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SHRIMAD BHAGWAT KATHA - BHADOHI- UP

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24Oct 2017

"गुरु वही है जो गोविंद से मिलने का मार्ग बताए।"

परम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद भागवत कथा के द्वितीय दिवस में भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने बताया कि हर व्यक्ति को अपने जीवन में भगवान की भक्ति जरूर करनी चाहिए क्योँकि भक्ति से ही मनुष्य का जीवन सदा के लिए सुधर सकता है। उसके सभी पाप धुल जाते है। हम लोग ही बहुत ही भाग्यवान है क्योंकि हमे सब तरह के अंगों से भगवान ने संपन्न किया हुआ है। भगवान ने हमको हाथ, पैर, आँख, नाक, दिमाग सभी कुछ दिया हुआ है। मेरे ठाकुर जी ने हमको इतनी सूंदर सी जिंदगी दी है। तो हमको उनके इस वरदान को कभी भी नहीं भूलना चाहिए। इस मानव योनि को प्राप्त करने के बाद भी अगर मानव मेरे प्रभु को याद न करे तो हमसे बड़ा आत्मघाती या पापी इस दुनिया में और कोई नहीं है। महाराज श्री ने कहा कि भगवान ने हर व्यक्ति को अपनी एक अलग ही समझ दी है। उसी के अनुसार ही हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार ही हर कार्य को करता है। कई अपनी समझ से अपने हर कार्य को भगवान की मर्जी समझकर ही करते है और सदा ही स्वच्छ मन से कार्य को करते है ताकि उनसे कोई भी गलती न हो और कुछ लोग अपने गंदे विचारो से ही कार्य को करते है और उन्ही में सदैव लिप्त रहते है। वो अच्छे और बुरे का फर्क नहीं समझते है। हमको तो सदा ही अच्छे और बुरे का फर्क लेकर ही भगवान की भक्ति को करते रहना चाहिए। क्योँकि उसी के अनुसार ही हम अपने सभी कार्यों को कर सकते है। हमको तो सदैव ही अच्छे कार्य ही करने चाहिए और बुरे कार्यों से सदा के लिए ही दूर रहना चाहिए। तभी हमारा इस संसार में सही रूप से गुजारा हो सकता है। भगवान भी उन्ही का साथ देते है जो सदा कर्मों में लिप्त रहते है। जो लोग सदा ही बुरे कार्य करते है उनसे तो भगवान सदा ही दूरी बनाये रखते है। महाराज श्री ने कहा कि देवता भी आपके भाग्य को देखकर जलते होंगे। वो सोचते होंगे कि जो भाग्य मानव ने पाया है वो भाग्य हमने क्यों नहीं पाया। कार्तिक मास में हमको श्रीमद भागवत कथा क्योँ नहीं सुनने को मिलती है। इसी मानव को ही क्योँ सुनने को मिलती है वो भी कार्तिक मास के इस पवित्र महीने में ही। इसलिए ही हे मानव हम सभी देवता आपको बारम्बार नमन करते है। क्योँकि यह भागवत कथा ही इस मानव को मोक्ष रुपी वरदान करती है। महाराज श्री ने आगे कहा की पहले हम सब को भगवान की भक्ति करने पर ही जोर दिया है। महाराज श्री ने हमको बताया कि प्रभु भक्ति से ही हम सब के पाप आसानी से धुल जाते है। क्योँकि आज के इस कलयुग में सभी अपने अपने काम करने में ही लगा रहता है। उसको भगवान की भक्ति करने का भी समय नहीं रहता है। लेकिन अपने जीवन को सही ढंग से जीने के लिए और अपने जीवन की सभी समस्याओं को दूर करने के लिए हमको भगवान की पूजा करनी चाहिए। भगवान की पूजा करने के लिए सबसे पहले तो हमारा मन स्वच्छ और साफ़ होना चाहिए। क्योँकि साफ़ और सवच्छ मन में ही भगवान का वास होता है। जब हमारा मन साफ होगा तो तभी हमारे मन में दूसरों के लिए अच्छे विचार आएंगे। जब हम दूसरों से प्यार करेंगे तो स्वयं भगवान भी हमसब से प्रेम करेंगे। और हमारे जीवन में आने वाली सभी समस्याओं को दूर कर देंगे। प्रभु भक्ति से ही हम सब का हर तरह से कल्याण हो सकता है। इसलिए तो हम सबको कभी न कभी भागवत कथा का श्रावण करना चाहिए। भागवत कथा हमको इंसान बनाती है। भगवात कथा ही हम सब को सही मायने में जीना सिखाती है। यहाँ पर महाराज श्री ने बताया कि यदि हम सात दिन की भागवत कथा को सुनेंगे तो अवश्य ही हमको इन सात दिनों में बहुत कुछ ऐसा सिखने को मिलेगा जो हम सब के लिए लाभकारी होगा और जिसके बारे में कभी भी हमने सुना ही नहीं होगा। महाराज श्री ने कहा कि भगवान त्रिलोकीनाथ जी की कृपा से ही हम सब को यह मानव जीवन प्राप्त होता है। उन्ही की कृपा से ही हम सब इस भागवत कथा को सुनते है। कहते है कि अगर मानव जीवन प्राप्त करने के बाद यदि हमने भगवान की भक्ति नहीं की ,अगर जीव ने दानपुण्य नहीं किया,अगर जीव सुरमा नहीं है ,अगर जीव भक्त है है ,अगर जीव तपस्वी नहीं है ,ऐसे व्यक्ति को मानव कहना बिलकुल ही गलत है। ऐसा मनुष्य तो केवल माँ का मलमूत्र ही है। इसके आलावा और कुछ भी नहीं होता है। उसे तो केवल माँ का मलमूत्र ही कहना उचित होता है। उसे तो मानवों की शृंखला में रखना ही गलत होता है। जिसने मानव जीवन पा कर तपस्या नहीं की ,दानपुण्य नहीं किया ,सुरमा नहीं हुआ ,भगवान का भक्त नहीं हुआ, ऐसे मानव जीवन को पाकर तो सिर्फ लाभ ही क्या हुआ। ना जाने आपके कितने जन्मों के पुण्य के फल के दवारा ही आपको इस श्रीमद भागवत कथा को सुनने का सौभाग्य आपको प्राप्त हुआ है महाराज श्री ने कहा की मैं जब भी विदेश जाता हूँ तो वहा भक्त ३००-४०० किलोमीटर से कथा सुनाने आते हैं और उसके बाद प्रत्येक दिन अपने काम पर भी जाते हैं। इसी को तो टाइम मैनेजमेंट कहते हैं। हमे किसी की शादी में जाना हो तो हम अपने काम से, अपने ऑफिस से छुट्टियां ले लेते हैं लेकिन क्या कभी आपने भागवत कथा सुनाने के लिए छुट्टी ली है क्या? हमे अपने ठाकुर जी से मिलने के लिए भी छुट्टी लेनी चाहिए। इसके बाद महाराज श्री ने कहा की आपके जीवन की सबसे ज्यादा चिंता आपके माता-पिता को होती है क्योंकि उन्हें यही चिंता सताती रहती है की मेरा बच्चा भविष्य में क्या करेगा। आपके माता पिता को आपके इस जीवन की इतनी चिंता है तो जो सबका परमपिता परमेश्वर है उसको कितनी चिंता होगी आपके जीवन की। इतना ही नहीं ठाकुर जी को आपके इसी जीवन की नहीं अपितु आपके अनंत जीवन की चिंता होती है तभी तो उसने आपको इससे मुक्त करने के लिए आपको मानव जीवन दिया है। लेकिन हम उसकी भक्ति न करके फिरसे इस जीवन को व्यर्थ कर देते हैं। गुरु का दायित्व क्या है? गुरु के गुण क्या है? अभी तक आप शिष्य के गुण जानते थे आज गुरु के गुण भी जानिये। गुरु के 3 दायित्व है। गुरु वही है जो तीन काम करा सके गुरु वही जो गोविन्द मिलावे। गुरु वही जो संत सिवावे गुरु वही जो विपिन बसावे ये तीन काम जो करा दे वही सच्चा गुरु है। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

23Oct 2017

"मनुष्य को अपने संस्कार कभी नहीं भूलने चाहिए क्योंकि उन्ही से उनका सही विकास होता है"

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 22-28 अक्टूबर 2017 तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद भागवत कथा के प्रथम दिवस में भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने आज की कथा प्रारम्भ करते हुए कहा कि मेरे बाबुजी आज भी जीवित है वे हमारे संस्कारों में, हमारे आचरण में सदैव जीवित रहेंगे। महाराज श्री ने कहा कि मोदी सरकार का नारा दिया है "बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ" इसमें एक और जोड़ देना चाहिए बेटी पढ़ाओ- बेटी बचाओ-संस्कार लाओ। और संस्कार बेटियों के लिए नहीं बल्कि बेटो के लिए पहले लाओ ताकि जब भी बेटी रोड़ पर निकले तो बेटे को यह याद रहे कि वो किसी की बेटी या बहन होगी। जब हम बेटों को संस्कार दे देंगे तो बेटियों को बचाने की जरूरत नही पड़ेगी। महाराज श्री ने कहा कि हमें अपने संस्कार बचाने के लिए बच्चों के साथ बैठकर रामायण देखनी चाहिए, रामायण पढ़नी चाहिए, तभी हमारे संस्कार बच पाएंगे। पूर्व काल में एक नगर में एक ब्राह्मण रहता था। उसका नाम आत्मदेव था। वह बहुत ज्ञानी और तेजस्वी था। उसकी पत्नी धुन्धुली कुलीन होने पर भी अपनी बात पर अड़नेवाली थी। वह क्रूर, झगडालू और कंजूस थी। बहुत समय बीत जाने के बाद भी उन दोनों के यहाँ संतान नही हुई। उन्होंने बहुत तरह से दान धर्म निभाया पर कुछ नही हुआ। एक दिन आत्मदेव दुखी होकर घर छोड़ कर वन को चला गया। वह एक तालाब के पास पंहुचा। पानी पी कर बैठा तो उसने एक सन्यासी महात्मा को वहाँ आते देखा। आत्मदेव ने सन्यासी के चरणों में प्रणाम किया और लम्बी लम्बी साँसे लेने लगा। सन्यासी ने उसके दुःख का कारण पूछा तो वह बोला कि अब देवता और ब्राह्मण भी उसका दिया प्रसन्न मन से स्वीकार नही करते। उसके संतान न होने से वह बहुत दुखी है और आत्महत्या करने आया है। उसके संतानहीन जीवन, घर और धन को धिक्कार है। जब आत्मदेव सन्यासी के सामने ये सब कहकर रोने लगा तब महात्मा को बहुत दया आई। उन्होंने आत्मदेव से कहा कि मैनें तुम्हारे माथे कीलकीरों में पढ़ा है कि सात जन्मों तक तुम्हारे कोई संतान नही हो सकती इसलिए तुम संसार की वासना छोड़ कर संन्यास ले लो। परन्तु ब्राह्मण ने कहा कि जिसमें पुत्र और स्त्री का सुख नही है वह संन्यास भी नीरस है। महात्मा ने समझाते हुए कहा कि विधाता का लेख मिटाने पर भी तुम्हे संतान से सुख नही मिलेगा। जब वह ब्राह्मण किसी प्रकार नही माना, तब सन्यासी ने उसे एक फल दिया और कहा कि ये अपनी पत्नी को खिला देना। इससे एक पुत्र होगा। अगर तुम्हारी पत्नी एक साल तक सत्य, शौच, दया, दान और एक समय एक ही अन्न खाने का नियम रखेगी तो बालक बहुत शुद्ध स्वभाव वाला होगा। ब्राह्मण ने वह फल अपनी पत्नी को दिया और कहीं चला गया। उसकी पत्नी कुटिल स्वभाव कि थी। उसने अपनी सखी से कहा कि मैं यह फल खाऊँगी तो मुझे बहुत कष्ट सहने पड़ेंगे। प्रसव कि पीड़ा, नियमों का पालन आदि सब करना होगा। इसलिए मैं ये फल नही खाऊँगी। उसके पति ने जब घर आकर पूछा कि फल खा लिया तो उसने कहा हाँ खा लिया। धुन्धुली ने अपनी बहन को सब बात बतायी तो वह बोली कि मेरे पास एक उपाए है। उसकी बहन ने कहा कि मेरे पेट में जो बच्चा है वो मैं तुझे दे दूँगी। तक तक तू गर्भवती के समान घर में गुप्त रूप से रह। तू मेरे पति को कुछ धन दे देगी तो वो तुझे अपना बालक दे देंगे। हम ऐसी युक्ति करेंगे जिससे सब यही कहें कि मेरा बालक छेह महीने का होकर मर गया। फिर मैं तेरे घर आकर उस बालक का पालन पोषण करती रहूंगी। और यह फल तू गौ को खिला दे। ब्राह्मणी ने सब कुछ अपनी बहन के कहे अनुसार किया। जब उसकी बहन को पुत्र हुआ तो उसकेपति ने चुपचाप उसे धुन्धुली को दे दिया। आत्मदेव बालक के होने ही ख़बर सुनकर बहुत आनंदित हुआ। उसकी स्त्री ने कहा कि बालक के पालन पोषण के लिए मैं अपनी बहन को यहाँ बुला लेती हूँ। आत्मदेव ने कहा ठीक है। उस बच्चे का नाम धुंधकारी रख दिया। तीन महीने बाद उस गौ ने भी एक मनुष्य के आकार के बच्चे को जन्म दिया। लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ और आत्मदेव के भाग्य कीसराहना करने लगे। आत्मदेव ने बालक के गौ के से कान देखकर उसका नाम गोकर्ण रख दिया। जब वे दोनों बालक जवान हुए तो गोकर्ण बहुत बड़ा पंडित और ज्ञानी हुआ किंतु धुंधकारी बहुत दुष्ट निकला। चोरी करना, सबसे द्वेष बढाना, दूसरे के बालकों को कुएं में डालना और सबको तंग करना यही उसका स्वभाव था। उसने वेश्याओं के जाल में फँस कर अपने पिता की सारी संपत्ति नष्ट कर दी। जब सब कुछ ख़तम हो गया तो आत्मदेव बहुत दुखी हुआ और कहने लगा कि इससे तो मेरी पत्नी बाँझ ही रहती। अब मैं कहाँ जाऊं और क्या करूं। उसी समय गोकर्ण ने आकर अपने पिता को समझाया कि यह संसार असार है। यह अत्यन्त दुखरूप और मोह में डालने वाला है। सुख न तो इन्द्र को है और न ही चक्रवर्ती राजा को। सुख केवल एकांतजीवी विरक्त मुनि को है। "यह मेरा पुत्र है" इस अज्ञान-को छोड़ दीजिये। मोह से नरक कीप्राप्ति है। इसलिए सबकुछ छोड़ कर वन में चले जाइए। गोकर्ण की बात सुनकर आत्मदेव को बहुत अच्छा लगा। उसने अपने पुत्र से उसे और उपदेश देने को कहा। गोकर्ण ने कहा यहशरीर हड्डी, मांस और रुधिर का पिंड है। इसे मैं मानना छोड़ दीजिये। स्त्री पुत्र आदि को अपना कभी ना मानें। भगवान् का भजन सबसे बड़ा धर्म है। निरंतर उसी का आश्रय लिए रहे। आत्मदेव ने अपने पुत्र की बात सुनकर घर त्याग दिया और वन में रात दिन भगवान् की सेवा- पूजा करने लगा। नियमपूर्वक भागवत के दशम स्कंध का पाठ करने से उसने भगवान् श्री कृष्ण चंद्र को प्राप्त कर लिया। राधे राधे बोलना पड़ेगा !!

19Oct 2017

" भगवान की भक्ति से ही मनुष्य के सभी कष्ट दूर हो जाते है "

परम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सास्काटून, कनाडा में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के पंचम दिवस में श्रीमद भागवत कथा के महत्त्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कथा प्रारम्भ करते हुए कहा कि आज आप सभी को धनतेरस की हार्दिक शुभकामनायें। मैं भगवान से कामना करता हूँ कि आप सभी इसी तरह से सुखी और समृद्ध बने रहे और जो कुछ भी भगवान आपको दे उसके साथ आप सदा ही भगवान की भक्ति करते रहे। गरीब हो, अमीर हो, फकीर हो, मिडिल क्लास हो, लेकिन भक्ति आपके साथ जुडी रहे तो आप हो जाते है वर्ल्ड क्लास। आप वर्ल्ड क्लास बनेंगे तभी जब आपके साथ भक्ति जुडी होगी। भक्ति के बिना हमारा कोई भी काम नहीं बनेगा। इसलिए हर व्यक्ति को अपने - अपने प्रभु की भक्ति में सदा ही लगे रहना चाहिए। उनकी भक्ति करने से ही हमारे सभी पाप आसानी से मिट जाते है। इसके बाद महाराज श्री ने "मेरी भई श्याम संग प्रीत दुनिया क्या जाने" भजन भक्तों को श्रवण कराया। तब महाराज श्री ने कथा को शुरू करने से पहले भारत या विदेश में मौजूद अपने सभी भक्तों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये दी। महाराज श्री ने बताया कि आपने देखा होगा कि दीपावली वाले दिन श्री गणेश जी और माँ लक्ष्मी जी की पूजा होती है। दीपावली से जुडी हुई कुछ विशेष बातें महाराज श्री ने भक्तों को बताई। दीपावली वाले दिन आपने देखा होगा कि हमलोग अपने घरों को अच्छी तरह से साफ करते है और सजाते है। इस दिन लोग घरों पर घी के दीपक जलाते है। ऐसा हम लोग क्योँ करते है, इसके पीछे एक कथा आती है। आज के दिन ही माँ लक्ष्मी जी पृथ्वी पर भ्रमण करने के लिए आती है। और जिस व्यक्ति का घर माँ को साफ, सूंदर, पवित्र, अच्छा दीखता है तो वो वहीँ पर ही सदा के लिए रुक जाती है। जिस घर में सफाई, शुद्धता, पवित्रता, रोशनी नहीं होती है तो वहां से लक्ष्मी जी सदा के लिए चली जाती है। एक बात ये भी मानते है कि माँ लक्ष्मी जी का ही स्वरुप माता सीता जी थी, तो उनके अयोध्या आने की ख़ुशी में भी यह पर्व मनाया जाता है। लेकिन यहाँ पर प्रश्न ये उठता है की गणेश जी की पूजा माँ लक्ष्मी जी के साथ क्योँ होती है? यह जानना हम सभी के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। एक व्यक्ति था और वह काफी निर्धन था। वह व्यक्ति चाहता था कि मैं एक धनवान व्यक्ति बन जाऊं। मुझे भी राज सुख प्राप्त हो और मेरे भी दूसरों की तरह ही ठाठ बाट हो। तब उसने इसके लिए माँ लक्ष्मी जी की पूजा की। तब पूजा करने से माँ लक्ष्मी जी प्रश्न होकर बोली कि मैं तुम्हारी तपस्या से बहुत ही प्रसन्न हूँ। तुमको मुझसे जो वरदान मांगना है तुम मांग लो। तब उस व्यक्ति ने कहा कि माँ मैं राज सुख पाना चाहता हूँ। अभी मेरे पास कुछ भी नहीं है पर मैं चाहता हूँ कि मुझे भी राज सुख मिले। तब माँ लक्ष्मी जी ने तथास्तु कहा और राज सुख का वरदान उसको दे दिया। लक्ष्मी जी से वरदान पाने के बाद वह व्यक्ति एक राजा के दरबार में गया और वहां पर पहुँच कर उसने बिना कुछ भी कहे ही उस राजा के सिर पर रखा हुआ मुकुट गिरा दिया। इसको देखकर वहां पर मौजूद सभी प्रजा और खुद राजा भी काफी क्रोधित हो गया। उसी समय एक और दृश्य देखते है कि उस मुकुट में से एक सांप निकल कर जा रहा है। तो इसको देखकर तो सभी लोग काफी प्रसन्न हुए कि इसने तो हमारे महाराज जी के जीवन की इस सांप से रक्षा की है। इस सब को देखकर तो वह राजा भी उससे काफी खुश हुआ कि आपने तो इस सांप से मेरे जीवन की रक्षा की है। इसलिए हम तुमको कुछ देना चाहते है, क्या तुम हमारा मंत्री बनना चाहते है। तब राजा ने अपने राज्य का सबसे बड़ा मंत्री उसको बना दिया। तो इस तरह से वह व्यक्ति राज सुख को भोगने लगा। सारी सुख-सुविधाएं उसको मिलने लगी और बड़े ही मजे में वह जीवन बिताने लगा। कुछ दिन बाद इसी तरह ही महल के राज दरबार में भोजन प्रसाद का काम चल रहा था तो उसी व्यक्ति ने वहां पर आकर कहा कि तुरंत हमको इस महल को खाली करना है। तो वहां पर मौजूद सभी लोग डरके मारे वहां से भागने लगे। जैसे ही सभी ने घबराहट में उस महल को खाली किया तो उसी समय वह महल धड़ाम से पूरा गिर गया। तो इस तरह से ही सभी लोग उस व्यक्ति को और भी मानने लगे और उसकी जय जय कार करने लगे। उसकी काफी प्रशंसा करने लगे। इस सब को देखकर वो सभी लोग कहने लगे कि ये वयक्ति तो त्रिकाल दर्शी है। यह तो भविष्य को जाने वाला है। इस तरह से उस व्यक्ति का राजा के महल में और भी ज्यादा सम्मान होने लगा था। इस तरह से उस व्यक्ति का कुछ ज्यादा ही आदर होने लगा। वो जो कह देता वही होने लगा था। अब इस तरह से उस व्यक्ति को भी काफी अभिमान होने लगा कि इस राज्य में जो वो चाहेगा वही होगा। तो एक दिन उसने देखा कि राजा के महल के सामने गणेश जी की मूर्ति रखी थी। तो उस व्यक्ति ने कहा कि ये जो गणेश जी की मूर्ति है न ये इस महल की शोभा को नष्ट कर रही है। तो इस गणेश जी की मूर्ति को यहाँ से हटा दो और वहां से गणेश जी की मूर्ति को हटा दिया गया। जब मूर्ति वहां से हट गयी तो कुछ दिन बाद की बात है। राजा अपनी सभा में बैठे थे। तो राजा से कहा कि अपने तन का ये वस्त्र उतार दो इसमें सांप है। तो राजा ने पूरी सभा के सामने अपना वो वस्त्र उतार दिया। लेकिन अबकी बार तो उसमें सांप ही नहीं था। जब उसमें से सांप नहीं निकला और वो भी पूरी सभा के सामने तो इस बात को लेकर राजा को काफी गुस्सा आया और तुरंत ही उसके मंत्री पद को छीन लिया गया। उसको कारागार में डाल दिया गया। अब उस व्यक्ति को ये बात नहीं मालूम हो रहा है कि मुझसे गलती कहाँ पर हुई है? तो कारागार में बैठा - बैठा वो व्यक्ति माँ लक्ष्मी जी का पूजन करने लगा कि माँ मुझसे क्या गलती हुई है। तन माँ सपने में आकर उससे बोली कि तुमने जो गणेश जी की मूर्ति का अपमान किया है वही तुम्हारा सबसे बड़ा अपराध है। जीवनभर याद रखिये की यदि आपको लक्ष्मी की प्राप्ति हो जाये और आपमें गणेश जी की बुद्धि न हो तो तुम्हारा कभी भी भला नहीं हो सकता है। तुम्हारा विनाश होने ही वाला है। तुमको याद रखना चाहिए कि गणेश जी बुद्धि के देवता है। अगर मेरे पास दौलत हो और मुझे उस दौलत का सदुपयोग करना न आये तो मैं स्वर्ग की जगह ही नर्क में ही जाने वाला हूँ। उसी धन को आप लोग बर्बादी के लिए लगाते है और उसी धन को हम लोग आबादी के लिए लगाते है। सभी विघ्नो को दूर करने वाले श्री गणेश जी ही हमको बुद्धि देते है। यहाँ पर महाराज श्री ने हमें बहुत ही जरुरु बात बताई कि धनवान होना बहुत बड़ी बात नहीं है लेकिन उस धनवान के साथ ही बुद्धिमान होना बहुत ही बड़ी बात है। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

20Oct 2017

" हमको भी भगवान श्री कृष्ण से निस्वार्थ भाव से प्रेम करना चाहिए "

परम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सास्काटून, कनाडा में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के षष्टम दिवस में श्री कृष्ण की लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। पूज्य श्री महाराज जी ने कथा प्रारम्भ करते हुए कहा कि - गोपियों और श्री कृष्ण में वात्सल्य भाव ही था क्योंकि जिस समय श्री कृष्ण गोपियों के वस्त्र लेकर भाग जाया करते थे तब वे सिर्फ पांच वर्ष के थे। माँ अगर पांच वर्ष के बच्चे की सामने अगर निर्वस्त्र भी होती है तो वो वात्सल्य भाव ही है लेकिन इस पापी दुनिया में इस भाव को समझना तब तक मुश्किल है जब तक हम पूर्ण रूप से भगवान श्री कृष्ण को समर्पित ना हो जाए। भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के, गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता है। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाइ जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवन ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श ४. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपा ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। महाराज श्री ने आगे कहा कि यह महारास 6 महीने तक चलता रहा। ये शरद पूर्णिमा की रात्रि 6 महीने तक रही लेकिन वृन्दावन में बाकी सब कुछ चलता रहा। ये भगवान की लीला है जिसे सिर्फ भगवान ही समझ सकते हैं हम मानव ये लीला समझ नहीं सकते हैं। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

21Oct 2017

" भगवान की आज्ञा से ही मनुष्य स्वर्ग और नरक में जाता है "

परम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सास्काटून, कनाडा में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के सप्तम दिवस में श्री कृष्ण की लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कथा प्रारम्भ करते हुए कहा की बलराम जी के देह त्यागने के बाद जब एक दिन श्रीकृष्ण जी पीपल के नीचे ध्यान की मुद्रा में बैठे हुए थे, तब उस क्षेत्र में एक जरा नाम का बहेलिया आया हुआ था। जरा एक शिकारी था और वह हिरण का शिकार करना चाहता था। जरा को दूर से हिरण के मुख के समान श्रीकृष्ण का तलवा दिखाई दिया। बहेलिए ने बिना कोई विचार किए वहीं से एक तीर छोड़ दिया जो कि श्रीकृष्ण के तलवे में जाकर लगा। जब वह पास गया तो उसने देखा कि श्रीकृष्ण के पैरों में उसने तीर मार दिया है। इसके बाद उसे बहुत पश्चाताप हुआ और वह क्षमायाचना करने लगा। तब श्रीकृष्ण ने बहेलिए से कहा कि जरा तू डर मत, तूने मेरे मन का काम किया है। अब तू मेरी आज्ञा से स्वर्गलोक प्राप्त करेगा। बहेलिए के जाने के बाद वहां श्रीकृष्ण का सारथी दारुक पहुंच गया। दारुक को देखकर श्रीकृष्ण ने कहा कि वह द्वारिका जाकर सभी को यह बताए कि पूरा यदुवंश नष्ट हो चुका है और बलराम के साथ कृष्ण भी स्वधाम लौट चुके हैं। अत: सभी लोग द्वारिका छोड़ दो, क्योंकि यह नगरी अब जल मग्न होने वाली है। मेरी माता, पिता और सभी प्रियजन इंद्रप्रस्थ को चले जाएं। यह संदेश लेकर दारुक वहां से चला गया। इसके बाद उस क्षेत्र में सभी देवता और स्वर्ग की अप्सराएं, यक्ष, किन्नर, गंधर्व आदि आए और उन्होंने श्रीकृष्ण की आराधना की। आराधना के बाद श्रीकृष्ण ने अपने नेत्र बंद कर लिए और वे सशरीर ही अपने धाम को लौट गए। श्रीमद भागवत के अनुसार जब श्रीकृष्ण और बलराम के स्वधाम गमन की सूचना इनके प्रियजनों तक पहुंची तो उन्होंने भी इस दुख से प्राण त्याग दिए। देवकी, रोहिणी, वसुदेव, बलरामजी की पत्नियां, श्रीकृष्ण की पटरानियां आदि सभी ने शरीर त्याग दिए। इसके बाद अर्जुन ने यदुवंश के निमित्त पिण्डदान और श्राद्ध आदि संस्कार किए। महाराज श्री ने आगे कहा कि यहां पर कुछ मूर्ख लोग ये कहते है कि ऐसे कैसे भगवान थे जो एक तीर से मर गए, उनको ये समझना चाहिए कि भगवान धर्म की सत्यापन करने के लिए धरती पर आए थे और वे स्वयं द्वारा बनाये गए कालचक्र को कैसे तोड़ सकते थे। इसीलिए ये उनके द्वारा रचित लीला थी। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

18Oct 2017

"धार्मिक शिक्षा हमको बताती है कि हमें किस तरह से जीवन को जीना चाहिए।"

