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18Mar 2019

“दुनिया की हर चीज झूठी है केवल भगवान का भजन सच्चा है"

“दुनिया की हर चीज झूठी है केवल भगवान का भजन सच्चा है"

विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 13 मार्च से 20 मार्च तक प्रतिदिन विश्व शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड, वृंदावन में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं होली महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

कथा प्रारंभ से पूर्व आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर 125 कन्याओं की शिक्षा हेतु 6 लाख 37 हजार रूपए की राशि विश्व शांति मिशन की ओर से दी गई ताकी किसी भी बच्ची को शिक्षा का अभाव ना रहे। मिशन द्वारा लगातार चौथे वर्ष यह राशि कन्याओं की शिक्षा के लिए दी गई।

पूज्य महाराज श्री ने कथा में देश के पूर्व रक्षा मंत्री एवं गोवा के मुख्यमंत्री श्री मनोहर पर्रिकर जी के देहांत पर शोक संवेदना व्यक्त करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा कि आज के युग में ऐसा नेता मिलना बहुत मुश्किल है, देश ने एक बेहतरीन राजनेता को खो दिया। प्रभु से प्रार्थना करता हूं की उस दिव्य आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें और अगर उनका दोबारा जन्म हो तो फिर से उन्हें भारत में ही भेजना, फिर से एक बेहतरीन राजनेता बनाना ऐसी कृपा करना ।

महाराज श्री ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि ठाकुर जी का बहुत ही सुंदर फाग उत्सव चल रहा है, आज फाग के उत्सव में बहुत ही सुंदर कार्य हुआ, 125 कन्याओं की शिक्षा के लिए सेवा राशि दी गई। इस दुनिया में मैं और मेरे के लिए तो सब सोचते हैं, लेकिन बहुत बड़ा कार्य ही किसी ओर के लिए करना। संसार में गैर तो कोई भी नहीं है लेकिन जिन को आवश्यकता है उन तक हमारी सेवा पहुंच जाए ये बहुत बड़ी बात है।

महाराज श्री ने आगे कहा कि जिस समय भगवान व्यक्ति को जैसा बनाते हैं वो वैसा बन जाता है, इसलिए ये बात ध्यान रखें की काला वो नहीं जिसका रंग काला है, काला वो है जिसने भगवान का भजन नहीं किय़ा। भगवान का भजन नहीं कियो तो आप मरे के समान हो, दुनिया की हर चीज झूठी है भगवान का भजन सच्चा है। जब इंद्र को झूकना पड़ा था, ब्रह्मा को भी पछताना पड़ा था तो हमारी औकात 
क्या है ?

महाराज श्री ने कहा कि जब तक हम और आप संसार में सुख ढूंढ़ते रहेंगे तब तक दुखी रहेंगे, सुखी तब होंगे जब प्रियाकांत जू के चरणों में सुख की तलाश करेंगे तो निश्चित सुखी होने लग जाएंगे। पूर्ण आनंद केवल परमात्मा के चरणों में है इसलिए गोपियां परमात्मा को प्राप्त करने के लिए रास में सम्मितिल होने के लिए जाती थी।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है।

कथा का आयोजन विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है। कथा पंडाल में 108 भागवत कथा के यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

 

19Mar 2019

“भागवत स्वयं कल्पवृक्ष है”

“भागवत स्वयं कल्पवृक्ष है”

विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 13 मार्च से 20 मार्च तक प्रतिदिन विश्व शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड, वृंदावन में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं होली महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि महराज श्री ने बताया की जहा हम यज्ञ और हवन करते है वहा कुछ आसुरी शक्तियां विघ्न पहुंचाने का कार्य करती है लेकिन जिस धरती पर हम बैठे है जिनकी कथा हम सुन रहें है ये दोनों साधारण नहीं है। क्यूंकि ये जो जगह है जहा पर आप बैठे है ये स्थान भक्तो की भक्ति से ओतप्रोत स्थान है और खुद श्री प्रियकांत जू महाराज यहां पर विराजमान है। श्रद्धा से सुनी हुई भागवत आपके मनोरथ को पूर्ण करती है। साथ ही बताया की पूर्णिमा की रात अगर हम श्री कृष्ण के धाम में व्रत रख कर इस उत्सव को मनाये तो ठाकुर जी स्वयं आपकी इच्छाओं को पूर्ण करते है। जीवन में एक बार जो यजमान बनकर श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन कराता है उसकी पंद्रह पीढ़ियां तर जाती है। श्रीमद भागवत कथा आपके जीवन के कल्याण का सबसे सर्वश्रेष्ठ साधन है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई।

बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया।

उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की। 
कथा का आयोजन विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है। कथा पंडाल में 108 भागवत कथा के यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

20Mar 2019

होली के पावन अवसर पर आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर के प्रांगण में होली महोत्सव मनाया गया।

होली के पावन अवसर पर आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर के प्रांगण में होली महोत्सव मनाया गया। जिसमें देश-विदेश से हजारों भक्त मौजूद रहे। इस अवसर पर भगवान ठा. प्रियाकान्त जू के दर्शन करने और पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में होली मनाने के लिए भक्त सुबह से ही प्रागण में एकत्रित होने लग गए, प्रातः 7 बजे से मंदिर में हजारों भक्त पहुंच गए थे। महोत्सव की शुरूआत महाराज श्री द्वारा ठा. प्रियाकांत जू भगवान को रंग लगाकर की गई। उसके पश्चयात विभिन्न कलाकारों ने अपनी प्रस्तुती दी जिसपर भक्त खूब जमकर झूमे और होली का उत्सव मनाया।

महाराज श्री ने महोत्सव की शुरूआत में सर्वप्रथम देश विदेश में रह रहे सभी भक्तों को होली की शुभकामनाएं दी। उसके बाद महाराज श्री ने एक सुंदर भजन रसिया की रसिली बन गई का भक्तों को श्रवण कराया जिसपर सभी भक्त झूमते नाचते हुए होली के रंग उडाकर होली मनाने लगे।

महाराज श्री ने होली पर नशा ना करने का संदेश देते हुए कहा कि ये होली प्रेम का उत्सव है इसे नशा करके बर्बाद ना करें। होली का त्यौहार प्रेम से भरा हुआ है, इसे प्यार से मनाएं, एक दूसरे पर रंग गुलाल लगाएं, पुरानी दुश्मनी को भुलाएं और प्यार से अपने जीवन की यात्रा प्रारंभ करें। ये जीवन छोटा सा है इसे दुश्मनी करके बर्बाद ना करें।

होली महोत्सव के इस अवसर पर पूज्य महाराज श्री के सुपुत्र देवांश जी ने भी होली के एक सुंदर भजन प्रियाकांत जू ने अपनी कर डारी होली में की प्रस्तुती दी जिसका वहां मौजूद सभी भक्तों ने आनंद लिया। 
इसके बाद बृज गोपियों कवितो की होली, लठ-मार होली, फूलों की होली, लड्डुओं की होली, रंग-गुलाल की होली मनाई गई। इसके बाद महाराज श्री ने पिचकारी से सभी भक्तों पर भक्ति का रंग डाला लगभग 70-80 फ़ीट की ऊंचाई से इस पिचकारी की बौछार भक्तो पर पड़ रही थी।

राधे - राधे बोलना पड़ेगा !!

9Mar 2019

“भागवत कथा श्री कृष्ण से प्रेम उत्पन्न कराती है”“प्रेम वो नदी है जो हर जगह से रास्ता बना कर निकल जाती है”इंदौर के माँ कनकेश्वरी धाम, मदन महल गार्डन के पास, आई.टी.आई रोड़ में रमेश मेंदोला मित्र मंडल एवं सहयोग विश्व शांति सेवा समिति, इंदौर के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 मार्च से 11 मार्च 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

“भागवत कथा श्री कृष्ण से प्रेम उत्पन्न कराती है”
“प्रेम वो नदी है जो हर जगह से रास्ता बना कर निकल जाती है”

इंदौर के माँ कनकेश्वरी धाम, मदन महल गार्डन के पास, आई.टी.आई रोड़ में रमेश मेंदोला मित्र मंडल एवं सहयोग विश्व शांति सेवा समिति, इंदौर के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 मार्च से 11 मार्च 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के पंचम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। पंचम दिवस के कथा की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि जो कृष्ण की बाल लीला को सुनता है उनके हृदय में कृष्ण भक्ति कृष्ण प्रेम उत्पन्न होता है। भागवत कथा श्री कृष्ण प्रेम उत्पन्न कराती ही है। भगवान् की कृपा जब हम पर होती है तभी जीव भगवान् की कथा में अपना मन लगा पाता है। अगर आपको कभी ठाकुर जी कृपा का अनुभव हो तो आप उसको गोपनीय रखें उसको दुनिया को न बताये क्यूंकि जीवन में कुछ ऐसी बाते भी होती है जिनको गुप्त रखना जरुरी है लेकिन कलयुग का व्यक्ति आज के समय में उल्टा चलता है और वो अपने यश और सम्मान के लिए अपनी सारी अच्छी अच्छी बाते दुनिया को बता देता है और अपनी सारी बुरी आदतों को छुपा लेता है।

महाराज श्री ने आगे कहा कि संतो की माने तो भजन करने वाले व्यक्ति को भक्ति ऐसी करनी चाहिए जिससे की सामने वाले को कुछ पता भी न चले। क्यूंकि अगर आपको कोई अनुभव हुआ है ठाकुर जी की कोई कृपा आप पर हुई है तो आपको उसका गीत दुनिया के आगे गाने की कोई आवश्यकता नहीं है क्यूंकि जिनसे आपको प्रेम हुआ है वो सब कुछ जानते है।

महाराज श्री ने कहा कि हमें स्मरण भी ऐसा करना चाहिए की सामने वाला उसके बारे में जान भी न पाए और उसका अभ्यास करने का तरीका होता है की पहले आप अपने मुख से फिर होंठो से उसके बाद अपने कंठ से और फिर हृदय से स्मरण करे और जब एक बार आपका स्मरण मजबूत हो जायेगा तो आपके रोम- रोम से बस वही नाम निकलता है जिसके लिए आप प्रयासरत है और यही है प्रेम की पराकास्ठा, लेकिन इस प्रेम को दुनिया को बताएं नहीं अपने दिल में रखें।

महाराज श्री ने कहा कि मानव का जीवन हमें सोने के लिए नहीं बल्कि जागने के लिए मिला है यही कारण है की हम लोग जागरण करते है और जो लोग जागरण करते है उन्हें उतना ज्यादा फल मिलता है। और जिस दिन तुम्हे हृदय से कन्हैया से प्रेम हो जायेगा तो तुम्हे ये जग छोड़ना नहीं पड़ेगा अपने आप छूट जायेगा। क्यूंकि जो तुम्हे आज भक्ति करने से रोकते है एक दिन वही आपको शमशान में जाकर जला के आएंगे। आप जब मीरा की तरह ठान लेंगे की मेरा कोई नहीं है तो ईश्वर की भक्ति करने से आपको कोई नहीं रोक सकता क्यूंकि प्रेम वो नदी है जो हर जगह से रास्ता बना कर निकल जाती है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराजा ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।
श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन रमेश मेंदोला मित्र मंडल एवं सहयोग विश्व शांति सेवा समिति द्वारा किया जा रहा है। कथा पंडाल में यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

8Mar 2019

"संसार की सबसे बड़ी शक्ति है महिलाएं”इंदौर के माँ कनकेश्वरी धाम, मदन महल गार्डन के पास, आई.टी.आई रोड़ में रमेश मेंदोला मित्र मंडल एवं सहयोग विश्व शांति सेवा समिति, इंदौर के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 मार्च से 11 मार्च 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।

"संसार की सबसे बड़ी शक्ति है महिलाएं”

इंदौर के माँ कनकेश्वरी धाम, मदन महल गार्डन के पास, आई.टी.आई रोड़ में रमेश मेंदोला मित्र मंडल एवं सहयोग विश्व शांति सेवा समिति, इंदौर के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 मार्च से 11 मार्च 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

आज कथा पंडाल में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव श्री कैलाश विजयवर्गीय जी ने भी अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया, संस्था की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। श्री कैलाश विजयवर्गीय जी ने राधा रानी को समर्पित सुंदर भजन की भी प्रस्तुति दी जिसपर सभी भक्त खूब झूमे।

इसके अलावा टीवी सीरियल तारक मेहता का उल्टा चश्मा में अय्यर का किरदार निभाने वाले श्री तनुज महाशब्दे जी ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाकर महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया, संस्था की ओर से उन्हे स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

कथा में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर इंदौर को स्वच्छ भारत में नंबर वन बनाने में अभिन्न भूमिका निभाने वाली मातृशक्ति समस्त सफाई कर्मचारियों को भी महाराज श्री द्वारा सम्मानित किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए महिला दिवस के पावन अवसर पर विश्व की सभी मातृशक्ति को व्यास पीठ से नमन किया और बताया की देवियों के बिना सृष्टि की कल्पना करना भी पाप है। परमात्मा की सबसे खूबसूरत रचना हमारी माताएं बहने और बेटियां है, किसी भी सफल पुरुष के पीछे भी एक महिला का हाथ होता है जो सब कुछ सहती है और अपने पति को आगे बढ़ने का मौका देती है। साथ ही इस समाज और संसार की सबसे बड़ी शक्ति हमारी माताएं बहने है क्यूंकि कभी न कभी किसी न किसी रूप में आकर हमें ऊर्जा प्रदान करती है चाहे वो हमारी माता का रूप हो या फिर हमारी बहन या धर्म पत्नी का रूप हो। 
महाराज श्री ने महिला दिवस के अवसर पर सभी महिलाओं से निवेदन किया की अपने बच्चों को थोड़ा ज्ञान और ऊर्जा दें ताकि आज का जो युवा है वो कही न कही सही मार्ग से भटका हुआ है उस भटके हुए को मार्ग पर लाने के लिए उन्हें थोड़ा ज्ञान देने की आवश्यकता है और ये बदलाव पुरे विश्व में सिर्फ आप ही के द्वारा ही हो सकता है।

महाराज श्री ने बताया की जिनके घर बड़े- बड़े होते है उनमे सफेद मार्बल बिछा होता है वो घर स्वर्ग नहीं होते है बल्कि जिन घरो में बच्चे ग से गधा नहीं गणेश, र से रथ नहीं राम, क से कृष्ण और स से सत्य पढ़ते है वो घर स्वर्ग होते है। तो चलिए आईये हम सब वचन लें और आने वाली पीढ़ी को सद्मार्ग पर चलना सिखाएं ताकि हमारे घर भी स्वर्ग बन सकें।

महाराज श्री ने कथा के क्रम को आगे बढ़ाते हुए कहा की हमें भजन नदी के तट पर नहीं बल्कि नदी के किनारे करना चाहिये क्यूंकि नदी के तट पर आगंतुकों का आना जाना लगा रहता है और जहा लोगों का आना जाना लगा रहता है वहां भजन में व्यवधान आता है और भजन करने में मन नहीं लगता। भजन करने के लिए दो सर्वश्रेस्ठ स्थान है या तो पर्वत की चोटी या फिर जंगल में किसी नदी का किनारा क्यूंकि वहां लोगों का आना जाना कम होता है और जीव शान्ति के साथ भजनो में मन लगकर भक्ति कर सकता है और यही कारण था की हमारे ऋषि मुनि पर्वत की चोटी या फिर जंगल में जाकर साधना किया करते थे। इसलिए हमें साधु संतो और भक्तों का सदैव आदर करना चाहिए क्यूंकि आप इनका जितना आदर करेंगे उतना ही आपके कल्याण के लिए अच्छा है क्यूंकि ना जाने कौन से संत आपको अपनी बरसो की तपश्या का फल देकर तुम्हारे जीवन को धन्य कर दें।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।

महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।

शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।

इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।

महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।

महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।
दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।
महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"

भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन रमेश मेंदोला मित्र मंडल एवं सहयोग विश्व शांति सेवा समिति द्वारा किया जा रहा है। कथा पंडाल में यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

7Mar 2019

“ जिसके विचार श्रेष्ठ है वही जीव श्रेष्ठ है”इंदौर के माँ कनकेश्वरी धाम, मदन महल गार्डन के पास, आई.टी.आई रोड़ में रमेश मेंदोला मित्र मंडल एवं सहयोग विश्व शांति सेवा समिति, इंदौर के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 मार्च से 11 मार्च 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया ।

“ जिसके विचार श्रेष्ठ है वही जीव श्रेष्ठ है”

इंदौर के माँ कनकेश्वरी धाम, मदन महल गार्डन के पास, आई.टी.आई रोड़ में रमेश मेंदोला मित्र मंडल एवं सहयोग विश्व शांति सेवा समिति, इंदौर के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 मार्च से 11 मार्च 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया ।

कथा के तृतीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि कोई भी व्यक्ति न अपने बैंक बैलेंस से बड़ा होता है, न अपने पद से बड़ा होता है और ना ही अपने परिवार से बड़ा होता है। अगर कोई व्यक्ति बड़ा होता है तो वो अपने विचारों से बड़ा होता है। व्यक्ति के विचार जितने श्रेष्ठ होंगे वो उतनी ही प्रगति करता है उसका आचरण वैसा ही होता है। इसलिए हमारे पूर्वज कहते है की सादा जीवन उच्च विचार। लेकिन आजकल लोग इससे उल्टा करते है जीवन को जीने में कोई कसर नहीं छोड़ते और विचार ऐसा रखते है की अपने आप को बड़ा बनाने के चक्कर में किसी को कुछ भी कह देते है और अपने आप को बड़ा बनाने का ही विचार हमेशा मन में रखते है। लेकिन हो सकें तो जीवन में कभी किसी का अपमान न करें क्यूंकि अगर आप जब कभी किसी का अपमान करते है तो उसके अपमान के साथ- साथ आप अपने माता -पिता और उनके द्वारा दिए हुए संस्कारों का भी अपमान करते है। अपमान करके कोई भी व्यक्ति बड़ा नहीं बना है जो भी लोग श्रेष्ठ बने है वो किसी का सम्मान करके ही बने है इसलिए आप सबको अपने कर्म ऊपर करने चाहिए ।

क्रम को आगे बढ़ाते हुए महाराज श्री ने बताया की संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है इसलिए हमें संस्कृत भाषा का सम्मान और अपनी संस्कृति का सम्मान करना चाहिए क्यूंकि भारतीय संस्कृति से सुन्दर पुरे विश्व में कोई और संस्कृति नहीं है। साथ ही बताया की इस दुनिया में हर एक चीज अससत्य है इस दुनिया का सबसे बड़ा सच मृत्यु है। भवरोगों को मिटाने के लिए पर्याप्त औषधि है श्रीमद भागवत और दुबारा रोग न लगे उसके लिए रसायन है श्रीमदभागवत क्यूंकि जो मन क्रम वचन से श्रीमद भागवत की शरण ग्रहण कर लेता है भागवत उसका कल्याण कर देती है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।

राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।

श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन रमेश मेंदोला मित्र मंडल एवं सहयोग विश्व शांति सेवा समिति द्वारा किया जा रहा है। कथा पंडाल में यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

6Mar 2019

“भवसागर का रोग दूर करना हो तो कृष्ण नाम की औषधि लिजिए।"इंदौर के माँ कनकेश्वरी धाम, मदन महल गार्डन के पास, आई.टी.आई रोड़ में रमेश मेंदोला मित्र मंडल एवं सहयोग विश्व शांति सेवा समिति, इंदौर के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05- 11 मार्च 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।

“भवसागर का रोग दूर करना हो तो कृष्ण नाम की औषधि लिजिए।"

इंदौर के माँ कनकेश्वरी धाम, मदन महल गार्डन के पास, आई.टी.आई रोड़ में रमेश मेंदोला मित्र मंडल एवं सहयोग विश्व शांति सेवा समिति, इंदौर के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05- 11 मार्च 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

कथा के द्वितीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

द्वितीय दिवस के कथा की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जब किसी जीव को कोई रोग लगता है तो उसे औषधि दी जाती है उस रोग की रोकथाम के लिए और रसायन पान कराया जाता है शरीर को स्वस्थ रखने के लिए और वो भी रोग से पहले, जिससे शरीर इतना पुष्ट हो की रोग हमें छू ही ना सके। जब रोग लगा हो तो औषधि लें लेकिन जब रोग लगा ही नहीं है तो फिर क्या करें?

संसार के विषय में हजारों लाखों बार आप सोचतें है की ये मिला, ये नहीं मिला, ना जाने क्या क्या सोचते हैं लेकिन क्या आपने कभी अपने आत्म के विषय में, आत्म कल्याण के संदर्भ में सोचा है। कभी सोचा है की आपको कोई रोग लगा है की नहीं लगा है अगर लगा है तो उसकी औषधि क्या है? पहली बात तो ये सोचें की रोग लगा है की नहीं, व्यक्ति के पास समय ही कहां है? इस विषय पर सोचने के लिए। हमे भी रोग लगा है और वो लोग साधारण नहीं है, हमें भवरोग लगा है। भवसागर के बार बार चक्कर काटना रोग ही है और इस रोग को समाप्त करने के लिए औषधि की आवश्यकता है। उस ओषधी का नाम है कृष्ण नाम, जो इस कृष्ण नाम की औषधि को विधि विधान से लेता है उसे भवसागर का रोग लगेगा ही नहीं।

महाराज श्री ने आगे कहा कि हर दिन भागवत का एक पाठ किजिए, अगर वो नहीं कर सकते तो एक श्लोक का पाठ किजिए। भागवत के किसी भी श्लोक के किसी भी एक चरण का उच्चारण करने वाले व्यक्ति को अश्वमेघ का फल मिलता है, ये दिव्य श्लोक हैं।

महाराज श्री ने कहा कि भगवान मे जिन पशुओं को शाकाहारी बनाया है वो पशु दस दिन भले ही भुखे रह लें लेकिन मांस नहीं खाएंगे। जिन पशुओं को मांसाहारी बनाया है वो कभी घास नहीं खाएंगे। लेकिन आज का इंसान सब कुछ खा लेता है, पशु भी अपने सिद्धांतों का पालन करते हैं लेकिन इंसान ही है जो अपने पथ से भटक जाता है।

महाराज श्री ने कहा कि नित्य भागवत का पाठ करें, हरि का चिंतन करें, तुलसी मईया का पोषण करें, गाय की सेवा करें लेकिन अंत समय में जो श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करता है भगवान प्रसन्न होकर उसे हमेशा हमेशा के लिए वैकुण्ठ प्रदान कर देते हैं।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता।

जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है।

जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।

श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।

यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

5Mar 2019

“मानव जीवन का एकमात्र उद्देश्य कृष्ण प्राप्ति है।"इंदौर के माँ कनकेश्वरी धाम, मदन महल गार्डन के पास, आई.टी.आई रोड़ में रमेश मेंदोला मित्र मंडल एवं सहयोग विश्व शांति सेवा समिति, इंदौर के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 मार्च से 11 मार्च 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।

“मानव जीवन का एकमात्र उद्देश्य कृष्ण प्राप्ति है।"

इंदौर के माँ कनकेश्वरी धाम, मदन महल गार्डन के पास, आई.टी.आई रोड़ में रमेश मेंदोला मित्र मंडल एवं सहयोग विश्व शांति सेवा समिति, इंदौर के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 मार्च से 11 मार्च 2019 तक प्रतिदिन श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।

श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के प्रथम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

प्रथम दिवस के कथा की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस पर कथा पंडाल में महामण्डलेश्वर श्री रामचरण दास जी महाराज, महामण्डलेश्वर डॉ चैतन्य स्वरूप जी महाराज, महंत श्री रामबालक दास रामायणी जी महाराज, महामण्डलेश्वर रामगोपाल दास जी महाराज, श्री भोले बाबा जी महाराज, स्वामी श्री राजानन्द जी महाराज, श्री मोहन दास जी महाराज, श्री सरजू दास जी महाराज, श्री अमित दास जी महाराज ने गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं दीप प्रज्वलित कर कथा का शुभारंभ किया।

कथा से पूर्व शिव मंदिर से कथा पंडाल तक ढ़ोल नगाड़ो के साथ विशाल कलश यात्रा निकाली गई, जिसमें सैकड़ों की तादाद में माताओं बहनों ने कलश उठाकर पुण्य लाभ प्राप्त किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि आप सब पर ठाकुर जी की कृपा है जिसकी वजह से आप आज कथा पंडाल में बैठे है और श्रीमद भगवत कथा का रसपान कर पा रहें है क्यूंकि जिन्हे गोविन्द प्रदान करते है जितना प्रदान करते है उसे उतना ही मिलता है।

उसके बाद कथा क्रम की शुरुआत भागवत के प्रथम श्लोक का उच्चारण करते हुए की।

महाराज श्री ने बताया की अगर आप भागवत कथा सुनकर कुछ पाना चाहते हैं, कुछ सीखना चाहते है तो कथा पंडाल में प्यासे बन कर आये, कुछ सिखने के उद्देश्य से, कुछ पाने के उद्देश्य से आएं, तो ये भागवत जरूर आपको कुछ नहीं बल्कि बहुत कुछ देगी। ये भगवान जिनकी आप कथा सुनने आएं है अगर आप उनके बारे में जानने की कोशिश करें तो मेरे ठाकुर वो सत्य है सर्वेश्वर है, जो सृष्टि की रचना करते हैं सृष्टि का पालन करते हैं और जब कोई आपत्ति आती है तो सृष्टि का संहार भी करते हैं।

महाराज श्री ने कहा कि हमें जो ये मानव जीवन मिला है ये विषय वस्तु को भोगने के लिए नहीं मिला है लेकिन आज का मानव भगवान की भक्ति को छोड़ विषय वस्तु को भोगने में लगा हुआ है उसका सारा ध्यान संसारिक विषयों को भोगने में ही लगा हुआ है। परन्तु मानव जीवन का उद्देश्य कृष्ण प्राप्ति सास्वत है अर्थात हमारे जीवन का उद्देश्य कृष्ण को पाकर ही जीवन छोड़ना है और अगर हम ये दृढ़ निश्चय कर लेंगे की हमे जीवन में कृष्ण को पाना ही है तो हमारे लिए इससे बढ़कर कोई और सुख, संपत्ति या सम्पदा नहीं है।

भगवत भागीरथी में जो आकर आप आज स्नान कर रहें है इसका मतलब ये है की स्वयं श्री कृष्ण आपसे मिलने आए है। जो भी इस भागवत के तट पर आकर विराजमान हो जाता है भागवत उसका कल्याण कर देती है, बिना जाती और बिना मजहब देखें इनसे आप जो मांगेंगे ये आपको वो मनवांछित फल देती है और अगर कोई कुछ न मांगे तो उसे मोक्ष परियन्त तक की यात्रा कराती है भागवत।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की प्रारम्भ में यह की भागवत का महात्यम क्या है ? एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया।

इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। इस सांसारिक जीवन में जो कुछ भी प्राप्त किये हो सब किराए के मकान की तरह है। खाली करना ही पड़ेगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।
श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन रमेश मेंदोला मित्र मंडल एवं सहयोग विश्व शांति सेवा समिति द्वारा किया जा रहा है। कथा पंडाल में यजमानों सहित कई गणमान्य अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई ।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

1Mar 2019

"जो जवानी देश के काम नहीं आती वो जवानी किसी काम की नहीं"पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में रेशम बाग मैदान, नागपुर मे देश और सेना के वीर जवानों के सम्मान में तिरंगा यात्रा का आयोजन किया गया। सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए तिरंगा यात्रा में हजारों की संख्या में लोग सम्मिलित हुए। यात्रा जहां से भी गुजरी वहां उस यात्रा को देखने वालों का तांता लग गया। जैसे जैसे यात्रा बढ़ती गई वैसे वैसे इसमें शामिल होने वालों की संख्या में भी इजाफा होने लगा। सभी ने एक सुर में भारत माता की जय के जयकारे लगाए।

"जो जवानी देश के काम नहीं आती वो जवानी किसी काम की नहीं"

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में रेशम बाग मैदान, नागपुर मे देश और सेना के वीर जवानों के सम्मान में तिरंगा यात्रा का आयोजन किया गया। सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए तिरंगा यात्रा में हजारों की संख्या में लोग सम्मिलित हुए। यात्रा जहां से भी गुजरी वहां उस यात्रा को देखने वालों का तांता लग गया। जैसे जैसे यात्रा बढ़ती गई वैसे वैसे इसमें शामिल होने वालों की संख्या में भी इजाफा होने लगा। सभी ने एक सुर में भारत माता की जय के जयकारे लगाए।

तिरंगा यात्रा से पूर्व रेशम बाग मैदान, नागपुर में विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरूआत बांके बिहारी जी की आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कार्यक्रम में नागपुर की महापौर नंदा ताई जिचकार जी ने अपने उपस्थिति दर्ज कराई एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया, संस्था की ओर से उन्हे स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।
सर्वप्रथम में महाराज श्री ने वंदेमातरम गीत के साथ पूरे पंडाल का उत्साहवर्धन किया। पंडाल में जहां तक नजर जा रही थी वहां तक हाथों में तिरंगा लिए हुए लोग नजर आ रहे थे। भारत माता के जयकारों से पूरा पंडाल गूंजायमान हो उठा, यह हर किसी के लिए गौरव का क्षण था।

महाराज श्री ने वीर जवानों की शहादत, उनके शौर्य, पराक्रम और वीरता का वर्णन करते हुए कहा कि जो जवानी देश के काम नहीं आती वो जवानी किसी काम की नहीं। आज हमारे देश में विषम परिस्थितियां है, हर मां बाप अपने बच्चों को दो चीजें सीखाते हैं पढ़ो, लिखो और कमाने लायक बन जाओ। हमारे अधिकांश सैनिक गांव से आते हैं, कभी सोचा है आपने की अधिकांश सैनिक शहरों से क्यों नहीं आते क्योंकि हम लोगों को अपने देश की चिंता कम और अपने पेट की चिंता ज्यादा है।

महाराज श्री ने कहा सभी को पता है की भारत एक शांतिप्रिय देश है उसके बावजूद भी कुथ स्वार्थी नेता लोग हर चीज का सबूत मांग लेते हैं। इस कठिन परिस्थिति में भी अगर हम सबूत मांगते हैं तो धिक्कार है ऐसे भारतीय होने पर। मैं सभी राजनैतिक पार्टियों से अनुरोध करूंगा की वो एक सूर में पाकिस्तान को जवाब दो, और ऐसे जवाब दो की पाकिस्तान फिर भारत की ओर देखने की कोशिश ना करे।

महाराज श्री ने कहा कि मैं सरकार से और सेना से भी निवेदन करता हूं की जैसे अमेरिका ने लादेन को खींच निकाला वैसे ही पाकिस्तान से आप भी इन आतंकवादियों को खींच लाओ और हिंदूस्तान की जमीं पर लाकर फांसी के फंदे पर चढ़ा दो।
उन्होंने देश के युवाओं से भी निवेदन करते हुए कहा कि सिर्फ पढ़ाई, नौकरी ही प्रयाप्त नहीं है, रोटी, पढ़ाई, नौकरी, शादी ये सब तब काम आते हैं जब देश सुरक्षित होगा। यहां पर आतंकवाद का साया हर वक्त मंडराता रहेगा तो इसका क्या फायदा। रोटी तो होगी लेकिन चैन नहीं होगा, बिस्तर तो होंगे पर नींद नहीं होगी, बच्चें तो होंगे पर उनके चैन से रहने की चिंत हर वक्त रहेगी इसलिए हर माता पिता को यह कहना चाहूंगा रोटी कमाना सिखाना तो जरूर लेकिन ये जरूर बताना की ये जो धरती है ये मेरी माँ है और इस माँ की सुरक्षा करना सिर्फ सेना का कर्तव्य नहीं है बल्कि जिसने इस मिट्टी की मिट्टी को छुआ है, अन्न खाया है, जल पिया है, जिसने भी भारत में जन्म लिया है उन सब की कर्तव्य बनता है की इसकी हिफाजत करें।

महाराज श्री ने जवानों की वीरता का बखान करते हुए कहा कि हम लोग घर में बैठे रहते हैं और घर में बैठकर खाने पीने और बच्चे पालने की चिंता करते हैं तो एक दिन कम से कम ऐसा निकालना चाहिए की उन परिवार वालों के बारे में भी सोचा जाए जिनके बच्चे बॉर्डर पर खड़े हैं। जाबांज विंग कमांडर अभिनंदन को देखिए उन्होंने गजब का पराक्रम दिखाया है, पाकिस्तान में जाकर पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब दिया है। पाकिस्तानियों ने उनसे उनके प्लान के बारे में पूछा लेकिन उन्होंने मुछों पर ताव देते हुए उन्हे कुछ भी बताने से इंकार कर दिया। हमारे देश के उस जाबांज ने यह बता दिया की जब योद्धा रण में पांव डालता है तो फिर पीछे नहीं मुड़ता।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में होली महोत्सव का भी आयोजन किया गया, जहां राधा कृष्ण के साथ खूब जमकर फूलों की होली खेली गई। महाराज श्री के भजनों पर भक्तों ने खूब झूमते नाचते हुए होली महोत्सव का आनन्द लिया। पंडाल में आए हुए भक्तों पर फूलों की वर्षा की गई।

28Feb 2019

भागवत बुरे कर्मों से डरना सिखाती है ।पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 22 फरवरी से 01 मार्च तक रेशम बाग मैदान, नागपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई।

भागवत बुरे कर्मों से डरना सिखाती है ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 22 फरवरी से 01 मार्च तक रेशम बाग मैदान, नागपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई।
विश्व शांति सेवा समिति नागपुर एवं विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 22 फरवरी से 01 मार्च 2019 तक प्रतिदिन रेशम बाग मैदान, नागपुर में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई।
भागवत कथा के सातवें दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत में कथा पंडाल में आए हुए सभी भक्तों को कल भारतीय सेना के समर्थन में होने वाली तिरंगा यात्रा के बारे में बताया और निवेदन किया की ज्यादा से ज्यादा संख्या में इस तिरंगा यात्रा में सम्मिलित होकर सेना का मनोबल बढ़ाये और उस कायर पाकिस्तान को दिखाए की कैसे देश एक जुट होकर सेना के साथ खड़ा है। 
महाराज श्री ने बताया की पूरा विश्व जानता है कि पाकिस्तान धोकेबाज है हमने पाकिस्तान के साथ जब-जब भी शान्ति की बात की है दोस्ती का हाथ बढ़ाया है तो उसने हमारी पीठ में खंजर मारा है। लेकिन अगर पाकिस्तान वाकई में ही शान्ति चाहता है तो वो हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे आतंकियों को गिरफ्तार करके भारत को सौपे ताकि दोनों देशो में शान्ति बनी रहें क्यूंकि भारत जैसा शांतिप्रिय देश पूरे विश्व में नहीं है। जो योद्धा शत्रुओं के हांथो में हो और दुश्मन से उससे हमारी योजनाओ के बारे में पूछ रहें हो और वो सिपाही निडर होकर हमारी कोई भी नीती दुश्मनों को ना बता रहा हो उस जांबाज सिपाही की माँ की कोख को मैं सलाम करता हूँ और अपनी व्यास पीठ से मैं विंग कमांडर अभिनन्दन की सुरक्षित वतन वापसी की भगवान से प्रार्थना करता हूँ।

