Program Shedule

Live News

14Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 12 अक्टूबर से 18 अक्टूबर 2018 तक Sri Krishna cultural Centre 13356 Apple Valley rd, Apple Valley, California में श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने राम कथा का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया और प्रभु की दूसरी भक्ति के बारे में बताया।

राम कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुवात करते हुए कहा कि तुलसीदास जी ने लिखा है की जो दुष्ट प्रवर्ति के लोग वह यहाँ कथा सुनने नहीं आते है। तो फिर यहां कौन आते है "राम कृपा बिन सुलभ न सोये " जिनके ऊपर भगवान की कृपा होगी वही यहाँ आ सकते है। 
बिनु सत्संग विवेक न होई। रामकृपा बिनु सुलभ न सोई।। भगवान की कथा, सत्संग राम की कृपा के बिना सुलभ नहीं हो सकता। 
महाराज जी ने कहा की जीवन भर बात याद रखो अच्छी बात कोई कहे मान लो बुरी बात कोई कहे किसी की भी मत मानो। कथा सुनने से मिलता क्या है ? कथा सुनने वाले ही जानते है की कथा से क्या मिलता है। जिन्होंने कभी कथा सुनी न हो उन्हें क्या मतलब पड़ा है। राम कथा के सबसे बड़े श्रोता कौन है ? स्वयं भोले नाथ। स्वयं शंकर भगवान वो खुद भी कथा कहते भी है जब कोई जिज्ञासु आता है तो भगवान श्री राम की कथा कहते है और जब मन करता है तो कैलाश पर्वत का त्याग करके संत महात्माओं के आश्रमों में चले जाते है। जो स्वयं महादेव हो उनको कथा सुनने की क्या जरुरत है। वैष्णवों में सर्वश्रेष्ठ अगर कोई है तो वह बाबा भोले नाथ है।

पूज्य महाराज श्री ने कहा की भगवान श्री राम की ये पावन कथा जीवन के सारे द्वंदों को दूर करती है और सही मायनो में कहा जाए तो भगवान की कथा ही है जो मानव को मानव बनाती है। जिन्होंने श्री राम कथा को थोडा भी अपने जीवन में उतार लिया है तो उसका कल्याण होना निश्चित है।

पूज्य महाराज श्री ने कहा की भगवान की दूसरी भक्ति है भगवान की कथा सुनना। इसका असर ये होता है की पहले तो ये कथा सुनने वालो को संसार की वस्तुएं मिलने लगती हैं और लगातार सुनने से संसार की वस्तुओं को पाने की इच्छा नहीं होती बल्कि इच्छा बड़ी होकर भगवान से मिलने की इच्छा जगा जाती है। भगवान की कथा सुनने के लिए जिगयासा जागनी चाहिए।

13Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 12 अक्टूबर से 18 अक्टूबर 2018 तक Sri Krishna cultural Centre 13356 Apple Valley rd, Apple Valley, California में श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने राम कथा का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 12 अक्टूबर से 18 अक्टूबर 2018 तक Sri Krishna cultural Centre 13356 Apple Valley rd, Apple Valley, California में श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने राम कथा का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया ।

राम कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने प्रथम दिवस की कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि हमारे जीवन में तमाम ऐसी परिस्थितियां होती है, हम ऐसी लड़ाई लड़ते हैं जिस लड़ाई का हमे पता नहीं होती है की अंत क्या है ? लेकिन आप अपने मन से पूछ लिजिए की जहां सत्य है वहां विजय है क्योंकि परमात्मा सत्य स्वरूप है, जहां सत्य होता है वहां विजय होती है। 
महाराज श्री ने आगे कहा कि कहा जाता है कि राम जी रावण से युद्ध में इसलिए जीत गए क्योंकि उनके साथ उनका भाई था और रावण इसलिए हार गया क्योंकि उसके भाई ने उसका साथ छोड़ दिया। आप अपने परिवार को अपने साथ रखते हैं तो आपकी जीत होती है। रावण जैसा पराक्रमी हार गया क्योंकि भाई साथ में नहीं था लेकिन आजकल भाई भाई में बनती नहीं है, बात बात पर लड़ाई होती है। इसिलिए जीवन भी और ज्यादा कठिन परिस्थितियों में घिर जाता है। भगवान श्री राम सिखाते हैं अगर तुम जीवन में सीखना चाहते हो तो सबसे पहले एक शर्त है की अपने भाईयों को अपने साथ में लेकर चलो, अपने समाज को साथ लेकर चलो, सत्य को साथ लेकर चलो, धर्म को अपने साथ मे लेकर चलो अगर धर्म साथ होगा तो तुम्हारी विजय होगी।
महाराज श्री ने कहा कि जीवन में भगवत कृपा बेहद जरूरी है “ जापर कृपा राम की होई तापर कृपा करें सब कोई” यानि जिसपर भगवान की कृपा है उसपर सब कृपा करते हैं । 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि आपको सबको पता है की रामचरित्र मानस तुलसीदास ने लिखि और बाल्मिकी रामायण ऋषि बाल्मिकी ने लिखी लेकिन यह बात आप नहीं जानते होगे की बाल्मिकी रामायण राम जी के आने से पहले लिख दी गई थी । हमारे संत कितने त्रिकाल दर्शी हैं की भगवान आकर क्या करेंगे यह बाल्मिकी रामायण में पहले ही लिखकर चले गए। कलयुग में भगवान का कल्कि अवतार होगा वेद व्यास जी ने भागवत में पहले ही लिख दिया और हम उन ऋषि मुनियों की बातों पर यकीन नहीं करते। ऐसे संत जो भगवान के आने से पहले भगवान की कथा लिख दे और वो हो तो उन ऋषियों के चरणों में लूट जाने को मन करता है। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

12Oct 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए ये मां बाप की जिम्मेदारी है, हम अपने बच्चों को कैसे संस्कार दे रहे हैं। सिर्फ बच्चे हो जाएं, वो पढ़ लिख जाएं, जो सही मायने में मानव ना हों क्योंकि जो सिर्फ अपने बारे में सोचता है और यह जीवन व्यतित कर देता है उसको कहा जाएगा तो मतलबी कहा जाएगा वो ढ़ग का मानव नहीं है। मानव किसे कहते है ? मानव तो सब हैं लेकिन मानवता किस किस में है ? अगर इंसान होकर इंसानियत ना हो तो उससे कोई फायदा नहीं है। आप अगर किसी के भले की ना सोच सकें, किसी के भले के बारे में ना सोच सकें, धर्म का हित ना कर सकें, अपना आत्म कल्याण ना कर सकें तो फिर ऐसा जीवन मिलने से लाभ भी क्या ? और ऐसा जीवन व्यतित करने से भी लाभ नहीं है। हम सब मानव जीवन में आए हैं तो अपने बच्चों को संस्कार देना बहुत जरूरी है।
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 
श्रीमद्भागवत कथा, सप्तम दिवस, Chicago USA.
23 Photos

12Oct 2018

पूज्य महाराज श्री ने शिकागो में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के बाद कैलिफोर्निया के लिए प्रस्थान किया जहां 12 अक्टूबर से 18 अक्टूबर तक Shri Krishna Ccultural Centre 13356 Apple Valley Rd., Apple Valley, CA- 92308 में श्री राम कथा का आयोजन किया जाएगा।

पूज्य महाराज श्री ने शिकागो में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के बाद कैलिफोर्निया के लिए प्रस्थान किया जहां 12 अक्टूबर से 18 अक्टूबर तक Shri Krishna Ccultural Centre 13356 Apple Valley Rd., Apple Valley, CA- 92308 में श्री राम कथा का आयोजन किया जाएगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

9Oct 2018

ज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि पति समझदार हो तो मकान जल्द बन जाता है और पत्नी समझदार हो तो बहुत जल्दी घर बन जाता है और बच्चे अगर समझदार हो तो घर ही स्वर्ग बन जाता है । यह सब समझदारी आती कहां से है ? यह सब समझदारी आती है धर्म से। आपके धर्मज्ञ लोग ही ये सारी चीजे बताते हैं और सिर्फ सुनने भर से काम नहीं चलता है, इसे अपने जीवन में उतारना पड़ता है। 
महाराज श्री ने आगे कहा कि आज हमारे पास सारी सुविधाएं उपलब्ध है लेकिन क्या जीवन में शांति है ? हमारे पास पहले के जमाने से ज्यादा अच्छी सड़के हैं, अच्छे मकान हैं, सारी सुविधाएं हैं लेकिन मन अशांत है आखिर क्यों ? वो इसलिए है क्योंकि संस्कारों की कमी है, हमने उन लोगों की नकल की जो साधन युक्त तो हैं लेकिन साधना युक्त नहीं हैं और साधन सुख नहीं दे सकते, साधना ही सुख दे सकती है। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

10Oct 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान ने हमे दो सॉफ्टवेयर दिए हैं एक है दिन और दूसरा दिमाग । दिल, दिमाग देने के बाद परमात्मा ने उसका उपयोग भी बताया है। प्रभु ने बताया की दिमाग का इस्तेमाल दुनिया के लिए करना और दिल का इस्तेमाल मेरे लिए करना, हमने ये बात मान ली और चले आए लेकिन जरा ध्यान से सोचिए क्या आपने उसका इस्तेमाल वैसे ही किया जैसा भगवान ने कहा ? हमने उसका उलट कर दिया, हमने दिमाग तो इस्तेमाल किया भगवान के लिए और दिल इस्तेमाल किया दुनिया के लिए । लोग कहते हैं की हमारा दिल टूट गया है, दिल के हजार टूकड़े हो गए हैं, आपसे किसने कहा था दिल का उपयोग करो, भगवान ने कहा था क्या दिल का उपयोग दुनिया के लिए करो ? भगवान ने जो कहा था आपने उससे उलटा किया। ये दुनिया दिल से नही चलती हैं, दुनिया दिमाग से चलती है, आप दिल को सिर्फ यहां फसा रहे हो। दिल का रिश्ता हमेशा भगवान के साथ होना चाहिए क्योंकि जब आप दिल से भगवान से जुड जाते हो तो उसे पता होता है की दिल कहां है। 
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

7Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि यह कटू सत्य है चाहे कोई इसे माने या ना माने, इस जीवन में कुछ भी निश्चित नहीं है, अगर इस संसार में जीवन में कुछ चीज निश्चित है तो उसका नाम हैं मृत्यु। अनिश्चित्ताओं के लिए अनेकों काम करते हैं हम और आप लेकिन जो निश्चिक है उसके बारे में कुछ नहीं सोचते हैं। जब हमारा जन्म भी नहीं हुआ उससे पहले हमारी मृत्यु निर्धारित है। मृत्यु जब आती है तो उसके लिए तीन चीजें निर्धारित रहती हैं समय, स्थान और वजह । 
महाराज श्री ने कहा कि 
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।
राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...
अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।
भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

8Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के चतुर्थ दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के चतुर्थ दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

कथा के चतुर्थ दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।महाराज श्री ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि आज आपका अच्छा वक्त है तो जरूरी नहीं कि कल भी रहेगा मुर्ख है वो लोग जो बुरे समय के आने का इन्तजार करते है और कहते है की भक्ति करेंगे जब हमारा वक्त बुरा आएगा या बुढ़ापा आएगा। काल करे सो आज कर आज करे सो अब। अच्छे काम कल नहीं आज करें और बुरे काम में कभी जल्दबाजी मत करें। बुरे काम को टालें, अच्छे वक्त में इतना अच्छा काम करो की बुरा वक्त आपको परेशान न कर सके।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली ने भगवान ब्रह्मा वरदान मांगा की मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने उसे वरदान दे दिया। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने विष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली से कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।

महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"

जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"

भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का सुंदर वर्णन श्रवण कराया। सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

7Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।कथा के द्वितीय दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।कथा के द्वितीय दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
भागवत कथा के दूसरे दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि हमारे संत महात्मा जो हैं इनका जन्म, लीला भ्रमण, संसार में रहना परोपकार के लिए है। हमेशा उनके मन में एक ही भावना रहती है की जनकल्याण कैसे हो ? और उस दिव्य जनकल्याणकारी भावना के लिए वह प्रायसरत रहते हैं। उन्होंने कहा कि जो आपको सदमार्ग दिखाते हैं वहीं आपके शुभचिंतक हैं। लेकिन समाज में दुर्भाग्य यह है कि बुरे विचार देने वाले जो लोग हैं उन्हे हम अपने शुभचिंतक समझते हैं और अच्छे विचार देने वालों को हम अपना शत्रु समझते हैं। यह जो नकारात्मक भावना हमारे मन में भर गई हैं यही हमे दुख देती है। 

महाराज श्री ने कहा कि वैराग्य और ज्ञान से भक्ति पुष्ट होती है इसलिए वैराग्य और ज्ञान जरूर होना चाहिए। पहले भक्ति हो भक्ति आपको ज्ञान प्राप्त करा देगी और भक्ति ही आपको वैराग्य भी स्वयं करा देगी। लेकिन भक्ति दुनिया को दिखाने के लिए ना हो भक्ति खुद के लिए हो। 

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए। 

यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

5Oct 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के प्रथम दिवस पर महाराज जी ने भागवत कथा के महात्म का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के प्रथम दिवस पर महाराज जी ने भागवत कथा के महात्म का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया ।

भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने प्रथम दिवस की कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जिन श्राद्ध प्रक्षों में हम ये श्रीमद्भागवत कथा सुन रहे हैं यह भी अपने आप में बहुत बड़ी बात है, जिस श्रीमद्भागवत कथा को देवता नहीं सुन पाए वो भागवत कथा हमको श्रवण करने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है। जब हमारे पित्रों को ये पता चलता है की हमारे वंशज कथा सुनने जा रहे हैं इतना सुनने मात्र से हमारे पित्र खुशी से झूमने लगते हैं, खुशियां मनाते हैं की हमारे बच्चे श्रीमद्भागवत सुनने जा रहे हैं। हम जो भी सुक्रित करते हैं वो हमारे पुर्वजों तक सीधा जाता है। भगवान जब स्वयं कृपा करें तब हमे भागवत कथा सुनने का अवसर प्राप्त होता है। 

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की एक बात सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगो का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा । 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

4Oct 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 28 सितंबर से 04 अक्टूबर 2018 तक Colorado, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत एक शायरी के साथ करते हुए कहा कि आपको और हमको एक बात समझनी चाहिए की चार दिन की है जिंदगी, हंसी खुशी में काट ले, मत किसी का दिल दुखा, दर्द सब के बांट ले, कुछ नहीं है साथ जाना एक नेकी के सिवा, कर भला होगा भला ये गांठ अब तू बांध ले। उन्होंने आगे कहा कि बड़ी मुश्किल से ये मानव जीवन मिला है, कौन जानता है ईश्वर हमें यहां के बाद कहां ले जाने वाला है, अगर हमारे हाथ में होता तो हम वही करते जो हम चाहते हैं। लेकिन ये हमारे हाथ में नहीं है, अगर हमारे हाथ में अगर कुछ है तो ये है की कर भलो तो हो भला, इस बात को गांठ बांध लो कि तुम्हारा भला तब होगा जब तुम किसी का भला करोगे। यही जीवन का सार है और अपना भला करने के लिए सबसे अच्छी बात है ईश्वर का भजन, हरि का नाम, कुछ भी छूटे हरि का नाम ना छूटे । 

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

2Oct 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 28 सितंबर से 04 अक्टूबर 2018 तक Colorado, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि शास्त्रों में कहा गया है कि सबको समझना आसान है लेकिन भगवान कृष्ण को समझना बहुत मुश्किल है । उनकी लीलाएं विचित्र हैं, भगवान श्याम सुंदर का प्राक्ट्य मथुरा में कारागार में हुआ, बधाई बाजी गोकुल में, गऊएं चराई नंदगांव, बरसाने, वृंदावान, ब्रज क्षेत्र में, कुछ समय मथुरा में भी रहे, भगवान श्री कृष्ण की जीवन में इतना संघर्ष है जितना हम और आप सोच भी नहीं सकते, हम लोगों में इतनी क्षमता ही नहीं है। इसके बावजूद भी वो इतने खुश हैं की हालात कोई भी हों चैन की बंशी वो ही बजा सकते हैं। वरना थोडी सी भी परेशानी आ जाए तो इंसान बहुत हताश हो जाता है और वो भगवान हैं कंश कोई ना कोई राक्षस भेजता है बावजूद इसके उसे मारके चैन की बंसी बजाते हैं । इसका मतलब यह है की भगवान श्रीकृष्ण हमको सीखाते हैं की मुश्किलें तो आएंगी और जाएंगी लेकिन अपने आप में जो मगन रहता है, अपने आप में जो खुश रहता है उसे संसार की कोई भी मुसीबत दु:खी नहीं कर सकती । 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

29Sep 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 28 सितंबर से 04 अक्टूबर 2018 तक Colorado, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। भागवत कथा के द्वितीय की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य महाराज श्री ने कथा की शुरुवात करते हुए कहा कि अपने धर्म की अच्छाई को बढ़ाना चाहिए। कुछ तो चीज है सतयुग से लेकर द्वापर तक द्वापर से त्रेता तक, त्रेता से द्वापर से कलयुग तक हम लोग आज भी उसी के गीत गा रहे है। अपने धर्म का प्रचार प्रसार करे, अपने धर्म की रक्षा करें, ये हम लोगों का कर्तव्य है जब कलयुग हमारे सर विराज मान होता है तो निश्चित बात है हमसे अपने से बड़ो का अनादर होता ही है। हम लोग अपने माँ पाप के प्रति उतने संस्कारी नहीं रहे हैं जो हमारे संस्कार हैं।

महाराज श्री आगे कहा कि 84 लाख युनियो के सुक्रतो को एकत्रित करके एक एक सुक्रतो को एकत्रित करके उस करुणा वरुणा सागर ने आपार करुणा करके अकारण ही कृपा करके ही हमें ये मानव जीवन दिया है। ये मानव शरीर में ही ऐसा मार्ग है जहाँ से हम 84 युनियों में जाने से बच सकते हैं। परन्तु जैसे ही मानव जीवन मिलता है सत्संग छूट जाता है, संसार की व्यवस्थाओं में ही अटेचमेंट हो जाती है, भगवान से बहुत दूर हो जाते हैं। हमारे ब्रज में एक बात कहते है सबसे बड़ी संपत्ति अगर जीवन में सत्संग मिल जाये तो उससे बड़ी संपत्ति नहीं, अगर भगवान आपको सब कुछ दे और सत्संग न दे तो समझ लेना की भगवान ने हम को सबकुछ दे कर सबकुछ छीन लिया।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। 
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

30Sep 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 28 सितंबर से 04 अक्टूबर 2018 तक Colorado, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया। भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते एक शायरी के साथ की, उन्होंने कहा ऐ जिंदगी तेरे जज्बे को सलाम, पता है की मंजिल मौत है, फिर भी दौड़ रही है तू । महाराज श्री ने आगे कहा कि जो श्राप राजा को लगा वो हमको भी लगा है हफ्ते में सात ही दिन होते हैं और ना जाने कब हमारी मौत हो जाएगी, राजा को तो मालूम था की सात दिन हैं हमको तो ये भी नहीं पता की सात मिनट भी है की नहीं हमारे पास, कौन जानता है कब तक जियेंगे। 
महाराज श्री ने कहा कि हर व्यक्ति को सत्संग में जाना चाहिए, बहुत से लोग कहते हैं सत्संग में जाकर क्या मिलता है ? जो मॉर्डन शिक्षा नहीं देती वो सत्संग देती है, जो हमारे बुजुर्गों के पास पहले से था । हमारे बुजुर्ग A for Apple नहीं जानते थे लेकिन जानकार वो तीनों कालों के थे । आज हम उन ऋषि मुनियों का मजाक उड़ाते हैं, उनका उपवास उड़ाते हैं जिनके पैर की धूल के कण के बराबर नहीं हैं हम लोग। एक जगह पर बैठे बैठे बता देते थे की दूसरी जगह क्या हो रहा है ?
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।
राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...
अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।
भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

1Oct 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 28 सितंबर से 04 अक्टूबर 2018 तक Colorado, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भागवत कथा जीव के पापों को काटती है, भागवत में नरक का वर्णन है की प्राणी कौन से पाप करके कौन से नरक में जाता है। कहने को मॉर्डन एज्यूकेशन हासिल करने वाले कुछ मॉर्डन लोग ये कहते हैं की मरने के बाद किसने देखा है क्या होगा ? सही बात को सही तरीके से समझोगे तो बच जाओगे और किसी भी सही बात को आप समझना ना चाहें वहीं सबसे बड़ी गलती है। हमे ये बात समझनी चाहिए की उचित क्या है और अनुचित क्या है ? 
देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली ने भगवान ब्रह्मा वरदान मांगा की मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने उसे वरदान दे दिया। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने विष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली से कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" 
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का सुंदर वर्णन श्रवण कराया। सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

28Sep 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 28 सितंबर से 04 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple and cultural center of the Rockies 7201 S.Potomac Road Centennial, Colorado, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के प्रथम दिवस पर महाराज जी ने भागवत कथा के महात्म का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया । भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 28 सितंबर से 04 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple and cultural center of the Rockies 7201 S.Potomac Road Centennial, Colorado, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के प्रथम दिवस पर महाराज जी ने भागवत कथा के महात्म का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया ।
भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने प्रथम दिवस की कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि श्रीमद्भागवत कथा सुनने का जो महात्म है ये बहुत बड़ा महात्म है। हमारे इतिहास में श्रीमद्भागवत कथा नारायण के श्रीमुख से निकली, नारायण के मुख से निकलकर ब्रह्मा जी तक गई, ब्रह्मा जी से सनकादिक ऋषि, सनकादिक ऋषियों से नारद जी और नारद जी से वेद व्यास जी तक और फिर इसका विस्तार हुआ। ये जो भागवत है जिसके समक्ष आप बैठे हैं ये भगवान के मुख से ही निकल कर आई है, भगवान ने ही इसको हम सबके लिए इसको उपस्थित किया और भगवान ने भागवत कथा हम सब तक इसलिए पहुंचाई क्योंकि कलयुग के लोगों का कल्याण हो सके।


महाराज श्री ने तीर्थ के महत्व के बारे में बताया कि अगर आप तीर्थ में इस भावना के साथ गए हो की तीर्थ में जाने से मेरे पाप कम होंगे होंगे, अगर इस भावना के साथ आप तीर्थ में गए हो तो निश्चित है की आपके पास उस दिन तक के नष्ट हो जाएंगे, तीर्थ जाया ही इसलिए जाता है, सत्कर्म किया ही इसलिए जाता है। तीर्थ जाना चाहिए मानव जीवन मिल जाने के बाद और एक निश्चित उम्र हो जाने के बाद तीर्थ में ही वास करना चाहिए। कुछ ऐसे स्थान हैं जहां पर जीवन के अंतिम यात्रा हो जैसे काशी, काशी में अगर व्यक्ति समाप्त होता है तो मोक्ष निश्चित होगा ही, उसका पुर्नजन्म नहीं होगा। इसमें कोई शंका नहीं है की जो लोगों दूसरों के विषय में बुरा सोचते हैं, बुरी योजनाएं बनाते हैं उनके दिमाग में गोबर के सिवा कुछ नहीं होता है और जो दूसरों को सुख देने की सोचते हैं उनके दिमाग में सुगंधित पुष्प रहते हैं।
महाराज श्री ने आगे कहा कि जितनी योजना आप दूसरों को तकलीफ देने में लगाते हो, जिनता नेगेटिव सोचते हो उतना पोजिटिव सोचो तो समाज को सुख दे पाओगे, परिवार को सुख दे पाओगे औरों की तो छोड़ो उतना ही अपने आप को सुख दे पाओगे। आपके दिमाग की जो स्थिति आपका स्तर बयां करती है की आपके दिमाग में भरा क्या है, गोबर भरा है या पुष्प भरा है ?


पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की एक बात सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगो का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।


व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा । 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

29Sep 2018

पूज्य महाराज श्री द्वारा Colarrado USA में आयोजित प्रथम दिवस की कथा से पूर्व कथा स्थल Hindu Temple and cultural center of the Rockies में पूजा अर्चना कर भगवान से आशीर्वाद लिया।

पूज्य महाराज श्री द्वारा Colarrado USA में आयोजित प्रथम दिवस की कथा से पूर्व कथा स्थल Hindu Temple and cultural center of the Rockies में पूजा अर्चना कर भगवान से आशीर्वाद लिया।

 

22Sep 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 22 से 23 सितंबर तक Portland, Oregon में श्रीकृष्ण कथा का आयोजन किया गया।

 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 22 से 23 सितंबर तक Portland, Oregon में श्रीकृष्ण कथा का आयोजन किया गया। महाराज श्री ने भक्तों को श्री कृष्ण कथा का श्रवण करवाते हुए बताया की हमारी जो संस्कृत भाषा है सबसे पवित्र भाषा है और यह संस्कृति को बनाती है और कहा की हर रिश्ते की खूबसूरती ही हिंदी में है। महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण की बाल लिलाओ का भी वर्णन किया।
 
 

21Sep 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

19Sep 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

19Sep 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

18Sep 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली ने भगवान ब्रह्मा वरदान मांगा की मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने उसे वरदान दे दिया। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने विष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली से कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" 
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का सुंदर वर्णन श्रवण कराया। सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

17Sep 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते।

इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।
भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

16Sep 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।


भागवत कथा के द्वितीय की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।


देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। 
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 


।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

14Sep 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के पहले दिन महाराज जी ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के पहले दिन महाराज जी ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।
भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
भागवत कथा प्रारंभ से पूर्व प्रात:काल में मदिर परिसर से कथा स्थल तक माताओं बहनों द्वारा कलश यात्रा निकाली गई। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की एक बात सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगो का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा । 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

12Sep 2018

आप महाराज जी ने अपने 40वें जन्मदिवस के अवसर पर सुबह पूज्य माता श्री से आशीर्वाद लेकर ठा. प्रियाकांत जू जी के दर्शन किए, उसके बाद बांके बिहारी जी के दर्शन करने के बाद वृंदावन में चातुर्मास कर रहे।

आप महाराज जी ने अपने 40वें जन्मदिवस के अवसर पर सुबह पूज्य माता श्री से आशीर्वाद लेकर ठा. प्रियाकांत जू जी के दर्शन किए, उसके बाद बांके बिहारी जी के दर्शन करने के बाद वृंदावन में चातुर्मास कर रहे पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज से आशीर्वाद प्राप्त कर आगे के लिए प्रस्थान किया।

 

12Sep 2018

कल पूज्य महाराज श्री अपने पूर्व निर्धारित कथा कार्यक्रमों को करने हेतु अमेरिका के लिए प्रस्थान किया।

कल पूज्य महाराज श्री अपने पूर्व निर्धारित कथा कार्यक्रमों को करने हेतु अमेरिका के लिए प्रस्थान किया।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

8Sep 2018

आज पूज्य पिताजी की प्रथम पुण्यतिथि पर महाराज श्री ने पूज्य पिताजी की प्रतिमा स्थापित कर ब्राह्मणो को भोजन प्रसाद ग्रहण कराया।।

आज पूज्य पिताजी की प्रथम पुण्यतिथि पर महाराज श्री ने पूज्य पिताजी की प्रतिमा स्थापित कर ब्राह्मणो को भोजन प्रसाद ग्रहण कराया।।

 

3Sep 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 03 सितंबर 2018 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का ठा. प्रियाकांत जू मंदिर, शांति सेवा धाम, वृंदावन में भव्य आयोजन किया गया। महोत्सव की शुरूआत महाराज श्री द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ की गई। कथा पंडाल में हजारों की संख्या में आए भक्तो ने रंगारंग कार्यक्रमों के बीच कन्हैया के आने की खुशियां मनाई।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 03 सितंबर 2018 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का ठा. प्रियाकांत जू मंदिर, शांति सेवा धाम, वृंदावन में भव्य आयोजन किया गया। महोत्सव की शुरूआत महाराज श्री द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ की गई। कथा पंडाल में हजारों की संख्या में आए भक्तो ने रंगारंग कार्यक्रमों के बीच कन्हैया के आने की खुशियां मनाई। देश के कोने कोने से आए कलाकारों ने नृत्य नाटिकाओं के माध्यम से कन्हैया के अलग अलग रूपों को पेश किया। पूज्य महाराज श्री के मुखाबिंद से निकले कृष्ण भजनों पर भक्त खूब झूमे और कृष्ण के जन्म की खुशियां मनाई। रंगारंग रोशनी में चमक रहे ठा. प्रियाकांत जू मंदिर की भव्यता भी मन मोह रही थी। रात 12 बजते ही प्रभु श्री कृष्ण का जन्म होते ही समूचा परिसर श्री कृष्ण के जयकारों से गूंज उठा। पूज्य महाराज श्री द्वारा ठा. प्रियाकांत जू मंदिर में बाल गोपाल का अभिषेक किया गया और 108 श्रीमद्भावत कथा के समस्त यजमानों के द्वारा भी बाल गोपाल का मंत्रोचारण के साथ अभिषेक किया गया एवं जन्माष्टमी आयोजन में उपस्थित सभी कृष्ण भक्तों के द्वारा महाआरती की गई। पूज्य महाराज श्री के साथ देर रात तक चले भजनों में हर कोई उल्लास में डूबा रहा।

3Sep 2018

आज पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में शांति सेवा धाम, वृंदावन में युवा शांति सेवा संदेश का आयोजन किया गया

जिसमें महाराज श्री ने सभी युवाओं एवं बच्चों के धर्म और संस्कृति से जुड़े सवालों का एक-एक करके जवाब दिया। युवा शांति संदेश के इस आयोजन में युवाओं ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। युवाओं ने देश के धर्म, संस्कृत, संस्कृति और संस्कारों से जुड़े हुए कई सवाल किए जिनका महाराज श्री द्वारा युवाओं की ही भाषा में बड़ी ही सरलता से उत्तर दिया गया। पूज्य महाराज श्री ने सभी युवाओं गलत संगत एवं प्रव्रतियों को त्यागने और धर्म, देश व समाज के प्रति समर्पित रहने के लिए प्रेरित किया और सनातन धर्म का इतिहास एवं संस्कारों की जानकारी दी।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

 