परम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सास्काटून, कनाडा में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस में श्रीमद भागवत कथा के महत्त्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कथा प्रारम्भ करते हुए कहा की भगवान ने हमको हाथ, पैर, आँख, नाक, दिमाग सभी कुछ दिया हुआ है। मेरे ठाकुर जी ने हमको इतनी सूंदर सी जिंदगी दी है। तो हमको उनके इस वरदान को कभी भी नहीं भूलना चाहिए। इस मानव योनि को प्राप्त करने के बाद भी अगर मानव मेरे प्रभु को याद न करे तो हमसे बड़ा आत्मघाती या पापी इस दुनिया में और कोई नहीं है। अगर हमारा कोई बुरा कर रहे है तो वो मैं खुद हूँ। मुझसे ज्यादा मेरा बुरा कोई भी नहीं कर सकता है। दुनिया कितना भी मेरा बुरा कर ले पर कहीं न कहीं उसकी भरपाई हो ही जाएगी। लेकिन मैं मेरे लिए जितना बुरा करता हूँ उसकी भरपाई कही भी नहीं हो सकती है। हम अपने धन, दौलत की कितनी भी बुराई कर ले लेकिन उसकी भरपाई हो सकती है लेकिन हम खुद बुरा कर रहे है लाइफ का, जीवन का, जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती है। क्या एक बार जीवन जाने के बाद कभी जीवन प्राप्त हो सकता है क्या? नहीं हो सकता है। मानव जीवन प्राप्त करना बहुत ही दुर्लभ है और इस मानव जीवन को पाने के बाद उस ठाकुर को हमको याद करना ही चाहिए। चाहे कितना भी बड़ा पापी क्योँ न हो एक बार जो मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो मेरे ठाकुर जी उसको माफ़ कर ही देते है। उस पापी को कभी भी त्यागते नहीं है। उस पापी को तो मेरे ठाकुर जी स्वीकार कर ही लेते है और उस पापी का बेडा सदा के लिए पार कर देते है। मैं तो भगवान से बस यही प्रार्थना करता हूँ की जितने भी संत, महात्मा, पापी, मनुष्य है अगर मेरे ठाकुर की शरण में आएं तो उनको मेरे ठाकुर जी सदा के लिए स्वीकार कर लेना और उन सब का बेडा सदा के लिए पार कर देना। बस यही प्रार्थना मैं अपने उन ठाकुर जी से करता हूँ। तब महाराज श्री ने एकादशी के बारे में वहां पर मौजूद भक्तों को बताया कि एकादशी के दिन लोगों को अन्न नहीं खाना चाहिए। अगर हमने व्रत रखा है या नहीं। हमको एकादशी के व्रत में चावल तो बिलकुल भी नहीं खाने चाहिए। न ही चावल खिलाने चाहिए क्योँकि चावल खिलाने से भी हमको पाप लगता है। ये पाप हमको ही नहीं ये तो हमारी स्वर्ग में जा चुकी पीडियों तक लगता है। इस दिन हमको हो सके तो अन्न ही नहीं खाना चाहिए। जौ और चावल तो दूर की बात है। एक संत थे जो अपनी माँ से डरे हुए थे और वो पृथ्वी में जाकर छुप गए थे और जब बाहर आये तो चावल और जौं के रूप में निकले थे। इसलिए हम इनको जीवात्मा ही समझते है। इसलिए अन्न हमारे यहाँ भगवान का रूप है। हमारे यहाँ पर अन्न का सम्मान भी भगवान के रूप में ही किया जाता है। इसलिए हमको अन्न का निरादर भी कभी नहीं करना चाहिए। अगर चावल के साइंटिफिक वर्जन के बात करे तो चावल में जल तत्व की मात्रा अधिक होती है। और जल तत्व का राजा है चंद्र और चंद्र होता है चंचल। एकादशी का व्रत रखने वाले को चावल क्योँ वर्जित है। क्योँकि ये जो चावल खाने से हमारा मन चंचल होता है पर व्रत का मतलब है की मन को संयमित रखना। इसलिए हमको अपने आप से चावल को दूर रखना है। अगर ये चावल हमारे शरीर के नादरा जायेगा तो हमारे शरीर को अंदर से चंचल कर देगा। इसलिए हमलोग चावल का भोग नहीं लगाते है। अगर भोग मिले भी तो उसको कल तक के लिए रख लो और फिर उस दिन को निकलने के बाद ग्रहण कर लो। अब महाराज श्री ने आगे कहा की कल आपने सुना था कि ध्रुव को अपनी अल्प आयु में ही भगवान के दर्शन हो गए थे। धार्मिक शिक्षा हमको बताती है कि हमको किस तरह से जीवन को जीना चाहिए। इसलिए ही तो संतों की वाणी बोलती है कि तू करले याद राम को ये कितनी बड़ी बात है। लेकिन हम लोगों को ये बात इतनी आसानी से समझ में नहीं आती है। आज कल के बच्चे तो इस मॉडर्न शिक्षा को पढ़ते है। उनके लिए आज की शिक्षा को बदल दिया गया है। जो आज कल के बच्चे पढ़ेंगे उसकी को ही तो वो समझेंगे। जब उनको इस बारे में समझाया ही नहीं जा रहा है तो वो समझेंगे कैसे? वो क्या समझेंगे की भगवान इस पत्थर में है तो इसके लिए उनको प्रह्लाद का चरित्र के बारे में सुनना चाहिए। ये मेरे और आपके द्वारा गयी हुई कथा नहीं है ये तो प्रमाण है इसका। अब बताओ कि क्या कहीं पिलर में से भी कोई भगवान निकलता है क्या? जो खुद जड़ है, जिसमें चेतन ही नहीं है उसमें से कौन आ सकता है? ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

17Oct 2017

"भगवान की भक्ति करने से मनुष्य के सभी पाप मिट जाते है"

"भगवान की भक्ति करने से मनुष्य के सभी पाप मिट जाते है" परम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सास्काटून, कनाडा में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस में श्रीमद भागवत कथा के महत्त्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कहा कि हर व्यक्ति को अपने जीवन में भगवान की भक्ति जरूर ही करनी चाहिए। क्योँकि भक्ति से ही मनुष्य का जीवन सदा के लिए सुधर सकता है। उसके सभी पाप धुल जाते है। जो खेल बीत गया है उसको याद मत करो। अब जो बचा है हम और तुम उसका सदुपयोग कर ले तो हमारे और तुम्हारे जीवन का सदुपयोग हो सकता है। राजा परीक्षित ने जब सुखदेव महाराज पधारे तो उनको प्रणाम करके उनसे एक प्रश्न किया। कृपा करके आप मुझे ये बताइए कि जिस व्यक्ति के पास केवल सात दिन है तो उसको इन दिनों में क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। इस प्रश्न को सुनकर सुखदेव महाराज जी बहुत ही प्रसन्न हुए क्योँकि सुखदेव महाराज जी से जो प्रश्न किया गया है वह जान कल्याण के लिए किया गया है। राजा परीक्षित ने ये नहीं कहा है कि मुझे श्राप लगा है और मैं सातवें दिन मरूंगा। राजा परीक्षित ने कहा जो सातवें दिन मरे उसका क्या। क्योंकि कुछ चीजों को भगवान अपने हाथ में ही रखता है। व्यक्ति कब जन्म लेगा कब मरेगा ,कब यश मिलेगा और कब अपयश ,कब लाभ होगा और कब हानि ,इन छह चीजों को भगवान् अपने हाथ में रखता है ,ये हम सब के हाथ में नहीं होता है। अगर यश ही यश होता हम सब के चाहने से तो कोई भी अपना अपयश नहीं चाहता। लाभ ही लाभ अगर हमको हमारी मर्जी से होता तो कौन चाहता है कि मेरी हानि हो जाये। अगर जन्म ही जन्म हमारी मर्जी से हो जाये तो कौन चाहता है कि हमारे यहाँ पर कोई भी मर जाए। इन छह चीजों को भगवान् ने अपने हाथ में रखा हुआ है इन पर हम सब का कोई भी अधिकार नहीं होता है। तो एक न एक दिन हम सब को मरना ही होता है। हम सब इसको संभाल कर नहीं रख सकते है। तो प्रश्न भी इसी के लिए ही होना चाहिए। लेकिन आज तक हमने मृत्यु को लेकर कोई भी प्रश्न नहीं किया है किसी से भी। जब भी हमने कोई भी प्रश्न किया है जीवन के विषय में किया है। मतलब हम झूठ के विषय में तो प्रश्न करते है लेकिन उस सत्य के बारे में प्रश्न नहीं करते है। तब महाराज श्री ने एक शेर के द्वारा हमको उस सत्य के बारे में बताया जो इस प्रकार है "जिंदगी तो बेवफा है एक दिन ठुकराएगी, मौत महबूबा है तेरी साथ लेकर जाएगी".यहाँ पर बेवफा उसे कहते है जो साथ नहीं देती है। लेकिन सब लोगों को यहाँ पर एक बफादार साथी ही चाहिए होता है। यहाँ पर हम बात कर रहे है जिंदगी के बारे में जिससे हम सबसे ज्यादा प्यार करते है। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा कि मोहब्बत तन से है ,पैसे से है या जीवन से है। तभी तो महाराज श्री ने कहा कि प्यार उससे करों जो जिंदगी भर साथ निभाए ,उससे मत करों जो जिंदगी के बीच में ही धोखा दे दे। यहाँ पर हम मृत्यु और जीवन के बारे में बात कर रहे है। जीवन तो एक छलावा है ये तो बीच में ही धोखा दे जाता है लेकिन मृत्यु तो परम सत्य है उसको ही हम नहीं सुधारते है। उसे हम भूल जाना चाहते है। हमको उसको भूलना नहीं चाहिए। अगर हम उसको याद रखेंगे तो कभी भी जिंदगी में हमसे पाप नहीं होंगे। हमें हमेशा ये याद रखना है कि हमारी मृत्यु तो सत्य है और उसको आने से पहले हमको कुछ अच्छा अपनी जिंदगी में करना है। और जो ये श्रीमद भागवत कथा है ये हमारी इस मृत्यु को सुधारती है। जब राजा परीक्षित ने सुखदेव महाराज जी से प्रश्न किया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवे दिन है तो उसको क्या करना चाहिए। तो इस प्रश्न को सुनकर सुखदेव महाराज जी ने कहा कि उस व्यक्ति को श्रीमद भागवत कथा सुननी चाहिए। हमारे सनातन धर्म में दो ग्रन्थ बहुत ही महत्वपूर्ण है एक रामायण और एक भागवत। रामायण हम सब को जीना सिखाती है कि हमको कैसे जीना चाहिए। और भागवत हमको मरना सिखाती है कि हमको मरना कैसे चाहिए। जीवन जीना आ गया तो भी मृत्यु सुधर जाएगी। मृत्यु अंतिम समय में भी सुधर जाए तो भी हमारे आगे का जीवन सुधर जायेगा। बस पहले तो मेरी मृत्यु ही सुधर जाए कि मरने से पहले मेरे मुख से एक बार उस गोविन्द का नाम निकल जाये। बस एक बार मेरा मन उस हरी के चरणों में लग जाये। एक बार मेरा चित्त उस गोविन्द की कथा में लग जाये। तो ऐसा करने से ही मेरी मृत्यु सुधर जाएगी। और ये सब हमारा काम करती है श्रीमद भागवत कथा ही। उस भागवत कथा के सुनने मात्र से ही हमारी मृत्यु हर तरह से सुधर जाती है। और आने वाला जीवन काफी हद तक सुधर जाता है। श्रीमद भागवत हमारा कल्याण कर देती है। श्री सुखदेव महाराज जी कहते है कि राजन जिसकी मृत्यु निश्चित है उसको श्रीमद भागवत कथा को सुनना चाहिए। जो भी व्यक्ति केवल सात दिन ही श्रीमद भागवत कथा को सुनता है तो उस को जीवन में मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। इस मोक्ष को पाने के लिए बड़े से बड़े ऋषि मुनि भी कड़ी तपस्या में लगे रहते है। लेकिन फिर भी उनको मोक्ष मिले यह कन्फर्म नहीं होता है। राधे राधे बोलना पड़ेगा !!

16Oct 2017

"भागवत कथा हमको बताती है की जिंदगी को कैसे जीना चाहिए?"

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सास्काटून, कनाडा में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस में श्रीमद भागवत कथा के महत्त्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कथा शुरू करने से पहले हम सभी को भगवान की भक्ति करने पर ही जोर दिया है। प्रभु भक्ति से ही हम सब के पाप आसानी से धुल जाते है। क्योँकि आज के इस कलयुग में सभी अपने अपने काम करने में ही लगा रहता है। उसको भगवान की भक्ति करने का भी समय नहीं रहता है। लेकिन अपने जीवन को सही ढंग से जीने के लिए और अपने जीवन की सभी समस्याओं को दूर करने के लिए हमको भगवान की पूजा करनी चाहिए। भगवान की पूजा करने के लिए सबसे पहले तो हमारा मन स्वच्छ और साफ़ होना चाहिए। क्योँकि साफ़ और स्वच्छ मन में ही भगवान का वास होता है। जब हमारा मन साफ होगा तो तभी हमारे मन में दूसरों के लिए अच्छे विचार आएंगे। जब हम दूसरों से प्यार करेंगे तो स्वयं भगवान भी हमसब से प्रेम करेंगे और हमारे जीवन में आने वाली सभी समस्याओं को दूर कर देंगे। प्रभु भक्ति से ही हम सब का हर तरह से कल्याण हो सकता है। इसलिए तो हम सबको कभी न कभी भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए। भागवत कथा हमको इंसान बनाती है। भागवत कथा ही हम सब को सही मायने में जीना सिखाती है। यहाँ पर महाराज श्री ने बताया कि यदि हम सात दिन की भागवत कथा को सुनेंगे तो अवश्य ही हमको इन सात दिनों में बहुत कुछ ऐसा सिखने को मिलेगा जो हम सब के लिए लाभकारी होगा और जिसके बारे में कभी भी हमने सुना ही नहीं होगा। आज की जिंदगी में हमसब का बस एक ही प्रश्न होता है कि पैसा कैसे कमाया जाता है। इसके लिए हम सब कितने साल तक पढाई करते है। इसके लिए हमसब अपनी जिंदगी के बीस साल गवा देते है उसके बाद ही हमसब पैसा कमाने लगते है। क्या कभी हमने अपनी जिंदगी के बीस दिन भी खर्च किये है क्या? की जिंदगी कैसे जीनी चाहिए। हमसब को तो पता ही नहीं चलता है कि जिंदगी हमको कहा पर ले जा रही है। यहाँ पर हमने पैसे कैसे कमाने चाहिए उसमे अपनी जिंदगी के पच्चीस साल लगा दिए है, पर जिंदगी कैसे जीनी चाहिए उसमे हमने मात्र पच्चीस दिन भी नहीं लगाए है। ये तो मूर्खतापूर्ण बात है न हम सब के लिए कि हम सब को जीना भी ढंग से नहीं आता है। लेकिन श्रीमद भागवत कथा हमको बताती है कि हमको अपनी जिंदगी को कैसे जीना चाहिए। इन सात दिनों में भागवत कथा के सुनने मात्र से ही हमको ये मालूम हो जाता है की हमको जिंदगी कैसे जीनी चाहिए। लेकिन हमको यहाँ पर समझाना पड़ेगा कि जिंदगी जीने का सही अर्थ क्या है, भगवान का सहीं अर्थ क्या है, इस संसार का सही अर्थ क्या है? पुराणों में और किसी युग के मनुष्य की बात क्योँ नहीं की गयी है। एक ही बात बार बार हमको बताई गयी है की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा? इसका मतलब है कि और युग के लोगों को पता है कि हमारा कल्याण कैसे होगा। लेकिन कलयुग के लोगों के पास तो आयु की कमी है वो लोग तो इस धरती पर हज़ारो वर्ष जीते थे, हमलोग तो हज़ारो वर्ष नहीं जीते है। वहां पर अकाल मृत्यु अचानक से नहीं होती है लेकिन यहाँ पर तो अकाल मृत्यु अचनाक से होती है। वहां पर जीवन को पूरा जिया जाता था। लेकिन यहाँ पर तो पता ही नहीं चलता है कि जीवन में कब क्या हो जाये। वहां पर लोग सौ - सौ साल जी जाते है लेकिन यहाँ पर तो पचास साल में ही भगवान को प्यारे हो जाते है। हम सब की जिंदगी का कुछ भी पता नहीं है। तो यहाँ पर कलयुग के लोगों की आयु कम है, कलयुग के लोगों के विचार कम है। कलयुग के लोगों की सारी जिंदगी तो खाने कमाने और बच्चो के पालन पोषण में ही निकल जाती है। तो कलयुग का ये मनुष्य अपने बारे में सोच ही नहीं पाता है। इसलिए तो हमारे ऋषि मुनियों ने बार बार ये कहा है कि कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा। सोनकादिक ऋषियों ने श्री शुकदेव जी महाराज से प्रश्न किया किहे मुनि श्रेष्ठ कृपा करके हमको बताइये कि इन कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा? यहाँ पर सोनकादिक ऋषियों ने शुकदेव जी महाराज से ऐसे कई प्रश्न किये है, लेकिन उनमे से मोक्ष का प्रश्न काफी अलग है और हम सब के लिए जरुरी भी है। ये प्रश्न है कि हम सब की मुक्ति कैसे होगी। मुक्ति जीव की तब तक नहीं होती है जब तक वो तीन ऋणों से मुक्त न हो जाये। वो तीन ऋण कौनसे है। पहला है दैविक ऋण ,दूसरा है पितृ ऋण और तीसरा है ऋषि ऋण। जब हम सूर्य का प्रकश लेते है तो क्या कोई भी टैक्स देते है। पानी का ,वायु का ,कोई भी टैक्स क्या हम सब देते है। क्या इस प्रकार का कोई भी ऋण हम देवताओं को देते है। देवता हम सब को फ्री ऑफ़ कॉस्ट जीवन देते है। ऐसे अग्नि, आकाश, सूर्य ,चंद्र, वायु, जल आदि हमको निशुल्क में ही जीवन देते है। ये सब हमसे कभी भी किसी भी तरह का शुल्क नहीं लेते है। दूसरा पितृ ऋण, जिन माँ बाप ने हमको पैदा किया है। जिस परिवार में हम पैदा हुए है जब तक उस परिवार का ऋण नहीं उतरता है तब तक सब बेकार है। और तीसरा ऋण ऋषि ऋण, जिंदगी कैसे जीनी चाहिए? ये सब हमको हमारे ऋषि मुनियों ने हमको बताया है। पूजा कैसे करे ,जीवन कैसे जीये,किसी का बार परेशान न करे ,भला काम क्या क्या करे ,ये सब हज़ारों वर्ष पहले जो शास्त्र लिखे है ये उन में हम सब को बताया है। उन सब के द्वारा ही हमको बताया है कि हमको क्या करना चाहिए और हमको क्या नहीं करना चाहिए? किस काम को करने से हम परेशान होंगे और किस काम को करने से हमारा भला होगा। बिना कठिन काम करने से तो हमको अच्छा सा फल भी है प्राप्त नहीं होगा। यहाँ पर महाराज श्री ने हमको बताया कि जो आप बीस साल की जिंदगी में नहीं सीखे है तो वो केवल इन सात दिनों में श्रीमद भागवत कथा के सुनने से ही हम सब को पता चल जाती है। सही अर्थ ये है कि भागवत इन सात दिनों में ही हमें बता देती है कि सही मायने में हमको बताती है की जिंदगी को कैसे जीना चाहिए। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

16Oct 2017

"हम बाहरी मैल मिटाने की तरफ ज्यादा ध्यान देते हैं लेकिन जीवन या मन का मैल नहीं मिटाते हैं।"

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सास्काटून,अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस में श्रीमद भागवत कथा के महत्त्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कहा की आज के समय में मानव बाहरी सुंदरता पर ध्यान देता है लेकिन अंदर की सुंदरता पर काम नहीं करता है। जैसे हम को भी वस्त्र एक दिन पहनने के बाद धोने में डाल देते है, प्रत्येक दिन हम स्नान करते है ऐसे क्या हम अपने मन का मैल मिटाने का काम करते हैं क्या? नहीं करते हैं। हम भौतिक चीजों की तरफ ज्यादा ध्यान देते हैं लेकिन जीवन या मन का मैल नहीं मिटाते हैं। इसके बाद महाराज श्री ने कहा की हम सब दीपावली पर पूजा करके लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने की कोशिश करते है लेकिन हम उनके स्वामी को साल भर नहीं जपते हैं तो लक्ष्मी जी कैसे बिन स्वामी आपके घर आ जायेगी। जब गुरु कृपा करते हैं तो हमें सत्संग मिलता है बिना गुरु कृपा के सत्संग नहीं मिलता है। भगवान शिव ने पार्वती अम्बा को अमर कथा सुनाई और भागवत में ऐसा लिखा है कि जिसने भागवत की कथा श्रद्धा से सुन ली वो माँ के गर्भ में दुबारा नहीं आएगा। यह शरीर छूटने के बाद वह वहाँ पहुँच जायेगा, जहाँ से दुबारा फिर जन्म नहीं लेना पड़ेगा, सदैव आनंद रहेगा। शुकदेव भगवान भी यह कथा सुनने लगते हैं, पार्वती अम्बा सुनती जा रहीं हैं। भगवान शंकर के नेत्र बंद थे, समाधि में योग में स्थित होकर सूना रहे हैं। पार्वती अम्बा हूँ! हूँ! करती रहीं और दसवां स्कन्ध समाप्त हुआ तो नींद आ गयी उन्हें। शुकदेव भगवान हूँ! हूँ! करते रहे और बारहवें स्कन्ध के बाद जब आँख खुली तो देखा पार्वती जी सो रहीं थीं हूँ हूँ ! कौन कर रहा था ? पार्वती जी से पूछा तो उन्होंने कहा प्रभु दशम स्कन्ध की समाप्ति तक, मैंने बहुत सावधान हो कर सुना, पता नहीं क्या आपकी माया थी कि मेरी आँख लग गई पर हूँ ! कौन कर रहा था, देखा तो शुकदेव जी तोते के रूप में हूँ! हूँ! कर रहे थे। भगवान शंकर ने चाहा इसको मार दें! जो खूफिया होते हैं, घुसपैठिये उनको तो मार डालना चाहते हैं, तो भगवान शंकर ने त्रिशूल उठाया और चला दिया, शुकदेव जी वहां से भागे और वेद व्यास जी की पत्नी पिंगला के पेट में चले गए, वे बाल सूखा रहीं थीं, उसी समय उनको जम्हाई आई। पार्वती जी बाद में बोलीं भगवान शंकर से ..प्रभु, इसीलिए तो लोग आपको भोला शंकर कहते हैं, एक ओर तो आप कहते हो जो भागवत की कथा सुनले वो अमर हो जाता है और दूसरी ओर आप शुकदेव को मारना चाहते हो .. जब वो अमर कथा सुन ही चुका है तो मरेगा कैसे! ऐसा मान लो कि भगवान् कृष्ण का ही संकल्प है। बारह वर्ष तक शुकदेव जी गर्भ में रहे, ऐसा शास्त्र कहते हैं, और वहीँ भगवत चिंतन, आत्म चिंतन करते रहे। व्यास जी ने प्रार्थना की, कि भाई कौन ऐसा योगी, पत्नी के गर्भ में आ गया जो बाहर आना ही नहीं चाहता। शुकदेव भगवान् ने कहा की मैं बाहर तब आउंगा जब मुझे ये वचन मिल जाये कि भगवान् की माया मुझ पर हावी नहीं होगी । पैदा होने के बाद भगवान् की माया एक दम पकड़ती है। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

16Oct 2017

"हम बाहरी मैल मिटाने की तरफ ज्यादा ध्यान देते हैं लेकिन जीवन या मन का मैल नहीं मिटाते हैं।"

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सास्काटून,अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस में श्रीमद भागवत कथा के महत्त्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कहा की आज के समय में मानव बाहरी सुंदरता पर ध्यान देता है लेकिन अंदर की सुंदरता पर काम नहीं करता है। जैसे हम को भी वस्त्र एक दिन पहनने के बाद धोने में डाल देते है, प्रत्येक दिन हम स्नान करते है ऐसे क्या हम अपने मन का मैल मिटाने का काम करते हैं क्या? नहीं करते हैं। हम भौतिक चीजों की तरफ ज्यादा ध्यान देते हैं लेकिन जीवन या मन का मैल नहीं मिटाते हैं। इसके बाद महाराज श्री ने कहा की हम सब दीपावली पर पूजा करके लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने की कोशिश करते है लेकिन हम उनके स्वामी को साल भर नहीं जपते हैं तो लक्ष्मी जी कैसे बिन स्वामी आपके घर आ जायेगी। जब गुरु कृपा करते हैं तो हमें सत्संग मिलता है बिना गुरु कृपा के सत्संग नहीं मिलता है। भगवान शिव ने पार्वती अम्बा को अमर कथा सुनाई और भागवत में ऐसा लिखा है कि जिसने भागवत की कथा श्रद्धा से सुन ली वो माँ के गर्भ में दुबारा नहीं आएगा। यह शरीर छूटने के बाद वह वहाँ पहुँच जायेगा, जहाँ से दुबारा फिर जन्म नहीं लेना पड़ेगा, सदैव आनंद रहेगा। शुकदेव भगवान भी यह कथा सुनने लगते हैं, पार्वती अम्बा सुनती जा रहीं हैं। भगवान शंकर के नेत्र बंद थे, समाधि में योग में स्थित होकर सूना रहे हैं। पार्वती अम्बा हूँ! हूँ! करती रहीं और दसवां स्कन्ध समाप्त हुआ तो नींद आ गयी उन्हें। शुकदेव भगवान हूँ! हूँ! करते रहे और बारहवें स्कन्ध के बाद जब आँख खुली तो देखा पार्वती जी सो रहीं थीं हूँ हूँ ! कौन कर रहा था ? पार्वती जी से पूछा तो उन्होंने कहा प्रभु दशम स्कन्ध की समाप्ति तक, मैंने बहुत सावधान हो कर सुना, पता नहीं क्या आपकी माया थी कि मेरी आँख लग गई पर हूँ ! कौन कर रहा था, देखा तो शुकदेव जी तोते के रूप में हूँ! हूँ! कर रहे थे। भगवान शंकर ने चाहा इसको मार दें! जो खूफिया होते हैं, घुसपैठिये उनको तो मार डालना चाहते हैं, तो भगवान शंकर ने त्रिशूल उठाया और चला दिया, शुकदेव जी वहां से भागे और वेद व्यास जी की पत्नी पिंगला के पेट में चले गए, वे बाल सूखा रहीं थीं, उसी समय उनको जम्हाई आई। पार्वती जी बाद में बोलीं भगवान शंकर से ..प्रभु, इसीलिए तो लोग आपको भोला शंकर कहते हैं, एक ओर तो आप कहते हो जो भागवत की कथा सुनले वो अमर हो जाता है और दूसरी ओर आप शुकदेव को मारना चाहते हो .. जब वो अमर कथा सुन ही चुका है तो मरेगा कैसे! ऐसा मान लो कि भगवान् कृष्ण का ही संकल्प है। बारह वर्ष तक शुकदेव जी गर्भ में रहे, ऐसा शास्त्र कहते हैं, और वहीँ भगवत चिंतन, आत्म चिंतन करते रहे। व्यास जी ने प्रार्थना की, कि भाई कौन ऐसा योगी, पत्नी के गर्भ में आ गया जो बाहर आना ही नहीं चाहता। शुकदेव भगवान् ने कहा की मैं बाहर तब आउंगा जब मुझे ये वचन मिल जाये कि भगवान् की माया मुझ पर हावी नहीं होगी । पैदा होने के बाद भगवान् की माया एक दम पकड़ती है। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

16Oct 2017

"हम बाहरी मैल मिटाने की तरफ ज्यादा ध्यान देते हैं लेकिन जीवन या मन का मैल नहीं मिटाते हैं।"

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सास्काटून,अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस में श्रीमद भागवत कथा के महत्त्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कहा की आज के समय में मानव बाहरी सुंदरता पर ध्यान देता है लेकिन अंदर की सुंदरता पर काम नहीं करता है। जैसे हम को भी वस्त्र एक दिन पहनने के बाद धोने में डाल देते है, प्रत्येक दिन हम स्नान करते है ऐसे क्या हम अपने मन का मैल मिटाने का काम करते हैं क्या? नहीं करते हैं। हम भौतिक चीजों की तरफ ज्यादा ध्यान देते हैं लेकिन जीवन या मन का मैल नहीं मिटाते हैं। इसके बाद महाराज श्री ने कहा की हम सब दीपावली पर पूजा करके लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने की कोशिश करते है लेकिन हम उनके स्वामी को साल भर नहीं जपते हैं तो लक्ष्मी जी कैसे बिन स्वामी आपके घर आ जायेगी। जब गुरु कृपा करते हैं तो हमें सत्संग मिलता है बिना गुरु कृपा के सत्संग नहीं मिलता है। भगवान शिव ने पार्वती अम्बा को अमर कथा सुनाई और भागवत में ऐसा लिखा है कि जिसने भागवत की कथा श्रद्धा से सुन ली वो माँ के गर्भ में दुबारा नहीं आएगा। यह शरीर छूटने के बाद वह वहाँ पहुँच जायेगा, जहाँ से दुबारा फिर जन्म नहीं लेना पड़ेगा, सदैव आनंद रहेगा। शुकदेव भगवान भी यह कथा सुनने लगते हैं, पार्वती अम्बा सुनती जा रहीं हैं। भगवान शंकर के नेत्र बंद थे, समाधि में योग में स्थित होकर सूना रहे हैं। पार्वती अम्बा हूँ! हूँ! करती रहीं और दसवां स्कन्ध समाप्त हुआ तो नींद आ गयी उन्हें। शुकदेव भगवान हूँ! हूँ! करते रहे और बारहवें स्कन्ध के बाद जब आँख खुली तो देखा पार्वती जी सो रहीं थीं हूँ हूँ ! कौन कर रहा था ? पार्वती जी से पूछा तो उन्होंने कहा प्रभु दशम स्कन्ध की समाप्ति तक, मैंने बहुत सावधान हो कर सुना, पता नहीं क्या आपकी माया थी कि मेरी आँख लग गई पर हूँ ! कौन कर रहा था, देखा तो शुकदेव जी तोते के रूप में हूँ! हूँ! कर रहे थे। भगवान शंकर ने चाहा इसको मार दें! जो खूफिया होते हैं, घुसपैठिये उनको तो मार डालना चाहते हैं, तो भगवान शंकर ने त्रिशूल उठाया और चला दिया, शुकदेव जी वहां से भागे और वेद व्यास जी की पत्नी पिंगला के पेट में चले गए, वे बाल सूखा रहीं थीं, उसी समय उनको जम्हाई आई। पार्वती जी बाद में बोलीं भगवान शंकर से ..प्रभु, इसीलिए तो लोग आपको भोला शंकर कहते हैं, एक ओर तो आप कहते हो जो भागवत की कथा सुनले वो अमर हो जाता है और दूसरी ओर आप शुकदेव को मारना चाहते हो .. जब वो अमर कथा सुन ही चुका है तो मरेगा कैसे! ऐसा मान लो कि भगवान् कृष्ण का ही संकल्प है। बारह वर्ष तक शुकदेव जी गर्भ में रहे, ऐसा शास्त्र कहते हैं, और वहीँ भगवत चिंतन, आत्म चिंतन करते रहे। व्यास जी ने प्रार्थना की, कि भाई कौन ऐसा योगी, पत्नी के गर्भ में आ गया जो बाहर आना ही नहीं चाहता। शुकदेव भगवान् ने कहा की मैं बाहर तब आउंगा जब मुझे ये वचन मिल जाये कि भगवान् की माया मुझ पर हावी नहीं होगी । पैदा होने के बाद भगवान् की माया एक दम पकड़ती है। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