महाराज श्री ने कहा कि मनुष्य को कभी भी मरने से नहीं डरना चाहिए बल्कि मरने के बाद जो दुर्गति होगी उससे डरना चाहिए। मरना गलत नहीं है, मरने से वो डरते हैं जिन्होंने पाप कर्म किए हों। पापियों को नरक में जाना पड़ता है, पापियों को अपने किए हुए कर्मों की सजा भुगतनी पड़ती है, उन्हें छोटे छोटे शरीरों में जाना पड़ता है, ये मानव शरीर हर बार नहीं मिलेगा, हर बार भारतीय नागरिक नहीं होंगे। ये सब आपके कर्मों पर निर्भर करता है। आज का व्यक्ति बुरे कर्मों से डरता नहीं है, भागवत सिखाती है की बुरे कर्मों से डरो, अगर बुरे कर्मों से नहीं डरे तो आपको बार बार जन्म लेना पड़ेगा, बार बार मरना पड़ेगा और अगर अच्छे कर्म करते रहे तो मरने से डरने की कोई बात ही नहीं क्योंकि जो लोग श्रद्धा के साथ सातों दिनों की भागवत कथा श्रवण करते हैं उनका पुन: जन्म नहीं होगा, उन्हें भगवान के ही धाम की प्राप्ति होगी।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि रुकमणी जी ने श्रीकृष्ण से प्रेम विवाह किया। भगवान ने 16 हजार 100 विवाह किए हैं लेकिन 8 विवाह अलग अलग हुए। ये 8 पटरानियां साधारण नहीं हैं लक्ष्मी जी बनी हैं रूकमणी, पार्वती जी आधे अंश से बनी हैं जामवंती और बाके आधे अंश से बनी हैं महामाया, तुलसी बनी हैं लक्ष्मणा, यमुना बनी हैं सूर्य की पूत्री कालिंदी, लज्जा बनी हैं भद्रा, गंगा बनी हैं मित्रव्रिंदा, सावित्री जी बनी हैं सत्या और पृथ्वी बनी हैं सत्यभामा। ये सांसारिक विवाह नहीं है ये पूरी प्रकृति के साथ ठाकुर जी ने विवाह किया है।
महाराज श्री ने आगे कहा कि भगवान ने 16100 विवाह इसलिए नहीं किए की उन्हे बहुत सारी पत्नियां चाहिए थी। उन्होंने इतने विवाह इसलिए किए क्योंकि उन स्त्रियों को जरूरत थी। भौमासुर नामक राक्षस ने 16 हज़ार 100 कन्याओं को बंदी बना रखा था। नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा की समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। इस कारण भगवान ने १६१०० रूप बनाकर सबके साथ एक मुहूर्त में एक साथ विवाह किया था। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने इतने विवाह किये। भगवान ने कामनावश विवाह नहीं किया था, करुणावश किया था। भगवान कहते हैं जिसको कोई नहीं अपनाता अगर वो मेरी शरण में आये तो मैं उसे अपना लेता हूँ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंततः सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

27Feb 2019

आलस हमारे जीवन का सबसे बड़ा शत्रु है : पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराजविश्व शांति सेवा समिति नागपुर एवं विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 22 फरवरी से 01 मार्च 2019 तक प्रतिदिन रेशम बाग मैदान, नागपुर में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। 

आलस हमारे जीवन का सबसे बड़ा शत्रु है : पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा समिति नागपुर एवं विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 22 फरवरी से 01 मार्च 2019 तक प्रतिदिन रेशम बाग मैदान, नागपुर में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। 
भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
महाराज श्री ने कथा की शुरुवात करते हुए कहा कि आलसी लोग न जीवन में सफल होते है और न ही उन्हें कभी भगवान् की प्राप्ति होती है हमारा जो ये आलसीपन है ये हमारे जीवन का बहुत बड़ा शत्रु है और हमारा आजकल का जो खान -पान है वो हमें आलसी बना रहा है। आलस ही वो कारण है जो हमें भगवान् से बहुत दूर लिए जा रहा है। महाराज श्री ने बताया की जब कभी भी हम अकेले हो तो हमें अपने गोविन्द का स्मरण करना चाहिए उनसे बात करनी चाहिए और जब आप सबके साथ हो तो गोविन्द की ही बाते किया करो। लेकिन जब हम लोगों के साथ होते है तो सांसारिक विचार धारा ही हमारे मन में होती है और उन्ही विषयों पर हम चर्चा करते है। लेकिन अगर वास्तव में देखा जाए तो ये सारी चर्चा व्यर्थ की है क्यूंकि जो आपके दिल और दिमाग में होता है उसी में आपका मन लगता है ईश्वर के भजनो में संकीर्तन में मन ना लगने की एक सबसे बड़ी वजह यही है। लेकिन आपको अपने खाली समय में मेरे ठाकुर जी के बारे में सोचना चाहिए क्यूंकि हमारे जीवन का उद्धार वही कर सकते है।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।

25Feb 2019

विश्व शांति सेवा समिति नागपुर एवं विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 22 फरवरी से 01 मार्च 2019 तक प्रतिदिन रेशम बाग मैदान, नागपुर में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। 

विश्व शांति सेवा समिति नागपुर एवं विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 22 फरवरी से 01 मार्च 2019 तक प्रतिदिन रेशम बाग मैदान, नागपुर में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। 
भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा कि शुरूआत करते हुए कहा कि आज इस जीवन में सब लोग सफल होना चाहते हैं, शायद है कोई ऐसा जो यह चाहता हो की हमें कुछ ना मिले। जीवन में वही व्यक्ति सफल होता है जिसमें कड़ा परिश्रम किया हुआ हो। लोगों को सिर्फ आपकी सफलता दिखती है सफलता के पीछे का परिश्रम कोई देखना भी नहीं चाहता। कोई भी व्यक्ति कितना भी सफल क्यों ना हुआ हो उसके कड़ा परिश्रम जरूर किया होगा। परिश्रमी व्यक्ति हर महोत्व की शान होता है, घर बैठे किसी को कुछ प्राप्त नहीं होता और जो मिला भी हो वो भी छिन जाता है बैठे बैठे। जीवन में जो लोग सफल होना चाहते हैं उन्हें अपने रास्ते खुद खोलने पड़ते हैं, रास्ते खुले हुए तुम्हे मिल जाएं तब तुम जाकर सफल होगे ये हर किसी के लिए मुमकिन नहीं है। 
महाराज श्री ने कहा कि जो लोग कहते हैं कथा सुनने की हमारी उम्र नहीं है उन लोगों को ये बात सुननी चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर आपका बेटा संस्कारी नहीं है तो इसमें सबसे बड़ी गलती आपकी ही है। अगर आप सोचते हैं की बच्चा पैदा होने के बाद उसमें संस्कार डाले जाते हैं तो ऐसा नहीं है। आप अपने इतिहास को जानिए अभिमन्यु ने चक्रव्यूह को तोड़ना गर्भ में ही सीख लिया था। इससे पहले के इतिहास मे जाएंगे तो प्रह्लाद जी महाराज ने अपनी मां की गर्भ में ही भगवान की कथा को सुन लिया था और वहीं से उस कथा का असर था की वो भक्त हुए, बचपन से ही भक्ति ने उनपर अपनी कृपा बनाए रखी। माताओं बहनों की 9 महीने की साधना आपके घर में ध्रुव प्रह्लाद पैदा कर सकती है। जब शिशु गर्भ में हो तो ज्यादा से ज्यादा अच्छे कार्य करें। 
महाराज श्री ने कहा कि जिस समय दुनिया पढ़ाई लिखाई के विषय में जानती तक नहीं थी, उस समय हम भारतीयों के पास 4 वेद मौजूद थे, हम वेद पढ़ा करते थे । जिस समय अक्षर ज्ञान कहीं नहीं था उस समय हमारे भारत में गुरूकुलम चला करते थे । और यह हम नहीं कह रहे बल्कि एक अमेरिकन लेखन ने ऐसा लिखा है। 
महाराज श्री ने कहा कि अगर कोई कहने लग जाए हम भगवान है तो आप उसकी पूजा करना शुरू कर दो यह गलत है, आप अपने अराध्या में सच्ची निष्ठा रखो, ईश्वर में सच्ची निष्ठा रखो, जब आप अपने ईश्वर में सच्ची निष्ठा रखेंगे तो आपका ईश्वर ही आपको वो सब दे देगा जो आपके भाग्य में है। 
महाराज श्री ने कहा कि जब आप भक्ति के मार्ग पर चलते हो तो इसका ये मतलब नहीं है की आप धनवान हो जाओगे, सारी सुख सुविधाएं आपको मिल जाएंगी, आपका सम्मान बढ़ जाएगा। भक्ति का मतलब यह है की कई बार ऐसा लगता है की दुनिया की नजर में सबसे बुरा बन जाए एक बार वही ठाकुर की नजर में सबसे अच्छा होता है। स्वयं भगवान कहते हैं जो जीव मेरा हो जाता है मैं दुनिया से उसे बेगाना कर देता हूं, जो दुनिया का होगा वो मेरा हो ही नहीं सकता। चाहे सुरदास जी हो, मीरा हो, तुलसीदास जी हों दुनिया ने उन्हें चैन से जीने नहीं दिया जब वो भगवान की भक्ति कर रहे थे। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।
महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।
शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।
इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।
दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।
महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

26Feb 2019

हेडलाइन - “ मोदी की देशभक्ति और भारतीय सेना की शक्ति पर संदेह नहीं करना चाहिए : देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”“जिसे परमात्मा मिल जाता है उसे वस्तुओं का मोह नहीं रहता चाहिए : देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

हेडलाइन - “ मोदी की देशभक्ति और भारतीय सेना की शक्ति पर संदेह नहीं करना चाहिए : देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”
“जिसे परमात्मा मिल जाता है उसे वस्तुओं का मोह नहीं रहता चाहिए : देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

विश्व शांति सेवा समिति नागपुर एवं विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 22 फरवरी से 01 मार्च 2019 तक प्रतिदिन रेशम बाग मैदान, नागपुर में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा कि शुरूआत देश के वीर जवानों को नमन करते हुए कि देश के वीर वायुसेना के जवानों के लिए हम जितना कहेंगे उतना कम है। आज मंगलवार है और आप याद किजिए पहली बार सर्जिकल स्ट्राइक हनुमान जी ने रावण की लंका में जाकर की थी। वो भी आकाश मार्ग से गए थे रावण की लंका जलाने के लिए और हमारी वायुसेना के जाबांज भी वायु मार्ग से जाकर पाकिस्तान रूपी रावण की लंका जला कर आए इसलिए हम कहते हैं भारतीय सेना की शक्ति पर और मोदी जी की देशभक्ति पर किसी को संदेह नहीं होना चाहिए , ये शक्ति जिधर मुड़ जाएगी उधर सब को सबक सिखाएगी। पाकिस्तान ने जो किया है उसको उसके किए की सजा मिली है इसमें कोई संदेह नहीं है।
महाराज श्री ने आगे कहा कि मैं आप सब के माध्यम से एक संदेश देना चाहता हूं कि 
आतंकवाद से जो धरा दूषित है उसे शुद्ध हो जाने दो । 
वीरो के हाथ खुले हैं अब जरा महायुद्ध हो जाने दो ।
हर एक रक्त की बूंद का बदला हम लेंगे उस नापाक पाकिस्तान से ।
अब तो देशद्रोहियों को भी अपने विरूद्ध हो जाने दो । 
महाराज श्री ने कहा कि युवाओं को भी मैं एक संदेश देना चाहूंगा की जवानी वही है जो देश और धर्म के काम आती है और देश धर्म के काम ना आए वो जवानी जवानी नहीं है। ये जवानी भोग विलास के लिए नहीं मिली है। धन्य है उन माओं की कोखो को जिनकी कोख से ऐसे वीर जवान पैदा हुए । ऐसे वीर जवानों पर व्यास पीठ प्रणाम करती है। 
महाराज श्री ने कहा कि हम सब लोग शांति चाहते हैं, हर देश शांति चाहता है लेकिन आप दूसरों को दुख देकर शांति चाहते हो तो शांति नहीं मिलेगी। उन्होंने सभी से पूछा की भगवान शांति दूत बनकर गए थे कौरवों को समझाने या अशांति दूत । इसके बावजूद भी क्या कौरव माने ? वो इसलिए नहीं माने क्योंकि उन्हे शांति की भाषा समझ में आती ही नहीं थी । दुर्योधन में और पाकिस्तान में एक ही समानता है वह समझने वाला नहीं है चाहे कितने भी शांतिदूत भेज दो।
महाराज श्री ने कहा कि हमारा जीवन इस बात पर निर्भर नहीं है कि हम कितने प्रसन्न हैं, हमारे जीवन का लक्ष्य यह नहीं है हम कितने प्रसन्न है बल्कि हमारे जीवन के सफलता की पहचान यह है की हम से कितने लोग प्रसन्न हैं। अगर हम किसी को खुशी देंगे तो निश्चित तौर पर हमारी खुशी का कारण वही बनेगा। जो केवल अपने सुख के पीछे भागते हैं, वह कभी सुखी नहीं हो सकते। आप दूसरों की मदद करो तो निश्चित तौर पर भगवान तुम्हारी मदद करेगा। 
महाराज श्री ने कहा कि जो व्यक्ति वस्तु के पीछे भागता है उसे परमात्मा नहीं मिलता और जिसे परमात्मा मिल जाता है उसे वस्तुओं से मोह नहीं रहता । यह सारी बातें हम जानते तो है लेकिन मानने को तैयार नहीं होते, इसी का नाम माया है। माया इतनी प्रबल होती है की दुनिया छूट जाए लेकिन ये माया नहीं छूटनी चाहिए हाथ से। 
पं. देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। 
महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।

24Feb 2019

विश्व शांति सेवा समिति नागपुर के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 22 फरवरी से 01 मार्च तक रेशम बाग मैदान, नागपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

विश्व शांति सेवा समिति नागपुर के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 22 फरवरी से 01 मार्च तक रेशम बाग मैदान, नागपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 108 श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।
भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया। कथा के तीसरे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के तीसरे दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि कथा को हमें एकाग्रचित होकर सुनना चाहिए और जितने विश्वास के साथ हम भगवान की कथा सुनते हैं उतना ही फल हमें अधिक प्राप्त होता है और दुनिया में कोई भी ऐसा कार्य नहीं है जो भगवान की कथा से बड़ा है। जिसने हमें ये मानव जीवन दिया , जिसका दिया हुआ हम खाते हैं उसी की भक्ति के लिए हमारे पास समय नहीं है। की कथा सुनते हैं उतना ही फल हमें अधिक प्राप्त होता है और दुनिया में कोई भी ऐसा कार्य नहीं है जो भगवान की कथा से बड़ा है। जिसने हमें ये मानव जीवन दिया , जिसका दिया हुआ हम खाते हैं उसी की भक्ति के लिए हमारे पास समय नहीं है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया की भगवान से वो ही लोग जुड़ते है जो कथा को टाइम पास नहीं समझते है इन कथा से जो कुछ भी सीखते है और सीख कर जीवन में परिवर्तन लाकर अपने आप को भगवान की तरफ जाते है। इस संसार में वो ही लोग आते है जो दोषी है निर्दोष कभी नहीं आता है, इस संसार में सर्वगुण सम्पन्न कोई नहीं है
महाराज श्री ने कहा कि यश ने धर्मराज से पूछा इसका संसार सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है इस संसार मैं सबसे बड़ा आश्चर्य यह है की समसान मैं जलाकर खाक बनाकर पानी मै बहा कर आता है और उसके बाद भी ऐसे जिन्दा रहता है जैसे खुद कभी मरेगा ही नहीं और साथ ही साथ ये भी बताया कि कोई बुड्ढा नहीं मरना चाहता कोई जवान नहीं मरना चाहता, बाते सब करते है लेकिन कोई मरना ही नहीं चाहता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।

तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।

23Feb 2019

विश्व शांति सेवा समिति नागपुर एवं विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 22 फरवरी से 01 मार्च 2019 तक प्रतिदिन रेशम बाग मैदान, नागपुर में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। 

विश्व शांति सेवा समिति नागपुर एवं विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 22 फरवरी से 01 मार्च 2019 तक प्रतिदिन रेशम बाग मैदान, नागपुर में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। 
कथा के दूसरे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। 
भागवत कथा के दूसरे दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा कि शुरूआत कुछ सवालों के साथ किया की श्रीमद्भागवत श्रवण करने से क्या मिल सकत है ? गुरूदेव की आज्ञा का पालन हम क्यों करें ? महाराज जी ने कहा कि इस संसार में एक है चिंतामणि और एक है कल्प वृक्ष। अगर आप कल्पवृक्ष की छांव में बैठ जाएं तो जो जो आप कल्पना करेंगे वो सब आपको प्राप्त हो जाएगा लेकिन अगर आप कल्पना कर रहे हैं की भगवान से मिला दे तो कल्प वृक्ष भी सामर्थय नहीं है। चिंतामणि अगर हाथ में हो, तो व्यक्ति जो कल्पना करता है उसे वही प्राप्त होता है, लेकिन भगवान से वो भी नहीं मिला सकता। लेकिन अगर गुरू कृपा हो जाए तो भगवान की कृपामयी छाया हमे प्राप्त होती है, भगवत दर्शन भी प्राप्त होता है। इतना ही नहीं भगवत कृपा ही है जिसकी वजह से हम और आप सभी यहां पर भागवत श्रवण कर रहे हैं। जिस जीव के ऊपर गुरू कृपा हो उसके लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं है। 
महाराज श्री ने कहा कि इस संसार में सबसे बड़ा भय है मृत्यु का भय। अगर किसी भी वस्तु का नुकसान हो जाए तो उसकी भरपाई की जा सकती है लेकिन अगर मृत्यु हो जाए तो उसकी भरपाई नहीं की जा सकती। मरने की बातें तो करते हैं लेकिन मरना कोई नहीं चाहता। मृत्यु की बात करना बहुत आसान है लेकिन मृत्यु होना और मृत्यु की बात करने में बहुत अंतर है। अगर मृत्यु के भय से कोई हमें बचा सकता है तो वो परमपिता परमात्मा है।
महाराज श्री ने कहा कि ये श्रीमद्भागवत महापुराण है ये कलयुग के लोगों के लिए बहुत बड़ा अमृतमयी प्याला है। हम सब को बचने का एकमात्र तरीका है की हम श्रीमद्भागवत की शरण ग्रहण कर लें और जिन लोगों ने श्रीमद्भागवत की शरण ग्रहण कर ली है उनका कल्याण होने से कोई नहीं रोक सकता। भागवत हमें जीवन का उद्देश्य बताती है, यह हमें सीखाती है की बार बार मेरा मरना और जन्म ना हो इसी योनि में मैं ऐसा कर जाऊं की मुझे दूसरी योनि में जन्म ना लेना पड़े गोविंद ऐसी कृपा करो। 
महाराज श्री ने आगे कहा कि भगवान ही सत्य है दुनिया मिथ्या है, इससे बड़ा ज्ञान दुनिया में कुछ हो नहीं सकता। सिर्फ भगवान ही सत्य हैं बाकी सब मिथ्या है ये वेदों का कितना बड़ा उपदेश है हम सब के लिए। ये ज्ञान अगर कथा से हम को हो जाए तो ये छोटी बात नहीं है, कथाओं का काम ही है जीव को संसार से मोड़ कर ईश्वर में लगा देना और जिन के साथ ऐसा व्यवहार कथा के बाद हुआ है उनको समझ लेना चाहिए की हम भगवान की बताए हुए मार्ग पर सही तरीके से जा रहे हैं । 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। 
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।

22Feb 2019

विश्व शांति सेवा समिति नागपुर एवं विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 22 फरवरी से 01 मार्च 2019 तक प्रतिदिन रेशम बाग मैदान, नागपुर में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। पूज्य महाराज श्री द्वारा लगभग 5 साल बाद नागपुर में कथा का श्रवण करवाया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। 

विश्व शांति सेवा समिति नागपुर एवं विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 22 फरवरी से 01 मार्च 2019 तक प्रतिदिन रेशम बाग मैदान, नागपुर में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। पूज्य महाराज श्री द्वारा लगभग 5 साल बाद नागपुर में कथा का श्रवण करवाया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। 
कथा के पहले दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। 
भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
आज कथा प्रारंभ से पूर्व गायत्री मंदिर से कथा पंडाल तक विशाल कलश यात्रा भी निकाली गई, जिसमें सैकड़ों की संख्या में माताओं बहनों ने कलश उठाया।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पूज्य जगतगुरू स्वामी हंसदेवाचार्य जी महाराज के निधन पर दुख व्यक्त करते हुए व्यास पीठ से उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि हमारे जीवन में घर परिवार की इतनी समस्याएं है की जीव ईश्वर को भी समय दे नहीं पाता है । लेकिन ईश्वर जिसपर विशेष कृपा करते हैं वो कन्हैया के लिए अपना सर्वस्व त्याग कर चले आते हैं। ठाकुर जी की अद्भुत कृपा का दर्शन यही है की हम उनके सानिध्य में बैठकर उनकी लीलाओं का गायन करें। 
महाराज जी ने आगे कहा कि ये मन सबसे बड़ा तेज गति से दौड़ने वाला चक्र है। ब्रह्मा जी ने जब सबसे प्रथम चक्र चलाया तो वो नैमिस में जाकर स्थिर हुआ इसलिए उसे नैमिसारण्य कहते हैं। हमारा मन अगर कही टिक सकता है तो वो भगवान की कथा में टिक सकता है। इसलिए श्रीमद्भागवत कथा हमें नित्त निरंतर जब भी अवसर मिले श्रवण करना चाहिए । ये मानव शरीर बहुत दुर्लभ है और इसके एक क्षण का भी पता नहीं है। इसिलिए हर एक दिन ऐसा शुभ कार्य किजिए की जिस दिन भी हमारी विदाई हो जाए तो वो शुभ कार्य हम अपने साथ में ले जा सकें। 
महाराज जी ने कहा कि ये जो सूर्य है हमारे शरीर के बाहर प्रकाश दे सकता है लेकिन शरीर के भीतर नहीं दे सकता। लेकिन कभी आपने सोचा है की अंधकार ज्यादा कहा हैं शरीर के भीतर या शरीर के बाहर ? शरीर के बाहर के अंधकार को आप सूरज से लाइट से भगा सकते हैं लेकिन मन के अंधकार को किससे मिटाएंगे। जीव बाहरी अंधकार से दुखी नहीं है, जीव दुखी है अपने भीतर के अंधेरे से, जो उसके मन में अज्ञान रूपी अंधेरा छाया हुआ है जीव उससे दुखी है। कोई इसलिए दुखी है की कुछ भी नहीं है, कोई इसलिए दुखी है की सबकुछ है लेकिन जिसके लिए परमात्मा है वो ना यहां दुखी है ना वहां दुखी है, वो सर्वथा सुखी है। मन के अंधेरे को केव गुरूदेव का ज्ञान मिटा सकता है। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग की शुरुआत भागवत के प्रथम श्लोक उच्चारण “सच्चिदानन्द रूपाय विश्वोत्पत्यादि हेतवे तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयम नुमः” से की। उन्होंने कहा कि भागवत के प्रथम श्लोक में वर्णन किया गया है त्रिकालों का, देहिक, दैविक, भौतिक। ये तीन प्रकार के ताप है दैहिक देह के द्वारा, दैविक देवताओं के द्वारा, भौतिक समाज के द्वारा दिया हुआ सुख हो या दुख हो और इन तीन तापों से जीव ग्रसित रहता है। इन त्रितापों को जन्म देने वाले, पोसित करने वाले, संहार करने वाले सच्चिदानंद परमपिता परमात्मा है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। 
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। .
श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

18Feb 2019

विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 10 से 18 फरवरी 2019 तक शांति सेवा शिविर, कुंभ, प्रयागराज में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से राम मंदिर के लिए संकल्पित नौ दिवसीय श्री राम कथा का आयोजन किया गया। कथा के नवम दिवस पर महाराज श्री ने भगवान की नौंवी भक्ति है सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्षित रहना के बारे में भक्तों को बताया।

विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 10 से 18 फरवरी 2019 तक शांति सेवा शिविर, कुंभ, प्रयागराज में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से राम मंदिर के लिए संकल्पित नौ दिवसीय श्री राम कथा का आयोजन किया गया। कथा के नवम दिवस पर महाराज श्री ने भगवान की नौंवी भक्ति है सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्षित रहना के बारे में भक्तों को बताया। 
नवम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
श्री राम कथा के नवम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
कथा के नौवें दिवस पर कथा पंडाल में अखिल भारतीय श्री पंच निर्माणी अनी अखाडे के महंत श्री धर्मदास जी महाराज, रूपाणा धाम के श्री पवनदास जी महाराज एवं अन्य संत महात्माओं ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं अपने आशीष वचनों से भक्तों को अंलकृत किया। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि मुझे बताइए की भगवान पर भरोसा हम क्यों ना करें ? भगवान पर भरोसा ना करने की कोई वजह ही नहीं है। बहुत सारी वजह हैं जिससे हम भगवान पर भरोसा कर सकते हैं। नि:संदेह ईश्वर उन्हे मिला है जिन्होंने उन्हे खोजने की कोशिश की है। ईश्वर ने उनकी मदद की है जिन्होंने उनके ऊपर विश्वास किया है, यह अलग बात है की मदद करते समय दिखाई नहीं पड़ते। कई बार वो अदृश्य रूप से हम सब के सामने अनेकों अनेक रूप मे प्रस्तुत होता है और वो ये सिद्ध करते हैं की मैं यहां हूं। 
महाराज श्री ने कहा कि ये जो प्रयागराज है ये हमारी आध्यात्मिक राजधानी है, ब्रह्मा जी ने प्रथम यज्ञ यहीं किया था । बाहरी लोगों ने आकर इस जगह का नाम बदलकर इलाहाबाद कर दिया, यानी हमारी संस्कृति को, सनातन धर्म को मिटाने की कोशिश की उन्होंने। हमने प्रयागराज से प्रार्थना की इलाहाबाद का नाम फिर से प्रयागराज कर दिया जाए तो ये व्यवस्था करने में 2 से 3 साल लग गए लेकिन आज हम प्रयागराज मे कथा कर रहे हैं इलाहाबाद में नहीं। प्रयाग से जो मांगा जाता है वो तुरंत मिलता है, ये बात सत्य है इसिलिए हमने राम कथा यहां पर की है राम मंदिर के लिए, राम मंदिर भी अयोध्या में बनना चाहिए। प्रयागराज से यही प्रार्थना है की अयोध्या में राम मंदिर बनना चाहिए सभी धर्माव्लंबी सनातनियों के लिए।
महाराज श्री ने आगे कहा कि कल के कथा क्रम को आगे बढ़ाते हुए कहा की भगवान श्री राम प्रयाग से चित्रकूट पहुंचे और चित्रकूट में लक्ष्मण जी ने भगवान श्री राम के लिए मंदाकिनी के तट पर बहुत सुंदर सी कुटिया बनाई और वहां पर प्रभु श्री राम और मां जानकी रहने लगे, लक्ष्मण जी उनकी सेवा करने लगे । संत महात्मा ऋषि वृंद उनका दर्शन करने के लिए आते रहे। वो बड़े आनंद में रहते थे, भगवान का दर्शन जो कर लेता है एक बार वो फिर आनंद में ही रहता है। इसके बाद जब सुमंत प्रभु श्री राम को वन में छोड़कर अयोध्या वापस जाते हैं और जब वापस जाते हैं तो जिस रथ में भगवान श्री राम अयोध्या से वन की ओर बढ़े उसी रथ में सुमंत को वापस जाना है। उस रथ के घोड़ों की दशा गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज वर्णन करते हैं की जब सुमंत ने घोड़ो का मुख अयोध्या की तरफ किया तो वो घोड़े फिर गंगा की तरफ अपना मुख करके खड़े हो जाते थे। जितनी बार सुमंत अयोध्या की तरफ घोड़ो का मुख करते वो वापस गंगा की तरफ अपना मुख कर लेते, हिनहिनाते और आंखो से अश्रुपात करते हैं, मानो सुमंत से कह रहे हों हे सुमंत तुम्हारे पास वो ह्रदय कहां से आ गया की जिस ह्रदय से तुम भगवान को वन में छोड़कर फिर अयोध्या जाने की हिम्मत जुटा पा रहे हो, कहां से वो साहस आ गया तुममे, क्या मुंह लेकर जाएंगे अयोध्या ? जिसके वियोग में पशुओं की ये दशा है उसके वियोग में पुर्वासियों की क्या दशा होगी, उसके वियोग मे माता पिता की क्या दशा होगी, वो जीते कैसे होंगे इनको छोड़कर। 
महाराज श्री ने आगे कहा कि जब सुमंत प्रभु श्री राम को छोड़कर अयोध्या वापस पहुंचे तो राजा दशरथ ने सुमंत से कहा बताओ सुमंत कहा हे राम तुम उनके कहां छोड़कर आए । सुमंत ने सारी घटना बताई राम आपके पुत्र है लेकिन धर्मनिष्ठ हैं, धर्मात्मा है, वो धर्म का पालन करते हैं वो कैसे वापस आ पाते, कैसे वचन मिथ्या करते आपका, वो नहीं आ पाए। तब दशरथ जी को श्रवण कुमार के माता पिता का श्राप याद या गया ।
महाराज श्री ने कहा कि आपके किए हुए कर्मों का फल आपको भले ही देर से मिले लेकिन मिलता है। इसमें कोई दो राय नहीं है और संदेह करना भी मत। अगर कोई कहे की यह सब बाते हैं तो यह बातें नहीं हैं, ये सत्य है, ये नियम है। आप कोई भी काम ऐसा मत किजिए तो सहन ना कर पाओ।

17Feb 2019

विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 10 से 18 फरवरी 2019 तक शांति सेवा शिविर, कुंभ, प्रयागराज में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से राम मंदिर के लिए संकल्पित नौ दिवसीय श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के अष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने भगवान की आठवीं भक्ति जो कुछ मिल जाए उसी में सन्तोष करना चाहिए के बारे में भक्तों को बताया। 

विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 10 से 18 फरवरी 2019 तक शांति सेवा शिविर, कुंभ, प्रयागराज में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से राम मंदिर के लिए संकल्पित नौ दिवसीय श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के अष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने भगवान की आठवीं भक्ति जो कुछ मिल जाए उसी में सन्तोष करना चाहिए के बारे में भक्तों को बताया। 
अष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
श्री राम कथा के अष्ठम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि आज पुलवामा में शहीद हुए वीर जवान महेश यादव जी के घर गए और उनके पिताजी और उनकी माँ से मिलकर आये और उनके पिता ने एक बात बोले महाराज जी से की आप सरकार से इतने नजदीक है तो मेरे छोटे बेटे को भी फौज में रखवा दे ताकि वो भी देश की सेवा करे।
महाराज जी ने ज्यादा ना बोल कर देश के वीर शहीदों को प्रणाम करा और साथ के बोल के मत भूलना उसमे सभी समुदाय के सैनिक थे मै सबको प्रणाम करता हूँ क्योंकि वो हमारे भारत माता के लाल थे क्योंकि वो इस देश की रक्षा की बात करते थे। क्या सीना पाया होगा उस बाप ने जो अपना एक बेटा कुर्बान कर दिया और दूसरे बेटा को कुर्बान करने के लिए तैयार है और साथ ही महाराज श्री ने बोला की मै अगर हम उनका कर्ज उतार सकते है तो जो जो वादे हमने उनसे करे है उन सबको उनके घर से एक एक नौकरी मिल जाए और जिससे वो अपने देश की सेवा कर सकें। 
महाराज श्री द्वारा कथा का क्रम याद दिलाते हुए बताया की महाराज श्री राम जी ने को पता चला तो राम बोले माँ तुम घरबराओ मत मे अभी वन को चला जाउंगा। बस मे कौशल्या माता से आज्ञा ले आता हूँ तो कौशल्या माँ बोले के राम तुमको आज राज्याभिषेक मिलने वाला है और जो अच्छा लगे वो भोजन कर लो और राज्याभिषेक के लिए तैयार हो जाओ।
लक्ष्मण डर रहे हैं की अब मेरे प्रभु मुझे क्या आज्ञा दे तो राम बोले की मै समझ रहा हूं पर ये समय उचित नहीं हैं क्यूँकि भरत और शत्रुघन दोनों यहां नहीं है मुझे पता है मेरे जाने का दुःख माता पिता दोनों को है बस तुम ही एक हो जो इनके मदद कर सकते हो। भगवन श्री राम ने पूछा के तुम 14 वर्ष तक सोये नहीं जब मै बन को आ रहा था तो मेरे से माँ ने प्रतिज्ञा ली की तुम 14 वर्ष तक सोयेगे नहीं जब तक राम तुम्हारे साथ है। 
महाराज श्री ने भगवान की आठवीं भक्ति के स्परूप के बारे में बताते हुए कहा कि जीवन में जो कुछ मिल जाए, उसी में संतोष करना और स्वप्न में भी पराए दोषों को न देखना। पर आज कलयुग में तो व्यक्ति जो है उसमे संतोष नहीं करता और केवल दूसरे पर क्या है इससे ही दुखी होते है। और अपने दोष कभी नहीं दिखाई देते बस दूसरों के की दोष ही देखने में ही लगा रहता है।

16Feb 2019

विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 10 से 18 फरवरी 2019 तक शांति सेवा शिविर, कुंभ, प्रयागराज में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से राम मंदिर के लिए संकल्पित नौ दिवसीय श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने भगवान की सातवीं भक्ति ईश्वर को स्वामी और अपने को दास समझकर परम श्रद्धा के साथ सेवा करने के बारे में भक्तों को बताया। 

विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 10 से 18 फरवरी 2019 तक शांति सेवा शिविर, कुंभ, प्रयागराज में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से राम मंदिर के लिए संकल्पित नौ दिवसीय श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने भगवान की सातवीं भक्ति ईश्वर को स्वामी और अपने को दास समझकर परम श्रद्धा के साथ सेवा करने के बारे में भक्तों को बताया। 
सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
श्री राम कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
राम कथा के सप्तम दिवस पर जगदगुरु स्वामी घनश्यामाचार्य जी महाराज, जगदगुरु श्री रामानुजाचार्य जी डॉक्टर स्वामी राघव आचार्य जी महाराज ,महंत माधव दास जी मौजूद रहें।
कथा के प्रारम्भ में पंडाल में आये हुए भक्तों को अपने आशीर्वचन भी दिए। साथ ही आज सुबह देश के वीर शहीदों की आत्मा की शान्ति और घायल सैनिकों की मंगल कामना के लिए भव्य यज्ञ का आयोजन किया गया और शहीदों की श्रद्धांजलि के लिए आहुति भी डाली गई। साथ ही महाराज श्री द्वारा तीर्थो के राजा प्रयागराज में शहीदों के लिए दी हुयी श्रद्धांजलि के महत्व के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा की त्रिवेणी संगम में माँ गंगा शहीदों की आत्मा को शान्ति देगी और उन्हें स्वर्गवास प्राप्त होगा। साथ ही दुश्मनो के जीवन में ऐसी अशांति फैलेगी जिससे उनकी आने वाली पीढ़ी भी ग्रषित होगी। यज्ञ में सम्मिलित सभी संत महापुरुषों ने मोदी सरकार से पाकिस्तान की इस कायराना हरकत पर कड़ा कदम उठाने का निवेदन भी किया गया। उसके बाद पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज द्वारा सभी हुए संतो के श्री चरणों में नमन करते हुए सॉल पहना कर सभी संतो को सम्मानित किया गया। कथा की शुरुआत करते हुए महाराज श्री ने कहा की हमारे संतों ने भी कहा है की जननी को अगर जन्म देना है तो जन्म योद्धा, दाताओं, और भक्तो को जन्म दे ताकि योद्धा देश के काम आ सकें दाता धर्म के काम आ सकेँ और भक्त अपने साथ दुसरो का भी कल्याण कर सकें। सही मायने में वही माँ है क्यूंकि इन भारत माता के सपूतों ने अपना बलिदान देकर अपनी माताओं की कोख को धन्य किया है। क्यूंकि आज कोई ऐसा भारतीय नहीं है जो उनके प्रति अपनी संवेदना और श्रद्धांजलि अर्पित ना कर रहा हो। भारत माँ के इन सपूतों को आज पूरा देश जब अंतिम विदाई देने आया तो जन सैलाब उमड़ गया। साथ ही महाराज श्री ने वर्तमान सरकार से निवेदन किया की कुछ सरकार को कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे की निश्चित ही पाकिस्तान के दांत खट्टे हो जाए। महाराज श्री द्वारा कथा का क्रम याद दिलाते हुए बताया की महाराज श्री राम जी ने शिव जी के धनुष को तोड़ दिया और पुरे विश्व को ये इशारा दिया की वो विश्व विजेता है और सारे आतताइयों का वध करेंगे। धनुष टूटने के बाद सतानंद जी कहते है की जाइए और सीता को विश्व विजयी माला के साथ लेकर आइयें और कुछ ही छण बाद सीता मइयां वरमाला लेकर आती है और श्री राम जी के समक्ष आगे बढ़ती है। लेकिन सीता मइयां जब आगे बढ़ती है तो देखती है की राम जी जहा खड़े है वो सिंघासन जरा उचाई पर है तो सीता जी कैसे राम जी को वरमाला पहनाएंगी। महाराज श्री ने बताया की श्री राम जी ने जब धनुष तोडा था तो उनकी उम्र 16 वर्ष की थी और सीता जी श्री राम जी से 10 वर्ष छोटी थी तो माता सीता की उम्र उस समय 6 वर्ष थी। तो महाराज श्री राम की साली और सरेज श्री राम जी से निवेदन करती है की महाराज जी आप थोड़ा झुक जाएँ हमारी सीता की लम्बाई छोटी होने के कारण वो आपको वरमाला नहीं पहना पा रही है और काफी देर से खड़ी है। लेकिन मर्यादा पुरुष राम अपना सर नहीं झुका सकते थे तो सीता मइयां ने अपनी मदद के लिए इधर उधर देखा तो लक्ष्मण जी वहां विराजमान थे तो सीता मइयां लक्षमण जी से कहती है की लक्षमण जी आप तो शेष अवतार हो मेरे ऊपर उपकार करों और थोड़ी देर के लिए पृथ्वी को उठा दो ताकि में तुम्हारे भाइयाँ को जयमाला पहना सकूँ। लेकिन लक्ष्मणजी सोचते है की अगर में पृथ्वी को उठाऊंगा तो सीता मइयां के साथ साथ राम जी भी ऊपर उठेंगे और ये कार्य सफल नहीं हो पाएगा। तो लक्ष्मण जी खड़े हुए और श्री राम जी के चरणों में उन्होंने प्रणाम किया तब श्री राम झुके और लक्ष्मण जी को उठाने लगें इतने में सीता जी ने श्री राम के गले में वरमाला डाली और विवाह सम्पूर्ण हुआ।

