Program Shedule

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 30 मार्च से 05 अप्रैल 2018 तक Sri Mandir, Cumberland Road, Auburn, NSW, Sydney (Australia) में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरूआत विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत भागवत के प्रथम श्लोक उच्चारण के साथ की सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे! तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नम: !! महाराज श्री ने कहा सच्चिदानंद का काम है श्रृष्टि की रचना करना, पालन भी वहीं करते हैं, रचना भी वही करते हैं और वक्त गुजर जाने पर संहार भी वहीं करते हैं। जो पालन, सृजन और संहार के इक्लौते कारण हैं ऐसे सच्चिदानंद परमात्मा को हम कोटि कोटि नमन करते हैं।

महाराज श्री ने कहा कि श्रीमद् भागवत कोई साधारण ग्रंथ नहीं है। यह ग्रंथ प्रभु से निकला है, सर्वप्रथम नारायण, नारायण से ब्रह्मा, ब्रह्मा जी से नारद जी, नारद जी से वेद व्यास जी, वेद व्यास जी से शुकदेव जी उसके बाद आगे बढ़ा है। महाराज श्री ने कहा जिसके करोड़ो करोड़ो जन्मों के पुण्य एकत्रित हो वो व्यक्ति भागवत समपूर्ण सुन पाता है। जैसे ही जीव के मन में यह भावना आती है कि मुझे भागवत सुनना है भगवान उसी वक्त उसके ह्रदय में कैद हो जाते हैं। यह कथा देवताओं को नसीब नहीं हुई लेकिन हमें नसीब हुई है। 
महाराज श्री ने कहा कि शास्त्रों में लिखा है जो व्यास जी हमें कथा सुनाते हैं वो साक्षात भगवान होते हैं क्योंकि भगवान की चर्चा भगवान के अलावा कोई कर ही नहीं सकता है। जब शुकदेव जी कथा सुना रहे थे तो उस वक्त शुकदेव जी को श्रीकृष्ण कहा गया, वो इसलिए कहा गया क्योंकि कृष्ण के अलावा कृष्ण को कोई गा ही नहीं सकता। ये भागवत आपको गोपी बना देती है, कृष्ण का दिवाना बना देती है। 
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि नेमिषासरणय में 88 हजार सनकादिक ऋषि विराजमान हैं और सभी ऋषियों के बीच में एक ही बात पर विचार हो रहा है की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? जितने भी ग्रंथ हुए है, पुराण हुए हैं सभी में एक ही बात की चर्चा हुई है, कलयुग के लोगों की चर्चा हुई है। क्योंकि वो जानते हैं की कलयुग के लोग ही ऐसे है जो कहते हैं हमे भगवान पर, धर्म पर विश्वास नहीं है। कलयुग का व्यक्ति स्वाभाविक तौर पर पापी होता है तो ऋषियों ने कहा महाराज कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा, इनके पास समय का अभाव है। इसके अलावा ओर प्रशन किए कि भगवान अगर सर्वसामर्थयवान है तो उसे अवतार लेने की क्या जरुरत है ? एक ओर प्रशन है कि भगवान के अवतार हुए तो कितने हुए ? एक ओर प्रशन है कि भगवान श्रीकृष्ण जब पृथ्वी छोड़ कर गए तो धर्म किसकी शरण में गया ? 


