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16Sep 2019

मोक्ष मिलना भागवत कृपा पर आधारित है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 13 से 19 सितंबर 2019 तक Hindu Temple Of Greater Chicago में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। पूज्य महाराज श्री ने कथा के तृतीय दिवस पर भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया। भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई । कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की मोक्ष मिलना भागवत कृपा पर आधारित है आप किसी एक साधन की मदद से प्राप्त मोक्ष की प्राप्ति नहीं कर सकते लेकिन अगर आपको मानव जन्म मिल जाए, जीवन में गुरु का संग मिल जाए और आपको उस ईश्वर को पाने की जिज्ञासा हो, ये तीन साधन अगर आपको मिल जाए तो आपके मोक्ष प्राप्ति के द्वार खुल जाते है। महाराज श्री ने बताया की आज के समय में लोगों को ईश्वर से मिलने की लालसा नहीं है बल्कि ईश्वर से पाने की लालसा है, हमें ईश्वर से प्रेम नहीं है, हमें जो ईश्वर से चाहिए उससे प्रेम है और यही हमारे जीवन में सबसे बड़ा दुःख का कारण है। मानव जीवन, गुरु का सानिध्य, ईश्वर से मिलने की तीव्र इच्छा आपके जीवन में जब ये तीनो चीजे एकत्रित हो जाए तो आप समझ लेना की ये मनुष्य जीवन हमारा आखिरी है और इसी जीवन में हमें सदगति प्राप्त हो जायेगी। महाराज श्री ने बताया की ये मानव शरीर ईश्वर के द्वारा हमें किराये के मकान की तरह दिया हुआ है अगर हम इसका ज्यादा गलत फायदा उठाएंगे तो भगवान हमसे ये मानव शरीर कभी भी खाली करा सकता है। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये... अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे। भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं। || राधे -राधे बोलना पड़ेगा ||

15Sep 2019

संतों का सानिध्य हृदय मे भगवान को बसा देता है।

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 13 से 19 सितंबर 2019 तक Hindu Temple Of Greater Chicago में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

महाराज श्री ने बताया की भागवत शब्द ब्रह्म है और जब आप भागवत श्रवण करते है तो इन शब्दों के माध्यम से ये आपके अन्ताकरण तक प्रविष्ठ होते है और हमारे अन्ताकरण को शुद्ध करते है। जब तक हमारा चित्त शुद्ध नहीं होगा तब तक हम भगवान को नहीं पा सकते।

संसारिक शब्द कही न कही हमें दूषित करते है संसार में फसाये रखते है, लेकिन जो भगवान के कथा रुपी शब्द है ये हमें संसार से मुक्त करते है।

भगवान ने हमपर बड़ी कृपा करके हमें ये मानव जीवन उपहार में दिया है ताकि हम यहां जन्म लेकर धर्म के कार्यो को करें, हरी की भक्ति करें और अपने जीवन के उद्देश्य को पूरा करें लेकिन मानव जीवन में जन्म लेने के बाद हम संस्कार में ही फस कर रह गए है।

महाराज श्री ने बताया की जिन लोगों के पूर्व जन्म के पाप हावी होते है वो उन्हें कथा श्रवण नहीं करने देते। लेकिन जिसके जीवन में श्याम न हो उसके जीवन में कभी आराम नहीं हो सकता। इसलिए हमें अपने कल्याण के लिए ईश्वर की भक्ति में अपना चित्त लगाना चाहिए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत वही अमर कथा है जोभगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकरआओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है।

माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन सेनहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं।

भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी।धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय मेभगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।

श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके सेअमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्तहोने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा।

तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुकआप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधताफिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जबआपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगाऔर नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

13Sep 2019

मानव जीवन तो ईश्वर से मिलने का प्रमुख द्वार है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 12 सितंबर 2019 तक Bharat Sevashram Sangha 3490 Route 27 Kendall Park New Jersey - 08824 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया। श्रीमद्भागवत कथा की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि हमें मानव जीवन इसलिए नहीं मिला है की हम इस संसार में जन्म लें, भोग विलासों को भोगे और फिर इस संसार को छोड़ कर चले जाए बल्कि मानव जीवन तो ईश्वर से मिलने का प्रमुख द्वार है। अगर हम इस मानव जीवन को यूँ ही व्यर्थ खो देंगे तो फिर जन्म जन्मांतर तक भटकने के सिवा हमारे हाथ कुछ नहीं लगेगा। सिर्फ मानव जीवन ही वही योनी है जिसमे हरी से मिलने का प्रयत्न किया जा सकता है किन्तु पुरे जीवन में मनुष्य अपने परिवार और जिम्मेदारियों के बीच में ही फंसे रह जाते है और अपने मानव जीवन के मुख्य उद्देश्य को भूल जाता है। भगवान आपको जन्म जन्मांतर के भव बंधनो से मुक्त करने का कार्य भगवान अपनी कृपा से करते है। भगवान के पुरूस्कार के बिना आपको मुक्ति नहीं मिल सकती। जीवन में भक्ति का पदार्पण, ज्ञान का पदार्पण, और किसी साधू की सेवा में आपका चित्त लग जाए ये सब आपको भगवान की किरपा से ही प्राप्त होता है। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की। ।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

14Sep 2019

जो व्यक्ति बिना किसी इच्छा के भागवत श्रवण करता है वो ठाकुर के श्री चरणों में स्थान प्राप्त करता है।

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 13 से 19 सितंबर 2019 तक Hindu Temple Of Greater Chicago में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

भागवत के प्रथम दिवस की शुरूआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के कथा की शुरूआत भागवत के प्रथम श्लोक से की
सच्चिदानन्द रूपाय विश्वोत्पत्यादि हेतवे तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयम नुमः
वासुदेव सुतं देवम् कंस चानुर मर्दनम् देवकी परमानंदम् कृष्णम् वंदे जगदगुरुम्।।

महाराज श्री ने बताया की जो जीव भागवत की शरण में आ जाता है समझो वो कृष्ण की शरण में आ गया है और उनका संरक्षण स्वयं श्री कृष्ण करते है, आप लोग इतने भाग्यशाली है की जिस कथा को देवराज इंद्र श्रवण नहीं कर पाए उसे आप इतनी सहजता से श्रवण कर रहें है।

महाराज श्री ने बताया की अमृत हमारे पुण्यो को नष्ट करता है और कथा अमृत हमारे पापों का नाश करता है, अमृत हमारी वासना बढ़ाता है और कथाअमृत हमारी उपासना को बढ़ाता है अगर आप सच्चे साधक हो तो आपको कथा से अवश्य प्रेम करना चाहिए।

महाराज श्री ने कथा श्रवण करने का लाभ बताते हुए कहा कि अगर दरिद्री व्यक्ति कथा सुनता है तो वो धनवान हो जाता है, रोगी व्यक्ति कथा श्रवण करें तो वो निरोगी काया प्राप्त करता है, पापी व्यक्ति कथा सुने तो वो निश्पाप हो जाता है, निसंतान व्यक्ति कथा सुने तो वो संतान प्राप्त कर लेता है और जो व्यक्ति बिना किसी इच्छा के भागवत श्रवण करता है वो ठाकुर के श्री चरणों में स्थान प्राप्त करता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार नैमिषारणय में सनकादिक ऋषि विराजमान थे तभी वहां परम श्रद्धेय सूद जी महाराज पधारे। जब सूद जी महाराज वहां पधारे तो उन्हें एक बहुत सुंदर आसन दिया और वहां पर उनको बैठाया। तो सभी ऋषियों ने सूद जी महाराज से ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा।

श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

12Sep 2019

शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है।

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 12 सितंबर 2019 तक Bharat Sevashram Sangha 3490 Route 27 Kendall Park New Jersey - 08824 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

महाराज श्री ने कथा की शुरुआत में श्रोताओं की श्रेणी के बारे में बात करते हुए बताया की कुछ श्रोता ऐसे होते है जो कथा तो श्रवण करते है लेकिन एक दिन सुनेंगे दूसरे दिन सुनेंगे लेकिन तीसरे दिन वो उस मार्ग से भटक जाएंगे और कथा श्रवण नहीं करेंगे।

लेकिन जो चातक श्रोता होते है उनका स्वभाव समुन्द्र के समान होता है जैसे समुन्द्र में कितनी भी नदियों का जल आकर उसमे मिल जाए समुन्द्र उस पानी को अपने अंदर समा लेता है और अपनी सीमा कभी नहीं लांगता। इसी प्रकार चातक श्रोता नियम से कथा का श्रवण करते है और वो भक्त भगवान की कथा के अलावा कुछ और श्रवण करना पसंद ही नहीं करते।

महाराज श्री ने हंस का उदहारण देते हुए कहा की हंस को भगवान् के द्वारा प्रकृति शक्ति प्राप्त है अगर आप हंस के सामने दूध में पानी मिलाकर उसे पीने के लिए देंगे तो हंस उसमे से सारा दूध पी जाएगा और पानी को छोड़ देगा उसी तरह दूसरी श्रेणी के श्रोताओं को होना चाहिए उनके आस पास जहाँ -जहां भगवान की कथा हो रही हो उन्हें कथा पंडाल में कथा श्रवण करने के लिए जरूर जाना चाहिए।

महाराज श्री ने तीसरी श्रेणी के श्रोता के बारे में बताते हुए कहा की तीसरी श्रेणी का श्रोता तोते के समान होता है उसे जो व्यक्ति जितना सीखा दे वो उतना ही बोलता है। जब तक पंडाल में कथा श्रवण करते है भगवान की भक्ति में लीन रहते है भगवान् की भक्ति करते है लेकिन जैसे ही कथा पंडाल से बाहर जाते है तो अभक्त हो जाते है।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है।

महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया।
ये बस स्वार्थ हैं।

दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं।

श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

11Sep 2019

जिनके दिलों में निर्मलता होती है ईश्वर उन्ही को प्राप्त होते है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 12 सितंबर 2019 तक Bharat Sevashram Sangha 3490 Route 27 Kendall Park New Jersey - 08824 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की गोविंद की अहित की कृपा के बिना हमें भागवत श्रवण का सौभाग्य प्राप्त नहीं होता।

महाराज श्री ने बताया की ये सम्पूर्ण संसार स्वार्थ से भरा हुआ है, जब तक लोगों की आपसे जरूरते पूरी होती रहेंगी तब तक लोग आपके साथ है लेकिन जैसे ही आपका बुरा समय आएगा तो आपका साथ कोई नहीं देगा सब आपका साथ छोड़ कर चले जाएंगे हमारे बुरे समय में बस हमारे गोविन्द ही हमे सहारा देते है।

महाराज श्री ने बताया की भक्ति के पथ पर हमें सदैव अकेला ही चलना पड़ता है अगर आप अपना कल्याण चाहते हो तो आपको ये नहीं सोचना है कि आपके साथ कौन है आपको बस ये देखना है की मैं जिस गोविन्द के साथ के लिए इस मार्ग पर आया हु उसका साथ मेरे साथ है या नहीं।

महाराज श्री ने बताया की जिनके दिलों में निर्मलता होती है ईश्वर उन्ही को प्राप्त होते है जैसे बच्चो के हृदय, उनके दिल एक दम पाक साफ़ होते है इसलिए उन्हें भगवान का स्वरुप भी कहा जाता है।

इसलिए बच्चों को बचपन से ही भक्ति पथ पर चलना चाहिए। क्यूंकि भक्ति करने की कोई उम्र नहीं होती और अगर वो बचपन से ही होने हृदय में ठाकुर को बसा लेंगे तो उनका जीवन उद्धार निश्चित है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

10Sep 2019

कथा श्रवण करने जाना ही परम सौभाग्य है।

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 12 सितंबर 2019 तक Bharat Sevashram Sangha 3490 Route 27 Kendall Park New Jersey - 08824 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि कथा श्रवण करना जाना ही परम सौभाग्य है, जो लोग भक्ति करने जाएंगे तो उसकी परीक्षाएं तो होंगी है लेकिन आपको उस परीक्षा से भागना नहीं है बल्कि उसका डट कर उनका सामना करना है।

महाराज श्री ने बताया की श्रीमद भागवत महापुराण को श्रवण करने से हमारे जन्म जन्मांतर के अग समाप्त हो जाते है, पाप और अग में बहुत अंतर है क्यूंकि पाप वो होते है जो संसार में हम करते है और किसी तीर्थ स्थान पर जाने के बाद उन पापो की समाप्ति हो जाती है लेकिन तीर्थ स्थानों पर हमसे हुई भूल या पापो को अग कहते है जिनकी समाप्ति कथा श्रवण से ही होती है।

श्रीमद्भागवत कथा ईश्वर को प्राप्त करने का मार्ग है और हमें ईश्वर को प्राप्त करने के लिए इस मार्ग पर अवश्य चलना चाहिए क्यूंकि यही हमारे जीवन का उद्देश्य है।

महाराज श्री ने बताया की किसान और कृष्ण में कोई ज्यादा अंतर नहीं है, कृष्ण कर्म करने का उपदेश देते है इसलिए हमें देवी देवताओं के साथ किसानो का भी आदर सम्मान करना चाहिए क्यूंकि बड़ी मेहनत से किसान खेती करके अन्न एवं फसल पैदा करते है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली ने भगवान ब्रह्मा वरदान मांगा की मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने उसे वरदान दे दिया। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने विष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली से कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"

जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"

भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया। इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का सुंदर वर्णन श्रवण कराया। सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

7Sep 2019

ईश्वर को जानने की जिज्ञासा ही विश्व में सबसे सुंदर है ।

ईश्वर को जानने की जिज्ञासा ही विश्व में सबसे सुंदर है -पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 12 सितंबर 2019 तक Bharat Sevashram Sangha 3490 Route 27 Kendall Park New Jersey - 08824 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

श्रीमद्भागवत कथा की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान की असीम कृपा से इस सृष्टि का सृजन हुआ है उन्ही के दवारा इस दुनिया का पालन पोषण होता है और समय आने पर वही इस सृष्टि का संघार भी करते है।

महाराज श्री ने बताया की भगवान की अद्भुत लीलाओं का वर्णन श्रीमद भागवत कथा है, ये कथा देयिक, दैविक और भौतिक तापो का नाश करने वाली है जो जीव श्रीमद भागवत कथा से अपना चित्त लगता है ये कथा उसको मोक्ष प्राप्त कराती है।

महाराज श्री ने बताया की लोगों के दिल में अपने और अपने परिवार को विकसित करने के लिए भिन्न- भिन्न प्रकार की इच्छा होती है और इच्छाएं ही वो चीज है जो कभी ख़त्म नहीं होती लेकिन जिस दिन जीव के अंदर ईश्वर को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हो जाती है उस दिन उसका कल्याण होना शुरू हो जाता है क्यूंकि ईश्वर के बारे में जानने वाले व्यक्ति का हरी से मिलना तय है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार नैमिषारणय में सनकादिक ऋषि विराजमान थे तभी वहां परम श्रद्धेय सूद जी महाराज पधारे। जब सूद जी महाराज वहां पधारे तो उन्हें एक बहुत सुंदर आसन दिया और वहां पर उनको बैठाया। तो सभी ऋषियों ने सूद जी महाराज से ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा।

श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

8Sep 2019

कथा का अमृतपान करने से आपके पाप नष्ट होते हैं।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 12 सितंबर 2019 तक Bharat Sevashram Sangha 3490 Route 27 Kendall Park New Jersey - 08824 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की कई लोग कहते है की हमारे शास्त्रों और ऋषि मुनियों के द्वारा बताये गए भक्ति के मार्ग एवं साधनो का पालन करने के बाद भी हमें ईश्वर की प्राप्ति क्यों नहीं होती ? महाराज श्री ने बहुत ही सुन्दर जवाब देते हुए बताया की हमें ईश्वर की प्राप्ति इसलिए नहीं होती क्यूंकि हम ईश्वर को पाने वाले मार्ग पर अपने आप को पूर्णता समर्पण किये बिना ही छोड़ देते है। इसलिए हमारे हाथ असफलता लगती है,जब तक आप परमात्मा में विलीन नहीं होंगे तब तक आपकी ये यात्रा मंगलमय नहीं होगी।

महाराज श्री ने बताया की जब तक आप अपने शरीर में अहमता और रिश्तो में ममता से छुटकारा नहीं पा लेंगे तब तक आपको हरी मिलन का आनंद प्राप्त नहीं होगा।

महाराज श्री ने अमृत और कथा अमृत में अंतर बताते हुए कहा की अमृत आपके पुण्य नष्ट करता है और कथा अमृत आपके पापो को नष्ट करता है।


पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है।

भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।

श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।

यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

9Sep 2019

इस संसार में केवल एक चीज निश्चित है, जन्म लेने के बाद मृत्यु।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 12 सितंबर 2019 तक Bharat Sevashram Sangha 3490 Route 27 Ken dall Park New Jersey - 08824 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। पूज्य महाराज श्री ने कथा के तृतीय दिवस पर भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया। भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि इस संसार में आपको जो भी चीजें प्राप्त है या फिर आने वाले समय में आपको जो भी प्राप्त होगा वो सब अनफिक्स है लेकिन इस संसार में जन्म लेने के बाद आपकी मृत्यु तय है। महाराज श्री ने बताया की हम सभी का जन्म एक ही तरीके से होता है, लेकिन हमारी मृत्यु एक तरह से नहीं होती किसी को बहुत सुंदर मौत नसीब होती है और कोई बड़ी दुःख दायी मौत मरता है व्यास जी ने बताया की हमारे जीवन की यात्रा का अंत जीवन की आखरी मंजिल मृत्यु ही है। महाराज श्री ने बताया की मृत्यु को अच्छा बनाने के लिए पूरा जीवन जिया जाता है क्यूंकि जिनकी मृत्यु अच्छी होती है उनका अगला जन्म नहीं होता वो ईश्वर के धाम को प्राप्त करते है और जिनकी मृत्यु बुरी होती है उनका फिर से पुनर्जन्म होता है। शास्त्रों में लिखा है की अंत में मरने वाले की जैसी मती होती है उसकी दूसरे जीवन में वैसी चित्त शुद्धि होती है क्यूंकि जिनका चित्त शुध्द होता है उनकी मुक्ति निश्चित होती है और जिनका चित्त शुद्ध नहीं होता वो फिर से पुनर्जन्म के बंधन में फस जाते है। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये... अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे। भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

6Sep 2019

संत वो महापुरुष होते है जो आपके ऊपर बिना किसी वजह के कृपा करते है।

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 30 अगस्त से 05 सितंबर 2019 तक Shiv Shakti Peeth 264-12 Hillside Avenue Queens, New York 11004 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया। श्रीमद्भागवत कथा की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि संतो का हृदय माखन समान होता है और संत वो होते है जो आपमें आपके अवगुणो की बजाए आपके गुण देखते है। साथ ही बताया की भगवान आपके ऊपर किसी न किसी वजह से कृपा करते है लेकिन संत वो महापुरुष होते है जो आपके ऊपर बिना किसी वजह के कृपा करते है। महाराज श्री ने भक्तो से प्रश्न करते हुए पूछा की आखिर जिस भगवान की हम इतनी पूजा करते है उनकी इतनी सेवा करते है तो उन्हें बार-बार पृथ्वी पर क्यों आना पड़ता है ? उसके बाद उन्होंने भक्तों को बताया की जब -जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है तो भगवान को धर्म की स्थापना करने और अधर्म का विनाश करने के लिए पृथ्वी पर अवतार लेना पड़ता है। महाराज श्री ने कहा की हमें हमेशा धर्म की रक्षा करनी चाहिए और धर्म को आगे बढ़ाने के लिए हमें रोजाना मंदिरो में जाना चाहिए, संतो की सेवा करनी चाहिए ,शास्त्रों के माध्यम से ब्राह्मणो द्वारा बताये गए मार्ग पर चलना चाहिए। लेकिन हम शास्त्रों द्वारा बताये रास्तो पर चलने के बजाए अपनी मनमानी करते है और यही कारण है जिससे अधर्म बढ़ता है इसलिए हमें अपने मन के मुताबिक नहीं बल्कि शास्त्रों के मुताबिक चलना है। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की। ।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

5Sep 2019

बुरे वक्त में केवल भगवान आपका सहारा बनते हैं।

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 30 अगस्त से 05 सितंबर 2019 तक Shiv Shakti Peeth 264-12 Hillside Avenue Queens, New York 11004 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीमद्भागवत कथा की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत में बताया की आज कल के जीव अपने ऊपर थोड़ी सी परेशानी आने पर ही परेशान हो जाते है, लेकिन हमें इन परिस्थतियों से घबराना नहीं चाहिए बल्कि इनका डट कर सामना करना चाहिए क्यूंकि समय के द्वारा हमें जब परेशानिया भोगनी पड़ती है तो इसका मतलब ये है की इस परेशानी के द्वारा हमारे कुछ कर्म भी कट रहें है और भगवान आपको पुनः चलने का एक नया मार्ग दिखा रहें है।

महाराज श्री ने बताया की जब आपका समय विचित्र हो तब सिर्फ ईश्वर ही आपका साथ देते है, क्यूंकि ये संसार बड़ा मतलबी है आपके बुरे समय में सब आपका साथ छोड़ देंगे लेकिन भगवान आपका साथ कभी नहीं छोड़ते वो हमेशा आपके साथ रहते है जब - जब आपको उनकी जरूरत पड़ती है।

महाराज श्री ने बताया की भगवान को अहंकार पसंद नहीं है, लेकिन आज का कलयुगी जीव अगर उसे थोड़ा बहुत धन प्राप्त हो जाए और कुछ लोग उसकी इज्जत करने लगें तो उस व्यक्ति को अपने ऊपर घमंड हो जाता है। लेकिन वो मुर्ख ये नहीं जानता की ये सब उसे ईश्वर का दिया हुआ है उसका खुद का कमाया हुआ कुछ नहीं है। ये सब हमें हमारे पूर्व जन्म के कर्मो के अनुसार प्राप्त होता है।

महाराज श्री ने कहा की जिन लोगों को ईश्वर के बारे में जानने की जिज्ञासा होती है उन लोगों को ईश्वर की प्राप्ति होती है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया।

ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे।

अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

5Sep 2019

जिन पंच तत्वों से आपका ये शरीर बना हुआ है उन पंच तत्वों का आधार भगवान ही है।

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 30 अगस्त से 05 सितंबर 2019 तक Shiv Shakti Peeth 264-12 Hillside Avenue Queens, New York 11004 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान हर जगह मौजूद है, महाराज श्री ने भगवान के नाम की व्याख्या करते हुए बताया की भ का अर्थ है भूमि, ग का अर्थ है गगन, वा का अर्थ है वायु, चौथा अक्षर है अ जिसका अर्थ है अग्नि और आखरी अक्सर है न जिसका अर्थ है नीर। जब आप भगवान के नाम का अर्थ खोजने की कोशिश करेंगे तो आपको ज्ञात होगा की जिन पंच तत्वों से आपका ये शरीर बना हुआ है उन पंच तत्वों का आधार भगवान ही है।

महाराज श्री ने बताया की पंच तत्वों से हमारा ये शरीर बना हुआ है और इसमें ईश्वर ही समाये हुए है, इसका मतलब है की भगवान हर जगह वास करते है। और अगर इन पंच तत्वों में से हमें कोई एक भी तत्व नहीं मिला तो हम उसके बिना जीवित नहीं रह पाएंगे। 
महाराज श्री ने बताया की इन पांच तत्वों में भगवान की सत्ता है और इन्ही पांच तत्वों की वजह से हमारा जीवन चलता है और अगर हमें ये पांच चीजे ना मिले तो इनके बिना हमारा जीवन शून्य है।

महाराज श्री ने बताया की जो भगवान के सच्चे भक्त होते है वो भगवान से कुछ मांगते नहीं है वो तो बस भगवान से मिलने की इच्छा रखते है, उन्हें अपने शरीर से कोई प्यार नहीं होता क्यूंकि ये शरीर भगवान से मिलने का साधन है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

3Sep 2019

महाराज श्री ने बताया की हमें अपने बड़ो के सामने हमेशा पर्दा करना चाहिए क्यूंकि पर्दा किसी से छुपने के लिए नहीं बल्कि बड़ो के सम्मान के लिए होता है।

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 30 अगस्त से 05 सितंबर 2019 तक Shiv Shakti Peeth 264-12 Hillside Avenue Queens, New York 11004 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

कथा के चतुर्थ दिवस पर भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की सभी माँ- बाप अपने बच्चो की ख़ुशी के लिए दिन-रात महनत करते है ताकि उनके बच्चों के जीवन में कोई कठिनाई न आये और वो ख़ुशी ख़ुशी अपना जीवन व्यतीत करे लेकिन अगर आपके बच्चो की किस्मत में वो ख़ुशी होगी ही नहीं तो क्या वह ख़ुशी उन्हें मिल पाएगी और अगर उनके भाग्य में ख़ुशी है तो क्या उन्हें आपकी इस मेहनत का इंतज़ार रहेगा।

महाराज श्री ने बताया की हम जब कभी भी मंदिर में जाए जो अपना सिर ढक लें साथ ही माता बहनो से निवेदन किया की भगवान् शिव जी का अभिषेख कभी भी खुले बालों में ना करें,और भगवान की प्रतिमा को कभी पीठ न दिखाएँ एवं पूजा करते समय अपने बालों को बाँध कर रखें।

महाराज श्री ने बताया की हमें अपने बड़ो के सामने हमेशा पर्दा करना चाहिए क्यूंकि पर्दा किसी से छुपने के लिए नहीं बल्कि बड़ो के सम्मान के लिए होता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था।

महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।

शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया।

पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे। महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।" जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था।

वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया।

वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया। इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

1Sep 2019

जन्म जन्मांतर के पुण्य जब एकत्रित होते हैं, तब कही जीव को जाकर सत्संग की प्राप्ति होती है।

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 30 अगस्त से 05 सितंबर 2019 तक Shiv Shakti Peeth 264-12 Hillside Avenue Queens, New York 11004 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। 
श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। 
भागवत के द्वितीय दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए "भजन बिना बावरा" भजन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज जी बताया की सत्संग की प्राप्ति कैसे करें। जन्म जन्मांतर के पुण्यों का जब सग्रह होता है जन्म जन्मांतर के पुण्य जब एकत्रित होते है। तब कही जीव को जाकर सत्संग की प्राप्ति होती है। सत्संग ऐसे ही नहीं मिल जाता। रामायण में भी सत्संग का बहुत बड़ा महत्व है। गोस्वामी तुलसीदास ने भी लिखा है। भाग्य में न जाने कितने सुख और दुःख आये है। पुण्य के जब सग्रह हो, एकत्रित करण हो तब बहुत कृपा करके सत्संग प्राप्त होता है। हम भवसागर से पार हो जाते है। इतना सरल है सत्संग, इतना दिव्य है सत्संग, सत्संग में भी श्रीमद भगवात श्रावण करने को मिल जाये तो हमारे भाग्य खुल जाते है। जब कोई भी जीव श्रीमद भागवत कथा सुनता है। तो पितृ नाचते हुए झूमते है। और एक दूसरे को बताते है की हम भाग्यशाली है। क्यों हमारे जो वंश है वो भागवत कथा सुनने के लिए है। अगर वो भागवत कथा सुनेगे तो आपको क्या लाभ मिलेगा ? भागवत जब सुनते है तो उनका किया हुआ सुकृत हम तक पहुंच जाएगी। हमें मुक्ति मिल जाएगी। महाराज जी कहा की कथा सुनने के लिए आप यह आये इससे आपके बुरा भला आप तक सिमित नहीं है आपके और हमारे पितरों तक ये लाभ जायेगा। कब जायेगा जब हम भागवत में ध्यान लगाकर सुनेगे। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओं का गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। 
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
#Usakatha #Usakatha2019 #ShantiSandeshYatra2019

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

2Sep 2019

“धार्मिक शिक्षा आपको अंधेरे से प्रकाश की ओर लेकर जाती है” पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

“धार्मिक शिक्षा आपको अंधेरे से प्रकाश की ओर लेकर जाती है”

विश्व शांति सेवा मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 30 अगस्त से 05 सितंबर 2019 तक Shiv Shakti Peeth 264-12 Hillside Avenue Queens, New York 11004 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

पूज्य महाराज श्री ने कथा के तृतीय दिवस पर भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि धार्मिक शिक्षा आपको अंधेरे से प्रकाश की ओर लेकर जाती है। धार्मिक शिक्षा हमारे जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है इसलिए उसका आदर करें।

महाराज श्री ने कहा कि आप कथा में आते हैं अगर आपको कथा का एक शब्द भी आ गया तो आपका जीवन बदल सकता है। आपने जब कुछ सीखा तभी आप इंजिनियर, डॉक्टर बने हैं, आप यहां कुछ सीखेंगे तो अच्छे इंसान भी बनेंगे। सत्संग एक ऐसी यूनिवर्सिटी है जहां अच्छे इंसान बनाए जाते हैं, इससे इसिलिए जुड़ते हैं ताकी अच्छे मानव बन सकें। वो लोग भाग्यशाली हैं जो इससे जुड़ते हैं, केवल भाग्यशाली ही नहीं बल्कि वो यहां से सीखते भी हैं।

महाराज श्री ने कहा कि बहुत लोग पूछते हैं हमारा कल कैसा होगा ? कल की चिंता मत करो जो कुछ कर रहे हो आज करो, वही तुम्हारा कल है, आज बीज है तो कल फसल है। महाराज श्री ने कहा कि जब हम स्कूल में पढ़ते हैं तो एक साल की पढ़ाई के बाद, कड़ी मेहनत करने के बाद हमें हमारा परिणाम पता चलता है लेकिन वहीं भक्ति की बात करें तो लोग सोचते हैं की हम आज माला करें और कल भगवान हमें प्रकट होकर दर्शन दे दें।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।

राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

30Aug 2019

"जो जीव भागवत श्रवण करते है उन्हें भागवत सहज ही प्रेम भक्ति का दान देती है" || श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

"जो जीव भागवत श्रवण करते है उन्हें भागवत सहज ही प्रेम भक्ति का दान देती है"

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन यूएसए के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 30 अगस्त से 05 सितंबर 2019 तक Shiv Shakti Peeth, New York 11004 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

श्रीमद्भागवत कथा की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के कथा की शुरूआत भागवत के प्रथम श्लोक से की
सच्चिदानन्द रूपाय विश्वोत्पत्यादि हेतवे तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयम नुमः 
वासुदेव सुतं देवम् कंस चानुर मर्दनम् देवकी परमानंदम् कृष्णम् वंदे जगदगुरुम्।।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की कई लोगों को ऐसा अजीर्ण हो जाता है की वो अगर एक ही काम बार- बार करते है तो उनके मन में ये विचार आता है की एक ही काम हम बार- बार कब तक करते रहेंगे और फिर उसका मन उस काम को करने में नहीं लगता। वैसे ही लोगों की रूचि भागवत कथा में कम होने लगती है और वो सोचते है की कथा पहले ही हमने सुनी हुई है तो अब बार बार कथा सुनने से क्या मिलेगा?

