Upcoming Events:

  • 4

    DAYS

  • 18

    HOUR

  • 27

    MINUTES

  • 06

    SECONDS

Shrimad Bhagwat Katha - USA

Program Shedule

Live News

31Aug 2017

"बिना स्वार्थ के की गयी भक्ति से भगवान भी आपके ऋणी हो जाते है "

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में एप्पल वैली, कैलिफोर्निया-अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के पंचम दिवस में श्रीमद भागवत कथा में जीवन में भक्ति के महत्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कथा शुरू करने से पहले अपने सभी भक्तों को एक प्यारा सा भजन " वृंदावन धाम अपार भजे जा राधे राधे" श्रवण करा सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस भजन के द्वारा महाराज श्री ने अपने सभी भक्तों को ठाकुर जी की भक्ति के लिए प्रेरित किया। ब्रज में, गोकुल में, बरसाने में, गोवर्धन में, रावल ग्राम में, नंदगाव में, जहाँ भक्ति महारानी स्वयं आनंदित होकर नृत्य करती है। जहाँ जगतपति अखिल ब्रह्माण्ड नायक, जगत रचियता अकारण ही अवतरित होकर आते है। जहाँ ब्रज की गलियों में संत बहुत ही अच्छा पद गाते है कि वृंदावन की महिमा तीन लोक से न्यारी है। इतने प्यारे वृंदावन की विशेषता का वर्णन कौन कर सकता है। जहाँ कर्म और धर्म दोनों ही मिलकर रस्सी बून रहे है और मुक्ति वृंदावन में पानी भर रही है। भला ऐसी विशेषता वाले वृंदावन का वर्णन कौन कर सकता है। हमारे आचार्यों ने तो यहाँ तक कहाँ है कि वृंदावन के बाहर अगर भगवान भी तुमको दर्शन देने के लिए तैयार हो तो तुम दर्शन मत करना। हमें श्री कृष्ण से प्रार्थना करनी चाहिए की हमें तो आपके दर्शन केवल वृंदावन में ही करने है बाहर नहीं। हमें वृन्दावन की सीमा के बाहर तो आपके दर्शन तो दूर हम आपको देखना भी नहीं चाहते है। हम तो आपको सदा सदा के लिए वृंदावन में ही देखना चाहते है। तब एक भक्त ने कहा की महाराज क्या मिलता है आपके वृंदावन में? ऐसा है क्या वहां पर? तब महाराज श्री ने कहा की वृंदावन में दो तरह के विजिटर्स आते है। एक विजिटर्स आते है की चलों बिहारी जी के दर्शन कर आये। आते है बिहारी जी के दर्शन करते है और चले जाते है और दूसरे विजिटर्स जाते है ये सोचकर की जाना तो है और मिलकर आना है। एक उस तरीके के भक्त जाने है और सोचते है की अगर हमें प्रभु जी मिल जाए तो हमारा भाग्य ही बदल जायेगा। तब महारज श्री ने वहां पर मौजूद सभी भक्तों को एक बालक की कथा सुनाई। एक बालक गुरु की आज्ञा से वृंदावन में वास करता था और पुरे दिनभर राधा कृष्ण का जाप करता रहता था। वह बालक यह काम अपने प्रति दिन करता रहता था। उसका काम ही था भगवान की युगल उपासना करना और कोई काम उसका दूसरा कुछ भी नहीं था। जब भी वह बालक बिहारी जी के मंदिर में जाता था पर उस बालक को वहां पर बिहारी जी के दर्शन नहीं होते थे। इस तरह से दिन बीतते गए और उस बालक को यह अहसास हुआ की वह भी यह सोचने लगा की की मैं बहुत ही बड़ा पापी हूँ। इसलिए ही बिहारी जी मुझे दर्शन नहीं देते है बाकि सभी को बिहारी जी के दर्शन हो जाते है। सबकी पुण्य आत्मा है इसलिए ही बिहारी जी सबको दर्शन देते है और मैं पापी हूँ इसलिए बिहारी जी मुझे दर्शन नहीं देते है यही बात उस बालक के मन में घर कर गयी। जब ये बात उस बालक के मन में घर कर गयी तो वह सोचने लगा की जब हम इतने ही पापी है तो हमारा जीना ही बेकार है और वह बालक मरने के बारे में सोचने लगा और यमुना जी की तरफ बड़े ही उदास मन से जाने लगा। यमुना के तट पर एक कोढ़ी लेटा हुआ था उसको अचानक ठाकुर जी ने सपने में आकर कहा की तू एक कोढ़ी है और अगर तुझे अपना कोढ़ ठीक करना है तो अभी सुबह-सुबह यहाँ से एक बालक गुजरेगा तो तू उस बालक के पैर पकड़ लेना और तब तक मत छोड़ना जब तक वह बालक तुमसे ये न कह दे की जा तेरा कोढ़ ठीक हो जायेगा। जब वह बालक वहां से गुजरा तो उस कोढ़ी ने उस बालक के पैर पकड़ लिए तब उस बालक ने कहा की तुम मेरे पैर छोड़ दो। इस पर वह कहने लगा की मैं तो नहीं छोडूंगा आपके पैर। मैं तो आपके पैर जब छोडूंगा जब आप मुझसे कह दो की जा तेरा कोढ़ ठीक हो जायेगा। इस पर बालक बोला की मैं कोई भगवान थोड़े न हूँ जिसके कहने से तेरा कोढ़ ठीक हो जायेगा। इस पर बालक बोला की मुझसे बड़ा पापी ही कोई नहीं है इस धरती पर जिसको बिहारी जी के दर्शन ही नहीं होते है बाकि सभी को तो बिहारी जी दर्शन हो जाते है। इतना बड़ा पापी हूँ की मुझे बिहारी जी के दर्शन ही नहीं होते है। मैं झूठ क्योँ बोलूं। पर कोढ़ी कहने लगा की नहीं आप कह कर तो देखो। पर बालक फिर भी मना करने लगा। पर फिर उस कोढ़ी ने कहा की मैं तो तब तक तुम्हारा पैर नहीं छोडूंगा जब तक तुम ये न कहो की जा तेरा कोढ़ ठीक हो जायेगा। इस पर बालक उस कोढ़ी से बोला की आप मुझसे झूठ बुलवाना चाहते हो तो कोढ़ी बोला की झूठ नहीं आप बोल कर तो देखो एक बार। तो इस पर गुस्से में आकर उस बालक ने आखिर कह ही दिया की जा तेरा कोढ़ ठीक हो जायेगा। बस इतना ही कहना था उस बालक का कि उस कोढ़ी का कोढ़ ठीक हो गया। इस पर वह बालक और भी गुस्से में आ गया और कहने लगा की महाराज हमारे द्वारा कहने से आप किसी का कोढ़ तो ठीक करवा सकते हो पर हमको दर्शन नहीं दे सकते हो। इसका मतलब तो एक ही की आप केवल छलिया ही हो सभी लोग आपके बारे में ठीक ही कहते है। अगर आपने मुझे अभी दर्शन नहीं दिए तो मैं अभी यमुना में अपने प्राण ही त्याग दूंगा। वह तेज गति से उस यमुना की तरफ बढ़ने लगा तभी बांके बिहारी जी ने उस बालक के सामने आकर दर्शन दिए और कहने लगे की आप कहाँ जा रहे हो। तो इस पर उस बालक ने कहाँ की क्योँ आपने इतने दिनों से मुझे दर्शन नहीं दिए और अब दिए भी तो पहले हमसे झूठ बुलवा कर इस कोढ़ी का कोढ़ ठीक करवा लिया। जब मैं यमुना जी में मरने के लिए जा रहा हूँ तो आपने हमें दर्शन दे दिए है। ये सब लीलाएं आप हमसे क्योँ करते है? तब उस बालक को अपने गले से लगा कर बिहारी जी कहते है की देख मेरे प्यारे तू तो एक गजब का भक्त है। तू पुरे दिनभर ही मेरी भक्ति में डूबा रहता है। तू हर पल मेरा नाम जपता रहता है। पर बड़ी विचित्र बात तो ये है कि तू कभी भी मुझसे कुछ मांगता ही नहीं है। जब तू मुझसे कुछ मांगता ही नहीं है तो तेरी भक्ति का ऋण मुझपर कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था। मैं अपने आप को यह नहीं समझा पाता हूँ की मैं तुझे दर्शन देकर तेरे प्यार का ऋण चुका सकूँ। तूने कभी कुछ नहीं माँगा मुझसे और सदा ही सत कर्म में लिप्त रहता है। इसलिए ही तो मैंने यह सब लीला रचाई है और अब मैंने तुम्हारे द्वारा यह कार्य करवा कर तेरा ऋण कुछ कम किया और आज मैं तुझे दर्शन देने के लिए आ गया हूँ। राधे राधे बोलना पड़ेगा !!

31Aug 2017

"मानव जीवन का एकमात्र उद्देश्य है और वो है प्रभु की प्राप्ति करना "

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में एप्पल वैली, कैलिफोर्निया-अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के षष्टम दिवस में श्रीमद भागवत कथा में जीवन के महत्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कहा कि एक अभूत ही प्रेरणादायक भजन है कि जीवन में इंसान किसे कहते है। यहाँ पर कौन सहीं मायने में इंसान है। यूँ तो आप सब देखते ही है कि असभ्य अपना अपना जीवन व्यतीत कर ही रहे है। लेकिन सहीं मायने में हम किस को कहेंगे की मानव कौन है। अच्छा ,बुरा ,भला ,कौन है मानव। जो हमेशा दुसरो का बुरा चाहता है क्या वो सहीं मायने में इंसान कहलाने के लायक है। या दूसरों का भी भला सोचता है वही सही मायने में इंसान होता है। मानवता को इंसान को सेल्फिश होकर दुसित नहीं करना चाहिए। अगर हम सेल्फिश होकर दुसित कर देंगे और यहीं सोचे की वह इस धरती से मिट जाये तो वो व्यक्ति कभी भी मानव कहलाने के लायक नहीं है। वो तो केवल शैतान कहलाने के लायक ही होता है। इंसान वहीँ होता है जो हमेशा निश्वार्थ होकर दूसरों की सेवा करता है। हमें यह प्रार्थना करनी चाहिए की हमारी वजह से पापी भी सुधर जाये। हमें सीसा नहीं सोचना चाहिए की पापी इस धरती से ही मर जाये। मरने से पहले उस पापी की आत्मा भी सुध हो हमें ऐसी प्रार्थना करनी चाहिए। कोई मर जाये या मिट जाये हमें ऐसा नहीं सोचना चाहिए। क्योँकि पाप तो हम सब ने भी किये है। फिर दूसरों के बारे में हमें ऐसा नहीं सोचना चाहिए। हमको पाप से साद ही नफरत करनी चाहिए लेकिन पापी के नहीं करनी चाहिए। वो पाप जो सामने वाले ने किया है वो पाप हमसे आगे चलकर न हो ऐसी हमें जीवन भर कोशिश करते रहनी चाहिए। यहाँ पर महाराज जी ने एक प्यारा भजन "किसी के काम जो आये उसे इंसान कहते है "नमक गीत सुना कर वहां पर मौजूद सभी भक्तों के मन को मोह लिया। बाहत से लोग है जो जो कथाओ से बहुत कुछ सीख लेते है। और अपने जीवन को काफी डेवलप कर लेते है। ये तो आप के ऊपर ही निर्भर करता है की आप कैसे उसका चुनाव करते है। महाराज जी सदा ही हमसे कहते है की हमें अपने जीवन में जीवन के महत्व को समझना चाहिए। और जीवन के उद्देश्य को समझना होगा। पहले हमें अपने जीवन में एक लक्ष्य को निर्धारित कर लेना चाहिए। जब तक हम अपने जीवन में एक लक्ष्य नहीं निर्धारित कर लेते है तब तक हमें यही नहीं पता होता है की हमें करना क्या है। हमारा जीवन उस बेकार इंसान की तरह हो जाता है जो इस धरती पर बेकार ही घूमता रहता है। तो सबसे पहला हमारा कर्तव्य होता है कि हमें अपने जीवन में लक्ष्य को निर्धारित करना चाहिए। कहते है की जब तक हम लक्ष्य नहीं बना लेते है की हमको करना क्या है तो हमारे सब काम ही बेकार जाते है। हमारा जीवन ही बेकार हो जाता है। इसलिए ही हमें साद ही अपने जीवन में एक लक्ष्य बना लेना चाहिए की हमको आगे अपने जीवन में करना क्या है , हमको कुछ लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए काफी कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। क्योँकि बिना मेहनत के हमें अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकते है। इसलिए हमें सदा ही मेहनत करते रहना चाहिए और मेहनत से कभी भी घबराना नहीं चाहिए। तब महारज श्री ने एक दृष्टांत हमको सुनाया। भगवान् के दिए हुए इस जीवन के साथ हमको सिर्फ खेलना है चाहिए। हमको तो इसके उद्देश्यों को भी समझना चाहिए। एक बहुत ही विद्वान पंडित थे जो अपने स्कूल के बच्चो को पढ़ा कर आते थे लेकिन घर पर आने के बाद उसकी पत्नी उनसे लड़ती थी। वो विद्वान पंडित चाहे कितना भी अच्छा काम कर ले पर उसकी पत्नी साद ही उसको भला बुरा बोलती थी। उसके काम से वो कभी भी खुश नहीं रहती थी। उनकी पत्नी उनसे हर रोज लड़ती झगड़ती रहती थी। वो पंडित हर रोज स्कूल जाता बच्चो को पढ़ाने और घर आकर पत्नी लड़ती रहती है तो वो काफी अपसेट हो गया। और वो सोचने लगा कि अब तो मेरा जीवन ही बेकार है। ऐसी जिंदगी ही ही बेकार है। क्या करूँगा ऐसी जिंदगी जीकर मैं। यहाँ पर समाज ,घर ,पत्नी ,बच्चे सभी मेरे खिलाफ है। तो कई बार व्यक्ति डिप्रेसन में आकर गलत कदम उठा लेता है। तो समाज की भी यही ड्यूटी है की किसी भी व्यक्ति के पीछे हाथ धोके न पड़े। कहीं हमारी वजह से कोई डिप्रेशन में न आ जाये। पर कहाँ दूसरों के बारे में हम सोच पाते है। आज कल तो अपने ही बारे में हम नहीं सोच पाते है। तब वो विद्वान पडित सोचने लगे की क्योँ न मैं अपना आत्मदाह कर लूँ। पर आत्मदाह से पहले बोले चलो पहले संत जी से परामर्श ले लेता हूँ शायद ही कोई उपाय निकल आये। तब पंडित जी महात्मा जी के पास गए। तब महात्मा जी वहां पर पत्तल बना रहे थे। तब पंडित जी ने कहा कि महात्मा जी मुझे आप से कुछ बात करनी है। लेकिन महात्मा जी अपना पत्तल बनाने का काम करते रहे। तब पंडित जी महात्मा से बोला की महाराज बहुत ही जरुरी काम है मुझे आप से जरुरी बात करनी है। पंडित जी बोले की महात्मा जी ये काम जरुरी नहीं है जो आप कर रहे है। काम तो ये जरुरी है जिसके लिए मैं यहाँ पर आया हूँ। तब महात्मा बोले मैं भी तो काम ही कर रहा हूँ। तब पंडित बोला की जो प्रश्न मैं लेकर आया हूँ वो मेरे जीवन और मरण का सवाल है और आप पत्तल बनाने में बने हैं। और पंडित जी वहां से नाराज होकर जाने लगा। तब संत ने पत्तल बना लिए और उससे कहाँ की इधर आओ और बताओ की तुमको क्या समस्या है। तब पंडित बोला की समस्या क्या मैं बड़ा ही परेशां हूँ जिंदगी में। कभी भी मैं किसी को खुश नहीं कर पा रहा हूँ। मैं खुद ही अपने आप को खुश नहीं कर पा रहा हूँ। मैं घर में जब भी जाता हूँ पत्नी बेवजह ही मुझसे लड़ती झगड़ती रहती है। मेरा मन करता है की मैं अपना आत्मदाह कर लूँ। तो आप मुझे सलह दीजिये की क्या मैं मर जाऊ। तब संत ने कहाँ की जो तुम चाहो तुम्हारी ही तो जिंदगी है। तब महात्मा ने उस पंडित से कहाँ की तुमने देखा कि मैं क्या कर रहा था। तो पंडित जी बोला की क्या कर रहे थे तो संत ने कहाँ कि मैं पत्तल बना रहा था। आप ऐसी पत्तल बना रहे थे जिसको आप को फेंक ही देना है। आपको मेरे जीवन की कोई भी परवाह नहीं है। आपको तो उस पत्तल की परवाह है जिपर भोजन करने के बाद फेंकना ही है। तब संत ने पंडित से कहाँ की पत्तल को फेंकना कब है भोजन के बाद यानि यूज करने के बाद पहले नहीं फैकना है। अगर उद्देश्य प्राप्त हो जाए तो पत्तल को तो फेंकना ही है। लेकिन उद्देश्य से पहले नहीं फैकना है। तब संत ने पंडित से कहाँ की के समझे जिंदगी में जब तक उद्देश्य प्राप्त नहीं हो जाता है तो हमें आत्मदाह के बारे में नहीं सोचना चाहिए। और मानव जीवन का उद्देश्य प्रभु की प्राप्ति है। और जब तक प्रभु की पर्पटी न हो जाये तब तक मरने के बारे में सोचना भी पाप है। राधे राधे बोलना पड़ेगा !!

30Aug 2017

" आपके कर्म जैसे होंगे भगवान आपको वैसे ही फल देता है "

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में एप्पल वैली, कैलिफोर्निया-अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस में श्रीमद भागवत कथा में जीवन के महत्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कहा कि भगवान ने हम सबकी किस्मत अपने हाथों से लिखी है और उन लोगों की किस्मत का क्या कहना जिन लोगों की किस्मत में ठाकुर की भक्ति हो, गोविन्द का प्यार हो और उन की कथा को श्रवण करने का अधिकार हो। माँ बाप की सेवा जो कर सके, धर्म और देश का सम्मान जो कर सके ऐसे लोगों की किस्मत का क्या कहना है। उन लोगों का भाग्य बहुत ही बड़ा होता है। यहाँ पर महाराज श्री ने बहुत ही प्यारे भजन "एक झोली में फूल खिले है ,एक झोली में कांटे रे कोई कारण होगा " भक्तों को श्रवण करवाया। आपके कर्म जैसे होंगे आपको वैसे ही फल मिलते है। इस भजन के द्वारा महाराज श्री ने लोगों को सच्चाई के रास्ते पर चलने के लिए लोगों को प्रेरित किया। और बुराई के रास्ते को सदा के लिए छोड़ने के लिए कहा। क्योँकि इस रस्ते पर चलकर ही हम सब का जीवन कष्टकारी हो जाता है। यहाँ पर सब व्यक्तियों को शांति चाहिए। जो लोग सदा के लिए भगवान के बने है उन लोगों की रक्षा भी तो भगवान ने सदा ही की है। हमें अपने आप को सदा के लिए भगवान की भक्ति में समर्पित कर देना चाहिए। तभी तो हमारा हर प्रकार से भला हो सकता है। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा कि पैसा आपको सुख नहीं दे सकता है, साधनाये आपको सुख नहीं दे सकती है। सुख तो हमारा मन ही हमको दे सकता है। हमारा सब्र भी हमको सुख दे सकता है और जब तक हमारे पास ये सब चीजे नहीं है तो हमको सुख प्राप्त नहीं हो सकता है। हम जो भी करते है तो हमें वो सब अपने गोविन्द के चरणों में अर्पित कर देना चाहिए। क्योँकि भगवान के चरणों में अर्पित की हुई कोई भी वस्तु हमें हज़ार गुना हो कर वापिस मिलती है। हम जब भी कोई गीता पाठ करते है, कोई भजन गाते है, कोई कथा सुनते है, कोई सत कर्म करते है या भागवत श्रवण करते है तो हमें श्रवण करने के बाद उन सब को गोविन्द के चरणों में ही समर्पित कर देना चाहिए। जिस समय भगवान राम धनुष तोड़ने के लिए जा रहे थे तो उस समय सब मिथिला वासियों ने अपने सारे सत कर्मों को याद किया और कहने लगे की हम सबने अपने जीवन जितने भी सत कर्म किये हो वो सभी भगवान राम को लग जाये और वो इस धनुष को तोड़ दे। क्योँकि हम सब के द्वारा किया हुआ सत कर्म कभी भी खाली नहीं जाता है। हमें अपने सत कर्मों को करने के बाद कभी भी दूसरे व्यक्तयों के सामने नहीं गाना चाहिए। क्योँकि ऐसा करने से हमारे द्वारा किये हुए सत कर्म का फल कम हो जाता है। हमें किये हुए कर्मों का बखान नहीं करना चाहिए। चाहे दूसरे हमारे किये हुए कर्मों का बखान करते फिरे। क्योँकि जब राम ने धनुष को तोडा था तो भगवान राम मिथिला वासियों के जीजा भी बन गए थे और सदा के लिए मिथिला में ही रह गए थे ऐसा ही मानना है मिथिलावासियों का। यहाँ पर वो सब कहते है कि अगर भगवान से सम्बन्ध जुड़ जाये तो इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है। महाराज श्री ने बताया कि हम सब चाहते है कि जो भी हमारे शहर का पावरफुल व्यक्ति हो उससे हमारा सम्बन्ध जुड़ जाये। कौन व्यक्ति नहीं चाहता है की हमारा राम के साथ और कृष्ण के सम्बन्ध जुड़े। जो ये सब नहीं चाहता है वो तो बद किस्मत वाला है और जो ये सब चाहता है वही किस्मत वाला है। उनसे सम्बन्ध जोड़ना भी आसान है और निभाना भी आसान है। दुनिया से तो छोटे से छोटा रिश्ता निभाना भी मुश्किल होता है। लेकिन जब भगवान से सम्बन्ध जुड़ जाये तो इससे बड़ी कोई बात हो ही नहीं सकती है। जिससे भगवान राम हमेशा के लिए मिथिलावासियों के बन कर मिथिला में ही रह गए थे। हमें सदा अपने गोविन्द के साथ ऐसा रिश्ता बना लेना चाहिए जिससे हमारी ज़िंदगी सुधर जाए। हम सब को ये तो पता ही है की हमारी मृत्यु तो निश्चित ही है तो इसको सफल बनाने के लिए हमें अपने इस जीवन में अच्छे अच्छे काम करने चाहिए। हम जितने अच्छे काम करेंगे तो हमें फल भी तो उसी के अनुसार ही मिलेंगे। महाराज श्री ने बताया कि ये शरीर तो एक वस्त्र के सामान है। आत्मा इस वस्त्र रुपी शरीर को समय समय पर बदलती रहती है। एक बार एक स्त्री ने महाराज जी से कहा कि महाराज मुझे मरना नहीं है तो महाराज ने कहा की क्योँ नहीं मरना है। तब स्त्री ने कहा कि महाराज मुझे मरने से डर नहीं लगता है मुझे तो मरने के बाद जलाते है उससे डर लगता है। तब महाराज श्री ने कहा कि कोई बात नहीं है एक बार मृत्यु को आ जाने दो तब देख लेंगे। तुम मरने के बाद जलने से मत डरना। मृत्यु तो हर व्यक्ति के जीवन में आती ही है। क्योँकि जिस भी व्यक्ति ने इस धरती पर जन्म लिया है तो उसको इस धरती से भी तो एक दिन जाना ही होता है। क्योँकि जो इस धरती पर आया है उसको इस धरती से एक दिन जाना भी तो होगा। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

