा कुटी से श्री अमरदास जी महाराज ने भी अपनी उपस्थिति दी एवं भक्तों को अपने अमूल्य वचनों से कृतार्थ किया।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की बिना साधन के साध्य को प्राप्त नहीं किया जा सकता और भागवत साधन भी है और साध्य भी है। अगर भागवत साधन हो तो वही प्रत्यक्ष कृष्ण साध्य भी हैं। आप सभी भाग्यशाली हैं क्योंकि लोग कहां नहीं अटके हैं, लोग कहां नहीं फसे हुए हैं, रास्ते तो दो ही हैं। एक रास्ता जन्म मरण के भव बंधन में डाले रखता है और एक मार्ग ऐसा भी है तो इनसे छुटकारा दिला देता है। 
महाराज श्री ने कहा कि ध्यान देने वाली बात है कलयुग अपने हाथ में दंड लेकर घूम रहा है और हमारे शरीर पर सारी चोट तो बर्दाश्त नहीं होत। ना जाने कौन सी चोट से हमारा ये शरीर विक्षिप्त हो जाए या परेशान हो जाए और अगर ये कहें की भगवान का नाम ले लेंगे अंत समय में और अंत समय में ना हुआ तो फिर क्या करोगे, जो करना है समय रहते करिए। कलयुग का व्यक्ति अच्छाई को टालता है और बुराई के लिए जल्दी कर बैठता है। अच्छे काम जितनी जल्दी हो सके कर डालो और बुरे काम में जिनती देरी हो सके उतनी देरी कर डालो क्योंकि अच्छे काम को टाल दिया तो फिर वो तुमसे ना हो पाए।
महाराज श्री ने भागवत प्रसंग की शुरूआत भागवत के प्रथम श्लोक से की
सच्चिदानन्द रूपाय विश्वोत्पत्यादि हेतवे तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयम नुमः 
वासुदेव सुतं देवम् कंस चानुर मर्दनम् देवकी परमानंदम् कृष्णम् वंदे जगदगुरुम्।।
महाराज श्री ने कहा कि भागवत के प्रथम श्लोक में भगवान को प्रणाम किया गया है, उनके स्वभाव का वर्णन किया गया है, उनकी लीलाओं का वर्णन किया गया है। भागवत को समझना भगवान को समझने के बराबर है। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की एक बात सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगो का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा । 
कथा का आयोजन विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है । कथा पंडाल में 108 श्रीमद् भागवत कथा के यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

18Aug 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 17 से 24 अगस्त 2019 तक वृंदावन में आयोजित 108 श्रीमद्भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव के द्वितीय दिवस पर कथा से पूर्व ब्राह्मणों के द्वारा भागवत पाठ किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 17 से 24 अगस्त 2019 तक वृंदावन में आयोजित 108 श्रीमद्भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव के द्वितीय दिवस पर कथा से पूर्व ब्राह्मणों के द्वारा भागवत पाठ किया गया।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

18Aug 2019

विश्व शांति सेवा चैरीटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में 17 से 24 अगस्त 2019 तक ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर शांति सेवा धाम छटीकरा रोड वृन्दावन में नि:शुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर का आयोजन किया जा रहा है ।

विश्व शांति सेवा चैरीटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में 17 से 24 अगस्त 2019 तक ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर शांति सेवा धाम छटीकरा रोड वृन्दावन में नि:शुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर का आयोजन किया जा रहा है । शिविर के द्वितीय दिवस पर सैकड़ों की संख्या में लोगों का नि:शुल्क इलाज किया गया एवं दवाइयां वितरित की गई।

15Aug 2019

जिसे कोई नहीं अपनाता उसे ठाकुर जी अपनाते हैं।

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 09 से 15 अगस्त 2019 तक Rinag Foods, 88 Jamie Avenue Ottawa, Ontario, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया गया।

श्रीमद्भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई।

भागवत के सप्तम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि रुकमणी जी ने श्रीकृष्ण से प्रेम विवाह किया। भगवान ने 16 हजार 100 विवाह किए हैं लेकिन 8 विवाह अलग अलग हुए। ये 8 पटरानियां साधारण नहीं हैं लक्ष्मी जी बनी हैं रूकमणी, पार्वती जी आधे अंश से बनी हैं जामवंती और बाके आधे अंश से बनी हैं महामाया, तुलसी बनी हैं लक्ष्मणा, यमुना बनी हैं सूर्य की पूत्री कालिंदी, लज्जा बनी हैं भद्रा, गंगा बनी हैं मित्रव्रिंदा, सावित्री जी बनी हैं सत्या और पृथ्वी बनी हैं सत्यभामा। ये सांसारिक विवाह नहीं है ये पूरी प्रकृति के साथ ठाकुर जी ने विवाह किया है।
महाराज श्री ने आगे कहा कि भगवान ने 16100 विवाह इसलिए नहीं किए की उन्हे बहुत सारी पत्नियां चाहिए थी। उन्होंने इतने विवाह इसलिए किए क्योंकि उन स्त्रियों को जरूरत थी। भौमासुर नामक राक्षस ने 16 हज़ार 100 कन्याओं को बंदी बना रखा था। नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा की समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। इस कारण भगवान ने १६१०० रूप बनाकर सबके साथ एक मुहूर्त में एक साथ विवाह किया था। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने इतने विवाह किये। भगवान ने कामनावश विवाह नहीं किया था, करुणावश किया था। भगवान कहते हैं जिसको कोई नहीं अपनाता अगर वो मेरी शरण में आये तो मैं उसे अपना लेता हूँ।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंततः सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

17Aug 2019

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कनाड़ा की शांति संदेश यात्रा के पूर्ण होने के पश्चात भारत के लिए प्रस्थान किया। महाराज श्री को कनाड़ा ने भक्तों ने पुन: आगमन की अभिलाषा के साथ विदाई दी।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कनाड़ा की शांति संदेश यात्रा के पूर्ण होने के पश्चात भारत के लिए प्रस्थान किया। महाराज श्री को कनाड़ा ने भक्तों ने पुन: आगमन की अभिलाषा के साथ विदाई दी। इस अवसर पर टोरंटो से दिनेश गौतम, तेज सिंह, मोंटरियल से राकेश शर्मा जी, ओटावा से राकेश जी, डॉ भारती, धर्मेंद्र जी, ऋषि गौतम, गोविंद गौतम, इत्यादि लोग एयरपोर्ट पर उपस्थित रहे।

 

17Aug 2019

आज शाम ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर शांति सेवा धाम, वृंदावन में 17 से 24 अगस्त 2019 तक आयोजित होने वाली 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव की पूर्व संध्या पर ठा. श्री प्रियाकांतजू मंदिर से कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गयी

आज शाम ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर शांति सेवा धाम, वृंदावन में 17 से 24 अगस्त 2019 तक आयोजित होने वाली 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव की पूर्व संध्या पर ठा. श्री प्रियाकांतजू मंदिर से कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गयी, सर्वप्रथम मुख्य यजमान श्रीमती मोहिनी देवी, श्री सुरेश चंद्र गोयल जी ने सपरिवार भागवत पूजा कर भागवत जी को अपने सर पर विराजमान कर मन्दिर की परिक्रमा की। कलश यात्रा में सैकड़ों की संख्या में माताओं बहनों ने कलश उठाकर पुण्य लाभ प्राप्त किया।

17Aug 2019

उ.प्र सरकार में कैबिनेट मंत्री श्री लक्ष्मी नारायण चौधरी जी ने दीप प्रज्वलित कर 108 श्रीमद्भागवत कथा का किया शुभारंभ।

आज वृंदावन में 17 से 24 अगस्त 2019 तक आयोजित 108 श्रीमद्भागवत कथा एवं जन्माष्टमी महोत्सव के प्रथम दिवस पर कथा पंडाल में उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री श्री लक्ष्मी नारायण चौधरी जी जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई, उन्होंने महाराज श्री के साथ दीप प्रज्वलित कर कथा का शुभारंभ किया एवं भागवत आरती की, साथ ही महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। इसके अलावा कथा पंडाल में सुदामा कुटी से श्री अमरदास जी महाराज ने भी अपनी उपस्थिति दी एवं भक्तों को अपने अमूल्य वचनों से कृतार्थ किया।

10Aug 2019

श्याम उन्ही लोगों को मिलते है जिनके हृदय में साधू ज़िंदा है।

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 09 से 15 अगस्त 2019 तक Rinag Foods, 88 Jamie Avenue Ottawa, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

भागवत के प्रथम दिवस की शुरूआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
कथा से पूर्व कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई, जिसमें कनाड़ा के भक्त प्रेमियों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के कथा की शुरूआत भागवत के प्रथम श्लोक से की
सच्चिदानन्द रूपाय विश्वोत्पत्यादि हेतवे तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयम नुमः 
वासुदेव सुतं देवम् कंस चानुर मर्दनम् देवकी परमानंदम् कृष्णम् वंदे जगदगुरुम्।।

महाराज श्री ने कहा कि भागवत के प्रथम श्लोक में भगवान को प्रणाम किया गया है, उनके स्वभाव का वर्णन किया गया है, उनकी लीलाओं का वर्णन किया गया है। भागवत को समझना भगवान को समझने के बराबर है।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की देवताओं के लिए दो चीजें बहुत दुर्लभ है एक तो मानव जीवन और दूसरी श्रीमद भागवत कथा। जिस जीव के करोडो करोडो पुण्य इक्कठा होते है उसे मेरे ठाकुर की लीलाओं को श्रवण करने का सौभाग्य प्राप्त होता है।

महाराज श्री ने बताया की श्रीमद भागवत कथा एक कल्पवृक्ष के समान है आप जो मनोरथ लेकर इस कथा को श्रवण करने आएंगे और सातो दिन मन लगा कर नियम अनुसार कथा का श्रवण करेंगे तो श्रीमद भागवत कथा आपको मनवांछित फल देगी।

महाराज श्री ने बताया की जो जीव दुसरो को कष्ट पहुंचाता है उन्हें दुखी देख कर खुश होता है तो समझ लेना की उस जीव के अंदर असाधु जिन्दा है। और जो जीव दुसरो की सेवा करते है दुसरो को दुखी देखकर खुद भी दुखी हो जाते है तो तो समझ लेना उन लोगों के अंदर साधू जिन्दा है और श्याम उन्ही लोगों को मिलते है जिनके हृदय में साधू ज़िंदा है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार नैमिषारणय में सनकादिक ऋषि विराजमान थे तभी वहां परम श्रद्धेय सूद जी महाराज पधारे। जब सूद जी महाराज वहां पधारे तो उन्हें एक बहुत सुंदर आसन दिया और वहां पर उनको बैठाया। तो सभी ऋषियों ने सूद जी महाराज से ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

11Aug 2019

जिन्हें सांसारिक वस्तु नहीं चाहिए भागवत उन्हें मोक्ष प्रदान करती है।

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 09 से 15 अगस्त 2019 तक Rinag Foods, 88 Jamie Avenue Ottawa, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।
श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया। 
भागवत के द्वितीय दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकी नंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुवात करते हुए कहा कि श्रीमद् भागवत श्रवण बहुत बड़ा फल प्राप्त करता है। दरिद्र व्यक्ति कथा सुनेगा तो वो धनवान होगा। रोगी व्यक्ति कथा सुनेगा तो निरोगी काया को प्राप्त होगा। निसंतान वान जीव अगर कथा श्रवण करेगा तो संतान की प्राप्ति उसको होगी। जिसके पास सभी पदार्थ हो और उसकी कोई इच्छा न हो किसी और की इच्छा वो न रखती हो। तो उन्हें कुछ प्राप्त होगा अथवा नहीं ? उन्ही को सबसे बड़ा पदार्थ प्राप्त होगा। संसार में कौन कौन से पदार्थ है ? अर्थ धर्म काम और मोक्ष और सबसे दुर्लभ पदार्थ क्या है। मोक्ष, पैसा तो सब पर है किसी पर कम किसी पर ज्यादा लेकिन होते तो है ही। मोक्ष किसके पास है आपसे एक बात कहेगे यही जीवन है। लाखों करोड़ो जन्म गवा चुके है। आखरी उपाय है की अगर यहाँ पर भी अव हम अपना भला नहीं कर सके। करोड़ो जन्मो में जिन भोगो को भोगते भोगते तृप्त नहीं हुई। क्या इस जन्म में भी भोगते रहेंगे तो क्या तृप्ति होगी ? जो जीव मोक्ष प्राप्त नहीं कर पाते मानव जीवन में उनका महा विनाश होता है। तो हम और आप भाग्यशाली है की भागवत जैसा पुनीत पावन ग्रन्थ हमें प्राप्त है इस समय श्रावण मास में क्यों जिसे जो सांसारिक वस्तु चाहिए भागवत श्रवण के उपरांत में वो सांसारिक वस्तु वो भी सब आपको मिल सकती है। अगर सांसारिक चीज चाहिए ही नहीं तो उन्ही को सबसे बड़ा भगवान की तरफ से प्रसाद के रूप मिलता है। उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। जिसे संसार की कोई वस्तु नहीं चाहिए उसको भागवत के सप्तहा के उपरांत में मोक्ष प्राप्ति होती है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

