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12Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 11 जनवरी से 17 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन शाम 4: 00 बजे से 7 बजे तक स्थान - सॉल्ट लेक सी डी पार्क कोलकाता में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। दूसरे दिन की भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया गया ।पूज्य महाराज श्री द्वारा पुन: कोलकाता में कथा का श्रवण करवाया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 11 जनवरी से 17 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन शाम 4: 00 बजे से 7 बजे तक स्थान - सॉल्ट लेक सी डी पार्क कोलकाता में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। दूसरे दिन की भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया गया ।
पूज्य महाराज श्री द्वारा पुन: कोलकाता में कथा का श्रवण करवाया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। 
भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई।
महाराज जी ने कथा प्रारम्भ करते हुए कहा की हर व्यक्ति को एक अतिथि को भोजन जरूर कराना चाहिए। ऐसा नियम होना चाहिए। और महाराज जी ने कहा की जब तक अतिथि भोजन ग्रहण न कर ले तब तक खुद भोजन नहीं करना चाहिए। कोई जरूरतमद भूका बैठा हो तो उसे भोजन कराके खुद भोजन करो।लेकिन अतिथि को भोजन करना चाहिए ये शास्त्र से संबंध बात है। सेठ जी बहुत सेवा करते थे उनके घर में कई संत आये सेठ जी को ये अवसर मिला की जब संत भोजन करें तो उनकी झूठी पत्तल उठाओ। "जितनी छोटी सेवा करोगे उतने ही विन्रम हो जाओगे। जितने विन्रम हो जाओगे उतने ही भगवान को प्रिय लगोगे"। आपका अहंकार आपको भगवान से दूर करता है। हाथ जोड़ने से थोड़ी कोई विन्रम हो जाता है। आपकी वाणी में आपकी विन्रमता है। आपके कर्म में आपकी विन्रमता ,आपके स्वाभाव में आपकी विन्रमता झलकनी चाहिए। आप न कहो की मैं विन्रम हो गया लेकिन आपके जानने वाले लोग कहने लग जायेगे की आप विन्रम हो गए इन में बदलाव आ गया तो समझना की कथा का असर हो गया। और आप में ये विन्रमता तब तक नहीं आएगी जब तक आप छोटी से छोटी सेवा नहीं करोगे। 
1 - संसार का सबसे बड़ा सुख है परमात्मा का मिलन - श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज 
2- जिसने कलयुग को बचा रखा है वो है दान - ठाकुर जी महाराज
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। 
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

13Jan 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में पुन: सीडी पार्क, सॉल्ट लेक, कोलकाता में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन स्नेही परिवार के द्वारा 11-17 जनवरी 2019 तक करवाया जा रहा है।तृतीय दिवस में पूज्य महाराज श्री ने राजा परीक्षित की कथा का वृतान्त भक्तों को श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में पुन: सीडी पार्क, सॉल्ट लेक, कोलकाता में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन स्नेही परिवार के द्वारा 11-17 जनवरी 2019 तक करवाया जा रहा है।

तृतीय दिवस में पूज्य महाराज श्री ने राजा परीक्षित की कथा का वृतान्त भक्तों को श्रवण कराया।

"इच्छाएं कभी पूरी नहीं होती",
"जीवन में भटकाव आ जाये तो संतो की आवयश्कता होती है" - पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है। तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।

शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है।

राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे। भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

आप सभी भक्तो से निवेदन है की अपने परिवार व् इष्ट मित्रो सहित भारी से भारी संख्या में पधारकर कथा का रसपान करें एवं अपने जीवन को कृतार्थ करें।

14Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 11 जनवरी से 17 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन शाम 4: 00 बजे से 7 बजे तक स्थान - सॉल्ट लेक सी डी पार्क कोलकाता में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 11 जनवरी से 17 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन शाम 4: 00 बजे से 7 बजे तक स्थान - सॉल्ट लेक सी डी पार्क कोलकाता में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

हमारे चरित्र का निर्माण करती है कथाएं - महाराज श्री 
परिवर्तन का नाम ही जीवन है - देवकीनंदन जी

जो ईश्वर में अपने आप को समाहिस्त न कर सकें वो नरको की यातना भोगते है -देवकीनंदन जी

जो अपने "आज" को सवारते है उनका आने वाला कल अपने आप सुधर जाता है - ठाकुर जी

कथा के चौथे दिन मुख्य यजमान गोपाल स्नेही जी का पूरा परिवार व हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

पूज्य महाराज श्री द्वारा पुन: कोलकाता में कथा का श्रवण करवाया जा रहा है।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
कथा की शुरुआत करते हुए महाराज श्री ने राधा रानी जी को याद करते हुए "राधे राधे जपले बंदे" भजन कथा पंडाल में भक्तो को श्रवण कराया। महाराज श्री ने चैतन्य महाप्रभु के बारे में बताते हुए कहा की गोपी प्रेम कैसा होता है अगर ये जानना हो तो आप चैतन्य महाप्रभु के बारे में जाने।साथ ही बहुत बड़े दार्शनिक सुखरात जी की कहानी भी भक्तो को अपने श्रीमुख से श्रवण कराई की एक बार सुखरात जी समुन्दर के तट पर टहल रहे थे तो उन्होंने एक बच्चे को रोता हुआ देखा सुखरात जी ने उस बच्चे से पूछा की तुम रो क्यों रहे हो तो उस बच्चे ने बताया की महाराज मुझे सुबह से शाम हो गई की मैं इस सागर को अपने कटोरे में समाना चाहता हु लेकिन ये सागर मेरे इस कटोरे में समा ही नहीं रहा है इस लिए मैं रो रहा हु। तो फिर उस बच्चे की इतनी बात सुन कर सुखराज जी भी रोने लगे तब बच्चा हैरान हो जाता है और पूछता है की महाराज जी अभी तक तो मैं रो रहा था अब आप क्यों अचानक से रोने लगे तब सुखरात जी कहते है कि जैसे तू इस समंदर को अपने इस कटोरे में समाने में निष्फल हो रहा है वैसे ही मैं भी इस मानव रूपी कटोरे में उस परमात्मा रूपी सागर को समाहिस्त करना चाहता हु लेकिन तेरी ही तरह मैं भी निष्फल हो रहा हु। ये सुनते ही उस बच्चे ने वो कटोरा समुन्दर में फेंक दिया और कहा की अगर इस कटोरे में समुन्द्र नहीं आ सकता तो क्या हुआ ये कटोरा तो समुन्दर में समा सकता है,और ये सीख उस बच्चे ने सुखरात जी को दी। महाराज श्री ने बताया की जो ईश्वर में अपने आप को समाहिस्त न कर सकें वो नरको की यातना भोगते है कभी किसी जन्म में कभी किसी जन्म में और ये संसार बड़ा मतलबी है जो समय के हिसाब से आपका फायदा उठाता है,लेकिन हमारे ठाकुर न आपके पैसे देखते है ना आपके कपडे देखते है वो तो आपकी भक्ति और आपका भाव देखते है। इसलिए हमें अपने आज का सदुपयोग करना चाहिए क्यूंकि वर्तमान भगवान् के द्वारा दिया हुआ बहुत सुन्दर गिफ्ट है। जो अपने आज को सवारते है उनका आने वाला कल अपने आप सुधर जाता है। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया। शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे। महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।" जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया। इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

15Jan 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में पुन: सीडी पार्क, सॉल्ट लेक, कोलकाता में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन स्नेही परिवार के द्वारा 11-17 जनवरी 2019 तक करवाया जा रहा है।पंचम दिवस में पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं की कथा का सुन्दर वृतान्त भक्तों को श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में पुन: सीडी पार्क, सॉल्ट लेक, कोलकाता में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन स्नेही परिवार के द्वारा 11-17 जनवरी 2019 तक करवाया जा रहा है।

पंचम दिवस में पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं की कथा का सुन्दर वृतान्त भक्तों को श्रवण कराया।

"हड़बड़ी में तो गड़बड़ी ही होती है।"

"शार्ट-कट करके जिसने जो कमाया है वो शार्ट-टाइम ही रहेगा। इसीलिए कभी भी शार्ट-कट नहीं अपनाना चाहिए।"

महाराज श्री ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की आज का दिन बहुत ही पावन है क्योंकि आज भगवान सूर्य अपने पुत्र शांति के घर में जाते हैं और वहां पर १ महीने तक रहते हैं। आज सूर्य मकर राशि में प्रवेश कर रहे हैं।

आज के दिन भगवान विष्णु ने दैत्यों का विनाश किया था और युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी जिस वजह से मकर संक्रांति के दिन का महत्व और बढ़ जाता है।

महाराज श्री ने आज बहुत ही सुंदर वृतान्त भक्तों को श्रवण कराया। एक बार एक जगल में गाय चारा चर रही थी की तभी पीछे से एक शेर आ गया और उस गाय को पकड़ने के लिए उसके पीछे भागा। गाय भी भागने लगी और उस शेर से बचने के लिए वह एक सरोवर की कूद गई, शेर भी पीछे-पीछे उस सरोवर में कूद गया। लेकिन सरोवर में पानी बहुत कम था और उसमे दलदल थी जिसकी वजह से दोनों उसमे फंस गए। गाय आगे थी और शेर पीछे था लेकिन शेर गाय तक पहुँच नहीं पा रहा था क्योंकि वो दलदल में फंस गया था। बहुत देर बीतने के बाद गाय शेर को देखकर हंसी, इस पर शेर ने कहा की तुम मरने वाली हो और हंस रही हो तुम्हे डर नहीं लग रहा क्या?

गाय ने शेर से पूछा की क्या तुम्हारा कोई मालिक है? शेर ने हँसते हुए कहा मैं जंगल का राजा हूँ मेरा कौन मालिक होगा!

गाय ने कहा मेरा मालिक है इसीलिए मैं बच जाउंगी, लेकिन तुम मर जाओगे। क्योंकि जैसे ही मेरा मालिक घर पहुंचेगा और गाय गिनेगा तो वो मुझे ढूंढ़ते हुए जंगल में आएगा और मुझे बचा कर ले जाएगा। लेकिन तेरा तो कोई मालिक नहीं है तो तुझे कौन बचने आएगा?

हुआ भी ऐसा ही की कुछ देर बाद गाय का मालिक जंगल में आ गया और गाय को बचा लिए।

इसके पश्चात महाराज श्री ने कहा की उस गाय की तरह हमे भी अपने जीवन में एक मालिक रखना चाहिए, जिसके प्रति हमारा पूर्ण समर्पण हो। जब भी आप पर कोई विपदा आएगी तो वो मालिक आपकी रक्षा करने जरूर आएगा। ये संसार सागर ही दलदल है, मेरा समर्पण ही गाय है और मेरा अहंकार ही सिंह/शेर है। मालिक कौन है? गुरु ही मालिक है। क्योंकि गुरु ही है जो इस संसार रुपी दलदल से निकलने में आपकी सहायता करता है।

आप सभी भक्तो से निवेदन है की अपने परिवार व इष्ट मित्रो सहित भारी से भारी संख्या में पधारकर कथा का रसपान करें एवं अपने जीवन को कृतार्थ करें।

16Jan 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में पुन: सीडी पार्क, सॉल्ट लेक, कोलकाता में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन स्नेही परिवार के द्वारा 11-17 जनवरी 2019 तक करवाया जा रहा है।षष्ठम दिवस में पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का सुन्दर वृतान्त भक्तों को श्रवण कराया। इसके साथ ही आज भगवान श्री कृष्ण के विवाह का उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में पुन: सीडी पार्क, सॉल्ट लेक, कोलकाता में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन स्नेही परिवार के द्वारा 11-17 जनवरी 2019 तक करवाया जा रहा है।

षष्ठम दिवस में पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का सुन्दर वृतान्त भक्तों को श्रवण कराया। इसके साथ ही आज भगवान श्री कृष्ण के विवाह का उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया।

"यदि आप धर्मात्मा हो तो किसी भी स्थिति में धर्म को नहीं छोड़ना चाहिए चाहे आपके प्राण क्यों न चले जाएँ।"

"पति धर्म है और पुत्र कर्म है। इसीलिए पतिव्रता स्त्री को पति का साथ पहले निभाना चाहिए।"

महाराज श्री ने कहा दिन में कम से कम एक बार का भोजन परिवार के साथ बैठकर करना चाहिए, इससे परिवार में एकता और प्यार बढ़ता है। लेकिन आज के समय में ऐसा बहुत कम हो रहा है। परिवार के सभी सदस्य अलग-अलग कमरे में बैठकर खाना खाते हैं। ऐसा तो राक्षस भी नहीं करते थे जैसा हम आजकल कर रहे हैं।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी।

इसके बाद महाराज श्री ने कहा की यज्ञ से देवताओं को बल मिलता है। इसीलिए यज्ञ करना चाहिए। यज्ञ करने से हम पितृ ऋण और देव ऋण से मुक्ति मिलती है। जहां कहीं भी यज्ञ होता है वहाँ पर आहुति जरूर डालनी चाहिए ,यज्ञ भगवान की परिक्रमा जरूर करनी चाहिए।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।

आप सभी भक्तो से निवेदन है की अपने परिवार व इष्ट मित्रो सहित भारी से भारी संख्या में पधारकर कथा का रसपान करें एवं अपने जीवन को कृतार्थ करें।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

11Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 11 जनवरी से 17 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन शाम 4: 00 बजे से 7 बजे तक स्थान - सॉल्ट लेक सी डी पार्क कोलकाता में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के प्रथम दिवस पर कथा के मुख्य यजमान गोपाल स्नेही जी का पूरा परिवार व हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। पूज्य महाराज श्री द्वारा पुन: कोलकाता में कथा का श्रवण करवाया जा रहा है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 11 जनवरी से 17 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन शाम 4: 00 बजे से 7 बजे तक स्थान - सॉल्ट लेक सी डी पार्क कोलकाता में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के प्रथम दिवस पर कथा के मुख्य यजमान गोपाल स्नेही जी का पूरा परिवार व हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। पूज्य महाराज श्री द्वारा पुन: कोलकाता में कथा का श्रवण करवाया जा रहा है। भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। गुरुदेव की कृपा आपको ठाकुर जी के दर्शन करा सकती है - देवकीनंदन जी मनवांछित इच्छाओं को पूर्ण करती है भागवत -देवकीनंदन जी ईश्वर को जाने बिना ये जीवन सफल नहीं होगा-पंडित देवकीनंदन जी जीवन में खुशिया बांटे अफवाहे नहीं -देवकीनंदन जी कथा की शुरुआत में कोलकाता (बंगाल )के शिष्य परिवार द्वारा गुरु वंदना "हमारे है श्री गुरु देव हमें किस बात की चिंता" गा कर महाराज श्री को नमन किया और उनका स्वागत किया। उसके बाद महाराज श्री ने बताया की जिस भाग्य में भागवत कथा सुनने का सौभाग्य होता है उस भाग्य के वर्णन कौन कर सकता है, महाराज श्री ने बताया की श्री माने होती है लक्ष्मी और भागवत माने होता है जहां सब उपस्थित हो भगवान भक्त और भक्ति सबका समावेश हो।तत्पश्चात महाराज श्री ने बहुत ही सुन्दर भजन श्री राधे गोविन्द भजन कथा पंडाल में भक्तो को श्रवण कराया। कथा के दौरान पश्चिम बंगाल के ऊर्जा मंत्री श्री शोभनदेब चटर्जी जी और तुलसी सिन्हा रॉय जी ने महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त कर श्रीमद भागवत कथा के प्रथम दिवस का रसपान किया। सर्वप्रथम महाराज श्री ने भागवत के प्रथम श्लोक का उच्चारण किया उसके बाद महाराज श्री ने बताया की हमारे अंदर ईश्वर को जानने की इच्छा होनी चाहिए क्यूंकि बिना ईश्वर को जाने हमें उनसे प्रेम नहीं होगा और ईश्वर को जाने बिना ये जीवन सफल नहीं होगा। इसलिए हमे अपने ईश्वर को जानने की कोशिश करनी चाहिए लेकिन गुरु कृपा के बिना ये सब संभव नहीं है।पंडित जी ने चिंता मणि और कल्पवृक्ष के बारे में बताते हुए कहा की अगर संसार में किसी को चिंतामणि मिल जाए तो वो जिस चीज के बारे में सोचेगा वो उसे प्राप्त होगा और कल्पवृक्ष का चमत्कार ये है की जो जीव उसके निचे बैठ कर कल्पना करेगा तो उसे स्वर्ग तक का भी सुख भोगने को मिल जायगा लेकिन चिंतामणि और कल्पवृक्ष सामर्थ नहीं है की वो आपको भगवान् के दर्शन करा सकें। लेकिन अगर गुरुदेव भगवान् की कृपा अगर हम पर हो जाए तो हैं साक्षात ठाकुर जी के दर्शन हो सकते है। देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

10Jan 2019

आस्था के महापर्व पवित्र त्रिवेणी संगम प्रयागराज में लगने जा रहें कुम्भ में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 18 से 24 जनवरी 2019 तक श्रीमद् भागवत कथा,3 से 5 फरवरी 2019 तक श्रीकृष्ण कथा,10 से 18 फरवरी 2019 तक श्री राम कथा का विशाल आयोजन विश्व शान्ति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शान्ति सेवा समिति प्रयाग के तत्वाधान में किया जा रहा है।

आस्था के महापर्व पवित्र त्रिवेणी संगम प्रयागराज में लगने जा रहें कुम्भ में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 18 से 24 जनवरी 2019 तक श्रीमद् भागवत कथा,3 से 5 फरवरी 2019 तक श्रीकृष्ण कथा,10 से 18 फरवरी 2019 तक श्री राम कथा का विशाल आयोजन विश्व शान्ति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शान्ति सेवा समिति प्रयाग के तत्वाधान में किया जा रहा है। आयोजन की तैयारियां पिछले कई दिनों से चल रही थी जिसके तहत आज विश्व शान्ति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी ने रिब्बन काट कर शिविर का उद्धघाटन किया। उसके बाद सर्वप्रथम पुरे विधि विधान से दीप प्रज्वल्लित कर भगवान् श्री गणेश जी की पूजा अर्चना की गई। उद्धघाटन के दौरान कथा के यजमान और प्रयाग व कानपूर समिति के भारी संख्या में भक्त मौजूद रहें। आप सभी भक्तो से निवेदन है की ज्यादा से ज्यादा संख्या में पहुंचकर इस पावन पर्व पर इस अद्भुत संगम का लाभ उठायें जहां श्रीमद्भागवत कथा, राम कथा, श्री कृष्ण कथा एवं कुंभ का एक साथ समावेश होने जा रहा है, ऐसा अवसर जीवन में बार बार नहीं मिलता।।

11Jan 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से कलकत्ता में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन 11 जनवरी से 17 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 4 : 00 बजे से 7 :00 बजे तक किया जा रहा है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से कलकत्ता में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन 11 जनवरी से 17 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 4 : 00 बजे से 7 :00 बजे तक किया जा रहा है।

महाराज श्री के कलकत्ता एयरपोर्ट पहुंचने पर सैंकड़ो की संख्या में भक्तों ने पुष्प वर्षाकर भव्य स्वागत किया। और राधे नाम के जयकारे भी लगाए।

कलकत्ता के सभी भक्तो से निवेदन है की ज्यादा से ज्यादा संख्या में आप कथा स्थल पर पहुंचे और महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का रसपान करें।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

9Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 जनवरी से 09 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 00 बजे से 5 बजे तक स्थान - धोबी घाट, भूतेश्वर मंदिर रोड़, भूतेश्वर फील्ड, सहारनपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 जनवरी से 09 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 00 बजे से 5 बजे तक स्थान - धोबी घाट, भूतेश्वर मंदिर रोड़, भूतेश्वर फील्ड, सहारनपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
ठाकुर जी की कृपा हमें भागवत सुनने का सौभाग्य प्राप्त कराती है -पं. देवकीनंदन
वेद जिसे स्वीकृति दे वो धर्म है जिसे अस्वीकृत दे वो अधर्म है- देवकीनंदन जी
दुसरो को सुख देना सबसे बड़ा धर्म है- ठाकुर जी
हमारा जीवन सत्कर्मो से भरा होना चाहिए -देवकीनंदन जी
धर्म और संस्कारो का सदा आदर करें -पंडित जी
भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
कथा के संपन्न दिवस पर महाराज श्री ने कथा की शुरुआत में कहा कि ठाकुर जी की जब कृपा जब हम पर होती है हमें तभी भागवत कथा सुनने का अवसर मिलता है। उसके बाद बहुत ही सुन्दर भजन "मेरे मन मोहन दिलदार" गा कर कथा की शुरुआत की। महाराज जी ने बताया की व्यक्ति इस मृत्यु लोक पर अकेला ही आता है और अकेला ही जाता है, धन वैभव परिवार मान सम्मान न तो लेकर पैदा होता है और न ही लेकर जाता है। हमारे मित्र हमारा परिवार हमारे सम्बन्धी सिर्फ शमशान तक हमारा साथ देते है और हमारा शरीर अग्नि में जलकर स्वाह हो जाता है, हमारा शरीर भी हमारा साथ नहीं देता। जब शरीर का मिलन अग्नि से होता है तो उसके बाद की जो यात्रा होती है वो हमें खुद अकेले करनी होती है। उस समय जीव के साथ उसके पुण्य और उसके पाप जाते है। लेकिन अब प्रश्न ये उठता है की पाप और पुण्य का फैसला कौन करेगा की पाप क्या है और पुण्य क्या है तो इसका अधिकार स्वयं खुद वेद भगवान् जी ने अपने हांथो में रखा है। हमारे द्वारा किये गए पुण्य और पाप का हिसाब वहा ऊपर होता रहता है। पंडित जी ने बताया की वेद जिसे स्वीकृति दे वो धर्म है वेद जिसे अस्वीकृति दे वो अधर्म है। और दुसरो को सुख देना परम धर्म है और किसी को दुःख देना जीवन का सबसे बड़ा अधर्म है। इसलिए जो भी आपने कर्म किये है वो आपको भोगने ही पड़ेंगे। इसलिए ये जो मानव जीवन हमें मिला है इसका ऐसा उपयोग कर ले कि ना हमें जीवन मिले और ना ही हमें मृत्यु मिले जिसके जीवन में सतकर्म नहीं होते वो इंसान जिन्दा नहीं मृत सामान है। साथ ही महाराज श्री ने बताया की हमें सतकर्म करते रहना चाहिए और अपनी हिन्दू परंपराओं को अपमानित नहीं करना चाहिए। रोजाना माथे पर तिलक लगाए हाथ में कलावा बांधे और सिर पर चोटी रखें। क्यूंकि धर्म के बिना गति नहीं दुर्गति ही होने वाली है इसलिए अपने धर्म और संस्कारो का सदा आदर करें।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंत: सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

8Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 जनवरी से 09 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 00 बजे से 5 बजे तक स्थान - धोबी घाट, भूतेश्वर मंदिर रोड़, भूतेश्वर फील्ड, सहारनपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 जनवरी से 09 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 00 बजे से 5 बजे तक स्थान - धोबी घाट, भूतेश्वर मंदिर रोड़, भूतेश्वर फील्ड, सहारनपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। गोविन्द की भक्ति दिखावा नहीं समर्पण है-देवकीनंदन ठाकुर जी कथा की शुरुआत बहुत ही प्यारे भजन से की " हमने ब्रज के ग्वालो से अपना दिल लगाया है" से की उसके बाद महाराज श्री ने कथा पंडाल में आये हुए भक्तों से पूछा की आखिर प्रेम क्या है ?और साथ ही प्रेम की परिभाषा के बारे में बताते हुए कहा की प्रेम वो होता है जो हम अपने भगवान से करें दिन भर उसकी भक्ति में खोए रहें देखे तो उसके दर्शन करें और सुने तो उसकी कथा सुने होंठो पे उनका नाम हो और फिर हमें दुनिया याद ही न रहे ये होता है असली प्रेम। साथ ही महाराज श्री ने बताया की सच तो ये है की ये संसार हमें परेशानी देता है और ठाकुर जी उस परेशानी को दूर करते है, क्यूंकि कोई भी परेशानी हम से ही शुरू होती है और हम पर ही खत्म होती है। लेकिन जीव का स्वभाव है की वो थोड़ी सी परेशानी आने पर ही घबरा जाता है। मगर सच तो ये है की जिसने हमें परेशानी दी है तो उसका समाधान भी वही देगा। महाराज श्री ने एक बहुत ही सुन्दर एक सेठ और एक किसान की कहानी के माध्यम से बताया की इंसान अगर किसी परेशानी में फंस जाए तो उसे उस परेशानी के बारे में नहीं उसके समाधान के बारे में सोचना चाहिए। क्यूंकि इस जीवन में ऐसा कोई नहीं है जिस पर कभी कोई परेशानी न आई हो। साथ ही पंडित जी ने बताया की हमारे और गोपिओ के प्रेम में बहुत अंतर है, गोपियों के लिए गोविन्द की भक्ति दिखावा नहीं समर्पण है। हम सब भी गोपी जैसा भाव तो बनाना चाहते है लेकिन गोपियों जैसा आचरण करने में हमें डर लगता है क्यूंकि गोपियों की विशेषता है की उनके दिल और दिमाग में हर तरफ सिर्फ गोविन्द है ब्रज के संत कहते है की गो माने होता है इन्द्रिया, जो अपनी हर एक इन्द्रिय का हर एक इन्द्रिय से कृष्ण रस का पान करती है वही गोपी है। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा। ।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

6Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 जनवरी से 09 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 00 बजे से 5 बजे तक स्थान - धोबी घाट, भूतेश्वर मंदिर रोड़, भूतेश्वर फील्ड, सहारनपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। कथा के चौथे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। 

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 जनवरी से 09 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 00 बजे से 5 बजे तक स्थान - धोबी घाट, भूतेश्वर मंदिर रोड़, भूतेश्वर फील्ड, सहारनपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। कथा के चौथे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।
भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि आइये सब मिलकर प्यार से किशोरी जी का गीत गाये और समझे की किशोरी जी हम पर कैसे कृपा करती है। “तेरी बिगड़ी बना देगी, चरण रज राधा प्यारी की” कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन श्रवण कराया और प्रार्थना की। भगवान ने कहा मैं तुम्हे दो सॉफ्टवेयर दे रहा हूँ। "बुद्धि और हृदय " और कहा की सुखी रहना चाहते है तो बुद्धि संसार में लगा कर रखना और हृदय मुझमे लगा कर रखना हमेशा सुखी रहोगे। “जिनका दिल दुनिया में लगा है वो कभी सुखी नहीं हुए , जिनका दिल गोविन्द में लगा वो कभी दुखी नहीं हुए ”। 
जब व्यक्ति मरता है तो उसके यूज़ किये हुए कपड़ो का आप क्या करते हो ? महाराज जी ने कहा की आप लोग घर में बीमार व्यक्ति और मरे हुए व्यक्ति की सभी चीज अलग कर देते है तो उनकी सम्पत्ति क्यों नहीं ? यहाँ तुमसे प्यार नहीं करते लोग तुमसे की हुई सम्पत्ति से प्यार करते है। आप लोग यह मत भूलिए कि आपके साथ भी यह होगा एक न एक दिन तो इसलिए अपने से बड़े बुजुर्ग व्यक्तियों को सम्मान करें जिससे की आने वाली पीढ़ी भी आपका सम्मान करें।
हेडलाइन - “सत्य को स्वीकार करने में ही भलाई है।“ देवकीनंदन जी
मानव जीवन जो मिला है उसका सदुपयोग ही हमारे लिए सफलता है। ठाकुर जी
जीवन का कल्याण करने का सबसे उत्तम मार्ग है श्रीमद भागवत कथा श्री देवकीनंदन ठाकुर जी 
मृत्युं से डरना नहीं है मृत्युं तो अकाट्य सत्य है जो होगी ही डरे क्यों उसका सदुपयोग करें। मृत्युं से भयभीत नहीं होना है मृत्युं का उत्सव मानना है। हमारी जो जीवन है वह यात्रा है जन्म से लेकर मृत्युं तक उस यात्रा में अच्छे पल भी आएंगे और बुरे पल भी। कृपा से अपने कर्मो की कृपा इतनी बनाये रखे अपने ऊपर की अच्छे क्रमो को इतना अच्छा बना लीजिये। की बुरे पल थोड़े कम आये। आये तो दूर से ही निकल जाये। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।
महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।
शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।
इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।
दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।
महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

7Jan 2019

कल रात्रि में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने सहारनपुर, उत्तर प्रदेश में सर्दी में फुटपाथ पर रह रहे गरीब व असहाय लोगों को कंबल वितिरत किए ताकि उन्हें सर्दी से थोड़ी राहत मिल सके। महाराज श्री ने कहा ये लोग न्यूनतम इच्छाओं के साथ अपना जीवन यापन कर रहे हैं ।