2Sep 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 27 अगस्त से 03 सितंबर 2018 तक शांति सेवा धाम, वृंदावन में 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
कथा की शुरूआत से आज विप्र समाज ब्रज साहित्य सेवा मंडल श्रीधाम वृंदावन एवं संयोजक पंडित बिहारी लाल वशिष्ठ जी के द्वारा महाराज श्री को ब्रज की संस्कृति को कृष्ण लीलाओं एवं श्रीमद्भागवत के माध्यम से विश्व में प्रसारित करने के अद्वितीय योगदान एवं उत्कृष्ट सेवाओं के लिए ब्रज पदम सिरोमणी की उपाधी से अलंकृत किया गया एवं प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि ये दुनिया दो चीजों से बनी है गुण से और अवगुण से, बिना अवगुणों के तो सोना भी नहीं बनता है, अगर इसमें गुण ही गुण होते तो ये दुनिया नहीं होती ये एकनिया होता। एक बात याद रखिए कहीं गर्मी, कहीं सर्दी ये कुदरत के नजारे हैं, उनहे भी प्यास लगती है जो दरिया के किनारे हैं। इस दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जिसमें सिर्फ गुण ही गुण हो, ये संसार बना ही गुण और अवगुण से है। ये जीवन एक गुण हैं और मृत्यु अवगुण। 
महाराज श्री ने आगे कहा कि संत में और असंत में एक अंतर होता है, संत सिर्फ गुण ग्रहण करते हैं और असंत सिर्फ दुर्गुण ही ग्रहण करते हैं। आप अपने आप निर्धारित किजिए की आप क्या है कौन हो। अगर हम किसी का अवगुण उठा कर ले जाते हैं तो हम असंत है, अगर हम किसी का गुण ग्रहण कर लेते हैं तो हम संत हैं और भागवत कथा हमें संत बनाती है। इसिलिए आपको संत बनना चाहिए, अपना नजरिया बदलिए. जब आपका नजरिया बदलेगा तो आपको नजारे बदल जाएंगे। 
महाराज श्री ने कहा कि हर किसी के जीवन में एक पल ऐसा आता है की जो हम नहीं करते उसका इल्जाम लगता है, यह पल हर किसी के जीवन में आता है, भगवान के जीवन में भी ये पल आएं है, भगवान श्री राम के जीवन में भी आया.....राम जी भगवान थे सब जानते हैं, माता सीता कितनी पतिव्रता थी उसे बावजूद भी राम राज में एक था जिसने इल्जाम लगाया था। याद रखिए जीवन में जो कार्य आपने ना किए हो और वो इल्जाम भी आप पर लगे तो समझना तुम्हारा वक्त थोड़ा सा बुरा चल रहा है, शांत रहो, भगवान का भजन करो, उस वक्त को निकल जाने दो, ठाकुर जी एक अच्छा वक्त फिर तुम्हारे सामने ला कर खड़ा कर देंगे। जीव को बुरे वक्त में धैर्य रखना चाहिए।
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

1Sep 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 27 अगस्त से 03 सितंबर 2018 तक शांति सेवा धाम, वृंदावन में 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

महाराज श्री ने कथा प्रारंभ करने से पूर्व जैन धर्म के परम श्रेष्ठ क्रांतिकारी राष्ट्रसंत तरूण सागर जी महाराज के देहांत पर शोक संवेदना व्यक्त की एवं समस्त श्रोतागणों के साथ 2 मिनट का मौन रख पुण्यात्मा की आत्म शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की। उन्होंने कहा की उनका इस तरह से लीला पूरी करना यह सिर्फ जैन समाज के लिए नुकसान नहीं है ये पूरे अध्यात्मिक जगत का बहुत बड़ा नुकसान है। वो खुद कहते थे कड़वे प्रवचन पर कहां थे उनके कड़वे प्रवचन, वो कड़वे प्रवचन के माध्यम से मीठा ही प्रवचन करते थे, सबके कल्याण के लिए करते थे। 
महाराज श्री ने आगे कहा कि यह भागवत कथा क्या है ? यह वैष्णवों का परम धन है। भगवान से बड़ा धन, भगवान के नाम से बड़ा धन इस संसार में दूसरा नहीं हो सकता, यही सबसे बड़ा धन है। 
महाराज श्री ने कहा कि वृंदावन का वास, संतों की झूठन प्रसादि, जमुना मईया का दर्शन और स्नान, प्रियाप्रितम का नित्य दर्शन, वृंदावन की परिक्रमा और राधे राधे गायन यह अपने आप में दर्शाता है की ठाकुर की कितनी असीम कृपा हम पर हुई है। 

महाराज श्री ने कहा कि मन में अगर अच्छे संकल्प हों तो ठाकुर सारी इच्छाएं पूरी करते हैं, ध्यान श्रीकृष्ण पर हो, गुरू के बताए हुए मंत्र जिसपर पूर्ण ऐसी निष्ठा हो की इसके अलावा तो कुछ है ही नहीं और तब हमे रास का सौभाग्य प्राप्त होता है। 

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

1Sep 2018

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के द्वारा ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर शांति सेवा धाम, वृंदावन में 01 एवं 2 सितंबर 2018 को नि:शुल्क नेत्र एवं स्वास्थ्य परीक्षण कैंप का आयोजन किया जा रहा है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के द्वारा ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर शांति सेवा धाम, वृंदावन में 01 एवं 2 सितंबर 2018 को नि:शुल्क नेत्र एवं स्वास्थ्य परीक्षण कैंप का आयोजन किया जा रहा है जिसमें ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर, ब्लड ग्रुप की जांच की जाएगी। आज प्रथम दिन हजारों की संख्या में आए लोगों का डॉक्टरों द्वारा परीक्षण किया गया एवं नि:शुल्क चश्मा एवं दवा वितरित की गई।

 

2Sep 2018

आज विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के द्वारा शांति सेवा धाम, वृंदावन में आयोजित नि:शुल्क नेत्र एवं स्वास्थ्य परीक्षण शिविर का दूसरे दिन पूज्य महाराज श्री द्वारा निरीक्षण किया।

आज विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के द्वारा शांति सेवा धाम, वृंदावन में आयोजित नि:शुल्क नेत्र एवं स्वास्थ्य परीक्षण शिविर का दूसरे दिन पूज्य महाराज श्री द्वारा निरीक्षण किया गया एवं हजारों की संख्या में आए रोगियों का डॉक्टरों द्वारा इलाज किया गया एवं चश्मे और दवा वितरित की गई।

2Sep 2018

आज पूज्य महाराज श्री ने शांति सेवा धाम, वृंदावन में 108 श्रीमद्भागवत कथा के मुख्य यजमानों एवं ब्राह्मणों के साथ ग्रुप फोटोग्राफी की एवं भण्डारे का प्रसाद वितरित किया।

आज पूज्य महाराज श्री ने शांति सेवा धाम, वृंदावन में 108 श्रीमद्भागवत कथा के मुख्य यजमानों एवं ब्राह्मणों के साथ ग्रुप फोटोग्राफी की एवं भण्डारे का प्रसाद वितरित किया।

 

31Aug 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 27 अगस्त से 03 सितंबर 2018 तक शांति सेवा धाम, वृंदावन में 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की विनम्रता छोटे से छोटे इंसान को महान बना देती है और बड़े से बड़े इंसान को अहंकार मिट्टी में मिला देता है। हमने कई बार कहा है जो खुब अकड़ के चलते थे उनको मिट्टी में मिलते देखा है। भगवान ने स्वयं ने कहा है मोहे कपट छल छिद्र ना भावा, निर्मल मन जन सो मोही पावा, जिसका मन निर्मल है वहीं मुझे प्राप्त कर सकता है, जिसका मन निर्मल नहीं है, जो अकड़ के चलता है वो मुझ तक नहीं पहुंच सकता, अकड़ तो मुर्दे की पहचान होती है। जीवन में विनम्रता लाओ और सभी आत्माओं में भगवान का ही दर्शन करो।

महाराज श्री ने आगे कहा कि कृष्ण धन मिल जाए, नाम धन मिल जाए तो उसके बाद तो सब धन धूल के समान है, यह धूल ही है आप इसको साथ नहीं ले जा सकते लेकिन कृष्ण नाम आपके साथ जाएगा, नाम धन तुम्हारे साथ जाएगा इसलिए गुरू सदैव पूज्यनीय होता है। दुनिया में जो भी व्यक्ति जो भी वस्तु देता है वो दुनिया तक सिमित रहती है लेकिन गुरू जो देते हैं वो दुनिया तक सिमित नहीं रहती है, वो ब्रह्माण्ड के किसी भी कौने में चले जाओ, वो असिमित है।

महाराज श्री ने कहा कि दुनिया की हर चीज झूठी है, सच्चा धन है तो सिर्फ परमात्मा ही सबसे सच्चा धन है, यह बात हमेशा याद रखना। कलयुग में हमेशा दान देना चाहिए, शास्त्रों में लिखा है कल काल में जो चरण बचा है धर्म का वो दान ही है। दान से धर्म आगे बढ़ता है

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

30Aug 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 27 अगस्त से 03 सितंबर 2018 तक शांति सेवा धाम, वृंदावन में 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।


देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की मानव जीवन में अगर लक्ष्य प्राप्त नहीं हुआ तो मानव जीवन होना ना होना सब बराबर है। महाराज श्री ने प्रश्न किया की मानव जीवन मिल जाना क्या हमको मानव होना साबित करता है ? मानव योनी में आ जाना अलग बात है और मानव होना एक अलग बात है। हम सब को कुछ समय निकाल कर ऐसा चिंतन करना चाहिए की हम मानव बन सके, हम मानव बन पाएं है, हम अपने आप को मानव कह सकेंगे ? यह सवाल अपने आप से किजिए क्योंकि तुमसे ज्यादा अच्छे से तुम्हे कोई नहीं जानता है। तो एक मानव होना और एक मानव योनी में होना दो अलग बात हैं। मेरा आप सब से आग्रह है की महीने में एक बार अपने आप से प्रशन किजिए की हम मानव हैं क्या ? हम मानव बन सके हैं क्या ? क्योंकि जब तक हम मानव नहीं बन पाएंगे तब तक हमें मोहन नहीं मिलेगा, भक्त बनना तो बहुत दूर की बात है अच्छे मानव ही बन जाओ। 


महाराज श्री ने आगे कहा कि शास्त्रों में, पुराणो में, रामायण में हर जगह पर मानव जीवन की विशेष बाते लिखी है की मानव जैसा जीवन किसी ओर का नहीं है। जब भगवान मानव जीवन देते हैं इसका मतलब है भगवान तुम्हे मुक्ति प्राप्त करने का, ईश्वर को प्राप्त करने का अवसर देते हैं। अगर तुम मानव जीवन में आ गए हो तो भगवान ने कह दिया है की मैं तुमसे मिलने के लिए तैयार हूं लेकिन ये तुम्हारे कर्मों पर निर्भर करता है की तुम अच्छे मानव बन पाए, भक्त बन पाए तो तुम मुझसे मिलने के अधिकारी हो जाओगे। 


महाराज श्री ने कहा की इतिहास गवाह है की प्रभु हमेशा वहां पहुंचे हैं जहां दिल से भक्त ने पुकारा है, उन्होंने कहा की मुझे कहते हुए तकलीफ होती है की आज का व्यक्ति दोहरे मापदंड अपनाता है, खुद के साथ दोहरा खेल खेलता है। भक्ति भी करता है और अधर्म भी करता है, धर्म और अधर्म दोनों करता है तो फिर प्रभावशील कैसे होगा, गुरू मंत्र भी ले लेते हैं लेकिन मंत्र में निष्ठा भी नहीं होती, कथा भी सुनते हैं लेकिन कथा सच है या झूठ है किंतु परंतु भी होता है। राजा परिक्षित ने एक बार कथा सुनी तो मोक्ष हो गया, आपने इतनी बार कथा सुनली लेकिन जीवन में बदलाव नहीं आया , याद रखना कथा सुनने का लाभ तभी है जब तुम्हे नहीं तुम्हारे घरवालों को महसूस होने लगे आप में परिवर्तन हो रहा है। 


देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली ने भगवान ब्रह्मा वरदान मांगा की मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने उसे वरदान दे दिया। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने विष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली से कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।


महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"


जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" 


भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का सुंदर वर्णन श्रवण कराया। सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

27Aug 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 27 अगस्त से 03 सितंबर 2018 तक प्रतिदिन दोपहर 3 बजे से वृंदावन में 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। कथा के पहले दिन महाराज जी ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।


भागवत कथा के प्रथम दिवस पर कथा पंडाल में आचार्य श्री बदरीश जी, श्री नेत्रपाल जी महाराज, श्री अशोक शास्त्री जी महाराज, श्री बिपिन बापू जी, विप्र समाज को लेकर चलने वाले श्री नागेंद्र जी महाराज, श्री उदेन शर्मा जी, श्री सुधीर शुक्ला जी और ब्रज तीर्थ विकास परिषद के उपाध्यक्ष श्री शैलजा कांत मिश्र जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई एवं अपने विचार व्यक्त किए ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की ब्रज के महात्यम की बात बताते हुए कहा कि ब्रज भूमि जिसमें हम वास कर रहे हैं यह इतना आसान नहीं है, इसका वर्णन इतना सुंदर है । जिस भूमि में ब्रह्मा जी अपनी मर्जी से नहीं आ सकते, चाह कर भी अपनी मर्जी से यहां जन्म नहीं ले सकते उस ब्रज में हम और आप बैठे हैं। इस ब्रज का महात्यम क्या है, आते तो यहां बहुत से लोग है लेकिन वास नहीं कर सकते। वैसे तो यहां आसान भी आसान नहीं है, अगर आएं है तो निश्चित है कुछ अच्छा काम किया होगा। किशोरी की अहित की कृपा है की आपको यहां पर वास मिल रहा है। 

महाराज श्री ने आगे कहा कि सच चित आनंद सच्चिदानंद, दैहिक, दैविक, भौतिक त्रितापों को जन्म देने वाले, उनका पालन और संहार करने वाले ऐसे सच्चिदानंद परमात्मा को हम नमन करते हैं। महाराज श्री ने कहा कि भागवत क्या है ? भागवत का अर्थ क्या है ? भागवत कहते किसको हैं....भगवान के भक्त को ही भागवत कहते हैं। इस भागवत के बारह के बारह स्कंदों को आप पडिए, उन बारह के बारह स्कंदों में भक्तों की विशेषता का ही वर्णन किया गया है। वो इसलिए क्योंकि भक्त भगवान को नमन करता है और भगवान भक्तों को नमन करते है, अगर भगवान ना हों, संत ना हों, भक्त ना हों, तो भगवान को प्रतिपादित कौन करेगा, भगवान को भगवान घोषित कौन करेगा ? उन्होंने आगे कहा कि आप किसी तीर्थ में जाते हो, वहां जल तत्व होता है कोई कुंड, कोई सरोवर होता है, प्रत्येक तीर्थ में होता है, कहीं ना कहीं मूर्ति के रूप में भगवान मौजूद रहते हैं लेकिन वो तीर्थ तीर्थ नहीं है जिस तीर्थ में संत नहीं हैं, भक्त नहीं हैं। हर वो तीर्थ श्रेष्ठ है जिस तीर्थ में संत जाकर वास करते हैं । संत वास करेंगे तो पूजा पाठ होगी, भजन होगा, भजन होगा तो उस स्थान का प्रभाव बढ़ता चला जाएगा और जितना प्रभाव बढ़ता चला जाएगा उतने लोगों की आस्था बढ़ती चली जाएगी ।
महाराज श्री ने कहा कि आप गौशाला में चले जाइए वहां गोबर भी पड़ा है, गौमूत्र भी पड़ा है, मक्खियां भी भिन भिना रही हैं लेकिन गौशाला में जाओगे तो आप उसको पवित्र ही कहोगे क्यों. क्योंकि वो वेद प्रमाणित बात है की जहां गऊ रहती है वहां 33 करोड़ देवी देवता तो गऊ में ही वास करते हैं, वह सुंदर और पवित्र स्थान है। पवित्रता यह है जिसे वेद प्रतिपादित करें।
महाराज श्री ने कहा कि हमे अपने कर्मों में सुधार करना चाहिए या फिर अपने कर्मों को ऐसा बना देना चाहिए जो कर्म ठाकुर को प्रिय लगते हों, गोविंद को प्रिय लगते हों, प्रियाकांत जू को प्रिय लगते हों, हमे वो काम करना चाहिए जिससे वो प्रसन्न हों। भागवत सुनने का मतलब ये नहीं है की सात दिन सुने और फिर बदलने की कोई कोशिश ही नहीं ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की एक बात सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगो का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा । 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

28Aug 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 27 अगस्त से 03 सितंबर 2018 तक शांति सेवा धाम, वृंदावन में 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।


देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की कुछ लोग कहते हैं की महाराज भगवान की कथा में मन नहीं लगता, महाराज सतकर्मों में मन नहीं लगता, भजन करने का मन नहीं करता है। ये बताइए ये कैसा विचित्र मन है हमारा हर उस काम में लगता है जिसे संत, गुरू, महात्मा मना करते हैं , पुराण, वेद वर्जित करते हैं, मनाही कर दी गई है की ये तो करना ही नहीं है किसी भी प्रकार से उसमें लग जाता है । बताइए कहीं पुराणों में लिखा गया है की झूठ बोलना है, मदिरा पान करना है कही सिखाया गया है, बड़ो का अपमान करना है कही सिखाया गया है, गाली देना, अपशब्द बोलना हम अपनी कला समझते हैं लेकिन ये कला नहीं है ये हमारे मां बाप की कमजोरी है जिन्होंने हमे सिखाया ही नहीं है की किसी को अपशब्द बोलना आपका अपनी कम बुद्धि होने का परिचय है। आप अगर किसी को अपशब्द बोलते हो तो आपके मां बाप ने आपको संस्कार देने में कमी रखी है और इसमें अपमान आपका नहीं आपके मां बाप का है।


महाराज जी ने आगे कहा कि कलयुग की प्रवृति ही हमारे मन में अविश्वास प्रकट करती है, इस बात का हमेशा ध्यान रखें। जब कभी भी हमारे मन में अविश्वास होता है चाहे वो धर्म के प्रति अविश्वास हो, चाहे गुरू के प्रति अविश्वास हो, चाहे भगवान के प्रति अविश्वास हो, धर्म से संबंधित अविश्वास कलयुग का ही प्रभाव है। इसका प्रभाव ही हमें पापी बनने पर विवश करता है। जब जब हमारा मन अधर्म की ओर बढ़े और सज्जनों के प्रति विश्वास ना रहे तो समझ लेना चाहिए की कलयुग हम पर हावी हो रहा है। 


महाराज श्री ने भागवत की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि यह भगवान की भागवत, भक्तों की कथा, ये पुराण है, पुराण ही नहीं महापुराण है, महापुराण ही नहीं पंचम वेद निराला है, ये पांचवा वेद है। वेद व्यास जी महाराज ने सभी वेदों का सार इसमें डाल दिया है और सबसे आखिर में लिखा ये पुराण है इसलिए पुराणों का भी सार है, सर्व वेदांत सारम है ये, सभी सारों का निचोड़ इसमें रखा है। 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।


श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

29Aug 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 27 अगस्त से 03 सितंबर 2018 तक शांति सेवा धाम, वृंदावन में 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया। भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की भगवान की भक्ति प्राप्त करने के लिए बहुत जरूरी है की कम बोलें। आपके अधिक बोलने से और व्यर्थ बोलने से आपकी भजन की शक्ति भी कम होती है, आपकी खुद की पावर कम होती है, ईश्वर को पाने की इच्छा भी कम होती है। आप कम बोले, अधिक बोलने से सर पर मुसीबतें ही आती हैं। अगर बोलना ही हो तो अच्छा बोलें, मीठा बोलें, कम बोलें, अधिक बोलने की आवश्यकता नहीं है। ऐसा मत बोलिए जो तुम सुनना पसंद नहीं करते हो, वही बोलिए जिससे तुम भी सुनना पसंद करते हो।


महाराज श्री ने कहा कि यहां अनेक संत है अनेक पंथ है, कई लोग ऐसे होते हैं जो एक संत की वाणी को सत्य करने के लिए दूसरे को झूठा बता देते हैं ऐसा नहीं है। आपको जिस संत, महात्मा, गुरू की वाणी पर विश्वास हो जाएगा वहीं वाक्य आपके लिए ब्रह्म बनकर आपका कल्याण कर देगा, वहीं गोविंद बनकर आपके जीवन में आयेगा। आपका विश्वास किस पर है यह जरूरी है, जब तक आपका विश्वास नहीं होगा जब तक भक्ति नहीं होगी, जब तक भक्ति नहीं होगी तब तक भगवत प्राप्ति नहीं होगी और बिना विश्वास के भक्ति दृढ़ नहीं हो सकती।


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी वयक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।
राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...
अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।
भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

24Aug 2018

आज विश्व शांति सेवा समिति प्रयाग के तत्वाधान में सरदार पटेल संस्थान, अलोपी बाग में बैठक आयोजित की गई । सबसे पहले प्रयाग समिति द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी का स्वागत किया गय।

आज विश्व शांति सेवा समिति प्रयाग के तत्वाधान में सरदार पटेल संस्थान, अलोपी बाग में बैठक आयोजित की गई । सबसे पहले प्रयाग समिति द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी का स्वागत किया गया, तत्पश्चात बैठक की शुरुआत की गई इस बैठक में आगामी कुंभ मेले में ट्रस्ट की ओर से लगने वाले शांति सेवा शिविर के बारे में विस्तारपूर्वक बताया गया। यह शिविर 10 जनवरी 2019 से प्रारंभ होकर 19 फरवरी 2019 तक प्रयाग कुंभ नगरी में रहेगा। इस दौरान परम् पूज्य धर्मरत्न शांतिदूत श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज द्वारा प्रयाग में 3 कथाओं का लाभ प्रयागवासियों एवं कल्पवासियों को मिलेगा। इस बैठक में तीनों कथाओं के बारे में विस्तृत रुप से चर्चा की गई एवं बताया गया कि 10 जनवरी को शिविर का उद्घाटन किया जाएगा जिसमें 18 से 25 जनवरी को विशाल श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जाएगा। पुनः 3 फरवरी से 5 फरवरी तक तीन दिवसीय कृष्ण कथा का भी आयोजन किया जाएगा। इसी क्रम में महाराज श्री द्वारा 8 फरवरी से 16 फरवरी तक नौ दिवसीय राम कथा का भव्य आयोजन ट्रस्ट के द्वारा किया जाएगा। इस दौरान अनेक अनेक धार्मिक कार्य एवं गरीब नि: शक्तजनों के कल्याणार्थ कार्यक्रम शिविर द्वारा संचालित किए जाएंगे। इस शिविर में अनेक भक्तों के देश विदेश से आने की संभावना है। सभी के रुकने रहने की व्यवस्था ट्रस्ट द्वारा शांति सेवा शिविर में ही की जाएगी। इस बैठक में समिति के अध्यक्ष भोला सिंह, कुलदीप सिंह, एस०पी०श्रीवास्तव श्रीवास्तव, दीपू मिश्रा, मानिक चंद्र श्रीवास्तव, डॉ शरद शांगलू, डॉ०वी.के. पांडेय, अम्बुज गर्ग आदि उपस्थित रहे।

 

23Aug 2018

"विश्व शांति सेवा समिति कानपुर" "विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली" के तत्वाधान में परम पूज्य "धर्मरत्न शांतिदूत श्रद्धेय श्री देवकीनंदन ठाकुर जी" महाराज के श्री मुख से "श्रीमद् भागवत कथा" का भव्य एवं विशाल आयोजन "11 से 18 नवंबर 2018 मोतीझील ग्राउंड कानपुर उत्तर प्रदेश" में होना सुनिश्चित हुआ है।

"विश्व शांति सेवा समिति कानपुर" "विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली" के तत्वाधान में परम पूज्य "धर्मरत्न शांतिदूत श्रद्धेय श्री देवकीनंदन ठाकुर जी" महाराज के श्री मुख से "श्रीमद् भागवत कथा" का भव्य एवं विशाल आयोजन "11 से 18 नवंबर 2018 मोतीझील ग्राउंड कानपुर उत्तर प्रदेश" में होना सुनिश्चित हुआ है, इस कथा की तैयारियों का जायजा लेने के लिए "विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट" के सचिव "श्री विजय शर्मा जी" आज "कानपुर कार्यालय" पहुंचे और आयोजक मंडल के सभी सदस्य एवं सभी स्वयंसेवकों के साथ बैठक की जिसमें श्री शर्मा जी ने बताया कि कथा को कैसे भव्य, विशाल एवं ज्यादा से ज्यादा लोगों तक कथा की जानकारी किस प्रकार से पहुंचायी जाए, एवं कथा से संबंधित अन्य पहलुओं पर चर्चा की, इसके बाद श्री विजय शर्मा जी ने प्रयाग के लिए प्रस्थान किया ।
कानपुर समिति के सचिव "श्री विपिन बाजपाई जी" ने बताया कि परम पूज्य "धर्मराज शांतिदूत श्री देवकीनंदन ठाकुर जी" महाराज का "जन्मोत्सव 12 सितंबर 2018" दिन बुधवार को बड़े ही भव्य एवं धूमधाम से "कानपुर कार्यालय" में मनाया जाएगा एवं "2 अक्टूबर 2018 गांधी जयंती" के शुभ अवसर पर एक विशाल रैली कथा से संबंधित जो कि कानपुर कार्यालय से उठकर कानपुर के विभिन्न मार्गों से होते हुए निकाली जाएगी जिसमें कथा की जानकारी के साथ-साथ कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होंगे सम्मिलित होंगे, आप सभी भक्तों से निवेदन है कि भारी से भारी संख्या में आकर कथा की जानकारी को जन जन तक पहुंचाने में सहयोग करें।


आप सभी भक्त प्रेमियों से निवेदन है कि इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक कमेंट एवं Facebook , WhatsApp इत्यादि ग्रुपों में शेयर अवश्य करें।
।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

19Aug 2018

*राधे राधे जी, प्रियाकांत जु भगवान की कृपा और गुरुजी के आशिर्वाद से 6 से 14 दिसम्बर 2018 भायंदर-मुम्बई में विशाल 108 श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों के लिए आज सुबह 11:30 बजे से विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्माजी ने मुम्बई आयोजक समिति के साथ मीटिंग की।

*राधे राधे जी, प्रियाकांत जु भगवान की कृपा और गुरुजी के आशिर्वाद से 6 से 14 दिसम्बर 2018 भायंदर-मुम्बई में विशाल 108 श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों के लिए आज सुबह 11:30 बजे से विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्माजी ने मुम्बई आयोजक समिति के साथ मीटिंग की, फिर शाम 3 बजे से सभी कार्यकर्ताओ एव शिष्य परिवार के साथ मीटिंग की जिसमे सर्व प्रथम भारत के पूर्व प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपई जी और मेजर कौस्तुभ प्रकाश कुमार राणे जी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी गई। इसके बाद कलश यात्रा की जानकारी प्रदान की गई, कथा में और भी भक्तो को कैसे जोड़ा जाए इसके ऊपर विचार विमर्श किया गया, कथा को भव्य विशाल रूप देने के लिए श्री विजय शर्माजी द्वारा मार्ग दर्शन प्रदान किया गया।
शाम 5 बजे श्री विजय शर्माजी ने नारियल चढ़ाकर प्रचार रथ की सुरुआत की एव 2 किलोमीटर तक कथा के प्रचार की रैली की गई।*

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

18Aug 2018

श्री राधे राधे, मुम्बई में 6 से 14 दिसम्बर 2018 में होने वाली विशाल श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों में मार्गदर्शन देने आज विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्माजी पहुचे मुम्बई एयरपोर्ट, मुम्बई समिति ने किया उनका दमाकेदार सुआगत।

श्री राधे राधे, मुम्बई में 6 से 14 दिसम्बर 2018 में होने वाली विशाल श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों में मार्गदर्शन देने आज विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्माजी पहुचे मुम्बई एयरपोर्ट, मुम्बई समिति ने किया उनका दमाकेदार सुआगत, कल श्री विजय शर्मा जी ने बैंगलोर और नागपुर समितियों से मिलकर वहां होने वाली विशाल श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों में मजबूती प्रदान की और आज सुबह नागपुर से मुम्बई के लिए प्रस्थान किया

18Aug 2018

जय श्री राधे, 6 से 14 दिसम्बर 2018 भायंदर-मुम्बई में होने वाली विशाल 108 श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों को करवाने हेतु विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्माजी आज सुबह नागपुर से मुम्बई पहुचे।

जय श्री राधे, 6 से 14 दिसम्बर 2018 भायंदर-मुम्बई में होने वाली विशाल 108 श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों को करवाने हेतु विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्माजी आज सुबह नागपुर से मुम्बई पहुचे, और मुम्बई पहुचते ही बिना किसी विलंब के सबसे पहले कथा स्थल का निरक्षण किया, क्योंकि 2017 की कथा में जितनी बड़ी संख्या में भक्तो ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी उसको देखते हुए लगता है कि इस बार पिछले साल के मैदान से भी बड़े मैदान की जरूरत पड़ेगी। कल सुबह 11:30 बजे से आयोजक समिति के साथ महत्वपूर्ण मीटिंग है और उसके तुरंत बाद 3 बजे से सभी स्वम सेवक एव शिष्य परिवार के साथ मीटिंग है, श्री प्रियाकांत जु भगवान और श्री सद्गुरुदेव भगवान के आशिर्वाद से इस बार कथा को और भी भव्य रूप देने के लिए सभी स्वम सेवक दिन रात परिश्रम कर रहे है, और इन सबको मार्ग दर्शन प्रदान कर रहे है हम सबके प्यारे भइया श्री विजय शर्माजी, राधे राधे।

18Aug 2018

रेशम बाग मैदान नागपुर में विश्व शांति सेवा समिति के द्वारा आगामी 21 से 28 फरवरी 2019 तक होने जा रही श्रीमद्भागवत कथा की तैयारियों को लेकर मीटिंग की गई जिसमें बेंगलुरु से पहुंचकर विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी ने भाग लिया जिनका एयरपोर्ट पहुंचने पर स्वागत किया गया।

रेशम बाग मैदान नागपुर में विश्व शांति सेवा समिति के द्वारा आगामी 21 से 28 फरवरी 2019 तक होने जा रही श्रीमद्भागवत कथा की तैयारियों को लेकर मीटिंग की गई जिसमें बेंगलुरु से पहुंचकर विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी ने भाग लिया जिनका एयरपोर्ट पहुंचने पर स्वागत किया गया। मीटिंग में किस प्रकार से कथा को सफल बनाना है, लोगों तक किस तरह से कार्यक्रम की जानकारी पहुंचानी है, किस तरह से कार्यक्रम का आयोजन करना है इस विषय पर चर्चा की गई ताकी किसी को भी किसी प्रकार की परेशानी का सामना ना करना पड़े। इसके अलावा भारत रतन एवं पूर्व प्रधानमंत्री श्रद्धेय श्री अटलबिहारी वाजपेयी जी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि भी दी गई। मीटिंग में समिति के सभी सम्मानित सदस्यों ने भाग लिया

17Aug 2018

रेशम बाग मैदान नागपुर में विश्व शांति सेवा समिति की मीटिंग में भारत रतन एवं पूर्व प्रधानमंत्री श्रद्धेय श्री #अटल_बिहारी_वाजपेयी जी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि भी दी गई। अटल जी आप सदैव हमारे दिलों में जीवित रहेंगे।

रेशम बाग मैदान नागपुर में विश्व शांति सेवा समिति की मीटिंग में भारत रतन एवं पूर्व प्रधानमंत्री श्रद्धेय श्री #अटल_बिहारी_वाजपेयी जी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि भी दी गई। अटल जी आप सदैव हमारे दिलों में जीवित रहेंगे। #AtaljiAmarRahen

17Aug 2018

आज बैंगलोर के प्लेस ग्राउंड गेट नं 9 में विश्व शांति सेवा समिति के द्वारा आगामी 25 से 31 जनवरी 2019 तक होने जा रही श्रीमद्भागवत कथा की तैयारियों को लेकर मीटिंग की गई।

