सनातन धर्म की रक्षा और समृद्धि के लिए सनातन बोर्ड का गठन किया जाए। हर सनातनी की आवाज़ यह है कि सनातन बोर्ड की स्थापना आवश्यक है। हम सरकार से विनम्र निवेदन करते हैं कि सनातन धर्म के हित में शीघ्र ही सनातन बोर्ड का गठन किया जाए, ताकि हमारी धार्मिक परंपराओं और संस्कृति की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से पूर्णतः मुक्त किया जाए, मंदिरों की आय से गुरुकुलम का निर्माण होना चाहिए। जहाँ सनातनी बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ वेद, उपनिषद, गीता, संस्कृत, नैतिक मूल्यों और भारतीय संस्कृति का संस्कार मिले। मंदिरों की आय से ऐसे गुरुकुलों का निर्माण और संचालन होना सनातन परंपरा की पुनर्स्थापना का महत्वपूर्ण कदम होगा। हमारे मंदिरों की आय से सनातनियों के लिए अस्पताल और सेवा केंद्र स्थापित किए जा सकते हैं, जहाँ गरीब, असहाय और जरूरतमंद लोगों को निःशुल्क सुविधा उपलब्ध हो।
अभिमान मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है, क्योंकि जहाँ अभिमान आता है वहाँ विवेक चला जाता है। अभिमानी मानव भगवान को कभी प्रिय नहीं होता, क्योंकि ईश्वर को विनम्रता, सरलता और सच्चा भाव पसंद है, न कि अहंकार और घमंड। जिसने स्वयं को बड़ा मान लिया, वह अपने भीतर बसे प्रभु को भूल बैठता है। धन, पद, बल या विद्या मिलने पर यदि मनुष्य अभिमान करने लगे, तो वही धन और शक्ति उसके पतन का कारण बन जाते हैं। लक्ष्मी सदा विनम्र के पास ठहरती है और अहंकारी से दूर चली जाती है। जो अपने सामर्थ्य पर घमंड करता है, वह ईश्वर की कृपा से वंचित हो जाता है।
आज हिंदू समाज दुखी इसलिए दिखाई देता है क्योंकि वह धीरे-धीरे अपने ही धर्म, संस्कार और मूल्यों से दूर होता जा रहा है। गुरुद्वारे में जाकर देखिए, जहाँ लंगर में हर व्यक्ति बिना भेदभाव के सेवा करता है। वहाँ कोई छोटा-बड़ा नहीं, कोई शर्म नहीं—सिर्फ सेवा का भाव होता है। वहीं दूसरी ओर, हम सनातनी होकर भी कई बार सेवा करने में संकोच या शर्म महसूस करने लगते हैं, जबकि सेवा तो हमारे धर्म की आत्मा है।
जब हम धर्म की रक्षा करेंगे, तभी धर्म हमारी रक्षा करेगा, जब मनुष्य धर्म के मार्ग पर चलता है, सत्य, करुणा, मर्यादा और न्याय को अपनाता है, तब धर्म स्वयं उसकी ढाल बन जाता है। धर्म की रक्षा करने का अर्थ है—अपने संस्कारों की रक्षा, अपनी संस्कृति का सम्मान और अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन। जिन्होंने धर्म को जीवन में धारण किया, विपत्ति में भी वही सुरक्षित रहे। और जिन्होंने धर्म की उपेक्षा की, वे शक्ति और वैभव होते हुए भी पतन को प्राप्त हुए। धर्म न केवल व्यक्ति की, बल्कि परिवार, समाज और राष्ट्र की भी रक्षा करता है।
जो संतान अपने माँ-बाप की सेवा, सम्मान और आज्ञा का पालन करती है, उसके जीवन में सुख, शांति और सफलता स्वतः आती है। माता-पिता का आशीर्वाद ऐसा कवच है जो हर संकट से रक्षा करता है। इसके विपरीत जो उनका अपमान या उपेक्षा करता है, वह जीवन में कभी सच्चा सुख प्राप्त नहीं कर पाता। माता-पिता की सेवा, उनका सम्मान और उनकी खुशी का ध्यान रखना हमारा परम कर्तव्य है। यही सच्चा धर्म है, यही सच्ची भक्ति है।
श्रीमद्भागवत कथा का भव्य आयोजन
दिनांक: 3 से 9 जनवरी 2026
समय: दोपहर 2 :30 बजे से
प्रिंसेस श्राईन पैलेस ग्राउंड ,गेट न.9, बैंगलोर