12Aug 2019

जीव संत, महात्मा, गुरु, अपने बड़ो एवं धर्म का अपमान करने वाले के ऊपर कलयुग विराजमान रहता है।

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 09 से 15 अगस्त 2019 तक Rinag Foods, 88 Jamie Avenue Ottawa, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

भागवत के तृतीय दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की स्वर्ण किसी भी स्थति में कभी अपवित्र नहीं होता क्यूंकि स्वर्ण भगवान का स्वरुप है चाहे आप उसे गला दें, तो वह तब भी स्वर्ण रहेगा और उसका अगर आप कोई आभूषण बना लें तो वो तब भी स्वर्ण ही कहलायेगा। शास्त्रों में ऐसा लिखा है की स्वर्ण में भगवान् का वास होता है।

महाराज श्री ने बताया की किसी से छीनकर, चोरी करके या फिर जो स्वर्ण आपका कभी था ही नहीं उसे आपने जबरदस्ती अपना बनाया है वह धन अनीति से कमाया हुआ धन है उस धन में कलयुग का वास होता है।

महाराज श्री ने बताया की जो जीव संत, महात्मा, गुरु, अपने बड़ो एवं धर्म के बारे में गलत बोलता हो या फिर गलत सुनने में रूचि रखता हो तो आपको समझ लेना चाहिए की उस जीव के सर पर कलयुग विराजमान है।

महाराज श्री ने बताया की आज के कलयुग में हम पाश्चात्य संस्कृति को अपना कर जब भी किसी व्यक्ति से मिलते है तो उससे हाथ मिलाते है लेकिन ये हमारे सनातन धर्म का संस्कार नहीं है क्यूंकि जिस व्यक्ति को आप नहीं जानते आप उससे भी हाथ मिलाते है और उसकी नेगेटिव ऊर्जा हाथ मिलाने से हमारे अंदर आ जाती है। हम जब भी किसी व्यक्ति से मिलें तो उसके अभिवादन में हिन्दू धर्म के अनुसार हमारे ऋषि मुनियों ने जो प्रणाम करने के तीन प्रकारों के बारे में उल्लेख किया हुआ है उसी प्रकार से प्रणाम करें। 
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।

तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा।।

14Aug 2019

बुरी आदतों को छोड़ना है तो दृढ़ संकल्प लें।

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 09 से 15 अगस्त 2019 तक Rinag Foods, 88 Jamie Avenue Ottawa,Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

कथा के चौथे दिन सैकड़ो की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा की शुरुआत महाराज श्री ने बहुत ही सुंदर भजन "मीठे रस से भरी रे राधा रानी लागे से की " उसके बाद महाराज श्री ने बताया की आज का मनुष्य पैसा कमाने के चक्कर में इतना व्यस्त हो गया है की वो अपने परिवारजनों और रिश्तेदारों के कनेक्शन में रहने के बजाए मात्र उनके कॉन्टेक्ट का हिस्सा बन कर रह गया है।

महाराज श्री ने बताया की आज के जीव के लिए अच्छी बाते सीखना तो बहुत आसान है लेकिन बुरी आदतों को छोड़ना उसके लिए बड़ा मुश्किल है, लेकिन अगर जीव दृढ़ संकल्प कर लें तो वो जो चाहे वो कर सकता है बस ये विश्वास आपको अपने अंदर लाना होगा।

महाराज श्री ने बताया की आज का व्यक्ति कर्म करने से पहले उसके फल के बारे में सोचने लगता है, लेकिन वो ये भूल जाता है की आप सिर्फ कर्म ही कर सकते है फल देना तो मेरे ठाकुर के हाथ में है। इसलिए आप जो भी कार्य करे उसे पूरी ईमानदारी और सच्ची निष्ठा के साथ करें क्यूंकि मेहनत का फल सदैव मीठा होता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था।

समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया। शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया।

पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे। महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।" जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया। इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

14Aug 2019

आज हाई कमीशन ऑफिस ओटावा, कनाडा में भारत के हाई कमिश्नर श्री विकास स्वरुप जी भेंट कर भारत देश के कई विषयों पर चर्चा की। साथ में श्री राकेश शर्मा जी, डॉ भारती जी, श्री सुनील शर्मा जी, श्री विजय शर्मा जी भी मौजूद रहे।

आज हाई कमीशन ऑफिस ओटावा, कनाडा में भारत के हाई कमिश्नर श्री विकास स्वरुप जी भेंट कर भारत देश के कई विषयों पर चर्चा की। साथ में श्री राकेश शर्मा जी, डॉ भारती जी, श्री सुनील शर्मा जी, श्री विजय शर्मा जी भी मौजूद रहे।

9Aug 2019

तिलक, चोटी, तुलसी, कलावा ये हिन्दुओं की पहचान है, ये सभी हमारे संस्कार है।

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 02 से 08 अगस्त 2019 तक Sanatan Dharma Temple, 6219 Monk (Corner Street is Jolicoeur), Montreal, Quebec H4E3H8, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई।

भागवत के सप्तम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए बताया कि तिलक, चोटी, तुलसी, कलावा ये हिन्दुओं की पहचान है, ये सभी हमारे संस्कार है। इन सभी चीजों से हमारे विचार विवेकशील होते है इसलिए हमें अपने जीवन में इन सभी को अवश्य धारण करना चाहिए। 
महाराज श्री ने बताया की हमें अपने जीवन में कभी भी अपने धर्म को नहीं भूलना चाहिए। आप चाहे जहाँ कही भी रह रहें हो अपने धर्म और संस्कारों को कभी न भूले बल्कि उन्हें आगे बढ़ाने के लिए कार्य करें वही संस्कार अपने बच्चों में डाले ताकि आपके इस दुनिया से जाने के बाद आपके बच्चे धार्मिक कार्य करें नहीं तो आप जीवन में कभी खुश नहीं रह पाएंगे।
महाराज श्री ने बताया की ब्रम्हांड के तीनो लोकों में हमारे जीवन में गुरु से बढ़कर कोई और नहीं है। क्यूंकि गुरु के बिना ज्ञान नहीं है और इस विश्व के जगत गुरु मेरे ठाकुर श्री कृष्ण है, जो कुछ भी करते है वही करते है उनकी इच्छा के बिना डाली से एक पत्ता इधर से उधर नहीं हो सकता। 
महाराज श्री ने बताया की श्रीमद भागवत कथा का ये सप्ताह जिसमे कहने को सिर्फ सात दिन होतें है लेकिन ये सात दिन हमारे सात जन्मो के बराबर होते है, जो भी इन सात दिनों को जी लेता है वो भौ बंधन के सभी बंधनो से मुक्त हो जाता है क्यूंकि मात्र ये सात दिन हमें हर बंधन से मुक्त कराने की क्षमता रखते है, इन सात दिनों में हम परमात्मा से मिलन का सफर तय कर लेते है। ये सात दिन नहीं बल्कि मानो सात युग है जिसके जीवन में ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का पदार्पण हो जाए वो युग युगान्तर तक याद रखें जाते है। इसलिए ये सात दिन परमात्मा की तरह ले जाने के लिए पर्याप्त है।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि रुकमणी जी ने श्रीकृष्ण से प्रेम विवाह किया। भगवान ने 16 हजार 100 विवाह किए हैं लेकिन 8 विवाह अलग अलग हुए। ये 8 पटरानियां साधारण नहीं हैं लक्ष्मी जी बनी हैं रूकमणी, पार्वती जी आधे अंश से बनी हैं जामवंती और बाके आधे अंश से बनी हैं महामाया, तुलसी बनी हैं लक्ष्मणा, यमुना बनी हैं सूर्य की पूत्री कालिंदी, लज्जा बनी हैं भद्रा, गंगा बनी हैं मित्रव्रिंदा, सावित्री जी बनी हैं सत्या और पृथ्वी बनी हैं सत्यभामा। ये सांसारिक विवाह नहीं है ये पूरी प्रकृति के साथ ठाकुर जी ने विवाह किया है।
महाराज श्री ने आगे कहा कि भगवान ने 16100 विवाह इसलिए नहीं किए की उन्हे बहुत सारी पत्नियां चाहिए थी। उन्होंने इतने विवाह इसलिए किए क्योंकि उन स्त्रियों को जरूरत थी। भौमासुर नामक राक्षस ने 16 हज़ार 100 कन्याओं को बंदी बना रखा था। नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा की समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। इस कारण भगवान ने १६१०० रूप बनाकर सबके साथ एक मुहूर्त में एक साथ विवाह किया था। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने इतने विवाह किये। भगवान ने कामनावश विवाह नहीं किया था, करुणावश किया था। भगवान कहते हैं जिसको कोई नहीं अपनाता अगर वो मेरी शरण में आये तो मैं उसे अपना लेता हूँ।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंततः सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

7Aug 2019

जो एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है।

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 02 से 08 अगस्त 2019 तक Sanatan Dharma Temple, 6219 Monk (Corner Street is Jolicoeur), Montreal, Quebec H4E3H8, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। भागवत के पंचम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची । जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है। भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए। अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है। श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया। श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा। ।। राधे-राधे बोलना पड़े

8Aug 2019

कथा आपके अहंकार को ख़त्म कर देती है ।

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 02 से 08 अगस्त 2019 तक Sanatan Dharma Temple, 6219 Monk (Corner Street is Jolicoeur), Montreal, Quebec H4E3H8, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। भागवत के षष्ठम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि हमें अपने जीवन में कभी अभिमान नहीं करना चाहिए क्यूंकि ये जो कुछ भी हमारे पास है वो सब हमें भगवान का ही दिया हुआ है और जहाँ अभिमान है वहां भगवान हो ही नहीं सकते। महाराज श्री ने बताया की अगर आप जीवन में अपना भाग्य उदय करना चाहते है तो आपको सूर्य के उदय होने से पहले उठना चाहिए। महाराज श्री ने कहा की कथा आपके अहंकार को ख़त्म कर देती है, सच्चे दिल से कथा सुनने वाले लोग अहम और घमंड को छोड़ भगवान की भक्ति में बह जाते है वो फिर मैं की नहीं बल्कि तुम की बात करते है, तुम हो तो हम है। महाराज श्री ने बताया की कलयुग के जीव ने आज के समय में भगवान श्री कृष्ण के रास का कुछ अलग ही मतलब निकाल लिया है, स्त्री और पुरुष के संग को रास नहीं कहते। संसार के विषयों की पूर्ति कुछ एक प्रयासों से हो जाती है लेकिन ईश्वर की प्राप्ति बिना साधना के नहीं होती और उन गोपियों ने भी असाधारण साधनायें की थी, बहुत तपश्या की थी, पूर्व जन्म में बहुत पुण्य किये थे तब जाकर उन्हें गोविन्द का सानिध्य प्राप्त हुआ है। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। ।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

6Aug 2019

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 02 से 08 अगस्त 2019 तक Sanatan Dharma Temple, 6219 Monk (Corner Street is Jolicoeur), Montreal, Quebec H4E3H8, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 02 से 08 अगस्त 2019 तक Sanatan Dharma Temple, 6219 Monk (Corner Street is Jolicoeur), Montreal, Quebec H4E3H8, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।


श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

भागवत के चतुर्थ दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।

महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।

शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।

बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।

इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।

इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।

महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।

महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।

उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।

महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"

जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।

दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।

महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"

भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।

।। राधे- राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

5Aug 2019

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 02 से 08 अगस्त 2019 तक Sanatan Dharma Temple, 6219 Monk (Corner Street is Jolicoeur), Montreal, Quebec H4E3H8, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 02 से 08 अगस्त 2019 तक Sanatan Dharma Temple, 6219 Monk (Corner Street is Jolicoeur), Montreal, Quebec H4E3H8, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