27Aug 2017

"भगवान हमारे जीवन का सबसे बड़ा पासपोर्ट है।"

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में एप्पल वैली, कैलिफोर्निया-अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस में भगवत कथा के महत्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कहा कि भादों के महीने में श्रीमद भागवत कथा सुनना कोई आसान काम नहीं है। भादों के महीने में ही समय है राधा अष्टमी का। कृष्ण जन्माष्टमी हमने वृंदावन में मनाई थी और राधा अष्टमी हम अमेरिका में अपने भक्तों के साथ मना रहे है। भागवत भी हमको आसानी से सुनने को नहीं मिलती है ये भी हमें अपने बहुत ही जन्मो के पुण्य करने के बाद प्राप्त होता है। हम और आप बहुत ही भाग्यशाली है जिन्हे घर बैठे ही भागवत कथा सुनने का अवसर मिल रहा है। पांच तत्व से हमारा शरीर चल रहा है और उन पांच तत्वों को जिसने बनाया है वह है भगवान श्री कृष्ण और उन सब का संहार करने वाले भी श्री कृष्ण ही है। हमारे अंदर जीव तीन तरह से जीवित रहता है ये है दैहिक, जैविक और भौतिक। दैहिक होता है शारीरिक कष्ट, शारीरिक सुख। दैविक होता है देवताओं द्वारा दिया हुआ कष्ट और देवताओं के द्वारा दिया हुआ सुख। भौतिक होता है हमारे अपने लोग, समाज के लोग जिनसे कभी हम सुख की अनुभूति करते है और कभी दुःख की अनुभूति करते है। इन त्रितापों को जन्म देने वाला भी कोई और नहीं है वो तो हमारे भगवान श्री कृष्ण ही है। वही श्री कृष्ण जो हमको इस धरती पर भेजते है, हमारा पालन पोषण करते है और हम सब का संहार भी करते है। वही ही इन तीनो वजहों का जन्म का, पालन का और मृत्यु का कारण है। जीव सबसे ज्यादा दुःख कब पता है जानते हो? जब उस कारण को भूल कर अन्य यत्र तत्र भटकता रहता है। हमको उस कारण को कभी भी भूलना नहीं चाहिए। जब जीव इस कारण को भूलता है तो उसे इन कष्टों को भुगतना पड़ता है। उदहारण के तौर पर महाराज श्री ने कहा कि यदि आप विदेश चले जाये और अपना पासपोर्ट खो दो तो आपको सुख मिलेगा या दुःख मिलेगा। तब महाराज बोले की हमको काफी परेशानी होगी और भगवान हमारे जीवन का सबसे बड़ा पासपोर्ट है। हम इस दुनिया में आये है और भगवान रुपी पासपोर्ट हमने अगर खो दिया तो निश्चित ही हमें सदा ही अपने जीवन में कष्टों का सामना ही करना पड़ेगा। यहाँ पर व्यक्ति अपनी वजह से ही खुद भी दुःख पाता है और दूसरों को भी दुःख देता है। कई बार हम ये कहते है की हमको तो इसने दुःख दे दिया है या उसने दुःख दे दिया है पर ऐसा नहीं है। हम तो दुःख अपनी वजह से ही पाते है। इसके लिए हम दूसरों को दोषी नहीं ठहरा सकते है। महाराज श्री ने कहा कि आप जो भी करते है भगवान उसी का फल हमको देता है। संत को महाराज श्री ने भगवान की उपाधि दी है। अगर मानव जीवन आपको मिला है तो सबसे पहले उस ब्रह्म को, उस श्री कृष्ण को जानने की कोशिश करो, उस परमात्मा को जानने की कोशिश कीजिये। वो निराकार वादियों के लिए ब्रह्म है, साकार वादियों के लिए कृष्ण है और भक्तों के लिए वो परमात्मा है। भगवान तो केवल एक ही होता है केवल उसके रूप अलग-अलग हो सकते है। लोग जिस भी रूप में उसे याद करते है तो भगवान अपने भक्तों को उसी रूप में उनको मिल जाते है। अगर हम सब अपने जीवन में जीपीएस रूल को फॉलो करेंगे तो हमेशा ही खुश रहेंगे। हमारा ये ही मकसद होना चाहिए की हम कैसे उस ब्रह्म को, भगवान को, या परमात्मा को जान सके। हमें सदा ही अपने परमात्मा में खोये रहना चाहिए। बहुत से लोग कहते है कि अगर हम भागवत सुनेंगे तो हमें क्या मिलेगा? सबसे पहले इंसान को अपने धर्म के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा कि पूरी जानकारी तो किसी को भी नहीं है पर लेकिन जितनी ज्यादा से ज्यादा जान सको तो जान लो। तभी हम सब का इस संसार में कल्याण हो सकता है। सतयुग में, द्वापर में और त्रेता इन तीनो युगों में हज़ारों-हज़ारों वर्ष तप करो और तपस्या भी कैसी कि एक पैर पर खड़े हो कर, या जल में खड़े हो कर, पेड़ के नीचे खड़े हो कर आदि इतनी घनघोर तपस्या के बाद भी पता नहीं है की भगवान हमसे प्रसन्न होंगे या नहीं। कलयुग में मात्र केवल नियम से सात दिन भागवत कथा सुनो तो हम वो सब पा सकते है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते है। यहाँ पर व्यक्ति को धर्म पर विश्वास इसलिए नहीं होता है क्योँकि यहाँ पर चमत्कार नहीं होते है। तब महारज श्री ने एक बच्चे की बात बताई। एक बच्चा था पन्द्रह सोलह साल का। डॉक्टरों ने कहा कि उस बच्चे को कैंसर है और वो भी लास्ट स्टेज का कैंसर है जिससे बचाया नहीं जा सकता है। तब वह बच्चा भागवत कथा सुनने की रट करने लगा और सुनी भी उसने कथा। और महाराज श्री मुझे जैसे कथा सुनाएंगे मैं वैसे ही सुनूंगा और पूरी कथा सुनुँगा। भागवत कथा के सुनने से ही उस बच्चे का लास्ट स्टेज का कैंसर भी ठीक हो गया था। ये तो भगवान की महिमा ही है जिसके सुनने मात्र से ही उसके सभी कष्ट दूर हो गए थे। तब वह महाराज श्री के पास आया और कहने लगा की महाराज मैं अब पूरी तरह से ठीक हूँ। मुझे किसी भी तरह की कोई भी प्रॉब्लम नहीं है। इस पर कोई भरोसा भी नहीं करेगा पर जिस व्यक्ति के साथ ये सब हुआ है वो आकर महाराज श्री को बता रहा है और आकर डॉक्टर का सर्टिफिकेट दिखा रहा है की मुझे लास्ट स्टेज का कैंसर था जो अब पूरी तरह से ठीक है। सही को गलत और गलत को सही करने की ताकत तो केवल उस परमात्मा में ही है। चाँद को छुपा दे, बादलों में छुपा दे , दिन में रात कर दे, रात में दिन कर दे ये सब ताकत तो केवल उस परमात्मा में ही है तो कैंसर कौनसी बड़ी चीज है। पर सबसे पहले हम सब को चाहिए की हमें उस परमात्मा में पक्का विश्वास करना चाहिए। उसमें पक्का भरोसा करना चाहिए। तभी यह सब संभव हो सकता है। महाराज श्री ने कहा की जो लोग भागवत कथा सुनते है तो रोगी निरोगी काया को प्राप्त होगा, गरीब लोग धनवान हो जायेंगे, पापी हमेशा के लिए निष्पाप हो जायेंगे। तब वह बोला की महाराज जिसको किसी भी चीज की जरुरत न हो, जिसके पास सब कुछ हो तो। तब महाराज श्री बोले की जिसको कुछ नहीं चाहिए वही मोक्ष को प्राप्त करता है और भगवान उन लोगों को ही प्राप्त होते है जिन व्यक्तियों का मन सदा ही निर्मल होता है। जिनका मन निर्मल नहीं होता है उन व्यक्तियों को भगवान के दर्शन कभी भी नहीं होते है। भगवान बोले की हमें वो लोग बहुत ही अच्छे लगते है जिनका मन निर्मल होता है। जो लोग झूठ का सहारा कभी भी नहीं लेते है और छल कपट से सदा ही दूर रहते है। अगर आप झूठ का सहारा लोगे तो दूसरे लोग आप से सदा के लिए किनारा करने लग जायेंगे। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

27Aug 2017

"भगवान हमारे जीवन का सबसे बड़ा पासपोर्ट है।"

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में एप्पल वैली, कैलिफोर्निया-अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस में भगवत कथा के महत्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कहा कि भादों के महीने में श्रीमद भागवत कथा सुनना कोई आसान काम नहीं है। भादों के महीने में ही समय है राधा अष्टमी का। कृष्ण जन्माष्टमी हमने वृंदावन में मनाई थी और राधा अष्टमी हम अमेरिका में अपने भक्तों के साथ मना रहे है। भागवत भी हमको आसानी से सुनने को नहीं मिलती है ये भी हमें अपने बहुत ही जन्मो के पुण्य करने के बाद प्राप्त होता है। हम और आप बहुत ही भाग्यशाली है जिन्हे घर बैठे ही भागवत कथा सुनने का अवसर मिल रहा है। पांच तत्व से हमारा शरीर चल रहा है और उन पांच तत्वों को जिसने बनाया है वह है भगवान श्री कृष्ण और उन सब का संहार करने वाले भी श्री कृष्ण ही है। हमारे अंदर जीव तीन तरह से जीवित रहता है ये है दैहिक, जैविक और भौतिक। दैहिक होता है शारीरिक कष्ट, शारीरिक सुख। दैविक होता है देवताओं द्वारा दिया हुआ कष्ट और देवताओं के द्वारा दिया हुआ सुख। भौतिक होता है हमारे अपने लोग, समाज के लोग जिनसे कभी हम सुख की अनुभूति करते है और कभी दुःख की अनुभूति करते है। इन त्रितापों को जन्म देने वाला भी कोई और नहीं है वो तो हमारे भगवान श्री कृष्ण ही है। वही श्री कृष्ण जो हमको इस धरती पर भेजते है, हमारा पालन पोषण करते है और हम सब का संहार भी करते है। वही ही इन तीनो वजहों का जन्म का, पालन का और मृत्यु का कारण है। जीव सबसे ज्यादा दुःख कब पता है जानते हो? जब उस कारण को भूल कर अन्य यत्र तत्र भटकता रहता है। हमको उस कारण को कभी भी भूलना नहीं चाहिए। जब जीव इस कारण को भूलता है तो उसे इन कष्टों को भुगतना पड़ता है। उदहारण के तौर पर महाराज श्री ने कहा कि यदि आप विदेश चले जाये और अपना पासपोर्ट खो दो तो आपको सुख मिलेगा या दुःख मिलेगा। तब महाराज बोले की हमको काफी परेशानी होगी और भगवान हमारे जीवन का सबसे बड़ा पासपोर्ट है। हम इस दुनिया में आये है और भगवान रुपी पासपोर्ट हमने अगर खो दिया तो निश्चित ही हमें सदा ही अपने जीवन में कष्टों का सामना ही करना पड़ेगा। यहाँ पर व्यक्ति अपनी वजह से ही खुद भी दुःख पाता है और दूसरों को भी दुःख देता है। कई बार हम ये कहते है की हमको तो इसने दुःख दे दिया है या उसने दुःख दे दिया है पर ऐसा नहीं है। हम तो दुःख अपनी वजह से ही पाते है। इसके लिए हम दूसरों को दोषी नहीं ठहरा सकते है। महाराज श्री ने कहा कि आप जो भी करते है भगवान उसी का फल हमको देता है। संत को महाराज श्री ने भगवान की उपाधि दी है। अगर मानव जीवन आपको मिला है तो सबसे पहले उस ब्रह्म को, उस श्री कृष्ण को जानने की कोशिश करो, उस परमात्मा को जानने की कोशिश कीजिये। वो निराकार वादियों के लिए ब्रह्म है, साकार वादियों के लिए कृष्ण है और भक्तों के लिए वो परमात्मा है। भगवान तो केवल एक ही होता है केवल उसके रूप अलग-अलग हो सकते है। लोग जिस भी रूप में उसे याद करते है तो भगवान अपने भक्तों को उसी रूप में उनको मिल जाते है। अगर हम सब अपने जीवन में जीपीएस रूल को फॉलो करेंगे तो हमेशा ही खुश रहेंगे। हमारा ये ही मकसद होना चाहिए की हम कैसे उस ब्रह्म को, भगवान को, या परमात्मा को जान सके। हमें सदा ही अपने परमात्मा में खोये रहना चाहिए। बहुत से लोग कहते है कि अगर हम भागवत सुनेंगे तो हमें क्या मिलेगा? सबसे पहले इंसान को अपने धर्म के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा कि पूरी जानकारी तो किसी को भी नहीं है पर लेकिन जितनी ज्यादा से ज्यादा जान सको तो जान लो। तभी हम सब का इस संसार में कल्याण हो सकता है। सतयुग में, द्वापर में और त्रेता इन तीनो युगों में हज़ारों-हज़ारों वर्ष तप करो और तपस्या भी कैसी कि एक पैर पर खड़े हो कर, या जल में खड़े हो कर, पेड़ के नीचे खड़े हो कर आदि इतनी घनघोर तपस्या के बाद भी पता नहीं है की भगवान हमसे प्रसन्न होंगे या नहीं। कलयुग में मात्र केवल नियम से सात दिन भागवत कथा सुनो तो हम वो सब पा सकते है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते है। यहाँ पर व्यक्ति को धर्म पर विश्वास इसलिए नहीं होता है क्योँकि यहाँ पर चमत्कार नहीं होते है। तब महारज श्री ने एक बच्चे की बात बताई। एक बच्चा था पन्द्रह सोलह साल का। डॉक्टरों ने कहा कि उस बच्चे को कैंसर है और वो भी लास्ट स्टेज का कैंसर है जिससे बचाया नहीं जा सकता है। तब वह बच्चा भागवत कथा सुनने की रट करने लगा और सुनी भी उसने कथा। और महाराज श्री मुझे जैसे कथा सुनाएंगे मैं वैसे ही सुनूंगा और पूरी कथा सुनुँगा। भागवत कथा के सुनने से ही उस बच्चे का लास्ट स्टेज का कैंसर भी ठीक हो गया था। ये तो भगवान की महिमा ही है जिसके सुनने मात्र से ही उसके सभी कष्ट दूर हो गए थे। तब वह महाराज श्री के पास आया और कहने लगा की महाराज मैं अब पूरी तरह से ठीक हूँ। मुझे किसी भी तरह की कोई भी प्रॉब्लम नहीं है। इस पर कोई भरोसा भी नहीं करेगा पर जिस व्यक्ति के साथ ये सब हुआ है वो आकर महाराज श्री को बता रहा है और आकर डॉक्टर का सर्टिफिकेट दिखा रहा है की मुझे लास्ट स्टेज का कैंसर था जो अब पूरी तरह से ठीक है। सही को गलत और गलत को सही करने की ताकत तो केवल उस परमात्मा में ही है। चाँद को छुपा दे, बादलों में छुपा दे , दिन में रात कर दे, रात में दिन कर दे ये सब ताकत तो केवल उस परमात्मा में ही है तो कैंसर कौनसी बड़ी चीज है। पर सबसे पहले हम सब को चाहिए की हमें उस परमात्मा में पक्का विश्वास करना चाहिए। उसमें पक्का भरोसा करना चाहिए। तभी यह सब संभव हो सकता है। महाराज श्री ने कहा की जो लोग भागवत कथा सुनते है तो रोगी निरोगी काया को प्राप्त होगा, गरीब लोग धनवान हो जायेंगे, पापी हमेशा के लिए निष्पाप हो जायेंगे। तब वह बोला की महाराज जिसको किसी भी चीज की जरुरत न हो, जिसके पास सब कुछ हो तो। तब महाराज श्री बोले की जिसको कुछ नहीं चाहिए वही मोक्ष को प्राप्त करता है और भगवान उन लोगों को ही प्राप्त होते है जिन व्यक्तियों का मन सदा ही निर्मल होता है। जिनका मन निर्मल नहीं होता है उन व्यक्तियों को भगवान के दर्शन कभी भी नहीं होते है। भगवान बोले की हमें वो लोग बहुत ही अच्छे लगते है जिनका मन निर्मल होता है। जो लोग झूठ का सहारा कभी भी नहीं लेते है और छल कपट से सदा ही दूर रहते है। अगर आप झूठ का सहारा लोगे तो दूसरे लोग आप से सदा के लिए किनारा करने लग जायेंगे। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

28Aug 2017

" भगवान को सच्ची भक्ति से ही प्राप्त किया जा सकता है "

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में एप्पल वैली, कैलिफोर्निया-अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस में श्री शुकदेवजी महाराज की लीलाओं का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कथा की शुरआत "मीठी रस सो भरी राधा रानी लागे, महरानी लागे भजन से की। महाराज श्री ने कहा की मेरे प्यारे प्रभु प्रेमिओ आप सब भद्रा पक्ष में राधा अष्ठमी के समय पर भागवत कथा श्रवण कर रहें है। भगवान श्री कृष्णा के गौ लोक प्रस्थान के बाद राजा परीक्षित को प्रथम बार श्रीमद्भागवत कथा को श्रवण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। तब से चली आ रही ये परंपरा आज तक हम सब के मध्य उपस्थित है और अनेकों-अनेक विद्वानों के द्वारा ऋषि मुनि ब्राह्मण के द्वारा हमको श्रीमद भागवत कथा प्राप्त होती है। कथा मैं आपको नया सुनने को मिलता है ये हमारा और आप सबका सौभाग्य है। महाराज श्री ने कहा -श्री शुक जब कथा सुन रहे थे तब उनकी आंखों से अश्रु बह रहा थे इसलिए अश्रु बह रहे थे क्योंकि श्री कृष्ण की विदाई का प्रसंग चल रहा था। श्री कृष्ण इस धरा धाम को तयाग कर अपने धाम के लिए जा रहे है ये सुनते हुए शुक रो पड़े। ठाकुर की कथा सुन कर ठाकुर का हो गया निश्चित तौर पर उसके संस्कार अच्छे होंगे। महाराज श्री जीे ने कहा की कथा उन्हीं को अच्छी लगती है जिनके संस्कार अच्छे होते है, हर किसी को कथा अच्छी नहीं लग सकती है। जिन्हें अपने माँ बाप से, बुजुरुर्गों से अच्छे कर्मो से जो मिला है उन्हीं को कथा अच्छी लग सकती है। बाबा ने सोचा की शुक कथा चोरी से सुन रहा है हाथ मैं त्रिशूल लेके बाबा दौड़े श्री शुक आगे-आगे बाबा पीछे-पीछे आत्म रूप से दौड़े। शुक व्यास पत्नी के मुख से गर्भ अस्थान में प्रवेश कर गए और बाबा भोले नाथ व्यास जी आश्रम में डट के बैठ गए की जब आएगा तब मारूंगा। 9महीने बाद तो आओगे न तब मार के जाऊँगा शुकदेव बोले मैं 9 साल तक नहीं आने वाला ये भक्त और भगवान् की लड़ाई है, 9 साल नहीं 12 साल हो गए शुक देव जी को माँ के गर्भ में उसके बाद ही उन्होंने धरा पर जन्म लिया। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

25Aug 2017

"धर्म आत्मा का एक ऐसा आभूषण है जिसे एक बार धारण कर लिया तो उतारा नहीं जा सकता है।"