15Feb 2019

विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 10 से 18 फरवरी 2019 तक शांति सेवा शिविर, कुंभ, प्रयागराज में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से राम मंदिर के लिए संकल्पित नौ दिवसीय श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने भगवान की छठी भक्ति जो शीलवान पुरुष अपने ज्ञान और कर्मेन्द्रियों पर नियंत्रण रखते हुए भगवद् सुमिरन करते हैं के बारे में भक्तों को बताया। 

विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 10 से 18 फरवरी 2019 तक शांति सेवा शिविर, कुंभ, प्रयागराज में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से राम मंदिर के लिए संकल्पित नौ दिवसीय श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने भगवान की छठी भक्ति जो शीलवान पुरुष अपने ज्ञान और कर्मेन्द्रियों पर नियंत्रण रखते हुए भगवद् सुमिरन करते हैं के बारे में भक्तों को बताया। 
षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
श्री राम कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए भगवत नाम उच्चारण किया ताकि भगवान् श्री राम की कथा में हमारा मन लग सकें और बहुत ही सुन्दर भजन "श्री राम जय जय राम कथा पंडाल में आये हुए भक्तों को श्रवण कराया। पंडित जी ने कथा की शुरुआत में जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में CRPF के जवानों पर हुए कायराना आतंकी हमले की कड़ी निंदा करते हुए कथा में आये सभी भक्तों के साथ दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि अर्पित की और उसके बाद महाराज श्री ने मोदी सरकार से पाकिस्तान को मुँह तोड़ जवाब देने का निवेदन किया और बताया की पाकिस्तान में किसी प्रजा की सरकार नहीं बल्कि आतंकवाद की सरकार है, पाकिस्तान आतंकवाद की फैक्ट्री है। साथ ही देश की सीमा पर हमारी सुरक्षा के लिए तैनात वीर जवानो भारत माँ के सपूतों को व्यास पीठ से नमन किया। और उसके बाद कथा क्रम को आगे बढ़ाया और बताया की इस धरती पर दो तरह के लोग है जो भगवान् से मिलना चाहते है भगवान को पाना चाहते है और दूसरे वो लोग है जो भगवान् को पाना नहीं चाहते। इसीलिए अगर आप भगवान् को पाना चाहते हो तो आपको भगवान् को पाने के लिए कोई न कोई साधन जरूर करना चाहिए। कथा का वृतांत सुनाते हुए महाराज श्री ने बताया कि विश्वामित्र मुनि बक्सर वन में रहते है जिन्होनें बक्सर वन में 100 यज्ञ पूरा करने का संकल्प लिया हुआ है। लेकिन जैसे ही वो यज्ञ करने जाते है तो मारीच और तड़का कोई न कोई अड़चन डाल कर उस यज्ञ में विघ्न पहुंचा देते है। तो इसीलिए विश्वामित्र मुनि जी परसुराम जी की सहायता लेते है । और उनसे कहते है की महाराज जी मैंने 100 यज्ञ करने का संकल्प लिया लेकिन ये मारीच और ताड़का यज्ञ पूर्ण करने नहीं दे रहें है कोई न कोई विघ्न डाल देते है। तो परशुराम जी जैसे ही उनकी सहायता के लिए आते है तो मारीच और तड़का भाग जाते है और विश्वामित्र मुनि जी 99 यज्ञ पूर्ण कर लेते है इसलिए कभी -कभी धर्म की रक्षा के लिए बल की भी आवश्यकता होती है। परसुराम जी विश्वामित्र मुनि जी के 99 यज्ञ पूरे करा कर वहा से चले जाते है क्यूंकि उसका कारन ये होता है की सौवा यज्ञ का मतलब है पूर्ण और पूर्ण अवतार भगवान् श्री राम है और पूर्ण के हाथों ही यज्ञ पूर्ण हो इसलिए परशुराम जी से चले जाते है क्यूंकि सौवा यज्ञ श्री राम खुद आकर पूर्ण कराएंगे।

14Feb 2019

विश्व शांति चरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 10 से 18 फरवरी 2019 तक शांति सेवा शिविर, कुंभ, प्रयागराज में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से राम मंदिर के लिए संकल्पित नौ दिवसीय श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने भगवान भगवान की पांचवी भक्ति है मन्त्र का जाप और दृढ़ विश्वास के बारे में भक्तों को बताया। कुंभ, प्रयागराज में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से राम मंदिर के लिए संकल्पित नौ दिवसीय श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने भगवान भगवान की पांचवी भक्ति है मन्त्र का जाप और दृढ़ विश्वास के बारे में भक्तों को बताया।

विश्व शांति चरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 10 से 18 फरवरी 2019 तक शांति सेवा शिविर, कुंभ, प्रयागराज में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से राम मंदिर के लिए संकल्पित नौ दिवसीय श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने भगवान भगवान की पांचवी भक्ति है मन्त्र का जाप और दृढ़ विश्वास के बारे में भक्तों को बताया। कुंभ, प्रयागराज में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से राम मंदिर के लिए संकल्पित नौ दिवसीय श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने भगवान भगवान की पांचवी भक्ति है मन्त्र का जाप और दृढ़ विश्वास के बारे में भक्तों को बताया।
पंचम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
श्री राम कथा के पंचम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत एक प्रश्न से किया कि भगवान क्यों प्रकट हुए ? एक बात तो यह है की जब जब धरती पर दुराचार बढ़ता है तब तब भगवान अनेकों प्रकार के रूप धारण करते हैं और इस धरती पर धर्म की स्थापना करते हैं। जैसे आप लोगों को लगता है की परिवार का पालन करना आप की जिम्मेदारी है, वैसे ही भगवान को लगता है मेरी जिम्मेदारी है धर्म की रक्षा करना। हम को भी भगवान के कार्य को आगे बढ़ाना चाहिए, आप सब की जिम्मेदारी आपका परिवार है और हम सब की जिम्मेदारी भगवान की है क्योंकि हम सब उनका परिवार हैं। गीता कहती है वसुदेव कुटुम्बकम लेकिन जब भटक जाते है, गलत रास्ते पर चले जाते हैं तब अधर्म प्रारंभ हो जाता है, अगर नियति पूर्वक जो करने लायक कार्य हैं वही करें तो आप धर्मात्मा हैं। और जो करने लायक कार्य नहीं है उनको आप जबरदस्ती करें वही अधर्म है। सत्य बोलना आपका धर्म है हर व्यक्ति को सत्य बोलना चाहिए, झूठ बोलें तो अधर्म है। आप भलाई का कार्य किजिए ईश्वर आपकी जरूर सुनेंगे।
महाराज श्री ने आगे कहा कि भगवान के अवतार लेने का दूसरा कारण हैं की वो भक्तों के सुख के लिए अवतार लेते हैं क्योंकि भगवान आए ही नहीं होते तो रामायण की रचना नहीं होती, रामायण की रचना नहीं होती तो फिर राम कथा कौन सुनाता और कौन सुनता। भगवान की कथा सुनकर भगवान में मन लगता है।
महाराज श्री ने कहा की भगवान श्री राम ने पूरी मानव जाती को मानव को क्या करना चाहिए ? क्या नहीं करना चाहिए ? ये सिखाया है । आप अपना मन रूपी पुष्प भगवान श्री राम के अर्पण कर दिजिए, ये सुंदर मन दुनिया को मत दो, ये सुंदर मन केवल गोविंद को दे दो, जिससे ये मन और भी सुंदर हो जाए।
महाराज श्री ने कहा कि जब तक आपके ऊपर बड़े बुजुर्गों की छत्र छाया है तब तक आप गलत दिशा में नहीं जा सकते लेकिन जब आप बड़ों की बात समझना ही छोड़ देते हैं या फिर समझना नहीं चाहें तो फिर आप गलत दिशा में निकल पड़ते हैं। अब यह आपके ऊपर है की आप गलत दिशा में जाना चाहते हैं या अच्छा करना चाहते हैं। अगर आप अच्छा करना चाहते हैं तो अपनी जिंदगी का हर पहलू पहले अपने मां बाप से विचार विमर्श किजिए जब वहां से हां हो जाए तो फिर अपने गुरू से विचार विमर्श किजिए, तब आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता।

13Feb 2019

विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 10 से 18 फरवरी 2019 तक शांति सेवा शिविर, कुंभ, प्रयागराज में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से राम मंदिर के लिए संकल्पित नौ दिवसीय श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने भगवान की चौथी भक्ति छल-कपट रहित होकर श्रद्धा प्रेम व लगन के साथ प्रभु नाम सुमिरन करना के बारे में भक्तों को बताया।

विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 10 से 18 फरवरी 2019 तक शांति सेवा शिविर, कुंभ, प्रयागराज में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से राम मंदिर के लिए संकल्पित नौ दिवसीय श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने भगवान की चौथी भक्ति छल-कपट रहित होकर श्रद्धा प्रेम व लगन के साथ प्रभु नाम सुमिरन करना के बारे में भक्तों को बताया।
चतुर्थ दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
श्री राम कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
कथा पंडाल में पूज्य श्री मौनी बाबा जी एवं सच्चा बाबा आश्रम से पूज्य श्री गोपाल जी महाराज एवं संघ प्रचारक इंद्रेश कुमार जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करायी, संस्था की ओर से उन्हे स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की करते हुए सर्वप्रथम राम मंदिर के विषय में कहा कि राम मंदिर केवल इसलिए नहीं बनना चाहिए की वो हिंदुओं के देवता है बल्कि इसलिए बनना चाहिए क्योंकि भगवान श्री राम पूरी मानवता के देवता है। ऐसे श्रीराम जिनका शुत्र भी उनकी स्तुती करता है , प्रशंसा करते हो ऐसे भगवान श्री राम के लिए हम किस बात का इंतजार कर रहे हैं। भारत में और भारत की बाहर भी अनेकों प्राणी अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण होते देखना चाहते हैं।
महाराज श्री ने कहा कि जरा सोचिए वो भगवान कैसे होंगे जो ऋषि मुनियों के श्राप को भी सहज ही स्वीकार कर लेते हैं। महाराज श्री कल के कथा क्रम को याद कराते हुए कहा की नारद जी ने भगवान नारायण को श्राप दिया। जो व्यक्ति कामातुर होता है, इच्छा पूर्ण ना होने पर क्रोधी होता है, क्रोधी ना होने पर वो दूसरों का बूरा करने से वो चूकता नहीं है। ऐसे उदाहरण भी हमें बहुत देखने को मिल रहे हैं, कोई किसी पर तेजाब फेंक रहा है, कोई गोली मार रहा है। आपको क्या करना चाहिए, क्या नहीं करनी चाहिए वो रामायण हमको सिखाती है। कथा को क्रम को आगे बढाते हुए कहा कि नारद जी ने क्रोध में आकर भगवान नारायण को श्राप दे दिया की आपको मानव रूप धारण करना होगा, बंदर आपकी सेवा करेंगे, आपकी पत्नी का हरण होगा, आपको विरह सहन करना होगा। देवर्षि नारद जैसे श्रेष्ठ ज्ञानी, भगवान के परम भक्त कामना पूर्ण ना होने पर भगवान को भी श्राप दे डालते हैं, तो फिर हम क्या है, कुछ भी नहीं।
महाराज श्री ने कहा कि बहुत से लोग कहते हैं हमें क्रोध बहुत जल्दी आता है, ये बुरी बात है की आपको क्रोध आता है, जब आपको क्रोध आता है आप बुरी बात बोलते हो, बुरी बात बोलते हो तो लोग आपसे नफरत करते हैं। क्रोध पर संयम, काम पर संयम पाया जा सकता है, उसके लिए करना सिर्फ ये है की अपने मन को ठाकुर के हवाले कर दो, राम कथा के हवाले कर दो ये खुद संयम में आ जाएगा। प्रभु जब कृपा करें, उनके नाम का प्रभाव जब हो तब जीव क्रोध के परे जाता है।
महाराज श्री ने कहा कि कल्पवृक्ष और चिन्ता मणि आपकी इच्छाओं को एक सिमित दायरे में पूरा करते हैं लेकिन गुरू कृपा और गोविंद की कथा ये असीमित हैं अगर देने में आ जाएं तो वो दे सकते हैं जो कोई नहीं दे पाता।

12Feb 2019

विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 10 से 18 फरवरी 2019 तक शांति सेवा शिविर, कुंभ, प्रयागराज में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से राम मंदिर के लिए संकल्पित नौ दिवसीय श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भगवान की तीसरी भक्ति अभिमान रहित हो कर गुरु के चरण कमलों की सेवा के बारे में भक्तों को बताया।

विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 10 से 18 फरवरी 2019 तक शांति सेवा शिविर, कुंभ, प्रयागराज में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से राम मंदिर के लिए संकल्पित नौ दिवसीय श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भगवान की तीसरी भक्ति अभिमान रहित हो कर गुरु के चरण कमलों की सेवा के बारे में भक्तों को बताया।

तृतीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। श्री राम कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की भगवान की ये कथा विशेष उद्देश्य के साथ हो रही है, विशेष उद्देश्य है भगवान श्री राम के भव्य मंदिर का निर्माण हो, ऐसी प्रार्थना हम भगवान श्री राम से करे, प्रयागराज से करें और उसही मनोरथ के साथ हम भगवान श्री राम की कथा का श्रवण करें। महाराज श्री ने आगे कहा कि ये जो संसार है ये गिने चुने दो चार कामों में ही व्यस्त है, खाओ, कमाओ, बच्चे पालो और सो जाओ इसके अलावा जीव कुछ नहीं कर पाता है।

इतना अनमोल जीवन है, हर एक चीज अनमोल है, उसके बावजूद भी इस जीवन को हम व्यर्थ गवाने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। कोई अच्छे उद्देश्य के साथ कोई काम कर रहा हो तो हम उसमें भी उसका साथ नहीं दे सकते। भगवान श्री राम अकेले केवल एक भारतीय के नहीं है, वो पूरी मानवता के हैं। जो मानवता में अच्छाई देखता है भगवान श्री राम उसके लिए सबसे बड़ी धरोहर हैं इस विश्व की। राम आत्मा, राम परमात्मा ऐसे राम का गुणगान करिए। उन भगवान श्री राम के मंदिर का निर्माण हो ऐसी प्रार्थना तो हम और आप कर सकते हैं। अगर कोई मनोरथ हम पूरे ध्यान से करते हैं तो देर से ही सही पर उस मनोरथ में भगवान पूरा जरूर करते हैं, अच्छे मन से किया हुआ संकल्प कभी अधूरा नहीं रहता, आपको अच्छे मन से संकल्प करना चाहिए ।

महाराज श्री ने कहा कि जीवन में कुछ ना कुछ साधना जरूर करते रहना चाहिए, माता पार्वती तक को बिना साधना के शिव प्राप्त नहीं हुए, आप भी सोचिए आपको भी कुछ चाहिए तो कुछ साधना तो करनी ही पड़ेगी। उन्होंने आगे कहा कि जब भी आप भक्ति के मार्ग पर चलते हैं तो ये संसार आपको उस मार्ग से हटाना चाहता है। महाराज श्री ने आगे कहा कि हम सभी को अपने वचनों की कीमत समझनी चाहिए, आपके मुंह से जो वचन निकलते हैं वो आपके होते हैं। पहले वचनों की कीमत हुआ करती थी, रामायण में लिखा है प्राण जाई पर वचन ना जाई। लेकिन आज के समय में आप किसी पर भरोसा नहीं कर सकते। उन्होंने सभी से निवेदन करते हुए कहा कि आप कम से कम झूठ बोलिए ज्यादा से ज्याद सच बोलिए फिर आप अपने अंदरूनी शक्ति देखिएगा, आप दिन प्रतिदिन शक्तिशाली होते चले जाएंगे।

11Feb 2019

विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 10 से 18 फरवरी 2019 तक शांति सेवा शिविर, कुंभ, प्रयागराज में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से राम मंदिर के लिए संकल्पित नौ दिवसीय श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के दूसरे दिन महाराज श्री ने भगवान की दूसरी भक्ति के बारे में भक्तों को बताया। 

विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 10 से 18 फरवरी 2019 तक शांति सेवा शिविर, कुंभ, प्रयागराज में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से राम मंदिर के लिए संकल्पित नौ दिवसीय श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के दूसरे दिन महाराज श्री ने भगवान की दूसरी भक्ति के बारे में भक्तों को बताया। 
दूसरे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
श्री राम कथा के दूसरे दिन की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा पंडाल में आज मलूक पीठाधीश्वर स्वामी श्री राजेंद्र दास जी महाराज ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं या0ने आशीष वचनों से भक्तों को अलंकृत किया, संस्था की और से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की हम सब राम के हैं, राम हमारे है, हमारा घर नहीं होता है तो हम राम से मांगते हैं, हमारे पास खुशियां नहीं होती हैं तो राम से मांगते हैं राम देते हैं। राम हमारे पूर्वज हैं, इष्ट हैं, हमारी आत्मा हैं उन राम के लिए हमारे पास समय होना चाहिए। जब राम हमें सब कुछ देते हैं तो हमें भी साथ में मिलकर उनके लिए कार्य करना चाहिए, राम मंदिर निर्माण हो सके ऐसा संकल्प लेना चाहिए।
महाराज श्री ने कहा कि बहुत से लोग हमसे कहते हैं की आप कौन से राम की बात कर रहे हो, कौन से राम की बात कर रहे हो जरा हमें बताइए। तो सुनिए प्रश्न से ही राम कथा प्रारंभ हुई है। सभी सनातन प्रेमी याद रखे, कहते हैं भगवान के भजन में मन नहीं लगता, उसकी वजह यह है की हम राम को जानना ही नहीं चाहते, अपने आप को जानना ही नहीं चाहते। उस ईश्वर को जानने की जिज्ञासा तुममे होगी तो अपने आप मन लगेगा। उनके भजन, कथा, सत्संग सब में मन लगेगा यह तब होगा जब अपने आप को जानने की कोशिश करोगे और उसके पहचानने की कोशिश करोगे। उन्होंने कहा कि प्रशन से ही राम कथा का प्रारंभ हुआ है, यही प्रश्न मां पार्वती जी ने किया, यही प्रश्न भारद्वाज ऋषि ने किया। 
महाराज श्री ने कहा कि अगर मन में संदेह हो और गुरू सामने हों और गुरू से वो संदेह ना कहा जाए तो मन से वो संदेह कभी नहीं मिटेगा, गुरू से कुछ छिपाया इसका पाप अलग लगता है। अगर हमारे सामने ऐसे लोग हैं जो मेरे संशय का निवारण करते हैं तो मुझे तुरंत अपना संशय सनिवेदन के साथ पूछ लेना चाहिए। गुरू से हर बात स्पष्ट कह देनी चाहिए। 
महाराज श्री ने कहा कि एक बार एक शिष्य ने अपने गुरू से प्रश्न किया कि राम कौन हैं ? अगर राम के विषय में कहा जाए तो राम योगी जन नित्य रमण करते हैं वो राम है, योग योगेश्वर बाबा भोलेनाथ भी जिनके नाम का स्मरण करके आनंदित हो उठते हैं वो राम हैं। राम नाम की महिमा कितनी है ये जानने की थोड़ी कोशिश तो करनी चाहिए तो गुरू जी ने कहा कि ऐसे तुम राम को नहीं समझ पाओगे, थोडे दिन साधना करो तब तुम्हे राम समझ में आएगा, राम का गुण समझ में आएगा, राम कौन है थोड़ा बहुत समझ सकोगे जब तुम्हारी बुद्धि थोड़ा सा बढ़ेगी। तो गुरू के कहने पर शिष्य ने साधना की। कुछ समय साधना करने के बाद पुन: गुरू जी के पास में पहुंचा तो गुरू जी से पूछा गुरूजी राम कितने हैं ? तब गुरू जी ने कहा देखो हम तुम्हे बताते हैं। रामायण कहती है ईश्वर अंश जीव अविनाशी, जीव क्या है ? ये जीव ईश्वर का अंश है, इसका मतलब ये है की हम सब ईश्वर के अंश हैं। जीव राम सब के चित्त में बैठा है, हम सब में बैठा है, लेकिन ईश्वर जो हैं जो बिंदू मात्र है जिसके इशारे से ये संसार चलता है उसही की ये सारी दुनिया है। तो शिष्य ने कहा गुरूदेव आपने जो बताया इस तरह भी चार राम हो रहे हैं , चाहे वो जीव के रूप में है, चाहे ईश्वर के रूप में है, चाहे वो बिंदू के रूप में है, चाहे ब्रह्म के रूप में है। गुरू जी ने सोचा की इसने साधना की है, साधना करने से इसकी जो मति है सूक्ष्म तो हुई है लेकिन अभी भी चार राम देख रहा है। तो गुरू जी ने करूणा की उन्हें लगा की इसको समझाना चाहिए तो गुरू जी ने कहा कि देखो एक आकाश घट में है, एक आकाश मेघ में है, एक आकाश मठ में है, एक आकाश स्वतंत्र है, दिखने में ये चार दिखते हैं। लेकिन सही बताओ क्या है चार हैं ? जब तक इन्हे अलग अलग दृष्टि से देखोगे तब तक ये चार दिखेंगे लेकिन घट, मठ, मेघ आकाश को अगर समाप्त कर दिया जाए और आकाश तत्व को ही देखा जाए तो तीनों के तीनों आकाश मिल जात हैं एक आकाश में फिर वो एक में ही खो जाते हैं। तो राम चार नहीं है, राम एक ही है। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने भगवान की नवदा भक्ति में से दूसरी भक्ति के बारे में बताते हुए कहा कि भगवान की दूसरी भक्ति है भगवान की कथा सुनना। इसका असर ये होता है की पहले तो ये कथा सुनने वालो को संसार की वस्तुएं मिलने लगती हैं और लगातार सुनने से संसार की वस्तुओं को पाने की इच्छा नहीं होती बल्कि इच्छा बड़ी होकर भगवान से मिलने की इच्छा जग जाती है। भगवान की कथा सुनने के लिए जिगयासा जगनी चाहिए।

10Feb 2019

विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 10 से 18 फरवरी 2019 तक प्रतिदिन शांति सेवा शिविर, कुंभ, प्रयागराज में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से राम मंदिर के लिए संकल्पित नौ दिवसीय श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के पहले दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।श्री राम कथा के प्रथम दिन की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 10 से 18 फरवरी 2019 तक प्रतिदिन शांति सेवा शिविर, कुंभ, प्रयागराज में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से राम मंदिर के लिए संकल्पित नौ दिवसीय श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के पहले दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
श्री राम कथा के प्रथम दिन की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
राम मंदिर के लिए संकल्पित भव्य श्री राम कथा का शुभारंभ मणिराम दास छावनी के पीठाधीश्वर, राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष परम पूज्य महंत श्री नृत्यगोपाल दास जी महाराज ने अपने कर कमलों से दीप प्रज्वलित कर किया। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की ये राम कथा एक अनुष्ठान के साथ हो रही है की हम कहने वाले भी और सुनने वाले भी, देश में भी विदेश में भी सिर्फ एक मनोरथ से राम कथा सुनें की प्रभु श्री राम कुछ ऐसा करें की अब प्रभु को अयोध्या में राम मंदिर के लिए इंतजार ना करना पड़े। उन्होंने आगे कहा कि आप को मेरा आप सभी से निवेदन है की दूर बैठकर और घर में राजनैतिक बात करके शायद राम मंदिर ना बने लेकिन हम लोग अगर श्री राम को ही मना लें तो फिर ऐसी कोई शक्ति नहीं है जो राम मंदिर बनने से रोक सके।
महाराज श्री ने कहा कि हम सभी के ह्रदय में जो विचार उत्पन्न होते हैं प्रभु श्री राम उसे प्रदान करते हैं । निर्णय देने वाले जो जज हैं वो भी मानव हैं, 70 सालों से तारीख पर तारीख देकर हमारी भावनाओं को नजर अंदाज किया जा रहा है। हमें नहीं पता की आपकी क्या मजबूरी है लेकिन हमारे श्री राम की कोई मजबूरी नहीं है, हम श्री राम को टेंट में नहीं देख सकते। 
महाराज श्री ने कहा कि यह प्रयाग साधारण नहीं है, अर्थ धर्म काम मोक्ष इससे आप जो मांगेंगे मिलेगा । आज से तीन साल पहले इसी प्रयाग राज में हमने संगम से, प्रयागराज से, अक्षय वट से प्रार्थना की थी की शहर का नाम इलाहबाद की जगह प्रयाग हो, पुरात्न पहचान इसे प्राप्त हो। आज आप सभी गवाह हैं की प्रयागराज ने हमारी मनोरथ को सुना और आज ये कुंभ इलाहाबाद की जगह प्रयागराज में हो रही है। इसलिए हम प्रयाग से इसी यह प्रार्थना करेंगे की हे प्रभु अयोध्या में राम मंदिर जल्द से जल्द बन जाए ऐसी दया भी आप कर दिजिए ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने रामचरित्रमानस की महानता का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रभु श्री राम की कथा गोस्वामी तुलसीदास महाराज जी ने रामचरित्रमानस के माध्यम से , श्री बाल्मिकी महाराज ने बाल्मिकी रामायण के माध्यम से की है। भगवान श्री राम के गुणों का गायन अनेकों बार अनेकों ऋषियों ने अपनी भावना के अनुसार किया है। परन्तु हम सभी की पहुंच में रामचरित्रमानस बहुत आसानी से आ गया है और हम रामचरित्रमानस के इस पवित्र ग्रंथ को सहज स्वीकार करते हैं। कोई अगर ये कहे की तुलसीदास महाराज ने रामचरित्रमानस 500-550 साल पहले लिखी इसकी प्रमाणिकता क्या है, इसकी गजब की प्रमाणिकता है रामायण । सबसे पहली बात स्वयं भगवान श्री राम ने गोस्वामी तुलसीदास बाबा को कहा तुम मेरे चरित्रों का गायन करो, तुलसीदास बाबा ने कहा मैं समर्थ नहीं हूं आपका चरित्र तो अपार है, मेरी पहुंच उतनी नहीं हैं, मैं क्या लिख सकूंगा। 
भगवान श्री जानते थे की कलयुग के लोग संस्कृत से धीरे धीरे दूर हो जाएंगे और यह प्रमाण भी है हम सब के मध्य मे की हम सब के घरों में संस्कृत अब पढ़ाई नहीं जाती और बाल्मिकी बाबा ने जो रामायण लिखि है वो संस्कृत में है, वो हमारी पहुंच से थोड़ी दूर है। इसलिए भगवान श्री राम ने गोस्वामी तुलसीदास बाबा को कहा आप मेरे चरित्रों का गायन किजिए, कुछ लिखिए। तुलसीदास बाबा बोले मैं सामर्थयवान नहीं हूं, मैने कुछ भी इधर उधर लिख दिया तो। तो वहां खड़े हनुमान जी बोले चिंता मत किजिए जब तक रामायण पूरी नहीं हो जाती मैं पल पल आपके साथ रहूंगा और जब भी कहीं इधर उधर हो गए तो मैं आपको सही मार्गदर्शन दूंगा। आज्ञा श्री राम की, निगरानी श्री हनुमान जी महाराज की, जब रामायण लिखकर तैयार हुई उसके बाद भी काशी के विद्ववानों ने यह कहकर मना कर दिया की ये आपने क्या लिखा है ये रामायण नहीं है, इसको मानयता नहीं मिलेगी। तो इस रामचरित्रमानस को मान्यता प्राप्त कराने के लिए काशी विश्वनाथ में नीचे रखा गया दबा कर और जब सुबह मंदिर खुला तो रामचरित्र मानस सबसे ऊपर रखा हुआ था और बाबा भोले नाथ के हस्ताक्षर थे उसमें। इसे भगवान श्री राम ने प्रमाणित किया, हनुमान जी ने प्रमाणित किया और अंत में वैष्णवों में सर्वश्रेष्ठ बाबा भोलेनाथ ने अपने हस्ताक्षर करके कहा कि यह रामचरित्रमानस मान्य है, सुंदर ग्रंथ है, जो इसकी छांव में आएगा उसे अद्भुत शांति की प्राप्ति होगी, ईश्वरीय कृपा प्राप्त होगी।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

5Feb 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 से 05 फरवरी 2019 तक स्थान - शान्ति सेवा शिविर सेक्टर न.-13 नागवासुकी मार्ग से पूर्व की तरफ हर्षवर्धन मार्ग (पूर्वी पट्टी ) कुम्भ मेला प्रयागराज में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीकृष्ण कथा का आयोजन किया गया। कथा के तृतीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। श्रीकृष्ण कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 से 05 फरवरी 2019 तक स्थान - शान्ति सेवा शिविर सेक्टर न.-13 नागवासुकी मार्ग से पूर्व की तरफ हर्षवर्धन मार्ग (पूर्वी पट्टी ) कुम्भ मेला प्रयागराज में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीकृष्ण कथा का आयोजन किया गया। कथा के तृतीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। 
श्रीकृष्ण कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
कथा पंडाल में अग्नि अखाड़ा के महामंडलेश्वर श्री कैलाशानंद ब्रह्मचारी जी महाराज एवं भागवत वक्ता डॉ श्याम सुंदर पाराशर जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं अपने आर्शीवचनों से सभी भक्तों को अलंकृत किया। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का उपदेश कहां दिया कुरूक्षेत्र के युद्ध में जहां रण के बाजे बज रहे हैं, जिसे सुनकर वीरों के, योद्धाओं का सीना धड़क रहा है ऐसे में वो नंद किशोर महाभारत जैसे युद्ध में खड़े होकर लगे हुए हैं अर्जुन को उपदेश देने में। वो इसलिए क्योंकि वो भगवान हैं, उनसे बड़ा ज्ञानी, त्यागी और गृहस्थी कोई नहीं है। 
महाराज श्री ने आगे कहा कि आप कभी ये ना सोचें की भगवान हमें ही हमारे कर्मों को फल देते हैं, भगवान सभी को सभी के कर्मों को फल बराबर देते हैं चाहे उसमें उनकी संतान ही क्यों ना हो। अगर एक विराट दृष्टि से देखा जाओ तो हम सब उनकी ही संतान हैं। 
महाराज श्री ने व्यक्ति को कैसा होना चाहिए इस पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि व्यक्ति बचपन कैसा होना चाहिए ? बचपन श्रीकृष्ण के जैसा चंचल होना चाहिए, खेलते रहो, आनंद लेते रहो। लेकिन आजकल के लोगों को बचपन गायब है, आजकल के बच्चे खेल नहीं पाते है और खेलते भी है तो मोबाइल में गेम खेलते हैं। उन्होंने माता पिताओं से गुजारिश कि की परीक्षा में बच्चों पर ज्यादा दबाव ना ड़ालें, पढ़ने के समय पढ़ने दिजिए, खेलने के समय खेलने दिजिए जब आप ऐसा उसको करने देंगे, तब ही वो पूर्ण अपने व्यक्तित्व को निखार पाएगा। इसलिए बचपन कृष्ण जैसा चंचल होना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि बड़े होकर कृष्ण जैसे गीता का ज्ञान होना चाहिए, आप जैसे बड़े होते जाओ अपने जीवन में सोचते जाओ की तुम्हारा जीवन में है क्या ? जीवन का उद्देश्य, लक्ष्य क्या है ? आपके साथ क्या जाएगा ? ये सब कृष्ण ने बताया है। अगर बचपन में समझ में ना आए तो जैसे जैसे आयु बड़े संतों, साधुओं, कथाकारों सानिध्य करना चाहिए और वहां से सिखना चाहिए की यहां सिर्फ पेट भरने नहीं आए हो, फिर बड़े होने लगो तो गीता का ज्ञान, पुराणों का ज्ञान, अध्य्यन ना कर सको तो कम से कम श्रवण तो करो और जैसे जैसे बड़े हो जाओ तो कृष्ण की तरह गंभीर हो जाओ ताकि इल्जाम भी लगे तो सहने और क्षमा करने के गुण अपने जीवन में उतार लो। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने चरित्र से हमें बहुत कुछ सीखाया है और हमें निश्चित तौर पर इसे सीखना चाहिए।
महाराज श्री ने कहा कि श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि जीवन भर व्यक्ति ने कुछ भी किया हो अगर अंत समय में किसी व्यक्ति की मति मेरे चरणों में लगी है तो निश्चित तौर पर उसका कल्याण ही होगा इसमें किंचित मात्र भी संशय नहीं करना चाहिए। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