कल रात्रि में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने सहारनपुर, उत्तर प्रदेश में सर्दी में फुटपाथ पर रह रहे गरीब व असहाय लोगों को कंबल वितिरत किए ताकि उन्हें सर्दी से थोड़ी राहत मिल सके। महाराज श्री ने कहा ये लोग न्यूनतम इच्छाओं के साथ अपना जीवन यापन कर रहे हैं ।

अगर हमें भगवान ने कुछ सामर्थ्य प्रदान किया है तो वह हम पर उसकी अनुपम कृपा है l हमें उस कृपा में एक हिस्सा अपने ऐसे असहाय गरीब साथियों के साथ बांटना चाहिए l समाज के समर्थ लोगों को गरीबों व असहाय लोगों की मदद के लिए आगे आना चाहिए l

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

7Jan 2019

आज सुबह पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज सहारनपुर में गौ शाला गए। यहां उन्होंने गौ सेवा की और साथ ही बताया की गौ सेवा भारतीय संस्कृति का प्रमुख अंग है क्यूंकि गौ माता में 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास है। सभी परिवारजनो को पहली रोटी गौ माता के लिए बनानी चाहिए और जो जीव गौमाता की सेवा और सब प्रकार से उनका अनुगमन करता है, गौ माता उस पर संतुष्ट होकर उसे अत्यंत दुर्लभ वरदान प्रदान करती है।

आज सुबह पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज सहारनपुर में गौ शाला गए। यहां उन्होंने गौ सेवा की और साथ ही बताया की गौ सेवा भारतीय संस्कृति का प्रमुख अंग है क्यूंकि गौ माता में 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास है। सभी परिवारजनो को पहली रोटी गौ माता के लिए बनानी चाहिए और जो जीव गौमाता की सेवा और सब प्रकार से उनका अनुगमन करता है, गौ माता उस पर संतुष्ट होकर उसे अत्यंत दुर्लभ वरदान प्रदान करती है।

महाराज श्री समय-समय पर गौ हत्या के विरुद्ध आवाज़ उठाते रहते हैं। इसी क्रम में उन्होंने प्रदेश व केंद्र सरकार से गौ हत्या पर कानून बनाने की मांग भी की है।

7Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 जनवरी से 09 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 00 बजे से 5 बजे तक स्थान - धोबी घाट, भूतेश्वर मंदिर रोड़, भूतेश्वर फील्ड, सहारनपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 जनवरी से 09 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 00 बजे से 5 बजे तक स्थान - धोबी घाट, भूतेश्वर मंदिर रोड़, भूतेश्वर फील्ड, सहारनपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

हमें ईश्वर से मिलने का प्रयास करते रहना चाहिए - देवकीनंदन जी

हमें इस जीवन को सफल बनाना है - ठाकुर जी

हमे जो प्राप्त हुआ है उसी में खुश रहना सीखे -देवकीनंदन जी

मनुष्य को खुशिओं के लिए जिन्दा नहीं रहना चाहिए -पं.देवकीनंदन जी

कथा की शुरुआत महाराज श्री ने गोविंदा गोपाला मुरली मनोहर नंदलाला कीर्तन के साथ की उसके बाद महाराज श्री ने पंडाल में "भारत माता की जय" के जयकारे लगवाते हुए भारत सरकार को आरक्षण पर निर्णय लेने पर साधु वाद भी दिया।उसके बाद पंडित जी ने बताया की ये संसार और संसार के बंधनो को हमने पकड़ा हुआ है या इन्होने हमें पकड़ा हुआ है ये एक सोचने वाला विषय है। एक कहानी के माध्यम से महाराज श्री ने हमें संसार और सांसारिक व्यवस्थाओ का उदाहरण दिया एक हाथी का बच्चा एक महावत ने अपने यहाँ पाला और वो हाथी का बच्चा बहुत शरारती था तो उस वजह से उसके पैर में रस्सी बाँधी हुयी थी लेकिन वो हाथी का बच्चा उस रस्सी को तोड़ने की बहुत कोशिश करता था लेकिन छोटा था इस वजह से वो रस्सी नहीं तोड़ पाता था लेकिन जैसे जैसे वो बच्चा बड़ा हुआ तो वो और बलशाली होने लगा लेकिन अब बड़ा होने के बाद उस हाथी के बच्चे ने रस्सी तोड़ने का प्रयास ही छोड़ दिया क्यूंकि उसकी मानसिकता बन गयी थी की वो उस रस्सी को नहीं तोड़ पाएगा। और जीवन भर एक विशाल हाथी उस छोटी सी रस्सी से बंधा रहा। और उस बंधन को कभी तोड़ नहीं पाया।उसी हाथी की तरह हम भी सांसारिक बंधनो में बंधे हुए है लेकिन भगवान् ने हमे मनुष्य का जीवन दिया है हमे ये सोचने का अधिकार दिया है की हम जो चाहे वो कर सकते है अच्छा या बुरा हम जो करें वो हमारे ऊपर है।हमे अपने इस जीवन को सफल बनाना है असफल नहीं इसीलिए हमें अपने जीवन को सफल बनाने के लिए एक प्रयास करना ही चाइये भगवन से मिलने का। महाराज श्री ने बताया की भगवान ने जो हमें दिया है क्या हमने उसके बारे में कभी सोचा जो भगवान् ने नहीं दिया है हम उसके बारे में सोचते है लेकिन सत्य तो यह है की जो भगवान् ने हमें दिया है उसी में अपनी ख़ुशी ढूंढिए उसकी को आनंद का रूप दीजिये भगवान् ने जो हमें दिया ही नहीं है अगर हम उसके बारे में सोचेंगे तो परेशान ही रहेंगे। महाराज जी ने बताया की बहुत से लोग जीवन भर खुशिओं की तलाश में रहते है और खुशिओं के चक्कर में पूरा जीवन निकाल देते है लेकिन मनुष्य को खुशिओं के लिए जिन्दा नहीं रहना चाहिए जो हमारे पास है उसी में खुशिया तलाश करो और दुख में भी जो खुशिओं का स्वपन सज़ा लेते है वो अपने जीते जी आस्मां में मकान बना लेते है मेरे गोविंद के चरणों में जगह बना लेते है, बस जरुरत है तो हमारे बुलंद इरादों की।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है। भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए। अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है। श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।
श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

4Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 जनवरी से 09 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 00 बजे से 5 बजे तक स्थान - धोबी घाट, भूतेश्वर मंदिर रोड़, भूतेश्वर फील्ड, सहारनपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। 

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 जनवरी से 09 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 00 बजे से 5 बजे तक स्थान - धोबी घाट, भूतेश्वर मंदिर रोड़, भूतेश्वर फील्ड, सहारनपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। 
भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

परम कल्याण करने वाली है भागवत - ठाकुर जी 
सात दिनों का उत्सव है भागवत - देवकीनंदन जी 
आपके पितरो को भी फल देती है भागवत- देवकीनंदन जी

कथा की शुरुआत महाराज श्री ने “हम भी कहे राधे श्याम तुम भी कहो राधे श्याम से” भजन से की उसके बाद महाराज श्री ने बताया की वेद व्यास जी द्वारा लिखित इस भागवत महापुराण में मोक्ष परियन्त की कामनाओ से रहित परम धर्म का निरूपण किया गया है। इसमें शुद्ध हृदय वाले महापुरुषों के जानने योग्य वास्तविक वास्तु परमात्मा का निरूपण हुआ है जो तीनो तापो को जड़ से नाश करने वाला है और वो परम कल्याण करने वाला है। अब और किसी शास्त्र से क्या परियोजन है जिस समय कोई पुण्य आत्मा या पुरुष इसको श्रवण करने की इच्छा करते है ईश्वर उसी समय तत्काल उनके हृदय में आकर विराजमान हो जाते है। पंडित जी ने कहा की भागवत में ऐसा लिखा है की अगर कोई जीव सच्चे दिल से ये संकल्प कर ले की वो श्रीमद्भागवत कथा सुनेगा तो उस संकल्प मात्र से ही भगवान उनके हृदय में वास करने लगते है।महाराज श्री ने बताया की गरुण पुराण में लिखा है कि आप देवताओं से पहले अपने पितरो को मना लो क्यूंकि देवता तो आपको आपके कर्म अनुसार फल देते है लेकिन अगर पितृ एक बार खुश हो जाए तो वह वो दे देते है जो तुम्हारे भाग्य में भी नहीं होता और अगर पितृ अप्रसन्न हो जाए तो वो भी छीन लेते है जो तुम्हारे भाग्य में होता है क्यूंकि जिन पितरो की मुक्ति हो जाती है वो भगवान में समां जाते है।इसलिए अपने बच्चो को ये संस्कार जरूर दे और उन्हें श्राद्ध का महत्व बताये ताकि आपके जाने के बाद वो भी आपकी तरह पित्रो की सेवा करें।क्यूंकि आपके भागवत सुनने से आपके पितरो का भी कल्याण होता है उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है इसलिए अगर आप कथा पंडाल में कथा सुनने आएं तो पुरे नियम के साथ कथा सुने ताकि आपके साथ आपके परिवार और पितरो का भी कल्याण हो।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

5Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 जनवरी से 09 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 00 बजे से 5 बजे तक स्थान - धोबी घाट, भूतेश्वर मंदिर रोड़, भूतेश्वर फील्ड, सहारनपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 जनवरी से 09 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 00 बजे से 5 बजे तक स्थान - धोबी घाट, भूतेश्वर मंदिर रोड़, भूतेश्वर फील्ड, सहारनपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

मनुष्य के श्रेष्ठ कर्म उसे देवता बनाते है - देवकीनंदन जी

मनुष्य जीवन में सबसे दुर्लभ हरी कथा और साधु मिलन है - देवकीनंदन जी

त्याग करने वाला जीव हमेशा सुखी रहता है- देवकीनंदन जी

कथा की शुरुआत महाराज श्री ने एक बहुत ही सुन्दर भजन श्री श्याम तुम्हारे चरणों में एक बार ठिकाना मिल जाय" गा कर की उसके बाद पंडित जी ने बताया की श्रीमद भागवत कथा जो देवताओं के लिए दुर्लभ है वो हमारे लिए सुलभ है लेकिन मानव जीवन अत्यंत कठिन है उसके बाद ही सुलभ है। क्यूंकि देवताओं के लिए भी मनुष्य बनना आसान नहीं है ,लेकिन अगर मनुष्य चाहे देवता बनना तो वो देवता बन सकता है। क्यूंकि मनुष्य के श्रेष्ठ कर्म मनुष्य को देवता बना सकते है। लेकिन मनुष्य के जीवन में दो चीजे बहुत मुश्किल है एक हरी कथा और दूसरा साधु मिलन। अगर हमें हरी कथा मिल भी जाए तो भी हमें उतनी श्रद्धा नहीं होती हमारा दिल और दिमाग कही और ही दौड़ता रहता है। महाराज जी ने कहा की आपको मानव जीवन और हरी कथा दोनों ही प्राप्त है तो आपको इसका सदुपयोग करना है ताकि ये व्यर्थ ना जाए। पंडित जी ने बताया की सुख संग्रह करने मे नहीं त्याग करने में है क्यूंकि संग्रह करने वाला जीव हमेशा दुखी ही रहता है और त्याग करने वाला जीव हमेशा सुखी रहता है। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है। तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे। भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।
श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे – राधे बोलना पड़ेगा ।।

3Jan 2019

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से सहारनपुर में पहली बार श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन 03 जनवरी से 09 जनवरी प्रतिदिन दोपहर 3: 00 बजे से 6: 30 तक किया जा रहा है। महाराज श्री के सहारनपुर पहुंचने पर भक्तो ने महाराज श्री का स्वागत फूलमाला अर्पित कर के किया और राधे नाम के जयकारे भी लगाए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से सहारनपुर में पहली बार श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन 03 जनवरी से 09 जनवरी प्रतिदिन दोपहर 3: 00 बजे से 6: 30 तक किया जा रहा है। महाराज श्री के सहारनपुर पहुंचने पर भक्तो ने महाराज श्री का स्वागत फूलमाला अर्पित कर के किया और राधे नाम के जयकारे भी लगाए। सहारनपुर के सभी भक्तो से निवेदन है की ज्यादा से ज्यादा संख्या में आप कथा स्थल पर पहुंचे और महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का रसपान करें।

3Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 जनवरी से 09 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 00 बजे से 5 बजे तक स्थान - धोबी घाट, भूतेश्वर मंदिर रोड़, भूतेश्वर फील्ड, सहारनपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। पूज्य महाराज श्री द्वारा पहली बार सहारनपुर में कथा का श्रवण करवाया जा रहा है। 

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 03 जनवरी से 09 जनवरी 2019 तक प्रतिदिन दोपहर 2: 00 बजे से 5 बजे तक स्थान - धोबी घाट, भूतेश्वर मंदिर रोड़, भूतेश्वर फील्ड, सहारनपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। 
पूज्य महाराज श्री द्वारा पहली बार सहारनपुर में कथा का श्रवण करवाया जा रहा है। 
भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
भक्त भक्ति और भगवान के समन्वय का नाम है भागवत - पं. देवकीनंदन जी 
अमर और निर्भय बनाती है भागवत-ठाकुर जी 
जो मन भक्ति में लग जाए वो मन सुमन हो जाता है - देवकीनंदन जी
कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने किशोरी जी को प्रणाम किया और बहुत ही सुन्दर भजन एक ओर कृपा की कर दो लाड़ली श्री राधे से की उसके बाद महाराज श्री ने बताया की अगर मनुष्य योनि में जीव चला जाए, उसे मानव जीवन अगर प्राप्त हो जाए तो उसका लक्ष्य क्या है? क्या उसे जीवन संसारिक मोह में फसने के लिए मिला है या कोई और कारण है ? आप आपने आप से प्रश्न जरूर कीजिये की मैं इस दुनिया में क्यों आया हु उस परमात्मा का मुझे मानव जीवन में भेजने का उद्देश्य क्या है अगर वो कारण आपको समझ आ गया तो आपका जीवन मंगल मय हो जायगा, जीवन की यात्रा सुखद हो जायगी। पंडित जी ने बताया की भागवत कथा तो देवताओं को भी सुननी नसीब नहीं हुई थी जिसे आप सुन रहे है। देव राज इंद्र अमृत कलश लेकर कथा सुनने गए थे लेकिन फिर भी नहीं सुन पाए थे लेकिन ये आपके सत्कर्मो का फल है जिससे की आप कथा पंडाल तक कथा सुनने खींचे चले आये। महाराज श्री ने बताया की जो मन भक्ति में लग जाए वो मन, मन नहीं सुमन हो जाता है। और जिसके पास सुन्दर मन है उसे दुनिया में जाकर मत बाँटिये सीधे मेरे गोविन्द के चरणों में जाकर चढ़ा दीजिये क्यूंकि जिनका सुन्दर मन ठाकुर जी के चरणों में अर्पण हो गया है उनका बेडा पार हो गया है। पंडित जी ने बताया की देवताओ को कथा सुनने का सौभाग्य इस लिए प्राप्त नहीं हुआ था क्यूंकि उनमे अभिमान था और जहा अभिमान होता है वहां भक्ति नहीं होती। क्यूंकि ये भक्तो का विषय है अभक्तो का नहीं इसलिए भक्त भक्ति और भगवान के समन्वय का नाम ही भागवत है। बिना भक्ति के भगवान को कोई पा नहीं सकता इसलिए हमें अपने मन को सुमन बनाना चाहिए। 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। 
श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

3Jan 2019

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सहारनपुर भव्य कलश यात्रा निकाली गई। कलश यात्रा में हजारों की संख्या में माताओं - बहनो और भाई -बंधुओं ने भाग लिया। कलश यात्रा ढ़ोल नगाड़े, के साथ निकाली गई। कलश यात्रा जिन मार्गों से होकर गुजरी वहां इस भव्य कलश यात्रा को देखने के लिए लोग थम गए, हर किसी ने इस अद्भुत यात्रा का आनंद लिया।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सहारनपुर भव्य कलश यात्रा निकाली गई। कलश यात्रा में हजारों की संख्या में माताओं - बहनो और भाई -बंधुओं ने भाग लिया। कलश यात्रा ढ़ोल नगाड़े, के साथ निकाली गई। कलश यात्रा जिन मार्गों से होकर गुजरी वहां इस भव्य कलश यात्रा को देखने के लिए लोग थम गए, हर किसी ने इस अद्भुत यात्रा का आनंद लिया।

राधे राधे बोलना पड़ेगा

1Jan 2019

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं अखंड भारत मिशन के अध्यक्ष पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने एकादशी के पावन अवसर पर मथुरा वृंदावन में सर्दी में फुटपाथ पर रह रहे गरीब असहाय व्यक्तियों को कंबल वितिरत किए ताकि उन्हें थोड़ी राहत मिल सके।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं अखंड भारत मिशन के अध्यक्ष पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने एकादशी के पावन अवसर पर मथुरा वृंदावन में सर्दी में फुटपाथ पर रह रहे गरीब असहाय व्यक्तियों को कंबल वितिरत किए ताकि उन्हें थोड़ी राहत मिल सके।

महाराज श्री ने कहा ये लोग न्यूनतम इच्छाओं के साथ अपना जीवन यापन कर रहे हैं l अगर हमें भगवान ने कुछ सामर्थ्य प्रदान किया है तो वह हम पर उसकी अनुपम कृपा है l हमें उस कृपा में एक हिस्सा अपने ऐसे असहाय गरीब साथियों के साथ बांटना चाहिए l ऐसे लोगों की मदद में आगे आना चाहिए l वास्तव में यही भगवान की सच्ची पूजा है l

इस मौके पर प्रियाकांत जू मंदिर के गजेंद्र सिंह, मीडिया प्रभारी जगदीश वर्मा, कमल शर्मा, दिवाकर पचहरा, सुरेंद्र शर्मा आदि मौजूद रहे l

30Dec 2018

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस आयोजन किया गया। । श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

"भक्त को भगवान से ग्रंथों और संतों का सत्कर्म ही मिलाता है।" श्री देवकीनंदन ठाकुर जी संतों का सानिध्य करोगे तभी भगवान से मिलने की इच्छा जागेगी। श्री देवकीनंदन ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस आयोजन किया गया। । श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान ने बड़ी कृपा करके हमे मानव जीवन दिया है । तो आप लोग भगवान की श्रीमद भागवत कथा सुनने के लिए समय अवश्य निकाले। धर्म का प्रचार करना सिर्फ साधु, संत महात्मा कथा कारों की जिम्मेदारी नहीं अपने सत्य सनातन धर्म का प्रचार करना हम सब की जिम्मेदारी है। जिसने कभी कृष्ण को प्रणाम किया है। राम भगवान को प्रणाम किया है। इस धरती माता का अन्न खाया है सनातन की रक्षा करना, प्रचार करना ,उसका रख रखाव करना उसकी जिम्मेदरी है। अगर हम लोग भगवान की कथा कहकर भोजन करते है। तुम लोग भी भगवान आगे भीख मांग कर उनके भेजे हुए ग्राहकों से संपत्ति कमा कर आप लोग रोटी खाते हो। ऐसा कोई नहीं है जो संसार में भगवान के दिए बगैर रोटी खाता हो। संसार में ऐसा कौन है। जिसने अपनी मनोकामना भगवान के द्वारा अर्पण नहीं कर रखी। जो शुद्ध विचार आपको व्यास पीठ से ठाकुर जी दिलाते है। वो पैसे से नहीं मिल सकता। किसी को कुछ बांटना है तो खुशियां बांटो सत्कर्म बांटो, लेकिन बुराइया न बांटो। जितने लोग अच्छा कर्म करते है, धर्म को आगे बढ़ाते है, सत्कर्म करते है। उन पर हमेशा ठाकुर जी का आशीर्वाद रहता है। "जीवन है तेरे हवाले मुरलिया वाले" महाराज जी ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तो को भजन श्रवण कराया। सौभाग्य का विषय है पुणे में की अपने खोया क्या है पाया क्या है। मानव होने के नाते चिंतन का अधिकार है मनन का अधिकार है। मानव होने के नाते यह सोचने का अधिकार है। क्या खोया और क्या पाया नुकसान क्या हुआ है और फायदा क्या हुआ है। की जीवन में क्या पाया उस पर चिन्तन जरूर करीयेगा। जो जीवन की सांसे हम को लिमिटेड मिली है। तो चिंतन करिये गए की जाने वाली साल में आपने क्या पाया और आने वाले साल में क्या पायेगे। सबसे बड़े गुरु वो है जिसने हमें गुरु मंत्र दिया जिसने हमें ठाकुर जी से मिलाया। संसार में ये जो जन्म है ये कुछ सालो तक है। लेकिन जो गुरु के द्वारा सम्बन्ध स्थापित कराया गया वो जन्म जन्मांतर तक है। इसीलिए दीक्षा गुरु एक शिक्षा शिष्य अनेक दीक्षा गुरु ने हमें बताया की परमात्मा को तुम इस मात्रा के द्वारा प्राप्त करो । आप का संग महत्वपूर्ण है जैसे लोगो आप संग करोगे वैसा ही आप पर असर होगा । संतो का सानिध्य महत्वपूर्ण हो। संतो के बिना गोविन्द नहीं मिलेंगे। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंत: सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

29Dec 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। हमारी मानसिकता पर हावी हो गया है कल्चर टेर्रेरिस्म-देवकीनंदन जी परिवार को चलाना सिखाती है भगवान की कथाएं -महाराज श्री जिनकी फीलिंग्स अच्छी होती है उनके घर विराजते है भगवान-ठाकुर जी पैसा कम होगा तो चलेगा अगर भावनाएं कम होंगी तो नहीं चलेगा -पं.देवकीनंदन जी कथा की शुरुआत महाराज श्री ने "राधा नाम लगे बहुत प्यारा" सुंदर भजन से की महाराज श्री ने कल्चर टेर्रेरिस्म की बात करते हुए बताया की कल्चर टेर्रेरिस्म की वजह से जो हमारे टूटते हुए परिवार प्रांरम्भ हो रहें है वो सोचने का विषय है क्यूंकि ये हमारी मानसिकता पर हावी हो गया है। हमारे सनातन धर्म में परिवार की जो जिम्मेदारियां है परिवार में जो भावना है एक दूसरे के लिए जो सहानुभूति है जो फीलिंग है वो अद्भुत है। विचित्र है पुरे ब्रह्माण्ड में आप चले जाओ भारत जैसी संस्कृति आपको पुरे वर्ल्ड में ढूढ़ने से नहीं मिलेगी। जिसका उदहारण है की अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा जी जो की भारत आकर कहते है की आई लव इंडियन कल्चर वो अपनी जेब में हनुमान चालीसा रखते है। लेकिन यहां हमारे ऊपर जो कल्चर टेर्रेरिस्म की व्यथा जो हम पर थोपी जा रही है हम उसमे डूबते जा रहे है और इसी का नतीजा है की ये टूटते हुए रिश्ते बिखरते हुए परिवार भारत में जब देखने को मिलते है तो दिल टूट जाता है। योग और संयोग बड़ी विचित्र स्थिति है,महाराज श्री ने बताया कि जब विश्व धर्म सभा शिकागो में हुई तो स्वामी विवेकानंद जी महाराज वहा पर पहुंचे और एक पत्रकार ने स्वामी जी का मजाक उड़ाने के उदेश्य से विवेकानंद जी से पूछा की क्या मैं आपसे एक सवाल पूछ सकता हु तब स्वामी जी ने कहा जी जरूर आपनें जो ये योग और संयोग के बारे में जो आखरी वक्तव्य बोला है वो हमें समझ नहीं आया वो कुछ उलझा हुआ सा है। तो स्वामी जी ने उस पत्रकार से सवाल पूछा और उसके माध्यम से उस पत्रकार को समझाया की आप अपने परिवार वालो के संपर्क में तो है लेकिन आप उनसे जुड़े हुए नहीं है और यही योग और संयोग है। क्यूंकि आज का हर व्यक्ति अपने परिवार के कांटेक्ट में तो है लेकिन जुड़ा हुआ नहीं है कल्चर टेररिज्म हम पर इतना हावी है की हम इसमें इतना डूब गए है क्यूंकि ये हमारी संस्कृति में नहीं है और ना ही ये हमारी सभ्यता है। हमारी सभ्यता और संस्कार तो वो है की हम अपने परिवार वालों के साथ दिल से जुड़े रहें। आप अपने मन से खुद ये सवाल कीजिये की जो आज का मानव है अगर वो खाना बना रहा है तो बिना भाव के बना रहा है अगर कोई पैसा कमा रहा है तो मज़बूरी में कमा रहा है। हम लोग अपनी जिम्मेदारिया तो निभा रहें है लेकिन बिना फीलिंग्स के इसलिए आप सब से मेरा निवेदन है की बच्चो को पैसे कम देना पर फीलिंग्स ज्यादा देना। अपने बच्चो को सिखाइये और उन्हें कल्चर टेर्रेरिस्म का शिकार मत होने देना। साथ ही पंडित जी ने कहा की भगवान की कथा परिवार को कैसे चलना है वो भी सिखाती है। अगर आपकी फीलिंग्स अच्छी होंगी तो भगवान भी आपके घर में वास करते है। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा। ।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

30Dec 2018

आज पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में युवाओं एवं बच्चों के लिए "युवा शांति संदेश" का आयोजन किया गया, जिसमें महाराज श्री ने सभी युवाओं एवं बच्चों के धर्म और संस्कृति से जुड़े सवालों का एक-एक करके जवाब दिया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में "युवा शांति संदेश"
आज पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में युवाओं एवं बच्चों के लिए "युवा शांति संदेश" का आयोजन किया गया, जिसमें महाराज श्री ने सभी युवाओं एवं बच्चों के धर्म और संस्कृति से जुड़े सवालों का एक-एक करके जवाब दिया।

28Dec 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

दिल और दिमाग को समझने वाला ग्रन्थ है भागवत -देवकीनंदन जी 
हम सांसारिक साधन में ही सुख तलाशते है -ठाकुर जी 
ख़ुशी उसे ही मिलती है जो दुसरो को खुश रखना जानते है- महाराज जी

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने अपने श्री मुख से बहुत ही सुन्दर भजन प्रेम रस जिसने पिया श्री राधे के नाम का को गा कर की। साथ ही महाराज श्री ने बताया की जीवन में सुख सब को चाहिए लेकिन हम ये जानते ही नहीं है की असली सुख या हकीकत में प्रशन्नता होती क्या है। हम तो बस अपने घर मकान गाडी और पैसे को ही असली सुख समझे बैठे है। और गजब की बात ये है की वो जड़ है वो आपके बिना कही जा ही नहीं सकते जब तक आप उनका इस्तेमाल नहीं करेंगे तब तक वो नहीं चलेंगे। क्यूंकि आप काम कर सकते हो लेकिन वो काम नहीं कर सकते है। आप चल सकते हो बोल सकते हो लेकिन वो नहीं। इसलिए आप चैतन्य हो और वो जड़ है और चैतन्य का सुख चैतन्य होता है जड़ नहीं। साथ ही महाराज श्री ने बताया की आज का युग कंप्यूटर का युग है जहा हम अपनी सुविधाओं के लिए तरह तरह के सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करते है,उसी प्रकार से भगवान् ने हमारे शरीर को भी बहुत ही खूबसूरत दो सॉफ्टवेयर से नवाजा है जिनका नाम है दिल और दिमाग। दिल और दिमाग को समझने वाला ग्रन्थ ही भागवत है आपने अगर भागवत का रसपान अच्छे से कर लिया तो आपको समझ आ जाएगा की आपको दिल कहा लगाना चाहिए और दिमाग कहा। ये समझ आने के बाद ही आपका मानव जीवन सुखमय होगा। लेकिन हम ईश्वर के द्वारा दिए हुए गिफ्ट दिल और दिमाग का गलत फायदा उठा रहें है क्यूंकि ईश्वर ने हमें ये कहकर भेजा था की दिल मुझमे और दिमाग दुनिया में लगाना लेकिन हम इस संसार में आकर दिल दुनिया में लगा रहें है और दिमाग भगवान में। इसीलिए हम अपने सुख की तलाश में भटके हुए है। हम अपनी खुशिया ढूंढने के लिए जीवन भर दौड़ते रहते है हमें सिर्फ अपनी खुशियों की ही परवाह होती है और हम अपनी खुशियों को ढूढ़ने में इतने पागल हो जाते है की दुसरो की ख़ुशी भूल जाते है उनके सुख दुःख की परवाह ही नहीं करते लेकिन हमें फिर भी ख़ुशी नहीं मिलती। क्यूंकि ख़ुशी का राज़ ही दुसरो को ख़ुशी देना है और ख़ुशी उन्हें ही मिलती है जो दुसरो को खुश रखना जानते हो।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है। भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए। अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है। श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।
श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