आज बैंगलोर के प्लेस ग्राउंड गेट नं 9 में विश्व शांति सेवा समिति के द्वारा आगामी 25 से 31 जनवरी 2019 तक होने जा रही श्रीमद्भागवत कथा की तैयारियों को लेकर मीटिंग की गई जिसमें पूना से पहुंचकर विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी ने भाग लिया। मीटिंग में किस प्रकार से कार्यक्रम को सफल बनाना है, लोगों तक किस तरह से कार्यक्रम की जानकारी पहुंचानी है, किन किन और किस तरह से कार्यक्रम का आयोजन करना है इस विषय पर चर्चा की गई ताकी किसी को भी किसी प्रकार की परेशानी का सामना ना करना पड़े। इसके अलावा हर माह होने वाले पूर्णिमा महोत्सव की जानकारी लोगों तक किस प्रकार से दी जाए ताकी ज्यादा से ज्यादा लोग इस आयोजन में भाग ले सकें इस बारे में भी समिति के सदस्यों द्वारा विचार रखे गए। मीटिंग में विश्व सेवा समिति के द्वारा कैसे जरूरतमंदों की मदद की जाए, कैसे उन तक जरूरत का सामान पहुंचाया जाए इस बारे में भी चर्चा की गई। मीटिंग के बाद श्री विजय शर्मा जी ने नागपुर के लिए प्रस्थान किया। मीटिग में समिति के अध्यक्ष श्री मुकेश शर्मा जी, सचिव श्री महेश कुमावत जी, कोषाध्यक्ष श्री सुरेश झांगिड जी, श्री संजय अग्रवाल जी, श्री खीमाराम जी, श्री संतोष महाराज जी, श्री गोपाल लाल जी, श्री संजय चतुर्वेदी जी, श्री रवि दत्त बरवारिया जी, श्री शिवम पाण्डेय जी, श्री ओम प्रकाश ठाकुर जी एवं समस्त कार्यकर्ता शामिल हुए।

15Aug 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 72वें स्वतंत्रता दिवस पर रंगारंग कार्यक्रमों का आयोजन शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड़, वृंदावन में किया गया। प्रात: काल में पूज्य महाराज श्री द्वारा ठा. प्रियाकांत जू प्रांगण में ध्वजारोहण किया गया और देश के लिए बलिदान देने वाले वीर जवानों को याद किया गया। 

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 72वें स्वतंत्रता दिवस पर रंगारंग कार्यक्रमों का आयोजन शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड़, वृंदावन में किया गया। प्रात: काल में पूज्य महाराज श्री द्वारा ठा. प्रियाकांत जू प्रांगण में ध्वजारोहण किया गया और देश के लिए बलिदान देने वाले वीर जवानों को याद किया गया। 

कार्यक्रम की शुरूआत विभिन्न स्कूलों के बच्चों द्वारा देश भक्ति के विभिन्न नृत्य नाटिकाओं, देशभक्ति गीतों, कविताओं की प्रस्तुती दी गई जिसका वहां उपस्थित सभी लोगों ने आनन्द लिया। महाराज श्री द्वारा सभी बच्चों का उत्साहवर्धन किया गया।

स्वतंत्रता दिवस के इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पूज्य स्वामी गोविंदानंद तीर्थ जी महाराज ने भी अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई, पूज्य महाराज श्री द्वारा उनका शॉल उड़ाकर सम्मान किया गया। 

पूज्य महाराज श्री ने स्वतंत्रता दिवस पर अपने विचार रखते हुए कहा कि सिर्फ आज के दिन झंडा फहराने से हम उन शहीदों के ऋण से उण नहीं हो सकते, हम इस धरती में आए भी नहीं थे उससे पहले उन्होंने अपने प्राणों की परवाह किए बगैर उन्होंने हमारे आने की प्रवाह की और हमारे जीवन की प्रवाह की, हम आजादी में जी सकें, जन्म ले सकें और आजादी भरे इस महौल में हम अपनी मृत्यु को स्वीकार कर सकें इसके लिए उन्होंने समय से पहले जाना स्वीकार किया, आज हमे उन्हे जानने की जरूरत है। अगर हमारी युवा पीढ़ी ने आजादी का मोल नहीं समझा तो तुम्हारी आने वाली पीढ़ी तुम्हे कभी माफ नहीं करेगी। 

महाराज श्री ने आगे कहा कि कॉनवेंट स्कूल में पढ़ाना, दोस्त बनाना, अच्छी नौकरी पाना, पैसा कमाना, बच्चे पैदा करना फिर उनकों अच्छी परवरिश देना सिर्फ यही जीवन नहीं है। आज के युवाओं का रोल मॉडल कौन है ? कोई एक्टर एक्ट्रेस रोल मॉडल नहीं हो सकते ये तो मनोरंजन का एक माध्यम हो सकता है रोल मॉडल नहीं, लड़कियों के लिए अगर कोई रोल मॉडल है तो वो लक्ष्मीबाई है, मीराबाई है, सावित्री है वो हमारा रोल मॉडल है और पुरूषो में प्रभु राम आपका रोल मॉडल होने चाहिए। 
महाराज श्री ने कहा कि आजकल जो रेप हो रहे हैं, महिलाओं के साथ अभद्रता हो रही है इसका मुख्य कारण है धार्मिक शिक्षा की कमी। हमारे बच्चों को इतिहास के बारे में बताया नहीं जाता है इसिलिए तो हमारी बहनों की रोल मॉडल हो गई हैं एक्ट्रेस जो विदेशों में कुछ और करती थी यहां आकर एक्ट्रेस बन गई हैं। 
महाराज श्री एक कविता भी सुनाई उन्होंने कहा कि 
आजादी की कभी हम शाम नहीं होने देंगे ।
शहीदों की कुर्बानी को बदनाम नहीं होने देंगे ।। 
बची हो गर एक बूंद भी एक लहू की ।
तब तक भारत माता का आंचल नीलाम नहीं होने देंगे ।।
कुछ नशा तिरंगे की आन का है ।
कुछ नशा मातृभूमि की मान का है ।। 
हर जगह पर लहराता हुए तिरंगा । 
नशा यही तो मेरे हिंदुस्तान की शान का है ।।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

13Aug 2018

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने यूपी के मा. मुख्यमंत्री महंत श्री योगी आदित्यनाथ जी से मिलकर इलाहाबाद का नाम "प्रयागराज" करने के लिए धन्यवाद दिया एवं उनसे अनेकों विषयों पर चर्चा की।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने यूपी के मा. मुख्यमंत्री महंत श्री योगी आदित्यनाथ जी से मिलकर इलाहाबाद का नाम "प्रयागराज" करने के लिए धन्यवाद दिया एवं उनसे अनेकों विषयों पर चर्चा की।

जैसा कि आप सभी को ज्ञात है कि पूज्य महाराज श्री कई वर्षों से इलाहाबाद का नाम "प्रयागराज" करने का अभियान चला रहे थे। जिस पर उत्तर प्रदेश सरकार ने 2019 के कुम्भ मेले के पावन अवसर पर इलाहाबाद का नाम प्रयागराज करने का निर्णय लिया है।

महाराज श्री ने महंत श्री योगी आदित्यनाथ जी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर ठा. प्रियाकान्त जू मंदिर, वृन्दावन के लिए भी आमंत्रित किया।

9Aug 2018

गोविंद देव जी की नगरी जयपुर में न्यूगेट स्थित रामलीला मैदान, संगानेरी गेट में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के सातवें दिन पूज्य महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

कथा के सातवें दिन की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। कथा में हजारों की संख्या में भक्त पधारे।

कथा से पूर्व प्रात: में महाराज श्री द्वारा युवाओं को संस्कारों का ज्ञान देने हेतु युवा शांति संदेश का भी आयोजन किया गया जिसमें कई युवाओं ने महाराज श्री के समक्ष अपने प्रश्न रखे और उन्होंने बड़ी सरलता से सभी प्रश्नो का उत्तर दिया।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि आपको अपनी वाणी को संभालकर रखना चाहिए । कभी भी अपनी वाणी से कटू शब्द मत निकालो। ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय, औरन को शीतल करै, आपहु शीतल होय। भगवान से प्रेम करने वाले लोग कटू शब्द नहीं बोलते क्योंकि एगर हम कटू बोलेंगे तो जिसको कटू बोल रहे हैं उसमें भी तो भगवान ही है। भगवान ने गीता में कहा है ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः यानि मैं प्रत्येक आत्मा में वास करता हूं । जिसको मैं बुरा बोल रहा हूं उसमें भी तो भगवान बसा हुआ है । एक तरफ मंदिर वाले भगवान को प्रसन्न करने की कोशिश दूसरी तरह उसी भगवान को उलटा सीधा बोलते हैं। जीव की वाणी ऐसी होनी चाहिए की किसी के प्रति बुरा ना बोले, वो आपकी मजबूरी नहीं ये आपकी आदत हो किसी को बुरा ना बोलने की।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

8Aug 2018

भगवान गोविंद देव जी की नगरी जयपुर में न्यूगेट स्थित रामलीला मैदान, संगानेरी गेट में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भगवान गोविंद देव जी की नगरी जयपुर में न्यूगेट स्थित रामलीला मैदान, संगानेरी गेट में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के षष्ठम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। कथा में हजारों की संख्या में भक्त पधारे।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि व्यक्ति को नेत्रों पर संयम रखना चाहिए, ये नेत्र सिर्फ रास्ता ही नहीं दिखाते बल्कि रास्ता भटकाते भी हैं। अपने नेत्रों को इतना समझा दो की क्या देखना है ? और क्या नहीं देखना ? ना देखने वाला चित्र अगर देख लें तो चरित्र खराब हो जाता है। नेत्रों से अच्छा देखिए, जब आप नेत्रों से अच्छा देखेंगे तो मन में संकल्प अच्छा करने का होगा। जो देखने योग्य नहीं है अगर वो देखोगे तो वो भी कर बैठोगे तो देखने योग्य नहीं है। 
महाराज श्री ने कहा कि एक संत ने क्या खूब कहा है कि जितना प्रेम एक पुरूष नारी से करते हो, नारी की सुंदरता से करते हो, उतना या उससे आधा प्रेम भी प्रभु से हो जाए तो कोई भी हमारा कल्याण होने से रोक नहीं सकता। उन्होंने आगे कहा कि एक साधु का तो भेष ही आदरणीय है इसलिए जब भी कही भी साधु संत मिलें अगर कुछ ना कर सको तो आदर पूर्वक सर झुकाकर प्रणाम करो। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा ।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

7Aug 2018

भगवान गोविंद देव जी की नगरी जयपुर में न्यूगेट स्थित रामलीला मैदान में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भगवान गोविंद देव जी की नगरी जयपुर में न्यूगेट स्थित रामलीला मैदान में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के पंचम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। कथा में हजारों की संख्या में भक्त पधारे।

महाराज श्री ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि अपने कानों पर संयम रखे, हमेशा यह मत सोचो की जो भी व्यक्ति आए वो आपकी प्रशंसा करे। प्रशंसा सुनने से कानों की आदत बिगड़ जाती है, जब हम प्रशंसा सुनते हैं तो फिर निंदा सुनने की क्षमता समाप्त हो जाती है, एक व्यक्ति भी हमारी निंदा कर दे तो हम उसे अपना शत्रु समझ लेते हैं। प्रशंसा सुनने की आदत व्यक्ति को गर्त में ले जाती है। 
महाराज श्री ने आगे कहा कि भगवत प्राप्ति बिना साधना के नहीं हो सकती । संसार की वस्तु तुम्हारे कर्म का फल हो सकता है लेकिन ऐसा कोई कर्म नहीं जिसके बाद भगवत दर्शन प्राप्त हो सके वो तो गुरू कृपा और तुम्हारे ऊपर ठाकुर जी के अहित की कृपा हो जाए तभी संभव है। 


देवकीनंदन ठाकुर जी महाराजा ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

6Aug 2018

भगवान गोविंद देव की नगरी जयपुर में न्यूगेट स्थित रामलीला मैदान, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

कथा के चतुर्थ दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। कथा में हजारों की संख्या में भक्त पधारे।महाराज श्री ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवत कृपा का प्रत्यक्ष दर्शन हमारे जीवन में अगर कुछ है तो यह है कि हमे भगवान की भागवत कथा का श्रवण करने का भी सौभाग्य प्राप्त हो जाए, हम भगवान की कथा सुनने के लिए तैयार हो जाएं। हमे भगवान का शुक्रिया करना चाहिए की हे प्रभु आपने हमारे ऊपर कितनी बड़ी कृपा की है, सबसे बड़ी कृपा आपने यह की हमें मानव जीवन दिया और उससे भी बड़ी कृपा यह की मानव जीवन देने के उपरान्त भी आपने हमारे ह्रदय घट में यह भावन उतपन्न कर दी की भगवान की भागवत कथा सुननी चाहिए। जैसे ही मन में यह भावना आती है कि भागवत सुनने जाना है उसी समय भगवान हमारे ह्रदय में कैद हो जाते हैं।
महाराज श्री ने कहा कि हो सके तो आप जीवन में किसी के सार्थी बनो स्वार्थी मत बनो, आज हमारे दुख की वजह यही है की हम स्वार्थी तो बन गए है लेकिन सार्थी हम खुद के भी नहीं बने हैं। दूसरों का ना सही खुद का हित कर लो, लेकिन खुद का हित दूसरों को नीचा दिखाकर मत करो। जिस दिन से हम दूसरों के लिए जीना शुरू कर देंगे उस ही दिन से जीवन में सुख आना शुरू हो जाएगा।
देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली ने भगवान ब्रह्मा वरदान मांगा की मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने उसे वरदान दे दिया। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने विष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली से कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" 
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का सुंदर वर्णन श्रवण कराया। सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

5Aug 2018

भगवान गोविंद देव जी की नगरी में महाराज श्री के सानिध्य में न्यूगेट स्थित रामलीला मैदान, संगानेरी गेट जयपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

भगवान गोविंद देव जी की नगरी में महाराज श्री के सानिध्य में न्यूगेट स्थित रामलीला मैदान, संगानेरी गेट जयपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

कथा के तृतीय दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। कथा में हजारों की संख्या में भक्त पधारे।

कथा के तृतीय दिवस पर कथा पंडाल में जयपुर के माननीय सांसद श्री रामचरण बोहरा जी ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाकर महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हे स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

महाराज श्री ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जो लोग जीवन में सफल होते हैं उनकी सफलता के पीछे अगर बहुत बड़ा किसी का हाथ है तो वो है आपके सलाहकार का, आपके गुरू का। जीवन में सभी सफलता पाने चाहते हैं लेकिन बहुत सोच समझकर आपको किसी की सलाह माननी चाहिए क्योंकि आजकल जिस की खूद की नाव डूब गई है वो भी सलाह देते हैं। गुरू अगर जीवन में गलत सलाह देते तो धर्म चला जाता है, वैद्य गलत सलाह दे तो जीवन चला जाता है, आपके सलाहकार जैसे होंगे आपका जीवन उसी दिशा में चल पड़ेगा। 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...
अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा।।

4Aug 2018

"विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली"  के तत्वधान में समिति के सभी पदाधिकारी गंण, सदस्य एवं सभी स्वयंसेवकों ने मिलकर भारी बारिश के चलते कानपुर में आई बाढ़ से पीड़ित लोगों के लिए खाद्य सामग्री एवं कंबल आदि चीजों का वितरण किया तथा बाढ़ पीड़ित लोगों को जरूरत पड़ने पर मदद की,

विश्व शांति सेवा समिति कानपुर",
"विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली" 
के तत्वधान में समिति के सभी पदाधिकारी गंण, सदस्य एवं सभी स्वयंसेवकों ने मिलकर भारी बारिश के चलते कानपुर में आई बाढ़ से पीड़ित लोगों के लिए खाद्य सामग्री एवं कंबल आदि चीजों का वितरण किया तथा बाढ़ पीड़ित लोगों को जरूरत पड़ने पर मदद की,
आप सभी लोगों से निवेदन है आप लोग भी अपने आस पास की जरूरत वाली जगहों मे जाकर लोगों की मदद करें।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

4Aug 2018

भगवान श्री गोविंद देव जी की नगरी जयपुर में न्यूगेट, रामलीला मैदान, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

हेडलाइन :- “संत महात्माओं के मन में हमेशा जनकल्याण की दिव्य भावना रहती है : देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”
भगवान श्री गोविंद देव जी की नगरी न्यूगेट, रामलीला मैदान, संगानेरी गेट जयपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

कथा के दूसरे दिन भी हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। 
भागवत कथा के दूसरे दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि हमारे संत महात्मा जो हैं इनका जन्म, लीला भ्रमण, संसार में रहना परोपकार के लिए है। हमेशा उनके मन में एक ही भावना रहती है की जनकल्याण कैसे हो ? और उस दिव्य जनकल्याणकारी भावना के लिए वह प्रायसरत रहते हैं। उन्होंने कहा कि जो आपको सदमार्ग दिखाते हैं वहीं आपके शुभचिंतक हैं। लेकिन समाज में दुर्भाग्य यह है कि बुरे विचार देने वाले जो लोग हैं उन्हे हम अपने शुभचिंतक समझते हैं और अच्छे विचार देने वालों को हम अपना शत्रु समझते हैं। यह जो नकारात्मक भावना हमारे मन में भर गई हैं यही हमे दुख देती है।

महाराज श्री ने कहा कि वैराग्य और ज्ञान से भक्ति पुष्ट होती है इसलिए वैराग्य और ज्ञान जरूर होना चाहिए। पहले भक्ति हो भक्ति आपको ज्ञान प्राप्त करा देगी और भक्ति ही आपको वैराग्य भी स्वयं करा देगी। लेकिन भक्ति दुनिया को दिखाने के लिए ना हो भक्ति खुद के लिए हो।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।

श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।

यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

3Aug 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में मुख्य यजमान मोहिनी देवी एवं सुरेश चंद्र गोयल जी के द्वारा 03 से 09 अगस्त 2018 तक प्रतिदिन रामलीला मैदान, न्यू गेट, संगानेरी गेट, जयपुर (राजस्थान) में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के पहले दिन महाराज जी ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

 

कथा के पहले दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। 
भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि गोविंद देव जी की कृपा के बगैर यह संभव नहीं है की श्रावण मास में श्रीमद्भागवत कथा सुनने को मिल सके। श्रावण मास अति सुंदर मास है और इस पवित्र मास में जो भी सतकर्म किए जाते हैं उनका कई गुना फल मिलता है। यह श्रावण मास भगवान शिव को तो प्यारा है ही श्याम को भी प्यारा है।

महाराज श्री ने कांवड के द्वारा जल लाकर भगवान शिव पर चढ़ाने का महत्व भी समझाया, उन्होंने कहा कि इस श्रावण मास में आपने देखा होगा पूरे देश में कांवडिएं गंगा से जल लेकर आते हैं और भगवान शिव पर चढ़ाते हैं। इसका एक विशेष महत्म हैं जिस समय समुंदर मंथन हुआ सर्वप्रथम विष निकला जिसे ना तो दैत्य लेने का तैयार हुए, ना ही देवता। यही समाज का नियम है की जब बुराई सामने आती है तब कोई नहीं लेना चाहता है लेकिन जब अच्छाई सामने आती है तो सब ले लेना चाहते हैं। जब कोई भी इस विष को लेने को तैयार नहीं हुआ तो भगवान शिव शंकर ने देवताओं का हित समझते हुए विषपान कर लिया और विष का पान करने के बाद बाबा के तन का ताप बढने लगा। बाबा ने शितलता प्राप्त करने के लिए चंद्रमा को अपने मस्तिष्क पर धारण किया, इंद्र देव ने घनघोर वर्षा की, अनेकों कोशिशें होने लगी और तभी से बाबा भोलेनाथ के ऊपर पंचामृत का अभिषेक होने लगा। यह विष का पान बाबा भोले नाथ ने श्रावण मास में किया था इसलिए तब से ही भक्तों द्वारा बाबा का ताप करने के लिए कावंड लाकर जलाभिषेक किया जाता है।

महाराज श्री ने आगे कहा कि भागवत के प्रथम श्लोक के उच्चारण सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे! तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नुम:। से की। उन्होंने कहा कि भागवत का यह प्रथम श्लोक भागवत का स्वरूप कैसा है, सत् घन चित घन और आनन्द स्वरूप है ऐसे भगवान सच्चिदानंद स्वरूप है, जो पूरे विश्व का पालन, सृजन और संघारण करते हैं। तीनों के जो हेतु हैं तथा जिनकी पावन चरण शरण ग्रहण करते ही जीव का तापत्र अपने आप समाप्त हो जाता है। दैहिक, दैविक, भौतिक ये तीन प्रकार के ताप हैं इन तीनों तापों को अगर कोई समाप्त कर सकता है तो सिर्फ परमात्मा का नाम और प्रभाव ही है और कुछ भी नहीं।

महाराज श्री ने आगे कहा कि ये भागवत कोई साधारण नहीं है ये दुनिया का सबसे बड़ा औषधालय है लेकिन मिलता उन्ही को है जो रोगी श्रद्धा से आते हैं। यहां हर कोई रोगी है किसी को काम का रोग लगा है, किसी को क्रोध का, किसी को मोह का, किसी को तृष्णा है और कैंसर, ब्लड प्रेशर जैसे रोग तो एक जन्म खत्म करते हैं लेकिन काम, क्रोध, मोह तो जन्म जन्मांतर को समाप्त कर देते हैं। उन रोगों को भी मिटाने की क्षमता इस भागवत रूपी औषधालय में है।

महाराज श्री ने कहा कि ध्यान देने योग्य बात है कि तन के बाहर का अंधकार उस अंधकार को हम प्रकाश से दूर कर सकते हैं लेकिन मन के भीतर जो अंधकार है उसे कैसे मिटाया जाए। हमारे बाहर इतना अंधकार नहीं है जितना हमारे भीतर अंधकार है, जहां कोई लाइट नहीं है, जहां कोई सूर्य की किरणें नहीं पहुंच सकती। सूर्य की किरणें जहां पहुंचने में असक्षम हैं वहां पर सद् गुरूदेव भगवान की वाणी ही है जो ज्ञान रूपी प्रकाश करके हमारे मन के अंधकार को समाप्त करती हैं।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। .

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

31Jul 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के द्वारा सांस्कृतिक महोत्सव 2018 का 28 से 30 जुलाई 2018 तक तालकटोरा स्टेडियम दिल्ली में भव्य आयोजन किया गया। हमारे देश की युवा पीढ़ी को संस्कृति का बोध कराने और एक नए भारत का निर्माण करने हेतु इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य था हमारी आने वाली पीढ़ी संस्कृति को जाने, हमारी विरासत से रूबरू हो।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के द्वारा सांस्कृतिक महोत्सव 2018 का 28 से 30 जुलाई 2018 तक तालकटोरा स्टेडियम दिल्ली में भव्य आयोजन किया गया। हमारे देश की युवा पीढ़ी को संस्कृति का बोध कराने और एक नए भारत का निर्माण करने हेतु इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य था हमारी आने वाली पीढ़ी संस्कृति को जाने, हमारी विरासत से रूबरू हो। 


तीन दिवसीय इस कार्यक्रम का विषय हर दिन अलग रखा गया था। प्रथम दिवस का विषय नारी शक्ति पर आधारित था जिसमें अपने क्षेत्र में विशिष्ठ योगदान देने वाली नारी शक्ति को स्मृति चिन्ह एवं सहयोग राशि देकर सम्मानित किया गया। इस आयोजन में देश की राजनीति की दिग्गज हस्तियां ने भी शिरकत की जिनमें प्रथम दिवस मुख्य अतिथि के रूप में महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती मेनका गांधी, एवं विशिष्ठ अतिथि के रूप में संसदीय मामलों के राज्य मंत्री श्री विजय गोयल जी एवं सांसद श्री साक्षी महाराज जी ने कार्यक्रम में अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई। (PHOTO 1 to 14)
द्वितीय दिवस का विषय हमारे देश के लिए प्राणों का बलिदान देने वाले वीर जवानों को समर्पित था जिसमें हमारे वीर जवानों और शहीदों के परिवार वालों को स्मृति चिन्ह एवं सहयोग राशि देकर सम्मानित किया गया। द्वितीय दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में कानून एवं न्याय मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद एवं विशिष्ठ अतिथि के रूप में श्रीमती मीनाक्षी लेखी, सांसद एवं भाजपा राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं सांसद श्री साक्षी महाराज जी ने कार्यक्रम में अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई। (PHOTO 15 to 30)


तृतीय दिवस का विषय था संस्कृत, संस्कृति और संस्कार, भारत वर्ष का एक आधार, आओ करें एक नए भारत का निर्माण। तृतीय दिवस पर मुख्य अतिथियों में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री गिरिराज सिंह जी, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री विजय सांपला जी, राज्यसभा सांसद श्री सत्यनारायण जाटिया, सांसद श्रीमती प्रियंका रावत, एवं सांसद श्री साक्षी महाराज जी ने कार्यक्रम में अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज द्वारा सभी अतिथियों को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। (PHOTO 31 to 44 )

30Jul 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में तालकटोरा स्टेडियम, दिल्ली में सांस्कृतिक महोत्सव 2018 का आयोजन 28 से 30 जुलाई 2018 तक किया गया। हमारे देश की युवा पीढ़ी को संस्कृति का बोध कराने और एक नए भारत का निर्माण करने हेतु इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के तृतीय दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री Giriraj Singh जी, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री श्री Vijay Sampla जी, राज्यसभा सांसद श्री Dr Satyanarayan Jatiya जी, सांसद श्रीमती Priyanka Singh Rawat जी एवं सांसद श्री Dr. Swami Sakshi Ji Maharaj जी ने कार्यक्रम में अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज द्वारा उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। । 

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में तालकटोरा स्टेडियम, दिल्ली में सांस्कृतिक महोत्सव 2018 का आयोजन 28 से 30 जुलाई 2018 तक किया गया। हमारे देश की युवा पीढ़ी को संस्कृति का बोध कराने और एक नए भारत का निर्माण करने हेतु इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के तृतीय दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री Giriraj Singh जी, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री श्री Vijay Sampla जी, राज्यसभा सांसद श्री Dr Satyanarayan Jatiya जी, सांसद श्रीमती Priyanka Singh Rawat जी एवं सांसद श्री Dr. Swami Sakshi Ji Maharaj जी ने कार्यक्रम में अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज द्वारा उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। । 


तीन दिवसीय यह कार्यक्रम में हर दिन एक अलग विषय पर रहा। तीन दिवसीय इस कार्यक्रम की थीम हर दिन अलग रखी गई थी। पहले दिन की थीम नारी शक्ति पर आधारित थी जिसमें अपने क्षेत्र में विशिष्ठ योगदान देने वाली नारी शक्ति को स्मृति चिन्ह एवं सहयोग राशि देकर सम्मानित किया गया, तो वहीं दूसरे दिन की थीम हमारे देश के लिए प्राणों का बलिदान देने वाले वीर जवानों को समर्पित थी जिसमें हमारे वीर जवानों और शहीदों के परिवार वालों को स्मृति चिन्ह एवं सहयोग राशि देकर सम्मानित किया गया। तीसरे दिन की थीम संस्कृत, संस्कृति और संस्कार, भारत वर्ष का एक आधार, आओ करें एक नए भारत का निर्माण है।


पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कार्यक्रम में सभी जनता को संबोधित किया एवं कार्यक्रम में मौजूद सम्मानित जनता और अतिथियों का कार्यक्रम में अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाने के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति विश्व की सर्वाधिक प्राचीन एवं समृद्ध संस्कृति है। भारत देश संस्कृत, संस्कृति और संस्कार के समावेश वाला देश है, हमारी परंपराएं, भाषाएं और कलाएं ही हमारी पहचान है। प्राचीन सभ्यता के बलबूते ही आज हम एक सभ्य समाज में जी रहे है। हमारे ऋषि परंपराओं ने ही हमे संस्कृत, संस्कृति और संस्कार का बोध कराया है। भारतीय संस्कृति में इतनी ताकत है कि पाश्चात्य संस्कृति भी भारतीय संस्कृति से प्रभावित रही है। भारतीय संस्कृति के प्रति पाश्चात्य लोगों में जिज्ञासा बढ़ रही है और वो भारतीय संस्कृति को जानने समझने भारत आते हैं। भारतीय संस्कृति के महत्वपूर्ण तत्व शिष्टाचार, सभ्य संवाद, धार्मिक संस्कार, मान्यताएँ और मूल्य आदि हैं। आज कल हर व्यक्ति की जीवन शैली आधुनिक हो रही है लेकिन भारतीय पूरे विश्व में जहां भी है वहां वह आज भी अपनी परंपरा और मूल्यों को बनाए हुए हैं। 


पूज्य महाराज श्री ने कलचर टेरेरिजम पर भी अपनी बात रखते हुए कहा कि आज के युवा आइटम सांग देखते हैं क्या वो बच्चे संस्कारी बनेंगे, अगर बच्चों को संस्कारी बनाना है तो गीता पढ़ाओ, रामायण पढ़ो, आप आइटम सान्ग देखकर संस्कारी नहीं बन सकते। उन्होंने कहा कि आजकल कान्वेट में पढ़ने वालें बच्चों को कहा जाता है कि आप चोटी नहीं रख सकते, हाथ में कलेवा नहीं बांध सकते, तिलक नहीं लगा सकते अगर आपने ऐसा किया तो आपको स्कूल से निकाल दिया जाएगा। क्या यह हमारे संस्कारों, संस्कृति को खत्म करने की साजिश है। महाराज श्री ने मा. मंत्री श्री गिरिराज सिंह जी के समक्ष यह बात रखी तो मंत्री जी ने कहा की अगर मिशिनरी का स्कूल हमारे संस्कारों का विरोध करता है त पूरे देश को उसका विरोध करना चाहिए।
महाराज श्री ने कहा कि हमारे नए देश का निर्माण वो युवा करेगा जिसके एक हाथ में कम्प्यूटर और एक हाथ में गीता होगी। उन्होंने कहा कि अगर हॉलैंड में गीता पढ़ाई जा सकती है, विदेशी धरती पर गीता के उपदेश दिए जा सकते हैं तो भारत में क्यों नहीं पढ़ाई जाती।


महाराज श्री ने कहा कि हर महीने ऐसे आयोजन होने चाहिएऐ ताकि भारतीय युवाओं को भारत की संस्कृति को जानने का अवसर मिल सके। महाराज श्री ने युवाओं को सफल होने का मंत्र भी दिया, उन्होंने कहा कि जीवन में सबसे सरल उपाय है कि अपने माता पिता के चरणों का आशीर्वाद हर दिन लिया करों और सफलता आने के बाद अहंकार मत आने दो क्योंकि अहंकार हमे फिर से गर्त में ले जाता है। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा।।

30Jul 2018

कार्यक्रम के तृतीय दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री Giriraj Singh जी, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री श्री Vijay Sampla जी, राज्यसभा सांसद श्री Dr Satyanarayan Jatiya जी, सांसद श्रीमती Priyanka Singh Rawat जी एवं सांसद श्री Dr. Swami Sakshi Ji Maharaj जी ने कार्यक्रम में अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज द्वारा उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम के तृतीय दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री Giriraj Singh जी, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री श्री Vijay Sampla जी, राज्यसभा सांसद श्री Dr Satyanarayan Jatiya जी, सांसद श्रीमती Priyanka Singh Rawat जी एवं सांसद श्री Dr. Swami Sakshi Ji Maharaj जी ने कार्यक्रम में अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज द्वारा उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