लेकिन वेद व्यास जी महाराज ने शास्त्रों में ये लिखा है की आप जब तक जीवित रहें श्रीमद भागवत रस अमृत का रसपान करते रहें क्यूंकि जब आप निरंतर श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करेंगे तो आपके हृदय में प्रेम भक्ति जाग्रित होगी। मनुष्य जीवन में अगर हमें ईश्वर से प्रेम हो जाए तो मानव जीवन में इससे बड़ी कोई बात नहीं है और श्रीमद भागवत कथा आपको प्रेम भक्ति का दान देती है।

जो जीव भागवत श्रवण करते है उन्हें भागवत सहज ही प्रेम भक्ति का दान देती है, क्यूंकि श्रीमद भागवत श्रवण का फल ही प्रेम भक्ति है। भागवत श्रवण मात्र से ही आपको कृष्ण की प्रेम भक्ति प्राप्त हो जाती है। 
महाराज श्री ने कहा कि भगवान् की कथा आपको चिंता मुक्त कर देती है, भागवत श्रवण करते रहना हमारे जीवन का महत्वपूर्ण भाग है इस दुनिया में आने के बाद हम अपने परिवार और प्रियजनों के लिए तो बहुत महनत करते है भागा- दौड़ी करते है लेकिन हमे अपने कल्याण के बारे में भी सोचना चाहिए इसलिए हमें अपनी दिनचर्या में भागवत श्रवण जरूर करनी चाहिए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार नैमिषारणय में सनकादिक ऋषि विराजमान थे तभी वहां परम श्रद्धेय सूद जी महाराज पधारे। जब सूद जी महाराज वहां पधारे तो उन्हें एक बहुत सुंदर आसन दिया और वहां पर उनको बैठाया। तो सभी ऋषियों ने सूद जी महाराज से ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

29Aug 2019

आज सुबह यूएसए के समय अनुसार पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज एवं श्री विजय शर्मा जी यूएसए पहुंचे, यहाँ भक्तों ने महाराज श्री का स्वागत किया।

आज सुबह यूएसए के समय अनुसार पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज एवं श्री विजय शर्मा जी यूएसए पहुंचे, यहाँ भक्तों ने महाराज श्री का स्वागत किया। लगभग 45 दिनो की इस शांति संदेश यात्रा में श्रीमद् भागवत कथा, श्री राम कथा, श्री कृष्ण कथा एवं शिव कथा का आयोजन किया जाएगा। 30 अगस्त 2019 से प्रथम श्रीमद भागवत कथा का आयोजन न्यूयार्क में किया जाएगा।
#ShantiSandeshYatra

 

28Aug 2019

आज पूज्य पिताश्री की दूसरी पुण्यतिथि के अवसर पर ठाकुर श्री प्रियाकांत जू प्रांगण में स्वर्गीय पिता जी की मूर्ति पर माल्यार्पण कर आशीर्वाद प्राप्त किया। इस दौरान ब्राहम्णो द्वारा अखंड पाठ किया गया एवं विधि-विधान के साथ पूजा अर्चना की गई।

आज पूज्य पिताश्री की दूसरी पुण्यतिथि के अवसर पर ठाकुर श्री प्रियाकांत जू प्रांगण में स्वर्गीय पिता जी की मूर्ति पर माल्यार्पण कर आशीर्वाद प्राप्त किया। इस दौरान ब्राहम्णो द्वारा अखंड पाठ किया गया एवं विधि-विधान के साथ पूजा अर्चना की गई, इस अवसर पर भंडारे का आयोजन किया गया। साथ ही ब्राहम्णो को भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा देकर विदाई दी गई।

29Aug 2019

राधे राधे,पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज एवं श्री विजय शर्मा जी शांति संदेश यात्रा के माध्यम से यूएसए के विभिन्न शहरों में होने जा रही श्रीमद्भागवत कथा, श्री राम कथा, श्री कृष्ण कथा एवं शिव कथा के लिए यूएसए रवाना हुए।

राधे राधे,पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज एवं श्री विजय शर्मा जी शांति संदेश यात्रा के माध्यम से यूएसए के विभिन्न शहरों में होने जा रही श्रीमद्भागवत कथा, श्री राम कथा, श्री कृष्ण कथा एवं शिव कथा के लिए यूएसए रवाना हुए। कथाओं का आयोजन 30 अगस्त से 12 अक्टूबर तक किया जाएगा। यूएसए रवाना होने से पूर्व ठा. श्री प्रियाकांत जू भगवान और बांके बिहारी जी के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। राधे राधे।। #ShantiSandeshYatra । #Thakur_Ji #Priyakant_Ju_Mandir#Vrindavan

 

24Aug 2019

वृंदावन में श्रीकृष्ण #जन्माष्टमी के पावन पर्व पर मुख्य यजमान श्रीमती मोहिनी देवी एवं श्री सुरेश चंद्र गोयल जी के द्वारा सपरिवार हवन पूजन किया गया। 

आज शांति सेवा धाम, वृंदावन में श्रीकृष्ण #जन्माष्टमी के पावन पर्व पर मुख्य यजमान श्रीमती मोहिनी देवी एवं श्री सुरेश चंद्र गोयल जी के द्वारा सपरिवार हवन पूजन किया गया। 
#JanmashtmiWithPriyakantJu

25Aug 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने शांति संदेश की शुरूआत करते हुए कहा कि कोई भी कार्य अगर तरीके से किया जाए तो उसका लाभ मिलता है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के पावन सानिध्य में शांति सेवा धाम, वृंदावन में युवा शांति संदेश का आयोजन किया गया। शांति संदेश में सैकड़ों की संख्या में युवा शामिल हुए।

कार्यक्रम की शुरूआत विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने शांति संदेश की शुरूआत करते हुए कहा कि कोई भी कार्य अगर तरीके से किया जाए तो उसका लाभ मिलता है। आजकल कई महानुभाव कहते हैं की व्रत की आवश्यकता क्या है ? परमात्मा परमेश्वर बिना किसी साधन व्रत के बिना मिलते नहीं है, कोई ना कोई साधन व्रत तो करना ही पड़ेगा। जिन्हें सिर्फ पेट की चिंता रहती है वो सिर्फ बहाने बनाते हैं की व्रत करके क्या होगा ? महाराज श्री ने बताया की कृष्ण जन्माष्टमी पर रात 12 बजे तक व्रत का पालन करना चाहिए, व्रत में बिल्कुल झूठ नहीं बोलना चाहिए, ज्यादा से ज्यादा भजन करना चाहिए और प्रभु से प्रार्थना करनी चाहिए।

महाराज श्री ने आगे कहा कि जो भी कृष्ण के भक्तों हो वो प्रेम पूर्वक सारे साधन और नियम व्रत करें जिन साधनों से परमात्मा की प्राप्ति हो सकती हो। हम सबको सबसे पहले 5 मिनट तक कीर्तन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि कृष्ण को मानना और कृष्ण की मानना दोनों अलग बात है। अगर हमको जीवन आनंदित करना है तो कृष्ण के साथ साथ कृष्ण की भी माननी पड़ेगी। आजकल व्यक्ति जो मन में आता है उसे ही धर्म समझ लेता है।

महाराज श्री ने कहा कि जब भी किसी का जन्मदिन हो तो उसदिन ना तो मोम्बत्ती जलाएं और ना ही बुझाएं, उसके बदले आप भगवान के आगे अपनी उम्र के बराबर देशी घी के दीपक जलाएं। आज भगवान श्रीकृष्ण का 5247वां जन्मोत्सव है तो आज आप कम से कम 9 या 11 घी के दीपक अपने घर में पूजा के समय अवश्य जलाएं। कहते हैं त्मसो मा ज्योतिर्गमय यानि अंधकार से प्रकाश की और चलो।

युवा शांति संदेश में मंच का संचालन विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी द्वारा किया गया, उन्होंने ट्रस्ट से जुड़ी कई जानकारी लोगों को दी।

24Aug 2019

आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर शांति सेवा धाम, वृंदावन में सैकड़ों की संख्या में भक्तों ने पूज्य महाराज श्री से गुरू दीक्षा प्राप्त की।

आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर शांति सेवा धाम, वृंदावन में सैकड़ों की संख्या में भक्तों ने पूज्य महाराज श्री से गुरू दीक्षा प्राप्त की। गुरू दीक्षा प्राप्त करने के पश्चयात सभी भक्तों ने महाराज श्री के आशीष वचनों पर अमल कर सच्चाई के पथ पर चलने और अपनी संस्कृत, संस्कृति और संस्कारों को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।#JanmashtmiWithPriyakantJu

24Aug 2019

16 कलाओं में निपुण थे भगवान श्रीकृष्ण

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 24 अगस्त 2019 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का ठा. प्रियाकांत जू मंदिर, शांति सेवा धाम, वृंदावन में भव्य आयोजन किया गया। महोत्सव की शुरूआत महाराज श्री द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ की गई। कथा पंडाल में हजारों की संख्या में आए भक्तो ने कन्हैया के आने की खुशियां मनाई। 
श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव की शुरुआत बाल कृष्ण आरती के साथ विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में ठाकुर श्री प ठा. प्रियाकांत जू मंदिर में जन्माष्टमी महोत्सव की शुरुआत बहुत ही सुन्दर बाल रूप श्री राधा के द्वारा दी हुई प्रस्तुति से हुई जिसने सभी श्रद्धालुओं का मन मोह लिया।

विश्व शान्ति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट की के द्वारा श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव की शुरुआत में भाजपा के वरिष्ठ नेता, पूर्व केंद्रीय मंत्री, प्रख्यात वक़ील श्री अरुण जेटली जी के निधन पर महाराज श्री ने सभी श्रद्धालुओं के साथ एक मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी एवं ठा. श्री प्रियाकांत जू उन्हें अपने श्री चरणों मे स्थान दें ऐसी प्रार्थना की।

महोत्सव की शुरुआत में महाराज श्री ने भगवान श्याम सुंदर की 16 कलाओं के बारे में सभी भक्तों को विस्तार से बताया।

पूज्य महाराज श्री देवकीननंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में ठाकुर श्री प्रियाकांत जू मंदिर में बड़ी धूम धाम से श्री कृष्ण प्राकट्योत्सव मनाया गया इस उत्सव में देश- विदेश से आए लाखों श्रद्धालुओं ने श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव में भगवान प्रियाकांत जू के चरणों में अपनी हाजरी लगाई। एवं महाराज श्री के मुखाबिंद से निकले कृष्ण भजनों पर भक्त खूब झूमे और कृष्ण के जन्म की खुशियां मनाई। रंगारंग रोशनी में चमक रहे ठा. प्रियाकांत जू मंदिर की भव्यता भी मन मोह रही थी। इस मौके पर ठाकुर श्री प्रियाकांत जू मंदिर में विशेष सजावट की गई है।

पूज्य महाराज श्री द्वारा ठा. प्रियाकांत जू मंदिर में बाल गोपाल का अभिषेक किया गया और 108 श्रीमद्भावत कथा के मुख्य यजमान श्रीमती एवं श्री सुरेश चंद्र जी व् समस्त यजमानों के द्वारा भी बाल गोपाल का मंत्रोचारण के साथ अभिषेक किया गया उसके बाद सोने का मुकुट, लकुट व् बंशी कन्हैया को धारण कराई गई एवं जन्माष्टमी आयोजन में उपस्थित सभी कृष्ण भक्तों के द्वारा महाआरती की गई। नन्दोत्सव के अवसर पर मंदिर के कपाट खुलने पर, कान्हा के जन्म की खुशी में खिलौने, वस्त्र, रुपये, मिठाई, फल, मेवा लुटाए गए। पूज्य महाराज श्री के साथ देर रात तक चले भजनों में हर कोई उल्लास में डूबा रहा।

#JanmashtamiMahotsav2019 #JanmashtamiWithThakurJi #Vrindavan

19Aug 2019

आज 108 श्रीमद्भभागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के तृतीय दिवस पर कथा पंडाल में मूलक पीठाधीश्वर स्वामी श्री राजेंद्र दास देवाचार्य जी महाराज ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई, संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

आज 108 श्रीमद्भभागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के तृतीय दिवस पर कथा पंडाल में मूलक पीठाधीश्वर स्वामी श्री राजेंद्र दास देवाचार्य जी महाराज ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई, संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। महाराज श्री ने अपने श्रीवचनों से भक्तों को अलंकृत किया। इसके अलवा महाराज श्री ने ठा. श्री प्रियाकांत जू भगवान के दर्शन कर आशीर्वाद भी प्राप्त किया। #JanmasthamiMahotsav

19Aug 2019

“बिना सोचे समझे किसी की बात पर विश्वास ना करें : विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 17 से 24 अगस्त 2019 तक प्रतिदिन सुबह 9:30 बजे से विश्व शांति सेवा धाम, वृंदावन में 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

“बिना सोचे समझे किसी की बात पर विश्वास ना करें : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

“ऐसा कर्म किजिए जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 17 से 24 अगस्त 2019 तक प्रतिदिन सुबह 9:30 बजे से विश्व शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड, वृंदावन में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

तृतीय दिवस पर कथा पंडाल में मूलक पीठाधीश्वर स्वामी श्री राजेंद्र दास देवाचार्य जी महाराज ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई, संस्था की और से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। महाराज श्री ने अपने श्रीवचनों से भक्तों को अलंकृत भी किया
पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि वेद व्यास जी ने बहुत ही बड़ा अनुग्रह करके यह कथा हम सब के लिए प्रस्तुत की है। वरना आजकल हमारे पास समय ही कहां है अपने कल्याण के विषय में सोचने का, जीव अपना ही अनर्थ कर रहा है। संसार के अल्पज्ञान के चक्कर में अपना विनाश किए जा रहा है। इस संसार में जहां जहां आप गए, जोभी व्यक्ति आपके जीवन में आया सबने आपको ज्ञान दिया और आपने लिया। वो ज्ञान आपने पाने की कोशिश की तब मिला लेकिन जब हरि को मनाने की कोशिश करोगे, संत के पास जाओगो, गुरू के पास जाओगे उनसे पूछोगे की मैं उन्हें कैसे मनाऊं वो भी रास्ता बताएंगे। जैसे संसार को जानने के लिए आप रास्ते पर चले, किसी की बात मानी और उसे माना, उसके बाद में वो आपको मिल भी गए लेकिन भगवान को पाने के रास्ते पर जब आप जाओगे गुरू, संत के बताए हुए मार्ग पर चलोगे तो निश्चित तौर पर आपको हरि मिलेंगे ही मिलेंगे।
महाराज श्री ने कहा कि आजकल हमारे घर बिगड़ रहे हैं, जानते हैं क्यों ? दूसरों की बातों पर विश्वास करने से हमारे घर बिगड़ रहे हैं। हमे किसी की भी बात पर विश्वास करने से पहले उन बातों को छान लेना चाहिए, अगर बिना सोचे समझे किसी की भी बातों पर विश्वास कर लोगे तो भी तो रिश्ते बिगड़ेगे ही।

पं. देवकीनंदन ठाकुर जी ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।
राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

कथा का आयोजन विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है। कथा पंडाल में 108 भागवत कथा के यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

19Aug 2019

आज 108 श्रीमद्भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 2020 में की जाने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा की घोषणा की गई। कैलाश मनसरोवर यात्रा 27 मई से लेकर 06 जून 2020तक हेलकॉप्टर के द्वारा की जायेगी जिसकी सेवा राशि 1,95,000/- रूपए है। एवं 27 मई से 09 जून तक बस द्वारा की जाएगी जिसकी सेवा राशि 1,35,000/- रूपए है।

आज 108 श्रीमद्भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 2020 में की जाने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा की घोषणा की गई। कैलाश मनसरोवर यात्रा 27 मई से लेकर 06 जून 2020तक हेलकॉप्टर के द्वारा की जायेगी जिसकी सेवा राशि 1,95,000/- रूपए है। एवं 27 मई से 09 जून तक बस द्वारा की जाएगी जिसकी सेवा राशि 1,35,000/- रूपए है। यात्रा से पूर्व 20 मई से लेकर 26 मई तक श्रीमद्भागवत कथा का काठमांडू में आयोजन किया जाएगा। आप सभी इस यात्रा में सादर आमंत्रित हैं, जो भी इस यात्रा में सम्मिलित होना चाहते हैं वो 8448444248/07351112221 इन नम्बरों पर संपर्क करके रजिस्ट्रेशन करवा सकते हैं।

20Aug 2019

शांति सेवा धाम, वृंदावन में किया गया नि:शुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर का आयोजन

विश्व शांति सेवा चैरीटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में 17 से 24 अगस्त 2019 तक ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर शांति सेवा धाम छटीकरा रोड वृन्दावन में नि:शुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर का आयोजन किया जा रहा है। शिविर के चतुर्थ दिवस पर सैकड़ों की संख्या में लोगों का नि:शुल्क इलाज किया गया एवं दवाइयां वितरित की गई।

20Aug 2019

वृंदावन में आयोजित 17 से 24 अगस्त 2019 तक 108 श्रीमद्भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव के चतुर्थ दिवस पर कथा से समस्त यजमानों के द्वारा भागवत पूजन किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 17 से 24 अगस्त 2019 तक वृंदावन में आयोजित 108 श्रीमद्भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव के चतुर्थ दिवस पर कथा से समस्त यजमानों के द्वारा भागवत पूजन किया गया।#JanmashtamiMahotsav2019

20Aug 2019

“बुरे वक्त में धैर्य ना खोएं, धैर्य खोने वाला अपना सर्वस्व खो देता है : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

“बुरे वक्त में धैर्य ना खोएं, धैर्य खोने वाला अपना सर्वस्व खो देता है : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

“साधु की पहचान वेशभुषा नहीं सहनशीलता हैं: पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 17 से 24 अगस्त 2019 तक प्रतिदिन सुबह 9:30 बजे से विश्व शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड, वृंदावन में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया
108 भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

कथा पंडाल में पूज्य श्री राम कमल दास वेदांती जी महाराज बनारस से कथा पंडाल में पधारे एवं व्यास पीठ से आशीर्वाद प्राप्त किया और कथा श्रवण करने आये सभी भक्तो को आशीर्वचन दिए । उन्होंने कहा कि युवाओं को कथा सुनने के लिए प्रेरित किया है उसके लिए मैं महाराज श्री का अभिनंदन करता हूँ। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि व्यक्ति बहुत व्यथित और चिंतित हो जाता है जब जीवन में कुछ बुरा पल आता है। इस संसार में ऐसा कौन है जिसने दुख नहीं झेला है, हमारी स्थित बहुत विचित्र होती है, जब बुरा वक्त आता है हम एक मिनट में अपना धैर्य गवां देते हैं। कई लोग तो बुरे वक्त के लिए भगवान को ही कोसने लगते हैं लेकिन वक्त अगर बुरा हो तो चिंता नहीं बल्कि हरि का चिंतन किजिए। हम कल तक सुखी थे लेकिन वक्त बदला तो दुखी हो गए तो कल तक का इंतजार किजिए वक्त बदलेगा और फिर से सुखी हो जाओगे। यह बात याद रखिए की वक्त हर दिन एक समान नहीं होता है, हर समय कुछ ना कुछ बदलाव तो होता ही है। बुरे वक्त में धैर्य खो देने वाला व्यक्ति अपना सर्वस्व खो देता है।

महाराज श्री ने कहा कि अगर आपको ईश्वरीय कृपा से कोई वस्तु प्राप्त हो तो अच्छा है लेकिन उस वस्तु का अभिमान होना बुरा है। हम लोगों को समस्या यही है की थोड़ी सी भी कोई चीज मिल जाए तो अहंकार किए बिना मानते नहीं है। कई तो ऐसे भी लोग हैं जो रात दिन सत्संग सुनते हैं लेकिन उनके मन से अहंकार मिटता नहीं है। इतना सत्संग सुनने के बाद भी यह अहंकार कहा से आता है ? हमको लगता है कही ना कही अच्छाई के विपरित बुराई भी चल रही है, जब तक अच्छाई चल रही है ठीक है लेकिन उसके विपरित बुराई भी चल रही है जिसकी वजह से हमारा जितना विकास होना चाहिए उतना आध्यात्मिक विकास नहीं हो पाता है। उन बुराईयों से बचने का अथक प्रयास आपको ही करना होगा।

महाराज श्री ने कहा कि एक संत का स्वभाव है सहनशील होना, किसी भी ग्रंथ में भेष को संत नहीं बताया गया है। सिर्फ लाल, सफेद, पीले कपड़े पहनने वाले ही साधु होंगे इस बात की गारंटी नहीं है। साधु वही है जो सहनशील है। सहनशील उसे कहते हैं जो बड़े से बड़े अपमान को सहज स्वीकार कर ले, अपमान के बाद भी कोई प्रतिक्रिया नहीं करते, वही इसलिए नहीं करते क्योंकि जो अपमान हो रहा है वह शरीर का हो रहा है और वह शरीर में स्थित ही नहीं है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली ने भगवान ब्रह्मा वरदान मांगा की मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने उसे वरदान दे दिया। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने विष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली से कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।

महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"

भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।

इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का सुंदर वर्णन श्रवण कराया। सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
कथा का आयोजन विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है। कथा पंडाल में 108 भागवत कथा के यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

#JanmashtamiMahotsav2019

21Aug 2019

108 श्रीमद्भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव के पंचम दिवस पर कथा पंडाल में सांसद श्री साक्षी महाराज जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

108 श्रीमद्भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव के पंचम दिवस पर कथा पंडाल में सांसद श्री साक्षी महाराज जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। श्री Dr. Swami Sakshi Ji Maharaj जी ने सभी भक्तों को अपने आशीर्वचनों से अलंकृत भी किया। #JanmashtamiMahotsav2019

21Aug 2019

“मृत्यु और जीवन ये किसी प्राणी के हाथ में नहीं है:पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

“मृत्यु और जीवन ये किसी प्राणी के हाथ में नहीं है:पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 17 से 24 अगस्त 2019 तक प्रतिदिन सुबह 9:30 बजे से विश्व शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड, वृंदावन में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।


श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पंचम दिवस पर कथा पंडाल में सांसद श्री साक्षी महाराज ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। श्री साक्षी महाराज जी ने सभी भक्तों को अपने आशीर्वचनों से अलंकृत भी किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की मृत्यु और जीवन ये किसी प्राणी के हाथ में नहीं है। आज सिर्फ कोशिश कर सकते हो, आप ना तो किसी को जीवनदान दे सकते हो और ना ही मृत्यु दे सकते हो। मृत्यु तो धूर्व सत्य है इसे कोई मिटा नहीं सकता।

महाराज श्री ने कहा कि बहुत से लोग कहते हैं हम इतना धर्म का कार्य करते हैं फिर भी हमारे मन को शांति क्यों नहीं मिलती ? उसका कारण यह है कि कहीं ना कहीं आप धर्म करते समय सच्चाई नहीं रखते हो मन में। मेरा उद्देश्य केवल आपका हित है, रामायण में लिखा है मेरा हित किसमें होगा, मेरा अनहित किसमें होगा ये पशु पक्षी भी जानते हैं। जब हित अनहित पशु पक्षी भी जानते हैं तो मानव होकर हम अपना हित और अनहित क्यों नहीं पहचानते हैं। 
महाराज श्री ने आगे कहा कि भगवान कपटी लोगों को देखते नहीं है अपनी आंखे बंद कर लेते हैं। कपटी वो होता है जिसके मन में कुछ, जुबान में कुछ होता है और हम भी ऐसा ही व्यवहार करते हैं भगवान के साथ। मन में भगवान के प्रति प्रेम नहीं है लेकिन दिखावे के लिए प्रेम प्रदर्शित करते हैं।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। 
श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है। श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है।

आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है। 
कथा का आयोजन विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है। कथा पंडाल में 108 भागवत कथा के यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

21Aug 2019

जन्माष्टमी के अवसर पर किया गया भण्डारे का आयोजन

विश्व शांति सेवा चैरीटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में 17 से 24 अगस्त श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव 2019 के शुभ अवसर पर ट्रस्ट की ओर से प्रतिदिन विशाल भंडारे का आयोजन किया रहा है जिसमें हजारों की संख्या में भक्तगण प्रसाद ग्रहण कर रहें है।#JanmashtamiMahotsav2019

21Aug 2019

शांति सेवा धाम, वृंदावन में किया गया नि:शुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर का आयोजन

विश्व शांति सेवा चैरीटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में 17 से 24 अगस्त 2019 तक ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर शांति सेवा धाम छटीकरा रोड वृन्दावन में नि:शुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर का आयोजन किया जा रहा है। शिविर के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने शिविर का निरीक्षण कर उचित व्यवस्था का जायजा लिया और उपलब्ध दवाओं एवं अन्य स्वास्थ्य सम्बंधित विषयों पर डाक्टरों से वार्ता की।

22Aug 2019

108 श्रीमद्भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव के अवसर पर आयोजित श्रीमद भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर कथा पंडाल में सुदामा कुटी के महंत श्री सुतीक्ष्ण दास जी महाराज ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई।

108 श्रीमद्भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव के अवसर पर आयोजित श्रीमद भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर कथा पंडाल में सुदामा कुटी के महंत श्री सुतीक्ष्ण दास जी महाराज ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं व्यास पीठ को नमन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित भी किया गया। श्री सुतीक्ष्ण दास जी महाराज ने कथा स्थल में मौजूद सभी भक्तों को अपने आशीर्वचन भी दिए।#JanmashtamiMahotsav2019

23Aug 2019

अमंगलों का नाश करते है संतो के दर्शन - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

अमंगलों का नाश करते है संतो के दर्शन - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 17 से 24 अगस्त 2019 तक प्रतिदिन सुबह 9:30 बजे से विश्व शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड, वृंदावन में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के छठे दिन की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

श्रीमद भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर कथा पंडाल में सुदामा कुटी के महंत श्री सुतीक्ष्ण दास जी महाराज ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं व्यास पीठ को नमन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित भी किया गया। श्री सुतीक्ष्ण दास जी महाराज ने कथा स्थल में मौजूद सभी भक्तों को अपने आशीर्वचन भी दिए।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की हमारे जीवन में परिवार का होना, संतान का होना,लक्ष्मी का होना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन अगर आपको आपके जीवन में संतो का दर्शन और भगवान की कथा का श्रवण मिल जाए तो इससे बड़ा जीवन का कोई उपहार आपको नहीं मिल सकता।

संतो के दर्शन मात्र से हमारे अमंगलों का नाश होता है और हमारे मंगल प्रांरभ होते है। क्यूंकि ईश्वर किसी न किसी वजह से कृपा करते है लेकिन संत बेवजह कृपा करते है।

महाराज श्री ने बताया की जीवन में जिन्हे पद और सम्मान मिल जाता है वो अपने पद को बचाएं रखने के लिए अपने से बड़ो का भी अनादर कर देते है लेकिन वो भूल जाते है की आप अपना सम्मान कभी खरीद नहीं सकते, आप अपने कर्मो के द्वारा उसे प्राप्त कर सकते है। और सम्मान पाने के लिए आप सिर्फ प्रयास कर सकते है सम्मान आपको मिलेगा या नहीं ये आपके हाथ में नहीं है। क्यूंकि अगर आप अपना कर्म करना नहीं भूलेंगे तो भगवान अपना कर्म करना नहीं भूलेंगे इसलिए आपको बिना फल की चिंता किये हुए अपने कर्म करने चाहिए।

श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है। 
कथा का आयोजन विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है। कथा पंडाल में 108 भागवत कथा के यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

23Aug 2019

"ईश्वर के चरणों में चित्त ना लगाने वाले लोगों का हाल बुरा होता है” || श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

"ईश्वर के चरणों में चित्त ना लगाने वाले लोगों का हाल बुरा होता है”

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 17 से 24 अगस्त 2019 तक प्रतिदिन सुबह 9:30 बजे से विश्व शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड, वृंदावन में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। 24 सितंबर को ठा. प्रियाकांत जू मंदिर में जन्माष्टमी का भव्य महोत्सव मनाया जाएगा

कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई । भागवत आरती मुख्य यजमान श्रीमती मोहिनी देवी एवं सुरेश चंद्र गोयल जी द्वारा की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि अंतिम समय में नाम मिल जाए, धाम मिल जाए, भगवान मिल जाए या कथा मिल जाए, होनी तो मुक्त ही हैं। ये चारों बराबर हैं। जीवन भर पाप किए हों और अंत समय में सदबुद्धि आ जाए की हमें धाम में ही रहना है तो कल्याण होना निश्चित है। लेकिन यह भी तभी संभव है जब आप पर किशोरी जी की पूर्ण कृपा हो। 
महाराज श्री ने कहा कि इस संसार में ईश्वर की अहित की कृपा का सबसे बड़ा दर्शन मनुष्य जीवन है। मनुष्य जीवन प्राप्ति के बाद हमारा मन उनकी तरफ आकर्षित हो जाए यह ठाकुर जी की अहित की कृपा है। ईश्वर के चरणों में चित्त ना लगाने वाले लोगों का हाल बुरा होता है।

महाराज श्री ने कहा कि अपने धर्म के प्रति वफादार बनिए और दिखावा मत किजिए, भगवान पर पूर्ण भरोसा किजिए। आपको जब भी समय मिले आपको पुराणों की कथा सुननी चाहिए, इससे हमारा चित्त परमात्मा की तरफ आकर्षित होता है, बुराईयों की तरफ नहीं जाता। अगर चित्त बुराई की तरफ चला गया तो यम के द्वार पर जाना ही पड़ेगा लेकिन चित्त गोविंद के चरणों में चला गया तो हमारा जो उद्देश्य है हमे प्राप्त हो जाएगा। पुराण हमें पुरूषोत्तम की तरफ लेकर जाते हैं।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

कथा पंडाल में मुख्य यजमान श्रीमती मोहिनी देवी एवं सुरेश चंद्र गोयल जी, श्री एच. पी.अग्रवाल जी, श्री जे पी सिंघल जी (मामा), श्री राजेश कुमार सिंह जी, श्री सतीश गर्ग जी, श्री श्रीपाल जिंदल जी, श्री अनिल त्यागी जी, श्री सुरेश जांगिड जी, श्री संजय अग्रवाल जी, श्री संजय चतुर्वेदी जी, श्री शेराराम भादू जी, श्री बिजेंदर सोनी जी, श्री सूरज बंसल जी, श्री अशोक कुमार खुराना जी, श्री रामगोपाल बागला जी, श्री विपिन बाजपाई जी आदि भक्त वृन्द मौजूद रहें।