भागवत के तृतीय दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।

तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा।।

1Aug 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन, कनाडा के तत्वाधान में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जुलाई से से 01 अगस्त 2019 तक Bhavani Shankar Mandir 90 Nexus Ave Brampton L6p 3R6 ( Near Hindu Sabha Mandir ) में श्रीराम कथा का आयोजन किया गया। पूज्य महाराज श्री ने कथा के सप्तम दिवस पर रावण वध का वृतांत भक्तों को श्रवण कराया। श्रीराम कथा के सप्तम दिवस की शुरूआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन, कनाडा के तत्वाधान में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जुलाई से से 01 अगस्त 2019 तक Bhavani Shankar Mandir 90 Nexus Ave Brampton L6p 3R6 ( Near Hindu Sabha Mandir ) में श्रीराम कथा का आयोजन किया गया। पूज्य महाराज श्री ने कथा के सप्तम दिवस पर रावण वध का वृतांत भक्तों को श्रवण कराया। श्रीराम कथा के सप्तम दिवस की शुरूआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान की कथा के लिए कोई समय सीमा नहीं है। प्रभु की कथा जितनी भी सुनी जाए लाभ तो निश्चित तौर पर प्राप्त होगा ही। महाराज श्री ने रामचरित्रमानस की चौपाईयां भी बताई और कहा की अगर आप इन चौपाईयां का प्रतिदिन पाठ करेंगे तो लक्ष्मी आपके घर से कभी नहीं जाएगी। महाराज श्री ने अयोध्या कांड की चौपाईयां सुनाई जब तें रामु ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए । भुवन चारिदस भूधर भारी। सुकृत मेघ बरषहिं सुख बारी ।। रिधि सिधि संपति नहीं सुहाई । उमगि अवध अंबुधि कहुं आई । मनिगम पुर नर नारि सुजाती । सुचि अमोल सुंदर सब भांती ।। कहि न जाइ कछु नगर बिभूती । जनु एतनिअ बिरंति करतूती । सब बिधि सब पुर लोग सुखारी । रामचंद मुख चंदु निहारी ।। इन चौपाईयों का आप नित पाठ करें तो आपकी घर में जितनी भी लक्ष्मी है वो हमेशा चिरकाल तक रहेगी, आपके घर को छोड़कर जाएगी ही नहीं। महाराज श्री ने कहा कि इस दुनिया मे राम के चाहने वालों को रावण की बात बुरी लगेगी और रावण के चाहने वालों को राम की बातें बुरी लगेंगी, अब आपने ये निश्चित करना है की आप किसके चाहने वाले हो। आपने अपने आसपास के रावण को ढूंढना है, जो आपको धर्म से दूर ले जाए, भक्ति से दूर ले जाए, संतों की बुराईयां तुमसे करता है, सत्संग से दूर ले जाए वही तुम्हारे जीवन का रावण है और ऐसे रावणों से दूर रहा करें। महाराज श्री ने कहा कि पहले एक रावण हुआ करता था लेकिन आजकल तो घर घर में रावण है। जो भी धर्म से जुड़े हुए लोगों की बुराईयां करते हैं, धर्म की बुराईयां करते हैं वो मानसिक तौर पर अस्वस्थ हैं, वो खुश नहीं है और वो खुश हो भी नहीं सकते। शांति राम की बहन है और जो राम की बुराई करता है वहां शांति नहीं जाती। महाराज श्री ने कहा कि आप इतिहास उठाकर देख लिजिए यहां हर एक संत महात्मा की बुराई हुई है। मीरा को तो सबसे बुरा कलंक लगाया की तू पराए पुरूष से बात करती है, लेकिन यहां एक प्रश्न है की इतनी समर्पित लोगों की बुराई क्यों होती है । उससे पहले ये समझिए की भक्ति, गोविंद का धाम, मोक्ष मिलता किसको है। जो धर्म और कर्म से शून्य हो गया है, ना अच्छा कर्म बचा हो, ना बुरा कर्म बचा हो और मति जिसकी गोविंद में हो उसको मोक्ष मिलता है और हम और आप कैसे हैं या तो अच्छा कर्म हो रहा है या बुरा कर्म हो रहा है और अगर कर्म हो रहे हैं तो निश्चित तौर पर हमारा पुनर्जन्म होगा, क्योंकि कर्मों का फल भोगने के लिए तो जाना ही होगा।

3Aug 2019

Brampton में श्री राम कथा के सफल समापन के बाद पूज्य महाराज श्री अब मॉन्ट्रियल, कनाडा में पहुंचे हैं, श्रीमद् भागवत कथा का पाठ करने के लिए अगस्त 2 से अगस्त 8, 2019.

Brampton में श्री राम कथा के सफल समापन के बाद पूज्य महाराज श्री अब मॉन्ट्रियल, कनाडा में पहुंचे हैं, श्रीमद् भागवत कथा का पाठ करने के लिए
अगस्त 2 से अगस्त 8, 2019.

3Aug 2019

कल पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज काउंसलेट जनरल ऑफ इंडिया में पहुंचे, वहां पर पर डिप्टी काउंसलेट जनरल मिस्टर डी.पी सिंह जी और मिस्टर खान ने महाराज श्री का स्वागत वह सम्मान किया।

कल पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज काउंसलेट जनरल ऑफ इंडिया में पहुंचे, वहां पर पर डिप्टी काउंसलेट जनरल मिस्टर डी.पी सिंह जी और मिस्टर खान ने महाराज श्री का स्वागत वह सम्मान किया। इस अवसर पर श्री विजय शर्मा जी, श्री दिनेश गौतम जी, भाजपा टोरंटो अध्यक्ष श्री बिपिन शर्मा, श्री ऋषि राम जी एवं अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।#ThakurJiInCanada

3Aug 2019

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 02 से 08 अगस्त 2019 तक Sanatan Dharma Temple, 6219 Monk (Corner Street is Jolicoeur), Montreal, Quebec H4E3H8, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 02 से 08 अगस्त 2019 तक Sanatan Dharma Temple, 6219 Monk (Corner Street is Jolicoeur), Montreal, Quebec H4E3H8, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

भागवत के प्रथम दिवस की शुरूआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा से पूर्व कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई, जिसमें कनाड़ा के भक्त प्रेमियों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के कथा की शुरूआत भागवत के प्रथम श्लोक से की
सच्चिदानन्द रूपाय विश्वोत्पत्यादि हेतवे तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयम नुमः 
वासुदेव सुतं देवम् कंस चानुर मर्दनम् देवकी परमानंदम् कृष्णम् वंदे जगदगुरुम्।।

महाराज श्री ने कहा कि भागवत के प्रथम श्लोक में भगवान को प्रणाम किया गया है, उनके स्वभाव का वर्णन किया गया है, उनकी लीलाओं का वर्णन किया गया है। भागवत को समझना भगवान को समझने के बराबर है। उन्होंने आगे कहा कि बहुत से लोग कहते हैं की हमारा मन नहीं लगता कथाओं में, कई लोग कथाओं में आ भी जाएं तो उन्हें नींद आने लगती है, वो इसलिए क्योंकि उनका दिलचस्पी नहीं है। जबतक हमारा मन ठाकुर जी में नहीं होगा तब तक हमारा मन कथाओं में नहीं लगेगा। जो भी भक्त मन कर्म वचन से भागवत सुनता है निश्चित तौर पर उसे भगवान से प्रेम होता है। अगर कोई ये कहे की हमे ईश्वर से प्रेम नहीं चाहिए तो, इसका भी फल है अगर तुम्हें कुछ भी नहीं चाहिए तब भी तुम्हें बहुत कुछ देती है भागवत। आपको भागवत के माध्यम से ईश्वर को जानने की कोशिश करनी चाहिए।

महाराज श्री ने कहा कि जब भी आप दुखी हों तो किसी संत के चरण पकड़ लिजिए, संतों के सानिध्य में बैठिए। संत का संग आपको जन्म जन्मांतर के भव बंधनों से मुक्त कर सकता है। ये आपके ऊपर है की आप चाहते क्या हैं अपना कल्याण या अपना विनाश।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार नैमिषारणय में सनकादिक ऋषि विराजमान थे तभी वहां परम श्रद्धेय सूद जी महाराज पधारे। जब सूद जी महाराज वहां पधारे तो उन्हें एक बहुत सुंदर आसन दिया और वहां पर उनको बैठाया। तो सभी ऋषियों ने सूद जी महाराज से ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

4Aug 2019

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 02 से 08 अगस्त 2019 तक Sanatan Dharma Temple, 6219 Monk (Corner Street is Jolicoeur), Montreal, Quebec H4E3H8, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 02 से 08 अगस्त 2019 तक Sanatan Dharma Temple, 6219 Monk (Corner Street is Jolicoeur), Montreal, Quebec H4E3H8, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

भागवत के द्वितीय दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।...

कथा की शुरुआत महाराज श्री ने बताया की वेद व्यास जी द्वारा लिखित इस भागवत महापुराण में मोक्ष परियन्त की कामनाओ से रहित परम धर्म का निरूपण किया गया है। इसमें शुद्ध हृदय वाले महापुरुषों के जानने योग्य वास्तविक वास्तु परमात्मा का निरूपण हुआ है जो तीनो तापो को जड़ से नाश करने वाला है और वो परम कल्याण करने वाला है। अब और किसी शास्त्र से क्या परियोजन है जिस समय कोई पुण्य आत्मा या पुरुष इसको श्रवण करने की इच्छा करते है ईश्वर उसी समय तत्काल उनके हृदय में आकर विराजमान हो जाते है। पंडित जी ने कहा की भागवत में ऐसा लिखा है की अगर कोई जीव सच्चे दिल से ये संकल्प कर ले की वो श्रीमद्भागवत कथा सुनेगा तो उस संकल्प मात्र से ही भगवान उनके हृदय में वास करने लगते है।महाराज श्री ने बताया की गरुण पुराण में लिखा है कि आप देवताओं से पहले अपने पितरो को मना लो क्यूंकि देवता तो आपको आपके कर्म अनुसार फल देते है लेकिन अगर पितृ एक बार खुश हो जाए तो वह वो दे देते है जो तुम्हारे भाग्य में भी नहीं होता और अगर पितृ अप्रसन्न हो जाए तो वो भी छीन लेते है जो तुम्हारे भाग्य में होता है क्यूंकि जिन पितरो की मुक्ति हो जाती है वो भगवान में समां जाते है।इसलिए अपने बच्चो को ये संस्कार जरूर दे और उन्हें श्राद्ध का महत्व बताये ताकि आपके जाने के बाद वो भी आपकी तरह पित्रो की सेवा करें।क्यूंकि आपके भागवत सुनने से आपके पितरो का भी कल्याण होता है उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है इसलिए अगर आप कथा पंडाल में कथा सुनने आएं तो पुरे नियम के साथ कथा सुने ताकि आपके साथ आपके परिवार और पितरो का भी कल्याण हो।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।

श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।

यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

26Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन, कनाडा के तत्वाधान में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जुलाई से से 01 अगस्त 2019 तक Bhavani Shankar Mandir 90 Nexus Ave Brampton L6p 3R6 ( Near Hindu Sabha Mandir ) में श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन, कनाडा के तत्वाधान में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जुलाई से से 01 अगस्त 2019 तक Bhavani Shankar Mandir 90 Nexus Ave Brampton L6p 3R6 ( Near Hindu Sabha Mandir ) में श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीराम कथा के प्रथम दिवस की शुरूआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि आज के युग में लोग अपने मुताबिक अपने आराध्य बदल लेते हैं, धर्म बदल लेते हैं, गुरू बदल लेते हैं, मंदिर बदल लेते हैं। लेकिन सच्चाई ये हैं अपना ईष्ट, अपना धर्म, गुरू ये कुछ चीजें ऐसी हैं जो कभी नहीं बदलनी चाहिए। आप अपना गुरू, धर्म बदलते हैं फिर कहते हैं हमे शांति नहीं मिलती, कैसे मिलेगी ,जो अपने गुरू का नहीं हुआ, अपने धर्म का नहीं हुआ वो परलोक की प्राप्ति करने का अधिकारी कैसे हो सकता है। जीवन में जो भी परेशानियां हो रही हैं वो इसलिए हो रही हैं क्योंकि हम राम से दूर जा रह हैं, सत्य से, धर्म से दूर जा रहे हैं। 
महाराज श्री ने कहा कि राम कथा सुनने का अधिकारी कौन है ? आप कोई भी पुराण ले लिजिए, कोई भी ग्रंथ ले लेजिए, हर पुराण, ग्रंथ में ईश्वर को जानने की जिज्ञासा है। हमारा मन ईश्वरवादी है तो ईश्वर को जानने की जिज्ञासा होनी ही चाहिए। ईश्वर को जानने की जिज्ञासा केवल मानव जीवन में ही हो सकती है और किसी जन्म में नहीं होगी। 
महाराज श्री ने कहा कि आज का युग परिवर्तित हो रहा है, लोगों की विचारधाराएं बदल रही है। लेकिन माता पिता और गुरू में आपका अटूट विश्वास होना चाहिए । दुनिया चाहे कुछ भी कहे पर मेरी श्रद्धा इतनी अटूट हो की मेरे गुरू, मेरा गोविंद मेरे माता पिता मेरे लिए बुरे नहीं है, अगर गलत होंगे तो अपने लिए होंगे मेरे लिए नहीं हैं। अगर इतनी अटूट श्रद्धा होगी तो राम को तुम्हे नहीं ढूंढना पड़ेगा, राम तुम्हे ढूंढते हुए तुम्हारे घर तक पहुंच जाएंगे ।
महाराज श्री ने राम कथा के प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए कहा कि चाहे भागवत कथा ले लिजिए, चाहे राम कथा ले लिजिए दोनों की शुरूआत ही प्रश्न से हुई है। प्रयागराज में भारद्वाज मुनि रहते हैं यागवल ऋषि उनसे प्रश्न करते हैं मैं ये जानना चाहता हूं की राम कौन है ? महाराज श्री ने कहा कि जब जब धर्म की हानि होती है या तो भगवान खुद आते हैं या अपने दुतों को भेजते हैं। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने रामचरित्रमानस की महानता का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रभु श्री राम की कथा गोस्वामी तुलसीदास महाराज जी ने रामचरित्रमानस के माध्यम से , श्री बाल्मिकी महाराज ने बाल्मिकी रामायण के माध्यम से की है।

27Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन, कनाडा के तत्वाधान में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जुलाई से से 01 अगस्त 2019 तक Bhavani Shankar Mandir 90 Nexus Ave Brampton L6p 3R6 ( Near Hindu Sabha Mandir ) में श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन, कनाडा के तत्वाधान में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जुलाई से से 01 अगस्त 2019 तक Bhavani Shankar Mandir 90 Nexus Ave Brampton L6p 3R6 ( Near Hindu Sabha Mandir ) में श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीराम कथा के द्वितीय दिवस की शुरूआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जिस कथा को सुनने के लिए आप आए हैं उस कथा को सुनने के लिए सब ललायित रहते हैं। गोस्वामी तुलसीदास बाबा जी ने लिखा है जिनके ह्रदय में कथा के प्रति आशक्ति नहीं है, भक्ति नहीं है, वो व्यक्ति मनुष्य जीवन प्राप्त करने के बाद भी जीवित नहीं है, वो मृत के समान है। मानव जीवन का एकमात्र उद्देश्य है जीवित रहते हुए हरि से मिलन इसके अलावा दूसरा कोई उद्देश्य नहीं है।
महाराज श्री ने युवाओं से कहा कि जब आपके बड़े आपको कोई अच्छी बात कहें और वो बात आपकी समझ में ना आए तो समझना आपका बुरा वक्त शुरू हो गया है। आपके साथ आपको जोश हो सकता है, बुद्धि हो सकती है लेकिन आपका पास अनुभव नहीं है, अनुभव उनके पास है। जीवन की सबसे बड़ी सफलता उसमें ही जिसमें अनुभव के साथ साथ जोश भी रहे। 
महाराज श्री ने कहा कि कथा में अगर जाओ तो अपने जीवनसाथी को जरूर संग लेकर जाओ, अगर जीवनसाथी को संग लेकर जाओगे तो दोनों की विचारधार एक जैसी हो जाएगी।
महाराज श्री ने कथा क्रम को आगे बढ़ाते हुए कहा कि यागवल्क्य ऋषि ने भारद्वाज ऋषि से प्रश्न किया की राम कौन है ? दशरथ पुत्र राम है, जो वन में गए वो राम है, रावण को जिसने मारा वो राम है या जो एक जो सब के घट घट में विराजमान है वो राम है ? तो भारद्वाज ऋषि ने यागवल्क्य ऋषि से का हे ऋषिवर मैं जानता हूं आप कितने श्रेष्ठ हैं लेकिन आपने ये जो प्रश्न किया है ये समस्त मानव की भ्रांति को मिटाने के लिए किया है मैं आपको उसका उत्तर देता हूं। यही प्रश्न यही संदेह एक बार बाबा भोलेनाथ की पत्नी सती को भी हुआ । 
एक बार त्रेतायुग में भगवान शंकर अपनी पत्नी के साथ कुम्भज ऋषि के पास कथा सुनने गए । नियम यह है की आचार्य का पूजन यजमान करेगा यहां यमनान के बाबा भोलेनाथ और आचार्य हैं। अब हुआ यह की बाबा भोनेनाथ कुम्भज ऋषि के यहां पहुंचे कुम्भज ऋषि ने उनका स्वागत किया, पूजा की। यह सब देखकर सती मईया सोचने लगी ये कैसे आचार्य हैं यजमान का पूजन कर रहे हैं और वहीं से उन्हे अश्रद्धा हो गई। तो कथा की शुरूआत हुई “रामकथा मुनिबर्ज बखानी। सुनी महेस परम सुखु मानी” बाबा भोलेनाथ ने कथा सुनी और सती जी का कही नाम ही नहीं आया, जबकी सुनने के लिए तो वो बैठी ही थी लेकिन नाम नहीं आ रहा है वो इसलिए क्योंकि उन्होंने कथा मन से सुनी ही नहीं। और जब आप मन से कथा नहीं सुनोगे तो आपको कही ना कही भ्रम जरूर होगा। मन से नहीं सुनोगे तो आधी कथा समझ में आएगी आधी नहीं आएगी और जो समझ में नहीं आई है वो भ्रम पैदा कर देगी । 
सती को भी कथा सुनकर हरि पर संदेह हो गया । जब लौट कर आ रहे थे तो त्रेतायुग में राम जी का प्राकट्य हुआ, प्रसंग जिस वक्त हुआ वो ये था की सीता जी का हरण हो चुका है और राम जी सीता जी के विरह में रो रहे हैं, उन्हें ढूंढ रहे हैं। शिव जी ने देखा की मेरे प्रभु मानव लीला कर रहे हैं, अपने भक्तों के लिए रोना भी पड़े तो रोते हैं, राम जी को रोता देखकर शिव जी का ह्रदय भर आया और उन्होंने जय सच्चिदानंद जग पावक कहकर प्रणाम किया और फिर आगे बढ़ गए। 
शिव जी की यह दशा जब सती ने देखी तो मन में संदेह हुआ की दुनिया शिव जी को पूजती है और ये किन को देख कर प्रणाम कर रहे हैं, यह है कौन जिनको प्रणाम किया ? सती ने शिव से प्रसन्न किया ये आपने किन को प्रणाम किया ? तो बाबा भोलेनाथ ने कहा जिनकी कथा अभी हम सुनकर आ रहे हैं, जिनकी भक्तिअभी मैने बाबा को सुनाई थी और ये मेरे ईष्ट देव हैं। लेकिन सती को फिर भी विश्वास नहीं हुआ। बाबा ने कहा अगर तुम्हारे मन में इतना संदेह है तो जाओ जाकर परीक्षा ले लो। अब बाबा भोलेनाथ सोच रहे हैं जब मेरे कहने से भी सती का संदेह नहीं गया इसका मतलब है विधाता वाम हो गया अब सती का भला होने वाला नहीं है।
एक बात याद रखिए राम के विरूद्ध, सति के विरूद्ध जो गया है उसका भला कभी नहीं हुआ है।

28Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन, कनाडा के तत्वाधान में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जुलाई से से 01 अगस्त 2019 तक Bhavani Shankar Mandir 90 Nexus Ave Brampton L6p 3R6 ( Near Hindu Sabha Mandir ) में श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन, कनाडा के तत्वाधान में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जुलाई से से 01 अगस्त 2019 तक Bhavani Shankar Mandir 90 Nexus Ave Brampton L6p 3R6 ( Near Hindu Sabha Mandir ) में श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीराम कथा के तृतीय दिवस पर श्रीराम का प्राकट्य दिवस मनाया एवं रामचरित्रमानस पर चर्चा की। कथा की शुरूआत सभी भक्तों ने मिलकर सर्वप्रथम अपने - अपने अराध्य के हाथ जोड़े और आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि आज हम प्रमुखता से भगवान श्री राघवेंद्र सरकार के प्राकट्य महोत्सव में सम्मिलित होंगे और "ऐसा मानते है की जो भगवान के मंगल में सम्मिलित होते है उनके जीवन में नित्य मंगल होते है।" रामचरित्रमानस के बारे में चर्चा करेंगे , जिससे हमें भी कुछ सिखने को मिले की भगवान श्री राम आज भी भारत बर्ष के सदस्य सर्वश्रेष्ठ, उत्तम, निर्विरोध, महापुरुष मर्यादाप्रुषोतम उन जैसा पुत्र, उन जैसा भाई, उन जैसा पिता, उन जैसा पति, और उन जैसा पवित्र चरित्र, किसी का नहीं हो सकता। उन जैसा राजा वो श्रेष्ष्ठ मानवता का एक अद्भुत उदहारण है। जहाँ उनके मन किसी के प्रति कोई वेर नहीं ईर्ष्या नहीं सब के लिए प्रेम भाव भरा है।

महाराज जी ने कहा की राम कथा में युवाओं के लिए करना चाहता हूँ। ये अभी सीख लोगे ज़िन्दगी भर काम आएगी। माँ सती ने भगवान की कथा को मन से नहीं सुना, शक हुआ तो उसका परिणाम उनको शरीर त्यागना पड़ा। पहले पति प्रेम त्याग हुआ बाबा भोले नाथ ने उनको त्याग दिया। उसके बाद उनको अपना शरीर भी योग अग्नि में भष्म करना पड़ा. क्योकि प्राण त्यागते समय माँ सती ने वरदान माँगा था की मेरा जो भी जन्म हो मैं बाबा भोलेनाथ की ही पत्नी बनी।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

29Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन, कनाडा के तत्वाधान में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जुलाई से से 01 अगस्त 2019 तक Bhavani Shankar Mandir 90 Nexus Ave Brampton L6p 3R6 ( Near Hindu Sabha Mandir ) में श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन, कनाडा के तत्वाधान में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जुलाई से से 01 अगस्त 2019 तक Bhavani Shankar Mandir 90 Nexus Ave Brampton L6p 3R6 ( Near Hindu Sabha Mandir ) में श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु श्री राम के जन्म का वृतांत सुनाया।

श्रीराम कथा के चतुर्थ दिवस की शुरूआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि एक प्रशन उठता है की जब भगवान सामर्थयवान है तो फिर इस धरती पर जन्म क्यों लेते है ? रामायण में इस बात का स्पष्टिकरण किया गया है की वो भक्तों का कल्याण करने के लिए आते हैं। राम इस धरती पर रावण को मारने के लिए नहीं आए थे, वो तो अपने भक्तों को सुख देने के लिए आए थे। अगर इससे भी उपर देखा जाए तो हम जानते कैसे की कोई भगवान हैं, हम नहीं जान पाते की भगवान कैसा दिखता है, उसका स्वरूप क्या है ? उसका स्वभाव क्या है ? ये सब तो भगवान के आने से ही पता चला है। भगवान धरती पर यह बताने आते हैं की मैं तुम्हारा पुत्र हूं, मैं तुम्हारा मित्र भी हूं। उन्होंने कहा कि हमारी सोच इतनी सर्वश्रेष्ठ नहीं हैं, अगर हमारी सोच श्रेष्ठ हो तो भगवान तक पहुंचने में कोई मुश्किल नहीं है।

महाराज श्री ने कहा कि इस संसार में कोई दुख बांटने वाला नहीं है, यहां तो लोग दुख बढ़ाने वाले हैं। जिसे आप अपना समझकर दु:ख रो रहे हो, वो मौके पर आपका दुख बढ़ाएगा ही यह संसार का स्वभाव है। लेकिन दो द्वार ऐसे हैं जहां चले जाओ तो या तो आपका दुख घट जाएगा, दुख बढ़ेगा तो बिल्कुल भी नहीं। वो दो द्वार है गुरू और गोविंद के, अगर आपको रोना ही है तो या तो गुरू के वहां जाकर रोओ या फिर गोविंद के वहां जाकर, इससे आपका कल्याण हो जाएगा।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने प्रभु श्री राम के जन्म का वृतांत सुनाते हुए कहा कि राजा दशरथ अपने गुरू जी का पास गए और कहा कि हे गुरूवर मेरा पुत्र नहीं है, मैं दु:खी हूं। तो गुरू जी ने कहा कि चिंता मत कर तुम्हारे दु:ख का निवारण हो जाएगा तुम्हे यज्ञ करना होगा। गुरू जी ने कहा कि धैर्य धरो तुम्हारे चार पुत्र होंगे। राजा दशरथ ने पुत्रिष्ठी यज्ञ किया, इस यज्ञ के बाद राजा दशरथ के चार पुत्र राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न हुए। पुत्र होने की खुशी ने राजा दशरथ ने अपना सर्वस्व दान दे दिया। यहां सवाल है की सर्वस्व क्या है ? सर्वस्व परमात्मा के अलावा कुछ हो नहीं सकता, सर्वस्व राम है और राम राज दशरथ को मिले हैं तो राजा दशरथ ने राम जी को पूरी प्रजा की गोद में दे दिया मानो सब से कह रहे हों ये मेरा राम नहीं सब का राम है। किसी ने भी उस दान को अपने पास नहीं रखा सब ने एक दूसरे को देते हुए उस दान को राजा दशरथ को वापस दे दिया।