महाराज श्री ने कथा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि शूद जी महाराज कहते हैं सनाकदिक मुनियों से कहा हे ऋषियों तुम धन्य हो जो तुमने जन कल्याण के लिए प्रशन किया है। शूद जी महाराज ने कहा जीन लोगों को कल काल में अपना कल्याण करना हो उन लोगों को श्रीमद् भागवत कथा सुननी चाहिए। जिन लोगों को बार बार जन्म नहीं लेना, बार बार मरना नहीं है, जिन्हें मोक्ष चाहिए उन्हें भागवत कथा सुननी चाहिए। ऋषियों ने कहा कि हे प्रभु ये भागवत सुनने से क्या किसी का कल्याण हुआ है इसका महात्यम क्या है ? शूद जी महाराज ने कथा का महात्यम सुनाते हुए कहा कि एक आत्म देव नाम के ब्राह्मण थे, भगवत भजन करते थे गाने वाले, वेद पाठी ब्राह्मण थे, उनकी पत्नी का नाम धूंधली था जो उनकी उलट थी, पति की बात नहीं मानती थी। वो बहुत दुखी थे बच्चे भी नहीं थे, गाय लाते थे तो दूध नहीं देती थी, वृक्ष लगाता हूं तो फल नहीं देता, कुछ भी काम बनने से पहले बिगड़ जाता था, अपने दुखों को देखकर उन्हे आत्मदाह का विचार आया। जब वह आत्मदाह के लिए जाने लगे तो एक ब्राह्मण वहां से गुजरे उन्होंने आत्मदेव की पूछा की तुम्हारे दुखों का कारण क्या है, तो उन्होंने कहा कि मेरा कोई पुत्र नहीं है इसलिए मैं दुखी हूं, मेरा कुछ भी काम नहीं बनता है, मैं रोज भगवान की पूजा पाठ करता हूं फिर भी मुझे इतना दुख दे रहे है, मुझसे अब यह सब बर्दाशत नहीं होता है। संत बोले चलो मैं तुम्हे बताता हूं, संत ने आत्मदेव का हाथ देखा तो पता चला कि उनके सात आगे और सात पीछे जन्म तक कोई संतान नहीं है। तो संत ने बात को घूमाते हुए पूछा की बताओ तुमहे संतान क्यों चाहिए। आत्मदेव बोले इसकी तीन वजह हैं पहली वो मेरा वंश बढ़ाएगा, दूसरा बुढ़ापे में मेरी सेवा करेगा और तीसरा मेरे बुढ़ापे का सहारा बनेगा। आत्मदेव की बाते सुनकर संत ने दया करते हुए उन्हें फल दिया और कहा की ये अपनी पत्नी को खिला देना, आत्मदेव वो फल लेकर आए और अपनी पत्नी को कहा कि ये फल खा लेना लेकिन तभी उनकी बहन आ गई ओर उसने बोल की ये फल मत खाना पता नहीं संत ने इसमें कुछ मिला दिया हो तो, तू इस फल को गाय को खिला दे इसकी भी तो संतान नहीं हो रही है और मैं गर्भ से हूं जो भी संतान होगी मैं तुझे लाकर दे दूंगी तू अपने पति को कह देना यही हूई है। आत्मदेव की पत्नी गर्भवती होने का नाटक करने लगी और उन्हें तीर्थ पर भेज दिया। जब उसकी बहन का पुत्र हुआ तो उसका नाम रख दिया धूंधकारी और गाय को जो फल खिलाया था उससे भी एक पुत्र हुआ लेकिन उसके कान गऊ जैसे थे तो उसका नाम रखा गऊकर्ण। संत के दिए फल का असर है की गऊकर्ण संस्कारी हुआ और धूंधकारी महाखल हुआ। धूंधकारी की दुष्टता देखकर आत्मदेव रोने लगे ओर कहने लगे की इससे तो मैं पहले ही अच्छा था जो मेरे घर में पुत्र नहीं था। धूंधकारी दिन प्रतिदिन बिगड़ता चला गया, वेश्यावृति करने लगा, मदिरापान करने लगा, अपनी मां को पीटने लगा। जब धूंधली को पीटा तो उसे लगा की जो मैने अपने पति की बात नहीं मानी ये उसका दुष्परिणाम है, अगर मैने अपने पति की बात मान ली होती तो ये दिन नहीं देखना पड़ता, मेरा पुत्र गऊकर्ण होता धूंधकारी नहीं होता, ये सोचकर उन्होंने भी कुएं में कूदकर खुदकुशी कर ली। गऊकर्ण भी तीर्थ पर निकल पड़े। धूंधकारी ने देखा की अब तो कोई भी नहीं है तो वो ओर बिगड़ गया उसने 4-5 गर्णिकाओं को अपने साथ रख लिया लेकिन ऐसे बुरे लोगों से तो बुरे लोग भी दुखी हो जाते हैं तो एक दिन उन्होंने धूंधकारी को चारपाई से बांध दिया और जलती हुई लकड़ी लेकर उसे पीटने लगी। वो चीखने लगा उसकी चीखे सब ने सुनी लेकिन बचाने कोई नहीं गया। पीटने से वो मर गया और प्रेत बन गया। जब गऊकर्ण को पता चला की मेरा भाई प्रेत बन गया है तो उन्होंने सूर्यनारायण से पूछा के मैं अपने भाई के कल्याण के लिए क्या करू तो सूर्य नारायण भगवान ने कहा कि श्रीमद् भागवत कथा उन्हें सुनाओ। तो जब भागवत कथा शुरू होने वाली थी तो धूंधकारी का प्रेत एक बांस में आकर बैठ गया, तो सांतवे दिन उस बांस के दो भाग हो गए और आकाश से धूंधकारी को लेने के लिए आकाश के विमान आया, जब देवदूत धूंधकारी को ले जाने लगे तो गऊकर्ण ने पूछा कि कथा तो हम सब ने सूनी है तो तुम एक को ही क्यों ले जा रहे हो, जब कथा सब ने एक समान सुनी है तो फल भी तो एक समान मिलना चाहिए सभी को। तो देवदूतों ने कहा कि कथा तो सबने सुनी है लेकिन श्रवण भेद है। कोई जिसने जिस इच्छा को लेकर कथा सुनी है उसकी वहीं इच्छा पूरी हुई है। धूंधकारी ने भागवत मुक्ति के लिए सुनी है इसलिए इसकी मुक्ति हुई है। धन्य है ये भागवत ग्रंथ जिसको सुनकर प्रेत का भी कल्याण हो गया।


।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

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आपकी हर सुबह सूहानी हो। आपका हर दिन शुभ हो।। अब आपको रोज नित्य सुबह प्रियकांत जू भगवान का संदेश मिलेगा आपके फोन पर। जिसे स्वयं पूज्य महाराज श्री भेजेंगे आपको पूज्य श्री महाराज का सन्देश प्राप्त करने के लिए आप ये नंबर सेव कर लिजिए और आपको सन्देश प्राप्त हो उसके लिए आप अपना नंबर, नाम, शहर का पता, ईमेल आईडी सहित भेज दीजिये।

श्री प्रियाकांतजू भगवान जी की संध्या आरती के लाइव दर्शन करें

जिनके दर्शन मात्र से हो जाता है सभी दुखों का नाश, मिट जाते है सभी कष्ट, ऐसे हैं भगवान श्री प्रियाकांतजू। अपने नेत्रों से हृदय में उतारें कष्ट हरने वाले श्री प्रियाकांतजू भगवान जी की संध्या आरती के लाइव दर्शन करें, आप सभी भक्त प्रियाकांतजू भगवान के दर्शन फेसबुक के पेज पर देख सकते है। यह आप आज से यानि 9.4.2016 से शाम को 7:30 बजे देख सकते है।

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