23Aug 2019

जन्माष्टमी के पावन पर्व पर ठा. श्री प्रियाकांत जू मंदिर, वृन्दावन में जन्माष्टमी महोत्सव मनाया जा रहा है। हजारों की संख्या में श्रद्धालु दिन रात संकीर्तन कर प्रभु की भक्ति में लीन हैं।

जन्माष्टमी के पावन पर्व पर ठा. श्री प्रियाकांत जू मंदिर, वृन्दावन में जन्माष्टमी महोत्सव मनाया जा रहा है। हजारों की संख्या में श्रद्धालु दिन रात संकीर्तन कर प्रभु की भक्ति में लीन हैं। सभी भक्त ठा. प्रियाकांत जू मंदिर प्रांगण में भजन गाकर एवं नृत्य करके गोकुल नंदन के आने का इंतजार कर रहे हैं। 
#HappyJanmashtmi #Priyakant_Ju #Thakurji

18Aug 2019

“जिनका मन निर्मल है वहीं प्रभु को प्राप्त कर सकता है" विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 17 से 24 अगस्त 2019 तक प्रतिदिन सुबह 9:30 बजे से वृंदावन में 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

साधु के एक क्षण का संग आपका जीवन सुधार सकता है : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज 


“जिनका मन निर्मल है वहीं प्रभु को प्राप्त कर सकता है : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज 

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 17 से 24 अगस्त 2019 तक प्रतिदिन सुबह 9:30 बजे से विश्व शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड, वृंदावन में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।


कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।
भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।


कथा के द्वितीय दिवस पर कथा पंडाल में केन्द्रीय पशुपालन, मत्स्य और डेयरी मंत्री श्री गिरिराज सिंह जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई, साथ ही भागवत आरती की एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हे स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।


पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए भक्तों को बहुत ही सुन्दर भजन श्रवण कराया। "भज गोविन्दं भज गोविन्दं, गोविन्दं भज गोविन्द "
महाराज जी ने कहा की भगवान श्याम सुन्दर को ये गोविन्द नाम बहुत प्रिय है। ऐसे तो परमात्मा के बहुत नाम है पर उन सभी नामो में से गोविन्द नाम अधिक प्रिय है। गोविन्द नाम इसलिए अधिक प्रिय है क्योकि गऊ माता ने ये नाम प्रदान किया है, इसका माहात्म्य भी बहुत बड़ा है इसलिए मैंने सोचा की श्री धाम व्रन्दावन में पधारे हुए लोगो को क्यों न माला माल करके वापस भेजा जाये। हम पर तो ये ही नाम का धन है जितना लूट सको लूट लो। जितना कृष्ण नाम जप लोगे उतना ही लोक परलोक सवर जाएगा।
महाराज श्री ने कहा की भक्ति के मार्ग में श्रीमद्भागवत महापुराण का आश्रय निश्चित देव कृपा है, निश्चित पूर्वजनों की कृपा है और निश्चित ही हमारे सद गुरुदेव की कृपा है। भक्ति के मार्ग पर चलने का मन हो भागवत का आश्रय हो तो मार्ग बहुत सुलभ सुगम हो जाता है। एक मार्ग व्यवस्ता युक्त होता है और एक मार्ग अव्यवस्ता युक्त होता है। कठिन मार्ग हो तो परेशानियाँ अधिक होगी, सुगम, सरल मार्ग हो तो आसानी से मंजिल प्राप्त की जा सकती है। सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग इन युगो में सिर्फ चर्चा करना आसान नहीं है, बहुत त्याग किया है लोगो ने हजारो हजारो वर्ष राजभोग भोगने के बाद भी अंत तुगत वो करना पड़ा जो एक संत प्रारम्भ से ही करते है और जिन्होंने तलाश की है उन्हें मिला भी है।

महाराज श्री ने कहा कि एक बड़ा प्रश्न यह है कि हमारा आधुनिक विज्ञान कहता हम बंदरो से इन्सान बने और आध्यात्मिक, ईश्वर वादी व्यक्ति कहते है की हमें ईश्वर ने बनाया है। ये आप पर निर्भर है की आप बनना क्या चाहते हो। अगर आप इसी में प्रसन्न हो की हम बंदर की संतान है तो ऐसे सोच के प्रसन्न हो लो। इस में बुराई क्या है, बुराई तो नहीं है लेकिन एक मंथन तो आपको करना ही पड़ेगा की आपका सम्मान किस में है बंदर की संतान कहलाने में या ईश्वर की संतान कहलाने में। ये तो आपका चिंतन होना चाहिए। ये तो आपका मनन होना चाहिए। आखिर तुम बंदर की संतान कहलाना चाहोगे या ईश्वर की। मुझसे कोई पहुंचेगा तो मैं तो यही कहूंगा ईश्वर की संतान हूँ। अगर इंसान बनना है, तो ईश्वर की संतान बनने में ही लाभ है। अगर बंदर की संतान हो और तुम्हे अग्नि में जलाया जाये तो बचाएगा बंदर कैसे? नहीं बचा पायेगा क्यों की उसे भी डर होगा मैं बचाने जाऊंगा तो भी जल जाऊंगा। लेकिन जब प्रहलाद को अग्नि में जलाया गया तो प्रह्लाद बंदर की संतान नहीं मानते अपने आपको, वो कहते है मैं ईश्वर की संतान हूँ। जब ईश्वर संतान प्रहलाद को अग्नि में जलने का प्रयास किया जाता है तो प्रहलाद को यह भरोशा है की मैं ईश्वर की संतान हूँ मेरा ईश्वर मुझे जलने नहीं देगा।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।

श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।

यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।

कथा का आयोजन विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है। कथा पंडाल में 108 भागवत कथा के यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।
|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

17Aug 2019

“कलयुगी व्यक्ति अच्छाई को टालता है और बुराई के लिए जल्दी कर बैठता है" || देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

“कलयुगी व्यक्ति अच्छाई को टालता है और बुराई के लिए जल्दी कर बैठता है"

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 17 से 24 अगस्त 2019 तक प्रतिदिन सुबह 9:30 बजे से विश्व शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड, वृंदावन में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। कथा के प्रथम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया

भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
भागवत कथा के प्रथम दिवस पर कथा पंडाल में उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री श्री लक्ष्मी नारायण जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई, संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया। इसके अलावा सुदामा कुटी से श्री अमरदास जी महाराज ने भी अपनी उपस्थिति दी एवं भक्तों को अपने अमूल्य वचनों से कृतार्थ किया।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की बिना साधन के साध्य को प्राप्त नहीं किया जा सकता और भागवत साधन भी है और साध्य भी है। अगर भागवत साधन हो तो वही प्रत्यक्ष कृष्ण साध्य भी हैं। आप सभी भाग्यशाली हैं क्योंकि लोग कहां नहीं अटके हैं, लोग कहां नहीं फसे हुए हैं, रास्ते तो दो ही हैं। एक रास्ता जन्म मरण के भव बंधन में डाले रखता है और एक मार्ग ऐसा भी है तो इनसे छुटकारा दिला देता है। 
महाराज श्री ने कहा कि ध्यान देने वाली बात है कलयुग अपने हाथ में दंड लेकर घूम रहा है और हमारे शरीर पर सारी चोट तो बर्दाश्त नहीं होत। ना जाने कौन सी चोट से हमारा ये शरीर विक्षिप्त हो जाए या परेशान हो जाए और अगर ये कहें की भगवान का नाम ले लेंगे अंत समय में और अंत समय में ना हुआ तो फिर क्या करोगे, जो करना है समय रहते करिए। कलयुग का व्यक्ति अच्छाई को टालता है और बुराई के लिए जल्दी कर बैठता है। अच्छे काम जितनी जल्दी हो सके कर डालो और बुरे काम में जिनती देरी हो सके उतनी देरी कर डालो क्योंकि अच्छे काम को टाल दिया तो फिर वो तुमसे ना हो पाए।
महाराज श्री ने भागवत प्रसंग की शुरूआत भागवत के प्रथम श्लोक से की
सच्चिदानन्द रूपाय विश्वोत्पत्यादि हेतवे तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयम नुमः 
वासुदेव सुतं देवम् कंस चानुर मर्दनम् देवकी परमानंदम् कृष्णम् वंदे जगदगुरुम्।।
महाराज श्री ने कहा कि भागवत के प्रथम श्लोक में भगवान को प्रणाम किया गया है, उनके स्वभाव का वर्णन किया गया है, उनकी लीलाओं का वर्णन किया गया है। भागवत को समझना भगवान को समझने के बराबर है। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की एक बात सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगो का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा । 
कथा का आयोजन विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है । कथा पंडाल में 108 श्रीमद् भागवत कथा के यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

18Aug 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 17 से 24 अगस्त 2019 तक वृंदावन में आयोजित 108 श्रीमद्भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव के द्वितीय दिवस पर कथा से पूर्व ब्राह्मणों के द्वारा भागवत पाठ किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 17 से 24 अगस्त 2019 तक वृंदावन में आयोजित 108 श्रीमद्भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव के द्वितीय दिवस पर कथा से पूर्व ब्राह्मणों के द्वारा भागवत पाठ किया गया।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

18Aug 2019

विश्व शांति सेवा चैरीटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में 17 से 24 अगस्त 2019 तक ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर शांति सेवा धाम छटीकरा रोड वृन्दावन में नि:शुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर का आयोजन किया जा रहा है ।

विश्व शांति सेवा चैरीटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में 17 से 24 अगस्त 2019 तक ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर शांति सेवा धाम छटीकरा रोड वृन्दावन में नि:शुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर का आयोजन किया जा रहा है । शिविर के द्वितीय दिवस पर सैकड़ों की संख्या में लोगों का नि:शुल्क इलाज किया गया एवं दवाइयां वितरित की गई।

15Aug 2019

जिसे कोई नहीं अपनाता उसे ठाकुर जी अपनाते हैं।

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 09 से 15 अगस्त 2019 तक Rinag Foods, 88 Jamie Avenue Ottawa, Ontario, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया गया।

श्रीमद्भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई।

भागवत के सप्तम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि रुकमणी जी ने श्रीकृष्ण से प्रेम विवाह किया। भगवान ने 16 हजार 100 विवाह किए हैं लेकिन 8 विवाह अलग अलग हुए। ये 8 पटरानियां साधारण नहीं हैं लक्ष्मी जी बनी हैं रूकमणी, पार्वती जी आधे अंश से बनी हैं जामवंती और बाके आधे अंश से बनी हैं महामाया, तुलसी बनी हैं लक्ष्मणा, यमुना बनी हैं सूर्य की पूत्री कालिंदी, लज्जा बनी हैं भद्रा, गंगा बनी हैं मित्रव्रिंदा, सावित्री जी बनी हैं सत्या और पृथ्वी बनी हैं सत्यभामा। ये सांसारिक विवाह नहीं है ये पूरी प्रकृति के साथ ठाकुर जी ने विवाह किया है।
महाराज श्री ने आगे कहा कि भगवान ने 16100 विवाह इसलिए नहीं किए की उन्हे बहुत सारी पत्नियां चाहिए थी। उन्होंने इतने विवाह इसलिए किए क्योंकि उन स्त्रियों को जरूरत थी। भौमासुर नामक राक्षस ने 16 हज़ार 100 कन्याओं को बंदी बना रखा था। नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा की समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। इस कारण भगवान ने १६१०० रूप बनाकर सबके साथ एक मुहूर्त में एक साथ विवाह किया था। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने इतने विवाह किये। भगवान ने कामनावश विवाह नहीं किया था, करुणावश किया था। भगवान कहते हैं जिसको कोई नहीं अपनाता अगर वो मेरी शरण में आये तो मैं उसे अपना लेता हूँ।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंततः सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

17Aug 2019

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कनाड़ा की शांति संदेश यात्रा के पूर्ण होने के पश्चात भारत के लिए प्रस्थान किया। महाराज श्री को कनाड़ा ने भक्तों ने पुन: आगमन की अभिलाषा के साथ विदाई दी।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कनाड़ा की शांति संदेश यात्रा के पूर्ण होने के पश्चात भारत के लिए प्रस्थान किया। महाराज श्री को कनाड़ा ने भक्तों ने पुन: आगमन की अभिलाषा के साथ विदाई दी। इस अवसर पर टोरंटो से दिनेश गौतम, तेज सिंह, मोंटरियल से राकेश शर्मा जी, ओटावा से राकेश जी, डॉ भारती, धर्मेंद्र जी, ऋषि गौतम, गोविंद गौतम, इत्यादि लोग एयरपोर्ट पर उपस्थित रहे।

 

17Aug 2019

आज शाम ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर शांति सेवा धाम, वृंदावन में 17 से 24 अगस्त 2019 तक आयोजित होने वाली 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव की पूर्व संध्या पर ठा. श्री प्रियाकांतजू मंदिर से कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गयी

आज शाम ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर शांति सेवा धाम, वृंदावन में 17 से 24 अगस्त 2019 तक आयोजित होने वाली 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव की पूर्व संध्या पर ठा. श्री प्रियाकांतजू मंदिर से कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गयी, सर्वप्रथम मुख्य यजमान श्रीमती मोहिनी देवी, श्री सुरेश चंद्र गोयल जी ने सपरिवार भागवत पूजा कर भागवत जी को अपने सर पर विराजमान कर मन्दिर की परिक्रमा की। कलश यात्रा में सैकड़ों की संख्या में माताओं बहनों ने कलश उठाकर पुण्य लाभ प्राप्त किया।

17Aug 2019

उ.प्र सरकार में कैबिनेट मंत्री श्री लक्ष्मी नारायण चौधरी जी ने दीप प्रज्वलित कर 108 श्रीमद्भागवत कथा का किया शुभारंभ।

आज वृंदावन में 17 से 24 अगस्त 2019 तक आयोजित 108 श्रीमद्भागवत कथा एवं जन्माष्टमी महोत्सव के प्रथम दिवस पर कथा पंडाल में उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री श्री लक्ष्मी नारायण चौधरी जी जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई, उन्होंने महाराज श्री के साथ दीप प्रज्वलित कर कथा का शुभारंभ किया एवं भागवत आरती की, साथ ही महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। इसके अलावा कथा पंडाल में सुदामा कुटी से श्री अमरदास जी महाराज ने भी अपनी उपस्थिति दी एवं भक्तों को अपने अमूल्य वचनों से कृतार्थ किया।

10Aug 2019

श्याम उन्ही लोगों को मिलते है जिनके हृदय में साधू ज़िंदा है।

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 09 से 15 अगस्त 2019 तक Rinag Foods, 88 Jamie Avenue Ottawa, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

भागवत के प्रथम दिवस की शुरूआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
कथा से पूर्व कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई, जिसमें कनाड़ा के भक्त प्रेमियों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के कथा की शुरूआत भागवत के प्रथम श्लोक से की
सच्चिदानन्द रूपाय विश्वोत्पत्यादि हेतवे तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयम नुमः 
वासुदेव सुतं देवम् कंस चानुर मर्दनम् देवकी परमानंदम् कृष्णम् वंदे जगदगुरुम्।।

महाराज श्री ने कहा कि भागवत के प्रथम श्लोक में भगवान को प्रणाम किया गया है, उनके स्वभाव का वर्णन किया गया है, उनकी लीलाओं का वर्णन किया गया है। भागवत को समझना भगवान को समझने के बराबर है।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की देवताओं के लिए दो चीजें बहुत दुर्लभ है एक तो मानव जीवन और दूसरी श्रीमद भागवत कथा। जिस जीव के करोडो करोडो पुण्य इक्कठा होते है उसे मेरे ठाकुर की लीलाओं को श्रवण करने का सौभाग्य प्राप्त होता है।

महाराज श्री ने बताया की श्रीमद भागवत कथा एक कल्पवृक्ष के समान है आप जो मनोरथ लेकर इस कथा को श्रवण करने आएंगे और सातो दिन मन लगा कर नियम अनुसार कथा का श्रवण करेंगे तो श्रीमद भागवत कथा आपको मनवांछित फल देगी।

महाराज श्री ने बताया की जो जीव दुसरो को कष्ट पहुंचाता है उन्हें दुखी देख कर खुश होता है तो समझ लेना की उस जीव के अंदर असाधु जिन्दा है। और जो जीव दुसरो की सेवा करते है दुसरो को दुखी देखकर खुद भी दुखी हो जाते है तो तो समझ लेना उन लोगों के अंदर साधू जिन्दा है और श्याम उन्ही लोगों को मिलते है जिनके हृदय में साधू ज़िंदा है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार नैमिषारणय में सनकादिक ऋषि विराजमान थे तभी वहां परम श्रद्धेय सूद जी महाराज पधारे। जब सूद जी महाराज वहां पधारे तो उन्हें एक बहुत सुंदर आसन दिया और वहां पर उनको बैठाया। तो सभी ऋषियों ने सूद जी महाराज से ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

11Aug 2019

जिन्हें सांसारिक वस्तु नहीं चाहिए भागवत उन्हें मोक्ष प्रदान करती है।

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 09 से 15 अगस्त 2019 तक Rinag Foods, 88 Jamie Avenue Ottawa, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।
श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया। 
भागवत के द्वितीय दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकी नंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुवात करते हुए कहा कि श्रीमद् भागवत श्रवण बहुत बड़ा फल प्राप्त करता है। दरिद्र व्यक्ति कथा सुनेगा तो वो धनवान होगा। रोगी व्यक्ति कथा सुनेगा तो निरोगी काया को प्राप्त होगा। निसंतान वान जीव अगर कथा श्रवण करेगा तो संतान की प्राप्ति उसको होगी। जिसके पास सभी पदार्थ हो और उसकी कोई इच्छा न हो किसी और की इच्छा वो न रखती हो। तो उन्हें कुछ प्राप्त होगा अथवा नहीं ? उन्ही को सबसे बड़ा पदार्थ प्राप्त होगा। संसार में कौन कौन से पदार्थ है ? अर्थ धर्म काम और मोक्ष और सबसे दुर्लभ पदार्थ क्या है। मोक्ष, पैसा तो सब पर है किसी पर कम किसी पर ज्यादा लेकिन होते तो है ही। मोक्ष किसके पास है आपसे एक बात कहेगे यही जीवन है। लाखों करोड़ो जन्म गवा चुके है। आखरी उपाय है की अगर यहाँ पर भी अव हम अपना भला नहीं कर सके। करोड़ो जन्मो में जिन भोगो को भोगते भोगते तृप्त नहीं हुई। क्या इस जन्म में भी भोगते रहेंगे तो क्या तृप्ति होगी ? जो जीव मोक्ष प्राप्त नहीं कर पाते मानव जीवन में उनका महा विनाश होता है। तो हम और आप भाग्यशाली है की भागवत जैसा पुनीत पावन ग्रन्थ हमें प्राप्त है इस समय श्रावण मास में क्यों जिसे जो सांसारिक वस्तु चाहिए भागवत श्रवण के उपरांत में वो सांसारिक वस्तु वो भी सब आपको मिल सकती है। अगर सांसारिक चीज चाहिए ही नहीं तो उन्ही को सबसे बड़ा भगवान की तरफ से प्रसाद के रूप मिलता है। उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। जिसे संसार की कोई वस्तु नहीं चाहिए उसको भागवत के सप्तहा के उपरांत में मोक्ष प्राप्ति होती है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

12Aug 2019

जीव संत, महात्मा, गुरु, अपने बड़ो एवं धर्म का अपमान करने वाले के ऊपर कलयुग विराजमान रहता है।

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 09 से 15 अगस्त 2019 तक Rinag Foods, 88 Jamie Avenue Ottawa, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

भागवत के तृतीय दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की स्वर्ण किसी भी स्थति में कभी अपवित्र नहीं होता क्यूंकि स्वर्ण भगवान का स्वरुप है चाहे आप उसे गला दें, तो वह तब भी स्वर्ण रहेगा और उसका अगर आप कोई आभूषण बना लें तो वो तब भी स्वर्ण ही कहलायेगा। शास्त्रों में ऐसा लिखा है की स्वर्ण में भगवान् का वास होता है।

महाराज श्री ने बताया की किसी से छीनकर, चोरी करके या फिर जो स्वर्ण आपका कभी था ही नहीं उसे आपने जबरदस्ती अपना बनाया है वह धन अनीति से कमाया हुआ धन है उस धन में कलयुग का वास होता है।

महाराज श्री ने बताया की जो जीव संत, महात्मा, गुरु, अपने बड़ो एवं धर्म के बारे में गलत बोलता हो या फिर गलत सुनने में रूचि रखता हो तो आपको समझ लेना चाहिए की उस जीव के सर पर कलयुग विराजमान है।

महाराज श्री ने बताया की आज के कलयुग में हम पाश्चात्य संस्कृति को अपना कर जब भी किसी व्यक्ति से मिलते है तो उससे हाथ मिलाते है लेकिन ये हमारे सनातन धर्म का संस्कार नहीं है क्यूंकि जिस व्यक्ति को आप नहीं जानते आप उससे भी हाथ मिलाते है और उसकी नेगेटिव ऊर्जा हाथ मिलाने से हमारे अंदर आ जाती है। हम जब भी किसी व्यक्ति से मिलें तो उसके अभिवादन में हिन्दू धर्म के अनुसार हमारे ऋषि मुनियों ने जो प्रणाम करने के तीन प्रकारों के बारे में उल्लेख किया हुआ है उसी प्रकार से प्रणाम करें। 
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।

तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा।।

14Aug 2019

बुरी आदतों को छोड़ना है तो दृढ़ संकल्प लें।

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 09 से 15 अगस्त 2019 तक Rinag Foods, 88 Jamie Avenue Ottawa,Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

कथा के चौथे दिन सैकड़ो की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा की शुरुआत महाराज श्री ने बहुत ही सुंदर भजन "मीठे रस से भरी रे राधा रानी लागे से की " उसके बाद महाराज श्री ने बताया की आज का मनुष्य पैसा कमाने के चक्कर में इतना व्यस्त हो गया है की वो अपने परिवारजनों और रिश्तेदारों के कनेक्शन में रहने के बजाए मात्र उनके कॉन्टेक्ट का हिस्सा बन कर रह गया है।

महाराज श्री ने बताया की आज के जीव के लिए अच्छी बाते सीखना तो बहुत आसान है लेकिन बुरी आदतों को छोड़ना उसके लिए बड़ा मुश्किल है, लेकिन अगर जीव दृढ़ संकल्प कर लें तो वो जो चाहे वो कर सकता है बस ये विश्वास आपको अपने अंदर लाना होगा।

महाराज श्री ने बताया की आज का व्यक्ति कर्म करने से पहले उसके फल के बारे में सोचने लगता है, लेकिन वो ये भूल जाता है की आप सिर्फ कर्म ही कर सकते है फल देना तो मेरे ठाकुर के हाथ में है। इसलिए आप जो भी कार्य करे उसे पूरी ईमानदारी और सच्ची निष्ठा के साथ करें क्यूंकि मेहनत का फल सदैव मीठा होता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था।

समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया। शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया।

पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे। महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।" जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया। इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

14Aug 2019

आज हाई कमीशन ऑफिस ओटावा, कनाडा में भारत के हाई कमिश्नर श्री विकास स्वरुप जी भेंट कर भारत देश के कई विषयों पर चर्चा की। साथ में श्री राकेश शर्मा जी, डॉ भारती जी, श्री सुनील शर्मा जी, श्री विजय शर्मा जी भी मौजूद रहे।

आज हाई कमीशन ऑफिस ओटावा, कनाडा में भारत के हाई कमिश्नर श्री विकास स्वरुप जी भेंट कर भारत देश के कई विषयों पर चर्चा की। साथ में श्री राकेश शर्मा जी, डॉ भारती जी, श्री सुनील शर्मा जी, श्री विजय शर्मा जी भी मौजूद रहे।

9Aug 2019

तिलक, चोटी, तुलसी, कलावा ये हिन्दुओं की पहचान है, ये सभी हमारे संस्कार है।

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 02 से 08 अगस्त 2019 तक Sanatan Dharma Temple, 6219 Monk (Corner Street is Jolicoeur), Montreal, Quebec H4E3H8, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई।

भागवत के सप्तम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए बताया कि तिलक, चोटी, तुलसी, कलावा ये हिन्दुओं की पहचान है, ये सभी हमारे संस्कार है। इन सभी चीजों से हमारे विचार विवेकशील होते है इसलिए हमें अपने जीवन में इन सभी को अवश्य धारण करना चाहिए। 
महाराज श्री ने बताया की हमें अपने जीवन में कभी भी अपने धर्म को नहीं भूलना चाहिए। आप चाहे जहाँ कही भी रह रहें हो अपने धर्म और संस्कारों को कभी न भूले बल्कि उन्हें आगे बढ़ाने के लिए कार्य करें वही संस्कार अपने बच्चों में डाले ताकि आपके इस दुनिया से जाने के बाद आपके बच्चे धार्मिक कार्य करें नहीं तो आप जीवन में कभी खुश नहीं रह पाएंगे।
महाराज श्री ने बताया की ब्रम्हांड के तीनो लोकों में हमारे जीवन में गुरु से बढ़कर कोई और नहीं है। क्यूंकि गुरु के बिना ज्ञान नहीं है और इस विश्व के जगत गुरु मेरे ठाकुर श्री कृष्ण है, जो कुछ भी करते है वही करते है उनकी इच्छा के बिना डाली से एक पत्ता इधर से उधर नहीं हो सकता। 
महाराज श्री ने बताया की श्रीमद भागवत कथा का ये सप्ताह जिसमे कहने को सिर्फ सात दिन होतें है लेकिन ये सात दिन हमारे सात जन्मो के बराबर होते है, जो भी इन सात दिनों को जी लेता है वो भौ बंधन के सभी बंधनो से मुक्त हो जाता है क्यूंकि मात्र ये सात दिन हमें हर बंधन से मुक्त कराने की क्षमता रखते है, इन सात दिनों में हम परमात्मा से मिलन का सफर तय कर लेते है। ये सात दिन नहीं बल्कि मानो सात युग है जिसके जीवन में ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का पदार्पण हो जाए वो युग युगान्तर तक याद रखें जाते है। इसलिए ये सात दिन परमात्मा की तरह ले जाने के लिए पर्याप्त है।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि रुकमणी जी ने श्रीकृष्ण से प्रेम विवाह किया। भगवान ने 16 हजार 100 विवाह किए हैं लेकिन 8 विवाह अलग अलग हुए। ये 8 पटरानियां साधारण नहीं हैं लक्ष्मी जी बनी हैं रूकमणी, पार्वती जी आधे अंश से बनी हैं जामवंती और बाके आधे अंश से बनी हैं महामाया, तुलसी बनी हैं लक्ष्मणा, यमुना बनी हैं सूर्य की पूत्री कालिंदी, लज्जा बनी हैं भद्रा, गंगा बनी हैं मित्रव्रिंदा, सावित्री जी बनी हैं सत्या और पृथ्वी बनी हैं सत्यभामा। ये सांसारिक विवाह नहीं है ये पूरी प्रकृति के साथ ठाकुर जी ने विवाह किया है।
महाराज श्री ने आगे कहा कि भगवान ने 16100 विवाह इसलिए नहीं किए की उन्हे बहुत सारी पत्नियां चाहिए थी। उन्होंने इतने विवाह इसलिए किए क्योंकि उन स्त्रियों को जरूरत थी। भौमासुर नामक राक्षस ने 16 हज़ार 100 कन्याओं को बंदी बना रखा था। नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा की समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। इस कारण भगवान ने १६१०० रूप बनाकर सबके साथ एक मुहूर्त में एक साथ विवाह किया था। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने इतने विवाह किये। भगवान ने कामनावश विवाह नहीं किया था, करुणावश किया था। भगवान कहते हैं जिसको कोई नहीं अपनाता अगर वो मेरी शरण में आये तो मैं उसे अपना लेता हूँ।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंततः सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

7Aug 2019

जो एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है।

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 02 से 08 अगस्त 2019 तक Sanatan Dharma Temple, 6219 Monk (Corner Street is Jolicoeur), Montreal, Quebec H4E3H8, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। भागवत के पंचम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची । जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है। भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए। अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है। श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया। श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा। ।। राधे-राधे बोलना पड़े

8Aug 2019

कथा आपके अहंकार को ख़त्म कर देती है ।

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 02 से 08 अगस्त 2019 तक Sanatan Dharma Temple, 6219 Monk (Corner Street is Jolicoeur), Montreal, Quebec H4E3H8, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। भागवत के षष्ठम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि हमें अपने जीवन में कभी अभिमान नहीं करना चाहिए क्यूंकि ये जो कुछ भी हमारे पास है वो सब हमें भगवान का ही दिया हुआ है और जहाँ अभिमान है वहां भगवान हो ही नहीं सकते। महाराज श्री ने बताया की अगर आप जीवन में अपना भाग्य उदय करना चाहते है तो आपको सूर्य के उदय होने से पहले उठना चाहिए। महाराज श्री ने कहा की कथा आपके अहंकार को ख़त्म कर देती है, सच्चे दिल से कथा सुनने वाले लोग अहम और घमंड को छोड़ भगवान की भक्ति में बह जाते है वो फिर मैं की नहीं बल्कि तुम की बात करते है, तुम हो तो हम है। महाराज श्री ने बताया की कलयुग के जीव ने आज के समय में भगवान श्री कृष्ण के रास का कुछ अलग ही मतलब निकाल लिया है, स्त्री और पुरुष के संग को रास नहीं कहते। संसार के विषयों की पूर्ति कुछ एक प्रयासों से हो जाती है लेकिन ईश्वर की प्राप्ति बिना साधना के नहीं होती और उन गोपियों ने भी असाधारण साधनायें की थी, बहुत तपश्या की थी, पूर्व जन्म में बहुत पुण्य किये थे तब जाकर उन्हें गोविन्द का सानिध्य प्राप्त हुआ है। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। ।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

6Aug 2019

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 02 से 08 अगस्त 2019 तक Sanatan Dharma Temple, 6219 Monk (Corner Street is Jolicoeur), Montreal, Quebec H4E3H8, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 02 से 08 अगस्त 2019 तक Sanatan Dharma Temple, 6219 Monk (Corner Street is Jolicoeur), Montreal, Quebec H4E3H8, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।


श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

भागवत के चतुर्थ दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।

महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।

शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।

बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।

इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।

इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।

महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।

महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।

उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।

महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"

जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।

दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।

महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"

भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।

।। राधे- राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

5Aug 2019

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 02 से 08 अगस्त 2019 तक Sanatan Dharma Temple, 6219 Monk (Corner Street is Jolicoeur), Montreal, Quebec H4E3H8, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 02 से 08 अगस्त 2019 तक Sanatan Dharma Temple, 6219 Monk (Corner Street is Jolicoeur), Montreal, Quebec H4E3H8, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