दशरथ के चारों पुत्र में दो गौर वर्ण के हैं और दो श्याम वर्ण के हैं। कैकयी और कौश्ल्या के पुत्र श्याम वर्ण के हैं और सुमित्रा के दोनो पुत्र गौर वर्ण के हैं। पुत्रों के होने के बाद राजा दशरथ ने गुरू जी से कहा आप इनका नामकरण कर दिजिए। जब नामकरण की बारी आई तो कौशल्या के पुत्र जब महाराज जी के गोद में आए तो राजा दशरथ ने कहा इनका मैं क्या नाम रखूं। तो गुरू जी ने कहा कि जो सुख का नाम है उसका नाम राम है, उसके बाद कैकयी के पुत्र की बारी आई तो कैकयी के पुत्र का नाम रखते हुए कहा जो विश्व का पालन करता है पोषण करता है उसका नाम भरत है। उसके बाद बारी आई सुमित्रा के दोनों के पुत्रों के नाम रखने की, महाराज जी ने कहा जो शत्रुओं का नाश करेगा उसका नाम शत्रुघ्न है, सुमित्रा के दूसरे पुत्र का नाम रखते हुए गुरू जी ने कहा जो राम का होगा प्रिय उनका ना है लक्ष्मण। इस तरह से राजा दशरथ के चारों पुत्रों का नामकरण सम्पन्न हुआ।

30Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन, कनाडा के तत्वाधान में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जुलाई से से 01 अगस्त 2019 तक Bhavani Shankar Mandir 90 Nexus Ave Brampton L6p 3R6 ( Near Hindu Sabha Mandir ) में श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन, कनाडा के तत्वाधान में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जुलाई से से 01 अगस्त 2019 तक Bhavani Shankar Mandir 90 Nexus Ave Brampton L6p 3R6 ( Near Hindu Sabha Mandir ) में श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीराम कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु श्रीराम के बाल्यकाल का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीराम कथा के पंचम दिवस की शुरूआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि श्रीराम की कथा हम सबको बहुत प्रेरणा देती है, शिक्षा देती है। जिन्होंने रामचरित्रमानस सुना है, पढ़ा है, गाया है, उन्हें पता है की गृहस्थ की मर्यादा क्या है ? संसार की मर्यादाएं क्या है ? बहुत आसान हो जाता है, बहुत सी समस्याओं का समाधान हो जाता है जिन्होंने रामचरित्रमानस में थोड़ा भी अपना ध्यान दिया है, उनके लिए गृहस्थ जीवन चलाना कोई बड़ी बात नहीं है। अगर हम बहुत युवा अवस्था में श्रीरामचरित्रमानस को पढ़ लें या जब शिशु गर्भ में होता है तो माता बाल कांड का पाढ़ करें तो उसी समय से शिशु को शिक्षा मिलने लगती है।

महाराज श्री ने कहा कि विद्यार्थी के लक्षण होते हैं । जितने भी विद्यार्थी हैं उन्हें कुछ चीजों का विशेष तौर पर ध्यान रखना चाहिए, अगर आप इन कुछ चीजों का ध्यान रखेंगे तो आप अच्छे विद्यार्थी हो सकते हैं । पहले हमारे यहां नियम था चाहे राजा का बेटा हो, चाहे किसी का भी बेटा हो, वो गुरूकुलम में पढ़ने जाता था। गुरू जी के वहां जब तक बच्चे पढ़ते थे, तब तक मां बाप उनका हाल चाल तक नहीं पुछ सकते थे और बच्चे वहां से निपुण होकर आते थे। एक बात याद रखें माता पिता का मोह ही बच्चों को बिगाड़ता है। बच्चों का ध्यान केंद्रित होना चाहिए, जिन बच्चों का ध्यान भटक जाता है वो काबिल होने के बाद भी कुछ नहीं कर पाते हैं। बच्चे अपनी शिक्षा के समय इस बात का ध्यान रखें की हम अपना ध्यान भटकने ना दें।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने प्रभु श्री राम जी के बाल्यकाल का वर्णन सुनाते हुए कहा कि प्रभु श्री राम जब बाल्यकाल में पढ़ने गए तो बहुत कम समय में शिक्षा प्राप्त कर ली। एक बार भगवान श्री राम अपने भाईयों, मित्रों को लेकर सरयु के तट पर पहुंचे तो वहां एक सुंदर मैदान था, तो राम जी का मन फुटबॉल खेलने का हुआ। अब राम जी की इच्छा जानते ही लक्ष्मण जी ने सोचा की कही ऐसा ना हो की राम जी में विपक्षी टीम में डाल दें। तो वो बोले प्रभु हम तो आपकी ही टीम में रहेंगे क्योंकि बचपन से लक्ष्मण जी राम जी की तरफ ही रहे हैं। अब राम जी ने सोचा की यहां कोई भी ऐसा नहीं है तो मेरी तरफ से ना खेला, सभी को मेरी तरफ से ही खेलना है, अब जब सारी मेरी तरफ से ही खेलेंगे तो खेल होगा कैसे ? लक्ष्मण जी तो राम की तरफ हो गए तो राम जी ने भरत जी की तरफ देखा, लेकिन कहा कुछ नहीं...यहां भाईयों का प्रेम देखिए की रामजी के देखते ही भरत जी बोले हां मैं विपक्षी टीम में रहूंगा । 
भडकाने वालों हर युग में होते है, जैसे ही भरत जी ने विपक्ष चुना तो भड़काने वालो ने कहा लो जी लक्ष्मण जी को तो अपने साथ ले लिया और आपको विपक्ष में कर दिया। लेकिन भरत जी भड़कने वालों में से नहीं थे, वो बोले अगर में राम जी के साथ रहूंगा तो मुझे कभी उनके बगल का दर्शन होता, कभी राम जी की पीठ का दर्शन होता लेकिन उनके विपक्ष में रहूंगा तो मुझे उनके मुख का ही दर्शन होता रहेगा ।

खेल शुरू हुआ तो राम जी ने चरण का प्रहार किया और गेंद सीधे भरत की तरफ गई, जब गेंद भरत जी की तरफ गई तो उन्होंने देखा की राम जी के चरण से स्पर्श हुई गेंद मेरी तरफ आ रही है तो उन्होंने जितनी जोर से राम जी ने मारा थी उससे अधिक तेज गति से प्रहार किया उस गेंद पर और राम जी की तरफ वापस कर दी। और जब वो गेंद राम जी के पास पहुंची तो राम जी ने प्रहार नहीं किया, बात ये हुई की जब बॉल वापस नहीं गई तो भरत जी जीत गए। अब वहां पर भी भड़काने वाले मौजूद थे, उन्होंने कहा वाह राम जी कितना बुरा किया आपने ये गेंद बेचारी के भाग्य उदय हुए की सब कुछ सोच के आई की दुनिया की शरण में जाने से कुछ नहीं मिलना राम की शरण में चलना चाहिए, तो वो सब कुछ छोड़ कर आपकी शरण में आई पर आपने क्या किया उसे लात मारकर बाहर कर दिया ऐसा आपने क्यों किया ? तो राम जी ने कहा भईया तुम नहीं समझोगे मैने इसलिए लात मारी क्योंकि जहां भरत जैसा संत मौजूद हो तुझे मेरी शरण में नहीं आना चाहिए, तुझे भरत की शरण में जाना चाहिए। जहां गुरू और गोविंद दोनों हो वहां पहले गुरू की शरण में जाना चाहिए।

अब वहां भरत जी को भड़काने वाले बोले कमाल कर दिया राम जी ने इतने धीरे से चरण का प्रहार किया और आपने इतनी तेज प्रहार किया इसका मतलब है आप राम जी को हराकर खुद जीतना चाहते हो। तो भरत जी बोले मैं जीतना नहीं चाहता, मैं तो इस गेंद की दुर्भाग्य को कह रहा था जहां साक्षात जगत के पालनहार खड़े हों तुझे मौका मिला था उनके चरणों में रहने का और तेरा दुर्भाग्य तू उनके चरण छोड़कर मेरे पास चली आई, तुझे वहीं जाना चाहिए क्योंकि दुनिया में आप कही घूम लो अन्त में आपको शांति केवल गोविंद के चरणों में आकर ही प्राप्त होगी।

भड़काने वाले राम जी से बोले अब जब यह गेंद आपके पास आई तो आपने चरणों का प्रहार क्यों नहीं किया ? तो भगवान श्री राम ने बहुत ही प्यारा जवाब दिया, उन्होंने कहा मैने पहले चरण का प्रहार किया संत के पास भेजने के लिएर फिर संत ने चरण का प्रहार किया और मेरे पास भेज दिया, तो जिस पर संत का चरण स्पर्श हो गया हो और फिर वो मेरे पास आए तो फिर मैं उसका त्याग नहीं करता, उसे स्वीकार करता हूं, फिर चाहे उसे स्वीकार करने में मेरी हार ही क्यों ना हो जाए। यही तो भरत और राम का प्रेम है।

31Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन, कनाडा के तत्वाधान में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जुलाई से से 01 अगस्त 2019 तक Bhavani Shankar Mandir 90 Nexus Ave Brampton L6p 3R6 ( Near Hindu Sabha Mandir ) में श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के षष्ठम दिवस पर प्रभु श्रीराम का विवाहोत्सव बड़ी ही धूमधाम से मनाया गया।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन, कनाडा के तत्वाधान में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जुलाई से से 01 अगस्त 2019 तक Bhavani Shankar Mandir 90 Nexus Ave Brampton L6p 3R6 ( Near Hindu Sabha Mandir ) में श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के षष्ठम दिवस पर प्रभु श्रीराम का विवाहोत्सव बड़ी ही धूमधाम से मनाया गया।

श्रीराम कथा के षष्ठम दिवस की शुरूआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत कल के कथा क्रम को याद दिलाते हुए कहा कि विश्वामित्र जी राम जी को लेने आए तो राजा दशरथ ने राम जी को देने से मना कर दिया। यथार्थ में सत्य ये है की भगवान देने का विषय है ही नहीं, हमारी इतनी हैसियत भी नहीं है की हम भगवान को दे सकें, राजा महाराजा कोई कितना भी बड़ा क्यों ना हो वो भगवान नहीं दे सकता। वो द्रव्य दे सकता है, हीरे जवाहरात दे सकता है, व्यवस्था दे सकता है लेकिन भगवान नहीं दे सकता। भगवान देने का अधिकार अगर किसी को है तो वो संतों को है, गुरूओं को है। किसी गुरू की शरण में जाओ, कृपा हो जाए तो भगवत प्राप्ति हो जाएगी इसमें कोई संदेह नहीं है।
महाराज श्री ने कहा कि जो किसी को दुख दे, जिसका व्यवहार ही हो दुसरों को दुख देना ऐसे लोगों का वध पाप नहीं है। उन्होंने कहा की गुरू की आज्ञा का पालन करने में कोई भी पाप पुण्य शिष्य को नहीं सोचना चाहिए । गुरू, माता, पिता संसार में ये तीन लोग ऐसे हैं जिनकी आज्ञा हो जाए तो कोई भी पाप पुण्य नहीं सोचना चाहिए । सांसारिक जीवन में पहले माता, फिर पिता, फिर गुरू और आध्यात्मिक जीवन में पहले गुरू, फिर माता, फिर पिता। अगर ये भी आपको भक्ति से दूर करते हों, धर्म से दूर करते हों तो इन तीनों की बातों को मत सुनिए। इन सब चीजों का इतिहास गवाह है, भरत जी ने अपनी मां को छोड़ा, प्रह्लाद जी ने अपने पिता को छोड़ा, राजा बली ने अपने गुरू को छोड़ा । 
महाराज श्री ने कहा कि हमारा इतिहास ऋषि मुनियों की अच्छाई से भरा हुआ है, एक से एक भक्त हुए हैं, ऋषि हुए हैं, अगर वो नहीं होते तो इतना सुंदर जीवन नहीं जी रहे होते । यह हमारा दुर्भाग्य है की हम बुराईयों को पकड़ लेते हैं और अच्छाईयों को दूर कर देते हैं। कोई भी यहां उत्तम नहीं है सब में कुछ ना कुछ कमियां हैं लेकिन आपकी समझ के लिए सिर्फ अच्चाई है। हर किसी की अच्छाई को पकड़ो, अगर बुद्धि है, विवेक है, दिमाग है तो अच्छाई पकड़ो, बुराई में क्या रखा है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने प्रभु श्रीराम के विवाहोत्सव का प्रसंग सुनाते हुए कहा की विश्वामित्र जी के साथ प्रभु श्री राम जनकपुर पहुंचे, वहां पहुंचने पर जैसे ही राजा जनक ने श्रीराम जी को देखा तो एक ह्रदय में एक तरफ राम जी और दूसरी तरफ सीता जी की छवि उमड़ आई। राजा जनक ने विश्वामित्र जी से राम जी के विषय में पूछा की ये कौन हैं तो उन्होंने कहा कि ये दशरथ जी महाराज के पुत्र हैं और मेरे यज्ञ की रक्षा के लिए भेजा है और आज देखिए यज्ञ भी सम्पन्न हो गया, बड़े बलवान हैं ये राम लक्ष्मण। कुछ दिनों बाद सीता स्वयंवर का समय आया, राजा दशरथ ने राम जी उच्च सिंहासन पर बैठाया, मानो यूं बता रहे हों की मिथिला वासियों ये देख लो ये सीता के योग्य वर है। स्वयंवर का समय आया, राजा दशरथ ने सभी राजाओं से कहा जाओ जिसके लिए आए हो वो कार्य करो, सभी राजा उठे धनुष तोड़ने के लिए गए लेकिन कोई भी राजा धनुष तोड़ना तो दूर, धनुष को हिला भी नहीं सके। यह देख जनक जी को क्रोध आ गया, जब क्रोध आया तो वो बोले हमको ऐसा लगता है जैसे ये पृथ्वी वीरों से विहिन हो गई है, अब इस पृथ्वी पर योद्धा नहीं बचे, क्या कोई ऐसा योद्धा नहीं है जो इस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाए और मेरी बेटी से विवाह करे। 
राजा जनकी की बात सुनकर वहां बैठे लक्षमण जी ने प्रभु श्री राम की तरफ देखा लेकिन वो तो मर्यादापुरूषोत्तम थे वो कसे बोलते, तो लक्षमण जी ने सोचा की प्रभु भी ना बोले और हम भी ना बोलें तो कैसे चलेगा। लक्षमण जी बोले उठे उन्होंने कहा जनक बिना सोचे समझे कुछ नहीं बोलना चाहिए हमारे गुरूजी ने आज्ञा नहीं दी है हमने अपने धनुष उठाया नहीं है, अभी हम यहां बैठे हैं और रघुवंशियों का एक भी बच्चा जहां बैठा हो वहां ऐसे शब्द कोई बोल नहीं सकता की पृथ्वी पर कोई वीर नहीं है। मुझे इस धनुष को तोड़ने में एक क्षण नहीं लेगा, लक्षमण जी ने जब यह कहा तो धरती कांप उठी, राजा भी भयभीत हो गए। राजा जनक को लगा की बात तो यह सही है अभी रघुवंशी बैठे हैं। लक्षमण जी के बढ़ते क्रोध को देखते हुए राम जी उन्हे शांत करवाकर बैठाया।
विश्वामित्र जी ने उचित समय जानते हुए श्री राम को आदेश दिया की हे राम उठो और राजा जनक की दुविधा को समाप्त करो। श्री राम जी उठे और अपने गुरू को मन ही मन प्रणाम किया, जब श्री राम धनुष की तरफ बढ़ने लगे तो सब सोचने लगे की अब क्या होगा, क्या धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ेगी, जिसे धनुष को हजारों लोग मिलकर नहीं उठा पाए क्या यह वनवासी उसे उठा पाएगा। प्रभु श्री राम धनुष उठाने गए, श्री राम ने धनुष उठाने से पूर्व गुरू चरणों में प्रणाम किया और धनुष को एक पल में उठा लिया, प्रत्यंचा चढायी और धनुष को तोड़ दिया। पूरे संसार में बधाईयां गायी जाने लगी, सीता मईया प्रभु श्रीराम की हो गई और राम सीता विवाह संपन्न हुआ।