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में नार्थ कैरोलिना, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के सप्तम दिवस में श्री कृष्ण की लीलाओं का सुन्दर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। "ये संसार किसी का हुआ नहीं, आगे होगा नहीं" इस भजन के साथ महाराज श्री ने आज की कथा प्रारम्भ की। महाराज श्री ने कहा की यह भजन बहुत ही प्यारा भजन है। हम एक दूसरे से बहुत ही उम्मीद करते है लेकिन उम्मीदें कहाँ कब किसकी पूरी होती है? सिर्फ भगवान ही उम्मीदों को पूरा करते है बाकि के लोग तो सिर्फ अपना टाइम पास करते है। "ओ दाता तेरा मेरा प्यार कभी न बदले, ओ कान्हा तेरा मेरा प्यार कभी न बदले" भजन सुना कर वहां पर मौजूद सभी भक्तों को मन्त्रमुग़्ध कर दिया। जिंदगी जब निकलती है हमें तब अपनी गलती का अहसास होता है कि हमने अपना क्या खोया है। लोग अपने अपने हिसाब से धर्म का अर्थ बताते है। किसी की नजर में भोजन कराना धर्म है। किसी की नजर में कथा सुनना धर्म है। किसी की नजर में किसी को गाली देना ही धर्म है। तो अपने अपने सिद्धांत के हिसाब से धर्म की परिभाषा बताई है। लेकिन धर्म तो वो है जो गोस्वामी तुलसीदास बाबा ने रामायण में लिखा है तुम किसी को दुःख दो उसके बराबर पाप नहीं है और तुम किसी को सुख दो उसके बराबर कोई पुण्य नहीं है। अगर तुम दुसरो की सेवा करोगे तो भगवान तुम्हारी सेवा करेंगे। तुम किसी को दुःख मत दो तुम्हारे लिए यही सबसे बड़ा पुण्य है। तो धर्म कभी भी चलाय मान नहीं है। लेकिन धर्म की गति ऐसी है जो हमें सुख प्रदान करने वाली है। जो जीव या मनुष्य केवल धर्म के बताये हुए मार्ग पर चलते है, उनका सदा ही कल्याण होता है। धर्म केवल वस्त्रों की तरह नहीं है जब चाहा उसे उतार लिया और जब चाहा उसे पहन लिया। धर्म एक ऐसा आभूषण है आत्मा का, जिसे एक बार धारण कर लिया तो उतारा नहीं जा सकता है। धर्म को केवल धारण करो इसे उतारने की कोशिश मत करों। शरीर पर से तो वस्त्र उतर भी सकते है और उनको फिर से पहना भी जा सकता है लेकिन आत्मा का जो वस्त्र है धर्म उसे यदि उतार दिया तो उसे हम दोबारा पहन नहीं सकते है। धर्म के अनुसार ही हमें अपना जीवन जीना चाहिए। धर्म से ही हमें सब कुछ सीखना चाहिए। कई व्यक्तियों की जिंदगी केवल दूसरों को दुःख देने में ही निकल जाती है। वो लोग केवल उसी में ही अपना सुख समझने लगते है। पैसे के लिए व्यक्ति क्या नहीं करता है। लोग अपना जमीर तक बेच देते है पैसे के लिए। केवल धर्म ही है जो मरने के बाद भी हमारे साथ ही जायेगा। सिर्फ एक धर्म ही है जो हमेशा हमारा साथ निभाएगा और जितनी भी संसार में वस्तुएं है वो सब तो यही पर रह जाती है। तो हमें अपने जीवन में धर्म के अनुसार ही कर्म करने चाहिए। भगवान राम आये हो या भगवान कृष्ण आये हो सभी ने अपने चरित्र से इस बात का दर्शन हमें कराया है। अपने चरित्र से उन्होंने हमें बताया कि हमको क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। भगवान राम जब बड़े होते है तो स्वयं ही वेदों का श्रवण करते है और पुराणों को सुनते है। और जो भी कथा स्वयं सुनते है तो अपने छोटे भाई बहनो को भी सुनाते है। जो भी अच्छी बात आज हमने सीखी है तो हमको उस बात को अपनों से छोटो को समझानी चाहिए। अगर कोई बुरी बात आपको लगे तो उस बात को अपने छोटे भाई बहन को नहीं बतानी चाहिए। भगवान् श्री कृष्ण के सोलह हज़ार एक सो आठ विवाह हुए। भगवान् की जो कुल संताने है वो एक लाख सत्ततर हज़ार एक सो अट्ठासी थी। उनके साथ बैठ कर श्री कृष्ण ब्राहम्णो को बालते है कथा सुनते है और अपने उन बच्चों को सुनाते है। और जो कथा हमारे राम भगवान् सुनते है, जो कथा हमारे कृष्ण सुनते है ,जिन कथाओं से हमें कुछ सिखने को मिलता है। एकबार की बात है भगवान् श्री कृष्ण अपने बाल गोपालों के साथ भृमण करने के वन में गए। वन में जाकरके अपने बल गोपालों को कुछ ऐसी कथा सुना रहे थे तो वहां पर एक बच्चे ने कहा कि "मैं प्यासा हूँ"। तो उन्होंने कहा की जाओ और देख के आओ के कही आस पास में कोई जल स्तोत्र है तो। अब बच्चे गए तो उन्हें वहां पर एक कुआ मिला। लेकिन कुए में एक बहुत ही बड़ा गिरगिट पड़ा हुआ था। तब उन बच्चों ने भगवान से आकर कहा की वहां पर पास ही में एक कुआ तो है पर उसमें बहुत बड़ा गिरगिट गिरा पड़ा है। तब भगवान ने उनसे कहा चलो में तुम्हारे साथ चलता हूँ। और जैसे ही भगवान् ने उस गिरगिट को बाहर निकलना चाहा तो उस गिरगिट का रूप बदल गया। और उसका आकर एक मनुष्य के रूप में बदल गया। और वह भगवान् श्री कृष्ण के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। तब भगवान् श्री कृष्ण ने उससे पूछा की आप कौन है। तब उस व्यक्ति ने कहा की मैं पूर्व जन्म में राजा नृग था। और मेरा हमेशा एक काम था की मैं हमेशा ब्राह्मणो को दान देता था। ब्राह्मणो को गाय दान में देता था। और गाय के सींगों को और गाय के पैरों के खुरों को सोने में मांडवा कर दान देता था। बस एक बार गलती ये हो गयी थी की जो गाय मैंने दान में दी थी तो वो उस ब्राह्मण के यहाँ से खुल कर आ गयी और उन सभी दान देने वाली गायों में आकर मिलकर कड़ी हो गयी थी। और उसी गाय को मैंने दोबारा से दान कर दिया। तो जहाँ पर मैंने पहले गाय दान में दी थी तो वो वहां पर आ रहे थे जो दूसरे वाले ब्राह्मण उस गे को लेकर वहां पर से जा रहे थे। और उन्होंने उस गाय को पहचान लिया। और कहने लगे की ये गाय तो मेरी है। तब दूसरा ब्राह्मण कहने लगा की नहीं ये आपकी नहीं हो सकती है इसे तो अभी राजा ने मुझे दान में दिया है। तब पहले वाला ब्राह्मण बोलै अरे नहीं इसे भी तो मुझे राजा ने एक दिन पहले दिया था। तब वो दोनों बोले चालों इस बारे में राजा से ही पता कर लेते है। तब दोनों ब्राह्मण राजा के यहाँ पर गए। और राजा से जाकर बोले की राजा जी ये गाय तो आपने परसो मुझे दान में दी थी और दूसरा बोले की नहीं ये गाय तो आज आपने मुझे दान में दी है। तो अब बताइये राजा जी की ये गाय आखिर है किसकी। तब राजा बोलै की महाराज गलती से सायद ऐसा हो गया है आप दोनों मुझे छमा कर दीजिये। एक ब्राह्मण इस गाय को छोड़ दे और जिसको इसकी ज्यादा जरुरत है वो ले ले। पर वो दोनों ब्राह्मण कहने लगे नहीं महाराज हमें तो यही गाय ही चाहिए। और कहने लगे की महाराज हमने तो दान लिया है कोई भीख नहीं ली है। हम तो संतोषी ब्राह्मण है। और राजा ने फिर कहाँ की नहीं महाराज आप एक हज़ार गाय ले लो या एक लाख गाय ले लो। इन बातों को सुनकर राजा को गुस्सा आ गया। राजन आप हमें ब्राह्मण नहीं समझते हो आप तो हमें लोभी और लालची समझते हो। तो इस सब को सुन कर ब्राह्मण बोलै जाओ हम तुम्हे श्राप देते है जिस तरह तुम गिरगिट की तरह रंग बदल रहे रहो तुमको गिरगिट बनना पड़ेगा। तब राजा उन ब्राहम्णो के कहरनो मरण गिर पड़े और माफ़ी मांगने लगे की महाराज इसमें मेरी कोई गलती नहीं है। मुझे छमा कर दो। राजा जब छमा मांगने लगा तो ब्राह्मणो को दया आयी और बोले की हे राजन अभी तो आपको गिरगिट बनना पड़ेगा लेकिन द्वापर युग के अंत में आपको भगवान् के साक्षात् दर्शन होंगे। जो तुमने इतने पुण्य के काम करे है उसी के फलीभूत तुमको भगवान् के साक्षात् दर्शन होंगे। और उनके दर्शन के बाद ही तुम्हारा उद्धार हो जायेगा। और तुम वापिस इंसान के रूप में आ जाओगे। अगर कोई बुरी बात आपको लगे तो उस बात को अपने छोटे भाई बहन को नहीं बतानी चाहिए। भगवान श्री कृष्ण के सोलह हज़ार एक सो आठ विवाह हुए। भगवान की जो कुल संताने है वो एक लाख सत्ततर हज़ार एक सो अट्ठासी थी। उनके साथ बैठ कर श्री कृष्ण ब्राहम्णो को बालते है कथा सुनते है और अपने उन बच्चों को सुनाते है। जो कथा हमारे राम भगवान सुनते है, जो कथा हमारे कृष्ण सुनते है जिन कथाओं से हमें कुछ सिखने को मिलता है। एकबार की बात है भगवान श्री कृष्ण अपने बाल गोपालों के साथ भ्रमण करने के वन में गए। वन में जाकर के अपने बाल गोपालों को कुछ ऐसी कथा सुना रहे थे तो वहां पर एक बच्चे ने कहा कि "मैं प्यासा हूँ" तो उन्होंने कहा की जाओ और देख के आओ के कही आस पास में कोई जल स्तोत्र है तो अब बच्चे गए उन्हें वहां पर एक कुआ मिला। लेकिन कुए में एक बहुत ही बड़ा गिरगिट पड़ा हुआ था। तब उन बच्चों ने भगवान से आकर कहा की वहां पर पास ही में एक कुआ तो है पर उसमें बहुत बड़ा गिरगिट गिरा पड़ा है। तब भगवान ने उनसे कहा चलो में तुम्हारे साथ चलता हूँ और जैसे ही भगवान ने उस गिरगिट को बाहर निकलना चाहा तो उस गिरगिट का रूप बदल गया। उसका आकार एक मनुष्य के रूप में बदल गया। वह भगवान श्री कृष्ण के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। तब भगवान श्री कृष्ण ने उससे पूछा की आप कौन है? उस व्यक्ति ने कहा की मैं पूर्व जन्म में राजा नृग था। और मेरा हमेशा एक काम था की मैं हमेशा ब्राह्मणो को दान देता था। ब्राह्मणो को गाय दान में देता था। गाय के सींगों को और गाय के पैरों के खुरों को सोने में मंडवा कर दान देता था। बस एक बार गलती ये हो गयी थी की जो गाय मैंने दान में दी थी तो वो उस ब्राह्मण के यहाँ से खुल कर आ गयी और उन सभी दान देने वाली गायों में आकर मिलकर खड़ी हो गयी थी। उसी गाय को मैंने दोबारा से दान कर दिया। जहाँ पर मैंने पहले गाय दान में दी थी तो वो वहां से आ रहे थे तो दूसरे वाले ब्राह्मण ने उस गाय को पहचान लिया और कहने लगे की ये गाय तो मेरी है। तब दूसरा ब्राह्मण कहने लगा की नहीं ये आपकी नहीं हो सकती है इसे तो अभी राजा ने मुझे दान में दिया है। तब पहले वाला ब्राह्मण बोले अरे नहीं इसे भी तो मुझे राजा ने एक दिन पहले दिया था। तब वो दोनों बोले चलों इस बारे में राजा से ही पता कर लेते है। तब दोनों ब्राह्मण राजा के यहाँ पर गए और राजा से जाकर बोले की राजा जी ये गाय तो आपने परसो मुझे दान में दी थी और दूसरा बोले की नहीं ये गाय तो आज आपने मुझे दान में दी है। तो अब बताइये राजा जी की ये गाय आखिर है किसकी? तब राजा बोले की महाराज गलती से शायद ऐसा हो गया है आप दोनों मुझे क्षमा कर दीजिये। एक ब्राह्मण इस गाय को छोड़ दे और जिसको इसकी ज्यादा जरुरत है वो ले ले। पर वो दोनों ब्राह्मण कहने लगे नहीं महाराज हमें तो यही गाय ही चाहिएऔर कहने लगे की महाराज हमने तो दान लिया है कोई भीख नहीं ली है। हम तो संतोषी ब्राह्मण है। राजा ने फिर कहा की नहीं महाराज आप एक हज़ार गाय ले लो या एक लाख गाय ले लो। इन बातों को सुनकर ब्राह्मण को गुस्सा आ गया। राजन आप हमें ब्राह्मण नहीं समझते हो आप तो हमें लोभी और लालची समझते हो। तो इस सब को सुन कर ब्राह्मण बोले जाओ हम तुम्हे श्राप देते है जिस तरह तुम गिरगिट की तरह रंग बदल रहे रहो तुमको गिरगिट बनना पड़ेगा। तब राजा उन ब्राहम्णो के चरणों गिर पड़े और माफ़ी मांगने लगे की महाराज इसमें मेरी कोई गलती नहीं है। मुझे क्षमा कर दो। राजा जब क्षमा मांगने लगा तो ब्राह्मणो को दया आयी और बोले की हे राजन अभी तो आपको गिरगिट बनना पड़ेगा लेकिन द्वापर युग के अंत में आपको भगवान के साक्षात दर्शन होंगे। जो तुमने इतने पुण्य के काम करे है उसी के फलीभूत तुमको भगवान के साक्षात दर्शन होंगे और उनके दर्शन के बाद ही तुम्हारा उद्धार हो जायेगा और तुम वापिस इंसान के रूप में आ जाओगे। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

24Aug 2017

" भगवान की भक्ति हमें ब्लाइंड फेथ के साथ करनी चाहिए "

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में नार्थ कैरोलिना, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के षष्टम दिवस में श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुन्दर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कहा कि अच्छा समय न जाने कब निकल जाता है इसका हमको पता भी नहीं चल पाता है। भगवान से सदा ही अपने मन की बात करते रहनी चाहिए। कुछ बातें उनसे करनी चाहिए और कुछ बातें उनसे हमें सुननी चाहिए। तभी तो हमारे जीवन का हर प्रकार से उद्धार हो सकता है। भगवान का नाम हमारे मुख से तब तक नहीं निकलता है जब तक भगवान स्वयं हम पर अपनी कृपा नहीं करते है। हर चीज हमारे मुख से आसानी से निकल जाती है लेकिन भगवान का नाम आसानी से नहीं निकलता है। "सुन बरसाने बारी दूर बड़ी दूर नगरी,कैसे मैं मिलने आऊं बड़ी दूर नगरी" भजन श्रवण कराकर महाराज श्री ने सभी भक्तों को मंत्रमुग्ध कर दिया। महाराज श्री ने कहा की मानव जीवन का उद्देश्य ये नहीं है की खाओ कमाओ और सो जाओ। उसका तो एक ही उद्देश्य होना चाहिए की वह भगवान को कैसे प्राप्त कर सके। इस दुनिया में एक साकार ब्रह्म को मानने वाले लोग होते है और एक निराकार ब्रह्म को मानने वाले लोग होते है। महाराज श्री ने कहा कि हमारे कर्मकांड के 84 हज़ार श्लोक है। किसी ने भगवान से पूछा की आप कैसे हो? आपका आकर कैसा है? आप निराकार हो या साकार हो? भगवान ने कहा कि जो लोग मुझे निराकार रूप में भजते है उनके लिए मैं निराकार हूँ और जो लोग मुझे साकार रूप में भजते है उनके लिए मैं साकार हूँ। क्योँकि कई बार राधा कहती है कि "बंसी बजाते हुए क्या किसी ने मेरे शयाम देखे" जो चीजे हमारे लिए जीवन है और जो चीजे हमारे लिए मृत्यु का एक मार्ग बन जाती है। वही सब चीजें भगवान के चरणों में बंधन करती है क्योँकि ये सब चीजे ही उनसे प्रकट हुई है। जिन लोगों को भगवान पर डाउट हो वो या तो किसी संत के चरणों में जा कर बैठे। जो भगवान के बारे में सब कुछ जानते हो और उनसे भगवान के बारे में जानने की कोशिश करो उन पर कुछ थोपो नहीं। पार्वती माता ने भी एक प्रश्न किया था की साकार ब्रह्म निराकार कैसे हुआ? यहाँ पर महाराज श्री ने भगवान राम के बारे में भी उदाहरण दिया है कि भगवान राम कौन है। अब भगवान पर संदेह करना कहाँ की सही बात है उसको तो हमें मिटाना ही पड़ेगा। इसके लिए हमें किसी जानकर या संत के चरणों में जाकर बैठना पड़ेगा। जिससे हमें भगवान के सही रूप के बारे में सही से जानकारी मिल सके। हम भगवान के सही रूप को जान सके। हमें भी तो भगवान के बारे में जानने अपनी जिज्ञासा दिखानी पड़ेगी। क्योँकि जैसे ही हम किसी ज्ञानी पुरुष या संत के पास ये प्रश्न लेकर जायेंगे की भगवान कौन है तो वह ज्ञानी हमें उस ईश्वर की सभी लीलाओं के बारे में बताता है। तब हम को उस ज्ञानी से उस भगवान का बहुत ही सुन्दर वर्णन प्राप्त हो जाता है। जिसके बाद हमें अपने उस प्रभु के बारे में जानने की और जिज्ञासा नहीं रहती है। भगवान का एक स्वाभाव और है कि भगवान किसी का अहंकार बर्दाश्त नहीं करता है। आज के इस जीवन में या समय में हमें अपनी छोटी छोटी चीजों पर अहंकार हो जाता है। अगर हम कोई नई गाड़ी भी घर में ले आते है तो अपने रिश्तेदारों को चिढ़ाने के लिए एकबार जरूर ही उनके पास जाते है कि तुम्हारे पास इतनी बड़ी गाडी नहीं है मेरे या हमारे पास तो है। तो हम अपने अहंकार के कारण उस को चिढ़ाते है की तुम इतनी बड़ी गाडी नहीं ले सकते है पर लेकिन हम ले सकते है और उसको इसी बात से जलन कराते है। महाराज श्री ने बताया की भगवान हर इंसान से कहता है कि आप सब को अहंकार से दूर रहना चाहिए। क्योँकि जो लोग अहंकार करते है मैं उन लोगों से कोशों दूर रहता हूँ। जहाँ पर अभिमान होता है वहां पर भगवान का वास नहीं होता है। और दूसरी बात ये है की भगवान अहंकार को भी नहीं रहने देता है। जीव जिस भी चीज का अभिमान करता है भगवान उससे उस चीज को ही छीन लेता है। यहाँ पर महाराज श्री ने बहुत ही सुन्दर पंक्तियों का वर्णन किया है कि "बनतो को भी बिगड़ते देखा है बिगड़तों को भी बनते देखा है,जो खूब अकड़के चलते थे उनको मिटटी में भी मिलते देखा है ".इन पंक्तियों के द्वारा महाराज श्री ने वहां पर मौजूद सभी लोगों को अहंकार को छोड़ने के लिए कहा है। क्योँकि अहंकार से मनुष्य का हर प्रकार से नाश ही होता है। उसका भला कभी भी नहीं हो सकता है। कल आप सभी ने गोवर्धन की परिक्रमा की थी। पर भगवान ने आप सभी से गोवर्धन की परिक्रमा कराई क्योँ थी। इसकी तो आवश्यकता ही नहीं थी। अगर भगवान श्री कृष्ण नहीं होते तो क्या वहां पर भगवान इंद्र की पूजा नहीं छुड़वा सकते थे। जब स्वयं बनाने वाला ही मिटाने पर आ जाये तो कोई भी आपको बचा नहीं सकता है। इस बात को आप देर से मानो या जल्दी से मानो, जितनी जल्दी से मान लोगे तो आप का ही भला हो सकता है। क्योँकि जितनी जल्दी ही मान लोगे तो उतना ज्यादा समय ही आप के पास मिल जाता है कुछ अच्छा करने के लिए। देवराज इंद्र ने वहां पर घनघोर वर्षा की। वहां पर इंद्र ये चाहते थे की इस भारी वर्षा से पूरा का पूरा ब्रज ही बह जाना चाहिए यमुना नदी में और इन लोगों का नामो निशान ही मिट जाना चाहिए। जब वहां पर काले काले बदल घुमड़ कर आये तो सब ब्रज वासी भगवान कान्हा से कहने लगे की आज तो आप हमारा सूपड़ा ही साफ करा दिया है। बादलों को देखकर सभी लोग काफी परेशान हो गए। सभी लोग कन्हैया से कहने लगे की देखो कान्हा कितने भयंकर बादल बन कर आ रहे है। अब तो यहाँ पर काफी बाहरी बारिश होगी और सब कुछ ही ख़त्म हो जायेगा। तब भगवान श्री कृष्ण सभी ब्रज वासियों से कहते है कि कमाल करते हो की जिस भगवान की पूजा करते हो उस पर तो भरोसा करो। इसलिए ही तो हमारी पूजा इतनी फलीभूत नहीं है जितनी होनी चाहिए। लोग कहते है कि पूजा करो पर ब्लाइंड फेथ मत करो। पर मैं कहता हूँ की ब्लाइंड फेथ करके ही पूजा करो। अगर आप का भगवान में भरोसा नहीं होगा तो इसमें आपका ही नुक्सान होगा। भगवान का कुछ नहीं बिगड़ेगा। अगर तुम चार पांच व्यक्ति भगवान को नहीं मानोगे तो इससे भगवान को मानने वालों की कमी नहीं होगी। तो इससे कौनसे भगवान की पूजा होनी बंद हो जाएगी। क्योँकि मेरे ऋषियों ने मुझसे कहा है, मेरे वेदों ने मुझसे कहा है, मेरे पुराणों ने मुझसे कहा है, ग्रंथों ने मुझसे कहा है ,मेरे गुरुओं ने मुझसे कहा है कि कृष्ण भगवान है। तभी तो बालभाचार्य ने कहा है कि इस पृथ्वी के कण कण में हमारे प्रभु श्री कृष्ण बसते है। फिर अगर हमको इस बात का ब्रह्म है तो हमने भगवान को जानने की कोशिश नहीं की है। क्योँकि आज का व्यक्ति काफी फ़ास्ट सर्विस चाहता है। अगर आज हमने पूजा की है तो आज शाम तक ही हमको उस पूजा का फल मिल जाये तभी हम यकीन करेंगे की पूजा का कोई असर हुआ है। नहीं फल मिला तो हम जानेंगे की हमारी पूजा का बेकार ही चली गयी है। यहाँ पर महाराज श्री एक दृष्टांत सुना रहे है। एक व्यक्ति एक संत के पास गए और कहने लगे की महाराज मुझे कोई ऐसा देवता बताओ जल्दी से प्रसन्न हो जाये। क्योँकि मैं चाहता हूँ की कोई देवता जल्दी से प्रसन्न हो और जो मैं चाहता हूँ वो मुझे जल्दी से प्राप्त हो जाए। तब संत ने कहा की तुम एक काम करो की तुम नारायण की पूजा करो और नारायण भगवान से आप जो मांगोगे आपको मिल जायेगा। फिर वह व्यक्ति भगवान नारायण की मूर्ति ले आया और पूजा शुरू कर दी। इस तरह से एक के बाद दो और दो के बाद एक सप्ताह हो गया तो व्यक्ति काफी नाराज हो गया और बोला की संत ने तो मुझे गलत देवता बता दिया है। एक हफ्ते से मैं पूजा कर रहा हूँ पर अगले ने मुझे ये तक नहीं पूछा है की आप कैसे हो ,प्रसन्न होने की तो बात दूर है। ये देवता तो मुझे ठीक नहीं लगता है। तब वह व्यक्ति सोचने लगा की शायद कलयुग में देवताओं की कम चलती है तो मुझे देविओं की पूजा करनी चाहिए। तब महाराज जी उस व्यक्ति से कहने लगे की चलों तो आप देवी की पूजा करों। नारायण भगवान तो शायद देर से तुम्हारी सुनेंगे पर देवी जल्दी ही सुन लेंगी। तो इस तरह से वह व्यक्ति एक देवी जी की भी मूर्ति ले आया। पर मंदिर में जगह तो काफी छोटी थी। अब या तो मंदिर में नारायण भगवान रहे या देवी रहे। दोनों एक मंदिर में नहीं रह सकते। तब उस व्यक्ति ने भगवान नारायण की मूर्ति को हटा कर वहां पर देवी की मूर्ति को लगा दिया और वहीँ पास में दीवार पर एक कील लगा कर भगवान नारायण की मूर्ति को उस पर टांक दिया। उसने उसी दिन से देवी माता की पूजा करनी शुरू कर दी। फिर एक दिन उस व्यक्ति ने देवी की मूर्ति के सामने धुप बत्ती जलाई और सयोंगवश उस धूपबत्ती का धुआँ भगवान नारायण की मूर्ति की तरफ जा रहा था। तो इस को देखकर उस व्यक्ति के मन में काफी टेंशन हो रही थी। तो उसने सोचा की लो जी हो गया कबाड़ा इनकी पूजा हमने करी थी तो खुद तो आये नहीं और अब कहीं देवी जी भी न आ जाये तो इनकी भी धुप ले रहे है। अगर मेरी धूपबत्ती के धुंए को भी नारायण ले गए तो मेरे पास देवी कहाँ से आ पाएंगी। तब वह व्यक्ति तुरंत गया और वहां से रुई ले आया और उस रुई को भगवान नारायण की नाक में लगा दिया और कहने लगा की अब देखता हूँ की कैसे लोगे धुआँ धुप का। इतना उसका कहना था की भगवान नारायण स्वयं वहां पर उसके सामने प्रकट हुए और कहने लगे की वरदान मांगो। अब वहां पर जो व्यक्ति मौजूद था वह ये देखकर काफी हैरान हो गया। वह कहने लगा की "यह क्या हुआ" और कहने लगा की वरदान देंगे आप! तब नारायण भगवान कहने लगे हाँ देंगे हम वरदान आपको! पर मेरे मन में एक प्रश्न है? तब भगवान बोले पूछो क्या है? तब वह व्यक्ति बोला की जब मैं आपकी पूजा कर रहा था तब तो आप वरदान देने के लिए नहीं आये और जब मैं देवी की पूजा करने लगा तो तब आपके मन में बड़ा वरदान देने की बात उमड़ आयी है। मैंने तो आपकी नाक में रुई तक लगा दी थी तो फिर भी आप मुझे वरदान देने के लिए क्योँ आ गए है। तब भगवान नारायण ने उस व्यक्ति को जो उत्तर दिया था वह बड़ा ही गजब का था। नारायण ने कहा कि जब तक तुम मेरी पूजा कर रहे थे तब तक तुम मुझे केवल मूर्ति समझ रहे थे। फिर जब तुम मुझे मूर्ति समझ कर पूजा करते रहे तो मैं केवल मूर्ति बनकर ही बैठा रहा। आज पहली बार तुम्हे अहसास हुआ की मैं तुम्हारी धूपबत्ती का धुआँ ग्रहण कर रहा हूँ। इसका मतलब ये है की आज तुमने पहली बार मुझे नारायण समझा है और अपने हाथों से आपने मेरी नाक में रुई लगा दी है तो अब मुझे लगा है की अब तुम्हे ये लग गया है की मैं नारायण हूँ। इसलिए आज में तुम्हारे सामने प्रकट हो गया हूँ और तुमसे वरदान मांगने के लिए कह रहा हूँ। इसलिए मैं तुम्हे वरदान देना चाहता हूँ। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