भागवत के तृतीय दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।

तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा।।

1Aug 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन, कनाडा के तत्वाधान में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जुलाई से से 01 अगस्त 2019 तक Bhavani Shankar Mandir 90 Nexus Ave Brampton L6p 3R6 ( Near Hindu Sabha Mandir ) में श्रीराम कथा का आयोजन किया गया। पूज्य महाराज श्री ने कथा के सप्तम दिवस पर रावण वध का वृतांत भक्तों को श्रवण कराया। श्रीराम कथा के सप्तम दिवस की शुरूआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन, कनाडा के तत्वाधान में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जुलाई से से 01 अगस्त 2019 तक Bhavani Shankar Mandir 90 Nexus Ave Brampton L6p 3R6 ( Near Hindu Sabha Mandir ) में श्रीराम कथा का आयोजन किया गया। पूज्य महाराज श्री ने कथा के सप्तम दिवस पर रावण वध का वृतांत भक्तों को श्रवण कराया। श्रीराम कथा के सप्तम दिवस की शुरूआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान की कथा के लिए कोई समय सीमा नहीं है। प्रभु की कथा जितनी भी सुनी जाए लाभ तो निश्चित तौर पर प्राप्त होगा ही। महाराज श्री ने रामचरित्रमानस की चौपाईयां भी बताई और कहा की अगर आप इन चौपाईयां का प्रतिदिन पाठ करेंगे तो लक्ष्मी आपके घर से कभी नहीं जाएगी। महाराज श्री ने अयोध्या कांड की चौपाईयां सुनाई जब तें रामु ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए । भुवन चारिदस भूधर भारी। सुकृत मेघ बरषहिं सुख बारी ।। रिधि सिधि संपति नहीं सुहाई । उमगि अवध अंबुधि कहुं आई । मनिगम पुर नर नारि सुजाती । सुचि अमोल सुंदर सब भांती ।। कहि न जाइ कछु नगर बिभूती । जनु एतनिअ बिरंति करतूती । सब बिधि सब पुर लोग सुखारी । रामचंद मुख चंदु निहारी ।। इन चौपाईयों का आप नित पाठ करें तो आपकी घर में जितनी भी लक्ष्मी है वो हमेशा चिरकाल तक रहेगी, आपके घर को छोड़कर जाएगी ही नहीं। महाराज श्री ने कहा कि इस दुनिया मे राम के चाहने वालों को रावण की बात बुरी लगेगी और रावण के चाहने वालों को राम की बातें बुरी लगेंगी, अब आपने ये निश्चित करना है की आप किसके चाहने वाले हो। आपने अपने आसपास के रावण को ढूंढना है, जो आपको धर्म से दूर ले जाए, भक्ति से दूर ले जाए, संतों की बुराईयां तुमसे करता है, सत्संग से दूर ले जाए वही तुम्हारे जीवन का रावण है और ऐसे रावणों से दूर रहा करें। महाराज श्री ने कहा कि पहले एक रावण हुआ करता था लेकिन आजकल तो घर घर में रावण है। जो भी धर्म से जुड़े हुए लोगों की बुराईयां करते हैं, धर्म की बुराईयां करते हैं वो मानसिक तौर पर अस्वस्थ हैं, वो खुश नहीं है और वो खुश हो भी नहीं सकते। शांति राम की बहन है और जो राम की बुराई करता है वहां शांति नहीं जाती। महाराज श्री ने कहा कि आप इतिहास उठाकर देख लिजिए यहां हर एक संत महात्मा की बुराई हुई है। मीरा को तो सबसे बुरा कलंक लगाया की तू पराए पुरूष से बात करती है, लेकिन यहां एक प्रश्न है की इतनी समर्पित लोगों की बुराई क्यों होती है । उससे पहले ये समझिए की भक्ति, गोविंद का धाम, मोक्ष मिलता किसको है। जो धर्म और कर्म से शून्य हो गया है, ना अच्छा कर्म बचा हो, ना बुरा कर्म बचा हो और मति जिसकी गोविंद में हो उसको मोक्ष मिलता है और हम और आप कैसे हैं या तो अच्छा कर्म हो रहा है या बुरा कर्म हो रहा है और अगर कर्म हो रहे हैं तो निश्चित तौर पर हमारा पुनर्जन्म होगा, क्योंकि कर्मों का फल भोगने के लिए तो जाना ही होगा।

3Aug 2019

Brampton में श्री राम कथा के सफल समापन के बाद पूज्य महाराज श्री अब मॉन्ट्रियल, कनाडा में पहुंचे हैं, श्रीमद् भागवत कथा का पाठ करने के लिए अगस्त 2 से अगस्त 8, 2019.

Brampton में श्री राम कथा के सफल समापन के बाद पूज्य महाराज श्री अब मॉन्ट्रियल, कनाडा में पहुंचे हैं, श्रीमद् भागवत कथा का पाठ करने के लिए
अगस्त 2 से अगस्त 8, 2019.

3Aug 2019

कल पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज काउंसलेट जनरल ऑफ इंडिया में पहुंचे, वहां पर पर डिप्टी काउंसलेट जनरल मिस्टर डी.पी सिंह जी और मिस्टर खान ने महाराज श्री का स्वागत वह सम्मान किया।

कल पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज काउंसलेट जनरल ऑफ इंडिया में पहुंचे, वहां पर पर डिप्टी काउंसलेट जनरल मिस्टर डी.पी सिंह जी और मिस्टर खान ने महाराज श्री का स्वागत वह सम्मान किया। इस अवसर पर श्री विजय शर्मा जी, श्री दिनेश गौतम जी, भाजपा टोरंटो अध्यक्ष श्री बिपिन शर्मा, श्री ऋषि राम जी एवं अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।#ThakurJiInCanada

3Aug 2019

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 02 से 08 अगस्त 2019 तक Sanatan Dharma Temple, 6219 Monk (Corner Street is Jolicoeur), Montreal, Quebec H4E3H8, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 02 से 08 अगस्त 2019 तक Sanatan Dharma Temple, 6219 Monk (Corner Street is Jolicoeur), Montreal, Quebec H4E3H8, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

भागवत के प्रथम दिवस की शुरूआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा से पूर्व कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई, जिसमें कनाड़ा के भक्त प्रेमियों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के कथा की शुरूआत भागवत के प्रथम श्लोक से की
सच्चिदानन्द रूपाय विश्वोत्पत्यादि हेतवे तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयम नुमः 
वासुदेव सुतं देवम् कंस चानुर मर्दनम् देवकी परमानंदम् कृष्णम् वंदे जगदगुरुम्।।

महाराज श्री ने कहा कि भागवत के प्रथम श्लोक में भगवान को प्रणाम किया गया है, उनके स्वभाव का वर्णन किया गया है, उनकी लीलाओं का वर्णन किया गया है। भागवत को समझना भगवान को समझने के बराबर है। उन्होंने आगे कहा कि बहुत से लोग कहते हैं की हमारा मन नहीं लगता कथाओं में, कई लोग कथाओं में आ भी जाएं तो उन्हें नींद आने लगती है, वो इसलिए क्योंकि उनका दिलचस्पी नहीं है। जबतक हमारा मन ठाकुर जी में नहीं होगा तब तक हमारा मन कथाओं में नहीं लगेगा। जो भी भक्त मन कर्म वचन से भागवत सुनता है निश्चित तौर पर उसे भगवान से प्रेम होता है। अगर कोई ये कहे की हमे ईश्वर से प्रेम नहीं चाहिए तो, इसका भी फल है अगर तुम्हें कुछ भी नहीं चाहिए तब भी तुम्हें बहुत कुछ देती है भागवत। आपको भागवत के माध्यम से ईश्वर को जानने की कोशिश करनी चाहिए।

महाराज श्री ने कहा कि जब भी आप दुखी हों तो किसी संत के चरण पकड़ लिजिए, संतों के सानिध्य में बैठिए। संत का संग आपको जन्म जन्मांतर के भव बंधनों से मुक्त कर सकता है। ये आपके ऊपर है की आप चाहते क्या हैं अपना कल्याण या अपना विनाश।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार नैमिषारणय में सनकादिक ऋषि विराजमान थे तभी वहां परम श्रद्धेय सूद जी महाराज पधारे। जब सूद जी महाराज वहां पधारे तो उन्हें एक बहुत सुंदर आसन दिया और वहां पर उनको बैठाया। तो सभी ऋषियों ने सूद जी महाराज से ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

4Aug 2019

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 02 से 08 अगस्त 2019 तक Sanatan Dharma Temple, 6219 Monk (Corner Street is Jolicoeur), Montreal, Quebec H4E3H8, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

विश्व शांति सेवा मिशन कनाडा के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 02 से 08 अगस्त 2019 तक Sanatan Dharma Temple, 6219 Monk (Corner Street is Jolicoeur), Montreal, Quebec H4E3H8, Canada में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

भागवत के द्वितीय दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।...

कथा की शुरुआत महाराज श्री ने बताया की वेद व्यास जी द्वारा लिखित इस भागवत महापुराण में मोक्ष परियन्त की कामनाओ से रहित परम धर्म का निरूपण किया गया है। इसमें शुद्ध हृदय वाले महापुरुषों के जानने योग्य वास्तविक वास्तु परमात्मा का निरूपण हुआ है जो तीनो तापो को जड़ से नाश करने वाला है और वो परम कल्याण करने वाला है। अब और किसी शास्त्र से क्या परियोजन है जिस समय कोई पुण्य आत्मा या पुरुष इसको श्रवण करने की इच्छा करते है ईश्वर उसी समय तत्काल उनके हृदय में आकर विराजमान हो जाते है। पंडित जी ने कहा की भागवत में ऐसा लिखा है की अगर कोई जीव सच्चे दिल से ये संकल्प कर ले की वो श्रीमद्भागवत कथा सुनेगा तो उस संकल्प मात्र से ही भगवान उनके हृदय में वास करने लगते है।महाराज श्री ने बताया की गरुण पुराण में लिखा है कि आप देवताओं से पहले अपने पितरो को मना लो क्यूंकि देवता तो आपको आपके कर्म अनुसार फल देते है लेकिन अगर पितृ एक बार खुश हो जाए तो वह वो दे देते है जो तुम्हारे भाग्य में भी नहीं होता और अगर पितृ अप्रसन्न हो जाए तो वो भी छीन लेते है जो तुम्हारे भाग्य में होता है क्यूंकि जिन पितरो की मुक्ति हो जाती है वो भगवान में समां जाते है।इसलिए अपने बच्चो को ये संस्कार जरूर दे और उन्हें श्राद्ध का महत्व बताये ताकि आपके जाने के बाद वो भी आपकी तरह पित्रो की सेवा करें।क्यूंकि आपके भागवत सुनने से आपके पितरो का भी कल्याण होता है उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है इसलिए अगर आप कथा पंडाल में कथा सुनने आएं तो पुरे नियम के साथ कथा सुने ताकि आपके साथ आपके परिवार और पितरो का भी कल्याण हो।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।

श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।

यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

26Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन, कनाडा के तत्वाधान में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जुलाई से से 01 अगस्त 2019 तक Bhavani Shankar Mandir 90 Nexus Ave Brampton L6p 3R6 ( Near Hindu Sabha Mandir ) में श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन, कनाडा के तत्वाधान में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जुलाई से से 01 अगस्त 2019 तक Bhavani Shankar Mandir 90 Nexus Ave Brampton L6p 3R6 ( Near Hindu Sabha Mandir ) में श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीराम कथा के प्रथम दिवस की शुरूआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि आज के युग में लोग अपने मुताबिक अपने आराध्य बदल लेते हैं, धर्म बदल लेते हैं, गुरू बदल लेते हैं, मंदिर बदल लेते हैं। लेकिन सच्चाई ये हैं अपना ईष्ट, अपना धर्म, गुरू ये कुछ चीजें ऐसी हैं जो कभी नहीं बदलनी चाहिए। आप अपना गुरू, धर्म बदलते हैं फिर कहते हैं हमे शांति नहीं मिलती, कैसे मिलेगी ,जो अपने गुरू का नहीं हुआ, अपने धर्म का नहीं हुआ वो परलोक की प्राप्ति करने का अधिकारी कैसे हो सकता है। जीवन में जो भी परेशानियां हो रही हैं वो इसलिए हो रही हैं क्योंकि हम राम से दूर जा रह हैं, सत्य से, धर्म से दूर जा रहे हैं। 
महाराज श्री ने कहा कि राम कथा सुनने का अधिकारी कौन है ? आप कोई भी पुराण ले लिजिए, कोई भी ग्रंथ ले लेजिए, हर पुराण, ग्रंथ में ईश्वर को जानने की जिज्ञासा है। हमारा मन ईश्वरवादी है तो ईश्वर को जानने की जिज्ञासा होनी ही चाहिए। ईश्वर को जानने की जिज्ञासा केवल मानव जीवन में ही हो सकती है और किसी जन्म में नहीं होगी। 
महाराज श्री ने कहा कि आज का युग परिवर्तित हो रहा है, लोगों की विचारधाराएं बदल रही है। लेकिन माता पिता और गुरू में आपका अटूट विश्वास होना चाहिए । दुनिया चाहे कुछ भी कहे पर मेरी श्रद्धा इतनी अटूट हो की मेरे गुरू, मेरा गोविंद मेरे माता पिता मेरे लिए बुरे नहीं है, अगर गलत होंगे तो अपने लिए होंगे मेरे लिए नहीं हैं। अगर इतनी अटूट श्रद्धा होगी तो राम को तुम्हे नहीं ढूंढना पड़ेगा, राम तुम्हे ढूंढते हुए तुम्हारे घर तक पहुंच जाएंगे ।
महाराज श्री ने राम कथा के प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए कहा कि चाहे भागवत कथा ले लिजिए, चाहे राम कथा ले लिजिए दोनों की शुरूआत ही प्रश्न से हुई है। प्रयागराज में भारद्वाज मुनि रहते हैं यागवल ऋषि उनसे प्रश्न करते हैं मैं ये जानना चाहता हूं की राम कौन है ? महाराज श्री ने कहा कि जब जब धर्म की हानि होती है या तो भगवान खुद आते हैं या अपने दुतों को भेजते हैं। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने रामचरित्रमानस की महानता का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रभु श्री राम की कथा गोस्वामी तुलसीदास महाराज जी ने रामचरित्रमानस के माध्यम से , श्री बाल्मिकी महाराज ने बाल्मिकी रामायण के माध्यम से की है।

27Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन, कनाडा के तत्वाधान में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जुलाई से से 01 अगस्त 2019 तक Bhavani Shankar Mandir 90 Nexus Ave Brampton L6p 3R6 ( Near Hindu Sabha Mandir ) में श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन, कनाडा के तत्वाधान में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जुलाई से से 01 अगस्त 2019 तक Bhavani Shankar Mandir 90 Nexus Ave Brampton L6p 3R6 ( Near Hindu Sabha Mandir ) में श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीराम कथा के द्वितीय दिवस की शुरूआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जिस कथा को सुनने के लिए आप आए हैं उस कथा को सुनने के लिए सब ललायित रहते हैं। गोस्वामी तुलसीदास बाबा जी ने लिखा है जिनके ह्रदय में कथा के प्रति आशक्ति नहीं है, भक्ति नहीं है, वो व्यक्ति मनुष्य जीवन प्राप्त करने के बाद भी जीवित नहीं है, वो मृत के समान है। मानव जीवन का एकमात्र उद्देश्य है जीवित रहते हुए हरि से मिलन इसके अलावा दूसरा कोई उद्देश्य नहीं है।
महाराज श्री ने युवाओं से कहा कि जब आपके बड़े आपको कोई अच्छी बात कहें और वो बात आपकी समझ में ना आए तो समझना आपका बुरा वक्त शुरू हो गया है। आपके साथ आपको जोश हो सकता है, बुद्धि हो सकती है लेकिन आपका पास अनुभव नहीं है, अनुभव उनके पास है। जीवन की सबसे बड़ी सफलता उसमें ही जिसमें अनुभव के साथ साथ जोश भी रहे। 
महाराज श्री ने कहा कि कथा में अगर जाओ तो अपने जीवनसाथी को जरूर संग लेकर जाओ, अगर जीवनसाथी को संग लेकर जाओगे तो दोनों की विचारधार एक जैसी हो जाएगी।
महाराज श्री ने कथा क्रम को आगे बढ़ाते हुए कहा कि यागवल्क्य ऋषि ने भारद्वाज ऋषि से प्रश्न किया की राम कौन है ? दशरथ पुत्र राम है, जो वन में गए वो राम है, रावण को जिसने मारा वो राम है या जो एक जो सब के घट घट में विराजमान है वो राम है ? तो भारद्वाज ऋषि ने यागवल्क्य ऋषि से का हे ऋषिवर मैं जानता हूं आप कितने श्रेष्ठ हैं लेकिन आपने ये जो प्रश्न किया है ये समस्त मानव की भ्रांति को मिटाने के लिए किया है मैं आपको उसका उत्तर देता हूं। यही प्रश्न यही संदेह एक बार बाबा भोलेनाथ की पत्नी सती को भी हुआ । 
एक बार त्रेतायुग में भगवान शंकर अपनी पत्नी के साथ कुम्भज ऋषि के पास कथा सुनने गए । नियम यह है की आचार्य का पूजन यजमान करेगा यहां यमनान के बाबा भोलेनाथ और आचार्य हैं। अब हुआ यह की बाबा भोनेनाथ कुम्भज ऋषि के यहां पहुंचे कुम्भज ऋषि ने उनका स्वागत किया, पूजा की। यह सब देखकर सती मईया सोचने लगी ये कैसे आचार्य हैं यजमान का पूजन कर रहे हैं और वहीं से उन्हे अश्रद्धा हो गई। तो कथा की शुरूआत हुई “रामकथा मुनिबर्ज बखानी। सुनी महेस परम सुखु मानी” बाबा भोलेनाथ ने कथा सुनी और सती जी का कही नाम ही नहीं आया, जबकी सुनने के लिए तो वो बैठी ही थी लेकिन नाम नहीं आ रहा है वो इसलिए क्योंकि उन्होंने कथा मन से सुनी ही नहीं। और जब आप मन से कथा नहीं सुनोगे तो आपको कही ना कही भ्रम जरूर होगा। मन से नहीं सुनोगे तो आधी कथा समझ में आएगी आधी नहीं आएगी और जो समझ में नहीं आई है वो भ्रम पैदा कर देगी । 
सती को भी कथा सुनकर हरि पर संदेह हो गया । जब लौट कर आ रहे थे तो त्रेतायुग में राम जी का प्राकट्य हुआ, प्रसंग जिस वक्त हुआ वो ये था की सीता जी का हरण हो चुका है और राम जी सीता जी के विरह में रो रहे हैं, उन्हें ढूंढ रहे हैं। शिव जी ने देखा की मेरे प्रभु मानव लीला कर रहे हैं, अपने भक्तों के लिए रोना भी पड़े तो रोते हैं, राम जी को रोता देखकर शिव जी का ह्रदय भर आया और उन्होंने जय सच्चिदानंद जग पावक कहकर प्रणाम किया और फिर आगे बढ़ गए। 
शिव जी की यह दशा जब सती ने देखी तो मन में संदेह हुआ की दुनिया शिव जी को पूजती है और ये किन को देख कर प्रणाम कर रहे हैं, यह है कौन जिनको प्रणाम किया ? सती ने शिव से प्रसन्न किया ये आपने किन को प्रणाम किया ? तो बाबा भोलेनाथ ने कहा जिनकी कथा अभी हम सुनकर आ रहे हैं, जिनकी भक्तिअभी मैने बाबा को सुनाई थी और ये मेरे ईष्ट देव हैं। लेकिन सती को फिर भी विश्वास नहीं हुआ। बाबा ने कहा अगर तुम्हारे मन में इतना संदेह है तो जाओ जाकर परीक्षा ले लो। अब बाबा भोलेनाथ सोच रहे हैं जब मेरे कहने से भी सती का संदेह नहीं गया इसका मतलब है विधाता वाम हो गया अब सती का भला होने वाला नहीं है।
एक बात याद रखिए राम के विरूद्ध, सति के विरूद्ध जो गया है उसका भला कभी नहीं हुआ है।

28Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन, कनाडा के तत्वाधान में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जुलाई से से 01 अगस्त 2019 तक Bhavani Shankar Mandir 90 Nexus Ave Brampton L6p 3R6 ( Near Hindu Sabha Mandir ) में श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन, कनाडा के तत्वाधान में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जुलाई से से 01 अगस्त 2019 तक Bhavani Shankar Mandir 90 Nexus Ave Brampton L6p 3R6 ( Near Hindu Sabha Mandir ) में श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीराम कथा के तृतीय दिवस पर श्रीराम का प्राकट्य दिवस मनाया एवं रामचरित्रमानस पर चर्चा की। कथा की शुरूआत सभी भक्तों ने मिलकर सर्वप्रथम अपने - अपने अराध्य के हाथ जोड़े और आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि आज हम प्रमुखता से भगवान श्री राघवेंद्र सरकार के प्राकट्य महोत्सव में सम्मिलित होंगे और "ऐसा मानते है की जो भगवान के मंगल में सम्मिलित होते है उनके जीवन में नित्य मंगल होते है।" रामचरित्रमानस के बारे में चर्चा करेंगे , जिससे हमें भी कुछ सिखने को मिले की भगवान श्री राम आज भी भारत बर्ष के सदस्य सर्वश्रेष्ठ, उत्तम, निर्विरोध, महापुरुष मर्यादाप्रुषोतम उन जैसा पुत्र, उन जैसा भाई, उन जैसा पिता, उन जैसा पति, और उन जैसा पवित्र चरित्र, किसी का नहीं हो सकता। उन जैसा राजा वो श्रेष्ष्ठ मानवता का एक अद्भुत उदहारण है। जहाँ उनके मन किसी के प्रति कोई वेर नहीं ईर्ष्या नहीं सब के लिए प्रेम भाव भरा है।

महाराज जी ने कहा की राम कथा में युवाओं के लिए करना चाहता हूँ। ये अभी सीख लोगे ज़िन्दगी भर काम आएगी। माँ सती ने भगवान की कथा को मन से नहीं सुना, शक हुआ तो उसका परिणाम उनको शरीर त्यागना पड़ा। पहले पति प्रेम त्याग हुआ बाबा भोले नाथ ने उनको त्याग दिया। उसके बाद उनको अपना शरीर भी योग अग्नि में भष्म करना पड़ा. क्योकि प्राण त्यागते समय माँ सती ने वरदान माँगा था की मेरा जो भी जन्म हो मैं बाबा भोलेनाथ की ही पत्नी बनी।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

29Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन, कनाडा के तत्वाधान में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जुलाई से से 01 अगस्त 2019 तक Bhavani Shankar Mandir 90 Nexus Ave Brampton L6p 3R6 ( Near Hindu Sabha Mandir ) में श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन, कनाडा के तत्वाधान में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जुलाई से से 01 अगस्त 2019 तक Bhavani Shankar Mandir 90 Nexus Ave Brampton L6p 3R6 ( Near Hindu Sabha Mandir ) में श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु श्री राम के जन्म का वृतांत सुनाया।

श्रीराम कथा के चतुर्थ दिवस की शुरूआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि एक प्रशन उठता है की जब भगवान सामर्थयवान है तो फिर इस धरती पर जन्म क्यों लेते है ? रामायण में इस बात का स्पष्टिकरण किया गया है की वो भक्तों का कल्याण करने के लिए आते हैं। राम इस धरती पर रावण को मारने के लिए नहीं आए थे, वो तो अपने भक्तों को सुख देने के लिए आए थे। अगर इससे भी उपर देखा जाए तो हम जानते कैसे की कोई भगवान हैं, हम नहीं जान पाते की भगवान कैसा दिखता है, उसका स्वरूप क्या है ? उसका स्वभाव क्या है ? ये सब तो भगवान के आने से ही पता चला है। भगवान धरती पर यह बताने आते हैं की मैं तुम्हारा पुत्र हूं, मैं तुम्हारा मित्र भी हूं। उन्होंने कहा कि हमारी सोच इतनी सर्वश्रेष्ठ नहीं हैं, अगर हमारी सोच श्रेष्ठ हो तो भगवान तक पहुंचने में कोई मुश्किल नहीं है।

महाराज श्री ने कहा कि इस संसार में कोई दुख बांटने वाला नहीं है, यहां तो लोग दुख बढ़ाने वाले हैं। जिसे आप अपना समझकर दु:ख रो रहे हो, वो मौके पर आपका दुख बढ़ाएगा ही यह संसार का स्वभाव है। लेकिन दो द्वार ऐसे हैं जहां चले जाओ तो या तो आपका दुख घट जाएगा, दुख बढ़ेगा तो बिल्कुल भी नहीं। वो दो द्वार है गुरू और गोविंद के, अगर आपको रोना ही है तो या तो गुरू के वहां जाकर रोओ या फिर गोविंद के वहां जाकर, इससे आपका कल्याण हो जाएगा।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने प्रभु श्री राम के जन्म का वृतांत सुनाते हुए कहा कि राजा दशरथ अपने गुरू जी का पास गए और कहा कि हे गुरूवर मेरा पुत्र नहीं है, मैं दु:खी हूं। तो गुरू जी ने कहा कि चिंता मत कर तुम्हारे दु:ख का निवारण हो जाएगा तुम्हे यज्ञ करना होगा। गुरू जी ने कहा कि धैर्य धरो तुम्हारे चार पुत्र होंगे। राजा दशरथ ने पुत्रिष्ठी यज्ञ किया, इस यज्ञ के बाद राजा दशरथ के चार पुत्र राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न हुए। पुत्र होने की खुशी ने राजा दशरथ ने अपना सर्वस्व दान दे दिया। यहां सवाल है की सर्वस्व क्या है ? सर्वस्व परमात्मा के अलावा कुछ हो नहीं सकता, सर्वस्व राम है और राम राज दशरथ को मिले हैं तो राजा दशरथ ने राम जी को पूरी प्रजा की गोद में दे दिया मानो सब से कह रहे हों ये मेरा राम नहीं सब का राम है। किसी ने भी उस दान को अपने पास नहीं रखा सब ने एक दूसरे को देते हुए उस दान को राजा दशरथ को वापस दे दिया।

दशरथ के चारों पुत्र में दो गौर वर्ण के हैं और दो श्याम वर्ण के हैं। कैकयी और कौश्ल्या के पुत्र श्याम वर्ण के हैं और सुमित्रा के दोनो पुत्र गौर वर्ण के हैं। पुत्रों के होने के बाद राजा दशरथ ने गुरू जी से कहा आप इनका नामकरण कर दिजिए। जब नामकरण की बारी आई तो कौशल्या के पुत्र जब महाराज जी के गोद में आए तो राजा दशरथ ने कहा इनका मैं क्या नाम रखूं। तो गुरू जी ने कहा कि जो सुख का नाम है उसका नाम राम है, उसके बाद कैकयी के पुत्र की बारी आई तो कैकयी के पुत्र का नाम रखते हुए कहा जो विश्व का पालन करता है पोषण करता है उसका नाम भरत है। उसके बाद बारी आई सुमित्रा के दोनों के पुत्रों के नाम रखने की, महाराज जी ने कहा जो शत्रुओं का नाश करेगा उसका नाम शत्रुघ्न है, सुमित्रा के दूसरे पुत्र का नाम रखते हुए गुरू जी ने कहा जो राम का होगा प्रिय उनका ना है लक्ष्मण। इस तरह से राजा दशरथ के चारों पुत्रों का नामकरण सम्पन्न हुआ।

30Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन, कनाडा के तत्वाधान में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जुलाई से से 01 अगस्त 2019 तक Bhavani Shankar Mandir 90 Nexus Ave Brampton L6p 3R6 ( Near Hindu Sabha Mandir ) में श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन, कनाडा के तत्वाधान में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जुलाई से से 01 अगस्त 2019 तक Bhavani Shankar Mandir 90 Nexus Ave Brampton L6p 3R6 ( Near Hindu Sabha Mandir ) में श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीराम कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु श्रीराम के बाल्यकाल का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीराम कथा के पंचम दिवस की शुरूआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि श्रीराम की कथा हम सबको बहुत प्रेरणा देती है, शिक्षा देती है। जिन्होंने रामचरित्रमानस सुना है, पढ़ा है, गाया है, उन्हें पता है की गृहस्थ की मर्यादा क्या है ? संसार की मर्यादाएं क्या है ? बहुत आसान हो जाता है, बहुत सी समस्याओं का समाधान हो जाता है जिन्होंने रामचरित्रमानस में थोड़ा भी अपना ध्यान दिया है, उनके लिए गृहस्थ जीवन चलाना कोई बड़ी बात नहीं है। अगर हम बहुत युवा अवस्था में श्रीरामचरित्रमानस को पढ़ लें या जब शिशु गर्भ में होता है तो माता बाल कांड का पाढ़ करें तो उसी समय से शिशु को शिक्षा मिलने लगती है।

महाराज श्री ने कहा कि विद्यार्थी के लक्षण होते हैं । जितने भी विद्यार्थी हैं उन्हें कुछ चीजों का विशेष तौर पर ध्यान रखना चाहिए, अगर आप इन कुछ चीजों का ध्यान रखेंगे तो आप अच्छे विद्यार्थी हो सकते हैं । पहले हमारे यहां नियम था चाहे राजा का बेटा हो, चाहे किसी का भी बेटा हो, वो गुरूकुलम में पढ़ने जाता था। गुरू जी के वहां जब तक बच्चे पढ़ते थे, तब तक मां बाप उनका हाल चाल तक नहीं पुछ सकते थे और बच्चे वहां से निपुण होकर आते थे। एक बात याद रखें माता पिता का मोह ही बच्चों को बिगाड़ता है। बच्चों का ध्यान केंद्रित होना चाहिए, जिन बच्चों का ध्यान भटक जाता है वो काबिल होने के बाद भी कुछ नहीं कर पाते हैं। बच्चे अपनी शिक्षा के समय इस बात का ध्यान रखें की हम अपना ध्यान भटकने ना दें।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने प्रभु श्री राम जी के बाल्यकाल का वर्णन सुनाते हुए कहा कि प्रभु श्री राम जब बाल्यकाल में पढ़ने गए तो बहुत कम समय में शिक्षा प्राप्त कर ली। एक बार भगवान श्री राम अपने भाईयों, मित्रों को लेकर सरयु के तट पर पहुंचे तो वहां एक सुंदर मैदान था, तो राम जी का मन फुटबॉल खेलने का हुआ। अब राम जी की इच्छा जानते ही लक्ष्मण जी ने सोचा की कही ऐसा ना हो की राम जी में विपक्षी टीम में डाल दें। तो वो बोले प्रभु हम तो आपकी ही टीम में रहेंगे क्योंकि बचपन से लक्ष्मण जी राम जी की तरफ ही रहे हैं। अब राम जी ने सोचा की यहां कोई भी ऐसा नहीं है तो मेरी तरफ से ना खेला, सभी को मेरी तरफ से ही खेलना है, अब जब सारी मेरी तरफ से ही खेलेंगे तो खेल होगा कैसे ? लक्ष्मण जी तो राम की तरफ हो गए तो राम जी ने भरत जी की तरफ देखा, लेकिन कहा कुछ नहीं...यहां भाईयों का प्रेम देखिए की रामजी के देखते ही भरत जी बोले हां मैं विपक्षी टीम में रहूंगा । 
भडकाने वालों हर युग में होते है, जैसे ही भरत जी ने विपक्ष चुना तो भड़काने वालो ने कहा लो जी लक्ष्मण जी को तो अपने साथ ले लिया और आपको विपक्ष में कर दिया। लेकिन भरत जी भड़कने वालों में से नहीं थे, वो बोले अगर में राम जी के साथ रहूंगा तो मुझे कभी उनके बगल का दर्शन होता, कभी राम जी की पीठ का दर्शन होता लेकिन उनके विपक्ष में रहूंगा तो मुझे उनके मुख का ही दर्शन होता रहेगा ।