4Feb 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 से 05 फरवरी 2019 तक स्थान - शान्ति सेवा शिविर सेक्टर न.-13 नागवासुकी मार्ग से पूर्व की तरफ हर्षवर्धन मार्ग (पूर्वी पट्टी ) कुम्भ मेला प्रयागराज में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीकृष्ण कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 से 05 फरवरी 2019 तक स्थान - शान्ति सेवा शिविर सेक्टर न.-13 नागवासुकी मार्ग से पूर्व की तरफ हर्षवर्धन मार्ग (पूर्वी पट्टी ) कुम्भ मेला प्रयागराज में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीकृष्ण कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
श्रीकृष्ण कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
महाराज श्री ने सर्वप्रथम मौनी अमावस्या पर गंगा स्नान की महत्वता को बताते हुए कहा कि कुंभ के दौरान मां गंगा में आकर स्नान करना अत्यंत ही शुभ कार्य है, जब करोड़ो करोड़ों जन्मों के पुण्य एकत्रित होते हैं उनहे ही ऐसा सुंदर अवसर प्राप्त होता है। प्रयागराज का स्नान और दर्शन ये आसान बात नहीं है, कितने लोग हैं जो आना चाहते थे लेकिन आ ना सके। ये शुभ कार्य कौन नहीं करना चाहता, सब करना चाहते हैं लेकिन होते उनही से हैं जो दृढ़ संकल्पित हैं, जिनके पूर्व जन्मों के कर्म श्रेष्ठ बने हुए हैं। उन्होंने कहा कि आज के दिन अपने पितरों के नाम से दान पुण्य भी करना चाहिए, जो भी इन क्रियाओं को करते हैं लोक और परलोक में उनके यश गाए जाते हैं। उनके और उनके पूर्वजों को लोक और परलोक में सुंदर स्थान प्राप्त होता है इसलिए सिर्फ गंगा स्नान ही प्रयाप्त ना हो, हम यहां अपने और अपने पितरों का कल्याण कर सकते हैं ऐसी विचारधारा के साथ हमें प्रयाग में वास करना है।
महाराज श्री ने कहा कि जिन भोगों को भोगने की वजह से जिन लोगों का मन में तीर्थ में जाने का नहीं करता है अथवा सतकर्म नहीं करते हैं ऐसे लोगों को एक बात समझनी चाहिए की भोगों से कभी विरकति होने वाली नहीं है। कोई अगर ये कहे की हमारी सारी इच्छाएं पूरी हो जाएंगी उसके बाद हम गंगा में, संगम में स्नान करेंगे तो ये कभी संभव ही नहीं है। ये भोग कितने भी भोग लो इनसे वैराग्य नहीं होगा। इच्छापूर्ति सिर्फ एक तरीके से हो सकती है की कोई इच्छा ही मत पालो जो मिल जाए उसे स्वीकार लो। अगर इच्छाओं के पीछे भागना शुरू किया तो जीवन में कभी भी इच्छा पूरी होने वाली नहीं है।
महाराज श्री ने कहा कि यहां दो तरह के लोग होते हैं एक जीवन का सदुपयोग करते हैं ईश्वर को पाने के लिए और दूसरे मानव जीवन को बर्बाद करते हैं बार बार जन्म लेकर यहीं मरने के लिए। लेकिन मैं आप सभी से एक ही प्रार्थना करूंगा हे श्रोतओं ये मानव शरीर बड़ा दूर्लभ है इसका सदुपयोग करें, यह जीवन खाने पीने सोने के लिए नहीं मिला है बल्कि ये मानव जीवन प्रभु को प्राप्त करने के लिए मिला है इसिलिए जीवन का सदुपयोग हरि प्राप्ति के लिए करें। जो ईश्वर का हो जाता है वो सुखी हो जाता है, दुखी वही है जो ईश्वर का नहीं बन पाया।
महाराज श्री ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि भगवान श्री कृष्ण जमुना के तट पर टहल रहे थे तो बृज की तरह जाती हुआ जमुना को देखकर वो फूट फूट कर रोने लगे और श्रीकृष्ण ने जमुना से कहा तुम तो हमारी पटरानी हो क्या तुम हमारा संदेश मां यशोदा को दे सकोगी। उन्होंने मईया यशोदा, बाबा नंद और राधा रानी के लिए संदेश दिए। ये चर्चा जब श्रीकृष्ण ने किया ब्रज का स्मरण उन्हें हुआ, जमुना का दर्शन जब हुआ तो उनका समय कितना निकल गया जमुना जी के तट पर उन्हें पता ही नहीं चला, वो समय की सीमा भूल गए। तो अर्जुन ने देखा की श्रीकृष्ण जमुना भ्रमण करने गए वापस नहीं वो दौड़ कर जमुना की तरफ गए वहां जाकर कृष्ण को पूछा, उन्हें देखा तो पाया की श्रीकृष्ण के नैन सजल थे, उनका ह्रदय, कंठ गदगद हो रखा था, उनके नैनों से अश्रु आ रहे थे। जगतपति की आंखों में आसूं देखकर अर्जुन व्याकुल हो उठे, अर्जुन ने पूछा प्रभु आपको क्या हो गया ? आपको क्या तकलीफ है ? आप इस दास को बताइए, क्या मैं आपकी कोई सेवा कर सकता हूं ? कृपा करके मुझे बताइए। श्रीकृष्ण ने कहा अर्जुन ये तुम्हारा विषय नहीं है इसे ऐसे ही रहने दो। अर्जुन कृष्ण को ऐसे देख ना पाएं और कहने लगे प्रभु मुझे बताइए ना मैं तो आपका घनिष्ठ मित्र हूं, मुझे बताइए। श्रीकृष्ण ने कहा हे अर्जुन तुम मेरे घनिष्ठ हो इसमें कोई संदेह नहीं हो लेकिन इतने भी करीब नहीं की मैं अपने ह्रदय की बात तुम्हें बता सकूं, ये मेरा अंदरूनी विषय है। अर्जुन ने आगे कहा कि कम से कम आप मुझे इतना तो बता दिजिए की ये किससे संबंधित है, श्रीकृष्ण ने जवाब दिया ये मेरे ब्रज से सम्बंधित है, ब्रजवासियों, मां यशोदा, बाबा नंद, ब्रज की गोपी ग्वालों से सम्बंधित है, उनसे सम्बंधित है जिन्होंने मेरे लिए अपना कोई ओर नहीं देखा, जिन ब्रजवासियों को कोई और नहीं दिखता मेरे सिवा। उनका सर्वआनन्द था मेरे ब्रज में रहते आज उनका सर्वानन्द घर से गायब है।
श्रीकृष्ण से अर्जुन बोले प्रभु आखिर क्या है उस ब्रज में ऐसा, यहां देखिए कितना सुंदर भवन है, कितना आनंद है यहां, हमारे साथ रहिए आनंद लिजिए, फिर आपकी सोने की द्वारका है, इतना बड़ा आपका साम्राज्य है, इतने बडे साम्राज्य के अधिपति होकर आप ब्रज की सोच रहे हैं, किया क्या था आपने वहां गईया चराने के अलावा ? वो एक गांव ही तो है, हमारे शहर की तरह विकसित थोड़े ही है।
महाराज श्री ने आगे कहा कि जिसके पांव में कांटा ना लगा हो साहब वो क्या जाने और कृष्ण कैसे समझाएं अर्जुन को कि मेरे ब्रज में क्या है। ये प्रेम रोग है मेरे प्यारे, इसका कोई इलाज नहीं है, हर रोग का इलाज है लेकिन कुछ रोग असाध्य होते हैं जिनका कोई इलाज नहीं होता है। दुनिया के प्रेम रोग का इलाज है समय लेकिन ठाकुर के प्रेम रोग का कोई इलाज नहीं है जितना समय बढ़ता है उतनी ही ये बिमारी बढ़ती चली जाती है।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा।।

3Feb 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 से 05 फरवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 3: 00 बजे से 6 बजे तक स्थान - शान्ति सेवा शिविर सेक्टर न.-13 नागवासुकी मार्ग से पूर्व की तरफ हर्षवर्धन मार्ग (पूर्वी पट्टी ) कुम्भ मेला प्रयागराज में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीकृष्ण कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 से 05 फरवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 3: 00 बजे से 6 बजे तक स्थान - शान्ति सेवा शिविर सेक्टर न.-13 नागवासुकी मार्ग से पूर्व की तरफ हर्षवर्धन मार्ग (पूर्वी पट्टी ) कुम्भ मेला प्रयागराज में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीकृष्ण कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। श्रीकृष्ण कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने कहा की कृष्ण कथा हमें श्री कृष्ण से मिलाती है जिसमे हमें अपना भाव पूरा करना होता है और तीर्थ में किया हुआ सत्कर्म और कथा श्रवण बहुत ज्यादा लाभदायक होता है। हमें अपने भाव को पूरा करने के लिए अपना चित ठाकुर जी के चरणों में लगाने के लिए कथा को गंभीर रूप से और पूरा ध्यान लगा कर सुननी चाहिए और ये केवल तभी मुमकिन है जब हम ये मान लेंगे की इस दुनिया में ईश्वर के सिवा और कुछ भी नहीं है। क्यूंकि संसार असार है सार भगवान् का नाम है और हमें ये मानव जीवन केवल खाने, पीने, सोने के लिए नहीं मिली है। हमें जो ये मानव जीवन मिला है वो इसलिए मिला है ताकि इस जन्म को पाने के बाद कुछ और पाने को न रहें ऐसा प्रयास कर लिया जाए। महाराज श्री ने तिलक स्वरूप का महत्व बताते हुए कहा की ये जो हम वैष्णव तिलक लगाते है इसे हम गोपी चन्दन कहते है और ये गोपियों की चरणों की धूल है। साथ ही बताया की भगवान् के चरणों में हमारी प्रीति क्यों नहीं होती क्यूंकि आपके प्रयास से भगवान् के चरणों में मन नहीं लगेगा किसी और के प्रयासो से भी आपका दिल भगवान् में नहीं लगेगा लेकिन अगर आप संतो की भक्तो की चरणों की धूल माथे पर लगा लेंगे तो आपका चित परमात्मा के चरणों में लगेगा। क्यूंकि प्रयास करने वालों की कभी हार नहीं होती और अगरआपको मार्ग पता होने के बावजूद भी आप उसपर चलने की कोशिश न करो तो इसमें आप ही की गलती है। महाराज श्री ने कथा का वृतांत सुनाते हुए नारद जी की कथा भक्तों को श्रवण करानी शुरू की। एक बार नारद जी भगवान् श्याम सुंदर जी के पास जाते है और उनसे कहते है की महाराज हम स्वेत दीप में जाकर वहां के भक्तो को कथा सुनाएंगे तो भगवान् श्याम सूंदर जी नारद जी को वहा कथा सुनाने जाने के लिए मना कर देते है। क्यूंकि जिन लोगों को पहले से ही सब कुछ मिल गया हो तो वहा जाकर उन्हें क्या कथा सुनानी। भगवान् श्याम सूंदर जी की ये बात सुनकर नारद जी बहुत दुखी होते है और फिर नारद जी बैकुंठ नाथ जी भगवान् के पास जाते है और उन्हें सारी बात बताते है की हम भगवान् की कथा स्वेतद्वीप के भक्तों को सुनाना चाहते थे लेकिन श्याम सूंदर भगवान् जी ने हमें वहा जाने से मना कर दिया। तो बैकुंठ नाथ जी कहते है की कोई बात नहीं अगर मना कर दिया है तो मत जाओ तो इसपर नारद जी कहते है की लेकिन हमारा मन है तो हम स्वेत दीप के भक्तों को कथा सुनना चाहते है। तो बैकुंठ नाथ जी नारद जी को अपने साथ स्वेत दीप लेकर जाते है और वहां उनके पहुंचने पर उन्होंने देखा की सरोवर में एक बगुला एक पैर पर खड़ा हो कर तपश्या कर रहा है, तो बैकुंठ नाथ जी नारद जी से कहते है की वो देखो ये बगुला पिछले एक हजार वर्षो से बिना जल पिए हुए भगवान् की तपश्या में लगा हुआ है और ये तपश्या इतने सालों से सिर्फ इसलिए कर रहा है की इसको भगवान् का अधरामृत मिल जाए। और स्वेत दीप में भक्ति के मामले में पशु पक्षी भी पीछे नहीं है तो नारद जी ने भगवान् से कहा की महराज जी में इस बात को सच कैसे मानू तो भगवान् जी ने नारद जी को दिखाया जैसे ही भगवान् ने उस सरोवर का जल पिया और फिर उस जल को जैसे ही उन्होंने अपने मुख से कमल के फूल पर डाला तो बगुला एक ही टांग पर भागा हुआ उस जल को पीने के लिए दौड़ा और भगवान् के मुख से निकले हुए जल को पीकर उसका रोम -रोम खिल गया और उस जल को पीते ही वो बगुला रोने लगा और भगवान् के दर्शन पा कर धन्य हो गया। ये कथा बैकुंठ नाथ जी गरुड़ जी को सुनाते है और जब ये कथा गरुड़ जी सुनते है तो वो कहते है की महाराज जी एक बार मैं भी स्वेत दीप जाना चाहता हूँ वहां के भक्त और भक्ति के दर्शन करना चाहता हूँ तो गरुड़ जी जब स्वेत दीप पहुंचते है और वहां देखते है की एक मंदिर है जिसकी पूजा खुद भोले भंडारी कर रहें है।और वो जो पूजा कर रहें हो वो सेवा राधा सर्वेश्वर की कर रहें स्वेत दीप में बाबा भोले नाथ हमें खुद सिखाते है की कृष्ण भगवान् की भक्ति कैसे की जाए।

31Jan 2019

बंगलुरु के प्रिसेंस श्राईन, पैलेस ग्राउंड में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया गया। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा में हजारों की तादाद में श्रोताओं ने कथा का पुण्य प्राप्त किया।  श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।।

बंगलुरु के प्रिसेंस श्राईन, पैलेस ग्राउंड में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया गया। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा में हजारों की तादाद में श्रोताओं ने कथा का पुण्य प्राप्त किया।  श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।।

सातवें दिन की कथा की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की बदलते हुए परपेक्ष में हम सभी कमजोर होते जा रहे हैं, परिवार टूटते जा रहे हैं, हम जिनको अपना कहते हैं उनके लिए ही हमारे पास समय नहीं है। आज की स्थिति तो ओर भी भयावह हो गई है, आज व्यक्ति जिनके साथ रहता है उनको समय नहीं देता, जिनसे कभी नहीं मिला उनके बारे में ही सोचता रहता है। आज ना हम अपनी मां के साथ बैठते हैं, ना ही पिता के साथ बैठना चाहते हैं, ना ही भाई बहन के साथ बैठना चाहते हैं, आजकल तो बस मोबाइल होना चाहिए। हाथ में मोबाइल हो ना मां हो, ना पिता हो, ना बंधु हो, कोई भी ना हो, जिनके हम सबसे नजदिक थे उनसे दिन प्रतिदिन दूर होते जा रहे हैं। कभी अकेले में जब हम इस बात का चिंतन करते हैं तो हमे पता चलता है हम कैसी झूठी दुनिया में जी रहे हैं, तमाम फरेब, झूठ, छलावा इस जिंदगी के आडंबर में ओढे हुए हैं। आज के नौजवान कथा में भी बैठते हैं तो मोबाइल का ही इस्तेमाल करते रहते हैं। मैं ये नहीं कहता की इसका इस्तेमाल मत करो, करो लेकिन अपनो का समय इनको मत दो। मेरा सभी से निवेदन है की अति की कोई चीज अच्छी नहीं होती। अपने मां बाप और गुरू को समय देना सीख लो जिंदगी संवर जाएगी। मां बाप को समय दोगे तो दुआएं मिलती रहेंगी, गुरू को समय दोगे तो गोविंद से मिलने की तारीख नजदीक आती रहेगी।
महाराज जी ने कहा कि धर्म का प्रचार प्रसार, धर्म की रक्षा तीन जगह से होती है साधु संत , दूसरा तीर्थ और देवालय, तीसरा ब्राह्मण। आजकल चर्चा चल रही है ब्राह्मण कौन है, ब्राह्मण कैसा है, बहुत सारे लोग ब्राह्मण को दोषी मानते हैं की जातिवाद इन्होंने ही फैलाया। हमारे देश में जातियों तो बहुत हैं लेकिन जातिवाद नहीं था। अगर ब्राह्मणों ने जातिवाद फैलाया होता तो ब्राह्मणों ने जो ग्रंथ लिखे हैं वेद व्यास जी महाराज ने, रामायण जो लिखी है तुलसीदास जी ने। अगर ब्राह्मण जातिवाद फैलाते तो यदुवंस में जन्म होने वाले श्रीकृष्ण को भगवान नहीं कहते। जातिवाद वोट के लिए फैलाया गया है, जातियां तो शुरू से थी और करोड़ो वर्ष हो गए सब साथ थे तब से तो कोई परेशानी नहीं हुई लेकिन कुछ वर्षों से जब से हम आजाद हुए हैं वोटिंग का सिस्टम हुआ है तब से क्या हो गया की हम साथ नहीं बैठ सकते, अब सबसे बड़ा पाप ही ब्राह्मण ने कर दिया है क्या ? किसी धर्म में जन्म लेना हमारे हाथ में नहीं है वो तो भगवान ने निश्चित किया है की कौन कहां पैदा होगा। लेकिन अच्छे कर्म करने वाला किसी भी जाति में जन्म ले वो सर्वमान्य ही होगा, पूज्यनीय होगा। आपके कर्म आपकी पहचान होती है, जाति नहीं।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा

31Jan 2019

बंगलुरु के प्रिसेंस श्राईन, पैलेस ग्राउंड में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया गया। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा में हजारों की तादाद में श्रोताओं ने कथा का पुण्य प्राप्त किया।  श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।।

बंगलुरु के प्रिसेंस श्राईन, पैलेस ग्राउंड में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया गया। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा में हजारों की तादाद में श्रोताओं ने कथा का पुण्य प्राप्त किया।  श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।।

सातवें दिन की कथा की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की बदलते हुए परपेक्ष में हम सभी कमजोर होते जा रहे हैं, परिवार टूटते जा रहे हैं, हम जिनको अपना कहते हैं उनके लिए ही हमारे पास समय नहीं है। आज की स्थिति तो ओर भी भयावह हो गई है, आज व्यक्ति जिनके साथ रहता है उनको समय नहीं देता, जिनसे कभी नहीं मिला उनके बारे में ही सोचता रहता है। आज ना हम अपनी मां के साथ बैठते हैं, ना ही पिता के साथ बैठना चाहते हैं, ना ही भाई बहन के साथ बैठना चाहते हैं, आजकल तो बस मोबाइल होना चाहिए। हाथ में मोबाइल हो ना मां हो, ना पिता हो, ना बंधु हो, कोई भी ना हो, जिनके हम सबसे नजदिक थे उनसे दिन प्रतिदिन दूर होते जा रहे हैं। कभी अकेले में जब हम इस बात का चिंतन करते हैं तो हमे पता चलता है हम कैसी झूठी दुनिया में जी रहे हैं, तमाम फरेब, झूठ, छलावा इस जिंदगी के आडंबर में ओढे हुए हैं। आज के नौजवान कथा में भी बैठते हैं तो मोबाइल का ही इस्तेमाल करते रहते हैं। मैं ये नहीं कहता की इसका इस्तेमाल मत करो, करो लेकिन अपनो का समय इनको मत दो। मेरा सभी से निवेदन है की अति की कोई चीज अच्छी नहीं होती। अपने मां बाप और गुरू को समय देना सीख लो जिंदगी संवर जाएगी। मां बाप को समय दोगे तो दुआएं मिलती रहेंगी, गुरू को समय दोगे तो गोविंद से मिलने की तारीख नजदीक आती रहेगी।
महाराज जी ने कहा कि धर्म का प्रचार प्रसार, धर्म की रक्षा तीन जगह से होती है साधु संत , दूसरा तीर्थ और देवालय, तीसरा ब्राह्मण। आजकल चर्चा चल रही है ब्राह्मण कौन है, ब्राह्मण कैसा है, बहुत सारे लोग ब्राह्मण को दोषी मानते हैं की जातिवाद इन्होंने ही फैलाया। हमारे देश में जातियों तो बहुत हैं लेकिन जातिवाद नहीं था। अगर ब्राह्मणों ने जातिवाद फैलाया होता तो ब्राह्मणों ने जो ग्रंथ लिखे हैं वेद व्यास जी महाराज ने, रामायण जो लिखी है तुलसीदास जी ने। अगर ब्राह्मण जातिवाद फैलाते तो यदुवंस में जन्म होने वाले श्रीकृष्ण को भगवान नहीं कहते। जातिवाद वोट के लिए फैलाया गया है, जातियां तो शुरू से थी और करोड़ो वर्ष हो गए सब साथ थे तब से तो कोई परेशानी नहीं हुई लेकिन कुछ वर्षों से जब से हम आजाद हुए हैं वोटिंग का सिस्टम हुआ है तब से क्या हो गया की हम साथ नहीं बैठ सकते, अब सबसे बड़ा पाप ही ब्राह्मण ने कर दिया है क्या ? किसी धर्म में जन्म लेना हमारे हाथ में नहीं है वो तो भगवान ने निश्चित किया है की कौन कहां पैदा होगा। लेकिन अच्छे कर्म करने वाला किसी भी जाति में जन्म ले वो सर्वमान्य ही होगा, पूज्यनीय होगा। आपके कर्म आपकी पहचान होती है, जाति नहीं।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा

28Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 25 जनवरी से 31 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 3: 00 बजे से 6 बजे तक स्थान -प्रिंसेस श्राईन पैलेस ग्राउंड बैंगलोर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 25 जनवरी से 31 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 3: 00 बजे से 6 बजे तक स्थान -प्रिंसेस श्राईन पैलेस ग्राउंड बैंगलोर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

लोकवाणी सुनने से अच्छा है वेद वाणी सुनो -देवकीनंदन जी

संतो का संग करना भगवान की पहली भक्ति है -पंडित जी

शास्त्रों के हिसाब से चलोगे तो दुःख आपको स्पर्श भी नहीं कर पाएंगे -देवकीनंदन जी

कथा की शुरुआत करते हुए महाराज श्री ने युगलसरकार का नाम उच्चारण करते हुए "हम भी कहे राधे श्याम तुम भी कहो राधे श्याम के साथ की। साथ ही महाराज श्री ने बताया की प्रहलाद जी भगवान् परम भागवत है। साथ ही महाराज श्री ने बताया की भगवान् की भक्ति ही है जो हमारे काम आती है, भक्ति के बारे में बताते हुए महाराज श्री ने बताया की भक्ति 9 प्रकार की होती है और पहली ही भक्ति है श्रवण करो। पंडित जी ने बताया की हम अपने शास्त्रों पर ध्यान नहीं देते इसलिए हम दुख पाते है अगर हम अपने शास्त्रों पर ध्यान देंगे तो दुःख हमें स्पर्श भी नहीं कर सकते इसलिए लोकवाणी सुनने से अच्छा है वेद वाणी सुनो पुराण वाणी सुनो। क्यूंकि श्रवण का बड़ा महत्व है अगर हम कथाओ का श्रवण करेंगे तो वो चित में आएगा और फिर वही दिमाग में जायगा और जो दिमाग में जायगा वही वाणी में आएगा और धीरे धीरे फिर वही हमारा कर्म बन जायगा। दर्शन और श्रवण बहुत महत्वपूर्ण है अगर आप अच्छे दृश्य देखते है तो गंदे दृश्य आप आँख बंद करके भी नहीं सोच सकेंगे।महाराज श्री ने गांधी जी के तीन बंदरो का उदहारण देते हुए कहा की हमें उन तीन बंदरों से सीख लेनी चाहिए और न बुरा सुनना चाहिए न बुरा बोलना चाहिए और न ही गंदे दृश्य देखने चाहिए। क्यूंकि जो सुख भगवान् की कथा श्रवण करने में है वो आनंद कही और नहीं मिलता। संतो का संग करना भगवान् की पहली भक्ति है, और संतो ने कहा है की इस पृथ्वी पर गुरु और माता- पिता साक्षात् भगवान् स्वरूप है आपको इनकी सेवा करनी चाहिए क्यूंकि अगर आप इनकी सेवा नहीं कर सकें तो फिर भगवान भी आपके पास आकर क्या करेंगे। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया। शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे। महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।" जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया। इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

 

25Jan 2019

कल देर रात्रि में प्रयाग से बैंगलोर पहुंचा और बैंगलोर पहुंचने के बाद आर्ट ऑफ़ लिविंग फाउण्डेशन के संस्थापक आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रवीशंकर जी के आश्रम आर्ट ऑफ़ लिविंग इंटरनेशनल सेण्टर पर उनसे भेंट हुई।

कल देर रात्रि में प्रयाग से बैंगलोर पहुंचा और बैंगलोर पहुंचने के बाद आर्ट ऑफ़ लिविंग फाउण्डेशन के संस्थापक आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रवीशंकर जी के आश्रम आर्ट ऑफ़ लिविंग इंटरनेशनल सेण्टर पर उनसे भेंट हुई। गुरु श्री श्री रवीशंकर जी से मिलकर राम मंदिर के मुद्दे पर और कई आध्यात्मिक विषयों पर चर्चा हुई। श्री श्री रविशंकर जी का सानिध्य और दर्शन सहज ही मन को आनंदित करता है।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

25Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 25 जनवरी से 31 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 3: 00 बजे से 6 बजे तक स्थान -प्रिंसेस श्राईन पैलेस ग्राउंड बैंगलोर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 25 जनवरी से 31 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 3: 00 बजे से 6 बजे तक स्थान -प्रिंसेस श्राईन पैलेस ग्राउंड बैंगलोर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

पूज्य महाराज श्री द्वारा पुनः बैंगलोर में कथा का श्रवण करवाया जा रहा है।

भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

गुरु का एक वाक्य हमें सर्व सुख प्राप्त करा सकता है - देवकीनंदन जी

संसार में सबसे बड़ा डर मृत्यु का है -पंडित जी

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने प्रिय प्रीतम की वंदना "जय राधे जय राधे राधे जय श्री राधे "से की तत्पश्चात भागवत के प्रथम श्लोक का उच्चारण कर श्रीमद भागवत कथा का प्रारम्भ किया। उसके बाद महाराज श्री ने बताया की इस लोक में मानव जीवन प्राप्त करने के बाद श्रीमद भागवत कथा श्रवण बड़ा दुर्लभ है क्यूंकि हमारे करोडो करोडो पुण्यों के बाद ही हमें भागवत कथा सुनने का मौका मिलता है। क्यूंकि जो हमें चिंतामणि नहीं दे सकती कल्पवृक्ष नहीं दे सकता वो हमें गुरु की कृपा दे सकती है। क्यूंकि गुरु का एक वाक्य हमें सर्व सुख प्राप्त करा सकता है लेकिन वो मांगने से नहीं मिलता। महाराज श्री ने एक उदहारण देते हुए बताया की शेरनी का दूध या तो उसका बच्चा पी कर पचा सकता है या फिर कोई सोने के पात्र में आप उस दूध को रखे तो वो फटने से बच सकता है अगर आप किसी और पात्र में शेरनी का दूध रखेंगे तो वो दूध फट जायगा। आपने ऐसी बहुत सी कहानिया सुनी होंगी की कोई संत ऋषि किसी जंगल में तपस्या करते है और शेर भी उनके सामने अपनी हिंसक मानसिकता को छोड़ कर संतो के चरणों में विनम्र हो जाता है। येसारी कथाये हमें यही उदहारण देती है की भगवान् के नाम में वो प्रभाव है की बड़े से बड़े हिंसक प्रवर्ति वाले जीव को भी सुधरने का मौका प्रदान करते है उन साधू संतो का दर्शन करने के बाद। इसलिए अपने मानव जीवन का सदुपयोग कीजियेगा। पंडित जी ने बताया की इस संसार का सबसे बड़ा डर मृत्यु है क्यूंकि एक बार अगर मृत्यु हो गयी तो फिर मानव जीवन मिलना दुर्लभ है। क्यूंकि हमे इस जीवन में सबकुछ प्राप्त हो सकता है लेकिन मृत्यु के बाद जीवन प्राप्त नही हो सकता क्यूंकि जीवन झूठा है और मृत्यु सत्य है। देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। 
श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

26Jan 2019

गणतंत्र दिवस के अवसर पर पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज द्वारा प्रिंसेस श्राईन पैलेस ग्राउंड बैंगलोर में ध्वजारोहण किया गया।इस अवसर पर बैंगलोर समिति के भक्त भी शामिल रहे। ध्वजारोहण कार्यक्रम के बाद पूज्य महाराज श्री द्वारा देश के वीर जवानों की शहादत को याद करते हुए देश भक्ति गीत भी गाये गए और समस्त देशवासियों को गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं भी दी।

गणतंत्र दिवस के अवसर पर पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज द्वारा प्रिंसेस श्राईन पैलेस ग्राउंड बैंगलोर में ध्वजारोहण किया गया।इस अवसर पर बैंगलोर समिति के भक्त भी शामिल रहे। ध्वजारोहण कार्यक्रम के बाद पूज्य महाराज श्री द्वारा देश के वीर जवानों की शहादत को याद करते हुए देश भक्ति गीत भी गाये गए और समस्त देशवासियों को गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं भी दी। साथ ही एक कदम स्वच्छता की ओर उठाते हुए स्वच्छ भारत अभियान के तहत सभी भारतवासिओं से निवेदन किया की हमें अपने शहर और आसपास की जगह को स्वच्छ रखना चाहिए।ताकि हमारा देश हमारा गांव और हम सब लोग स्वच्छ रहें स्वस्थ रहें और रोग रहित रहें l

#Republicday2019 #गणतंत्रदिवस #Republicdayindia

26Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 25 जनवरी से 31 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 3: 00 बजे से 6 बजे तक स्थान -प्रिंसेस श्राईन पैलेस ग्राउंड बैंगलोर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। 

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 25 जनवरी से 31 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 3: 00 बजे से 6 बजे तक स्थान -प्रिंसेस श्राईन पैलेस ग्राउंड बैंगलोर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। 
भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

उन सभी माताओं को मेरा नमन जिनके सपूतो की कुर्बानी की बदौलत हम आजाद हुए है- देवकीनंदन ठाकुर जी

हमें अपने देश से शिकायते नहीं करनी चाहिए - ठाकुर जी

समस्याओं का हल ढूढ़ने वालों को हमेशा आदर्श माना जाता है- पंडित जी

गणतंत्र दिवस के अवसर पर पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज द्वारा प्रिंसेस श्राईन पैलेस ग्राउंड बैंगलोर में ध्वजारोहण किया गया।इस अवसर पर बैंगलोर समिति के भक्त भी शामिल रहे। ध्वजारोहण कार्यक्रम के बाद पूज्य महाराज श्री द्वारा देश के वीर जवानों की शहादत को याद करते हुए देश भक्ति गीत भी गाये गए और समस्त देशवासियों को गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं भी दी। साथ ही एक कदम स्वच्छता की ओर उठाते हुए स्वच्छ भारत अभियान के तहत सभी भारतवासिओं से निवेदन किया की हमें अपने शहर और आसपास की जगह को स्वच्छ रखना चाहिए।ताकि हमारा देश हमारा गांव और हम सब लोग स्वच्छ रहें स्वस्थ रहें और रोग रहित रहें l कथा की शुरुआत करते हुए महाराज श्री ने देश वासिओं से निवेदन करते हुए कहा की हमें कुछ पैसे अपने देश के जवानो के लिए जोड़ने चाहिए और भारतीय सेना के फण्ड में जमा करने चाहिए ताकि हमारे देश के फौजी भाइयों का मनोबल और बढ़ सकें। और भारत माता की जय बोलते हुए "हे प्रभु मुझे बता दो चरणों में कैसे आउ बहुत ही सुन्दर भजन का श्रवण भक्तों को कराया। साथ ही महाराज श्री ने भारत की आजादी में कुर्बान हुए बलिदानो के बारे में युवाओं को बताते हुए कहा की मंगलपांडेय जी से प्रांरभ हुई ये बलिदान की कहानी पता नहीं कहा तक गयी ये इसका अंदाजा हम और आप नहीं लगा सकते है ना जाने कितने बलिदानो के बाद हमें ये आज़ादी मिली है। सुखदेव,राजगुरु और भगत सिंह जी जैसे युवा क्रांतिकारिओं को याद करते हुए महाराज श्री ने उन सभी माताओं को प्रणाम किया जिन के सपूतो के बलिदान की बदौलत हम आज आजादी में सांस ले रहे है।साथ ही पंडित जी ने बताया की आज के समय में जीव को हर किसी से कोई न कोई शिकायत है लेकिन शिकायते वो करते है जो बहुत बड़ा नहीं सोचते जो बड़ा सोचते है वो कभी शिकायत नहीं करते उसका हल ढूढ़ने की ओर चलते है। और जो लोग हल ढूंढ़ते है उन्ही को हमेशा आदर्श माना जाता है। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है। श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए। यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

24Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 18 जनवरी से 24 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन सुबह 10 बजे से 2 बजे तक स्थान - शान्ति सेवा शिविर सेक्टर न.-13 नागवासुकी मार्ग से पूर्व की तरफ हर्षवर्धन मार्ग (पूर्वी पट्टी ) कुम्भ मेला प्रयागराज में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 18 जनवरी से 24 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन सुबह 10 बजे से 2 बजे तक स्थान - शान्ति सेवा शिविर सेक्टर न.-13 नागवासुकी मार्ग से पूर्व की तरफ हर्षवर्धन मार्ग (पूर्वी पट्टी ) कुम्भ मेला प्रयागराज में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।
श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

हेडलाइन – धार्मिक स्थलों में शराब व् मांस की बिक्री पर पूर्णतया प्रतिबंध लगाए सरकार - ठाकुर जी महाराज

भगवान के मुख से प्रकट हुई है भागवत - श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

बुरी संगत से हमें दूर रहना चाहिए - ठाकुर जी

धार्मिक व् पवित्र तीर्थस्थल है शुक्रताल - श्री 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

कथा की शुरुआत में पूज्य महाराज श्री ने कहा की भारत संस्कृत, संस्कृति, धर्म और संस्कारो का देश है लेकिन कुछ लोग धार्मिक स्थलों पर जाकर भी शराब और मांस का सेवन कर हमारी संस्कृति को खंडित करते है इसलिए मैं भारत सरकार से निवेदन करता हूँ कि भारत के सभी धार्मिक स्थलों पर शराब व् मांस की बिक्री पर पूर्णतया प्रतिबंध लगाया जाए। ताकि धर्म की जगह पर सिर्फ ज्ञान और भक्ति की बयार ही बहे। ताकि भारत पुनः विश्व गुरु बन सकें।

उसके बाद कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को "कृष्ण प्रेम माई राधा"जी का सुंदर भजन श्रवण कराया ।उसके बाद बताया की भागवत भगवान के मुख से प्रकट हुई है। श्रीमद भगवत कथा का चतुर्थ श्लोक ब्रह्मा जी, सनकादिक नारद जी और फिर व्यास जी तक पहुची। और फिर भागवत के चतुर्थ श्लोक का विस्तार श्री वेद व्यास जी ने किया। उसके बाद सुकदेव जी महाराज ने इसको एक पुराण के रूप में गाया। सुकदेव जी महाराज ने जिस प्रथम स्थान पर श्रीमद भगवत कथा का गायन किया था वो जगह है शुक्रताल। तो आप खुद ही सोचिये वो शुक्रताल कितना श्रेठ और पावन होगा।साथ ही पंडित जी ने बताया कि श्रीमद भागवत कथा सुनकर राजा परीक्षित को मुक्ति प्राप्त हुई और हम सब के लिए मार्ग दर्शन प्राप्त हुआ। इसलिए मेरा तो सौभाग्य होगा की मैं उस स्थान पर जा कर कथा कह सकूं। और अगर आप सब लोग भी वहां बैठकर सात दिन अनुष्ठानित होकर कथा सुन पाए तो ये आप का भी सौभाग्य होगा। हमारे शास्त्रों में ऋषियों ने अनेको बार बहुत सी चीजें समझाई है। जिसमे ख़ास तौर पर संगत का प्रभाव हम को बार- बार बताया गया है आप जैसे लोगो की संगत में रहते है, जैसे लोगो का संग करते है वैसा असर आपके ऊपर होता है। ख़ास तौर पर आज की पीढ़ी के लिए हम लोग बहुत जल्दी किसी को भी अपना मित्र बना लेते है। महाराज जी ने कहा की आज कल के लोग सोशल मीडिया पर जितनी जल्दी फ्रेंडशिप करते है उतनी जल्दी तोड़ भी देते है। वजह सीधी है ना तो आपने उसे पहले अपना बनाने से पहले सोचा की वो है कैसा और न ही आप ने तोड़ने से पहले सोचा क्या अगर हमने इसे आपना बना लिया है तो इसे छोड़ने में भी हमारा लाभ क्या है। दोनों प्रकार से इस बात को हम समझना नहीं चाहते लेकिन ऐसे मित्रों के साथ अधिक नहीं रहना चाहिए जो दो मुही बातें करते हो। दो मुही बाते करने वाले लोग कैसे आप के मुख पर आपकी प्रसन्ना करते हो और आपके पीठ पीछे वो आपकी निंदा करते हो शास्त्रों में इसका भी वर्णन है। वो लोग ऐसे है स्वर्ण के कलश में विष भरा हो। विष के कलश से बच के रहना चाहिए ठीक वैसे ही ऐसे दो मुही बातें करने वाले लोगो से बच के रहना चाहिए। लेकिन गलती ना होते हुए भी लोग आज भी लोग आपकी निंदा करते है। तो इसलिए पहले गलत बताने वाले का उद्देश्य होता था की वो गलती सुधारले इसलिए बताते थे। लेकिन आजकल इसलिए बताते की आपका मनोबल गिर जाये। इसलिए ये आपकी समझ होनी चाहिए, आपका विवेक होना चाहिए।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंत: सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