23Aug 2017

" भगवान छल से नहीं पवित्र मन से प्राप्त किये जा सकते है "

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में नार्थ कैरोलिना, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के पंचम दिवस में श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुन्दर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कहा कि हमें अपने भगवान की भक्ति में ही अपना तन-मन-धन लगा देना चाहिए। तभी हमको इस लालची संसार से सदा के लिए मुक्ति मिल सकती है। इसके बाद महाराज श्री ने एक भजन "मीठों रस से भरों री राधा रानी लागे, महारानी लागे" सुनाकर मौजूद सभी भक्तों को मंत्रमुग्ध कर दिया। क्यों लोग ब्रज की लीलाओं में बहुत ही आनंद लेते है क्योँकि ब्रज की लीला हम सब के संदेह का निवारण करती है। जो लोग सिर्फ भगवान को रास रचैया समझते है, बंसी बजैया समझते है उन लोगों को दशम स्कन्द की कथा मन लगा कर सुननी चाहिए। भागवत कथा के दशम स्कन्द में श्री कृष्ण ने अपनी भगवत्ता का दर्शन लोगों को कराया है। मैं भगवान हूँ ये बार-बार लोगों को दर्शन कराया है। लेकिन मेरे गोविन्द का ना समझने वाले लोग कहते है की वो तो चोर थे। कहते है कि वो तो गोपियों के साथ रास रचाते थे। उन्हें रास रचाने वाले तो याद होते है लेकिन गीता का ज्ञान देने वाले याद नहीं रहते है। विष का पान करने वाले याद नहीं रहते है। कालिया नाग को नाथने वाले याद नहीं रहते है। गिर्राज पर्वत को उठाने वाले याद नहीं रहते है। और न जाने ऐसी कितनी लीला है ,उनकी इन लीलाओं को ये सब याद नहीं रखते है। क्योँकि इन सब को वो लोग स्वयं जानना नहीं चाहते है। एक व्यक्ति ने मुझसे किसी अन्य धर्म के ग्रन्थ के विषय में बात की और वो लड़का कहने लगा की क्या फर्क पड़ता है महाराज जी हम ये पढ़े या वो पढ़े। हाँ मुझे ये धर्म बहुत ही पसंद है। महाराज श्री ने कहा कि तुम्हे जो धर्म पसंद हो तुम उसका पालन करों। पर सबसे पहले हमने जिस धर्म में जन्म लिया है हमें उस धर्म का पालन करना चाहिए। अगर उस धर्म को जानने में कोई प्रॉब्लम हो तो उस धर्म को जानने वालों के पास बैठे। अगर तब भी आपके वह धर्म समझ में न आये तो तुम अपना धर्म बदल सकते हो। अपनी सोच को बदल सकते हो। तब महाराज श्री ने उससे कहा कि क्या तुमने कभी गीता को पढ़ा है। तब वो लड़का बोला नहीं महाराज नहीं पढ़ा है। तब महाराज बोले की फिर तुम ये कैसे कह सकते हो की क्या अच्छा है क्या बुरा है। महाराज श्री ने बताया की उनसे एक लड़की ने पूछा था कि भगवान को दुध नहीं चढ़ाना चाहिए। हमें उस दूध को गरीबों में बाँट देना चाहिए। तब महाराज ने उस लड़की से पूछा की हम कितना दूध शिवजी को चढ़ाते है। आपको गरीबों में शिवजी वाला दूध ही क्योँ बाटना है। जब आपको शिवजी पर दूध चढ़ाते है तो आपको गरीब याद आते है और पूरी ज़िंदगी भर आप दूध चढ़ाते है तो आपको गरीब याद नहीं आते है। जब भगवान को थोड़ा सा भोग लगाना है तो आपके मन में नए नए विचार आ जाते है। कि भगवान को इस दूध की क्या जरुरत है और जब आप दिन में चार-पांच बार खाना खाते हो तो तब आपको गरीब याद नहीं आते है। इतना सारा दूध भगवान पर चढ़ा कर आप बर्बाद कर देते है तब आपको भगवान याद नहीं आते है। क्योँ नहीं याद आते है महाराज श्री ने लोगों से पूछा। ये एक सोची समझी रणनीति के तहत इन लोगों को भटकाया जाता है। वो कहते है कि क्या वो भगवान हमारे दूध का भूखा है, वो भी इतना बड़ा भगवान। तब महाराज श्री ने कहा कि न भगवान किसी भी चीज का भूखा नहीं है। उन्होंने कहा की यदि भगवान हम सब पर अपनी कृपा न करे तो हम सब लोग ही भूखा मर जाएंगे और सोचते है की हम सब भगवान को भोग क्योँ लगाते है? प्रसाद क्योँ लेते है? उस प्रसाद को ग्रहण करके ही हम सब निरोगी रहते है। यहाँ पर प्रसाद और भोजन में बहुत ही अंतर होता हैं। तब उन्होंने कहा की श्रावण मास में लोग या हम सब दूध दही नहीं खाते है। इस महीने में दूध दही खाने से हम सब को कोई भी लाभ नहीं होता है और दूसरा शिवजी के वेग को खत्म करने के लिए हम सब उन पर दूध चढ़ाते है। जहाँ पर भी वो अभिषेक किया हुआ दूध निकलता है तो हम सब को वहां से नहीं निकलना चाहिए या उसको क्रॉस नहीं करना चाहिए क्योँकि अगर हम उस दूध को क्रॉस करेंगे तो हमको बीमारी लगने का डर लगा रहता है। इसलिए ही हम उस दूध का उपयोग नहीं करते है और न ही उसका इस्तेमाल ही करते है और जब वह दूध नदी या तालाब में मिल जाता है तो वो हमारे लिए औषधि का काम करता है। हमारे ऋषि मुनियों ने जो भी परम्पराए स्थापित की है वो सब मानव जाती के कल्याण के लिए की है। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा की न तो भगवान को किसी भी चीज की जरुरत होती है। हम तो केवल उस दूध का प्रयोग करके उसका शुद्धिकरण करते है। यहाँ पर दूध चढ़ाना और दूध बाँटना एक अलग-अलग विषय है। अगर आप दूध चढ़ाना चाहते है तो चढ़ाइये। अगर आप दूध बाँटना चाहते है तो उस से भी हज़ार गुना दूध बाँटना चाहिए। "हरी जी मेरी लागि लगन मत तोडना ,गहरी नदिया नाव पुरानी, बीच भंवर मत छोड़ना" भजन सुनकर महाराज श्री ने भक्तों को भक्ति में सदा के लिए डूब जाने के लिए कहा। आप सोचिये की हमने भगवान को किसके लिए छोड़ा है। महाराज ने वहां पर मौजूद सभी लोगों से पूछा। एक गांव में एक नौजवान की मृत्यु हो गयी। उसके छोटे छोटे बच्चे थे और गाँव वाले सभी उसकी सब यात्रा में जा रहे थे। जो भी लोग आगे-आगे चल रहे थे तो वो सब राम नाम सत्य कह रहे थे और जो पीछे चल रहे थे तो वो कुछ भी बोल रहे थे। कोई भगवान-भगवान नहीं है। वो कह रहे थे की अगर भगवान होते तो इसको नहीं बुलाते अपने पास। जिसके इतने छोटे छोटे बच्चे है। तब भगवान स्वयं एक संत का रूप बन कर वहां पर आये और पूछा की तुम ऐसे भगवान को क्योँ बोल रहे हो। वो बोले की क्योँ नहीं बोले की क्या एक जवान व्यक्ति की ऐसे मौत होनी चाहिए। जैसी इस व्यक्ति की हो गयी है। क्या ये भगवान का न्याय है? नहीं ये तो भगवान का अन्याय है। कोई भगवान नाम की चीज नहीं है। वो बोले की अगर ये व्यक्ति अभी ज़िंदा हो जाए तो हम मान लेंगे की हाँ भगवान है। तब महाराज ने उस मरे हुए को स्पर्श किया और वो मरा हुआ व्यक्ति ज़िंदा हो गया। वहां पर मौजूद सभी लोग भगवान को भूल गए और उन संत की जय जयकार करने लग गए। सब लोग कह रहे थे की महाराज की जय हो। बाबा की जय हो और शव यात्रा शोभा यात्रा में बदल गयी। महाराज को अपने गाँव में लेकर गए हुए पुरे गाँव में घुमाया और जय जयकार करते रहे। तब बाबा ने कहा की अगर तुम्हारी सभी बधाइयाँ पूरी हो गयी हो तो मैं तुमसे एक बात कहना चाहता हूँ। वो बोले की अच्छा बाबा बताओ। अब तो तुम खुश हो की तुम्हारा बच्चा जीवित हो गया है तो वो सब बोले की हाँ महाराज हम सब तो बहुत ही खुश है। आप जैसे संतों के कारण ही ये पृथ्वी टिकी हुई है। तब बाबा बोला की तुम लोगों के कहने पर मैंने इस व्यक्ति को जीवित कर दिया है। ये तभी जीवित रहेगा जब कोई भी व्यक्ति इसके बदले अपने प्राण दे और जो इसको सबसे ज्यादा प्रेम करता है वो इसके बदले अपने प्राण दे दे तो ये हमेशा ही जीवित रहेगा। सबसे पहले पिता जी पूछा की आप तो अब बूढ़े हो गए हो आप ही अपने प्राण दे दो। तब पिता जी ने अलग-अलग बहाने बना कर कहा की अगर मैंने अपने प्राण दे दिए तो ये पीछे से सारे परिवार को ही मरवा देगा। इस लिए मेरा मरना ठीक नहीं है। उसके बाद माता जी पूछा की आप ही दे दो तो माता जी ने भी ऐसे ही बहाना बना दिया। महाराज श्री ने बताया की कन्हैया का जन्म हुआ और सभी ब्रजवासी उनका दर्शन करने के लिए वहां पर आये। जब कंस को पता चला की मुझे मारने वाला ब्रज में जन्म ले चूका है तो कंस ने अपनी मुँह बोली बहन पूतना को ब्रज में भेज कर कहा की जाओ और जितने भी वहां पर नवजात शिशु है उन सब को मार दो। पूतना भेष बदलकर श्री कृष्ण के पास गयी। भगवान को झूंठे लोग बिलकुल भी पसंद नहीं है। दो लोगों को भगवान बिलकुल भी नहीं देखता है। कृष्ण अवतार में भगवान कृष्ण ने पूतना को नजरें उठाकर नहीं देखा था। और राम अवतार में भगवान् राम ने शूर्पणखा को नहीं देखा था। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।। .

22Aug 2017

" मनुष्य को भगवान से सदा प्रेम करना चाहिए, घृणा कभी नहीं करनी चाहिए "

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में नार्थ कैरोलिना, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस में राजा बलि की कथा रसपान भक्तों को कराया। महाराज श्री ने कहा कि हमें हमेशा ही अपने ईश्वर से प्यार करना चाहिए। हमें अपने इष्ट देव का कभी भी अपमान नहीं करना चाहिए क्योंकि अपने ईश्वर से जो भी व्यक्ति घृणा करता है उसका कभी भी कल्याण नहीं हो सकता है। हमें सदा ही अपने उस परमात्मा से प्रेम करते रहना चाहिए तभी तो हमारा कल्याण वो करेंगे। यदि हम वेद, पुराण, साधु, संत, ब्राह्मण आदि से प्रेम नहीं करेंगे और उनका अपमान करेंगे तो हमारा कभी भी भला नहीं हो सकता है। हमारे प्रभु हमसे सदा के लिए रूठ जायेंगे और कभी भी हमारा उद्धार नहीं हो सकता है। हमारा प्रेमी तो वो कान्हा है जो हमें हर मुसीबत से बचाता है। जब प्रह्लाद भक्ति करने के लिए जाते है उनका पिता हिरण्यकशपु उनको सताता है तो भगवान विष्णु नरसिंघ का रूप लेकर के खम्बा चीर के प्रकट हो जाते है। भगवान उन लोगों की सदा ही मदद करते है जो भगवान के नाम पर अपने आप को न्योछावर कर देता है। तो इसलिए हमें ये नहीं सोचना चाहिए कि अगर हम भक्ति करेंगे तो हमें क्या मिलेगा। आप ये सोचिये की अगर हम भगवान के हो गए तो ऐसा कुछ नहीं है जो हमसे बच जायेगा। सबकुछ हमारे इष्टदेव भगवान कन्हैया हमको दे देंगे। हमारी देखभाल भी करेंगे। क्योंकि वो तो उनकी जिम्मेदारी बन जाएगी। श्री शुकदेव महाराज गंगा के तट पर विराजमान राजा परीक्षित को कथा श्रवण करा रहे है। उसके बाद महाराज श्री बताते है की भगवान वामन का रूप धर के राजा बलि को छलने के लिए जाते है और राजा बलि से कहते है कि तीन पग धरती हमको दान में दे दो। तब महाराज बलि ने कहा की महाराज आप देखने में बहुत ही छोटे से दिख रहे हो। आप इससे भी ज्यादा भी मांग सकते हो। तीन पग धरती में तो कुछ भी नहीं होगा। महाराज श्री ने कहा की आज कल का दानी कहता है की कम मांगों। जो लोग ये समझते है की देने से कुछ ख़त्म होता है तो वो सब व्यक्ति मुर्ख है। हम जब तक बीज नहीं बोते है तो हमको फसल की भी इच्छा नहीं करनी चाहिए। तब राजा बलि ने भगवान वामन से कहा की महाराज आप इसे ज्यादा भी मांग सकते हो तो महाराज वामन ने कहा की नहीं महाराज आप केवल मुझे तीन पग धरती ही दे दो। फिर राजा बलि ने कहा की नहीं महाराज आप इससे ज्यादा ही मांग लो में दे दूंगा। तब भगवान वामन ने कहा नहीं महाराज में तो एक संतोषी ब्राह्मण हूँ। मुझे तो केवल तीन पग धरती ही चाहिए। तब राजा बलि ने कहा की तो लीजिये में आपको तीन पग धरती देता हूँ ,लेकिन तभी वहां पर राक्षसों के गुरु शुक्राचार्य जी वहां पर आ जाते है। उन्होंने कहा की नहीं राजन आप तीन पग धरती तो क्या इनको एक पग धरती भी मत देना और शुक्राचार्य ने राजा बलि से कहा की तुम जानते नहीं हो कि ये कौन है? तब राजा बलि बोले की ये कौन है तब गुरु शुक्राचार्य बोले की ये तिर्लोकिनाथ है ये तुम्हारा सब कुछ हरण करने के लिए यहाँ पर आये है। तभी राजा बलि काफी खुश हो गए की मेरा तो भाग्य ही खुल गया है। "दाता एक राम भिखारी सारी दुनिया, राम एक देवता पुजारी दुनिया सारी" भजन सुना कर महाराज श्री ने सभी भक्तों को मंत्रमुग्ध कर दिया। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा कि आप मुझे अपना समय दो मैं तुमको आनंद दूंगा। मैं आपके सभी दुखों को नष्ट करने की राह दिखा दूंगा। तब राजा बलि ने कहा कि आज तो मेरा भाग्य ही जाग गया है जो सारी दुनिया को देने वाला है आज मेरे दर पर आकर मुझसे ही कुछ मांग रहे है। अगर आज मैंने इनको खाली हाथ लौटा दिया तो मेरा तो सब जीवन ही व्यर्थ हो जायेगा। तभी महाराज को एक दृष्टांत याद आया और बताने लगे कि एक मंदिर के बाहर एक भिखारी बैठा रहता था। वो काफी ही बुजुर्ग था। वह एकदम शांत बैठा रहता था। और उनके शरीर से खून बह रहा था। उनके पुरे शरीर को कोड लगा हुआ था और उनकी दशा बड़ी ही दयनीय थी। जवान लड़का उस मंदिर में हर रोज आता और उस को कुछ न कुछ हर रोज देता था। फिर एक दिन वह व्यक्ति हर रोज की तरह वहां पर आया और रोज की तरह उसको देने लगा। आज उस यंग व्यक्ति के मन में एक प्रश्न उठ रहा था। तब उस जवान व्यक्ति ने उस बूढ़े व्यक्ति से कहा की बाबा बुरा न मनो तो मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ। तब बूढ़ा व्यक्ति बोला की पूछो बेटा। बाबा आप इस दयनीय अवस्था में भीख क्योँ मांगते हो? तब वह बूढ़ा आदमी बोला की बेटा अपना पेट भरने के लिए। अगर हमें ज़िंदा रहना है तो अपना पेट तो किसी न किसी तरह भरना ही होगा। तब वो जवान व्यक्ति बोला की आप ज़िंदा रहना चाहते हो तो बूढ़ा व्यक्ति बोला की ज़िंदा कौन नहीं रहना चाहता है। तब उस जवान व्यक्ति ने कहा की इस उम्र में आपको इस अवस्था में भी ज़िंदा रहने के लिए भीख मांगनी पड़ती है। आप भगवान से अपने लिए मौत ही क्योँ नहीं मांग लेते हो? आपके सभी दुःख नष्ट हो जायेंगे। तब उस बूढ़े व्यक्ति ने बड़े ही गजब का जवाब दिया कि बेटा जीवन और मृत्यु किसी भी जीव के हाथ में नहीं है। जीवन और मृत्यु तो केवल उस भगवान के हाथ में ही है। तब उस बच्चे कहा की क्या वो भगवान आपको मरना नहीं चाहता है तो उसने कहा की नहीं वो मुझे नहीं मारना चाहता है। वो मुझे इसलिए नहीं मारना चाहता है की कल तुम मेरी जगह पर न आ जाओ जहाँ पर आज मैं बैठा हूँ। तुम जानते नहीं हो की कल मैं वहां था जहाँ पर आज तुम हो। कहते है कि जो भी व्यक्ति अपने दर से किसी व्यक्ति को खाली हाथ लौटा देता है या उस व्यक्ति के दर से कोई भी खली हाथ लौट जाता है तो उसके सभी पुण्य कर्मों को ले जाता है और जीवन भर के अपने पापों को उसके दर पर ही छोड़ जाता है। तभी तो गृहस्थ आश्रम सबसे बड़ा आश्रम होता है की जो भी हमारे घर पर आता है हम उनकी सेवा करते है। हमें अपने गुरु की हर बात माननी चाहिए। क्योंकि गुरु की हर बात को मानना तो हर शिष्य का फर्ज होता है। गुरु के बिना तो मनुष्य का जीवन ही बेकार है। उसके सभी काम बेकार जाते है। कभी भी उसका भला नहीं हो सकता है। राधे राधे बोलना पड़ेगा!!