16Oct 2017

"हम बाहरी मैल मिटाने की तरफ ज्यादा ध्यान देते हैं लेकिन जीवन या मन का मैल नहीं मिटाते हैं।"

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सास्काटून,अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस में श्रीमद भागवत कथा के महत्त्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कहा की आज के समय में मानव बाहरी सुंदरता पर ध्यान देता है लेकिन अंदर की सुंदरता पर काम नहीं करता है। जैसे हम को भी वस्त्र एक दिन पहनने के बाद धोने में डाल देते है, प्रत्येक दिन हम स्नान करते है ऐसे क्या हम अपने मन का मैल मिटाने का काम करते हैं क्या? नहीं करते हैं। हम भौतिक चीजों की तरफ ज्यादा ध्यान देते हैं लेकिन जीवन या मन का मैल नहीं मिटाते हैं। इसके बाद महाराज श्री ने कहा की हम सब दीपावली पर पूजा करके लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने की कोशिश करते है लेकिन हम उनके स्वामी को साल भर नहीं जपते हैं तो लक्ष्मी जी कैसे बिन स्वामी आपके घर आ जायेगी। जब गुरु कृपा करते हैं तो हमें सत्संग मिलता है बिना गुरु कृपा के सत्संग नहीं मिलता है। भगवान शिव ने पार्वती अम्बा को अमर कथा सुनाई और भागवत में ऐसा लिखा है कि जिसने भागवत की कथा श्रद्धा से सुन ली वो माँ के गर्भ में दुबारा नहीं आएगा। यह शरीर छूटने के बाद वह वहाँ पहुँच जायेगा, जहाँ से दुबारा फिर जन्म नहीं लेना पड़ेगा, सदैव आनंद रहेगा। शुकदेव भगवान भी यह कथा सुनने लगते हैं, पार्वती अम्बा सुनती जा रहीं हैं। भगवान शंकर के नेत्र बंद थे, समाधि में योग में स्थित होकर सूना रहे हैं। पार्वती अम्बा हूँ! हूँ! करती रहीं और दसवां स्कन्ध समाप्त हुआ तो नींद आ गयी उन्हें। शुकदेव भगवान हूँ! हूँ! करते रहे और बारहवें स्कन्ध के बाद जब आँख खुली तो देखा पार्वती जी सो रहीं थीं हूँ हूँ ! कौन कर रहा था ? पार्वती जी से पूछा तो उन्होंने कहा प्रभु दशम स्कन्ध की समाप्ति तक, मैंने बहुत सावधान हो कर सुना, पता नहीं क्या आपकी माया थी कि मेरी आँख लग गई पर हूँ ! कौन कर रहा था, देखा तो शुकदेव जी तोते के रूप में हूँ! हूँ! कर रहे थे। भगवान शंकर ने चाहा इसको मार दें! जो खूफिया होते हैं, घुसपैठिये उनको तो मार डालना चाहते हैं, तो भगवान शंकर ने त्रिशूल उठाया और चला दिया, शुकदेव जी वहां से भागे और वेद व्यास जी की पत्नी पिंगला के पेट में चले गए, वे बाल सूखा रहीं थीं, उसी समय उनको जम्हाई आई। पार्वती जी बाद में बोलीं भगवान शंकर से ..प्रभु, इसीलिए तो लोग आपको भोला शंकर कहते हैं, एक ओर तो आप कहते हो जो भागवत की कथा सुनले वो अमर हो जाता है और दूसरी ओर आप शुकदेव को मारना चाहते हो .. जब वो अमर कथा सुन ही चुका है तो मरेगा कैसे! ऐसा मान लो कि भगवान् कृष्ण का ही संकल्प है। बारह वर्ष तक शुकदेव जी गर्भ में रहे, ऐसा शास्त्र कहते हैं, और वहीँ भगवत चिंतन, आत्म चिंतन करते रहे। व्यास जी ने प्रार्थना की, कि भाई कौन ऐसा योगी, पत्नी के गर्भ में आ गया जो बाहर आना ही नहीं चाहता। शुकदेव भगवान् ने कहा की मैं बाहर तब आउंगा जब मुझे ये वचन मिल जाये कि भगवान् की माया मुझ पर हावी नहीं होगी । पैदा होने के बाद भगवान् की माया एक दम पकड़ती है। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

16Oct 2017

"हम बाहरी मैल मिटाने की तरफ ज्यादा ध्यान देते हैं लेकिन जीवन या मन का मैल नहीं मिटाते हैं।"

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सास्काटून,अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस में श्रीमद भागवत कथा के महत्त्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कहा की आज के समय में मानव बाहरी सुंदरता पर ध्यान देता है लेकिन अंदर की सुंदरता पर काम नहीं करता है। जैसे हम को भी वस्त्र एक दिन पहनने के बाद धोने में डाल देते है, प्रत्येक दिन हम स्नान करते है ऐसे क्या हम अपने मन का मैल मिटाने का काम करते हैं क्या? नहीं करते हैं। हम भौतिक चीजों की तरफ ज्यादा ध्यान देते हैं लेकिन जीवन या मन का मैल नहीं मिटाते हैं। इसके बाद महाराज श्री ने कहा की हम सब दीपावली पर पूजा करके लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने की कोशिश करते है लेकिन हम उनके स्वामी को साल भर नहीं जपते हैं तो लक्ष्मी जी कैसे बिन स्वामी आपके घर आ जायेगी। जब गुरु कृपा करते हैं तो हमें सत्संग मिलता है बिना गुरु कृपा के सत्संग नहीं मिलता है। भगवान शिव ने पार्वती अम्बा को अमर कथा सुनाई और भागवत में ऐसा लिखा है कि जिसने भागवत की कथा श्रद्धा से सुन ली वो माँ के गर्भ में दुबारा नहीं आएगा। यह शरीर छूटने के बाद वह वहाँ पहुँच जायेगा, जहाँ से दुबारा फिर जन्म नहीं लेना पड़ेगा, सदैव आनंद रहेगा। शुकदेव भगवान भी यह कथा सुनने लगते हैं, पार्वती अम्बा सुनती जा रहीं हैं। भगवान शंकर के नेत्र बंद थे, समाधि में योग में स्थित होकर सूना रहे हैं। पार्वती अम्बा हूँ! हूँ! करती रहीं और दसवां स्कन्ध समाप्त हुआ तो नींद आ गयी उन्हें। शुकदेव भगवान हूँ! हूँ! करते रहे और बारहवें स्कन्ध के बाद जब आँख खुली तो देखा पार्वती जी सो रहीं थीं हूँ हूँ ! कौन कर रहा था ? पार्वती जी से पूछा तो उन्होंने कहा प्रभु दशम स्कन्ध की समाप्ति तक, मैंने बहुत सावधान हो कर सुना, पता नहीं क्या आपकी माया थी कि मेरी आँख लग गई पर हूँ ! कौन कर रहा था, देखा तो शुकदेव जी तोते के रूप में हूँ! हूँ! कर रहे थे। भगवान शंकर ने चाहा इसको मार दें! जो खूफिया होते हैं, घुसपैठिये उनको तो मार डालना चाहते हैं, तो भगवान शंकर ने त्रिशूल उठाया और चला दिया, शुकदेव जी वहां से भागे और वेद व्यास जी की पत्नी पिंगला के पेट में चले गए, वे बाल सूखा रहीं थीं, उसी समय उनको जम्हाई आई। पार्वती जी बाद में बोलीं भगवान शंकर से ..प्रभु, इसीलिए तो लोग आपको भोला शंकर कहते हैं, एक ओर तो आप कहते हो जो भागवत की कथा सुनले वो अमर हो जाता है और दूसरी ओर आप शुकदेव को मारना चाहते हो .. जब वो अमर कथा सुन ही चुका है तो मरेगा कैसे! ऐसा मान लो कि भगवान् कृष्ण का ही संकल्प है। बारह वर्ष तक शुकदेव जी गर्भ में रहे, ऐसा शास्त्र कहते हैं, और वहीँ भगवत चिंतन, आत्म चिंतन करते रहे। व्यास जी ने प्रार्थना की, कि भाई कौन ऐसा योगी, पत्नी के गर्भ में आ गया जो बाहर आना ही नहीं चाहता। शुकदेव भगवान् ने कहा की मैं बाहर तब आउंगा जब मुझे ये वचन मिल जाये कि भगवान् की माया मुझ पर हावी नहीं होगी । पैदा होने के बाद भगवान् की माया एक दम पकड़ती है। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

16Oct 2017

"हम बाहरी मैल मिटाने की तरफ ज्यादा ध्यान देते हैं लेकिन जीवन या मन का मैल नहीं मिटाते हैं।"

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में सास्काटून,कनाडा में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस में श्रीमद भागवत कथा के महत्त्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कहा की आज के समय में मानव बाहरी सुंदरता पर ध्यान देता है लेकिन अंदर की सुंदरता पर काम नहीं करता है। जैसे हम को भी वस्त्र एक दिन पहनने के बाद धोने में डाल देते है, प्रत्येक दिन हम स्नान करते है ऐसे क्या हम अपने मन का मैल मिटाने का काम करते हैं क्या? नहीं करते हैं। हम भौतिक चीजों की तरफ ज्यादा ध्यान देते हैं लेकिन जीवन या मन का मैल नहीं मिटाते हैं। इसके बाद महाराज श्री ने कहा की हम सब दीपावली पर पूजा करके लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने की कोशिश करते है लेकिन हम उनके स्वामी को साल भर नहीं जपते हैं तो लक्ष्मी जी कैसे बिन स्वामी आपके घर आ जायेगी। जब गुरु कृपा करते हैं तो हमें सत्संग मिलता है बिना गुरु कृपा के सत्संग नहीं मिलता है। भगवान शिव ने पार्वती अम्बा को अमर कथा सुनाई और भागवत में ऐसा लिखा है कि जिसने भागवत की कथा श्रद्धा से सुन ली वो माँ के गर्भ में दुबारा नहीं आएगा। यह शरीर छूटने के बाद वह वहाँ पहुँच जायेगा, जहाँ से दुबारा फिर जन्म नहीं लेना पड़ेगा, सदैव आनंद रहेगा। शुकदेव भगवान भी यह कथा सुनने लगते हैं, पार्वती अम्बा सुनती जा रहीं हैं। भगवान शंकर के नेत्र बंद थे, समाधि में योग में स्थित होकर सूना रहे हैं। पार्वती अम्बा हूँ! हूँ! करती रहीं और दसवां स्कन्ध समाप्त हुआ तो नींद आ गयी उन्हें। शुकदेव भगवान हूँ! हूँ! करते रहे और बारहवें स्कन्ध के बाद जब आँख खुली तो देखा पार्वती जी सो रहीं थीं हूँ हूँ ! कौन कर रहा था ? पार्वती जी से पूछा तो उन्होंने कहा प्रभु दशम स्कन्ध की समाप्ति तक, मैंने बहुत सावधान हो कर सुना, पता नहीं क्या आपकी माया थी कि मेरी आँख लग गई पर हूँ ! कौन कर रहा था, देखा तो शुकदेव जी तोते के रूप में हूँ! हूँ! कर रहे थे। भगवान शंकर ने चाहा इसको मार दें! जो खूफिया होते हैं, घुसपैठिये उनको तो मार डालना चाहते हैं, तो भगवान शंकर ने त्रिशूल उठाया और चला दिया, शुकदेव जी वहां से भागे और वेद व्यास जी की पत्नी पिंगला के पेट में चले गए, वे बाल सूखा रहीं थीं, उसी समय उनको जम्हाई आई। पार्वती जी बाद में बोलीं भगवान शंकर से ..प्रभु, इसीलिए तो लोग आपको भोला शंकर कहते हैं, एक ओर तो आप कहते हो जो भागवत की कथा सुनले वो अमर हो जाता है और दूसरी ओर आप शुकदेव को मारना चाहते हो .. जब वो अमर कथा सुन ही चुका है तो मरेगा कैसे! ऐसा मान लो कि भगवान् कृष्ण का ही संकल्प है। बारह वर्ष तक शुकदेव जी गर्भ में रहे, ऐसा शास्त्र कहते हैं, और वहीँ भगवत चिंतन, आत्म चिंतन करते रहे। व्यास जी ने प्रार्थना की, कि भाई कौन ऐसा योगी, पत्नी के गर्भ में आ गया जो बाहर आना ही नहीं चाहता। शुकदेव भगवान् ने कहा की मैं बाहर तब आउंगा जब मुझे ये वचन मिल जाये कि भगवान् की माया मुझ पर हावी नहीं होगी । पैदा होने के बाद भगवान् की माया एक दम पकड़ती है। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

14Oct 2017

"केवल सात दिन श्रीमद भागवत कथा सुनने से ही मोक्ष प्राप्त हो जाता है "

पूज्य महाराज श्री देवकीनंदन ठाकुर जी के सानिध्य में न्यू जर्सी, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के सप्तम दिवस में श्रीमद भागवत कथा के महत्त्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने आज सबसे पहले कथा शुरू करने से हमें बताया कि हमको किस तरह से भगवान की भक्ति करनी चाहिए। महाराज श्री ने कहा कि प्रभु की भक्ति के लिए सबसे पहले हमको अपने मन को सदा के लिए साफ कर लेना चाहिए। ताकि हमारे मन में किसी भी तरह का कोई भी पाप न आने पाए। क्योँकि जब तक हमारा मन साफ़ नहीं होगा तो हमारा मन उस प्रभु की भक्ति में लगेगा ही नहीं। इसलिए तो कहा गया है कि जिन भी व्यक्तियों का मन साफ़ नहीं होगा तो चाहे वो कितनी भी भक्ति या पूजा क्योँ न कर ले पर उनको इसका फल कभी भी है मिलेगा। हमको सदा ही सच्चे और साफ़ मन से उस परम परमात्मा की पूजा में ही अपने आप को सदा के लिए लगा देना चाहिए। क्योँकि वो परमात्मा ही हमको इस संसार रुपी दलदल से निकाल सकते है। भागवत कथा को सुनने से भी हमको बहुत ही फायदा होता है। जो व्यक्ति केवल सात दिन ही भागवत कथा को सुन लेते है तो उनको उस मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है जिसके लिए बड़े बड़े ऋषि मुनि वर्षो तक वन में तपस्या करते रहते है। तब भी ये भरोसा नहीं रहता है कि उनको मोक्ष मिलेगा भी या नहीं। लेकिन यदि हम इन सात दिनों में भागवत कथा को मात्र सुन भी लेते है तो हमको उस मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। इन बारह महीनो में से ये कार्तिक का महीना बड़ा ही पवित्र होता है। क्योँकि इस महीने में हम जो भी अच्छा कार्य करते है तो उस कार्य का फल भी हमको कुछ ज्यादा ही मिलता है। दुनिया उस कृष्ण का स्मरण करते है और वो कृष्ण उस राधा रानी का भजन करते है। यदि इस कार्तिक महीने में हम राधा और कृष्ण का भजन करते है तो उसका फल भी हमको कई गुना मिलता है। कल कथा में आपने सुना था कि राजकुमारी रुक्मणि का विवाह श्री कृष्ण के साथ संपन्न हुआ था। श्री कृष्ण ने सोलह हज़ार एक सौ आठ विवाह किये थे। कई लोग फिर भी कह देते है कि इतने सारे विवाह करने वाले ये अपने आप को देवता कहलाते है। पर ये कैसे देवता है? जिन्होंने इतने सारे विवाह किये है। लेकिन भगवान का इस धरती पर आने का प्रयोजन कुछ और ही था जिनका वर्णन उन्होंने खुद ही किया है। यहाँ पर भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं ही कहा है कि मैं हर युग में केवल धर्म की स्थापना करने के लिए आता हूँ। इसका मतलब ये है कि हर युग में ऐसे भी लोग होते है जो धर्म को नहीं मानते है। सतयुग में हिरण्यकशपु ,त्रेता युग में रावण ,द्वापर युग में कंस और कलयुग में हम और तुम जैसे व्यक्ति होते है जो धर्म को नहीं मानते है या कमियां निकालते रहते है। संसार में भगवान को मज़बूरी से मानने वाले लोग ज्यादा मिलेंगे बजाय मन से मानने वाले लोगों के। जो दिल से भगवान को माने ऐसे लोग दुनिया में बहुत ही कम है और जो दिल से भगवान को मानते है वही सच्चे भक्त होते है। विपत्ति में तो भगवान को मानने वाले होते है ये तो आम बात होती है। इसलिए हमको जो कुछ भी मिले उसे भगवान की मंजूरी समझ कर ले लेना चाहिए। हमको बस इस बात को स्वीकार कर लेना चाहिए कि जो कुछ भी हमको मिला है उसी में हमारी भलाई है। और यही हम सब की सच्ची भक्ति है। पर लेकिन आज इस कलयुग में ऐसे भी भक्त होते है जो सामने तो कुछ और ही करते है और पीछे से कुछ और ही करते है। अब जब कलयुग में भी ऐसे लोग मौजूद है तो भगवान को कलयुग में भी आना पड़ता है। कलयुग के चौथे चरण में कल्कि अवतार होगा। जब भौमासुर नामक राक्षस जहां पर भी कन्याओं को देखता था तो उनको बंदी बना लेता था। जब नारद जी को इस बात का पता चला तो उन्होंने द्वारकाधीश को इस बारे में बताया। तब द्वारकाधीश गरुड़ पर स्वर होकर वहां पर गए और उस दुष्ट राक्षस का वध किया और उन बंदी बानी लड़कियों को आज़ाद कराया। तब उन लड़कियों ने कृष्ण से कहा कि अब हम कहा को जाएँ। अब हम को स्वीकार कौन करेगा। हमारे संसार में बुजुर्गो को सदा से ही भार समझा जाता है। हमारे युवा लड़के कभी भी बुजुर्गों की सेवा करना ही है चाहते है। वो उनको साथ रखना ही नहीं चाहते है। कई युवा लड़के तो उनको अपने साथ रखने में भी शर्म महसूस करते है। क्योँ उन माँ बाप को उन वृद्ध आश्रमों में जाना पड़े जिन्होंने हमको ऊँगली पकड़ कर चलना सिखाया है। जिस मां ने मुझको नौ महीने तक अपने पेट में रखा है। क्या मेरे जवान होने पर उसको यही वरदान मिलेगा की उसको मेरे घर से सदा के लिए जाना पड़ेगा। हम सब आपसे पूछते है कि क्या भारतीय सभ्यता है ,क्या यही भारतीय परम्परा है। इसलिए हम सब को सदा ही अपने बच्चो को यही सीखना चाहिए कि जिस माँ ने हमें जन्म दिया है उस माँ को हमको कभी भी नहीं भूलना चाहिए। उस माँ बाप को हमें कभी किसी भी तरह का दुःख दर्द नहीं देना चाहिए। क्योँकि यही वह माँ बाप है जो खुद भूखे रह कर भी हम सब का पेट भरते है। और आज इस बुढ़ापे में हमको उनको दर्द नहीं देना चाहिए। उनकी हर प्रकार से सेवा करनी चाहिए। हमको उन माँ बाप की आँखों में कभी भी आंसू नहीं आने देना चाहिए। यदि हमारी वजह से उनकी आँखों में आंसू आये तो अपनी इस जिंदगी में हम कभी भी खुश नहीं रह सकते है। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

13Oct 2017

"हम सभी को सदा ही पवित्र मन से प्रभु की भक्ति करनी चाहिए "

पूज्य महाराज श्री देवकीनंदन ठाकुर जी के सानिध्य में न्यू जर्सी, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के षष्टम दिवस में श्रीमद भागवत कथा के महत्त्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने "श्री राधे गोपाल भजमन श्री राधे "नामक भजन सुना कर वहां पर मौजूद सभी अपने भक्त जनो को प्रभु भक्ति के लिए प्रेरित किया। महाराज श्री ने कहा कि हमसब को सबसे पहले अपने मन को पूजा के लिए पवित्र कर लेना चाहिए। तभी हम अपने प्रभु की सच्ची भक्ति कर सकते है। इसलिए हमको अपने मन को सदा ही साफ रखना चाहिए। तभी हमारा मन अपने प्रभु की भक्ति में लग सकता है। जो लोग अपने मन को साफ नहीं रखते है वो अपने प्रभु की भक्ति सच्चे मन से नहीं कर सकते है। अपने प्रभु की भक्ति के लिए हमको सदा ही अपने मन को सदा के लिए साफ रखना चाहिए। महाराज श्री ने कथा को शुरू करने से पहले हमें बताया कि कौन लोग किसके द्वारा प्रसन्न होता है। ब्राह्मण को हम भोजन से प्रसन्न कर सकते है। अगर उसके साथ थोड़ी सी दक्षिणा ज्यादा दे दे तो और भी ज्यादा प्रसन्न हो जाते है। तब हमको वो सब कुछ ज्यादा ही प्रसन्न होकर अच्छा सा वरदान दे देते है। मोर ज्यादा काले घने बादल देखकर अधिक प्रसन्न हो जाते है। और जो साधु लोग होते है वो पराई संपत्ति को देखकर अधिक प्रसन्न हो जाते है। साधु केवल वही नहीं होता है जो लाल वस्त्र पहनता है। जब हम समाज को सुख देने वाले कार्य करते है तो हम साधु कहलाते है। हम भजन करते है तो साधु कहलाते है। ईश्वर को मानते है तो हम साधु कहलाते है। हम सब में साधु भी मौजूद होता है और दुष्ट भी होता है। अगर हम समाज को नुकसान पहुँचाने वाले कार्य करे तो हम साधु नहीं है। तब हम दुष्ट कहलाते है। अगर इस संसार में साधु और संत नहीं होते तो ये संसार सदा ही द्वेष ,ईर्ष्या ,घमंड आदि परेशानियों से सदा ही जूझता रहता। और इस संसार को इन सब से बचाने वाला कोई और नहीं होता। जब हम समाज से ,परिवार से ,अपनी इच्छाओं से परेशान होते है तब हम किसी संत के चरणों में जाकर दो आंसू बहाते है। और कभी - कभी तो वो आंसू ऐसे बहते है कि उस संत के हृदय से सच्चा आशीर्वाद निकल जाता है। वो आशीर्वाद देते है कि जा और चिंता मतकर भगवान तुम्हारी सभी मनोकामनाओं को पूरा करेंगे। और उसके बाद अगर भगवान हमारे ऊपर अपनी कृपा कर देते है तो बाकई हमारे जीवन की सभी समस्याओं का समाधान निकल जाता है। जो सच्चे मन वाले होते है वो ही तो सच्चे साधु होते है। और वही साधु हमारी ख़ुशी देखकर खुद भी खुश हो जाते है। और जो दुष्ट होते है वो पराई विपत्ति को देखकर अधिक प्रसन्न होते है। कई बार हमने देखा है की जिनसे हमारा कुछ भी लेना देना नहीं होता है फिर भी वो हम सब की विपत्ति को देखकर अधिक प्रसन्न होते है। ये तो पुरानी कहावत है कि आजकल व्यक्ति अपने दुःख से दुखी नहीं होता है वो तो दूसरों के सुख से अधिक दुखी होता है। ये सब बातें तो हम सब की मेंटालिटी को दर्शाती है कि हमसब की सोच किस तरह की है। ये सब बातें हम सब की विचारधारा का ,हमारी बुरी थिंकिंग का परिचय कराती है कि आप किसी की प्रसन्नता में प्रसन्न नहीं हो सकते है। अपितु जब कोई भी व्यक्ति प्रसन्न होता है तो आप तो यही सोचते है कि यह व्यक्ति प्रसन्न होने की जगह दुखी होना चाहिए। उस व्यक्ति को दुःख देना चाहिए ,उसको परेशान किया जाना चाहिए। और जब कोई भी व्यक्ति स्वाभाविक रूप से अपने दुःख से दुखी होता है तो हम ख़ुशी मनाते है। आपने देखा भी होगा कि जब कोई व्यक्ति दुखी होता है तो बहुत सारे लोगों के चेहरे पर अपने आप ही ख़ुशी आ जाती है। हम सब को एक बात कभी नहीं भूलनी चाहिए कि जब हम दूसरों के दुःख में खुशियां मनाते है। तो एक दिन वह भी आएगा की जब हम दुखी होंगे और हम सब के शत्रु हमारे दुःख में खुशियां मनाएंगे। हम सब को इन छोटी - छोटी बातों का विशेष ध्यान देना चाहिए। हमको दूसरों के दुःख में खुश नहीं होना चाहिए। बल्कि हमसब को भगवान् से प्रार्थना करनी चाहिए की इसके दुःख को जल्दी से समाप्त कर दो। भगवान इसको दुःख सहने की शक्ति प्रदान करो। आप किसी के भला होने की प्रार्थना नहीं कर सकते है। लेकिन किसी के भला होने की दुआ तो कर सकते है। लेकिन आज का व्यक्ति मेंटली इतना गरीब हो चूका है की न तो वो किसी का भला कर सकता है और न ही किसी के भला होने की दुआ कर सकता है। तुम्हारा क्या चला जायेगा अगर तुम किसी के दुःख को देखकर उसके भला होने की दुआ कर दो तो। अगर हम किसी की दुआ के लिए अपने हाथ उठा देंगे तो हमारे ठाकुर जी अपने सहस्त्रो हाथ उठाकर हमारी मदद करेंगे और हमको कभी भी असुरक्षा महशुश नहीं होगा। जब आप किसी को सुरक्षित करते है तो मेरे ठाकुर जी आपको सुरक्षित रखते है। जब हमको भगवान् का भोजन मिले तो हमको उस प्रसाद को ही भगवान् का आशीर्वाद समझकर ग्रहण कर लेना चाहिए। राधे राधे बोलना पड़ेगा !!

