सोमनाथ मंदिर पर हुए आक्रमण को लगभग 1000 वर्ष पूर्ण हो गए हैं, और यह घटना सनातन धर्म के इतिहास में आस्था, संघर्ष और बलिदान की अमर गाथा के रूप में स्मरण की जाती है। महमूद ग़ज़नी द्वारा बार-बार आक्रमण किए जाने के बावजूद हजारों सनातन धर्मावलंबियों ने इस पावन धाम की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी, और उन्हीं के त्याग के कारण आज हम श्री सोमनाथ महादेव के दिव्य शिवलिंग के दर्शन कर पा रहे हैं।
आज देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने सोमनाथ मंदिर जाकर भगवान शिव की पूजा-अर्चना की , जिससे सनातनियों और आने वाली पीढ़ियों को यह प्रेरणा मिली है कि धर्म और संस्कृति के प्रति सम्मान रखना हमारा कर्तव्य है। जब राष्ट्र का प्रमुख व्यक्ति अपने धर्म का पालन करता है, तो बच्चों के मन में भी गौरव का भाव जागृत होता है और वे अपने संस्कारों के प्रति अधिक जिम्मेदार बनते हैं।
इसके विपरीत, पूर्व में कई नेता धार्मिक आस्थाओं को प्रकट करने में संकोच करते रहे, लेकिन आज यह परिवर्तन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि मंदिर दर्शन, गंगा स्नान और पूजा-पाठ जैसे कार्यों को सम्मान के साथ अपनाया जा रहा है। जो भी व्यक्ति सनातन धर्म को आगे बढ़ाने और उसकी मर्यादा की रक्षा करने का कार्य करता है, वह समाज के लिए प्रेरणा बनता है, क्योंकि जैसा आचरण बड़े करते हैं, वही संस्कार बच्चों के जीवन में भी उतरते हैं।
हर सनातनी को अपने जीवन में एक बार चारों धाम—बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री—की यात्रा अवश्य करनी चाहिए। कहा जाता है कि जो व्यक्ति जीवन रहते चार धाम की यात्रा कर लेता है, उसका जीवन पुण्य, शुद्धता और ईश्वर-भक्ति से परिपूर्ण हो जाता है। चार धाम यात्रा केवल तीर्थ भ्रमण नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम और धर्म के मार्ग पर चलने का संकल्प है।
जब करोड़ों जन्मों के संचित पुण्यों का उदय होता है, तब मनुष्य को श्रीमद् भागवत कथा के पावन श्रवण का सौभाग्य प्राप्त होता है। यह कोई साधारण अवसर नहीं, बल्कि ईश्वर की विशेष कृपा का प्रसाद है, जो केवल उन्हीं को मिलता है जिनकी आत्मा अनेक जन्मों की तपस्या, सेवा और भक्ति से परिपक्व हो चुकी होती है।
तीर्थ में हमेशा मर्यादित और संयमित रहना चाहिए। वहाँ ऊँचा-नीचा, बड़बोलेपन या अनैतिक आचरण की जगह नहीं होती, क्योंकि तीर्थ स्थान पवित्रता, शांति और श्रद्धा का केंद्र होते हैं। प्रत्येक सनातनी को वहाँ अपने विचार, शब्द और कर्म में संयम रखना चाहिए—खुद की मर्यादा बनाए रखनी चाहिए और दूसरों का सम्मान करना चाहिए।
समय की क़द्र करना अत्यंत आवश्यक है। जो व्यक्ति समय का सही उपयोग करता है, वही जीवन में सफलता, समृद्धि और सुख-शांति प्राप्त करता है। समय को व्यर्थ गंवाना न केवल अवसरों को खोना है, बल्कि अपने कर्मों और लक्ष्य को भी पीछे छोड़ देने जैसा है।
जो व्यक्ति धर्म का पालन करता है, वह सत्य, करुणा, त्याग और न्याय जैसे मूल्यों को अपने आचरण में उतारता है, और यही गुण उसे अमर बना देते हैं। इतिहास गवाह है कि जिन महापुरुषों ने धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों तक की आहुति दे दी, वे आज भी हमारे हृदयों में आदर्श बनकर जीवित हैं।
जीवन में अनुशासन का होना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि अनुशासन ही व्यक्ति को सही मार्ग पर चलने की शक्ति देता है। जो व्यक्ति अपने विचारों, कर्मों और व्यवहार में नियमितता और नियमों का पालन करता है, वही जीवन में सफलता, संतुलन और सम्मान प्राप्त करता है। बिना अनुशासन के जीवन अशांत और अस्थिर हो जाता है; इच्छाएँ असीमित और कार्य अधूरे रह जाते हैं।
श्रीमद्भागवत कथा का भव्य आयोजन
दिनांक: 3 से 9 जनवरी 2026
समय: दोपहर 2 :30 बजे से
प्रिंसेस श्राईन पैलेस ग्राउंड ,गेट न.9, बैंगलोर