राम जी के आदर्शों पर चलकर ही राम राज्य आएगा | भगवान राम ने अपने जीवन में सत्य, धर्म, मर्यादा, त्याग, करुणा और विनम्रता का अद्भुत संगम पेश किया। उन्होंने कभी पद, शक्ति या सामर्थ्य का अहंकार नहीं किया, बल्कि हर परिस्थिति में धर्म का पालन किया। आज के समय में जब समाज में स्वार्थ, अहंकार और असत्य बढ़ता जा रहा है, तब राम जी के आदर्श पहले से भी अधिक आवश्यक हो जाते हैं। यदि हर व्यक्ति अपने जीवन में सत्य बोलने, बड़ों का सम्मान करने, कर्तव्य का पालन करने और दूसरों के प्रति करुणा रखने का संकल्प ले, तो समाज स्वतः ही सुधरने लगेगा और राम राज्य आ जायेगा।

सनातन धर्म की रक्षा और उसके शाश्वत मूल्यों को सुरक्षित रखने के लिए देश में सनातन बोर्ड का निर्माण होना चाहिए, यह बोर्ड शिक्षा के माध्यम से बच्चों और युवाओं को वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण, महाभारत और गीता जैसे ग्रंथों के मूल संदेश से परिचित कराएगा, जिससे उनमें नैतिकता, संस्कार और राष्ट्रप्रेम का भाव विकसित हो सके।

हमारे मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जाये। मंदिरों की आय का उपयोग मूल रूप से धार्मिक कार्यों, साधु-संतों की सेवा, गोशालाओं, वेद-पाठशालाओं, संस्कृत शिक्षा, अन्नदान, चिकित्सा और समाज सेवा के लिए होना चाहिए। किंतु जब मंदिर सरकारी नियंत्रण में होते हैं, तब उनकी आय का उपयोग कई बार ऐसे कार्यों में हो जाता है जिनका धर्म और भक्तों की भावना से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता।

आज स्थिति यह हो गई है कि छोटे-छोटे गांवों में भी शराब की दुकानें खुल गई हैं। हमें समझना चाहिए कि शराब का सेवन न केवल हमारे शरीर को, बल्कि मन, बुद्धि, परिवार और समाज – सबको दूषित कर देता है।तीर्थ की पवित्रता बनाए रखना हमारा कर्तव्य है। हमारे तीर्थो को पर्यटक स्थल मत बनाओ। तीर्थ में शराब और मांस का पूरी तरह से प्रतिबंध लगना चाहिए। यह स्थान भक्ति, प्रेम, सेवा और साधना का धाम है, न कि तामसिक प्रवृत्तियों का केंद्र।

महाराज श्री ने रावण के जन्म का प्रसंग बताते हुए समझाया कि हर जन्म अपने साथ कोई न कोई उद्देश्य और सीख लेकर आता है। रावण का जन्म ऋषि पुलस्त्य के वंश में हुआ—अर्थात उसमें ज्ञान, तप और ब्राह्मणत्व के गुण भी थे। वह अत्यंत विद्वान, वेदों का ज्ञाता और शिवभक्त था, लेकिन उसके भीतर धीरे-धीरे अहंकार और शक्ति का दुरुपयोग बढ़ता गया। यही अहंकार उसके पतन का कारण बना। केवल ज्ञान या शक्ति होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका सही उपयोग और विनम्रता भी उतनी ही आवश्यक है। रावण के पास सब कुछ था—विद्या, बल, वैभव—लेकिन वह अपने अहंकार पर नियंत्रण नहीं रख सका, इसलिए उसका अंत निश्चित हो गया।

हनुमान जी ने अपने कर्मों के द्वारा राम जी की भक्ति पाई थी, लेकिन आज वैसी भक्ति दुर्लभ होती जा रही है। उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि उन्हें क्या मिलेगा, बल्कि हर कार्य भगवान राम की प्रसन्नता के लिए किया। चाहे माता सीता की खोज हो, लंका दहन हो या संजीवनी लाना—हर परिस्थिति में उन्होंने पूरी निष्ठा, साहस और विनम्रता के साथ अपना कर्तव्य निभाया। हनुमान जी की भक्ति हमें यह सिखाती है कि सच्चा भक्त वही है, जो अपने अहंकार को त्यागकर, निःस्वार्थ भाव से सेवा करता है और हर परिस्थिति में भगवान के प्रति अटूट विश्वास बनाए रखता है।

भगवान के दरबार में न किसी का पद बड़ा होता है, न धन-दौलत का महत्व होता है और न ही अहंकार की कोई कीमत होती है। वहां केवल सच्ची भक्ति, निर्मल हृदय और विनम्रता ही स्वीकार की जाती है। जो व्यक्ति अपने अहंकार को त्यागकर, सरल भाव से भगवान के चरणों में समर्पित हो जाता है, वही वास्तव में उनका प्रिय बनता है। आज के समय में मनुष्य अपने पद, प्रतिष्ठा और संपत्ति पर गर्व करता है, लेकिन यह सब क्षणिक है। भगवान के सामने सब समान हैं। जब हम यह समझ लेते हैं कि असली शक्ति और सम्मान भगवान की कृपा से ही मिलता है, तब हमारे भीतर से अहंकार समाप्त होने लगता है और जीवन में शांति का अनुभव होता है।

मनुष्य का जीवन उसके कर्म और संगति से ही बनता और बिगड़ता है। जो कार्य हम करते हैं और जिन लोगों के साथ हम समय बिताते हैं, वही हमारे विचारों, संस्कारों और भविष्य को दिशा देते हैं। ऐसे कर्म करो जो भगवान को प्रिय हों—जिनमें सत्य, सेवा, करुणा, ईमानदारी और धर्म का पालन हो। इसलिए हमें चाहिए कि हम ऐसे लोगों का साथ चुनें जो हमें आगे बढ़ाएं, अच्छे संस्कार दें और भगवान के करीब ले जाएं। जब हमारे कर्म और संग दोनों ही भगवान को प्रिय होंगे, तब हमारा जीवन अपने आप सफल, शांत और आनंदमय बन जाएगा।

दिनांक: 22 से 28 अप्रैल 2026 तक

समय: दोपहर 1 बजे से शाम 4 बजे तक

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