12Oct 2017

"जब हम भगवान की तरफ नहीं देखते है तब वो थोड़ी - थोड़ी मुसीबत भेजते है हमारे जीवन में।"

पूज्य महाराज श्री देवकीनंदन ठाकुर जी के सानिध्य में न्यू जर्सी, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के पंचम दिवस में श्रीमद भागवत कथा के महत्त्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने "दूर नगरी बड़ी दूर नगरी, कैसे आऊं रे सांवरिया कैसे आऊं रे मनवसिया तेरी गोकुल नगरी" भजन से कथा प्रारम्भ की। महाराज श्री ने कहा की हमारे इष्टदेव यानि की ठाकुर जी ही हम सब को इस संसार रुपी दलदल से सदा के लिए निकाल सकते हैं। यही है जो हमको इस मोहमाया के चंगुल से सदा के लिए आज़ाद कर सकते है। लेकिन आज का इंसान अनजाने में ही कई बार हम सब से एक प्रश्न करता है की जब भगवान हर जगह है तो इतने मंदिरों की क्या जरुरत है। इस पर स्वामी विवेकानंद जी ने बड़ा ही सुन्दर सा जबाव दिया है कि हवा चारो तरफ है लेकिन उस हवा को महसूस करने के लिए हमें कूलर, पंखा की जरुरत होती है। इसके लिए महाराज श्री ने एक दृष्टांत सुनाया कि एक जगह एक बिल्डिंग का निर्माण हो रहा था। सुपरवाइजर था बिल्डिंग के सबसे ऊपर और सभी मजदूर नीचे काम कर रहे थे। तब उस सुपरवाइजर को किसी मजदूर से जरुरी काम पड़ा। जिस मजदूर से उसे काम था उसने उसे आवाज दी लेकिन नीचे काफी होने के कारण किसी ने आवाज नहीं सुनी। तब उसने एक दस रूपये का नोट नीचे फैका। लेकिन मजदूर ने वो दस का नोट उठाया और अपनी जेब में रख लिया और दोबारा काम करने लगा। फिर उस सुपरवाइजर ने पांच सौ का नोट नीचे की तरफ फैका। लेकिन मजदूर ने उस पांच सौ के नोट को भी उठाया और फिर से काम करने लग गया। उसने फिर भी ऊपर की तरफ नहीं देखा। अब सुपरवाइजर ने वहां से अबकी बार एक छोटा सा पत्थर उठाया और उस मजदूर के सर पर दे मारा। अब उस मजदूर ने ऊपर की तरफ देखा कि ये पत्थर आया कहाँ से है? तब उस मजदूर की सुपरवाइजर से वार्ता शुरू हो गयी। ठीक वैसी ही स्थति हमारे जीवन में होती है। जब हमको छोटी-छोटी खुशियां मिलती है तो हम उस भगवान की तरफ देखते भी नहीं है। बड़ी ख़ुशी के वक़्त भी अगर हमको भगवान भी याद करता है तो भी हम अपने आप को बड़ा ही बिजी कर लेते है। जब हम भगवान की तरफ नहीं देखते है तब वो थोड़ी - थोड़ी मुसीबत भेजते है हमारे जीवन में। यहाँ पर गुरु नानकदेव जी ने एक बड़ी अच्छी बात लिखी है कि "जब हमारे जीवन में छोटी - छोटी मुसीबत आती है तब ही हमें इनकी याद आती है"। लेकिन यदि हम इनको अपने सुखी दिनों में याद करेंगे तो दुःख तो कभी आएगा ही नहीं हमारे जीवन में। उनका कहना ये है की सुखी दिनों में हम उनकी तरफ देखते भी नहीं लेकिन जब दुःख आता है तो हमको उनके सिवा कुछ दिखता भी है। इसलिए तो महाराज श्री ने कहा है कि हमको उस बुरे वक़्त का इंतज़ार नहीं करना चाहिए कि कब बुरा वक़्त आएगा और कब हम उसको याद करेंगे। इस थिंकिंग को हमको बदल देना चाहिए। अच्छे समय में ही इतने अच्छे काम कर लेना चाहिए कि बुरे समय में बुराई अपने आप ही चली जाये और ये तभी होगा जब हम अच्छे काम करेंगे। तभी हमारे सभी दुखड़ों को यानि दुखों को हमारे राम दूर कर देंगे। हमको तो अपने आत्म कल्याण के बारे में सोचना चाहिए। अपने बारे में सोचना चाहिए कि मैं कौन हूँ ये सोचना चाहिए। मैं कहाँ से आया हूँ ये भी सोचना चाहिए। हमारे वेदों में कर्म कांड का भी वर्णन मिलता है और वेदों में भक्ति का भी वर्णन मिलता है। तब महाराज श्री ने हमको बताया कि ज्ञानी तो इस संसार में पूर्णतया कोई आया ही नहीं है। हमको भगवान की भक्ति सदा ही करते रहना चाहिए। इसलिए तो हमको उस देव के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानना चाहिए। तभी तो हम अपने जीवन में सफल हो सकते है। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

12Oct 2017

"जब हम भगवान की तरफ नहीं देखते है तब वो थोड़ी - थोड़ी मुसीबत भेजते है हमारे जीवन में।"

पूज्य महाराज श्री देवकीनंदन ठाकुर जी के सानिध्य में न्यू जर्सी, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के पंचम दिवस में श्रीमद भागवत कथा के महत्त्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने "दूर नगरी बड़ी दूर नगरी, कैसे आऊं रे सांवरिया कैसे आऊं रे मनवसिया तेरी गोकुल नगरी" भजन से कथा प्रारम्भ की। महाराज श्री ने कहा की हमारे इष्टदेव यानि की ठाकुर जी ही हम सब को इस संसार रुपी दलदल से सदा के लिए निकाल सकते हैं। यही है जो हमको इस मोहमाया के चंगुल से सदा के लिए आज़ाद कर सकते है। लेकिन आज का इंसान अनजाने में ही कई बार हम सब से एक प्रश्न करता है की जब भगवान हर जगह है तो इतने मंदिरों की क्या जरुरत है। इस पर स्वामी विवेकानंद जी ने बड़ा ही सुन्दर सा जबाव दिया है कि हवा चारो तरफ है लेकिन उस हवा को महसूस करने के लिए हमें कूलर, पंखा की जरुरत होती है। इसके लिए महाराज श्री ने एक दृष्टांत सुनाया कि एक जगह एक बिल्डिंग का निर्माण हो रहा था। सुपरवाइजर था बिल्डिंग के सबसे ऊपर और सभी मजदूर नीचे काम कर रहे थे। तब उस सुपरवाइजर को किसी मजदूर से जरुरी काम पड़ा। जिस मजदूर से उसे काम था उसने उसे आवाज दी लेकिन नीचे काफी होने के कारण किसी ने आवाज नहीं सुनी। तब उसने एक दस रूपये का नोट नीचे फैका। लेकिन मजदूर ने वो दस का नोट उठाया और अपनी जेब में रख लिया और दोबारा काम करने लगा। फिर उस सुपरवाइजर ने पांच सौ का नोट नीचे की तरफ फैका। लेकिन मजदूर ने उस पांच सौ के नोट को भी उठाया और फिर से काम करने लग गया। उसने फिर भी ऊपर की तरफ नहीं देखा। अब सुपरवाइजर ने वहां से अबकी बार एक छोटा सा पत्थर उठाया और उस मजदूर के सर पर दे मारा। अब उस मजदूर ने ऊपर की तरफ देखा कि ये पत्थर आया कहाँ से है? तब उस मजदूर की सुपरवाइजर से वार्ता शुरू हो गयी। ठीक वैसी ही स्थति हमारे जीवन में होती है। जब हमको छोटी-छोटी खुशियां मिलती है तो हम उस भगवान की तरफ देखते भी नहीं है। बड़ी ख़ुशी के वक़्त भी अगर हमको भगवान भी याद करता है तो भी हम अपने आप को बड़ा ही बिजी कर लेते है। जब हम भगवान की तरफ नहीं देखते है तब वो थोड़ी - थोड़ी मुसीबत भेजते है हमारे जीवन में। यहाँ पर गुरु नानकदेव जी ने एक बड़ी अच्छी बात लिखी है कि "जब हमारे जीवन में छोटी - छोटी मुसीबत आती है तब ही हमें इनकी याद आती है"। लेकिन यदि हम इनको अपने सुखी दिनों में याद करेंगे तो दुःख तो कभी आएगा ही नहीं हमारे जीवन में। उनका कहना ये है की सुखी दिनों में हम उनकी तरफ देखते भी नहीं लेकिन जब दुःख आता है तो हमको उनके सिवा कुछ दिखता भी है। इसलिए तो महाराज श्री ने कहा है कि हमको उस बुरे वक़्त का इंतज़ार नहीं करना चाहिए कि कब बुरा वक़्त आएगा और कब हम उसको याद करेंगे। इस थिंकिंग को हमको बदल देना चाहिए। अच्छे समय में ही इतने अच्छे काम कर लेना चाहिए कि बुरे समय में बुराई अपने आप ही चली जाये और ये तभी होगा जब हम अच्छे काम करेंगे। तभी हमारे सभी दुखड़ों को यानि दुखों को हमारे राम दूर कर देंगे। हमको तो अपने आत्म कल्याण के बारे में सोचना चाहिए। अपने बारे में सोचना चाहिए कि मैं कौन हूँ ये सोचना चाहिए। मैं कहाँ से आया हूँ ये भी सोचना चाहिए। हमारे वेदों में कर्म कांड का भी वर्णन मिलता है और वेदों में भक्ति का भी वर्णन मिलता है। तब महाराज श्री ने हमको बताया कि ज्ञानी तो इस संसार में पूर्णतया कोई आया ही नहीं है। हमको भगवान की भक्ति सदा ही करते रहना चाहिए। इसलिए तो हमको उस देव के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानना चाहिए। तभी तो हम अपने जीवन में सफल हो सकते है। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

11Oct 2017

"सिर्फ सनातन धर्म ही ऐसा है जहां पर कन्याओं का पूजन होता है।"

पूज्य महाराज श्री देवकीनंदन ठाकुर जी के सानिध्य में न्यू जर्सी, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस में श्रीमद भागवत कथा के महत्त्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कहा कि एक भक्त को जिस तरह मैं और मेरा भगवान अधिक प्रिय लगता है। ठीक उसी तरह ही एक पत्नी को मैं और मेरा पति प्रिय लगता है। पुराने समय में जब किसी पत्नी का पति मर जाता था और तो वो भी अपने पति के साथ ही चिता में बैठ कर अपना शरीर त्याग देती थी। ऐसा ही एक प्रमाण तब देखने में आता है जब लक्ष्मण जी ने मेघनाथ जी का वध किया था। मेघनाथ की पत्नी सुलोचना जो शेषनाग की बेटी है और शेषनाग कौन है? वो तो लक्ष्मण जी है। सुलोचना ने अपने ससुर से कहा कि मुझे मेरे पति का सिर लाकर दो। तब रावण ने सुलोचना से कहा कि नहीं तुमको सती नहीं होना चाहिए और उसकी सास मंदोदरी भी सुलोचना से बोली कि नहीं तुम हमारी बेटी की तरह हो। तुमको पति के साथ सती नहीं होना चाहिए। लेकिन सुलोचना तो अपने वचन पर अडिग थी कि नहीं मुझे तो अपने पति के साथ ही सती होना है। सती होने के लिए मुझे मेरे पति का सिर चाहिए। लेकिन सिर तो राम के दल में था और वहां से सिर को लाएगा कौन? तब रावण ने सुलोचना से कहा कि मैं तो मेघनाथ का सिर मांगने नहीं जाऊंगा राम के दल में। तब सास मंदोदरी ने कहा कि अपने पति रावण की आज्ञा के बिना में भी नहीं जाउंगी। तब स्वयं सुलोचना ने राम के दल में जाने का फैसला किया वहां से मेघनाथ का सिर लाने के लिए। जब सबको पता चला कि मेघनाथ की पत्नी उसका सिर लेने के लिए आई है तो सब लोग वहां पर शांत खड़े हो गए। तब सुलोचना ने श्री राम से कहा कि मुझे मेरे पति का सिर चाहिए। तब श्री राम ने उनका सम्मान पूर्वक स्वागत किया और सम्मान पूर्वक ही मेघनाथ का सिर उनको सौप दिया। तब अपने पति का सिर लेकर सुलोचना जलती अग्नि में बैठकर अपने शरीर का त्याग कर देती है और अपने पति के साथ ही सती हो जाती है। हमारे शास्त्रों में ऐसा मानते है कि जो स्त्री अपने पति के साथ सती होती है तो वो हमेशा पति लोक में अपने पति के साथ ही वास करती है। फिर उसको इस धरती पर आने की जरुरत नहीं पड़ती है। पति व्रता पत्नी के सामने तो भगवान भी झुक जाते है। तब महाराज श्री ने करवा चौथ के बारे में भी बताया। महाराज श्री ने बताया कि स्त्रियां सोलह श्रृंगार कब करती है। अगर स्त्री टेंशन में होगी तो सोलह श्रृंगार नहीं कर सकती है। जब स्त्री खुश होगी तो ही वह सोलह श्रृंगार करती है। जब देवी खुश होगी तो ही हमारा घर स्वर्ग बन पाता है। इसीलिए तो कहते है कि जहाँ पर देवियों का सम्मान होता है वहां पर देवता वास करते है। सिर्फ सनातन धर्म ही ऐसा है जहां पर कन्याओं का पूजन होता है ,जहाँ पर देवियों का पूजन होता है। हमारे यहाँ पर कभी भी स्त्रियों का छोटा नहीं समझा गया है। हमारे यहां पर सदा से ही देवियों को पूजनीय समझा गया है। हमें ज्ञान चाहिए तो हमको सरस्वती देवी जी की पूजा करनी चाहिए। यदि हमें धन चाहिए तो हमको माता लक्ष्मी जी की पूजा करनी चाहिए। यदि हमको ताकत चाहिए तो हमको माता दुर्गा की पूजा करनी चाहिए। सब की सब ताकत तो हमारी देवियों के पास ही है ,हमारे पास क्या है? हमारे पास तो कुछ भी नहीं है। उदाहरण के तौर पर शादी के बाद देवियों को कहा जाता है देवी। लेकिन शादी के बाद पुरुष को देवता कभी भी नहीं कहा जाता है। तो यही स्त्री के सम्मान का एक प्रतिक है। स्त्रियां इन्ही कारणों से सम्मान का भाव रखती है और करवाचौथ के दिन पति की लम्बी उम्र के लिए व्रत रखती है और करवाचौथ का व्रत कार्तिक मास में होता है और कार्तिक मास में किया हुआ कोई भी सत कर्म हमको कई गुणा फल देता है। कार्तिक मास इन बारह मासों में से सबसे पवित्र मास माना गया है। और इसीलिए कार्तिक मास में ही करवा चौथ का व्रत है। कार्तिक मास में एक प्रसंग का बहुत ही महत्व है गजेंद्र मोक्ष। हम सब को गजेंद्र मोक्ष अवश्य सुनना चाहिए। जो कार्तिक मास में गजेंद्र मोक्ष सुनते है उनको बहुत ही बड़ा फल मिलता है। आप को जानना चाहिए कि भगवान आपके कितने पास है, करीब है, ये सब हमको जानना चाहिए। हमारी बुद्धि तब बहुत ही छोटी होती है जब हम कहते है कि हम भगवान से बहुत ही दूर है। भगवान हमारी नहीं सुनता है। लेकिन ये गलत है कि जितनी जल्दी भगवान हमारी सुनता है और कोई हमारी नहीं सुनता है। जब हम कोई छोटी समस्या में फस जाते है तो हम और दूसरों को याद करते है। लेकिन जब हम किसी बड़ी समस्या में फस जाते है तो हम केवल और केवल भगवान को ही याद करते है। हम सब को पता होता है कि इस समस्या में केवल भगवान ही हमारी मदद कर सकते है। जब सबसे बड़ी समस्या हमारे जीवन में आती है तो तब हमको सिर्फ उस भगवान की ही याद आती है। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

8Oct 2017

" कार्तिक मास में पूजा का फल कई गुना मिलता है "

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में न्यू जर्सी, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस में श्रीमद भागवत कथा के महत्त्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कथा प्रारम्भ करते हुए कहा की लोगों का भागवत सुनना इतना आसान नहीं है। वो भी इस मास में, इस मास में व्यक्ति जो भी कार्य करता है तो इसका फल उसको कई गुना लगता है। ये समय काफी पवित्र होता है। महाराज श्री ने कहा कि इस संसार में हमको जो कुछ भी मिलता है वो सब हमें उस ठाकुर की कृपा से ही मिलता है। इसके बाद महाराज श्री ने "हमारो धन राधा श्री राधा श्री राधा, जीवन धन राधा श्री राधा श्री राधा" भजन भक्तों को श्रवण कराया। जिस प्रकार से राधा रानी का कृष्ण के प्रति सच्चा प्रेम है उसी तरह से हमको भी अपने साथी से सच्चा प्रेम करना चाहिए। हमारे जीवन में तीन ताप होते है दैहिक, दैविक और भौतिक। सुख हो या दुःख तीनों तीन प्रकार के होते है। चाहे शारीरिक सुख हो या शारीरिक दुःख हो, चाहे भौतिक सुख हो या भौतिक दुःख हो, चाहे दैविक सुख हो या दैविक दुःख। तीनो प्रकार के ताप व्यक्ति को सुख भी देते है और दुःख भी देते है। पर इनकी उत्पत्ति करने वाले कौन है? इनका पालन करने वाले कौन है? इनका संहार करने वाले कौन है? ऐसे सचिदानंद को हम कोटि-कोटि नमन करते है। कहते है ऐसे सचिदानंद श्री कृष्ण को जो नमन करते है उनको ये तीनो ताप नहीं सताते है। फिर भगवान इनको अपना लेते है। जिनको कोई अपना ले तो उनका फेवर तो भगवान को भी करना पड़ता है। इसलिए भगवान से उस चीज को मत मांगो जिसका दोबारा मन ही न करे उसे छोड़ने का, लेकिन छोड़ना तो पड़ेगा ही। एक न एक दिन हर वस्तु का आखिरी दिन तो आता ही है। समय का तो पता है नहीं होता है वह किसी से कहकर तो आता ही नहीं है। ये नहीं होता है कि यदि तुम आज अच्छे हो तो कल भी आप अच्छे ही रहोगे। इस जिंदगी का कोई भी भरोसा ही नहीं है। ये मत सोचना की मौत आने के लिए बुढ़ापा ही जरुरी है। कई बुजुर्ग ऐसे भी है जो मौत मांगते है पर उनको मौत आती ही नहीं है। मौत के लिए अगर कुछ आवश्यक है तो वो है आपका जन्म। जन्म के लिए ये आवश्यक नहीं है की आप इस धरती पर भी आये अगर आप माँ के गर्भ में भी आ गए है तो भी आपकी मृत्यु हो सकती है। वो कभी भी हो सकती है उसकी कोई लिमिट नहीं है, कोई सीमा नहीं है, कोई भी कानून नहीं है। तो जिस दिन हमारी मृत्यु आती है उस दिन तो हमें छोड़के जाना ही पड़ेगा। कार्तिक महीने को सब लोग बहुत ही पवित्र मानते है तो इस पवित्र महीने में हमको श्रीमद भागवत कथा को सुनना चाहिए।जब हम इन सातों दिनों में अगर श्रीमद भागवत कथा को सुनेगे तो इसके फलस्वरूप में हम जो भी फल मांगेंगे तो वो हमको जरूर ही मिल जायेगा। अगर कथा सुनकर दरिद्र से दरिद्र भी अपने लिए धन मांगेगा तो उसको धन भी मिल जायेगा। पापी को निष्पाप कर देते है, रोगी को निरोगी कर देते है। जिनके अगर संतान नहीं होती है तो उसको संतान दे देते है। जिन व्यक्तियों के पास सब कुछ हो और उसे भगवान से कुछ नहीं चाहिए होता है तो फिर भी भगवान उस को मोक्ष दे देता है। अगर हम भगवान से कहे की आप मुझसे धन दौलत ले ले और मुझे आप मोक्ष दे दो तो क्या भगवान हमें मोक्ष देंगे? तो क्या इस पर भगवान हमको मोक्ष देंगे क्या? बिलकुल भी नहीं देंगे। तो इस पर भगवान हमको वहां से चले जाने को कहेंगे और जो ये तुम मुझे देने की बात कह रहे हो वो सब भी तो मेरा ही है। जो मैंने तुझे इस संसार में भेजा है कि जा और तू कुछ सीख ले इस धरती पर जाकर। जो ये तू कहता है की ये मेरा है पर ये तेरा नहीं ये तो मेरा ही है। इस पर भी भगवान हमको मोक्ष नहीं देते है। और उस व्यक्ति को मोक्ष दे देते है जो मात्र इन सात दिनों में श्रीमद भागवत कथा को सुनते है। उस भागवत को सुनाने से बिना मांगे ही वो सब कुछ मिल जाता है जो जन्म जन्म की तपस्या करने के बाद भी हमको नहीं मिलता है। बड़े बड़े ऋषि मुनि जो तरसते रहते है उस मोक्ष को पाने के लिए वो मात्र इन सात दिनों में भागवत कथा को सुनने से ही हमको मिल जाता है। सबसे शुद्ध अंतिम संस्कार भारतीय परंपरा का होता है। पांच तत्व से बना हुआ ये हमारा शरीर अंत में चिता पर जलने के बाद ही इन पांचों तत्वों में ही इसको समर्पित कर दिया जाता है। एक भी तत्व हमारे अंतिम संस्कार से वंचित नहीं रहता है। लेकिन आज के मनुष्य के पास इतना समय ही नहीं होता है कि वो भागवत कथा को सुने। लेकिन गन्दी जगह पर वही व्यक्ति बिना बुलाए ही चला जाता है और काफी पैसे खर्च करके आ जाता है। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

9Oct 2017

" प्रभु भक्ति के द्वारा ही हम इस संसार में अपने सभी कठिन कामों को भी आसानी से कर लेते है "

पूज्य महाराज श्री देवकीनंदन ठाकुर जी के सानिध्य में न्यू जर्सी, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस में संगति के महत्त्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने "मेरा कोई न सहारा बिन तेरे गोपाल सावरिया मेरे" भजन भक्तों को श्रवण कराया। इसके बाद महाराज श्री ने प्रभु भक्ति को बहुत ही जरुरी बताया है। इसी के द्वारा ही हम बड़ी से बड़ी विपदा से लड़ सकते है। प्रभु भक्ति के द्वारा ही हम इस संसार में अपने सभी कठिन कामों को भी आसानी से कर लेते है। इसीलिए से हमें को अपना सारा का सारा ध्यान ही प्रभु की भक्ति में लगा देना चाहिए। ताकि हम सब का ये पापी जीवन सुधर सके। जो व्यक्ति प्रभु की भक्ति नहीं करता है वह हर समय विपदाओं में घिरा रहता है। इस तरह की विपदा का केवल एक ही समाधान है और वो है प्रभु की भक्ति करना। इसलिए ही हमको प्रभु की भक्ति करना ही जरुरी बताया गया है। ये कार्तिक मास का पवित्र महीना चल रहा है। और इस समय में भागवत कथा का सुनना ऐसा होता है मानों हमने अमृत को पा लिया है। इन दिनों में कथा के सुनने से हमको मन वांछित फल मिल जाता है। इन दिनों में कथा के सुनने मात्र से ही हमारे सभी पाप दूर हो जाते है। इस महीने में कथा सुनने से हम सब को उस मोक्ष की प्राप्ति होती है जिसके लिए बड़े-बड़े ऋषि मुनि वन में हज़ारों वर्षो तक तपस्या करते रहते है लेकिन फिर भी उनको मोक्ष नहीं मिलता है। कानो से जो भी पान किया जाता है वो निकलता नहीं है। घाव तो एक बार की गोली से भर भी जाता है लेकिन जो हमारी बोली होती है उसका हमारे जीवन में बहुत ही बड़ा असर पड़ता है। जब हम किसी के द्वारा कुछ अच्छा सुनते है तो उसका हमारे जीवन में अच्छा ही असर पड़ता है। और हमारे जीवन में अनेक तरह के परिवर्तन आने लग जाते है। हमारा जीवन सब समस्याओं से छुटकारा पा लेता है। इसलिए ही केवल श्रवण मात्र से ही हमारे जीवन में सब कुछ बदल सकता है। जब हमारे बच्चे कोई भजन या कथा को सुनते है तो उनके जीवन में उसका बहुत ही अच्छा प्रभाव पड़ता है। जब भी हम किसी को कुछ भला बुरा बोलते है तो उसका असर भी तो हमारे जीवन में ही पड़ता है। अगर हम कुछ बार बोलेंगे तो उसका बुरा असर ही हमारे जीवन में पड़ेगा। और यदि हम कुछ अच्छा बोलेंगे तो कुछ अच्छा असर ही पड़ेगा हमारे जीवन में। इसलिए तो कहते है कि आप जैसा बोलोगे तो जनता भी आपसे वैसा ही व्यवहार करती है। इसलिए तो हमारे ऋषि मुनियों ने हमसे कहा है कि जीवन में बुरे लोगों का संग मत करो। सदा ही अच्छे लोगो का संग करो। बुरे लोगों का संग तो हमारे जीवन को पूरी तरह ही बिगाड़ देते है। इसलिए तो कहा है की हमको इन व्यक्तियों का संग कभी भी नहीं करना चाहिए। इसलिए तो कहा है कि जो विष है वो सिंह की मूछों में रहता है और शर्प के मस्तिष्क में विष रहता है। बिच्छू की पूंछ में विष रहता है। लेकिन दुर्जन व्यक्ति के तो हर अंग में विष रहता है। इसलिए तो कहते है कि न तो बुरे लोगों के साथ व्यापार करना चाहिए, न उठना-बैठना चाहिए, न आना-जाना चाहिए। हमको तो ऐसी संगति को सदा के लिए ही त्याग देना चाहिए। हमलोगों ने हमारे ऋषि मुनियों के कथन को इग्नोर किया है इसलिए ही तो हम सब ज्यादा अपसेट होते है। इसलिए ही हम ज्यादा परेशान रहते है। हमारी जिंदगी में कुछ ज्यादा ही स्ट्रगल रहता है, होता तो सब कुछ है हमारी जिंदगी में पर हम संतुष्ट नहीं होते है अपने जीवन में, क्योँकि हम सब लोगों का संग अच्छा नहीं होता है। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

10Oct 2017

" भारतीय परंपरा में महाराज श्री ने 16 शृंगार के वैज्ञानिक महत्व के बारे में बताया "

पूज्य महाराज श्री देवकीनंदन ठाकुर जी के सानिध्य में न्यू जर्सी, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस में करवाचौथ के महत्त्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। आज की कथा प्रारम्भ करने से पहले पूज्य महाराज श्री ने सभी माताओं, बहनों को करवाचौथ की शुभकामनायें दी व ठा. प्रियाकांत जू भगवान से उनके सुहाग के चिरायु होने की मंगल कामना भी की। महाराज श्री ने सभी माताओं और बहनो को बताया की आज के दिन 16 श्रृंगार अवश्य करना चाहिए। साथ ये भी बताया की एक विवाहित स्त्री को 16 श्रृंगार तब करना चाहिए जब उसका पति साथ हो और एक भक्त को जब उसका ठाकुर साथ हो। महाराज श्री ने कथा में 16 शृंगार का वैज्ञानिक महत्त्व भी बताया की आखिर भारतीय परंपरा में किस कारण स्त्री ये 16 शृंगार करती है। भारतीय संस्कृति ही एक मात्र ऐसी संस्कृति है जहाँ स्त्रियां अपनी मांग में सिंदूर लगाती है, सिंदूर लगाने का वैज्ञानिक महत्व यह है की इसमें पारे की मात्रा होती है जो स्त्रियों में विध्यमान विधुत शक्ति को नियंत्रित करने का कार्य करती है। बिंदी- महिलाये अपनी दोनों भौहों के बीच में इसलिए लगाती है, क्योंकि इस स्थान पर मनुष्य का आज्ञाचक्र स्थित होता है जब हम प्रति दिन इस स्थान पर बिंदी लगाते है तो स्त्रियों की आध्यात्मिक शक्ति जाग्रत होती है। इसी प्रकार काजल लगाने से मताये, बहनें दूसरों की बुरी नज़र से अपने को सुरक्षित करती है। महिलाये जो चूड़ियाँ पहनती है उससे उनके मन की चंचलता दर्शन होता है, क्योकि हम अपने पति के सामने जिस चंचलता का व्यवहार कर सकते है उसी प्रकार का व्यवहार हम समाज में अन्य किसी के समक्ष नहीं करते। यह नियंत्रण हमें चूड़ियों से मिलता है। कंगन हमें ममत्व प्रदान करता है। जो फूलों का गजरा माताएं अपने बालों में लगाती है वो प्रतिपल हमारे मन में स्फूर्ति का प्रदर्शन करता है। बाजूबंद पहने से मासपेशियां एवं हड्डियों पर नियंत्रण बना रहता है। महिलाएं जो पायल और घुँघरू पहनती है वह हमारे घर में सुख व शांति का दर्शन कराती है क्योकि लक्ष्मी के साथ साथ घर में शांति का होना अत्यंत आवश्यक है। इसी प्रकार मेंहदी लगाने से रक्तचाप पर नियंत्रण होता है और माताओं का रक्तचाप नियंत्रित रहना घर व घरवालों के लिए कितना आवश्यक है ये आप सभी जाते हैं। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

10Oct 2017

" भारतीय परंपरा में महाराज श्री ने 16 शृंगार के वैज्ञानिक महत्व के बारे में बताया "

पूज्य महाराज श्री देवकीनंदन ठाकुर जी के सानिध्य में न्यू जर्सी, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस में करवाचौथ के महत्त्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। आज की कथा प्रारम्भ करने से पहले पूज्य महाराज श्री ने सभी माताओं, बहनों को करवाचौथ की शुभकामनायें दी व ठा. प्रियाकांत जू भगवान से उनके सुहाग के चिरायु होने की मंगल कामना भी की। महाराज श्री ने सभी माताओं और बहनो को बताया की आज के दिन 16 श्रृंगार अवश्य करना चाहिए। साथ ये भी बताया की एक विवाहित स्त्री को 16 श्रृंगार तब करना चाहिए जब उसका पति साथ हो और एक भक्त को जब उसका ठाकुर साथ हो। महाराज श्री ने कथा में 16 शृंगार का वैज्ञानिक महत्त्व भी बताया की आखिर भारतीय परंपरा में किस कारण स्त्री ये 16 शृंगार करती है। भारतीय संस्कृति ही एक मात्र ऐसी संस्कृति है जहाँ स्त्रियां अपनी मांग में सिंदूर लगाती है, सिंदूर लगाने का वैज्ञानिक महत्व यह है की इसमें पारे की मात्रा होती है जो स्त्रियों में विध्यमान विधुत शक्ति को नियंत्रित करने का कार्य करती है। बिंदी- महिलाये अपनी दोनों भौहों के बीच में इसलिए लगाती है, क्योंकि इस स्थान पर मनुष्य का आज्ञाचक्र स्थित होता है जब हम प्रति दिन इस स्थान पर बिंदी लगाते है तो स्त्रियों की आध्यात्मिक शक्ति जाग्रत होती है। इसी प्रकार काजल लगाने से मताये, बहनें दूसरों की बुरी नज़र से अपने को सुरक्षित करती है। महिलाये जो चूड़ियाँ पहनती है उससे उनके मन की चंचलता दर्शन होता है, क्योकि हम अपने पति के सामने जिस चंचलता का व्यवहार कर सकते है उसी प्रकार का व्यवहार हम समाज में अन्य किसी के समक्ष नहीं करते। यह नियंत्रण हमें चूड़ियों से मिलता है। कंगन हमें ममत्व प्रदान करता है। जो फूलों का गजरा माताएं अपने बालों में लगाती है वो प्रतिपल हमारे मन में स्फूर्ति का प्रदर्शन करता है। बाजूबंद पहने से मासपेशियां एवं हड्डियों पर नियंत्रण बना रहता है। महिलाएं जो पायल और घुँघरू पहनती है वह हमारे घर में सुख व शांति का दर्शन कराती है क्योकि लक्ष्मी के साथ साथ घर में शांति का होना अत्यंत आवश्यक है। इसी प्रकार मेंहदी लगाने से रक्तचाप पर नियंत्रण होता है और माताओं का रक्तचाप नियंत्रित रहना घर व घरवालों के लिए कितना आवश्यक है ये आप सभी जाते हैं। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

7Oct 2017

"भगवान की कृपा कोई चीज़ नहीं है जो बाज़ार से खरीदी जा सके।"