27Dec 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

भगवान से मिलने का मार्ग ही मन की शान्ति है - देवकीनंदन जी 
संसार का परम सुख हरी मिलन में है - पंडित देवकीनंदन जी 
भगवान से दूर करता है अहंकार - देवकीनंदन जी

कथा के चौथे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
महाराज श्री ने कथा की शुरुआत करते हुए उस हरी को याद किया जिसने हमें इतना सुन्दर जीवन दिया है और उन्हें याद कर बहुत ही सुंदर भजन हर घड़ी सिमरन तुम्हारा प्रियकांत जु मेरे इन होंठो पर है " गाया उसके बाद पंडित जी ने कहा की हमें बड़ी मुश्किल से ये नर तन मिला है लेकिन अल्पदृष्टि के कारण अल्पसोच के कारण हम बहुत कम प्राप्त करके उसमे खुश हो जाते है,क्यूंकि किसी छोटे व्यक्ति को उतनी ही चीज दे दी जाए तो वो खुश हो जाता है और बड़े व्यक्ति को वही दी जाय तो वो नाखुश हो जाता है। महाराज श्री ने बताया की क्या हम लोगों को हमारा मानव जीवन बस इतना सरल लग रहा है की खाओ पीओ सोउ और मर जाओ लेकिन क्या यही मानव जीवन का मोल है ? पंडित जी ने एक बहुत समय पहले की बात बताते हुए हमें जीवन का महत्व समझाया और बताया की बहुत समय पहले की बात है जिस समय लाइट नहीं हुआ करती थी तो कोई महानानुभाव दिया जला का एक ग्रन्थ पढ़ रहे थे और उस ग्रन्थ का अध्यन पूरा मन लगा कर पढ़ रहें थे और पढ़ते - पढ़ते जब वो ग्रन्थ उन्होंने पूरा पढ़ लिया तब उन्होंने उस जलते दीपक को शांत किया। और जैसे ही उन्होंने वो दिया शांत किया तो उनके सामने एक अद्भुत नज़ारा प्रस्तुत हुआ क्यूंकि उस दिन शरद पूर्णिमा की रात्रि थी और चन्द्रमा अपने पूर्ण प्रकाश पर था लेकिन कुटिया में दिया जलने की वजह से उन्हें उस प्रकाश का अनुभव ही नहीं हुआ लेकिन जैसे ही उन्होंने उस दिए को शांत किया,तब मानो उस शरद पूर्णिमा के प्रकाश ने वहा आकर दस्तक दी और मानो कहा हो की किस अँधेरे में डूबे हुए थे महानानुभाव हम तो आपके लिए खड़े थे बाहर पूर्ण प्रकाश लेकर और आप इस दिये की रोशनी में ही पढ़ रहें थे। ऐसे ही हमने भी अपने जीवन में अहंकार रूपी तमाम दिये जला रखे है जिसके कारण सद्गुरु देव भगवान् का जो प्रकाश है वो हमारे अंतकरण तक पहुँच ही नहीं पता है, क्यूंकि अहंकार का जो दीपक है वो हमने शांत ही नहीं किया है इसीलिए जब तक वाणी को विश्राम नहीं दोगे जब तक मन को शांत नहीं करोगे तब तक ईश्वर की प्राप्ति नहीं होगी। भगवान मिलने की व्यथा ही यही है की जब आपके मन में शान्ति हो परोपकार का जीवन हो दर्शन सुन्दर हो श्रवण सुन्दर हो कर्म में श्रेश्ठता हो कर्म परोपकार के लिए प्रयासरत हो तभी आपको कन्हैया मिलेंगे। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया। शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे। महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।" जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया। इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।

26Dec 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

 "मनोकामनाओ को पूर्ण करती है भागवत - देवकीनंदन जी महाराज। 
पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।
कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। पूज्य महाराज श्री द्वारा पुणे, महाराष्ट्र, में श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करवाया जा रहा है।भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि हम सब भाग्यशाली है सत्संग वही है जहां मन से जाया जाए जो हमें भागवत कथा का रसपान करने का सौभाग्य मिल रहा है, ये किशोरी जी की कृपा से ही प्राप्त होता है। महाराज जी ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन “मेरे मन की है एक आवाज़ श्रावण कराया”। साथ ही महाराज श्री ने बताया की अगर गुरुदेव कृपा कर दे तो क्या होता है ? गुरुदेव की कृपा हो जाए तो हरी दर्शन हो जाते है। जो कल्पवृक्ष से प्राप्त नहीं होता, जो चिंतामणि से प्राप्त नहीं होता, वो गुरु कृपा से सहज प्राप्त होता है। हम सब काल के मुख से घिरे है इसके अलावा और कुछ नहीं। पंडित जी ने कहा की कलयुग के लोग अगर अपनी मृत्यु में महोत्सव उत्पन्न करना चाहते है तो श्रीमद भागवत कथा सुने जो श्री सुखदेव भगवान के मुख से निकली हुई है। उस भागवत को श्रावण करें ये भागवत जो परीक्षित का कल्याण करने वाली है। वो हम सब का भी कल्याण कर देगी। जीवन में "आलसी मत बनो" आलस्य बहुत बड़ा अभिशाप है। आलसी आदमी लेट उठता है, लेट काम करता है, आलसी आदमी भजन तो करता ही नहीं है। क्यूंकि उससे होता ही नहीं है और यही आलसी आदमी की पहचान है। कौन कौन व्यक्ति दरिद्र्री नहीं होना चाहता। अगर आप दरिद्र्री नहीं होना चाहते हो तो गाठ बांध लो इस बात को जीवन भर कभी भी बिस्तर पर बैठ कर भोजन मत ग्रहण करना। जो बिस्तर पर बैठ कर भोजन करते है वो दरिद्र नारायण को अपने घर में निमंत्रण देते है। अगर वाकई दरिद्री नहीं होना चाहते तो कभी भी बिस्तर पर बैठ कर भोजन नहीं करना चाहिए। संभव हो सके तो पृथ्वी पर ही बैठ कर भोजन करना चाहिए जिससे पाचन शक्ति बढ़ती है। महाराज जी ने कहा की हमारे कन्हैया के जितने भी भक्त हो वो अपार धनवान हो, ईश्वर वान हो और भक्तिवान हो, भक्त अगर धनवान होंगे तो धर्म को आगे बढ़ाएंगे। पापी लोग अगर धनवान होंगे तो वो पाप को आगे बढ़ाएंगे। इसलिए प्रत्येक भक्त धनवान हो जाये वैभववान हो जाये और बलवान भी हो जाये। जीवन को पवित्र और धन्य करने के लिए उसी भागवत ग्रंथ को श्रावण करने के लिए आज इस कथा पंडाल में उपस्थित हुए है। कलिकाल के सभी कष्टों को मिटाने में श्रीमद भागवत कथा ऐसा ग्रंथ है जो है सबके कलेशो कलयुग के दुआंधो को दूर करता है।इससे आप जो मांगे भागवत देती है आपको धन मांगना है धन मांग लो, परिवार मांगना है , परिवार मांग लो, निरोगी काया चाहिए वो मांग लो, यश चाहिए- यश मांग लो, कुछ नहीं चाहिए, जो कुछ नहीं मांगते उनको सबसे ज्यादा भगवान की भक्ति मिलती है। और उन्ही को भगवान मिलते है। जिन्हे सांसारिक कोई वस्तु नहीं चाहिए उसी को ज्यादा तर ईश्वर की प्राप्ति होती है। भागवत श्रवण के बाद जरुरी नहीं है की हम सांसारिक वस्तुए मांगने के लिए भागवत सुने।अगर अधिक बार कथा सुनने का मिले तो सिर्फ एक ही काम करना चाहिए की हे ईश्वर तुम कब मिलोगे।
महाराज श्री ने भागवत कथा की प्रथम श्लोक सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे! तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नम:..... के उच्चारण के साथ की। उन्होंने श्लोक का अर्थ समझाते हुए कहा की जो सत्य नित्य निरंतर जिनके स्वरूप को प्राप्त करके सत्य होता है, जो नित्य निरंतर हैं। जब शृष्टि नहीं थी तब भी वो थे, जब शृष्टि नहीं रहेगी तब भी वो रहेंगे, सत्य कहते ही उसको हैं जो नित्य निरंतर होता है, जो कभी नहीं मिट सकता। एक ब्रह्म सत्य है, एक कृष्ण सत्य है बाकी सब मिथ्या है। इसका एक प्यारा सा भाव समझे तो वो ये है की जिसका चित्त जिसके वश में है, हमारा चित्त हमारे वश में नहीं है, हमारा चित्त हमें भटकाता रहता है लेकिन उनका चित्त उनके वश में रहता है। 
महाराज जी ने कहा की सुखदेव जी हमारे कल्याण का कितना चिंतन करते है की उन्होंने जीव कल्याण के लिए पांच यज्ञ बताए हैं, पहला यज्ञ है जब भी भोजन बनाएं घर की पहली रोटी निकालकर गऊ को खिलाएं, दूसरा यज्ञ है कुछ मीठा या आटा लेकर चीटियों को खाने के लिए देना चाहिए, तीसरा यज्ञ है पक्षियों को कुछ खाने के लिए देना चाहिए, चौथा यज्ञ है जलाशय में जो मछलियां हो उनको भी खाने के लिए कुछ देना चाहिए, पांचवा यज्ञ है भोजन बनाने के साथ कुछ मीठे के साथ अग्नि देव की पहला ग्रास खिलाना चाहिए, खुद के खाने से पहले। अग्नि देव नारायण का ही स्वरूप हैं जैसे ही आप अग्नि को भोग लगाते हैं स्वयं परमात्मा उसे ग्रहण कर लेते हैं। ये पांच यज्ञ जीव को प्रत्येक दिन करना चाहिए और जो गृहस्थि ये पांचों यज्ञ ना कर पाए उसे भगवान की कथा का आश्रय ले लेना चाहिए।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। 
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। .
श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

21Dec 2018

श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

हेडलाइन - धर्म आपकी आत्मा है- देवकीनंदन जी महाराज

दुनिया का सबसे बड़ा पाप किसी को दुःख देना है- देवकीनंदन जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 16 से 22 दिसंबर 2018 तक परम पूज्य बालयोगी काशीगिरी जी धाम, सकलेचा नगर, भराड़ी रोड़, सिल्लोड, औरंगाबाद, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज श्री ने कथा की शुरुआत एक संत और एक सेठ की कहानी से की एक नगर में एक संत प्रवचन करने के लिए जाते है। उस नगर में एक सेठ जी रहते थे जिनके चार पुत्र थे, और बाबाजी के प्रवचन सुनने के बाद उस सेठ ने संत से कहा की आप हमारे घर भी भोजन करने आइये ताकि हमारा घर भी पवित्र हो जाए तो उस सेठ के आग्रह करने पर संत उनके घर अगले दिन प्रवचन के बाद भोजन पर जाते है। तो सेठ बड़ा खुश होता है और अपने चारो बेटो को फ़ोन करके घर आने के लिए बोलता है की कल हमारे घर संत आने वाले है भोजन पर तो तुम सब भी आकर संतो का आशीर्वाद प्राप्त करो लेकिन चारो पुत्रो में से तीन पुत्र कोई न कोई काम बता कर घर नहीं आते है सिर्फ सेठ जी का एक ही बेटा उनके घर आता है। फिर अगले दिन जब संत सेठ के घर खाना खाने आते है तो वो बाबा जी सेठ से पूछते है की आपके कितने पुत्र है तो सेठ जी कहते है मेरा सिर्फ एक ही पुत्र है, और फिर संत पूछते है की आपकी कितनी उम्र है तो सेठ कहता है की सिर्फ २.५ वर्ष तो संत अचंबित होते है और फिर सोचते है की ये मेरे सारे सवालों का गलत उत्तर दे रहा है तो फिर संत एक आखरी सवाल और पूछते है की कितना पैसा कमा लेते हो तो सेठ कहता है की अभी तक सिर्फ दस हजार ही कमाया है। तो संत उस सेठ से पूछते है की अगर आपको हमारे प्रश्नो का सही जवाब देना ही नहीं है तो हमे मना कर दीजिये हम पूछेंगे ही नहीं। तब वो सेठ कहते है की बाबाजी दुनिया वालों की नज़र में मेरे चार पुत्र है, लेकिन जो धर्म के काम में मेरे काम ना आये तो किस बात के पुत्र और जो मैने अपनी उम्र आपको बताई है २.४५ वर्ष वो इसलिए क्यूंकि मुझे भगवान् की भक्ति करते हुए सिर्फ उतना ही टाइम हुआ है और मैंने आपकी व्यवस्था में अभी तक दस हजार ही खर्च किये है इसलिए मैंने जीवन भर में बस यही कमाया है। क्यूंकि जो मैंने धर्म के लिए किया है वही बस मेरा है बाकी का तो जीवन और माया तो मैंने व्यर्थ कर दी है। साथ ही महाराज श्री ने बताया की आप अपने धर्म को जाने हमारा जो ये सनातन धर्म है ये कल का धर्म नहीं है ये धर्म जो तब से है जब से सूर्य की पहली किरण इस धरती पर पड़ी थी तब से सनातन धर्म है और इस धर्म को कभी विभाजित नहीं किया जा सकता क्यूंकि सनातन धर्म पूरी मानवता के लिए है। महाराज जी ने कहा की वेद व्यास जी द्वारा अठारह पुराण लिखने के बाद शास्त्र और वेदों को विभाजित करने के बाद सिर्फ यही पता चला की सबसे बड़ा धर्म क्या है दुसरो को सुख देना और सबसे बड़ा पाप क्या है दुसरो को दुख देना। पंडित जी ने प्रेम के बारे में बताते हुए कहा की हमें प्रेम करना चाहिए और जिससे भी करना चाहिए दिल खोल के बिना किसी स्वार्थ के करना चाइये जैसा मेरे श्री कृष्ण और राधा रानी ने किया था। महाराज श्री ने श्री कृष्ण की रास लीलाओं के बारे में बताते हुए श्री कृष्ण भगवान् के रास का महत्व भी भक्तो को समझाया और बताया की केवल किसी स्त्री और पुरुष के नृत्य को ही रास नहीं कहते है क्यूंकि ये आज कल के लोगों की गलत धारणा है। 
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण हो

22Dec 2018

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 16 से 22 दिसंबर 2018 तक परम पूज्य बालयोगी काशीगिरी जी धाम, सकलेचा नगर, भराड़ी रोड़, सिल्लोड, औरंगाबाद, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया गया। श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

हेडलाइन - संस्कारो की भूमि है भारत- पं. देवकीनंदन ठाकुर जी

मुक्ति का मार्ग है भागवत- देवकीनंदन ठाकुर जी

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 16 से 22 दिसंबर 2018 तक परम पूज्य बालयोगी काशीगिरी जी धाम, सकलेचा नगर, भराड़ी रोड़, सिल्लोड, औरंगाबाद, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया गया। 
श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज श्री के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि महाराज श्री ने कथा की शुरुआत करते हुए अजंता एलोरा की गुफाओ के बारे में बताया की वहा जो आकृतिया बनाई गयी है वो केवल आकृतिया ही नहीं बल्कि चित्रकला के माध्यम से पुरातन घटनाओं के बारे में बताया गया है। साथ ही महाराज श्री ने बताया की अगर आप वहा जाओगे तो आपको जीवन को जीने का दर्शन वहा मिलेगा। वहा एक राजा के चित्र को देख महाराज श्री ने एक कहानी भक्तो को सुनानी शुरू की। एक बार एक राजा के राज्य में एक बहुत ही बलसाली हाथी मर गया उस राजा ने उस राज्य के मंत्रियों से कहा की मुझे अपने राज्य के लिए बहुत स्ट्रांग हाथी चाइये ढूंढ कर लाइए तो सभी मंत्री उस हाथी की तलाश में जंगल की ओर निकल पड़े और फिर उन्हें जंगल में एक हाथी का परिवार दिखा जिस परिवार में तीन हाथी थे माँ बाप और बेटा लेकिन वहा समस्या ये थी की उस परिवार में उस हाथी के माँ बाप अंधे थे लेकिन राजा का हुकुम था तो ले जाना भी जरुरी था तो वो लोग हाथी को जबरजस्ती पकड़ के राजा के सामने ले जाते है और राजा उस हाथी को देख बहुत प्रशन्न होता है क्यूंकि वो हाथी बहुत बलसाली और हस्ठ - पुष्ट होता है। फिर जब उस हाथी के स्वागत में उसे खाने के लिए हाथी की मनपसंद चीजे खिलाई जाती है मगर वो हाथी कुछ नहीं खाता, तब राजा उस मंत्री को कहता है की हाथी है तो बहुत अच्छा लेकिन ये ना कुछ खा रहा रहा है ना कुछ पी रहा है इसकी कोई कोई न कोई समस्या जरूर है इसलिए ये कुछ नहीं खा रहा है। तभी राजा आदेश देता है की इस हाथी को छोड़ दिया जाए और जैसे ही उस हाथी को आज़ाद छोड़ा जाता है वैसे ही वो हाथी उस जंगल में वापस चला जाता है और सरोवर से जाकर अपनी शूड में पानी भरता है और अपने अंधे माँ- बाप को जाकर पानी पिलाता है और कहता है की आप फ़िक्र ना करें में वापस आ गया हु आप लोगो की सेवा करने के लिए साथ ही महाराज श्री ने युवा पीड़ी को समझाते हुए बताया की उस हाथी ने राजा के दरबार में कुछ क्यों नहीं खाया था क्यूंकि उस हाथी को अपने अंधे माँ बाप की फ़िक्र थी क्यूंकि उनका एकलौता सहारा सिर्फ वही था। पंडित जी ने बताया की हम जो इस भारत की भूमि पर रह रहे है वो बड़ी संस्कारो की भूमि है ये बड़ी पावन भूमि है यहां न सिर्फ मानव ही संस्कृति और विरासत को स्वीकार करते है बल्कि यहां रहने वाले पशु पक्षी भी अपने माता- पिता का आदर करने वाले है। इसलिए हमे अपनी संस्कृति और अपने भारत से प्यार करना चाहिए और हमारी संस्कृति में सबसे ऊपर है हमारे माँ-बाप तो हमे सदैव उनका आदर करना चाहिए क्यूंकि यही हमारी सबसे प्यारी संपत्ति है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंत: सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

22Dec 2018

मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की पूर्णिमा पर "पूर्णिमा महोत्सव" का सुंदर एवं भव्य आयोजन ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर के प्रांगण में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया गया

।। राधे राधे ।। मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की पूर्णिमा पर "पूर्णिमा महोत्सव" का सुंदर एवं भव्य आयोजन ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर के प्रांगण में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया गया, जिसमें सैकड़ो भक्त मौजूद रहे। सभी भक्तों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया एवं सर्वप्रथम गणेश वंदना कर कार्यक्रम की शुरुआत की गई तथा ठाकुर श्री प्रियाकांत जू भगवान, सर्वेश्वरीश्री राधा रानी के प्यारे प्यारे भजनों की प्रस्तुति दी गई। अंत में ठाकुर श्री प्रियाकांतजू भगवान की आरती का कार्यक्रम का समापन किया गया ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

24Dec 2018

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में श्री केदारेश्वर मंदिर, पेट क्र. 24 प्राधिकरण, निगडी महाराष्ट्र पुणे 44 से कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में श्री केदारेश्वर मंदिर, पेट क्र. 24 प्राधिकरण, निगडी महाराष्ट्र पुणे 44 से कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई। कलश यात्रा में हजारों की संख्या में माताओं - बहनो और भाई -बंधुओं ने भाग लिया। कलश यात्रा ढ़ोल नगाड़े, के साथ निकाली गई। कलश यात्रा जिन मार्गों से होकर गुजरी वहां इस भव्य कलश यात्रा को देखने के लिए लोग थम गए, हर किसी ने इस अद्भुत यात्रा का आनंद लिया।

राधे राधे बोलना पड़ेगा

24Dec 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। पूज्य महाराज श्री द्वारा पुणे, महाराष्ट्र, में श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करवाया जा रहा है।भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

हेडलाइन :-"मनोकामनाओ को पूर्ण करती है भागवत - देवकीनंदन जी महाराज।
पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।
कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। पूज्य महाराज श्री द्वारा पुणे, महाराष्ट्र, में श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करवाया जा रहा है।भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि हम सब भाग्यशाली है सत्संग वही है जहां मन से जाया जाए जो हमें भागवत कथा का रसपान करने का सौभाग्य मिल रहा है, ये किशोरी जी की कृपा से ही प्राप्त होता है। महाराज जी ने कथा पंडाल में बैठे सभी भक्तों को भजन “मेरे मन की है एक आवाज़ श्रावण कराया”। साथ ही महाराज श्री ने बताया की अगर गुरुदेव कृपा कर दे तो क्या होता है ? गुरुदेव की कृपा हो जाए तो हरी दर्शन हो जाते है। जो कल्पवृक्ष से प्राप्त नहीं होता, जो चिंतामणि से प्राप्त नहीं होता, वो गुरु कृपा से सहज प्राप्त होता है। हम सब काल के मुख से घिरे है इसके अलावा और कुछ नहीं। पंडित जी ने कहा की कलयुग के लोग अगर अपनी मृत्यु में महोत्सव उत्पन्न करना चाहते है तो श्रीमद भागवत कथा सुने जो श्री सुखदेव भगवान के मुख से निकली हुई है। उस भागवत को श्रावण करें ये भागवत जो परीक्षित का कल्याण करने वाली है। वो हम सब का भी कल्याण कर देगी। जीवन में "आलसी मत बनो" आलस्य बहुत बड़ा अभिशाप है। आलसी आदमी लेट उठता है, लेट काम करता है, आलसी आदमी भजन तो करता ही नहीं है। क्यूंकि उससे होता ही नहीं है और यही आलसी आदमी की पहचान है। कौन कौन व्यक्ति दरिद्र्री नहीं होना चाहता। अगर आप दरिद्र्री नहीं होना चाहते हो तो गाठ बांध लो इस बात को जीवन भर कभी भी बिस्तर पर बैठ कर भोजन मत ग्रहण करना। जो बिस्तर पर बैठ कर भोजन करते है वो दरिद्र नारायण को अपने घर में निमंत्रण देते है। अगर वाकई दरिद्री नहीं होना चाहते तो कभी भी बिस्तर पर बैठ कर भोजन नहीं करना चाहिए। संभव हो सके तो पृथ्वी पर ही बैठ कर भोजन करना चाहिए जिससे पाचन शक्ति बढ़ती है। महाराज जी ने कहा की हमारे कन्हैया के जितने भी भक्त हो वो अपार धनवान हो, ईश्वर वान हो और भक्तिवान हो, भक्त अगर धनवान होंगे तो धर्म को आगे बढ़ाएंगे। पापी लोग अगर धनवान होंगे तो वो पाप को आगे बढ़ाएंगे। इसलिए प्रत्येक भक्त धनवान हो जाये वैभववान हो जाये और बलवान भी हो जाये। जीवन को पवित्र और धन्य करने के लिए उसी भागवत ग्रंथ को श्रावण करने के लिए आज इस कथा पंडाल में उपस्थित हुए है। कलिकाल के सभी कष्टों को मिटाने में श्रीमद भागवत कथा ऐसा ग्रंथ है जो है सबके कलेशो कलयुग के दुआंधो को दूर करता है।इससे आप जो मांगे भागवत देती है आपको धन मांगना है धन मांग लो, परिवार मांगना है , परिवार मांग लो, निरोगी काया चाहिए वो मांग लो, यश चाहिए- यश मांग लो, कुछ नहीं चाहिए, जो कुछ नहीं मांगते उनको सबसे ज्यादा भगवान की भक्ति मिलती है। और उन्ही को भगवान मिलते है। जिन्हे सांसारिक कोई वस्तु नहीं चाहिए उसी को ज्यादा तर ईश्वर की प्राप्ति होती है। भागवत श्रवण के बाद जरुरी नहीं है की हम सांसारिक वस्तुए मांगने के लिए भागवत सुने।अगर अधिक बार कथा सुनने का मिले तो सिर्फ एक ही काम करना चाहिए की हे ईश्वर तुम कब मिलोगे।
महाराज श्री ने भागवत कथा की प्रथम श्लोक सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे! तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नम:..... के उच्चारण के साथ की। उन्होंने श्लोक का अर्थ समझाते हुए कहा की जो सत्य नित्य निरंतर जिनके स्वरूप को प्राप्त करके सत्य होता है, जो नित्य निरंतर हैं। जब शृष्टि नहीं थी तब भी वो थे, जब शृष्टि नहीं रहेगी तब भी वो रहेंगे, सत्य कहते ही उसको हैं जो नित्य निरंतर होता है, जो कभी नहीं मिट सकता। एक ब्रह्म सत्य है, एक कृष्ण सत्य है बाकी सब मिथ्या है। इसका एक प्यारा सा भाव समझे तो वो ये है की जिसका चित्त जिसके वश में है, हमारा चित्त हमारे वश में नहीं है, हमारा चित्त हमें भटकाता रहता है लेकिन उनका चित्त उनके वश में रहता है।
महाराज जी ने कहा की सुखदेव जी हमारे कल्याण का कितना चिंतन करते है की उन्होंने जीव कल्याण के लिए पांच यज्ञ बताए हैं, पहला यज्ञ है जब भी भोजन बनाएं घर की पहली रोटी निकालकर गऊ को खिलाएं, दूसरा यज्ञ है कुछ मीठा या आटा लेकर चीटियों को खाने के लिए देना चाहिए, तीसरा यज्ञ है पक्षियों को कुछ खाने के लिए देना चाहिए, चौथा यज्ञ है जलाशय में जो मछलियां हो उनको भी खाने के लिए कुछ देना चाहिए, पांचवा यज्ञ है भोजन बनाने के साथ कुछ मीठे के साथ अग्नि देव की पहला ग्रास खिलाना चाहिए, खुद के खाने से पहले। अग्नि देव नारायण का ही स्वरूप हैं जैसे ही आप अग्नि को भोग लगाते हैं स्वयं परमात्मा उसे ग्रहण कर लेते हैं। ये पांच यज्ञ जीव को प्रत्येक दिन करना चाहिए और जो गृहस्थि ये पांचों यज्ञ ना कर पाए उसे भगवान की कथा का आश्रय ले लेना चाहिए।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। .
श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

25Dec 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। भागवत कथा के दूसरे दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।कथा के द्वितीय दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

मानव जीवन परमात्मा की तरफ से सबसे प्यारा गिफ्ट है- पं. देवकीनंदन जी

बिगड़े हुए चरित्र को भी सुधार देती है भागवत - देवकीनंदन जी महाराज

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में - 24 से 31 दिसम्बर, स्थान - महापौर निवास ग्राउण्ड, भेलपुरी चौक निगडी प्राधिकरण, पुणे, महाराष्ट्र, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। भागवत कथा के दूसरे दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
कथा के द्वितीय दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। पूज्य महाराज श्री द्वारा पुणे, महाराष्ट्र, में श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करवाया जा रहा है। महाराज श्री ने कथा की शुरुआत में एक संत का उदहारण देते हुए कहा की एक बार एक व्यक्ति ने एक संत से पूछा की बाबा हम भी भजन करना चाहते है भक्ति करना चाहते है लेकिन भक्ति हो नहीं पाती है तो संत ने बड़ा ही सुन्दर जवाब दिया की बुरी आदतें सुधार लो बस हो गया भजन। महाराज श्री ने बताया की हमें अपने आप को समय देना चाहिए अकेले मैं बैठ कर सोचना चाहिए की हमारे अंदर क्या क्या बुराइयां है और वो कौन सी बुराई है जिसकी वजह से दुसरो को दुख होता है।साथ ही पंडित जी ने बताया की हमारे संत किसी भी बात को इतना स्पष्ट इस वजह से कह पाते थे क्यूंकि वो किसी और से बात करने में समय व्यर्थ करने की बजाए अपने मन से अपने आप से बात किया करते थे, क्यूंकि हम से अच्छा हमें कोई नहीं जानता।इसलिए हमें अपने आप से बाते करनी चाहिए और सोचना चाहिए की हमने अपने जीवन में क्या खोया और क्या पाया है। क्यूंकि हमने अपने जीवन में कुछ पाया नहीं सिर्फ खोया है और जिस ने जीवन में पा लिया है तो उसके भाग्य के तो क्या ही कहने। महाराज श्री ने बताया की मानव जीवन मिलने के बाद आप थोड़ा सोचिये की जीवन भर जो आपने पैसा कमाया है पूरा जीवन कमाने में लगा दिया है लेकिन उस दिन के बारे में सोचिये जिस दिन आपकी मृत्यु होगी और मरने के बाद आप मिटटी में तब्दील हो जाओगे तो सब मिटटी हो जाना है मिटटी में मिल जाना है तुम्हारे साथ कुछ नहीं जायगा लेकिन वही दूसरी ओर कृष्ण नाम गाने वाले लोग मेरे हरी का नाम संकीर्तन करने वाले लोग वो यहां कुछ छोड़ कर नहीं जायँगे वो सब कुछ साथ लेकर जायँगे क्यूंकि उन्होंने हरी का नाम भज कर वो परम धन पा लिया है जो उनके साथ जायगा। पंडित जी ने बताया की हमारी जो भी आदते बुरी है उन्हें दोष देने के बजाए हमें अपने आप को सुधारना चाहिए क्यूंकि हमे बुरी आदतों ने नहीं बल्कि हमने इन बुरी आदतों को पकड़ा हुआ है। जितना समय हम बुरी आदतों में लगाते है अगर उतना समय हम भगवान की भक्ति में लगाए तो हमारा कल्याण हो जायगा। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। 
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है। श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए। यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