25Jan 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कुम्भ प्रयागराज में आयोजित विशाल श्रीमद्भागवत कथा के भव्य आयोजन के बाद बेंगलुरु के लिए प्रस्थान किया। जहाँ विश्व शांति सेवा समिति बेंगलुरु एवं विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली के तत्वाधान में धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन 25 जनवरी से 31 जनवरी 2019 तक किया जा रहा है। महाराज श्री के बेंगलुरु एयरपोर्ट पहुंचने पर भक्तो ने महाराज श्री का स्वागत फूलमाला अर्पित कर के किया और राधे नाम के जयकारे भी लगाए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कुम्भ प्रयागराज में आयोजित विशाल श्रीमद्भागवत कथा के भव्य आयोजन के बाद बेंगलुरु के लिए प्रस्थान किया। जहाँ विश्व शांति सेवा समिति बेंगलुरु एवं विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली के तत्वाधान में धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन 25 जनवरी से 31 जनवरी 2019 तक किया जा रहा है। महाराज श्री के बेंगलुरु एयरपोर्ट पहुंचने पर भक्तो ने महाराज श्री का स्वागत फूलमाला अर्पित कर के किया और राधे नाम के जयकारे भी लगाए। बेंगलुरु के सभी भक्तो से निवेदन है की ज्यादा से ज्यादा संख्या में आप कथा स्थल पर पहुंचे और महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का रसपान करें।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

 

22Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 18 जनवरी से 24 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 30 बजे से 6 बजे तक स्थान - शान्ति सेवा शिविर सेक्टर न.-13 नागवासुकी मार्ग से पूर्व की तरफ हर्षवर्धन मार्ग (पूर्वी पट्टी ) कुम्भ मेला प्रयागराज में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 18 जनवरी से 24 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 30 बजे से 6 बजे तक स्थान - शान्ति सेवा शिविर सेक्टर न.-13 नागवासुकी मार्ग से पूर्व की तरफ हर्षवर्धन मार्ग (पूर्वी पट्टी ) कुम्भ मेला प्रयागराज में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।
कथा के पाचवे दिन कथा के यजमान और हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा पंडाल में जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज जी ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई और मंच से कथा श्रवण करने आये हुए भक्तो को आशीर्वचन दिए।

सतत प्रयास करने वाले लोग निश्चित ही अपना उद्देश्य प्राप्त करते है।

संतो जैसा कोई आपका परम हितकारी नहीं है। 
संतो को दिया हुआ दान हमें हरिमिलन का फल देता है। 
कथा की शुरुआत करते हुए महाराज श्री ने "मेरे दुःख के समय में श्याम बड़े काम आते है" बहुत ही प्यारा भजन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने बताया की संतो का दर्शन आसान नहीं है हमारे पूर्व के संतो ने कितने सुंदर मार्ग का दर्शन हमें कराया है। साथ ही बताया की माधाव जैसा कोई देव नहीं गंगा जैसी कोई नहीं नहीं और संतो जैसा कोई आपका परम हितकारी नहीं है। और महाराज श्री ने फिर एक किसान और संत का दृष्टांत भक्तो को श्रवण कराया की एक बार एक संत गांव में एक किसान के द्वार पर भिक्षा मांगने गए और जिस किसान के घर वो भिक्षा मांग रहे थे वो किसान बड़ा कर्म निष्ठ था खेती करके अपना जीवन यापन करता था। तो जब वो किसान उन संत को भिक्षा देने लगा तो उसने महात्मा जी को ऊपर से निचे तक देखा और सोचा की महात्मा जी ना तो दिव्यांग है और न ही इतने वृद्ध की कुछ मेहनत न कर सकें उसके बाद भी भिक्षा मांगने आ गये है। और में दिन रात मेहनत करता हु खेत में बीज बोता हूँ उसमे जल देता हु तब कही जा कर फसल उगती है फिर में अपना जीवन यापन करता हु और साथ ही धर्म के लिए जो दिव्यांग मेरे घर आये उन्हें दान देकर अपनी धर्म की सेवा करता हु। लेकिन भगवान् ने तो आपको हस्ठ पुष्ट बनाया है तो आप कोई कर्म क्यों नहीं करते मेहनत क्यों नहीं करते तब महात्मा जी ने बड़े ही शांत हो कर उत्तर दिया की मैं भी तो किसान हु मैं भी तो खेती करता हु तो किसान ने बड़े ही आश्चर्य से उन्हें देखा और कहा की आप किसान है तो भिक्षा क्यों मांग रहे है तो संत ने किसान की चिंता का समाधान करते हुए कहा की मैं किसान हु लेकिन आत्मा की खेती करता हु , मैं ज्ञान के हल से श्रद्धा के बीज बोता हूँ, और तपस्या के जल से सींचता हूँ। और ये जो सतत यान है मुझे गंतव्य की ओर ले जा रहा है जहाँ न दुख है न संताप है। अगर अब तुम मुझे अपनी खेती का कुछ भाग मुझे देते हो तो मैं भी अपनी खेती का कुछ भाग तुम्हे देता हु तो बताओ मैं तुमसे भिक्षा खा मांग रहा हूँ। पंडित जी ने बताया की हम तो संतो को एक समय बाद मिटने वाली चीजे देते है लेकिन महात्मा हमें कभी न मिटने वाला नाम भजन का फल हमें देते है। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है। भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए। अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है। श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।
श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

23Jan 2019

कल रात्रि कुम्भ, प्रयागराज में स्वामी चिदानंद सरस्वती मुनि जी से भेंटकर आशीर्वाद लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। संतो का सानिध्य पाकर, उनके आचार-विचार को आत्मसात करके जो आनन्द इस जगत में मिलता है वो कहीं नहीं मिल सकता।

कल रात्रि कुम्भ, प्रयागराज में स्वामी चिदानंद सरस्वती मुनि जी से भेंटकर आशीर्वाद लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। संतो का सानिध्य पाकर, उनके आचार-विचार को आत्मसात करके जो आनन्द इस जगत में मिलता है वो कहीं नहीं मिल सकता।

संत है तो जगत है।

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव का एक कारण सत्संग से दूर होना। संतो के सानिध्य से हमें ईश्वरीय शक्ति का आभास होता है जिससे हम पाप से भी बचते है। इसलिए प्रयत्न कर सत्संग जरूर जाये।

23Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 18 जनवरी से 24 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 30 बजे से 6 बजे तक स्थान - शान्ति सेवा शिविर सेक्टर न.-13 नागवासुकी मार्ग से पूर्व की तरफ हर्षवर्धन मार्ग (पूर्वी पट्टी ) कुम्भ मेला प्रयागराज में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 18 जनवरी से 24 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 30 बजे से 6 बजे तक स्थान - शान्ति सेवा शिविर सेक्टर न.-13 नागवासुकी मार्ग से पूर्व की तरफ हर्षवर्धन मार्ग (पूर्वी पट्टी ) कुम्भ मेला प्रयागराज में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

हमारे देश का विश्व भर में परचम फहरा रहा है अक्षय वट-देवकीनंदन जी

संतो की आज्ञा सेवा और संग हमारे जीवन को मंगलमयी बनाता है।

विश्व का हृदय है प्रयागराज-देवकीनंदन जी

परम पूज्य राष्ट्रीय संत श्री गोविन्द देव गिरी जी महाराज ने षष्ठम दिवस पर कथा पंडाल में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई और पूज्य महाराज श्री द्वारा शॉल पहना कर उनका स्वागत किया गया। उसके बाद श्री गोविन्द देव गिरी जी महाराज ने मंच से कथा पंडाल में आये हुए भक्तो को आशीर्वचन भी दिए।

कथा के मध्य में अनंत श्री विभूषित श्रीमद जगदगुरु रामानंद आचार्य जी महाराज जी कथा पंडाल में पहुंचे और पूज्य महाराज श्री द्वारा शॉल पहना कर उनका स्वागत किया । उसके बाद अनंत श्री विभूषित श्रीमद जगदगुरु रामानंद आचार्य जी महाराज जी ने मंच से कथा पंडाल में आये हुए भक्तो को आशीर्वचन दिए और कहा की भागवत महा पुराण प्रेम शास्त्र है।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने" मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है भजन भक्तो को श्रवण कराया" साथ ही महाराज श्री ने बताया की संतो का संग संतो की वाणी संतो की सेवा निश्चित तौर पर मंगलमयी है। हमारे जीवन में नित्य संतो की आज्ञा, संतो की सेवा और संतो का संग रहे तो हमारा जीवन कभी अमंगल नहीं हो सकता। पंडित जी ने बताया कि प्रयागराज की ये पावन भूमि ये धरा धाम समस्त विश्व का हृदय है विश्व की आत्मा है जहाँ चारो वेदो के ज्ञाता श्री ब्रह्मा जी महाराज प्रथम यहां यज्ञ करते है और पूरी मानव जाती को धर्म के रास्ते पर चलना सिखाते है। साथ ही अक्षय वट पुरे विश्व को बता रहा है की सत्य सनातम धर्म क्या है इसको मिटाने वालों ने कितनी कोशिशे की लेकिन इसे मिटा न सकें। साथ ही महाराज श्री ने बताया की अक्षय वट हमारे देश का दर्शन और परचम दोनों ही फेहरा रहा है। क्यूंकि सनातन धर्म में हमें कुछ सीखना नहीं पड़ता समर्पण भक्ति धर्म दान ये हमारे खून में है लेकिन युग युगान्तर से पाप में लिप्त हुए जीव ये सब भूल गए है उन्हें बस ये स्मरण करने की आवशयकता है चाहे वो सुन कर हो जाए या पढ़ कर और जब हम संतो के पास जाते है तो उनकी वाणी सुन कर हमें स्मरण हो जाता है की संतो का सानिध्य हमारे जीवन को मंगलमय करता है। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

21Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 18 जनवरी से 24 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 30 बजे से 6 बजे तक स्थान - शान्ति सेवा शिविर सेक्टर न.-13 नागवासुकी मार्ग से पूर्व की तरफ हर्षवर्धन मार्ग (पूर्वी पट्टी ) कुम्भ मेला प्रयागराज में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।कथा के चौथे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।जिनके कर्म श्रेष्ट होते है वो संसार को सुंदर बनाते है। 

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 18 जनवरी से 24 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 30 बजे से 6 बजे तक स्थान - शान्ति सेवा शिविर सेक्टर न.-13 नागवासुकी मार्ग से पूर्व की तरफ हर्षवर्धन मार्ग (पूर्वी पट्टी ) कुम्भ मेला प्रयागराज में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
कथा के चौथे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
जिनके कर्म श्रेष्ट होते है वो संसार को सुंदर बनाते है। 
विचार वो होते है जो मेरे साथ दुसरो के भी काम आ सकें - देवकीनंदन जी 
उस सुंदरता का कोई मोल नहीं जिनमे उदारता और श्रेष्ठता न हो - पंडित जी 
कथा की शुरुआत करते हुए महाराज श्री ने पूर्णिमा के पावन दिवस पर स्नान के महत्व के बारे में बात करते हुए बताया की आप सभी बहुत सौभाग्य शाली है क्यूंकि इस पावन दिन पर आपको त्रिवेणी संगम पर स्नान करने का मौका मिला है, और ये सब बिना प्रभु की कृपा के नहीं हो सकता। उसके बाद महाराज श्री ने "अरे मन मुसाफिर तुझको निकलना पड़ेगा किराये का घर खाली करना पड़ेगा" बहुत ही सुन्दर भजन कथा पंडाल में आये हुए भक्तों को श्रवण कराया और बताया की जितना धर्म कामना है पुण्य करना है दान देना है कुम्भ के इस पावन पर्व में कीजिये क्यूंकि यहां किये हुए धर्म का लाभ आपको सामान्य दिनों से लाखो गुना मिलेगा। महाराज श्री ने एक दिव्यांग व्यक्ति और एक सुन्दर महिला की एक प्लेन की घटना क्रम सुनाते हुए हमें समझाया की हम लोगों को सिर्फ अपना तन ही सुन्दर नहीं रखना चाहिए हमें अपने मन और विचारों को भी सुन्दर बनाना चाहिए क्यूंकि जिनके कर्म श्रेष्ट होते है वो संसार को सुंदर बनाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाते है। इसीलिए उस सौन्दर्यता का कोई मोल नहीं है अगर उनके विचारों में उदारता और श्रेष्ठता न हो। इसलिए हमें कभी भी अपनी सुंदरता पर घमंड नहीं करना चाहिये अगर घमंड करना ही है तो इस बात पर करें की आपको ठाकुर जी ने मानव जीवन दिया है, इस मानव जीवन में सुन्दर विचारों के साथ हमको आगे बढ़ना चाहिए।साथ ही पंडित जी ने बताया की विचार वो होते है जो मेरे साथ दुसरो के भी काम आ सकें और उन विचारो का पालन करने वाला ही भगवान् को प्रिय होता है। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया। शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे। महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।" जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया। इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

21Jan 2019

आज पौष पूर्णिमा के पावन अवसर पर प्रातः गंगा में स्नान किया। इसके पश्चात दिन-भर संतों के सानिध्य प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। जगदगुरु रामानन्दाचार्य पूज्य स्वामी हंसदेवाचार्य जी महाराज से भेंट कर आशीर्वाद प्राप्त करने का सौभाग्य मिला। साथ ही उनके द्वारा आयोजित श्री हनुमंत कथा में जाकर पूज्य गोविन्द गिरी जी महाराज के श्रीमुख से श्री हनुमंत कथा श्रवण की।

आज पौष पूर्णिमा के पावन अवसर पर प्रातः गंगा में स्नान किया। इसके पश्चात दिन-भर संतों के सानिध्य प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। जगदगुरु रामानन्दाचार्य पूज्य स्वामी हंसदेवाचार्य जी महाराज से भेंट कर आशीर्वाद प्राप्त करने का सौभाग्य मिला। साथ ही उनके द्वारा आयोजित श्री हनुमंत कथा में जाकर पूज्य गोविन्द गिरी जी महाराज के श्रीमुख से श्री हनुमंत कथा श्रवण की।

कथा में प्रखर विद्वान,श्रीराम भक्त पूज्य श्री मुरारी बापूजी महाराज से भी भेंट कर आशीर्वाद प्राप्त किया। हमारे जीवन का उद्देश्य तो मात्र आत्म विकास है लेकिन लोग विषय भोगो में उलझकर आत्मा के आनंद से वंचित रह जाते हैं।संतो के सानिध्य और साधना में बिताया हुआ समय ही जीवन का सार्थक समय है।

जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी राघवाचार्य जी महाराज से भेंट करने का सौभाग्य मिला। इसके पश्चात जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी श्री वासुदेवाचार्य श्री विद्याभास्कर जी महराज से भी भेंट की। संतो के सानिध्य बिना मानव जीवन व्यर्थ है बाहरी ज्ञान ओर बाहरी सफलता से ओत-प्रोत होकर भी उनका जीवन व्यर्थ है जिनके जीवन में संतों का सानिध्य नहीं है।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

20Jan 2019

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कुम्भ में श्री प्रखर जी महाराज के कैम्प में भाग लिया। और स्कूल के बच्चों की शिक्षा के बारे में चर्चा की। साथ ही संस्कृति को कैसे आगे बढ़ाया जाये ये भी छात्रों को बताया और महाराज श्री ने चिकित्सालयों को देखा और मौजूद डॉक्टरों से लोगों की बीमारियों के इलाज हेतु चर्चा की। कैम्प का निरक्षण करने के पश्चात महाराज श्री ने श्री प्रखर जी महाराज को जनसेवा के लिए साधुवाद दिया और उसके बाद रावतपुरा सरकार जी महाराज के कैम्प में भाग लिया।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कुम्भ में श्री प्रखर जी महाराज के कैम्प में भाग लिया। और स्कूल के बच्चों की शिक्षा के बारे में चर्चा की। साथ ही संस्कृति को कैसे आगे बढ़ाया जाये ये भी छात्रों को बताया और महाराज श्री ने चिकित्सालयों को देखा और मौजूद डॉक्टरों से लोगों की बीमारियों के इलाज हेतु चर्चा की। कैम्प का निरक्षण करने के पश्चात महाराज श्री ने श्री प्रखर जी महाराज को जनसेवा के लिए साधुवाद दिया और उसके बाद रावतपुरा सरकार जी महाराज के कैम्प में भाग लिया। और गौ माता की सेवा के लिए चर्चा की।

 

20Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 18 जनवरी से 24 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 30 बजे से 6 बजे तक स्थान - शान्ति सेवा शिविर सेक्टर न.-13 नागवासुकी मार्ग से पूर्व की तरफ हर्षवर्धन मार्ग (पूर्वी पट्टी ) कुम्भ मेला प्रयागराज में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया। कथा के तीसरे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। 

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 18 जनवरी से 24 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 30 बजे से 6 बजे तक स्थान - शान्ति सेवा शिविर सेक्टर न.-13 नागवासुकी मार्ग से पूर्व की तरफ हर्षवर्धन मार्ग (पूर्वी पट्टी ) कुम्भ मेला प्रयागराज में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया। कथा के तीसरे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। 
भागवत कथा के तीसरे दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि उपस्थित सभी भक्त, माताओं- बहनों और भाई - बंधुओं बाल - गोपाल प्रयाग की पावन भूमि पर प्रयागराज की विशेष अनुकम्पा का अभिवर्षन आप सब भक्त के ऊपर यहां प्रयागराज में अतिसुन्दर दर्शन माँ भगवती गंगा का भक्ति स्वरूप मार्ग यमुना का और ज्ञान स्वरूप माँ सरस्वती का गुप्त दर्शन ये जो संतो की वाणी है। ये आप को गुप्त दर्शन हो रहा है। प्रभु के गुणान्वादो को गायन करने वाले सब ये माँ सरस्वती का ही स्वरुप है। गंगा यमुना का प्रत्यक्ष दर्शन आप वहाँ कर रहे है। और ज्ञान रुपी सरस्वती का दर्शन आप हर एक कथा पंडाल में कर रहे है। त्रवेणी संगम में आप स्नान कर रहे है। ये आप का भाग्य है। महाराज जी कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तो को "ये अद्भुत संसार हमने देख लिया" भजन श्रवण कराया। महाराज जी ने कहा कि माधव के सामान कोई देवता नहीं है। गंगा के सामान कोई दूसरी नदी नहीं है। और त्रवेणी के सामान सदृश कोई दूसरा क्षेत्र नहीं है। यहाँ माधव भगवान के दर्शन होते है। अक्षयवट के दर्शन होते है। इस अक्षयवट के बहुत बर्षो से पहले से सनातन धर्म प्रेमी दर्शन नहीं कर सकते थे। सबके लिए दर्शन नहीं होते थे। लेकिन इस यू पी सरकार ने बहुत अच्छा काम किया की इस बार हर कोई श्रोता दर्शक श्रद्धालु जो चाहये वो अक्षयवट के दर्शन कर सकता है। ये बहुत अच्छा काम किया है। सरकारों का काम है। लोगों को अपनी अपनी आस्थाओं से जोड़ना बहुत बर्षो से अक्षयवट से हम लोगो को दूर रखा गया। ये अक्षयवट साधारण नहीं है। आप इसके तत्व को और महत्त्व को समझिये। जब मुगलों ने आक्रमण किया हमारे इस देश के ऊपर। इसका प्राकर्तिक को प्राचीन नाम ही है प्रयागराज इस अक्षयवट की विशेष महिमा ये है। प्रलय कालीन समय पर भी जो कभी मिटे ही न वही अक्षयवट है। मिट जाये वो अक्षय कैसे हो सकता है। अक्षय कभी क्षय नहीं होता। प्रलय कालीन समय पर भी जब प्रलय हो जाती है समस्त ब्राह्मण में जल ही जल हो जाते है उस समय पर भी ये अक्षयवट रहते है। और इसी अक्षयवट पर हमारे ठाकुर जी बाल - गोपाल रूप धारण करके अपने आपको ही जिसको कहते है आत्म रमण करते है। महाराज जी के प्रसंग समाप्त करते समय यू .पी सरकार का धन्यबाद किया। सत्य कर्म कीजिये लेकिन गाये नहीं - श्री देवकीनंदन ठाकुर जी
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।

तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।

 

21Jan 2019

आज पौष पूर्णिमा एवं कुम्भ के पावन अवसर पर धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने गंगा में स्नान किया।

आज पौष पूर्णिमा एवं कुम्भ के पावन अवसर पर धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने गंगा में स्नान किया।

पुराणों के अनुसार पौष पूर्णिमा के अवसर पर जो भी व्यक्ति विधिपूर्वक प्रात:काल स्नान करता है उसे मोक्ष प्राप्ति होती है। कुम्भ में पौष पूर्णिमा का यह स्नान आरोग्य व अमरत्व का द्योतक है। इस दिन त्रिवेणी संगम में स्नान करने का अति-विशेष महत्व है।

आप सभी को पौष पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं। जप,तप व दान के लिए प्रचलित यह दिवस हिन्दू धर्म की आस्था का महान पर्व है।

19Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 18 जनवरी से 24 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 3: 00 बजे से 6 बजे तक स्थान - शान्ति सेवा शिविर सेक्टर न.-13 नागवासुकी मार्ग से पूर्व की तरफ हर्षवर्धन मार्ग (पूर्वी पट्टी ) कुम्भ मेला प्रयागराज में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। 

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 18 जनवरी से 24 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 3: 00 बजे से 6 बजे तक स्थान - शान्ति सेवा शिविर सेक्टर न.-13 नागवासुकी मार्ग से पूर्व की तरफ हर्षवर्धन मार्ग (पूर्वी पट्टी ) कुम्भ मेला प्रयागराज में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। 
भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

वैराग्य भूमि है प्रयाग - ठाकुर जी 
सत्संग का मतलब होता है सत्य का संग -देवकीनंदन जी

कथा की शुरुआत महाराज श्री ने माटी में मिले माटी और पानी में पानी बड़ा ही सुन्दर भजन भक्तो को श्रवण कराया उसके बाद महाराज श्री ने बताया की वैराग्य भूमि है प्रयाग इस प्रयाग में हम सभी को वैराग्य की प्राप्ति होती है हमें जो पंच तत्वों से प्राप्त मानव शरीर है ये हमारा साथ कहा तक देगा ये जो शरीर है बस पंच तत्वों तक ही सिमित है और पंचतत्वों में ही इसको पूर्णता समां जाना है। मान, बढ़ाई, पद, प्रतिष्ठा, ईर्ष्या, काम, क्रोध सब इधर ही छूट जाना है हमारे साथ हमारा शरीर भी नहीं जायगा ये भी यही छूट जायगा। यही अकाट्य सच है। साथ ही महाराज श्री ने बताया की प्रयाग में कल्पवास करने वाले लोगों को 21 नियमो का पालन करना चाहिए जिनके बारे में विस्तार से महाराज श्री ने कथा पंडाल में आये हुए लोगों को बताया।पंडित जी ने बताया की सत्संग का मतलब होता है सत्य का संग जिससे हमारा चित ठाकुर में लग जाता है और धीरे- धीरे संसार से मन हट कर भगवान् में लगने लगता है। और इसी के लिए हमे मानव जीवन मिला है जो की सिर्फ सत्संग से ही संभव है। ये जो प्रयागराज की भूमि है ये बड़ी पवित्र भूमि है क्यूंकि हमारे जितने भी देवी देवता है वो यह किसी न किसी शरीर में अनेको अनेक रूप में यही पर विचरण करते रहते है। क्यूंकि देवी देवताओं को भी भागवत सुनने का अवसर यही मिलता है।क्यूंकि यहां किये हुए दान का धर्म का तप का कथा श्रवण का फल कई गुना ज्यादा मिलता है। इसलिए अगर हमे मानव जीवन में कुंभ में प्रयाग में कल्पवास का मौका मिला है तो हमें अपने उस लोक को सवारना चाहिए। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है। श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए। यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

19Jan 2019

कल देर रात्रि पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कुंभ प्रयागराज में भ्रमण करते हुए अनेको दिव्य संतो के दर्शन किए।

कल देर रात्रि पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कुंभ प्रयागराज में भ्रमण करते हुए अनेको दिव्य संतो के दर्शन किए। इस दौरान महाराज श्री एक ऐसे दिव्य संत से मिले जो लगभग 10 साल से अपना हाथ ऊपर करके भगवान की तपस्या कर रहे हैं। महाराज श्री ने इन संत के दर्शन कर उनसे भगवान की भक्ति, तपस्या आदि पर चर्चा की और कुछ समय साथ बैठकर भजन-सत्संग किया।

 

18Jan 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज कोलकाता में आयोजित विशाल श्रीमद्भागवत कथा के भव्य आयोजन के बाद आज सुबह लखनऊ एयरपोर्ट पहुंचे, जहाँ लखनऊ समिति के भक्तों ने महाराज श्री का स्वागत किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज कोलकाता में आयोजित विशाल श्रीमद्भागवत कथा के भव्य आयोजन के बाद आज सुबह लखनऊ एयरपोर्ट पहुंचे, जहाँ लखनऊ समिति के भक्तों ने महाराज श्री का स्वागत किया। उसके बाद कुम्भ प्रयागराज के लिए प्रस्थान किया, जहां पर पूज्य महाराज श्री द्वारा 18 से 24 जनवरी तक श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जाएगा। और इसका सीधा प्रसारण आप युटुब पर लाइव देख सकेंगे।

18Jan 2019

विश्व शान्ति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 18 से 24 जनवरी तक श्रीमद्भागवत कथा का भव्य आयोजन किया जा रहा है जिसके चलते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज प्रयागराज पहुंचे। जहाँ प्रयाग समिति के भक्तों ने फूलमाला अर्पित कर महाराज श्री का भव्य स्वागत किया।

विश्व शान्ति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 18 से 24 जनवरी तक श्रीमद्भागवत कथा का भव्य आयोजन किया जा रहा है जिसके चलते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज प्रयागराज पहुंचे। जहाँ प्रयाग समिति के भक्तों ने फूलमाला अर्पित कर महाराज श्री का भव्य स्वागत किया। आयोजित भागवत कथा का सीधा प्रसारण आप युटुब पर लाइव देख सकते है।

18Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 18 जनवरी से 24 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 3: 00 बजे से 6 बजे तक स्थान - शान्ति सेवा शिविर सेक्टर न.-13 नागवासुकी मार्ग से पूर्व की तरफ हर्षवर्धन मार्ग (पूर्वी पट्टी ) कुम्भ मेला प्रयागराज में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। 

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 18 जनवरी से 24 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 3: 00 बजे से 6 बजे तक स्थान - शान्ति सेवा शिविर सेक्टर न.-13 नागवासुकी मार्ग से पूर्व की तरफ हर्षवर्धन मार्ग (पूर्वी पट्टी ) कुम्भ मेला प्रयागराज में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। 
भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

तीर्थो का राजा है प्रयागराज - देवकीनंदन ठाकुर जी 
धर्म की राजधानी है प्रयागराज- ठाकुर जी 
हम सभी ईश्वर के अंश है -देवकीनंदन ठाकुर जी

कथा की शुरुआत प्रयागराज कुंभ मेले में आए संतो के आशीर्वचन से हुई। कथा पंडाल में महाराज श्री द्वारा आये हुए संतो को शॉल पहना कर उन्हें सम्मानित किया गया। 
कथा पंडाल में परम पूज्य यज्ञ सम्राट महा मंडलेश्वर स्वामी प्रखर जी महाराज,स्वामी विद्या चैतन्य जी महाराज,महंत श्री नारायण गिरि जी महाराज,वाल योगी स्वामी जगदीश्वरा नन्द जी महाराज और श्रीमद जगतगुरु पीपा दुवाराचार्य बलराम दास देवाचार्य जी महाराज उपस्थित रहें। संतो के आशीर्वचन के बाद मंच से गणेश वंदना की स्तुति प्रस्तुत की गई। उसके बाद कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने उत्तर प्रदेश की सरकार को इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज करने पर साधुवाद दिया और भक्तो के साथ हरी नाम संकीर्तन कर प्रयागराज में निवास करने वाले सनकादिक ऋषि के बारे में बताया। साथ ही कहा की प्रयागराज में ब्रह्मा जी ने सृष्टि निर्माण के लिए सर्वप्रथम पहला यज्ञ यहां किया था। और हम सभी लोग बहुत सौभाग्य शाली है की प्रयागराज जैसी पवित्र धरती पर हमें श्रीमद भगवत कथा सुनने का मौका मिल रहा है। साथ ही महाराज श्री ने बताया की अगर जीवन में ईश्वरीय शक्ति को जांनना है तो अपने आप से दो सवाल जरूर करें की मैं कौन हु और वो कौन है जिसने मुझे इस धरती पर भेजा है और मेरे जीवन का क्या उद्देश्य है। जिस दिन आपको ये बात समझ में आ गई उस दिन कुछ और समझने के लिए नहीं बचेगा।पंडित जी ने बताया की अगर आप किसी पावन धरती पर कोई धर्म का काम करते है या कथा सुनते है तो आपके पाप मिट जाते है हमारा कल्याण होता है। लेकिन अगर आप यहाँ भी पाप करोगे तो वो कही ख़त्म नहीं होगा। क्यूंकि संसार में किया हुआ पाप केवल " पाप " है लेकिन तीर्थ पर किया हुआ पाप वज्रपाप होता है जो कही समाप्त नहीं हो सकते। महाराज श्री ने कहा की प्रयाग में आये हुए सभी भक्तो से निवेदन है की अपने आप को पहचाने और इस कुम्भ के मेले में अपने स्वाभिमान,अहंकार को ऐसा खो दे की वो आपको मिल ही ना पाए। हमें बड़ी मुश्किल से ये नर तन मिला है और इसका और हमे इसका सदुपयोग करना चाहिए। 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। 
श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

12Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 11 जनवरी से 17 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन शाम 4: 00 बजे से 7 बजे तक स्थान - सॉल्ट लेक सी डी पार्क कोलकाता में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। दूसरे दिन की भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया गया ।पूज्य महाराज श्री द्वारा पुन: कोलकाता में कथा का श्रवण करवाया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 11 जनवरी से 17 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन शाम 4: 00 बजे से 7 बजे तक स्थान - सॉल्ट लेक सी डी पार्क कोलकाता में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। दूसरे दिन की भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया गया ।
पूज्य महाराज श्री द्वारा पुन: कोलकाता में कथा का श्रवण करवाया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। 
भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई।
महाराज जी ने कथा प्रारम्भ करते हुए कहा की हर व्यक्ति को एक अतिथि को भोजन जरूर कराना चाहिए। ऐसा नियम होना चाहिए। और महाराज जी ने कहा की जब तक अतिथि भोजन ग्रहण न कर ले तब तक खुद भोजन नहीं करना चाहिए। कोई जरूरतमद भूका बैठा हो तो उसे भोजन कराके खुद भोजन करो।लेकिन अतिथि को भोजन करना चाहिए ये शास्त्र से संबंध बात है। सेठ जी बहुत सेवा करते थे उनके घर में कई संत आये सेठ जी को ये अवसर मिला की जब संत भोजन करें तो उनकी झूठी पत्तल उठाओ। "जितनी छोटी सेवा करोगे उतने ही विन्रम हो जाओगे। जितने विन्रम हो जाओगे उतने ही भगवान को प्रिय लगोगे"। आपका अहंकार आपको भगवान से दूर करता है। हाथ जोड़ने से थोड़ी कोई विन्रम हो जाता है। आपकी वाणी में आपकी विन्रमता है। आपके कर्म में आपकी विन्रमता ,आपके स्वाभाव में आपकी विन्रमता झलकनी चाहिए। आप न कहो की मैं विन्रम हो गया लेकिन आपके जानने वाले लोग कहने लग जायेगे की आप विन्रम हो गए इन में बदलाव आ गया तो समझना की कथा का असर हो गया। और आप में ये विन्रमता तब तक नहीं आएगी जब तक आप छोटी से छोटी सेवा नहीं करोगे। 
1 - संसार का सबसे बड़ा सुख है परमात्मा का मिलन - श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज 
2- जिसने कलयुग को बचा रखा है वो है दान - ठाकुर जी महाराज
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। 
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

13Jan 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में पुन: सीडी पार्क, सॉल्ट लेक, कोलकाता में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन स्नेही परिवार के द्वारा 11-17 जनवरी 2019 तक करवाया जा रहा है।तृतीय दिवस में पूज्य महाराज श्री ने राजा परीक्षित की कथा का वृतान्त भक्तों को श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में पुन: सीडी पार्क, सॉल्ट लेक, कोलकाता में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन स्नेही परिवार के द्वारा 11-17 जनवरी 2019 तक करवाया जा रहा है।

तृतीय दिवस में पूज्य महाराज श्री ने राजा परीक्षित की कथा का वृतान्त भक्तों को श्रवण कराया।

"इच्छाएं कभी पूरी नहीं होती",
"जीवन में भटकाव आ जाये तो संतो की आवयश्कता होती है" - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है। तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।

शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है।

राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे। भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

आप सभी भक्तो से निवेदन है की अपने परिवार व् इष्ट मित्रो सहित भारी से भारी संख्या में पधारकर कथा का रसपान करें एवं अपने जीवन को कृतार्थ करें।

14Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 11 जनवरी से 17 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन शाम 4: 00 बजे से 7 बजे तक स्थान - सॉल्ट लेक सी डी पार्क कोलकाता में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 11 जनवरी से 17 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन शाम 4: 00 बजे से 7 बजे तक स्थान - सॉल्ट लेक सी डी पार्क कोलकाता में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

हमारे चरित्र का निर्माण करती है कथाएं - महाराज श्री 
परिवर्तन का नाम ही जीवन है - देवकीनंदन जी

जो ईश्वर में अपने आप को समाहिस्त न कर सकें वो नरको की यातना भोगते है -देवकीनंदन जी

जो अपने "आज" को सवारते है उनका आने वाला कल अपने आप सुधर जाता है - ठाकुर जी

कथा के चौथे दिन मुख्य यजमान गोपाल स्नेही जी का पूरा परिवार व हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

पूज्य महाराज श्री द्वारा पुन: कोलकाता में कथा का श्रवण करवाया जा रहा है।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
कथा की शुरुआत करते हुए महाराज श्री ने राधा रानी जी को याद करते हुए "राधे राधे जपले बंदे" भजन कथा पंडाल में भक्तो को श्रवण कराया। महाराज श्री ने चैतन्य महाप्रभु के बारे में बताते हुए कहा की गोपी प्रेम कैसा होता है अगर ये जानना हो तो आप चैतन्य महाप्रभु के बारे में जाने।साथ ही बहुत बड़े दार्शनिक सुखरात जी की कहानी भी भक्तो को अपने श्रीमुख से श्रवण कराई की एक बार सुखरात जी समुन्दर के तट पर टहल रहे थे तो उन्होंने एक बच्चे को रोता हुआ देखा सुखरात जी ने उस बच्चे से पूछा की तुम रो क्यों रहे हो तो उस बच्चे ने बताया की महाराज मुझे सुबह से शाम हो गई की मैं इस सागर को अपने कटोरे में समाना चाहता हु लेकिन ये सागर मेरे इस कटोरे में समा ही नहीं रहा है इस लिए मैं रो रहा हु। तो फिर उस बच्चे की इतनी बात सुन कर सुखराज जी भी रोने लगे तब बच्चा हैरान हो जाता है और पूछता है की महाराज जी अभी तक तो मैं रो रहा था अब आप क्यों अचानक से रोने लगे तब सुखरात जी कहते है कि जैसे तू इस समंदर को अपने इस कटोरे में समाने में निष्फल हो रहा है वैसे ही मैं भी इस मानव रूपी कटोरे में उस परमात्मा रूपी सागर को समाहिस्त करना चाहता हु लेकिन तेरी ही तरह मैं भी निष्फल हो रहा हु। ये सुनते ही उस बच्चे ने वो कटोरा समुन्दर में फेंक दिया और कहा की अगर इस कटोरे में समुन्द्र नहीं आ सकता तो क्या हुआ ये कटोरा तो समुन्दर में समा सकता है,और ये सीख उस बच्चे ने सुखरात जी को दी। महाराज श्री ने बताया की जो ईश्वर में अपने आप को समाहिस्त न कर सकें वो नरको की यातना भोगते है कभी किसी जन्म में कभी किसी जन्म में और ये संसार बड़ा मतलबी है जो समय के हिसाब से आपका फायदा उठाता है,लेकिन हमारे ठाकुर न आपके पैसे देखते है ना आपके कपडे देखते है वो तो आपकी भक्ति और आपका भाव देखते है। इसलिए हमें अपने आज का सदुपयोग करना चाहिए क्यूंकि वर्तमान भगवान् के द्वारा दिया हुआ बहुत सुन्दर गिफ्ट है। जो अपने आज को सवारते है उनका आने वाला कल अपने आप सुधर जाता है। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया। शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे। महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।" जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया। इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

15Jan 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में पुन: सीडी पार्क, सॉल्ट लेक, कोलकाता में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन स्नेही परिवार के द्वारा 11-17 जनवरी 2019 तक करवाया जा रहा है।पंचम दिवस में पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं की कथा का सुन्दर वृतान्त भक्तों को श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में पुन: सीडी पार्क, सॉल्ट लेक, कोलकाता में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन स्नेही परिवार के द्वारा 11-17 जनवरी 2019 तक करवाया जा रहा है।

पंचम दिवस में पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं की कथा का सुन्दर वृतान्त भक्तों को श्रवण कराया।

"हड़बड़ी में तो गड़बड़ी ही होती है।"

"शार्ट-कट करके जिसने जो कमाया है वो शार्ट-टाइम ही रहेगा। इसीलिए कभी भी शार्ट-कट नहीं अपनाना चाहिए।"

महाराज श्री ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की आज का दिन बहुत ही पावन है क्योंकि आज भगवान सूर्य अपने पुत्र शांति के घर में जाते हैं और वहां पर १ महीने तक रहते हैं। आज सूर्य मकर राशि में प्रवेश कर रहे हैं।

आज के दिन भगवान विष्णु ने दैत्यों का विनाश किया था और युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी जिस वजह से मकर संक्रांति के दिन का महत्व और बढ़ जाता है।

महाराज श्री ने आज बहुत ही सुंदर वृतान्त भक्तों को श्रवण कराया। एक बार एक जगल में गाय चारा चर रही थी की तभी पीछे से एक शेर आ गया और उस गाय को पकड़ने के लिए उसके पीछे भागा। गाय भी भागने लगी और उस शेर से बचने के लिए वह एक सरोवर की कूद गई, शेर भी पीछे-पीछे उस सरोवर में कूद गया। लेकिन सरोवर में पानी बहुत कम था और उसमे दलदल थी जिसकी वजह से दोनों उसमे फंस गए। गाय आगे थी और शेर पीछे था लेकिन शेर गाय तक पहुँच नहीं पा रहा था क्योंकि वो दलदल में फंस गया था। बहुत देर बीतने के बाद गाय शेर को देखकर हंसी, इस पर शेर ने कहा की तुम मरने वाली हो और हंस रही हो तुम्हे डर नहीं लग रहा क्या?