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में शिकागो, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के सप्तम दिवस में भक्ति कैसे की जाए उसका वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने सातवें दिन की कथा प्रारम्भ करने से पहले बताया कि आज शरद पूर्णिमा है और आज ही के दिन भगवान श्री कृष्ण ने वृंदावन में रास किया था। आज के दिन किये हुए हर कार्य पूर्ण होते है। वो कभी भी अपूर्ण यानि की अधुरे हि नहीं रह जाते है। आज के दिन हम जो भी कार्य करते है वही हमें पूर्णता की और ले जाते है। आज शरद पूर्णिमा भी है और आज कथा का समापन भी हो जायेगा। तो आज तो श्री कृष्ण आपको छप्पर फाड़ के दे रहा है। इसके बाद महाराज श्री ने "मेरो प्यारों नन्दलाल किशोरी राधे, औ किशोरी राधे श्यामा राधे" भजन भक्तों से श्रवण कराया। जो व्यक्ति भगवान की भक्ति नहीं करता है वह इस संसार के कष्टों में ही उलझ कर रह जाता है। इसलिए हमको भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए सदैव ही अपने प्रभु की भक्ति में लगे रहना चाहिए। सत्संग जीव को और जीव के विचारों को पवित्र करता है। भागवत जैसा ग्रन्थ जीव का हर प्रकार से उद्धार भी करता है। लेकिन कई बार बहुत से लोग हमको मिल जाते है और कहते है कि हमने तो भागवत कथा सुनी थी लेकिन हमको तो इसका कोई भी लाभ नहीं हुआ है। हमको भगवान के दर्शन नहीं हुए है सब लोगों को भगवान् के दर्शन हो गए है। ऐसा हमारे साथ ही क्योँ होता है? क्या कभी ऐसा हो सकता है कि भगवान सब पर अपनी कृपा करे और केवल आप पर ही ना करे? भगवान तो हमेशा ही हम पर कृपा करते है, बस सच बताइए कि क्या हमको भगवान की कृपा लेना आता है? कृपा कोई बाज़ार से खरीदी नहीं जा सकती है। कृपा अगर पानी है तो हमें उसके लायक बनना पड़ता है। फिर महाराज श्री ने एक दृष्टांत सुनाया और कहा कि एक बार मिटटी का मटका रूठ गया देवराज इंद्र से की इस संसार में मैं ही आपको सबसे बड़ा शत्रु दीखता हूँ। तब लोगों ने उससे पूछा कि तुम ऐसा क्योँ सोचते हो। तब मटका बोला कि सोचता नहीं मैंने एक्सपीरियंस किया हुआ है। तब मटका बोला की पुरे शहर में बारिश हो जाती है लेकिन मुझे तो महसूस ही नहीं हो पाती है। तब इंद्र बोले कि ऐसा तो नहीं है कि बारिश एक व्यक्ति को छोड़ कर बाकि के सब पर हो रही है। जब आकाश से बारिश की बुँदे गिरती है तो हम सब पर समान रूप से गिरती है। जब भी बारिश होती है तो किसी भी स्थान को छोड़ती नहीं है। तब मटका इंद्र से बोला कि नहीं हमारे ऊपर तो बारिश नहीं होती है। अगर बारिश हम पर होती तो हम भर नहीं जाते। हम तो खाली ही है,हम भरे नहीं है। तब इंद्र देव बोले की मुझे एक बात समझ नहीं आई है कि सब कहते है कि बारिश हुई है पर ये कहता है कि मुझ पर तो बारिश हुई ही नहीं है। जब उस मटके के पास जाकर देखा जहाँ पर वह रखा हुआ है तो कसूर इसमें बारिश का नहीं था उस मटके का ही था। क्योँकि वहां पर बारिश तो हुई थी पर वह मटका उल्टा रखा हुआ था। इस पर इंद्र देव ने उस मटके से कहा कि अब यदि तुम उलटे रखे हो तो तुममे पानी कैसे भरेगा। अगर तुम सीधे रखे होते तो तुममे पानी भी भरता। वैसा ही आज का मनुष्य या प्राणी है जो कहता है कि भगवान हम पर अपनी कृपा नहीं करते है। अगर तुम उलटे लटके हुए हो तो भगवान की कृपा तुमपर आएगी कहाँ से। तुम अगर चाहते हो कि तुम पर भगवान की कृपा हो तो तुम पहले सीधे तो हो जाओ। लेकिन हम सब इस बात को समझाना ही नहीं चाहते है। आप एक बात बताओ कि अगर भगवान की हम पर कृपा नहीं होती तो हमको ये मानव शरीर मिलता कैसे। भगवान की कृपा का हमारे पास प्रत्यक्ष प्रमाण है और वो है हमारा मानव जीवन। लेकिन भगवत कथा के द्वारा मिला ज्ञान हमको जन्म जन्मांतर तक काम आता है। भगवान की कृपा को संभालना सीखो। फिर इसके बाद महाराज श्री ने बताया कि कल आपने सुना था कि भगवान श्री कृष्ण ने रुक्मणि जी से विवाह किया। तो श्री कृष्ण ने सोलह हज़ार एक सौ आठ विवाह किये थे। तब एक व्यक्ति ने उनसे प्रश्न किया कि ये कैसे भगवान है जिन्होंने इतने विवाह किये है। एक पत्नी के चक्कर में आकर हमने देश को छोड़ दिया है पैसे के लिए। हर स्त्रियों को स्वार्थ तो हो सकता है अपने पतियों से ,लेकिन उन रानियों को तो कोई भी स्वार्थ नहीं था उस गोविन्द से। अगर हम सब को उनका दर्शन मात्र ही हो जाये तो इसके बाद हमको तो किसी भी चीज की जरुरत ही नहीं होती है। वो जानती थी कि वो केवल हमारे ही पति नहीं है वो तो जगत के पति है। एकबार नारद ने सोचा कि भगवन तो सबके साथ लीलाए करते है। वो सोचने लगे कि क्या लीला की जाए ,तब उन्होंने सोचा कि इनके घर में थोड़ी लड़ाई की जाए। तब नारद ने सोचा कि जिस भी पत्नी के पास कृष्ण नहीं होंगे तो मैं वहीँ पर लड़ाई का बीज बोऊँगा। देखो वो तो उन्ही से प्रेम करते है ,उन्ही के पास बैठे है। तुमसे तो प्रेम करते ही नहीं है ,तुमहारे पास तो वो आते ही नहीं है। तुम यही पर बैठी रहो ,उनका इंतज़ार करती रहो। तब इसके बाद नारद जिस भी महल में गए तो वहां पर उनको श्री कृष्ण जी मिले। वहां पर ऐसा कोई भी महल नहीं था जहाँ पर श्री कृष्ण नहीं थे। हर एक महल में श्री कृष्ण है ये तो इस भगवत्ता का प्रमाण है। यहाँ पर उन्होंने सोचा कि एक साधारण सा इंसान एक समय में हर जगह पर मौजूद नहीं हो सकता है लेकिन श्री कृष्ण तो हर महल में मौजूद थे। तो अनेको अनेक इच्छाओं से उनकी पूर्ति कर रहे है। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

6Oct 2017

"मनुष्य को अभिमान नहीं करना चाहिए क्योंकि अभिमान ही सब दुखों की जड़ है "

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में शिकागो, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठम दिवस में भगवान की लीलाओं का सुन्दर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कथा प्रारम्भ करते हुए कहा की भगवान गोविन्द जी को सदैव याद करना चाहिए क्योंकि वो ही है जो हमें इस पापी संसार से मुक्ति दिला सकते है। वो ही है जो इस मतलबी संसार में हमारी हर समस्या से रक्षा कर सकते है। भगवान की इस पवित्र रचना को हम नमन करते है। मेरे ठाकुर जी की ये जो रचना है वो बड़ी ही सूंदर और आनंददायक है। जिसकी कल्पना भी हम लोग नहीं कर सकते है। जब मेरे ठाकुर जी ने इतनी सूंदर सृष्टि की रचना की है तो हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते है कि इतनी सूंदर सृष्टि की रचना करने वाले मेरे ठाकुर का रूप कैसा होगा? इस बारे में जरा सा सोच कर तो देखिये। इसके बाद महाराज श्री ने "नाम तुम्हारा तारणहारा जाने कब दर्शन होगा, तेरी रचना इतनी सूंदर तू कितना सूंदर होगा" भजन भक्तों को श्रवण कराया। तभी तो हम सब के मन में अपने प्रभु के प्रति इतनी आस्था का विचार आएगा और हम अपने इष्टदेव की पूजा में लग जायेंगे। महाराज श्री ने कहा कि हम लोगों को सदा ही शांतिपूर्ण ढंग से जीवन जीने की चाह होती है। हम सभी को शांति, सुख और समृद्धि चाहिए होती है। लेकिन कभी-कभी ऐसा होता है की हम लोग चाहते कुछ और है और होता कुछ और है। शान्तिपूर्ण जीवन या जिंदगी जीने के लिए कुछ कर्म होते है जो हमको करने चाहिए। हमारे यहाँ पर सदा ही दो चीजों का सिद्धांत होता है जिसका हमारे बड़े बुजुर्ग बड़ा ही ध्यान रखा करते थे। वो दो चीजों का बड़ा ही ध्यान रखा करते थे एक तो खाने का और दूसरा पीने का। वो लोग भोजन का भी बड़ा ध्यान रखते थे कि कुछ गलत सलत न खा ले। जल पीने का भी बड़ा ध्यान रखते थे कि कुछ गलत सलत न पी ले। यहाँ पर हमें जैसे ही जल आये तो उसे चरणामृत समझना चाहिए और जैसे ही भोजन आये तो उसको भगवान का प्रसाद समझाना चाहिए। ये जो आपके द्वारा दिया हुआ जल है और ये जो आपके द्वारा दिया हुआ भोजन है इसको मैं ग्रहण कर रहा हूँ। इन सब को मैं आपका प्रसाद समझकर ग्रहण कर रहा हूँ तो इसके बदले आप मेरे मन में सदा ही अच्छे विचार देना और मेरा मन सदा ही शुद्ध रखना। इसके बदले आप मुझे अपनी शक्ति देना ,आप इसमें मुझे अपनी कृपा देना, इसमें आप मुझे अपनी भक्ति देना, इसमें आप मुझे अपने अच्छे विचार देना। यही प्रार्थना हमको हर बार जलपान और भोजन ग्रहण करते समय करनी चाहिए। कई बार हम सब लोग ऐसा कर बैठते है जिसकी कल्पना भी हम लोग नहीं कर सकते है। हमारी पति से लड़ाई हो गयी है या पत्नी से लड़ाई हो गयी है। अब वो मुझसे बात करेगी या नहीं, या हमेशा रूठी ही रहेगी। ऐसी नकारात्मक चीजे केवल उस भोजन से ही हमारे अंदर आते है जो हम करते है। जो जल हम पीते है उसके अंदर से ही हमारे अंदर ये नकारात्मक विचार आते है। हम बिना किसी भोग लगाए ही सब कुछ ग्रहण किये जा रहे है जो हमको नहीं करना चाहिए। हम जब भी कुछ खाते है या कुछ पीते है तो सबसे पहले भगवान को भोग लगा देना चाहिए। इस सब में केवल थोड़ा सा समय ही तो लगता है। थोड़ा सा समय निकाल कर हमको आँखे बंद करके भगवान का ध्यान करना चाहिए। सदैव हमसब को सकारात्मक होकर काम करना चाहिए। जैसे की यदि हमारी अपने पति या पत्नी से लड़ाई भी हो गयी है तो उसको ठन्डे दिमाग से बैठा कर उसके लिए थोड़ा सा पानी लेकर आना चाहिए और एक लौटे में जल लेकर आइये और भगवान से कहिये की हे भगवान इस जल में आप अपनी पावर डाल दीजिये। जैसे ही आप वो जल अपने पति या पत्नी को पिलाएंगे तो पांच मिनट के अंदर ही हमारे घर का माहौल ठीक होने लग जायेगा। श्री कृष्ण भगवान ब्रज में अनेकों लीला करते है। उन्ही लीलाओं में से कल आपने गिरिराज महाराज की लीला को सुना था। भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत इसलिए उठाया था क्योंकि एक तो ब्रजवासियों से पूजा करवानी थी बिना बताए की मैं भी भगवान हूँ। दूसरा कारण यह था कि इंद्र को अभिमान हो गया था कि मैं देवराज इंद्र हूँ और भगवान को अभिमान ही पसंद नहीं है। सब कुछ भगवान सहन कर लेते है केवल अभिमान ही सहन नहीं कर सकते है। कई लोगों को अपने पैसे का अभिमान बहुत ही होता है। किसी को अपने बहुत ही बड़े पद का अभिमान बहुत ही होता है। कई लोगों को तो अपनी भक्ति का भी अभिमान बहुत ही होता है। नारद जी को तो इस बात का अभिमान बहुत था कि मैंने काम और क्रोध को जीत लिया है। तो नारद जी भगवान से कह था कि मैंने अपनी कृपा से कामदेव को जीत लिया है। पर भगवान केवल वाणी पर ही नहीं जाते है वो तो सीधे भीतर ही जाते है कि अंदर चल क्या रहा है। यहां पर मेरे प्रभु की पहुंच केवल थोड़ी जगह तक ही सीमित नहीं है, उनकी पहुँच तो हमारे अंदर तक है। कि हमारे अंदर चल क्या रहा है। ऐसा कुछ नहीं है जो मेरे प्रभु जानते न हो। जब नारद ने कह की मैंने ही काम को जीता है तो इस बात में भी उनका घमंड साफ़ झलक रहा था। तो इस पर भगवान ने उनको बन्दर बना दिया। तो इस पर भगवान नारद जी का धैर्य जांचने के लिए योग माया को कहा की तुम एक सूंदर स्त्री का रूप धारण करके नारद के पास जाना। तुम इतनी सूंदर बनना कि नारद जी के मन में शादी की इच्छा जग जाये। जब नारद जी ने मोहनी बनी स्त्री को देखा तो देखता ही रह गया। तो उसी समय नारद ने सोचा की अभी तो ये कन्या भी कुंवारी है और अभी तक तो मैं भी कुंवारा हूँ। पर मेरे साथ तो एक समस्या है कि मुझसे शादी करेगा कौन? क्योँकि मैं तो एक ब्रह्मचारी हूँ और ये तो एक राजकुमारी है। तब भगवान के पास नारद जी दौड़े-दौड़े गए और कहने लगे कि आप मुझको अपना रूप दे दो। नारद जी भगवान से कह रहे है कि आप वो ही करना जिसमें मेरा हित हो। आपको तो तुरंत ही ये सब कर देना चाहिए क्योँकि मैं तो आपका दास हूँ। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

5Oct 2017

"आप जैसा भी और जिसका भी संग करोगे तो उसका रंग एक न एक दिन आप पर जरूर ही चढ़ जायेगा।"

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में शिकागो, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस में श्रीमद भागवत कथा के महत्त्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने "मीठों रस से भरों री राधा रानी लागे, महारानी लागे" भजन से आज की कथा प्रारम्भ की। महाराज श्री ने अपने प्रभु भक्ति को ही हम सभी के लिए जरुरी बताया। क्योँकि इस के द्वारा ही हम सभी अपने जीवन को सुधार सकते हैं। इस परमात्मा की भक्ति से ही हम हर पाप से मुक्ति पा सकते है। प्रभु भक्ति से ही हम हर समस्या का आसानी से हल निकाल सकते है हर विपदा को आसानी से पार कर सकते हैं। क्योँकि प्रभु भक्ति से ही हमें इतनी शक्ति मिल जाती है की हम इन समस्याओं को आसानी से दूर कर सकते है और जो लोग प्रभु की भक्ति नहीं करते है तो वो इन समस्याओं में उलझ कर ही रह जाते है। इन समस्याओं को दूर नहीं कर पाते है। यहाँ पर सबसे पहले महाराज श्री ने कथा शुरू करने से पहले एक समस्या के बारे में बताया। महाराज श्री ने कहा की कुछ लोगों ने मुझसे कहा कि महाराज मेरा भगवान के भजन में मन नहीं लगता है। हम जब भी भजन करने को बैठते है तो हमारा ध्यान इधर-उधर भटकता रहता है, लेकिन प्रभु के भजन में ही हमारा मन नहीं लगता है। बैठते तो हम भजन करने के लिए है लेकिन हमारा मन ही कहीं और चला जाता है। महाराज श्री ने कहा की हमारे मन में जितनी भी समस्याएं होती है वो उसी वक़्त ही आती है जब हम भजन करने के लिए बैठते है। यह समस्या हम सभी को होती है। इस समस्या के समाधान के लिए भगवान ने हमें समाधान तो बताया है पर हम उस समाधान को करना नहीं चाहते है। जब तक हम उस समस्या का समाधान करेंगे नहीं तब तक उस का समाधान होगा ही नहीं। हमको कोई न कोई समस्या होती है तो इसके लिए हम कुछ न कुछ समाधान करने की कोशिश तो करते ही है। लेकिन जब हमारा भगवान के भजन में मन नहीं लगता है तो इस समस्या का समाधान हम करना ही नहीं चाहते है। नहीं लगता है तो नहीं लगता, बैठे है तो बैठे है, कुछ भी करने का प्रयास ही नहीं करते है। जब भी हम इस समस्या का समाधान ढूंढेंगे तो इस समस्या का समाधान हमको जरूर ही मिल जायेगा। इस समस्या के समाधान के लिए भगवान ने हमें अच्छे संतो के संग करने को कहा है। हमको उन संतों का संग करना चाहिए जिनका मन पहले से ही भगवान में लगा हुआ है। जिनका मन अगर भगवान में लगा हुआ है और हमें अपना मन उनमे लगा देना चाहिए तो निश्चित तौर पर एक दिन उनके माध्यम से हमारा मन भगवान में जरूर ही लग जायेगा। तब किसी ने महाराज से कहा कि महाराज हम इस बात पर यकीन कैसे करे कि आप जो भी बात कह रहे है वो बात सही है? इसके लिए महाराज श्री ने एक उदाहरण दिया। जब हमारे घरों में गैस सिलेंडर नहीं हुआ करते थे तो लोग या हमारी माताएं जंगलों में जाकर के लकड़ियां लाती थी और भोजन का प्रबंध करती थी। बारिश के दिनों में माताएं जंगल में लकड़ी लेने के लिए गई। माताएं जहाँ-जहाँ से लकड़ियां बीन रही थी तो वो सभी की सभी गीली पड़ी थी। तो अब ये बताइये की जब हम इन सभी गीली लकड़ियों को चूल्हे में लगा देंगे तो आग जलेगी ही नहीं। क्योँकि वो सारी की सारी लकड़ी तो गीली पड़ी थी। इसके लिए हमें सबसे पहले एक सुखी लकड़ी कहीं से लेकर आनी है। सबसे पहले हमें उसमें आग लगानी है फिर उसकी सहायता से ही उन गीली लकड़ियों में भी आग लग जाएगी। तो ये जो हमारा मन है ये उस गीली लकड़ी के समान है ये भटकता ही रहता है। किसी संत का पका हुआ मन मिल जाये जो लगा है ठाकुर के चरणों में। हमें तो ऐसे ही संत का का संग करना चाहिए जिनके मन में तो सदा से ही गोविन्द बसते है। उनके द्वारा ही हम अपनी इस समस्या का समाधान कर सकते है। इसके बाद महाराज श्री ने एक और उदाहरण दिया की जब भी हम लोग अपने अपने संत या साधु का संग करते है ,चाहे वो कैसा भी क्योँ न हो? उसका असर हम पर पड़ता ही है। उदाहरण के तौर पर यदि हम किसी जुआरी का संग कर लेते है तो हमको भी उस जुआरी की आदत ही पड़ जाएगी। अगर हम किसी पोलिटिसियन का संग करेंगे तो उनके साथ रहते -रहते एक दिन हम भी राजनीतिज्ञ बन ही जायेंगे। जो आदमी शराब पीता हो अगर हम उसका संग करेंगे तो एक दिन हम भी शराब पीने लग जायेंगे। आप जैसा भी और जिसका भी संग करोगे तो उसका रंग एक न एक दिन आप पर जरूर ही चढ़ जायेगा। इसलिए हमको ऐसे संत का संग करना चाहिए जो प्रभु भक्ति में हमेशा ही लगा रहता है तो एक दिन हमारी भक्ति भी भगवान के प्रति परफेक्ट हो जाएगी और हमारा मन भी उस भगवान की भक्ति में हमेशा के लिए लग जायेगा। कभी भी वहां से हटेगा नहीं। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

5Oct 2017

"आप जैसा भी और जिसका भी संग करोगे तो उसका रंग एक न एक दिन आप पर जरूर ही चढ़ जायेगा।"

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में शिकागो, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस में श्रीमद भागवत कथा के महत्त्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने "मीठों रस से भरों री राधा रानी लागे, महारानी लागे" भजन से आज की कथा प्रारम्भ की। महाराज श्री ने अपने प्रभु भक्ति को ही हम सभी के लिए जरुरी बताया। क्योँकि इस के द्वारा ही हम सभी अपने जीवन को सुधार सकते हैं। इस परमात्मा की भक्ति से ही हम हर पाप से मुक्ति पा सकते है। प्रभु भक्ति से ही हम हर समस्या का आसानी से हल निकाल सकते है हर विपदा को आसानी से पार कर सकते हैं। क्योँकि प्रभु भक्ति से ही हमें इतनी शक्ति मिल जाती है की हम इन समस्याओं को आसानी से दूर कर सकते है और जो लोग प्रभु की भक्ति नहीं करते है तो वो इन समस्याओं में उलझ कर ही रह जाते है। इन समस्याओं को दूर नहीं कर पाते है। यहाँ पर सबसे पहले महाराज श्री ने कथा शुरू करने से पहले एक समस्या के बारे में बताया। महाराज श्री ने कहा की कुछ लोगों ने मुझसे कहा कि महाराज मेरा भगवान के भजन में मन नहीं लगता है। हम जब भी भजन करने को बैठते है तो हमारा ध्यान इधर-उधर भटकता रहता है, लेकिन प्रभु के भजन में ही हमारा मन नहीं लगता है। बैठते तो हम भजन करने के लिए है लेकिन हमारा मन ही कहीं और चला जाता है। महाराज श्री ने कहा की हमारे मन में जितनी भी समस्याएं होती है वो उसी वक़्त ही आती है जब हम भजन करने के लिए बैठते है। यह समस्या हम सभी को होती है। इस समस्या के समाधान के लिए भगवान ने हमें समाधान तो बताया है पर हम उस समाधान को करना नहीं चाहते है। जब तक हम उस समस्या का समाधान करेंगे नहीं तब तक उस का समाधान होगा ही नहीं। हमको कोई न कोई समस्या होती है तो इसके लिए हम कुछ न कुछ समाधान करने की कोशिश तो करते ही है। लेकिन जब हमारा भगवान के भजन में मन नहीं लगता है तो इस समस्या का समाधान हम करना ही नहीं चाहते है। नहीं लगता है तो नहीं लगता, बैठे है तो बैठे है, कुछ भी करने का प्रयास ही नहीं करते है। जब भी हम इस समस्या का समाधान ढूंढेंगे तो इस समस्या का समाधान हमको जरूर ही मिल जायेगा। इस समस्या के समाधान के लिए भगवान ने हमें अच्छे संतो के संग करने को कहा है। हमको उन संतों का संग करना चाहिए जिनका मन पहले से ही भगवान में लगा हुआ है। जिनका मन अगर भगवान में लगा हुआ है और हमें अपना मन उनमे लगा देना चाहिए तो निश्चित तौर पर एक दिन उनके माध्यम से हमारा मन भगवान में जरूर ही लग जायेगा। तब किसी ने महाराज से कहा कि महाराज हम इस बात पर यकीन कैसे करे कि आप जो भी बात कह रहे है वो बात सही है? इसके लिए महाराज श्री ने एक उदाहरण दिया। जब हमारे घरों में गैस सिलेंडर नहीं हुआ करते थे तो लोग या हमारी माताएं जंगलों में जाकर के लकड़ियां लाती थी और भोजन का प्रबंध करती थी। बारिश के दिनों में माताएं जंगल में लकड़ी लेने के लिए गई। माताएं जहाँ-जहाँ से लकड़ियां बीन रही थी तो वो सभी की सभी गीली पड़ी थी। तो अब ये बताइये की जब हम इन सभी गीली लकड़ियों को चूल्हे में लगा देंगे तो आग जलेगी ही नहीं। क्योँकि वो सारी की सारी लकड़ी तो गीली पड़ी थी। इसके लिए हमें सबसे पहले एक सुखी लकड़ी कहीं से लेकर आनी है। सबसे पहले हमें उसमें आग लगानी है फिर उसकी सहायता से ही उन गीली लकड़ियों में भी आग लग जाएगी। तो ये जो हमारा मन है ये उस गीली लकड़ी के समान है ये भटकता ही रहता है। किसी संत का पका हुआ मन मिल जाये जो लगा है ठाकुर के चरणों में। हमें तो ऐसे ही संत का का संग करना चाहिए जिनके मन में तो सदा से ही गोविन्द बसते है। उनके द्वारा ही हम अपनी इस समस्या का समाधान कर सकते है। इसके बाद महाराज श्री ने एक और उदाहरण दिया की जब भी हम लोग अपने अपने संत या साधु का संग करते है ,चाहे वो कैसा भी क्योँ न हो? उसका असर हम पर पड़ता ही है। उदाहरण के तौर पर यदि हम किसी जुआरी का संग कर लेते है तो हमको भी उस जुआरी की आदत ही पड़ जाएगी। अगर हम किसी पोलिटिसियन का संग करेंगे तो उनके साथ रहते -रहते एक दिन हम भी राजनीतिज्ञ बन ही जायेंगे। जो आदमी शराब पीता हो अगर हम उसका संग करेंगे तो एक दिन हम भी शराब पीने लग जायेंगे। आप जैसा भी और जिसका भी संग करोगे तो उसका रंग एक न एक दिन आप पर जरूर ही चढ़ जायेगा। इसलिए हमको ऐसे संत का संग करना चाहिए जो प्रभु भक्ति में हमेशा ही लगा रहता है तो एक दिन हमारी भक्ति भी भगवान के प्रति परफेक्ट हो जाएगी और हमारा मन भी उस भगवान की भक्ति में हमेशा के लिए लग जायेगा। कभी भी वहां से हटेगा नहीं। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

5Oct 2017

"आप जैसा भी और जिसका भी संग करोगे तो उसका रंग एक न एक दिन आप पर जरूर ही चढ़ जायेगा।"

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में शिकागो, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस में श्रीमद भागवत कथा के महत्त्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने "मीठों रस से भरों री राधा रानी लागे, महारानी लागे" भजन से आज की कथा प्रारम्भ की। महाराज श्री ने अपने प्रभु भक्ति को ही हम सभी के लिए जरुरी बताया। क्योँकि इस के द्वारा ही हम सभी अपने जीवन को सुधार सकते हैं। इस परमात्मा की भक्ति से ही हम हर पाप से मुक्ति पा सकते है। प्रभु भक्ति से ही हम हर समस्या का आसानी से हल निकाल सकते है हर विपदा को आसानी से पार कर सकते हैं। क्योँकि प्रभु भक्ति से ही हमें इतनी शक्ति मिल जाती है की हम इन समस्याओं को आसानी से दूर कर सकते है और जो लोग प्रभु की भक्ति नहीं करते है तो वो इन समस्याओं में उलझ कर ही रह जाते है। इन समस्याओं को दूर नहीं कर पाते है। यहाँ पर सबसे पहले महाराज श्री ने कथा शुरू करने से पहले एक समस्या के बारे में बताया। महाराज श्री ने कहा की कुछ लोगों ने मुझसे कहा कि महाराज मेरा भगवान के भजन में मन नहीं लगता है। हम जब भी भजन करने को बैठते है तो हमारा ध्यान इधर-उधर भटकता रहता है, लेकिन प्रभु के भजन में ही हमारा मन नहीं लगता है। बैठते तो हम भजन करने के लिए है लेकिन हमारा मन ही कहीं और चला जाता है। महाराज श्री ने कहा की हमारे मन में जितनी भी समस्याएं होती है वो उसी वक़्त ही आती है जब हम भजन करने के लिए बैठते है। यह समस्या हम सभी को होती है। इस समस्या के समाधान के लिए भगवान ने हमें समाधान तो बताया है पर हम उस समाधान को करना नहीं चाहते है। जब तक हम उस समस्या का समाधान करेंगे नहीं तब तक उस का समाधान होगा ही नहीं। हमको कोई न कोई समस्या होती है तो इसके लिए हम कुछ न कुछ समाधान करने की कोशिश तो करते ही है। लेकिन जब हमारा भगवान के भजन में मन नहीं लगता है तो इस समस्या का समाधान हम करना ही नहीं चाहते है। नहीं लगता है तो नहीं लगता, बैठे है तो बैठे है, कुछ भी करने का प्रयास ही नहीं करते है। जब भी हम इस समस्या का समाधान ढूंढेंगे तो इस समस्या का समाधान हमको जरूर ही मिल जायेगा। इस समस्या के समाधान के लिए भगवान ने हमें अच्छे संतो के संग करने को कहा है। हमको उन संतों का संग करना चाहिए जिनका मन पहले से ही भगवान में लगा हुआ है। जिनका मन अगर भगवान में लगा हुआ है और हमें अपना मन उनमे लगा देना चाहिए तो निश्चित तौर पर एक दिन उनके माध्यम से हमारा मन भगवान में जरूर ही लग जायेगा। तब किसी ने महाराज से कहा कि महाराज हम इस बात पर यकीन कैसे करे कि आप जो भी बात कह रहे है वो बात सही है? इसके लिए महाराज श्री ने एक उदाहरण दिया। जब हमारे घरों में गैस सिलेंडर नहीं हुआ करते थे तो लोग या हमारी माताएं जंगलों में जाकर के लकड़ियां लाती थी और भोजन का प्रबंध करती थी। बारिश के दिनों में माताएं जंगल में लकड़ी लेने के लिए गई। माताएं जहाँ-जहाँ से लकड़ियां बीन रही थी तो वो सभी की सभी गीली पड़ी थी। तो अब ये बताइये की जब हम इन सभी गीली लकड़ियों को चूल्हे में लगा देंगे तो आग जलेगी ही नहीं। क्योँकि वो सारी की सारी लकड़ी तो गीली पड़ी थी। इसके लिए हमें सबसे पहले एक सुखी लकड़ी कहीं से लेकर आनी है। सबसे पहले हमें उसमें आग लगानी है फिर उसकी सहायता से ही उन गीली लकड़ियों में भी आग लग जाएगी। तो ये जो हमारा मन है ये उस गीली लकड़ी के समान है ये भटकता ही रहता है। किसी संत का पका हुआ मन मिल जाये जो लगा है ठाकुर के चरणों में। हमें तो ऐसे ही संत का का संग करना चाहिए जिनके मन में तो सदा से ही गोविन्द बसते है। उनके द्वारा ही हम अपनी इस समस्या का समाधान कर सकते है। इसके बाद महाराज श्री ने एक और उदाहरण दिया की जब भी हम लोग अपने अपने संत या साधु का संग करते है ,चाहे वो कैसा भी क्योँ न हो? उसका असर हम पर पड़ता ही है। उदाहरण के तौर पर यदि हम किसी जुआरी का संग कर लेते है तो हमको भी उस जुआरी की आदत ही पड़ जाएगी। अगर हम किसी पोलिटिसियन का संग करेंगे तो उनके साथ रहते -रहते एक दिन हम भी राजनीतिज्ञ बन ही जायेंगे। जो आदमी शराब पीता हो अगर हम उसका संग करेंगे तो एक दिन हम भी शराब पीने लग जायेंगे। आप जैसा भी और जिसका भी संग करोगे तो उसका रंग एक न एक दिन आप पर जरूर ही चढ़ जायेगा। इसलिए हमको ऐसे संत का संग करना चाहिए जो प्रभु भक्ति में हमेशा ही लगा रहता है तो एक दिन हमारी भक्ति भी भगवान के प्रति परफेक्ट हो जाएगी और हमारा मन भी उस भगवान की भक्ति में हमेशा के लिए लग जायेगा। कभी भी वहां से हटेगा नहीं। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