20Dec 2018

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 16 से 22 दिसंबर 2018 तक परम पूज्य बालयोगी काशीगिरी जी धाम, सकलेचा नगर, भराड़ी रोड़, सिल्लोड, औरंगाबाद, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

प्रेम जैसा पवित्र कोई शब्द नहीं है।
हमें ये जीवन सिर्फ भक्ति के लिए मिला है :- श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 16 से 22 दिसंबर 2018 तक परम पूज्य बालयोगी काशीगिरी जी धाम, सकलेचा नगर, भराड़ी रोड़, सिल्लोड, औरंगाबाद, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के पांचवे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए युगलासठकम में किये गए श्री राधारानी और श्री कृष्ण के प्रेम की लीलाओं का वर्णन कर किया। महाराज श्री ने बताया की हमारे प्रेम और सर्वेश्वर ठाकुर जी के प्रेम में बहुत अंतर है हमारा प्रेम उनके जैसा नहीं है। यह जीव किसी न किसी से प्रेम करता है और अगर हम जिससे प्रेम करते है और उससे कुछ चाहे पर हमारी वो इच्छा पूरी न हो तो हम आपस में लड़ते है क्यूंकि तुम जो चाहो वो में करूं तो ये प्रेम है और अगर जो तुम चाहो वो में ना करूं तो ये लड़ाई तो आज का जिव प्रेम नहीं बिज़नेस करता है। और यही अन्तर है आपके और ठाकुर जी के प्रेम में क्यूंकि गोविंद सर्वेश्वर राधा सर्वेश्वर कृष्ण एक दूसरे से अनंत अनंत अनंत हजार वर्षो तक युग युगांतर से एक दूसरे को देखते है और देखते आ रहे है लेकिन जब भी देखते है हमेशा ऐसा लगता है की जैसे पहली बार देख रहें है। लेकिन हम जो प्रेम करते है वो प्रेम नहीं था वो तो बस एक आकर्षण था खिचाव था किसी के प्रति मन प्राप्ति चाहता था और वो जब प्राप्त हुआ तो प्रेम खत्म और दूसरी ओर मेरे राधा रानी और श्री कृष्ण जो एक दूसरे से कुछ चाहते ही नहीं है ब्रज के रसिको ने लिखा है की मिले ही रहै तो मन कबऊ मिले ना ऐसे रोज मिलते है लेकिन जब मिलते है तो ऐसे मिलते है जैसे कभी पहले मिले ही नहीं थे यही तो अद्भुत प्रेम है इसी प्रेम का वर्णन युगलासठकम में किया गया है। ठाकुर जी ने बताया की प्रेम जैसा पवित्र कोई शब्द नहीं है प्रेम से पवित्र कोई विषय नहीं है, प्रेम ही है जो पत्थर को भगवान् बना देता है जब कोई इंसान किसी पत्थर को प्रेम करता है तो पत्थर में भगवान् प्रकट कर देता है। लेकिन आज के समय में हम जैसे स्वार्थी लोगो ने प्रेम की परिभाषा ही बदल दी है और प्रेम शब्द को बदनाम कर दिया है। महाराज श्री ने कहा की हमें भक्ति जन्म से ही करना शुरू कर देनी चाहिए क्यूंकि जो जीव बचपन से भक्ति करना शुरू कर देता है तो उनका रंग ढंग चाल सब अलग होता है और उनकी एक अलग ही दुनिया होती है महाराज श्री ने सक्कु बाई के बारे में बात करते हुए कहा की सक्कु बाई भगवान् की परम भक्त हुई है और उन्होंने बचपन से भगवान् की भक्ति की और जिस परिवार में उनकी शादी हुई वहा उन्हें पूजा पाठ करने से तिलक लगाने से भक्ति करने से रोका जाता था लेकिन एक दिन ऐसा आया की सक्कु बाई कपडे धोने के लिए एक तालाब के किनारे गई और उसने वहा एक संत को भगवान् का नाम जपते हुए जाते देखा तो मानो सक्कु बाई अपने आप को उनके पास जाने से नहीं रोक पाई और संतो से कहने लगी की मुझे भी आपके साथ चलना है भगवान् का नाम जपना है भगवान्
की भक्ति करनी है तो वो सब छोड़ छाड़ उन संतो के साथ भगवान् के कीर्तन में चली गयी और उसे उसके ससुराल जल्दी आने मुमकिन न था तब भगवान् श्री कृष्ण खुद सक्कु बाई बनकर उसके घर गए कपडे धोये और घर का सारा काम किया। इसलिए अगर आप भगवान् की भक्ति पुरे दिल से करते है तो भगवान् आप पर जरा सी भी आंच नहीं आने देते है। इसलिए हमें जो ये जीवन मिला है वो मिला ही सिर्फ भक्ति के लिए है इसलिए जितना नाम जाप कर सको जितनी भक्ति कर सको वो करो वार्ना पशुओं में और हममे फर्क ही क्या रहेगा। और ये अधिकार सिर्फ मानव जीवन को मिला है की वो भक्ति पूरी कर भगवान् तक की अपनी यात्रा पूरी करें। इसलिए भक्ति का बीज हमें बचपन में ही बोना चाहिए ताकि हमारी पुरे जीवन की यात्रा मंगलमय हो जाए। पंडित जी ने बताया की आज कल युवा पीढ़ी के बच्चो में फ़टे हुए कपडे पहनने का बड़ा शोक है वो फ़टे हुए कपडे पहन कर अपने आप को फैशनेबल समझते है लेकिन में आप को बता दू की हमारे द्वारा फ़टे हुए कपडे पहनना अपसगुन होता है। इसलिए हमे कभी भी फ़टे हुए वस्त्र नहीं पहनने चाहिए। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। 
महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है। 
भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना
है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।
अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।
श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।
श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

 

16Dec 2018

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सिल्लौड, औरंगाबाद में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा से पूर्व विशाल कलश यात्रा निकाली गई।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सिल्लौड, औरंगाबाद में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा से पूर्व विशाल कलश यात्रा निकाली गई, जिसमें हजारों की संख्या में माताओं बहनों ने कलश उठाया, कलश यात्रा कथा स्थल तक निकाली गई।

16Dec 2018

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 16 से 22 दिसंबर 2018 तक परम पूज्य बालयोगी काशीगिरी जी धाम, सकलेचा नगर, भराड़ी रोड़, सिल्लोड, औरंगाबाद, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

“भक्ति ज्ञान वैराग्य से ओत प्रोत है श्रीमद भागवत कथा : देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 16 से 22 दिसंबर 2018 तक परम पूज्य बालयोगी काशीगिरी जी धाम, सकलेचा नगर, भराड़ी रोड़, सिल्लोड, औरंगाबाद, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि "श्रीमद् भागवत कथा साधारण ग्रंथ नहीं है। " 
भागवत कथा अगर श्रद्धा से सुनेंगे तो यह भागवत कल्प वृक्ष है आपको वो मिल सकता जिसकी आपने कल्पना भी नहीं की होगी। अगर आप अपने धर्म का सम्मान करेंगे तभी आप सम्माननीय बनेगे।
महाराज श्री ने आगे बताया कि "श्रीमद भागवत कथा आखिर है क्या ?" उन्होंने कहा कि भक्ति ज्ञान वैराग्य से ओत प्रोत है श्रीमद भागवत कथा। बिना भगवान की सेवा के बिना कल्याण नहीं है।

महाराज श्री ने कहा कि कभी हमें यह प्रश्न नहीं किया कि हम कौन है। राम कृष्णा परमहंस जी महाराज को काली माँ साक्षात् दर्शन देती थी। एक भक्त उनके पास में आया और भक्त ने कहा महाराज हमने सुना है काली मैया आपको दर्शन देती है। तब परमहंस जी महाराज जी कहा की बताओ आपको क्या चाहिए। तो भक्त ने कहा की हमें भी उनसे मिलाना देना। भक्त ने कहा की जब आपके यहाँ आये तो उन्हें मेरे यहाँ भेज देना। परमहंस जी महाराज जी ने भक्त से पूछा तुम कहा रहते हो। तो उसने अपने दफ्तर का एड्रेस बताया और आपने घर का एड्रेस भी दिया फिर भी महारा जी ने कहा की तुम कहा रहते हो। तो परमहंस जी महाराज जी कहा की जिस दिन तुम ये बता दो तुम कहां रहते हो उस दिन काली मैय्या को वहां भेज दूँगा।

महाराज श्री ने कहा कि अपने आपको पहचानो यही से भागवत कथा प्रारम्भ हुई है। भक्ति का प्रारम्भिकरण दो ही प्रश्नो से है। या तो में कौन हूँ ये जानने की शुरुआत कर लो या फिर वो भगवान कौन है जिसने इतनी सुन्दर दुनिया बनाई है। तुम दोनों में से किसी को जान गए तो तुम्हारा मन भक्ति और कथा, भजन दोनों में लग जायेगा।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। 
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

17Dec 2018

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 16 से 22 दिसंबर 2018 तक परम पूज्य बालयोगी काशीगिरी जी धाम, सकलेचा नगर, भराड़ी रोड़, सिल्लोड, औरंगाबाद, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। दूसरे दिन की भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया गया । कथा के द्वितीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। 

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 16 से 22 दिसंबर 2018 तक परम पूज्य बालयोगी काशीगिरी जी धाम, सकलेचा नगर, भराड़ी रोड़, सिल्लोड, औरंगाबाद, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। 
दूसरे दिन की भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया गया । कथा के द्वितीय दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। 
भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जीवन में भगवत संबंधी कुछ प्रश्न हमें अपने आप से करने चाहिए। निश्चित तौर पर जब तक ये संसार रहेगा का हमे चैन नहीं लेने देगा । अगर हम ये सोचे की काम से फ्री होकर हम भक्ति करेंगे, तो ये सोचिए की काम पूरे ही कब होते हैं। ये कामनाए ही हैं जो कभी पूरी नहीं होती, जीवन पूरा हो जाता है। 
महाराज श्री ने आगे कहा कि भगवान की भक्ति के बगैर अगर हम सोचें की हमे कुछ मिल गया। इस संसार और संसार के लोगों को आजतक मिला क्या है? काम किसी के पूरे हुए नहीं, भगवान की भक्ति है जो हमे पूर्ण करती है। मानव जीवन में जब भी अवसर मिले सुधरने का काम किजिए, अच्छी बात सिखने को मिले तो सीख लिजिए, बुरे बातों पर ध्यान मत दिजिए। समस्या वही है जो नहीं करनी चाहिए वो कर रहे हैं और जो करना चाहिए उसके लिए ही समय नहीं है। मानव जीवन हमें भगवान की भक्ति के लिए मिला है, भगवान ने हमे हमारे विवेक पर छोड़ा है की जो विवेक कहता है वो करो और हम निकल पड़े हैं अपने विवेक को लेकर और जैसे ही विवेक का उपयोग इस संसार में किया संसार वालों ने कहा हम खुद फसे हुए हैं आओ हमारे साथ ही फस लो और हम उनकी देखा देखी उसमें ही फसते चले जा रहे हैं। इससे निकलने के लिए गुरू द्वारा बताए गए मार्ग पर चलिए, उससे जो आप चाहते हैं वो आपको प्राप्त होगा। मानव जीवन का उद्देश्य हमे प्राप्त होगा, सफलता हमे प्राप्त होगी। 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। 
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे- राधे बोलन पड़ेगा ।।

18Dec 2018

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 16 से 22 दिसंबर 2018 तक परम पूज्य बालयोगी काशीगिरी जी धाम, सकलेचा नगर, भराड़ी रोड़, सिल्लोड, औरंगाबाद, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। 

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 16 से 22 दिसंबर 2018 तक परम पूज्य बालयोगी काशीगिरी जी धाम, सकलेचा नगर, भराड़ी रोड़, सिल्लोड, औरंगाबाद, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। 
भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया। कथा के तीसरे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के तीसरे दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जितने भी युवा जीवन में सफलता चाहते हैं तो सबकुछ आपके विचारों पर निर्भर करता है। कई बार लोग निराश होते हैं, आपकी विचारधारा आपको सुख देती है, आपकी विचार धारा आपको दुख देती है। इस संसार में सब अपने अपने कर्मों का फल भोगते हैं। हमारे युवा बहुत जल्दी अपनी विचारधारा बदल लेते हैं, सुखी हो जाएं तो मेहनत का फल है, दुखी हो जाएं तो भगवान ये दुख मुझे क्यों दिया है। भगवान आपको दुख देते हैं, मेहनत आपको सुख देती है ऐसा नहीं है, ये सारा कमाल नजरिए का है, आप सिर्फ अपनी सोच बदलिए, सारी व्यवस्थाए, सुविधाएं सब बदल जाएंगी। आपके पास जो है उसमें खुश रहिए, जो नहीं है उसके लिए ईश्वर को दोष मत दिजिए, आपने जो नहीं किया वो आपको नहीं मिलेगा, अगर कुछ करके आए होते तो आपको जरूर मिलता, इसलिए जो मिल गया है उसमें ही सुखी रहिए।

महाराज श्री ने कहा कि जीवन से सम्बंधित प्रश्न हम संत महात्माओं से करते हैं लेकिन एक प्रश्न मृत्यु से सम्बंधित नहीं करते जबकि जीवन झूठा मृत्य सत्य है और सत्य के विषय में कोई प्रश्न नहीं किया जाता। जीवन में एक कर्म अपने लिए किया जाता है, एक कर्म सबके लिए किया जाता है। जो परोपकार के लिए कर्म किया जाता है वो सर्वश्रेष्ठ कर्म कहा जाता है।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।

तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

19Dec 2018

आज विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी ने कुंभ प्रयागराज में शांति शिविर का भूमि पूजन विधिवत पूजा अर्चना के साथ किया।

आज विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी ने कुंभ प्रयागराज में शांति शिविर का भूमि पूजन विधिवत पूजा अर्चना के साथ किया। 10 जनवरी को पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के कर कमलों से शिविर का उद्घाटन किया जाएगा। शांति सेवा शिविर लगभग सवा महीने के लिए लगाया जाएगा जिसमें आने वाले भक्त प्रेमियों के रहने की उचित व्यवस्था की जाएगी।

 

19Dec 2018

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 16 से 22 दिसंबर 2018 तक परम पूज्य बालयोगी काशीगिरी जी धाम, सकलेचा नगर, भराड़ी रोड़, सिल्लोड, औरंगाबाद, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 16 से 22 दिसंबर 2018 तक परम पूज्य बालयोगी काशीगिरी जी धाम, सकलेचा नगर, भराड़ी रोड़, सिल्लोड, औरंगाबाद, महाराष्ट्र में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। कथा के चतुर्थ दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
कथा प्रारंभ से पूर्व आज महाराज श्री को गुलाब की फूल माला पहनाकर एवं शॉल उड़ाकर सम्मानित किया गया ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि आप सत्संग मे जाते रहते हैं इस बात का परिचय इस बात से मिलता है की आप सत्संग में जाकर कैसा व्यवाहर करते हैं। हम सिर्फ भंडारा लेने के लिए नहीं जाते हैं भण्डारे में, हम सत्य को ग्रहण करने के लिए जाते हैं सत्संग में। सत्संग में हम अगर देर से पहुंचे तो हमारा बैठना भी उस तरह का होना चाहिए, पहुंचना उस तरह का होना चाहिए की जो लोग कथा हम से पूर्व सुन रहे हैं उसमें कुछ बाधा उत्पन्न ना हो। तभी हम को समझना चाहिए की हम सच्चे श्रोता हैं, हमें कथा सुनना आता है। कहते है भगवान वहीं देते हैं जो हम भगवान को देते हैं । अगर हम मंदिरों में, तीर्थों में कथा पंडालों में अशांति देंगे तो ये अशांति हमारे जीवन में आ जाएगी और अगर हम वहां जाकर शांति का परिचय देंगे तो हमारे जीवन में शांति आ जाएगी। बहुत ज्यादा जरूरी है की कथा में जाकर हम शांति का परिचय दें।

महाराज श्री ने कहा कि जीव के चरित्र निर्माण में और चरित्र हनन में तीन चीजें बहुत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा कि अगर चरित्र समाप्त हो जाए तो सब कुछ समाप्त हो जाता है और चरित्र समाप्त होता कब है उसके भी पीछे कारण हैं। चरित्र हरण होता है आपके दृश्य से, आपके श्रवण से, ये दो चीजें जबतक नहीं सुधरेंगी तब तक हनन का खतरा मडराता रहेगा । जो व्यक्ति देखता है एक दृश्य उसका चरित्र बदल सकता है, दूसरा जो सुनता है वो भी चरित्र बदल सकता है।

महाराज श्री ने आगे कहा कि महात्मा गांधी जी के तीन बंदर हमे तीन सीख देते हैं, बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो, बुरा मत कहो, लेकिन सोचने वाली बात ये है की क्या इनमें से एक भी बात हम सीख पा रहे हैं। बुरा मत बोला सरल है, बुरा मत सुनो सरल है, बुरा मत कहो सरल है ये सब कुछ तुम्हारे ऊपर निर्भर करता है। लेकिन हम लोग अच्छा देखने के लिए उत्तसुक कम होते हैं, बुरा देखने के लिए ज्यादा होते हैं। अच्छा बोलने के लिए प्रयास करना पड़ता है, बुरा बोलने के लिए अपने आप ही निकल पड़ता है। मेरे कहने का अभिप्राय है आपका एक दृश्य आपका चरित्र बदल सकता है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।
महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।
शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।
इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।
दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।
महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

20Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी के द्वारा आज राम किशन स्कूल सिल्लोड में युवा शान्ति सन्देश के माध्यम से महाराज श्री ने छात्र-छात्राओं को भारत की संस्कृत संस्कृति और संस्कारो के बारे में बताया ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी के द्वारा आज राम किशन स्कूल सिल्लोड में युवा शान्ति सन्देश के माध्यम से महाराज श्री ने छात्र-छात्राओं को भारत की संस्कृत संस्कृति और संस्कारो के बारे में बताया साथ ही आज की युवा पीढ़ी द्वारा धर्म के बारे में पूछे गए सवालों के जवाब भी दिए और उन्हें सदा सदमार्ग पर चलने का पाठ पढ़ाया।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

15Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने भायंदर मुंबई में आयोजित विशाल 108 श्रीमद्भागवत के भव्य आयोजन के बाद सिल्लोड़ औरंगाबाद के लिए प्रस्थान किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने भायंदर मुंबई में आयोजित विशाल 108 श्रीमद्भागवत के भव्य आयोजन के बाद सिल्लोड़ औरंगाबाद के लिए प्रस्थान किया, जहां पर पूज्य महाराज श्री द्वारा 16 से 22 दिसंबर तक प्रथम बार श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जाएगा। मुंबई आयोजकों एवं समिति सदस्यों द्वारा महाराज श्री को भावभीनी विदाई दी गई।

15Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने आज सिद्धि विनायक के दर्शन किए, गणपति महाराज से आशीर्वाद प्राप्त कर देश की खुशहाली की कामना की।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने आज सिद्धि विनायक के दर्शन किए, गणपति महाराज से आशीर्वाद प्राप्त कर देश की खुशहाली की कामना की।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

14Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 14 दिसंबर 2018 तक भायंदर मुंबई में आयोजित 108 श्रीमद् भागवत कथा के अष्टम दिवस पर राम मंदिर पर शांति संदेश एवं संकीर्तन का आयोजन किया गया। महाराज श्री ने प्रभु श्री राम के चरित्र का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 14 दिसंबर 2018 तक भायंदर मुंबई में आयोजित 108 श्रीमद् भागवत कथा के अष्टम दिवस पर राम मंदिर पर शांति संदेश एवं संकीर्तन का आयोजन किया गया। महाराज श्री ने प्रभु श्री राम के चरित्र का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

अष्टम दिवस की शुरुआत प्रभु राम की आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। आरती में मुख्य यजमान रजनीश त्रिपाठी, विजया रजनीश त्रिपाठी, सहयजमान माया मुरारी लाल पांडला, हेमलता दिनेश शर्मा, इंदु सुभाष चेजारा, माया रमा प्रसाद सक्सैना ने उतारी, साथ में अयोध्या प्रसाद सेठ, राम जीवन लाल सोनी एवं आयोजक समिति के सभी सदस्य उपस्थित रहे।
कथा पंडाल में आए हुए कई भजन गायकों ने सुंदर भजनों की प्रस्तुती दी, जिसे सुनकर सभी भक्त खूब झूमें नाचे।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने शुरूआत करते हुए कहा कि वो कर्म श्रेष्ठ है, वो वाणी श्रेष्ठ है, वो श्रवण श्रेष्ठ है जो प्रभु के लिए होता है। उन्होंने भगवान श्री राम के मंदिर निर्माण के लिए केंद्र सरकार से, राज्य सरकार से, सुप्रीम कोर्ट से, सभी राजनैतिक पार्टियों से प्रार्थना करते हुए कहा कि हमें राम मंदिर के निर्माण के लिए कितना इंतजार और करना होगा। अगर इस देश को हम भारत कह रहे हैं तो राम के बगैर ये देश भारत नहीं हो सकता यह बात याद रखिए। महाराज श्री ने आगे कहा कि देर से मिला हुआ न्याय अन्याय से कम नहीं होता है। हमे इंतजार करते करते 70-80 साल हो गए। उन्होंने कहा कि सभी राजनैतिक पार्टियों को मिलकर राम मंदिर का समर्थन करना चाहिए और भव्य मंदिर का निर्माण करना चाहिए।

महाराज श्री ने कहा कि सभी लोग देश बचाने की बात करते हैं लेकिन धर्म बचाने की कोई बात नहीं करता, अगर धर्म नहीं बचा को देश नहीं बचेगा, धर्म बचेगा तो ये देश बचेगा । मंदिर का निर्माण होगा तो ये धर्म बचेगा।

महाराज श्री ने सभी से प्रश्न किया की राम जरूरी क्यों हैं, उन्होंने इसका बड़ा सुंदर उत्तर देते हुए कहा कि क्या इस देश में आज माताएं बहने सुरक्षित हैं ? और ये असुरक्षा किसकी वजह से हैं। माताओं की वजह से माताएं सुरक्षित नहीं हैं या पुरूषों की वजह से माताएं सुरक्षित नहीं हैं। दहेज के लिए प्रताडित करना, मारना पीटना ये सब कौन करता है ये पुरूष करता है। लेकिन ये पुरूष इतना पतभ्रष्ट कैसे हो गया ? जिसके वहां मां बहन भी स्त्रियां है और उसही के वहां उनकी नजरों में कोई स्त्री सुरक्षित नहीं है। पुरूष के इतने चरित्र का पतन इस वजह से हुआ है क्योंकि आज हमारे देश के युवाओं को धर्म से दूर किया जा रहा है। जब व्यक्ति धर्म से दूर जाता है, राम से दूर जाता है, राम चरित्र से दूर जाता है तो रावण के चरित्र को अपना लेता है और जब रावण का चरित्र अपना लेगा तो फिर कोई मां, बहन, बेटी, भाई, पिता पुत्र कोई सुरक्षित नहीं होगा, सब असुरक्षित हों जाएंगे, समाज असुरक्षित हो जाएगा। भगवान श्री राम सिखाते हैं एक नारी व्रत रखता हूं, अपनी को छोड़कर पराई माता और बहन समझता हूं, इसलिए राम मंदिर जरूरी है। अगर चाहते हो इस देश में माताएं बहने सुरक्षित हों तो सबसे पहले देश के युवाओं को राम के विषय में समझना चाहिए, राम मंदिर बनाकर राम के उस चरित्र को बताइए की राम की उस मूर्ति का ही दर्शन करने मत जाइए, एक बार वहां जाकर देखिए की राम ने जीवन में किया क्या है। आप सब ये समझिए की जब से इस देश ने राम को भूला दिया तब से ये देश अशांत हो गया।

महाराज श्री ने आगे कहा कि आज के पाठ्यक्रम में से राम गायब है, राम को पढ़ाया नहीं जाता है। झूठी कहानियां पढ़ाई जाती हैं । मैं किसी के भी विरूद्ध नहीं हूं लेकिन कृप्या करके अपने धर्म का सम्मान किजिए। हमारे बच्चें धर्म के विषय में, राम-सीता के विषय में, भरत-लक्ष्मण के विषय में जानेंगे तो माता बहन ही नहीं इस देश में पूरा परिवार सुरक्षित होगा।

उन्होंने आगे कहा कि किसी भी धर्म की महिला से पूछा जाए की उसे कैसा पुत्र चाहिए तो वो राम जैसा ही कहेंगी। भगवान श्री राम ने कभी भी अपनी माता पिता की इच्छा को नजर अंदाज नहीं किया । वो श्री राम जो बाल्यकाल से ही अपने माता पिता के आज्ञाकारी पुत्र हैं, वेदों से उनका जुड़ाव है, बचपन से ही संत महात्माओं का आदर करना जानते हैं। वो अपने गुरू के वहां पड़ने गए और सभी विद्याओं में निपुण हो गए।

महाराज श्री ने कहा कि हमें घर में पूजा पाठ करनी चाहिए, जिस घर में पूजा पाठ होता है उस घर में शांति होती है, जिस घर में पूजा पाठ नहीं होती उस घर में लक्ष्मी रहे या ना रहें लेकिन अशांती जरूर रहती है। एक मंदिर अयोध्या में बने और दूसरा मंदिर हमारे मन में भी बने, मैं देश के युवाओं से कहना चाहूंगा की राम का चरित्र पढ़ना चाहिए और माताओं बहनों को सीता का चरित्र पढ़ना चाहिए ।

पूज्य महाराज श्री ने आज अपने श्रीमुख से निकले हुए भजनों से समुचे वातावरण को कृष्णमय बना दिया। सभी भक्त भजनों पर खुब झूमें और प्रभु के रंग में रंग गए। महाराज श्री ने राधा कृष्ण के सुंदर भजनों की प्रस्तुती दी।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

14Dec 2018

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में भायंदर, मुम्बई में संकीर्तन एवं शांति संदेश का आयोजन किया गया। जिसमें हजारों की संख्या में भक्त महाराज श्री के भजनों पर झूमे।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में भायंदर, मुम्बई में संकीर्तन एवं शांति संदेश का आयोजन किया गया। जिसमें हजारों की संख्या में भक्त महाराज श्री के भजनों पर झूमे।

इसके बाद महाराज श्री के सानिध्य में भगवान श्री राम के मंदिर निर्माण हेतु पद यात्रा भी निकाली गई।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

14Dec 2018

भगवान श्रीराम के मंदिर निर्माण हेतु भायंदर, मुम्बई में निकली गई पदयात्रा

भगवान श्रीराम के मंदिर निर्माण हेतु भायंदर, मुम्बई में निकली गई पदयात्रा

अखण्ड भारत मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 14 दिसम्बर 2018 को सांय 4:30 बजे से भायंदर मुंबई में बाला साहेब ठाकरे मैदान, ऑरेंज हॉस्पिटल के सामने, इंद्रलोक फेज-3, भायंदर मुंबई से राम मंदिर के पक्ष में अपना समर्थन देते हुए श्रीराम मंदिर निर्माण हेतु शातिपूर्वक पद यात्रा निकाली, जिसमें हजारों की संख्या में श्रीराम भक्त इकत्रित हुए।

यह पद यात्रा अखण्ड भारत मिशन के बैनर तले निकाली गई। महाराज श्री ने सभी राजनैतिक पार्टियों से भी आह्वान किया है की जो भी भगवान श्रीराम मंदिर के समर्थन में है वो अपना पक्ष जनता के सामने साफ करें। जिस देश मे 100 करोड़ हिन्दू रहते हो उस देश मे भी यदि भगवान श्रीराम का मंदिर नहीं बनेगा तो कहां बनेगा?