19Aug 2017

" हर एक भारतीय को अपनी संस्कृति से प्रेम करना चाहिए "

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में नार्थ कैरोलिना, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस महाराज श्री ने आत्मदेव की कथा का रसपान भक्तों को कराया। महाराज श्री ने कहा कि आजकल हम हम अपने बच्चों को अपनी संस्कृति से नहीं जोड़ते हैं फिर हम कहते ही कि हमारे बच्चे हमारा सम्मान या सेवा नही कर रहे है। महारज श्री ने कहा कि श्रीमती सहानी मुम्बई में मर गई लेकिन उसके बच्चे ने उसको 1 साल के बाद देखा जब उसकी बॉडी कंकाल बन गई थी। पूर्व काल में एक नगर में एक ब्राह्मण रहता था। उसका नाम आत्मदेव था। वह बहुत ज्ञानी और तेजस्वी था। उसकी पत्नी धुन्धुली कुलीन होने पर भी अपनी बात पर अड़नेवाली थी। वह क्रूर, झगडालू और कंजूस थी। बहुत समय बीत जाने के बाद भी उन दोनों के यहाँ संतान नही हुई। उन्होंने बहुत तरह से दान धर्म निभाया पर कुछ नही हुआ। एक दिन आत्मदेव दुखी होकर घर छोड़ कर वन को चला गया। वह एक तालाब के पास पंहुचा। पानी पी कर बैठा तो उसने एक सन्यासी महात्मा को वहाँ आते देखा। आत्मदेव ने सन्यासी के चरणों में प्रणाम किया और लम्बी लम्बी साँसे लेने लगा। सन्यासी ने उसके दुःख का कारण पूछा तो वह बोला कि अब देवता और ब्राह्मण भी उसका दिया प्रसन्न मन से स्वीकार नही करते। उसके संतान न होने से वह बहुत दुखी है और आत्महत्या करने आया है। उसके संतानहीन जीवन, घर और धन को धिक्कार है। जब आत्मदेव सन्यासी के सामने ये सब कहकर रोने लगा तब महात्मा को बहुत दया आई। उन्होंने आत्मदेव से कहा कि मैनें तुम्हारे माथे कीलकीरों में पढ़ा है कि सात जन्मों तक तुम्हारे कोई संतान नही हो सकती इसलिए तुम संसार की वासना छोड़ कर संन्यास ले लो। परन्तु ब्राह्मण ने कहा कि जिसमें पुत्र और स्त्री का सुख नही है वह संन्यास भी नीरस है। महात्मा ने समझाते हुए कहा कि विधाता का लेख मिटाने पर भी तुम्हे संतान से सुख नही मिलेगा। जब वह ब्राह्मण किसी प्रकार नही माना, तब सन्यासी ने उसे एक फल दिया और कहा कि ये अपनी पत्नी को खिला देना। इससे एक पुत्र होगा। अगर तुम्हारी पत्नी एक साल तक सत्य, शौच, दया, दान और एक समय एक ही अन्न खाने का नियम रखेगी तो बालक बहुत शुद्ध स्वभाव वाला होगा। ब्राह्मण ने वह फल अपनी पत्नी को दिया और कहीं चला गया। उसकी पत्नी कुटिल स्वभाव कि थी। उसने अपनी सखी से कहा कि मैं यह फल खाऊँगी तो मुझे बहुत कष्ट सहने पड़ेंगे। प्रसव कि पीड़ा, नियमों का पालन आदि सब करना होगा। इसलिए मैं ये फल नही खाऊँगी। उसके पति ने जब घर आकर पूछा कि फल खा लिया तो उसने कहा हाँ खा लिया। धुन्धुली ने अपनी बहन को सब बात बतायी तो वह बोली कि मेरे पास एक उपाए है। उसकी बहन ने कहा कि मेरे पेट में जो बच्चा है वो मैं तुझे दे दूँगी। तक तक तू गर्भवती के समान घर में गुप्त रूप से रह। तू मेरे पति को कुछ धन दे देगी तो वो तुझे अपना बालक दे देंगे। हम ऐसी युक्ति करेंगे जिससे सब यही कहें कि मेरा बालक छेह महीने का होकर मर गया। फिर मैं तेरे घर आकर उस बालक का पालन पोषण करती रहूंगी। और यह फल तू गौ को खिला दे। ब्राह्मणी ने सब कुछ अपनी बहन के कहे अनुसार किया। जब उसकी बहन को पुत्र हुआ तो उसकेपति ने चुपचाप उसे धुन्धुली को दे दिया। आत्मदेव बालक के होने ही ख़बर सुनकर बहुत आनंदित हुआ। उसकी स्त्री ने कहा कि बालक के पालन पोषण के लिए मैं अपनी बहन को यहाँ बुला लेती हूँ। आत्मदेव ने कहा ठीक है। उस बच्चे का नाम धुंधकारी रख दिया। तीन महीने बाद उस गौ ने भी एक मनुष्य के आकार के बच्चे को जन्म दिया। लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ और आत्मदेव के भाग्य कीसराहना करने लगे। आत्मदेव ने बालक के गौ के से कान देखकर उसका नाम गोकर्ण रख दिया। जब वे दोनों बालक जवान हुए तो गोकर्ण बहुत बड़ा पंडित और ज्ञानी हुआ किंतु धुंधकारी बहुत दुष्ट निकला। चोरी करना, सबसे द्वेष बढाना, दूसरे के बालकों को कुएं में डालना और सबको तंग करना यही उसका स्वभाव था। उसने वेश्याओं के जाल में फँस कर अपने पिता की सारी संपत्ति नष्ट कर दी। जब सब कुछ ख़तम हो गया तो आत्मदेव बहुत दुखी हुआ और कहने लगा कि इससे तो मेरी पत्नी बाँझ ही रहती। अब मैं कहाँ जाऊं और क्या करूं। उसी समय गोकर्ण ने आकर अपने पिता को समझाया कि यह संसार असार है। यह अत्यन्त दुखरूप और मोह में डालने वाला है। सुख न तो इन्द्र को है और न ही चक्रवर्ती राजा को। सुख केवल एकांतजीवी विरक्त मुनि को है। "यह मेरा पुत्र है" इस अज्ञान-को छोड़ दीजिये। मोह से नरक कीप्राप्ति है। इसलिए सबकुछ छोड़ कर वन में चले जाइए। गोकर्ण की बात सुनकर आत्मदेव को बहुत अच्छा लगा। उसने अपने पुत्र से उसे और उपदेश देने को कहा। गोकर्ण ने कहा यहशरीर हड्डी, मांस और रुधिर का पिंड है। इसे मैं मानना छोड़ दीजिये। स्त्री पुत्र आदि को अपना कभी ना मानें। भगवान् का भजन सबसे बड़ा धर्म है। निरंतर उसी का आश्रय लिए रहे। आत्मदेव ने अपने पुत्र की बात सुनकर घर त्याग दिया और वन में रात दिन भगवान् की सेवा- पूजा करने लगा। नियमपूर्वक भागवत के दशम स्कंध का पाठ करने से उसने भगवान् श्री कृष्ण चंद्र को प्राप्त कर लिया।

20Aug 2017

" हमें अपने ईश्वर की भक्ति में ही विश्वास रखना चाहिए "

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में नार्थ कैरोलिना, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस में भगवान शुक की कथा रसपान भक्तों को कराया। महाराज श्री ने कहा कि इस संसार में मेरे प्रभु अगर कृपा करे तभी श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करने का मज़ा आता है। कभी-कभी कथा के सुनने में आस पास का ट्रैफिक भी बाधा पहुंचाता है। कई अन्य चीजे भी बाधा पहुंचाती है। हमारी नींद भी कभी-कभी बाधा पहुंचाती है। कई बार वहां का भोजन प्रबंध भी बाधा पहुंचा सकता है। कथा के सुनने में बाधा कहीं से भी आ सकती है। आप कल्पना नहीं कर सकते है बाधा कहाँ-2 से आ सकती है। महाराज श्री ने बताया कि केवल जब हमारे प्रभु अपनी कृपा हम पर करते है तभी ही श्रीमद भागवत कथा को सुनने का मज़ा आता है। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा कि भगवान श्री कृष्ण ने आपको कथा को सुनने के लिए चुना है। तभी तो आपको इसके सुनने का फल प्राप्त होगा और जब भगवान हरी स्वयं हमें अपनी कथा को सुनाये तो इससे बड़ा हमारे लिए और क्या हो सकता है कि मेरे इष्ट देव स्वयं आ कर मुझे अपनी इस कथा का रसपान करा रहे है। महाराज श्री ने कहा कि कल आपने भागवत कथा में आत्मदेव की कथा को सुना था। जब हम धर्म के विरुद्ध कार्य करते है तो हम धुंधकारी है। हम सब में धुंधकारी मनुष्य मौजूद होता है और जब हम धर्म में रह कर कार्य करते है तो हम गौकर्ण होते है। गौकर्ण का मतलब है की विद्वान मनुष्य। वह मनुष्य समझदार होता है। सत कर्म करता है और सदा ही माँ बाप की सेवा करते है। धर्म की सेवा करते है। सदा ही सत्य का अनुशरण करते है। महाराज श्री ने बताया कि किसी को भी उसकी वाणी से कष्ट न हो ऐसी वाणी का प्रयोग करते है और इसके विपरीत ही धुंधकारी अपना कार्य करते है। सभी को कष्ट देते है। धर्म के विरुद्ध अपना कार्य करते है। सदा ही दुसरो से उल्टा सीधा बोलते रहते है। उनके जो भी मन में आता है उनसे वैसा ही बोलते है। धुंधकारी कभी भी दुसरो का भला नहीं कर सकता है। वह अपने आप को ही सबसे ऊपर मानता है। वह सोचता है कि में ही सबसे ऊपर हूँ बाकि सभी उससे निचे है। वह मनुष्य भगवान को नहीं मानता है। वह कहता है कि भगवान कुछ नहीं होता है। भगवान ने गीता में अर्जुन से कहा था कि हे अर्जुन इस संसार का पालनकर्ता मैं ही हूँ और तब कृष्ण भगवान ने कहा कि जो लोग मेरी माया से वशीभूत है आज मुझे को नहीं पहचान पाते है। मुझे को भला बुरा कहते है। वो मुझे केवल अपनी तरह का ही साधारण सा समझने लगते है। मुझे जान लेना या मेरी शक्ति को पहचान लेना कोई साधारण सी बात नहीं है। ये आसान काम नहीं है। इस संसार में जो भी कुछ है उनसब का मूल मैं ही तो हूँ। जो व्यक्ति मेरी पूजा करता है तो केवल मुझ को प्राप्त करता है और मेरे धाम में ही निवास करता है। मुझे पहचान पाना आसान काम नहीं है। कोई भी साधारण सा व्यक्ति मुझे आसानी से पहचान भी नहीं सकता है। जब जब मुझे इस पापी पृथ्वी पर धर्म को बचाना था तो मैंने तब तब इस धरती पर अवतार लिया है। महाराज श्री ने कहा कि एक दिन भगवान श्री कृष्ण गोकुल में अकेले और चुपचाप शांत बैठे है तो राधा उनसे पूछती है आप इस तरह से उदास क्योँ बैठे हैं? भगवान कहते है कि मैं अपने इन कलयुग के बच्चों को देख कर दुखी हो रहा हूँ। तब किशोरी राधा जी ने कहा की ऐसा क्योँ। तब उन्होंने कहा की सभी को पता होता है की मेरा बुरा किसमें है और भला किसमें है। तब भी आज का मनुष्य इन सब बातों को नजर अंदाज कर रहा है। हर मनुष्य को सदा ही सत्य बोलना चाहिए और धर्म के मार्ग पर ही चलना चाहिए। तभी तो इस संसार में उसका भला हो सकता है। लेकिन आज का मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए न जाने कितने ही झूठ बोल जाता है और अपने आने वाले जीवन को संकट में डाल देता है। जब भी हमारे माँ बाप हमसे किसी भी चीज के लिए माना करते है तो हम नहीं मानते है और उसी को करते है। तब महाराज श्री ने कहा कि क्या शास्त्र हमसे कहता है कि हमें झूठ बोलना चाहिए। क्या पुराण हमसे कहता है कि हमें झूठ बोलना चाहिए। क्या एक भी पुराण ऐसा है जो कहता है कि हमें अपने माँ बाप का अपमान करना चाहिए? एक पुराण क्या कहता है कि हमें अपने पड़ोसियों को हर्ट करना चाहिए या एक भी पुराण ऐसा है की जो कहता है कि हमें अपने बच्चों को हर्ट करना चाहिए? एक भी पुराण ऐसा नहीं होता है? लेकिन फिर भी हम ये सब करते है। इन सब को न जाने कौन हम सब को सीखा देता है। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा कि हमसे जिस भी काम को करने के लिए मना किया जाता है हम उसी काम को करते है और जिस भी काम को करने के लिए कहा जाता है हम उस काम को नहीं करते है। भगवान श्री कृष्ण सोचते है कि इन सब मनुष्यों का कल्याण कैसे किया जाए? तब श्री कृष्ण ने भगवान शुक से कहा की आप पृथ्वी पर जाओ और हमारी कथाओं को लोगों को सुनाओ। हमने यहाँ पर जन्म ले करके क्या क्या लीलाये की है जब ये जानेगे और हमारी कथाओं को सुनेगे तो कथा को सुन सुनकर वो सभी मनुष्य सत मार्ग पर चलेंगे और धर्म के मार्ग पर अपने आप ही चलने लगेंगे। तब भगवान श्री कृष्ण ने शुक से कहा कि तुम जाओ और हमारी इन कथाओं का प्रचार और प्रसार करो। तभी ही इन सब का भला हो सकता है। जब शुक आ रहे थे तो रास्ते में कैलाश पर्वत पड़ा। इसी पर्वत पर माँ पार्वती और भगवान भोलेनाथ रहते थे। तो पार्वती माता भोले नाथ से कथा सुन रही है। तब भोलेनाथ ने माता पार्वती से कहा की पहले आप जाओ और देख कर आओ की इस वक़्त यहाँ पर कोई और तो नहीं है। जब मध्य में कथा पहुंची तो माता पार्वती को नींद आ गयी और वो वहीँ पर सो गयी लेकिन शुक ने पूरी कथा सुनी। अब प्रश्न ये उठता है कि माता पार्वती को नींद कैसे आ गयी तब गोस्वामी तुलसी दास कहते है की पिछले जन्म के पाप के कारण उनको कथा अच्छी नहीं लगती है। यहाँ पर महर्षि ने कहा की उनके जीवन में तीन चीजे होती है पहले तो वो कथा में जाएँगी ही नहीं, अगर चले भी गयी तो वो वहां पर सो जायेगा, अगर नहीं भी सोया तो वह वहां पर सब से लड़ाई ही कर देगा। जब भी आप का कोई बड़ा या सम्मानीय व्यक्ति आप को समझाए और आप को तब भी कुछ भी समझा में नहीं आता है तो समझ लेना की अब आपका अभी से बुरा वक़्त शुरू हो चुका है। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

21Aug 2017

"भगवान ना ज्ञान से मिलते हैं ना दौलत से मिलते हैं। जिसका मन पवित्र है भगवान उसी को मिलते हैं।"

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में नार्थ कैरोलिना, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस में भगवान शुक की कथा रसपान भक्तों को कराया। पूज्य महाराज श्री ने परीक्षित जी महाराज के प्रसंग को प्रारम्भ करते हुए कहा की जब परीक्षित जी महाराज को पता चला कि सातवें दिन उनकी मृत्यु निश्चित है तो अपना सब कुछ त्याग दिया। राजा परीक्षित ने संतो से पूछा की जिसकी मृत्यु सातवे दिन हो तो उस क्या करना चाहिए? इस पर कोई कहता है भजन करो,कोई कहता है गंगा स्नान करे, किसी संत ने कहा मोन करो, स्मरण करो ध्यान करो, उपासना करो। अनेको संत से उन्हें अनेकों विचार प्राप्त हुए। उसी समय भगवान नारद के आदेश पर भगवान शुकदेव जी वहाँ पर पधारें। उनके मुख पर बहुत तेज था सभी संतो ने उनको प्रणाम किया। शुकदेव जी महाराज जब आये तब राजा परीक्षित ने उन्हें साष्टांग दंडवत प्रणाम किया। और शुकदेव जी से पूछा जिसकी मृत्यु निश्चित हो उसे क्या करना चाहिए और मृत्यु हमारे जीवन का कटु सत्य है। हम इस संसार में खाली हाथ आए थे और खाली हाथ ही जायंगे। यह पता होने के बावजूद भी हम अपना सारा जीवन सांसारिक भोगविलास में गुजार देते हैं और प्रभु ने हमें जिस कार्य के लिए मानव जीवन दिया है उससे हम भटक जाते हैं। शुकदेव जी ने परीक्षित जी महाराज से कहा हे राजन जिस की मृत्यु निश्चित हो उसे भागवत कथा श्रवण करनी चाहिए। उसी हमें भी सच्चे मन से भागवत कथा श्रवण करनी चाहिए और भगवान की भक्ति करनी चाहिए। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

21Aug 2017

"भगवान ना ज्ञान से मिलते हैं ना दौलत से मिलते हैं। जिसका मन पवित्र है भगवान उसी को मिलते हैं।"

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में नार्थ कैरोलिना, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस में भगवान शुक की कथा रसपान भक्तों को कराया। पूज्य महाराज श्री ने परीक्षित जी महाराज के प्रसंग को प्रारम्भ करते हुए कहा की जब परीक्षित जी महाराज को पता चला कि सातवें दिन उनकी मृत्यु निश्चित है तो अपना सब कुछ त्याग दिया। राजा परीक्षित ने संतो से पूछा की जिसकी मृत्यु सातवे दिन हो तो उस क्या करना चाहिए? इस पर कोई कहता है भजन करो,कोई कहता है गंगा स्नान करे, किसी संत ने कहा मोन करो, स्मरण करो ध्यान करो, उपासना करो। अनेको संत से उन्हें अनेकों विचार प्राप्त हुए। उसी समय भगवान नारद के आदेश पर भगवान शुकदेव जी वहाँ पर पधारें। उनके मुख पर बहुत तेज था सभी संतो ने उनको प्रणाम किया। शुकदेव जी महाराज जब आये तब राजा परीक्षित ने उन्हें साष्टांग दंडवत प्रणाम किया। और शुकदेव जी से पूछा जिसकी मृत्यु निश्चित हो उसे क्या करना चाहिए और मृत्यु हमारे जीवन का कटु सत्य है। हम इस संसार में खाली हाथ आए थे और खाली हाथ ही जायंगे। यह पता होने के बावजूद भी हम अपना सारा जीवन सांसारिक भोगविलास में गुजार देते हैं और प्रभु ने हमें जिस कार्य के लिए मानव जीवन दिया है उससे हम भटक जाते हैं। शुकदेव जी ने परीक्षित जी महाराज से कहा हे राजन जिस की मृत्यु निश्चित हो उसे भागवत कथा श्रवण करनी चाहिए। उसी हमें भी सच्चे मन से भागवत कथा श्रवण करनी चाहिए और भगवान की भक्ति करनी चाहिए। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

14Aug 2017

"भगवान की भक्ति करने से ही व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते है।"

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर श्री कृष्ण की जन्मभूमि से परम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने अपने मुखारविंद से पंचम दिवस की श्रीमद्भागवत कथा का रसपान भक्तों को कराया। इस बार हम जन्माष्टमी महा महोत्सव मना रहे हैं इस बार जन्माष्टमी 15 अगस्त को है। इतना ही नहीं देश को आजाद हुए भी 70 साल पुरे हो जाएंगे। तो यह मात्र जन्माष्टमी महोत्सव नहीं है बल्कि देश की आजादी का भी पर्व है। इस बार स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर श्री कृष्ण भगवान् हमे कोई न कोई तो सन्देश देना चाहते होंगे तभी तो स्वतंत्रता दिवस पर जन्माष्टमी का पर्व आया है। महाराज श्री ने कहा कि हर मनुष्य को अपने जीवन में भक्ति जरूर ही करनी चाहिए। क्योँकि भक्ति के द्वारा ही उस मनुष्य का जीवन सफल हो सकता है। जो व्यक्ति अपने इस जीवन में भक्ति नहीं करता है उस मनुष्य का जीवन कभी भी सफल नहीं हो सकता है। इसलिए अपने इस जीवन को सुखी और सफल बनाने के लिए मनुष्य को अपने जीवन में भक्ति का मार्ग जरूर ही अपनाना चाहिए। महाराज श्री ने बताया कि जिस प्रकार से मनुष्य के जीवन में भक्ति जरुरी है ,उसी प्रकार से उसे देशभक्ति का मार्ग भी अपनाना बहुत ही जरुरी है। क्योँकि इसके द्वारा ही मनुष्य अपने जीवन को और अपने देश को हर प्रकार से खुशहाल बना सकता है। मनुष्य को अपने जीवन में सदा ही दुसरो की सेवा जरूर ही करनी चाहिए तभी तो हम अपना और दुसरो का भला कर सकते है। जो व्यक्ति दुसरो की सेवा करते है बह सदा ही उस व्यक्ति की मदद जरूर ही करते है और उसका जीवन सफल बना देते है। महाराज श्री ने बताया कि हमें अपने इष्ट देव की पूजा में सदा के लिए अपने जीवन को लगा देना चाहिए। तभी हम सब का अच्छी तरह से भला हो सकता है। हमें भगवान से अच्छी अच्छी बातें सीखनी चाहिए। हमें अपने ठाकुर जी की भक्ति में लग जाना चाहिए ताकि हमारे जीवन के सभी कष्टों को हमारे ठाकुर जी हर ले। भगवान भी उन्ही लोगों का साथ देते है जो सत्य और भलाई के रस्ते पर चलते है। इसलिए हमें सदा ही सत्य और भलाई का रास्ता अपनाना चाहिए। महाराज श्री ने कहा कि हर व्यक्ति को अपने जीवन में सदा ही सत्य कर्म करना चाहिए। सत्य कर्म ही उस मनुष्य को इस जीवन में हर तरह से सुखी बना सकते है। मनुष्य को सदा ही सत्य और अच्छी का मार्ग अपनाना चाहिए। इस मार्ग को अपना कर ही यह मनुष्य इस कपटी और लालची संसार में हर तरह से सुखी रह सकता है। मानव को कभी भी कपट और लालच का रास्ता नहीं अपनाना चाहिए। क्योँकि इस मार्ग को अपना कर मनुष्य अपना तो बुरा करता है ही साथ ही वह इस मार्ग से दुसरो का बुरा भी बैठता है। इसलिए मनुष्य को सदा ही अपने इष्ट देव से सत्य और अच्छी का मार्ग देने की अपील करनी चाहिए। इसके बाद महाराज श्री ने " हे गोविन्द ये जीवन है तेरे हवाले , बाके मुरलिया वाले " भजन गाकर अपने सभी भक्तों को मंत्र मुग्ध कर दिया। यहाँ पर बैठे सभी व्यक्तियों को भगवान के प्रति अपने आप को समर्पित कर देने को कहा। तभी हमारा इस संसार में सहीं प्रकार से जीवन काट सकता है। महाराज श्री ने बताया कि जब भी आप वृंदावन में जाए तो अपने ठाकुर जी से सच्ची प्रीत रखते है। ये भूमि बहुत ही पवित्र भूमि है। यहाँ पर आकर सभी मनुष्य अपने आप को और अपने पाप को धोते है। मनुष्य को देखने के लिए प्रेम रुपी नेत्र चाहिए होते है। जो भी सच्चा रसिक होता है तो वह आप से भगवान् की पूजा के लिए जरूर ही बोलेगा। यहाँ पर आकर बहुत से राजाओं ने शादी की थी। तभी तो वहां पर भी इस ब्रज भूमि की महक मिलती है। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा की अगर भगवान कृष्ण का नाम जपने से हम नर्क में जायेंगे तो हम अपने इस इष्ट देव एक नाम जरूर ही जपेंगे। चाहे हम नर्क में ही क्योँ न चले जाए। खुदा नहीं कहता है की तुम कृष्ण की निंदा करो और कृष्ण नहीं कहता है की तुम खुदा की निंदा करो। हम जब भी वृंदावन में रहे तो हमारे हर अंग में ब्रज की छाप लगी होनी चाहिए। हर घडी हमें अपने ठाकुर जी का नाम जपते रहना चाहिए। तभी हमारा यह जीवन सफल हो सकता है।

15Aug 2017

" मनुष्य को सदा के लिए अपने प्रभु की भक्ति में डूब जाना चाहिए "