5Oct 2017

"आप जैसा भी और जिसका भी संग करोगे तो उसका रंग एक न एक दिन आप पर जरूर ही चढ़ जायेगा।"

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में शिकागो, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस में श्रीमद भागवत कथा के महत्त्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने "मीठों रस से भरों री राधा रानी लागे, महारानी लागे" भजन से आज की कथा प्रारम्भ की। महाराज श्री ने अपने प्रभु भक्ति को ही हम सभी के लिए जरुरी बताया। क्योँकि इस के द्वारा ही हम सभी अपने जीवन को सुधार सकते हैं। इस परमात्मा की भक्ति से ही हम हर पाप से मुक्ति पा सकते है। प्रभु भक्ति से ही हम हर समस्या का आसानी से हल निकाल सकते है हर विपदा को आसानी से पार कर सकते हैं। क्योँकि प्रभु भक्ति से ही हमें इतनी शक्ति मिल जाती है की हम इन समस्याओं को आसानी से दूर कर सकते है और जो लोग प्रभु की भक्ति नहीं करते है तो वो इन समस्याओं में उलझ कर ही रह जाते है। इन समस्याओं को दूर नहीं कर पाते है। यहाँ पर सबसे पहले महाराज श्री ने कथा शुरू करने से पहले एक समस्या के बारे में बताया। महाराज श्री ने कहा की कुछ लोगों ने मुझसे कहा कि महाराज मेरा भगवान के भजन में मन नहीं लगता है। हम जब भी भजन करने को बैठते है तो हमारा ध्यान इधर-उधर भटकता रहता है, लेकिन प्रभु के भजन में ही हमारा मन नहीं लगता है। बैठते तो हम भजन करने के लिए है लेकिन हमारा मन ही कहीं और चला जाता है। महाराज श्री ने कहा की हमारे मन में जितनी भी समस्याएं होती है वो उसी वक़्त ही आती है जब हम भजन करने के लिए बैठते है। यह समस्या हम सभी को होती है। इस समस्या के समाधान के लिए भगवान ने हमें समाधान तो बताया है पर हम उस समाधान को करना नहीं चाहते है। जब तक हम उस समस्या का समाधान करेंगे नहीं तब तक उस का समाधान होगा ही नहीं। हमको कोई न कोई समस्या होती है तो इसके लिए हम कुछ न कुछ समाधान करने की कोशिश तो करते ही है। लेकिन जब हमारा भगवान के भजन में मन नहीं लगता है तो इस समस्या का समाधान हम करना ही नहीं चाहते है। नहीं लगता है तो नहीं लगता, बैठे है तो बैठे है, कुछ भी करने का प्रयास ही नहीं करते है। जब भी हम इस समस्या का समाधान ढूंढेंगे तो इस समस्या का समाधान हमको जरूर ही मिल जायेगा। इस समस्या के समाधान के लिए भगवान ने हमें अच्छे संतो के संग करने को कहा है। हमको उन संतों का संग करना चाहिए जिनका मन पहले से ही भगवान में लगा हुआ है। जिनका मन अगर भगवान में लगा हुआ है और हमें अपना मन उनमे लगा देना चाहिए तो निश्चित तौर पर एक दिन उनके माध्यम से हमारा मन भगवान में जरूर ही लग जायेगा। तब किसी ने महाराज से कहा कि महाराज हम इस बात पर यकीन कैसे करे कि आप जो भी बात कह रहे है वो बात सही है? इसके लिए महाराज श्री ने एक उदाहरण दिया। जब हमारे घरों में गैस सिलेंडर नहीं हुआ करते थे तो लोग या हमारी माताएं जंगलों में जाकर के लकड़ियां लाती थी और भोजन का प्रबंध करती थी। बारिश के दिनों में माताएं जंगल में लकड़ी लेने के लिए गई। माताएं जहाँ-जहाँ से लकड़ियां बीन रही थी तो वो सभी की सभी गीली पड़ी थी। तो अब ये बताइये की जब हम इन सभी गीली लकड़ियों को चूल्हे में लगा देंगे तो आग जलेगी ही नहीं। क्योँकि वो सारी की सारी लकड़ी तो गीली पड़ी थी। इसके लिए हमें सबसे पहले एक सुखी लकड़ी कहीं से लेकर आनी है। सबसे पहले हमें उसमें आग लगानी है फिर उसकी सहायता से ही उन गीली लकड़ियों में भी आग लग जाएगी। तो ये जो हमारा मन है ये उस गीली लकड़ी के समान है ये भटकता ही रहता है। किसी संत का पका हुआ मन मिल जाये जो लगा है ठाकुर के चरणों में। हमें तो ऐसे ही संत का का संग करना चाहिए जिनके मन में तो सदा से ही गोविन्द बसते है। उनके द्वारा ही हम अपनी इस समस्या का समाधान कर सकते है। इसके बाद महाराज श्री ने एक और उदाहरण दिया की जब भी हम लोग अपने अपने संत या साधु का संग करते है ,चाहे वो कैसा भी क्योँ न हो? उसका असर हम पर पड़ता ही है। उदाहरण के तौर पर यदि हम किसी जुआरी का संग कर लेते है तो हमको भी उस जुआरी की आदत ही पड़ जाएगी। अगर हम किसी पोलिटिसियन का संग करेंगे तो उनके साथ रहते -रहते एक दिन हम भी राजनीतिज्ञ बन ही जायेंगे। जो आदमी शराब पीता हो अगर हम उसका संग करेंगे तो एक दिन हम भी शराब पीने लग जायेंगे। आप जैसा भी और जिसका भी संग करोगे तो उसका रंग एक न एक दिन आप पर जरूर ही चढ़ जायेगा। इसलिए हमको ऐसे संत का संग करना चाहिए जो प्रभु भक्ति में हमेशा ही लगा रहता है तो एक दिन हमारी भक्ति भी भगवान के प्रति परफेक्ट हो जाएगी और हमारा मन भी उस भगवान की भक्ति में हमेशा के लिए लग जायेगा। कभी भी वहां से हटेगा नहीं। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

5Oct 2017

"आप जैसा भी और जिसका भी संग करोगे तो उसका रंग एक न एक दिन आप पर जरूर ही चढ़ जायेगा।"

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में शिकागो, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस में श्रीमद भागवत कथा के महत्त्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने "मीठों रस से भरों री राधा रानी लागे, महारानी लागे" भजन से आज की कथा प्रारम्भ की। महाराज श्री ने अपने प्रभु भक्ति को ही हम सभी के लिए जरुरी बताया। क्योँकि इस के द्वारा ही हम सभी अपने जीवन को सुधार सकते हैं। इस परमात्मा की भक्ति से ही हम हर पाप से मुक्ति पा सकते है। प्रभु भक्ति से ही हम हर समस्या का आसानी से हल निकाल सकते है हर विपदा को आसानी से पार कर सकते हैं। क्योँकि प्रभु भक्ति से ही हमें इतनी शक्ति मिल जाती है की हम इन समस्याओं को आसानी से दूर कर सकते है और जो लोग प्रभु की भक्ति नहीं करते है तो वो इन समस्याओं में उलझ कर ही रह जाते है। इन समस्याओं को दूर नहीं कर पाते है। यहाँ पर सबसे पहले महाराज श्री ने कथा शुरू करने से पहले एक समस्या के बारे में बताया। महाराज श्री ने कहा की कुछ लोगों ने मुझसे कहा कि महाराज मेरा भगवान के भजन में मन नहीं लगता है। हम जब भी भजन करने को बैठते है तो हमारा ध्यान इधर-उधर भटकता रहता है, लेकिन प्रभु के भजन में ही हमारा मन नहीं लगता है। बैठते तो हम भजन करने के लिए है लेकिन हमारा मन ही कहीं और चला जाता है। महाराज श्री ने कहा की हमारे मन में जितनी भी समस्याएं होती है वो उसी वक़्त ही आती है जब हम भजन करने के लिए बैठते है। यह समस्या हम सभी को होती है। इस समस्या के समाधान के लिए भगवान ने हमें समाधान तो बताया है पर हम उस समाधान को करना नहीं चाहते है। जब तक हम उस समस्या का समाधान करेंगे नहीं तब तक उस का समाधान होगा ही नहीं। हमको कोई न कोई समस्या होती है तो इसके लिए हम कुछ न कुछ समाधान करने की कोशिश तो करते ही है। लेकिन जब हमारा भगवान के भजन में मन नहीं लगता है तो इस समस्या का समाधान हम करना ही नहीं चाहते है। नहीं लगता है तो नहीं लगता, बैठे है तो बैठे है, कुछ भी करने का प्रयास ही नहीं करते है। जब भी हम इस समस्या का समाधान ढूंढेंगे तो इस समस्या का समाधान हमको जरूर ही मिल जायेगा। इस समस्या के समाधान के लिए भगवान ने हमें अच्छे संतो के संग करने को कहा है। हमको उन संतों का संग करना चाहिए जिनका मन पहले से ही भगवान में लगा हुआ है। जिनका मन अगर भगवान में लगा हुआ है और हमें अपना मन उनमे लगा देना चाहिए तो निश्चित तौर पर एक दिन उनके माध्यम से हमारा मन भगवान में जरूर ही लग जायेगा। तब किसी ने महाराज से कहा कि महाराज हम इस बात पर यकीन कैसे करे कि आप जो भी बात कह रहे है वो बात सही है? इसके लिए महाराज श्री ने एक उदाहरण दिया। जब हमारे घरों में गैस सिलेंडर नहीं हुआ करते थे तो लोग या हमारी माताएं जंगलों में जाकर के लकड़ियां लाती थी और भोजन का प्रबंध करती थी। बारिश के दिनों में माताएं जंगल में लकड़ी लेने के लिए गई। माताएं जहाँ-जहाँ से लकड़ियां बीन रही थी तो वो सभी की सभी गीली पड़ी थी। तो अब ये बताइये की जब हम इन सभी गीली लकड़ियों को चूल्हे में लगा देंगे तो आग जलेगी ही नहीं। क्योँकि वो सारी की सारी लकड़ी तो गीली पड़ी थी। इसके लिए हमें सबसे पहले एक सुखी लकड़ी कहीं से लेकर आनी है। सबसे पहले हमें उसमें आग लगानी है फिर उसकी सहायता से ही उन गीली लकड़ियों में भी आग लग जाएगी। तो ये जो हमारा मन है ये उस गीली लकड़ी के समान है ये भटकता ही रहता है। किसी संत का पका हुआ मन मिल जाये जो लगा है ठाकुर के चरणों में। हमें तो ऐसे ही संत का का संग करना चाहिए जिनके मन में तो सदा से ही गोविन्द बसते है। उनके द्वारा ही हम अपनी इस समस्या का समाधान कर सकते है। इसके बाद महाराज श्री ने एक और उदाहरण दिया की जब भी हम लोग अपने अपने संत या साधु का संग करते है ,चाहे वो कैसा भी क्योँ न हो? उसका असर हम पर पड़ता ही है। उदाहरण के तौर पर यदि हम किसी जुआरी का संग कर लेते है तो हमको भी उस जुआरी की आदत ही पड़ जाएगी। अगर हम किसी पोलिटिसियन का संग करेंगे तो उनके साथ रहते -रहते एक दिन हम भी राजनीतिज्ञ बन ही जायेंगे। जो आदमी शराब पीता हो अगर हम उसका संग करेंगे तो एक दिन हम भी शराब पीने लग जायेंगे। आप जैसा भी और जिसका भी संग करोगे तो उसका रंग एक न एक दिन आप पर जरूर ही चढ़ जायेगा। इसलिए हमको ऐसे संत का संग करना चाहिए जो प्रभु भक्ति में हमेशा ही लगा रहता है तो एक दिन हमारी भक्ति भी भगवान के प्रति परफेक्ट हो जाएगी और हमारा मन भी उस भगवान की भक्ति में हमेशा के लिए लग जायेगा। कभी भी वहां से हटेगा नहीं। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

5Oct 2017

"आप जैसा भी और जिसका भी संग करोगे तो उसका रंग एक न एक दिन आप पर जरूर ही चढ़ जायेगा।"

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में शिकागो, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस में श्रीमद भागवत कथा के महत्त्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने "मीठों रस से भरों री राधा रानी लागे, महारानी लागे" भजन से आज की कथा प्रारम्भ की। महाराज श्री ने अपने प्रभु भक्ति को ही हम सभी के लिए जरुरी बताया। क्योँकि इस के द्वारा ही हम सभी अपने जीवन को सुधार सकते हैं। इस परमात्मा की भक्ति से ही हम हर पाप से मुक्ति पा सकते है। प्रभु भक्ति से ही हम हर समस्या का आसानी से हल निकाल सकते है हर विपदा को आसानी से पार कर सकते हैं। क्योँकि प्रभु भक्ति से ही हमें इतनी शक्ति मिल जाती है की हम इन समस्याओं को आसानी से दूर कर सकते है और जो लोग प्रभु की भक्ति नहीं करते है तो वो इन समस्याओं में उलझ कर ही रह जाते है। इन समस्याओं को दूर नहीं कर पाते है। यहाँ पर सबसे पहले महाराज श्री ने कथा शुरू करने से पहले एक समस्या के बारे में बताया। महाराज श्री ने कहा की कुछ लोगों ने मुझसे कहा कि महाराज मेरा भगवान के भजन में मन नहीं लगता है। हम जब भी भजन करने को बैठते है तो हमारा ध्यान इधर-उधर भटकता रहता है, लेकिन प्रभु के भजन में ही हमारा मन नहीं लगता है। बैठते तो हम भजन करने के लिए है लेकिन हमारा मन ही कहीं और चला जाता है। महाराज श्री ने कहा की हमारे मन में जितनी भी समस्याएं होती है वो उसी वक़्त ही आती है जब हम भजन करने के लिए बैठते है। यह समस्या हम सभी को होती है। इस समस्या के समाधान के लिए भगवान ने हमें समाधान तो बताया है पर हम उस समाधान को करना नहीं चाहते है। जब तक हम उस समस्या का समाधान करेंगे नहीं तब तक उस का समाधान होगा ही नहीं। हमको कोई न कोई समस्या होती है तो इसके लिए हम कुछ न कुछ समाधान करने की कोशिश तो करते ही है। लेकिन जब हमारा भगवान के भजन में मन नहीं लगता है तो इस समस्या का समाधान हम करना ही नहीं चाहते है। नहीं लगता है तो नहीं लगता, बैठे है तो बैठे है, कुछ भी करने का प्रयास ही नहीं करते है। जब भी हम इस समस्या का समाधान ढूंढेंगे तो इस समस्या का समाधान हमको जरूर ही मिल जायेगा। इस समस्या के समाधान के लिए भगवान ने हमें अच्छे संतो के संग करने को कहा है। हमको उन संतों का संग करना चाहिए जिनका मन पहले से ही भगवान में लगा हुआ है। जिनका मन अगर भगवान में लगा हुआ है और हमें अपना मन उनमे लगा देना चाहिए तो निश्चित तौर पर एक दिन उनके माध्यम से हमारा मन भगवान में जरूर ही लग जायेगा। तब किसी ने महाराज से कहा कि महाराज हम इस बात पर यकीन कैसे करे कि आप जो भी बात कह रहे है वो बात सही है? इसके लिए महाराज श्री ने एक उदाहरण दिया। जब हमारे घरों में गैस सिलेंडर नहीं हुआ करते थे तो लोग या हमारी माताएं जंगलों में जाकर के लकड़ियां लाती थी और भोजन का प्रबंध करती थी। बारिश के दिनों में माताएं जंगल में लकड़ी लेने के लिए गई। माताएं जहाँ-जहाँ से लकड़ियां बीन रही थी तो वो सभी की सभी गीली पड़ी थी। तो अब ये बताइये की जब हम इन सभी गीली लकड़ियों को चूल्हे में लगा देंगे तो आग जलेगी ही नहीं। क्योँकि वो सारी की सारी लकड़ी तो गीली पड़ी थी। इसके लिए हमें सबसे पहले एक सुखी लकड़ी कहीं से लेकर आनी है। सबसे पहले हमें उसमें आग लगानी है फिर उसकी सहायता से ही उन गीली लकड़ियों में भी आग लग जाएगी। तो ये जो हमारा मन है ये उस गीली लकड़ी के समान है ये भटकता ही रहता है। किसी संत का पका हुआ मन मिल जाये जो लगा है ठाकुर के चरणों में। हमें तो ऐसे ही संत का का संग करना चाहिए जिनके मन में तो सदा से ही गोविन्द बसते है। उनके द्वारा ही हम अपनी इस समस्या का समाधान कर सकते है। इसके बाद महाराज श्री ने एक और उदाहरण दिया की जब भी हम लोग अपने अपने संत या साधु का संग करते है ,चाहे वो कैसा भी क्योँ न हो? उसका असर हम पर पड़ता ही है। उदाहरण के तौर पर यदि हम किसी जुआरी का संग कर लेते है तो हमको भी उस जुआरी की आदत ही पड़ जाएगी। अगर हम किसी पोलिटिसियन का संग करेंगे तो उनके साथ रहते -रहते एक दिन हम भी राजनीतिज्ञ बन ही जायेंगे। जो आदमी शराब पीता हो अगर हम उसका संग करेंगे तो एक दिन हम भी शराब पीने लग जायेंगे। आप जैसा भी और जिसका भी संग करोगे तो उसका रंग एक न एक दिन आप पर जरूर ही चढ़ जायेगा। इसलिए हमको ऐसे संत का संग करना चाहिए जो प्रभु भक्ति में हमेशा ही लगा रहता है तो एक दिन हमारी भक्ति भी भगवान के प्रति परफेक्ट हो जाएगी और हमारा मन भी उस भगवान की भक्ति में हमेशा के लिए लग जायेगा। कभी भी वहां से हटेगा नहीं। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

5Oct 2017

"भगवान ने हमपर अपनी कृपा की है तो इसका सबसे जीता जागता उदाहरण है ये मानव शरीर।"

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में शिकागो, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के पंचम दिवस में श्रीमद भागवत कथा के महत्त्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने "मेरा आप की कृपा से सब काम हो रहा है, करते हो तुम कन्हैया मेरा नाम हो रहा है" भजन से आज की कथा प्रारम्भ की। गोविन्द भगवान ही हमको इस धरती पर सभी समस्याओं से निजात दिला सकता है। जो भी भगवान की भक्ति में लगा रहता है तो उसको किसी भी समस्या का डर नहीं रहता है। हमारे प्रभु गोविन्द जी हमको उस विपदा से आसानी से निकाल लेते है। सर्वेश्वर भगवान जो घाट-घाट में वास करते है। उनके द्वारा दिया हुआ ये मानव शरीर जिसके द्वारा हम उनको ही प्राप्त कर सकते है। बहुत से लोग होते है जो ये कहते है कि हमपर उनकी कृपा कैसे बनी रह सकती है? हम ये महसूस कैसे कर सकते है? भगवान की कृपा का दर्शन हम कैसे करे। हम ये भी कैसे महसूस करे कि भगवान् ने हमपर कृपा की है। अगर जो भी व्यक्ति ये महसूस करना चाहता है कि भगवान ने हमपर अपनी कृपा की है तो इसका सबसे जीता जागता उदहारण है ये मानव शरीर। हमको सिर्फ ये मानव शरीर ही केवल प्राप्त नहीं हुआ है, हमको एक अच्छा मानव शरीर भी प्राप्त हुआ है जिसमे किसी भी तरह का कोई भी डिफेक्ट नहीं है। सबकी दो आँखे होती है तो हमारी भी है,सबके दो हाथ होते है तो हमारे भी है, सबके दो पैर होते है तो वो हमारे भी है, हमको वाणी बोलने को दी है, कान हमको सुनने के लिए दिए है। आपने बहुत से ऐसे भी लोग देखे होंगे कि उनके कर्मों के अनुसार किसी के हाथ नहीं होते है, किसी के पैर नहीं होते है, कोई रंग में बहुत ही सुन्दर होता है तो वो बोल नहीं सकता है। किसी के पास तो भगवान का दिया हुआ सब कुछ होता है पर दिमाग ही नहीं होता है, न तो वह कुछ सोच सकता है और न ही समझ सकता है। इसको हम एक दूसरे से तुलना करने पर पता लगा सकते है। यहाँ पर आप अपने पैरों पर चलकर आये है लेकिन लोग दूसरों के मोहताज है, हम अपने हाथों से ही अपना सब काम करते है पर बाकि लोग दूसरों पर ही निर्भर रहते है। तो क्योँ हम कहे की भगवान की कृपा नहीं है। इसलिए हम पर भागवत कृपा तो है ही इसका जीता जगता उदाहरण है ये पवित्र मानव शरीर। अब इसके द्वारा हम क्या कर सकते है और क्या कर रहे है ये सब हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। तब महाराज श्री ने एक दृश्टान्त सुनाया। एक नदी के किनारे पर एक बहुत ही सुन्दर सा वन था। उस वन में कुछ सुन्दर फल और फूल लगे हुए थे। एक दिन की बात है उस वन में एक कौवा रहा करता था। उसकी जिंदगी काफी आनंद से कट रही थी। एक दिन जब वह डाल पर बैठा था तो उसने एक नजारा देखा कि उस नदी में एक मरा हुआ हाथी बहता हुआ जा रहा है। तो वो कौवा तुरंत डाल से उड़ा और और उस मरे हुए हाथी के ऊपर जाकर बैठ गया। उसने उस मरे हुए हाथी का मॉस खा लिया और उसी नदी में पानी पी लिया। उस कौवे ने उसके मॉस से अपने पेट को भर लिया था और वहां के वातावरण को देख कर काफी खुश हो रहा था। अचानक से उस कौवे ने सोचा की मैं इस वन में रहता हूँ तो मुझे कभी यहाँ कभी वहां जाना पड़ता है, अपनी खाने की सभी व्यवस्था करनी पड़ती है, लेकिन यदि मैं इस मरे हुए हाथी के ऊपर यदि बैठा रहूं तो मुझे तो कुछ भी करने की जरुरत ही नहीं पड़ेगी। क्योंकि अगर मैं इस मांस को जीवन भर भी खाता रहूं तो भी ये ख़त्म नहीं होगा और साथ ही मुझे पिने के लिए इस नदी का जल भी मिलता रहेगा तो मुझे तो अपने लिए और कुछ करने की जरुरत ही नहीं होगी। अब मुझे तो कहीं भी और जाने की जरुरत ही नहीं है, उस कौवे ने ये निर्णय कर लिया था। अब हाथी तो उस जलधारा के साथ बहा जा रहा है और नहीं अपने पथ की और बही जा रही है। कुछ ही दिन बाद नदी को अपनी मंजिल प्राप्त हुई और वो तो सागर में जाकर मिल गयी। नदी को तो आज बहुत ही ख़ुशी हो रही थी कि आज उसके जन्म-जन्म के साथी उसके पिया से उसका मिलन हो गया है यानि उसका एक ही उद्देश्य था कि वह सागर में जाकर मिल जाये। इसके बाद उसका कोई भी उद्देश्य शेष नहीं रह जाता है। अब नदी के साथ वह हाथी भी उस सागर में आ गया। और उस हाथी के साथ ही वह कौवा भी उसी सागर में ही आ गया था। अब बेचारा कौवा क्या करता अपनी जान बचाने के लिए वहां से उड़ने लगा। कभी वह इधर जाता कभी उधर जाता। और करता भी क्या? सागर की तो कोई सीमा ही नहीं होती है। वह बेचारा अपने आप को अब असहाय सा महसूस करने लगा। वहां की ऊंची ऊँची लहरों से वह घबरा गया था। कितना उड़ता वह कौवा और अंत में वह उसी सागर में गिर गया और उसकी मौत हो गयी। अब इस में उस कौवे क्या विशेषता थी की उसने उस खाने को ही अपना सब कुछ समझ लिया था और बाकि के सब संसार से ही उसने अपना नाता तोड़ लिया था। अंत में वह कौवा निकल गया था अपनी मृत्यु के सफर पर। ठीक वैसे ही हम सबने भी खाने कमाने को ही अपने जीवन का उद्देश्य समझ रखा है। इस संसार में हाथी के समान खाने-पीने की चीज ही हमारे सामने खड़ी है। समय की लहरे भी उस नदी की तरह बहती चली जा रही है जैसे वह नदी बह रही है। लेकिन कभी न कभी तो महासागर में नदी का मिलन होगा। तब हमारी ये उड़ान काम नहीं आ सकेगी। फिर जो उस कौवे का हश्र हुआ है वही हश्र हमारा भी होगा। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

2Oct 2017

"जब इंसान अपनी मय में आ जाता है तो केवल एक पुतला बन कर रह जाता है।"

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में शिकागो, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस में भगवान श्रीराम के जीवन के महत्त्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कहा कि जैसा की आप सभी जानते है कि आज विजय दशमी का त्यौहार है। और विजय दशमी के त्योहार के बारे में तो आप सभी को मालूम ही है कि इस दिन भगवान श्री राम चंद्र ने राक्षस राज रावण का वध किया था। इसको हम सत्य पर असत्य की जीत भी कह सकते है। रावण को इस लिया जलाया जाता है क्योँकि उसको बुराइयों का प्रतिक समझा जाता है। इसका सही मतलब हम ये कह सकते है कि जो धर्म के विरुद्ध जाता है वो जल ही जाता है या उसका नाश होना निश्चित ही है। मानव जीवन वही होता है जो हमेशा सत्य के साथ खड़ा रहता है। जो धर्म के विरुद्ध हो गया या राम के विरुद्ध हो गया हो उस व्यक्ति का कल्याण कभी भी नहीं हो सकता है। आज के दिन हम सब अपने बच्चों को एक उपदेश देते है की हमें सदा ही धर्म पर ही चलना चाहिए। उसके विपरीत कभी भी नहीं चलना चाहिए। क्योँकि जो भी धर्म के विपरीत चलता है उस का कल्याण कभी भी नहीं हो सकता है। इस युद्ध में रावण की पराजय हुई थी और राम की विजय हुई थी। तभी तो इस को हम असत्य पर सत्य की जीत मानते है। इस में रावण के पास सब कुछ होते हुए भी वह राम से हार गया था। उसके पास सेना, बल, बुद्धि, ज्ञान सब कुछ होते हुए भी और राम के पास न तो सेना थी वो तो एक वनवासी की तरह घूम रहे थे, न ही धन दौलत थी और फिर भी उन्होंने उस पापी रावण को युद्ध में हरा दिया था और सीता माता को उस के चंगुल से आज़ाद कराया था। इसको हम कई चीजों से भी नाप सकते है। पहली तो ये है कि जो धर्म के विरुद्ध जाता है उसका कभी भी भला नहीं हो सकता है। उसका तो हर जगह विनाश ही होगा। उस अत्याचारी रावण के एक लाख पुत्र होते हुए भी और सवा लाख नाती होते हुए भी युद्ध के अंत में कोई भी कुल में रोने के लिए नहीं बचा था और जब अंत में युद्ध में स्वयं रावण मरा था तो उसके लिए भी कुल में रोने के लिए कोई भी नहीं बचा था। स्वयं रावण की पत्नी मंदोदरी ने उससे ये कहा था की हे प्राण नाथ आपको क्या ये पता है की आपके कुल में कोई भी रोने के लिए नहीं बचा है ये स्थति आपकी क्योँ हुई है। आप जब चलते भी है तो पृथ्वी कांपती है। आप जब भी चलते हो तो इतना विशाल समुन्द्र भी रास्ता छोड़ देता है। आप जब भी चलते है तो देवता भी अपना महल छोड़ कर भाग जाते है अर्थात स्वर्ग ही छोड़ कर चले जाते है। काल को तो आपने अपनी पाटी से बांध कर रखा है। अग्नि देव को आपने रसोइया बन रखा है और पवन देव आपके यहाँ पर झाड़ू लगाते है। रावण का इतना विशाल साम्राज्य होने के बाद भी उसके यहाँ पर अंत में कोई भी रोने के लिए नहीं बचा था। इसकी वजह तो केवल ये ही है कि आप भगवान राम के विरुद्ध चले गए है ये सब कहती है रावण की पत्नी मंदोदरी अपने पति रावण से। दुनिया में आप किसी के भी विरुद्ध चले जाओ तो राम आपके बचा लेंगे। लेकिन जब आप राम के ही और धर्म के ही विरुद्ध चले जाओगे तो आप को कोई भी नहीं बचा सकता है। आपका ये जो हाल हुआ है ये केवल राम के विरुद्ध जाने से ही हुआ है। अपने जीवन में आप कुछ भी करो लेकिन राम के विरुद्ध आपको नहीं जाना चाहिए। हमको कभी भी धर्म के विरुद्ध नहीं जाना चाहिए। आपका ये विनाश तो आप की ही वजह से हुआ है। न आप राम कर्म विरुद्ध जाते, न ही आप धर्म के विरुद्ध जाते तो आपका ये हाल कभी भी नहीं होता। जब भगवान राम राक्षस राज रावण को हरा कर अयोध्या वापस लौटे थे तो कौशल्या माता ने राम से पूछा कि राम क्या तुमने रावण को मारा। माता कौशल्या माता को तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसके इतने छोटे से पुत्र ने उस अत्याचारी राक्षस राज रावण को मार दिया था। क्योँकि बेटा कितना भी बड़ा क्योँ न हो जाये लेकिन माँ के लिए तो बच्चा ही होता है। तब भगवान राम ने कहा माता से कहा कि रावण तो त्रिकालज्ञ है मैं कैसे उसे मार सकता हूँ। रावण भगवान शिव का परम भक्त है। उसे मैं कैसे मार सकता हूँ? रावण तो परम पराक्रमी है उसे मैं कैसे मार सकता हूँ? रावण तो चारों वेदों का ज्ञाता है उसे मैं कैसे मार सकता हूँ? हे माँ सच तो ये है कि रावण को मैंने नहीं मारा ,रावण को तो उसके अहंकार ने मारा है। जब तक हमारी मैं या अहंकार जिन्दा रहता है तब तक हमारा कुछ भी भला नहीं हो सकता है। हम किसी भी वक़्त मारे जा सकते है। आप क्या हो ये घमंड हमको कभी भी नहीं करना चाहिए क्योँकि हमको बनाने वाला तो कोई और ही है। और जब इंसान अपनी मैं में आ जाता है तो केवल एक पुतला बन कर रह जाता है। जहाँ त्रेता युग में रावण मरा था और आज तक उसका पुतला जलाया जाता है। आज भी हम सब अपने बच्चों को मेला देखने ले जाते है, तमाशा दिखाने ले जाते है, लेकिन कभी भी उनको ज्ञान नहीं देते है कि इसके पीछे कारण क्या है। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