इस पद यात्रा में जहां तक नज़र जा रही थी वहां तक भगवान श्रीराम के बैनर, झंडे इत्यादि लिए भक्त नज़र आ रहे थे। पूरा भायंदर, मुम्बई में भक्तों ने बढ़-चढ़ कर इस पद यात्रा में हिस्सा लिया।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

8Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 14 दिसंबर 2018 तक भायंदर मुंबई में आयोजित 108श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 14 दिसंबर 2018 तक भायंदर मुंबई में आयोजित 108श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। भागवत कथा के दूसरे दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई। भागवत आरती मुख्य यजमान श्री रजनीश त्रिपाठी जी, श्रीमती विजया रजनीश त्रिपाठी जी, सहयजमान श्रीमती माया मुरारी लाल पांडला जी, श्रीमती हेमलता दिनेश शर्मा जी, श्रीमती इंदु सुभाष चेजारा जी, श्रीमती माया रमा प्रसाद सक्सैना जी ने उतारी, साथ में श्री अयोध्या प्रसाद सेठ जी, श्री राम जीवन लाल सोनी जी एवं आयोजक समिति के सभी सदस्य उपस्थित रहे। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान हमे कभी वेद के माध्यम से, वेदी की श्रुतियों के माध्यम से, पुराणों के माध्यम से, गुरू और संतों की वाणी के माध्यम से बार बार समझाते ही हैं, ना समझ तो हम हैं की सुनने और समझने के बाद भी गलतियां करने से बाज नहीं आते। ऐसा नहीं है की ईश्वर हमें समाझाते नहीं है, ऐसा नहीं है की ईश्वर ने हमें समझने का अवसर नहीं दिया, जब भी आप कथा में इस बात से सहमत होते हो की ये सच है, ईश्वर ने आपके गुरू के द्वारा, संतों के द्वारा वो बात आप तक पहुंचाई ही है। आप कथा पंडाल में सहमत होते हैं और बाहर जाते ही वहीं करते हो जिसके लिए पंडाल में सहमती दी थी की ये मेरी भूल है, यही माया का सच। ईश्वर हमें बार बार कहते हैं अपना ध्यान रखो, गलत दिशा में मत जाओ लेकिन ये पापी मन है की मानने का नाम ही नहीं लेता। महाराज श्री ने आगे कहा कि वेद रूपी पेड़ का भागवत पका हुआ फल है । पके हुए फल की तीन प्रमुख पहचान हैं, पहली पहचान वह नर्म हो जाता है, दूसरी पहचान वो मीठा हो जाता है, तीसरा वो अपना रंग बदल लेता है। भक्ति में परिपक्व, भक्ति में निपुण जो जीव है उसकी भी ये तीन पहचान हैं, जब जीव भक्ति में आगे बढ़ने लगता है तो सबसे पहला गुण वो विनम्र हो जाता है, आप आगे बढ़े या ना बढ़े लेकिन जीवन में आपके विनम्रता आनी चाहिए, झुका हुआ व्यक्ति, विनम्र व्यक्ति जीवन में कही भी मात नहीं खा सकता। दूसरा उसकी वाणी मीठी हो जाती है, उसकी वाणी में कटुता नहीं होती, आप अपने ऊपर सोचिए की आपकी वाणी कैसी है ? कौए और गाय का रंग एक जैसा होता है लेकिन कौए से सब नफरत करते हैं और गाय से प्रेम इसका मुख्य कारण वाणी ही है, इसलिए मीठा बोलिए। तीसरा भक्ति में निपुण व्यक्ति के चेहरे पर आत्मविश्वास झलकता है, जो भगवान की भक्ति करते हैं वो अपने आप को अविश्वासी नहीं बनने देते, पूर्ण विश्वास करते हैं की इसमें उन्हें सफलता मिलेगी ठाकुर जी मिलेंगे ही इसमें कोई दो राय नहीं है। उन्होंने आगे कहा की जीवन में गुरूर नहीं गुरू की जरूरत है और गुरू ऐसे नहीं की कंठी ले ली और फिर झांके ही नहीं। ये सत्संग होता ही उसके लिए है यहां सुनो, पढ़ो और आगे बढ़ो। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है। श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए। यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा। ।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

9Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 06 से 14 दिसंबर 2018 तक प्रतिदिन दोपहर 2:30 बजे से बाला साहेब ठाकरे मैदान, ऑरेंज हॉस्पीटल के सामने, इंद्रलोक फेज-3, भायंदर मुंबई में 108 श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया। कथा के तीसरे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 06 से 14 दिसंबर 2018 तक प्रतिदिन दोपहर 2:30 बजे से बाला साहेब ठाकरे मैदान, ऑरेंज हॉस्पीटल के सामने, इंद्रलोक फेज-3, भायंदर मुंबई में 108 श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया। कथा के तीसरे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के तीसरे दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई। भागवत आरती मुख्य यजमान रजनीश त्रिपाठी, विजया रजनीश त्रिपाठी, सहयजमान माया मुरारी लाल पांडला, हेमलता दिनेश शर्मा, इंदु सुभाष चेजारा, माया रमा प्रसाद सक्सैना ने उतारी, साथ में अयोध्या प्रसाद सेठ, राम जीवन लाल सोनी एवं आयोजक समिति के सभी सदस्य उपस्थित रहे। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भागवत की कृपा हम सब पर है, हम सभी को भगवान के द्वारा यहाँ भेजा गया है। लेकिन हम में से ये कोई नहीं जानता की किसका जीवन काल कितना है सबको उनके कर्मो के अनुसार जीवन दिया गया है हम जो ये साँसे ले रहें है उनका वहा ऊपर हिसाब किताब रखने वाले बैठा है। इसलिए इस जीवन का सबसे बड़ा सत्य मृत्यु है और जो असत्य है वो जीवन है।महाराज जी ने बताया की हम सब का प्यार जीवन के साथ मृत्यु के साथ नहीं । हमें जीवन में क्या प्यारा लगता है हम मृत्यु से ज्यादा जीवन को प्यार करते है लेकिन सच तो ये है की जीवन सिर्फ और सिर्फ एक धोखा है यह हमें धोखा देगा, जीवन हमारे साथ धोखा करेगा, आज है कल नहीं होगा लेकिन जो आपका साथ देगी और जो इस पृथ्वी का सबसे बड़ा सत्य है वो है मृत्यु। जिसने जन्म लिया है वो उसका मरना तय है समय जगह और कारण सब पहले से तय है। साथ ही पंडित जी ने बताया की अगर मनुष्य को चिंता करनी हो तो अपने जीवन के अन्धकार की करे की कैसे वो अपने जीवन में प्रकाश ला सकता है क्यूंकि इस जीवन में प्रकाश लाना सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी जिम्मेदारी है। इसलिए मेरे प्यारे भगवान् के बनो और अपने धर्म के बनो। क्यूंकि यही तो मोह माया है जो आपको अन्धकार की ओर ले जाती है जीव रहकर भी भगवान को भूल जाता है। और तकलीफ सिर्फ इसी बात की है की हमारे जीवन में अन्धकार है। महाराज श्री ने आगे कहा आज के इस कलयुग में हम भगवान् से ज्यादा लोगों को मनाने में लगे हुए है। और ईश्वर को विस्म्रत कर आनंद लेने की कोशिश कर रहे है। लेकिन मेरे प्यारे अपने जीवन में भक्ति की जिम्मेदारी मेरे ठाकुर की सेवा आपकी ही है। तुम्ही को ये जिम्मेदारी पूरी करनी पड़ेगी वरना बाद में रोना पड़ेगा। अगर आप अपना कल्याण करना चाहते है तो अपनी जिम्मेदारी खुद पूरी करे, और दान पुण्य जरूर करे। इस युग में अनेक संत है और अनेक विचार धारा संतो को संतो के भाव से देखो , ब्राह्मणो को ब्राह्मणो के भाव से देखो, बड़े आदर्श पुरुषो को उस आदर्श की भावना से देखो लेकिन भगवान की भावना किसी में पैदा मत करो लेकिन भगवान सिर्फ भगवान है कोई जीव भगवान नहीं हो सकता। संतो की वजह से ही भगवान की प्राप्ति हो सकती है। महाराज श्री ने बताया की रोज सुबह अपने माता - पिता के हाथ जोड़कर उन्हें नमन करे। क्यूंकि संस्कार ही है जो हमें विष गुरु बनाते है। वरना आज कल तो हमारे संस्कारो में जहर घुल गया है । याद रखिए आपके विचार, संस्कार आपकी वाणी, आपके कार्य आपको महान बनाते है। जो आदर्श से पैर छूता है उसके लिए आशीर्वाद दिल से निकलता है। आशीर्वाद सबसे बड़ी दौलत है। जितना ज्यादा हो सके उतना आशीर्वाद लीजिये। देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है। तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये... अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे। भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं। श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा। ।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

10Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 14 दिसंबर 2018 तक भायंदर मुंबई में आयोजित 108 श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। कथा के चौथे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 14 दिसंबर 2018 तक भायंदर मुंबई में आयोजित 108 श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। कथा के चौथे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। भागवत आरती मुख्य यजमान रजनीश त्रिपाठी, विजया रजनीश त्रिपाठी, सहयजमान माया मुरारी लाल पांडला, हेमलता दिनेश शर्मा, इंदु सुभाष चेजारा, माया रमा प्रसाद सक्सैना ने उतारी, साथ में अयोध्या प्रसाद सेठ, राम जीवन लाल सोनी एवं आयोजक समिति के सभी सदस्य उपस्थित रहे। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि झूठे जगत का त्याग जितनी जल्दी कर दो उतना अच्छा है क्योंकि हम सब के पीछे उसही दिन से काल पड़ा है जिस दिन से हमारा जन्म हुआ है। महाराज श्री ने आगे कहा कि एक भक्त ने प्रशन किया है कि हम भक्ति करते हैं तो हमें परीक्षा क्यों देनी पड़ती है, कितनी परीक्षाएं हमको देनी हैं उन्होंने इसका सुंदर उत्तर देते हुए कहा कि कुछ बातें हमेशा याद रखनी चाहिए की इस संसार में सिर्फ सफल होने वालों को ही परीक्षा देनी पड़ती है, असफल होने वालों को तो देनी ही नहीं पड़ती वो तो आराम से घर बैठते हैं, परीक्षा उसही को देनी है जिसे सफल होना है। संसार रोकता है भक्ति करने से, संसार इसलिए रोकता है क्योंकि तुम रूक जाते हो। मीरा कहां रूक पाई थी, ध्रुव कहां रूक पाए थे, प्रह्लाद कहां रूक पाए थे, जब उनके सर पर धुन सवार हुई तो निकल गए थे वो भक्ति करने को। आप मुझे एक भक्त का नाम बता दो जिसे भक्ति करने से ना रोका गया हो। महाराज श्री ने कहा कि अगर वाकई भक्ति करना चाहते हो तो सबसे बड़ी बात ये है कि तुम्हे पता होना चाहिए की तुम सही कर रहे हो। तुम्हारी आत्मा इस बात की गवाही दे की तुम सही कर रहे हो, तो फिर रूकना मत। गोपियां अगर गवालों के रोकने से रूक जाती तो वो कृष्ण को कभी प्राप्त नहीं कर पाती। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया। शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे। महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”। महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।" जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया। इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा। ।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

11Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 14 दिसंबर 2018 तक भायंदर मुंबई में आयोजित 108 श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के पांचवे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 14 दिसंबर 2018 तक भायंदर मुंबई में आयोजित 108 श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के पांचवे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। भागवत आरती मुख्य यजमान रजनीश त्रिपाठी, विजया रजनीश त्रिपाठी, सहयजमान माया मुरारी लाल पांडला, हेमलता दिनेश शर्मा, इंदु सुभाष चेजारा, माया रमा प्रसाद सक्सैना ने उतारी, साथ में अयोध्या प्रसाद सेठ, राम जीवन लाल सोनी एवं आयोजक समिति के सभी सदस्य उपस्थित रहे। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि कभी कभी जो बड़े नहीं कर पाते वो छोटे छोटे बच्चे कर पाते हैं। समझ आ जाए ये बात, ये भी ठाकुर जी की कृपा ही समझो की ये बात समझ में आ जाए। कभी कभार समय के अनुसार विपरित परिस्थितियों में भगवान पर से भरोसा हमारा छूट जाता है और जब हमारा भरोसा छूटता है तो कई बार तो हम धर्म करने से दूर चले जाते हैं । विपरित परिस्थितियों में भगवान को भूल जाना हमारी कमजोरी है, अगर आपने सत्संग अच्छे से सुना है तो कठिन परिस्थितियों में वो सत्संग आपके काम आएगा ही आएगा। मुश्किलें तब होती हैं जब हम सत्संग में नहीं जाते और जो सत्य है, जो दुनिया में हमें धैर्यवान बनाता है वो हमें प्राप्त नहीं होता। इस संसार में ऐसा कोई नहीं है जिस पर संकट नहीं है, हर इंसान की अलग प्रकार की परिस्थितियां हैं। कोई गरीबी से अमीर हुआ है पर अमीरी में भी खुश नहीं है, कोई अमीरी से गरीबी में चला गया है वहां भी सुखी नहीं है। ना अमीर सुखी है, ना गरीब सुखी है जिसने भगवान के नाम का आश्रय ले लिया वो हर हाल में सुखी है। महाराज श्री ने कहा कि भगवान जब अहित की कृपा करते हैं तो जीव का मन सतकर्मों में लगता है और जीव का मन अगर सतकर्मों में लगता है तो ये मानव के जीवन की सफलताओं की पहली सीढ़ी है। अच्छे कर्मों में मन लगना और अच्छाई करना ये मानव जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। महाराज श्री ने कहा कि अगर तुम जीवन में परोपकार कर सको तो उससे बड़ा पुण्य नहीं, अगर तुम किसी को दुख दे दो तो उससे बड़ा कोई पाप नहीं। आजकल हर व्यक्ति एक दूसरे को दु:ख देने में लगा है, कोई मन से दुख दे रहा है ,कोई वचन से दुख दे रहा है, कोई कर्म से दुख दे रहा है। वेद व्यास जी ने कहा है अगर पुण्य प्राप्त करना चाहते हो तो परोपकार करो, तुम्हारे द्वारा कोई दुखी ना हो पाए, हो सके तो तुम्हारे द्वारा सुखी हों। जब कोई आत्मा आपसे दुखी होती है तो परमात्मा दुखी होते हैं और जब परमात्मा दुखी होते हैं तो पूरी दुनिया में आपको कोई सुखी नहीं कर सकता। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है। भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए। अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है। श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया। श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा। ।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

12Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने 06 से 14 दिसंबर 2018 तक भायंदर मुंबई में आयोजित 108 श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने 06 से 14 दिसंबर 2018 तक भायंदर मुंबई में आयोजित 108 श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। भागवत आरती मुख्य यजमान रजनीश त्रिपाठी, विजया रजनीश त्रिपाठी, सहयजमान माया मुरारी लाल पांडला, हेमलता दिनेश शर्मा, इंदु सुभाष चेजारा, माया रमा प्रसाद सक्सैना ने उतारी, साथ में अयोध्या प्रसाद सेठ, राम जीवन लाल सोनी एवं आयोजक समिति के सभी सदस्य उपस्थित रहे। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत कहा कि आज के समय में अगर सबसे बड़ी सम्पत्ति कुछ है तो वो है शांति, सच्चा सुख। ना अमीर सुखी है ना गरीब सुखी है, सभी का चित्त अशांत है। उन्होंने कहा कि अगर जीवन में शांति चाहते हो तो जीवन में भार उठाकर मत चलो, हमने जो ये भार उठा रखा है संसार मेरा है, परिवार मेरा है, ये गाड़ी, मकान दुकान मेरा है, ये जो भार उठा रखा है ये हमें सुखी नहीं होने देता ये दुख देता है। साधन दिखावे के लिए अच्छे हैं लेकिन ये सुख नहीं देते। एक संत ने कहा है कि जितने सुख के साधन इकट्ठे करोगे उतने दुखी होगे। हमेशा सुखी रहने के लिए एक उपाय कर लिजिए, ये मान लिजिए की मेरा कुछ नहीं है, सबकुछ उसका है। महाराज श्री ने कहा कि हर व्यक्ति को धर्म को जानना चाहिए, धर्म को जानेंगे तो बहुत कम लोग रह जाएंगे अपराध करने वाले क्योंकि धर्म में सीखाया जाता है बुरा कर्म का बुरा नतीजा होगा, एक जन्म नहीं अनेकों जन्म बिगड़ेंगे। इसलिए आप सब से आग्रह है की कुछ भी भगवान दे अहंकारी मत बनना, अभिमानी मत बनना और अपने बच्चों को धर्मात्मा बनाना क्योंकि बच्चे धर्मात्मा बनेंगे तभी तुम्हारी बुढ़ापे में सेवा करेंगे और अगर बच्चें धर्मात्मा नहीं बने तो बुढ़ापे में तुम्हे रोना पड़ेगा। धर्म ही तो बच्चों को सीखाता है बढ़ों की सेवा करो। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा। ।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

9Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के पावन सानिध्य में भायंदर मुंबई में गुरूदीक्षा एवं आर्शीवचन कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के पावन सानिध्य में भायंदर मुंबई में गुरूदीक्षा एवं आर्शीवचन कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमें हजारों की संख्या में आए हुए भक्तों ने गुरू दीक्षा ली एवं श्रीमुख से निकले हुए आर्शीवचनों का रसपान किया।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

 

7Dec 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 06 से 14 दिसंबर 2018 तक बाला साहेब ठाकरे मैदान, ऑरेंज हॉस्पिटल के सामने, इंद्रलोक फेज-3, भायंदर मुंबई में आयोजित 108श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 06 से 14 दिसंबर 2018 तक बाला साहेब ठाकरे मैदान, ऑरेंज हॉस्पीटल के सामने, इंद्रलोक फेज-3, भायंदर मुंबई में आयोजित 108श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। 

पूज्य महाराज श्री द्वारा दूसरी बार भायंदर, मुंबई में श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करवाया जा रहा है। कथा के एक दिन पहले यानि 06 दिसंबर को कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई जिसमें हजारों की संख्या में माताओं बहनों ने कलश उठाया एवं विभिन्न झांकियों के साथ कलाश यात्रा निकाली गई
भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई। दीप प्रज्वलित महाराज श्री, महापौर श्रीमती डिंपल मेहता, श्री गजेंद्र भण्डारी जी, श्री एच.पी अग्रवाल जी, श्री अर्जुन सेलांग जी द्वारा किया गया।

आयोजक समिति द्वारा महाराज श्री को पगड़ी पहनाकर सम्मानित किया गया, कथा पंडाल में महापौर श्रीमती डिंपल मेहता जी ने भी अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई, मिशन द्वारा उन्हे समृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।


पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि हम सब भाग्यशाली है जो हमें भागवत कथा का रसपान करने का सौभाग्य मिल रहा है, ये किशोरी जी की कृपा से ही प्राप्त होता है वरना कुछ लोग तो यहां रहकर भी कथा में नहीं आ पाते। जब आपके पूर्व जन्मों के सतत सतकर्मों का संग्रह एकत्रित होता है तब आप श्रीमद्भागवत कथा सुनने का विचार बनाते हैं, और जैसे ही आप ये धारणा बनाते हैं की कथा सुनने जाना है उसी वक्त पितृ लोक में हमारे पितृ झूमने लग जाते हैं की हमारा परिवार, हमारे वंश कथा सुनने जा रहे हैं। हम जो भी सतकर्म करते हैं उसका फल पितृ को भी प्राप्त होता है और एक बात याद रखना की देवताओं से ज्यादा महत्वपूर्ण पित्र हैं। देवता तो उतना ही देंगे जितना तुम सतकर्म करोगे लेकिन पित्र वो दे सकते हैं जो तुम सोच नहीं सकते। 
महाराज श्री ने भागवत कथा की प्रथम श्लोक सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे! तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नम:..... के उच्चारण के साथ की। उन्होंने श्लोक का अर्थ समझाते हुए कहा की जो सत्य नित्य निरंतर जिनके स्वरूप को प्राप्त करके सत्य होता है, जो नित्य निरंतर हैं। जब शृष्टि नहीं थी तब भी वो थे, जब शृष्टि नहीं रहेगी तब भी वो रहेंगे, सत्य कहते ही उसको हैं जो नित्य निरंतर होता है, जो कभी नहीं मिट सकता। एक ब्रह्म सत्य है, एक कृष्ण सत्य है बाकी सब मिथ्या है। इसका एक प्यारा सा भाव समझे तो वो ये है की जिसका चित्त जिसके वश में है, हमारा चित्त हमारे वश में नहीं है, हमारा चित्त हमें भटकाता रहता है लेकिन उनका चित्त उनके वश में रहता है। 
महाराज जी ने कहा की सुखदेव जी हमारे कल्याण का कितना चिंतन करते है की उन्होंने जीव कल्याण के लिए पांच यज्ञ बताए हैं, पहला यज्ञ है जब भी भोजन बनाएं घर की पहली रोटी निकालकर गऊ को खिलाएं, दूसरा यज्ञ है कुछ मीठा या आटा लेकर चीटियों को खाने के लिए देना चाहिए, तीसरा यज्ञ है पक्षियों को कुछ खाने के लिए देना चाहिए, चौथा यज्ञ है जलाशय में जो मछलियां हो उनको भी खाने के लिए कुछ देना चाहिए, पांचवा यज्ञ है भोजन बनाने के साथ कुछ मीठे के साथ अग्नि देव की पहला ग्रास खिलाना चाहिए, खुद के खाने से पहले। अग्नि देव नारायण का ही स्वरूप हैं जैसे ही आप अग्नि को भोग लगाते हैं स्वयं परमात्मा उसे ग्रहण कर लेते हैं। ये पांच यज्ञ जीव को प्रत्येक दिन करना चाहिए और जो गृहस्थि ये पांचों यज्ञ ना कर पाए उसे भगवान की कथा का आश्रय ले लेना चाहिए।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। 
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। .
श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

6Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में हनुमान मंदिर नवघर रोड़ से कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई। कलश यात्रा में हजारों की संख्या में माताओं बहनो और भाई बंधुओं ने भाग लिया। कलश यात्रा अनेकों प्रकार की झांकियों, बैंड, ढ़ोल नगाड़े, पारंपरिक वाद्य यंत्र, ध्वजा, घोड़े, हाथियों के साथ निकाली गई जिसमें स्वयं पूज्य महाराज श्री एक विशाल रथ में विराजमान होकर सम्मिलित हुए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में हनुमान मंदिर नवघर रोड़ से कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई। कलश यात्रा में हजारों की संख्या में माताओं बहनो और भाई बंधुओं ने भाग लिया। कलश यात्रा अनेकों प्रकार की झांकियों, बैंड, ढ़ोल नगाड़े, पारंपरिक वाद्य यंत्र, ध्वजा, घोड़े, हाथियों के साथ निकाली गई जिसमें स्वयं पूज्य महाराज श्री एक विशाल रथ में विराजमान होकर सम्मिलित हुए। कलश यात्रा जिन मार्गों से होकर गुजरी वहां इस भव्य कलश यात्रा को देखने के लिए लोग थम गए, हर किसी ने इस अद्भुत यात्रा का आनंद लिया। यात्रा में महाराष्ट्र के पारंपरिक वाद्य यंत्रों ने अलग ही समां बांधा, साथ ही नृत्य नाटिकाओं ने भी सभी का मनमोह लिया। कलश यात्रा में कई तरह की झाकियां निकाली गई जिनमें राम सीता, राधा कृष्ण, शिव, हनुमान की झाकियों ने शोभा यात्रा की शोभा बढ़ाई। इसके अलावा अनेक तरह का सांस्कृतिक कार्यक्रम की झाकियों ने भी सबका मन मोह लिया। इस कलश यात्रा की मुख्य विशेषता यह थी की इसमें कई नदियों से लाया गया जल मिलाया गया है। हनुमान मंदिर नवघर रोड़ से शुरू हुई ये कलश यात्रा शहर के विभिन्न क्षेत्रों से होते हुए राधे राधे के गीत गाते हुए, नृत्य करते, झूमते हुए कथा पंडाल तक पहुंची जहां पर कलशों की स्थापना की गई। विशाल कलश यात्रा को देखते हुए प्रशासन द्वारा सुरक्षा के भी कड़े इंतजाम किए गए थे एवं भक्तो को किसी प्रकार की परेशानी ना हो इसका भी ख्याल रखा गया था।

5Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज 06 से 14 दिसंबर तक भायंदर, मुंबई में आयोजित होने जा रही 108 श्रीमद्भागवत कथा के लिए आज मुंबई पहुचंने पर विश्व शांति सेवा समिति मुंबई के सदस्यों द्वारा फूलमाला पहनाकर एयरपोर्ट पर भव्य स्वागत किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज 06 से 14 दिसंबर तक भायंदर, मुंबई में आयोजित होने जा रही 108 श्रीमद्भागवत कथा के लिए आज मुंबई पहुचंने पर विश्व शांति सेवा समिति मुंबई के सदस्यों द्वारा फूलमाला पहनाकर एयरपोर्ट पर भव्य स्वागत किया गया।

 

5Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज मुंबई पहुंचते ही सर्वप्रथम सिद्धिविनायक मंदिर में गणपति बप्पा के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया एवं प्रभु से कथा के सफल आयोजन की कामना की।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज मुंबई पहुंचते ही सर्वप्रथम सिद्धिविनायक मंदिर में गणपति बप्पा के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया एवं प्रभु से कथा के सफल आयोजन की कामना की।

 
 

5Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सम्मान में श्री रजनीश त्रिपाठी जी द्वारा सफायर हाईट्स (क्लब हाउस प्रथम तल) लोखंडवाला कॉम्पलेक्स, कांदिवली ईस्ट, मुंबई में स्वागत एवं आर्शीवचन कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सम्मान में श्री रजनीश त्रिपाठी जी द्वारा सफायर हाईट्स (क्लब हाउस प्रथम तल) लोखंडवाला कॉम्पलेक्स, कांदिवली ईस्ट, मुंबई में स्वागत एवं आर्शीवचन कार्यक्रम का आयोजन किया गया, पूज्य महाराज श्री का भव्य स्वागत किया गया, सभी ने श्रीमुख से निकले आशीष वचनों का श्रवण किया।

 

6Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज का भायंदर मुंबई में कथा स्थल पर पहुंचने पर समस्त माताओ बहनों ने 111 आरती उतारकर महाराज श्री का भव्य स्वागत किया। महाराज श्री के सानिध्य में सैकडों की तादाद में आए हुए भक्तों, समिति सदस्यों, आयोजकों ने सैकड़ो शंख बजाते हुए कथा का शंखनाद किया । पूज्य महाराज श्री ने सभी का इस भव्य स्वागत के लिए धन्यवाद किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज का भायंदर मुंबई में कथा स्थल पर पहुंचने पर समस्त माताओ बहनों ने 111 आरती उतारकर महाराज श्री का भव्य स्वागत किया। महाराज श्री के सानिध्य में सैकडों की तादाद में आए हुए भक्तों, समिति सदस्यों, आयोजकों ने सैकड़ो शंख बजाते हुए कथा का शंखनाद किया । पूज्य महाराज श्री ने सभी का इस भव्य स्वागत के लिए धन्यवाद किया। कथा पंडाल में महाराज श्री के स्वागत के लिए श्री गजेंद्र भण्डारी जी, श्री अर्जुन सेलांग जी, श्री अयोध्या प्रसाद सेठ जी, श्री मुरारी लाल पांडल जी, श्री छुट्टन लाल शरण शर्मा जी, श्री अमर पांडे जी, श्री सुभाष शरण जी, श्री हीराकांत शरण झा जी, श्री पिंटू शरण गुप्ता जी, श्री राकेश शरण शर्मा जी, श्री बनवारी अजय शरण गौड़ सामौता जी, श्री विनोद शरण सिंह जी, श्री जनार्दन शरण पाठक जी, श्री सुशील यादव जी, श्रीमती माया सक्सेना जी, श्री दिनेश शर्मा जी, श्रीमती नीलम चौधरी जी, श्रीमती रेखा शर्मा जी, श्री शेष नारायण गुप्ता जी, श्रीमती कोकिला सोनी जी, श्री राजेश मेवाडा जी, श्री प्रह्लाद सिसोदिया जी, श्रीमती जागृति ठक्कर जी, श्री आयुष शाह जी, श्री मोनू सोनी जी, समस्त विप्र समाज आदि कार्यकर्तागण एवं समर्थक उपस्थित रहे।

