कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री रामेश्वर शर्मा जी ( हुजूर विधानसभा, म.प्र.) ने सम्मिलित होकर व्यासपीठ का आशीर्वाद प्राप्त कर कथा श्रवण किए।
कथा में “नो तिलक, नो एंट्री।” का नियम बनाया गया है। जिसका सभी भक्तों ने पूरे भाव, अनुशासन और सनातनी गौरव के साथ पालन किया। कथा पंडाल में उपस्थित प्रत्येक भक्त तिलक धारण किए हुए दिखाई दिया, जिससे संपूर्ण पंडाल भक्ति, संस्कृति और सनातन चेतना के दिव्य रंग में रंग गया। कथा पंडाल में उपस्थित प्रत्येक भक्त के मस्तक पर तिलक सुशोभित दिखाई दिया, जिससे संपूर्ण वातावरण भक्ति, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना से ओत-प्रोत हो उठा। पूरे कथा पंडाल में एकता, अनुशासन और धार्मिक चेतना का ऐसा अनुपम संगम देखने को मिला, जिसने सभी के हृदय को भाव-विभोर कर दिया।
कथा में भगवान श्रीकृष्ण जन्म महोत्सव धूम-धाम से मनाया गया। इस पावन अवसर पर संपूर्ण कथा पंडाल भक्तिरस में सराबोर हो उठा और ऐसा प्रतीत होने लगा मानो भोपाल स्वयं वृंदावन धाम में परिवर्तित हो गया हो। भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य की मंगल बेला पर भक्तों ने जयकारों, भजनों और नृत्य के माध्यम से अपने आनंद और उत्साह की अभिव्यक्ति की।महोत्सव में भगवान श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की मनमोहक झांकी निकाली गई, जिसने सभी भक्तों का मन मोह लिया। चारों ओर गूंजते मधुर भजन, शंखनाद और हरिनाम संकीर्तन से वातावरण दिव्य और अलौकिक बन गया। भक्त बड़ी संख्या में इस उत्सव में सम्मिलित हुए और नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की के जयघोषों से पूरा कथा पंडाल गुंजायमान हो उठा।
हर सनातनी को तुलसी की माला और तिलक जरूर धारण करना चाहिए । तुलसी और तिलक धारण करना केवल एक धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि भक्ति, सदाचार और भगवान के प्रति समर्पण का प्रतीक है। तुलसी धारण करने वाले भक्तों की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं और यमराज के दूत भी उनके निकट नहीं आ सकते। इसलिए प्रत्येक सनातनी को तुलसी का सम्मान करना चाहिए, तुलसी की सेवा करनी चाहिए तथा भगवान के नाम का निरंतर स्मरण करते हुए धर्ममय जीवन व्यतीत करना चाहिए।
माता-पिता हमारे जीवन के प्रथम गुरु होते हैं। वे अपने बच्चों के सुख, शिक्षा और उज्ज्वल भविष्य के लिए अनेक त्याग करते हैं। उनका प्रेम, मार्गदर्शन और आशीर्वाद ही जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है। इसलिए किसी भी परिस्थिति में माता-पिता का अपमान नहीं करना चाहिए।जब हम अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, उनकी बातों को आदरपूर्वक सुनते हैं और उनकी सेवा करते हैं, तो परिवार में प्रेम, शांति और संस्कार बने रहते हैं।
मनुष्य का स्वभाव और उसका भविष्य उसकी संगति पर निर्भर करता है। हमेशा अपने से बेहतर, गुणवान और संस्कारी लोगों का संग करने का प्रयास करना चाहिए। अच्छे लोगों की संगति से हमें ज्ञान, प्रेरणा और सही मार्गदर्शन मिलता है। उनके अनुभव और आदर्श हमें अपनी कमियों को पहचानने तथा स्वयं को बेहतर बनाने में सहायता करते हैं। वहीं बुरी संगति व्यक्ति को गलत रास्ते पर ले जा सकती है और उसके जीवन की प्रगति में बाधा बन सकती है।
भोजन करते समय अनावश्यक बातें नहीं करनी चाहिए। अन्न केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि ईश्वर का प्रसाद और जीवन का आधार है। इसलिए भोजन ग्रहण करते समय मन को शांत, एकाग्र और कृतज्ञ भाव में रखना चाहिए। बातों में उलझकर भोजन करने से न केवल भोजन का सम्मान कम होता है। यदि हम भोजन को प्रसाद समझकर श्रद्धा और मौन भाव से ग्रहण करें, तो वह हमारे शरीर के साथ-साथ मन और आत्मा को भी पोषण प्रदान करता है।
श्रीमद्भागवत कथा का भव्य आयोजन
दिनांक: 13 से 19 जून 2026 तक
समय: प्रतिदिन दोपहर 3:30 बजे से सायं 6:30 बजे तक
स्थान: रुद्राक्ष किंग्स्टन, अपोलो हॉस्पिटल के पास बावड़िया कलाँ, भोपाल (म.प्र.)