1Oct 2017

"भागवत कथा श्रवण करने से बड़ा और कोई सौभाग्य नहीं हो सकता है।"

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में शिकागो, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस में श्रीमद भागवत कथा के महत्त्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कथा शुरू करने से पहले अपने सभी भक्तों को हरी नाम का संकीर्तन करने को कहा। जिससे की हमारा मन इस कथा में लगे। इसके बाद महाराज श्री ने "जय राधे राधे गोविन्द राधे" भजन भक्तों को श्रवण कराया। हम जो भी कार्य करते है उसका हमारे जीवन पर किसी न किसी रूप में फर्क पड़ता है। अगर हम कोई भी अच्छा कार्य करते है तो हम को उस अच्छे कार्य का फल भी अच्छा ही मिलता है और यदि हम कोई भी बुरा कार्य करते है तो उस बुरे कार्य का फल भी हमें बुरा ही मिलता है। इसलिए हमको सदा ही अच्छे ही कार्य करने चाहिए और बुरे कार्यों से सदा ही बचाना चाहिए। कथा सुनना भी हर किसी के बस की बात नहीं है। हम एक दिन सुन लेंगे या दो दिन कथा सुन लेंगे पर सातों दिन कथा कोई कोई ही व्यक्ति सुन पता है। क्योँकि देवराज इन्द्र भी इस कथा को नहीं सुन पाए थे। ये कथा देवताओ से भी दूर आप सब के लिए इस विदेशी धरती पर भी आपको सुनने को मिल रही है। यही आप सब का सबसे बड़ा सौभाग्य है। सोचिये अगर इस संसार में साधु संत या कथाकार नहीं होते तो कब कहाँ कनाडा में कथा खत्म हो जाती है और कब कहाँ शिकागो में कथा शुरू हो जाती है। भगवान से जुडने का जो अवसर भागवत हमको देती है वो कहाँ हम सब को मिलता है। वो लोग बहुत ही धन्य है जिनका मन कथा को सुनने के लिए यहाँ पर पहुँच जाता है। वो मन बहुत ही तरसता है की हमको अपने उस परमात्मा की कथा सुननी है। मनुष्य का कभी कभी भगवान से विश्वास उठ जाता है लेकिन जैसे ही वह व्यक्ति भागवत कथा को सुनता है तो उस व्यक्ति का फिर से उस परमात्मा में विश्वास लौट कर वापस आ जाता है। ये तो केवल भगवान की कथा ही है जो हमको भगवान की तरफ लौट कर ले जाती है। और मानव जीवन का परम उद्देश्य तो केवल भागवत कथा को सुनना ही है। और हमारा कोई भी उद्देश्य नहीं है। हम सब ने अपना देश किस के लिए छोड़ा था, केवल पैसे के लिए ही न। पर क्या जब हम इस धरती को छोड़ कर जायेंगे तो क्या पैसा हमारे साथ जायेगा। तो ऐसा पैसा किस काम का है? जिसके लिए मैंने तो अपना सब कुछ ही छोड़ दिया था ऊपर जब मैं इस धरती को छोड़ कर जा रहा हूँ तो वही पैसा मेरे साथ नहीं है। लेकिन आप जो इस कथा को सुनते है ये आपको कभी भी नहीं छोड़ेगी। चाहे आप इस देश में हो या उस देश में हो। विश्व में भी रहो या मृत्यु हो जाये तब भी ये आप सब के साथ ही जाती है। ये तो सदा ही आप का साथ देने वाली है ये आप का कभी भी छोड़ने वाली नहीं है। आपके पास इतनी दौलत है क्या जिससे आप भगवान से कह दो कि भगवान हम आपको इतनी दौलत दे देंगे इसके बदले आप हमको मोक्ष दे दो। इस पर भगवान इस पापी मनुष्य से कहता है की तुम अपनी इस माया को अपने पास रखो। तुम जिस अपनी माया पर इतना उछाल रहे हो उस माया का तो केवल एक ही कण तुम्हारे पास है। वही लक्ष्मी तो सदा मेरे चरण दबा रही होती है। चौबीस घंटे मेरे साथ ही रहती है। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

1Oct 2017

"मानव जीवन का परम उद्देश्य तो केवल भागवत कथा को सुनना ही है।"

महाराज श्री ने कथा शुरू करने से पहले अपने सभी भक्तों को हरी नाम का संकीर्तन करने को कहा। जिससे की हमारा मन इस कथा में लगे। इसके बाद महाराज श्री ने "जय राधे राधे गोविन्द राधे" भजन भक्तों को श्रवण कराया। हम जो भी कार्य करते है उसका हमारे जीवन पर किसी न किसी रूप में फर्क पड़ता है। अगर हम कोई भी अच्छा कार्य करते है तो हम को उस अच्छे कार्य का फल भी अच्छा ही मिलता है और यदि हम कोई भी बुरा कार्य करते है तो उस बुरे कार्य का फल भी हमें बुरा ही मिलता है। इसलिए हमको सदा ही अच्छे ही कार्य करने चाहिए और बुरे कार्यों से सदा ही बचाना चाहिए। कथा सुनना भी हर किसी के बस की बात नहीं है। हम एक दिन सुन लेंगे या दो दिन कथा सुन लेंगे पर सातों दिन कथा कोई कोई ही व्यक्ति सुन पता है। क्योँकि देवराज इन्द्र भी इस कथा को नहीं सुन पाए थे। ये कथा देवताओ से भी दूर आप सब के लिए इस विदेशी धरती पर भी आपको सुनने को मिल रही है। यही आप सब का सबसे बड़ा सौभाग्य है। सोचिये अगर इस संसार में साधु संत या कथाकार नहीं होते तो कब कहाँ कनाडा में कथा खत्म हो जाती है और कब कहाँ शिकागो में कथा शुरू हो जाती है। भगवान से जुडने का जो अवसर भागवत हमको देती है वो कहाँ हम सब को मिलता है। वो लोग बहुत ही धन्य है जिनका मन कथा को सुनने के लिए यहाँ पर पहुँच जाता है। वो मन बहुत ही तरसता है की हमको अपने उस परमात्मा की कथा सुननी है। मनुष्य का कभी कभी भगवान से विश्वास उठ जाता है लेकिन जैसे ही वह व्यक्ति भागवत कथा को सुनता है तो उस व्यक्ति का फिर से उस परमात्मा में विश्वास लौट कर वापस आ जाता है। ये तो केवल भगवान की कथा ही है जो हमको भगवान की तरफ लौट कर ले जाती है। और मानव जीवन का परम उद्देश्य तो केवल भागवत कथा को सुनना ही है। और हमारा कोई भी उद्देश्य नहीं है। हम सब ने अपना देश किस के लिए छोड़ा था, केवल पैसे के लिए ही न। पर क्या जब हम इस धरती को छोड़ कर जायेंगे तो क्या पैसा हमारे साथ जायेगा। तो ऐसा पैसा किस काम का है? जिसके लिए मैंने तो अपना सब कुछ ही छोड़ दिया था ऊपर जब मैं इस धरती को छोड़ कर जा रहा हूँ तो वही पैसा मेरे साथ नहीं है। लेकिन आप जो इस कथा को सुनते है ये आपको कभी भी नहीं छोड़ेगी। चाहे आप इस देश में हो या उस देश में हो। विश्व में भी रहो या मृत्यु हो जाये तब भी ये आप सब के साथ ही जाती है। ये तो सदा ही आप का साथ देने वाली है ये आप का कभी भी छोड़ने वाली नहीं है। आपके पास इतनी दौलत है क्या जिससे आप भगवान से कह दो कि भगवान हम आपको इतनी दौलत दे देंगे इसके बदले आप हमको मोक्ष दे दो। इस पर भगवान इस पापी मनुष्य से कहता है की तुम अपनी इस माया को अपने पास रखो। तुम जिस अपनी माया पर इतना उछाल रहे हो उस माया का तो केवल एक ही कण तुम्हारे पास है। वही लक्ष्मी तो सदा मेरे चरण दबा रही होती है। चौबीस घंटे मेरे साथ ही रहती है। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

29Sep 2017

"श्रीमद भागवत कथा का अर्थ ही मोक्ष है।"

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में टोरंटो, कनाडा में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के षष्टम दिवस में श्रीमद भागवत कथा में जीवन और मृत्यु का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने "नाम तुम्हारा तारणहारा न जाने कब दर्शन होगा, तेरी रचना कितनी सुन्दर तू कितना सुन्दर होगा" भजन से आज की कथा प्रारम्भ की। यहाँ पर महाराज श्री ने भगवान को ही अपना तारणहार बताया है। भगवान ही सभी सुखो को देने वाला होता है। भगवान ही हम सबको इस धरती पर सुख और दुःख को देने वाला होता है। भगवान के द्वारा ही हमें अपने कर्मों का फल मिल जाता है। महाराज श्री ने हमें बताया की श्रीमद भागवत कथा का अर्थ मोक्ष होता है। इसलिए हमें भागवत कथा अधिक से अधिक श्रवण करनी चाहिए। जो लोग भागवत कथा का श्रवण करते है उनका जीवन हर प्रकार से सफल हो जाता है और जो लोग भागवत कथा का श्रवण नहीं करते है उनके जीवन में कई समस्याएं आ जाती है। उनको अनेक कठिनाइयां आ कर घेर लेती है और उनका जीवन हर प्रकार से नीरस सा हो जाता है। उनके जीवन का कोई मतलब ही नहीं होता है। जो भी ज्ञान बड़े बड़े साधु संतों, बड़े-बड़े ऋषि मुनियों, बड़े बड़े ज्ञानी व्यक्तियों को कड़ी तपस्या करने से नहीं मिलता है वही ज्ञान हमें केवल इन सात दिनों में मात्र भागवत कथा सुनने से ही मिल जाता है। अगर हमें हिन्दू धर्म को बचाना है तो नाचने वाला, बंसी बजाने वाले कृष्ण की ही नहीं, उस गीता का ज्ञान देने वाले कृष्ण की भी हमको जरूरत है। हमें उनका भी प्रचार करना है। रास का मतलब केवल नृत्य नहीं है, नाचना नहीं है अगर आप रास के मतलब को समझोगे तो आपका जीवन ही निखार जायेगा। यहाँ पर कमजोर से कमजोर व्यक्ति भी लड़ सकता है, जिसमे खुद में कुछ भी दम नहीं होता है वो भी हमको लड़ने की धमकी देता रहता है। वो हमें ऐसे धमकी देता है जैसे सामने वाले को जान से ही मार देगा। अपने आप को खली से कम नहीं समझाता है। लड़ना तो बहुत ही आसान है लेकिन भगवान श्री कृष्ण ने अपने बाल्यकाल में जो किया है उसे बड़े-बड़े ऋषि मुनि नहीं कर सकते है। अगर भगवान की उन लीलाओं को समझने की जगह उन पर अगर हम कटाक्ष करे तो ये बहुत ही गलत बात है। हम सनातन धर्म प्रेमियों की बस एक यही कमी है हम सब पर अपने विचार थोपते है लेकिन दूसरों के विचार को सुन कर समझकर उनका सम्मान करना चाहिए। हम एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश में लगे रहते है। हम कहते है कि आप गलत बोलते है और हम ही सही बोलते है। बस इसी बात में लगे रहते है। हम सब का एक ही मार्ग है, हम सब को एक ही जगह जाना है। हाँ बस है इतना की हम सब भगवान के अलग अलग रूप को भजते है। दुनिया में जितने भी प्रेमी युगल हुए है वो उपासना के, पूजा के, पात्र नहीं हुए है। यहाँ पर पूरा का पूरा इतिहास उठा करके देख लो अगर कोई प्रेमी युगल पूजा का, उपासना का पात्र हुआ है तो वो राधा और कृष्ण भगवान हुए है और पूजा उसी की होती है युगो-युगो तक जो विषय उनका प्रचलित किया गया ,प्रचारित किया गया, वो शुद्ध हो, सात्विक हो। श्री राधा कृष्ण के प्रेम को हम लोग गलत तरीके से प्रस्तुत करते है। सबसे पहले तो हमें ये समझना चाहिए की ये गोपियाँ कौन है। हमें वृंदावन में जाना चाहिए और वृंदावन के निधिवन में जाना चाहिए। उस निधिवन की लता पता है जो उनसे जाकर के मिलिए आपको एक अलग ही अनुभव होगा। कहते है की वो लता पता ही रात्रि में गोपी बनती है और भगवान श्री कृष्ण प्रगट होती है, माता राधा प्रगट होती है और वो लता पता ही रात्रि में भगवान कृष्ण के साथ रास लीला करती है और सुबह को फिर से वो वृक्ष हो जाती है। आज भी ये हमारे वृंदावन में प्रचलित है। तो वो गोपियाँ कैसी होंगी। दुनियां को दिखाने के लिए वो जड़ बन जाती है और जब कृष्ण प्रगट होते है तो गोपियों का रूप धारण कर लेती है। जहाँ वासना का दूर -दूर तक कोई सम्बन्ध ही नहीं है। इस रास को भगवान कृष्ण कभी नहीं करते अगर कामदेव अहंकारी नहीं होते। यहाँ पर महाराज श्री ने पूछा की क्या तुमने कभी काम देव को हराया है। तुम एक स्त्री के साथ रहते हो तो भी तुम काम देव को नहीं हरा सकते हो लेकिन भगवान श्री कृष्ण ने सैकड़ों गोपियों के साथ रह कर और 16108 विवाह करके भी कृष्ण भगवान काम देव को हरा देते है तो बताइये की वो रास कैसे गलत हो सकता है। इस बात का प्रमाण अगर आपको चाहिए तो प्रमाण ये है की वृंदावन में काम को हराना ये है की वही कामदेव कृष्ण के पुत्र बनके आये जिनक नाम था प्रद्युम्न। ये सब इसलिए ही हुआ था कि कामदेव ने हर मान ली थी और उसी सब के कारण ही उन्होंने उनका पुत्र बनना स्वीकार किया और बोले की अब जो भी आप बोलोगे तो मैं वो सब करूँगा। उनकी पत्नी रो रही थी की मेरे पति को मार दिया है अब मेरा क्या होगा। तब भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि ये मेरा पुत्र आकर बनेगा तो तुम तुम इनकी पत्नी बनना। अब आगे ये मेरे पुत्र के रूप में तुमको प्राप्त होगा। ये सब कृष्ण ने उनसे तब कहा था जब कृष्ण भगवान केवल साढ़े सात साल के थे। यहाँ पर एक साढ़े सात साल का कृष्ण कामदेव को हरा देता है। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

28Sep 2017

"हमारी सभी इंद्रियां वो गाडी है जो हमें भगवान तक पहुंचा सकती है।"

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में टोरंटो, कनाडा में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के पंचम दिवस में श्रीमद भागवत कथा में मानव के इन्द्रियों के सही उपयोग का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने यहाँ पर कथा शुरू करने से पहले किशोरी जी से प्रार्थना की और "मेरे सर पर हाथ अपना रख दो राधा रानी जी" भक्तों को कराया। यहाँ पर महाराज श्री ने अपने भक्तों से कहा की कि उनको अपने आप को अपने इष्ट देव को समर्पित कर देना चाहिए। तभी हम सब का कल्याण हो सकता है। ताकि आने वाला हमारा समय अच्छा हो और हमको किसी भी तरह का कोई कष्ट न हो। यूँ तो मानव जीवन सभी को प्राप्त नहीं होता है और बहुत से व्यक्तियों को प्राप्त भी हो जाता है। लेकिन जिसको भी प्राप्त होता है क्या वो सभी इसका महत्व जानते है। जो व्यक्ति मानव जीवन को भगवान से मिलने का माध्यम समझ लेता है। वही मानव जीवन के उद्देश्य को समझ पाता है। यहाँ पर महाराज श्री ने हमें दो लोगों के बारे में बताया है। एक होता है जो हमें माया की बधाई कर कर के हमें नरक की तरफ भेजता है। और एक वो होते है जो भगवान की प्रशंसा कर कर के हमें भगवान की तरफ भेजने का मार्ग दिखाते है। तुमको उस गोविन्द से मिला देते है। तुम्हारा स्वर्ग, बैकुंठ सभी कुछ सुधर जाता है। उनकी बातों के द्वारा हम सब अपने उस भगवान के धाम तक पहुँच जाते है। यहाँ पर महाराज श्री ने बताया की मनुष्य के कान कुछ न कुछ तो सुनते ही है या तो वह माया के बारे में सुनता है या भगवान के बारे में सुनता है। जो लोग कहते है की देख उस व्यक्ति के पास कितना पैसा है, वह कितनी पार्टी करता है, वह कितना अमीर है, वह कितना घूमता है, वह कितना अच्छा खाना खता है, यह सब तो केवल माया की प्रशंसा ही है। अब तुम वैसा ही बनना चाहोगे। एक वो है जो आपको हर रोज भगवान की कथा सुनाते है चाहे वो आपको लगता है की वह झूठ ही बोल रहा है, लेकिन वह ये झूठ भी आपके लिए ही बोल रहा है। जिससे आपका मन लग जाये गोविन्द में। महाराज श्री ने कहा की इस संसार में कोई भी परफेक्ट नहीं होता है सिवाय भगवान के। तो हमें केवल इस बात को समझना चाहिए की जो भी हमें अच्छा रास्ता दिखाए हमें उसका धन्यवाद देकर आगे अपने रास्ते के लिए चल देना चाहिए। यही हम सब के लिए अच्छा होता है ताकि हमारा पथ आसानी से हमें मिल जाये। और हम को हमारी मंजिल में किसी भी तरह की कोई भी रुकावट नहीं आ पाए। भगवान श्री राम जब शबरी को नवदा भक्ति के बारे में बताते है। आपके तन के सभी भाग भगवान तक जाने के रास्ते है। आंखों से हम अपने भगवान को देखते है। कानों से हम भगवान के बारे में सुनते है और वाणी से हम भगवन के बारे में बोलते है। नाक से हम उस गंध को ग्रहण करते है। इस शरीर से हम उस स्पर्श को महसूस कर पाते है। तो यहाँ पर महाराज श्री ने इसके केवल दो रास्ते बताये है। एक रास्ता ऐसा है कि यदि हम इनका दुरूपयोग करेंगे तो हम नरक में जायेंगे और यदि हम इन्ही का सदुपयोग करंगे तो हम स्वर्ग में जायेंगे। जिन व्यक्तियों ने अपने कानों से भगवान की कथा नहीं सुनी है तो उसके ये कर्ण छिद्र सर्प बिल के समान है और जो लोग अपने इन कानो से उस भगवान की कथा को सुनते है तो वह स्वर्ग को प्राप्त करता है। वह लगातार उस परम ब्रह्म की कथा को सुनता ही रहता है। इन सभी इन्द्रियों को आप भगवान के द्वारा दी हुई गाडी ही समझो। यहाँ पर गाड़ी से मतलब है है हमें भगवान की कथा को सुनना भी है और उसके बारे में समझना भी है। इन सब चीजों को जो व्यक्ति सदुपयोग में लाता है वही सच्चा मानव कहलाता है। जो भी व्यक्ति इन सब बातों को समझ लेता है सच्चे अर्थों में वही सच्चा मानव कहलाता है। बाकि के लोग तो बोलते है की बस अपनी जिंदगी को काट ही रहे है। वो लोग तो केवल अपने दिनों को काटते ही रहते है, वो अपने दिनों को गुजारते भी है है। उनके जीवन का कोई भी औचित्य ही नहीं रह जाता है। हमारे जीवन का हर एक पल कीमती होता है, हमें सच्चे अर्थों में अपने जीवन को सहीं ढंग से जीना चाहिए। क्योँकि हमारे जीवन का जो भी समय निकल जाता है वो वापस लौट कर नहीं आ पाता है। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

25Sep 2017

"रामायण हमें जीना सीखाती है और भागवत हमें मरना सीखाती है।"

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में टोरंटो, कनाडा में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस में श्रीमद भागवत कथा में जीवन और मृत्यु का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। आज की कथा पूज्य महाराज श्री ने "ये जीवन है तेरे हवाले मुरलिया" भजन से की। इसके बाद महाराज श्री ने कहा की हमारे सनातन धर्म के मुताबिक ये नवरात्र हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण दिन है। इन दिनों में किया हुआ कोई भी सत कर्म हम लोगों को अधिक फल देने वाला होता है। इसलिए हमें इन दिनों में ज्यादा से ज्यादा अच्छे काम करने चाहिए। इन दिनों में देवी बहुत ही जल्दी से प्रसन्न हो जाती है। कल आपने श्रीमद भागवत कथा में सुना की किस तरह से राजा परीक्षित को श्राप लगा और राजा परीक्षित ने उसी समय में घर को त्याग दिया था। उनको श्राप यह मिला था की सातवें दिन आपको तक्षक नाग डस लेगा। जैसा की आप सब जानते है की यह श्राप हम सब को भी लगा हुआ है। श्री शुकदेव महाराज जी बहुत प्रसन्न हुए जब राजा ने उनसे प्रश्न किया था कि जिसकी मृत्यु सातवें दिन हो उसे क्या करना चाहिए? महाराज श्री ने हमें बताया की जो भी प्राणी इस धरती पर आया है उसकी मृत्यु तो एक न एक दिन जरूर ही होगी। जो भी इस धरती पर आया है वो एक दिन जायेगा जरूर। जब भी हम इस धरती को छोड़कर वहां पर जायेंगे तो हमसे सबसे पहले पूछा जायेगा कि तुम्हारे पेपर कैसे है। तुमने नीचे धरती पर जाकर क्या किया था। यक्ष ने धर्मराज से प्रश्न किया कि इस संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है। तब धर्मराज ने कहा कि सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि लोग अपने ही लोगों को शमशान में जाकर के जलाते है और स्वयं ऐसे जिन्दा रहते है कि जैसे वो कभी मरेंगे ही नहीं। लेकिन हम सब इस बात को जान कर भी इस बात से अनजान बने रहते है। यही तो मुर्ख व्यक्ति की पहचान होती है। राजा ने प्रश्न किया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो तो वो व्यक्ति क्या करे? तो शुकदेव महाराज जी ने कहा की तुमने यह प्रश्न अपने नहीं अपितु जगत के कल्याण के लिए मुझसे किया है। तुम तो जनकल्याण के पात्र हो। तुम भगवान की कृपा के पात्र हो। तब शुकदेव जी महाराज ने कहा कि हे राजन जिसकी मृत्यु सातवें दिन है उस व्यक्ति को श्रीमद भागवत कथा सुननी चाहिए। रामायण हमें जीना सीखाती है और भागवत हमें मरना सीखाती है। हम जिन भी चीजों के ऊपर बैठे है ,हमने जिन भी चीजों के ऊपर अपना सारा जीवन लगाया है। हमारे सनातन धर्म में स्त्री को शमशान में जाने की अनुमति नहीं होती है। हमारा ये शरीर भी केवल चिता तक ही हमारा साथ देता है। जिस शरीर को हम सब कुछ समझते है वो शरीर भी हमारा साथ नहीं देता है और जैसे ही चिता पर हमारा शरीर जलाया जाता है तो सभी हमारा साथ छोड़ देते है। उसके बाद केवल उस पवित्र आत्मा के द्वारा किये हुए अच्छे काम ही उस व्यक्ति के साथ जाते है। नहीं तो उस व्यक्ति को अकेला ही चलना पड़ता है। आप के द्वारा किये हुए सत कर्म ही आपके साथ है। वही आपका साथ निभाने वाले होते है। उसके अलावा कोई भी आपका साथ देने वाला नहीं है चाहे आप गौरे है या काले है। धनवान हो या निर्धन, मोटे हो या काले, परिवार बहुत बड़ा हो या बहुत ही छोटा इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है। तुमको तो अकेले ही जाना पड़ेगा। तुम्हारे द्वारा किये हुए सत कर्म ही तुम्हारा साथ देंगे और कोई भी नहीं देगा। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

26Sep 2017

"जब तक जीव भागवत से दूर रहता है तब तक भगवान की कृपा से दूर है।"

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में टोरंटो, कनाडा में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस में श्रीमद भागवत कथा में जीवन और मृत्यु का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कहा कि इस संसार में जन्म लेने वाला व्यक्ति, इस भवसागर में आने वाला व्यक्ति कभी अपने आपको सुखी पाता है तो कभी दुखी पाता है। इस संसार का यह सुख कभी भी स्थाई नहीं रहता है और इसी तरह से दुःख भी स्थाई नहीं रहता है। ईश्वर को त्याग करने वाला व्यक्ति, सत कर्मों को त्याग करने वाला व्यक्ति, धर्म का त्याग करने वाला व्यक्ति स्थाई रूप से दुखी हो जाता है। हमेशा सुखी रहने वाला व्यक्ति कौन होता है रामायण में इसका बहुत ही सुन्दर वर्णन किया गया है। जीव कब तक दुखी रहता है? जीव कब तक परेशान रहता है? यहाँ पर महाराज श्री ने एक मछली के द्वारा बताया है की आखिर कौन सच्चे अर्थों में सुखी है? एक मछली वहां पर दुखी होती है जहाँ पर पानी बहुत ही कम है और एक मछली वहां पर बहुत ही सुखी होती है जहाँ पर बहुत ही गहरा पानी होता है। तो सुखी रहने के लिए हमें इन मछलियों से सीखना चाहिए। हम लोग कहते है कि हम दुखी है पर उस दुखी रहने की वजह को तो हम जान नहीं पाते है या जानने की कोशिश ही नहीं करते है। समस्या ये है की अगर मछली जल से बाहर आ जाएगी तो वो दुखी हो जाएगी। मछली को सुखी रहने के लिए तो गहरे जल के अंदर जाना ही होगा। तभी वह हर तरह से सुखी रह सकती है। ठीक इसी तरह जीव तब तक ही दुखी रहता है जब तक वह भागवत से दूर रहता है। जब तक वह भागवत सप्ताह से दूर है तब तक भगवान् की कृपा से दूर है। जीव कभी भी सुखी नहीं हो सकता है। आप मकान, दुकान, परिवार ये सब तो बढ़ा सकते हो पर सुख को कभी भी बढ़ा नहीं सकते हो। यहाँ पर हम जिन चीजों को बढ़ा रहे है वो साधन साधन है सुख नहीं है और यहाँ पर साधन कभी भी हमको सुख नहीं दे सकते हैं। जीव केवल तभी सुखी रह सकता है जब वह उस जड़ रुपी परमात्मा से जुड़ जायेगा। हम सब लोगों की जड़ भगवान है और हम सब लोगों की जड़ हमारा धर्म है। जब तक जीव धर्म से नहीं जुड़ेगा तब तक वो इस संसार में दुखी रहेगा और जिस दिन जीव धर्म से जुड़ जायेगा और ईश्वर से जुड़ जायेगा उस दिन उसके सभी दुःख ख़त्म हो जायेंगे और वो हर प्रकार से सुखी हो जायेगा। यहाँ पर तुलसीदास जी कहते है कि जब मनुष्य ईश्वर से जुड़ जाता है तो उस को किसी भी प्रकार की समस्या नहीं सताती है। यदि आप धर्म से जुड़े रहे या भगवान से जुड़े रहे तो इस संसार में ऐसी कोई भी शक्ति नहीं है जो तुमको दुःख पहुंचा सके। इस संसार में जो कुछ भी होता है वो सब भगवान की मर्जी से ही होता है। कुछ भी उसकी मर्जी के बगैर नहीं होता है। यहाँ पर हमारे साथ अच्छा हो, बुरा हो, भला हो सब को भगवान की मर्जी समझ कर उसका आंनद लो। जो व्यक्ति दुःख में भी हसकर अपना जीवन जीता है वही व्यक्ति यहाँ पर सही अर्थों में सुखी होता है। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

23Sep 2017

"संसार हमेशा चलायमान है और हमेशा चलता रहता है यह कभी भी किसी के लिए नहीं रुकता।"

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में टोरंटो, कनाडा में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस में श्रीमद भागवत कथा कथा के महत्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कथा प्रारम्भ करते हुए कहा की नवरात्रि चल रहे है और आज नवरात्रि का दूसरा दिन है आप सभी भाग्यशाली है जो इस पावन अवसर पर कथा का रसपान कर रहे हैं। हिन्दू परम्परा में, हिन्दू संस्कृति में कुछ दिन विशेष दिन होते है विशेष तौर पर ये ऐसे पवित्र दिन होते है जिसमें व्यक्ति अगर थोड़ा- सा भी सत्कर्म करता है तो उसका लाभ अधिक मिलता है। यदि माता रानी को मनाना है तो शक्ति की पूजा किये बगैर आप शक्ति को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। नौ देवियों की पूजा इन नौ दिनों में की जाती है। ये सभी माँ जगदम्बा का ही रूप हैं। माँ भगवती अनेकानेक रूपों में अपनी कृपा प्रदान करती है। मैं हमेशा आपको बताता हूँ कि माँ वैष्णो देवी भगवान श्री कृष्णा की बहन ही है। इसके बाद महाराज श्री ने कहा की ये जो आत्मा है, ये अजर, अमर है, अखंड है, अग्नि इसको जला नहीं सकती, पानी इसको डूबा नहीं सकता, तलवार इसे काट नहीं सकती। संसार का यह सत्य है, सत्य तो यही है जो आया हैं वह जायेगा, राजा रंक फ़क़ीर उसे भी जाना हैं। इसीलिए उसे शोक नहीं करना चाहिए। जैसे हम सब अपने शरीर के वस्त्र बदलते हैं, आज जो वस्त्र पहने हैं उसे धुलने डाल देते हैं और दूसरे पहनते हैं ठीक उसी प्रकार आत्मा भी वस्त्र बदलती हैं और आत्मा का वस्त्र यह शरीर हैं। जब वस्त्र पुराना हो जाता हैं तब वह आत्मा दूसरा शरीर धारण कर लेती है। यह आज से नहीं युगो-युगांतर से है उसी क्रम के तहत जो हमेशा से चला आ रहा है इसी क्रम में जो हमेशा से चला आ रहा है। पूज्य पिता जी ने कुछ समय पूर्व गोलोक के लिए प्रस्थान किया इसीलिए यह संसार हमेशा चलायमान है और हमेशा चलता रहता है किसी के लिए भी नहीं रुकता है। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