खेल शुरू हुआ तो राम जी ने चरण का प्रहार किया और गेंद सीधे भरत की तरफ गई, जब गेंद भरत जी की तरफ गई तो उन्होंने देखा की राम जी के चरण से स्पर्श हुई गेंद मेरी तरफ आ रही है तो उन्होंने जितनी जोर से राम जी ने मारा थी उससे अधिक तेज गति से प्रहार किया उस गेंद पर और राम जी की तरफ वापस कर दी। और जब वो गेंद राम जी के पास पहुंची तो राम जी ने प्रहार नहीं किया, बात ये हुई की जब बॉल वापस नहीं गई तो भरत जी जीत गए। अब वहां पर भी भड़काने वाले मौजूद थे, उन्होंने कहा वाह राम जी कितना बुरा किया आपने ये गेंद बेचारी के भाग्य उदय हुए की सब कुछ सोच के आई की दुनिया की शरण में जाने से कुछ नहीं मिलना राम की शरण में चलना चाहिए, तो वो सब कुछ छोड़ कर आपकी शरण में आई पर आपने क्या किया उसे लात मारकर बाहर कर दिया ऐसा आपने क्यों किया ? तो राम जी ने कहा भईया तुम नहीं समझोगे मैने इसलिए लात मारी क्योंकि जहां भरत जैसा संत मौजूद हो तुझे मेरी शरण में नहीं आना चाहिए, तुझे भरत की शरण में जाना चाहिए। जहां गुरू और गोविंद दोनों हो वहां पहले गुरू की शरण में जाना चाहिए।

अब वहां भरत जी को भड़काने वाले बोले कमाल कर दिया राम जी ने इतने धीरे से चरण का प्रहार किया और आपने इतनी तेज प्रहार किया इसका मतलब है आप राम जी को हराकर खुद जीतना चाहते हो। तो भरत जी बोले मैं जीतना नहीं चाहता, मैं तो इस गेंद की दुर्भाग्य को कह रहा था जहां साक्षात जगत के पालनहार खड़े हों तुझे मौका मिला था उनके चरणों में रहने का और तेरा दुर्भाग्य तू उनके चरण छोड़कर मेरे पास चली आई, तुझे वहीं जाना चाहिए क्योंकि दुनिया में आप कही घूम लो अन्त में आपको शांति केवल गोविंद के चरणों में आकर ही प्राप्त होगी।

भड़काने वाले राम जी से बोले अब जब यह गेंद आपके पास आई तो आपने चरणों का प्रहार क्यों नहीं किया ? तो भगवान श्री राम ने बहुत ही प्यारा जवाब दिया, उन्होंने कहा मैने पहले चरण का प्रहार किया संत के पास भेजने के लिएर फिर संत ने चरण का प्रहार किया और मेरे पास भेज दिया, तो जिस पर संत का चरण स्पर्श हो गया हो और फिर वो मेरे पास आए तो फिर मैं उसका त्याग नहीं करता, उसे स्वीकार करता हूं, फिर चाहे उसे स्वीकार करने में मेरी हार ही क्यों ना हो जाए। यही तो भरत और राम का प्रेम है।

31Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन, कनाडा के तत्वाधान में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जुलाई से से 01 अगस्त 2019 तक Bhavani Shankar Mandir 90 Nexus Ave Brampton L6p 3R6 ( Near Hindu Sabha Mandir ) में श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के षष्ठम दिवस पर प्रभु श्रीराम का विवाहोत्सव बड़ी ही धूमधाम से मनाया गया।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन, कनाडा के तत्वाधान में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 26 जुलाई से से 01 अगस्त 2019 तक Bhavani Shankar Mandir 90 Nexus Ave Brampton L6p 3R6 ( Near Hindu Sabha Mandir ) में श्रीराम कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के षष्ठम दिवस पर प्रभु श्रीराम का विवाहोत्सव बड़ी ही धूमधाम से मनाया गया।

श्रीराम कथा के षष्ठम दिवस की शुरूआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत कल के कथा क्रम को याद दिलाते हुए कहा कि विश्वामित्र जी राम जी को लेने आए तो राजा दशरथ ने राम जी को देने से मना कर दिया। यथार्थ में सत्य ये है की भगवान देने का विषय है ही नहीं, हमारी इतनी हैसियत भी नहीं है की हम भगवान को दे सकें, राजा महाराजा कोई कितना भी बड़ा क्यों ना हो वो भगवान नहीं दे सकता। वो द्रव्य दे सकता है, हीरे जवाहरात दे सकता है, व्यवस्था दे सकता है लेकिन भगवान नहीं दे सकता। भगवान देने का अधिकार अगर किसी को है तो वो संतों को है, गुरूओं को है। किसी गुरू की शरण में जाओ, कृपा हो जाए तो भगवत प्राप्ति हो जाएगी इसमें कोई संदेह नहीं है।
महाराज श्री ने कहा कि जो किसी को दुख दे, जिसका व्यवहार ही हो दुसरों को दुख देना ऐसे लोगों का वध पाप नहीं है। उन्होंने कहा की गुरू की आज्ञा का पालन करने में कोई भी पाप पुण्य शिष्य को नहीं सोचना चाहिए । गुरू, माता, पिता संसार में ये तीन लोग ऐसे हैं जिनकी आज्ञा हो जाए तो कोई भी पाप पुण्य नहीं सोचना चाहिए । सांसारिक जीवन में पहले माता, फिर पिता, फिर गुरू और आध्यात्मिक जीवन में पहले गुरू, फिर माता, फिर पिता। अगर ये भी आपको भक्ति से दूर करते हों, धर्म से दूर करते हों तो इन तीनों की बातों को मत सुनिए। इन सब चीजों का इतिहास गवाह है, भरत जी ने अपनी मां को छोड़ा, प्रह्लाद जी ने अपने पिता को छोड़ा, राजा बली ने अपने गुरू को छोड़ा । 
महाराज श्री ने कहा कि हमारा इतिहास ऋषि मुनियों की अच्छाई से भरा हुआ है, एक से एक भक्त हुए हैं, ऋषि हुए हैं, अगर वो नहीं होते तो इतना सुंदर जीवन नहीं जी रहे होते । यह हमारा दुर्भाग्य है की हम बुराईयों को पकड़ लेते हैं और अच्छाईयों को दूर कर देते हैं। कोई भी यहां उत्तम नहीं है सब में कुछ ना कुछ कमियां हैं लेकिन आपकी समझ के लिए सिर्फ अच्चाई है। हर किसी की अच्छाई को पकड़ो, अगर बुद्धि है, विवेक है, दिमाग है तो अच्छाई पकड़ो, बुराई में क्या रखा है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने प्रभु श्रीराम के विवाहोत्सव का प्रसंग सुनाते हुए कहा की विश्वामित्र जी के साथ प्रभु श्री राम जनकपुर पहुंचे, वहां पहुंचने पर जैसे ही राजा जनक ने श्रीराम जी को देखा तो एक ह्रदय में एक तरफ राम जी और दूसरी तरफ सीता जी की छवि उमड़ आई। राजा जनक ने विश्वामित्र जी से राम जी के विषय में पूछा की ये कौन हैं तो उन्होंने कहा कि ये दशरथ जी महाराज के पुत्र हैं और मेरे यज्ञ की रक्षा के लिए भेजा है और आज देखिए यज्ञ भी सम्पन्न हो गया, बड़े बलवान हैं ये राम लक्ष्मण। कुछ दिनों बाद सीता स्वयंवर का समय आया, राजा दशरथ ने राम जी उच्च सिंहासन पर बैठाया, मानो यूं बता रहे हों की मिथिला वासियों ये देख लो ये सीता के योग्य वर है। स्वयंवर का समय आया, राजा दशरथ ने सभी राजाओं से कहा जाओ जिसके लिए आए हो वो कार्य करो, सभी राजा उठे धनुष तोड़ने के लिए गए लेकिन कोई भी राजा धनुष तोड़ना तो दूर, धनुष को हिला भी नहीं सके। यह देख जनक जी को क्रोध आ गया, जब क्रोध आया तो वो बोले हमको ऐसा लगता है जैसे ये पृथ्वी वीरों से विहिन हो गई है, अब इस पृथ्वी पर योद्धा नहीं बचे, क्या कोई ऐसा योद्धा नहीं है जो इस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाए और मेरी बेटी से विवाह करे। 
राजा जनकी की बात सुनकर वहां बैठे लक्षमण जी ने प्रभु श्री राम की तरफ देखा लेकिन वो तो मर्यादापुरूषोत्तम थे वो कसे बोलते, तो लक्षमण जी ने सोचा की प्रभु भी ना बोले और हम भी ना बोलें तो कैसे चलेगा। लक्षमण जी बोले उठे उन्होंने कहा जनक बिना सोचे समझे कुछ नहीं बोलना चाहिए हमारे गुरूजी ने आज्ञा नहीं दी है हमने अपने धनुष उठाया नहीं है, अभी हम यहां बैठे हैं और रघुवंशियों का एक भी बच्चा जहां बैठा हो वहां ऐसे शब्द कोई बोल नहीं सकता की पृथ्वी पर कोई वीर नहीं है। मुझे इस धनुष को तोड़ने में एक क्षण नहीं लेगा, लक्षमण जी ने जब यह कहा तो धरती कांप उठी, राजा भी भयभीत हो गए। राजा जनक को लगा की बात तो यह सही है अभी रघुवंशी बैठे हैं। लक्षमण जी के बढ़ते क्रोध को देखते हुए राम जी उन्हे शांत करवाकर बैठाया।
विश्वामित्र जी ने उचित समय जानते हुए श्री राम को आदेश दिया की हे राम उठो और राजा जनक की दुविधा को समाप्त करो। श्री राम जी उठे और अपने गुरू को मन ही मन प्रणाम किया, जब श्री राम धनुष की तरफ बढ़ने लगे तो सब सोचने लगे की अब क्या होगा, क्या धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ेगी, जिसे धनुष को हजारों लोग मिलकर नहीं उठा पाए क्या यह वनवासी उसे उठा पाएगा। प्रभु श्री राम धनुष उठाने गए, श्री राम ने धनुष उठाने से पूर्व गुरू चरणों में प्रणाम किया और धनुष को एक पल में उठा लिया, प्रत्यंचा चढायी और धनुष को तोड़ दिया। पूरे संसार में बधाईयां गायी जाने लगी, सीता मईया प्रभु श्रीराम की हो गई और राम सीता विवाह संपन्न हुआ।

आज कथा स्थल पर पी.सी पार्टी के केंडिडेट श्री अर्पण खन्ना जी, भाजपा अध्यक्ष कनाडा श्री बिपिन शर्मा जी एवं पी.सी पार्टी केंडिडेट श्री मुरारी लाल जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया।

23Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 21 जुलाई से 23 जुलाई 2019 तक स्थान -टोरंटो, कनाडा हिन्दू प्रार्थना समाज टेम्पल में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्री कृष्ण कथा का आयोजन किया जा रहा है।

धर्म और सत्संग जीवन में अवश्य धारण करना चाहिए - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

गृहस्थ आश्रम से बड़ा कोई और आश्रम नहीं है - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 21 जुलाई से 23 जुलाई 2019 तक स्थान -टोरंटो, कनाडा हिन्दू प्रार्थना समाज टेम्पल में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्री कृष्ण कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्री कृष्ण कथा के तृतीय दिवस पर सैकड़ो की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

श्री कृष्ण कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा की शुरुआत महाराज श्री ने बहुत ही सुन्दर मानस की चौपाई से की और बताया की बिना सत्संग के विवेक नहीं मिलता और जब तक गुरु की कृपा न हो गोविन्द की कृपा न हो तब तक जीवन में सत्संग श्रवण का अवसर प्राप्त नहीं होता। अगर आप को जीवन में सत्संग सुनने का अवसर प्राप्त हो तो मात्र उसे सुने नहीं बल्कि उसे अपने जीवन में भी धारण करें, हमे धर्म और सत्संग अवश्य धारण करना चाहिए।

पंडित जी ने बताया की हमारे सनातन धर्म में चार तरह के आश्रम है ब्रह्मचर्य आश्रम दूसरा गृहस्थ, तीसरा वानप्रस्थ, और चौथा संन्यास है, इन सब आश्रमों में से सबसे सवर्श्रेष्ठ आश्रम गृहस्थ है। क्यूंकि गृहस्थ ही वो आश्रम है जो भगवान को गोदी में ख़िलाता है।

महाराज श्री ने बताया की जो जीव सत्य धर्म और ईश्वर के मार्ग से भटक जाता है वो जीव फिर ज़िन्दगी भर 84 लाख योनियों में भटकता ही रहता है। इसलिए हमें इस मानव जीवन में आकर इस बहुमल्य जीवन को यूँ ही व्यर्थ नहीं करना चाहिए।

व्यास जी ने बताया की अगर आप संतो के सानिध्य में रहोगे तो आपका जीवन सुखमय होगा। आपको अपने बच्चो को भी सत्संग में लेकर जाना चाहिए ताकि जीवन में उन्हें कभी भी समस्या का सामने करना पड़े तो वो संतो की शरण में जाकर उन्हें सभी समस्याओं का समाधान मिल जाए।

23Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 21 जुलाई से 23 जुलाई 2019 तक स्थान -टोरंटो, कनाडा हिन्दू प्रार्थना समाज टेम्पल में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्री कृष्ण कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्री कृष्ण कथा के द्वितीय दिन सैकड़ो की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

संतो का हक़ खाना सबसे बड़ा पाप है - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

कलयुग में मानसिक रूप से किये गए पुण्यो का भी फल मिलता है - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

संतो का संग आपका स्वाभाव, आचरण , किस्मत तक बदल देता है - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

सेवा की शुरुआत आनंद से होती है - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 21 जुलाई से 23 जुलाई 2019 तक स्थान -टोरंटो, कनाडा हिन्दू प्रार्थना समाज टेम्पल में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्री कृष्ण कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्री कृष्ण कथा के द्वितीय दिन सैकड़ो की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

श्री कृष्ण कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की आपने अपने जीवन में जो भी मानसिक पुण्य किया होगा उसका फल आपके जीवन में आपको जरूर मिलता है।

महाराज श्री ने बताया की हमें अपने जीवन में संतो का संग जरूर करना चाहिए क्यूंकि संतो के सानिध्य और आशीर्वाद से हमारे जन्म जन्मो के पाप जो जमा है उनसे हमें मुक्ति मिलती है, आजकल का कलयुगी मनुष्य इस वहम में रहता है की वो पापी नहीं है उसके पाप कम और पुण्य ज्यादा है लेकिन असल में जो लोग पापी होते है उनका मन कभी धार्मिक कार्यो में नहीं लगता और जिस जीव के पाप ज्यादा है उसका मन कभी बुरे काम में नहीं लगेगा।

व्यास जी ने कहा की ब्राह्मण का हक़ खाना सबसे बड़ा पाप है, और आजकल आप सड़को पर भिखारियों को देखते होंगे वो इसलिए भिखारी नहीं है की वो निर्धन है बल्कि उनके निर्धन होने का कारण उनके पिछले जन्म के कर्म है, जो भी व्यक्ति किसी का हक़ मार कर खाता है वो अगले जन्म में दरिद्र बनता है इसलिए हमें जीवन में कभी भी किसी का हक़ नहीं मरना चाहिए।

महाराज श्री ने बताया की कलिकाल में जीव अगर मानसिक रूप से कोई धार्मिक यात्रा करें तो उसे उसका फल मिलता है , कलियुग के लोगों पर ठाकुर जी की इतनी कृपा है की अगर आप मानसिक पाप करोगे तो आपको पाप नहीं लगेगा और मानिसक पुण्य करोगे तो आपको उसका लाभ मिलेगा क्यूंकि हमारा ठाकुर बहुत दयालु है। लेकिन अगर आप अपने जीवन में कोई पाप करते है तो उसको तो आपको भोगना ही पड़ेगा।

संतो का संग आपका स्वाभाव, आचरण , कर्म और आपकी किस्मत तक बदल देता है 
बुरे लोगों का संग करने से आप जन्म जन्मांतर तक फंस जाते हो, और संतो के संग से ये आपका आखरी जीवन होता है।

महाराज श्री ने सावन के पहले सोमवार के शुभ अवसर पर श्री कृष्ण कथा के माध्यम से सबसे लम्बी मानसिक कावड़ यात्रा कनाड़ा के भक्तों को करवाई,और सात समंदर पार धर्म प्रेमियों को मानसिक कावड़ के माध्यम से भगवान शिव शंकर पर गंगा जल अभिषेक करवाया।

 
श्री कृष्ण कथा-द्वितीय दिवस-टोरंटो, कनाडा
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20Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के पावन सानिध्य में 20 जुलाई 2019 को हैमिलटन, कनाड़ा में श्री कृष्ण कथा का विशाल आयोजन किया गया।

"देश और धर्म की सेवा ही सबसे बड़ी सेवा है।"-पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

कलयुग का प्रभाव ही हमारे मन में अविश्वास प्रकट करता है : पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के पावन सानिध्य में 20 जुलाई 2019 को हैमिलटन, कनाड़ा में श्री कृष्ण कथा का विशाल आयोजन किया गया।

श्री कृष्ण कथा की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

महाराज श्री ने श्री कृष्ण कथा की शुरूआत करते हुए भक्तों को बहुत ही मधुर भजन "मुरली मनोहर गोपाला" श्रवण कराया। उसके बाद बताया की ये हमारे भगवान के अहेतु की कृपा है जिस वजह से हम कनाड़ा में बैठ कर श्री कृष्ण कथा का रसपान कर पा रहे है।

महाराज श्री ने बताया की जीवन में सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति वही होता है जो अपने संस्कारो और अपने धर्म का पालन करता है। जो जीव समय के अनुसार अपने संस्कारो और धर्म को अपनाता व छोड़ देता है वो व्यक्ति ईश्वर की नज़र में दोषी होता है।

महाराज श्री ने कहा की भारतीय संस्कृति विश्व विख्यात है, और अगर भारतीय संस्कृति को सम्पूर्ण विश्व ग्रहण कर ले तो पुरे विश्व में शान्ति आ जायेगी क्यूंकि भारतीय संस्कृति मानवता और शान्ति का पाठ पढ़ाती है।

व्यास जी ने बताया की जीव इस जीवन में सुख शान्ति के लिए दिन रात काम करता है मेहनत करता है पैसे कमाता है लेकिन उसे फिर भी शान्ति नहीं मिलती, अगर आप को सच में शान्ति चाहिए तो भगवान के सामने जाकर बैठ जाए भगवान से प्रार्थना करें भगवान की लीलाओं का चिंतन मनन करे शान्ति खुद ब खुद आपके हृदय में सहज सुलभ हो जाएगी।

महाराज श्री ने बताया की आज के इस कलयुग में सभी माता - पिता अपने बच्चों को भगवान राम की तरह बनाना चाहती है लेकिन आपके बच्चे राम तब बनेंगे जब आप अपने बच्चोँ में श्री राम जैसे आचरण डालेंगे। उन्हें धर्म की बात बताएँगे उनसे धार्मिक कार्य कराएँगे, सत्संगो में ले जायेंगे। लेकिन माँ - बाप ये सोचते है की हमने अपने बच्चों को सब सुख सुविधाएं दे दी तो उनकी जिम्मेदारी पूरी हो गई लेकिन आपकी असल जिम्मेदारी तब पूरी होगी जब आपके बच्चों के माथे पर तिलक, सर पर शिखा और गले में तुलसी की माला होगी।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

#ThakurJiInCanada #ShantiSandeshYatra

23Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 21 जुलाई से 23 जुलाई 2019 तक स्थान -टोरंटो, कनाडा भारत माता मंदिर एवं हिन्दू टेम्पल में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्री कृष्ण कथा का आयोजन किया जा रहा है।

बिना सत्संग के विवेक जागृत नहीं होता - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

हमारे पापो को नष्ट करता है सत्संग श्रवण - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

जीपीएस का असली मतलब है गुरु, परमात्मा और सत्य- पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 21 जुलाई से 23 जुलाई 2019 तक स्थान -टोरंटो, कनाडा भारत माता मंदिर एवं हिन्दू टेम्पल में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्री कृष्ण कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के प्रथम दिन सैकड़ो की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

श्री कृष्ण कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की आज के समय में आपकी संगत बहुत महत्वपूर्ण है क्यूंकि आपकी जिंदगी के बाद के परिणाम भी आपके संग पर निर्भर है। आजकल का जीव बिना कुछ सोचे - समझे किसी को भी अपना दोस्त बना लेते है और उसकी संगत में चल पड़ते है। आपने जिन किन्ही भी लोगों की बुरी संगत का संग किया है वो सिर्फ आपके केवल इस जीवन ही नहीं बल्कि उसका प्रभाव आपके आने वाली पीढ़ी पर भी पड़ता है। क्यूंकि जीव जैसे कर्म का संगत करता है उसकी वैसी ही उनकी विचार धारा बनती है। वो फिर वैसा ही बोलते है, वैसा ही सोचते है और वैसा ही करने की कोशिश करते है।

महाराज श्री ने बताया की जब तक आपके जीवन में सत्संग नहीं होगा आपके जीवन में विवेक जागृत नहीं हो सकता। जब तक आप पर भगवान् की कृपा नहीं होगी तब तक आपको सत्संग में जाने का मौका नहीं मिलेगा।

हमे हमारे पापो को नष्ट करने के लिए सत्संग में जाना चाहिए संतो का संग करना चाहिए क्यूंकि बिना गुरु और संत की शरण में जाए बिना हमारे जीवन का उद्धार नहीं हो सकता।

महाराज श्री ने बताया की गुरु, परमात्मा और सत्य ही जीपीएस का असली मतलब है और गुरु के द्वारा बताये गए सत्य के मार्ग पर चलोगे तो आपको परमात्मा की प्राप्ति होगी, जिसकी शुरुआत हमें सत्संग से करनी चाहिए ताकि आपके जीवन के टारगेट की प्राप्ति आपको हो जाए। बिना जीपीएस के आपको भगवान् की प्राप्ति नहीं हो सकती।

18Jul 2019

आज पूज्य महाराज श्री एवं विजय शर्मा जी कनाडा पहुंचे जहां विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन कनाडा के सदस्यों व भक्तों द्वारा स्वागत किया गया।

आज पूज्य महाराज श्री एवं विजय शर्मा जी कनाडा पहुंचे जहां विश्व शांति सेवा चैरिटेबल मिशन कनाडा के सदस्यों व भक्तों द्वारा स्वागत किया गया।यहाँ पूज्य महाराजश्री के सानिध्य में 20 जुलाई से 15 अगस्त तक श्रीराम कथा, श्रीकृष्ण कथा, श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।

 

30Nov -0001

ठा. प्रियाकांत जू मंदिर, शांति सेवा धाम, वृंदावन में "गुर पूर्णिमा महोत्सव" के पावन अवसर पर पूर्णमासी महासंकीर्तन का सुंदर एवं भव्य आयोजन पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में बड़ी हर्षोल्लास के साथ मनाया गया जिसमें हजारों भक्त मौजूद रहे। सर्वप्रथम गणेश वंदना कर कार्यक्रम की शुरुआत की गई तथा ठाकुर श्री प्रियाकांत जू भगवान, सर्वेश्वरीश्री राधा रानी के प्यारे प्यारे भजनों की प्रस्तुति दी गई।

ठा. प्रियाकांत जू मंदिर, शांति सेवा धाम, वृंदावन में "गुर पूर्णिमा महोत्सव" के पावन अवसर पर पूर्णमासी महासंकीर्तन का सुंदर एवं भव्य आयोजन पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में बड़ी हर्षोल्लास के साथ मनाया गया जिसमें हजारों भक्त मौजूद रहे। सर्वप्रथम गणेश वंदना कर कार्यक्रम की शुरुआत की गई तथा ठाकुर श्री प्रियाकांत जू भगवान, सर्वेश्वरीश्री राधा रानी के प्यारे प्यारे भजनों की प्रस्तुति दी गई। इस अवसर पर सुप्रसिद्ध भजन गायक श्री नंदू भईया जी ने भी अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई एवं अपने भजनों से भक्तों को झूमने पर मजबूर कर दिया। महोत्सव में देश के जाने माने भजन गायकों ने भी ठा. श्री प्रियाकांत जू के चरणों के हाज़िरी लगाई, उनके भजनों पर भक्त जमकर झूमे। महाराज श्री द्वारा गए गये भजनो पर सभी भक्तगण झूमते नाचते रहे, जहां तक नजर जा रही थी वहीं तक भक्त नजर आ रहे थे। अंत में ठाकुर श्री प्रियाकांतजू भगवान की आरती का कार्यक्रम का समापन किया गया ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

17Jul 2019

आज शाम पूज्य महाराजश्री एवं विजय शर्मा जी ने वृन्दावन से कनाडा के लिए प्रस्थान किया, प्रस्थान से पूर्व ठा. श्री प्रियाकांत जू भगवान एवं पूज्य पिता जी के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया । राधे राधे।

आज शाम पूज्य महाराजश्री एवं विजय शर्मा जी ने वृन्दावन से कनाडा के लिए प्रस्थान किया, प्रस्थान से पूर्व ठा. श्री प्रियाकांत जू भगवान एवं पूज्य पिता जी के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया । राधे राधे।

16Jul 2019

आज शाम ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर, शान्ति सेवा धाम, वृन्दावन में दिल्ली कथा को लेकर ट्रस्ट सचिव श्री विजय शर्मा जी के साथ मीटिंग हुई जिसमे कि 25 मार्च से 2 अप्रैल 2020 तक श्रीराम कथा का आयोजन भजनपुरा, दिल्ली में होना सुनिश्चित हुआ हैं।

आज शाम ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर, शान्ति सेवा धाम, वृन्दावन में दिल्ली कथा को लेकर ट्रस्ट सचिव श्री विजय शर्मा जी के साथ मीटिंग हुई जिसमे कि 25 मार्च से 2 अप्रैल 2020 तक श्रीराम कथा का आयोजन भजनपुरा, दिल्ली में होना सुनिश्चित हुआ हैं। इस अवसर पर श्री एच .पी अग्रवाल जी, श्री मुकेश पाण्डेय जी, श्रीपाल जिंदल जी, श्री बिजेंदर सोनी जी, श्री शेराराम भादू जी, श्री अशोक खुराना जी, श्री वीर सिंह जी, श्री महेश अग्रवाल जी मौजूद रहें। ।। राधे राधे ।।

 

16Jul 2019

आज शाम ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर, शान्ति सेवा धाम वृन्दावन में मुम्बई कथा को लेकर ट्रस्ट सचिव श्री विजय शर्मा जी के साथ मीटिंग हुई जिसमे कि 15 से 22 दिसम्बर 2019 तक मुम्बई में होने वाली श्रीमद्भागवत कथा की तैयारियों को लेकर समिति के सदस्यों के साथ चर्चा हुई।

आज शाम ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर, शान्ति सेवा धाम वृन्दावन में मुम्बई कथा को लेकर ट्रस्ट सचिव श्री विजय शर्मा जी के साथ मीटिंग हुई जिसमे कि 15 से 22 दिसम्बर 2019 तक मुम्बई में होने वाली श्रीमद्भागवत कथा की तैयारियों को लेकर समिति के सदस्यों के साथ चर्चा हुई। ।। राधे राधे।।

 

11Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 से 11 जुलाई 2019 तक प्रतिदिन करनैल सिंह नगर, अटल अपार्टमेंट, नियर सिंह सभा गुरूद्वारा, पखोवाल रोड़, लुधियाना में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत सुनने मात्र का संकल्प लेने से हमारे पितृ खुश हो जाते है- पंडित देवकीनंदन ठाकुर जी

जिस परिवार में धर्म नहीं वो परिवार मृत सामान है-पंडित देवकीनंदन ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 से 11 जुलाई 2019 तक प्रतिदिन करनैल सिंह नगर, अटल अपार्टमेंट, नियर सिंह सभा गुरूद्वारा, पखोवाल रोड़, लुधियाना में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की कृष्ण हर जगह किसी न किसी रूप में मौजूद है। और जिस जीव के करोडो पुण्य एकत्रित होते है उसे सम्पूर्ण भागवत सुनने को प्राप्त होती है, भागवत सुनने मात्र का संकल्प लेने से हमारे पितृ खुश हो जाते है। भागवत जैसा पुनीत और पावन ग्रन्थ सरल नहीं है और यदि अगर हम किसी भागवत कथा पंडाल में कथा श्रवण कराने ले जाए तो उसका लाभ हमें भी मिलता है। 
महाराज श्री ने बताया की सेवा धन से नहीं मन से होती है और जिस परिवार में धर्म नहीं है, अध्यात्म नहीं है वो परिवार मृत सामान है। जब कभी भी किसी जीव के जीवन में कोई दुविधा आती है तो वो सबसे पहले भगवान को कोसता है लेकिन वो ये नहीं जानता की तुम्हारा कर्म ही तुम्हे सुख और दुःख भोगने पर विवश करता है। 
महाराज श्री ने बताया की आपको अपने बच्चो को धर्म के बारे में बताना चाहिए उन्हें धार्मिक जगहों पर ले जाना चाहिए उन्हें संस्कारी बनाना चाहिए ताकि आपके जाने के बाद भी आपके बच्चे विधि- विधान से पूजा- पाठ करते रहें, धर्म का प्रचार करें और ये हमारी जिम्मेदारी है हमारे परिवार के प्रति तभी हमारा धर्म आगे बढ़ेगा। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंत: सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

6Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 से 11 जुलाई 2019 तक प्रतिदिन करनैल सिंह नगर, अटल अपार्टमेंट, नियर सिंह सभा गुरूद्वारा, पखोवाल रोड़, लुधियाना में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। 

ज्ञान की गंगा में गोते लगाने से सभी पाप समाप्त हो जाते है - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

जिस व्यक्ति के जीवन में धर्म नहीं वो पशु के समान है - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

धर्म करने वाला व्यक्ति भगवान के हृदय में वास करता है - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 से 11 जुलाई 2019 तक प्रतिदिन करनैल सिंह नगर, अटल अपार्टमेंट, नियर सिंह सभा गुरूद्वारा, पखोवाल रोड़, लुधियाना में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। 
भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की भगवान की भक्ति करने से हमे पल -पल उनका हर कदम पर सहारा मिलता है। भक्ति, भजन करने से सत्संग करने से हमें वो प्राप्त होता है जो हमारी कल्पना से भी परे है। इस संसार में आपको वो लाभ नहीं मिलेगा जो आपको कृष्ण की भक्ति में मिलेगा क्यूंकि भगवान् के सच्चे भक्तों को पग पग पर सहारा मिलता है।

पंडित जी ने बताया की जिस व्यक्ति के जीवन में धर्म नहीं है, कृष्ण प्रेम नहीं है भगवान का स्मरण नहीं है वो व्यक्ति पशु के सामान है। क्यूंकि अगर आपने मानव जीवन में आकर भगवन का भजन नहीं किया भगवान् का स्मरण नहीं किया तो आपका मनुष्य योनि में जनम लेना व्यर्थ है।

महाराज श्री ने बताया की भगवान के सच्चे भक्त वो लोग होते है जो धर्म की रक्षा करने के लिए सदैव तत्पर रहते है लेकिन आज का कलयुगी मनुष्य भगवान को तब याद करता है जब वो की किसी काल से घिरा हुआ होता है। इसलिए हमें अपने ह्रदय में वास करा लेना चाहिए जिससे अपने आप सभी काल ग्रहो का नाश हो जाता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

12Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 से 11 जुलाई 2019 तक प्रतिदिन करनैल सिंह नगर, अटल अपार्टमेंट, नियर सिंह सभा गुरूद्वारा, पखोवाल रोड़, लुधियाना में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया ।

अगर मन की शांति चाहते हो तो उसे स्वच्छ रखो

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 से 11 जुलाई 2019 तक प्रतिदिन करनैल सिंह नगर, अटल अपार्टमेंट, नियर सिंह सभा गुरूद्वारा, पखोवाल रोड़, लुधियाना में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया ।

कथा के तृतीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
कथा की शुरूआत भागवत आरती एवं विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि मृत्यु एक ऐसा पल है जिसे कोई टाल नहीं सकता इसिलिए या तो जीवन सुधर जाए या फिर मृत्यु सुधर जाए। जीवन तो बिगड़ रहा है, आज का जो माहौल है उसमें जीतने दिन जिंदा रहेंगे उसमें जीवन बिगड़ेगा ही। जब जब सुधरने के हालात होते हैं तब तब कोई बिगाड़ने वाला आ ही जाता है। तो जीवन कैसे सुधरे, जीवन उस दिशा में कैसे जाए जहां से जीवन सुधर जाए या तो मृत्यु सुधर जाए। जीवन तो धीरे धीरे व्यतीत हो रहा है लेकिन मृत्यु सुधारी जा सकती है।

महाराज श्री ने कहा कि अगर मन की शांति चाहते हो तो सफेद रंग की तरह जीवन को एकदम स्वच्छ रखो, इसपर छोटी सा दाग भी लग जाए तो दिखता है। यह मानव रूपी जीवन की यह चादर मिली है तो इसे युक्ति के साथ जीओ। तो मिल जाए खालो, जहां मिल जाए सो जाओ, जो मन में आया बोल दो, ऐसा मत करो, खाने से पहले सोचो की क्या मैं इसे भगवान को भोग लगा सकता हूं, बोलने से पहले सोचो क्या कोई ये शब्द मुझे भी बोल सकता है। हर कर्म करने से पहले सोचो फिर करो। हमारे संतो ने बड़े मार्ग दिखाए हैं, सोचे समझे बगैर कुछ भी मत बोलो, कुछ भी मत करो। अगर कुछ चीज नहीं सोचनी है तो वो भगवान का नाम किस समय लें यह नहीं सोचना है, जब मन करे ले लो।

महाराज श्री ने पाश्चयात कल्चर पर अपनी बात रखते हुए कहा कि कभी सोचा है कि इस पाश्चयात कल्चर ने आपको दिया क्या है ? इस पाश्चयात कल्चर ने आपको सिर्फ असुरक्षा दी है। उन्होंने कहा कि हमारे देश का दुर्भाग्य है की यहां लिव इन रिलेशनसिप जैसे कानून बनते हैं, और कोई बोलता नहीं है। कोई ऐसा देश नहीं होगा जो अपने कल्चर का गला अपने हाथों से घोटता होगा लेकिन यह भारत है यहां अपने ही कल्चर का गला अपने ही हाथों से घोटा जा रहा है। और कोई बोलता नहीं है, कोई देश नहीं बचाना चाहता सब को अपना पद बचाना है। यह भारत वो भारत नहीं है जहां श्री राम राज्य किया करते थे, यह भारत बदल रहा है, लेकिन यह अच्छाई की ओर नहीं बदल रहा है। हमे संस्कार वाला भारत चाहिए, संस्कार विहिन नहीं ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।

राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।

8Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 से 11 जुलाई 2019 तक प्रतिदिन करनैल सिंह नगर, अटल अपार्टमेंट, नियर सिंह सभा गुरूद्वारा, पखोवाल रोड़, लुधियाना में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

पुरे विश्व में एक ही धर्म है सनातन धर्म - पंडित देवकीनंदन ठाकुर जी

आपके अच्छे कर्मो का सर्वश्रेठ फल है की आपने सनातन धर्म में जन्म लिया है - पंडित देवकीनंदन ठाकुर जी

सनातन धर्म में ईश्वर को प्राप्त करने के अनेक मार्ग है - पंडित देवकीनंदन ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 से 11 जुलाई 2019 तक प्रतिदिन करनैल सिंह नगर, अटल अपार्टमेंट, नियर सिंह सभा गुरूद्वारा, पखोवाल रोड़, लुधियाना में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
कथा के चतुर्थ दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की हम भगवान से हमेशा ये प्रार्थना करें की हे प्रभु आपके श्री चरणों से हमें प्रीत हो जाए और हमारा मन आपके श्री चरणों को छोड़कर इस मोह माया एवं संसार के चक्कर में कभी इधर उधर न भटके आपकी कृपा आपका आशीर्वाद सदैव हमारे ऊपर बना रहें।

महाराज श्री ने बताया की आज कल कुछ लोग लोगों के धर्म परिवर्तन करा रहें है लेकिन धर्म कोई वस्त्र नहीं जिसे आप बदल लें और अगर आप धर्म बदलना भी चाहेंगे तो कैसे बदल पाएंगे क्यूंकि धर्म तो एक ही है, आपके पूजा करने की पद्द्ति बदल सकती है लेकिन आपका धर्म नहीं बदल सकता। क्यूंकि पुरे विश्व में एक ही धर्म है जिसका नाम है सनातन धर्म और हमारे ऋषि मुनियों ने भी कहा है की अपने धर्म में रहकर मृत्यु भी आनंद दायक होता है। जैसे हम अपने पिता को नहीं बदल सकते, अपने पति को नहीं बदल सकते, अपनी आत्मा को नहीं बदल सकते उसी तरह हमें अपना धर्म बदलने का भी अधिकार भी नहीं है। आपको ठाकुर जी ने जिस धर्म में भेजा है आपको उसी का पालन करना पड़ेगा।

पंडित जी ने बताया की सनातन धर्म में जन्म मिलना कोई मामूली बात नहीं है यह आपके अच्छे कर्मो का सर्वश्रेष्ठ फल है कि आपको सनातन धर्म में जन्म मिला है क्यूंकि इसी धर्म में भगवान के अवतार बार - बार होते है। जब- जब भगवान के भक्तो पर कोई विपत्ति आती है तो भगवान अवतार लेकर अपने भक्तों की रक्षा के लिए पृथ्वी पर प्रकट होते है और जीव का कल्याण करते है।

व्यास जी ने बताया की सत्य सनातन धर्म में ईश्वर को प्राप्त करने के अनेक मार्ग है। ज्ञान मार्ग, भक्ति मार्ग और वैराग्य मार्ग जो भी मार्ग जीव को अच्छा लगे उस मार्ग पर चलकर वो ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। ज्ञानियों के लिए वो ब्रह्मा है वेदान्तियों के लिए वो परमात्मा है और भक्तों के लिए वो भगवान है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया। शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे। महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।" जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया। इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

9Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 से 11 जुलाई 2019 तक प्रतिदिन करनैल सिंह नगर, अटल अपार्टमेंट, नियर सिंह सभा गुरूद्वारा, पखोवाल रोड़, लुधियाना में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

हमें बोलने से पहले सुनना चाहिए - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

कोई भी रिश्ता बिना सहनशीलता के निभाया नहीं जाता- पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 से 11 जुलाई 2019 तक प्रतिदिन करनैल सिंह नगर, अटल अपार्टमेंट, नियर सिंह सभा गुरूद्वारा, पखोवाल रोड़, लुधियाना में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की इस जीवन में हम छोटी - छोटी बहुत सी गलतियां करते है जिनकी वजह से हम लोग ईश्वर की नजरो में कही न कही गलत साबित होते है जिनसे हमारी छवि का निर्माण होता है।

महाराज श्री ने बताया की हमें अपनी लाइफ स्टाइल में थोड़ा सा चेंज लाना चाहिए कुछ भी बोलने से पहले हमें अच्छे से सुनना चाहिए उसके बाद सोच समझ कर कुछ बोलना चाहिए। क्यूंकि जो जीव सुनना सीख लेता है वो फालतू की बकवास बाते कभी नहीं करता। और युवाओं को पैसा खर्च करने से पहले सोचना चाहिए क्यूंकि आपके एक - एक रूपए की बहुत बड़ी कीमत है और वो कीमत हमें तब समझ में आती है जब हम पैसा खुद कमाते है। इसलिए हमें खर्च करने से पहले सोचना चाहिए।

महाराज श्री ने बताया की आज कल के युवा बहुत जल्दी किसी को बिना जाने उससे रिश्ते बना लेता है और फिर कुछ ही दिनों में उस रिश्ते से ऊब जाते है और रिश्ते तोड़ देते है। इसलिए कभी भी बहुत ज्यादा रिश्ते मत बनाइये रिश्ते बनाने से पहले उन्हें निभाने के बारे में सोचिये। क्यूंकि कोई भी रिश्ता बिना सहनशीलता के निभाया नहीं जाता।

पंडित जी ने बताया की आज का कलयुगी मनुष्य दुसरो के सुख को देख कर अपने आप को दुखी करता है क्यूंकि वो हमेशा अपने से बड़े पैसे वाले व्यक्ति के ऐशो आराम को देखता है और उसकी सुख सुविधाओं को देखकर अपने मन को दुखी करता है लेकिन आपको ये सोचना चाहिए की आप बहुत भाग्यशाली हो इसलिए भगवान ने आपको ये सब दिया है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है। भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए। अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है। श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।
श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

10Jul 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 से 11 जुलाई 2019 तक प्रतिदिन करनैल सिंह नगर, अटल अपार्टमेंट, नियर सिंह सभा गुरूद्वारा, पखोवाल रोड़, लुधियाना में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

मानव जीवन का एकमात्र उद्देश्य धर्म की रक्षा होना चाहिए- पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

संतो का दर्शन और भगवान का सत्संग कलयुग में बहुत दुर्लभ है - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

हमारी इच्छाओं को नष्ट करता है सत्संग - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 से 11 जुलाई 2019 तक प्रतिदिन करनैल सिंह नगर, अटल अपार्टमेंट, नियर सिंह सभा गुरूद्वारा, पखोवाल रोड़, लुधियाना में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

कथा की शुरुआत में परम पूज्य स्वामी कृष्णानंद जी महाराज, पूज्य ओमकार दास जी महाराज एवं समाज सेवक श्री दीपक जी कथा पंडाल में पधारे और मंच से कथा श्रवण करने आये हुए भक्तों को अपने आशीर्वचन दिए।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की इस कलयुग में जीव के लिए दो चीजे असंभव होती जा रही है एक तो संतो का दर्शन और दूसरा भगवान का सत्संग और जिन्हे इस मृत्यु लोक पर संतो का दर्शन और भगवान की कथा सुनने का सौभाग्य प्राप्त हो जाए उस व्यक्ति को अपने आप को धन्य समझना चाहिए। क्यूंकि वही लोग ईश्वर के करीब होते है।

पण्डित जी ने बताया की मानव जीवन का एकमात्र उद्देश्य धर्म की रक्षा होनी चाहिए, और गौ माता पुरे विश्व की माँ है क्यूंकि गौ माता अपने आँचल का दूध हमें पुरे जीवन भर पिलाती है लेकिन उसके बाद भी कितने दुर्भाग्य की बात है की हम गौ रक्षा करने में असमर्थ है।

कथा व्यास जी ने मंदिर और सत्संग में अंतर बताते हुए कहा की मंदिर जाकर भगवान के दर्शन करने से हमारी सारी इच्छाएं पूरी होती है , लेकिन सत्संग में जाने के बाद हमारी इच्छाएं पैदा होनी ही बंद हो जाती है। इसलिए हमारे जीवन में हमें जहा कही भी सत्संग हो रहा हो उसे श्रवण करने जरूर जाना चाहिए।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

5Jul 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी सभी मनोरथो को पूर्ण करती है श्रीमद भागवत कथा - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी संस्कार संस्कृति और आदर्श सिखाती है भागवत -पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 से 11 जुलाई 2019 तक प्रतिदिन करनैल सिंह नगर, अटल अपार्टमेंट, नियर सिंह सभा गुरूद्वारा, पखोवाल रोड़, लुधियाना में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।

इस सृष्टि के सृजनकर्ता भगवान श्रीकृष्ण है-

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी सभी मनोरथो को पूर्ण करती है श्रीमद भागवत कथा - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी संस्कार संस्कृति और आदर्श सिखाती है भागवत -पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 से 11 जुलाई 2019 तक प्रतिदिन करनैल सिंह नगर, अटल अपार्टमेंट, नियर सिंह सभा गुरूद्वारा, पखोवाल रोड़, लुधियाना में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के प्रथम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। प्रथम दिवस के कथा की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने भागवत ग्रन्थ की शुरुआत कहा से हुई उसके बारे में कथा पंडाल में आये भक्तो को बताया साथ ही कथा की शुरुआत भागवत के प्रथम श्लोक से की और कहा की जो कृष्ण की भक्ति करते है उन्हें जीवन में कुछ और करने की आवश्यकता नहीं है क्यूंकि श्री कृष्ण उनके सभी दुखो को दूर कर देते है और अपने भक्तो को अपनी शरण में लेकर उनका बेडा पार करने का उन्हें वचन देते है। महाराज श्री ने बताया की इस संसार में सभी पापी है ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जिसने जीवन में जाने अनजाने में पाप ना किया हो। लेकिन अंत में जो श्री कृष्ण की शरण में जाते है श्री कृष्ण उनका कल्याण करते है। ठाकुर जी ने बताया की आज का कलयुगी मनुष्य बहुत आलसी हो गया है और भगवान से दूर होता जा रहा है। आज कल के मनुष्य को भजन करने से ज्यादा आनंद भोजन करने में आता है। व्यास जी ने बताया की आप जब कभी भी कथा पंडाल में आये तो अपने बच्चो को कथा श्रवण कराने के लिए जरूर लाये क्यूंकि भागवत आपके बच्चो को संस्कार संस्कृति और आदर्श सिखाती है। पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की प्रारम्भ में यह की भागवत का महात्यम क्या है ? एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। इस सांसारिक जीवन में जो कुछ भी प्राप्त किये हो सब किराए के मकान की तरह है। खाली करना ही पड़ेगा। व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

8Jun 2019

संतो का आशीर्वाद इस जीवन में अमृत के समान है- 

संतो का आशीर्वाद इस जीवन में अमृत के समान है- 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

मोक्ष की प्राप्ति कराती है श्रीमद भागवत- 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

मनवांछित इच्छाओं को पूर्ण करती है भागवत- 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

भगवान के श्री चरणों में पहुंचने का मार्ग है भागवत-
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के पावन सानिध्य में 07 से 14 जून 2019 तक सिद्ध भागवत पीठ, श्री शुकदेव आश्रम (भागवत जनभूमि) शुक्रतीर्थ, शुक्रताल, मुजफ्फरनगर में 108 श्रीमद्भागवत कथा का विशाल आयोजन किया जा रहा है।
108 श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

कथा की शुरुआत में पूज्य श्री गुरुदत जी महाराज, एवं मुख्य अतिथि के रूप में श्री सुभाष शर्मा जी आयुर्वेदिक बोर्ड अध्यक्ष (राजयमंत्री) उत्तर प्रदेश सरकार कथा पंडाल में पधारे और द्वितीय दिवस की कथा का रसपान किया।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की संतो का सानिध्य हमारे जीवन में होना बहुत जरुरी है, क्यूंकि संतो की सेवा, संतो का आशीर्वाद इस जीवन में अमृत के समान है। संतो की सेवा मात्र से ही हमारा जीवन धन्य हो जाता है। साथ ही महाराज श्री ने गौ रक्षा के बारे में बताते हुए कहा की आज का कलयुगी मनुष्य कुत्ता पालना तो सीख गया है लेकिन जिसमे लक्ष्मी का वास होता है हमारी गौ माता को नहीं पाल सकता ये हमारे लिए दुर्भाग्य की बात है। जीवन में हमें कभी भी अपनी संस्कृति नहीं छोड़नी चाहिए चाहे हम कितने भी मॉडर्न क्यों न हो जाए क्यूंकि अगर हम अपनी संस्कृति को त्याग देंगे तो उसी दिन से हमारे विनाश की शुरुआत हो जाएगी। 
महाराज श्री ने बताया की श्रीमद भागवत कथा श्रवण करने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है ये श्रीमद भागवत हमें मोक्ष की प्राप्ति कराती है, और हमारी मनवांछित इच्छाओं को पूर्ण करती है। अगर आप सृष्टि का सृजन करने वाले को जानना चाहते है तो श्रीमद भगवत कथा श्रवण करें।
पंडित जी ने बताया की ये जो जन्म हमे सिर्फ खाने पिने सोने या फिर पैसा कमाने के लिए नहीं मिला है, जन्मो जन्म चौरासी लाख योनियों में भटकने के बाद हमें ये मानव जीवन प्राप्त हुआ है। इसलिए ये हमारा अधिकार है की हम अपने जन्मदाता के बारे में जानने की कोशिश करें की आख़िरकार उसने हमें मानव जीवन में किस उदेद्श्य के साथ भेजा है और उस भगवान तक पहुंचा कैसे जाए।

महाराज श्री ने बताया की भागवत के मंगलाचरण मैं लिखा है की भगवान श्री कृष्ण ही सत्य है और सत्य ही कृष्ण है जहा सत्य है वही विजय है इसीलिए देवताओं ने श्री कृष्ण के प्रकट होने से पहले अपने मंत्रो में नौ बार सत्य का उच्चारण किया था। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

7Jun 2019

“कलयुग के लोगों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है भागवत”

“कलयुग के लोगों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है भागवत”

"जिसको गुरू कृपा प्राप्त हो, उसे सबकुछ प्राप्त हो सकता है”

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के पावन सानिध्य में 07 से 14 जून 2019 तक सिद्ध भागवत पीठ, श्री शुकदेव आश्रम (भागवत जनभूमि) शुक्रतीर्थ, शुक्रताल, मुजफ्फरनगर में 108 श्रीमद्भागवत कथा का विशाल आयोजन किया जा रहा है।

108 श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के प्रथम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
प्रथम दिवस के कथा की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा पंडाल में मुख्य अतिथि के रूप में स्वामी कल्याण देव सेवा ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री सोमाश प्रकाश जी, मुजफ्फरनगर नगर पालिका अध्यक्ष श्रीमती अंजू अग्रवाल जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हे स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि श्री शुकदेव जी महाराज ने हम पर अपने अहित की कृपा की है जो हमें अपने निज धाम में बुलाया है, ये हमारा परम सौभाग्य है। श्री शुकदेव जी महाराज भगवान श्री कृष्ण के ही अंश अवतार हैं, क्योंकि भगवान की कथा को भगवान के बगैर कोई कह नहीं सकता।

महाराज श्री ने कहा कि हम उन त्याग के चक्र चुरामणी श्री शुकदेव जी महाराज को प्रणाम करते हैं जिन शुकदेव जी महाराज की इस धरा पर जहां उन्होंने भागवत को कहकर कलयुग के जीव मात्र के कल्याण के लिए सुंदर मार्ग प्रशस्त किया। मात्र सात दिन में मोक्ष प्रयन्त तक की बात यहां लोग करते हैं जहां जन्म जन्मांतर व्यतित हो जाते हैं। मोक्ष की तो बात छोडिए हजारों वर्ष तप करने के बाद भी मन स्थिर नहीं रह पाता। कलयुग में कल काल के जीवों के लिए यह आसान नहीं है लेकिन कलयुग के जीवों का भी कल्याण हो इस शुभ कार्य के लिए शुभ विचार श्री शुकदेव जी महाराज ने हम सब को प्रदान किया और भागवत की शरण ग्रहण करने वालों के लिए मात्र 07 दिन में मोक्ष मिल जाए ऐसे सुंदर मार्ग को दिखाकर अहित की कृपा की है। लेकिन बात यहां विश्वास की है, अगर आपको विश्वास नहीं है तो भगवान भी आपका कुछ नहीं कर सकते लेकिन अगर विश्वास है तो मात्र सात दिन में भागवत आपका बेडापार कर देगी।

महाराज श्री ने कहा कि लोग पुछते हैं महाराज हमारा क्या होगा ? इसक उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि जो भगवान दे उसे उसकी मर्जी समझ कर उसके साथ अपना समन्वय बीता लो। अगर गोविंद ने ये समय दिया है तो निश्चित उसने कहा होगा की नहीं तुम्हे वहां जाकर तप करना है।

महाराज श्री ने कहा कि जिसको गुरू कृपा प्राप्त हो, उसे सबकुछ प्राप्त हो सकता है, जो चिंतामणी नहीं दे सकती, तो कल्पवृक्ष नहीं दे सकता वो गुरू कृपा से प्राप्त किया जा सकता है। ईश्वर का दर्शन कराने में कोई साधन सक्षम नहीं है, दान करो, यज्ञ करो तो भगवान मिलेगा इसकी कोई पक्की गारंटी नहीं है, भागवत सुनलो यह साधन भी है साधय भी लेकिन गुरू कृपा के बगैर भागवत सुनकर भी कृष्ण प्राप्ति नहीं होगी। गोविंद की प्राप्ति के लिए जिन साधकों की सच्ची श्रद्धा हो, विश्वास हो सबसे पहले गुरू के वचनों पर अमल करें।

महाराज श्री ने कहा कि भागवत भक्तों का विषय है अभक्तों का नहीं है। जो भगवान के चरणों में पूर्ण समर्पित हो चले हैं ये भागवत उनका विषय है, जो अभक्त हैं उनके लिए भागवत में कुछ नहीं है, कुछ समझेंगे ही नहीं।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की प्रारम्भ में यह की भागवत का महात्यम क्या है ? एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। इस सांसारिक जीवन में जो कुछ भी प्राप्त किये हो सब किराए के मकान की तरह है। खाली करना ही पड़ेगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

26May 2019

" भगवान द्वारा दिया हुआ बहुत ही सूंदर गिफ्ट है मानव जीवन"

"ভগবানের দেওয়া সব থেকে সুন্দর উপহার হলো মানব জীবন "
"হাতের রেখারুপী ভাগ্যের থেকে আমাদের বেশি বিশ্বাস রাখতে হবে নিজেদের চেষ্টা আর সৎকর্মের উপর"
"মানব জীবনের সব থেকে বড় পাপ হলো আত্মহত্যা করা "
- পণ্ডিত শ্রী দেবকীনন্দন ঠাকুরজী মহারাজ 
কন্যাপুর, সেনরেলে, আসানসোল, পশ্চিমবঙ্গ

" भगवान द्वारा दिया हुआ बहुत ही सूंदर गिफ्ट है मानव जीवन"

" हाथों की रेखा से ज्यादा विश्वास हमें अपनी मेहनत और सतकर्मो पर होना चाहिए"

आसनसोल के कन्यापुर हाई स्कूल, संलग्न ज्योति जिम के पास, सेनरेले, कन्यापुर, आसनसोल, पश्चिम बंगाल में विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 मई 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया गया। कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई।

भागवत कथा के सातवें दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

श्रीमद भागवत कथा के सम्पूर्ण दिवस की शुरुआत महाराज श्री ने बहुत ही सुंदर भजन "तेरी बिगड़ी बना देगी लाड़ली श्री राधे से की" उसके बाद महाराज श्री ने बताया की लोग अपनी हस्थ रेखा पर बड़ा विश्वास करता है लेकिन वो ये नहीं जानते की भगवान ने हमारे हांथो में ये जो रेखाएं बनाई है वो हमारे पुराने कर्मो के आधार पर बनाई है, लेकिन भगवान ने हमें हमारी रेखाओं से पहले हमें उंगलिया दी है ताकि हम उन उँगलियों से भगवान् की माला का जप करें अपने इन हांथो से सतकर्म करें ताकि हमारे आने वाले समय में हमारा भाग्य उदय हो जाए। हमें अपनी हाथो की रेखा से ज्यादा विश्वास अपनी मेहनत,धर्म और अपने सत्कर्मो पर होना चाहिए ताकि आने वाले समय को बदल सकें। क्यूंकि जो व्यक्ति धर्म करता है मेहनत करता है वो अपने सतकर्मो के दम पर अपनी किस्मत और रेखाओं दोनों को बदल सकता है। महाराज श्री ने बताया की जीवन में कितनी भी बड़ी समस्या क्यों न आ जाए हमें उनका डट कर सामना करना चाहिए क्यूंकि ये मानव जीवन भगवान के द्वारा दिया हुए बहुत ही सूंदर गिफ्ट है, कायर होते है वो लोग जो समस्याओं के सामने हार मानकर आत्महत्या कर लेते है। कितना भी बुरा समय क्यों न आ जाएँ ठाकुर जी की भक्ति करते रहें, क्यूंकि आपके बुरे समय में सब आपका साथ छोड़ देंगे लेकिन भगवान सदैव आपके साथ रहते है और बुरे वक्त से बाहर निकाल आपका कल्याण करते है। इसलिए हमें भगवान को सिर्फ बुरे वक्त में ही नहीं बल्कि अपने अच्छे समय में भी याद करना चाहिए। और सामर्थ होने पर धार्मिक कार्य करते रहने चाहिए..

