Vrindavan बरसाना, श्रीराधारानी की जन्मभूमि और ब्रज का मुकुट, ऐसा पावन धाम है जहाँ की परिक्रमा प्रत्येक श्रद्धालु को अवश्य करनी चाहिए। इस परिक्रमा के प्रत्येक चरण में भक्त को श्रीराधा जी की करुणा, माधुर्य और दिव्य उपस्थिति का अनुभव होता है। जैसे गोवर्धन परिक्रमा से श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है, वैसे ही बरसाना परिक्रमा से श्रीराधारानी की अनुकंपा सहज रूप से प्राप्त होती है। बरसाने की पावन धरा पर चलना ही ध्यान जैसा अनुभव देता है। परिक्रमा के दौरान जप, भजन और स्मरण से मन शांत होता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

पूज्य महाराज श्री ने वृन्दावन के पूज्य संत श्री रमेश बाबा जी की प्रशंसा करते हुए कहा कि वे गौ माता के अत्यंत समर्पित और महान सेवक हैं। पूज्य रमेश बाबा जी वर्तमान में लगभग एक लाख गौ माताओं की सेवा कर रहे हैं, जो वास्तव में अनुकरणीय और प्रेरणादायक कार्य है। पूज्य महाराज श्री ने कहा कि ऐसे ही त्यागी, सेवाभावी और धर्मनिष्ठ संतों के कारण हमारा सनातन धर्म सुरक्षित, सशक्त और जीवंत बना हुआ है।

जमुना मैया स्वच्छ होनी चाहिए । विदेशों में कभी अत्यंत गंदी और प्रदूषित रही अनेक नदियों को आज इतना स्वच्छ बना दिया गया है कि उनका पानी पीने योग्य हो गया, लेकिन दुर्भाग्यवश हमने जमुना जी के पावन जल को इतना दूषित कर दिया है कि आज हम उसे ग्रहण करने की स्थिति में भी नहीं हैं। हमने जिसे भी “मां” कहा, यदि उसी की दुर्दशा कर दी, गौ माता को हम मां कहते हैं, पर आज उनकी स्थिति क्या है—यह किसी से छिपा नहीं है। गंगा और जमुना को मां कहकर पूजते हैं, लेकिन उनके जल की वर्तमान दशा अत्यंत पीड़ादायक है।

इंदौर में गंदा पानी पीने से कई मासूम बच्चों की मृत्यु हो जाती है , यदि अब भी नहीं जागे, तो परिणाम और भी भयावह होंगे। इसलिए हमें अपनी नदियों का संरक्षण करना होगा, उन्हें स्वच्छ रखना होगा । यही सच्ची श्रद्धा है, यही सच्चा धर्म और यही आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी सच्ची जिम्मेदारी है।

गौ हत्या पूर्ण रूप से बंद होनी चाहिए और गौ माता की सेवा समाज की प्राथमिक जिम्मेदारी बननी चाहिए। हम गौ माता को केवल “मां” कहें नहीं, बल्कि उनकी रक्षा, सेवा, संरक्षण और सम्मान को अपने आचरण में उतारें। जब तक गौ सेवा को धर्म, कर्तव्य और सामाजिक दायित्व के रूप में नहीं अपनाया जाएगा, तब तक सभ्यता का संतुलन बिगड़ता रहेगा। गौ हत्या पर पूर्ण विराम लगे और हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार गौ माता की सेवा कर, राष्ट्र और धर्म की रक्षा में सहभागी बने।

तिलक जरूर लगाना चाहिए। तिलक धारण करने से व्यक्ति को यह स्मरण रहता है कि उसका जीवन धर्म, मर्यादा और सदाचार के मार्ग पर चले। यह मन को एकाग्र करता है, अहंकार को शांत करता है और भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। जो व्यक्ति नियमित तिलक लगाता है, वह अनजाने में भी ईश्वर-स्मरण और आत्मसंयम की भावना से जुड़ा रहता है। तिलक धारण करना हमारी संस्कृति का गौरव और आध्यात्मिक अनुशासन का महत्वपूर्ण अंग है।

जीवन के अंतिम समय में हमारे साथ न धन जाता है, न पद, न प्रतिष्ठा और न ही संबंध—हमारे साथ केवल कर्म और भक्ति ही जाती है। जिस प्रकार मनुष्य पूरे जीवन कर्म करता है, उन्हीं कर्मों का फल उसे भोगना पड़ता है, और जिस भाव से की गई भक्ति होती है वही उसकी अंतिम गति का निर्धारण करती है। संसार की सारी उपलब्धियाँ यहीं छूट जाती हैं, लेकिन सेवा, सदाचार, दया, करुणा और ईश्वर स्मरण ही वह सच्चा धन है जो मृत्यु के पार भी हमारे साथ चलता है।

जीवन में सत्संग बहुत जरूरी है। सत्संग के प्रभाव से मन शुद्ध होता है, विचार सकारात्मक बनते हैं और जीवन का सही उद्देश्य स्पष्ट होता है। जहाँ सत्संग होता है वहाँ अच्छे संस्कार स्वतः पनपते हैं और व्यक्ति अपने आचरण, वाणी और कर्म में संयम व मर्यादा सीखता है। सत्संग हमें यह बोध कराता है कि संसार क्षणभंगुर है और परम सत्य की प्राप्ति ही जीवन का वास्तविक लक्ष्य है। जो व्यक्ति सत्संग को अपनाता है, उसका जीवन दिशा, दशा और दृष्टि—तीनों ही बदल जाती हैं।

भक्तमाल कथा का भव्य आयोजन
दिनांक: 12 से 16 जनवरी 2026
समय: शाम 4 बजे से
स्थान: ठाकुर श्री प्रियाकांत-जू मंदिर, शांति सेवा धाम ,वृंदावन

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