जब हम सनातनियों की बात करते हैं, तो अनेक लोग और कुछ न्यूज़ चैनल हमें ट्रोल करने लगते हैं। क्या सनातन की बात करना कोई गुनाह है, क्या अपनी संस्कृति, परंपरा और आस्था की रक्षा के लिए बोलना कोई अपराध है? आज जब कोई सनातन के मूल्यों, परंपराओं और सनातनियों के अधिकारों की बात करता है, तो उसे नकारात्मक दृष्टि से देखने का प्रयास किया जाता है। हम जब तक जीवित रहेंगे, अपने सनातन और सनातनियों के लिए हमेशा मुखर होकर आवाज उठाते रहेंगे। यदि मेरी बातों से किसी को अच्छी नहीं लगती है , तो उसे आत्मचिंतन करने की आवश्यकता है, क्योंकि अपने धर्म, संस्कृति और देश की आत्मा के लिए बोलना देशविरोध नहीं, बल्कि देशहित की भावना है।
जब कोई भक्त भगवान के जन्मोत्सव, पाटोत्सव, रासोत्सव, झूलनोत्सव, कीर्तन या महोत्सव में श्रद्धा और प्रेम के साथ सम्मिलित होता है, तब उसका मन सांसारिक मलिनताओं से मुक्त होने लगता है। जहाँ भगवान की कथा, कीर्तन और उत्सव होते हैं, वहाँ देवता स्वयं निवास करते हैं। ऐसे पावन वातावरण में एक क्षण का भी सच्चे भाव से किया गया स्मरण जन्म-जन्मांतर के संचित पापों को भस्म कर देता है।
राधा कुंड और श्याम (कृष्ण) कुंड केवल जलाशय नहीं, बल्कि राधा-कृष्ण के प्रेम और करुणा के साक्षात स्वरूप माने जाते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि जैसे श्रीकृष्ण सभी देवताओं में श्रेष्ठ हैं, वैसे ही सभी तीर्थों में राधा कुंड सर्वोच्च है। यह वही स्थान है जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने अरिष्टासुर का वध करने के बाद स्नान किया और श्रीराधा रानी ने अपने सखियों सहित राधा कुंड का प्राकट्य किया। जिन दम्पतियों को संतान की प्राप्ति नहीं हो रही हो, यदि वे श्रद्धा, संयम और नियमपूर्वक राधा कुंड की सेवा करते हैं, तो श्रीराधा-कृष्ण की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
भगवान न तो धन से प्राप्त होते हैं, न बल से, न ही पद, प्रतिष्ठा या विद्या के अहंकार से। संसार के साधन सीमित हैं, पर भगवान असीम हैं, इसलिए उन्हें पाने का मार्ग भी सांसारिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक है। वह मार्ग है भक्ति का — निष्कपट, निस्वार्थ और पूर्ण समर्पण से भरा हुआ। जहाँ तर्क समाप्त हो जाता है, वहीं से भक्ति आरंभ होती है, क्योंकि भगवान को समझा नहीं जाता, उन्हें अनुभव किया जाता है।
सच्चा सनातनी वही है जो पूजा के साथ-साथ प्रभु की वाणी और उनके आदर्शों को अपने विचार, व्यवहार और कर्मों में जीवित रखे। तभी समाज में धर्म की स्थापना होगी और जीवन सार्थक बनेगा।
अभिमानी मानव भगवान को कभी प्रिय नहीं होता, क्योंकि ईश्वर को विनम्रता, सरलता और सच्चा भाव पसंद है, न कि अहंकार और घमंड। धन, पद, बल या विद्या मिलने पर यदि मनुष्य अभिमान करने लगे, तो वही धन और शक्ति उसके पतन का कारण बन जाते हैं। लक्ष्मी सदा विनम्र के पास ठहरती है और अहंकारी से दूर चली जाती है।
भक्तमाल कथा का भव्य आयोजन
दिनांक: 12 से 16 जनवरी 2026
समय: शाम 4 बजे से
स्थान: ठाकुर श्री प्रियाकांत-जू मंदिर, शांति सेवा धाम ,वृंदावन