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंततः सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन नोनी गोपाल मंडल और शान्तो रानी मंडल एवं सहयोग विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा किया गया । कथा पंडाल में यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

25May 2019

“दुनिया की हर चीज झूठी है केवल भगवान का भजन सच्चा है”

“दुनिया की हर चीज झूठी है केवल भगवान का भजन सच्चा है”

"रास को श्रवण करने के लिए दिमाग की नहीं ह्रदय की आवश्यकता पड़ती है”

आसनसोल के कन्यापुर हाई स्कूल, संलग्न ज्योति जिम के पास, सेनरेले, कन्यापुर, आसनसोल, पश्चिम बंगाल में विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 मई 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने सर्वप्रथम सूरत में घटी दर्दनाक घटना पर दुख जाहिर किया, उन्होंने कहा कि हम इस घटना में 19 बच्चों की जान चले गई। बच्चे अग्नि के भय से चौथी मंजिल से छलांग लगा रहे थे, यह ह्रदय विदारक दृश्य बहुत दुख देता है। महाराज श्री के साथ कथा पंडाल में उपस्थित सभी भक्तों ने सभी मृतक बच्चों की आत्मा की शांति के लिए दो मिनट का मौन रखा एवं दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान को वो भक्त बहुत प्रिय लगते हैं जो बिछड़े हुए भक्तों को भगवान की तरफ लेकर चले जाए। यह संसार सागर है यहां लोग भटके हुए हैं, कोई किसी दिशा में जा रहा है,कोई किसी दिशा में जा रहा है, सब ने अलग अलग दिशाएं अपना रखी हैं। कई तो ऐसे हैं जिन्हे मालूम ही नहीं है हमारी मंजिल कहां है फिर भी चले जा रहे हैं। उनसे पूछो क्यों भाग रहे हो बोले सब भाग रहे हैं तो हम भी भाग रहे हैं। लेकिन यह पुराण, ये भेद, ये संत, ये साधु, ये कथाकार भगवान इनको प्रेम क्यों करते हैं ? भगवान इसलिए प्रेम करते हैं क्योंकि इस संसार में भटके हुए लोगों को भगवान की तरफ प्रेरित करते हैं।

महाराज श्री ने कहा कि इस संसार में रहना है तो सबकुछ सहने की शक्ति रखनी पड़ेगी। भगवान जब तक आपकी परीक्षा नहीं लेंगे तब तक उन्हें कैसे पता चलेगा की आप शुद्ध हैं की अशुद्ध हैं। भगवान केवल शुद्ध को ही मिलता है, तो अगर आपकी श्रद्धा पक्की है, तो भी डर किस बात की है। जो परीक्षा ले रहा है उसमें पास कराने की जिम्मेदारी भी उसकी ही है। हमारा कर्तव्य बस इतना है की जहां है वहीं खड़े रहें

महाराज श्री ने प्रभु की रास के बारे में बताते हुए कहा कि रास को श्रवण करने के लिए दिमाग की नहीं ह्रदय की आवश्यकता पड़ती है। अगर भगवान के इस रास में अकेले दिमाग का इस्तेमाल करेंगे सुनने में तो आपको इस रास में भगवान पर संदेह हो जाएगा और अगर आपको भगवान पर संदेह हो गया तो आपको नरकगामी बनना पड़ेगा। भगवान की ये रासलीला बड़ी उत्तम है, श्रेष्ठ है. बडे बड़े ऋषि भी इस रास को सुनकर ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया।

श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।

श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन नोनी गोपाल मंडल और शान्तो रानी मंडल एवं सहयोग विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है। कथा पंडाल में यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

24May 2019

कल की कोई गारंटी नहीं लेकिन काल की गारंटी है

" কালকের কোনো সম্ভাবনা নেই কিন্তু কালের সম্ভাবনা অবসম্ভাবী "

"ভগবানের প্রতি দৃঢ় নিষ্ঠার সাথে বিশ্বাস করলে ভগবান আপনাকে কখুনো দুঃখী হতে দেবেন না "

"যে মানুষ জীবনে কখুনো দান করে না সেই মানুষকে ভবিষ্যতে গরিব হতে হয় "

"মানব জীবনের উদ্দেশ্যেই হলো ঠাকুর কে প্রসন্ন করা "
- পণ্ডিত শ্রী দেবকীনন্দন ঠাকুরজী মহারাজ

কন্যাপুর হাই স্কুল মাঠ, জ্যোতি জিম এর পাশে, আসানসোল, সেনরেলে, পশ্চিমবঙ্গ

कल की कोई गारंटी नहीं लेकिन काल की गारंटी है

भगवान पर दृढ़निष्ठा से विश्वास करों वो आपको कभी दुखी नहीं होने देंगे

जो व्यक्ति जीवन में कभी दान नहीं करता वो मनुष्य दरिद्री होता है

मानव जीवन का उद्देश्य है ठाकुर को प्रसन्न करना

आसनसोल के कन्यापुर हाई स्कूल, संलग्न ज्योति जिम के पास, सेनरेले, कन्यापुर, आसनसोल, पश्चिम बंगाल में विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 मई 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के पंचम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की हमें जब भी खाली समय मिले उस समय में हमे भगवान का नाम स्मरण करना चाहिए क्यूंकि ये छोटे- छोटे प्रयास हमें भगवान के निकट ले जाते है। साथ ही बताया की हमे भगवान पर दृढ़निष्ठा के साथ विश्वास करना चाहिए, दुनिया को भूल अपने आप को ठाकुर जी के चरणों में समर्पित कर देना चाहिए। क्यूंकि जब कभी भी बुरे वक़्त में हमें उसकी जरूरत होगी तो वो हमारी मदद के लिए हमेशा हमारे साथ खड़े रहेंगे।

कलयुग का जीव बहुत मतलबी होता है, ये आपके सुख में आपके साथ है लेकिन आपके दुख में आपके साथ नहीं रहते इसलिए जितना जल्दी इस बात को समझ लोगे उतना आपके लिए अच्छा होगा, नहीं तो आपको जीवन भर पछताना पड़ेगा। ये जीवन, आपके रिश्तेदार, घर आपकी सुख - सुविधा सब व्यर्थ की चीजे है ये कुछ आपके साथ नहीं जाना जो कुछ भी आपके साथ जायगा वो भगवान का नाम, जाप और उनका सुमिरन ही आपके साथ जाएगा।

मानव जीवन का उद्देश्य है ठाकुर को प्रसन्न करना और ठाकुर आपसे प्रसन्न तब होंगे जब आप गौ माता की सेवा करेंगे गुरुओं की सेवा करेंगे, संतो की सेवा करेंगे भक्तो और ब्राह्मणो की सेवा एवं भगवान का नाम जाप करेंगे। और इन सब में से सबसे बड़ी सेवा है दीन हिनो की सेवा अनाथो की सेवा।

जो व्यक्ति जीवन में कभी दान नहीं करता वो मनुष्य दरिद्री होता है और उसका धन मल के सामान होता है वो पुरुष ईश्वर की नज़रो में पापी होता है और नर्क में जाकर अनेको अनेक यातनाएं भोगता है। जो व्यक्ति इस जीवन में दान करता है वो व्यक्ति पुण्य का भागी होता है और पुण्य के प्रभाव से वो स्वर्ग में जाता है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराजा ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये।

नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है।

परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं।

पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें।

अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे।

इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है,

और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।
श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन नोनी गोपाल मंडल और शान्तो रानी मंडल एवं सहयोग विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है। कथा पंडाल में यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

23May 2019

"भागवत की शरणागति आपको हरिमिलन कराती है"

"ভাগবতের প্রতি সরণাগতি আপনাকে হরি মিলনের অধিকারী করায় "
"ধর্মের জন্য উত্তম কার্যকরী ব্যক্তি ভগবানের শ্রী চরণে স্থান পায় "
"আপনি জীবনে কারোর ক্ষতি করতে চাইলে আপনার ও জীবনে ক্ষতি হতে বাধ্য " - পণ্ডিত শ্রী দেবকীনন্দন ঠাকুরজী মহারাজ
সেনরেলে, কন্যাপুর, আসানসোল, পশ্চিমবঙ্গ

"भागवत की शरणागति आपको हरिमिलन कराती है"

"धर्म के लिए अच्छे कार्य करने वाले व्यक्ति भगवान के श्री चरणों में वास करते है"

"जीवन में किसी के साथ बुरा करोगे तो आपके साथ भी बुरा होना तय है"

आसनसोल के कन्यापुर हाई स्कूल, संलग्न ज्योति जिम के पास, सेनरेले, कन्यापुर, आसनसोल, पश्चिम बंगाल में विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 मई 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की जिनकी मृत्यु सत्य है उन्हें भागवत की शरण ले लेनी चाहिए और जो जीव भागवत की शरण ले लेते है मृत्यु भी उसका बाल बांका नहीं कर पाती है। जो जीव पूर्णता विश्वास से श्री कृष्ण और भागवत की शरणागति ग्रहण करता है भागवत उसका कल्याण कर उसे हरिमिलन करा देती है।

ये जीवन समुन्द्र की तरह है और हमारा मंथन हमारे कर्म है और जो इस जीवन में हमे अपमान सहन करना पड़ता है वही इस समुन्द्र रूपी जीवन से निकला विष है।

इस जीवन में ये बात हमेशा याद रखना की अगर आप कभी किसी का बुरा करोगे तो आपका भी बुरा होना तय है, चंद्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण इस बात के उदहारण है। मानव जीवन में जन्म लेने के बाद भी जो व्यक्ति अतिथि सेवा नहीं कर पाता तो समझ लो वो मानव जीवन का धर्म निभाने में असफल रहता है।

महाराज श्री ने बताया की जो जीव सामर्थ होने के बाद धार्मिक कार्यो में खर्च करते है तो भगवान उन्हें उसका सौ गुना फल देता है। इसलिए हमें सदैव धर्म के लिए कुछ न कुछ अच्छे कार्य करते रहना चाहिए। सतकर्म करने वाले व्यक्ति को अगर हम रोकते है तो भगवान उसे दंड देते है इसलिए अगर हम खुद सतकर्म या दान न कर पाएं तो हमें किसी को करने से रोकना भी नहीं चाहिए।

पं. देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।

महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।

शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।

बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ
की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।
इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।

महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।

महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।

उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"

जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।
दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।

महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन नोनी गोपाल मंडल और शान्तो रानी मंडल एवं सहयोग विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है। कथा पंडाल में यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

22May 2019

“भागवत सुनने का फल है मोक्ष"

“भागवत सुनने का फल है मोक्ष"

"बचपन में किया हुआ भजन आपको सौ प्रतिशत फल देता है "

"84लाख योनियों में जन्म लेने के बाद हमे मानव जीवन प्राप्त होता है"

महाराज”आसनसोल के कन्यापुर हाई स्कूल, संलग्न ज्योति जिम के पास, सेनरेले, कन्यापुर, आसनसोल, पश्चिम बंगाल में विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 मई 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया ।

कथा के तृतीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
कथा की शुरूआत भागवत आरती एवं विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की भगवान की कथा श्रद्धा पूर्वक बैठकर सुननी चाहिए क्यूंकि भगवान् की कथा हमारी व्यथाओं का हरण करती है इसलिए जहाँ भी आपको भगवान की कथा सुनने का अवसर प्राप्त हो तो आपको जरूर जाना चाहिए। आप बहुत भाग्यशाली हो की आपको ये कथा सुनने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है। क्यूंकि भगवान जब कृपा करते है तो साधन बनाने नहीं पड़ते साधन अपने आप बन जाते है।

इस जीवन में आपका कुछ भी फिक्स नहीं है लेकिन आपकी मृत्यु होना तय है कलयुग में मानव ज्योतिषियों के पास जाते है तो हमेशा उनसे अपने काम अपने बच्चो की पढ़ाई उनकी शादी के बारे में ही पूछते है लेकिन क्या कभी आपने किसी ज्योतिषी से ये पूछा है की मेरी मृत्यु कब होगी क्यूंकि बाकी की जो चीजे है वो सब व्यर्थ है रिश्ते - नाते, धन, कारोबार आपकी मृत्यु के बाद आपकी सारी सम्पत्ति यही रह जानी है बस जायगा तो साथ आपके कर्म आपकी भक्ति आपका दान।

जो जीव भागवत को बिना किसी इच्छा के सुनता है भागवत उसे मोक्ष देती है। जो लोग श्री राम को चाहते है उन्हें साकेत मिलता है जो लोग भगवान शिव को चाहते है उन्हें शिवलोक मिलता है और जिन भक्तो को श्री कृष्ण से प्रेम है उन्हें गोलोक मिलता है और ज्ञानियों को मोक्ष मिलता है।

बच्चो को बचपन से ही भक्ति और भजन करने चाहिए क्यूंकि अगर आपको बचपन से ही सत्य असत्य पाप और पुण्य का बोध कथाओं के माध्यम से हो जायगा तो आप जीवन भर उसपर अमल कर पाएंगे।

84 लाख योनियों में जन्म लेने के बाद उन जन्मो के एक एक पुण्य को जोड़कर हमे मानव जीवन प्राप्त होता है, और ना जाने माँ के गर्भ में हमें कितने दुखो का सामना करना पड़ता है वहां इतना अँधेरा होता है की कुछ दिखाई नहीं देता, और 9 महीने तक उलटे लटके रहना पड़ता है इसलिए मानव जीवन साधारण नहीं है। हमें मानव जीवन में जन्म लेने के बाद ऐसे कर्म करने चाहिए ताकि हमें पुनर्जन्म से मुक्ति मिल जाए।

पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।

राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।
श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।
श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन नोनी गोपाल मंडल और शान्तो रानी मंडल एवं सहयोग विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है। कथा पंडाल में यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

20May 2019

“भागवत ही कृष्ण है, कृष्ण ही भागवत है"

ভাগবতই কৃষ্ণ, কৃষ্ণই ভাগবত :
"মা, বাবা, গুরুর কথা শুনো, আর তাকে মেনে চল, তাহলে তোমার কর্ম স্রেষ্ঠ হবে: "পন্ডিত দেবকিনন্দন ঠাকুর জী মহারাজ"

কন্যাপুর হাই স্কুল, আসানসোল, জ্যোতি জিমের পাশে, সেনরেলে, কন্যাপুর, আসানসোল, পশ্চিমবঙ্গ

“भागवत ही कृष्ण है, कृष्ण ही भागवत है"

“माँ-बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी, तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे”

आसनसोल के कन्यापुर हाई स्कूल, संलग्न ज्योति जिम के पास, सेनरेले, कन्यापुर, आसनसोल, पश्चिम बंगाल में विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 मई 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के प्रथम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया ।
प्रथम दिवस के कथा की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत भागवत के प्रथम श्लोक सच्चिदानन्दरूपाय विश्वोत्पत्त्यादिहेतवे। तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुम: के उच्चारण के साथ की। महाराज श्री ने कहा कि भगवान का स्वरूप कैसा है ? सतघन, चितघन, आनन्द, ऐसे भगवान सच्चिदानंद स्वरूप, समस्त विश्व का पालन पोषण सृजन करने वाले तीनो के जो हेतु हैं तथा जिनके पावन चरण ग्रहण करने पर जीव का त्रापत्य समाप्त हो जाता है, ऐसे गोविंद को हम सब मिलकर बारम्बार नमन करते हैं, प्रणाम करते हैं।
महाराज श्री ने आगे कहा कि हम सब को मन कर्म वचन से भागवत की शरण ग्रहण करनी चाहिए और मन से ये सोचना चाहिए, सच्ची श्रद्धा के साथ ये भाव रखना चाहिए भागवत ही कृष्ण है, कृष्ण ही भागवत है। 
महाराज श्री ने कहा कि संसार का अंधकार उसे आप लाइट से अन्य साधनों से दूर कर सकते हैं, लेकिन जो मन का अंधकार है इसके लिए कोई भी ऐसा सिस्टम वैज्ञानिकों ने तैयार नहीं किया जो मन के अंधकार को मिटा सके। मन के अंधकार को मिटाने के लिए अगर किसी की आवश्यकता है तो वो सिर्फ ज्ञान की आवश्यकता है और वो ज्ञान केवल सतगुरू के चरणों में ही प्राप्त होता है। 
महाराज श्री ने कहा कि प्रत्येक पुराण में चिंतन अगर किसी के लिए किया गया तो कलयुग के लोगों के लिए किया गया है। बाकी तीनों युगों के लोगों की चिंता नही की गई क्योंकि उनका स्वभाव वहीं है धर्म में रहना, धर्मयुक्त कर्म करना, धर्म के साथ जीवन यापन करना और अपने सहज कल्याण के लिए कार्य करना। परन्तु कल काल में यह व्यवस्था नहीं है, कल काल में मुसीबतें है और सबसे बड़ी मुसीबत है कलयुग में आयु कम है। यहां आयु प्रथम चरण में सौ वर्ष है लेकिन सौ वर्ष भी कहां जी पाते हैं, एक क्षण का भी भरोसा नहीं है। इसिलिए कलयुग के लोगों की बार बार चिंता की गई। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की प्रारम्भ में यह की भागवत का महात्यम क्या है ? एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। इस सांसारिक जीवन में जो कुछ भी प्राप्त किये हो सब किराए के मकान की तरह है। खाली करना ही पड़ेगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।
श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन नोनी गोपाल मंडल और शान्तो रानी मंडल एवं सहयोग विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है। कथा पंडाल में यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

21May 2019

सर्वश्रेष्ठ जीव वही है जो अपने उद्देश्य को याद रखे- पंडित देवकीनंदन ठाकुर जी

सर्वश्रेष्ठ जीव वही है जो अपने उद्देश्य को याद रखे- पंडित देवकीनंदन ठाकुर जी

रिलीजियस एजुकेशन आपको जीवन जीना सिखाती है -पंडित देवकीनंदन ठाकुर जी

आसनसोल के कन्यापुर हाई स्कूल, संलग्न ज्योति जिम के पास, सेनरेले, कन्यापुर, आसनसोल, पश्चिम बंगाल में विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 20 से 26 मई 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

कथा के द्वितीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

द्वितीय दिवस के कथा की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की जो फल बड़े- बड़े तप, यज्ञ, हवन, से नहीं मिलता है वो फल आपको भगवान की कथा सुनने उसका नाम स्मरण करने से मिल जाता है। जो जीव अपने लक्ष्य को याद रखता है वही सर्वश्रेस्ठ है। हमें ये मानव जीवन क्यों मिला है किस उद्देश्य के लिए मिला है इसे जरूर ध्यान रखें जब तक आप इस मानव जीवन में अपने उद्देश्य को प्राप्त न कर ले तब तक उसके लिए मनोरथ करते रहें। क्यूंकि जीवन की यात्रा में अंत मृत्यु है और मृत्यु इस जीवन का सत्य है इसलिए इस जीवन को यूँ ही न गवाएं और अपने सत्कर्मो को इतना बढ़ा ले की आपको मोक्ष की प्राप्ति हो जाए। लेकिन आज का कलयुगी जीव अपनी मृत्यु को जीवन के इस सच को भूला हुआ है तभी वो पाप करता है, जो जीव अपनी मृत्यु को याद रखता है वो जीव कभी पाप नहीं करता।

महाराज श्री ने बताया की कलयुग का सबसे बड़ा अभिशाप है आलस और कम आयु इसी वजह से लोगों की रूचि पाप में बढ़ती है। आज के समय में ये आलस हम सभी के घरो में राज कर रहा है अगर आप चाहते है की आपकी आगे की पीढ़ी धर्म और भक्ति करने में आलस न करें तो अपने बच्चों को कथा पंडाल में लाएं। क्यूंकि मॉर्डन एजुकेशन सिर्फ आपके बच्चो को रोटी कमाने का जरिया सिखाती है लेकिन रिलीजियस एजुकेशन आपके बच्चो को सच्चा मानव बनती है और उन्हें सिखाती है की आखिर जीवन जीना कैसे है।

इस जीवन में बहुत मुश्किल है अपने आप को सुधारना और बहुत आसान है दुसरो को सुधारना क्यूंकि कलयुग का व्यक्ति दूसरे को सुधारने के उपदेश देता है लेकिन खुद वो कितने भी पाप करें, अधर्म करें, गलत कार्य करे उस पर कभी ध्यान नहीं देता। लेकिन अगर मनुष्य का आचरण पवित्र होगा तो आपको किसी को बताना नहीं पड़ेगा लोग खुद आपको देख कर सीख जाएंगे।

महाराज श्री ने बताया की जीन लोगों के पाप अधिक होते है उन लोगों का कथा में मन नहीं लगता और वो श्रीमद भगवत कथा नहीं सुन पाता लेकिन ये श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण बहुत ही दुर्लभ है क्यूंकि भागवत कथा तो देवताओं को भी सुनने को नसीब नहीं है देवताओं को भी अगर भागवत सुनने का लाभ लेना है तो उन्हें मानव जीवन लेना होगा।

पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है।

भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।

श्री शुक जी की कथा सुनाते महाराज श्री ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ मं छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।

18May 2019

"जीवन में सफलता के लिए टाइम मैनेजमेंट बहुत जरुरी है"

"जीवन में सफलता के लिए टाइम मैनेजमेंट बहुत जरुरी है"
"आपके सबसे अच्छे दोस्त आपके माता-पिता है"

रांची के हरमू मैदान में विश्व शांति सेवा समिति रांची एवं विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 मई 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम की शुरुआत में सबसे पहले विश्व शान्ति के लिए प्रार्थना की गई। आयोजित कार्यक्रम में हजारों की संख्या में युवा पीढ़ी एवं भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से भजनो एवं विचारों का श्रवण किया।

श्रीमद् भागवत कथा के अष्ठम दिवस पर पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में युवा शान्ति सन्देश कार्यक्रम एवं होली मिलन समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की कलयुग में जीवन में किसी भी चीज़ को खरीदने या करने से पहले हम प्लानिंग जरूर करते है लेकिन जीव अपने इन भौतिक सुखो के चक्कर में अपने जीवन को कैसे जीना है उसकी प्लानिंग नहीं करता। क्यूंकि जिन व्यर्थ चीजों की हम प्लानिंग कर रहें है वो हमारे जीवन में जब तक ज़िंदा है बस तभी तक काम आने वाली है, लेकिन जब आपकी मृत्यु होगी तो उसके बाद आपका धर्म आपका सत्कर्म आपकी भक्ति ही वहां काम आने वाली है और आप लोग भौतिक सुविधाओं के चक्कर में आप अपने इस जीवन को व्यर्थ गवां रहें है। अगर मानव जीवन को पाकर भी आप अपना कल्याण न कर पाओ तो आपका मानव जीवन में जन्म लेना बेकार है। और यही सब चीजे आपको हमारे संत ऋषिमुनि और कथा सिखाती है इसलिए जहाँ कही भी सत्संग हो रहा हो ज्ञान की बाते हो रही हो आपको उस ज्ञानयज्ञ में जाना चाहिए। लेकिन ये तभी मुमकिन है जब आप अपनी बुरी संगत को छोड़ कर अच्छी संगत का संग करोगे। महाराज श्री ने बताया की इस जीवन में सबसे अच्छे और सच्चे दोस्त आपके माता- पिता है अगर आपको दोस्त बनाने ही है तो अपने माता-पिता को ही बनाओ क्यूंकि दुःख की घडी में सिर्फ वही आपके काम आएंगे। आज के समय में चाहते तो सब है की उनका बेटा, भाई, पति श्रीराम की तरह हो लेकिन श्री राम जैसे कर्म आज के समय में करना कोई नहीं चाहता।

महाराज श्री ने बताया की आज का युवा संदेह में रहता है की हमारे ऊपर जीवन की इतनी जिम्मेदारियां है तो हम भजन कैसे करें ? इसी विषय के साथ महाराज श्री द्वारा युवा शान्ति सन्देश कार्यक्रम की शुरुआत की गई। युवाओं ने भी बढ़ -चढकर इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया। साथ ही युवाओं ने देश के धर्म, संस्कृत, संस्कृति और संस्कारों से जुड़े हुए कई सवाल महाराज श्री से किए जिनका महाराज श्री ने युवाओं को उनकी ही भाषा में बड़ी ही सरलता से उत्तर दिया। साथ ही बताया की जीवन में सफलता के लिए टाइम मैनेजमेंट बहुत जरुरी है। अंत में महाराज श्री द्वारा युवा पीढ़ी को सनातन धर्म के इतिहास एवं संस्कारों की जानकारी दी गई। साथ ही सभी युवाओं को बुरी संगत एवं प्रव्रतियों को त्यागने और धर्म, देश व समाज के प्रति समर्पित रहने के लिए प्रेरित भी किया। श्रीमद भागवत कथा के अष्ठम दिवस पर भजन संध्या का आयोजन भी किया गया।

कथा पंडाल में पूज्य महाराज श्री के श्रीमुख से निकले बहुत ही सुन्दर भजनों पर भक्त कान्हा की भक्ति में सराबोर दिखे पूरा कथा पंडाल कृष्ण मयी नज़र आया, एक ऐसा अद्भुत नज़ारा भजन संध्या में दिखा कि मानो साक्षात् श्री कृष्ण और राधा रानी कथा पंडाल में अपनी लीला कर रहे हो। भक्तों ने महाराज श्री के भजनो पर जमकर नृत्य किया और पूरा पंडाल राधे - राधे नाम के जयकारे से गूंज उठा।

रांची में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के भव्य आयोजन के सफलता पूर्वक सम्पन्न होने के बाद रांची के भक्तों द्वारा महाराज श्री को नम आँखों से विदाई दी गई।

17May 2019

सप्तम दिवस पर सुनी हुई कथा आपको सम्पूर्ण भागवत कथा का फल देती है- पंडित देवकीनंदन जी। 

सप्तम दिवस पर सुनी हुई कथा आपको सम्पूर्ण भागवत कथा का फल देती है- पंडित देवकीनंदन जी। 
मोक्ष प्राप्ति का मार्ग है भागवत - पंडित देवकीनंदन जी।

रांची के हरमू मैदान में विश्व शांति सेवा समिति रांची एवं विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 मई 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की सप्तम दिवस पर सुनी हुई कथा आपको सम्पूर्ण भागवत कथा का फल देती है। ये हमारे करोड़ो जन्मो का पुण्य ही है की हमे श्रीमद भागवत कथा सुनने का अवसर प्राप्त हुआ है। क्यूंकि आप बस मानव जीवन को प्राप्त करके ही श्रीमद भगवत कथा का श्रवण कर सकतें है। श्रीमद भगवत कथा का ये ग्रन्थ तो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

जिस जीव के दिल में इच्छा होती है की वो ईश्वर के बारे में जाने वो इस श्रीमद भगवतकथा के माध्यम से ईश्वर के बारे में जान पाता है। जो व्यक्ति सिर्फ माया के पीछे भागता है वो व्यक्ति उस कुंए के मेंढक की तरह है जिसने कभी उस कुए के बाहर की दुनिया देखी ही नहीं। वो कथा को सिर्फ एक कहानी की तरह सुनता है या फिर जब तक उसको सुनने का मन करता है तब तक कथा पंडाल में रहता है उसके बाद निकल जाता है। लेकिन वेद व्यास जी ने खुद भागवत कथा में लिखा है की अगर सातो दिन तक पूरी निष्ठा और ध्यान से आप श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करते है तो वो आपको मोक्ष की प्राप्ति कराती है। महाराज श्री ने बताया की जिस धरती पर पानी की कमी हो वहां की फसल ख़राब हो जाती है और जहाँ धर्म न हो जहाँ संस्कार न हो, जहां अपनी परम्पराओं का निर्वाहन न हो वहां नस्ल ख़राब हो जाती है। भगवान् ने जो हमे ये साँसे दी है वो किसी का बुरा करने के लिए नहीं किसी को बुरा कहने के लिए नहीं , अपनी ज़िन्दगी को यूँ ही व्यर्थ करने के लिए बल्कि ये साँसे भगवान् का नामजाप करने और भगवान् की भक्ति के लिए दी है। ये सांस बहुत अनमोल है इन्हे आपको कोई उधार नहीं देगा इसलिए इन्हे व्यर्थ ना जाने दे।

भक्ति करने की कोई उम्र नहीं होती जिस समय आपका जन्म हुआ था उससे पहले आपकी मृत्यु तय है किस जगह आपकी मौत होगी किस कारण से होगी वो सब पहले से तय है। अगर आप चाहो की आप अपनी मौत को टाल लोगे उस पर जीत प्राप्त कर लोगे ऐसा कभी नहीं हो सकता आप अपनी मृत्यु को कभी हरा नहीं सकते क्यूंकि मृत्यु जीवन का सत्य है। इस लिए जीवन में हरीनाम बहुत जरुरी है ताकि आपको दुबारा इस जीवन में न आना पड़े। साथ ही महाराज श्री ने कहा की आपको अपने बच्चो को सनातन संस्कृति के संस्कार जरूर देने चाहिए ताकि आपके इस जीवन से चले जाने के बाद वो हिन्दू धर्म के नियमो का पालन करे और जो भी कार्य करें हिन्दू धर्म के मुताबिक पुरे विधि- विधान से करें और ये सारी चीजे तभी मुमकिन है जब आप इन सभी नियमो का पालन करोगे और अपने बच्चो के भीतर बचपन से ये सारे संस्कार डालोगे।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंत: सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

16May 2019

ईश्वर की स्मृति ही जीवन है - पंडित देवकीनंदन ठाकुर जी

ईश्वर की स्मृति ही जीवन है - पंडित देवकीनंदन ठाकुर जी

सूर्य उदय के बाद सोना दरिद्र्ता की निशानी है - पंडित देवकीनंदन ठाकुर जी

रांची के हरमू मैदान में विश्व शांति सेवा समिति रांची एवं विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 मई 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की जो व्यक्ति अपने हाथो से दान न करें, भगवान् के नाम का जाप न करें किसी भूखे व्यक्ति को खाना न खिलाये, सामर्थ होने पर किसी जरूरतमंद की जरुरत को पूरा न करें इस प्रवर्ति के लोग ईश्वर की नज़र में पापी होते है। ईश्वर का नाम लेने में जिन्हे आलस आता है सही काम को हमेशा कल पर टालते है वो ये नहीं जानते की यही सत्कर्म उसके साथ जाएंगे और तुम्हारा कल्याण करेंगे लेकिन फिर भी जीव भगवान की भक्ति से दूर है। हम संसार को अपना कहते है, संसार के लोगों को अपना कहते है ये भी हमारा भ्रम है क्यूंकि ये जो कुछ भी हमे मिला है ये ईश्वर की ही देन है हम तो बस किराये के घर की तरह यहाँ रह रहें है। जो व्यक्ति ईश्वर को भुला बैठा है उसके जीवन में सत्कर्मो की चेस्टा नहीं है तथा भगवत भक्ति नहीं हो वो व्यक्ति वो मृत समान है, क्यूंकि ईश्वर की स्मृति ही जीवन है। जब तक आप सांसारिक रिश्ते निभाओगे तब तक आप इस जीवन को डर के जिओगे और जिस दिन आप गोविन्द से रिश्ता निभाना शुरू कर दोगे उस दिन निर्भय हो जाओगे और इस जीवन को खुल कर जियोगे। महाराज श्री ने बताया की देर तक सोना दरिद्रता को निमंत्रण देना है जीव को सूर्य उदय के बाद नहीं सोना चाहिए क्यूंकि सूर्य उदय के बाद हम जितना देर तक सोते है हम उतनी ही अपनी आयु खोते है। साथ ही देर से स्नान करना ये पशुपत योनि के अंतगर्त आता है व्यक्ति को अधिक से अधिक सुबह आठ बजे तक स्नान कर लेना चाहिए अगर आप इसके बाद स्नान करते है तो वो मनुष्य का स्नान नहीं माना जाता। इसलिए हमे सुबह जल्दी उठ कर स्नान करके सूर्य को जल चढ़ाना चाहिए। अगर हम इन छोटी - छोटी आदतों को अगर सुधार ले तो अपने जीवन को सरल और सुगम बना सकते है। हमारे वेद पुराणों एवं शास्त्रों में हमारे ऋषि मुनियो द्वारा लिखी हुई ये बाते हमारे जीवन का कल्याण करती है इसलिए हमें स्वस्थ्य रहने के लिए अपनी दिनचर्या के इन नियमो का पालन करना चाहिए। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

15May 2019

अपने जन्मदिन,सालगिरह पर पेड़ अवश्य लगाएं - पंडित देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

अपने जन्मदिन,सालगिरह पर पेड़ अवश्य लगाएं - पंडित देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

वर्तमान को जीने वाले व्यक्ति सदैव सुखी रहते है - पंडित देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

जीवन का अनमोल खजाना है हमारी "साँसे "- पंडित देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

रांची के हरमू मैदान में विश्व शांति सेवा समिति रांची एवं विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 मई 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के पंचम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बताया की आज के जीवन में लोगों की मानसिकता ये बनी हुई है की जिनके पास धन दौलत और ऐशोआराम नहीं होता वो लोग अपना पूरा जीवन बिना सुख की प्राप्ति के बिता देते है, और जिन लोगों के पास अपार धन दौलत कई सारी गाड़िया उनके बड़े - बड़े घरो में नौकर होते है वो लोग अपने जीवन में असली सुख की प्राप्ति कर पाते है। महाराज श्री ने कहा की जो लोग इस तरह की धारणा रखते है वे लोग गलत होते है, क्यूंकि इस दुनिया में ना जाने कितने ऐसे लोग है जिनपर सबकुछ होने के बाद भी वो लोग अपने जीवन में दुखी रहते है। और जो इन सब की सबसे बड़ी वजह है उस वजह को हम समझना नहीं चाहते है। क्यूंकि सुखी रहने का सबसे सर्वश्रेष्ठ फार्मूला है की आप वर्तमान में जिए आपने क्या खोया है उसके बारे में मत सोचो जो आपको मिला है उसमे ही खुश रहना सीखो क्यूंकि भगवान् ने हमे ये बेसकीमती साँसों का खजाना दिया हुआ है, लेकिन हम इसे भूले बैठे है और व्यर्थ की चीजों के बारे में सोच- सोच कर अपने आप को दुखो में डालते है। इस जीवन के खजाने को आप व्यर्थ न जाने दे इसको आप हरिनाम जाप करने में लगाए और अपने जीवन का कल्याण कर भगवान के श्री चरणों में अपनी जगह बनाये।