गाय ने शेर से पूछा की क्या तुम्हारा कोई मालिक है? शेर ने हँसते हुए कहा मैं जंगल का राजा हूँ मेरा कौन मालिक होगा!

गाय ने कहा मेरा मालिक है इसीलिए मैं बच जाउंगी, लेकिन तुम मर जाओगे। क्योंकि जैसे ही मेरा मालिक घर पहुंचेगा और गाय गिनेगा तो वो मुझे ढूंढ़ते हुए जंगल में आएगा और मुझे बचा कर ले जाएगा। लेकिन तेरा तो कोई मालिक नहीं है तो तुझे कौन बचने आएगा?

हुआ भी ऐसा ही की कुछ देर बाद गाय का मालिक जंगल में आ गया और गाय को बचा लिए।

इसके पश्चात महाराज श्री ने कहा की उस गाय की तरह हमे भी अपने जीवन में एक मालिक रखना चाहिए, जिसके प्रति हमारा पूर्ण समर्पण हो। जब भी आप पर कोई विपदा आएगी तो वो मालिक आपकी रक्षा करने जरूर आएगा। ये संसार सागर ही दलदल है, मेरा समर्पण ही गाय है और मेरा अहंकार ही सिंह/शेर है। मालिक कौन है? गुरु ही मालिक है। क्योंकि गुरु ही है जो इस संसार रुपी दलदल से निकलने में आपकी सहायता करता है।

आप सभी भक्तो से निवेदन है की अपने परिवार व इष्ट मित्रो सहित भारी से भारी संख्या में पधारकर कथा का रसपान करें एवं अपने जीवन को कृतार्थ करें।

16Jan 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में पुन: सीडी पार्क, सॉल्ट लेक, कोलकाता में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन स्नेही परिवार के द्वारा 11-17 जनवरी 2019 तक करवाया जा रहा है।षष्ठम दिवस में पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का सुन्दर वृतान्त भक्तों को श्रवण कराया। इसके साथ ही आज भगवान श्री कृष्ण के विवाह का उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में पुन: सीडी पार्क, सॉल्ट लेक, कोलकाता में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन स्नेही परिवार के द्वारा 11-17 जनवरी 2019 तक करवाया जा रहा है।

षष्ठम दिवस में पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का सुन्दर वृतान्त भक्तों को श्रवण कराया। इसके साथ ही आज भगवान श्री कृष्ण के विवाह का उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया।

"यदि आप धर्मात्मा हो तो किसी भी स्थिति में धर्म को नहीं छोड़ना चाहिए चाहे आपके प्राण क्यों न चले जाएँ।"

"पति धर्म है और पुत्र कर्म है। इसीलिए पतिव्रता स्त्री को पति का साथ पहले निभाना चाहिए।"

महाराज श्री ने कहा दिन में कम से कम एक बार का भोजन परिवार के साथ बैठकर करना चाहिए, इससे परिवार में एकता और प्यार बढ़ता है। लेकिन आज के समय में ऐसा बहुत कम हो रहा है। परिवार के सभी सदस्य अलग-अलग कमरे में बैठकर खाना खाते हैं। ऐसा तो राक्षस भी नहीं करते थे जैसा हम आजकल कर रहे हैं।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी।

इसके बाद महाराज श्री ने कहा की यज्ञ से देवताओं को बल मिलता है। इसीलिए यज्ञ करना चाहिए। यज्ञ करने से हम पितृ ऋण और देव ऋण से मुक्ति मिलती है। जहां कहीं भी यज्ञ होता है वहाँ पर आहुति जरूर डालनी चाहिए ,यज्ञ भगवान की परिक्रमा जरूर करनी चाहिए।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।

आप सभी भक्तो से निवेदन है की अपने परिवार व इष्ट मित्रो सहित भारी से भारी संख्या में पधारकर कथा का रसपान करें एवं अपने जीवन को कृतार्थ करें।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

11Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 11 जनवरी से 17 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन शाम 4: 00 बजे से 7 बजे तक स्थान - सॉल्ट लेक सी डी पार्क कोलकाता में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के प्रथम दिवस पर कथा के मुख्य यजमान गोपाल स्नेही जी का पूरा परिवार व हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। पूज्य महाराज श्री द्वारा पुन: कोलकाता में कथा का श्रवण करवाया जा रहा है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 11 जनवरी से 17 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन शाम 4: 00 बजे से 7 बजे तक स्थान - सॉल्ट लेक सी डी पार्क कोलकाता में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के प्रथम दिवस पर कथा के मुख्य यजमान गोपाल स्नेही जी का पूरा परिवार व हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। पूज्य महाराज श्री द्वारा पुन: कोलकाता में कथा का श्रवण करवाया जा रहा है। भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। गुरुदेव की कृपा आपको ठाकुर जी के दर्शन करा सकती है - देवकीनंदन जी मनवांछित इच्छाओं को पूर्ण करती है भागवत -देवकीनंदन जी ईश्वर को जाने बिना ये जीवन सफल नहीं होगा-पंडित देवकीनंदन जी जीवन में खुशिया बांटे अफवाहे नहीं -देवकीनंदन जी कथा की शुरुआत में कोलकाता (बंगाल )के शिष्य परिवार द्वारा गुरु वंदना "हमारे है श्री गुरु देव हमें किस बात की चिंता" गा कर महाराज श्री को नमन किया और उनका स्वागत किया। उसके बाद महाराज श्री ने बताया की जिस भाग्य में भागवत कथा सुनने का सौभाग्य होता है उस भाग्य के वर्णन कौन कर सकता है, महाराज श्री ने बताया की श्री माने होती है लक्ष्मी और भागवत माने होता है जहां सब उपस्थित हो भगवान भक्त और भक्ति सबका समावेश हो।तत्पश्चात महाराज श्री ने बहुत ही सुन्दर भजन श्री राधे गोविन्द भजन कथा पंडाल में भक्तो को श्रवण कराया। कथा के दौरान पश्चिम बंगाल के ऊर्जा मंत्री श्री शोभनदेब चटर्जी जी और तुलसी सिन्हा रॉय जी ने महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त कर श्रीमद भागवत कथा के प्रथम दिवस का रसपान किया। सर्वप्रथम महाराज श्री ने भागवत के प्रथम श्लोक का उच्चारण किया उसके बाद महाराज श्री ने बताया की हमारे अंदर ईश्वर को जानने की इच्छा होनी चाहिए क्यूंकि बिना ईश्वर को जाने हमें उनसे प्रेम नहीं होगा और ईश्वर को जाने बिना ये जीवन सफल नहीं होगा। इसलिए हमे अपने ईश्वर को जानने की कोशिश करनी चाहिए लेकिन गुरु कृपा के बिना ये सब संभव नहीं है।पंडित जी ने चिंता मणि और कल्पवृक्ष के बारे में बताते हुए कहा की अगर संसार में किसी को चिंतामणि मिल जाए तो वो जिस चीज के बारे में सोचेगा वो उसे प्राप्त होगा और कल्पवृक्ष का चमत्कार ये है की जो जीव उसके निचे बैठ कर कल्पना करेगा तो उसे स्वर्ग तक का भी सुख भोगने को मिल जायगा लेकिन चिंतामणि और कल्पवृक्ष सामर्थ नहीं है की वो आपको भगवान् के दर्शन करा सकें। लेकिन अगर गुरुदेव भगवान् की कृपा अगर हम पर हो जाए तो हैं साक्षात ठाकुर जी के दर्शन हो सकते है। देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

10Jan 2019

आस्था के महापर्व पवित्र त्रिवेणी संगम प्रयागराज में लगने जा रहें कुम्भ में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 18 से 24 जनवरी 2019 तक श्रीमद् भागवत कथा,3 से 5 फरवरी 2019 तक श्रीकृष्ण कथा,10 से 18 फरवरी 2019 तक श्री राम कथा का विशाल आयोजन विश्व शान्ति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शान्ति सेवा समिति प्रयाग के तत्वाधान में किया जा रहा है।

आस्था के महापर्व पवित्र त्रिवेणी संगम प्रयागराज में लगने जा रहें कुम्भ में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 18 से 24 जनवरी 2019 तक श्रीमद् भागवत कथा,3 से 5 फरवरी 2019 तक श्रीकृष्ण कथा,10 से 18 फरवरी 2019 तक श्री राम कथा का विशाल आयोजन विश्व शान्ति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शान्ति सेवा समिति प्रयाग के तत्वाधान में किया जा रहा है। आयोजन की तैयारियां पिछले कई दिनों से चल रही थी जिसके तहत आज विश्व शान्ति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी ने रिब्बन काट कर शिविर का उद्धघाटन किया। उसके बाद सर्वप्रथम पुरे विधि विधान से दीप प्रज्वल्लित कर भगवान् श्री गणेश जी की पूजा अर्चना की गई। उद्धघाटन के दौरान कथा के यजमान और प्रयाग व कानपूर समिति के भारी संख्या में भक्त मौजूद रहें। आप सभी भक्तो से निवेदन है की ज्यादा से ज्यादा संख्या में पहुंचकर इस पावन पर्व पर इस अद्भुत संगम का लाभ उठायें जहां श्रीमद्भागवत कथा, राम कथा, श्री कृष्ण कथा एवं कुंभ का एक साथ समावेश होने जा रहा है, ऐसा अवसर जीवन में बार बार नहीं मिलता।।

11Jan 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से कलकत्ता में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन 11 जनवरी से 17 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 4 : 00 बजे से 7 :00 बजे तक किया जा रहा है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से कलकत्ता में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन 11 जनवरी से 17 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 4 : 00 बजे से 7 :00 बजे तक किया जा रहा है।

महाराज श्री के कलकत्ता एयरपोर्ट पहुंचने पर सैंकड़ो की संख्या में भक्तों ने पुष्प वर्षाकर भव्य स्वागत किया। और राधे नाम के जयकारे भी लगाए।

कलकत्ता के सभी भक्तो से निवेदन है की ज्यादा से ज्यादा संख्या में आप कथा स्थल पर पहुंचे और महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का रसपान करें।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

9Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 जनवरी से 09 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 00 बजे से 5 बजे तक स्थान - धोबी घाट, भूतेश्वर मंदिर रोड़, भूतेश्वर फील्ड, सहारनपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 जनवरी से 09 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 00 बजे से 5 बजे तक स्थान - धोबी घाट, भूतेश्वर मंदिर रोड़, भूतेश्वर फील्ड, सहारनपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
ठाकुर जी की कृपा हमें भागवत सुनने का सौभाग्य प्राप्त कराती है -पं. देवकीनंदन
वेद जिसे स्वीकृति दे वो धर्म है जिसे अस्वीकृत दे वो अधर्म है- देवकीनंदन जी
दुसरो को सुख देना सबसे बड़ा धर्म है- ठाकुर जी
हमारा जीवन सत्कर्मो से भरा होना चाहिए -देवकीनंदन जी
धर्म और संस्कारो का सदा आदर करें -पंडित जी
भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
कथा के संपन्न दिवस पर महाराज श्री ने कथा की शुरुआत में कहा कि ठाकुर जी की जब कृपा जब हम पर होती है हमें तभी भागवत कथा सुनने का अवसर मिलता है। उसके बाद बहुत ही सुन्दर भजन "मेरे मन मोहन दिलदार" गा कर कथा की शुरुआत की। महाराज जी ने बताया की व्यक्ति इस मृत्यु लोक पर अकेला ही आता है और अकेला ही जाता है, धन वैभव परिवार मान सम्मान न तो लेकर पैदा होता है और न ही लेकर जाता है। हमारे मित्र हमारा परिवार हमारे सम्बन्धी सिर्फ शमशान तक हमारा साथ देते है और हमारा शरीर अग्नि में जलकर स्वाह हो जाता है, हमारा शरीर भी हमारा साथ नहीं देता। जब शरीर का मिलन अग्नि से होता है तो उसके बाद की जो यात्रा होती है वो हमें खुद अकेले करनी होती है। उस समय जीव के साथ उसके पुण्य और उसके पाप जाते है। लेकिन अब प्रश्न ये उठता है की पाप और पुण्य का फैसला कौन करेगा की पाप क्या है और पुण्य क्या है तो इसका अधिकार स्वयं खुद वेद भगवान् जी ने अपने हांथो में रखा है। हमारे द्वारा किये गए पुण्य और पाप का हिसाब वहा ऊपर होता रहता है। पंडित जी ने बताया की वेद जिसे स्वीकृति दे वो धर्म है वेद जिसे अस्वीकृति दे वो अधर्म है। और दुसरो को सुख देना परम धर्म है और किसी को दुःख देना जीवन का सबसे बड़ा अधर्म है। इसलिए जो भी आपने कर्म किये है वो आपको भोगने ही पड़ेंगे। इसलिए ये जो मानव जीवन हमें मिला है इसका ऐसा उपयोग कर ले कि ना हमें जीवन मिले और ना ही हमें मृत्यु मिले जिसके जीवन में सतकर्म नहीं होते वो इंसान जिन्दा नहीं मृत सामान है। साथ ही महाराज श्री ने बताया की हमें सतकर्म करते रहना चाहिए और अपनी हिन्दू परंपराओं को अपमानित नहीं करना चाहिए। रोजाना माथे पर तिलक लगाए हाथ में कलावा बांधे और सिर पर चोटी रखें। क्यूंकि धर्म के बिना गति नहीं दुर्गति ही होने वाली है इसलिए अपने धर्म और संस्कारो का सदा आदर करें।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंत: सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

8Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 जनवरी से 09 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 00 बजे से 5 बजे तक स्थान - धोबी घाट, भूतेश्वर मंदिर रोड़, भूतेश्वर फील्ड, सहारनपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 जनवरी से 09 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 00 बजे से 5 बजे तक स्थान - धोबी घाट, भूतेश्वर मंदिर रोड़, भूतेश्वर फील्ड, सहारनपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। गोविन्द की भक्ति दिखावा नहीं समर्पण है-देवकीनंदन ठाकुर जी कथा की शुरुआत बहुत ही प्यारे भजन से की " हमने ब्रज के ग्वालो से अपना दिल लगाया है" से की उसके बाद महाराज श्री ने कथा पंडाल में आये हुए भक्तों से पूछा की आखिर प्रेम क्या है ?और साथ ही प्रेम की परिभाषा के बारे में बताते हुए कहा की प्रेम वो होता है जो हम अपने भगवान से करें दिन भर उसकी भक्ति में खोए रहें देखे तो उसके दर्शन करें और सुने तो उसकी कथा सुने होंठो पे उनका नाम हो और फिर हमें दुनिया याद ही न रहे ये होता है असली प्रेम। साथ ही महाराज श्री ने बताया की सच तो ये है की ये संसार हमें परेशानी देता है और ठाकुर जी उस परेशानी को दूर करते है, क्यूंकि कोई भी परेशानी हम से ही शुरू होती है और हम पर ही खत्म होती है। लेकिन जीव का स्वभाव है की वो थोड़ी सी परेशानी आने पर ही घबरा जाता है। मगर सच तो ये है की जिसने हमें परेशानी दी है तो उसका समाधान भी वही देगा। महाराज श्री ने एक बहुत ही सुन्दर एक सेठ और एक किसान की कहानी के माध्यम से बताया की इंसान अगर किसी परेशानी में फंस जाए तो उसे उस परेशानी के बारे में नहीं उसके समाधान के बारे में सोचना चाहिए। क्यूंकि इस जीवन में ऐसा कोई नहीं है जिस पर कभी कोई परेशानी न आई हो। साथ ही पंडित जी ने बताया की हमारे और गोपिओ के प्रेम में बहुत अंतर है, गोपियों के लिए गोविन्द की भक्ति दिखावा नहीं समर्पण है। हम सब भी गोपी जैसा भाव तो बनाना चाहते है लेकिन गोपियों जैसा आचरण करने में हमें डर लगता है क्यूंकि गोपियों की विशेषता है की उनके दिल और दिमाग में हर तरफ सिर्फ गोविन्द है ब्रज के संत कहते है की गो माने होता है इन्द्रिया, जो अपनी हर एक इन्द्रिय का हर एक इन्द्रिय से कृष्ण रस का पान करती है वही गोपी है। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा। ।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

6Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 जनवरी से 09 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 00 बजे से 5 बजे तक स्थान - धोबी घाट, भूतेश्वर मंदिर रोड़, भूतेश्वर फील्ड, सहारनपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। कथा के चौथे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। 

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 जनवरी से 09 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 00 बजे से 5 बजे तक स्थान - धोबी घाट, भूतेश्वर मंदिर रोड़, भूतेश्वर फील्ड, सहारनपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। कथा के चौथे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि आइये सब मिलकर प्यार से किशोरी जी का गीत गाये और समझे की किशोरी जी हम पर कैसे कृपा करती है। “तेरी बिगड़ी बना देगी, चरण रज राधा प्यारी की” कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन श्रवण कराया और प्रार्थना की। भगवान ने कहा मैं तुम्हे दो सॉफ्टवेयर दे रहा हूँ। "बुद्धि और हृदय " और कहा की सुखी रहना चाहते है तो बुद्धि संसार में लगा कर रखना और हृदय मुझमे लगा कर रखना हमेशा सुखी रहोगे। “जिनका दिल दुनिया में लगा है वो कभी सुखी नहीं हुए , जिनका दिल गोविन्द में लगा वो कभी दुखी नहीं हुए ”। 
जब व्यक्ति मरता है तो उसके यूज़ किये हुए कपड़ो का आप क्या करते हो ? महाराज जी ने कहा की आप लोग घर में बीमार व्यक्ति और मरे हुए व्यक्ति की सभी चीज अलग कर देते है तो उनकी सम्पत्ति क्यों नहीं ? यहाँ तुमसे प्यार नहीं करते लोग तुमसे की हुई सम्पत्ति से प्यार करते है। आप लोग यह मत भूलिए कि आपके साथ भी यह होगा एक न एक दिन तो इसलिए अपने से बड़े बुजुर्ग व्यक्तियों को सम्मान करें जिससे की आने वाली पीढ़ी भी आपका सम्मान करें।
हेडलाइन - “सत्य को स्वीकार करने में ही भलाई है।“ देवकीनंदन जी
मानव जीवन जो मिला है उसका सदुपयोग ही हमारे लिए सफलता है। ठाकुर जी
जीवन का कल्याण करने का सबसे उत्तम मार्ग है श्रीमद भागवत कथा श्री देवकीनंदन ठाकुर जी 
मृत्युं से डरना नहीं है मृत्युं तो अकाट्य सत्य है जो होगी ही डरे क्यों उसका सदुपयोग करें। मृत्युं से भयभीत नहीं होना है मृत्युं का उत्सव मानना है। हमारी जो जीवन है वह यात्रा है जन्म से लेकर मृत्युं तक उस यात्रा में अच्छे पल भी आएंगे और बुरे पल भी। कृपा से अपने कर्मो की कृपा इतनी बनाये रखे अपने ऊपर की अच्छे क्रमो को इतना अच्छा बना लीजिये। की बुरे पल थोड़े कम आये। आये तो दूर से ही निकल जाये। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।
महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।
शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।
इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।
दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।
महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

7Jan 2019

कल रात्रि में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने सहारनपुर, उत्तर प्रदेश में सर्दी में फुटपाथ पर रह रहे गरीब व असहाय लोगों को कंबल वितिरत किए ताकि उन्हें सर्दी से थोड़ी राहत मिल सके। महाराज श्री ने कहा ये लोग न्यूनतम इच्छाओं के साथ अपना जीवन यापन कर रहे हैं ।

कल रात्रि में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने सहारनपुर, उत्तर प्रदेश में सर्दी में फुटपाथ पर रह रहे गरीब व असहाय लोगों को कंबल वितिरत किए ताकि उन्हें सर्दी से थोड़ी राहत मिल सके। महाराज श्री ने कहा ये लोग न्यूनतम इच्छाओं के साथ अपना जीवन यापन कर रहे हैं ।

अगर हमें भगवान ने कुछ सामर्थ्य प्रदान किया है तो वह हम पर उसकी अनुपम कृपा है l हमें उस कृपा में एक हिस्सा अपने ऐसे असहाय गरीब साथियों के साथ बांटना चाहिए l समाज के समर्थ लोगों को गरीबों व असहाय लोगों की मदद के लिए आगे आना चाहिए l

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

7Jan 2019

आज सुबह पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज सहारनपुर में गौ शाला गए। यहां उन्होंने गौ सेवा की और साथ ही बताया की गौ सेवा भारतीय संस्कृति का प्रमुख अंग है क्यूंकि गौ माता में 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास है। सभी परिवारजनो को पहली रोटी गौ माता के लिए बनानी चाहिए और जो जीव गौमाता की सेवा और सब प्रकार से उनका अनुगमन करता है, गौ माता उस पर संतुष्ट होकर उसे अत्यंत दुर्लभ वरदान प्रदान करती है।

आज सुबह पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज सहारनपुर में गौ शाला गए। यहां उन्होंने गौ सेवा की और साथ ही बताया की गौ सेवा भारतीय संस्कृति का प्रमुख अंग है क्यूंकि गौ माता में 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास है। सभी परिवारजनो को पहली रोटी गौ माता के लिए बनानी चाहिए और जो जीव गौमाता की सेवा और सब प्रकार से उनका अनुगमन करता है, गौ माता उस पर संतुष्ट होकर उसे अत्यंत दुर्लभ वरदान प्रदान करती है।

महाराज श्री समय-समय पर गौ हत्या के विरुद्ध आवाज़ उठाते रहते हैं। इसी क्रम में उन्होंने प्रदेश व केंद्र सरकार से गौ हत्या पर कानून बनाने की मांग भी की है।

7Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 जनवरी से 09 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 00 बजे से 5 बजे तक स्थान - धोबी घाट, भूतेश्वर मंदिर रोड़, भूतेश्वर फील्ड, सहारनपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 जनवरी से 09 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 00 बजे से 5 बजे तक स्थान - धोबी घाट, भूतेश्वर मंदिर रोड़, भूतेश्वर फील्ड, सहारनपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

हमें ईश्वर से मिलने का प्रयास करते रहना चाहिए - देवकीनंदन जी

हमें इस जीवन को सफल बनाना है - ठाकुर जी

हमे जो प्राप्त हुआ है उसी में खुश रहना सीखे -देवकीनंदन जी

मनुष्य को खुशिओं के लिए जिन्दा नहीं रहना चाहिए -पं.देवकीनंदन जी

कथा की शुरुआत महाराज श्री ने गोविंदा गोपाला मुरली मनोहर नंदलाला कीर्तन के साथ की उसके बाद महाराज श्री ने पंडाल में "भारत माता की जय" के जयकारे लगवाते हुए भारत सरकार को आरक्षण पर निर्णय लेने पर साधु वाद भी दिया।उसके बाद पंडित जी ने बताया की ये संसार और संसार के बंधनो को हमने पकड़ा हुआ है या इन्होने हमें पकड़ा हुआ है ये एक सोचने वाला विषय है। एक कहानी के माध्यम से महाराज श्री ने हमें संसार और सांसारिक व्यवस्थाओ का उदाहरण दिया एक हाथी का बच्चा एक महावत ने अपने यहाँ पाला और वो हाथी का बच्चा बहुत शरारती था तो उस वजह से उसके पैर में रस्सी बाँधी हुयी थी लेकिन वो हाथी का बच्चा उस रस्सी को तोड़ने की बहुत कोशिश करता था लेकिन छोटा था इस वजह से वो रस्सी नहीं तोड़ पाता था लेकिन जैसे जैसे वो बच्चा बड़ा हुआ तो वो और बलशाली होने लगा लेकिन अब बड़ा होने के बाद उस हाथी के बच्चे ने रस्सी तोड़ने का प्रयास ही छोड़ दिया क्यूंकि उसकी मानसिकता बन गयी थी की वो उस रस्सी को नहीं तोड़ पाएगा। और जीवन भर एक विशाल हाथी उस छोटी सी रस्सी से बंधा रहा। और उस बंधन को कभी तोड़ नहीं पाया।उसी हाथी की तरह हम भी सांसारिक बंधनो में बंधे हुए है लेकिन भगवान् ने हमे मनुष्य का जीवन दिया है हमे ये सोचने का अधिकार दिया है की हम जो चाहे वो कर सकते है अच्छा या बुरा हम जो करें वो हमारे ऊपर है।हमे अपने इस जीवन को सफल बनाना है असफल नहीं इसीलिए हमें अपने जीवन को सफल बनाने के लिए एक प्रयास करना ही चाइये भगवन से मिलने का। महाराज श्री ने बताया की भगवान ने जो हमें दिया है क्या हमने उसके बारे में कभी सोचा जो भगवान् ने नहीं दिया है हम उसके बारे में सोचते है लेकिन सत्य तो यह है की जो भगवान् ने हमें दिया है उसी में अपनी ख़ुशी ढूंढिए उसकी को आनंद का रूप दीजिये भगवान् ने जो हमें दिया ही नहीं है अगर हम उसके बारे में सोचेंगे तो परेशान ही रहेंगे। महाराज जी ने बताया की बहुत से लोग जीवन भर खुशिओं की तलाश में रहते है और खुशिओं के चक्कर में पूरा जीवन निकाल देते है लेकिन मनुष्य को खुशिओं के लिए जिन्दा नहीं रहना चाहिए जो हमारे पास है उसी में खुशिया तलाश करो और दुख में भी जो खुशिओं का स्वपन सज़ा लेते है वो अपने जीते जी आस्मां में मकान बना लेते है मेरे गोविंद के चरणों में जगह बना लेते है, बस जरुरत है तो हमारे बुलंद इरादों की।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है। भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए। अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है। श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।
श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

4Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 जनवरी से 09 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 00 बजे से 5 बजे तक स्थान - धोबी घाट, भूतेश्वर मंदिर रोड़, भूतेश्वर फील्ड, सहारनपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। 

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 जनवरी से 09 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 00 बजे से 5 बजे तक स्थान - धोबी घाट, भूतेश्वर मंदिर रोड़, भूतेश्वर फील्ड, सहारनपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। 
भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

परम कल्याण करने वाली है भागवत - ठाकुर जी 
सात दिनों का उत्सव है भागवत - देवकीनंदन जी 
आपके पितरो को भी फल देती है भागवत- देवकीनंदन जी

कथा की शुरुआत महाराज श्री ने “हम भी कहे राधे श्याम तुम भी कहो राधे श्याम से” भजन से की उसके बाद महाराज श्री ने बताया की वेद व्यास जी द्वारा लिखित इस भागवत महापुराण में मोक्ष परियन्त की कामनाओ से रहित परम धर्म का निरूपण किया गया है। इसमें शुद्ध हृदय वाले महापुरुषों के जानने योग्य वास्तविक वास्तु परमात्मा का निरूपण हुआ है जो तीनो तापो को जड़ से नाश करने वाला है और वो परम कल्याण करने वाला है। अब और किसी शास्त्र से क्या परियोजन है जिस समय कोई पुण्य आत्मा या पुरुष इसको श्रवण करने की इच्छा करते है ईश्वर उसी समय तत्काल उनके हृदय में आकर विराजमान हो जाते है। पंडित जी ने कहा की भागवत में ऐसा लिखा है की अगर कोई जीव सच्चे दिल से ये संकल्प कर ले की वो श्रीमद्भागवत कथा सुनेगा तो उस संकल्प मात्र से ही भगवान उनके हृदय में वास करने लगते है।महाराज श्री ने बताया की गरुण पुराण में लिखा है कि आप देवताओं से पहले अपने पितरो को मना लो क्यूंकि देवता तो आपको आपके कर्म अनुसार फल देते है लेकिन अगर पितृ एक बार खुश हो जाए तो वह वो दे देते है जो तुम्हारे भाग्य में भी नहीं होता और अगर पितृ अप्रसन्न हो जाए तो वो भी छीन लेते है जो तुम्हारे भाग्य में होता है क्यूंकि जिन पितरो की मुक्ति हो जाती है वो भगवान में समां जाते है।इसलिए अपने बच्चो को ये संस्कार जरूर दे और उन्हें श्राद्ध का महत्व बताये ताकि आपके जाने के बाद वो भी आपकी तरह पित्रो की सेवा करें।क्यूंकि आपके भागवत सुनने से आपके पितरो का भी कल्याण होता है उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है इसलिए अगर आप कथा पंडाल में कथा सुनने आएं तो पुरे नियम के साथ कथा सुने ताकि आपके साथ आपके परिवार और पितरो का भी कल्याण हो।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

5Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 जनवरी से 09 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 00 बजे से 5 बजे तक स्थान - धोबी घाट, भूतेश्वर मंदिर रोड़, भूतेश्वर फील्ड, सहारनपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 जनवरी से 09 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 00 बजे से 5 बजे तक स्थान - धोबी घाट, भूतेश्वर मंदिर रोड़, भूतेश्वर फील्ड, सहारनपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

मनुष्य के श्रेष्ठ कर्म उसे देवता बनाते है - देवकीनंदन जी

मनुष्य जीवन में सबसे दुर्लभ हरी कथा और साधु मिलन है - देवकीनंदन जी

त्याग करने वाला जीव हमेशा सुखी रहता है- देवकीनंदन जी

कथा की शुरुआत महाराज श्री ने एक बहुत ही सुन्दर भजन श्री श्याम तुम्हारे चरणों में एक बार ठिकाना मिल जाय" गा कर की उसके बाद पंडित जी ने बताया की श्रीमद भागवत कथा जो देवताओं के लिए दुर्लभ है वो हमारे लिए सुलभ है लेकिन मानव जीवन अत्यंत कठिन है उसके बाद ही सुलभ है। क्यूंकि देवताओं के लिए भी मनुष्य बनना आसान नहीं है ,लेकिन अगर मनुष्य चाहे देवता बनना तो वो देवता बन सकता है। क्यूंकि मनुष्य के श्रेष्ठ कर्म मनुष्य को देवता बना सकते है। लेकिन मनुष्य के जीवन में दो चीजे बहुत मुश्किल है एक हरी कथा और दूसरा साधु मिलन। अगर हमें हरी कथा मिल भी जाए तो भी हमें उतनी श्रद्धा नहीं होती हमारा दिल और दिमाग कही और ही दौड़ता रहता है। महाराज जी ने कहा की आपको मानव जीवन और हरी कथा दोनों ही प्राप्त है तो आपको इसका सदुपयोग करना है ताकि ये व्यर्थ ना जाए। पंडित जी ने बताया की सुख संग्रह करने मे नहीं त्याग करने में है क्यूंकि संग्रह करने वाला जीव हमेशा दुखी ही रहता है और त्याग करने वाला जीव हमेशा सुखी रहता है। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है। तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे। भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।
श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे – राधे बोलना पड़ेगा ।।

3Jan 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से सहारनपुर में पहली बार श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन 03 जनवरी से 09 जनवरी प्रतिदिन दोपहर 3: 00 बजे से 6: 30 तक किया जा रहा है। महाराज श्री के सहारनपुर पहुंचने पर भक्तो ने महाराज श्री का स्वागत फूलमाला अर्पित कर के किया और राधे नाम के जयकारे भी लगाए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से सहारनपुर में पहली बार श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन 03 जनवरी से 09 जनवरी प्रतिदिन दोपहर 3: 00 बजे से 6: 30 तक किया जा रहा है। महाराज श्री के सहारनपुर पहुंचने पर भक्तो ने महाराज श्री का स्वागत फूलमाला अर्पित कर के किया और राधे नाम के जयकारे भी लगाए। सहारनपुर के सभी भक्तो से निवेदन है की ज्यादा से ज्यादा संख्या में आप कथा स्थल पर पहुंचे और महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का रसपान करें।

3Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 जनवरी से 09 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 00 बजे से 5 बजे तक स्थान - धोबी घाट, भूतेश्वर मंदिर रोड़, भूतेश्वर फील्ड, सहारनपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। पूज्य महाराज श्री द्वारा पहली बार सहारनपुर में कथा का श्रवण करवाया जा रहा है। 