6Dec 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में भायंदर मुंबई में आयोजित होने जा रही 108 श्रीमद्भागवत कथा से पूर्व कलश यात्रा की तैयारियां जोरशोर से चल रही है। माताएं बहने बढ़ चढ़ कर कलश यात्रा में सम्मिलित होने हेतु रजिस्ट्रेशन करवा रही हैं। कुछ ही समय पश्चयात भव्य कलश यात्रा का शुभारंभ किया जाएगा।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में भायंदर मुंबई में आयोजित होने जा रही 108 श्रीमद्भागवत कथा से पूर्व कलश यात्रा की तैयारियां जोरशोर से चल रही है। माताएं बहने बढ़ चढ़ कर कलश यात्रा में सम्मिलित होने हेतु रजिस्ट्रेशन करवा रही हैं। कुछ ही समय पश्चयात भव्य कलश यात्रा का शुभारंभ किया जाएगा।

 

2Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 6-14 दिसम्बर 2018 तक भायंदर, मुम्बई में आयोजित होने वाली 108 श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों को लेकर कथा स्थल पर संस्था के सचिव श्री विजय शर्मा जी ने कार्यकर्ताओं के साथ चर्चा की। कार्यकर्ताओं में गज़ब का उत्साह है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 6-14 दिसम्बर 2018 तक भायंदर, मुम्बई में आयोजित होने वाली 108 श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों को लेकर कथा स्थल पर संस्था के सचिव श्री विजय शर्मा जी ने कार्यकर्ताओं के साथ चर्चा की। कार्यकर्ताओं में गज़ब का उत्साह है। पूज्य महाराज श्री के आशीर्वाद और विश्व शांति सेवा समिति मुम्बई के कार्यकर्ताओं के प्रयास से इस बार की कथा पहले से भी विशाल होने वाली है जिसमें भारी संख्या में मुम्बई के भक्तगण कथा का रसपान करेंगे।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

30Nov 2018

आज विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी नागपुर में 22 फरवरी से 01 मार्च तक आयोजित होने जा रही श्रीमद्भागवत कथा की तैयारियों का जायजा लेने एवं कार्यकर्ताओं के साथ मीटिंग करने के लिए नागपुर पहुंचे, जहां एयरपोर्ट पर कार्यकर्ताओं द्वारा उनका स्वागत किया गया।

आज विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी नागपुर में 22 फरवरी से 01 मार्च तक आयोजित होने जा रही श्रीमद्भागवत कथा की तैयारियों का जायजा लेने एवं कार्यकर्ताओं के साथ मीटिंग करने के लिए नागपुर पहुंचे, जहां एयरपोर्ट पर कार्यकर्ताओं द्वारा उनका स्वागत किया गया।

 

28Nov 2018

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 6 से 14 दिसम्बर 2018 तक बाला साहेब ठाकरे मैदान, में आयोजित होने वाली विशाल 108 श्रीमद भागवत कथा के लिए पंडाल प्रारम्भ का भूमि पूजन श्री गजेंद्र भण्डारी जी के कर कमलों द्वारा किया गया।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 6 से 14 दिसम्बर 2018 तक बाला साहेब ठाकरे मैदान, में आयोजित होने वाली विशाल 108 श्रीमद भागवत कथा के लिए पंडाल प्रारम्भ का भूमि पूजन श्री गजेंद्र भण्डारी जी के कर कमलों द्वारा किया गया। आज से विशाल पंडाल का कार्य प्रारंभ हो चुका है, आप सभी भक्त इस विशाल 108 श्रीमद्भागवत कथा में सादर आमंत्रित है।

 

16Nov 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में आए भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत कहा कि जीवन में कुछ भी चीज ज्यादा एकत्रित नहीं करना चाहिए, जो भी मिले उसमें ही संतोष करना चाहिए और अधिक हो जाए तो सेवा भाव धर्म में अधिक लगाना शुरू कर दिजिए। विचार अधिक हों तो विचारों से अपने धर्म को आगे बढ़ाइए, बल अधिक हो तो धर्म की रक्षा किजिए, धन अधिक हो तो अपना धन धार्मिक कार्यों में लगाइए। जो भी आपके पास है उसकी अधिकता बढ़ जाए तो सिर्फ भगवान के लिए, धर्म के लिए, सेवा के लिए लगाइए।

महाराज श्री ने कहा कि भगवान को अहंकार प्रिय नहीं है और जब जब किसी जीव को अहंकार होता है, किसी वस्तु का अभिमान होता है तो मेरे ठाकुर उससे उस वस्तु को छीन लेते हैं। जब प्रिय वस्तु व्यक्ति से छिनती है तो उसके मन में वैराग्य उत्पन्न होता है और जब वैराग्य उत्पन्न होता है तो भगवान के प्रति उसका आक्रषण बढ़ जाता है।

महाराज श्री ने कहा कि कुछ लोग कहते हैं की भगवान को किसने देखा है । महाराज श्री ने उनसे सवाल पूछा की क्या तुम्हारी आत्मा किसी ने देखी है, अगर नहीं देखी तो क्या नहीं है । बिना आत्मा के आप 1 सेकेंड के लिए भी जी नहीं सकते और आज तक तुमने अपनी आत्मा को नहीं देखा की वो लाल है की पीली है, मोटी है या पतली है। जिस आत्मा पर तुम जिंदा हो उस आत्मा को आजतक नहीं देखा और भगवान को ना देख पाने पर सवाल उठाते हो। ना देख पाना वो आपकी समस्या है, आपके ना देखने की वजह से वो नहीं है ये गलत है। हम यहां बैठे बैठे अमेरिका नहीं देख सकते, हम यहां बैठे बैठे कई लोगों को नहीं देख पाते तो क्या वो नहीं है, उनका अस्तित्व नहीं है। उनका अस्तित्व है लेकिन मेरी नजर वहां तक नहीं पहुंच पा रही है। लोग यह भी कहते हैं की हमने नहीं देखा अमेरिका तो क्या हुआ किसी ने तो देखा है। महाराज श्री ने कहा कि यही तो मैं भी कह रहा हूं हमने नहीं देखा ईश्वर तो क्या हुआ, हमारे कुछ लोगों ने तो देखा है । अब आप पुछेंगे किसने देखा है, उनको बता दूं हनुमान ने देखा है, विभिषण ने देखा है, अयोध्या वासियों ने देखा है, गोपियों ने देखा है, गवालों ने देखा है, मीरा ने देखा है, तुलसी ने देखा है, इन सब ने देखा है, अगर आप नहीं देख सके तो ये आपकी समस्या है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

17Nov 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई।

कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि अगर हम चाहते हैं की मानव जीवन सफल होना तो कुछ बातें अहम होती है। सबसे पहले बात ईश्वर को कभी ना भूलें, अपने लक्ष्य को कभी ना भूलें, दूसरी बात अपने विचारों को कभी गिरने ना दें। आप अपने विचारों को ऊंचा ही रखिए, इसिलिए हमारे बुजुर्ग कहते हैं साधा जीवन ऊच्च विचार। लेकिन आज कल उलटा हो रहा है फैंसी जीवन, नीचा विचार, जीवन फैंसी हो गया है और विचार गिर गए हैं। जीवन में अच्छा बनने के लिए जरूरी है की आप का विचार श्रेष्ठ हो। कबीरदास बाबा ने कहा है निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय यानि अपने निंदकों को अपने आंगन में रखिए क्योंकि वो निंदा करेंगे तो तुम्हें सुधारने का मौका मिलेगा। लेकिन आजकल के निंदक भी वैसे नहीं रहे हैं, निंदक सुधारने वाले नहीं रहे मिटाने वाले हो गए हैं। पहले निंदा लोग करते थे आपको सुधारने के लिए, आजकल लोग मिटाने के लिए निंदा करते हैं। आप अच्छा कर रहे हो, आप आगे बढ़ रहे हो, आप कुछ कर ना सको इसके लिए मिटा देंगे आपको। निंदा नहीं करते बल्कि पूरा षडयंत्र करते हैं की कैसे मिटा दिया जाए इस शख्स को। लेकिन मिटाने वाले ये भूल जाते हैं की मिटाने का काम और बनाने का काम किसी ओर का है, आप सिर्फ प्रयास कर सकते हो सफल नहीं हो सकते। इसिलिए मैं आप सब से कह रहा हूं किसी को मिटा कर के आगे मत बढ़िए, जिस दिन आप किसी को मिटाने का प्रयास करेंगे उस दिन खुद मिट जाएंगे क्योंकि उसी दिन आप चाहे किसी की नजरों में ना गिरें हो लेकिन भगवान की नजरों में तो उस दिन गिर ही जाओगे।

महाराज श्री ने कहा कि जब जब संसार में अधर्म बढ़े, धर्म की कमी हो, तब तब उस युग में भगवान अवतार लेकर आते हैं और अवतार लेकर धर्म की स्थापना करते हैं। आज व्यक्ति धर्म को जानना नहीं चाहता है, हम भगवान की औलाद हैं, हम सब की ड्यूटी है की धर्म का प्रचार प्रसार करें। आज के इस युग में धर्म का प्रचार करने वाले को ठग कहते हैं, ढोंगी कहते हैं और ना जाने क्या क्या कहते हैं, खुद करते नहीं और दूसरों को करने देते नहीं।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंत: सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

18Nov 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 14 दिसंबर तक भायंदर (पूर्व) में आयोजित होने जा रही 108 श्रीमद्भागवत कथा की तैयारियों का जायजा लेने के लिए विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी मुंबई पहुंचे, एयरपोर्ट पहुंचने पर माल, पगड़ी, शॉल, गुलदस्ते देकर उनका भव्य स्वागत किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 14 दिसंबर तक भायंदर (पूर्व) में आयोजित होने जा रही 108 श्रीमद्भागवत कथा की तैयारियों का जायजा लेने के लिए विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी मुंबई पहुंचे, एयरपोर्ट पहुंचने पर माल, पगड़ी, शॉल, गुलदस्ते देकर उनका भव्य स्वागत किया गया। श्री विजय शर्मा जी ने मुंबई एयरपोर्ट पर कदम रखते ही सर्वप्रथम 108 श्रीमद्भागवत कथा को भव्य बनाने के लिए हरी झंडी दिखाई और मुम्बई के समस्त समिति सदस्यों का हौसला बुलंद किया।

18Nov 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के अष्टम दिवस पर भजन संध्या का आयोजन किया गया। महाराज श्री के श्रीराम के चरित्र का वर्णन किया, महाराज के श्रीमुख से निकले सुंदर भजनों पर भक्त खूब झूमें।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के अष्टम दिवस पर भजन संध्या का आयोजन किया गया। महाराज श्री के श्रीराम के चरित्र का वर्णन किया, महाराज के श्रीमुख से निकले सुंदर भजनों पर भक्त खूब झूमें।

भागवत कथा के अष्टम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने शुरूआत करते हुए कहा कि बलवान होना, पद्वान होना, धनवान होना, ज्ञानवान होना कोई बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात तभी है जब आपको धन, पद, बल, ज्ञान, भगवान की तरफ लग जाए, भगवान की तरफ लेकर जाए तो समझना की ये बड़ी बात है। यूं तो संसार में एक से एक व्यक्ति हैं, कितने आए, कितने चले गए, किसी भी वस्तु का सदुपयोग ईश्वरमय होने पर ही है। जब तक जीव ईश्वरमय ना हो तब तक जीव किसी काम का नहीं है। ईश्वर की सेवा में ना लगे, ईश्वर के काम ना आए, ईश्वर को पाने की कोशिश ना करे तो ये जीवन जीवन नहीं है। पशुओं में और हम में फिर अंतर क्या रह गया वो भी पेट भरने के लिए प्रयास करें और हम भी पेट भरने के लिए प्रयास करें।

महाराज श्री ने कहा कि भगवान की कथा सुनने के बाद यह चिंतन लगा रहे की भगवान में ही हमारा मन लगा रहे, भगवान को छोड़कर ये मन कहीं जाए ना । वो जीवन ही ध्न्य है, वो समय ही पवित्र है जिस समय में हमारा मन भगवान में लगता है और कथाओं के माध्यम से सहज में लगता है।

महाराज श्री ने प्रभु श्री राम के चरित्र का वर्णन करते हुए बताया की कैसे वह पूरे विश्व के एक आदर्श सद्चरित्र हैं. भगवान श्री राम की ऐसी क्या विशेष्ताएं हैं जो उन्हें राम बनाती हैं। उन्होंने कहा कि पूरे विश्व के युवाओं को श्रीराम का चरित्र वर्णन सुनना चाहिए। उन्होंने कहा कि भगवान श्री राम जिनको हम अपना आदर्श मानते हैं, समझने की कोशिश करें की वो भगवान श्री राम कौन हैं ? कैसे हैं ? क्यो त्रेता युग से लेकर आज तक प्रभु श्री राम हमारे दिलों में बसे हुए हैं ? आजतक हम राम को भुला नहीं सके हैं। जिस राशी के राम थे उसही राशी का रावण भी था लेकिन दोनों में कितना अंतर था ।

उन्होंने आगे कहा कि किसी भी धर्म की महिला से पूछा जाए की उसे कैसा पुत्र चाहिए तो वो राम जैसा ही कहेंगी। भगवान श्री राम ने कभी भी अपनी माता पिता की इच्छा को नजर अंदाज नहीं किया । वो श्री राम जो बाल्यकाल से ही अपने माता पिता के आज्ञाकारी पुत्र हैं, वेदों से उनका जुड़ाव है, बचपन से ही संत महात्माओं का आदर करना जानते हैं। वो अपने गुरू के वहां पड़ने गए और सभी विद्याओं में निपुण हो गए।

महाराज श्री ने आगे कहा कि पहले गुरूकुलम पद्ति थी आजकल स्कूल और कॉलेज पद्ती है। गुरूकुलम में बच्चों को गुरूकुलम में ही भेजा जाता था अपने माता पिता से दूर। भगवान श्री राम भी अपने माता पिता से दूर गए थे पड़ने के लिए। आज कल उन्हे हॉस्टल कहा जाता है लेकिन हॉस्टल में केवल पढ़ाया जाता है उन्हें पूरा नियम नहीं बताया जाता की जीवन में सुबह उठ कर क्या करें ? भोजन कितने बजे करें, भजन कब करें ये चीजे नहीं बताई जाती। आजकल के बच्चों की दिनचर्या ठीक नहीं है। गुरूकुलम में आप जाइए वहां बच्चों को सुर्य उदय से पूर्व उठा दिया जाता है और स्नान इत्यादि कराकर या तो योग के द्वारा या भजन के द्वारा हरि से मिलाने की कोशिश करते हैं। जब तक आप पढ़ाई में कठिन परिश्रम नहीं करेंगे आप श्रेष्ठ नहीं बन पाएंगे। केवल पास होने के लिए पढ़ना है वो अलग बात है लेकिन जीवन में फेल ना हो जाऊं उसके लिए पढ़ना है तो गुरू के गुरूकुलम में जाना ही पड़ेगा।

पूज्य महाराज श्री ने अपने श्रीमुख से निकले हुए भजनों से समुचे वातावरण को कृष्णमय बना दिया। सभी भक्त भजनों पर खुब झूमें और प्रभु के रंग में रंग गए। महाराज श्री ने राधा कृष्ण के सुंदर भजनों की प्रस्तुती दी।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

19Nov 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में अखण्ड भारत मिशन के बैनर तले दिनाक 18 नवंबर को राम मंदिर के निर्माण हेतु विशाल पद यात्रा निकाली गई। यह यात्रा मोतीझील ग्राउंड कानुपर से आनंदेश्वर धाम परमठ गंगा घाट तक निकाली गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में अखण्ड भारत मिशन के बैनर तले दिनाक 18 नवंबर को राम मंदिर के निर्माण हेतु विशाल पद यात्रा निकाली गई। यह यात्रा मोतीझील ग्राउंड कानुपर से आनंदेश्वर धाम परमठ गंगा घाट तक निकाली गई। यह यात्रा मोतीझील ग्राउंड से प्रारंभ होकर मधुराज नर्सिंग होम, आर्यनगर चौराहा, राजीव पेट्रोल पंप, रानीघाट चौराहा, होकर आनंदेश्वर धाम गंगा घाट पहुंची। वहां पर महाराज श्री ने शंकर भगवान के दर्शन कर भगवान से अयोध्या में जल्द से जल्द राम मंदिर का निर्माण हो इसके लिए प्रार्थना की। यात्रा में हजारों की संख्या में राम भक्त और संत समाज के व्यक्ति शामिल हुए। आनन्देश्वर मंदिर के रमेश पुरी जी महाराज ने महाराज श्री का स्वागत किया एवं गंगा जी की महा आरती की गई।

 

14Nov 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

कथा के चौथे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत कहा कि जीव अपने ही किए हुए कर्मों का फल भोगता है, जो बीज हम बोते हैं वहीं फसल के रूप में हमें प्राप्त होता है। इसका एक उदाहरण यह है की कई बार हम सोचते हैं की हमने किसी का बुरा नहीं किया, इसके बाद में हमें तकलीफ क्यों झेलनी पड़ रही है, हमे इतने दुखी क्यों है, हमने किसी का क्या बिगाड़ा है। एक बात आप ये समझ लिजिए की किसी को डंडा मारने को ही बिगाड़ना नहीं कहते हैं, किसी का खुन कर देना ही किसी का बुरा करना नहीं होता है, किसी के घर में चोरी करने को ही बुरा नहीं कहते हैं। बहुत सारी चीजें हैं जो हम रोज कर रहे हैं।

महाराज श्री ने आगे कहा कि इस संसार का नाम ही है दुखालय जहां आकर दुख मिलेंगे ये निश्चित है। वस्त्रालय में जाओगे वस्त्र मिलेंगे, विद्यालय में जाओगे विद्या मिलेगी और दुखालय में जाओगे तो दुख मिलेंगे । इस संसार में आए हो तो दुख निश्चित तौर पर मिलेंगे लेकिन उस दुख से निकलने का एक तरीका है अपने आप को गोविंद का कहो और गोविंद को अपना। जीव जब संसार में आता है तो ऐसा बंधनों में बंधता है की जिसने भेजा है उस ही को भूलता है।

महाराज श्री ने कहा कि भगवान कहते हैं जो मेरा नाम जपता है उसको तो मैं तार ही देता हूं लेकिन जो मेरा नाम जपे और कोई उसके चरण पकड़ ले उसे पहले तार देता हूं। भगवान के स्वरूप का दर्शन करवाने वाले कौन हैं, भगवान के भक्त ही तो हैं, जिनको हम गुरू, कथाकार, संत, भक्त के रूप में जानते हैं। भगवान भले ही दिखाई ना पड़ें लेकिन जो भगवान को गुणों का गुणगान करते हैं वो तो दिखाई पड़ते हैं।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।
महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।
शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।
इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।
दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।
महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे- राधे बोलना पड़ेगा ।।

15Nov 2018

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सम्मान में सी.एम.एस कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज, कानपुर द्वारा नागरिक अभिनंदन सम्मान समारोह का आयोजन किया गया।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सम्मान में सी.एम.एस कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज, कानपुर द्वारा नागरिक अभिनंदन सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। पूज्य महाराज श्री ने कार्यक्रम में सम्मिलित होकर छात्र छात्राओं का अपने आशीष वचनों से मार्गदर्शन किया एवं छात्र छात्राओं द्वारा पूछे गए सवालों का उत्तर सरल भाषा में दिया।

 

15Nov 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के पांचवे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत कहा कि जब राम कृपा करते हैं तो संत मिलते हैं और जब संत कृपा करते हैं तो राम मिलते हैं, ये एक दूसरे के पूरक हैं। समाज की व्यवस्था अच्छी रहे इसही का चिंतन संत और कथाकार करते हैं। यहां किसी बात को कहने का मतलब ये नहीं होता की हम किसी से द्वेष करते हैं। हम सब का उद्देश्य यही है की भारत अखण्ड बना रहे और हम सब को उस ही के लिए प्रयास करना चाहिए।

महाराज श्री ने अयोध्या में राम मंदिर बनने के समर्थन में भी अपने बात रखते हुए कहा कि राम मंदिर तोड़ने वालों ने किसी से अनुमति नहीं मांगी थी उन्होंने तोड़ दिया था। वो आक्रमणकारी थे, बाहरी देश से आए हुए चोर लुटेरे थे जिन्होंने हमारे प्रभु पर आक्रमण किया, देवस्थानों पर आक्रमण किया। ये हमारा भारत कितना सहनशील देश है जिसके देवता के ऊपर उसही के देश में जबरदस्ती उससे वो स्थान छिन लिया गया हो तब से लेकर आजतक हम लोग शांति के साथ ये प्रार्थना कर रहे हैं की हमारा राम मंदिर बन जाए। उन्होंने आगे कहा कि पत्नी का हरण करने वाले रावण के भी चरणों में प्रणाम वो इसलिए करते हैं क्योंकि रावण ब्राह्मण है और वो क्षत्रिय, ये है राम का चरित्र। हम उस राम को चाहते हैं, राम के चरित्र को, राम के मंदिर को इसलिए चाहते हैं क्योंकि वहां प्रणाम करने वाले लोग सीखें मानवता नाम किस चीज का है।

महाराज श्री ने कहा कि भगवान हमें वो सब देते हैं जो हम चाहते हैं, जीव ही है कही ना कही भटक जाता है। ईश्वर अंतर्यामी है घट घट की जानते हैं, आप जब चाहते हैं तभी तो कथा होती है, आप जब गोविंद से कहते हैं हे गोविंद कृपा करो आपकी कथा हो जाए, हमारा भी मन आपकी कथा में लग जाए। हम ठीक वैसे ही आपके हो जाएं जैसे मीरा हो गई, जैसे धुर्व हो गए, जैसे प्रहलाद हो गए। भगवा का नाम लिजिए, भगवान की कथा सुनिए हमारा कल्याण होगा ही इसके कोई दो राय नहीं है। कुछ लोग कहते हैं भगवान की कथा क्या देती है अरे भरोसा करके तो देखो सबकुछ देती है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। 
महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

13Nov 2018

आज दामोदर नगर, बर्रा, कानपुर नगर में प्रयाग कॉलेज ऑफ स्पेशल एजूकेशन स्कूल द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सम्मान में अभिवादन समारोह का आयोजन किया गया।

आज दामोदर नगर, बर्रा, कानपुर नगर में प्रयाग कॉलेज ऑफ स्पेशल एजूकेशन स्कूल द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सम्मान में अभिवादन समारोह का आयोजन किया गया जिसमें पूज्य महाराज श्री ने सम्मिलित होकर दिव्यांग छात्र छात्राओं के साथ समय व्यतित किया एवं अपने आशीष वचनों से उनका मार्ग दर्शन किया। महाराज श्री ने सभी बच्चों को फूलमाला पहनाकर उन्हे अपना आशीर्वाद दिया।

13Nov 2018

आज दामोदर नगर, खाईपुर, कानपुर में गुरूकुल इंग्लिश स्कूल द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सम्मान में समारोह का आयोजन किया गया।

आज दामोदर नगर, खाईपुर, कानपुर में गुरूकुल इंग्लिश स्कूल द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सम्मान में समारोह का आयोजन किया गया। पूज्य महाराज श्री ने स्कूल के छोटे बच्चों के साथ दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का उद्घाटन किया। महाराज श्री का फूल माला पहनाकर भव्य स्वागत किया गया । पूज्य महाराज श्री ने स्कूल के छात्र छात्राओं को आशीर्वाद देते हुए अपने आशीष वचनों से उनका मार्गदर्शन किया।

12Nov 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।
भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि शूद जी महाराज कहते हैं ये श्रीमद्भागवत अत्यंत ही गोपनीय है, रहस्यात्मक पुराण है। यह भगवत स्वरूप का दर्शन कराने वाला ग्रंथ है, जो जीव इस संसार सागर में फंसे हुए हैं, अंधकार में फंसे हुए है उनके लिए दीपक के समान है। 
महाराज श्री ने आगे कहा कि निश्चित तौर पर यह संसार अंधकारमय ही तो है जो अपना दिखता है वो है नहीं और जो गैर दिखता है वो गैर नहीं । इस संसार में यत्र तत्र सर्वत्र सब अपने ही तो हैं क्योंकि सब भगवत स्वरूप हैं, भगवान ने बनाए हैं। ऐसी भावना हर किसी जीव के मन में नहीं आ पाती है। इस अंधकार में जो अपने नहीं है उन्हें अपना समझ बैठते हैं और जो अपने हैं उन्हें हम अपना कह ही नहीं पाते हैं। 
महाराज श्री ने कहा कि श्रीमद्भागवत सभी का कल्याण करने वाली है, ये नहीं है की ब्राह्मण सुनेंगे तो कल्याण होगा, क्षत्रिय सुनेंगे तो कल्याण होगा। भागवत अगर कोई पक्षी भी सुन लेगा तो उसका कल्याण हो जाएगा। भागवत से अगर कुछ मांगोगे तो मिलेगा, अगर नहीं मांगोगे तो मोक्ष मिलेगा। ऐसा पावन ग्रंथ ये श्रीमद्भागवत है। इस भागवत के शरण में आने के बाद इसे केवल ग्रंथ ही नहीं समझना चाहिए साक्षात श्रीकृष्ण हैं ये भाव मन में रखना चाहिए और जब इस भाव से श्रीमद्भागवत कथा सुनेंगे तो उसी क्षण श्रीकृष्ण आपके ह्रदय में आकर विराजमान हो जाएंगे।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। 
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

13Nov 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत एक शायरी से कि उन्होंने कहा मुश्किल है दौर इतना और उम्र थक गई ।
अब किससे जाके पूछे की मंजिल किधर गई ।।
बाजार में पूछा था मैने इंसानियत मिलेगी।
सब ने हंसते हुए कहा वह तो कब की मर गई ।।
महाराज श्री ने कहा कि यह कितना कठिन युग है। पहले सोच से डर लगता था कि हम किसी को दुख देंगे तो क्या होगा आजकल तो लोग चैलेंज के साथ दुख देते हैं। लेकिन सच यही है की ये कठिन युग है, मुश्किल घड़ी है जहां अपने और पराए का भी पता नहीं है। लेकिन एक बात याद रखना जो हरि के होते हैं उनके सब होते हैं, जो हरि के नहीं होते उनका कोई नहीं होता है। इसलिए अगर मेरी बात मानो तो सबसे पहले हरि के बन जाओ और जो हरि के बन गए उन्हें और किसी के बनने की इच्छा बिल्कुल भी नहीं है।

महाराज श्री ने कथा पंडाल में आए हुए सभी बालक बालिकाओं को सीख देते हुए कहा की आपको प्रत्येक दिन 10 से 15 मिनट भगवान के सामने बैठकर कुछ भी ना कर सको तो ऊँ नमों भगवते वासुदेवाय इस मंत्र का जाप जरूर किजिए। सिर्फ 10 मिनट का समय बचपन में लगा दोगे तो मैं दावे से कहता हूं आपकी पूरी जवानी सुधर जाएगी।

महाराज श्री ने आगे कहा कि भक्ति करने की कोई उम्र नहीं होती, बल्कि बड़े होने पर व्यवस्थाएं बड़ जाती हैं। बचपन में भजन करने का फल बहुत अधिक होता है। माता पिता अपने बच्चों को भले की 10 मिनट के लिए लेकिन भगवान के आगे उसे बैठाइए। जो बच्चा बचपन से भक्ति करेगा उसका चरित्र बड़े होकर 98% नहीं जाएगा। बच्चों के भविष्य का निर्माण बचपन से करना चाहिए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।

तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे – राधे बोलना पड़ेगा ।।

11Nov 2018

विश्व शांति सेवा समिति कानपुर के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 11 नवंबर से 18 नवंबर 2018 तक प्रतिदिन दोपहर 1:30 बजे से मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।  पूज्य महाराज श्री द्वारा 1 साल कानपुर में कथा का श्रवण करवाया जा रहा है। कथा के एक दिन पहले यानि 10 नवंबर को कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई जिसमें हजारों की संख्या में माताओं बहनों ने कलश उठाया। 

विश्व शांति सेवा समिति कानपुर के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 11 नवंबर से 18 नवंबर 2018 तक प्रतिदिन दोपहर 1:30 बजे से मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। 
पूज्य महाराज श्री द्वारा 1 साल कानपुर में कथा का श्रवण करवाया जा रहा है। कथा के एक दिन पहले यानि 10 नवंबर को कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई जिसमें हजारों की संख्या में माताओं बहनों ने कलश उठाया। 
भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि शास्त्रों में वेदो में पुराणों में जो वर्णन किया गया है उसे उसी के तरीके से समझना चाहिए। उस भाषा को ये भागवत कथा समझाती है। ईश्वर कौन है ? ईश्वर को पहचाने की इच्छा आती है तो धरा ही बदल जाती है, फिर होटल का खाना नहीं अच्छा लगता, मंदिर का प्रसाद अच्छा लगता है।