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर श्री कृष्ण की जन्मभूमि से परम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने अपने मुखारविंद से षटम दिवस की श्रीमद्भागवत कथा का रसपान भक्तों को कराया। महाराज श्री ने बताया कि जिस प्रकार से मनुष्य के जीवन में भक्ति जरुरी है, उसी प्रकार से उसे देशभक्ति का मार्ग भी अपनाना बहुत ही जरुरी है। क्योँकि इसके द्वारा ही मनुष्य अपने जीवन को और अपने देश को हर प्रकार से खुशहाल बना सकता है। मनुष्य को अपने जीवन में सदा ही दुसरो की सेवा जरूर ही करनी चाहिए तभी तो हम अपना और दुसरो का भला कर सकते है। जो व्यक्ति दुसरो की सेवा करते है बहगवां सदा ही उस व्यक्ति की मदद जरूर ही करते है और उसका जीवन सफल बना देते है। महाराज श्री ने बताया कि हमें अपने इष्ट देव की पूजा में सदा के लिए अपने जीवन को लगा देना चाहिए। तभी हम सब का अच्छी तरह से भला हो सकता है। हमें भगवान से अच्छी अच्छी बातें सीखनी चाहिए। हमें अपने ठाकुर जी की बहकती में लग जाना चाहिए। ताकि हमारे जीवन के सभी कष्टों को हमारे ठाकुर जी हर ले। भगवान भी उन्ही लोगों का साथ देते है जो सत्य और भलाई के रास्ते पर चलते है। इसलिए हमें सदा ही सत्य और भलाई का रास्ता अपनाना चाहिए। महाराज श्री ने कहा कि भगवान अपने अपने में ही खोया हुआ रहता है। उसे व्यर्थ ही में इस सब की चिंता नहीं करनी चाहिए। जब कंस ने अक्रूर जी से कहा की जाओ और बलराम और कृष्ण को लिवा ले आओ। तब अक्रूर जी वृंदावन के लिए चल दिए। मनुषय व्यर्थ में ही अपने इस सब को सोच कर रोटा रहता है। उसे ऐसा नहीं करना चाहिए। क्योँकि जो ऐसा करता है वह कभी भी खुश नहीं रह सकता है। जब अक्रूर जी के साथ बलराम और कृष्ण जी वृंदावन से चले तो वहां पर लोगों की काफी भीड़ लग गयी थी। और उनसे वहां से नहीं जाने की प्रार्थना करने लगे। इस पर जब वो दोनों जब यमुना के तट पर पहुंचे तो वहां पर एक धोबी कपडे धो रहा था तब कृष्ण भगवन ने उससे कपडे पहनने के लिए मांगे थे। तब वो धोबी ने उनको कपडे देने से माना कर दिया। इस पर भगवान कृष्ण ने उस धोबी को वही पर पटक दिया और उसका खात्मा कर दिया। महाराज श्री ने बताया कि जब भगवान कृष्ण के पास जाने के लिए तैयार हो गए तो वो काफी खुश हो गए। जब कृष्ण बलराम के साथ कंस की नगरी में पहुँच गए तो वहां पर उन दोनों को एक दासी मिली जो कंस को चन्दन लगाने के लिए जा रही थी। तब उसको देख भगवान कृष्ण ने उससे रोक कर कहा की आप किसको चन्दन लगाने के लिए जा रही थी तो भगवान् ने उसे कहा की आप कंस को किया चन्दन लगाती हो आप मुझे ही चन्दन लगा दो। आपका भाग्य चमक जायेगा। और इस प्रकार से भगवान ने पहले हाथी को मारा ,फिर दरबार में सभी पहलवानो को बढ़ कर दिया। इससे कंस दर कर अपनी गद्दी पर बैठ गया। तब कृष्ण भगवान् ने कंस का वध कर दिया। और उस पापी राक्षस का नट कर दिया और अपनी माता देवकी और नाना को उस आतातायी के चंगुल से आज़ाद कराया। इससे वहां पर मौजूद सभी नगरवासी काफी खुश हो गए। महाराज श्री ने कहा कि उसके बाद जब भगवान कृष्ण जब शिक्षा के लिए गए तो वो गए तो ज्ञान के लिए थे लेकिन वो वहां से प्रेम की शिक्षा ग्रहण करके आये। और जब जरासंध से भगवान कृष्ण का सत्रह बार युद्ध हुआ था तो हर बार उनकी हार हुई थी। और वो रण को छोड़ कर चले गए। इसलिए ही तो उनको रणछोड़ के नाम से पुकारा जाता है। और अंत में जब फिर से कृष्ण ने द्वारका में अपनी नगरी बसै तो इससे जरासंध काफी गुस्सा हो गया था। और जब भगवान कृष्ण ने कंस के दरबार में अर्जुन और भीम को लेकर गए तो उनको द्वंध युद्ध के लिए ललकारा। तो जरासंध ने भीम को युद्ध के लिए ललकारा। और इस तरह से भगवान कृष्ण ने जरासंध का वध भीम के हाथों से करवाया। इस राज्य को उस आतातायी के चंगुल से आज़ाद करवाया। और कई देवी देवताओं को वहां से आज़ाद करवाया। फिर जब भगवान श्री कृष्ण रुक्मणि से विवाह करने के लिए गए तो वहां पर भगवान का काफी अपमान किया क्या था। उनको काफी भला बुरा कहा गया था। तब भगवान ने रुक्मणि का हरण कर लिया और उनको उठा कर के हरण करके अपनी नगरी द्वारका के लिए चल दिए। तब रुकमणी के भाई रुक्मी ने उनको रोकने की काफी कोशिश की लेकिन रुक्मी उनको रोकने में सफल नहीं हो सके। और भगवान ने रुक्मी को हरा कर के द्वारका ले गए और उनसे विवाह कर लिया। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

16Aug 2017

" मनुष्य को अपनी मित्रता के बीच अमीरी गरीबी को नहीं देखना चाहिए "

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर श्री कृष्ण की जन्मभूमि से परम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने अपने मुखारविंद से सप्तम दिवस की श्रीमद्भागवत कथा का रसपान भक्तों को कराया। आज महाराज श्री ने "प्रभु मुझे बता दो चरणों में कैसे आना?" भजन से कथा प्रारम्भ की। पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने मित्रता की परिभाषा समझाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंततः सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की थी।

16Aug 2017

" मनुष्य को अपनी मित्रता के बीच अमीरी गरीबी को नहीं देखना चाहिए "

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर श्री कृष्ण की जन्मभूमि से परम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने अपने मुखारविंद से सप्तम दिवस की श्रीमद्भागवत कथा का रसपान भक्तों को कराया। आज महाराज श्री ने "प्रभु मुझे बता दो चरणों में कैसे आना?" भजन से कथा प्रारम्भ की। पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने मित्रता की परिभाषा समझाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंततः सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की थी।

12Aug 2017

"भगवान की भक्ति कहीं भी की जा सकती है उसके लिए इधर-उधर भटकने की ज़रूरत नहीं है।"

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर श्री कृष्ण की जन्मभूमि से परम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने अपने मुखारविंद से चतुर्थ दिवस की श्रीमद्भागवत कथा का रसपान भक्तों को कराया। महाराज श्री ने कहा कि इस बार हम जन्माष्टमी महा महोत्सव 15 अगस्त को मना रहे है। इतना ही नहीं देश को आजाद हुए भी 70 साल पुरे हो जाएंगे। तो यह मात्र जन्माष्टमी महोत्सव नहीं है बल्कि देश की आजादी का भी पर्व है। इस बार स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर श्री कृष्ण भगवान हमे कोई न कोई तो सन्देश देना चाहते होंगे तभी तो स्वतंत्रता दिवस पर जन्माष्टमी का पर्व आया है। महाराज श्री ने कहा कि हमें सदा ही अपने माता पिता का हर जगह पर सम्मान करना चाहिए। तभी हमारा हर प्रकार से कल्याण हो सकता है। जो व्यक्ति अपने माता पिता का सम्मान नहीं करते है। इस व्यक्ति का कभी भी भला नहीं हो सकता है। अतः हर व्यक्ति को अपने माता पिता और गुरओं का हर जगह पर सम्मान करना चाहिए। तभी हम सब का भला हो सकता है। भगवान भी उन्ही लोगों का साथ देते है जो अपने माता पिता और गुरुओं का सम्मान करते है। महाराज श्री ने कहा कि हम सब से इस भारत देश में जन्म लिया है। जिस देश में अनेक चमत्कार हुए है। यही पर सभी देवी देवताओं ने जन्म लिया है। यही पर उनके सभी चमत्कारों का उल्लेख हम सब को मिलता है और किसी देश में इस तरह के चमत्कार हमें नहीं मिलते है। भारत में ही इस तरह का वाकया हमें मिलता है। भारत की संस्कृति भी काफी विशाल है। यहाँ पर अनेक धर्मों को मानने वाले लोग रहते है। इस सब के बावजूद यहाँ पर सभी लोग मिलजुल कर रहते है। महाराज श्री ने बताया कि हमें अपने इष्ट देव की पूजा में सदा के लिए अपने जीवन को लगा देना चाहिए। तभी हम सब का अच्छी तरह से भला हो सकता है। हमें भगवान से अच्छी-अच्छी बातें सीखनी चाहिए। हमें अपने ठाकुर जी की भक्ति में लग जाना चाहिए। ताकि हमारे जीवन के सभी कष्टों को हमारे ठाकुर जी हर ले। भगवान भी उन्ही लोगों का साथ देते है जो सत्य और भलाई के रस्ते पर चलते है। इसलिए हमें सदा ही सत्य और भलाई का रास्ता अपनाना चाहिए। महाराज श्री ने कहा कि हम सब ने इस भारत जैसे विशाल देश में जन्म लिया है जहाँ पर कृष्ण और राम जैसे देवताओं ने जन्म लिया है। हमें सदा ही अपने भगवान के चरणों की सेवा में लग जाना चाहिए। अपने जीवन को उनकी ही भक्ति में लगा देना चाहिए। चाहे वो कोई भी देवता हो। उसी की भक्ति में पूरी तरह डूब जाना चाहिए। तभी हम सब का भला हो सकता है। हमें अपनी भक्ति से उस अपने इष्ट देव को सदा ही प्रसन्न करते रहना चाहिए ताकि वो हमारे जीवन में आने वाले सभी कष्टों को आसानी से हर ले। महाराज श्री ने एक सूंदर भजन "मेरे गिनियों ना अपराध लाड़ली श्री राधे" सुनाकर वहां पर मौजूद सभी भक्तों को मंत्र मुग्ध कर दिया। इस गीत के माध्यम से महाराज श्री ने अपने भक्तों को कई सन्देश दिए ताकि वह आने वाले जीवन की आने वाली कठिनाइयों को आसानी से पार कर सके। इस भजन से महाराज श्री ने भगवान कृष्ण और राधा के प्रेम का भी वर्णन किया है। महाराज श्री ने बताया कि इस भजन के माध्यम से एक भक्त अपने इष्ट देव से प्रार्थना करता है की वह कितने भी अपराध कर ले लेकिन उनके इष्टदेव उसके द्वारा किये गए अपराधों को ना गिने। उसे पूजा और पाठ करना नहीं आता है। फिर भी आपकी भक्ति में लगा हुआ है। उसको पूजा और पाठ करना तो आप ही उसे बताओगे। अगर आप मेरे अवगुण देखोगे तो आप मेरा भला नहीं कर सकते है। इसलिए आप को मुझे हर तरह से सच्चाई के मार्ग पर चलाना ही होगा। तभी आप मेरा हर प्रकार से उद्धार कर सकते है। महाराज श्री ने कहा कि जिस व्यक्ति ने कभी पूजा नहीं की हो ,जिसने कभी सत्संग नहीं किया हो ,जिसने कभी भक्ति नहीं की हो उस व्यक्ति का जीवन बेकार है। उस व्यक्ति का कभी भी भला नहीं हो सकता है। महाराज श्री ने बताया की जिस तरह से हिरण कस्तूरी के चक्कर में जगह जगह भटकता रहता है लेकिन वह कस्तूरी उसी की नाभि में ही होती है। उसी तरह ही हमें अपने भगवान की भक्ति के लिए जगह जगह नहीं भटकना चाहिए। अपनी जगह पर ही उस की भक्ति में ही लगे रहना चाहिए। संसार की सत्यता को समझ कर अपने जीवन को उस ठाकुर की भक्ति में साद के लिए लगा देना चाहिए। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा कि हम सब को जगह जगह भटकना छोड़ देना चाहिए। अपने आप को गोविन्द की भक्ति में लगा देना चाहिए। ये हमारे गोविन्द ही हमें इस उलझन से निकल सकते है। हमें इस विपदा से सदा के लिए अलग कर देते है। महाराज श्री ने बताया कि इस बार जन्माष्टमी का पर्व भी 15 अगस्त के दिन ही पद रहा है। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा की यह तुम पर ही निर्भर करता है है तुम गुलाम बनना चाहते हो या राजा बन कर जीना चाहते हो। तभी तो इस बार जन्माष्टमी का त्यौहार आज़ादी के दिवस के दिन पड़ रहा है। इसीलिए हमें पूर्ण रूप से आज़ाद रूप में जीना चाहिए। महाराज श्री ने बताया कि हमें अपने ठाकुर जी के प्रति अपनी भक्ति को सुदृढ़ करना चाहिए। ताकि हम सब अपनी भक्ति में कमजोर ना हो सके। हमें कभी भी गलत कामों को नहीं करना चाहिए। हमसब को हमेशा अच्छे काम करते रहना चाहिए। हमें अपने सम्बन्ध अपने ठाकुर से मजबूत करने चाहिए। कोई भी कठिनाई चाहे हम सब के सामने क्यों ना हो। आज का भक्त तो यह चाहता है की गुरु जी अपने भक्त का हाथ जोड़ कर स्वागत करता रहे। लेकिन ये सब गलत है। भक्ति करते वक़्त तो हम सब को अनेक परीक्षा देनी पड़ती है। लेकिन हम सब को उन परीक्षाओं से नहीं घबराना चाहिए। हमें तो अपने भगवान की भक्ति में सदा के लिए लग जाना चाहिए। कभी भी अपनी परीक्षा से नहीं घबराना चाहिए। जिस प्रकार राजा बलि के पास भगवान वामन गए थे तो उन्होंने राजा बलि से तीन पग धरती मांगी थी। तो राजा बलि ने उनसे कहा था की तीन पग से ज्यादा धरती भी आप मांग सकते हो। लेकिन भगवान वामन ने कहा नहीं राजन मुझे तो केवल तीन पग ही धरती चाहिए। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा की जिस व्यक्ति के पास धन हो तो उसको समय समय पर भंडारा करते रहना चाहिए। महाराज श्री ने कहा कि हमें समय समय पर उन अनाथ लोगों की मदद करते रहना चाहिए जिनको दो वक़्त का खाना भी नसीब नहीं होता है ताकि उनका जीवन आराम से कट सके। हम सब को भूमि दान जरूर करना चाहिए। ताकि आगे आने वाले समय में हमारे लिए इस सब का लाभ मिल सके। ।।राधे राधर बोलना पड़ेगा ।।

12Aug 2017

"भगवान की भक्ति कहीं भी की जा सकती है उसके लिए इधर-उधर भटकने की ज़रूरत नहीं है।"

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर श्री कृष्ण की जन्मभूमि से परम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने अपने मुखारविंद से चतुर्थ दिवस की श्रीमद्भागवत कथा का रसपान भक्तों को कराया। महाराज श्री ने कहा कि इस बार हम जन्माष्टमी महा महोत्सव 15 अगस्त को मना रहे है। इतना ही नहीं देश को आजाद हुए भी 70 साल पुरे हो जाएंगे। तो यह मात्र जन्माष्टमी महोत्सव नहीं है बल्कि देश की आजादी का भी पर्व है। इस बार स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर श्री कृष्ण भगवान हमे कोई न कोई तो सन्देश देना चाहते होंगे तभी तो स्वतंत्रता दिवस पर जन्माष्टमी का पर्व आया है। महाराज श्री ने कहा कि हमें सदा ही अपने माता पिता का हर जगह पर सम्मान करना चाहिए। तभी हमारा हर प्रकार से कल्याण हो सकता है। जो व्यक्ति अपने माता पिता का सम्मान नहीं करते है। इस व्यक्ति का कभी भी भला नहीं हो सकता है। अतः हर व्यक्ति को अपने माता पिता और गुरओं का हर जगह पर सम्मान करना चाहिए। तभी हम सब का भला हो सकता है। भगवान भी उन्ही लोगों का साथ देते है जो अपने माता पिता और गुरुओं का सम्मान करते है। महाराज श्री ने कहा कि हम सब से इस भारत देश में जन्म लिया है। जिस देश में अनेक चमत्कार हुए है। यही पर सभी देवी देवताओं ने जन्म लिया है। यही पर उनके सभी चमत्कारों का उल्लेख हम सब को मिलता है और किसी देश में इस तरह के चमत्कार हमें नहीं मिलते है। भारत में ही इस तरह का वाकया हमें मिलता है। भारत की संस्कृति भी काफी विशाल है। यहाँ पर अनेक धर्मों को मानने वाले लोग रहते है। इस सब के बावजूद यहाँ पर सभी लोग मिलजुल कर रहते है। महाराज श्री ने बताया कि हमें अपने इष्ट देव की पूजा में सदा के लिए अपने जीवन को लगा देना चाहिए। तभी हम सब का अच्छी तरह से भला हो सकता है। हमें भगवान से अच्छी-अच्छी बातें सीखनी चाहिए। हमें अपने ठाकुर जी की भक्ति में लग जाना चाहिए। ताकि हमारे जीवन के सभी कष्टों को हमारे ठाकुर जी हर ले। भगवान भी उन्ही लोगों का साथ देते है जो सत्य और भलाई के रस्ते पर चलते है। इसलिए हमें सदा ही सत्य और भलाई का रास्ता अपनाना चाहिए। महाराज श्री ने कहा कि हम सब ने इस भारत जैसे विशाल देश में जन्म लिया है जहाँ पर कृष्ण और राम जैसे देवताओं ने जन्म लिया है। हमें सदा ही अपने भगवान के चरणों की सेवा में लग जाना चाहिए। अपने जीवन को उनकी ही भक्ति में लगा देना चाहिए। चाहे वो कोई भी देवता हो। उसी की भक्ति में पूरी तरह डूब जाना चाहिए। तभी हम सब का भला हो सकता है। हमें अपनी भक्ति से उस अपने इष्ट देव को सदा ही प्रसन्न करते रहना चाहिए ताकि वो हमारे जीवन में आने वाले सभी कष्टों को आसानी से हर ले। महाराज श्री ने एक सूंदर भजन "मेरे गिनियों ना अपराध लाड़ली श्री राधे" सुनाकर वहां पर मौजूद सभी भक्तों को मंत्र मुग्ध कर दिया। इस गीत के माध्यम से महाराज श्री ने अपने भक्तों को कई सन्देश दिए ताकि वह आने वाले जीवन की आने वाली कठिनाइयों को आसानी से पार कर सके। इस भजन से महाराज श्री ने भगवान कृष्ण और राधा के प्रेम का भी वर्णन किया है। महाराज श्री ने बताया कि इस भजन के माध्यम से एक भक्त अपने इष्ट देव से प्रार्थना करता है की वह कितने भी अपराध कर ले लेकिन उनके इष्टदेव उसके द्वारा किये गए अपराधों को ना गिने। उसे पूजा और पाठ करना नहीं आता है। फिर भी आपकी भक्ति में लगा हुआ है। उसको पूजा और पाठ करना तो आप ही उसे बताओगे। अगर आप मेरे अवगुण देखोगे तो आप मेरा भला नहीं कर सकते है। इसलिए आप को मुझे हर तरह से सच्चाई के मार्ग पर चलाना ही होगा। तभी आप मेरा हर प्रकार से उद्धार कर सकते है। महाराज श्री ने कहा कि जिस व्यक्ति ने कभी पूजा नहीं की हो ,जिसने कभी सत्संग नहीं किया हो ,जिसने कभी भक्ति नहीं की हो उस व्यक्ति का जीवन बेकार है। उस व्यक्ति का कभी भी भला नहीं हो सकता है। महाराज श्री ने बताया की जिस तरह से हिरण कस्तूरी के चक्कर में जगह जगह भटकता रहता है लेकिन वह कस्तूरी उसी की नाभि में ही होती है। उसी तरह ही हमें अपने भगवान की भक्ति के लिए जगह जगह नहीं भटकना चाहिए। अपनी जगह पर ही उस की भक्ति में ही लगे रहना चाहिए। संसार की सत्यता को समझ कर अपने जीवन को उस ठाकुर की भक्ति में साद के लिए लगा देना चाहिए। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा कि हम सब को जगह जगह भटकना छोड़ देना चाहिए। अपने आप को गोविन्द की भक्ति में लगा देना चाहिए। ये हमारे गोविन्द ही हमें इस उलझन से निकल सकते है। हमें इस विपदा से सदा के लिए अलग कर देते है। महाराज श्री ने बताया कि इस बार जन्माष्टमी का पर्व भी 15 अगस्त के दिन ही पद रहा है। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा की यह तुम पर ही निर्भर करता है है तुम गुलाम बनना चाहते हो या राजा बन कर जीना चाहते हो। तभी तो इस बार जन्माष्टमी का त्यौहार आज़ादी के दिवस के दिन पड़ रहा है। इसीलिए हमें पूर्ण रूप से आज़ाद रूप में जीना चाहिए। महाराज श्री ने बताया कि हमें अपने ठाकुर जी के प्रति अपनी भक्ति को सुदृढ़ करना चाहिए। ताकि हम सब अपनी भक्ति में कमजोर ना हो सके। हमें कभी भी गलत कामों को नहीं करना चाहिए। हमसब को हमेशा अच्छे काम करते रहना चाहिए। हमें अपने सम्बन्ध अपने ठाकुर से मजबूत करने चाहिए। कोई भी कठिनाई चाहे हम सब के सामने क्यों ना हो। आज का भक्त तो यह चाहता है की गुरु जी अपने भक्त का हाथ जोड़ कर स्वागत करता रहे। लेकिन ये सब गलत है। भक्ति करते वक़्त तो हम सब को अनेक परीक्षा देनी पड़ती है। लेकिन हम सब को उन परीक्षाओं से नहीं घबराना चाहिए। हमें तो अपने भगवान की भक्ति में सदा के लिए लग जाना चाहिए। कभी भी अपनी परीक्षा से नहीं घबराना चाहिए। जिस प्रकार राजा बलि के पास भगवान वामन गए थे तो उन्होंने राजा बलि से तीन पग धरती मांगी थी। तो राजा बलि ने उनसे कहा था की तीन पग से ज्यादा धरती भी आप मांग सकते हो। लेकिन भगवान वामन ने कहा नहीं राजन मुझे तो केवल तीन पग ही धरती चाहिए। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा की जिस व्यक्ति के पास धन हो तो उसको समय समय पर भंडारा करते रहना चाहिए। महाराज श्री ने कहा कि हमें समय समय पर उन अनाथ लोगों की मदद करते रहना चाहिए जिनको दो वक़्त का खाना भी नसीब नहीं होता है ताकि उनका जीवन आराम से कट सके। हम सब को भूमि दान जरूर करना चाहिए। ताकि आगे आने वाले समय में हमारे लिए इस सब का लाभ मिल सके। ।।राधे राधर बोलना पड़ेगा ।।

11Aug 2017

"भगवान ना ज्ञान से मिलते हैं ना दौलत से मिलते हैं। जिसका मन पवित्र है भगवान उसी को मिलते हैं।"