29Jul 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में तालकटोरा स्टेडियम, दिल्ली में सांस्कृतिक महोत्सव 2018 का आयोजन किया जा रहा है। हमारे देश की युवा पीढ़ी को संस्कृति का बोध कराने और एक नए भारत का निर्माण करने हेतु इस कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। कार्यक्रम के द्वितीय दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में कानून एवं न्याय मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद एवं विशिष्ठ अतिथि के रूप में श्रीमती मीनाक्षी लेखी, सांसद एवं भाजपा राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं सांसद श्री साक्षी महाराज जी ने कार्यक्रम में अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज द्वारा उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। 

तीन दिवसीय इस कार्यक्रम में हर दिन एक अलग थीम है। दूसरे दिन की थीम हमारे देश के लिए प्राणों का बलिदान देने वाले वीर जवानों को समर्पित रही जिसमें हमारे वीर जवानों और शहीदों के परिवार वालों को मुख्य अतिथि श्री रविशंकर प्रसाद जी द्वारा स्मृति चिन्ह एवं सहयोग राशि देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में देश भक्ति के कई नृत्य नाटिकाओं की प्रस्तुती दी गई। 

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कार्यक्रम में सभी जनता को संबोधित किया एवं देशभक्ति के गीतों से देशप्रेम की भावन को व्यक्त किया। उन्होंने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि 15 अगस्त 1947 वो ऐतिहासिक लम्हा जब हम आज़ाद हुए और उस आज़ादी को पाने के लिए हमारे देश के वीरों ने अपना लहू बहाया। महात्मा गाँधी, भगत सिंह, सुखदेव, चंद्र शेखर आज़ाद जैसे शूरवीरों ने अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। उनके अद्मय साहस, पराक्रम, का ही परिणाम है कि ही भारत आज एक आजाद देश के साथ साथ विश्व शक्ति बनने की राह में खड़ा है। भारत के शहीदों ने जहां हमे आजादी दिलाई, वहीं देश की वीर जवानों ने सरहदों पर अपने प्राणों का बलिदान देते हुए इस देश की रक्षा की है। भारत आज एक विकसित देश के रूप में खड़ा है, भारत की सैन्य शक्ति किसी भी देश का सामना करने में सक्षम है। इतिहास गवाह है की जिसने भी भारत से टकराने की कोशिश की है उसे मुंह की खानी पड़ी है। भारत जमीन से लेकर आसमान तक अपना वर्चस्व रखता है। भारत की जमीं जहां सोना उगलती है वहीं आसमानी निगाहें देश की रक्षा करती है। सरहदों पर हमारे वीर जवान देश की हिफाजत के लिए दिन रात ना देखते हुए अपनी छाती को ढ़ाल बनाते हुए हमारी रक्षा करते हैं। आज देश के कोने कोने में "भारत " माता की जय के नारे गुंज़ेते है। हम सबको हिंदुस्तानी होने पर गर्व होता है और क्यों न हो? आज शायद ही दुनिया का ऐसा कोई कोना है जहां भारतीयों ने अपनी कला काबिलियत से दुनिया को नतमस्तक न किया हो। आज हम सब अपने अपने घरो में देश दुनिया की बाते करते है, त्यौहार मानते है, हम सब अपनी अपनी ज़िंदगियों में परिवार के साथ अपना भविष्य तय करते है, रात को चैन की नींद सोते है, क्योकि हम सब यह बात अच्छी तरह से जानते है की कोई है जो हमारे लिए परिवार से दूर, हर सुख सुविधा से दूर अपनी धरती माँ की रक्षा ले लिए जाग रहा है हमारे देश के वीर जवान जिन पर हम सब को गर्व है। हमारी गीता में "निष्काम कर्म" पर ज़ोर दिया गया है यहां कहा भी जाता है की चाहे जिस्म में खून की बूँद न रहे सासों से नाता टूट जाये, पर योद्धा का धर्म है लड़ना। इस युक्ति को यदि कोई आज भी सिद्ध कर रहा है तो वो है हमारे देश के जवान, बॉर्डर पर वो अपना काम पूरी निष्ठा और ईमानदारी कर रहे है।

29Jul 2018

सांस्कृतिक महोत्सव के द्वितीय दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में कानून एवं न्याय मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद एवं विशिष्ठ अतिथि के रूप में सांसद एवं भाजपा राष्ट्रीय प्रवक्ता श्रीमती मीनाक्षी लेखी, सांसद श्री साक्षी महाराज जी ने कार्यक्रम में अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई।

सांस्कृतिक महोत्सव के द्वितीय दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में कानून एवं न्याय मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद एवं विशिष्ठ अतिथि के रूप में सांसद एवं भाजपा राष्ट्रीय प्रवक्ता श्रीमती मीनाक्षी लेखी, सांसद श्री साक्षी महाराज जी ने कार्यक्रम में अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई। पूज्य महाराज श्री के द्वारा उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

 

28Jul 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 28 से 30 जुलाई 2018 तक तालकटोरा स्टेडियम में सांस्कृतिक महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। महोत्सव का उद्देश्य हमारी संस्कृत, संस्कृति और संस्करों को एक मंच के माध्यम से परोसकर देश के युवाओं को इस लोक परंपराओं का बोध करना है। महोत्सव का प्रथम दिवस नारी शक्ति को समर्पित रहा जिसमें देशहित के कार्य करने वाली हमारी नारी शक्तियों को सम्मानित किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 28 से 30 जुलाई 2018 तक तालकटोरा स्टेडियम में सांस्कृतिक महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। महोत्सव का उद्देश्य हमारी संस्कृत, संस्कृति और संस्करों को एक मंच के माध्यम से परोसकर देश के युवाओं को इस लोक परंपराओं का बोध करना है। महोत्सव का प्रथम दिवस नारी शक्ति को समर्पित रहा जिसमें देशहित के कार्य करने वाली हमारी नारी शक्तियों को सम्मानित किया गया। महोत्सव में कई राजनितिक हस्तियों ने भी शिरक्त की जिनमें महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती Maneka Gandhi जी, संसदीय कार्यों के राज्यमंत्री श्री Vijay Goel जी, सांसद श्री Dr. Swami Sakshi Ji Maharaj जी ने अपनी गिरमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई।

सांस्कृतिक महोत्सव में नारी शक्ति को समर्पित कई कार्यक्रमों का भी आयोजन किया गया।
पूज्य महाराज श्री ने महोत्सव को संबोधित करते हुए कहा कि विषय महिला सशक्तिकरण का है तो पहले हम ये बात समझें की आखिर ये सशक्तिकरण क्या है ? क्या वाकई इस शब्द का प्रयोग महिलाओं के लिए उचित है। सशक्तिकरण यानि सश्कत बनना यानि शक्ति देना। इस शब्द के गूढ़ में जाएं तो हास्यपद लग सकता है कि सृष्टि को जन्म देने वाली उसका भरण पोषण करने वाली महिला को सशक्त बनाने के लिए अभियान आंदोलन चलाए जाएं, जो स्वयं में सृष्टि है, जो स्वयं नियता क्या वो आशक्त हो सकती है कदापि नहीं।


महाराज श्री ने कहा कि ऋगवेद में वर्णित है यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते तत्र रमन्ते देवता यानि जहां नारी की पूजा होती है वहां देवताओं का वास होता है और देवताओं का वास स्थान यानि स्वर्ग तो अर्थ यह है कि नारी का सम्मान हो तो वह जगह देवस्थान है। महर्षि मनु ने कहा कि दस उपाध्यायों के बराबर एक आचार्य, सौ आचार्यों के बराबर एक पिता, एक हजार पिताओं से अधिक गौरवपूर्ण माँ होती है। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

28Jul 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में आयोजित सांस्कृतिक महोत्सव का प्रथम दिवस नारी शक्ति को समर्पित रहा।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में आयोजित सांस्कृतिक महोत्सव का प्रथम दिवस नारी शक्ति को समर्पित रहा। महोत्सव में कई राजनितिक हस्तियों ने भी शिरक्त की जिनमें महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती Maneka Gandhi जी, संसदीय कार्यों के राज्यमंत्री श्री Vijay Goel जी, सांसद श्री Dr. Swami Sakshi Ji Maharaj जी ने अपनी गिरमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई।

 

27Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के पावन सानिध्य में 26 और 27 जुलाई 2018 को "गुरु पूर्णिमा महोत्सव" का सुंदर एवं भव्य आयोजन ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर के प्रांगण में गुरु पूर्णिमा महोत्सव का आयोजन बड़ी हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।

पूज्य महाराज श्री के पावन सानिध्य में 26 और 27 जुलाई 2018 को "गुरु पूर्णिमा महोत्सव" का सुंदर एवं भव्य आयोजन ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर के प्रांगण में गुरु पूर्णिमा महोत्सव का आयोजन बड़ी हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। जिसमें हजारों की तादाद में देश विदेश से भक्त पधारे। जिसमें सभी भक्तों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया एवं सर्वप्रथम गणेश वंदना कर कार्यक्रम की शुरुआत की गई तथा ठाकुर श्री प्रियाकांतजू भगवान, सर्वेश्वरीश्री राधा रानी के प्यारे प्यारे भजनों की प्रस्तुति दी गई। महाराज श्री द्वारा गाये गये भजनो पर सभी भक्तगण झूमते नाचते रहे। अंत में ठाकुर श्री प्रियाकांतजू भगवान की आरती का कार्यक्रम का समापन किया गया।

26Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के पावन सानिध्य में 26 और 27 जुलाई को शांति सेवा धाम, वृंदावन में गुरू पूर्णिमा महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। गुरू पूर्णिमा महोत्सव के प्रथम दिवस पर हजारों की तादाद में देश विदेश से भक्त पधारे। महाराज श्री ने गुरू पूर्णिमा के महत्व और गुरू महिमा का वृतांत भक्तों को श्रवण कराया। 

पूज्य महाराज श्री के पावन सानिध्य में 26 और 27 जुलाई को शांति सेवा धाम, वृंदावन में गुरू पूर्णिमा महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। गुरू पूर्णिमा महोत्सव के प्रथम दिवस पर हजारों की तादाद में देश विदेश से भक्त पधारे। महाराज श्री ने गुरू पूर्णिमा के महत्व और गुरू महिमा का वृतांत भक्तों को श्रवण कराया। 


प्रथम दिवस की शुरूआत विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने गुरू पूर्णिमा महोत्सव की शुरूआत करते हुए कहा कि अगर हमे कोई गाड़ी चलाना ना सीखाए तो हमे कैसे पता चलेगा की गाड़ी कैसे चलानी है, उसके लिए कोई गुरू होता है जो बताता है की क्लच दबा, गेयर डाल, स्टेयरिंग संभाल, साइड देख, तब हम आगे बढ़ते हैं। कोई तो है जो मुझे ड्राइव करना सिखाता है, शुरू में मेरी माँ मुझे सीखाती थी खाना कैसे खाना है, बोलना कैसे है, कोई तो है जो मुझे कपड़े पहना सीखाता है, कोई तो है जो मुझे मेरे हाथ में किताब देकर सीखाता है पढ़ना कैसे है, लिखना कैसे हैं। जीवन में आपके पास जो है वो किसी ना किसी के माध्यम से है, सीधे नहीं है। कही से तो आपने सीखा है, किसी को देख कर सीखा है, कोई अगर यह कहे की ये मैने खुद कर लिया ऐसा नहीं होता है, कहीं से हम सीखते हैं, कही से हम लेते हैं।
महाराज श्री ने कहा कि जीवन में आप बिना गुरू के कुछ नहीं कर सकते, अनपढ़ ही रह जाओगे अगर आपको जीवन में गुरू नहीं मिलेगा। बोल नहीं पाओगे अगर जीवन में माँ रूपी पहला गुरू ना मिले, अध्यात्म में ईश्वर से नहीं मिल पाओगे अगर कोई सद्गुरू ना मिले। 
पूज्य महाराज श्री के श्रीमुख से निकले हुए भजनों पर भी सभी भक्त खूब झूम, सभी भक्तों ने गुरू पूर्णिमा का प्रथम दिवस बड़ी ही धूमधाम से मनाया।

26Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में गुरू पूर्णिमा महोत्सव से पूर्व श्रीधाम वृंदावन में गुरू दीक्षा का आयोजन किया गया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में गुरू पूर्णिमा महोत्सव से पूर्व श्रीधाम वृंदावन में गुरू दीक्षा का आयोजन किया गया जिसमें देश विदेश से आएं सैकड़ो भक्तों ने महाराज श्री से दीक्षा प्राप्त की। गुरू दीक्षा प्राप्त करने के पश्चयात सभी भक्तों ने महाराज श्री के आशीष वचनों पर अमल कर सच्चाई के पथ पर चलने और अपनी संस्कृत, संस्कृति और संस्कारों को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।

27Jul 2018

आज सुबह 7 बजे पूज्य महाराजश्री पहुँचे वृन्दावन अपने सद्गुरुदेव वृन्दावन भागवत पीठाधीश्वर भागवत सम्राट निम्बार्क रत्न शास्त्रार्थ महारथी श्री पुरुषोत्तम शास्त्री जी महाराज के पूजन के लिए पूज्य सद्गुरुदेव का पूजन कर पूज्य महाराजश्री ने आशीर्वाद प्राप्त किया।

गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । 

गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥

आज सुबह 7 बजे पूज्य महाराजश्री पहुँचे वृन्दावन अपने सद्गुरुदेव वृन्दावन भागवत पीठाधीश्वर भागवत सम्राट निम्बार्क रत्न शास्त्रार्थ महारथी श्री पुरुषोत्तम शास्त्री जी महाराज के पूजन के लिए पूज्य सद्गुरुदेव का पूजन कर पूज्य महाराजश्री ने आशीर्वाद प्राप्त किया। सद गुरुदेव भगवान की जय।। राधे राधे।

 

27Jul 2018

गुरू पूर्णिमा के विशेष पर्व पर "गुरु पूजन" करने हजारों की तादाद में देश विदेश से भक्त पधारे। सभी भक्तों ने महाराज श्री के श्री चरणों में पूजन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

 

पूज्य महाराज श्री के पावन सानिध्य में 26 और 27 जुलाई को शांति सेवा धाम, वृंदावन में गुरू पूर्णिमा महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। गुरू पूर्णिमा के विशेष पर्व पर "गुरु पूजन" करने हजारों की तादाद में देश विदेश से भक्त पधारे। सभी भक्तों ने महाराज श्री के श्री चरणों में पूजन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

 

27Jul 2018

गुरू पूर्णिमा के पावन अवसर पर गुरू पूजन के लिए भक्तों की लंबी कतार लगी। भारी बारिश की परवाह किए बगैर भक्त पूज्य महाराज श्री का आशीर्वाद लेने के लिए घंटो कतार में लगे रहे।

गुरू पूर्णिमा के पावन अवसर पर गुरू पूजन के लिए भक्तों की लंबी कतार लगी। भारी बारिश की परवाह किए बगैर भक्त पूज्य महाराज श्री का आशीर्वाद लेने के लिए घंटो कतार में लगे रहे।भक्तों ने महाराज श्री का पूजन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। और गुरू पूर्णिमा के पावन अवसर पर ठा. श्री प्रियाकान्त जू मन्दिर में भंडारा का आयोजन किया गया जिसमें कि हजारों की संख्या में भक्तों ने प्रसाद पाया गुरू पूर्णिमा के पावन अवसर पर हर महीने ट्रस्ट के द्वारा हजारों भक्तों के लिए भंडारा किया जाता हैं ।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

26Jul 2018

"गुरु पूजन" के पावन अवसर पर "भजन कीर्तन" का सुंदर एवं भव्य आयोजन किया गया।

"विश्व शांति सेवा समिति कानपुर"
के तत्वाधान में आज कानपुर कार्यालय मे "गुरु पूजन" के पावन अवसर पर "भजन कीर्तन" का सुंदर एवं भव्य आयोजन किया गया जिसमें सभी भक्तों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया एवं सर्वप्रथम पूज्य गुरुदेव जी का पूजन किया गया तथा ठाकुर श्री प्रियाकांतजू भगवान, सर्वेश्वरीश्री राधा रानी के प्यारे प्यारे भजनों की प्रस्तुति दी गई एवं अंत में ठाकुर श्री प्रियाकांतजू भगवान की आरती कर कार्यक्रम का समापन किया गया तदोपरांत प्रसाद का वितरण किया गया, जिसमें समिति के सभी पदाधिकारी गण, भक्तगणं, कार्यकर्ता आदि मौजूद रहे,
इस जानकारी को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए इस पोस्ट को शेयर अवश्य करें ,
आप सभी भक्त प्रेमी पूज्य गुरुदेव जी से आशीर्वाद लेने के लिए वृन्दावन अवश्य पहुंचे।
।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

25Jul 2018

दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचने पर महाराज श्री का फूलमाला पहनाकर स्वागत किया गया।

पूज्य महाराज श्री कनाडा में श्रीमद्भागवत कथा का समापन कर भारत वापस लौटे, दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचने पर महाराज श्री का फूलमाला पहनाकर स्वागत किया गया।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

25Jul 2018

कनाडा में आयोजित भागवत कथा के समापन के बाद भारत लौटते ही विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव विजय शर्मा जी द्वारा तालकटोरा स्टेडियम, दिल्ली पहुंचकर सांस्कृतिक महोत्सव 2018 की तैयारियों का जायजा लिया गया।

कनाडा में आयोजित भागवत कथा के समापन के बाद भारत लौटते ही विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव विजय शर्मा जी द्वारा तालकटोरा स्टेडियम, दिल्ली पहुंचकर सांस्कृतिक महोत्सव 2018 की तैयारियों का जायजा लिया गया। विजय जी ने सभी कार्यकर्ताओं को महोत्सव को भव्य बनाने का निवेदन किया एवं सुनिश्चित किया की किसी प्रकार की कोई कमी ना रह जाए। कार्यक्रम में राजनीति से जुड़ी कई दिग्गज हस्तियां शिरकत करेंगी उनकी सुरक्षा एवं समस्त इंट्री गेटों में सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद हो इसका भी निरिक्षण किया। सांस्कृतिक महोत्सव में प्रवेश केवल पास के जरिए ही संभव हो पाएगा। अपने पास लेने के लिए आप विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के दिल्ली कार्यालय एवं तालकटोरा स्टेडियम में कार्यक्रम के दिन इंट्री गेट पर बनाए गए कार्यालय से प्राप्त कर सकते हैं। इंट्री पास लिमिटेड है तो आप अपने पास पहले से ही सुनिश्चित करने का कष्ट करें।

22Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 15 से 21 जुलाई 2018 तक PCAE Community Center 9226 39 Avenue NW, Near Hindu Temple, Edmonton, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई।

भागवत के सप्तम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि श्रीमद्भागवत प्रत्यक्ष श्री कृष्ण हैं, श्रीमद्भागवत के शरण में विराजमान होने का अभिप्राय है हम साक्षात श्रीकृष्ण की शरण में बैठे हुए हैं, इसमें किंचित मात्र भी संदेह नहीं होना चाहिए क्योंकि ये सद् बह्रम हैं, सद कृष्ण हैं। कलयुग के जीवों का कल्याण करने के श्रीकृष्ण भागवत के रूप में ही हमारे सामने उपस्थित हैं और जो भी भागवत श्रवण करते हैं उन्हे भौतिकवादी चीजें तो मिलती ही हैं साथ ही वो मिलता है जो कठिन तपस्या करके भी प्राप्त नहीं होता वो है मोक्ष। 
महाराज श्री ने कहा कि भक्ति करनी है तो बचपन से शुरू करो, जवानी तक करो ताकि बुढापे में किसी की जरूरत ही ना पड़े, तो यह कहना की बुढ़ापे में हम भागवत कथा सुनेंगे यह सबसे बड़ी गलती है। भगवान की कथा हर दिन सुनो क्योंकि ये आपको जीना सीखाती है, आपको सुधारती है, जीवन में क्या करना चाहिए क्या नहीं ये कथा आपको सीखाती है। 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कल के कथा का क्रम को आगे बढ़ाते हुए कहा कि रुकमणी जी ने श्रीकृष्ण से प्रेम विवाह किया। भगवान ने 16 हजार 100 विवाह किए हैं लेकिन 8 विवाह अलग अलग हुए। ये 8 पटरानियां साधारण नहीं हैं लक्ष्मी जी बनी हैं रूकमणी, पार्वती जी आधे अंश से बनी हैं जामवंती और बाके आधे अंश से बनी हैं महामाया, तुलसी बनी हैं लक्ष्मणा, यमुना बनी हैं सूर्य की पूत्री कालिंदी, लज्जा बनी हैं भद्रा, गंगा बनी हैं मित्रव्रिंदा, सावित्री जी बनी हैं सत्या और पृथ्वी बनी हैं सत्यभामा। ये सांसारिक विवाह नहीं है ये पूरी प्रकृति के साथ ठाकुर जी ने विवाह किया है।
महाराज श्री ने आगे कहा कि भगवान ने 16100 विवाह इसलिए नहीं किए की उन्हे बहुत सारी पत्नियां चाहिए थी। उन्होंने इतने विवाह इसलिए किए क्योंकि उन स्त्रियों को जरूरत थी। भौमासुर नामक राक्षस ने 16 हज़ार 100 कन्याओं को बंदी बना रखा था। नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा की समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। इस कारण भगवान ने १६१०० रूप बनाकर सबके साथ एक मुहूर्त में एक साथ विवाह किया था। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने इतने विवाह किये। भगवान ने कामनावश विवाह नहीं किया था, करुणावश किया था। भगवान कहते हैं जिसको कोई नहीं अपनाता अगर वो मेरी शरण में आये तो मैं उसे अपना लेता हूँ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंततः सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।

22Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 15 से 21 जुलाई 2018 तक PCAE Community Center 9226 39 Avenue NW, Near Hindu Temple, Edmonton, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा का समापन करने के पश्चात विजय शर्मा जी और महाराज श्री ने Toronto के लिए प्रस्थान किया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 15 से 21 जुलाई 2018 तक PCAE Community Center 9226 39 Avenue NW, Near Hindu Temple, Edmonton, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा का समापन करने के पश्चात विजय शर्मा जी और महाराज श्री ने Toronto के लिए प्रस्थान किया।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

23Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में Edmonton हिंदू मंदिर में श्री कृष्ण कथा के साथ कनाडा की यात्रा पूरी हुई।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में Edmonton हिंदू मंदिर में श्री कृष्ण कथा के साथ कनाडा की यात्रा पूरी हुई। पूज्य महाराज श्री ने भक्तो को भजनों का आनंद दिलाया।

 

21Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 15 से 21 जुलाई 2018 तक PCAE Community Center 9226 39 Avenue NW, Near Hindu Temple, Edmonton, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत के षष्ठम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि अहंकार और अभिमान सबसे बुरी बलाएं हैं और धर्म का सबसे बड़ा रोड़ा है अहंकार । अभिमानी के शब्दो से पता चल जाता है कि कौन अभिमानी है, जो अभिमानी नहीं होता वो विनमर्ता से बात करता है। हर चीज का एक अलग ही अभिमान होता है, जब हम जवान होते हैं तो जवानी का भी एक अलग अहंकार होता है। जवानी के अहंकार में अपने माता पिता से कहते है कि आपको कुछ पता ही नहीं है, समय बदल चुका है, मुझे सिखाने की कोशिश मत करो। लेकिन इतना याद रखिए की आप अपने माता पिता की उम्र का अनुभव कभी प्राप्त नहीं कर सकते। आपके माता पिता के उम्र का जो अनुभव है वो आपका है और अगर आप उसे सीढ़ी बना लें तो अगर आप श्रेष्ठ है तो उनके अनुभव लेने के बाद आप प्रतिभाशाली हो सकते हैं। 


महाराज श्री ने कहा कि अगर जीवन में कोई समस्या आ जाए तो दो ही रास्ते हैं आपके पास, आपको या तो गोविंद के पास चले जाना चाहिए या गुरू के पास चले जाना चाहिए । गुरू दूर हैं तो गोविंद के पास चले जाओ वो सारी परेशानियां समाप्त कर देंगे, गोविंद दूर हो तो गुरू के पास चले जाओ वहां से सारी परेशानियां समाप्त हो जाएंगी। 


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

20Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 15 से 21 जुलाई 2018 तक PCAE Community Center 9226 39 Avenue NW, Near Hindu Temple, Edmonton, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत के पंचम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा कि शुरूआत करते हुए कहा कि सादा जीवन उच्च विचार, जीवन में जीने के लिए हमारा जीवन सरल और सीधे मार्ग से गुजरना चाहिए। व्यक्ति खुद ही मार्ग चुनता है, चाहे वो ऊंचे हों, ढेडे हों या सीधे हो यह व्यक्ति के खुद के ऊपर है। एक बात और यह मानना पड़ेगा की जितना कठिन मार्ग हम चुनेंगे उतनी ही कठनाईयों का सामना हमे करना पड़ेगा। लेकिन एक बात है सादे तरीके से जी कर हमे अपने विचार ऊंचे रखने चाहिए।
महाराज श्री ने कहा कि दूसरों को सुख दो यह सबसे बड़ा सतकर्म है और दूसरों को दुख दो यह सबसे बड़ा पाप है। व्यक्ति अपने सुख की खातिर दूसरों को दुख देने से भी चुकता नहीं है। हमे अपने श्रेष्ठ विचारों को और श्रेष्ठ करना चाहिए, अपने आप को प्रभु का दिवाना बनाना चाहिए। जितने आपके विचार श्रेष्ठ होंगे उतने आगे जाकर आप श्रेष्ठ होंगे, हमारी आने वाली पीढ़ी है वो भी आगे जाकर श्रेष्ठ होगी इसमें कोई शंका नहीं है। 
महाराज श्री ने कहा कि कन्हैया अपने भक्तों को तारने का बहाना ढूंढते हैं, जो पुतना का कल्याण कर सकते हैं वो हमारा भी कल्याण करेंगे।
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। 
महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

19Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 15 से 21 जुलाई 2018 तक PCAE Community Center 9226 39 Avenue NW, Near Hindu Temple, Edmonton, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। भागवत के चतुर्थ दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि बहुत कुछ फर्क पड़ता है कि हम लोग अपने दिमाग से क्या सोचते हैं। कई लोग होते हैं जो हमेश नेगेटिव सोचत रहते हैं और कई लोग पॉजिटिव सोचते रहते हैं। इसिलिए लोग कहते हैं हमेशा सकारात्मक सोचिए क्योंकि हमारा दिमाग चुंबक की तरह है, अगर आप हमेशा अच्छा सोचेंगे तो आपके साथ हमेशा अच्छा ही होगा, अगर आप हमेशा परेशानियों के बारे में सोचेंगे तो आपके पास परेशानियां ही आएंगी। तो इसके लिए यह करें कि हमेशा सकारात्मक सोचे, अच्छे विचार अपने मन में लाएं। 


महाराज श्री ने कहा जब भी जीवन में परेशानियां आए तो समझ लेना की तुम्हारे अपने कर्मों का मंथन चल रहा है लेकिन देव भावना से आपने ये मंथन किया है तो अमृत आपको ही मिलेगा, दैत्य विचारधारा के साथ अगर मंथन किया है तो अमृत नहीं मिलेगा। इसलिए हमेशा सकारात्मक सोचें, ईश्वर हमेशा आपके साथ है, वो तुम्हारा हमेशा से था, है और रहेगा। तो विचारों का, कर्मों का जब मंथन होगा तो फल रूपी अमृत तुम्हे जरू मिलेगा बस शर्त यह है की देवताओं वाली भावना हो। 


महाराज श्री ने कहा कि हम सब भारतीय जितने भी सनातन धर्म को मानने वाले हैं वो सब एक स्वर में काम किया करें और जहां कही भी सनातन धर्म का कार्य हो रहा हो वहां हम सब को एकसाथ जाना चाहिए इस इच्छा से की वो मेरे प्रियतम का कार्य है, मेरे ठाकुर का कार्य है। 


देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।


महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।


शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।


इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।


उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"


जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।


दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।
महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
।। राधे- राधे बोलना पड़ेगा ।।

17Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 15 से 21 जुलाई 2018 तक PCAE Community Center 9226 39 Avenue NW, Near Hindu Temple, Edmonton, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

भागवत के द्वितीय दिवस की शुरूआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

एडमॉनटन कनाडा में चल रहीं श्रीमद्भागवत कथा में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने भक्तों को कथा की शुरूआत सुंदर भजन से कराई। और कथा की शुरुआत में बताया कि जितना भगवान को देना है उतना ही आपको मिंलना है। फिर चाहे वो कथामृत ही क्यों ना हो।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओं का गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। 

भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।


यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

18Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 15 से 21 जुलाई 2018 तक PCAE Community Center 9226 39 Avenue NW, Near Hindu Temple, Edmonton, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

 

भागवत के तृतीय दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कि कहा गया है कि हरि अनंत हरि कथा अनंता, कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता । भगवान की कथा एक नहीं है अनंत है, भगवान की कथा जितनी बार भी सुनो उतनी बार नई लगती है, जितना सुनो यह मन को मोह लेती है। लेकिन यह रसिकों की बात है, जो रसिक नहीं होते उन्हे तो भगावत कथा सुननी ही नहीं चाहिए। 
महाराज श्री ने कहा कि हम लोग भगवान के दिए हुए मानव जीवन को भी सिर्फ पैसा पाने की कोशिश में गंवा देते हैं। आप धन कमाईए क्योंकि जितना धन होगा उतना धर्म होगा लेकिन भगवान ने आपको जो भी दिया है आप अपने आप को उसका मालिक मत समझो, आप उसके मुनीम हो। जो व्यक्ति भगवान की दी हुई सम्पत्ति को अपने आप को मालिक समझता है वही अपने साथ सबसे बड़ा घाटा करता है। जब हम अपने आप को मालिक समझेंगे तो धन का दुरूपयोग करेंगे और जब हम अपने आप को इसका मुनीम समझेंगे तो जो भी भगवान ने हमे दिया है उसका हिसाब देना पड़ेगा।
महाराज श्री ने कहा कि किसी भी संत का मत झूठा नहीं होता, आप जिस भी संत की वाणी पर विश्वास कर लेंगे, उसकी वाणी से आपका कल्याण हो जाएगा, वही वाक्य आपका बेड़ा पार कर देगा। महाराज श्री ने आगे कहा कि हमे उस मार्ग को अपनाना चाहिए जिस मार्ग से हमारे ऋषि जन गए हैं, नए मार्ग का निर्माण नहीं करना चाहिए। आजकल कलयुग में देखिए नए नए मार्गों का निर्माण हो रहा है, जिनके भी 2-4 हजार समर्थक हो जाते हैं वो अपना नया पंथ बना लेते हैं और समर्थक उसे स्वीकर भी कर लेते हैं। जो ऋषि परंपराओं के द्वारा पहले से मार्ग प्रशस्त किए गए है उसी परंपरा को स्वीकार करते हुए उसी के अनुसार हमें आगे बढ़ना चाहिए। 

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।

तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा।।

16Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 15 से 21 जुलाई 2018 तक PCAE Community Center 9226 39 Avenue NW, Near Hindu Temple, Edmonton, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

भागवत के प्रथम दिवस की शुरूआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।


कथा से पूर्व पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई, जिसमें मातओं बहनों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।


पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भागवत कथा जीव को श्रेष्ठ ज्ञान देती है। यह भागवत भक्ति ज्ञान वैराग्य से पूर्ण है, जीवन जीने के लिए ज्ञान होना जरूरी है, भगवान को पाने के लिए भक्ति का होना जरूरी है और भगवान से ना मिटने वाला प्रेम हो सके उसके लिए थोड़ा वैराग्य भी जरूरी है। यह जरूरी नहीं कि हम घर छोड़ देंगे तो वैरागी होंगे , कई बार तो हम घर में रहते हुए भी वैरागी हो जाते हैं। कुछ भी खाने का, इस्तेमाल करने का मन नहीं करता सिर्फ श्याम से मिलने की इच्छा दिल में प्रकाट होती चली जाती है, इतनी प्रगाट हो जाती है कि उस इच्छा को लेकर रात दिन हमारी आंखों से अश्रु बिंदू बहते रहते हैं और वही वैरागी है तो दुनिया के लिए ना रोए, कृष्ण के लिए जिसकी आंखों में आंसू रहते हों। दुनिया का कोई भी आक्रषण उसे अपनी ओर ना आकृषित कर सके अपितु कृष्ण की याद, कृष्ण की कथा, कृष्ण का दर्शन, कृष्ण का श्रवण जीवन का एकमात्र उद्देश्य बन जाए। और मानव जीवन में ही हम लोग कृष्ण को पा सकते हैं और कोई विकल्प नहीं है कि किसी ओर जीवन में हम उसे पा सकें सिर्फ मानव जीवन में ही यह उपलब्धि हमें प्राप्त हो सकती है।


महाराज श्री ने आगे कहा कि ईश्वर को आप तब तक नहीं जान सकते जब तक ईश्वर की जानने की जिज्ञासा आपके मन में नहीं है। ईश्वर को जानने की जिज्ञासा आपमें होनी चाहिए, ईश्वर को जानने की जिज्ञासा का मतलब है अपने आपको जानने की जिज्ञासा। दो में से किसी एक को जान लो तो दोनों को जान जाओगे। या तो ईश्वर को जानने की कोशिश करो या तो ईश्वर को जानने की कोशिश करो। व्यक्ति इन दोनों को जानने की कोशिश नहीं करता बाकि सबको जानने की कोशिश करता है। कभी कोशिश किजिए की मैं कौन हूं ?, कहां से आया हूं ?, मेरा मकसद क्या है ? इसिलिए भगवान की कथाएं सुननी चाहिए, भगवान की कथाएं तुमहे तुमसे मिला देती हैं। जो लोग भगवान की कथाएं सुनते हैं, जानना चाहते हैं वो लोग कई बार खुद को जानना नहीं चाहते उसके बावजूद खुद को जान जाते हैं। 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार नैमिषारणय में सनकादिक ऋषि विराजमान थे तभी वहां परम श्रद्धेय सूद जी महाराज पधारे। जब सूद जी महाराज वहां पधारे तो उन्हें एक बहुत सुंदर आसन दिया और वहां पर उनको बैठाया। तो सभी ऋषियों ने सूद जी महाराज से ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।


व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

15Jul 2018

आज पूज्य महाराज श्री Edmonton,Canada एयरपोर्ट पहुँचे तो भारी संख्या में भक्तों ने महाराज श्री का स्वागत किया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 08 से 14 जुलाई 2018 तक Vedic Hindu Cultural Society, Surrey, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा का समापन करने के पश्चात महाराज श्री ने Edmonton के लिए प्रस्थान किया। वहां 15 से 21 जुलाई तक कथा का आयोजन किया जा रहा है।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

15Jul 2018

आज Edmonton, Canada में भागवत कथा शुरू होने से पूर्व महाराज श्री के सानिध्य में कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई।

आज Edmonton, Canada में भागवत कथा शुरू होने से पूर्व महाराज श्री के सानिध्य में कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई। माताएं बहनें बढ़ चढ़कर कलश यात्रा में शामिल हुई।

14Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 08 से 14 जुलाई 2018 तक Vedic Hindu Cultural Society Surrey, CANADA में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत के षष्ठम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान सर्वत्र व्याप्त, हमारे ह्रदय में नित्य निरंतर वास करने वाले भगवान की जब कृपा होती है तो हमें भागवत सुनने का परम सौभाग्य प्राप्त होता है। भगवान के उत्सव में पहुंचना ये साधारण विषय नहीं है, लाख कृपा जब ईश्वर करें और हमारे सत्कर्मों की कृपा हो तब भगवान के उत्सवों में सम्मिलित होने का सौभाग्य मिलता है। एक बात जीवन भर बात रखना ये जो भगवत उत्सव होते हैं, ये भगवान के उत्सव सब पृथ्वी पर ही होते हैं और कही नहीं होते हैं, स्वर्ग में यह उत्सव करने का सौभाग्य प्राप्त नहीं होता। मृत्युलोक में करवाए गए भगवान के उत्सव हमें भगवान के धाम तक पहुंचा देते हैं। 


महाराज श्री ने कहा कि मनुष्य में ज्ञान होना चाहिए अभिमान नहीं, ज्ञान बहुत अच्छा है लेकिन ज्ञान का अभिमान बहुत बुरा। ज्ञान के माध्यम भगवान को प्राप्त किया जा सकता है। लेकिन एक भगवान ने कहा है कि अगर तुम अभिमानी हुए तो मुझसे नहीं मिल सकते। और ऐसे कई उदाहरण है कि जब ज्ञान हुआ तो ज्ञान के माध्यम से भगवान को प्राप्त करने की कोशिश की है और कईयों को भगवान मिले भी हैं लेकिन जब अभिमानी हो गए तो भगवान ने उनको छोड़ भी दिया। इसिलिए व्यक्ति को ज्ञानी होना चाहिए अभिमानी नहीं, इस बात को अपने जीवनें में उतारना चाहिए।


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 
 

15Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 08 से 14 जुलाई 2018 तक Vedic Hindu Cultural Society, Surrey, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई।

भागवत के सप्तम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि आज के युवा एक बात कहते हैं कि सत्संग जरूरी क्यों है ? हमारा मन शुद्ध है तो हम सत्संग में क्यों जाएं ? लेकिन मैं युवाओं से पूछना चाहूंगा की ये कौन निर्धारित करते हैं कि हमारा मन शुद्ध है। आपके विचारधारा बताती है कि आपका मन शुद्ध है कि नहीं और कथाएं इसमें आपकी मदद करती हैं। बिनु सत्संग विवेक ना होई, जीवन में कर्मों की सफलता लाने के लिए भगवान की कथाएं, सत्संग जरूरी है यह हमारे जीवन को आगे बढ़ाती हैं।

महाराज श्री ने कहा कि सत्य की राह बढ़ी कठिन होती है, सत्य की राह हमेशा कांटों भरी होती है इसलिए लोग इस राह पर चल नहीं पाते हैं, पहले तो सब दम भरते हैं की हम सच्चें है लेकिन जब वह राह आती है कांटों भरी तो छोड कर भाग जाते हैं, क्योंकि हमें सत्य भी तभी स्वीकार है जब उसमें सुख हों लेकिन हमेशा सत्य में सुख नहीं होते, कभी कभी सत्य की राह में बढ़ी परेशानियां भी होती हैं और तब याती है कि ठाकुर जी आप ही संभालो और ठाकुर जी संभालते भी हैं।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कल के कथा का क्रम को आगे बढ़ाते हुए कहा कि रुकमणी जी ने श्रीकृष्ण से प्रेम विवाह किया। भगवान ने 16 हजार 100 विवाह किए हैं लेकिन 8 विवाह अलग अलग हुए। ये 8 पटरानियां साधारण नहीं हैं लक्ष्मी जी बनी हैं रूकमणी, पार्वती जी आधे अंश से बनी हैं जामवंती और बाके आधे अंश से बनी हैं महामाया, तुलसी बनी हैं लक्ष्मणा, यमुना बनी हैं सूर्य की पूत्री कालिंदी, लज्जा बनी हैं भद्रा, गंगा बनी हैं मित्रव्रिंदा, सावित्री जी बनी हैं सत्या और पृथ्वी बनी हैं सत्यभामा। ये सांसारिक विवाह नहीं है ये पूरी प्रकृति के साथ ठाकुर जी ने विवाह किया है।

महाराज श्री ने आगे कहा कि भगवान ने 16100 विवाह इसलिए नहीं किए की उन्हे बहुत सारी पत्नियां चाहिए थी। उन्होंने इतने विवाह इसलिए किए क्योंकि उन स्त्रियों को जरूरत थी। भौमासुर नामक राक्षस ने 16 हज़ार 100 कन्याओं को बंदी बना रखा था। नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा की समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। इस कारण भगवान ने १६१०० रूप बनाकर सबके साथ एक मुहूर्त में एक साथ विवाह किया था। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने इतने विवाह किये। भगवान ने कामनावश विवाह नहीं किया था, करुणावश किया था। भगवान कहते हैं जिसको कोई नहीं अपनाता अगर वो मेरी शरण में आये तो मैं उसे अपना लेता हूँ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंततः सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

 

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

13Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 08 से 14 जुलाई 2018 तक Vedic Hindu Cultural Society Surrey, CANADA में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत के पंचम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा कि शुरूआत करते हुए कहा कि जीवन का सफल दिन होता है जब आप प्रभु के भजन में व्यस्त रहते हैं। संसार की दिन चर्याओं को तो आप रोक नहीं सकते ये तो दिन प्रतिदिन चलेगी ही चलेगी। कोई दिन आपका अच्छा जाएगा कोई दिन आपका बुरा जाएगा लेकिन दिन वहीं श्रेष्ठ है जिस दिन आप भगवान की कथा गायन में और श्रवण करने में जो लगा देते हैं उस दिन से श्रेष्ठ कोई दिन नहीं हो सकता। 


महाराज श्री ने पूछा कि सबसे ज्यादा आवश्यक क्या है ? भगवान ने गीता में अर्जुन को कहा है सबसे ज्यादा आवश्यक है ये जो मोह माया का सघन वन है इससे पार पाकर गोविंद की तरफ जाना। जब तक व्यक्ति मोह रूपी जंगल को पार नही करेगा तब तक वह गोविंद से नहीं मिल सकता। जब इस घने जंगल में फंस जाएं और रास्ता नजर ना आए तो गुरू के चरणों में बैठ कर भटकाव को दूर करने की कोशिश करो। गुरू के बताए हुए मार्ग पर चलकर अपने जीवन में पवित्रता लाओ। 


महाराज श्री ने कहा कि जीवन में लोगों को थोड़ी थोड़ी खुशियां मिलती हैं लेकिन आनंद नहीं मिलता, कभी खुशियां आती हैं, कभी गम भी आते हैं पर अपने तो हमेशा गम में ही पहचाने आते हैं। बड़े बुजुर्ग कह गए हैं किसी के सुख में सम्मिलित होओ या नहीं किसी के गम में सम्मिलित जरूर होना चाहिए। पहले के लोग समाज में जो अन्याय फैलता था उसके खिलाफ खड़े होते थे लेकिन आज कल सब तमाशा देखते हैं। इस संसार में वही आपके हैं जो दुख में खड़े हों और ऐसे लोग बहुत ज्यादा नहीं है। 


देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। 
महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

12Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य 08 से 14 जुलाई 2018 तक Vedic Hindu Cultural Society Surrey, CANADA में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

भागवत के चतुर्थ दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जैसी श्री वृंदावन में प्रिया प्रीतम रमण करते हैं, लीला करते हैं, वैसे ही भागवत महापुराण में भी भगवान लीला करते हैं, रमण करते हैं। श्रीमद् भागवत महापुराण यह परम हंसों की संगता है, यह भक्तों की संगता है, यह भक्तों का विषय है। जैसे हंस दुध में और पानी में अंतर कर लेता है ठीक वैसे ही भागवत परमहंसों की संगता है ना सिर्फ कहने वाला अपितु सुनने वाला भी इतना श्रेष्ठ होना चाहिए कि महापुरूषों की कही गई बातों में से जो अच्छा लगा हो उसे ले ले और जो अच्छा ना लगा हो उसे छोड़ दे। अगर हम सच्चे वक्ता हैं, सच्चे श्रोता है तो भागवत महापुराण ही श्रीकृष्ण हैं ऐसा भाव मानकर भागवत को श्रवण करना चाहिए और जो जो अच्छा लगे वो सब जीवन में उतारना चाहिए। 
महाराज श्री ने कहा कि सबसे बड़ा सत्कर्म है दूसरों को सुख देना और सबसे बड़ा पाप है दुसरों को दुख देना। आज व्यक्ति खुद को सुखी देखने के चक्कर में, सुख प्राप्ति के चक्कर में दूसरों को तकलीफ देने से नहीं चुकता। आप अगर किसी को सुख नहीं दे सकते तो कम से कम दुख मत दिजिए, इतना काम तो हमको करना ही चाहिए अगर हम अपने आप को धरमात्मा बनाना चाहते हैं, ठाकुर को मनाना चाहते हैं। जो परोपकार करना जानते हैं उनके लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं है। 
महाराज श्री ने कहा कि आज के बच्चों को भम्र होता है कि धर्म है क्या ? तो धर्म है आपका कर्म और देश, काल परिस्थिति के हिसाब से आपको ये निर्णय लेना होगा कि क्या करूं, क्या ना करूं ? कई बार वही कर्म तो धर्म है वो अधर्म बन सकता है आपके लिए । जैसे झूठ बोलना पाप है लेकिन आपके सत्य से किसी की जान चली जाए तो वो सत्य ही पाप बन जाएगा आपके लिए, अब यहां झूठ बोलना पड़े तो झूठ बोलों क्योंकि झूठ बोलने से किसी की जान बच रही है। वेद जिसे स्विकृति देता है वो धर्म है और वेद जिसे स्विकृति नही देता वो अधर्म है। 
देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।
महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।
शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।
इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।
दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।
महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
।। राधे- राधे बोलना पड़ेगा ।।

11Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 08 से 14 जुलाई 2018 तक Vedic Hindu Cultural Society Surrey, CANADA में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया

भागवत के तृतीय दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

 में कभी ऐसी परेशानियां आ जाती हैं जहां से मायुसी दिल में छा जाती है और कुछ भी ना करने का मन करता है और दुनिया छोड़ देने का भी मन करता है ? महाराज जी ने आगे कहा कि दुनिया पर भरोसा करके हम जो गलती करते हैं, जिन पर भरोसा करें और वो ही आपको धोखा दे दें तब लगता है कि काश हम ये दुनिया छोड कर चले जाएं ये दिन देखने से पहले। लेकिन हम ये क्यों भूल जाते हैं कि इसी का नाम ही तो जिंदगी है। जिंदगी में हमेशा अच्छा ही नहीं होता है, कभी कभी ऐसे भी दिन आते हैं जिसकी हम कल्पना भी नहीं करते। कभी कभार ऐसा भी होता है कि किसी के कर्मों का फल हमें भोगना पड़ता है। इसलिए यह याद रखो की जीवन में अगर भरोसा किसी पर करना है तो भगवान पर किजिए। ईश्वर पर भरोसा करोगे तो धोखा नहीं खाओगे, दुनिया से चाहे जो भी मिले लेकिन धोखा नहीं मिलेगा भगवान से। भागवत ही हमको भगवान से भरोसा करना सिखाती है। 


महाराज श्री ने कहा कि सुख में भगवान को भूलना नहीं चाहिए, अगर सुख में भी भगवान को याद करोगे तो दुख की मजाल नहीं है कि वो तुम्हे छू ले। सभी बच्चों को महाराज श्री ने ज्ञान देते हुए कहा कि बचपन में भक्ति का फल मिलता है अमृत के समान, जो बचपन से भक्ति करते हैं भजन करते हैं उन्हें सौ गुना फल मिलता है।, बुढापे की सौ माला और बचपन की एक माला बराबर है। 
महाराज श्री ने कहा कि मृत्यु तीन चीजों के बगैर नहीं आती। पहली समय, दूसरी जगह और तीसरी वजह, जब यह तीनों चीजे मिलती है तो मृत्यु आती है। मानव जीवन अनमोल है लेकिन एक क्षण का भी भरोसा नहीं है की हम अगले क्षण रहेंगे या नहीं। 


देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।

तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा।।

विश्व के सबसे छोटे टापू पर The Capital Post

10Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 08 से 14 जुलाई 2018 तक Vedic Hindu Cultural Society Surrey, CANADA में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

भागवत के द्वितीय दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कथा स्थल में पूज्यनीय श्री गोविंद गिरी जी महाराज पधारे, उन्होंने महाराज श्री का सम्मान किया एवं व्यास पीठ से आशीर्वाद लिया और अपने आशीष वचन से सभी को कृतार्थ किया। 
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि मानव जीवन में दो चीजे बहुत दुर्लभ हैं, एक तो संत का दर्शन और दूसरा भगवान की कथा। अगर आपके पास पैसा है तो कोई बड़ी बात नहीं है, आपके पास परिवार है तो कोई बड़ी बात नहीं है, अगर बड़ी बात कोई है तो यह है कि एक तो संत का मिलना और दूसरी भगवान की कथा सुनना। अगर आपको यह दोनों चीजे मिल जाएं तो समझ लिजिए की आपका जीवन सफल हो गया। 
महाराज श्री ने आगे कहा कि आज इस संसार में कुछ लोगों ने संत महात्मा अच्छे लोगों को बदनाम करने का षडयंत्र किया है क्योंकि मंदिर बदनाम होंगे तो संत बदनाम होगा, संत बदनाम होंगे तो सनातन धर्म बदनाम होगा, आप लोगों के ह्रदय में सनातन के प्रति नफरत पैदा करने के लिए प्लानिंग के साथ यह काम किया जा रहा है। इस विषय पर कोई मीडिया कुछ नहीं बोलता। 
महाराज श्री ने आगे कहा कि पूछा कि हम दुखी क्यों है ? क्या हमे किसी ने दुखी किया है ? हमे दुखी किसी ने किया है या हमे दुखी हम ही ने किया है ? इस संसार के सबसे बड़े दुख की वजह मेरी इच्छाएं हैं। जिसकी इच्छाएं कम होती हैं वो हमेशा खुश रहता है और जिसकी इच्छाएं बहुत ज्यादा होती हैं वो हमेशा दुखी रहता है। बहुत से लोग कहते हैं भगवान ने मुझे वो नहीं दिया जो मैं चाहता था, लेकिन आपको यह समझना होगा की भगवान ने आपको वो सब कुछ दिया है जिसकी आपको आवश्यकता है। 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओं का गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। 
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

9Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 08 से 14 जुलाई 2018 तक Vedic Hindu Cultural Society Surrey, CANADA में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

भागवत के प्रथम दिवस की शुरूआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि मानव जीवन सबको मिलता है लेकिन सब मानव बनकर नहीं जीते कई लोग पशु बनकर भी जीते हैं। मानव वहीं है जो मानव जीवन मिलने के बाद उसका सदुपयोग करना जानते हों, जिन जीवों को मानव जीवन मिला है उसके बाद भी वो मानव योनी का सदुपयोग ना कर पाएं तो मानव होकर भी वो पशु हैं।
महाराज जी ने कहा कि भागवत सिर्फ एक ग्रंथ नहीं है ये पंचम वेद निराला है, ये पांचवा वेद है जो हम सब के पापों को नष्ट करता है और हरि तक मिलाने की गारंटी लेता है। जो भागवत तक आएंगा उसे गोविंद तक मिलाने की गारंटी लेगा। कौन सा ऐसा साधन है जो आपको हरि से मिला दे ? इस संसार में रहकर कितने भी पैसे कमा लेना वो पैसा आपको भगवान से नहीं मिला सकता लेकिन जो पूरे विश्व की संपत्ति काम ना कर सके वो काम आपकी भावना कर सकती है आपको परमात्मा से मिलने का अधिकार आपकी भक्ति दिला सकती है, ये भागवत आपको देती है। 
महाराज जी ने कहा कि भागवत चार अक्षरों से यह नाम पड़ा है भा, ग, व, त । पहला अक्षर है भ यानि भक्ति, दूसरा अक्षर है ग यानि ज्ञान, तीसरा अक्षर है व यानि वैराग्य, चौथा अक्षर है त यानि तक्षण फल की प्राप्ति, मुक्ति, मोक्ष । भागवत को भक्ति के साथ सुनना चाहिए, आपके मन में अगर भागवत सुनने की इच्छा है तो भक्ति का होना अनिवार्य है। भक्ति किसे कहते हैं ? मैं भगवान का हो जाऊं ये भाव आना ही भक्ति का स्वरूप है। 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो सभी ऋषियों ने सूद जी महाराज से ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

8Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 01 से 07 जुलाई 2018 तक Bhavani Shankar Mandir & Cultural Centre, Gore Road, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई।

भागवत के सप्तम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि लोग कहते हैं कि जब समय होगा तो भक्ति कर लेंगे लेकिन वो समय कभी होता ही नहीं। बचपन में कहते हैं अभी तो खेलने कुदने की उम्र है बडे होंगे तो भक्ति कर लेंगे, जब बड़े होते हैं तो कहते हैं अभी तो खाने कमाने की उम्र है जब बूढ़े होंगे तो भक्ति कर लेंगे, जब बुढ़ापा होता है तो क्या भक्ति हो पाती है। स्थिति ये हो जाती है कि पैर साथ नहीं देते चला नहीं जाता, कान जवाब दे जाते हैं कि हम सुन नहीं सकते, आंख जवाब दे जाती है कि हम चाहकर भी देख नहीं सकते। और तो और कफ पित्त ना सिर्फ सीने में जमता है बल्कि कंठ में आकर जम जाता है हम बोलना भी चाहते हैं तो बोल नहीं पाते हैं। इसलिए जो करना है हमे आज करना है, जो सोचना है वो आज सोचना है, काल करे सो आज कर आज करे सो अब, पल में प्रल्य होगी बहुरी करेगा कब। ना जाने किस दिन जिंदगी का आखिरी दिन होगा कौन जाने। मेरा बुढ़ापा आयेगा ये जरूरी नहीं है, मैं जवान हो जाऊ ये भी जरूरी नहीं हैं, आज जो मेरे पास है उसका इस्तेमाल करें कल किसने देखा है। जिस व्यक्ति ने बचपन से भक्ति का बीज बोया है उसकी पूरी जिंदगी अच्छी व्यतित हुई है। बचपन में भक्ति करने का लाभ कई गुना बढ़ता है और जब वो भजन पढ़कर आगे बढ़ता है, जैसे जैसे आयु बढ़ती है वैसे वैसे भजन का प्रभाव बढ़ता है और पूरे जीवन भर सदमार्ग पर चलने की प्रेरणा वो भजन आपको देता है। वही काम यह सत्संग करता है आपका पूरा जीवन सुधार देता है।

महाराज श्री ने कहा कि मैं सभी युवाओं से कहना चाहता हूं कि आप अपने मां बाप को, भगवान को समय नहीं दे पाते हो, अपने रिश्तेदारों को समय नहीं दे पाते हो लेकिन आप समय दे पाते हो सोशल मीडिया को जिससे आप कभी मिले नहीं, जिसका आपको पता नहीं उनके साथ अपना समय बर्बाद कर रहे हो, एक एक सेकेंड आपका कितना किमती है आपको पता है। मैं ये नहीं कह रहा हूं कि आप सोशल मीडिया इस्तेमाल मत किजिए अगर आपको लगता है जरूरी है तो जरूर इस्तेमाल किजिए लेकिन सही चीजों के लिए इस्तेमाल किजिए।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कल के कथा का क्रम को आगे बढ़ाते हुए कहा कि रुकमणी जी ने श्रीकृष्ण से प्रेम विवाह किया। भगवान ने 16 हजार 100 विवाह किए हैं लेकिन 8 विवाह अलग अलग हुए। ये 8 पटरानियां साधारण नहीं हैं लक्ष्मी जी बनी हैं रूकमणी, पार्वती जी आधे अंश से बनी हैं जामवंती और बाके आधे अंश से बनी हैं महामाया, तुलसी बनी हैं लक्ष्मणा, यमुना बनी हैं सूर्य की पूत्री कालिंदी, लज्जा बनी हैं भद्रा, गंगा बनी हैं मित्रव्रिंदा, सावित्री जी बनी हैं सत्या और पृथ्वी बनी हैं सत्यभामा। ये सांसारिक विवाह नहीं है ये पूरी प्रकृति के साथ ठाकुर जी ने विवाह किया है।

महाराज श्री ने आगे कहा कि भगवान ने 16100 विवाह इसलिए नहीं किए की उन्हे बहुत सारी पत्नियां चाहिए थी। उन्होंने इतने विवाह इसलिए किए क्योंकि उन स्त्रियों को जरूरत थी। भौमासुर नामक राक्षस ने 16 हज़ार 100 कन्याओं को बंदी बना रखा था। नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा की समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। इस कारण भगवान ने १६१०० रूप बनाकर सबके साथ एक मुहूर्त में एक साथ विवाह किया था। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने इतने विवाह किये। भगवान ने कामनावश विवाह नहीं किया था, करुणावश किया था। भगवान कहते हैं जिसको कोई नहीं अपनाता अगर वो मेरी शरण में आये तो मैं उसे अपना लेता हूँ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंततः सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

6Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 01 से 07 जुलाई 2018 तक Bhavani Shankar Mandir & Cultural Centre, Gore Road, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत के षष्ठम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि एक यक्ष प्रशन है कि संसार में सुखी कौन है। कोई तो सुखी होगा उस सुखी व्यक्ति की पहचान क्या है ? व्यक्ति वही सुखी है जिसके पास ये चार चीजे हो। पहला सुख निरोगी काया, दूसरा सुख घर में हो माया, तीसरा सुख सुलक्षणा नारी (पतिव्रता स्त्री), चौथा सुख हो पुत्र आज्ञाकारी जिनके पास ये चार चीजे हैं वह सुखी है लेकिन कुछ ओर चीजे है जब भी पति घर से बाहर से काम करके आए और घर में प्रवेश करे, दोनों समय पत्नी के हाथ का बना हुआ भोजन जिसे मिल जाए वो भी सुखी है, दूसरा वह व्यक्ति विदेश में ना हो, तीसरा उस पर कोई कर्ज ना हो और जिसके जीवन में ईश्वर की याद हमेश बनी रहती है उससे ज्यादा सुखी कोई नही है।


महाराज श्री ने कहा कि बिना परिक्षा के गोविंद नहीं मिलता है, जब भी भक्ति करते करते थोडी से मुश्किले आएं तो दुखी ना हो प्रसन्न रहें तभी गोविंद आपको मिलेंगा।


महाराज श्री ने कहा कि जो लोग सोचते हैं कि भगवान मंदिर में रहता है यहीं गलती करते है हम लोग और पाप कर बैठते हैं। मंदिर में जाएं तो वैष्णव बन जाते हैं और बाहर निकलते है. मदिरालय या डिस्को में जाते हैं तो कहते हैं यहां थोडे ना भगवान होगा। भगवान तो वहां भी मौजूद है बस तुमहे नजर नहीं आ रहे हैं। मंदिर में वह दूसरे रूप में है लेकिन जब तुम गंदी जगह पर जाते हो तो वो तुम्हारे भीतर बैठ कर जाता है और देखते हैं कि क्या करने आए हो तुम वहां पर। ये सोचना ही भगवान यहां है वहां नहीं है यही मुर्खता है। व्यक्ति जब यह भूलता है कि भगवान मेरे साथ है या नहीं तभी गलती करता है, तभी पाप करता है। यदि व्यक्ति यह याद रखे की भगवान हमेशा मेरे साथ में है तो तुमसे पाप होगा ही नहीं। 


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

6Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 01 से 07 जुलाई 2018 तक Bhavani Shankar Mandir & Cultural Centre, Gore Road, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत के पंचम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा कि शुरूआत करते हुए कहा कि इस संसार का एक नाम है दुनिया । दुनिया का मतलब है जो दो रंगी है, भगवान ने अच्छाई और बुराई दोनों लेकर बनाई है ये दुनिया । हम सब में एक परेशानी है कि जिससे हम प्यार करते हैं उसकी हम बुराई नहीं देखते और जिससे हम नफरत करते हैं उसकी हम अच्छाई नहीं देखते। सच्चाई यह दोनों ही हैं कि अच्छा आदमी भी कभी कभी गलत कर सकता है और बुरा आदमी भी अच्छा काम कर सकता है। वजह यह है कि यह दुनिया अच्छाई और बुराई से ही बनी हुई है। महाराज श्री ने पूछा कि किसी और के अंदर क्या देखना अपने अंदर ही झांक लो सारी अच्छाई है क्या आपमें ? और सारी बुराईयां ही हैं अच्छाई नहीं है क्या ? इस दुनिया में अगर अच्छे और बुरे रंग नहीं होते तो ये दुनिया थोड़ी होती फिर तो ये एकनिया होती, एक ही से चलती, अच्छाई से ही चलती। 


महाराज श्री ने कहा कि सही मायने में संसार में आनंद है ही नहीं, जो मिटने वाला हो वो आनंद नहीं है। आनंद वो है जो नित्य, निरंतर, अनादी है। आप विद्यालय में जाओगे तो विद्या मिलेगी, वस्त्रालय में जाओगे तो वस्त्र मिलेगा, मृत्युलोक में जाओगे तो मृत्यु मिलेगी लेकिन आनंद नहीं मिलेगा, यह संसार दुखालय है। इस संसार में सुख तब मिलेगा जब आप गोविंद पर भरोसा करने लग जाएंगे, जैसै ही गोविंद पर आपका भरोसा हो जाएगा तो आपके जीवन में आनंद ही आनंद होगा। अगर गोविंद के बनोगे तो आनंद ही नहीं सर्वानंद तुम्हे प्राप्त हो जाएगा। 
महाराज श्री ने कहा कि आजकल के लोगों की बुद्धि खराब होते जा रही है उसका कारण है कि उनका आहार शुद्ध नहीं है। जब आहार शुद्ध होगा तो विचार शुद्ध होगा, विचार शुद्ध होगा तो कर्म शुद्ध होगा, कर्म शुद्ध होगा तब ही हमारा फल अच्छा होगा। इसलिए जरूरी है कि हमारा आहार शुद्ध हो। 


देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। 
महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

5Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 01 से 07 जुलाई 2018 तक Bhavani Shankar Mandir & Cultural Centre, Gore Road, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

भागवत के चतुर्थ दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि आंखो से अंधा होना ये भाग्य की बात है परन्तु विवेक से अंधा होना ये दुर्भाग्य की बात है। जिसे आंखो से ना दिखे वो कह सकता है कि मेरा भाग्य ऐसा है की मुझे आंख नहीं मिली लेकिन आंख होते हुए भी तुम्हे ना दिखे तो ये तुम्हारे दुर्भाग्य की बात है। जो आंखो का अंधा होता है उसे जगत के नजारे नजर नहीं आते लेकिन जो विवेक से अंधा है उसे जगदीश के नजारे नजर नहीं आते। आंख से अंधा होना दयनीय है लेकिन विवेक से अंधा होना सोचनीय है। आजकल लोग आंखे से अंधे कम है और विवेक से अंधे अधिक है इसलिए वो दयनीय नहीं है सोचनीय है। जिस ईश्वर की असीम अनुकम्पा का नित्य दर्शन हम और आप सभी करते हैं, यहां जो भी हो रहा है वो परमात्मा की लीला में घटित हो रहा है। यह मेरा और आपका जीवन नहीं है यह परमात्मा की लीला के पात्र हैं हम और आप सब।