महाराज श्री ने बताया कि हर व्यक्ति को अपने जीवन में भगवान की भक्ति जरूर ही करनी चाहिए। क्योंकि भक्ति से ही मनुष्य का जीवन सदा के लिए सुधर सकता है। उसके सभी पाप धुल जाते है। जो खेल बीत गया है उसको याद मत करो। अब जो बचा है हम और तुम उसका सदुपयोग कर ले तो हमारे और तुम्हारे जीवन का सदुपयोग हो सकता है। मानव योनि हमे मिली है हम लोग ही बहुत ही भाग्यवान है। जिसको सब तरह के अंगों से भगवान् ने संपन्न किया हुआ है।
महाराज श्री ने कहा कि ईश्वर को कैसे पहचाना जाये, उसे पाए कैसे उसे मिले कैसे? दो प्रश्न- अपने आप से कीजिए तुम कौन हो और वो कौन है जिसने तुम्हारी रचना की है। ये दो प्रश्न आपने आप से कीजिये ये संसार बड़ा कोमल लगने लगेगा। भगवत की रचना हुई इस ब्रहम की पहचान करने के लिए। सत,चित और आनंद ये तीन रूप है परमात्मा के और आनद भी दो प्रकार के होते है। एक आनद दो साधनो में मिलता है लेकिन साधन के समाप्त हो जाने पर वो आनंद ख़तम हो जाता है। एक आनन्द वो होता है जो किसी साधन का मुताज नहीं होता। एक भीतरी आनन्द है जो परमात्मा को सोचते रहते है। जहां गोविन्द के नाम का गुणगान है वह सच्चा आनन्द है। सच्चा आनद कही अगर है तो वो भगवान की कथाओ में। श्रीमद भागवत कथा में ही सच्चा सुख है। जो संत महात्मा कथाकार भक्त होते है वो सब के कल्याण की बात करते है। श्रीमद भागवत कथा साधारण नहीं है ये हमारी सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाला ग्रन्थ है। जीव को संवेदनहीन नहीं होना चाहिए।

महाराज श्री ने अपनी बात रखते हुए कहा कि आज मैं आप लोगों से एक बात शेयर करना चाहता हूं, ये मेरे मन की बात है जो मैं आप लोगों से शेयर कर रहा हूं इसका राजनैतिक मतलब ना निकाले, बहुत दिनों से कुछ लोग अफवाहें फैला रहे हैं की अब तो देवकीनंदन राजनैतिक आदमी हो गए हैं अब वो कथा कहां करेंगे....उन्होंने अपनी पार्टी बना ली है, राजनीति में उतर गए हैं....लेकिन मैं आप लोगों को बता दूं की ना ही मैं राजनीति में उतरा हूं और ना ही कभी उतरूंगा। 
मैं कोई राजनैतिक व्यक्ति नहीं हूं। मेरा राजनीति से कोई लेना देना नही है......मैं हर उस बात के विरुद्ध हूँ जो देशहित और समाज हित मे ना हो।
हमने अखण्ड भारत मिशन का निर्माण किया जो की एक सामाजिक संस्था है जिसका उद्देश्य है जाति धर्म वर्ग के भेदभाव को खत्म कर एक अखण्ड भारत का निर्माण करना तो इसमें राजनीति कहां से आई ?
अखण्ड भारत मिशन कोई राजनैतिक पार्टी नहीं है बल्कि सामाजिक संस्था है जो राष्ट्रहित के लिए कार्य कर रही है। अगर आपको किसी की कोई बात बुरी लगती है और आप उसका विरोध कर रहे हैं तो उसका विरोध करना राजनिती तो नहीं होती..... 
मेरा सभी से अनुरोध है की आप इसे राजनैतिक रूप ना दें और संस्था का साथ दे चाहे वो किसी भी रूप में क्यों ना हो.....यह आपका देशहित में एक योगदान होगा।
मैं आपको यह भी बताना चाहता हूं की मेरा किसी भी रूप में राजनैतिक इस्तेमाल ना करें क्योंकि सोशल मीडिया पर मेरे नाम से कई अफवाहें चल रही हैं, मेरी फोटो का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है, मैं सब से अपील करता हूं की यह सब ना करें.... मेरा फ़ोटो और नाम कोई भी राजनीतिक पार्टी या प्रत्याशी इस्तेमाल ना करें। मेरा किसी भी पार्टी से कोई संबंध नहीं है मैं ना किसी पार्टी के विरुद्ध हूँ ना ही समर्थन में हूँ। मैं कथावाचक हूँ और कथा ही करता रहूंगा 
इस व्यास पीठ के माध्यम से देश विदेश में धर्म का शांति का, संस्कृत, संस्कृति और संस्कारों का संदेश देता रहूंगा।
कुछ लोगों ने समाज को भृमित करने की भी कोशिश की, की मैं समाज को बांट रहा हूँ। मेरे भाईयों से मुझे अलग करने की कोशिश की, मेरे बारे में कहा गया की मैं दलित विरोधी हूं, इस तरह का कोई भी बयान मैन नहीं दिया है। ना ही मैंने समाज को बांटने का कोई काम किया है। इसीलिए मेरा सभी से निवेदन है कि ऐसी अफवाहों पर ध्यान ना दे। कोई भी कथावाचक या संत किसी जाति, धर्म वर्ग विशेष का नही होता अपितु वो सभी का होता है और सभी उसके परिवार है।
सनातन धर्म मे सबसे पहले यही सिखाया जाता है कि वसुधैव कुटुम्बकम। अर्थात पूरा संसार एक परिवार है। तो ऐसे में कोई समाज को बांटने की बात कैसे कर सकता है।
मैं हमेशा देशहित में कार्य करता हूं, मैं हमेशा दलित भाईयों के साथ था, हूं और रहूंगा., मैं सब को साथ लेकर चलने में विश्वास रखता हूं......मैं ना ही किसी पार्टी के विरोध में हूं ना ही मैं उनके पक्ष में हूं और ना ही विपक्ष में.....
मेरा सीधा सीधा से मतलब यह है की जो भी पार्टी देशहित के लिए कार्य करेगी मेरा पूरा समर्थन उस पार्टी के लिए रहेगा।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। 
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। .
श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

7Nov 2018

#दीपावली के पावन पर्व पर पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने ग़रीब एवं अनाथ बच्चों को सर्दियों के वस्त्र और मिठाइयां बाँटकर पर्व मनाया।

#दीपावली के पावन पर्व पर पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने ग़रीब एवं अनाथ बच्चों को सर्दियों के वस्त्र और मिठाइयां बाँटकर पर्व मनाया। साथ ही बच्चों को भोजन ग्रहण करवाया और उनके साथ समय व्यतीत किया। #DiwaliCelebration #HappyDeepavali

10Nov 2018

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 17 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा से पूर्व आज विशाल कलश यात्रा निकाली गई।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 17 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा से पूर्व आज विशाल कलश यात्रा निकाली गई, जिसमें हजारों की संख्या में आई माताओं बहनों ने काली मठिया (हनुमान मंदिर), 80 फीट रोड से कथा स्थल तक कलश उठाकर यात्रा निकाली। कलश यात्रा जिस जिस मार्ग निकली वहां का वातावरण राधे राधे की धुन से गूंजायमान हो उठा।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

27Oct 2018

अमेरिका से डेढ़ महीने की यात्रा के बाद आज जब पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज शांति सेवा धाम,वृन्दावन पहुंचे तो यहां मौजूद सैंकड़ो भक्तो ने महाराज श्री का माल्यापर्ण करके उनका भव्य स्वागत किया।

अमेरिका से डेढ़ महीने की यात्रा के बाद आज जब पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज शांति सेवा धाम,वृन्दावन पहुंचे तो यहां मौजूद सैंकड़ो भक्तो ने महाराज श्री का माल्यापर्ण करके उनका भव्य स्वागत किया।

पूज्य महाराज श्री ने सर्वप्रथम ठा. प्रियाकांत जू भगवान के दर्शन किए। डेढ़ महीने तक अपने प्रिय ठा. श्री प्रियाकांत जू भगवान से दूर रहने का दुःख महाराज श्री के चेहरे पर दिख रहा था। उन्होंने कुछ समय भगवान के चरणों में बिताया और उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया।

लगातार 36 घंटे से भी लंबी यात्रा करने के पश्चात भी महाराज श्री आश्रम में आये सभी भक्तों से मिले और उन्हें अपने प्रवचनों श्रवण करवाये। भक्त भी महाराज श्री की एक झलक पाने के लिए सुबह से ही इंतजार कर रहे थे। देह के कोने कोने से भक्त महाराज श्री से मिलने आये।#WelcomeThakurJi

27Oct 2018

इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट दिल्ली पर भारी संख्या में विश्व शांति सेवा चैरिटबल ट्रस्ट और अखण्ड भारत मिशन के सदस्य एवं कार्यकर्ता पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज का स्वागत करने के पहुंच गए है। कुछ ही क्षणों में पूज्य महाराज श्री आने वाले है।

इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट दिल्ली पर भारी संख्या में विश्व शांति सेवा चैरिटबल ट्रस्ट और अखण्ड भारत मिशन के सदस्य एवं कार्यकर्ता पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज का स्वागत करने के पहुंच गए है। कुछ ही क्षणों में पूज्य महाराज श्री आने वाले है।

 

27Oct 2018

इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट दिल्ली पर भारी संख्या में विश्व शांति सेवा चैरिटबल ट्रस्ट के सदस्यों, भक्तों एवं कार्यकर्ताओं द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज का स्वागत किया गया।

इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट दिल्ली पर भारी संख्या में विश्व शांति सेवा चैरिटबल ट्रस्ट के सदस्यों, भक्तों एवं कार्यकर्ताओं द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज का स्वागत किया गया। इस दौरान पूरा एयरपोर्ट राधे-राधे के स्वर से गूंज उठा। #WelcomeThakurJi

27Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 19 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 2018 तक Shiv Shakti Peeth, 264-12 Hillside Avenue Queens, NY11004, NewYork, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 19 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 2018 तक Shiv Shakti Peeth, 264-12 Hillside Avenue Queens, NY11004, NewYork, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
कथा की शरुआत करते हुए महाराज श्री ने बताया की आज का युग कलयुग है और अगर इस कलयुग में आज कोई लड़की किसी को बिना बताये मंदिर में पूजा करने चली जाए तो कोई भी उस लड़की का विश्वास नहीं करेगा और उससे कोई शादी नहीं करेगा जब आज कलयुग में ये स्थिति है तो आप पांच हजार वर्षो पीछे जाइये और सोचिये की वहा क्या स्थिति होगी जिन कन्याओं को बंधी बना कर रखा गया था उन कन्याओं से शादी कौन करता। इसलिए उन सभी कन्याओं ने ठाकुर जी से कहा की अब आप ही हमें बताये की हम क्या करें या तो हम गलत काम करें अपना पेट पालने के लिए या फिर मर जाए। महाराज श्री ने धर्म और अधर्म का पाठ पढ़ाते हुए बताया की आत्महत्या करना अधर्म है और भगवान् का प्राकट ही धर्म की रक्षा के लिए हुआ है इस लिए मेरे ठाकुर जी ने धर्म की रक्षा करते हुए उन सभी गोपियों को अपनाया और उनका उद्धार किया इसी लिए कहा जाता है की श्री कृष्ण जी की 16 हजार एक सौ 8 पटरानियां और एक लाख 61 हजार 80 पुत्र और 1 लाख 77 हजार 188 कन्याये थी।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की। और भागवत को सम्पूर्ण किया। पूज्य महाराज श्री ने भागवत कथा को सम्पूर्ण कर भागवत जी को विदा किया।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

25Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 19 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 2018 तक Shiv Shakti Peeth, 264-12 Hillside Avenue Queens, NY11004, NewYork, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 19 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 2018 तक Shiv Shakti Peeth, 264-12 Hillside Avenue Queens, NY11004, NewYork, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
कथा की शुरुआत करते हुए महाराज श्री ने बताया की हमारे जीवन में हमारे पितरों का बड़ा अहम रोल है अगर हमारे पितर हम से रूठ जाएँ तो घर में खुशहाली नहीं आती बच्चे बीमार पड़ जाते हैबिजनेस में लॉस हो जाता है घर में लड़ाईया शुरू हो जाती है। इसलिए हमें पितरो के लिए सत्कर्म समय समय पर करते रहना चाहिए और पितृ पक्ष में श्राद्ध में जो अपने पितरो का स्मरण नहीं करते है उनके पितृ उनसे रूठते ही है। और अगर आपके पितृ आपसे खुश हो तो आपकी आधी समस्याओं का निवारण तो ऐसे ही हो जाता है, इसलिए हमें अपने पितरो के प्रति हमेशा जागरूक रहना चाहिए। तत्पश्चात महाराज श्री ने कल का कथा प्रसंग याद दिलाते हुए कंश और देवकी प्रसंग से कथा क्रम को आगे बढ़ाया पंडित जी ने कंस का उदहारण देते हुए बताया की जैसे ही आकाशवाणी के द्वारा पता चला की देवकी का आठवा पुत्र कंश की मौत का कारण बनेगा तब कंस ने सोचा की अगर देवकी का आठवा पुत्र मेरी मौत का कारण बनेगा तो क्यों न में देवकी को ही मार दू। लेकिन क्या आज तक मौत को कोई हरा पाया है। हमारे जन्म से पहले ही हमारी मृत्यु तय है वो कहा होगी क्यों होगी और कैसे होगी किस समय होगी सब भगवान् के घर में पहले से ही तय है। साथ ही महाराज श्री ने बताया की एक बार महाराज यक्ष ने एक बार धर्म राज जी से प्रश्न किया की संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य बताओ की सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है तब धर्मराज जी महाराज से कहते है की महाराज जी सबसे बड़ा आश्चर्य ये है की ये प्राणी खुद अपने परिवार वालों को समशान घाट में अपने हाथो से जला कर आते है, अपनी आँखों के सामने उन्हें सुवाह होते हुए देखते है भस्म होते हुए देखते है इसके बाद भी खुद ऐसे जिन्दा रहते है की जैसे खुद कभी मरेंगे ही नहीं, तो इंसान इस बात को क्यों नहीं समझता की ऊपर कोई बैठा हुआ है जो हमें यहां निचे भेजता है और हमारा समय पूरा होने पर हमें ऊपर बुला लेता है। इसलिए हमारे जन्म से पहले हमारी मृत्यु तय है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

24Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 19 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 2018 तक Shiv Shakti Peeth, 264-12 Hillside Avenue Queens, NY11004, NewYork, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
कथा की शुरुआत करते हुए महाराज जी ने चतुर्थ दिवस का ध्रव प्रसंग भक्तों को याद दिलाते हुए बताया की भगवान् ने किस प्रकार प्रह्लाद जी की रक्षा की और निश्चित बात तो ये हैं की भगवान् के भक्तों को पग पग पर सहारा मिलता है। अगर तुम्हारे अंदर सच्चाई है और तुम भगवान् से बहुत प्यार करते हो तो भगवान् दुनिया छोड़ सकते है तुम्हे नहीं छोड़ सकते है। हमारा एक मात्र सहारा ईश्वर ही है बस शर्त ये है की आपको उनमे विश्वास रखना होगा। और जैसे जैसे आपका विश्वास बढ़ता जायगा वैसे वैसे ठाकुर जी आप पर कृपा करते जायँगे। लेकिन आज के मानव की सबसे बड़ी कमी ये है की उसका विश्वास डगमगा जाता है और यही सबसे बड़ी समस्या है अगर आप इस विश्वास से निजात पा ले तो अनंत बढ़ता चला जाता है एक विश्वास ही तो था प्रहलाद जी का जब हिरणकश्यप ने पूछा की बताओ तुम्हारा भगवान् कहा है तो प्रह्लाद जी ने कहा की पिताजी आप ये मत पूछो की मेरा भगवान कहा है आप ये पूछो की मेरा भगवान् कहा कहा नहीं है। परमात्मा तो हर जगह है बस आपकी दृष्टि होनी चाहिए उन्हें देखने की। इसलिए हमारी भक्ति और दृष्टि प्रह्लाद जी जैसी होनी चाहिए ताकि भगवान् आपकी रक्षा करने के लिए कही भी उपस्थित हो जाए।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली ने भगवान ब्रह्मा वरदान मांगा की मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने उसे वरदान दे दिया। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने विष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाशकरें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली से कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" 
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का सुंदर वर्णन श्रवण कराया। सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

23Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 19 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 2018 तक Shiv Shakti Peeth, 264-12 Hillside Avenue Queens, NY11004, NewYork, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 19 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 2018 तक Shiv Shakti Peeth, 264-12 Hillside Avenue Queens, NY11004, NewYork, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।
भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जीवन में जो आपके आदरणीय लोग हैं उनका आदर करना सीख लें। हम जो भी किसी को देते हैं वो ही हमें वापस मिलता है, अगर हम सम्मान देंगे तो हमें भी सम्मान ही मिलेगा। सम्मान एक ऐसा विषय है जो आप किसी से छीन नहीं सकते, आपके डर से कोई आपको सम्मान नहीं देगा, आपके कर्म से प्रभावित होकर वो आपको सम्मान देता है। 
महाराज श्री ने कहा कि जीवन में तीन लोगों का अपमान कभी नहीं करना चाहिए, साधु-संत, भक्त और ब्राह्मण। अनजाने में भी इनका अपराध नहीं होना चाहिए, अगर आपने अनजाने में भी इनका अपराध किया तो वो आपके विनाश की शुरूआत होगी। आप मुझ पर यकीन मत किजिए, पुराण पढिए, धार्मिक किताबें पढिए। भगवान के बनाए हुए नियम कभी गलत नहीं होते, हम भगवान के बनाए हुए नियमों में जी रहे हैं। हमें उनही के नियमों का पालन करना चाहिए वही हमारे लिए बेहतर है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।
राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...
अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।
भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

22Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 19 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 2018 तक Shiv Shakti Peeth, 264-12 Hillside Avenue Queens, NY11004, NewYork, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 19 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 2018 तक Shiv Shakti Peeth, 264-12 Hillside Avenue Queens, NY11004, NewYork, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।
भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भागवत कथा के रहस्य को हर कोई नहीं जान पाता केवल भक्त लोग ही जान पाते हैं। भगवान का विषय, भक्ति को विषय साधारण नहीं है, ना जाने कितने जन्मों के अच्छे कर्मों का फल भगवान की भक्ति ह्रदय में प्रकट होना है। जब तक अच्छे कर्मों का फल हम लोग एकत्रित ना कर ले तब तक भगवान की भक्ति हमारे ह्रदय में प्रकट नहीं हो सकती। भगवान की भक्ति सभी शूलों को मिटाने वाली है, हरि का दर्शन कराने वाली है, वो भगवान की भक्ति को प्रकट करने वाली है भागवत हमारे ह्रदय में। लेकिन कब जब हमारे उतने श्रेष्ठ कर्म हों कि हम कथा में जा सकें, कथा में पहुंच सके, कथा में हमारा मन लग सके। 
महाराज श्री ने कहा कि किसी भी चीज का अहंकार नहीं करना चाहिए चाहे वो भक्ति या भजन ही क्यों ना हो। उन्होंने आगे कहा कि भागवत क्या है ? व्यास जी ने लिखा है भागवत साक्षात कृष्ण हैं। भागवत सुनते वक्त सीधे सामने आकर बैठे और एक एक वाक्य को ध्यान से सुनते रहें। भगवत कृपा समझ कर उसे ग्रहण करते रहें। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। 
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

21Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 19 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 2018 तक Shiv Shakti Peeth, 264-12 Hillside Avenue Queens, NY11004, Newyork, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के प्रथम दिवस पर महाराज जी ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 19 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 2018 तक Shiv Shakti Peeth, 264-12 Hillside Avenue Queens, NY11004, Newyork, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के प्रथम दिवस पर महाराज जी ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
भागवत कथा प्रारंभ से पूर्व प्रात:काल में मदिर परिसर से कथा स्थल तक माताओं बहनों द्वारा कलश यात्रा निकाली गई।

पूज्य महाराज श्री ने सर्वेश्वर भगवान को प्रणाम कर कथा की शुरुआत की और कहा की जब तक हमारी बुराइयों का विनाश नहीं होगा तब तक हमारी अच्छाइयों का विकास नहीं हो सकता। बुराइयों के विनाश अच्छाइयों के विकास का सबसे बड़ा उदाहरण राम और रावण का युद्ध है। हम लोग अपने देश से दूर रहकर अगर मन भागवत में हमारा मन ठाकुर जी में है तो समझ लेना चाहिए की जरूर हमारे ठाकुर जी की कृपा हम सब के ऊपर बनी हुई है तभी हमें ये सुन्दर अवसर मिला है।

महाराज श्री ने कहा की आसान नहीं धर्म का प्रचार करना और कहा की कथा सबसे बड़ा कार्य करती है, हमारा मन ठाकुर जी के चरणों में लगाती है। हमारे जब तक पाप रहते है तब तक हमारा मन कथा में नहीं लग सकता। आइये हम सब मिलकर पाप काटने के लिए संकीर्तन कर ले, पाप कटेंगे तो हमारा मन भागवत में लगेगा। सात दिन की भागवत कथा हमें क्या नहीं दे सकती ? भागवत श्रवणमात्र ही वो सब दे सकती है जो कही से प्राप्त नहीं हो सकता।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की एक बात सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगो का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा ।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

21Oct 2018

पूज्य महाराज श्री द्वारा Newyork USA में आयोजित प्रथम दिवस की भागवत कथा से पूर्व कथा स्थल Shiv Shakti Peeth में पूजा अर्चना कर भगवान से आशीर्वाद लिया। महाराज श्री के सानिध्य में भक्तो द्वारा कथा स्थल तक कलश यात्रा निकालकर कथा का शुभारंभ किया गया।

पूज्य महाराज श्री द्वारा Newyork USA में आयोजित प्रथम दिवस की भागवत कथा से पूर्व कथा स्थल Shiv Shakti Peeth में पूजा अर्चना कर भगवान से आशीर्वाद लिया। महाराज श्री के सानिध्य में भक्तो द्वारा कथा स्थल तक कलश यात्रा निकालकर कथा का शुभारंभ किया गया।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

18Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 12 अक्टूबर से 18 अक्टूबर 2018 तक Sri Krishna Cultural Centre 13356 Apple Valley rd, Apple Valley, California में श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने राम कथा का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 12 अक्टूबर से 18 अक्टूबर 2018 तक Sri Krishna Cultural Centre 13356 Apple Valley rd, Apple Valley, California में श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने राम कथा का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया ।
राम कथा के पंचम दिवस की शुरुआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि बंदर राम के या बंदर काम के, हम सभी बंदर है चाहे राम के बन जाएं, चाहे काम के बन जाएं। राम के बंदर हैं तो श्री हनुमान जी जो पूज्यनीय हैं और काम के बंदर जो जो बने है वो काम के नहीं रहे। जो कामनाओं की पूर्ति में लगे रहत हैं वो काम के बंदर हैं, उनका जीवन पूरा हो जाता है लेकिन कामना पूरी नहीं होती।
महाराज श्री ने कहा कि रामचरित्रमानस एक बहुत ही प्यारा ग्रंथ है। रामायण में दो चरित्रों को आप याद किजिए, उन दो चरित्रों पर टीका है पूरा रामचरित्रमानस, एक है दशरथ एक है दशानन। दशरथ जिसने अपनी दशों इंद्रियों को अपने कंट्रोल में कर रखा है, जिसने अपनी दशों इंद्रियों को कंट्रोल में कर रखा है उसके घर में राम पैदा होते हैं और दशानन जिसने अपनी दशों इंद्रियों को खोल रखा है भोगों के लिए, उसका जाकर राम वध करते हैं। भोग कभी भोगे नहीं जाते अपितु यह भोग हमे भोग रहे हैं इसमें हम चाहे माने या ना माने। 
महाराज श्री ने कहा कि विषयों से कभी वैराग्य नहीं होता, पूरा जीवन मेरा प्रभु की भक्ति के बिना व्यतीत हो रहा है जब इस तरह का वैराग्य मन में आए तो फिर इंतजार नहीं करना चाहिए क्योंकि वैराग्य आसानी से नहीं आता है। कभी कभी जब भगवान कृपा करें तब वैराग्य होता है, वैराग्य किसी ठोकर लगने के बाद ही होता है, किसी घटना के बाद वैराग्य होता है, कोई ना कोई घटना घटती है जब हम वैरागी होते हैं। बहुत से लोग कहते हैं हम ये सब छोड़े देंगे, हमारे दुख का कारण ही ये है की हम छोड़ना चाहते हैं, छोडिए मत छोड़ने की कोशिश मत किजिए, अपने आप को वैराग्य से जोड़ने की कोशिश किजिए। जब आप वैराग्य को सुमिरण करने लग जाएंगे, ईमानदारी से मन में वो आ जाएगा आपको कुछ छोड़ने नहीं पड़ेगा, अपने आप छुट जाएगा।

19Oct 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में Apple Valley, CA में आयोजित श्री राम कथा का भव्य समापन हुआ, श्रोताओं ने कथा का रसपान कराने के लिए महाराज श्री को धन्यवाद दिया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में Apple Valley, CA में आयोजित श्री राम कथा का भव्य समापन हुआ, श्रोताओं ने कथा का रसपान कराने के लिए महाराज श्री को धन्यवाद दिया एवं अगले वर्ष पुन: मिलने की कामना के साथ भव्य विदाई दी, तत्पश्चात महाराज श्री ने न्यूयॉर्क के लिए प्रस्थान किया।

15Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 12 अक्टूबर से 18 अक्टूबर 2018 तक Sri Krishna cultural Centre 13356 Apple Valley rd, Apple Valley, California में श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के तृतीया दिवस पर महाराज श्री ने राम कथा का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया और प्रभु की दूसरी भक्ति के बारे में बताया।

राम कथा के तृतीया दिवस की शुरुआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुवात करते हुए कहा कि तुलसीदास जी ने लिखा है की जो दुष्ट प्रवर्ति के लोग वह यहाँ कथा सुनने नहीं आते है। तो फिर यहां कौन आते है "राम कृपा बिन सुलभ न सोये " जिनके ऊपर भगवान की कृपा होगी वही यहाँ आ सकते है। 
बिनु सत्संग विवेक न होई। रामकृपा बिनु सुलभ न सोई।। भगवान की कथा, सत्संग राम की कृपा के बिना सुलभ नहीं हो सकता। 
महाराज जी ने कहा की जीवन भर बात याद रखो अच्छी बात कोई कहे मान लो बुरी बात कोई कहे किसी की भी मत मानो। कथा सुनने से मिलता क्या है ? कथा सुनने वाले ही जानते है की कथा से क्या मिलता है। जिन्होंने कभी कथा सुनी न हो उन्हें क्या मतलब पड़ा है। राम कथा के सबसे बड़े श्रोता कौन है ? स्वयं भोले नाथ। स्वयं शंकर भगवान वो खुद भी कथा कहते भी है जब कोई जिज्ञासु आता है तो भगवान श्री राम की कथा कहते है और जब मन करता है तो कैलाश पर्वत का त्याग करके संत महात्माओं के आश्रमों में चले जाते है। जो स्वयं महादेव हो उनको कथा सुनने की क्या जरुरत है। वैष्णवों में सर्वश्रेष्ठ अगर कोई है तो वह बाबा भोले नाथ है।

पूज्य महाराज श्री ने कहा की भगवान श्री राम की ये पावन कथा जीवन के सारे द्वंदों को दूर करती है और सही मायनो में कहा जाए तो भगवान की कथा ही है जो मानव को मानव बनाती है। जिन्होंने श्री राम कथा को थोडा भी अपने जीवन में उतार लिया है तो उसका कल्याण होना निश्चित है।

पूज्य महाराज श्री ने कहा की भगवान की दूसरी भक्ति है भगवान की कथा सुनना। इसका असर ये होता है की पहले तो ये कथा सुनने वालो को संसार की वस्तुएं मिलने लगती हैं और लगातार सुनने से संसार की वस्तुओं को पाने की इच्छा नहीं होती बल्कि इच्छा बड़ी होकर भगवान से मिलने की इच्छा जगा जाती है। भगवान की कथा सुनने के लिए जिगयासा जागनी चाहिए।

14Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 12 अक्टूबर से 18 अक्टूबर 2018 तक Sri Krishna cultural Centre 13356 Apple Valley rd, Apple Valley, California में श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने राम कथा का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया और प्रभु की दूसरी भक्ति के बारे में बताया।