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर श्री कृष्ण की जन्मभूमि से परम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने अपने मुखारविंद से तृतीय दिवस की श्रीमद्भागवत कथा का रसपान भक्तों को कराया। महाराज श्री ने कथा प्रारम्भ करते हुए कहा की इस बार हम जन्माष्टमी महा महोत्सव 15 अगस्त को मना रहे है। इतना ही नहीं देश को आजाद हुए भी 70 साल पुरे हो जाएंगे तो यह मात्र जन्माष्टमी महोत्सव नहीं है बल्कि देश की आजादी का भी पर्व है। इस बार स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर श्री कृष्ण भगवान हमे कोई न कोई तो सन्देश देना चाहते होंगे तभी तो स्वतंत्रता दिवस पर जन्माष्टमी का पर्व आया है। महाराज श्री ने कहा कि वृंदावन भूमि एक पवित्र भूमि है ,जहाँ पर भगवान श्री कृष्ण ने अनेकों बाल लीलाएं की थी तथा अनेक राक्षसों का नाश किया था। हमें भी सदा ही अपने इष्ट देव के चरणों में सारा ध्यान लगा देना चाहिए। सदा ही भगवान की भक्ति में लगे रहना चाहिए और अपने जीवन से उस राक्षस रूपी दानव का सदा के लिए नाश कर देना चाहिए। महाराज श्री ने अपने बच्चे और माँ बाप के बीच के रिश्ते के बारे में अपने भक्तों को बताते हुए कहा की हमें सदा ही श्रवण कुमार की तरह ही अपने माता पिता की आज्ञा का पालन करना चाहिए तथा सदा ही अपने माता पिता का हर जगह सम्मान करना चाहिए। मुंबई घटना के बारे में बताते हुए महाराज श्री ने कहा की एक माँ घर में अकेले ही मर गई और उसका अंतिम संस्कार करने वाला बेटा अमेरिका में ही नौकरी करता रह गया। जब बेटा मुंबई घर वापिस आया तो पता चला की माँ का कंकाल घर के अंदर था और माँ की मृत्यु हुए 9-10 महीने हो चुके हैं। इसमें किसकी गलती है? महाराज श्री ने सभी से पूछा। इसमें गलती है भारतीय शिक्षा की, इसमें गलती है माँ बाप की। क्यूंकि आजकल माता पिता अपने बच्चों को भी पैसा कमाने की मशीन समझते हैं। इसलिए सभी रिश्ते नाते हमारे समाज से ख़त्म होते जा रहे हैं। इसके बाद महाराज श्री ने "पत्थर की राधा प्यारी" भजन सुनाकर सभी भक्तों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस गीत के द्वारा महाराज श्री ने अपने भक्तों को भगवान की भक्ति को ही भक्त के जीवन का आधार बताया। जिसमें भगवान की सच्ची भक्ति के बिना उस भक्त का सारा जीवन बेकार है। उसे सदा ही सच्चे मन से अपने जीवन को सदा ही अपने प्रभु के चरणों में लगा देना चाहिए। तभी तो उस भक्त के जीवन के सभी पाप मिट सकते है। महाराज श्री ने बताया कि वृंदावन की भूमि हम सब को प्रेम प्रदान करने वाली भूमि है। जो भी भक्त कृष्ण नाम नहीं जपता है उस का जीवन व्यर्थ ही जाता है और जो भक्त कृष्ण नाम जपता है उस का जीवन बड़े ही अच्छे रूप में कटता है। हमें सदा ही संतो की वाणी को अपनाना चाहिए तभी हमारा उद्धार हो सकता है। हमें अपने मन पर सदा ही काबू रखना चाहिए। तभी हम कामयाब हो सकते है। जो व्यक्ति अपने मन पर काबू नहीं रख सकता है वह व्यक्ति कभी भी अपने जीवन में सफल नहीं हो सकता है। महाराज श्री ने बताया कि हमारी मृत्यु सदा ही आनी ही होती है। ये तो परम सत्य है की जिस व्यक्ति का जीवन हुआ है उसकी मृत्यु अवश्य ही होगी। इसलिए हमें अच्छे काम करके अपने जीवन को सफल बना लेना चाहिए। जितने भी भगवान के धाम होते है वैसे ही उसमें पाप और क्रोध भी रहना चाहता है। ये तो आप पर निर्भर करता है की आप किसको अपनाते है। जिसकी मृत्यु आती है उसको भागवत कथा को सुनना चाहिए। पूज्य महाराज श्री ने परीक्षित जी महाराज के प्रसंग को प्रारम्भ करते हुए कहा की जब परीक्षित जी महाराज को पता चला कि सातवें दिन उनकी मृत्यु निश्चित है तो अपना सब कुछ त्याग दिया। राजा परीक्षित ने संतो से पूछा की जिसकी मृत्यु सातवे दिन हो तो उस क्या करना चाहिए? इस पर कोई कहता है भजन करो,कोई कहता है गंगा स्नान करे, किसी संत ने कहा मोन करो, स्मरण करो ध्यान करो, उपासना करो। अनेको संत से उन्हें अनेकों विचार प्राप्त हुए।

9Aug 2017

"जो भी मांगोगे वो मिलेगा, अगर कुछ नहीं मांगोगे तो कृष्ण मिलेंगे।"

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर श्री कृष्ण की जन्मभूमि से परम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने अपने मुखारविंद से प्रथम दिवस की श्रीमद्भागवत कथा का रसपान भक्तों को कराया। महाराज श्री ने अपने भक्तों के साथ कलश यात्रा में भाग लिया है। यहाँ पर महाराज श्री ने कथा शुरू करने से पहले अपने सभी भक्तों के साथ पुरे मंदिर में परिक्रमा की। सबसे पहले महाराज श्री ने हाल में अंदर पहुँचते ही भगवान श्री गणेश की पूजा अर्चना की। उसके बाद महाराज श्री ने भगवान हनुमान जी की पूजा भी की। सबसे पहले महाराज श्री ने वहां पर दीप प्रज्वलित किये तथा बाद में भगवान श्री गणेश के चरणों में पुष्प अर्पित किये। महाराज श्री ने कहा कि हमें सदा ही भगावन की भक्ति में लगे रहना चाहिए। क्योंकि उससे ही हम अपने जीवन को सुचारु रूप से चला सकते है यहाँ महाराज श्री ने बताया की मानव सेवा करना ही भगवान की सेवा करना है। सभी बहन-बेटियों को मेरा साधुवाद जो उन्होंने इस बार भारतीय सभ्यता-संस्कृति की रक्षा हेतु भारतीय राखियों को महत्व दिया। ऐसे ही हम सबने मिलकर भारतीय संस्कारों को बचाना है। यहाँ बैठी सभी माताए, बहने बेटियों को मैं आज कुछ कहना चाहता हूँ। इस समय आस्था चैनल के माध्यम से सोशल मीडिया के माध्यम से जो कोई भी मुझे सुन रहा हैं मैं उनसे एक बात कहना चाहता हूँ की आप सभी को मेरा साधुवाद। आप सभी का धन्यवाद। मेरे एक बार कहने पर आपने भारतीय सभ्यता-संस्कृति की रक्षा हेतु भारतीय राखियों को महत्व दिया। माताऐं घर में सभी त्योहारों, व्रत व परवों को नियम अनुसार करना शुरु करें। सभी संस्कार घर में हो तो बच्चा बहुत जल्द उन से जुड़ता है हमारी पढ़ाई तो बिल्कुल संस्कार विहीन है पर अगर हम अपने घर को भी संस्कारविहीन बना देंगे संस्कार नहीं देंगे तो आने वाली पीढ़ियां धर्म, संस्कृति और बुजुर्गों का सम्मान बिल्कुल भूल जाएंगी फिर वह विदेशियों जैसे बनना चाहेंगे क्योंकि स्कूल की पढ़ाई हमें शुद्ध स्वदेशी नहीं विदेशी बनने की ओर धकेलती है । अगर माताएं सभी संस्कारों को सीख लें, सभी पर्वों पर ब्राह्मण को बुलाकर घर में पूजा पाठ व पर्वों की कथाएं एंव मंत्रोच्चारण हो और ब्राह्मण से कहा जाए कि इसका सार आज की भाषा के अनुसार समझाएं ताकि आज की भाषा के अनुसार पहले बच्चे उसका मतलब समझेंगे, तब जाकर बच्चों का इंटरेस्ट क्रिएट होगा । उसके बाद बच्चा संस्कारों के द्वारा संस्कृत से जुड़ेगा, और जो बच्चा एक बार संस्कृत से जुड़ गया, उसके अंदर यहां की संस्कृति की उत्पत्ति होगी, बीजारोपण होगा। महाराज श्री ने कहा कि हमें सदा ही अपने भगवान की भक्ति में लगे रहना चाहिए। यहाँ पर महाराज श्री ने वेदों के बारे में भी लोगों को बताया। सबसे पहले महाराज श्री ने अपने परमपूज्य गुरुदेव जी का धन्यवाद किया। महाराज श्री ने बताया की जो भी गुरु जी ने हमें बताया है ये बहुत ही मुश्किल से हम सब को प्राप्त होता है। जो भी गुरूजी ने थोड़ा बहुत भी हम सब को ज्ञान दिया है वो हम सब के लिए अनमोल है।महाराज श्री ने बताया कि जब भी कभी हम वृंदावन धाम में जाए तो बिना राधा के वृंदावन की यात्रा अधूरी मानी जाती है। हमें यहाँ पर आकर राधा रानी की सदा ही जयकार करनी चाहिए।

10Aug 2017

"दुःख संसार देता है भगवान तो बस सुख देते हैं।"

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर श्री कृष्ण की जन्मभूमि से परम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने अपने मुखारविंद से द्वितीय दिवस की श्रीमद्भागवत कथा का रसपान भक्तों को कराया। कितना बड़ा संयोग है की हम जन्माष्टमी महा महोत्सव मना रहे हैं इस बार जन्माष्टमी 15 अगस्त को है। इतना ही नहीं देश को आजाद हुए भी 70 साल पुरे हो जाएंगे। तो यह मात्र जन्माष्टमी महोत्सव नहीं है बल्कि देश की आजादी का भी पर्व है। इस बार स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर श्री कृष्ण भगवान् हमे कोई न कोई तो सन्देश देना चाहते होंगे तभी तो स्वतंत्रता दिवस पर जन्माष्टमी का पर्व आया है। हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने स्वच्छ भारत अभियान चलाया है मेरा उन्हें इस अभियान के लिए साधुवाद है। मोदी जी ने टारगेट रखा है की 2019 तक भारत में हर घर में शौचालय बनाना है और देश को शौच मुक्त बनाना है। मेरा यहाँ पर एक सवाल यह भी है की बाहरी स्वछता का लक्ष्य तो हम २-३ साल में पूरा कर लेंगे। लेकिन क्या हम में से कोई आंतरिक स्वच्छता की कोई बात करेगा उसका कोई लक्ष्य निर्धारित करेगा। शायद कोई ऐसा नहीं करने वाला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2017 से 2022 तक संकल्प वर्ष मनाने का संकल्प लेने का आह्वान किया है। पीएम मोदी ने 2017 से 2022 तक देश को न्यू इंडिया बनाने का संकल्प लिया है। मेरा मोदी जी से एक निवेदन है और यहाँ बैठे सभी भक्तों से एक निवेदन है की 2022 में भारत को आजाद हुए 75 साल हो जाएंगे तब हम एक न्यू इंडिया बनाने का संकल्प ले लेकिन वो न्यू इंडिया क्या होगा? वह न्यू इंडिया होगा मेरे देश में संस्कृत भाषा बोली जाए - पढ़ी जाए। देश की संस्कृति को हम सभी अच्छे से जाने, चाहे वो किसी भी धर्म से हो वह अपने धर्म को संस्कृति को जाने, उसे समझे। मेरे देश के सभी युवा, बच्चे, बड़े सभी अपने संस्कारों को जाने और उनका पालन करें। जो हिन्दू है वह गीता पढ़े, रामायण पढ़े, जो मुसलमान भाई है वह कुरआन पढ़े। जब ऐसा होगा तभी हमारा पूर्ण विकास होगा। आज अमेरिका, रूस, यूरोप के देश विकसित देश तो हैं लेकिन क्या वहां के सभी नागरिक भी विकसित है क्या? नहीं है। मेरा सभी से एक ही निवेदन है की देश की 70 साल की आजादी के उपलक्ष्य पर आप सभी ये संकल्प लें की अपने बच्चों को आप संस्कृत, संस्कृति और संस्कार अवश्य देंगे। आजकल के स्कूल में यह सब नहीं सिखाया जाता है। आप सभी को पता है की श्री कृष्ण भगवान् जेल में पैदा हुए थे। और उनके जन्म लेते ही उनके माता पिता की बेड़िया स्वयं खुल गई थी तो इस बार इस महोत्सव में हम यह संकल्प ले की विदेशी शिक्षा की बेड़ियों को हमने तोडना है, उनसे अपने बच्चों को बचाना है। जिस फल में तोते के चोंच लगी होती हैं वो फल मीठा होता हैं ..ये कथा तो स्वयं ही वेद रूपी वृक्ष के फल भगवान शुकदेव जी के मुँह से निकले हुए हैं तो सोचो ये फल कितना मीठा होगा।हर फल में कुछ न कुछ फेकने के लिए होता हैं लेकिन इस कथा रूपी फल में ऐसा कुछ नहीं है फेंकने लायक हो , ये वो फल हैं जो आपके साथ हमेशा रहेंगे।

10Aug 2017

"दुःख संसार देता है भगवान तो बस सुख देते हैं।"

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर श्री कृष्ण की जन्मभूमि से परम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने अपने मुखारविंद से द्वितीय दिवस की श्रीमद्भागवत कथा का रसपान भक्तों को कराया। कितना बड़ा संयोग है की हम जन्माष्टमी महा महोत्सव मना रहे हैं इस बार जन्माष्टमी 15 अगस्त को है। इतना ही नहीं देश को आजाद हुए भी 70 साल पुरे हो जाएंगे। तो यह मात्र जन्माष्टमी महोत्सव नहीं है बल्कि देश की आजादी का भी पर्व है। इस बार स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर श्री कृष्ण भगवान् हमे कोई न कोई तो सन्देश देना चाहते होंगे तभी तो स्वतंत्रता दिवस पर जन्माष्टमी का पर्व आया है। हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने स्वच्छ भारत अभियान चलाया है मेरा उन्हें इस अभियान के लिए साधुवाद है। मोदी जी ने टारगेट रखा है की 2019 तक भारत में हर घर में शौचालय बनाना है और देश को शौच मुक्त बनाना है। मेरा यहाँ पर एक सवाल यह भी है की बाहरी स्वछता का लक्ष्य तो हम २-३ साल में पूरा कर लेंगे। लेकिन क्या हम में से कोई आंतरिक स्वच्छता की कोई बात करेगा उसका कोई लक्ष्य निर्धारित करेगा। शायद कोई ऐसा नहीं करने वाला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2017 से 2022 तक संकल्प वर्ष मनाने का संकल्प लेने का आह्वान किया है। पीएम मोदी ने 2017 से 2022 तक देश को न्यू इंडिया बनाने का संकल्प लिया है। मेरा मोदी जी से एक निवेदन है और यहाँ बैठे सभी भक्तों से एक निवेदन है की 2022 में भारत को आजाद हुए 75 साल हो जाएंगे तब हम एक न्यू इंडिया बनाने का संकल्प ले लेकिन वो न्यू इंडिया क्या होगा? वह न्यू इंडिया होगा मेरे देश में संस्कृत भाषा बोली जाए - पढ़ी जाए। देश की संस्कृति को हम सभी अच्छे से जाने, चाहे वो किसी भी धर्म से हो वह अपने धर्म को संस्कृति को जाने, उसे समझे। मेरे देश के सभी युवा, बच्चे, बड़े सभी अपने संस्कारों को जाने और उनका पालन करें। जो हिन्दू है वह गीता पढ़े, रामायण पढ़े, जो मुसलमान भाई है वह कुरआन पढ़े। जब ऐसा होगा तभी हमारा पूर्ण विकास होगा। आज अमेरिका, रूस, यूरोप के देश विकसित देश तो हैं लेकिन क्या वहां के सभी नागरिक भी विकसित है क्या? नहीं है। मेरा सभी से एक ही निवेदन है की देश की 70 साल की आजादी के उपलक्ष्य पर आप सभी ये संकल्प लें की अपने बच्चों को आप संस्कृत, संस्कृति और संस्कार अवश्य देंगे। आजकल के स्कूल में यह सब नहीं सिखाया जाता है। आप सभी को पता है की श्री कृष्ण भगवान् जेल में पैदा हुए थे। और उनके जन्म लेते ही उनके माता पिता की बेड़िया स्वयं खुल गई थी तो इस बार इस महोत्सव में हम यह संकल्प ले की विदेशी शिक्षा की बेड़ियों को हमने तोडना है, उनसे अपने बच्चों को बचाना है। जिस फल में तोते के चोंच लगी होती हैं वो फल मीठा होता हैं ..ये कथा तो स्वयं ही वेद रूपी वृक्ष के फल भगवान शुकदेव जी के मुँह से निकले हुए हैं तो सोचो ये फल कितना मीठा होगा।हर फल में कुछ न कुछ फेकने के लिए होता हैं लेकिन इस कथा रूपी फल में ऐसा कुछ नहीं है फेंकने लायक हो , ये वो फल हैं जो आपके साथ हमेशा रहेंगे।

21Jul 2017

"धर्म आत्मा का श्रंगार होता है। हमें सदा ही सत्य और सच्चे धर्म का पालन करना चाहिए।"

परम श्रध्देय श्री देवकी नन्दन ठाकुर जी महाराज की जयपुर में आयोजित श्रीमद भागवत कथा में सभी भक्तों को सप्तम दिवस भागवत कथा में भगवान श्री कृष्ण के विवाह का सुन्दर वर्णन श्रोताओं के श्रवण कराया। महाराज श्री ने कहा कि अगर इंसान को किसी भी प्रकार का कष्ट होता है तो भगवान की भक्ति से सभी प्रकार के कष्टों को भक्त दूर कर सकता है। वह इस भक्ति से कठिन से कठिन विपदा को भी दूर कर लेता है। इसलिए हमें सदा ही भगवान की भक्ति सच्चे मन से करनी चाहिए। जिस व्यक्ति भगवान के प्रति सच्चे मन से होती है वह हर विपदा को पार कर लेता है। महाराज श्री ने बताया कि कैसे हम भगवान की भक्ति से अपने सभी कष्टों को दूर कर सकते है। यहाँ महाराज श्री ने भजन श्रवण कराया। इस भजन को सुन कर वहां पर मौजूद सभी भक्तगण झूम उठे। यह भजन था "मेरी बिगड़ी तू बना दे दुनिया बनाने वाले " महाराज श्री ने बताया कि हर भक्त के मन में सदा भगवान के सच्ची भावना होनी चाहिए। जिससे की उस भक्त का आने वाला जीवन सदा अच्छा रहे। यहाँ पर महाराज श्री ने अपने भक्तों को कल्चरल टेरेरिज्म के बारे में भी बताया। हमें सदा ही सच्ची और अच्छी शिक्षा लेनी चाहिए। हमें सदा ही अपने चरित्र को अच्छा बनाना चाहिए। अपने बच्चो को अच्छे स्कूलों में कॉलेजों में भेजना चाहिए। महाराज श्री ने कहा कि जन्माष्टमी पर होने वाले अवसर पर हम लोगों को भारत की सभ्यता से अवगत कराएँगे और लोगों को गुरुकुल में ही ज्यादा से ज्यादा शिक्षा लेनी चाहिए। क्योंकि गुरुकुल की शिक्षा आजकल के स्कूलों की शिक्षा से ज्यादा अच्छी होती है। यहाँ महाराज श्री ने GST के बारे में भी लोगों को बताया। उन्होंने हमें बताया की पूजा के सामान पर किसी भी तरह का टैक्स नहीं होना चाहिए। यहाँ पर देवी देवताओं की मूर्तियों पर किसी भी प्रकार का टैक्स नहीं होना चाहिए।

19Jul 2017

"भगवान प्रेम के बिना नहीं मिलते है। प्रेम से मनुष्य अपने भगवान के दर्शन आसानी से प्राप्त कर लेता है।"

परम श्रध्देय श्री देवकी नन्दन ठाकुर जी महाराज की जयपुर में आयोजित श्रीमद भागवत कथा में सभी भक्तों को पंचम दिवस भागवत कथा में भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुन्दर वर्णन श्रोताओं के श्रवण कराया। महाराज श्री ने कथा प्रारम्भ करते हुए कहा की मनुष्य को सदा ही सत्य का मार्ग अपनाना चाहिए। इस मार्ग पर चल कर ही हम सब अपना जीवन सदा के लिए सफल बना सकते हैं। सत्य पर चल कर हम अपने जीवन की सभी कठिनाइयों को दूर कर सकते है। सत्यवान पुरुष सदा ही अपने जीवन से सबका चहिता बन जाता है। सब उसको प्यार करने लगते है। महाराज श्री ने बताया कि हम कैसे भगवान की भक्ति करके अपने जीवन का उद्धार कर सकते है। हमें सदा ही भगवान की भक्ति में लीन रहना चाहिए। अपने इष्टदेव की सदा ही भक्ति करते रहना चाहिए। ताकि आगे आने वाले समय में हमें किसी भी तरह की समस्या न आये। उसके लिए हमें सदा तैयार रहना चाहिए। हमें अपने जीवन को गोविन्द के चरणों में समर्पित कर देना चाहिए। फिर तो हमारे जीवन के सभी कष्टों को हमारे इष्टदेव गोविन्द जी पल भर में ही दूर कर देंगे और हमें सदा ही अपने जीवन में सत्य और अच्छाई का रास्ता अपनाना चाहिए। ताकि आने वाले समय में हमें किसी भी तरह की कोई परेशानी न आये।

20Jul 2017

"सत्य क्या है? माया से दूर रहना, भगवान के चरणों की सेवा करना ही सत्य है।"

परम श्रध्देय श्री देवकी नन्दन ठाकुर जी महाराज की जयपुर में आयोजित श्रीमद भागवत कथा में सभी भक्तों को षष्टम दिवस भागवत कथा में भगवान श्री कृष्ण की गोपियों संग लीलाओं का सुन्दर वर्णन श्रोताओं के श्रवण कराया। आज महाराज श्री ने "हो मनरो लागे ना सखी, म्हारो घनश्याम के बिना" भजन से कथा प्रारम्भ की। इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने कहा की मोदी जी देश में जीएसटी ले आये हैं उन्हें एक और जीएसटी लाना चाहिए। "गौ सेवा तुरंत" शुरू की जाए। हमारे देश में जितने भी विधायक, सांसद, वकील, जज आदि सबको गाय घर में पालनी चाहिए। महाराज श्री ने कहा की यदि आप 7 दिन तक भागवत कथा मन से श्रवण करते हैं तो आपको माया से विरक्ति और कान्हा में आसक्ति हो जायेगी। कथा का काम है आपको भगवान के चरणों की सेवा में लगा दे ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सत्य का बोध हो जाता है। सत्य क्या है? सत्य है माया से दूर रहना, भगवान के चरणों की सेवा करना यही सत्य है। इस कलयुग में हम कभी भी माया से दूर नहीं जा सकते हैं लेकिन माया को प्रयोग तो करो लेकिन मन में माया ना रखो। गोविन्द को पाना है तो माया को छोड़ना पड़ेगा। इस आत्मा पर, मन पर माया को हावी मत होने दो। महाराज श्री ने कहा श्री कृष्ण ने ब्रजवासियों से कहा की इन्द्र देव की पूजा ना करें और गिरिराज पर्वत की पूजा करें। इस पर देवराज इंद्र क्रोधित हो गए और उन्होंने लगातार कई दिन तक ब्रज में वर्षा की जिससे ब्रज में बाढ़ आ गई। ब्रजवासियों को बचाने के लिए श्री कृष्ण भगवान ने अपनी कनिष्क ऊँगली पर गिरिराज पर्वत को उठा लिया जिसकी शरण में सभी ब्रजवासी आ गए। बहुत वर्षा करने के बाद भी ब्रजवासी सुरक्षित रहे क्योंकि वे सब भगवान श्री कृष्ण द्वारा उठाये गए पर्वत गिरिराज की शरण में थे।