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 जनवरी से 09 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 00 बजे से 5 बजे तक स्थान - धोबी घाट, भूतेश्वर मंदिर रोड़, भूतेश्वर फील्ड, सहारनपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। 
पूज्य महाराज श्री द्वारा पहली बार सहारनपुर में कथा का श्रवण करवाया जा रहा है। 
भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
भक्त भक्ति और भगवान के समन्वय का नाम है भागवत - पं. देवकीनंदन जी 
अमर और निर्भय बनाती है भागवत-ठाकुर जी 
जो मन भक्ति में लग जाए वो मन सुमन हो जाता है - देवकीनंदन जी
कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने किशोरी जी को प्रणाम किया और बहुत ही सुन्दर भजन एक ओर कृपा की कर दो लाड़ली श्री राधे से की उसके बाद महाराज श्री ने बताया की अगर मनुष्य योनि में जीव चला जाए, उसे मानव जीवन अगर प्राप्त हो जाए तो उसका लक्ष्य क्या है? क्या उसे जीवन संसारिक मोह में फसने के लिए मिला है या कोई और कारण है ? आप आपने आप से प्रश्न जरूर कीजिये की मैं इस दुनिया में क्यों आया हु उस परमात्मा का मुझे मानव जीवन में भेजने का उद्देश्य क्या है अगर वो कारण आपको समझ आ गया तो आपका जीवन मंगल मय हो जायगा, जीवन की यात्रा सुखद हो जायगी। पंडित जी ने बताया की भागवत कथा तो देवताओं को भी सुननी नसीब नहीं हुई थी जिसे आप सुन रहे है। देव राज इंद्र अमृत कलश लेकर कथा सुनने गए थे लेकिन फिर भी नहीं सुन पाए थे लेकिन ये आपके सत्कर्मो का फल है जिससे की आप कथा पंडाल तक कथा सुनने खींचे चले आये। महाराज श्री ने बताया की जो मन भक्ति में लग जाए वो मन, मन नहीं सुमन हो जाता है। और जिसके पास सुन्दर मन है उसे दुनिया में जाकर मत बाँटिये सीधे मेरे गोविन्द के चरणों में जाकर चढ़ा दीजिये क्यूंकि जिनका सुन्दर मन ठाकुर जी के चरणों में अर्पण हो गया है उनका बेडा पार हो गया है। पंडित जी ने बताया की देवताओ को कथा सुनने का सौभाग्य इस लिए प्राप्त नहीं हुआ था क्यूंकि उनमे अभिमान था और जहा अभिमान होता है वहां भक्ति नहीं होती। क्यूंकि ये भक्तो का विषय है अभक्तो का नहीं इसलिए भक्त भक्ति और भगवान के समन्वय का नाम ही भागवत है। बिना भक्ति के भगवान को कोई पा नहीं सकता इसलिए हमें अपने मन को सुमन बनाना चाहिए। 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। 
श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

3Jan 2019

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सहारनपुर भव्य कलश यात्रा निकाली गई। कलश यात्रा में हजारों की संख्या में माताओं - बहनो और भाई -बंधुओं ने भाग लिया। कलश यात्रा ढ़ोल नगाड़े, के साथ निकाली गई। कलश यात्रा जिन मार्गों से होकर गुजरी वहां इस भव्य कलश यात्रा को देखने के लिए लोग थम गए, हर किसी ने इस अद्भुत यात्रा का आनंद लिया।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सहारनपुर भव्य कलश यात्रा निकाली गई। कलश यात्रा में हजारों की संख्या में माताओं - बहनो और भाई -बंधुओं ने भाग लिया। कलश यात्रा ढ़ोल नगाड़े, के साथ निकाली गई। कलश यात्रा जिन मार्गों से होकर गुजरी वहां इस भव्य कलश यात्रा को देखने के लिए लोग थम गए, हर किसी ने इस अद्भुत यात्रा का आनंद लिया।

राधे राधे बोलना पड़ेगा

1Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं अखंड भारत मिशन के अध्यक्ष पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने एकादशी के पावन अवसर पर मथुरा वृंदावन में सर्दी में फुटपाथ पर रह रहे गरीब असहाय व्यक्तियों को कंबल वितिरत किए ताकि उन्हें थोड़ी राहत मिल सके।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं अखंड भारत मिशन के अध्यक्ष पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने एकादशी के पावन अवसर पर मथुरा वृंदावन में सर्दी में फुटपाथ पर रह रहे गरीब असहाय व्यक्तियों को कंबल वितिरत किए ताकि उन्हें थोड़ी राहत मिल सके।

महाराज श्री ने कहा ये लोग न्यूनतम इच्छाओं के साथ अपना जीवन यापन कर रहे हैं l अगर हमें भगवान ने कुछ सामर्थ्य प्रदान किया है तो वह हम पर उसकी अनुपम कृपा है l हमें उस कृपा में एक हिस्सा अपने ऐसे असहाय गरीब साथियों के साथ बांटना चाहिए l ऐसे लोगों की मदद में आगे आना चाहिए l वास्तव में यही भगवान की सच्ची पूजा है l

इस मौके पर प्रियाकांत जू मंदिर के गजेंद्र सिंह, मीडिया प्रभारी जगदीश वर्मा, कमल शर्मा, दिवाकर पचहरा, सुरेंद्र शर्मा आदि मौजूद रहे l

30Dec 2018

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस आयोजन किया गया। । श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

"भक्त को भगवान से ग्रंथों और संतों का सत्कर्म ही मिलाता है।" श्री देवकीनंदन ठाकुर जी संतों का सानिध्य करोगे तभी भगवान से मिलने की इच्छा जागेगी। श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस आयोजन किया गया। । श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान ने बड़ी कृपा करके हमे मानव जीवन दिया है । तो आप लोग भगवान की श्रीमद भागवत कथा सुनने के लिए समय अवश्य निकाले। धर्म का प्रचार करना सिर्फ साधु, संत महात्मा कथा कारों की जिम्मेदारी नहीं अपने सत्य सनातन धर्म का प्रचार करना हम सब की जिम्मेदारी है। जिसने कभी कृष्ण को प्रणाम किया है। राम भगवान को प्रणाम किया है। इस धरती माता का अन्न खाया है सनातन की रक्षा करना, प्रचार करना ,उसका रख रखाव करना उसकी जिम्मेदरी है। अगर हम लोग भगवान की कथा कहकर भोजन करते है। तुम लोग भी भगवान आगे भीख मांग कर उनके भेजे हुए ग्राहकों से संपत्ति कमा कर आप लोग रोटी खाते हो। ऐसा कोई नहीं है जो संसार में भगवान के दिए बगैर रोटी खाता हो। संसार में ऐसा कौन है। जिसने अपनी मनोकामना भगवान के द्वारा अर्पण नहीं कर रखी। जो शुद्ध विचार आपको व्यास पीठ से ठाकुर जी दिलाते है। वो पैसे से नहीं मिल सकता। किसी को कुछ बांटना है तो खुशियां बांटो सत्कर्म बांटो, लेकिन बुराइया न बांटो। जितने लोग अच्छा कर्म करते है, धर्म को आगे बढ़ाते है, सत्कर्म करते है। उन पर हमेशा ठाकुर जी का आशीर्वाद रहता है। "जीवन है तेरे हवाले मुरलिया वाले" महाराज जी ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तो को भजन श्रवण कराया। सौभाग्य का विषय है पुणे में की अपने खोया क्या है पाया क्या है। मानव होने के नाते चिंतन का अधिकार है मनन का अधिकार है। मानव होने के नाते यह सोचने का अधिकार है। क्या खोया और क्या पाया नुकसान क्या हुआ है और फायदा क्या हुआ है। की जीवन में क्या पाया उस पर चिन्तन जरूर करीयेगा। जो जीवन की सांसे हम को लिमिटेड मिली है। तो चिंतन करिये गए की जाने वाली साल में आपने क्या पाया और आने वाले साल में क्या पायेगे। सबसे बड़े गुरु वो है जिसने हमें गुरु मंत्र दिया जिसने हमें ठाकुर जी से मिलाया। संसार में ये जो जन्म है ये कुछ सालो तक है। लेकिन जो गुरु के द्वारा सम्बन्ध स्थापित कराया गया वो जन्म जन्मांतर तक है। इसीलिए दीक्षा गुरु एक शिक्षा शिष्य अनेक दीक्षा गुरु ने हमें बताया की परमात्मा को तुम इस मात्रा के द्वारा प्राप्त करो । आप का संग महत्वपूर्ण है जैसे लोगो आप संग करोगे वैसा ही आप पर असर होगा । संतो का सानिध्य महत्वपूर्ण हो। संतो के बिना गोविन्द नहीं मिलेंगे। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंत: सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

29Dec 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। हमारी मानसिकता पर हावी हो गया है कल्चर टेर्रेरिस्म-देवकीनंदन जी परिवार को चलाना सिखाती है भगवान की कथाएं -महाराज श्री जिनकी फीलिंग्स अच्छी होती है उनके घर विराजते है भगवान-ठाकुर जी पैसा कम होगा तो चलेगा अगर भावनाएं कम होंगी तो नहीं चलेगा -पं.देवकीनंदन जी कथा की शुरुआत महाराज श्री ने "राधा नाम लगे बहुत प्यारा" सुंदर भजन से की महाराज श्री ने कल्चर टेर्रेरिस्म की बात करते हुए बताया की कल्चर टेर्रेरिस्म की वजह से जो हमारे टूटते हुए परिवार प्रांरम्भ हो रहें है वो सोचने का विषय है क्यूंकि ये हमारी मानसिकता पर हावी हो गया है। हमारे सनातन धर्म में परिवार की जो जिम्मेदारियां है परिवार में जो भावना है एक दूसरे के लिए जो सहानुभूति है जो फीलिंग है वो अद्भुत है। विचित्र है पुरे ब्रह्माण्ड में आप चले जाओ भारत जैसी संस्कृति आपको पुरे वर्ल्ड में ढूढ़ने से नहीं मिलेगी। जिसका उदहारण है की अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा जी जो की भारत आकर कहते है की आई लव इंडियन कल्चर वो अपनी जेब में हनुमान चालीसा रखते है। लेकिन यहां हमारे ऊपर जो कल्चर टेर्रेरिस्म की व्यथा जो हम पर थोपी जा रही है हम उसमे डूबते जा रहे है और इसी का नतीजा है की ये टूटते हुए रिश्ते बिखरते हुए परिवार भारत में जब देखने को मिलते है तो दिल टूट जाता है। योग और संयोग बड़ी विचित्र स्थिति है,महाराज श्री ने बताया कि जब विश्व धर्म सभा शिकागो में हुई तो स्वामी विवेकानंद जी महाराज वहा पर पहुंचे और एक पत्रकार ने स्वामी जी का मजाक उड़ाने के उदेश्य से विवेकानंद जी से पूछा की क्या मैं आपसे एक सवाल पूछ सकता हु तब स्वामी जी ने कहा जी जरूर आपनें जो ये योग और संयोग के बारे में जो आखरी वक्तव्य बोला है वो हमें समझ नहीं आया वो कुछ उलझा हुआ सा है। तो स्वामी जी ने उस पत्रकार से सवाल पूछा और उसके माध्यम से उस पत्रकार को समझाया की आप अपने परिवार वालो के संपर्क में तो है लेकिन आप उनसे जुड़े हुए नहीं है और यही योग और संयोग है। क्यूंकि आज का हर व्यक्ति अपने परिवार के कांटेक्ट में तो है लेकिन जुड़ा हुआ नहीं है कल्चर टेररिज्म हम पर इतना हावी है की हम इसमें इतना डूब गए है क्यूंकि ये हमारी संस्कृति में नहीं है और ना ही ये हमारी सभ्यता है। हमारी सभ्यता और संस्कार तो वो है की हम अपने परिवार वालों के साथ दिल से जुड़े रहें। आप अपने मन से खुद ये सवाल कीजिये की जो आज का मानव है अगर वो खाना बना रहा है तो बिना भाव के बना रहा है अगर कोई पैसा कमा रहा है तो मज़बूरी में कमा रहा है। हम लोग अपनी जिम्मेदारिया तो निभा रहें है लेकिन बिना फीलिंग्स के इसलिए आप सब से मेरा निवेदन है की बच्चो को पैसे कम देना पर फीलिंग्स ज्यादा देना। अपने बच्चो को सिखाइये और उन्हें कल्चर टेर्रेरिस्म का शिकार मत होने देना। साथ ही पंडित जी ने कहा की भगवान की कथा परिवार को कैसे चलना है वो भी सिखाती है। अगर आपकी फीलिंग्स अच्छी होंगी तो भगवान भी आपके घर में वास करते है। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा। ।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

30Dec 2018

आज पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में युवाओं एवं बच्चों के लिए "युवा शांति संदेश" का आयोजन किया गया, जिसमें महाराज श्री ने सभी युवाओं एवं बच्चों के धर्म और संस्कृति से जुड़े सवालों का एक-एक करके जवाब दिया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में "युवा शांति संदेश"
आज पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में युवाओं एवं बच्चों के लिए "युवा शांति संदेश" का आयोजन किया गया, जिसमें महाराज श्री ने सभी युवाओं एवं बच्चों के धर्म और संस्कृति से जुड़े सवालों का एक-एक करके जवाब दिया।

28Dec 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

दिल और दिमाग को समझने वाला ग्रन्थ है भागवत -देवकीनंदन जी 
हम सांसारिक साधन में ही सुख तलाशते है -ठाकुर जी 
ख़ुशी उसे ही मिलती है जो दुसरो को खुश रखना जानते है- महाराज जी

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने अपने श्री मुख से बहुत ही सुन्दर भजन प्रेम रस जिसने पिया श्री राधे के नाम का को गा कर की। साथ ही महाराज श्री ने बताया की जीवन में सुख सब को चाहिए लेकिन हम ये जानते ही नहीं है की असली सुख या हकीकत में प्रशन्नता होती क्या है। हम तो बस अपने घर मकान गाडी और पैसे को ही असली सुख समझे बैठे है। और गजब की बात ये है की वो जड़ है वो आपके बिना कही जा ही नहीं सकते जब तक आप उनका इस्तेमाल नहीं करेंगे तब तक वो नहीं चलेंगे। क्यूंकि आप काम कर सकते हो लेकिन वो काम नहीं कर सकते है। आप चल सकते हो बोल सकते हो लेकिन वो नहीं। इसलिए आप चैतन्य हो और वो जड़ है और चैतन्य का सुख चैतन्य होता है जड़ नहीं। साथ ही महाराज श्री ने बताया की आज का युग कंप्यूटर का युग है जहा हम अपनी सुविधाओं के लिए तरह तरह के सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करते है,उसी प्रकार से भगवान् ने हमारे शरीर को भी बहुत ही खूबसूरत दो सॉफ्टवेयर से नवाजा है जिनका नाम है दिल और दिमाग। दिल और दिमाग को समझने वाला ग्रन्थ ही भागवत है आपने अगर भागवत का रसपान अच्छे से कर लिया तो आपको समझ आ जाएगा की आपको दिल कहा लगाना चाहिए और दिमाग कहा। ये समझ आने के बाद ही आपका मानव जीवन सुखमय होगा। लेकिन हम ईश्वर के द्वारा दिए हुए गिफ्ट दिल और दिमाग का गलत फायदा उठा रहें है क्यूंकि ईश्वर ने हमें ये कहकर भेजा था की दिल मुझमे और दिमाग दुनिया में लगाना लेकिन हम इस संसार में आकर दिल दुनिया में लगा रहें है और दिमाग भगवान में। इसीलिए हम अपने सुख की तलाश में भटके हुए है। हम अपनी खुशिया ढूंढने के लिए जीवन भर दौड़ते रहते है हमें सिर्फ अपनी खुशियों की ही परवाह होती है और हम अपनी खुशियों को ढूढ़ने में इतने पागल हो जाते है की दुसरो की ख़ुशी भूल जाते है उनके सुख दुःख की परवाह ही नहीं करते लेकिन हमें फिर भी ख़ुशी नहीं मिलती। क्यूंकि ख़ुशी का राज़ ही दुसरो को ख़ुशी देना है और ख़ुशी उन्हें ही मिलती है जो दुसरो को खुश रखना जानते हो।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है। भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए। अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है। श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।
श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

27Dec 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

भगवान से मिलने का मार्ग ही मन की शान्ति है - देवकीनंदन जी 
संसार का परम सुख हरी मिलन में है - पंडित देवकीनंदन जी 
भगवान से दूर करता है अहंकार - देवकीनंदन जी

कथा के चौथे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
महाराज श्री ने कथा की शुरुआत करते हुए उस हरी को याद किया जिसने हमें इतना सुन्दर जीवन दिया है और उन्हें याद कर बहुत ही सुंदर भजन हर घड़ी सिमरन तुम्हारा प्रियकांत जु मेरे इन होंठो पर है " गाया उसके बाद पंडित जी ने कहा की हमें बड़ी मुश्किल से ये नर तन मिला है लेकिन अल्पदृष्टि के कारण अल्पसोच के कारण हम बहुत कम प्राप्त करके उसमे खुश हो जाते है,क्यूंकि किसी छोटे व्यक्ति को उतनी ही चीज दे दी जाए तो वो खुश हो जाता है और बड़े व्यक्ति को वही दी जाय तो वो नाखुश हो जाता है। महाराज श्री ने बताया की क्या हम लोगों को हमारा मानव जीवन बस इतना सरल लग रहा है की खाओ पीओ सोउ और मर जाओ लेकिन क्या यही मानव जीवन का मोल है ? पंडित जी ने एक बहुत समय पहले की बात बताते हुए हमें जीवन का महत्व समझाया और बताया की बहुत समय पहले की बात है जिस समय लाइट नहीं हुआ करती थी तो कोई महानानुभाव दिया जला का एक ग्रन्थ पढ़ रहे थे और उस ग्रन्थ का अध्यन पूरा मन लगा कर पढ़ रहें थे और पढ़ते - पढ़ते जब वो ग्रन्थ उन्होंने पूरा पढ़ लिया तब उन्होंने उस जलते दीपक को शांत किया। और जैसे ही उन्होंने वो दिया शांत किया तो उनके सामने एक अद्भुत नज़ारा प्रस्तुत हुआ क्यूंकि उस दिन शरद पूर्णिमा की रात्रि थी और चन्द्रमा अपने पूर्ण प्रकाश पर था लेकिन कुटिया में दिया जलने की वजह से उन्हें उस प्रकाश का अनुभव ही नहीं हुआ लेकिन जैसे ही उन्होंने उस दिए को शांत किया,तब मानो उस शरद पूर्णिमा के प्रकाश ने वहा आकर दस्तक दी और मानो कहा हो की किस अँधेरे में डूबे हुए थे महानानुभाव हम तो आपके लिए खड़े थे बाहर पूर्ण प्रकाश लेकर और आप इस दिये की रोशनी में ही पढ़ रहें थे। ऐसे ही हमने भी अपने जीवन में अहंकार रूपी तमाम दिये जला रखे है जिसके कारण सद्गुरु देव भगवान् का जो प्रकाश है वो हमारे अंतकरण तक पहुँच ही नहीं पता है, क्यूंकि अहंकार का जो दीपक है वो हमने शांत ही नहीं किया है इसीलिए जब तक वाणी को विश्राम नहीं दोगे जब तक मन को शांत नहीं करोगे तब तक ईश्वर की प्राप्ति नहीं होगी। भगवान मिलने की व्यथा ही यही है की जब आपके मन में शान्ति हो परोपकार का जीवन हो दर्शन सुन्दर हो श्रवण सुन्दर हो कर्म में श्रेश्ठता हो कर्म परोपकार के लिए प्रयासरत हो तभी आपको कन्हैया मिलेंगे। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया। शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे। महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।" जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया। इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

26Dec 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

 "मनोकामनाओ को पूर्ण करती है भागवत - देवकीनंदन जी महाराज। 
पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।
कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। पूज्य महाराज श्री द्वारा पुणे, महाराष्ट्र, में श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करवाया जा रहा है।भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि हम सब भाग्यशाली है सत्संग वही है जहां मन से जाया जाए जो हमें भागवत कथा का रसपान करने का सौभाग्य मिल रहा है, ये किशोरी जी की कृपा से ही प्राप्त होता है। महाराज जी ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन “मेरे मन की है एक आवाज़ श्रावण कराया”। साथ ही महाराज श्री ने बताया की अगर गुरुदेव कृपा कर दे तो क्या होता है ? गुरुदेव की कृपा हो जाए तो हरी दर्शन हो जाते है। जो कल्पवृक्ष से प्राप्त नहीं होता, जो चिंतामणि से प्राप्त नहीं होता, वो गुरु कृपा से सहज प्राप्त होता है। हम सब काल के मुख से घिरे है इसके अलावा और कुछ नहीं। पंडित जी ने कहा की कलयुग के लोग अगर अपनी मृत्यु में महोत्सव उत्पन्न करना चाहते है तो श्रीमद भागवत कथा सुने जो श्री सुखदेव भगवान के मुख से निकली हुई है। उस भागवत को श्रावण करें ये भागवत जो परीक्षित का कल्याण करने वाली है। वो हम सब का भी कल्याण कर देगी। जीवन में "आलसी मत बनो" आलस्य बहुत बड़ा अभिशाप है। आलसी आदमी लेट उठता है, लेट काम करता है, आलसी आदमी भजन तो करता ही नहीं है। क्यूंकि उससे होता ही नहीं है और यही आलसी आदमी की पहचान है। कौन कौन व्यक्ति दरिद्र्री नहीं होना चाहता। अगर आप दरिद्र्री नहीं होना चाहते हो तो गाठ बांध लो इस बात को जीवन भर कभी भी बिस्तर पर बैठ कर भोजन मत ग्रहण करना। जो बिस्तर पर बैठ कर भोजन करते है वो दरिद्र नारायण को अपने घर में निमंत्रण देते है। अगर वाकई दरिद्री नहीं होना चाहते तो कभी भी बिस्तर पर बैठ कर भोजन नहीं करना चाहिए। संभव हो सके तो पृथ्वी पर ही बैठ कर भोजन करना चाहिए जिससे पाचन शक्ति बढ़ती है। महाराज जी ने कहा की हमारे कन्हैया के जितने भी भक्त हो वो अपार धनवान हो, ईश्वर वान हो और भक्तिवान हो, भक्त अगर धनवान होंगे तो धर्म को आगे बढ़ाएंगे। पापी लोग अगर धनवान होंगे तो वो पाप को आगे बढ़ाएंगे। इसलिए प्रत्येक भक्त धनवान हो जाये वैभववान हो जाये और बलवान भी हो जाये। जीवन को पवित्र और धन्य करने के लिए उसी भागवत ग्रंथ को श्रावण करने के लिए आज इस कथा पंडाल में उपस्थित हुए है। कलिकाल के सभी कष्टों को मिटाने में श्रीमद भागवत कथा ऐसा ग्रंथ है जो है सबके कलेशो कलयुग के दुआंधो को दूर करता है।इससे आप जो मांगे भागवत देती है आपको धन मांगना है धन मांग लो, परिवार मांगना है , परिवार मांग लो, निरोगी काया चाहिए वो मांग लो, यश चाहिए- यश मांग लो, कुछ नहीं चाहिए, जो कुछ नहीं मांगते उनको सबसे ज्यादा भगवान की भक्ति मिलती है। और उन्ही को भगवान मिलते है। जिन्हे सांसारिक कोई वस्तु नहीं चाहिए उसी को ज्यादा तर ईश्वर की प्राप्ति होती है। भागवत श्रवण के बाद जरुरी नहीं है की हम सांसारिक वस्तुए मांगने के लिए भागवत सुने।अगर अधिक बार कथा सुनने का मिले तो सिर्फ एक ही काम करना चाहिए की हे ईश्वर तुम कब मिलोगे।
महाराज श्री ने भागवत कथा की प्रथम श्लोक सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे! तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नम:..... के उच्चारण के साथ की। उन्होंने श्लोक का अर्थ समझाते हुए कहा की जो सत्य नित्य निरंतर जिनके स्वरूप को प्राप्त करके सत्य होता है, जो नित्य निरंतर हैं। जब शृष्टि नहीं थी तब भी वो थे, जब शृष्टि नहीं रहेगी तब भी वो रहेंगे, सत्य कहते ही उसको हैं जो नित्य निरंतर होता है, जो कभी नहीं मिट सकता। एक ब्रह्म सत्य है, एक कृष्ण सत्य है बाकी सब मिथ्या है। इसका एक प्यारा सा भाव समझे तो वो ये है की जिसका चित्त जिसके वश में है, हमारा चित्त हमारे वश में नहीं है, हमारा चित्त हमें भटकाता रहता है लेकिन उनका चित्त उनके वश में रहता है। 
महाराज जी ने कहा की सुखदेव जी हमारे कल्याण का कितना चिंतन करते है की उन्होंने जीव कल्याण के लिए पांच यज्ञ बताए हैं, पहला यज्ञ है जब भी भोजन बनाएं घर की पहली रोटी निकालकर गऊ को खिलाएं, दूसरा यज्ञ है कुछ मीठा या आटा लेकर चीटियों को खाने के लिए देना चाहिए, तीसरा यज्ञ है पक्षियों को कुछ खाने के लिए देना चाहिए, चौथा यज्ञ है जलाशय में जो मछलियां हो उनको भी खाने के लिए कुछ देना चाहिए, पांचवा यज्ञ है भोजन बनाने के साथ कुछ मीठे के साथ अग्नि देव की पहला ग्रास खिलाना चाहिए, खुद के खाने से पहले। अग्नि देव नारायण का ही स्वरूप हैं जैसे ही आप अग्नि को भोग लगाते हैं स्वयं परमात्मा उसे ग्रहण कर लेते हैं। ये पांच यज्ञ जीव को प्रत्येक दिन करना चाहिए और जो गृहस्थि ये पांचों यज्ञ ना कर पाए उसे भगवान की कथा का आश्रय ले लेना चाहिए।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। 
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। .
श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

21Dec 2018

श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

हेडलाइन - धर्म आपकी आत्मा है- देवकीनंदन जी महाराज

दुनिया का सबसे बड़ा पाप किसी को दुःख देना है- देवकीनंदन जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 16 से 22 दिसंबर 2018 तक परम पूज्य बालयोगी काशीगिरी जी धाम, सकलेचा नगर, भराड़ी रोड़, सिल्लोड, औरंगाबाद, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज श्री ने कथा की शुरुआत एक संत और एक सेठ की कहानी से की एक नगर में एक संत प्रवचन करने के लिए जाते है। उस नगर में एक सेठ जी रहते थे जिनके चार पुत्र थे, और बाबाजी के प्रवचन सुनने के बाद उस सेठ ने संत से कहा की आप हमारे घर भी भोजन करने आइये ताकि हमारा घर भी पवित्र हो जाए तो उस सेठ के आग्रह करने पर संत उनके घर अगले दिन प्रवचन के बाद भोजन पर जाते है। तो सेठ बड़ा खुश होता है और अपने चारो बेटो को फ़ोन करके घर आने के लिए बोलता है की कल हमारे घर संत आने वाले है भोजन पर तो तुम सब भी आकर संतो का आशीर्वाद प्राप्त करो लेकिन चारो पुत्रो में से तीन पुत्र कोई न कोई काम बता कर घर नहीं आते है सिर्फ सेठ जी का एक ही बेटा उनके घर आता है। फिर अगले दिन जब संत सेठ के घर खाना खाने आते है तो वो बाबा जी सेठ से पूछते है की आपके कितने पुत्र है तो सेठ जी कहते है मेरा सिर्फ एक ही पुत्र है, और फिर संत पूछते है की आपकी कितनी उम्र है तो सेठ कहता है की सिर्फ २.५ वर्ष तो संत अचंबित होते है और फिर सोचते है की ये मेरे सारे सवालों का गलत उत्तर दे रहा है तो फिर संत एक आखरी सवाल और पूछते है की कितना पैसा कमा लेते हो तो सेठ कहता है की अभी तक सिर्फ दस हजार ही कमाया है। तो संत उस सेठ से पूछते है की अगर आपको हमारे प्रश्नो का सही जवाब देना ही नहीं है तो हमे मना कर दीजिये हम पूछेंगे ही नहीं। तब वो सेठ कहते है की बाबाजी दुनिया वालों की नज़र में मेरे चार पुत्र है, लेकिन जो धर्म के काम में मेरे काम ना आये तो किस बात के पुत्र और जो मैने अपनी उम्र आपको बताई है २.४५ वर्ष वो इसलिए क्यूंकि मुझे भगवान् की भक्ति करते हुए सिर्फ उतना ही टाइम हुआ है और मैंने आपकी व्यवस्था में अभी तक दस हजार ही खर्च किये है इसलिए मैंने जीवन भर में बस यही कमाया है। क्यूंकि जो मैंने धर्म के लिए किया है वही बस मेरा है बाकी का तो जीवन और माया तो मैंने व्यर्थ कर दी है। साथ ही महाराज श्री ने बताया की आप अपने धर्म को जाने हमारा जो ये सनातन धर्म है ये कल का धर्म नहीं है ये धर्म जो तब से है जब से सूर्य की पहली किरण इस धरती पर पड़ी थी तब से सनातन धर्म है और इस धर्म को कभी विभाजित नहीं किया जा सकता क्यूंकि सनातन धर्म पूरी मानवता के लिए है। महाराज जी ने कहा की वेद व्यास जी द्वारा अठारह पुराण लिखने के बाद शास्त्र और वेदों को विभाजित करने के बाद सिर्फ यही पता चला की सबसे बड़ा धर्म क्या है दुसरो को सुख देना और सबसे बड़ा पाप क्या है दुसरो को दुख देना। पंडित जी ने प्रेम के बारे में बताते हुए कहा की हमें प्रेम करना चाहिए और जिससे भी करना चाहिए दिल खोल के बिना किसी स्वार्थ के करना चाइये जैसा मेरे श्री कृष्ण और राधा रानी ने किया था। महाराज श्री ने श्री कृष्ण की रास लीलाओं के बारे में बताते हुए श्री कृष्ण भगवान् के रास का महत्व भी भक्तो को समझाया और बताया की केवल किसी स्त्री और पुरुष के नृत्य को ही रास नहीं कहते है क्यूंकि ये आज कल के लोगों की गलत धारणा है। 
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण हो

22Dec 2018

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 16 से 22 दिसंबर 2018 तक परम पूज्य बालयोगी काशीगिरी जी धाम, सकलेचा नगर, भराड़ी रोड़, सिल्लोड, औरंगाबाद, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया गया। श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

हेडलाइन - संस्कारो की भूमि है भारत- पं. देवकीनंदन ठाकुर जी

मुक्ति का मार्ग है भागवत- देवकीनंदन ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 16 से 22 दिसंबर 2018 तक परम पूज्य बालयोगी काशीगिरी जी धाम, सकलेचा नगर, भराड़ी रोड़, सिल्लोड, औरंगाबाद, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया गया। 
श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि महाराज श्री ने कथा की शुरुआत करते हुए अजंता एलोरा की गुफाओ के बारे में बताया की वहा जो आकृतिया बनाई गयी है वो केवल आकृतिया ही नहीं बल्कि चित्रकला के माध्यम से पुरातन घटनाओं के बारे में बताया गया है। साथ ही महाराज श्री ने बताया की अगर आप वहा जाओगे तो आपको जीवन को जीने का दर्शन वहा मिलेगा। वहा एक राजा के चित्र को देख महाराज श्री ने एक कहानी भक्तो को सुनानी शुरू की। एक बार एक राजा के राज्य में एक बहुत ही बलसाली हाथी मर गया उस राजा ने उस राज्य के मंत्रियों से कहा की मुझे अपने राज्य के लिए बहुत स्ट्रांग हाथी चाइये ढूंढ कर लाइए तो सभी मंत्री उस हाथी की तलाश में जंगल की ओर निकल पड़े और फिर उन्हें जंगल में एक हाथी का परिवार दिखा जिस परिवार में तीन हाथी थे माँ बाप और बेटा लेकिन वहा समस्या ये थी की उस परिवार में उस हाथी के माँ बाप अंधे थे लेकिन राजा का हुकुम था तो ले जाना भी जरुरी था तो वो लोग हाथी को जबरजस्ती पकड़ के राजा के सामने ले जाते है और राजा उस हाथी को देख बहुत प्रशन्न होता है क्यूंकि वो हाथी बहुत बलसाली और हस्ठ - पुष्ट होता है। फिर जब उस हाथी के स्वागत में उसे खाने के लिए हाथी की मनपसंद चीजे खिलाई जाती है मगर वो हाथी कुछ नहीं खाता, तब राजा उस मंत्री को कहता है की हाथी है तो बहुत अच्छा लेकिन ये ना कुछ खा रहा रहा है ना कुछ पी रहा है इसकी कोई कोई न कोई समस्या जरूर है इसलिए ये कुछ नहीं खा रहा है। तभी राजा आदेश देता है की इस हाथी को छोड़ दिया जाए और जैसे ही उस हाथी को आज़ाद छोड़ा जाता है वैसे ही वो हाथी उस जंगल में वापस चला जाता है और सरोवर से जाकर अपनी शूड में पानी भरता है और अपने अंधे माँ- बाप को जाकर पानी पिलाता है और कहता है की आप फ़िक्र ना करें में वापस आ गया हु आप लोगो की सेवा करने के लिए साथ ही महाराज श्री ने युवा पीड़ी को समझाते हुए बताया की उस हाथी ने राजा के दरबार में कुछ क्यों नहीं खाया था क्यूंकि उस हाथी को अपने अंधे माँ बाप की फ़िक्र थी क्यूंकि उनका एकलौता सहारा सिर्फ वही था। पंडित जी ने बताया की हम जो इस भारत की भूमि पर रह रहे है वो बड़ी संस्कारो की भूमि है ये बड़ी पावन भूमि है यहां न सिर्फ मानव ही संस्कृति और विरासत को स्वीकार करते है बल्कि यहां रहने वाले पशु पक्षी भी अपने माता- पिता का आदर करने वाले है। इसलिए हमे अपनी संस्कृति और अपने भारत से प्यार करना चाहिए और हमारी संस्कृति में सबसे ऊपर है हमारे माँ-बाप तो हमे सदैव उनका आदर करना चाहिए क्यूंकि यही हमारी सबसे प्यारी संपत्ति है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंत: सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

22Dec 2018

मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की पूर्णिमा पर "पूर्णिमा महोत्सव" का सुंदर एवं भव्य आयोजन ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर के प्रांगण में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया गया

।। राधे राधे ।। मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की पूर्णिमा पर "पूर्णिमा महोत्सव" का सुंदर एवं भव्य आयोजन ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर के प्रांगण में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया गया, जिसमें सैकड़ो भक्त मौजूद रहे। सभी भक्तों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया एवं सर्वप्रथम गणेश वंदना कर कार्यक्रम की शुरुआत की गई तथा ठाकुर श्री प्रियाकांत जू भगवान, सर्वेश्वरीश्री राधा रानी के प्यारे प्यारे भजनों की प्रस्तुति दी गई। अंत में ठाकुर श्री प्रियाकांतजू भगवान की आरती का कार्यक्रम का समापन किया गया ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

24Dec 2018

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में श्री केदारेश्वर मंदिर, पेट क्र. 24 प्राधिकरण, निगडी महाराष्ट्र पुणे 44 से कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में श्री केदारेश्वर मंदिर, पेट क्र. 24 प्राधिकरण, निगडी महाराष्ट्र पुणे 44 से कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई। कलश यात्रा में हजारों की संख्या में माताओं - बहनो और भाई -बंधुओं ने भाग लिया। कलश यात्रा ढ़ोल नगाड़े, के साथ निकाली गई। कलश यात्रा जिन मार्गों से होकर गुजरी वहां इस भव्य कलश यात्रा को देखने के लिए लोग थम गए, हर किसी ने इस अद्भुत यात्रा का आनंद लिया।

राधे राधे बोलना पड़ेगा

24Dec 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। पूज्य महाराज श्री द्वारा पुणे, महाराष्ट्र, में श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करवाया जा रहा है।भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