आज कथा स्थल पर पी.सी पार्टी के केंडिडेट श्री अर्पण खन्ना जी, भाजपा अध्यक्ष कनाडा श्री बिपिन शर्मा जी एवं पी.सी पार्टी केंडिडेट श्री मुरारी लाल जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया।

23Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 21 जुलाई से 23 जुलाई 2019 तक स्थान -टोरंटो, कनाडा हिन्दू प्रार्थना समाज टेम्पल में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्री कृष्ण कथा का आयोजन किया जा रहा है।

धर्म और सत्संग जीवन में अवश्य धारण करना चाहिए - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

गृहस्थ आश्रम से बड़ा कोई और आश्रम नहीं है - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 21 जुलाई से 23 जुलाई 2019 तक स्थान -टोरंटो, कनाडा हिन्दू प्रार्थना समाज टेम्पल में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्री कृष्ण कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्री कृष्ण कथा के तृतीय दिवस पर सैकड़ो की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

श्री कृष्ण कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा की शुरुआत महाराज श्री ने बहुत ही सुन्दर मानस की चौपाई से की और बताया की बिना सत्संग के विवेक नहीं मिलता और जब तक गुरु की कृपा न हो गोविन्द की कृपा न हो तब तक जीवन में सत्संग श्रवण का अवसर प्राप्त नहीं होता। अगर आप को जीवन में सत्संग सुनने का अवसर प्राप्त हो तो मात्र उसे सुने नहीं बल्कि उसे अपने जीवन में भी धारण करें, हमे धर्म और सत्संग अवश्य धारण करना चाहिए।

पंडित जी ने बताया की हमारे सनातन धर्म में चार तरह के आश्रम है ब्रह्मचर्य आश्रम दूसरा गृहस्थ, तीसरा वानप्रस्थ, और चौथा संन्यास है, इन सब आश्रमों में से सबसे सवर्श्रेष्ठ आश्रम गृहस्थ है। क्यूंकि गृहस्थ ही वो आश्रम है जो भगवान को गोदी में ख़िलाता है।

महाराज श्री ने बताया की जो जीव सत्य धर्म और ईश्वर के मार्ग से भटक जाता है वो जीव फिर ज़िन्दगी भर 84 लाख योनियों में भटकता ही रहता है। इसलिए हमें इस मानव जीवन में आकर इस बहुमल्य जीवन को यूँ ही व्यर्थ नहीं करना चाहिए।

व्यास जी ने बताया की अगर आप संतो के सानिध्य में रहोगे तो आपका जीवन सुखमय होगा। आपको अपने बच्चो को भी सत्संग में लेकर जाना चाहिए ताकि जीवन में उन्हें कभी भी समस्या का सामने करना पड़े तो वो संतो की शरण में जाकर उन्हें सभी समस्याओं का समाधान मिल जाए।

23Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 21 जुलाई से 23 जुलाई 2019 तक स्थान -टोरंटो, कनाडा हिन्दू प्रार्थना समाज टेम्पल में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्री कृष्ण कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्री कृष्ण कथा के द्वितीय दिन सैकड़ो की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

संतो का हक़ खाना सबसे बड़ा पाप है - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

कलयुग में मानसिक रूप से किये गए पुण्यो का भी फल मिलता है - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

संतो का संग आपका स्वाभाव, आचरण , किस्मत तक बदल देता है - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

सेवा की शुरुआत आनंद से होती है - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 21 जुलाई से 23 जुलाई 2019 तक स्थान -टोरंटो, कनाडा हिन्दू प्रार्थना समाज टेम्पल में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्री कृष्ण कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्री कृष्ण कथा के द्वितीय दिन सैकड़ो की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

श्री कृष्ण कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की आपने अपने जीवन में जो भी मानसिक पुण्य किया होगा उसका फल आपके जीवन में आपको जरूर मिलता है।

महाराज श्री ने बताया की हमें अपने जीवन में संतो का संग जरूर करना चाहिए क्यूंकि संतो के सानिध्य और आशीर्वाद से हमारे जन्म जन्मो के पाप जो जमा है उनसे हमें मुक्ति मिलती है, आजकल का कलयुगी मनुष्य इस वहम में रहता है की वो पापी नहीं है उसके पाप कम और पुण्य ज्यादा है लेकिन असल में जो लोग पापी होते है उनका मन कभी धार्मिक कार्यो में नहीं लगता और जिस जीव के पाप ज्यादा है उसका मन कभी बुरे काम में नहीं लगेगा।

व्यास जी ने कहा की ब्राह्मण का हक़ खाना सबसे बड़ा पाप है, और आजकल आप सड़को पर भिखारियों को देखते होंगे वो इसलिए भिखारी नहीं है की वो निर्धन है बल्कि उनके निर्धन होने का कारण उनके पिछले जन्म के कर्म है, जो भी व्यक्ति किसी का हक़ मार कर खाता है वो अगले जन्म में दरिद्र बनता है इसलिए हमें जीवन में कभी भी किसी का हक़ नहीं मरना चाहिए।

महाराज श्री ने बताया की कलिकाल में जीव अगर मानसिक रूप से कोई धार्मिक यात्रा करें तो उसे उसका फल मिलता है , कलियुग के लोगों पर ठाकुर जी की इतनी कृपा है की अगर आप मानसिक पाप करोगे तो आपको पाप नहीं लगेगा और मानिसक पुण्य करोगे तो आपको उसका लाभ मिलेगा क्यूंकि हमारा ठाकुर बहुत दयालु है। लेकिन अगर आप अपने जीवन में कोई पाप करते है तो उसको तो आपको भोगना ही पड़ेगा।

संतो का संग आपका स्वाभाव, आचरण , कर्म और आपकी किस्मत तक बदल देता है 
बुरे लोगों का संग करने से आप जन्म जन्मांतर तक फंस जाते हो, और संतो के संग से ये आपका आखरी जीवन होता है।

महाराज श्री ने सावन के पहले सोमवार के शुभ अवसर पर श्री कृष्ण कथा के माध्यम से सबसे लम्बी मानसिक कावड़ यात्रा कनाड़ा के भक्तों को करवाई,और सात समंदर पार धर्म प्रेमियों को मानसिक कावड़ के माध्यम से भगवान शिव शंकर पर गंगा जल अभिषेक करवाया।

 
श्री कृष्ण कथा-द्वितीय दिवस-टोरंटो, कनाडा
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20Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के पावन सानिध्य में 20 जुलाई 2019 को हैमिलटन, कनाड़ा में श्री कृष्ण कथा का विशाल आयोजन किया गया।

"देश और धर्म की सेवा ही सबसे बड़ी सेवा है।"-पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

कलयुग का प्रभाव ही हमारे मन में अविश्वास प्रकट करता है : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के पावन सानिध्य में 20 जुलाई 2019 को हैमिलटन, कनाड़ा में श्री कृष्ण कथा का विशाल आयोजन किया गया।

श्री कृष्ण कथा की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

महाराज श्री ने श्री कृष्ण कथा की शुरूआत करते हुए भक्तों को बहुत ही मधुर भजन "मुरली मनोहर गोपाला" श्रवण कराया। उसके बाद बताया की ये हमारे भगवान के अहेतु की कृपा है जिस वजह से हम कनाड़ा में बैठ कर श्री कृष्ण कथा का रसपान कर पा रहे है।

महाराज श्री ने बताया की जीवन में सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति वही होता है जो अपने संस्कारो और अपने धर्म का पालन करता है। जो जीव समय के अनुसार अपने संस्कारो और धर्म को अपनाता व छोड़ देता है वो व्यक्ति ईश्वर की नज़र में दोषी होता है।

महाराज श्री ने कहा की भारतीय संस्कृति विश्व विख्यात है, और अगर भारतीय संस्कृति को सम्पूर्ण विश्व ग्रहण कर ले तो पुरे विश्व में शान्ति आ जायेगी क्यूंकि भारतीय संस्कृति मानवता और शान्ति का पाठ पढ़ाती है।

व्यास जी ने बताया की जीव इस जीवन में सुख शान्ति के लिए दिन रात काम करता है मेहनत करता है पैसे कमाता है लेकिन उसे फिर भी शान्ति नहीं मिलती, अगर आप को सच में शान्ति चाहिए तो भगवान के सामने जाकर बैठ जाए भगवान से प्रार्थना करें भगवान की लीलाओं का चिंतन मनन करे शान्ति खुद ब खुद आपके हृदय में सहज सुलभ हो जाएगी।

महाराज श्री ने बताया की आज के इस कलयुग में सभी माता - पिता अपने बच्चों को भगवान राम की तरह बनाना चाहती है लेकिन आपके बच्चे राम तब बनेंगे जब आप अपने बच्चोँ में श्री राम जैसे आचरण डालेंगे। उन्हें धर्म की बात बताएँगे उनसे धार्मिक कार्य कराएँगे, सत्संगो में ले जायेंगे। लेकिन माँ - बाप ये सोचते है की हमने अपने बच्चों को सब सुख सुविधाएं दे दी तो उनकी जिम्मेदारी पूरी हो गई लेकिन आपकी असल जिम्मेदारी तब पूरी होगी जब आपके बच्चों के माथे पर तिलक, सर पर शिखा और गले में तुलसी की माला होगी।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

#ThakurJiInCanada #ShantiSandeshYatra

23Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 21 जुलाई से 23 जुलाई 2019 तक स्थान -टोरंटो, कनाडा भारत माता मंदिर एवं हिन्दू टेम्पल में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्री कृष्ण कथा का आयोजन किया जा रहा है।

बिना सत्संग के विवेक जागृत नहीं होता - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

हमारे पापो को नष्ट करता है सत्संग श्रवण - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

जीपीएस का असली मतलब है गुरु, परमात्मा और सत्य- पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 21 जुलाई से 23 जुलाई 2019 तक स्थान -टोरंटो, कनाडा भारत माता मंदिर एवं हिन्दू टेम्पल में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्री कृष्ण कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के प्रथम दिन सैकड़ो की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