राम कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुवात करते हुए कहा कि तुलसीदास जी ने लिखा है की जो दुष्ट प्रवर्ति के लोग वह यहाँ कथा सुनने नहीं आते है। तो फिर यहां कौन आते है "राम कृपा बिन सुलभ न सोये " जिनके ऊपर भगवान की कृपा होगी वही यहाँ आ सकते है। 
बिनु सत्संग विवेक न होई। रामकृपा बिनु सुलभ न सोई।। भगवान की कथा, सत्संग राम की कृपा के बिना सुलभ नहीं हो सकता। 
महाराज जी ने कहा की जीवन भर बात याद रखो अच्छी बात कोई कहे मान लो बुरी बात कोई कहे किसी की भी मत मानो। कथा सुनने से मिलता क्या है ? कथा सुनने वाले ही जानते है की कथा से क्या मिलता है। जिन्होंने कभी कथा सुनी न हो उन्हें क्या मतलब पड़ा है। राम कथा के सबसे बड़े श्रोता कौन है ? स्वयं भोले नाथ। स्वयं शंकर भगवान वो खुद भी कथा कहते भी है जब कोई जिज्ञासु आता है तो भगवान श्री राम की कथा कहते है और जब मन करता है तो कैलाश पर्वत का त्याग करके संत महात्माओं के आश्रमों में चले जाते है। जो स्वयं महादेव हो उनको कथा सुनने की क्या जरुरत है। वैष्णवों में सर्वश्रेष्ठ अगर कोई है तो वह बाबा भोले नाथ है।

पूज्य महाराज श्री ने कहा की भगवान श्री राम की ये पावन कथा जीवन के सारे द्वंदों को दूर करती है और सही मायनो में कहा जाए तो भगवान की कथा ही है जो मानव को मानव बनाती है। जिन्होंने श्री राम कथा को थोडा भी अपने जीवन में उतार लिया है तो उसका कल्याण होना निश्चित है।

पूज्य महाराज श्री ने कहा की भगवान की दूसरी भक्ति है भगवान की कथा सुनना। इसका असर ये होता है की पहले तो ये कथा सुनने वालो को संसार की वस्तुएं मिलने लगती हैं और लगातार सुनने से संसार की वस्तुओं को पाने की इच्छा नहीं होती बल्कि इच्छा बड़ी होकर भगवान से मिलने की इच्छा जगा जाती है। भगवान की कथा सुनने के लिए जिगयासा जागनी चाहिए।

13Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 12 अक्टूबर से 18 अक्टूबर 2018 तक Sri Krishna cultural Centre 13356 Apple Valley rd, Apple Valley, California में श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने राम कथा का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 12 अक्टूबर से 18 अक्टूबर 2018 तक Sri Krishna cultural Centre 13356 Apple Valley rd, Apple Valley, California में श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने राम कथा का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया ।

राम कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने प्रथम दिवस की कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि हमारे जीवन में तमाम ऐसी परिस्थितियां होती है, हम ऐसी लड़ाई लड़ते हैं जिस लड़ाई का हमे पता नहीं होती है की अंत क्या है ? लेकिन आप अपने मन से पूछ लिजिए की जहां सत्य है वहां विजय है क्योंकि परमात्मा सत्य स्वरूप है, जहां सत्य होता है वहां विजय होती है। 
महाराज श्री ने आगे कहा कि कहा जाता है कि राम जी रावण से युद्ध में इसलिए जीत गए क्योंकि उनके साथ उनका भाई था और रावण इसलिए हार गया क्योंकि उसके भाई ने उसका साथ छोड़ दिया। आप अपने परिवार को अपने साथ रखते हैं तो आपकी जीत होती है। रावण जैसा पराक्रमी हार गया क्योंकि भाई साथ में नहीं था लेकिन आजकल भाई भाई में बनती नहीं है, बात बात पर लड़ाई होती है। इसिलिए जीवन भी और ज्यादा कठिन परिस्थितियों में घिर जाता है। भगवान श्री राम सिखाते हैं अगर तुम जीवन में सीखना चाहते हो तो सबसे पहले एक शर्त है की अपने भाईयों को अपने साथ में लेकर चलो, अपने समाज को साथ लेकर चलो, सत्य को साथ लेकर चलो, धर्म को अपने साथ मे लेकर चलो अगर धर्म साथ होगा तो तुम्हारी विजय होगी।
महाराज श्री ने कहा कि जीवन में भगवत कृपा बेहद जरूरी है “ जापर कृपा राम की होई तापर कृपा करें सब कोई” यानि जिसपर भगवान की कृपा है उसपर सब कृपा करते हैं । 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि आपको सबको पता है की रामचरित्र मानस तुलसीदास ने लिखि और बाल्मिकी रामायण ऋषि बाल्मिकी ने लिखी लेकिन यह बात आप नहीं जानते होगे की बाल्मिकी रामायण राम जी के आने से पहले लिख दी गई थी । हमारे संत कितने त्रिकाल दर्शी हैं की भगवान आकर क्या करेंगे यह बाल्मिकी रामायण में पहले ही लिखकर चले गए। कलयुग में भगवान का कल्कि अवतार होगा वेद व्यास जी ने भागवत में पहले ही लिख दिया और हम उन ऋषि मुनियों की बातों पर यकीन नहीं करते। ऐसे संत जो भगवान के आने से पहले भगवान की कथा लिख दे और वो हो तो उन ऋषियों के चरणों में लूट जाने को मन करता है। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

12Oct 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए ये मां बाप की जिम्मेदारी है, हम अपने बच्चों को कैसे संस्कार दे रहे हैं। सिर्फ बच्चे हो जाएं, वो पढ़ लिख जाएं, जो सही मायने में मानव ना हों क्योंकि जो सिर्फ अपने बारे में सोचता है और यह जीवन व्यतित कर देता है उसको कहा जाएगा तो मतलबी कहा जाएगा वो ढ़ग का मानव नहीं है। मानव किसे कहते है ? मानव तो सब हैं लेकिन मानवता किस किस में है ? अगर इंसान होकर इंसानियत ना हो तो उससे कोई फायदा नहीं है। आप अगर किसी के भले की ना सोच सकें, किसी के भले के बारे में ना सोच सकें, धर्म का हित ना कर सकें, अपना आत्म कल्याण ना कर सकें तो फिर ऐसा जीवन मिलने से लाभ भी क्या ? और ऐसा जीवन व्यतित करने से भी लाभ नहीं है। हम सब मानव जीवन में आए हैं तो अपने बच्चों को संस्कार देना बहुत जरूरी है।
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 
श्रीमद्भागवत कथा, सप्तम दिवस, Chicago USA.
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12Oct 2018

पूज्य महाराज श्री ने शिकागो में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के बाद कैलिफोर्निया के लिए प्रस्थान किया जहां 12 अक्टूबर से 18 अक्टूबर तक Shri Krishna Ccultural Centre 13356 Apple Valley Rd., Apple Valley, CA- 92308 में श्री राम कथा का आयोजन किया जाएगा।

पूज्य महाराज श्री ने शिकागो में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के बाद कैलिफोर्निया के लिए प्रस्थान किया जहां 12 अक्टूबर से 18 अक्टूबर तक Shri Krishna Ccultural Centre 13356 Apple Valley Rd., Apple Valley, CA- 92308 में श्री राम कथा का आयोजन किया जाएगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

9Oct 2018

ज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि पति समझदार हो तो मकान जल्द बन जाता है और पत्नी समझदार हो तो बहुत जल्दी घर बन जाता है और बच्चे अगर समझदार हो तो घर ही स्वर्ग बन जाता है । यह सब समझदारी आती कहां से है ? यह सब समझदारी आती है धर्म से। आपके धर्मज्ञ लोग ही ये सारी चीजे बताते हैं और सिर्फ सुनने भर से काम नहीं चलता है, इसे अपने जीवन में उतारना पड़ता है। 
महाराज श्री ने आगे कहा कि आज हमारे पास सारी सुविधाएं उपलब्ध है लेकिन क्या जीवन में शांति है ? हमारे पास पहले के जमाने से ज्यादा अच्छी सड़के हैं, अच्छे मकान हैं, सारी सुविधाएं हैं लेकिन मन अशांत है आखिर क्यों ? वो इसलिए है क्योंकि संस्कारों की कमी है, हमने उन लोगों की नकल की जो साधन युक्त तो हैं लेकिन साधना युक्त नहीं हैं और साधन सुख नहीं दे सकते, साधना ही सुख दे सकती है। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

10Oct 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान ने हमे दो सॉफ्टवेयर दिए हैं एक है दिन और दूसरा दिमाग । दिल, दिमाग देने के बाद परमात्मा ने उसका उपयोग भी बताया है। प्रभु ने बताया की दिमाग का इस्तेमाल दुनिया के लिए करना और दिल का इस्तेमाल मेरे लिए करना, हमने ये बात मान ली और चले आए लेकिन जरा ध्यान से सोचिए क्या आपने उसका इस्तेमाल वैसे ही किया जैसा भगवान ने कहा ? हमने उसका उलट कर दिया, हमने दिमाग तो इस्तेमाल किया भगवान के लिए और दिल इस्तेमाल किया दुनिया के लिए । लोग कहते हैं की हमारा दिल टूट गया है, दिल के हजार टूकड़े हो गए हैं, आपसे किसने कहा था दिल का उपयोग करो, भगवान ने कहा था क्या दिल का उपयोग दुनिया के लिए करो ? भगवान ने जो कहा था आपने उससे उलटा किया। ये दुनिया दिल से नही चलती हैं, दुनिया दिमाग से चलती है, आप दिल को सिर्फ यहां फसा रहे हो। दिल का रिश्ता हमेशा भगवान के साथ होना चाहिए क्योंकि जब आप दिल से भगवान से जुड जाते हो तो उसे पता होता है की दिल कहां है। 
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

7Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि यह कटू सत्य है चाहे कोई इसे माने या ना माने, इस जीवन में कुछ भी निश्चित नहीं है, अगर इस संसार में जीवन में कुछ चीज निश्चित है तो उसका नाम हैं मृत्यु। अनिश्चित्ताओं के लिए अनेकों काम करते हैं हम और आप लेकिन जो निश्चिक है उसके बारे में कुछ नहीं सोचते हैं। जब हमारा जन्म भी नहीं हुआ उससे पहले हमारी मृत्यु निर्धारित है। मृत्यु जब आती है तो उसके लिए तीन चीजें निर्धारित रहती हैं समय, स्थान और वजह । 
महाराज श्री ने कहा कि 
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।
राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...
अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।
भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

8Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के चतुर्थ दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के चतुर्थ दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

कथा के चतुर्थ दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।महाराज श्री ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि आज आपका अच्छा वक्त है तो जरूरी नहीं कि कल भी रहेगा मुर्ख है वो लोग जो बुरे समय के आने का इन्तजार करते है और कहते है की भक्ति करेंगे जब हमारा वक्त बुरा आएगा या बुढ़ापा आएगा। काल करे सो आज कर आज करे सो अब। अच्छे काम कल नहीं आज करें और बुरे काम में कभी जल्दबाजी मत करें। बुरे काम को टालें, अच्छे वक्त में इतना अच्छा काम करो की बुरा वक्त आपको परेशान न कर सके।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली ने भगवान ब्रह्मा वरदान मांगा की मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने उसे वरदान दे दिया। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने विष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली से कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।

महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"

जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"

भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का सुंदर वर्णन श्रवण कराया। सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

7Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।कथा के द्वितीय दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।कथा के द्वितीय दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
भागवत कथा के दूसरे दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि हमारे संत महात्मा जो हैं इनका जन्म, लीला भ्रमण, संसार में रहना परोपकार के लिए है। हमेशा उनके मन में एक ही भावना रहती है की जनकल्याण कैसे हो ? और उस दिव्य जनकल्याणकारी भावना के लिए वह प्रायसरत रहते हैं। उन्होंने कहा कि जो आपको सदमार्ग दिखाते हैं वहीं आपके शुभचिंतक हैं। लेकिन समाज में दुर्भाग्य यह है कि बुरे विचार देने वाले जो लोग हैं उन्हे हम अपने शुभचिंतक समझते हैं और अच्छे विचार देने वालों को हम अपना शत्रु समझते हैं। यह जो नकारात्मक भावना हमारे मन में भर गई हैं यही हमे दुख देती है। 

महाराज श्री ने कहा कि वैराग्य और ज्ञान से भक्ति पुष्ट होती है इसलिए वैराग्य और ज्ञान जरूर होना चाहिए। पहले भक्ति हो भक्ति आपको ज्ञान प्राप्त करा देगी और भक्ति ही आपको वैराग्य भी स्वयं करा देगी। लेकिन भक्ति दुनिया को दिखाने के लिए ना हो भक्ति खुद के लिए हो। 

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए। 

यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

5Oct 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के प्रथम दिवस पर महाराज जी ने भागवत कथा के महात्म का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के प्रथम दिवस पर महाराज जी ने भागवत कथा के महात्म का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया ।

भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने प्रथम दिवस की कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जिन श्राद्ध प्रक्षों में हम ये श्रीमद्भागवत कथा सुन रहे हैं यह भी अपने आप में बहुत बड़ी बात है, जिस श्रीमद्भागवत कथा को देवता नहीं सुन पाए वो भागवत कथा हमको श्रवण करने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है। जब हमारे पित्रों को ये पता चलता है की हमारे वंशज कथा सुनने जा रहे हैं इतना सुनने मात्र से हमारे पित्र खुशी से झूमने लगते हैं, खुशियां मनाते हैं की हमारे बच्चे श्रीमद्भागवत सुनने जा रहे हैं। हम जो भी सुक्रित करते हैं वो हमारे पुर्वजों तक सीधा जाता है। भगवान जब स्वयं कृपा करें तब हमे भागवत कथा सुनने का अवसर प्राप्त होता है। 

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की एक बात सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगो का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा । 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

4Oct 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 28 सितंबर से 04 अक्टूबर 2018 तक Colorado, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत एक शायरी के साथ करते हुए कहा कि आपको और हमको एक बात समझनी चाहिए की चार दिन की है जिंदगी, हंसी खुशी में काट ले, मत किसी का दिल दुखा, दर्द सब के बांट ले, कुछ नहीं है साथ जाना एक नेकी के सिवा, कर भला होगा भला ये गांठ अब तू बांध ले। उन्होंने आगे कहा कि बड़ी मुश्किल से ये मानव जीवन मिला है, कौन जानता है ईश्वर हमें यहां के बाद कहां ले जाने वाला है, अगर हमारे हाथ में होता तो हम वही करते जो हम चाहते हैं। लेकिन ये हमारे हाथ में नहीं है, अगर हमारे हाथ में अगर कुछ है तो ये है की कर भलो तो हो भला, इस बात को गांठ बांध लो कि तुम्हारा भला तब होगा जब तुम किसी का भला करोगे। यही जीवन का सार है और अपना भला करने के लिए सबसे अच्छी बात है ईश्वर का भजन, हरि का नाम, कुछ भी छूटे हरि का नाम ना छूटे । 

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

2Oct 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 28 सितंबर से 04 अक्टूबर 2018 तक Colorado, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि शास्त्रों में कहा गया है कि सबको समझना आसान है लेकिन भगवान कृष्ण को समझना बहुत मुश्किल है । उनकी लीलाएं विचित्र हैं, भगवान श्याम सुंदर का प्राक्ट्य मथुरा में कारागार में हुआ, बधाई बाजी गोकुल में, गऊएं चराई नंदगांव, बरसाने, वृंदावान, ब्रज क्षेत्र में, कुछ समय मथुरा में भी रहे, भगवान श्री कृष्ण की जीवन में इतना संघर्ष है जितना हम और आप सोच भी नहीं सकते, हम लोगों में इतनी क्षमता ही नहीं है। इसके बावजूद भी वो इतने खुश हैं की हालात कोई भी हों चैन की बंशी वो ही बजा सकते हैं। वरना थोडी सी भी परेशानी आ जाए तो इंसान बहुत हताश हो जाता है और वो भगवान हैं कंश कोई ना कोई राक्षस भेजता है बावजूद इसके उसे मारके चैन की बंसी बजाते हैं । इसका मतलब यह है की भगवान श्रीकृष्ण हमको सीखाते हैं की मुश्किलें तो आएंगी और जाएंगी लेकिन अपने आप में जो मगन रहता है, अपने आप में जो खुश रहता है उसे संसार की कोई भी मुसीबत दु:खी नहीं कर सकती । 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

29Sep 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 28 सितंबर से 04 अक्टूबर 2018 तक Colorado, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। भागवत कथा के द्वितीय की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य महाराज श्री ने कथा की शुरुवात करते हुए कहा कि अपने धर्म की अच्छाई को बढ़ाना चाहिए। कुछ तो चीज है सतयुग से लेकर द्वापर तक द्वापर से त्रेता तक, त्रेता से द्वापर से कलयुग तक हम लोग आज भी उसी के गीत गा रहे है। अपने धर्म का प्रचार प्रसार करे, अपने धर्म की रक्षा करें, ये हम लोगों का कर्तव्य है जब कलयुग हमारे सर विराज मान होता है तो निश्चित बात है हमसे अपने से बड़ो का अनादर होता ही है। हम लोग अपने माँ पाप के प्रति उतने संस्कारी नहीं रहे हैं जो हमारे संस्कार हैं।

महाराज श्री आगे कहा कि 84 लाख युनियो के सुक्रतो को एकत्रित करके एक एक सुक्रतो को एकत्रित करके उस करुणा वरुणा सागर ने आपार करुणा करके अकारण ही कृपा करके ही हमें ये मानव जीवन दिया है। ये मानव शरीर में ही ऐसा मार्ग है जहाँ से हम 84 युनियों में जाने से बच सकते हैं। परन्तु जैसे ही मानव जीवन मिलता है सत्संग छूट जाता है, संसार की व्यवस्थाओं में ही अटेचमेंट हो जाती है, भगवान से बहुत दूर हो जाते हैं। हमारे ब्रज में एक बात कहते है सबसे बड़ी संपत्ति अगर जीवन में सत्संग मिल जाये तो उससे बड़ी संपत्ति नहीं, अगर भगवान आपको सब कुछ दे और सत्संग न दे तो समझ लेना की भगवान ने हम को सबकुछ दे कर सबकुछ छीन लिया।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। 
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

30Sep 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 28 सितंबर से 04 अक्टूबर 2018 तक Colorado, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया। भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते एक शायरी के साथ की, उन्होंने कहा ऐ जिंदगी तेरे जज्बे को सलाम, पता है की मंजिल मौत है, फिर भी दौड़ रही है तू । महाराज श्री ने आगे कहा कि जो श्राप राजा को लगा वो हमको भी लगा है हफ्ते में सात ही दिन होते हैं और ना जाने कब हमारी मौत हो जाएगी, राजा को तो मालूम था की सात दिन हैं हमको तो ये भी नहीं पता की सात मिनट भी है की नहीं हमारे पास, कौन जानता है कब तक जियेंगे। 
महाराज श्री ने कहा कि हर व्यक्ति को सत्संग में जाना चाहिए, बहुत से लोग कहते हैं सत्संग में जाकर क्या मिलता है ? जो मॉर्डन शिक्षा नहीं देती वो सत्संग देती है, जो हमारे बुजुर्गों के पास पहले से था । हमारे बुजुर्ग A for Apple नहीं जानते थे लेकिन जानकार वो तीनों कालों के थे । आज हम उन ऋषि मुनियों का मजाक उड़ाते हैं, उनका उपवास उड़ाते हैं जिनके पैर की धूल के कण के बराबर नहीं हैं हम लोग। एक जगह पर बैठे बैठे बता देते थे की दूसरी जगह क्या हो रहा है ?
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।
राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...
अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।
भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

1Oct 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 28 सितंबर से 04 अक्टूबर 2018 तक Colorado, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भागवत कथा जीव के पापों को काटती है, भागवत में नरक का वर्णन है की प्राणी कौन से पाप करके कौन से नरक में जाता है। कहने को मॉर्डन एज्यूकेशन हासिल करने वाले कुछ मॉर्डन लोग ये कहते हैं की मरने के बाद किसने देखा है क्या होगा ? सही बात को सही तरीके से समझोगे तो बच जाओगे और किसी भी सही बात को आप समझना ना चाहें वहीं सबसे बड़ी गलती है। हमे ये बात समझनी चाहिए की उचित क्या है और अनुचित क्या है ? 
देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली ने भगवान ब्रह्मा वरदान मांगा की मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने उसे वरदान दे दिया। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने विष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली से कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" 
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का सुंदर वर्णन श्रवण कराया। सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

28Sep 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 28 सितंबर से 04 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple and cultural center of the Rockies 7201 S.Potomac Road Centennial, Colorado, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के प्रथम दिवस पर महाराज जी ने भागवत कथा के महात्म का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया । भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 28 सितंबर से 04 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple and cultural center of the Rockies 7201 S.Potomac Road Centennial, Colorado, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के प्रथम दिवस पर महाराज जी ने भागवत कथा के महात्म का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया ।
भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने प्रथम दिवस की कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि श्रीमद्भागवत कथा सुनने का जो महात्म है ये बहुत बड़ा महात्म है। हमारे इतिहास में श्रीमद्भागवत कथा नारायण के श्रीमुख से निकली, नारायण के मुख से निकलकर ब्रह्मा जी तक गई, ब्रह्मा जी से सनकादिक ऋषि, सनकादिक ऋषियों से नारद जी और नारद जी से वेद व्यास जी तक और फिर इसका विस्तार हुआ। ये जो भागवत है जिसके समक्ष आप बैठे हैं ये भगवान के मुख से ही निकल कर आई है, भगवान ने ही इसको हम सबके लिए इसको उपस्थित किया और भगवान ने भागवत कथा हम सब तक इसलिए पहुंचाई क्योंकि कलयुग के लोगों का कल्याण हो सके।


महाराज श्री ने तीर्थ के महत्व के बारे में बताया कि अगर आप तीर्थ में इस भावना के साथ गए हो की तीर्थ में जाने से मेरे पाप कम होंगे होंगे, अगर इस भावना के साथ आप तीर्थ में गए हो तो निश्चित है की आपके पास उस दिन तक के नष्ट हो जाएंगे, तीर्थ जाया ही इसलिए जाता है, सत्कर्म किया ही इसलिए जाता है। तीर्थ जाना चाहिए मानव जीवन मिल जाने के बाद और एक निश्चित उम्र हो जाने के बाद तीर्थ में ही वास करना चाहिए। कुछ ऐसे स्थान हैं जहां पर जीवन के अंतिम यात्रा हो जैसे काशी, काशी में अगर व्यक्ति समाप्त होता है तो मोक्ष निश्चित होगा ही, उसका पुर्नजन्म नहीं होगा। इसमें कोई शंका नहीं है की जो लोगों दूसरों के विषय में बुरा सोचते हैं, बुरी योजनाएं बनाते हैं उनके दिमाग में गोबर के सिवा कुछ नहीं होता है और जो दूसरों को सुख देने की सोचते हैं उनके दिमाग में सुगंधित पुष्प रहते हैं।
महाराज श्री ने आगे कहा कि जितनी योजना आप दूसरों को तकलीफ देने में लगाते हो, जिनता नेगेटिव सोचते हो उतना पोजिटिव सोचो तो समाज को सुख दे पाओगे, परिवार को सुख दे पाओगे औरों की तो छोड़ो उतना ही अपने आप को सुख दे पाओगे। आपके दिमाग की जो स्थिति आपका स्तर बयां करती है की आपके दिमाग में भरा क्या है, गोबर भरा है या पुष्प भरा है ?


पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की एक बात सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगो का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।


व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा । 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

29Sep 2018

पूज्य महाराज श्री द्वारा Colarrado USA में आयोजित प्रथम दिवस की कथा से पूर्व कथा स्थल Hindu Temple and cultural center of the Rockies में पूजा अर्चना कर भगवान से आशीर्वाद लिया।

पूज्य महाराज श्री द्वारा Colarrado USA में आयोजित प्रथम दिवस की कथा से पूर्व कथा स्थल Hindu Temple and cultural center of the Rockies में पूजा अर्चना कर भगवान से आशीर्वाद लिया।

 

22Sep 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 22 से 23 सितंबर तक Portland, Oregon में श्रीकृष्ण कथा का आयोजन किया गया।

 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 22 से 23 सितंबर तक Portland, Oregon में श्रीकृष्ण कथा का आयोजन किया गया। महाराज श्री ने भक्तों को श्री कृष्ण कथा का श्रवण करवाते हुए बताया की हमारी जो संस्कृत भाषा है सबसे पवित्र भाषा है और यह संस्कृति को बनाती है और कहा की हर रिश्ते की खूबसूरती ही हिंदी में है। महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण की बाल लिलाओ का भी वर्णन किया।
 
 

21Sep 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

19Sep 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

19Sep 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

18Sep 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली ने भगवान ब्रह्मा वरदान मांगा की मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने उसे वरदान दे दिया। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने विष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली से कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" 
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का सुंदर वर्णन श्रवण कराया। सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

17Sep 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते।

इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।
भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

16Sep 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।


भागवत कथा के द्वितीय की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।


देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। 
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 


।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

14Sep 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के पहले दिन महाराज जी ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के पहले दिन महाराज जी ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।
भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
भागवत कथा प्रारंभ से पूर्व प्रात:काल में मदिर परिसर से कथा स्थल तक माताओं बहनों द्वारा कलश यात्रा निकाली गई। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की एक बात सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगो का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा । 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

12Sep 2018

आप महाराज जी ने अपने 40वें जन्मदिवस के अवसर पर सुबह पूज्य माता श्री से आशीर्वाद लेकर ठा. प्रियाकांत जू जी के दर्शन किए, उसके बाद बांके बिहारी जी के दर्शन करने के बाद वृंदावन में चातुर्मास कर रहे।

आप महाराज जी ने अपने 40वें जन्मदिवस के अवसर पर सुबह पूज्य माता श्री से आशीर्वाद लेकर ठा. प्रियाकांत जू जी के दर्शन किए, उसके बाद बांके बिहारी जी के दर्शन करने के बाद वृंदावन में चातुर्मास कर रहे पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज से आशीर्वाद प्राप्त कर आगे के लिए प्रस्थान किया।

 

12Sep 2018

कल पूज्य महाराज श्री अपने पूर्व निर्धारित कथा कार्यक्रमों को करने हेतु अमेरिका के लिए प्रस्थान किया।

कल पूज्य महाराज श्री अपने पूर्व निर्धारित कथा कार्यक्रमों को करने हेतु अमेरिका के लिए प्रस्थान किया।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

8Sep 2018

आज पूज्य पिताजी की प्रथम पुण्यतिथि पर महाराज श्री ने पूज्य पिताजी की प्रतिमा स्थापित कर ब्राह्मणो को भोजन प्रसाद ग्रहण कराया।।

आज पूज्य पिताजी की प्रथम पुण्यतिथि पर महाराज श्री ने पूज्य पिताजी की प्रतिमा स्थापित कर ब्राह्मणो को भोजन प्रसाद ग्रहण कराया।।

 

3Sep 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 03 सितंबर 2018 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का ठा. प्रियाकांत जू मंदिर, शांति सेवा धाम, वृंदावन में भव्य आयोजन किया गया। महोत्सव की शुरूआत महाराज श्री द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ की गई। कथा पंडाल में हजारों की संख्या में आए भक्तो ने रंगारंग कार्यक्रमों के बीच कन्हैया के आने की खुशियां मनाई।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 03 सितंबर 2018 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का ठा. प्रियाकांत जू मंदिर, शांति सेवा धाम, वृंदावन में भव्य आयोजन किया गया। महोत्सव की शुरूआत महाराज श्री द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ की गई। कथा पंडाल में हजारों की संख्या में आए भक्तो ने रंगारंग कार्यक्रमों के बीच कन्हैया के आने की खुशियां मनाई। देश के कोने कोने से आए कलाकारों ने नृत्य नाटिकाओं के माध्यम से कन्हैया के अलग अलग रूपों को पेश किया। पूज्य महाराज श्री के मुखाबिंद से निकले कृष्ण भजनों पर भक्त खूब झूमे और कृष्ण के जन्म की खुशियां मनाई। रंगारंग रोशनी में चमक रहे ठा. प्रियाकांत जू मंदिर की भव्यता भी मन मोह रही थी। रात 12 बजते ही प्रभु श्री कृष्ण का जन्म होते ही समूचा परिसर श्री कृष्ण के जयकारों से गूंज उठा। पूज्य महाराज श्री द्वारा ठा. प्रियाकांत जू मंदिर में बाल गोपाल का अभिषेक किया गया और 108 श्रीमद्भावत कथा के समस्त यजमानों के द्वारा भी बाल गोपाल का मंत्रोचारण के साथ अभिषेक किया गया एवं जन्माष्टमी आयोजन में उपस्थित सभी कृष्ण भक्तों के द्वारा महाआरती की गई। पूज्य महाराज श्री के साथ देर रात तक चले भजनों में हर कोई उल्लास में डूबा रहा।