उसके बाद महाराज श्री ने रांची में कथा प्रसंग के दौरान जल की महत्वता के बारे में बताया। महाराज श्री ने कहा कि यहां रांची में जल की बड़ी समस्या है, रांची में अच्छी बारिश भी होती है लेकिन फिर भी जल संकट क्यों है ? उन्होंने कहा कि ये कमी भगवान की वजह से नहीं है इसका कारण हैं इंसान। हमने पृथ्वी पर कोई कच्ची जगह अपने घर में छोड़ी ही नहीं है जहां से जल पृथ्वी में जा सके। जब तक जल पृथ्वी में नहीं जाएगा तब तक वो जल आपको कैसे मिलेगा ? उन्होंने कहा कि भारत सरकार को एक नियम बनाना चाहिए की हर घर में कही ना कही कोई कच्ची जगह जरूर होगी जहां पर कोई सिमेंट का कार्य नहीं होगा और सारे घर का जल उसी जगह पर जाएगा जिससे वो जल पृथ्वी में अंदर जा सके, जिससे ये पृथ्वी के स्त्रोत में जल की कोई कमी ना रहे और हम लोगों को भी वो जल पर्याप्त मात्रा में मिलता रहे। महाराज श्री ने आगे कहा कि जल अनमोल है इसका मूल्य समझे, ये ना हो की हमारी आने वाली पीढ़ी को जल मिले ही ना। जो भी हम जल का इस्तेमाल करते हैं उसे उतना ही करें जितने की जरूरत है, व्यर्थ का जल बर्बाद ना करें।

आप अपने जन्मदिन पर, सालगिरह पर पेड़ लगाइए, वृक्ष लगाने से पृथ्वी मां का श्रृंगार होता है और जहां पेड़ वृक्ष होते हैं वहां वर्षा भी अधिक होती है, जहां अधिक वर्षा होती है वहां जल स्त्रोत्र ऊंचा रहता है, वहां जल की कमी नहीं होती है इसलिए महत्वपूर्ण है की हम वृक्ष भी लगाएं और जल भी बचाएं।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराजा ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी।

पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है।

आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।
श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन अंजू सिन्हा एवं अनिल कुमार सिन्हा एवं सहयोग विश्व शांति सेवा समिति रांची द्वारा किया जा रहा है। कथा पंडाल में यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

12May 2019

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने ने भागवत कथा में अमर कथा

रांची के हरमू मैदान में विश्व शांति सेवा समिति रांची एवं विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 मई 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। कथा के द्वितीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। द्वितीय दिवस के कथा की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। पूज्य श्री देवकी नंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत में सर्वप्रथम सभी माताओं को मातृ दिवस की शुभकामनाएं दी। महाराज श्री ने आगे कहा कि भागवत और कृष्ण में कोई भेद नहीं हैं हमको भागवत और कृष्ण में भेद नहीं करना चहिये। उन्होने कहा कि संतों की सेवा में जो आनंद हो वो किसी ओर चीज में नहीं। महाराज श्री ने बताया की गरुण पुराण में लिखा है कि आप देवताओं से पहले अपने पितरो को मना लो क्यूंकि देवता तो आपको आपके कर्म अनुसार फल देते है लेकिन अगर पितृ एक बार खुश हो जाए तो वह वो दे देते है जो तुम्हारे भाग्य में भी नहीं होता और अगर पितृ अप्रसन्न हो जाए तो वो भी छीन लेते है। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है। श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए। यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा। श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन अंजू सिन्हा एवं अनिल कुमार सिन्हा एवं सहयोग विश्व शांति सेवा समिति रांची द्वारा किया जा रहा है। कथा पंडाल में यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

13May 2019

विनम्रता आपकी सबसे बड़ी दौलत है - पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विनम्रता आपकी सबसे बड़ी दौलत है - पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

आपका सम्मान आपके कर्मो से होता है - पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

मानव जीवन का उद्देश्य ईश्वर की प्राप्ति है - पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

रांची के हरमू मैदान में विश्व शांति सेवा समिति रांची एवं विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 मई 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया ।

कथा की शुरुआत में श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट समिति रांची द्वारा महाराज श्री का शॉल पहनाकर उनका स्वागत किया गया।

कथा पंडाल में नगर विकास मंत्री माननीय श्री चंद्रेश्वर प्रसाद सिंह (झारखंड) जी ने अपनी उपस्तिथि दर्ज करवाई व् कथा का रसपान किया।

कथा के तृतीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
कथा की शुरूआत भागवत आरती एवं विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। महाराज श्री ने युगलाष्टक के पाठ से की और कथा पंडाल में आये हुए भक्तों को युगलाष्टक के बारे में बताते हुए कहा की जिन्हे श्रीकृष्ण और राधा- रानी के प्रेम के बारे में जानना है, उनके प्रेम भाव को महसुसु करना है तो युगलाष्टक को जाने।

महाराज श्री ने बताया की आज के समय में लोगों के अंदर से विनम्रता गायब हो गयी है। आज के कलयुगी पुरुष में अहम आ गया है आज का व्यक्ति न तो किसी की सुनना चाहता है और न ही किसी का सम्मान करना चाहता है। वो तो बस सबको अपनी सुनाना चाहता है और अपना सम्मान करवाना चाहता है। लेकिन उस मुर्ख को ये नहीं पता की अगर तुम्हारे कर्म अच्छे होंगे तो तुम खुद ब खुद सम्मान के काबिल हो जाओगे तुम्हारे सत्कर्म तुम्हे खुद सम्मान दिलाएंगे।

पंडित जी ने कहा की जिन कार्यो को हमारे वेद अनुमति देते हो हमें सिर्फ वही कार्य करने चाहिए,क्यूंकि जब भागवत राजा परीक्षित का कल्याण कर सकती है वो हमारा भी कल्याण कर सकती है लेकिन इस बात पर हमें पूर्ण विश्वास होना चाहिए। कलयुग का वरदान आलस है और आलस के चक्कर में इंसान अपना मोक्ष भी गवा रहा है, क्यूंकि आज के समय में हमें तिलक लगाने में आलस करता है तुलसी की माला पहनने में उसे आलस आता है लेकिन आज के व्यक्ति को खाने पीने और कमाने में आलस नहीं आता है इसलिए हमे हरिनाम जाप करने में कभी आलस नहीं करना चाहिए

अगर हम इस जीवन में हरी नाम जाप करने में आलस करेंगे तो फिर अगले जन्म फिर से अपने कर्म भोगने आना पड़ेगा। बचपन में किया हुआ भजन आपको सौ गुना फल देता है वो आपके पुरे जीवन भर का खजाना होता है इसलिए हमें बचपन में ही इतना भजन कर लेना चाहिए ताकि बुरा समय आपके पास आने से भी घबराये। भजन और भक्ति करने की कोई उम्र नहीं होती। परमात्मा ने हम पर उपकार करके हमें मानव जीवन दिया है ताकि हम ईश्वर की प्राप्ति कर सकें क्यूंकि मानव जीवन मिलना साधारण नहीं है लेकिन हम अपने इस मानव जीवन को बिना किसी लक्ष्य के व्यर्थ यूँ ही गवा रहे है। मानव जीवन मिलना बड़ा ही दुर्लभ है और अगर हम इस जीवन को बिना ईश्वर की प्राप्ति के गवा दे तो हमारा इस पृथ्वी पर जन्म लेना असफल है। मानव जीवन का उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ ईश्वर की प्राप्ति है। इसलिए भगवान् के श्री चरणों में जाकर मुक्ति पाने का मार्ग सिर्फ और सिर्फ भक्ति है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।

राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है।

भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।
श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।
श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन अंजू सिन्हा एवं अनिल कुमार सिन्हा एवं सहयोग विश्व शांति सेवा समिति रांची द्वारा किया जा रहा है। कथा पंडाल में यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

14May 2019

"भक्ति और भक्त सदैव भगवान के हृदय में रहते है।"

"भक्ति और भक्त सदैव भगवान के हृदय में रहते है।"
"सच्ची निष्ठा से की गई भक्ति आपको भगवान से मिलाती है।"

रांची के हरमू मैदान में विश्व शांति सेवा समिति रांची एवं विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 मई 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

कथा की शुरूआत भागवत आरती एवं विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने कथा का रसपान किया।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने बहुत ही सुन्दर भजन "श्री श्याम तुम्हारे चरणों में एक बार ठिकाना मिल जाए से की" महाराज श्री ने बताया की भगवान् अपने भक्तो की रक्षा के लिए कोई भी लीला करते है। प्रहलाद जी की रक्षा करने के लिए भगवान् नरसिंह का अवतार लेकर प्रकट हुए, और उनकी रक्षा कर उन्हें अपनी गोद में लिया और खूब सारा स्नेह किया और आज के समय में लोग कहते है की भगवान् है ही नहीं लेकिन हमारे पास इतिहास में वेद है, पुराण है, शास्त्र है, जिनमे हमें भगवान की अनेको अनेक लीलाओ का वर्णन मिलता है, कई लोगों को तो मंदिर जाकर भी भगवान नहीं मिलते लेकिन जो भक्त भगवान को सच्चे दिल से याद करते है उनकी भक्ति करते है उसके पास भगवान खुद चल कर आते है। सच्ची निष्ठा से की गई भक्ति आपको भगवान से मिलाती है। क्यूंकि भगवान के हृदय में सिर्फ दो ही लोग रहते है एक भक्ति और दूसरा भक्त। लेकिन कुछ मुर्ख लोग है जिन्हे भगवान कुछ दे दे तो वो भगवान की भक्ति को भूल खुद को भगवान मानने लगते है। ये भगवान की ही कृपा है जिससे हम हर दिन जीवित है वरना बिना भगवान की इच्छा के एक पत्ता भी नहीं हिल सकता। इसलिए इस जीवन में अच्छे भक्त बनिए, अच्छे साधू बनिए ताकि भगवान की कृपा आप के ऊपर बनी रहे। 
महाराज श्री ने कहा कि सदैव सतकर्म करते रहिये ताकि आप अपने साथ - साथ अपने पित्तरो का भी कल्याण कर सकें। इस पृथ्वी पर किये हुए सतकर्मो से आपके पितरो को भी ख़ुशी मिलती है। मानव योनि मिलने के बाद जीव को सत्य को स्वीकार करना चाहिए क्यूंकि सत्य कमजोर हो सकता है लेकिन कभी मिट नहीं सकता और एक झूठ को छुपाने के लिए आपको कई और झूठ बोलने पड़ेंगे और झूठ की विशेषता ये होती है की इसे आपको याद रखना पड़ता है। मनुष्य को दयाशील भी होना चाहिए क्यूंकि दयाशील व्यक्ति धर्मात्मा होता है और धर्मात्मा व्यक्ति की वाणी हमेशा मीठी होती है। दयाशील व्यक्ति सदैव संतो की सेवा करते है, अन्न दान करते है और सबसे महत्वपूर्ण बात की वो संतोषी होते है उन्हें भगवान् ने जितना दिया है उसी में खुश रहते है ,क्यूंकि अठरहा पुराणों का सार यही है की दुसरो को सुख देने वाला धर्मात्मा होता है और दुसरो को दुख देने वाला अधर्मी तो आपका भी इन गुणों से भरपूर अपना जीवन बनाना चाहिए ताकि भगवान की कृपा आप पर बनी रहें।।

महाराज श्री ने बताया की जीव को एकादशी का व्रत जरूर करना चाहिए क्यूंकि इस व्रत में इतनी सकती है की अगर इस व्रत को करते है तो इस व्रत को मात्र करने से आपका कल्याण हो जायगा।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया। शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे। महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।" जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया। इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

11May 2019

भागवत कथा सुनने से हमारे लोक -परलोक दोनों सुधर जाते है”

“भागवत कथा सुनने से हमारे लोक -परलोक दोनों सुधर जाते है”
“आपके भव रोगो को मिटाने का काम करती है श्रीमद भागवत”

रांची के हरमू मैदान में विश्व शांति सेवा समिति रांची एवं विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 मई 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के प्रथम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
कथा से पूर्व आज दुर्गा मंदिर, हाईकोर्ट कॉलोनी, नियर सरदानंद चौक से कथा पंडाल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई। कलश यात्रा में सैकड़ों की तादाद में माताओं बहनों ने कलश उठाकर पुण्य लाभ प्राप्त किया।
प्रथम दिवस के कथा की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि आप सब पर ठाकुर जी की अहित की कृपा का दर्शन है जिसकी वजह से आप आज कथा पंडाल में बैठे है और श्रीमद भगवत कथा का रसपान कर पा रहें है क्यूंकि जिन्हे गोविन्द प्रदान करते है जितना प्रदान करते है उसे उतना ही मिलता है। उसके बाद कथा क्रम की शुरुआत भागवत के प्रथम श्लोक का उच्चारण करते हुए की।
महाराज श्री ने कहा की जिस भूमि पर आप अभी बैठे है ये कोई साधारण भूमि नहीं है इसलिए सबसे पहले इस भूमि को प्रणाम करें । उन्होंने आगे कहा कि जो ये 7 दिन की कथा सुनता है उसके पाप पूर्ण रूप से धूल जाते है। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की प्रारम्भ में यह की भागवत का महात्यम क्या है ? एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। इस सांसारिक जीवन में जो कुछ भी प्राप्त किये हो सब किराए के मकान की तरह है। खाली करना ही पड़ेगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।
श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन अंजू सिन्हा एवं अनिल कुमार सिन्हा एवं सहयोग विश्व शांति सेवा समिति रांची द्वारा किया जा रहा है। कथा पंडाल में यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

12Apr 2019

रामलीला मैदान, फिरोजाबाद में युवा शांति सेवा संदेश का आयोजन किया गया।

आज विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में लेबर कॉलोनी, रामलीला मैदान, फिरोजाबाद में युवा शांति सेवा संदेश का आयोजन किया गया। वहां पहुंचने पर पूज्य महाराज श्री को विशाल फूलमाला पहनाकर एवं स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। महाराज श्री ने सभी युवाओं एवं बच्चों के धर्म और संस्कृति से जुड़े सवालों का एक-एक करके जवाब दिया। युवा शांति संदेश के इस आयोजन में युवाओं ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। युवाओं ने देश के धर्म, संस्कृत, संस्कृति और संस्कारों से जुड़े हुए कई सवाल किए जिनका महाराज श्री द्वारा युवाओं की ही भाषा में बड़ी ही सरलता से उत्तर दिया गया। पूज्य महाराज श्री ने सभी युवाओं को गलत संगत एवं प्रव्रतियों को त्यागने और धर्म, देश व समाज के प्रति समर्पित रहने के लिए प्रेरित किया और सनातन धर्म का इतिहास एवं संस्कारों की जानकारी दी। साथ ही महाराज श्री द्वारा युवाओं को पुरस्कृत भी किया गया।

1Apr 2019

श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में होली मिलन एवं भारतीय नव वर्ष स्वागत समारोह

कल लखनऊ के तुलसी उद्यान, गीतापल्ली, आलमबाग में श्री सत्य शिव सेवा चैरिटेबल समिति द्वारा विश्व शांति सेवा समिति के सहयोग से कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में होली मिलन एवं भारतीय नव वर्ष स्वागत समारोह का आयोजन किया गया।

होली मिलन के इस भव्य कार्यक्रम में सैकड़ों की तादाद में भक्त शामिल हुए। कार्यक्रम की शुरूआत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज द्वारा राधा कृष्ण की आरती के साथ की गई, उसके पश्चयात कार्यक्रम में विभिन्न कलाकारों ने अपनी प्रस्तुती दी, कलाकारों की प्रस्तुती का सभी भक्तों ने आनन्द लिया। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने भी राधा कृष्ण के सुंदर भजनों और होली के गीतों से सभी भक्तों को कृतार्थ किया, सभी भक्त महाराज जी के द्वारा गाए हुए भजनों पर खूब झूमें।

होली मिलन कार्यक्रम में फूलों की होली, लठ्मार होली, लड्डूओं की होली खेली गई। कलाकारों द्वारा लठ्मार होली की भी सुंदर प्रस्तुती दी गई, उसके बाद पूज्य महाराज श्री ने राधा कृष्ण पर फूलों की वर्षा की, उसके बाद सभी भक्तों ने एक दूसरे पर पुष्ष वर्षा कर फूलों की होली का आनन्द लिया।

होली मिलन के इस कार्यक्रम में आयोजक सर्वेश पाण्डेय, राजेश पाण्डेय, देवेश पाण्डेय, दिनेश पाण्डेय, नितिन गुप्ता, आशोक यादव जी के अलावा कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

31Mar 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में कानपुर में होली मिलन का आयोजन किया गया।

विश्व शांति सेवा समिति कानपुर एवं विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में कानपुर में होली मिलन का आयोजन किया गया। सर्वप्रथम कानपुर पहुंचने पर पूज्य महाराज श्री का समिति सदस्यों एवं सभी भक्तों द्वारा भव्य स्वागत किया गया, महाराज श्री को विशाल फूलों की माला पहनाई गई। होली मिलन कार्यक्रम में सैकड़ों की तादाद में भक्त शामिल हुए, कार्यक्रम कें विभिन्न कलाकारों ने अपनी प्रस्तुती दी, कलाकारों की प्रस्तुती का सभी भक्तों ने आनन्द लिया। पूज्य महाराज श्री ने भी भक्तों के इंतजार को खत्म करते हुए राधा कृष्ण के सुंदर भजनों और होली के गीतों से सभी भक्तों को कृतार्थ किया, सभी भक्त महाराज श्री के भजनों पर खूब झूमें। होली मिलन कार्यक्रम में फूलों की होली, लठ्मार होली, लड्डूओं की होली खेली गई। कलाकारों द्वारा लठ्मार होली की भी सुंदर प्रस्तुती दी गई, उसके बाद पूज्य महाराज श्री ने राधा कृष्ण पर फूलों की वर्षा की, उसके बाद सभी भक्तों पर पुष्ष वर्षा की गई। सभी भक्तों ने महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया।

18Mar 2019

“दुनिया की हर चीज झूठी है केवल भगवान का भजन सच्चा है"

“दुनिया की हर चीज झूठी है केवल भगवान का भजन सच्चा है"

विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 13 मार्च से 20 मार्च तक प्रतिदिन विश्व शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड, वृंदावन में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं होली महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

कथा प्रारंभ से पूर्व आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर 125 कन्याओं की शिक्षा हेतु 6 लाख 37 हजार रूपए की राशि विश्व शांति मिशन की ओर से दी गई ताकी किसी भी बच्ची को शिक्षा का अभाव ना रहे। मिशन द्वारा लगातार चौथे वर्ष यह राशि कन्याओं की शिक्षा के लिए दी गई।

पूज्य महाराज श्री ने कथा में देश के पूर्व रक्षा मंत्री एवं गोवा के मुख्यमंत्री श्री मनोहर पर्रिकर जी के देहांत पर शोक संवेदना व्यक्त करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा कि आज के युग में ऐसा नेता मिलना बहुत मुश्किल है, देश ने एक बेहतरीन राजनेता को खो दिया। प्रभु से प्रार्थना करता हूं की उस दिव्य आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें और अगर उनका दोबारा जन्म हो तो फिर से उन्हें भारत में ही भेजना, फिर से एक बेहतरीन राजनेता बनाना ऐसी कृपा करना ।

महाराज श्री ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि ठाकुर जी का बहुत ही सुंदर फाग उत्सव चल रहा है, आज फाग के उत्सव में बहुत ही सुंदर कार्य हुआ, 125 कन्याओं की शिक्षा के लिए सेवा राशि दी गई। इस दुनिया में मैं और मेरे के लिए तो सब सोचते हैं, लेकिन बहुत बड़ा कार्य ही किसी ओर के लिए करना। संसार में गैर तो कोई भी नहीं है लेकिन जिन को आवश्यकता है उन तक हमारी सेवा पहुंच जाए ये बहुत बड़ी बात है।

महाराज श्री ने आगे कहा कि जिस समय भगवान व्यक्ति को जैसा बनाते हैं वो वैसा बन जाता है, इसलिए ये बात ध्यान रखें की काला वो नहीं जिसका रंग काला है, काला वो है जिसने भगवान का भजन नहीं किय़ा। भगवान का भजन नहीं कियो तो आप मरे के समान हो, दुनिया की हर चीज झूठी है भगवान का भजन सच्चा है। जब इंद्र को झूकना पड़ा था, ब्रह्मा को भी पछताना पड़ा था तो हमारी औकात 
क्या है ?

महाराज श्री ने कहा कि जब तक हम और आप संसार में सुख ढूंढ़ते रहेंगे तब तक दुखी रहेंगे, सुखी तब होंगे जब प्रियाकांत जू के चरणों में सुख की तलाश करेंगे तो निश्चित सुखी होने लग जाएंगे। पूर्ण आनंद केवल परमात्मा के चरणों में है इसलिए गोपियां परमात्मा को प्राप्त करने के लिए रास में सम्मितिल होने के लिए जाती थी।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है।

कथा का आयोजन विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है। कथा पंडाल में 108 भागवत कथा के यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

 

19Mar 2019

“भागवत स्वयं कल्पवृक्ष है”

“भागवत स्वयं कल्पवृक्ष है”

विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 13 मार्च से 20 मार्च तक प्रतिदिन विश्व शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड, वृंदावन में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं होली महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि महराज श्री ने बताया की जहा हम यज्ञ और हवन करते है वहा कुछ आसुरी शक्तियां विघ्न पहुंचाने का कार्य करती है लेकिन जिस धरती पर हम बैठे है जिनकी कथा हम सुन रहें है ये दोनों साधारण नहीं है। क्यूंकि ये जो जगह है जहा पर आप बैठे है ये स्थान भक्तो की भक्ति से ओतप्रोत स्थान है और खुद श्री प्रियकांत जू महाराज यहां पर विराजमान है। श्रद्धा से सुनी हुई भागवत आपके मनोरथ को पूर्ण करती है। साथ ही बताया की पूर्णिमा की रात अगर हम श्री कृष्ण के धाम में व्रत रख कर इस उत्सव को मनाये तो ठाकुर जी स्वयं आपकी इच्छाओं को पूर्ण करते है। जीवन में एक बार जो यजमान बनकर श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन कराता है उसकी पंद्रह पीढ़ियां तर जाती है। श्रीमद भागवत कथा आपके जीवन के कल्याण का सबसे सर्वश्रेष्ठ साधन है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई।

बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया।

उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की। 
कथा का आयोजन विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है। कथा पंडाल में 108 भागवत कथा के यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

20Mar 2019

होली के पावन अवसर पर आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर के प्रांगण में होली महोत्सव मनाया गया।

होली के पावन अवसर पर आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर के प्रांगण में होली महोत्सव मनाया गया। जिसमें देश-विदेश से हजारों भक्त मौजूद रहे। इस अवसर पर भगवान ठा. प्रियाकान्त जू के दर्शन करने और पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में होली मनाने के लिए भक्त सुबह से ही प्रागण में एकत्रित होने लग गए, प्रातः 7 बजे से मंदिर में हजारों भक्त पहुंच गए थे। महोत्सव की शुरूआत महाराज श्री द्वारा ठा. प्रियाकांत जू भगवान को रंग लगाकर की गई। उसके पश्चयात विभिन्न कलाकारों ने अपनी प्रस्तुती दी जिसपर भक्त खूब जमकर झूमे और होली का उत्सव मनाया।

महाराज श्री ने महोत्सव की शुरूआत में सर्वप्रथम देश विदेश में रह रहे सभी भक्तों को होली की शुभकामनाएं दी। उसके बाद महाराज श्री ने एक सुंदर भजन रसिया की रसिली बन गई का भक्तों को श्रवण कराया जिसपर सभी भक्त झूमते नाचते हुए होली के रंग उडाकर होली मनाने लगे।

महाराज श्री ने होली पर नशा ना करने का संदेश देते हुए कहा कि ये होली प्रेम का उत्सव है इसे नशा करके बर्बाद ना करें। होली का त्यौहार प्रेम से भरा हुआ है, इसे प्यार से मनाएं, एक दूसरे पर रंग गुलाल लगाएं, पुरानी दुश्मनी को भुलाएं और प्यार से अपने जीवन की यात्रा प्रारंभ करें। ये जीवन छोटा सा है इसे दुश्मनी करके बर्बाद ना करें।

होली महोत्सव के इस अवसर पर पूज्य महाराज श्री के सुपुत्र देवांश जी ने भी होली के एक सुंदर भजन प्रियाकांत जू ने अपनी कर डारी होली में की प्रस्तुती दी जिसका वहां मौजूद सभी भक्तों ने आनंद लिया। 
इसके बाद बृज गोपियों कवितो की होली, लठ-मार होली, फूलों की होली, लड्डुओं की होली, रंग-गुलाल की होली मनाई गई। इसके बाद महाराज श्री ने पिचकारी से सभी भक्तों पर भक्ति का रंग डाला लगभग 70-80 फ़ीट की ऊंचाई से इस पिचकारी की बौछार भक्तो पर पड़ रही थी।

राधे - राधे बोलना पड़ेगा !!

9Mar 2019

“भागवत कथा श्री कृष्ण से प्रेम उत्पन्न कराती है”“प्रेम वो नदी है जो हर जगह से रास्ता बना कर निकल जाती है”इंदौर के माँ कनकेश्वरी धाम, मदन महल गार्डन के पास, आई.टी.आई रोड़ में रमेश मेंदोला मित्र मंडल एवं सहयोग विश्व शांति सेवा समिति, इंदौर के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 मार्च से 11 मार्च 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

“भागवत कथा श्री कृष्ण से प्रेम उत्पन्न कराती है”
“प्रेम वो नदी है जो हर जगह से रास्ता बना कर निकल जाती है”

इंदौर के माँ कनकेश्वरी धाम, मदन महल गार्डन के पास, आई.टी.आई रोड़ में रमेश मेंदोला मित्र मंडल एवं सहयोग विश्व शांति सेवा समिति, इंदौर के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 मार्च से 11 मार्च 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के पंचम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। पंचम दिवस के कथा की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि जो कृष्ण की बाल लीला को सुनता है उनके हृदय में कृष्ण भक्ति कृष्ण प्रेम उत्पन्न होता है। भागवत कथा श्री कृष्ण प्रेम उत्पन्न कराती ही है। भगवान् की कृपा जब हम पर होती है तभी जीव भगवान् की कथा में अपना मन लगा पाता है। अगर आपको कभी ठाकुर जी कृपा का अनुभव हो तो आप उसको गोपनीय रखें उसको दुनिया को न बताये क्यूंकि जीवन में कुछ ऐसी बाते भी होती है जिनको गुप्त रखना जरुरी है लेकिन कलयुग का व्यक्ति आज के समय में उल्टा चलता है और वो अपने यश और सम्मान के लिए अपनी सारी अच्छी अच्छी बाते दुनिया को बता देता है और अपनी सारी बुरी आदतों को छुपा लेता है।

महाराज श्री ने आगे कहा कि संतो की माने तो भजन करने वाले व्यक्ति को भक्ति ऐसी करनी चाहिए जिससे की सामने वाले को कुछ पता भी न चले। क्यूंकि अगर आपको कोई अनुभव हुआ है ठाकुर जी की कोई कृपा आप पर हुई है तो आपको उसका गीत दुनिया के आगे गाने की कोई आवश्यकता नहीं है क्यूंकि जिनसे आपको प्रेम हुआ है वो सब कुछ जानते है।

महाराज श्री ने कहा कि हमें स्मरण भी ऐसा करना चाहिए की सामने वाला उसके बारे में जान भी न पाए और उसका अभ्यास करने का तरीका होता है की पहले आप अपने मुख से फिर होंठो से उसके बाद अपने कंठ से और फिर हृदय से स्मरण करे और जब एक बार आपका स्मरण मजबूत हो जायेगा तो आपके रोम- रोम से बस वही नाम निकलता है जिसके लिए आप प्रयासरत है और यही है प्रेम की पराकास्ठा, लेकिन इस प्रेम को दुनिया को बताएं नहीं अपने दिल में रखें।

महाराज श्री ने कहा कि मानव का जीवन हमें सोने के लिए नहीं बल्कि जागने के लिए मिला है यही कारण है की हम लोग जागरण करते है और जो लोग जागरण करते है उन्हें उतना ज्यादा फल मिलता है। और जिस दिन तुम्हे हृदय से कन्हैया से प्रेम हो जायेगा तो तुम्हे ये जग छोड़ना नहीं पड़ेगा अपने आप छूट जायेगा। क्यूंकि जो तुम्हे आज भक्ति करने से रोकते है एक दिन वही आपको शमशान में जाकर जला के आएंगे। आप जब मीरा की तरह ठान लेंगे की मेरा कोई नहीं है तो ईश्वर की भक्ति करने से आपको कोई नहीं रोक सकता क्यूंकि प्रेम वो नदी है जो हर जगह से रास्ता बना कर निकल जाती है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराजा ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।
श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन रमेश मेंदोला मित्र मंडल एवं सहयोग विश्व शांति सेवा समिति द्वारा किया जा रहा है। कथा पंडाल में यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

8Mar 2019

"संसार की सबसे बड़ी शक्ति है महिलाएं”इंदौर के माँ कनकेश्वरी धाम, मदन महल गार्डन के पास, आई.टी.आई रोड़ में रमेश मेंदोला मित्र मंडल एवं सहयोग विश्व शांति सेवा समिति, इंदौर के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 मार्च से 11 मार्च 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।

"संसार की सबसे बड़ी शक्ति है महिलाएं”

इंदौर के माँ कनकेश्वरी धाम, मदन महल गार्डन के पास, आई.टी.आई रोड़ में रमेश मेंदोला मित्र मंडल एवं सहयोग विश्व शांति सेवा समिति, इंदौर के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 मार्च से 11 मार्च 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

आज कथा पंडाल में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव श्री कैलाश विजयवर्गीय जी ने भी अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया, संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। श्री कैलाश विजयवर्गीय जी ने राधा रानी को समर्पित सुंदर भजन की भी प्रस्तुति दी जिसपर सभी भक्त खूब झूमे।

इसके अलावा टीवी सीरियल तारक मेहता का उल्टा चश्मा में अय्यर का किरदार निभाने वाले श्री तनुज महाशब्दे जी ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाकर महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया, संस्था की ओर से उन्हे स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

कथा में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर इंदौर को स्वच्छ भारत में नंबर वन बनाने में अभिन्न भूमिका निभाने वाली मातृशक्ति समस्त सफाई कर्मचारियों को भी महाराज श्री द्वारा सम्मानित किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए महिला दिवस के पावन अवसर पर विश्व की सभी मातृशक्ति को व्यास पीठ से नमन किया और बताया की देवियों के बिना सृष्टि की कल्पना करना भी पाप है। परमात्मा की सबसे खूबसूरत रचना हमारी माताएं बहने और बेटियां है, किसी भी सफल पुरुष के पीछे भी एक महिला का हाथ होता है जो सब कुछ सहती है और अपने पति को आ