श्री कृष्ण कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की आज के समय में आपकी संगत बहुत महत्वपूर्ण है क्यूंकि आपकी जिंदगी के बाद के परिणाम भी आपके संग पर निर्भर है। आजकल का जीव बिना कुछ सोचे - समझे किसी को भी अपना दोस्त बना लेते है और उसकी संगत में चल पड़ते है। आपने जिन किन्ही भी लोगों की बुरी संगत का संग किया है वो सिर्फ आपके केवल इस जीवन ही नहीं बल्कि उसका प्रभाव आपके आने वाली पीढ़ी पर भी पड़ता है। क्यूंकि जीव जैसे कर्म का संगत करता है उसकी वैसी ही उनकी विचार धारा बनती है। वो फिर वैसा ही बोलते है, वैसा ही सोचते है और वैसा ही करने की कोशिश करते है।

महाराज श्री ने बताया की जब तक आपके जीवन में सत्संग नहीं होगा आपके जीवन में विवेक जागृत नहीं हो सकता। जब तक आप पर भगवान् की कृपा नहीं होगी तब तक आपको सत्संग में जाने का मौका नहीं मिलेगा।

हमे हमारे पापो को नष्ट करने के लिए सत्संग में जाना चाहिए संतो का संग करना चाहिए क्यूंकि बिना गुरु और संत की शरण में जाए बिना हमारे जीवन का उद्धार नहीं हो सकता।

महाराज श्री ने बताया की गुरु, परमात्मा और सत्य ही जीपीएस का असली मतलब है और गुरु के द्वारा बताये गए सत्य के मार्ग पर चलोगे तो आपको परमात्मा की प्राप्ति होगी, जिसकी शुरुआत हमें सत्संग से करनी चाहिए ताकि आपके जीवन के टारगेट की प्राप्ति आपको हो जाए। बिना जीपीएस के आपको भगवान् की प्राप्ति नहीं हो सकती।

18Jul 2019

आज पूज्य महाराज श्री एवं विजय शर्मा जी कनाडा पहुंचे जहां विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन कनाडा के सदस्यों व भक्तों द्वारा स्वागत किया गया।

आज पूज्य महाराज श्री एवं विजय शर्मा जी कनाडा पहुंचे जहां विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन कनाडा के सदस्यों व भक्तों द्वारा स्वागत किया गया।यहाँ पूज्य महाराजश्री के सानिध्य में 20 जुलाई से 15 अगस्त तक श्रीराम कथा, श्रीकृष्ण कथा, श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।

 

30Nov -0001

ठा. प्रियाकांत जू मंदिर, शांति सेवा धाम, वृंदावन में "गुर पूर्णिमा महोत्सव" के पावन अवसर पर पूर्णमासी महासंकीर्तन का सुंदर एवं भव्य आयोजन पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में बड़ी हर्षोल्लास के साथ मनाया गया जिसमें हजारों भक्त मौजूद रहे। सर्वप्रथम गणेश वंदना कर कार्यक्रम की शुरुआत की गई तथा ठाकुर श्री प्रियाकांत जू भगवान, सर्वेश्वरीश्री राधा रानी के प्यारे प्यारे भजनों की प्रस्तुति दी गई।

ठा. प्रियाकांत जू मंदिर, शांति सेवा धाम, वृंदावन में "गुर पूर्णिमा महोत्सव" के पावन अवसर पर पूर्णमासी महासंकीर्तन का सुंदर एवं भव्य आयोजन पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में बड़ी हर्षोल्लास के साथ मनाया गया जिसमें हजारों भक्त मौजूद रहे। सर्वप्रथम गणेश वंदना कर कार्यक्रम की शुरुआत की गई तथा ठाकुर श्री प्रियाकांत जू भगवान, सर्वेश्वरीश्री राधा रानी के प्यारे प्यारे भजनों की प्रस्तुति दी गई। इस अवसर पर सुप्रसिद्ध भजन गायक श्री नंदू भईया जी ने भी अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई एवं अपने भजनों से भक्तों को झूमने पर मजबूर कर दिया। महोत्सव में देश के जाने माने भजन गायकों ने भी ठा. श्री प्रियाकांत जू के चरणों के हाज़िरी लगाई, उनके भजनों पर भक्त जमकर झूमे। महाराज श्री द्वारा गए गये भजनो पर सभी भक्तगण झूमते नाचते रहे, जहां तक नजर जा रही थी वहीं तक भक्त नजर आ रहे थे। अंत में ठाकुर श्री प्रियाकांतजू भगवान की आरती का कार्यक्रम का समापन किया गया ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

17Jul 2019

आज शाम पूज्य महाराजश्री एवं विजय शर्मा जी ने वृन्दावन से कनाडा के लिए प्रस्थान किया, प्रस्थान से पूर्व ठा. श्री प्रियाकांत जू भगवान एवं पूज्य पिता जी के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया । राधे राधे।

आज शाम पूज्य महाराजश्री एवं विजय शर्मा जी ने वृन्दावन से कनाडा के लिए प्रस्थान किया, प्रस्थान से पूर्व ठा. श्री प्रियाकांत जू भगवान एवं पूज्य पिता जी के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया । राधे राधे।

16Jul 2019

आज शाम ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर, शान्ति सेवा धाम, वृन्दावन में दिल्ली कथा को लेकर ट्रस्ट सचिव श्री विजय शर्मा जी के साथ मीटिंग हुई जिसमे कि 25 मार्च से 2 अप्रैल 2020 तक श्रीराम कथा का आयोजन भजनपुरा, दिल्ली में होना सुनिश्चित हुआ हैं।

आज शाम ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर, शान्ति सेवा धाम, वृन्दावन में दिल्ली कथा को लेकर ट्रस्ट सचिव श्री विजय शर्मा जी के साथ मीटिंग हुई जिसमे कि 25 मार्च से 2 अप्रैल 2020 तक श्रीराम कथा का आयोजन भजनपुरा, दिल्ली में होना सुनिश्चित हुआ हैं। इस अवसर पर श्री एच .पी अग्रवाल जी, श्री मुकेश पाण्डेय जी, श्रीपाल जिंदल जी, श्री बिजेंदर सोनी जी, श्री शेराराम भादू जी, श्री अशोक खुराना जी, श्री वीर सिंह जी, श्री महेश अग्रवाल जी मौजूद रहें। ।। राधे राधे ।।

 

16Jul 2019

आज शाम ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर, शान्ति सेवा धाम वृन्दावन में मुम्बई कथा को लेकर ट्रस्ट सचिव श्री विजय शर्मा जी के साथ मीटिंग हुई जिसमे कि 15 से 22 दिसम्बर 2019 तक मुम्बई में होने वाली श्रीमद्भागवत कथा की तैयारियों को लेकर समिति के सदस्यों के साथ चर्चा हुई।

आज शाम ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर, शान्ति सेवा धाम वृन्दावन में मुम्बई कथा को लेकर ट्रस्ट सचिव श्री विजय शर्मा जी के साथ मीटिंग हुई जिसमे कि 15 से 22 दिसम्बर 2019 तक मुम्बई में होने वाली श्रीमद्भागवत कथा की तैयारियों को लेकर समिति के सदस्यों के साथ चर्चा हुई। ।। राधे राधे।।

 

11Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 से 11 जुलाई 2019 तक प्रतिदिन करनैल सिंह नगर, अटल अपार्टमेंट, नियर सिंह सभा गुरूद्वारा, पखोवाल रोड़, लुधियाना में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत सुनने मात्र का संकल्प लेने से हमारे पितृ खुश हो जाते है- पंडित देवकीनंदन ठाकुर जी

जिस परिवार में धर्म नहीं वो परिवार मृत सामान है-पंडित देवकीनंदन ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 से 11 जुलाई 2019 तक प्रतिदिन करनैल सिंह नगर, अटल अपार्टमेंट, नियर सिंह सभा गुरूद्वारा, पखोवाल रोड़, लुधियाना में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की कृष्ण हर जगह किसी न किसी रूप में मौजूद है। और जिस जीव के करोडो पुण्य एकत्रित होते है उसे सम्पूर्ण भागवत सुनने को प्राप्त होती है, भागवत सुनने मात्र का संकल्प लेने से हमारे पितृ खुश हो जाते है। भागवत जैसा पुनीत और पावन ग्रन्थ सरल नहीं है और यदि अगर हम किसी भागवत कथा पंडाल में कथा श्रवण कराने ले जाए तो उसका लाभ हमें भी मिलता है। 
महाराज श्री ने बताया की सेवा धन से नहीं मन से होती है और जिस परिवार में धर्म नहीं है, अध्यात्म नहीं है वो परिवार मृत सामान है। जब कभी भी किसी जीव के जीवन में कोई दुविधा आती है तो वो सबसे पहले भगवान को कोसता है लेकिन वो ये नहीं जानता की तुम्हारा कर्म ही तुम्हे सुख और दुःख भोगने पर विवश करता है। 
महाराज श्री ने बताया की आपको अपने बच्चो को धर्म के बारे में बताना चाहिए उन्हें धार्मिक जगहों पर ले जाना चाहिए उन्हें संस्कारी बनाना चाहिए ताकि आपके जाने के बाद भी आपके बच्चे विधि- विधान से पूजा- पाठ करते रहें, धर्म का प्रचार करें और ये हमारी जिम्मेदारी है हमारे परिवार के प्रति तभी हमारा धर्म आगे बढ़ेगा। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंत: सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

6Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 से 11 जुलाई 2019 तक प्रतिदिन करनैल सिंह नगर, अटल अपार्टमेंट, नियर सिंह सभा गुरूद्वारा, पखोवाल रोड़, लुधियाना में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। 

ज्ञान की गंगा में गोते लगाने से सभी पाप समाप्त हो जाते है - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

जिस व्यक्ति के जीवन में धर्म नहीं वो पशु के समान है - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

धर्म करने वाला व्यक्ति भगवान के हृदय में वास करता है - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 से 11 जुलाई 2019 तक प्रतिदिन करनैल सिंह नगर, अटल अपार्टमेंट, नियर सिंह सभा गुरूद्वारा, पखोवाल रोड़, लुधियाना में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। 
भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की भगवान की भक्ति करने से हमे पल -पल उनका हर कदम पर सहारा मिलता है। भक्ति, भजन करने से सत्संग करने से हमें वो प्राप्त होता है जो हमारी कल्पना से भी परे है। इस संसार में आपको वो लाभ नहीं मिलेगा जो आपको कृष्ण की भक्ति में मिलेगा क्यूंकि भगवान् के सच्चे भक्तों को पग पग पर सहारा मिलता है।

पंडित जी ने बताया की जिस व्यक्ति के जीवन में धर्म नहीं है, कृष्ण प्रेम नहीं है भगवान का स्मरण नहीं है वो व्यक्ति पशु के सामान है। क्यूंकि अगर आपने मानव जीवन में आकर भगवन का भजन नहीं किया भगवान् का स्मरण नहीं किया तो आपका मनुष्य योनि में जनम लेना व्यर्थ है।

महाराज श्री ने बताया की भगवान के सच्चे भक्त वो लोग होते है जो धर्म की रक्षा करने के लिए सदैव तत्पर रहते है लेकिन आज का कलयुगी मनुष्य भगवान को तब याद करता है जब वो की किसी काल से घिरा हुआ होता है। इसलिए हमें अपने ह्रदय में वास करा लेना चाहिए जिससे अपने आप सभी काल ग्रहो का नाश हो जाता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

12Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 से 11 जुलाई 2019 तक प्रतिदिन करनैल सिंह नगर, अटल अपार्टमेंट, नियर सिंह सभा गुरूद्वारा, पखोवाल रोड़, लुधियाना में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया ।

अगर मन की शांति चाहते हो तो उसे स्वच्छ रखो

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 से 11 जुलाई 2019 तक प्रतिदिन करनैल सिंह नगर, अटल अपार्टमेंट, नियर सिंह सभा गुरूद्वारा, पखोवाल रोड़, लुधियाना में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया ।

कथा के तृतीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
कथा की शुरूआत भागवत आरती एवं विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि मृत्यु एक ऐसा पल है जिसे कोई टाल नहीं सकता इसिलिए या तो जीवन सुधर जाए या फिर मृत्यु सुधर जाए। जीवन तो बिगड़ रहा है, आज का जो माहौल है उसमें जीतने दिन जिंदा रहेंगे उसमें जीवन बिगड़ेगा ही। जब जब सुधरने के हालात होते हैं तब तब कोई बिगाड़ने वाला आ ही जाता है। तो जीवन कैसे सुधरे, जीवन उस दिशा में कैसे जाए जहां से जीवन सुधर जाए या तो मृत्यु सुधर जाए। जीवन तो धीरे धीरे व्यतीत हो रहा है लेकिन मृत्यु सुधारी जा सकती है।