हेडलाइन :-"मनोकामनाओ को पूर्ण करती है भागवत - देवकीनंदन जी महाराज।
पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।
कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। पूज्य महाराज श्री द्वारा पुणे, महाराष्ट्र, में श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करवाया जा रहा है।भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि हम सब भाग्यशाली है सत्संग वही है जहां मन से जाया जाए जो हमें भागवत कथा का रसपान करने का सौभाग्य मिल रहा है, ये किशोरी जी की कृपा से ही प्राप्त होता है। महाराज जी ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन “मेरे मन की है एक आवाज़ श्रावण कराया”। साथ ही महाराज श्री ने बताया की अगर गुरुदेव कृपा कर दे तो क्या होता है ? गुरुदेव की कृपा हो जाए तो हरी दर्शन हो जाते है। जो कल्पवृक्ष से प्राप्त नहीं होता, जो चिंतामणि से प्राप्त नहीं होता, वो गुरु कृपा से सहज प्राप्त होता है। हम सब काल के मुख से घिरे है इसके अलावा और कुछ नहीं। पंडित जी ने कहा की कलयुग के लोग अगर अपनी मृत्यु में महोत्सव उत्पन्न करना चाहते है तो श्रीमद भागवत कथा सुने जो श्री सुखदेव भगवान के मुख से निकली हुई है। उस भागवत को श्रावण करें ये भागवत जो परीक्षित का कल्याण करने वाली है। वो हम सब का भी कल्याण कर देगी। जीवन में "आलसी मत बनो" आलस्य बहुत बड़ा अभिशाप है। आलसी आदमी लेट उठता है, लेट काम करता है, आलसी आदमी भजन तो करता ही नहीं है। क्यूंकि उससे होता ही नहीं है और यही आलसी आदमी की पहचान है। कौन कौन व्यक्ति दरिद्र्री नहीं होना चाहता। अगर आप दरिद्र्री नहीं होना चाहते हो तो गाठ बांध लो इस बात को जीवन भर कभी भी बिस्तर पर बैठ कर भोजन मत ग्रहण करना। जो बिस्तर पर बैठ कर भोजन करते है वो दरिद्र नारायण को अपने घर में निमंत्रण देते है। अगर वाकई दरिद्री नहीं होना चाहते तो कभी भी बिस्तर पर बैठ कर भोजन नहीं करना चाहिए। संभव हो सके तो पृथ्वी पर ही बैठ कर भोजन करना चाहिए जिससे पाचन शक्ति बढ़ती है। महाराज जी ने कहा की हमारे कन्हैया के जितने भी भक्त हो वो अपार धनवान हो, ईश्वर वान हो और भक्तिवान हो, भक्त अगर धनवान होंगे तो धर्म को आगे बढ़ाएंगे। पापी लोग अगर धनवान होंगे तो वो पाप को आगे बढ़ाएंगे। इसलिए प्रत्येक भक्त धनवान हो जाये वैभववान हो जाये और बलवान भी हो जाये। जीवन को पवित्र और धन्य करने के लिए उसी भागवत ग्रंथ को श्रावण करने के लिए आज इस कथा पंडाल में उपस्थित हुए है। कलिकाल के सभी कष्टों को मिटाने में श्रीमद भागवत कथा ऐसा ग्रंथ है जो है सबके कलेशो कलयुग के दुआंधो को दूर करता है।इससे आप जो मांगे भागवत देती है आपको धन मांगना है धन मांग लो, परिवार मांगना है , परिवार मांग लो, निरोगी काया चाहिए वो मांग लो, यश चाहिए- यश मांग लो, कुछ नहीं चाहिए, जो कुछ नहीं मांगते उनको सबसे ज्यादा भगवान की भक्ति मिलती है। और उन्ही को भगवान मिलते है। जिन्हे सांसारिक कोई वस्तु नहीं चाहिए उसी को ज्यादा तर ईश्वर की प्राप्ति होती है। भागवत श्रवण के बाद जरुरी नहीं है की हम सांसारिक वस्तुए मांगने के लिए भागवत सुने।अगर अधिक बार कथा सुनने का मिले तो सिर्फ एक ही काम करना चाहिए की हे ईश्वर तुम कब मिलोगे।
महाराज श्री ने भागवत कथा की प्रथम श्लोक सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे! तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नम:..... के उच्चारण के साथ की। उन्होंने श्लोक का अर्थ समझाते हुए कहा की जो सत्य नित्य निरंतर जिनके स्वरूप को प्राप्त करके सत्य होता है, जो नित्य निरंतर हैं। जब शृष्टि नहीं थी तब भी वो थे, जब शृष्टि नहीं रहेगी तब भी वो रहेंगे, सत्य कहते ही उसको हैं जो नित्य निरंतर होता है, जो कभी नहीं मिट सकता। एक ब्रह्म सत्य है, एक कृष्ण सत्य है बाकी सब मिथ्या है। इसका एक प्यारा सा भाव समझे तो वो ये है की जिसका चित्त जिसके वश में है, हमारा चित्त हमारे वश में नहीं है, हमारा चित्त हमें भटकाता रहता है लेकिन उनका चित्त उनके वश में रहता है।
महाराज जी ने कहा की सुखदेव जी हमारे कल्याण का कितना चिंतन करते है की उन्होंने जीव कल्याण के लिए पांच यज्ञ बताए हैं, पहला यज्ञ है जब भी भोजन बनाएं घर की पहली रोटी निकालकर गऊ को खिलाएं, दूसरा यज्ञ है कुछ मीठा या आटा लेकर चीटियों को खाने के लिए देना चाहिए, तीसरा यज्ञ है पक्षियों को कुछ खाने के लिए देना चाहिए, चौथा यज्ञ है जलाशय में जो मछलियां हो उनको भी खाने के लिए कुछ देना चाहिए, पांचवा यज्ञ है भोजन बनाने के साथ कुछ मीठे के साथ अग्नि देव की पहला ग्रास खिलाना चाहिए, खुद के खाने से पहले। अग्नि देव नारायण का ही स्वरूप हैं जैसे ही आप अग्नि को भोग लगाते हैं स्वयं परमात्मा उसे ग्रहण कर लेते हैं। ये पांच यज्ञ जीव को प्रत्येक दिन करना चाहिए और जो गृहस्थि ये पांचों यज्ञ ना कर पाए उसे भगवान की कथा का आश्रय ले लेना चाहिए।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। .
श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

25Dec 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। भागवत कथा के दूसरे दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।कथा के द्वितीय दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

मानव जीवन परमात्मा की तरफ से सबसे प्यारा गिफ्ट है- पं. देवकीनंदन जी

बिगड़े हुए चरित्र को भी सुधार देती है भागवत - देवकीनंदन जी महाराज

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। भागवत कथा के दूसरे दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
कथा के द्वितीय दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। पूज्य महाराज श्री द्वारा पुणे, महाराष्ट्र, में श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करवाया जा रहा है। महाराज श्री ने कथा की शुरुआत में एक संत का उदहारण देते हुए कहा की एक बार एक व्यक्ति ने एक संत से पूछा की बाबा हम भी भजन करना चाहते है भक्ति करना चाहते है लेकिन भक्ति हो नहीं पाती है तो संत ने बड़ा ही सुन्दर जवाब दिया की बुरी आदतें सुधार लो बस हो गया भजन। महाराज श्री ने बताया की हमें अपने आप को समय देना चाहिए अकेले मैं बैठ कर सोचना चाहिए की हमारे अंदर क्या क्या बुराइयां है और वो कौन सी बुराई है जिसकी वजह से दुसरो को दुख होता है।साथ ही पंडित जी ने बताया की हमारे संत किसी भी बात को इतना स्पष्ट इस वजह से कह पाते थे क्यूंकि वो किसी और से बात करने में समय व्यर्थ करने की बजाए अपने मन से अपने आप से बात किया करते थे, क्यूंकि हम से अच्छा हमें कोई नहीं जानता।इसलिए हमें अपने आप से बाते करनी चाहिए और सोचना चाहिए की हमने अपने जीवन में क्या खोया और क्या पाया है। क्यूंकि हमने अपने जीवन में कुछ पाया नहीं सिर्फ खोया है और जिस ने जीवन में पा लिया है तो उसके भाग्य के तो क्या ही कहने। महाराज श्री ने बताया की मानव जीवन मिलने के बाद आप थोड़ा सोचिये की जीवन भर जो आपने पैसा कमाया है पूरा जीवन कमाने में लगा दिया है लेकिन उस दिन के बारे में सोचिये जिस दिन आपकी मृत्यु होगी और मरने के बाद आप मिटटी में तब्दील हो जाओगे तो सब मिटटी हो जाना है मिटटी में मिल जाना है तुम्हारे साथ कुछ नहीं जायगा लेकिन वही दूसरी ओर कृष्ण नाम गाने वाले लोग मेरे हरी का नाम संकीर्तन करने वाले लोग वो यहां कुछ छोड़ कर नहीं जायँगे वो सब कुछ साथ लेकर जायँगे क्यूंकि उन्होंने हरी का नाम भज कर वो परम धन पा लिया है जो उनके साथ जायगा। पंडित जी ने बताया की हमारी जो भी आदते बुरी है उन्हें दोष देने के बजाए हमें अपने आप को सुधारना चाहिए क्यूंकि हमे बुरी आदतों ने नहीं बल्कि हमने इन बुरी आदतों को पकड़ा हुआ है। जितना समय हम बुरी आदतों में लगाते है अगर उतना समय हम भगवान की भक्ति में लगाए तो हमारा कल्याण हो जायगा। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। 
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है। श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए। यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

20Dec 2018

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 16 से 22 दिसंबर 2018 तक परम पूज्य बालयोगी काशीगिरी जी धाम, सकलेचा नगर, भराड़ी रोड़, सिल्लोड, औरंगाबाद, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

प्रेम जैसा पवित्र कोई शब्द नहीं है।
हमें ये जीवन सिर्फ भक्ति के लिए मिला है :- श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 16 से 22 दिसंबर 2018 तक परम पूज्य बालयोगी काशीगिरी जी धाम, सकलेचा नगर, भराड़ी रोड़, सिल्लोड, औरंगाबाद, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के पांचवे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए युगलासठकम में किये गए श्री राधारानी और श्री कृष्ण के प्रेम की लीलाओं का वर्णन कर किया। महाराज श्री ने बताया की हमारे प्रेम और सर्वेश्वर ठाकुर जी के प्रेम में बहुत अंतर है हमारा प्रेम उनके जैसा नहीं है। यह जीव किसी न किसी से प्रेम करता है और अगर हम जिससे प्रेम करते है और उससे कुछ चाहे पर हमारी वो इच्छा पूरी न हो तो हम आपस में लड़ते है क्यूंकि तुम जो चाहो वो में करूं तो ये प्रेम है और अगर जो तुम चाहो वो में ना करूं तो ये लड़ाई तो आज का जिव प्रेम नहीं बिज़नेस करता है। और यही अन्तर है आपके और ठाकुर जी के प्रेम में क्यूंकि गोविंद सर्वेश्वर राधा सर्वेश्वर कृष्ण एक दूसरे से अनंत अनंत अनंत हजार वर्षो तक युग युगांतर से एक दूसरे को देखते है और देखते आ रहे है लेकिन जब भी देखते है हमेशा ऐसा लगता है की जैसे पहली बार देख रहें है। लेकिन हम जो प्रेम करते है वो प्रेम नहीं था वो तो बस एक आकर्षण था खिचाव था किसी के प्रति मन प्राप्ति चाहता था और वो जब प्राप्त हुआ तो प्रेम खत्म और दूसरी ओर मेरे राधा रानी और श्री कृष्ण जो एक दूसरे से कुछ चाहते ही नहीं है ब्रज के रसिको ने लिखा है की मिले ही रहै तो मन कबऊ मिले ना ऐसे रोज मिलते है लेकिन जब मिलते है तो ऐसे मिलते है जैसे कभी पहले मिले ही नहीं थे यही तो अद्भुत प्रेम है इसी प्रेम का वर्णन युगलासठकम में किया गया है। ठाकुर जी ने बताया की प्रेम जैसा पवित्र कोई शब्द नहीं है प्रेम से पवित्र कोई विषय नहीं है, प्रेम ही है जो पत्थर को भगवान् बना देता है जब कोई इंसान किसी पत्थर को प्रेम करता है तो पत्थर में भगवान् प्रकट कर देता है। लेकिन आज के समय में हम जैसे स्वार्थी लोगो ने प्रेम की परिभाषा ही बदल दी है और प्रेम शब्द को बदनाम कर दिया है। महाराज श्री ने कहा की हमें भक्ति जन्म से ही करना शुरू कर देनी चाहिए क्यूंकि जो जीव बचपन से भक्ति करना शुरू कर देता है तो उनका रंग ढंग चाल सब अलग होता है और उनकी एक अलग ही दुनिया होती है महाराज श्री ने सक्कु बाई के बारे में बात करते हुए कहा की सक्कु बाई भगवान् की परम भक्त हुई है और उन्होंने बचपन से भगवान् की भक्ति की और जिस परिवार में उनकी शादी हुई वहा उन्हें पूजा पाठ करने से तिलक लगाने से भक्ति करने से रोका जाता था लेकिन एक दिन ऐसा आया की सक्कु बाई कपडे धोने के लिए एक तालाब के किनारे गई और उसने वहा एक संत को भगवान् का नाम जपते हुए जाते देखा तो मानो सक्कु बाई अपने आप को उनके पास जाने से नहीं रोक पाई और संतो से कहने लगी की मुझे भी आपके साथ चलना है भगवान् का नाम जपना है भगवान्
की भक्ति करनी है तो वो सब छोड़ छाड़ उन संतो के साथ भगवान् के कीर्तन में चली गयी और उसे उसके ससुराल जल्दी आने मुमकिन न था तब भगवान् श्री कृष्ण खुद सक्कु बाई बनकर उसके घर गए कपडे धोये और घर का सारा काम किया। इसलिए अगर आप भगवान् की भक्ति पुरे दिल से करते है तो भगवान् आप पर जरा सी भी आंच नहीं आने देते है। इसलिए हमें जो ये जीवन मिला है वो मिला ही सिर्फ भक्ति के लिए है इसलिए जितना नाम जाप कर सको जितनी भक्ति कर सको वो करो वार्ना पशुओं में और हममे फर्क ही क्या रहेगा। और ये अधिकार सिर्फ मानव जीवन को मिला है की वो भक्ति पूरी कर भगवान् तक की अपनी यात्रा पूरी करें। इसलिए भक्ति का बीज हमें बचपन में ही बोना चाहिए ताकि हमारी पुरे जीवन की यात्रा मंगलमय हो जाए। पंडित जी ने बताया की आज कल युवा पीढ़ी के बच्चो में फ़टे हुए कपडे पहनने का बड़ा शोक है वो फ़टे हुए कपडे पहन कर अपने आप को फैशनेबल समझते है लेकिन में आप को बता दू की हमारे द्वारा फ़टे हुए कपडे पहनना अपसगुन होता है। इसलिए हमे कभी भी फ़टे हुए वस्त्र नहीं पहनने चाहिए। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। 
महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है। 
भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना
है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।
अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।
श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।
श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

 

16Dec 2018

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सिल्लौड, औरंगाबाद में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा से पूर्व विशाल कलश यात्रा निकाली गई।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सिल्लौड, औरंगाबाद में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा से पूर्व विशाल कलश यात्रा निकाली गई, जिसमें हजारों की संख्या में माताओं बहनों ने कलश उठाया, कलश यात्रा कथा स्थल तक निकाली गई।

16Dec 2018

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 16 से 22 दिसंबर 2018 तक परम पूज्य बालयोगी काशीगिरी जी धाम, सकलेचा नगर, भराड़ी रोड़, सिल्लोड, औरंगाबाद, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

“भक्ति ज्ञान वैराग्य से ओत प्रोत है श्रीमद भागवत कथा : देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 16 से 22 दिसंबर 2018 तक परम पूज्य बालयोगी काशीगिरी जी धाम, सकलेचा नगर, भराड़ी रोड़, सिल्लोड, औरंगाबाद, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि "श्रीमद् भागवत कथा साधारण ग्रंथ नहीं है। " 
भागवत कथा अगर श्रद्धा से सुनेंगे तो यह भागवत कल्प वृक्ष है आपको वो मिल सकता जिसकी आपने कल्पना भी नहीं की होगी। अगर आप अपने धर्म का सम्मान करेंगे तभी आप सम्माननीय बनेगे।
महाराज श्री ने आगे बताया कि "श्रीमद भागवत कथा आखिर है क्या ?" उन्होंने कहा कि भक्ति ज्ञान वैराग्य से ओत प्रोत है श्रीमद भागवत कथा। बिना भगवान की सेवा के बिना कल्याण नहीं है।

महाराज श्री ने कहा कि कभी हमें यह प्रश्न नहीं किया कि हम कौन है। राम कृष्णा परमहंस जी महाराज को काली माँ साक्षात् दर्शन देती थी। एक भक्त उनके पास में आया और भक्त ने कहा महाराज हमने सुना है काली मैया आपको दर्शन देती है। तब परमहंस जी महाराज जी कहा की बताओ आपको क्या चाहिए। तो भक्त ने कहा की हमें भी उनसे मिलाना देना। भक्त ने कहा की जब आपके यहाँ आये तो उन्हें मेरे यहाँ भेज देना। परमहंस जी महाराज जी ने भक्त से पूछा तुम कहा रहते हो। तो उसने अपने दफ्तर का एड्रेस बताया और आपने घर का एड्रेस भी दिया फिर भी महारा जी ने कहा की तुम कहा रहते हो। तो परमहंस जी महाराज जी कहा की जिस दिन तुम ये बता दो तुम कहां रहते हो उस दिन काली मैय्या को वहां भेज दूँगा।

महाराज श्री ने कहा कि अपने आपको पहचानो यही से भागवत कथा प्रारम्भ हुई है। भक्ति का प्रारम्भिकरण दो ही प्रश्नो से है। या तो में कौन हूँ ये जानने की शुरुआत कर लो या फिर वो भगवान कौन है जिसने इतनी सुन्दर दुनिया बनाई है। तुम दोनों में से किसी को जान गए तो तुम्हारा मन भक्ति और कथा, भजन दोनों में लग जायेगा।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। 
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

17Dec 2018

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 16 से 22 दिसंबर 2018 तक परम पूज्य बालयोगी काशीगिरी जी धाम, सकलेचा नगर, भराड़ी रोड़, सिल्लोड, औरंगाबाद, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। दूसरे दिन की भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया गया । कथा के द्वितीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। 

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 16 से 22 दिसंबर 2018 तक परम पूज्य बालयोगी काशीगिरी जी धाम, सकलेचा नगर, भराड़ी रोड़, सिल्लोड, औरंगाबाद, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। 
दूसरे दिन की भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया गया । कथा के द्वितीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। 
भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जीवन में भगवत संबंधी कुछ प्रश्न हमें अपने आप से करने चाहिए। निश्चित तौर पर जब तक ये संसार रहेगा का हमे चैन नहीं लेने देगा । अगर हम ये सोचे की काम से फ्री होकर हम भक्ति करेंगे, तो ये सोचिए की काम पूरे ही कब होते हैं। ये कामनाए ही हैं जो कभी पूरी नहीं होती, जीवन पूरा हो जाता है। 
महाराज श्री ने आगे कहा कि भगवान की भक्ति के बगैर अगर हम सोचें की हमे कुछ मिल गया। इस संसार और संसार के लोगों को आजतक मिला क्या है? काम किसी के पूरे हुए नहीं, भगवान की भक्ति है जो हमे पूर्ण करती है। मानव जीवन में जब भी अवसर मिले सुधरने का काम किजिए, अच्छी बात सिखने को मिले तो सीख लिजिए, बुरे बातों पर ध्यान मत दिजिए। समस्या वही है जो नहीं करनी चाहिए वो कर रहे हैं और जो करना चाहिए उसके लिए ही समय नहीं है। मानव जीवन हमें भगवान की भक्ति के लिए मिला है, भगवान ने हमे हमारे विवेक पर छोड़ा है की जो विवेक कहता है वो करो और हम निकल पड़े हैं अपने विवेक को लेकर और जैसे ही विवेक का उपयोग इस संसार में किया संसार वालों ने कहा हम खुद फसे हुए हैं आओ हमारे साथ ही फस लो और हम उनकी देखा देखी उसमें ही फसते चले जा रहे हैं। इससे निकलने के लिए गुरू द्वारा बताए गए मार्ग पर चलिए, उससे जो आप चाहते हैं वो आपको प्राप्त होगा। मानव जीवन का उद्देश्य हमे प्राप्त होगा, सफलता हमे प्राप्त होगी। 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। 
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे- राधे बोलन पड़ेगा ।।

18Dec 2018

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 16 से 22 दिसंबर 2018 तक परम पूज्य बालयोगी काशीगिरी जी धाम, सकलेचा नगर, भराड़ी रोड़, सिल्लोड, औरंगाबाद, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। 

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 16 से 22 दिसंबर 2018 तक परम पूज्य बालयोगी काशीगिरी जी धाम, सकलेचा नगर, भराड़ी रोड़, सिल्लोड, औरंगाबाद, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। 
भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया। कथा के तीसरे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के तीसरे दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जितने भी युवा जीवन में सफलता चाहते हैं तो सबकुछ आपके विचारों पर निर्भर करता है। कई बार लोग निराश होते हैं, आपकी विचारधारा आपको सुख देती है, आपकी विचार धारा आपको दुख देती है। इस संसार में सब अपने अपने कर्मों का फल भोगते हैं। हमारे युवा बहुत जल्दी अपनी विचारधारा बदल लेते हैं, सुखी हो जाएं तो मेहनत का फल है, दुखी हो जाएं तो भगवान ये दुख मुझे क्यों दिया है। भगवान आपको दुख देते हैं, मेहनत आपको सुख देती है ऐसा नहीं है, ये सारा कमाल नजरिए का है, आप सिर्फ अपनी सोच बदलिए, सारी व्यवस्थाए, सुविधाएं सब बदल जाएंगी। आपके पास जो है उसमें खुश रहिए, जो नहीं है उसके लिए ईश्वर को दोष मत दिजिए, आपने जो नहीं किया वो आपको नहीं मिलेगा, अगर कुछ करके आए होते तो आपको जरूर मिलता, इसलिए जो मिल गया है उसमें ही सुखी रहिए।

महाराज श्री ने कहा कि जीवन से सम्बंधित प्रश्न हम संत महात्माओं से करते हैं लेकिन एक प्रश्न मृत्यु से सम्बंधित नहीं करते जबकि जीवन झूठा मृत्य सत्य है और सत्य के विषय में कोई प्रश्न नहीं किया जाता। जीवन में एक कर्म अपने लिए किया जाता है, एक कर्म सबके लिए किया जाता है। जो परोपकार के लिए कर्म किया जाता है वो सर्वश्रेष्ठ कर्म कहा जाता है।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।

तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

19Dec 2018

आज विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी ने कुंभ प्रयागराज में शांति शिविर का भूमि पूजन विधिवत पूजा अर्चना के साथ किया।

आज विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी ने कुंभ प्रयागराज में शांति शिविर का भूमि पूजन विधिवत पूजा अर्चना के साथ किया। 10 जनवरी को पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के कर कमलों से शिविर का उद्घाटन किया जाएगा। शांति सेवा शिविर लगभग सवा महीने के लिए लगाया जाएगा जिसमें आने वाले भक्त प्रेमियों के रहने की उचित व्यवस्था की जाएगी।

 

19Dec 2018

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 16 से 22 दिसंबर 2018 तक परम पूज्य बालयोगी काशीगिरी जी धाम, सकलेचा नगर, भराड़ी रोड़, सिल्लोड, औरंगाबाद, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 16 से 22 दिसंबर 2018 तक परम पूज्य बालयोगी काशीगिरी जी धाम, सकलेचा नगर, भराड़ी रोड़, सिल्लोड, औरंगाबाद, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। कथा के चतुर्थ दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
कथा प्रारंभ से पूर्व आज महाराज श्री को गुलाब की फूल माला पहनाकर एवं शॉल उड़ाकर सम्मानित किया गया ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि आप सत्संग मे जाते रहते हैं इस बात का परिचय इस बात से मिलता है की आप सत्संग में जाकर कैसा व्यवाहर करते हैं। हम सिर्फ भंडारा लेने के लिए नहीं जाते हैं भण्डारे में, हम सत्य को ग्रहण करने के लिए जाते हैं सत्संग में। सत्संग में हम अगर देर से पहुंचे तो हमारा बैठना भी उस तरह का होना चाहिए, पहुंचना उस तरह का होना चाहिए की जो लोग कथा हम से पूर्व सुन रहे हैं उसमें कुछ बाधा उत्पन्न ना हो। तभी हम को समझना चाहिए की हम सच्चे श्रोता हैं, हमें कथा सुनना आता है। कहते है भगवान वहीं देते हैं जो हम भगवान को देते हैं । अगर हम मंदिरों में, तीर्थों में कथा पंडालों में अशांति देंगे तो ये अशांति हमारे जीवन में आ जाएगी और अगर हम वहां जाकर शांति का परिचय देंगे तो हमारे जीवन में शांति आ जाएगी। बहुत ज्यादा जरूरी है की कथा में जाकर हम शांति का परिचय दें।

महाराज श्री ने कहा कि जीव के चरित्र निर्माण में और चरित्र हनन में तीन चीजें बहुत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा कि अगर चरित्र समाप्त हो जाए तो सब कुछ समाप्त हो जाता है और चरित्र समाप्त होता कब है उसके भी पीछे कारण हैं। चरित्र हरण होता है आपके दृश्य से, आपके श्रवण से, ये दो चीजें जबतक नहीं सुधरेंगी तब तक हनन का खतरा मडराता रहेगा । जो व्यक्ति देखता है एक दृश्य उसका चरित्र बदल सकता है, दूसरा जो सुनता है वो भी चरित्र बदल सकता है।

महाराज श्री ने आगे कहा कि महात्मा गांधी जी के तीन बंदर हमे तीन सीख देते हैं, बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो, बुरा मत कहो, लेकिन सोचने वाली बात ये है की क्या इनमें से एक भी बात हम सीख पा रहे हैं। बुरा मत बोला सरल है, बुरा मत सुनो सरल है, बुरा मत कहो सरल है ये सब कुछ तुम्हारे ऊपर निर्भर करता है। लेकिन हम लोग अच्छा देखने के लिए उत्तसुक कम होते हैं, बुरा देखने के लिए ज्यादा होते हैं। अच्छा बोलने के लिए प्रयास करना पड़ता है, बुरा बोलने के लिए अपने आप ही निकल पड़ता है। मेरे कहने का अभिप्राय है आपका एक दृश्य आपका चरित्र बदल सकता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।
महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।
शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।
इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।
दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।
महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

20Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी के द्वारा आज राम किशन स्कूल सिल्लोड में युवा शान्ति सन्देश के माध्यम से महाराज श्री ने छात्र-छात्राओं को भारत की संस्कृत संस्कृति और संस्कारो के बारे में बताया ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी के द्वारा आज राम किशन स्कूल सिल्लोड में युवा शान्ति सन्देश के माध्यम से महाराज श्री ने छात्र-छात्राओं को भारत की संस्कृत संस्कृति और संस्कारो के बारे में बताया साथ ही आज की युवा पीढ़ी द्वारा धर्म के बारे में पूछे गए सवालों के जवाब भी दिए और उन्हें सदा सदमार्ग पर चलने का पाठ पढ़ाया।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

15Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने भायंदर मुंबई में आयोजित विशाल 108 श्रीमद्भागवत के भव्य आयोजन के बाद सिल्लोड़ औरंगाबाद के लिए प्रस्थान किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने भायंदर मुंबई में आयोजित विशाल 108 श्रीमद्भागवत के भव्य आयोजन के बाद सिल्लोड़ औरंगाबाद के लिए प्रस्थान किया, जहां पर पूज्य महाराज श्री द्वारा 16 से 22 दिसंबर तक प्रथम बार श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जाएगा। मुंबई आयोजकों एवं समिति सदस्यों द्वारा महाराज श्री को भावभीनी विदाई दी गई।

15Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने आज सिद्धि विनायक के दर्शन किए, गणपति महाराज से आशीर्वाद प्राप्त कर देश की खुशहाली की कामना की।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने आज सिद्धि विनायक के दर्शन किए, गणपति महाराज से आशीर्वाद प्राप्त कर देश की खुशहाली की कामना की।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

14Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 14 दिसंबर 2018 तक भायंदर मुंबई में आयोजित 108 श्रीमद् भागवत कथा के अष्टम दिवस पर राम मंदिर पर शांति संदेश एवं संकीर्तन का आयोजन किया गया। महाराज श्री ने प्रभु श्री राम के चरित्र का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 14 दिसंबर 2018 तक भायंदर मुंबई में आयोजित 108 श्रीमद् भागवत कथा के अष्टम दिवस पर राम मंदिर पर शांति संदेश एवं संकीर्तन का आयोजन किया गया। महाराज श्री ने प्रभु श्री राम के चरित्र का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

अष्टम दिवस की शुरुआत प्रभु राम की आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। आरती में मुख्य यजमान रजनीश त्रिपाठी, विजया रजनीश त्रिपाठी, सहयजमान माया मुरारी लाल पांडला, हेमलता दिनेश शर्मा, इंदु सुभाष चेजारा, माया रमा प्रसाद सक्सैना ने उतारी, साथ में अयोध्या प्रसाद सेठ, राम जीवन लाल सोनी एवं आयोजक समिति के सभी सदस्य उपस्थित रहे।
कथा पंडाल में आए हुए कई भजन गायकों ने सुंदर भजनों की प्रस्तुती दी, जिसे सुनकर सभी भक्त खूब झूमें नाचे।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने शुरूआत करते हुए कहा कि वो कर्म श्रेष्ठ है, वो वाणी श्रेष्ठ है, वो श्रवण श्रेष्ठ है जो प्रभु के लिए होता है। उन्होंने भगवान श्री राम के मंदिर निर्माण के लिए केंद्र सरकार से, राज्य सरकार से, सुप्रीम कोर्ट से, सभी राजनैतिक पार्टियों से प्रार्थना करते हुए कहा कि हमें राम मंदिर के निर्माण के लिए कितना इंतजार और करना होगा। अगर इस देश को हम भारत कह रहे हैं तो राम के बगैर ये देश भारत नहीं हो सकता यह बात याद रखिए। महाराज श्री ने आगे कहा कि देर से मिला हुआ न्याय अन्याय से कम नहीं होता है। हमे इंतजार करते करते 70-80 साल हो गए। उन्होंने कहा कि सभी राजनैतिक पार्टियों को मिलकर राम मंदिर का समर्थन करना चाहिए और भव्य मंदिर का निर्माण करना चाहिए।

महाराज श्री ने कहा कि सभी लोग देश बचाने की बात करते हैं लेकिन धर्म बचाने की कोई बात नहीं करता, अगर धर्म नहीं बचा को देश नहीं बचेगा, धर्म बचेगा तो ये देश बचेगा । मंदिर का निर्माण होगा तो ये धर्म बचेगा।

महाराज श्री ने सभी से प्रश्न किया की राम जरूरी क्यों हैं, उन्होंने इसका बड़ा सुंदर उत्तर देते हुए कहा कि क्या इस देश में आज माताएं बहने सुरक्षित हैं ? और ये असुरक्षा किसकी वजह से हैं। माताओं की वजह से माताएं सुरक्षित नहीं हैं या पुरूषों की वजह से माताएं सुरक्षित नहीं हैं। दहेज के लिए प्रताडित करना, मारना पीटना ये सब कौन करता है ये पुरूष करता है। लेकिन ये पुरूष इतना पतभ्रष्ट कैसे हो गया ? जिसके वहां मां बहन भी स्त्रियां है और उसही के वहां उनकी नजरों में कोई स्त्री सुरक्षित नहीं है। पुरूष के इतने चरित्र का पतन इस वजह से हुआ है क्योंकि आज हमारे देश के युवाओं को धर्म से दूर किया जा रहा है। जब व्यक्ति धर्म से दूर जाता है, राम से दूर जाता है, राम चरित्र से दूर जाता है तो रावण के चरित्र को अपना लेता है और जब रावण का चरित्र अपना लेगा तो फिर कोई मां, बहन, बेटी, भाई, पिता पुत्र कोई सुरक्षित नहीं होगा, सब असुरक्षित हों जाएंगे, समाज असुरक्षित हो जाएगा। भगवान श्री राम सिखाते हैं एक नारी व्रत रखता हूं, अपनी को छोड़कर पराई माता और बहन समझता हूं, इसलिए राम मंदिर जरूरी है। अगर चाहते हो इस देश में माताएं बहने सुरक्षित हों तो सबसे पहले देश के युवाओं को राम के विषय में समझना चाहिए, राम मंदिर बनाकर राम के उस चरित्र को बताइए की राम की उस मूर्ति का ही दर्शन करने मत जाइए, एक बार वहां जाकर देखिए की राम ने जीवन में किया क्या है। आप सब ये समझिए की जब से इस देश ने राम को भूला दिया तब से ये देश अशांत हो गया।

महाराज श्री ने आगे कहा कि आज के पाठ्यक्रम में से राम गायब है, राम को पढ़ाया नहीं जाता है। झूठी कहानियां पढ़ाई जाती हैं । मैं किसी के भी विरूद्ध नहीं हूं लेकिन कृप्या करके अपने धर्म का सम्मान किजिए। हमारे बच्चें धर्म के विषय में, राम-सीता के विषय में, भरत-लक्ष्मण के विषय में जानेंगे तो माता बहन ही नहीं इस देश में पूरा परिवार सुरक्षित होगा।

उन्होंने आगे कहा कि किसी भी धर्म की महिला से पूछा जाए की उसे कैसा पुत्र चाहिए तो वो राम जैसा ही कहेंगी। भगवान श्री राम ने कभी भी अपनी माता पिता की इच्छा को नजर अंदाज नहीं किया । वो श्री राम जो बाल्यकाल से ही अपने माता पिता के आज्ञाकारी पुत्र हैं, वेदों से उनका जुड़ाव है, बचपन से ही संत महात्माओं का आदर करना जानते हैं। वो अपने गुरू के वहां पड़ने गए और सभी विद्याओं में निपुण हो गए।

महाराज श्री ने कहा कि हमें घर में पूजा पाठ करनी चाहिए, जिस घर में पूजा पाठ होता है उस घर में शांति होती है, जिस घर में पूजा पाठ नहीं होती उस घर में लक्ष्मी रहे या ना रहें लेकिन अशांती जरूर रहती है। एक मंदिर अयोध्या में बने और दूसरा मंदिर हमारे मन में भी बने, मैं देश के युवाओं से कहना चाहूंगा की राम का चरित्र पढ़ना चाहिए और माताओं बहनों को सीता का चरित्र पढ़ना चाहिए ।

पूज्य महाराज श्री ने आज अपने श्रीमुख से निकले हुए भजनों से समुचे वातावरण को कृष्णमय बना दिया। सभी भक्त भजनों पर खुब झूमें और प्रभु के रंग में रंग गए। महाराज श्री ने राधा कृष्ण के सुंदर भजनों की प्रस्तुती दी।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

14Dec 2018

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में भायंदर, मुम्बई में संकीर्तन एवं शांति संदेश का आयोजन किया गया। जिसमें हजारों की संख्या में भक्त महाराज श्री के भजनों पर झूमे।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में भायंदर, मुम्बई में संकीर्तन एवं शांति संदेश का आयोजन किया गया। जिसमें हजारों की संख्या में भक्त महाराज श्री के भजनों पर झूमे।

इसके बाद महाराज श्री के सानिध्य में भगवान श्री राम के मंदिर निर्माण हेतु पद यात्रा भी निकाली गई।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

14Dec 2018

भगवान श्रीराम के मंदिर निर्माण हेतु भायंदर, मुम्बई में निकली गई पदयात्रा

भगवान श्रीराम के मंदिर निर्माण हेतु भायंदर, मुम्बई में निकली गई पदयात्रा

अखण्ड भारत मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 14 दिसम्बर 2018 को सांय 4:30 बजे से भायंदर मुंबई में बाला साहेब ठाकरे मैदान, ऑरेंज हॉस्पिटल के सामने, इंद्रलोक फेज-3, भायंदर मुंबई से राम मंदिर के पक्ष में अपना समर्थन देते हुए श्रीराम मंदिर निर्माण हेतु शातिपूर्वक पद यात्रा निकाल