महाराज श्री ने कहा कि मैं आप सब से आग्रह करूंगा की इस बात को शान मत समझना की आपके बच्चे तीर्थ नहीं करते, कथा में नहीं जाते, सत्संग में नहीं जाते ये दुर्भाग्य का विषय है। आप दुर्भाग्यशाली हो, आपके बच्चे दुर्भाग्यशाली हैं कि वो जहां से जीवन सुधरने का प्रतिक मिलता है, जीवन जीने की कला मिलती है वहां जाना ही पसंद नहीं करते। मंदिर एक ऐसा स्थान है जहां हमे हमारे परमात्मा के स्वरूप का परिचय होता है, कथा जहां हमे हमारे भगवान के स्वभाव का परिचय पता चलता है।


महाराज श्री ने कहा कि सनातन धर्म प्रेमी को अतिथि का सत्कार अपने सामर्थय अनुसार करना ही चाहिए। जो जीव द्वार पर आए हुए अतिथि का सत्कार नहीं करता है उसके पितृ उससे प्रसन्न नहीं होते हैं। 
महाराज श्री ने कहा कि हमारे धर्म में कहा जाता है गुरू आज्ञा गरीयसी, गुरू जी जो आज्ञा दे दे बिना सोचे समझे उसका पालन करो। अगर गोविंद को पाना है तो एक स्वास भी बिना गुरू के नहीं जानी चाहिए । सनातन धर्म में गुरू का स्थान बहुत ऊपर है, भगवान से भी ऊपर गुरू को बताया गया है। 


देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।
महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।


शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।


इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।


महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।


उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।


दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।


महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
।। राधे- राधे बोलना पड़ेगा ।।

4Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 01 से 07 जुलाई 2018 तक Bhavani Shankar Mandir & Cultural Centre, Gore Road, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

ब्रेमटन कनाडा में चल रही पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर महाराज जी के श्रीमुख से श्रवण हो रही श्रीमद्दभागवत कथा का आज तृतीय दिवस है। आज महाराज जी कहते है कहां रहते हो क्या फर्क पढ़ता है, फर्क तो इस बात का पड़ता है कि जहां तुम रहते हो वहां भगवान का नाम लिया जाता है या नहीं? वहां सतक्रम करते हो कि नहीं? वहां तुम्हें प्रभु याद है कि नहीं? महाराज श्री कहते है कि वो ज़िंदगी बेकार है जहां हमें भगवान का नाम याद ना हो, वो ज़िंदगी सुंदर है जिसमें हम कहीं भी रहें, किसी भी मोड़ पर रहें, अमीर रहें या गरीब रहें, देश में रहें या विदेश में, ईश्वर को हम कहीं ना भूलें। ईश्वर हमारा है, हम ईश्वर के हैं, ये याद बनी रही, सुख में भी ईश्वर याद रहें और दुख में भी ईश्वर याद रहें। और जो ईश्वर को हमेशा याद रखता है, वहीं प्रभु को हमेशा प्यारा होता है। पूज्य महाराज श्री ने द्वतिय दिन का प्रसंग याद दिलाते हुए कहा कि कल किसने देखा है, मृत्यु कि कोई उम्र नहीं होती। जीवन का भरोसा कभी नहीं करना चाहिए, जीवन सबसे सुंदर और कीमती है लेकिन इस सैकेंड का भी अंदाज़ा नहीं है कि कब साथ छोड़ दे। महाराजश्री ने कहानी के ज़रिए भक्तों को समझाया कि एक कृष्ण भक्त था, अपने माता पिता की बहुत सेवा करता था, वो इतना अच्छा भक्त था कि स्वंय भगवान उससे मित्र कि तरह आकर बात किया करते थे। लेकिन अचानक से एक दिन उसके पिता जी बहुत बिमार हो गए, और हॉस्पिटल में एडमिट हो गए, जब बेटा अपने पिता को लेकर हॉस्पिटल पहुंचा, वहां पहुंचकर डॉक्टरों ने जवाब दे दिया कि उनके पिता के साथ बहुत कम समय बचा है, बस अब भगवान से प्राथना करो, वो ही तुम्हारी मदद कर सकते है। ये सुन उसे अचानक से याद आया कि भगवान तो मेरे मित्र हैं, और भगवान को पुकारने लगा कृष्ण आओ, कृष्ण आओ। कृष्ण प्रकट हो गए, और पूछा कि बताओ मैं तुम्हारी कैसे मदद कर सकते हूं? कृष्ण से ये सुन भक्त भगवान से बिंती करने लगा कि मेरे पिता को ठीक कर दो, वे बहुत बिमार है और हॉस्पिटल में भर्ति है, उन्हें ठीक कर दो। लेकिन भगवान ने कहा कि ये मैं नहीं कर सकता , जीवन और मृत्यु दोनों तय है, लेकिन भक्त अपने भगवान से लड़ने लगा, और कहने लगा कि आप मेरे सच्चे मित्र नहीं हैं। ये सुन भगवान ने बहुत समझाने के बाद ये कहा कि ठीक है मैं तुम्हारी मदद करता हूं, इसके लिए भगवान ने अपने भक्त अपने मित्र से पूछा कि एक बात बताओ तुम्हारे गांव में कितने घर हैं? भक्त ने कहा कि होंगे 500-600 घर, ये सुन भगवान कृष्ण ने कहा कि उन सभी घरों में से किसी एक घर से चावल कि एक मुट्ठी ले आओ जिसमें एक मृत्यु ना हुई हो। और जब तू वो ले आऐगा तो मैं तेरे पिता को ठीक कर दूंगा। ऐसा सुन भक्त बहुत खुश हुआ और तुरंत ही उस एक घर की तलाश में निकल पड़ा, लेकिन सभी घरों में ऐसा कोई एक घर नहीं मिला जिसमें मृत्यु ना हुई हो। निराश होकर वे भक्त भगवान की शरण में गया और कहा कि हे प्रभु मुझे ऐसा एक भी घर नहीं मिला जहां मृत्यु ना हुई हो। भक्त के मुख से ऐसा सुन भगवान ने भक्त से कहा कि ये ही अटल सत्य है, जैसे जन्मउत्सव है वैसे मृत्यु भी उत्सव है। भगवान को ऐसा कहता सुन भक्त ने भगवान से माफी मांगी , तो भगवान ने अपने भक्त से कहा कि अच्छा हुआ कि तुम्हे ये सही समय में समझ आ गया कि जो आया है उसे यात्रा पूरी करनी पड़ेगी।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल की कथा क्रम याद कराया की जिस वयक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये । अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे। भगवान को मनाने की कोशिश करते रहना चाहिए क्योंकि मानव जीवन द्वार है परमात्मा मिलन का, सतकर्म का और मोक्ष प्राप्ति का। जितना जतन अपने तन को सजाने में करते हो, उसका थोड़ा भी यदि मन को सजाने में लगा दो तो परिणाम देखना। तन की सुंदरता पर दुनिया मोहित होती है और मन की सुंदरता पर मोहन मोहित होते हैं। अपने अपमान करने वालों को भी सम्मान देने वाला ही सुंदर मन वाला होता है। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा की देवहुति ने कपिल मुनि से पूछा पुत्र मैनें सुना है की तुम साक्षात् भगवान के अवतार हो और मेरा ये सौभाग्य है की तुमने मेरे यहाँ जन्म लिया और मैनें तुम्हें अपना दूध पिलाया। कपिल जी महाराज ने कहा की माँ आपने सही सुना है। देवहुति बोली पुत्र मुझे कृपा कर बताइए की मानव जीवन का लक्ष्य क्या है। मानव जीवन मिल जाने के बाद जीव को जीवन भर क्या करना चाहिए। किस पर विश्वास करना चाहिए और किस पर विश्वास नहीं करना चाहिए। कपिल महाराज बोले माँ मानव जीवन मिलने के बाद जीव को जीवन पर्यन्त भगवान को मनाने की कोशिश करते रहना चाहिए। क्योंकि मानव जीवन द्वार है परमात्मा मिलन का ,सतकर्म का और मोक्ष प्राप्ति का। जानती हो माँ बच्चा जब माँ के गर्भ में होता है तो मास का एक लोथड़ा होता है धीरे धीरे उस में से अंग बनाना शुरू होता है। इस पर ऊपरी त्वचा नहीं होती और माँ जो भी खाती है वो सीधा बच्चे को जाकर चुभता है और जो बच्चे इस चुभन को नहीं सह पाते उनकी गर्भ में ही मृत्यु हो जाती है। माँ के गर्भ में बच्चे का स्थान मल- मूत्र के पास होता है। बच्चा इस पीड़ा को सह नहीं पाता वह चिल्लाता है भगवान मुझे बचाओ मुझे यहाँ से बाहर निकालो तब प्रभु कहते हैं की मैं तम्हे यहाँ से बहार निकाल दूँगा लेकिन तुम्हे एक वादा करना होगा की जन्म लेने के बाद तुम्हे अपने धर्म को आगे बढ़ना होगा। धर्म का प्रचार करना होगा। लेकिन बच्चा जन्म लेने के बाद प्रभु से किया हुआ वादा भूल जाता है और संसार की मोहमाया में लिप्त हो जाता है और फिर मृत्यु के बाद दुबारा उसी कष्ट से होकर गुजरना पड़ता है।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

1Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 01 से 07 जुलाई 2018 तक Bhavani Shankar Mandir & Cultural Centre, Gore Road, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

भागवत के प्रथम दिवस की शुरूआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत एक सुंदर भजन दास हूं राधे का से की जिसपर सभी भक्त खूब झूमे। महाराज श्री ने कथा की शुरूआत से पूर्ण सभी कनाडा वासियों को कनाडा दिवस की शुभकामनाएं दी, उन्होंने कनाडा और यहां के वासी यूं ही तरक्की करते रहें और प्रगति की राह पर चलते रहें। 
महाराज श्री ने कथा के क्रम को आगे बढ़ाते हुए कहा कि भागवत को पुराण कहा गया है, सबसे पहले हमे ये बात समझनी चाहिए की पुराण कहते किसको हैं, पुराण के लक्षण क्या हैं ? महाराज जी ने पुराण के लक्षणों को बताते हुए कहा कि जिसमें 5 लक्षण हों वो पुराण है। ये 5 लक्षण हैं सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मनवंतर, वंशानुचरित। सर्ग में शृष्टि की रचना का वर्णन है, प्रतिसर्ग में शृष्टि के अंत का वर्णन है, वंश में ब्रह्मा जी के द्वारा चलाए गए वंश उनका वर्णन है, मनवंतर में कौन से मनु कब आकर राज्य करेंगे, कितने समय तक करेंगे उनका वर्णन है, वंशानुचरित में जो बड़े बड़े धर्मपरायण राजा हुए उनका वर्ण है। ये पांचो लक्षण जिसमें हैं वो पुराण है और श्रीमद्भागवत पुराण यह महापुरण है। सभी वेदों का सारांश इस श्रीमद्भागवत महापुराण में रखा है श्री व्यास जी महाराज ने। 
महाराज श्री ने कहा कि श्रीमद्भागवत महापुराण हिंदू समाज का सबसे आदरणीय ग्रंथ है, इसमें अनेकों सुंदर कथाएं, जीवन के कल्याण के अनेकों मार्ग, गंभीर रहस्यों विषयों का निरूपण बड़ी ही सरलता से किया गया है। श्रीमद्भागवत कथा कल्प वृक्ष के समान है, श्रीमद्भागवत कथा को सात दिन नियमों के साथ श्रवण करने से उसे वो सब कुछ मिल जाता है जिसकी वो कल्पना करता है और जिसे कुछ नहीं चाहिए उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
महाराज श्री ने कहा कि मानव जीवन जब मिल गया हो तो तीर्थ करने से कभी पीछे नहीं रहना चाहिए, जब भी मौका मिले तीर्थ करने निकल जाओ। तीर्थों में जाकर ही हमारे पापों का नाश होता है।
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो सभी ऋषियों ने सूद जी महाराज से ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

2Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 01 से 07 जुलाई 2018 तक Bhavani Shankar Mandir & Cultural Centre, Gore Road, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

भागवत के द्वितीय दिवस की शुरूआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि हमारी भावनाएं धीरे धीरे समाप्त होती जा रही हैं। जो हम लोगों की भावनाएं अपनों की प्रति रहा करती थी वो अब नहीं हैं। जैसे जैसे हम लोग आगे बढ़ते जा रहे हैं वैसे वैसे भावना विहिन होते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमारे सारे रिश्तों को समाप्त मोबाइल ने किया है। जब से यह मोबाइल आए हैं तब से कोई भी रिश्तेदार अपने रिश्तों के साथ नहीं बैठना चाहता बल्कि बंद कमरे में अपने मोबाइल के साथ बैठना चाहता है। बच्चों से पूछो की सबसे पहले सुबह उठकर मम्मी से मिलोगे की मोबाइल से बच्चों का उत्तर आप सब को पता ही है। ये कोई छोटी समस्या नहीं है, जिन परिवारों के लिए हम अपनी पूरी जिंदगी लगाते हैं यकिन मानिए धीरे धीरे हम उन परिवारों से दूर चले जा रहे हैं। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि आज के इस युग में इंसानों से ज्यादा पशुओं में भावनाएं हैं। 
महाराज श्री ने कहा कि युवाओं को कथा में आना चाहिए, अगर कथा में आओगे तो ना सिर्फ आपका जीवन सुधरेगा बल्कि आपकी जो अगली पीढ़ी है उसको पता चलेगा की मानव जीवन कैसा है ? 
महाराज श्री ने कहा कि जो लोग यह समझते है कि वो कभी भी श्रीमद्भागवत कथा सुन सकते हैं वो गलती करते हैं। आप ये मत सोचिएगा की भागवत आप अपनी मर्जी से सुन रहे हैं, करोड़ो करोड़ो जन्मों के पुण्य जब जीव के इकत्रित होते हैं तब जाकर व्यक्ति भगवान की भागवत कथा सुनने का अधिकारी होता है।
महाराज जी ने कहा कि सौ काम छोड़कर भोजन करना चाहिए, हजार काम छोड़कर भजन करना चाहिए और दुनिया का हर काम छोड़कर भगवान की कथा सुननी चाहिए । 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओं का गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। 
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

28Jun 2018

ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा पर "पूर्णिमा महोत्सव" का सुंदर एवं भव्य आयोजन पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर के प्रांगण में पूर्णिमा महोत्सव का आयोजन बड़ी हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।

|| राधे राधे || 
ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा पर "पूर्णिमा महोत्सव" का सुंदर एवं भव्य आयोजन पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर के प्रांगण में पूर्णिमा महोत्सव का आयोजन बड़ी हर्षोल्लास के साथ मनाया गया जिसमें सैकड़ो भक्त मौजूद रहे। जिसमें सभी भक्तों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया एवं सर्वप्रथम गणेश वंदना कर कार्यक्रम की शुरुआत की गई तथा ठाकुर श्री प्रियाकांतजू भगवान, सर्वेश्वरीश्री राधा रानी के प्यारे प्यारे भजनों की प्रस्तुति दी गई। महाराज श्री द्वारा गए गये भजनो पर सभी भक्तगण झूमते नाचते रहे। अंत में ठाकुर श्री प्रियाकांतजू भगवान की आरती का कार्यक्रम का समापन किया गया

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

 
 

28Jun 2018

पूर्णिमा के पावन अवसर पर ठा. श्री प्रियाकान्त जू मन्दिर में संकीर्तन का आयोजन किया गया जिसमें कि हजारों की संख्या में भक्तों ने प्रसाद पाया ।

राधे राधे,
पूर्णिमा के पावन अवसर पर ठा. श्री प्रियाकान्त जू मन्दिर में संकीर्तन का आयोजन किया गया जिसमें कि हजारों की संख्या में भक्तों ने प्रसाद पाया पूर्णिमा के पावन अवसर पर हर महीने ट्रस्ट के द्वारा हजारों भक्तों के लिए भंडारा किया जाता हैं । राधे राधे।

1Jul 2018

राधे राधे, पूज्य महाराजश्री पहुँचे कनाडा जहाँ पर सभी भक्तों ने पूज्य महाराज जी का स्वागत किया।

राधे राधे, पूज्य महाराजश्री पहुँचे कनाडा जहाँ पर सभी भक्तों ने पूज्य महाराज जी का स्वागत किया,पूज्य महाराज श्री के श्रीमुख से 1 से 7 जुलाई 2018 तक ब्रम्प्टन ओंटोरियो कनाडा में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जाएगा। 1 जुलाई 2018 को कनाडा में सुबह 10:30 बजे से कथा का प्रारम्भ होगा। 2 से 7 जुलाई 2018 तक की कथा शाम 5 :00 से होगी। जिसका कि आप सभी भक्त भारत में 2 से 8 जुलाई तक शाम 4 बजे से आस्था भजन चैनल पर विशेष प्रसारण किया जा रहा हैं । राधे राधे

27Jun 2018

श्रीमद्भागवत कथा के सप्तम दिवस पर कथा पंडाल में असम के मा. मुख्यमंत्री श्री @SarbanandaSonowal जी, मा. असम टूरिज्म चैयरमैन श्री @jayanta.mallabaruah जी एवं मा. असम भाजपा प्रदेश अध्यक्ष श्री @Ranjit KUMAR DAS जी ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई।

असम, गुवाहाटी में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के सप्तम दिवस पर कथा पंडाल में असम के मा. मुख्यमंत्री श्री @SarbanandaSonowal जी, मा. असम टूरिज्म चैयरमैन श्री @jayanta.mallabaruah जी एवं मा. असम भाजपा प्रदेश अध्यक्ष श्री @Ranjit KUMAR DAS जी ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई और व्यास पीठ से आशीर्वाद प्राप्त किया। मिशन के द्वारा माननीय मुख्यमंत्री जी को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

27Jun 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 21 जून से 27 जून 2018 तक सोनाराम प्लेग्राउण्ड, ए.टी रोड, भरलुमुख, गुवाहाटी, असम में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण-रूकमणी विवाह और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
श्रीमद्भागवत कथा के सप्तम दिवस पर असम के माननीय मुख्यमंत्री श्री सर्वानंद सोनोवाल जी, असम टूरिज्म डेवलपमेंट कोरपोरेशन के माननीय चैयरमैन श्री जयंत मल्ला बरूआ जी एवं असम भाजपा प्रदेश अध्यक्ष श्री रंजित दास जी ने भी कथा पंडाल में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई और भागवत जी एवं व्यास पीठ से आशीर्वाद प्राप्त किया। मिशन की ओर से सभी को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा कि शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान ने बड़ी कृपा करके हमे मानव जीवन दिया है। इस संसार में मानव जीवन मिल भी गया है, इस संसार में हमे जो भी यश मिलता है, मान सम्मान मिलता है वो सभी ठाकुर की कृपा से मिलता है। कुछ लोग मान लेते हैं और कुछ लोग नहीं मानते। लेकिन हम और आप सभी आस्तिक लोग हैं, आस्थावान लोग हैं, हम सभी को यह बात मान लेनी चाहिए कि ठाकुर की कृपा के बगैर यह संभव नहीं है।

महाराज श्री ने कहा कि बहुत से लोग यह कहते हैं या भटके हुए लोग यह कहते हैं कि जीवन के अंतिम पड़ाव यानि वृद्धावस्था में हम करेंगे ही क्या ? भगवान का नाम ही तो जपना है। कुछ ओर तो करने को बचेगा नही, अभी तो हमारी खाने कमाने की उम्र है, अभी तो हमें धन कमाने दो, जब हम वृद्ध हो जाएंगे तब हम भगवान का भजन किया करेंगे। लेकिन कभी सोचा है आपने जिस समय जीव की वृद्ध अवस्था होती है वो रोग ग्रसित हो जाता है, वात पित्त उसका साथ नहीं देता है, रात को वो चैन से सो नहीं सकता, उस कठिन परिस्थिति में अगर जीव ये कहे कि मैं अंतिम समय पर भगवान का नाम लूंगा तो वो मुर्खता कर रहा है। पहले तो हमे यही नहीं पता की हमारा अंतिम समय कब आएगा। ये कहना की मैं बुढ़ापे में करूंगा तो बुढ़ापे तक जिंदा रहने की कोई गारंटी है। कोई कह सकता है कि मुझे बुढ़ापे तक कुछ नहीं होगा, कोई नहीं कह सकता क्योंकि कोई जानता ही नहीं है। ना जाने किसी दिन और कब हमारी मौत आ जाए।

महाराज श्री ने आगे कहा कि दुष्ट प्रवृति के मित्र दुष्ट प्रवृति के ही होंगे और संत प्रवृति के लोगों के मित्र संत प्रवृति का ही होगा। आपके मित्र से भी आपकी पहचान बन जाती है कि आपका स्वभाव कैसा होगा। आप जीवन में कभी भी मदिरा पान मत करो लेकिन अगर आप शराबी के साथ रहोगे तो आपकी पहचान शराबी की जरूर हो जाएगी। आपका संग ही आपकी पहचान बनाता है।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि रुकमणी जी ने श्रीकृष्ण से प्रेम विवाह किया। भगवान ने 16 हजार 100 विवाह किए हैं लेकिन 8 विवाह अलग अलग हुए। ये 8 पटरानियां साधारण नहीं हैं लक्ष्मी जी बनी हैं रूकमणी, पार्वती जी आधे अंश से बनी हैं जामवंती और बाके आधे अंश से बनी हैं महामाया, तुलसी बनी हैं लक्ष्मणा, यमुना बनी हैं सूर्य की पूत्री कालिंदी, लज्जा बनी हैं भद्रा, गंगा बनी हैं मित्रव्रिंदा, सावित्री जी बनी हैं सत्या और पृथ्वी बनी हैं सत्यभामा। ये सांसारिक विवाह नहीं है ये पूरी प्रकृति के साथ ठाकुर जी ने विवाह किया है।
महाराज श्री ने आगे कहा कि भगवान ने 16100 विवाह इसलिए नहीं किए की उन्हे बहुत सारी पत्नियां चाहिए थी। उन्होंने इतने विवाह इसलिए किए क्योंकि उन स्त्रियों को जरूरत थी। भौमासुर नामक राक्षस ने 16 हज़ार 100 कन्याओं को बंदी बना रखा था। नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा की समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। इस कारण भगवान ने १६१०० रूप बनाकर सबके साथ एक मुहूर्त में एक साथ विवाह किया था। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने इतने विवाह किये। भगवान ने कामनावश विवाह नहीं किया था, करुणावश किया था। भगवान कहते हैं जिसको कोई नहीं अपनाता अगर वो मेरी शरण में आये तो मैं उसे अपना लेता हूँ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंततः सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

26Jun 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 21 जून से 27 जून 2018 तक सोनाराम प्लेग्राउण्ड, ए.टी रोड, भरलुमुक, गुवाहाटी, असम में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत एक सुंदर भजन राधे राधे गाने को जी चाहता से की जिसपर सभी भक्त खूब झूमे। महाराज श्री ने कथा के क्रम को आगे बढ़ाते हुए कहा कि भगवान ने जीव को इस मानव जीवन को खुबसूरत बनाने के लिए दो उपहार दिए हैं, एक दिया है दिल और एक दिया है दिमाग। भगवान ने जब दिल और दिमाग दिया तो भगवान ने उपयोगिता हमारे उपर छोड़ दी। ये तुम्हे सोचना है की दिल कहां इस्तेमाल करना है और दिमाग कहां इस्तेमाल करना है। जीव आया और उसने अपने विवेक अनुसार इस्तेमाल किया और इस्तेमाल कैसे किया जहां दिमाग लगाना चाहिए था वहां दिमाग नहीं लगाया और दिल वहां लगाया जहां नहीं लगाना चाहिए था। अपने दिल पर हाथ रखकर पुछिए कि ऐ दिल तू कहां लगा हुआ है तो जवाब मिलेगा दुनिया में, परिवार में, माया में, संपत्ति में और मान सम्मान पाने में, यहां हमारा दिल लगा हुआ है और फिर कुछ समय बाद कहते हैं फलाने व्यक्ति ने हमारा दिल तोड़ दिया। भगवान ने कहा जब विवेक का इस्तेमाल नहीं करोगे तो दिल ही टूटेगा। तुमने दिल वहां लगाया ही क्यों जहां दिल टूट जाए या दिल टूटने का डर हो, तुमहे तो दिल मुझमें लगाना चाहिए था, जिनका दिल मुझ में लग जाता है फिर उनका दिल कभी टूटता नहीं है। सच यह है कि दिमाग दुनिया में लगाना चाहिए और दिल भगवान में लगाना चाहिए। जो जीव अपना दिल और दिमाग सही जगह पर इस्तेमाल करता है वो सही मायने में मानव जीवन का सदुपयोग करता है। इसिलिए कहते हैं धर्म और कर्म साथ में करो, कर्म दिमाग के साथ करो और कर्म दिल के साथ करो।
महाराज श्री ने कहा कि भगवान हर जगह है लेकिन मिलता उन्ही को है जो उस मार्ग पर चलता है और मार्ग क्या है ? जो ज्ञान को चाहते हैं उनके लिए ज्ञान मार्ग है, जो वैराग्य को चाहते हैं उनके लिए त्याग मार्ग है, जो ईश्वर को साकार रूप में प्यार करते हैं उनके लिए भक्ति मार्ग है और कल काल में सबसे सरल मार्ग है भक्ति। 
महाराज श्री ने कहा कि कभी भी अविश्वास को अपने दिल में मत आने दो, ये बात का आना कि भगवान है कि नहीं ये ही तुमहे अविश्वासी और नास्तिक बना देता है। भगवान है ऐसा पूर्ण विश्वास अपने दिल में जगाओ और जब ये दिल में जगा लोगे तो निश्चित तौर पर गोविंद आप की हर मनोकामना को पूरी करेंगे। 
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

26Jun 2018

पूज्य महाराज श्री ने अंबूबाची में माँ कामाख्या के कपाट खुलने पर सबसे पहले किए दर्शन ।

पूज्य महाराज श्री ने अंबूबाची में माँ कामाख्या के कपाट खुलने पर सबसे पहले किए दर्शन, महाराज श्री के साथ असम के माननीय मुख्यमंत्री श्री सर्बानन्द सोणोवाल जी, माननीय राज्यपाल श्री जगदीश मुखी जी, उत्तर प्रदेश के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री महेंद्र सिंह जी मौजूद रहे।

25Jun 2018

अंबुबाची महोत्सव पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 21 जून से 27 जून 2018 तक स्थान – सोनाराम प्लेग्राउण्ड, ए.टी.रोड, भरलुमुख, गुवाहाटी, असम में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

अंबूबाची महोत्सव में चल रहें श्री मदभागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत पुज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर महाराज जी ने एक सुंदर भजन की प्रस्तुति से कि। “श्री श्याम तुम्हारे चरणों में एक बार ठिकाना मिल जाए” की धुन में मग्न भक्तों ने पंचम दिवस का शुभआरंभ झूमते गाते हुए किया। आज परम पुज्य महाराजश्री ने कहा कि लोग भहाना बनाते है कि भगवान मिलते नहीं, लेकिन भगवान का स्वभाव और काम ही है जीव से मिलना, महाराज श्री ने कहा कि भगवान तो सहज स्वभाव हैं, वो तो मिलने के लिए आतुर हैं, महाराज श्री ने बताया कि कैसे भगवान खुद अपने भक्तो से मिलने के लिए आतुर होते हैं, उन्होंने कहा कि भगवान अपने भग्तों से मिलने के लिए उसी तरह आतुर रहते हैं, जैसे एक धन के लिए लालची व्यक्ति धन पाने की लालसा रखता है। वैसे ही स्वयं भगवान अपने भक्तों से मिलने कि तालाश में रहते हैं। भगवान कहते हैं कि जहां मेरे भक्त अपने चरण रखते है, वहां वे अपने दोनों नैन रखते हैं। ऐसे है दीन दयालू ठाकुर जी भगवान। पर जीव ये समझता है कि भगवान उससे मिलना नहीं चाहते, लेकिन क्यों जीव ऐसे सोचता है? क्या वजह है कि जीव ऐसा समझता है? भगवान तो ये कहते है कि जीव उनसे मिलना नहीं चाहता। 
कथा की शुरूआत करते हुए महाराज श्री ने एक बहुत धर्म प्रिय राजा थे, वे हमेशा ईश्वर का प्रेम से भजन करते पूजा पाठ करते, राज्य को भी बड़े धर्म के हिसाब से चलाते। एक दिन राजा कहीं से भ्रमण करके आए और ठाकुर जी की पूजा कर रहें थे, और आचानक भगवान ने प्रसन्न होकर राजा को साक्षात् दर्शन दिए। भगवान ने राजा को कहा कि वे उनकी सेवा और धर्म निष्ठा से बड़े प्रसन्न हैं, जिसके चलते भगवान ने राजा से कहा कि तुम कोई भी वरदान हमसे मांग लो, जो भी तुम मांगोगे हम तुम्हें देंगे। राजा बहुत धर्मप्राणायक था, अपनी प्रजा का भला चाहने वाला था, राजा ने भगवान श्री कृष्ण से कहा कि मुझ तुछ को दर्शन देकर आपने बहुत कृपा की है, राजा ने कहा कि जैसे आपने अनुग्रह करके हमें दर्शन दिया है, वैसे ही अनुग्रह करके हमारी प्रजा के हर वयक्ति को दर्शन दे दीजिए। उन सबका कल्याण हो जाएगा। राजा से ऐसा सुन भगवान ने कहा कि हमने तुम्हें दर्शन इसिलिए दिए क्योंकि तुम अच्छे, सच्चे और धर्मप्रणाय हो, लेकिन तुम्हारी पूरी प्रजा ऐसी थोड़ी ना है, और ना ही सब हमसे मिलना चाहते हैं। लेकिन राजा ने कहा कि नहीं प्रभू हम तो तभी समझेंगें कि आपकी कृपा हमारे ऊपर है जब आप सबको दर्शन देंगे। भगवान को राजा पर दया आ गई, क्योंकि भगवान का एक स्वभाव है कि वो अपने भक्तों के वचन झूठे नहीं करते। उनकी इच्छा को पूरा करने का प्रयास करते हैं। लेकिन कहीं ना कहीं तो विधान भी है जिसका ध्यान रखना ज़रूरी है। तो भगवान ने कहा कि राजा अगर तुम चाहते हो कि तुम्हारी प्रजा के हर वयक्ति को दर्शन हो जाएं, तो तुम्हारी प्रजा को मेरी तरफ चलके आना होगा, राजा को भगवान वे एक पहाड़ी का नाम बताया जहां उन्होंने राजा से कहा कि प्रजा खुद चलकर उनके दर्शन करने आऐगी। प्रभु के वचन को सुन राजा ने पूरे राज्य में ये संदेश फेलवा दिया कि कल मेरे साथ आप सब चलें स्वयं भगवान कृष्ण आपको दर्शन देंगे। पुज्य महाराज श्री ने कहा कि कौन वयक्ति नहीं चाहेगा कि बिना तप के , साधना के भगवान मिल जाएं, सभी ये चाहेंगे। 
कहानी को आगे बड़ाते हुए महाराज श्री ने बताया कि जैसे ही प्रजा को पता चला राजा के बताए हुए समय पर सब चल पड़े उस पहाड़ी की तरफ, लेकिन भगवान कि लीला देखिए कि रास्ते में तांबे के सिक्कों का बहुत बड़ा पहाड़ है, और जो भी राजा के साथ आए थे उनमें से कुछ लोग वो तांबे के सिक्के बटौरने की तरफ चलने लगे, राजा ने उनसे कहा कि अरे! तुम पागल हो गए हो? वहां भगवान हमारा इंतज़ार कर रहें हैं, और तुम चले हो तांबे के सिक्के बटौरने। राजा ने कहा कि मानव जीवन का उद्देश संपत्ति नहीं है, चले हमारे साथ चलो, ऐसा राजा ने अपनी प्रजा से कहा। 
रास्ते में आगे चलते हुए बीच में चांदी का पहाड़ दिखाई दिया, उसे देखते ही प्रजा के कुछ लोग चांदी के पहाड़ को देखकर उसकी तरफ आकर्शित हो उठे और चांदी की लालसा में मार्ग बदलने लगे, ऐसा देख राजा ने कहा कि अरे तुम कहा जा रहें हो? तुम पागल हो गए हो जैसे तुमने तांबे के सिक्कों का परित्याग किया है, वैसे ही तुम इस चांदी का भी परित्याग करो। राजा ने कहा कि क्या मिलगा तुम्हें। राजा ने प्रजा से कि आओ चलो मेरे साथ तुम्हें हम भगवान का दर्शन कराएंगे। कुछ ही लोगों ने इस बात को समझा और अधिक लोग कम हो गए। चांदी की चमक में कुछ लोग बह गए। उसके बाद फिर थोडे आगे चले, तो वहां पर देखा कि बहुत बड़ा, चमकता हुआ सोने का पहाड़ है, चारों तरफ से स्वर्ण पाहाड़ जो है, अपनी चमक बिखेर रहा है। और उस सोने के पहाड़ को देखकर जो भी कुछ बचे थे, सब सोने की पाहाड़ की ओर बड़ गए। और सोना बटौरने की और चले गए, राजा पुकारता रहा कि कैसे लोग हैं ये कि समपत्ति के लिए इश्वर को भुला रहें हैं। प्रजा ने राजा को कहा कि अगर ज़िदा रहें तो भगवान से फिर प्राथना कर देना, हम भगवान से फिर दर्शन करेंगे। आखिर में सिर्फ राजा और रानी दोनों साथ में जाते हुए एक दूसरे से बाते करते हुए इश्वर के दर्शन के लिए आगे बड़ रहे था, तब राजा ने रानी को कहा कि रानी देखा वहां भगवान मिलने के लिए तैयार खड़े हैं, और यहां ये मायावादी लोग ऐसा माया में रच गए कि सबकुछ भूलकर सिर्फ माया में रम गए। रानी ने राजा की बात में हामी भरते हुए कहा कि हां महाराज आप सही कह रहें हैं। और जब आगे बड़े तो सतरंगों से चमक रहा हीरों का पहाड़ रानी ने देखा। और जब रानी ने देखा, तब तो रानी के भी पांव उसतरफ बड़ने लगे , राजा ने कहा कि ऐसा मत करो, लेकिन ने राजा को अनसुना कर हीरे बटौरने लगी। और जब रानी की ये दशा देखी तो राजा को बड़ी ग्लानी हुई, कि ये संसार कैसा है, जिन्हें इश्वर से कोई लगाव ही नहीं है। राजा उदास होकर अकेले ही भगवान के दर्शन के लिए चले और जब पहाड़ी पर पहुंचे, तो वहां भगवान विराजमान थे। भगवान मुस्कुरा रहें थे