महाराज श्री ने कहा कि अगर मन की शांति चाहते हो तो सफेद रंग की तरह जीवन को एकदम स्वच्छ रखो, इसपर छोटी सा दाग भी लग जाए तो दिखता है। यह मानव रूपी जीवन की यह चादर मिली है तो इसे युक्ति के साथ जीओ। तो मिल जाए खालो, जहां मिल जाए सो जाओ, जो मन में आया बोल दो, ऐसा मत करो, खाने से पहले सोचो की क्या मैं इसे भगवान को भोग लगा सकता हूं, बोलने से पहले सोचो क्या कोई ये शब्द मुझे भी बोल सकता है। हर कर्म करने से पहले सोचो फिर करो। हमारे संतो ने बड़े मार्ग दिखाए हैं, सोचे समझे बगैर कुछ भी मत बोलो, कुछ भी मत करो। अगर कुछ चीज नहीं सोचनी है तो वो भगवान का नाम किस समय लें यह नहीं सोचना है, जब मन करे ले लो।

महाराज श्री ने पाश्चयात कल्चर पर अपनी बात रखते हुए कहा कि कभी सोचा है कि इस पाश्चयात कल्चर ने आपको दिया क्या है ? इस पाश्चयात कल्चर ने आपको सिर्फ असुरक्षा दी है। उन्होंने कहा कि हमारे देश का दुर्भाग्य है की यहां लिव इन रिलेशनसिप जैसे कानून बनते हैं, और कोई बोलता नहीं है। कोई ऐसा देश नहीं होगा जो अपने कल्चर का गला अपने हाथों से घोटता होगा लेकिन यह भारत है यहां अपने ही कल्चर का गला अपने ही हाथों से घोटा जा रहा है। और कोई बोलता नहीं है, कोई देश नहीं बचाना चाहता सब को अपना पद बचाना है। यह भारत वो भारत नहीं है जहां श्री राम राज्य किया करते थे, यह भारत बदल रहा है, लेकिन यह अच्छाई की ओर नहीं बदल रहा है। हमे संस्कार वाला भारत चाहिए, संस्कार विहिन नहीं ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।

राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।

8Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 से 11 जुलाई 2019 तक प्रतिदिन करनैल सिंह नगर, अटल अपार्टमेंट, नियर सिंह सभा गुरूद्वारा, पखोवाल रोड़, लुधियाना में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

पुरे विश्व में एक ही धर्म है सनातन धर्म - पंडित देवकीनंदन ठाकुर जी

आपके अच्छे कर्मो का सर्वश्रेठ फल है की आपने सनातन धर्म में जन्म लिया है - पंडित देवकीनंदन ठाकुर जी

सनातन धर्म में ईश्वर को प्राप्त करने के अनेक मार्ग है - पंडित देवकीनंदन ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 से 11 जुलाई 2019 तक प्रतिदिन करनैल सिंह नगर, अटल अपार्टमेंट, नियर सिंह सभा गुरूद्वारा, पखोवाल रोड़, लुधियाना में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
कथा के चतुर्थ दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की हम भगवान से हमेशा ये प्रार्थना करें की हे प्रभु आपके श्री चरणों से हमें प्रीत हो जाए और हमारा मन आपके श्री चरणों को छोड़कर इस मोह माया एवं संसार के चक्कर में कभी इधर उधर न भटके आपकी कृपा आपका आशीर्वाद सदैव हमारे ऊपर बना रहें।

महाराज श्री ने बताया की आज कल कुछ लोग लोगों के धर्म परिवर्तन करा रहें है लेकिन धर्म कोई वस्त्र नहीं जिसे आप बदल लें और अगर आप धर्म बदलना भी चाहेंगे तो कैसे बदल पाएंगे क्यूंकि धर्म तो एक ही है, आपके पूजा करने की पद्द्ति बदल सकती है लेकिन आपका धर्म नहीं बदल सकता। क्यूंकि पुरे विश्व में एक ही धर्म है जिसका नाम है सनातन धर्म और हमारे ऋषि मुनियों ने भी कहा है की अपने धर्म में रहकर मृत्यु भी आनंद दायक होता है। जैसे हम अपने पिता को नहीं बदल सकते, अपने पति को नहीं बदल सकते, अपनी आत्मा को नहीं बदल सकते उसी तरह हमें अपना धर्म बदलने का भी अधिकार भी नहीं है। आपको ठाकुर जी ने जिस धर्म में भेजा है आपको उसी का पालन करना पड़ेगा।

पंडित जी ने बताया की सनातन धर्म में जन्म मिलना कोई मामूली बात नहीं है यह आपके अच्छे कर्मो का सर्वश्रेष्ठ फल है कि आपको सनातन धर्म में जन्म मिला है क्यूंकि इसी धर्म में भगवान के अवतार बार - बार होते है। जब- जब भगवान के भक्तो पर कोई विपत्ति आती है तो भगवान अवतार लेकर अपने भक्तों की रक्षा के लिए पृथ्वी पर प्रकट होते है और जीव का कल्याण करते है।

व्यास जी ने बताया की सत्य सनातन धर्म में ईश्वर को प्राप्त करने के अनेक मार्ग है। ज्ञान मार्ग, भक्ति मार्ग और वैराग्य मार्ग जो भी मार्ग जीव को अच्छा लगे उस मार्ग पर चलकर वो ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। ज्ञानियों के लिए वो ब्रह्मा है वेदान्तियों के लिए वो परमात्मा है और भक्तों के लिए वो भगवान है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया। शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे। महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।" जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया। इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

9Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 से 11 जुलाई 2019 तक प्रतिदिन करनैल सिंह नगर, अटल अपार्टमेंट, नियर सिंह सभा गुरूद्वारा, पखोवाल रोड़, लुधियाना में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

हमें बोलने से पहले सुनना चाहिए - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

कोई भी रिश्ता बिना सहनशीलता के निभाया नहीं जाता- पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 से 11 जुलाई 2019 तक प्रतिदिन करनैल सिंह नगर, अटल अपार्टमेंट, नियर सिंह सभा गुरूद्वारा, पखोवाल रोड़, लुधियाना में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की इस जीवन में हम छोटी - छोटी बहुत सी गलतियां करते है जिनकी वजह से हम लोग ईश्वर की नजरो में कही न कही गलत साबित होते है जिनसे हमारी छवि का निर्माण होता है।

महाराज श्री ने बताया की हमें अपनी लाइफ स्टाइल में थोड़ा सा चेंज लाना चाहिए कुछ भी बोलने से पहले हमें अच्छे से सुनना चाहिए उसके बाद सोच समझ कर कुछ बोलना चाहिए। क्यूंकि जो जीव सुनना सीख लेता है वो फालतू की बकवास बाते कभी नहीं करता। और युवाओं को पैसा खर्च करने से पहले सोचना चाहिए क्यूंकि आपके एक - एक रूपए की बहुत बड़ी कीमत है और वो कीमत हमें तब समझ में आती है जब हम पैसा खुद कमाते है। इसलिए हमें खर्च करने से पहले सोचना चाहिए।

महाराज श्री ने बताया की आज कल के युवा बहुत जल्दी किसी को बिना जाने उससे रिश्ते बना लेता है और फिर कुछ ही दिनों में उस रिश्ते से ऊब जाते है और रिश्ते तोड़ देते है। इसलिए कभी भी बहुत ज्यादा रिश्ते मत बनाइये रिश्ते बनाने से पहले उन्हें निभाने के बारे में सोचिये। क्यूंकि कोई भी रिश्ता बिना सहनशीलता के निभाया नहीं जाता।

पंडित जी ने बताया की आज का कलयुगी मनुष्य दुसरो के सुख को देख कर अपने आप को दुखी करता है क्यूंकि वो हमेशा अपने से बड़े पैसे वाले व्यक्ति के ऐशो आराम को देखता है और उसकी सुख सुविधाओं को देखकर अपने मन को दुखी करता है लेकिन आपको ये सोचना चाहिए की आप बहुत भाग्यशाली हो इसलिए भगवान ने आपको ये सब दिया है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है। भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए। अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है। श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।
श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

10Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 से 11 जुलाई 2019 तक प्रतिदिन करनैल सिंह नगर, अटल अपार्टमेंट, नियर सिंह सभा गुरूद्वारा, पखोवाल रोड़, लुधियाना में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

मानव जीवन का एकमात्र उद्देश्य धर्म की रक्षा होना चाहिए- पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

संतो का दर्शन और भगवान का सत्संग कलयुग में बहुत दुर्लभ है - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

हमारी इच्छाओं को नष्ट करता है सत्संग - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 से 11 जुलाई 2019 तक प्रतिदिन करनैल सिंह नगर, अटल अपार्टमेंट, नियर सिंह सभा गुरूद्वारा, पखोवाल रोड़, लुधियाना में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

कथा की शुरुआत में परम पूज्य स्वामी कृष्णानंद जी महाराज, पूज्य ओमकार दास जी महाराज एवं समाज सेवक श्री दीपक जी कथा पंडाल में पधारे और मंच से कथा श्रवण करने आये हुए भक्तों को अपने आशीर्वचन दिए।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की इस कलयुग में जीव के लिए दो चीजे असंभव होती जा रही है एक तो संतो का दर्शन और दूसरा भगवान का सत्संग और जिन्हे इस मृत्यु लोक पर संतो का दर्शन और भगवान की कथा सुनने का सौभाग्य प्राप्त हो जाए उस व्यक्ति को अपने आप को धन्य समझना चाहिए। क्यूंकि वही लोग ईश्वर के करीब होते है।

पण्डित जी ने बताया की मानव जीवन का एकमात्र उद्देश्य धर्म की रक्षा होनी चाहिए, और गौ माता पुरे विश्व की माँ है क्यूंकि गौ माता अपने आँचल का दूध हमें पुरे जीवन भर पिलाती है लेकिन उसके बाद भी कितने दुर्भाग्य की बात है की हम गौ रक्षा करने में असमर्थ है।

कथा व्यास जी ने मंदिर और सत्संग में अंतर बताते हुए कहा की मंदिर जाकर भगवान के दर्शन करने से हमारी सारी इच्छाएं पूरी होती है , लेकिन सत्संग में जाने के बाद हमारी इच्छाएं पैदा होनी ही बंद हो जाती है। इसलिए हमारे जीवन में हमें जहा कही भी सत्संग हो रहा हो उसे श्रवण करने जरूर जाना चाहिए।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

5Jul 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी सभी मनोरथो को पूर्ण करती है श्रीमद भागवत कथा - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी संस्कार संस्कृति और आदर्श सिखाती है भागवत -पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 से 11 जुलाई 2019 तक प्रतिदिन करनैल सिंह नगर, अटल अपार्टमेंट, नियर सिंह सभा गुरूद्वारा, पखोवाल रोड़, लुधियाना में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।

इस सृष्टि के सृजनकर्ता भगवान श्रीकृष्ण है-

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी सभी मनोरथो को पूर्ण करती है श्रीमद भागवत कथा - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी संस्कार संस्कृति और आदर्श सिखाती है भागवत -पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 से 11 जुलाई 2019 तक प्रतिदिन करनैल सिंह नगर, अटल अपार्टमेंट, नियर सिंह सभा गुरूद्वारा, पखोवाल रोड़, लुधियाना में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के प्रथम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। प्रथम दिवस के कथा की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने भागवत ग्रन्थ की शुरुआत कहा से हुई उसके बारे में कथा पंडाल में आये भक्तो को बताया साथ ही कथा की शुरुआत भागवत के प्रथम श्लोक से की और कहा की जो कृष्ण की भक्ति करते है उन्हें जीवन में कुछ और करने की आवश्यकता नहीं है क्यूंकि श्री कृष्ण उनके सभी दुखो को दूर कर देते है और अपने भक्तो को अपनी शरण में लेकर उनका बेडा पार करने का उन्हें वचन देते है। महाराज श्री ने बताया की इस संसार में सभी पापी है ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जिसने जीवन में जाने अनजाने में पाप ना किया हो। लेकिन अंत में जो श्री कृष्ण की शरण में जाते है श्री कृष्ण उनका कल्याण करते है। ठाकुर जी ने बताया की आज का कलयुगी मनुष्य बहुत आलसी हो गया है और भगवान से दूर होता जा रहा है। आज कल के मनुष्य को भजन करने से ज्यादा आनंद भोजन करने में आता है। व्यास जी ने बताया की आप जब कभी भी कथा पंडाल में आये तो अपने बच्चो को कथा श्रवण कराने के लिए जरूर लाये क्यूंकि भागवत आपके बच्चो को संस्कार संस्कृति और आदर्श सिखाती है। पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की प्रारम्भ में यह की भागवत का महात्यम क्या है ? एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। इस सांसारिक जीवन में जो कुछ भी प्राप्त किये हो सब किराए के मकान की तरह है। खाली करना ही पड़ेगा। व्यक्ति इस