इस शुभ अवसर पर पूज्य संत श्री नेत्रपाल जी महाराज ने ठा. श्री प्रियाकांत जू भगवान की महिमा का भावपूर्ण वर्णन करते हुए बताया कि प्रियाकांत जू भगवान साक्षात करुणा, प्रेम और भक्तवत्सलता के साकार स्वरूप हैं। उनके दर्शन मात्र से हृदय के विकार शांत हो जाते हैं और मन स्वतः ही ब्रज-भाव में लीन हो जाता है। प्रियाकांत जू भगवान की कृपा से असंभव भी संभव हो जाता है और जो भक्त सच्चे भाव से उनकी शरण में आता है, उसके जीवन को नई दिशा, उद्देश्य और आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती है।

कथा में देवांश ठाकुर जी ने भक्तों को सुन्दर भजन श्रवण करवाया। भजन की प्रत्येक पंक्ति में भक्ति, प्रेम और समर्पण का ऐसा प्रवाह था कि श्रोता भाव-विभोर हो उठे और संपूर्ण कथा पंडाल हरिनाम के रस में डूब गई।

महाराज श्री ने उत्तरप्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी से निवेदन करते हुए कहा कि उत्तरप्रदेश के सभी तीर्थ स्थल को मांस और मदिरा से पूर्णतः मुक्त किया जाए। तीर्थ केवल पर्यटन स्थल नहीं होते, वे साधना, संयम और संस्कार के जीवंत केंद्र होते हैं। जहाँ संतों की तपस्या, ऋषियों की साधना और भक्तों की आस्था सदियों से प्रवाहित होती रही है, वहाँ मांस और मदिरा का प्रचलन उस पवित्रता को आघात पहुँचाता है।

तिलक अवश्य धारण करना चाहिए। तिलक व्यक्ति को निरंतर यह स्मरण कराता है कि उसका जीवन धर्म, मर्यादा और सदाचार के मार्ग पर अग्रसर रहे। तिलक मन को एकाग्र करता है, अहंकार को शांत करता है और अंतःकरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। जो व्यक्ति नियमित रूप से तिलक धारण करता है, वह अनजाने में भी ईश्वर-स्मरण, आत्मसंयम और संस्कारों से जुड़ा रहता है। तिलक हमारी सनातन संस्कृति का गौरव और आध्यात्मिक अनुशासन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीक है।

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