अंबूबाची महोत्सव में श्री मदभागवत कथा के दर्शन करने, पुज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर महाराज जी से आशिर्वाद प्राप्त करने पहुंचे उत्तर प्रदेश के माननीय मंत्री महेंद्र सिंह जी एवं असम सरकार से जयंत जी।

माननिय उत्तर प्रदेश मंत्री महेंद्र सिंह जी ने महाराजी और भक्त जनों को समक्ष पहुंचकर कहा कि अद्दभुत है , दिव्य है , शब्द को तो भ्रम कहा गया है , लेकिन वह शब्द जब परम पूज्यनीय देवकीनंदन जी के मुखारविंदों से निकलता है तो भ्रम तो साक्षात दिखाई पड़ता है। पूरा देश व पूरी दुनिया महाराज श्री की अमृतमय वाणी सुनती है। लोग कहते है कि सतयुग में तो भगवान राम थे, द्वापर में भगवान कृष्ण थे, अगर कलयुग में भगवान से मिलना हो तो कहां मिलेगे? तो मंत्री जी ने कहा कि कलयुग में अगर भगवान से मिलना हो तो जहां आदरणीय पूज्य देवकीनंदन जी कथा कर रहें हो, आ जाइए आपको भगवान मिल जाएंगे।

23Jun 2018

अंबुबाची महोत्सव धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 21 जून से 27 जून 2018 तक स्थान – सोनाराम प्लेग्राउण्ड, ए.टी.रोड, भरलुमुख, गुवाहाटी ,असम में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

अंबुबाची महोत्सव में श्रीमदभागवत कथा के तृतीय दिन में प्रवेश करते हुए श्री भागवत भगवान जी की आरती की गई। पुज्य श्री महाराज जी कथा की शुरुआत एक सुंदर भजन के साथ किया, कथा का श्रवण कराते हुए पुज्य महाराज श्री ने कहा कि श्रीमद भागवत जो हमारे जीवन में वो सबकुछ प्राप्त कराती है और जिन्हें कुछ नहीं चाहिए होता उन्हें सबसे ज्यादा। संसारिक बातॆं बताते हुए कहा कि आज वयक्ति भगवान से और परिवार से दोनों से धीरे धीरे दूसर जा रहा है। ना तो परिवार का ही सगा हो पा रहा है और ना ही भगवान का ही सगा हो पा रहा है, वजह सबकी अपनी अपनी अलग है, इसकी प्रमुख वजह पर गौर करें तो इसकी वजह पैसा है। महाराज श्री ने कहा कि वे पैसों के खिलाफ नहीं है, धन ज़रूरी है लेकिन धन के लिए पागल हो जाना कि जिससे आप अपने परिवार और अपने भगवान से अलग हो जाओ ये सही बात नहीं है। धन की चाहत इस कदर हमपर हावी है कि मनुष्य अपने परमात्मा से भी अलग हो चुके हैं। लेकिन कभी आपने सोचा है कि जब इस दुनिया ने व्यक्ति चला जाएगा तो यहां से कुछ भी अपने साथ लेकर नहीं आएगा। इस बात पर ज़ोर करते हुए महाराज श्री ने कथा के ज़रिए पंडाल में मौजूद भक्तों को समझाया कि एक क्रूर राजा था, जिसने प्रजा पर कर लगा दिया, सबसे कर वसूलता था, और सब धन इकठ्ठा कर के जंगल में गुफा में वे धन इक्कठा करता और उस गुफा में ताला लगवा दिया जिसकी दो चाबी थी, एक चाबी राजा के पास और दूसरी चाबी जो विशेष मंत्री के पास। मन ही मन बड़ा हर्षित होता, तो राजा उस खजाने के पास जाता और खजाने को देख राजा बहुत खुश होता था। ये सिलसिला कुछ साल चला , लेकिन एक दिन जब काफी समय बाद राजा का मन खजाने को देखने को किया तो वे उस गुफा में खजाने को देखने के लिए गया। और हीरे मोती की चमक देखकर बहुत प्रसन्न हो रहा था, अपने खजाने को देख मस्त हो रहा राजा के सामने अचानक असका विश्वासी मंत्री आया जिसने देखा कि महाराज के खजाने का दरवाज़ा खुला है और ये सोचते हुए उसे ध्यान आया कि कल वे खजाना देखने आया था मुझसे ही ये दरवाज़ा खुला रह गया। तो वे गया दरवाज़ा बंद किया, ताला लगा दिया और चला गया। मंत्री तो चला गया लेकिन राजा तो अभी भी हीरों की चमक में मस्त है। थोड़ी देर बाद जब उसे सुकून मिला, शांती मिली, चैन मिल गया, प्रसन्न होने के बाद जब घर जाने की बारी आई और राजा दरवाजे कि ओर मुड़ा तो उसने देखा कि दरवाजा तो बंद है, फिर राजा दरवाजे को पीटने लगा और दरवाजा खोलने के लिए आवाज़ लगाने लगा। संयोगवश अब जंगल में कौन आए। कोई नहीं जंगल में तो , दौपहर से शाम, शाम से रात और रात में सुबह होने को है। प्यास लग रहीं है और गला सूख रहा था। और हीरे मोती से पूछने लगा कि क्या तुम मुझे एक वक्त का भोजन दे सकते हो,तो हीरे ने कहा कि मैं तेरे तन की चमक तो बड़ा सकता हूं लेकिन तेरा पेट नहीं भर सकता, उसके लिए तो तुझे अन्न ही चाहिए। फिर राजा ने सोने से कहा कि मुझ पर कृपा कर मुझे हर हालत में सिर्फ एक ग्लास पानी चाहिए, सिर्फ एक ग्लास, सोने ने कहा कि मैं आभुषण तो बन सकता हूं, तुम्हारे और तुम्हारे परिवार कि शोभा तो बड़ा सकता हूं, लेकिन मैं कुछ भी करके तुम्हें जल नहीं पिला सकता। बिना पानी के बिना जल के राजा की जान जाने लगी। पागलों सा हो गया राजा, बिना भोजन और जल के राजा मुर्षित सा हो गया, और कुछ समय बाद जब उसकी मुर्षा दूर हुई तो जाने से पहले दुनिया को कुछ संदेशा देना चाहता था। अब मैसेज देने के लिए भी वहां कुछ नहीं। मैसेज भी दे तो किससे दे , वहां तो कुछ है हि नहीं और आखिरकार उसने अपनी उंगली फोड़ी और रक्त निकला जिससे उसने लिखा कि तुम्हारे जीवनभर की कमाई वक्त आने पर तुम्हें एक ग्लास जल भी नहीं दे सकती। वो तुम्हारे काम नहीं आने नहीं आने वाली। तुम्हें जो चाहे कमाना है कमाओं लेकिन अंतिम समय तुम्हारे साथ ना तो तुम्हारा हीरा जाएगा ना मोती जाएगा, अगर साथ तुम्हारो कुछ जाएगा तो वो तुम्हारी नेक कमाई ही जाएगी। राजा की तलाश में मंत्रीगण भटक रहें,और जब राजा नहीं मिला, तो मंत्री आखिर गया कि ऐसा तो नहीं कि राजा को हरण या मारकर के किसी ने उस खज़ाने को भी चोरी कर लिया हो, तो वो गए खजाने को देखने, दरवाजा खोला, और राजा को मरा हुआ देख मंत्रीओं की सेना हक्का बक्का रह गई, दंग हो गई कि उस राजा ने सारे हीरे मोती सोना चांदी नीचे बिछा रखे थे, और उसके ऊपर खुद मरा पड़ा था, और मानव दुनिया को कह रहा था कि चाहे कितना भी कमा लो एक ग्लास पानी भी तुम्हें जीवन भर की कमाई नहीं दे सकती। मंत्री को एहसास हुआ कि मेरी गलती से राजा मारा गया। इसिलिए महाराज श्री ने कहा कि पैसा की चाह गलत चीज़ नहीं है लेकिन पैसे के लिए पागल हो जाना पागलपन है। धन सबको चाहिए, लेकिन तुम्हारी कमाई ऐसी हो जो किसी की आंख में आंसू ला दे, किसी के मान सम्मान को चोट पहुंचा दे, इस कमाई से भेहतर है कि भूखे रहकर अपने प्राण त्याग दो, लेकिन किसी को रुला कर धन एत्रिक करते हो, तो धिक्कार है उस जीवन पर, उस धन के लिए। महाराज श्री ने कहा कि आजकल लोग रिश्वत लेने को ब्लेकमेलिंग को भी अपना धर्म समझते हैं। इस कथा को पुज्य महाराज श्री जी ने भजन के ज़रिए भक्तों को समझाया कि “ हरी का नाम तुम ले लो, यह ही बस साथ जाएगा” ।

24Jun 2018

अंबुबाची महोत्सव पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 21 जून से 27 जून 2018 तक स्थान – सोनाराम प्लेग्राउण्ड, ए.टी.रोड, भरलुमुख, गुवाहाटी, असम में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

महाराज जी ने कहा हमेशा भगवान से वस्तुएं नहीं मांगनी चाहिए कभी कभी भगवान से भगवान को भी मांगना चाहिए, भगवान के चरणों की धूल मांगनी चाहिए। वस्तु मांग लोगे तो एक दिन यहीं छूट जाएगी लेकिन भक्ति मांग ली तो कही नहीं छूटेगी तुम्हारे साथ जाएगी।

पूज्य महाराज श्री ने कथा प्रारम्भ करते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और
मानव रूप में अवतार था जिसमे भगवान विष्णु ने एक बौने के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया | वामन
अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है | महबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था | महाबली
एक महान शाषक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी | उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी | उसको उसके
पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था | समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव
ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था |


महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रस्सन करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान
मांगने को कहा | बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे
भी होते हैं | मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके “| भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के
लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया |


शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीति कार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली | बाली ने इंद्रदेव
को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया | एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के
स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा कोअश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए |


बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया | बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी |
इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे |
इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई |देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा
कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें | जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर
बौने पुत्र ने जन्म लिया | पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया |
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे | अंतिमअश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी
दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया |

महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है | तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के
भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर
तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे |
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी
इच्छा पूरी करूंगा |


महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये” |
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप
सकूं” |


महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मै तुमको दूँगा ”|
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया | वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि
बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था | वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया |
दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया | अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों
में धरती और आकाश को नाप लिया है | अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मै
अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ “|


महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये “|
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया | वामन के तीसरे कदम की शक्ति से
महाबली पाताल लोक में चला गया |अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया
|इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया
|
महाराज श्री ने देश की सेवा और धर्म की सेवा को सर्वोपरि मानते हुए कहा की सभी को अपने धर्म और अपने देश की सेवा के
लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।

22Jun 2018

अंबुबाची महोत्सव धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 21 जून से 27 जून 2018 तक स्थान – सोनाराम प्लेग्राउण्ड, ए.टी.रोड, भरलुमुख, गुवाहाटी ,असम में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

द्वितिय दिवस की शुरुआत करते हुए परम पुज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने प्रभु श्री कृष्ण का सुंदर भजन श्रवण किया।

उन्होंने कहा कि जो मोक्ष चाहने वाले है उनके लिए भागवत सबसे सरल साधन है। मुक्ति मिलना आसान नहीं है, हज़ारों हज़ारों वर्षों तक तप करने के बाद भी मोक्ष सहज प्राप्त नहीं होता। अगर हम कहें कि हमें मुक्ति तप के माध्यम से मिल जाए, किसी और साधन से मिल जाए, तो ये आसान नहीं है, मुक्ति मिली तो है लेकिन आसानी से नहीं। उन्होंने कहा कि भागवत मात्र 7 दिन में मोक्ष देती है, लेकिन ये मुमकिन तब ही है जब हम भागवत को नियम और विधि विधान से सुने, ऐसा करने से आप जो चाहते है वो ही आपको मिलेगा। धन चाहने वालों को धन, संतान चाहने वालों को संतान, पाप नष्ट करना चाहते हो तो पाप नष्ट हो जाऐंगे, पापी से पापी कितना भी बड़ा पापिष्ट क्यूं ना हो वो भागवत कथा सुन ले तो वो निष्पान हो जाता है, ऐसी शक्ति है पवित्र ग्रंथ श्रीमद भागवत कथा में। श्रीमद भागवत कथा प्रत्येक रोग की औषधी है जिसे आप औषधालय भी कह सकते हैं।

भगवान श्री कृष्ण गोकुल में विराजमान, उदास सर्वेश श्री राधा ने पूछा आप उदास क्यूं हैं? तो श्री कृष्ण कहते हैं, कलयुग के लोग बुरा कर्म कर रहें हैं, बुरी योनिओं में जा रहें हैं, बहुत दुख पा रहें हैं, कष्ट पा रहें हैं, जब वो दुखी होते हैं, तो मैं दुखी होता हूं। महाराज श्री ने कहा कि आज हमारी स्थिति क्या है, पहले किसी राजा के राज्य में एक भी चोर होता था, उसकी कहानी लिखी जाती थी, पहले एक आद चोर होता था इतिहास बन जाता था, अब तो गली महोल्ले सुरक्षित नहीं है। राक्षक कौन है, किसे कहते हैं? राक्षक वो नहीं जो सिर्फ रावण या कंस कि सेना में होता था, राक्षक वो हैं जो माता पिता को नहीं मानते, जो अपने धर्म को नहीं मानते, अपने आदर्णियों से उनका आदर नहीं करते बल्कि उनका अपमान करते हैं, जिनकी नज़र हमेशा पराये धन पर लगी रहती है। जो हमेशा पराई स्त्रियों के साथ रमण करते हैं, या फिर उन पर नज़र रखते हैं।

महाराज श्री ने ज़ोर देते हुए कहा कि जो पराया धन है, वो मिट्टी है। उन्होंने कहा कि जो तुम्हारे भाग्य में नहीं, और तुम्हें उस धन की प्राप्ति चोरी से हुई है और तुमने उसे अपने घर रख लिया है, वो धन भी तुम्हारे विनाश की वजह बन सकता है। धन से सुख नहीं मिलने वाला, जितना तुम्हारे भाग्य में लिखा है उसी से संतोष करो, अगर अधिक पाने कि इच्छा है तो मेहनत करो।

महाराज श्री ने श्रीमद भागवत कथा के माध्यम से कहा कि आज की एजुकेशन में प्रॉब्लम है,आजकल बच्चों को मां बाप भी वहीं ग्यान देना चाहते है जिससे बच्चे अपना पेट भर सकें।

पूज्य महाराज श्री ने बताया कि श्रीमद भागवत की कथा ही अमर कथा है । भगवान् शिव ने पार्वती अम्बा को अमर कथा सुनाई और भागवत में ऐसा लिखा है कि जिसने भागवत की कथा श्रद्धा से सुनली वो माँ के गर्भ मेंदुबारा नहीं आएगा। यह शरीर छूटने के बाद वह वहाँ पहुँच जायेगा, जहाँ से दुबारा फिर जन्म नहीं लेना पड़ेगा , सदैव आनंद रहेगा। सुखदेव भगवान् भी यह कथा सुनने लगते हैं, पार्वती अम्बा सुनती जा रहीं हैं। 
भगवान् शंकर के नेत्र बंद थे, समाधि में योग में स्थित होकर सूना रहे हैं । पारवती अम्बा हूँ! हूँ! करती रहीं और दसवां स्कन्ध समाप्त हुआ तो नींद आ गयी उन्हें । सुखदेव भगवान् हूँ! हूँ! करते रहे और बारहवें स्कन्ध के बादजब आँख खुली तो देखा पार्वती जी सो रहीं थीं । हूँ हूँ ! कौन कर रहा था ? पारवती जी से पूछा तो उन्होंने कहा प्रभु दशम स्कन्ध की समाप्ति तक, मैंने बहुत सावधान हो कर सुना, पता नहीं क्या आपकी माया थी कि मेरीआँख लग गई पर हूँ ! कौन कर रहा था, देखा तो सुखदेव जी तोते के रूप में हूँ! हूँ! कर रहे थे । भगवान् शंकर ने चाहा इसको मार दें ! जो खूफिया होते हैं, घुस पैठिये उनको तो मार डालना चाहते हैं, तो भगवान् शंकर नेत्रिशूल उठाया और चला दिया , सुखदेव जी वहां से भागे और वेद व्यास जी की पत्नी पिंगला के पेट में चले गए, वे बाल सूखा रहीं थीं , उसी समय उनको जम्हाई आई । पार्वती जी बाद में बोलीं भगवान् शंकर से ..
प्रभु, इसीलिए तो लोग आपको भोला शंकर कहते हैं, एक ओर तो आप कहते हो जो भागवत की कथा सुनले वो अमर हो जाता है और दूसरी ओर आप सुखदेव को मारना चाहते हो .. जब वो अमर कथा सुन ही चुका है तोमरेगा कैसे !

ऐसा मान लो कि भगवान् कृष्ण का ही संकल्प है । बारह वर्ष तक सुखदेव जी गर्भ में रहे, ऐसा शास्त्र कहते हैं, और वहीँ भगवत चिंतन, आत्म चिंतन करते रहे । व्यास जी ने प्रार्थना की, कि भाई कौन ऐसा योगी, पत्नी के गर्भमें आ गया जो बाहर आना ही नही चाहता । सुखदेव भगवान् ने कहा की मैं बाहर तब आउंगा जब मुझे ये वचन मिल जाये कि भगवान् की माया मुझ पर हावी नहीं होगी । पैदा होने के बाद भगवान् की माया एक दम पकडतीहै ।

ये तीन इच्छाएं बड़ी जबरदस्त होती हैं , इन तीन इच्छाओं पर विजय पाना बहुत कठिन है वो तो ऊपर वाला कृपा कर दे तो ठीक है, एक तो बेटे की इच्छा, दुसरे धन की इच्छा और तीसरे समाज में सम्मान पाने की जो इच्छा है, ये हर व्यक्ति में होती है । इश्वर की कृपा के बिना, प्रभु की माया पे विजय पाना बहुत कठिन है।

जब सुखदेव भगवान् प्रगट हुए और थोड़े समय के बाद वे जवान हुए, इतने सुंदर थे, भगवान् कृष्ण का चिंतन करते करते स्वयं कृष्ण स्वरूप ही हो गये थे। अभी जनेउ संस्कार हुआ नहीं, कि सुखदेव जी महाराज घर से निकलके चल पड़े तप करने, कहते हैं मैं घर में नहीं रहूँगा भजन करूँगा । सुखदेव जी घर से निकले, कि वेदव्यास के मन में ममता जाग उठी, कितना सुंदर पुत्र मिला, कुछ दिन और घर रह जाता तो अच्छा था। दुनिया को उपदेशदे रहे है।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

21Jun 2018

अंबुबाची महोत्सव धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 21 जून से 27 जून 2018 तक स्थान – सोनाराम प्लेग्राउण्ड, ए.टी.रोड, भरलुमुख, गुवाहाटी ,असम में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भक्ति में धैर्य की आवश्यकता होती। कि इतने लोगों को आपने सुना जिनको सुनने आप नहीं आये, 
और इंतजार करते रहे उसका जिसको आप सुनने के लिए आये है श्रीमद भगवत कथा। सर्वप्रथम महाराज श्री ने विश्व शांति के लिए ठाकुर जी से प्रार्थना की और उसके बाद भागवत कथा में प्रवेश किया। महाराज जी ने भागवत के प्रथम श्लोक का पाठ किया।

" सच्चिदानन्दरूपाय विश्वोत्पत्त्यादिहेतवे। तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुम:।। "

उन भगवान को प्रणाम है जो सृष्टि के रचयिता है, जो सृष्टि के पालनहार है, ऐसे सच्चिानन्द को कोटि - कोटि नमन है। महाराज श्री ने सच्चिानन्द भगवान को प्रणाम कर प्रथम दिवस की कथा प्रारंभ किया। बहुत से लोगो के मन में विशेष तौर पर आज कल की युवा पीढ़ी के मन है एक बात आती है की कथा सुनना क्यों आवश्यक है। वेद पुराण श्रावण करना हमारे लिए क्यों जरुरी है।

धर्म को जानने के लिए हम शास्त्रों की शरण में जाते है। धर्म किसे कहते है ? ये समझने के लिए धर्म क्या करता है ? धर्म ही जो हमें जीना सिखाता है क्या करे क्या ना करे ये समझाने का जो माध्यम है। 
वो संत गुरुवाणी वेद पुराण रामायण संतो के मुख से निकला हुआ वाक्य है। यही हमें समझाता है की क्या करने योग्य है क्या करने योग्य नहीं है। धर्म क्या है ? जो वेद विदित है जो वेद में कहा गया पुराणों में कहा गया शास्त्रों में कहा गया उसके अनुसार अगर हम काम करे तो वह धर्म है और उसके विपरीत अगर हम काम करे तो वह अधर्म है। और महाराज जी कहा की वेद क्या है। वेद संविधान है सृष्टि को चलाने के लिए। और कहा की पूरे विश्व का चलाने के लिए ही वेद सविधान लागु किया गया।

20Jun 2018

आज पूज्य महाराज श्री गुवाहाटी,असम एयरपोर्ट पहुँचे तो भारी संख्या में भक्तों ने महाराज श्री का स्वागत किया।

आज पूज्य महाराज श्री गुवाहाटी,असम एयरपोर्ट पहुँचे तो भारी संख्या में भक्तों ने महाराज श्री का स्वागत किया। भक्तों ने महाराज श्री को फूल माला, पुष्प गुच्छ आदि अर्पित किए। पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 21-27 जून 2018 तक गुवाहाटी, असम में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

18Jun 2018

"सांस्कृतिक महोत्सव 2018" का आयोजन पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में तालकटोरा स्टेडियम, दिल्ली में आयोजित किया जा रहा है।

आज विश्व शान्ति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शान्ति सेवा समिति दिल्ली के तत्वावधान में 28-30 जुलाई 2018 को होने वाला विशाल "सांस्कृतिक महोत्सव" 28 के संदर्भ में श्री विजय शर्मा जी की अध्यक्षता में बैठक की गई। श्री शर्मा जी ने कहा कि यह महोत्सव ऐतिहासिक महोत्सव होगा जिसके लिए सभी सदस्यों और कार्यकर्ताओं को अपना सहयोग देना है।

"सांस्कृतिक महोत्सव 2018" का आयोजन पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में तालकटोरा स्टेडियम, दिल्ली में आयोजित किया जा रहा है। जिसमे देश-विदेश की जानी-मानी हस्तियां भी आएंगी।

14Jun 2018

कल विश्व शांति सेवा चैरीटेबल ट्रस्ट के द्वारा वृंदावन नगर में विभिन्न स्थानों पर बुजुर्ग महिलाओं एवं निर्धन महिलाओं को वस्त्र वितरण किये गये।

कल विश्व शांति सेवा चैरीटेबल ट्रस्ट के द्वारा वृंदावन नगर में विभिन्न स्थानों पर बुजुर्ग महिलाओं एवं निर्धन महिलाओं को वस्त्र वितरण किये गये । राधे राधे।।

10Jun 2018

पूज्य महाराज श्री ने खाटूश्याम से निकलकर जयपुर में भगवान गोविंद देव जी के दर्शन किए।

पूज्य महाराज श्री ने खाटूश्याम से निकलकर जयपुर में भगवान गोविंद देव जी के दर्शन किए।

 

10Jun 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 03 जून से 10 जून तक राजकीय आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय का खेल मैदान, खाटूश्याम जी में 108 श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया गया। अष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई।

भागवत कथा के अष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत में सर्वप्रथम सांस्कृतिक आतंकवाद पर बात करते हुए कहा कि ये पाश्चात्य कल्चर का ही असह है की आज हमारे माथे पर तिलक नहीं है। पाश्चात्य पढ़ाई का ही असर है की हमारे हाथ में कलावा, सर पर चोटी और गले में तुलसी नहीं है। हमे लगता है कि यह पुरानी बात है, यह पुराना कल्चर है, यह आधुनिक युग में ठीक नही है, लेकिन यह सब मिथ्या है। क्योंकि जीन लोगों को हमारा धर्म समझ में आ रहा है, जिन्होंने वेद पढ़े है, शास्त्र पढ़ा है और जिनको थोड़ा बहुत समझ में आ गया आप यकीन नहीं करेंगे की पाश्चात्य समाज के लोग भी माथे पर तिलक लगाने लगे हैं। दुर्भाग्य हमारा है की हम अपने सभ्य संस्कारों को भूलते जा रहे हैं जिससे मानव बनता है। आज आप स्वत: ही देखिए हमारे मन में अपने लिए जितनी चिंता रहती है दूसरों के लिए उतनी नहीं रहती। वेद, पुराण, रामायण, गीता की ये जो पढ़ाई है ये सही मायने में मानव का निर्माण करती है।

महाराज श्री ने कहा कि संसार एक नदिया है, जीव एक पथिक है और माया और ईश्वर दो किनारे हैं, सिर्फ भगवान ही इसे पार कर सकता है ओर कोई नहीं। जो माया का किनारा छोड़कर ईश्वर के किनारे हो जाता है गोविंद उसे पार लगा देते हैं।
महाराज श्री ने कथा के कल के क्रम को आगे बढाते हुए कहा कि भगवान ब्रज से मथुरा गए, साढे ग्यारह वर्ष ब्रज में रहे और साढ़े 12वर्ष मथुरा में रहे। कंस इत्यादि का वध किया । कंस की दो पत्निया थी अस्ति और प्राप्ति ये दोनों जरासंध की पुत्रियां थी। जब यह दोनों अपने पिता की पास जाकर रोने लगी तो जरासंध ने 17 वां मथुरा पर चढाई करी और हर बार कन्हैया ने उन्हे प्राप्त किया और 18वीं बार जरासंध ने ब्राह्मणों को बंदी बनाया और कहा कि तुम मेरी विजय के लिए यज्ञ करो और मेरी विजय नहीं हुई तो तुम सब को मृत्यु दंड मिलेगा। बेचारे ब्राह्मण मृत्यु के डर से यज्ञ करने लगे। यज्ञ का उद्देश्य है कृष्ण की पराजय और जरासंध की विजय। सोचने वाली बात यह है की संसार में कोई है जो कृष्ण को परास्त करे फिर भी कृष्ण ने अपनी हार स्वीकार की, रण छोड़कर भाग गए। वो इसलिए नहीं भागे की हरा नहीं सकते थे बल्कि वो इसलिए भागे क्योंकि वो चाहते हैं धर्म की रक्षा करना चाहते हैं, जरासंध ने ब्राह्मणों को बंद बना रखा है अगर उनहे कुछ हुआ तो धर्म का नुकसान होगा।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि रुकमणी जी ने श्रीकृष्ण से प्रेम विवाह किया। भगवान ने 16 हजार 100 विवाह किए हैं लेकिन 8 विवाह अलग अलग हुए। ये 8 पटरानियां साधारण नहीं हैं लक्ष्मी जी बनी हैं रूकमणी, पार्वती जी आधे अंश से बनी हैं जामवंती और बाके आधे अंश से बनी हैं महामाया, तुलसी बनी हैं लक्ष्मणा, यमुना बनी हैं सूर्य की पूत्री कालिंदी, लज्जा बनी हैं भद्रा, गंगा बनी हैं मित्रव्रिंदा, सावित्री जी बनी हैं सत्या और पृथ्वी बनी हैं सत्यभामा। ये सांसारिक विवाह नहीं है ये पूरी प्रकृति के साथ ठाकुर जी ने विवाह किया है।
महाराज श्री ने आगे क
हा कि भगवान ने 16100 विवाह इसलिए नहीं किए की उन्हे बहुत सारी पत्नियां चाहिए थी। उन्होंने इतने विवाह इसलिए किए क्योंकि उन स्त्रियों को जरूरत थी। भौमासुर नामक राक्षस ने 16 हज़ार 100 कन्याओं को बंदी बना रखा था। नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा की समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। इस कारण भगवान ने १६१०० रूप बनाकर सबके साथ एक मुहूर्त में एक साथ विवाह किया था। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने इतने विवाह किये। भगवान ने कामनावश विवाह नहीं किया था, करुणावश किया था। भगवान कहते हैं जिसको कोई नहीं अपनाता अगर वो मेरी शरण में आये तो मैं उसे अपना लेता हूँ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंततः सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