18Jul 2017

कठिन से कठिन समय में मनुष्य को भगवान का श्रवण करते रहना चाहिए

परम श्रध्देय श्री देवकी नन्दन ठाकुर जी महाराज की जयपुर में आयोजित श्रीमद भागवत कथा में सभी भक्तों को चतुर्थ दिवस भागवत कथा में प्रहलाद जी, भगवान के वामन अवतार आदि की लीलाओं का सुन्दर वर्णन श्रोताओं के श्रवण कराया। "तेरी बिगड़ी बना देगा" इस सुन्दर भजन से महाराज श्री ने आज की कथा प्रारम्भ की महाराज श्री ने कहा की व्यक्ति भगवान की भक्ति करके अपने जीवन को सभी प्रकार से सम्पन्न कर सकता है। व्यक्ति को सदा ही सत्य और सच्चाई का मार्ग अपनाना चाहिए। मनुष्य को सदा ही भगवान की भक्ति में लगे रहना चाहिए तभी हमारा जीवन हर प्रकार से सुखी रह सकता है। हमें सदा ही परिश्रम का मार्ग अपनाना चाहिए। हमें कठिनाइयों से कभी भी घबराना नहीं चाहिए। हमें सदा ही भगवन की भक्ति में डूबे रहना चाहिए। हमें प्रह्लाद की तरह ही भगवान की भक्ति करनी चाहिए। कभी भी अपनी भक्ति से नहीं हटना चाहिए। सदा ही सत्य का मार्ग अपनाना चाहिए। भक्त प्रह्लाद की तरह ही कठिनाइयों को झेलते हुए अपनी भक्ति का रास्ता नहीं छोड़ा था और अंत में प्रह्लाद को अपने प्रभु के दर्शन हुए थे और उनका जीवन सफल हो गया था। जो माता गर्भवती होती है उसको कथा जरूर ही सुननी चाहिए। अभिमन्यु ने अपनी माता के गर्भ में ही चक्रव्यूह को तोड़ने का राज जान लिया था। महाराज श्री ने बताया की कैसे भक्त प्रह्लाद ने अनेक कठिनाइयों को झेलते हुए भी अपनी भक्ति नहीं छोड़ी थी उसी तरह ही हमें भी भगवान का अनुशरण करते ही रहना चाहिए। प्रह्लाद को पहाड़ से निचे गिराया गया था और आग में जलाया गया था फिर भी प्रह्लाद ने अपनी भक्ति को नहीं छोड़ा था। प्रह्लाद के विश्वास से ही भगवान ने खम्बे को फाड़ कर राक्षस का वध किया था और अपने भक्त को नरसिंह रूप में दर्शन दिए थे। भगवान ने समय-समय पर अनेक अवतार लेकर अपने भक्तों और इस पृथ्वी का उद्धार किया था। केवल भगवान का नाम रट लेने से ही सब कुछ ठीक नहीं हो जाता है हमें उनका अनुशरण भी करना चाहिए। कितना भी सूंदर मनुष्य हो या स्त्री हो बुढ़ापे में सब नष्ट हो जाता है लेकिन गोविन्द की सुंदरता तो सदा ही बढ़ती ही जाती है और उसकी सुंदरता बढ़ती ही जा रही है। जो व्यक्ति भजन नहीं करता है वो आंतरिक रूप से कमजोर होता है। और जो भजन करता है वो आंतरिक रूप से मजबूत होता है। भगवान की कथा में कभी भी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए और न ही कथा से खाली हाथ आना चाहिए। वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था जिसमे भगवान विष्णु ने एक बौने के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रस्सन करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।“ भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया। शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीति कार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई | देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे। महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।

16Jul 2017

इंसान को अच्छे गुणों को धारण करना चाहिए और बुरे गुणों से दूर रहना चाहिए

"इंसान को ऐसे गुणों को अपनाना चाहिए जिसे लोग पसंद करे, ना की नापसंद।" परम श्रध्देय श्री देवकी नन्दन ठाकुर जी महाराज की जयपुर में आयोजित श्रीमद भागवत कथा में सभी भक्तों को द्वितीय दिवस भागवत कथा में राधा-रानी, भगवान् शुकदेव आदि की लीलाओं का सुन्दर वर्णन श्रोताओं के श्रवण कराया। महाराज श्री ने इस मधुर भजन से कथा प्रारम्भ की "भगवान इतना कीजिये की मुझे अपनी ही भक्ति दीजिये... हे प्रभु आपको मैं न भूल पाऊँ.. माया के बांधों से मैं मुक्ति कैसे पाऊँ.." महाराज श्री ने कहा की श्रीमद भगवत कथा के पहले ही दिन जयपुर में वर्षा हो गयी और सबको राहत मिली। दिल ये जो मांगे वो मिलता हैं और मिलता उन्ही को, जो पाना चाहता हैं। सारे काम प्लानिंग से होते हैं... प्लानिंग ऑफ़ हाउ टू लिव लाइफ, ये सबसे बड़ी प्लानिंग होती है हाउ टू लिव लाइफ - "फ्रॉम बर्थ टू डेथ।" जिंदगी के रास्तो को समझने में समय लगता हैं और जब रास्ते समझ आते हैं तो समय ख़त्म हो जाता है। हमें कथाये अपने बच्चो के साथ सुननी चाहिए। अपने जीवन के महत्त्व को समझे। राजस्थान वीरों की भूमि के साथ-साथ भक्तों की भूमि है। यकीन है की जो औरतें पुराने वस्त्रों में आई हैं उनमें से कोई न कोई मीरा बाई है। जिस समय जीव का भागवत कथा सुनने का मन बनता है उसी समय भगवान उस जीव के कल्याण करने का मन बना लेता है और जिस समय जीव कथा सुनने के लिए पंडाल में आते हैं उसी समय भगवन उनके मन में समां जाता हैं। जिस फल में तोते के चोंच लगी होती हैं वो फल मीठा होता है। ये कथा तो स्वयं ही वेद रूपी वृक्ष के फल भगवान शुकदेव जी के मुँह से निकले हुए हैं तो सोचो ये फल कितना मीठा होगा। हर फल में कुछ न कुछ फेंकने के लिए होता हैं लेकिन इस कथा रूपी फल में ऐसा कुछ नहीं है जो फेंकने लायक हो। ये वो फल हैं जो आपके साथ हमेशा रहेंगे।

17Jul 2017

"ज्ञान कृपा से मिलता है चाहे गुरु कृपा हो या गोविन्द की कृपा हो।"

परम श्रध्देय श्री देवकी नन्दन ठाकुर जी महाराज की जयपुर में आयोजित श्रीमद भागवत कथा में सभी भक्तों को तृतीय दिवस भागवत कथा में कपिल देव जी महाराज की लीलाओं का सुन्दर वर्णन श्रोताओं के श्रवण कराया। महाराज श्री ने "तेरे चरणों की धुल मैं बन जाऊ, है आशा कहीं दुर न जाऊँ ऐसा भक्ति के रंग चढ़ा दे की तेरे बिन एक पल न रहूं। भजन से कथा प्रारम्भ की। पूज्य महाराज श्री ने कहा की कथा को हमें एकाग्रचित होकर सुनना चाहिए और जितने विश्वास के साथ हम भगवान की कथा सुनते हैं उतना ही फल हमें अधिक प्राप्त होता है और दुनिया में कोई भी ऐसा कार्य नहीं है जो भगवान की कथा से बड़ा है। जिसने हमें ये मानव जीवन दिया, जिसका दिया हुआ हम खाते हैं उसी की भक्ति के लिए हमारे पास समय नहीं है। पूज्य महाराज श्री ने परीक्षित जी महाराज के प्रसंग को प्रारम्भ करते हुए कहा की जब परीक्षित जी महाराज को पता चला कि सातवें दिन उनकी मृत्यु निश्चित है तो अपना सब कुछ त्याग दिया। राजा परीक्षित ने संतो से पूछा की जिसकी मृत्यु सातवे दिन हो तो उस क्या करना चाहिए? इस पर कोई कहता है भजन करो,कोई कहता है गंगा स्नान करे, किसी संत ने कहा मोन करो, स्मरण करो ध्यान करो, उपासना करो। अनेको संत से उन्हें अनेकों विचार प्राप्त हुए। उसी समय भगवान नारद के आदेश पर भगवान शुकदेव जी वहाँ पर पधारें। उनके मुख पर बहुत तेज था सभी संतो ने उनको प्रणाम किया। मेरा सभी बच्चों से निवेदन है की जब भी आपके घर में आये उनका खड़े होकर प्रणाम कर सम्मान करना चाहिए। भारत की संस्कृति है "अतिथि देवो भवः" अतिथि भगवान के समान है। मेरा सभी माताओं और बहनों से निवेदन है की आपके घर में जब भी कोई अतिथि आये तो उनका सम्मान करें पता नहीं भगवान कब मेहमान बन आपके घर आ जाए। यह सब तभी संभव है जब आप अपने बच्चों को संस्कार दोगे। शुकदेव जी महाराज जब आये तब राजा परीक्षित ने उन्हें साष्टांग दंडवत प्रणाम किया। और शुकदेव जी से पूछा जिसकी मृत्यु निश्चित हो उसे क्या करना चाहिए और मृत्यु हमारे जीवन का कटु सत्य है। हम इस संसार में खाली हाथ आए थे और खाली हाथ ही जायंगे। यह पता होने के बावजूद भी हम अपना सारा जीवन सांसारिक भोगविलास में गुजार देते हैं और प्रभु ने हमें जिस कार्य के लिए मानव जीवन दिया है उससे हम भटक जाते हैं। शुकदेव जी ने परीक्षित जी महाराज से कहा हे राजन जिस की मृत्यु निश्चित हो उसे भागवत कथा श्रवण करनी चाहिए। उसी प्रकार हमें भी सच्चे मन से भागवत कथा श्रवण करनी चाहिए और भगवान की भक्ति करनी चाहिए।

15Jul 2017

"भगवान का भजन सबसे बड़ा धर्म है"

परम श्रध्देय श्री देवकी नन्दन ठाकुर जी महाराज की जयपुर में आयोजित श्रीमद भागवत कथा में सभी भक्तों को प्रथम दिवस भागवत कथा में करमेती बाई, मीरा बाई, आत्मदेव आदि की लीलाओं का सुन्दर वर्णन श्रोताओं के श्रवण कराया। अमरनाथ यात्रा के दौरान आतंकवादी हमला कर 7 श्रद्धालुओं की जान ले ली गई। तीन अलग अलग जगहों पर आतंकियों ने अमरनाथ यात्रियों के जत्थे पर सबसे कायराना और क्रूर हमला किया। निहत्थे श्रद्धालु जिनकी जुबान पर भोले का भजन और हाथों में पूजा-आरती का समान था उन पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसा दी गईं। उनका कसूर सिर्फ इतना था कि वो कभी जन्नत रही घाटी के रास्तों से अपने भोलेनाथ के दर्शन करने बिना खौफ जा रहे थे क्योंक वो भक्ति में डूबे थे और आस्था में लीन थे। अमरनाथ यात्रियों से भरी बस पर आतंकियों ने फायरिंग की। दहशतगर्दों का न कोई मुल्क है और न मज़हब. लेकिन कम से कम ये आतंकी इतना तो जान लेते कि जिस अमरनाथ गुफा में महादेव के दर्शन के लिये यात्री रवाना हुए हैं उस मंदिर को ढूंढने वाला कोई काफिर नहीं बल्कि एक गडरिया मुसलमान ही था। अमरनाथ गुफा को करीब 500 साल पहले खोजा गया था और इसे खोजने का श्रेय एक मुस्लिम, बूटा मलिक को दिया जाता है। बूटा मलिक एक गड़रिए थे। पहाड़ पर ही भेड़-बकरियां वगैरह चराते थे। वहां उनकी मुलाकात एक साधु से हुई और दोनों की दोस्ती हो गई। एक बार उन्हें सर्दी लगी तो वो उस गुफा में चले गए। गुफा में ठंड लगी तो साधु ने उन्हें एक कांगड़ी दिया जो सुबह में सोने की कांगड़ी में तब्दील हो गया।

12Jul 2017

गुरु पूर्णिमा महोत्सव "युवा शांति सन्देश"

गुरु पूर्णिमा की संध्या को युवा शांति संदेश में पूज्य महाराज श्री ने युवा पीढ़ी को धर्म के प्रति जवाबदेह बताते हुये कहा कि हमारे युवा सनातन धर्म और देश का भविष्य हैं। आधुनिकता का ताना देकर इन्हें दोषी मानकर छोड़ा नहीं जा सकता। युवा शक्ति केवल तब तक ही अदृश्य रहती है जब तक कि उन्हें जीवन के असली अर्थ से परिचित ना कराया जाये। यह जिम्मेदारी गुरू के साथ-साथ माता-पिता की भी बनती है। जिसने भागवत न सुनी हो, जिसने रामायण का सार न समझा हों उसे आध्यात्म का मर्म कैसे पता चलेगा। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

12Jul 2017

गुरु पूर्णिमा महोत्सव (प्रथम दिवस)

ठा. प्रियाकांत जू मंदिर, शांति सेवा धाम, वृन्दावन में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में "गुरु पूर्णिमा महोत्सव" में गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर महाराज श्री से दीक्षा लेने के लिए 2-3 दिन पहले से हजारों भक्त आश्रम में आ गए थे।

12Jul 2017

गुरूपूर्णिमा महोत्सव (प्रथम दिवस) - गुरूकृपा के लिये शिष्य में श्रद्धाभाव जरूरी

ठा. प्रियाकान्तजू मंदिर पर दो दिवसीय गुरू पूर्णिमा महोत्सव का प्रारम्भ हुआ। श्रोताओं को सम्बोधित करते हुये पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने गुरू और शिष्य का सम्बन्ध बताया। उन्होने कहा मनुष्य जीवन का एक मात्र लक्ष्य परमात्मा से मिलन कर मोक्ष की प्राप्ति है और इस आत्मा को परमात्मा से मिलाने का माध्यम गुरू है। परमात्मा की ओर ले जाने वाले सद्मार्ग से भटके हुये लोगों को राह दिखाने का कार्य गुरू करता है। उन्होने कहा कि जन्म-जन्म के बंधन से मुक्त होने के लिये ही यह मानव जीवन मिला है। गुरू द्वारा दिया गया मंत्र ही जीव को कठिनाईयों से मुक्त करता है। अगर गुरूमंत्र में श्रद्धा ना हो तो उसे ग्रहण नहीं करें अन्यथा प्राणी पाप का भागी होता है। गुरू निस्वार्थ होना चाहिये तो शिष्य के लिये श्रद्धा का भाव जरूरी है। जो निस्वार्थ है, परमार्थ है वही गुरू है। इससे पूर्व प्रातः देश-विदेश से आये श्रद्धालुओं ने ठा. प्रियाकान्तजू भगवान के दर्शन कर गुरू पूजन किया। श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने उन्हें कंठी धारण कराकर गुरूदीक्षा प्रदान की। शांति सेवा सभागृह में आर्शीवचन में भक्तों ने अच्छाई के मार्ग पर चलने की सीख ग्रहण की। ठा. प्रियाकान्तजू मंदिर कल पुर्णिमा की रात्रि 8 बजे से प्रातः मंगला आरती तक महासंकीर्तन आयोजित होगा। श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के साथ प्रसिद्ध भजन गायिका अलका गोयल, राजकुमार लक्खा, पूरन पागल आदि विभिन्न भजन गायक अपनी मधुर वाणी से भगवान के प्रति भक्तों की मूक वन्दना को भावों के स्वर प्रदान करेगें। इस अवसर पर एचपी अग्रवाल, रामधन वशिष्ठ, महेश कुमावत, अनिल त्यागी, प्रवीन कुमार, बनवारी, श्यामसुन्दर शर्मा, अजय, मुरारी, रवि रावत आदि उपस्थित रहे ।

12Jul 2017

हजारों भक्तों ने पूरी रात अपने प्रिय ठा. प्रियाकांत जू के सानिध्य में किया महासंकीर्तन

ठा. प्रियाकान्तजू मंदिर पुर्णिमा की रात्रि 8 बजे से प्रातः मंगला आरती तक महासंकीर्तन आयोजित किया गया। श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के साथ प्रसिद्ध भजन गायिका श्रीमती अलका गोयल जी, श्री राजकुमार लक्खा जी, श्री पूरन पागल जी, श्री गोपाल जिंदल जी, श्रीमती मीनू शर्मा जी, श्री तिलक वर्मा जी, सुश्री संध्या तोमर जी आदि विभिन्न भजन गायक अपनी मधुर वाणी से भगवान के प्रति भक्तों की मूक वन्दना को भावों के स्वर प्रदान किये। जिसे सुन कर भक्त मंत्रमुग्ध हो गये। इस अवसर पर महाराज श्री ने कहा की जो कोई भक्त 11 पूर्णिमा लगातार ठा. प्रियाकांत जू मंदिर में अपनी हाजिरी लगाता है उसकी हर इच्छा पूर्ण होती है। भक्तों ने कई बार बताया है की उन्हें तो मात्रा 1-2 या 3 पूर्णिमा की हाजिरी में ही इच्छा पूर्ण हो गई। इस अवसर पर संस्था के सचिव श्री विजय शर्मा जी, श्री एचपी अग्रवाल जी, श्री धमेन्द्र कुमार जी, श्री धन्नू भईया जी, श्री प्रवीन कुमार जी, श्री जगदीश वर्मा जी , श्री रवि रावत जी, श्री विष्णु शर्मा जी, श्री शंकर लाल एम कुमावत जी, श्री कीर्ती सिंघल जी, श्री गजेंद्र चौहान जी आदि उपस्थित रहे।

8Mar 2017

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के तहत 125 गरीब कन्याओं को दी गई राशि

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर पूज्य महाराज श्री ने 125 गरीब कन्याओं को शिक्षा हेतु प्रति कन्या 5100 रूपए की सहयोग सेवा राशि ट्रस्ट के द्वारा प्रदान की। गत वर्ष 8 फरवरी 2016 को भी श्री प्रियाकान्त जू मन्दिर के उदघाटन के अवसर पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह जी के हाथों से विश्व शान्ति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के द्वारा 125 गरीब कन्याओं को प्रति कन्या साईकिल एवं शिक्षा हेतु 5100 रूपए की सहयोग सेवा राशि ट्रस्ट के द्वारा प्रदान की गई थी।

2Feb 2017

श्री श्याम शरण देव जी महाराज बने निम्बार्क पीठ के 49वें जगद्गुरु

परम पूज्य निम्बार्कपीठ जगद्गुरु श्री श्यामशरणदेव जी महाराज का जगद्गुरु पदाभिषेक बसंत पंचमी के पावन अवसर पर प्रातः 11.30 बजे किया गया। इसी के साथ वे निम्बार्क पीठ के 49वें जगद्गुरु बन गए है। आज उन्हें श्री "श्रीजी महाराज" की उपाधि भी दी गई। सांय के समय में श्री "श्रीजी महाराज" के पदाभिषेक के अवसर पर बाबा श्री रामदेव जी, परम् पूज्य श्री देवकी नंदन ठाकुर जी महाराज जी, राजस्थान की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे सिंधिया जी आदि पहुंचे। इसी के साथ सांय में भोजन-प्रसाद के कार्यक्रम साथ यह तीन दिवसीय पूण्य समारोह सम्पन्न हुआ।

25Jan 2017

प्रथम पाटोत्सव पर संत सम्मलेन

श्री प्रियकांत जू भगवान के प्रथम पाटोत्सव पर आशीर्वाद देने पहुचे बृजभूमि के दिव्य संत 5 घंटे से ज्यादा मंच पर मौजूद रहे। उन्होंने श्रद्धालुओं को अपने प्रवचनों से मंत्र मुग्ध करने के साथ-साथ पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज को ढेरों बधाईयाँ और अपना आशीर्वाद भी देते रहे। पाटोत्सव की कुछ यादगार झलकियां अगले कुछ दिनों तक हम आपके साथ साझा करते रहेंगे।

26Jan 2017

पूज्य महाराज श्री ने स्कूल के बच्चों के साथ मनाया गणतंत्र दिवस

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महारज ने आज गणतंत्र दिवस के अवसर पर श्री जी बाबा सरस्वती विद्या मंदिर स्कूल, मथुरा में ध्वजारोहण किया। महाराज श्री ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम की शुरुवात की। पूज्य महाराज श्री ने कहा की प्यारे-प्यारे बच्चों को, देश के होनहारों को, देश के इन छोटे-छोटे गणों को, मासूम से मनो को गणतंत्र दिवस की बहुत-बहुत बधाई। आओ मेरे साथ तीन बार बोलो जय हिन्द.....जय हिन्द........जय हिन्द। आप देश का भविष्य हो, मेरे सामने जितने भी नन्हे-नन्हे हाथ हैं। मैं महसूस कर रहा हूँ कि ये देश का भविष्य बनाने के काम आएंगे, आपकी मासूम आँखों में मैं भारत की सुनहरी तस्वीर देख पा रहा हूँ। हे नन्हे वीरों आने वाले दिनों में आपके कन्धों पर यह ज़िम्मेदारी है की आप देश की प्रगति करें, अपनी संस्कृति को पूरे विश्व में फैलाएं व धर्म की रक्षा करें क्योंकि आपका जन्म ब्रज भूमि पर हुआ है तो आपकी ज़िम्मेदारी और बढ़ जाती है क्योंकि पूरा विश्व ब्रज भूमि से प्रेरणा लेने के लिए आता है। मेरा आपको शुभ आशीर्वाद और एक बार फिर से गणतंत्र दिवस की बहुत-बहुत बधाई।

27Jan 2017

महाराज श्री ने श्री प्रियाकांत जू भगवान के भक्तों को दिया उपहार

प्रथम पाटोत्सव के पावन अवसर पर पूज्य महाराज श्री ने अपने भक्तों के लिए मासिक पत्रिका का विमोचन देश की दिव्य आत्माओं, दिव्य संतों के साथ किया। अब सभी भक्त श्री प्रियाकांत मंदिर, पूज्य महाराज श्री एवं विश्व शान्ति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट की सभी जानकारी इस पत्रिका के द्वारा जान पाएंगे। इस पत्रिका में भारतवर्ष की संस्कृति, संस्कार, संतानत धर्म के गूढ़ बातें और महाराज श्री के सन्देश भी पढ़ पाएंगे। यदि आप भी इस पत्रिका के पाठक बनना चाहते है और अपने घर बैठे मंगवाना चाहते हैं तो आप ऑनलाइन भी बुक कर सकते हैं। नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें और पत्रिका को अभी बुक करें। आइये इस पत्रिका से जाने अपनी संस्कृति और संस्कार के बारे में।

17Jan 2017

Facebook LIVE Question Answer

Facebook LIVE Question Answer

11Jan 2017

Media

मीरापुर मैं श्रीमद्भागवत कथा के दौरान बोले कथावयास देवकी नंदन ठाकुर जी

11Jul 2017

अब आपको रोज नित्य सुबह प्रियकांत जू भगवान का संदेश मिलेगा आपके फोन पर।

आपकी हर सुबह सूहानी हो। आपका हर दिन शुभ हो।। अब आपको रोज नित्य सुबह प्रियकांत जू भगवान का संदेश मिलेगा आपके फोन पर। जिसे स्वयं पूज्य महाराज श्री भेजेंगे आपको पूज्य श्री महाराज का सन्देश प्राप्त करने के लिए आप ये नंबर सेव कर लिजिए और आपको सन्देश प्राप्त हो उसके लिए आप अपना नंबर, नाम, शहर का पता, ईमेल आईडी सहित भेज दीजिये।

11Jul 2017

श्री प्रियाकांतजू भगवान जी की संध्या आरती के लाइव दर्शन करें

जिनके दर्शन मात्र से हो जाता है सभी दुखों का नाश, मिट जाते है सभी कष्ट, ऐसे हैं भगवान श्री प्रियाकांतजू। अपने नेत्रों से हृदय में उतारें कष्ट हरने वाले श्री प्रियाकांतजू भगवान जी की संध्या आरती के लाइव दर्शन करें, आप सभी भक्त प्रियाकांतजू भगवान के दर्शन फेसबुक के पेज पर देख सकते है। यह आप आज से यानि 9.4.2016 से शाम को 7:30 बजे देख सकते है।