।। राधे-राधे कहना पड़ेगा ।।

9Jun 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 03 जून से 10 जून तक प्रतिदिन राजकीय आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय का खेल मैदान, खाटूश्याम जी में 108 श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्री कृष्ण- रूक्मिणी विवाह का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।


आज पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर से राजकीय आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय के स्कूल बच्चों की पढ़ाई में आ रही रूकावट को दूर करने के लिए 1,21,000 रूपए की राशि का चेक भेंट किया गया ताकि बच्चों के उज्जवल भविष्य की राह में आ रही रूकावट को दूर किया जा सके।
कथा के मध्य में नवीन दशहरा समिति खाटू श्याम जी द्वारा पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज को भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए किए जा रहे प्रयासो को देखते हुए “भारतीय संस्कृति गौरव सम्मान की उपाधी से अलंकृत किया गया। यह सम्मान समिति के अध्यक्ष पप्पू शर्मा खाटू वाले के द्वारा दिया गया। इस मौके पर संरक्षक सुरेश तिवाड़ी, प्रताप सिंह चौहान, लक्ष्मीनारायण सैन, समिति मंत्री गोवर्धन सैन, कोषाध्यक्ष दीनदयाल शर्मा उपस्थित रहे। 


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि मॉर्डन एज्यूकेशन जो आजकल हमारे बच्चे स्कूलों में पढ़ाई जा रही है, ध्यान दें की वहां से बच्चे सीख कर क्या आ रहे हैं ? पहले यह बात प्रच्चलित थी की तुम्हारी कलम में वो ताकत है कि बड़े से बड़े विवाद को, आतंकवाद को समाप्त कर सकती है। पहले व्यक्ति शस्त्र नहीं, शास्त्र उठाते थे। कलम से बिना गोली चलाए समाज का कितना बडा कल्याण कर सकते हैं। पहले हमारे गुरूजन पैसा कमाने वाला इंसान नहीं बनाते थे, वो एक सच्चा मानव बनाते थे और वो मानव ऐसा होता ना सिर्फ घर का पालन करता था, ना सिर्फ अपने समाज की देखभाल करता था बल्कि देश और धर्म पर कुर्बान होने के लिए एक समय भी सोचता नहीं था। लेकिन आज आतंकवाद को समाप्त करने में नहीं आतंकवाद को बढ़ाने में शिक्षा काम कर रही है। आजकल होने वाली ज्यादातर आतंकी घटनाओं में पढ़े लिखे लोग ही शामिल है। हम बड़े बड़े स्कूल कॉलेजों में अपने बच्चों को इंसान बनने के लिए भेजते हैं और वही उच्च शिक्षा हमारे बच्चों को आतंकवादी बना कर लौटाती है। दूसरे धर्म के गुरू शिक्षा देते है की जेहादी बनो क्या ये शिक्षा है ? बड़े बड़े डॉक्टर, इंजिनियर, पढ़े लिखे बच्चे आतंकवादी बन रहे हैं। गलती वहां नहीं है, दरअसल शिक्षा इसका मूल आधार है। मूल आधार ऐसे है कि बच्चा मन लगा कर नहीं पढ़ता है मां बाप कहते हैं कि पढ़ोगे नहीं तो नौकरी नहीं मिलेगी, नौकरी नहीं मिलेगी तो पैसा नहीं मिलेगा और पैसा नहीं तो कौन पूछेगा। बचपन से ही हमारे बच्चों के दिमाग में पैसा बूरी तक डाल दिया जाता है। इंटरनेट की माध्यम से बडे बड़े ऑफर दिए जाते हैं, तुम यह काम कर दो तुमहे भरपूर पैसा मिलेगा, तुम मर भी गए तो तुम्हारे घर वाले चैन से आनंद लेंगे। इस आतंकवाद को रोका जा सकता है, युवाओं को उचित संस्कार देकर, अगर संस्कार होंगे तो व्यक्ति को सही गलत का बोध होगा। अपने बच्चो को संस्कार दिजिए, उन्हे सही गलत का ज्ञान दिजिए उनसे सिर्फ पैसा बनाने की मशीन मत बनाइए वरना हाथ मलते रह जाओगे।


महाराज श्री ने कहा कि अपने मन में गुरू और गोविंद के लिए कभी गांठ मत रखना। गुरू और गोविंद में कोई अंतर नहीं है। गुरू गोविंद के प्रति जब आपकी गांठ नहीं होगी तो गोविंद से मिलने के लिए आप तैयार हो जाओगे। उन्होंने कहा कि मौन भी एक साधना है इसलिए बिना वजह कभी बोलना नहीं चाहिए, जहां जरूरत हो वही बोलो।
महाराज श्री ने कहा कि महंगे कपड़े पहनने से कोई बड़ा नहीं होता जिसके विचार महान होते हैं वही बड़ा होता है। 


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

8Jun 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिधय में 03 जून से 10 जून तक प्रतिदिन राजकीय आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय का खेल मैदान, खाटूश्याम जी में श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि जीवन का एक मात्र उद्देश्य होना चाहिए अपने जीवन में रहते हुए भगवान को मना लेना। हमारे दुख का एक कारण यह भी है कि हम अपना पूरा जीवन दुनिया का मनाने में निकाल देते हैं। लेकन संसार कभी माना नहीं है किसी से, कितनी भी आप कोशिश कर लो, 99 बात आप मानो लेकिन 1 बात नहीं मानोगे तो कह देंगे तुझसे बुरा इंसान कोई नहीं है दुनिया में। ये संसार का स्वभाव है कि इनकी हर इच्छा को पूरी करती रहो तो आप इनके अपने हो और जिस दिन आप इनकी बात पूरी ना करो उस दिन वो आपकी हर अच्छाई भूल जाते हैं और सिर्फ बुराई याद रखते हैं। लेकिन हमारे प्रभु का स्वभाव अलग है, हम जन्मों से उन्हें भूल बैठे हैं अपने बल के, जीवन के, धन के, रूप के अभिमान पर। ना जाने कितने अभिमानों के कारण हम उन्हे भूले बैठे हैं लेकिन फिर भी हमारे मरने तक इंतजार करते हैं कि ये मरेगा मुझे याद करेगा। ईश्वर को मनाना बहुत आसान है और जीव को मनाना बहुत मुश्किल है इसलिए आओ आज अपने जीवन में से कुछ समय निकालें भगवान को मनाने के लिए। 


महाराज श्री ने सांस्कृतिक आतंकवाद पर भी अपनी बात रखी, उन्होंने कहा कि यहां पर जिनते भी बुजुर्ग बैठे हैं उन्होंने अपने समय में संगीत के माध्यम से भी नृत्य के माध्यम से भी अपनी कल्चर को देखा होगा। यूपी मे चले जाओ, राजस्थान में चले जाओ, मध्य प्रदेश में चले जाओ, झारखंड में चले जाओ, झारखंड में चले जाओ हर प्रदेश की भाषा अलग, नृत्य अलग, गायन अलग, अनेकता में एकता की पहचान है हमारा भारत। जहां पर हमारे भारत में भरत नाट्यम जैसे नृत्य है, ऐसे ऐसे नृत्य हैं जिसमें बिना कुछ कहे राम कथा और पूरा महाभारत वो नृत्य के माध्यम से हम सब को प्रस्तुत कर देते हैं, इतनी सुंदर हमारी संस्कृति है, संस्कार हैं, कल्चर है। लेकिन आप देख रहे होंगे आजकल पाश्चात्य संगीत और फिल्मी धूनों ने हमारे संगीत और नृत्य के कल्चर पर जो आघात किया है, अब धीरे धीरे वो हमारे प्रदेशों से गायब होता जा रहा है। हमारे वहां ऐसी कलाएं हैं जिसने पूरे विश्व का ध्यान हमारी और आकृषित किया है। कई कलाओं ने तो विदेश में जाकर झंडे गाडे हैं, अवॉर्ड जीते हैं लेकिन आज अपने ही देश में वो उपेक्षित हैं। आज हर जगह रिमिक्स छाया है, पहले फिल्मी गाने भी पूरे राग में हुआ करते थे। वो करण प्रिय संगीत आज करण को दुख देने वाला संगीत होता जा रहा है। आज कल के फिल्मों के डांस देखो आप वो डांस नही रहे उन्हे देख कर जैसे हमारे बच्चे बन रहे हैं इसके बारे में भी आप सोचिए। आज हमारे देश की नृत्य कला, गायन संस्कृति खत्म होती चली जा रही है, मृत्यु की कगार पर खड़ी है। विदेशों से कई लोग आते हैं इन कलाओं को सीखने के लिए लेकिन अपने ही देश में अपनी भाषा, अपना नृत्य उपेक्षित है। मैं यह नहीं कर रहा हूं की हम महान बन जाएं पर इतना जरूर कह रहा हूं की क्या हमारे बच्चे वो पुरातन नृत्य देख पाएंगे, वो शास्त्रीय संगीत सुन पाएंगे, ये सांस्कृतिक आतंकवाद नहीं तो क्या ? संस्कृति, सभ्यता, संस्कार यह हमारे देश की सबसे बड़ी समपत्ति है और इसे बचा कर रखना हमारी जिम्मेदारी है। 


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने षष्ठम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

महाराज श्री ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

7Jun 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 03 जून से 10 जून तक प्रतिदिन राजकीय आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय का खेल मैदान, खाटूश्याम जी में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 108 श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

भागवत कथा के पांचवे दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि धर्म का प्रचार करना सिर्फ साधु संतो, महात्माओं, कथा वाचकों, ब्राह्मणों का काम नहीं है, ये हम सब की जिम्मेदारी है। भगवान ने भी आज्ञा दी है की अपने धर्म की रक्षा किसी भी कीमत पर किजिए। हम से पूर्व के लोगों ने अपना बलिदान देकर भी धर्म की रक्षा की है। आप लोग अपने धर्म को आगे बढ़ाने का अपनी तरफ से भी प्रयास किजिए। सबसे पहला काम यह किजिए की अपनी आने वाली पीढ़ी को इतना धर्मात्मा बना दिजिए की आपके जाने के बाद भी आपके मंदिर में आरती और पूजा होती रहे। दूसरा काम यह किजिए की ठाकुर की कथाओं को लोगों तक पहुंचाइए, ये आपकी तरफ से धर्म की सेवा होगी।

महाराज जी ने कहा कि आप और हम उस पुनित पावन देश के लोग हैं जिस देश में ना सिर्फ अपना अपितु ओरों का भी ख्याल रखा जाता है। आजकल हमारे देश के लोग एक चीज को बहुत अच्छे से जानते है उसका नाम है मैनेजमेंट। पाश्चात्य कल्चर में बिजनेस मैनेजमेंट में सेलफिस व्यक्ति का निर्माण करते हैं, वह सिखाते हैं कि झूठ बोलकर पैसा कैसे कमाया जाएं। आप गीता को पढिए, कई विशेषज्ञों का मानना है कि गीता में दिया गया ज्ञान आधुनिक मैनेजमेंट के लिए भी एकदम सटीक है और उससे काफी कुछ सीखा जा सकता है। गीता में ज्ञान दिया गया है कि तुम क्या कर सकते हो, तुम्हारे किए हुए कर्म तुम्हे और दुसरों को सुख पहुंचा सकते हैं। गीता जैसा मैनेजमेंट तुम्हे पूरे विश्व में कही नहीं मिलेगा। महाराज जी ने आगे कहा कि कान्वेंट स्कूलों में बाइबिल पढ़ाई जाती है लेकिन भारतीय स्कूलों में रामायण गीता नहीं पढ़ाई जा सकती क्योंकि अगर रामायण पढ़ाई गई तो भगवाकरण विद्या का हो जाएगा ऐसा कुछ लोग मानते हैं। मैं एक बात कहता हूं कि गीता पढ़ने से भगवाकरण नहीं होगा बल्कि मानवता का एक उद्धार होगा।

महाराज जी ने कहा कि हमारे हाथ कि शोभा कंगन से नहीं है हमारे हाथ की शोभा दान से है, हमारे कान की शोभा कुण्डल से नहीं है, हमारे कान की शोभा भगवान की कथा सुनने से है। हाथ तब सुंदर लगते हैं जब दान दिए जाते हैं, कान तब सुंदर लगते हैं जब भगवान की कथा सुनी जाती है। दयावानों का शरीर परोपकार के लिए होता है, हमारे शरीर की इत्र से नहीं बल्कि परोपकार से बढ़ेगी।

महाराज जी ने कहा कि भगवान तुम्हे कुछ भी दे दे उसका अहंकार मत करो, बल्कि उसमें सरलता बनी रहनी चाहिए। अगर तुम सरल बने हुए हो तो उसका मतलब है कि भगवान के प्रसाद को सही मायने में आपने स्वीकार किया है।

देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा पांचवे दिन के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।

महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।

शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।

बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।

इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।

इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।

महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।

महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।

उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।

महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"

जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।

दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।

महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"

भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।

।। राधे-राधे बोलना पडेगा ।।

6Jun 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 03 जून से 10 जून तक प्रतिदिन राजकीय आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय का खेल मैदान, हॉस्पिटल चौराहा के पास, खाटूश्याम जी में 108 श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के चतुर्थ दिवस पर भी हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत सांस्कृतिक आतंकवाद पर चर्चा से की। उन्होंनवे कहा कि किसी भी देश के निर्माण के लिए वहां की कुछ चीजें महत्वपूर्ण होती हैं, यदि हम देश को शरीर समझे तो संस्कृति उसकी आत्मा होती है। जैसा की आप जानते हैं बिना आत्मा के शरीर किसी काम का नहीं है, ठीक वैसे ही बिना संस्कृति के देश किसी काम का नहीं है। किसी भी संस्कृति के आदर्श होते हैं, मूल्य होते हैं, इन मूल्यों की संवाहक संस्कृति होती है। भारतीय संस्कृति में चार मूल्य प्रमुख हैं— धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इनही पर चलकर जीव अपने चरित्र का निर्माण करता है। ये संस्कृति नहीं है जीता जागता एक सनातन धर्म है जो हमें नेक इंसान बनाता है। लेकिन आधुनिकता की जो आंधी चल रही है उसमें हमारी संस्कृत, संस्कृति, कलचर उड़ता चला जा रहा है। आज हम एक ऐसी अंधी दौड़ में लग गए हैं जिसका हमें अंत नहीं पता, बस भागे जा रहे हैं। आप प्रत्यक्ष रूप से देख सकते हैं सामाजिक बदलाव, चाहे वो बोलने का स्टाइल हो, चलने का स्टाइल हो, पश्चिमी सभ्यता हमारे ऊपर जोर शोर से हावी है। आज का युवा अगर धर्म की बात करता भी है तो बाकि के उसके मित्र हीन दृष्टि से उसे देखते हैं। अपनी भारतीय संस्कृति का विनाश हम लोग अपनी आंखो से होता हुआ देख रहे हैं। 


महाराज श्री ने कहा कि कौन व्यक्ति कितना जीएगा यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण बात यह है कि तुम जीए कैसे हो, किस प्रकार से तुमने अपना जीवन जीय है। किसी के लिए अच्छा करो या ना करो लेकिन अपनी आत्मा के लिए तो अच्छा करो। 


महाराज श्री ने कहा कि बचपन में किया हुआ भजन बहुत महत्वपूर्ण होता है, पूरा जीवन संवार देता है। जितने भी लोग यहां बैठे हैं और जो कहते हैं कि अभी भजन करने का समय नहीं है वो तुम्हारे हितैषी नहीं है वो तुम्हारे शत्रु है। भजन करने की कोई उम्र नहीं होती, जिस दिन तुम्हे लग जाए की मैं प्रभु का हूं, प्रभु मेरे हैं उस दिन से ही भजन शुरू कर देना चाहिए।
महाराज श्री ने कहा कि इतिहास वही अच्छा लिख सकते हैं जिस अपनी प्रशंसा सुनने की इच्छ ना हो। वहीं सच्चा और अच्छा इतिहास लिख सकते हैं। हमारे वहां तो इतिहास बच्चों को पढ़ाया जाता है वो पूरा सच नही है उसमे मिलवाट है। कुछ लोग सिर्फ पैसों के लिए कुछ भी लिख देते हैं, आप पैसा दो वो कुछ भी लिख देंगे। लिखने वाला वहीं अच्छा लिख सकता है जिसे धन का लालच ना हो। हमारे जिन ऋषि मुनियों ने जो इतिहास लिखा है शास्त्र लिखे हैं, पुराण लिखे हैं, उनको ना अपनी प्रशंसा सुनने की इच्छा थी और ना ही पैसों का लालच। 
महाराज श्री ने कहा कि अच्छा मानव वही है, जो बड़े बुजुर्गों ने कह दिया उसे स्वीकार कर ले, वहां किंतु परंतु नहीं होनी चाहिए। महाराज जी ने कहा कि स्त्री की पहचान तीन जगह से होती है बालयावस्था में किसी बेटी है, युवा अवस्था में किसकी पत्नी है, वृद्धावस्था में किसकी मां है। 


देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।

तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

5Jun 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 03 जून से 10 जून तक प्रतिदिन राजकीय आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय का खेल मैदान, हॉस्पिटल चौराहा के पास, खाटूश्याम जी में 108 श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।


कथा से पूर्व बजरंग दल खाटूश्याम के सदस्यों द्वारा महाराज श्री को पगड़ी पहानकर एवं स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। 


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि संस्कृत, संस्कृति और संस्कार इस देश की वो धरोहर है जिसकी वजह से हमारे देश का मान सम्मान सिर्फ भूमंडल पर ही नहीं अपितु इस की वजह से भारत जैसे पुनित देश का डंका स्वर्ग में भी बजता है। मेकाले जब भारत आया तो उसने अपने सदन में एक बात कही थी कि मैने भारत के हर एक कोने को जा जाकर देखा है और इस भारत को हम गुलाम बनाने के लायक नहीं है। यह इतना संपन्न देश है कि मुझे इस देश में एक भी भिखारी नजर नहीं आया। इस देश की सबसे बड़ी सपत्ति इसके संस्कार है, यहां एक से एक आदर्श व्यक्तित्व रहता है। मेकाले उस देश की बात कर रहा है जहां आज एक भी लड़की सुरक्षित नहीं है। मेकाले कहता था यह देश तब तक गुलाम नहीं बन सकता जब तक हम इसकी संस्कृति, संस्कृत और संस्कार को खत्म नहीं कर देते। आजकल अगर कहीं हम अगर दो अंग्रेजी बोलने वालों के बीच में हिंदी बोलने लग जाएं तो लोग समझते हैं हम अनपढ़ आदमी हैं। अपने देश में जैसी दुर्दशा भारतीयों की है वो शायद ही किसी देश में हो। इस देश में हिंदी बोलने वालों को हीन भावना से देखा जाता है। संस्कृति को बचाने की जो बाते करे हम उसे संस्कृति बचाने वाला ऐजेंट समझने लगते हैं। दुनिया मे कई देश ऐसे हैं जो इंग्लिश तो जानते हैं लेकिन बोलना नहीं चाहते वो अपने राष्ट्रीय भाषा बोलते हैं। चीन वाले चीनी भाषा बोलते हैं, जापान में जापानी बोलते हैं लेकिन भारत में हिंदी बोलने वाले को अनपढ़ समझते हैं। विश्व का एक पावरपुल देश ही चीन क्योंकि उसने अपनी संस्कृति को नहीं छोड़ा। भारत आज भी दूसरों के आगे गिडगिडाता हैं क्योंकि हमने अपनी संस्कृति का अपमान अपने हाथों से किया है। मेकाले की यह रणनिती थी की इनको मेंटेली ऐसा तैयार कर दो कि यह शरीर से तो आजाद हो जाएं लेकिन दिमागी तौर पर कभी आजाद ना हो पाएं उसके लिए उसने कॉन्वेंट की व्यवस्था की क्योंकि उसको पता था की यह संस्कार गुरूकुलम से आते हैं वहां ऋषि मुनी, योगी उनको ज्ञान देते हैं। महाराज जी ने कहा कि आज आप अपने दिल से पूछिए की क्या आप अपने बच्चों के चरित्र पर ध्यान देते हैं, बस ही चीज पर ध्यान देते हैं मार्क्स कितने आए, दूसरा यह बनेगा क्या, कभी भी इस बात पर ध्यान नहीं रहता है कि इसका चरित्र कैसा है ? जिस चरित्र को पाश्चात्य कल्चर ने कुछ नहीं समझा वहीं चरित्र हमारी संपत्ति है।


महाराज जी ने कहा कि जब गुरूकुलम की पद्दति थी तब 90 प्रतिशत लोग साक्षर थे और जब से कॉवेंट आएं है तो देख लो कितने प्रतिशत लोग साक्षर हैं। उस समय ऋषि मुनी पढ़ाया करते थे और साक्षर बनाया करते थे। उस समय हमारे यहां सोने चांदी की सिक्के चला करते थे, भारत को सोने की चिडिया कहा जाता था। हर कोई यह चाहता है कि हमारे देश में बहन बेटियां सुरक्षित हो लेकिन कोई यह जानना नहीं चाहता की क्यों सुरक्षित नहीं है। वो इसलिए सुरक्षित नहीं है क्योंकि आपके बच्चे चरित्रवान नहीं है। हमारे बेटे चरित्रवान हो जाएंगे तो हमारी बेटियां सुरक्षित हो जाएंगी। आपकी बेटियां सुरक्षित हो उसके लिए आपके बेटे का चरित्रवान होना जरूरी है।


महाराज जी ने आगे कहा कि श्रीमद्भागवत कथा वेद रूपी वृक्ष का पका हुआ फल है। विश्व में जितने भी फल में उसमें कुछ ना कुछ त्यागने योग्य वस्तुए हैं लेकिन इस फल में कुछ भी त्यागने योग्य नहीं है। भागवत हमें सब कुछ देती है, जिसे भक्ति चाहिए भक्ति लो, जिसे ज्ञान चाहिए ज्ञान लो, जिसे वैराग्य चाहिए वैराग्य लो और जिसे कुछ नहीं चाहिए उसे मोक्ष तो सहज में प्राप्त करा देती है भागवत। 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।


श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।


यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

4Jun 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 03 जून से 10 जून तक प्रतिदिन राजकीय आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय का खेल मैदान, हॉस्पिटल चौराहा के पास, खाटूश्याम जी में 108 श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत में कल्चर टेरेरिजम पर बात की उन्होंने कहा कि हमारी जो संस्कृत भाषा है यह संस्कृति को बनाती है, संस्कृत कोई साधारण भाषा नहीं है। संसार में जितनी भी भाषाएं है वो किसी ना किसी के द्वारा बनाई गई है लेकिन संस्कृत भाषा देव भाषा है। संस्कृत भाषा जोड़ना सिखाती है, संस्कृत भाषा पढ़ने वाले बच्चे तीव्र बुद्धि के होते हैं, उनमे हर एक भाषा समझने की शक्ति होती है। यह दुर्भाग्य का विषय ही है कि आज संस्कृत की बात करने वालों की बाते अनसुनी की जाती हैं और सिर्फ अंग्रेजी पढ़े लिखे बच्चों को भी बुद्धिमान समझा जाता है। लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा की बाहरी देशों में संस्कृत भाषा की विशेषता को समझते हुए उन्होंने पाठय क्रम में बच्चों को संस्कृत अनिवार्य कर दिया। एक ओर बात सुनकर आपको आश्चर्य होगा की 7वीं जेनरेशन का जो महाकंप्यूटर बन रहा है उसका बेस ही संस्कृत में रखा जा रहा है। दुर्भाग्य यह है कि हम अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं, आजकल तो संस्कृत को मरी हुई भाषा कहा जाता है। लेकिन याद रखिए संस्कृत कभी मर नहीं सकती जब तक यह धरती रहेगी संस्कृत रहेगी। संस्कृत पढ़ने वाले बच्चे संस्कारी होते हैं, घर परिवार को जोड़ने वाले होते हैं। 


महाराज जी ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा वो है जिस भागवत को लिखने के बाद वेद व्यास जी महाराज को कुछ और लिखने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी इसलिए भागवत को कहा गया है सर्व वेदांत सारिणी यानि यह सभी वेदों का सार है। 


महाराज जी ने कहा कि भगवान ज्ञान सिद्ध नहीं है, भगवान वैराग्य से मिलेंगे गारंटी नहीं है, ज्ञान से मिलेंगे गारंटी नहीं है, लेकिन प्रेम से मिलेग इस बात की पूरी गारंटी है। 
महाराज जी ने आगे कहा कि जो देवताओं के लिए दुर्लभ है वो आप लोगों के लिए सुलभ है। आप लोग जो भी सतकर्म करते हैं उससे सुख की प्राप्ति तो हो सकती है लेकिन भागवत की प्राप्ति नहीं हो सकती। 100 अश्वमेघ यज्ञ करने से इंद्र तो बन जाओगे, स्वर्ग की प्राप्ति कर लोगे लेकिन भागवत मिल जाएगी यह संभव नहीं है। 


महाराज जी ने कहा कि जैसे ही मनुष्य भागवत सुनने का संकल्प लेता है उसी वक्त प्रभु उसके ह्रदय में विराजमान हो जाते हैं, ऐसी है भागवत की महिमा। अमृत अमर कर सकता है लेकिन निर्भय नहीं कर सकता, जो अमृत नहीं कर सकता वो भागवत आपको एक बार ही कथा सुनने से कर देती है। लेकिन यह उसके लिए ही संभव है जो सच्चे मन से कथा सुने। 


देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो ? राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। 
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।


श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।


यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

3Jun 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 03 जून से 10 जून 2018 तक राजकीय आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय का खेल मैदान, हॉस्पिटल चौराहा के पास, खाटूश्याम जी में आयोजित 108 श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया

कथा के पहले दिन सर्वप्रथम सुबह श्री खाटू श्याम जी मंदिर से कथा स्थल तक कलश यात्रा निकाली जिसमें सैकड़ों माताओं बहनों ने कलश उठाया।


कथा से पूर्व महाराज श्री ने सभी 108 यजमान ब्राह्मणों के साथ पूजा अर्चना की जिसके बाद दोपहर 12:30 बजे महाराज जी के साथ श्री पवन जी, पुजारी अध्यक्ष, श्री श्याम सुंदर शर्मा जी, प्रधानाचार्य, श्री पप्पू शर्मा जी ने दीप प्रज्जवलित कर 108 श्रीमद्भागवत कथा की शुरूआत की। यजमानों द्वारा महाराज श्री को पगड़ी पहनाकर सम्मानित किया गया।
भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि हमेशा मीठी बाते सुनिए अगर कटु वाणी सुनोगे तो तुम्हारा ह्रदय जहरीला हो जाएगा और मधुर वाणी सुनोगे तो आपका ह्रदय रस युक्त, स्वस्थ, निर्मल पवित्र हो जाएगा।


महाराज जी ने कहा कि आजकल मां बाप की जिम्मेदारी कम होती जा रही है क्योंकि वो सोचते हैं कि अध्यापक सबकुछ सीखा देंगे। उन्होंने कहा कि बच्चे आपके हैं टीचर के नहीं , अपने बच्चों को सही राह पर ले जाने के लिए मां बाप का कर्तव्य है उन्हे अच्छी बात समझाएं। 


महाराज जी ने कहा कि श्रद्धावान किसे कहते हैं ? अगर आप यहां आए हो तो आपको विश्वास होना चाहिए की जिस भाव से यहां आए हैं वो भाव यहां पूरा होगा ही कोई टाल नहीं सकता। महाराज जी ने श्रद्धा किसे कहते हैं इसका उदहारण देते हुए कहा कि महाराष्ट्र में एक जगह सूखा पड़ा, तो सब गांव के लोगों ने सोचा की अब करें क्या ? पहले सोचा की गांव छोड़े लेकिन इतनी खेती बाड़ी थी उसका क्या करते, दूसरे किसी बुजुर्ग ने कहा इस दुनिया में सब कुछ मिलता है अगर हम भगवान से दिल से मांगे तो, चलो हम सब गांव के लोग चलते हैं और मंदिर में बैठ कर भगवान से प्रार्थना करते हैं। गांव के लोग मंदिर में जाकर एकत्रित हो गए और भगवान से प्रार्थना करने लगे, सभी लोग प्रार्थना कर ही रहे थे की तभी एक दृश्य देखा की एक बच्चा छतरी ताने हुए आ रहा है। उसके देख कर कुछ लोगों ने कहा कि पागल हो गया है क्या इतनी धूप में छतरी लेकर आया है। तो उस बच्चे ने कहा जब संत हमारे वहां आते हैं तो कहते हैं भगवान के वहां जो दिल से मांगा जाए तो भगवान देता है और तो और जब हम साधारण व्यक्ति हमारे सामने खड़ा हो जाए और उसका भी अच्छा स्वभाव हो तो वो भी हमें खाली नहीं लौटाता कुछ ना कुछ देता है, अगर हम भगवान के वहां आए हैं तो इसी इच्छा से आए हैं कि भगवान हम पर कृपा करो कि हमारे वहां बारिश हो जाए, जब हम यह इच्छा लेकर आएं तो क्या भगवान बारिश नहीं करेंगे । जब भगवान बारिश करेंगे तो कहीं मैं बारिश में भीग ना जाऊं इसलिए मैं छतरी लेकर आया हूं। आप विश्वास नहीं करेगे की उस बच्चे की यह बात पूरी हुई ही थी की बारिश शुरू हो गई। भले ही पूरे गांव की प्रार्थना नामंजूर हो गई हो लेकिन उस बच्चे के विश्वास ने भगवान को बारिश करने पर मजबूर कर दिया। 


महाराज जी ने कहा कि आपको ऐसे देश के बारे में बताना चाहता हूँ जिसे जानकर आपको पहले क्षण बहुत खुशी होगी दूसरे क्षण बहुत दुख होगा। विश्व में एक ऐसा देश है जिसका धर्म तो इस्लाम है और संस्कृति है रामायण और यह देश है इंडोनेशिया। मुस्लिम बहुल इंडोनेशिया में लोग न केवल बेहतर इंसान बनने के लिए रामायण पढ़ते हैं बल्कि इसके पात्र वहां की स्कूली शिक्षा का भी अभिन्न हिस्सा हैं। इंडोनेशिया के किसी गांव में एक मुस्लिम शिक्षक को रामायण पढ़ते देखकर पूछा गया कि आप रामायण क्यों पढ़़ते हैं? उत्तर मिला, ‘मैं और अच्छा मनुष्य बनने के लिए रामायण पढ़ता हूँ। दरअसल रामकथा इंडोनेशिया की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा है। बहुत से लोग हैं जिन्हें यह देखकर हैरानी होती है, लेकिन सच यही है कि दुनिया में सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाला यह देश रामायण के साथ जुड़ी अपनी इस सांस्कृतिक पहचान के साथ बहुत ही सहज है। इतना ही नहीं इंडोनेशिया के स्कूलों में प्रत्येक सप्ताह बच्चो के माता पिता को स्कूल बुलाया जाता है और बच्चों को अपने माता पिता के पैर धोने के लिए कहा जाता है। ताकि बच्चों में आने माता पिता के प्रति सम्म