24Sep 2017

"अपने अहंकार का त्याग करके ही दुनिया के भवसागर को पार किया जा सकता है।"

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में टोरंटो, कनाडा में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस में शुकदेव जी महाराज की लीलाओं का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा प्रारम्भ करते हुए महाराज श्री ने कहा कि श्री राधा ने भगवान श्री कृष्ण से पूछा भगवान आप इतने परेशान क्यों हैं... भगवान श्री कृष्ण से कहते हैं इस कलयुग में रह रहे लोगो के दुःख देख के बहुत दुखी हूँ... कैसे ये लोग अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं... तब श्री राधा ने कहा भगवान आप तो सब जानते हैं आप ही क्यों नहीं इन लोगो के उद्धार के लिए कुछ करते? तब श्री कृष्ण ने कहा मेरा कोई ऐसा दूत जो इन्हे मेरी कहानी सुनाये.. जिससे लोगो का उद्धार हो.. मेरी कथाये इन्हे मौका देगा इन्हे मेरे से जुड़ने का ... सुखी रहने का.. तब श्री राधा ने पूछा, ऐसा कौन जायँगे.. तब श्री कृष्ण ने कहा शुकदेव जायँगे.. जब माँ पार्वती जी ने भगवान भोले से कथा सुनाने के लिए कहा तो भोले बोले देख के आओ कैलाश पर कोई और तो नहीं हैं। माँ पार्वती ने देखा और उन्हें कोई नहीं मिला लेकिन वह शुक छुपे बैठे थे और भोले कथा सुनाने लगे। कथा सुनते सुनते माँ पार्वती सो गयी और शुक कथा सुन रहे थे। माँ पार्वती ने ऐसा क्या किया जिसकी वजह से वो कथा पूरी नहीं सुन पाई? माँ पार्वती के पूर्व जन्म में जाइये जंहा :- कथा मन से नहीं सुना, राम पर विश्वाश न रखना, अपने पति की परीक्षा लेना, अपने पति पर अविश्वाश रखना, ये सभी पाप कहलाते हैं। जिसके कारण माँ पार्वती सती हुई और इस जन्म में माँ पार्वती कथा नहीं सुन पाई। श्री शुकदेव जी महाराज ने अपना घर छोड़ दिया, अपने माँ पिता जी को छोड़ दिया। अपने तन पर एक वस्त्र नई रखा और घर-बार सब छोड़ दिया। भवसागर को पार करने के लिए क्या क्या करना पड़ता हैं। अपने अभिमान को त्यागना पड़ता हैं। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

31Aug 2017

"बिना स्वार्थ के की गयी भक्ति से भगवान भी आपके ऋणी हो जाते है "

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में एप्पल वैली, कैलिफोर्निया-अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के पंचम दिवस में श्रीमद भागवत कथा में जीवन में भक्ति के महत्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कथा शुरू करने से पहले अपने सभी भक्तों को एक प्यारा सा भजन " वृंदावन धाम अपार भजे जा राधे राधे" श्रवण करा सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस भजन के द्वारा महाराज श्री ने अपने सभी भक्तों को ठाकुर जी की भक्ति के लिए प्रेरित किया। ब्रज में, गोकुल में, बरसाने में, गोवर्धन में, रावल ग्राम में, नंदगाव में, जहाँ भक्ति महारानी स्वयं आनंदित होकर नृत्य करती है। जहाँ जगतपति अखिल ब्रह्माण्ड नायक, जगत रचियता अकारण ही अवतरित होकर आते है। जहाँ ब्रज की गलियों में संत बहुत ही अच्छा पद गाते है कि वृंदावन की महिमा तीन लोक से न्यारी है। इतने प्यारे वृंदावन की विशेषता का वर्णन कौन कर सकता है। जहाँ कर्म और धर्म दोनों ही मिलकर रस्सी बून रहे है और मुक्ति वृंदावन में पानी भर रही है। भला ऐसी विशेषता वाले वृंदावन का वर्णन कौन कर सकता है। हमारे आचार्यों ने तो यहाँ तक कहाँ है कि वृंदावन के बाहर अगर भगवान भी तुमको दर्शन देने के लिए तैयार हो तो तुम दर्शन मत करना। हमें श्री कृष्ण से प्रार्थना करनी चाहिए की हमें तो आपके दर्शन केवल वृंदावन में ही करने है बाहर नहीं। हमें वृन्दावन की सीमा के बाहर तो आपके दर्शन तो दूर हम आपको देखना भी नहीं चाहते है। हम तो आपको सदा सदा के लिए वृंदावन में ही देखना चाहते है। तब एक भक्त ने कहा की महाराज क्या मिलता है आपके वृंदावन में? ऐसा है क्या वहां पर? तब महाराज श्री ने कहा की वृंदावन में दो तरह के विजिटर्स आते है। एक विजिटर्स आते है की चलों बिहारी जी के दर्शन कर आये। आते है बिहारी जी के दर्शन करते है और चले जाते है और दूसरे विजिटर्स जाते है ये सोचकर की जाना तो है और मिलकर आना है। एक उस तरीके के भक्त जाने है और सोचते है की अगर हमें प्रभु जी मिल जाए तो हमारा भाग्य ही बदल जायेगा। तब महारज श्री ने वहां पर मौजूद सभी भक्तों को एक बालक की कथा सुनाई। एक बालक गुरु की आज्ञा से वृंदावन में वास करता था और पुरे दिनभर राधा कृष्ण का जाप करता रहता था। वह बालक यह काम अपने प्रति दिन करता रहता था। उसका काम ही था भगवान की युगल उपासना करना और कोई काम उसका दूसरा कुछ भी नहीं था। जब भी वह बालक बिहारी जी के मंदिर में जाता था पर उस बालक को वहां पर बिहारी जी के दर्शन नहीं होते थे। इस तरह से दिन बीतते गए और उस बालक को यह अहसास हुआ की वह भी यह सोचने लगा की की मैं बहुत ही बड़ा पापी हूँ। इसलिए ही बिहारी जी मुझे दर्शन नहीं देते है बाकि सभी को बिहारी जी के दर्शन हो जाते है। सबकी पुण्य आत्मा है इसलिए ही बिहारी जी सबको दर्शन देते है और मैं पापी हूँ इसलिए बिहारी जी मुझे दर्शन नहीं देते है यही बात उस बालक के मन में घर कर गयी। जब ये बात उस बालक के मन में घर कर गयी तो वह सोचने लगा की जब हम इतने ही पापी है तो हमारा जीना ही बेकार है और वह बालक मरने के बारे में सोचने लगा और यमुना जी की तरफ बड़े ही उदास मन से जाने लगा। यमुना के तट पर एक कोढ़ी लेटा हुआ था उसको अचानक ठाकुर जी ने सपने में आकर कहा की तू एक कोढ़ी है और अगर तुझे अपना कोढ़ ठीक करना है तो अभी सुबह-सुबह यहाँ से एक बालक गुजरेगा तो तू उस बालक के पैर पकड़ लेना और तब तक मत छोड़ना जब तक वह बालक तुमसे ये न कह दे की जा तेरा कोढ़ ठीक हो जायेगा। जब वह बालक वहां से गुजरा तो उस कोढ़ी ने उस बालक के पैर पकड़ लिए तब उस बालक ने कहा की तुम मेरे पैर छोड़ दो। इस पर वह कहने लगा की मैं तो नहीं छोडूंगा आपके पैर। मैं तो आपके पैर जब छोडूंगा जब आप मुझसे कह दो की जा तेरा कोढ़ ठीक हो जायेगा। इस पर बालक बोला की मैं कोई भगवान थोड़े न हूँ जिसके कहने से तेरा कोढ़ ठीक हो जायेगा। इस पर बालक बोला की मुझसे बड़ा पापी ही कोई नहीं है इस धरती पर जिसको बिहारी जी के दर्शन ही नहीं होते है बाकि सभी को तो बिहारी जी दर्शन हो जाते है। इतना बड़ा पापी हूँ की मुझे बिहारी जी के दर्शन ही नहीं होते है। मैं झूठ क्योँ बोलूं। पर कोढ़ी कहने लगा की नहीं आप कह कर तो देखो। पर बालक फिर भी मना करने लगा। पर फिर उस कोढ़ी ने कहा की मैं तो तब तक तुम्हारा पैर नहीं छोडूंगा जब तक तुम ये न कहो की जा तेरा कोढ़ ठीक हो जायेगा। इस पर बालक उस कोढ़ी से बोला की आप मुझसे झूठ बुलवाना चाहते हो तो कोढ़ी बोला की झूठ नहीं आप बोल कर तो देखो एक बार। तो इस पर गुस्से में आकर उस बालक ने आखिर कह ही दिया की जा तेरा कोढ़ ठीक हो जायेगा। बस इतना ही कहना था उस बालक का कि उस कोढ़ी का कोढ़ ठीक हो गया। इस पर वह बालक और भी गुस्से में आ गया और कहने लगा की महाराज हमारे द्वारा कहने से आप किसी का कोढ़ तो ठीक करवा सकते हो पर हमको दर्शन नहीं दे सकते हो। इसका मतलब तो एक ही की आप केवल छलिया ही हो सभी लोग आपके बारे में ठीक ही कहते है। अगर आपने मुझे अभी दर्शन नहीं दिए तो मैं अभी यमुना में अपने प्राण ही त्याग दूंगा। वह तेज गति से उस यमुना की तरफ बढ़ने लगा तभी बांके बिहारी जी ने उस बालक के सामने आकर दर्शन दिए और कहने लगे की आप कहाँ जा रहे हो। तो इस पर उस बालक ने कहाँ की क्योँ आपने इतने दिनों से मुझे दर्शन नहीं दिए और अब दिए भी तो पहले हमसे झूठ बुलवा कर इस कोढ़ी का कोढ़ ठीक करवा लिया। जब मैं यमुना जी में मरने के लिए जा रहा हूँ तो आपने हमें दर्शन दे दिए है। ये सब लीलाएं आप हमसे क्योँ करते है? तब उस बालक को अपने गले से लगा कर बिहारी जी कहते है की देख मेरे प्यारे तू तो एक गजब का भक्त है। तू पुरे दिनभर ही मेरी भक्ति में डूबा रहता है। तू हर पल मेरा नाम जपता रहता है। पर बड़ी विचित्र बात तो ये है कि तू कभी भी मुझसे कुछ मांगता ही नहीं है। जब तू मुझसे कुछ मांगता ही नहीं है तो तेरी भक्ति का ऋण मुझपर कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था। मैं अपने आप को यह नहीं समझा पाता हूँ की मैं तुझे दर्शन देकर तेरे प्यार का ऋण चुका सकूँ। तूने कभी कुछ नहीं माँगा मुझसे और सदा ही सत कर्म में लिप्त रहता है। इसलिए ही तो मैंने यह सब लीला रचाई है और अब मैंने तुम्हारे द्वारा यह कार्य करवा कर तेरा ऋण कुछ कम किया और आज मैं तुझे दर्शन देने के लिए आ गया हूँ। राधे राधे बोलना पड़ेगा !!

31Aug 2017

"मानव जीवन का एकमात्र उद्देश्य है और वो है प्रभु की प्राप्ति करना "

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में एप्पल वैली, कैलिफोर्निया-अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के षष्टम दिवस में श्रीमद भागवत कथा में जीवन के महत्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कहा कि एक अभूत ही प्रेरणादायक भजन है कि जीवन में इंसान किसे कहते है। यहाँ पर कौन सहीं मायने में इंसान है। यूँ तो आप सब देखते ही है कि असभ्य अपना अपना जीवन व्यतीत कर ही रहे है। लेकिन सहीं मायने में हम किस को कहेंगे की मानव कौन है। अच्छा ,बुरा ,भला ,कौन है मानव। जो हमेशा दुसरो का बुरा चाहता है क्या वो सहीं मायने में इंसान कहलाने के लायक है। या दूसरों का भी भला सोचता है वही सही मायने में इंसान होता है। मानवता को इंसान को सेल्फिश होकर दुसित नहीं करना चाहिए। अगर हम सेल्फिश होकर दुसित कर देंगे और यहीं सोचे की वह इस धरती से मिट जाये तो वो व्यक्ति कभी भी मानव कहलाने के लायक नहीं है। वो तो केवल शैतान कहलाने के लायक ही होता है। इंसान वहीँ होता है जो हमेशा निश्वार्थ होकर दूसरों की सेवा करता है। हमें यह प्रार्थना करनी चाहिए की हमारी वजह से पापी भी सुधर जाये। हमें सीसा नहीं सोचना चाहिए की पापी इस धरती से ही मर जाये। मरने से पहले उस पापी की आत्मा भी सुध हो हमें ऐसी प्रार्थना करनी चाहिए। कोई मर जाये या मिट जाये हमें ऐसा नहीं सोचना चाहिए। क्योँकि पाप तो हम सब ने भी किये है। फिर दूसरों के बारे में हमें ऐसा नहीं सोचना चाहिए। हमको पाप से साद ही नफरत करनी चाहिए लेकिन पापी के नहीं करनी चाहिए। वो पाप जो सामने वाले ने किया है वो पाप हमसे आगे चलकर न हो ऐसी हमें जीवन भर कोशिश करते रहनी चाहिए। यहाँ पर महाराज जी ने एक प्यारा भजन "किसी के काम जो आये उसे इंसान कहते है "नमक गीत सुना कर वहां पर मौजूद सभी भक्तों के मन को मोह लिया। बाहत से लोग है जो जो कथाओ से बहुत कुछ सीख लेते है। और अपने जीवन को काफी डेवलप कर लेते है। ये तो आप के ऊपर ही निर्भर करता है की आप कैसे उसका चुनाव करते है। महाराज जी सदा ही हमसे कहते है की हमें अपने जीवन में जीवन के महत्व को समझना चाहिए। और जीवन के उद्देश्य को समझना होगा। पहले हमें अपने जीवन में एक लक्ष्य को निर्धारित कर लेना चाहिए। जब तक हम अपने जीवन में एक लक्ष्य नहीं निर्धारित कर लेते है तब तक हमें यही नहीं पता होता है की हमें करना क्या है। हमारा जीवन उस बेकार इंसान की तरह हो जाता है जो इस धरती पर बेकार ही घूमता रहता है। तो सबसे पहला हमारा कर्तव्य होता है कि हमें अपने जीवन में लक्ष्य को निर्धारित करना चाहिए। कहते है की जब तक हम लक्ष्य नहीं बना लेते है की हमको करना क्या है तो हमारे सब काम ही बेकार जाते है। हमारा जीवन ही बेकार हो जाता है। इसलिए ही हमें साद ही अपने जीवन में एक लक्ष्य बना लेना चाहिए की हमको आगे अपने जीवन में करना क्या है , हमको कुछ लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए काफी कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। क्योँकि बिना मेहनत के हमें अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकते है। इसलिए हमें सदा ही मेहनत करते रहना चाहिए और मेहनत से कभी भी घबराना नहीं चाहिए। तब महारज श्री ने एक दृष्टांत हमको सुनाया। भगवान् के दिए हुए इस जीवन के साथ हमको सिर्फ खेलना है चाहिए। हमको तो इसके उद्देश्यों को भी समझना चाहिए। एक बहुत ही विद्वान पंडित थे जो अपने स्कूल के बच्चो को पढ़ा कर आते थे लेकिन घर पर आने के बाद उसकी पत्नी उनसे लड़ती थी। वो विद्वान पंडित चाहे कितना भी अच्छा काम कर ले पर उसकी पत्नी साद ही उसको भला बुरा बोलती थी। उसके काम से वो कभी भी खुश नहीं रहती थी। उनकी पत्नी उनसे हर रोज लड़ती झगड़ती रहती थी। वो पंडित हर रोज स्कूल जाता बच्चो को पढ़ाने और घर आकर पत्नी लड़ती रहती है तो वो काफी अपसेट हो गया। और वो सोचने लगा कि अब तो मेरा जीवन ही बेकार है। ऐसी जिंदगी ही ही बेकार है। क्या करूँगा ऐसी जिंदगी जीकर मैं। यहाँ पर समाज ,घर ,पत्नी ,बच्चे सभी मेरे खिलाफ है। तो कई बार व्यक्ति डिप्रेसन में आकर गलत कदम उठा लेता है। तो समाज की भी यही ड्यूटी है की किसी भी व्यक्ति के पीछे हाथ धोके न पड़े। कहीं हमारी वजह से कोई डिप्रेशन में न आ जाये। पर कहाँ दूसरों के बारे में हम सोच पाते है। आज कल तो अपने ही बारे में हम नहीं सोच पाते है। तब वो विद्वान पडित सोचने लगे की क्योँ न मैं अपना आत्मदाह कर लूँ। पर आत्मदाह से पहले बोले चलो पहले संत जी से परामर्श ले लेता हूँ शायद ही कोई उपाय निकल आये। तब पंडित जी महात्मा जी के पास गए। तब महात्मा जी वहां पर पत्तल बना रहे थे। तब पंडित जी ने कहा कि महात्मा जी मुझे आप से कुछ बात करनी है। लेकिन महात्मा जी अपना पत्तल बनाने का काम करते रहे। तब पंडित जी महात्मा से बोला की महाराज बहुत ही जरुरी काम है मुझे आप से जरुरी बात करनी है। पंडित जी बोले की महात्मा जी ये काम जरुरी नहीं है जो आप कर रहे है। काम तो ये जरुरी है जिसके लिए मैं यहाँ पर आया हूँ। तब महात्मा बोले मैं भी तो काम ही कर रहा हूँ। तब पंडित बोला की जो प्रश्न मैं लेकर आया हूँ वो मेरे जीवन और मरण का सवाल है और आप पत्तल बनाने में बने हैं। और पंडित जी वहां से नाराज होकर जाने लगा। तब संत ने पत्तल बना लिए और उससे कहाँ की इधर आओ और बताओ की तुमको क्या समस्या है। तब पंडित बोला की समस्या क्या मैं बड़ा ही परेशां हूँ जिंदगी में। कभी भी मैं किसी को खुश नहीं कर पा रहा हूँ। मैं खुद ही अपने आप को खुश नहीं कर पा रहा हूँ। मैं घर में जब भी जाता हूँ पत्नी बेवजह ही मुझसे लड़ती झगड़ती रहती है। मेरा मन करता है की मैं अपना आत्मदाह कर लूँ। तो आप मुझे सलह दीजिये की क्या मैं मर जाऊ। तब संत ने कहाँ की जो तुम चाहो तुम्हारी ही तो जिंदगी है। तब महात्मा ने उस पंडित से कहाँ की तुमने देखा कि मैं क्या कर रहा था। तो पंडित जी बोला की क्या कर रहे थे तो संत ने कहाँ कि मैं पत्तल बना रहा था। आप ऐसी पत्तल बना रहे थे जिसको आप को फेंक ही देना है। आपको मेरे जीवन की कोई भी परवाह नहीं है। आपको तो उस पत्तल की परवाह है जिपर भोजन करने के बाद फेंकना ही है। तब संत ने पंडित से कहाँ की पत्तल को फेंकना कब है भोजन के बाद यानि यूज करने के बाद पहले नहीं फैकना है। अगर उद्देश्य प्राप्त हो जाए तो पत्तल को तो फेंकना ही है। लेकिन उद्देश्य से पहले नहीं फैकना है। तब संत ने पंडित से कहाँ की के समझे जिंदगी में जब तक उद्देश्य प्राप्त नहीं हो जाता है तो हमें आत्मदाह के बारे में नहीं सोचना चाहिए। और मानव जीवन का उद्देश्य प्रभु की प्राप्ति है। और जब तक प्रभु की पर्पटी न हो जाये तब तक मरने के बारे में सोचना भी पाप है। राधे राधे बोलना पड़ेगा !!

30Aug 2017

" आपके कर्म जैसे होंगे भगवान आपको वैसे ही फल देता है "

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में एप्पल वैली, कैलिफोर्निया-अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस में श्रीमद भागवत कथा में जीवन के महत्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कहा कि भगवान ने हम सबकी किस्मत अपने हाथों से लिखी है और उन लोगों की किस्मत का क्या कहना जिन लोगों की किस्मत में ठाकुर की भक्ति हो, गोविन्द का प्यार हो और उन की कथा को श्रवण करने का अधिकार हो। माँ बाप की सेवा जो कर सके, धर्म और देश का सम्मान जो कर सके ऐसे लोगों की किस्मत का क्या कहना है। उन लोगों का भाग्य बहुत ही बड़ा होता है। यहाँ पर महाराज श्री ने बहुत ही प्यारे भजन "एक झोली में फूल खिले है ,एक झोली में कांटे रे कोई कारण होगा " भक्तों को श्रवण करवाया। आपके कर्म जैसे होंगे आपको वैसे ही फल मिलते है। इस भजन के द्वारा महाराज श्री ने लोगों को सच्चाई के रास्ते पर चलने के लिए लोगों को प्रेरित किया। और बुराई के रास्ते को सदा के लिए छोड़ने के लिए कहा। क्योँकि इस रस्ते पर चलकर ही हम सब का जीवन कष्टकारी हो जाता है। यहाँ पर सब व्यक्तियों को शांति चाहिए। जो लोग सदा के लिए भगवान के बने है उन लोगों की रक्षा भी तो भगवान ने सदा ही की है। हमें अपने आप को सदा के लिए भगवान की भक्ति में समर्पित कर देना चाहिए। तभी तो हमारा हर प्रकार से भला हो सकता है। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा कि पैसा आपको सुख नहीं दे सकता है, साधनाये आपको सुख नहीं दे सकती है। सुख तो हमारा मन ही हमको दे सकता है। हमारा सब्र भी हमको सुख दे सकता है और जब तक हमारे पास ये सब चीजे नहीं है तो हमको सुख प्राप्त नहीं हो सकता है। हम जो भी करते है तो हमें वो सब अपने गोविन्द के चरणों में अर्पित कर देना चाहिए। क्योँकि भगवान के चरणों में अर्पित की हुई कोई भी वस्तु हमें हज़ार गुना हो कर वापिस मिलती है। हम जब भी कोई गीता पाठ करते है, कोई भजन गाते है, कोई कथा सुनते है, कोई सत कर्म करते है या भागवत श्रवण करते है तो हमें श्रवण करने के बाद उन सब को गोविन्द के चरणों में ही समर्पित कर देना चाहिए। जिस समय भगवान राम धनुष तोड़ने के लिए जा रहे थे तो उस समय सब मिथिला वासियों ने अपने सारे सत कर्मों को याद किया और कहने लगे की हम सबने अपने जीवन जितने भी सत कर्म किये हो वो सभी भगवान राम को लग जाये और वो इस धनुष को तोड़ दे। क्योँकि हम सब के द्वारा किया हुआ सत कर्म कभी भी खाली नहीं जाता है। हमें अपने सत कर्मों को करने के बाद कभी भी दूसरे व्यक्तयों के सामने नहीं गाना चाहिए। क्योँकि ऐसा करने से हमारे द्वारा किये हुए सत कर्म का फल कम हो जाता है। हमें किये हुए कर्मों का बखान नहीं करना चाहिए। चाहे दूसरे हमारे किये हुए कर्मों का बखान करते फिरे। क्योँकि जब राम ने धनुष को तोडा था तो भगवान राम मिथिला वासियों के जीजा भी बन गए थे और सदा के लिए मिथिला में ही रह गए थे ऐसा ही मानना है मिथिलावासियों का। यहाँ पर वो सब कहते है कि अगर भगवान से सम्बन्ध जुड़ जाये तो इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है। महाराज श्री ने बताया कि हम सब चाहते है कि जो भी हमारे शहर का पावरफुल व्यक्ति हो उससे हमारा सम्बन्ध जुड़ जाये। कौन व्यक्ति नहीं चाहता है की हमारा राम के साथ और कृष्ण के सम्बन्ध जुड़े। जो ये सब नहीं चाहता है वो तो बद किस्मत वाला है और जो ये सब चाहता है वही किस्मत वाला है। उनसे सम्बन्ध जोड़ना भी आसान है और निभाना भी आसान है। दुनिया से तो छोटे से छोटा रिश्ता निभाना भी मुश्किल होता है। लेकिन जब भगवान से सम्बन्ध जुड़ जाये तो इससे बड़ी कोई बात हो ही नहीं सकती है। जिससे भगवान राम हमेशा के लिए मिथिलावासियों के बन कर मिथिला में ही रह गए थे। हमें सदा अपने गोविन्द के साथ ऐसा रिश्ता बना लेना चाहिए जिससे हमारी ज़िंदगी सुधर जाए। हम सब को ये तो पता ही है की हमारी मृत्यु तो निश्चित ही है तो इसको सफल बनाने के लिए हमें अपने इस जीवन में अच्छे अच्छे काम करने चाहिए। हम जितने अच्छे काम करेंगे तो हमें फल भी तो उसी के अनुसार ही मिलेंगे। महाराज श्री ने बताया कि ये शरीर तो एक वस्त्र के सामान है। आत्मा इस वस्त्र रुपी शरीर को समय समय पर बदलती रहती है। एक बार एक स्त्री ने महाराज जी से कहा कि महाराज मुझे मरना नहीं है तो महाराज ने कहा की क्योँ नहीं मरना है। तब स्त्री ने कहा कि महाराज मुझे मरने से डर नहीं लगता है मुझे तो मरने के बाद जलाते है उससे डर लगता है। तब महाराज श्री ने कहा कि कोई बात नहीं है एक बार मृत्यु को आ जाने दो तब देख लेंगे। तुम मरने के बाद जलने से मत डरना। मृत्यु तो हर व्यक्ति के जीवन में आती ही है। क्योँकि जिस भी व्यक्ति ने इस धरती पर जन्म लिया है तो उसको इस धरती से भी तो एक दिन जाना ही होता है। क्योँकि जो इस धरती पर आया है उसको इस धरती से एक दिन जाना भी तो होगा। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

27Aug 2017

"भगवान हमारे जीवन का सबसे बड़ा पासपोर्ट है।"

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में एप्पल वैली, कैलिफोर्निया-अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस में भगवत कथा के महत्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कहा कि भादों के महीने में श्रीमद भागवत कथा सुनना कोई आसान काम नहीं है। भादों के महीने में ही समय है राधा अष्टमी का। कृष्ण जन्माष्टमी हमने वृंदावन में मनाई थी और राधा अष्टमी हम अमेरिका में अपने भक्तों के साथ मना रहे है। भागवत भी हमको आसानी से सुनने को नहीं मिलती है ये भी हमें अपने बहुत ही जन्मो के पुण्य करने के बाद प्राप्त होता है। हम और आप बहुत ही भाग्यशाली है जिन्हे घर बैठे ही भागवत कथा सुनने का अवसर मिल रहा है। पांच तत्व से हमारा शरीर चल रहा है और उन पांच तत्वों को जिसने बनाया है वह है भगवान श्री कृष्ण और उन सब का संहार करने वाले भी श्री कृष्ण ही है। हमारे अंदर जीव तीन तरह से जीवित रहता है ये है दैहिक, जैविक और भौतिक। दैहिक होता है शारीरिक कष्ट, शारीरिक सुख। दैविक होता है देवताओं द्वारा दिया हुआ कष्ट और देवताओं के द्वारा दिया हुआ सुख। भौतिक होता है हमारे अपने लोग, समाज के लोग जिनसे कभी हम सुख की अनुभूति करते है और कभी दुःख की अनुभूति करते है। इन त्रितापों को जन्म देने वाला भी कोई और नहीं है वो तो हमारे भगवान श्री कृष्ण ही है। वही श्री कृष्ण जो हमको इस धरती पर भेजते है, हमारा पालन पोषण करते है और हम सब का संहार भी करते है। वही ही इन तीनो वजहों का जन्म का, पालन का और मृत्यु का कारण है। जीव सबसे ज्यादा दुःख कब पता है जानते हो? जब उस कारण को भूल कर अन्य यत्र तत्र भटकता रहता है। हमको उस कारण को कभी भी भूलना नहीं चाहिए। जब जीव इस कारण को भूलता है तो उसे इन कष्टों को भुगतना पड़ता है। उदहारण के तौर पर महाराज श्री ने कहा कि यदि आप विदेश चले जाये और अपना पासपोर्ट खो दो तो आपको सुख मिलेगा या दुःख मिलेगा। तब महाराज बोले की हमको काफी परेशानी होगी और भगवान हमारे जीवन का सबसे बड़ा पासपोर्ट है। हम इस दुनिया में आये है और भगवान रुपी पासपोर्ट हमने अगर खो दिया तो निश्चित ही हमें सदा ही अपने जीवन में कष्टों का सामना ही करना पड़ेगा। यहाँ पर व्यक्ति अपनी वजह से ही खुद भी दुःख पाता है और दूसरों को भी दुःख देता है। कई बार हम ये कहते है की हमको तो इसने दुःख दे दिया है या उसने दुःख दे दिया है पर ऐसा नहीं है। हम तो दुःख अपनी वजह से ही पाते है। इसके लिए हम दूसरों को दोषी नहीं ठहरा सकते है। महाराज श्री ने कहा कि आप जो भी करते है भगवान उसी का फल हमको देता है। संत को महाराज श्री ने भगवान की उपाधि दी है। अगर मानव जीवन आपको मिला है तो सबसे पहले उस ब्रह्म को, उस श्री कृष्ण को जानने की कोशिश करो, उस परमात्मा को जानने की कोशिश कीजिये। वो निराकार वादियों के लिए ब्रह्म है, साकार वादियों के लिए कृष्ण है और भक्तों के लिए वो परमात्मा है। भगवान तो केवल एक ही होता है केवल उसके रूप अलग-अलग हो सकते है। लोग जिस भी रूप में उसे याद करते है तो भगवान अपने भक्तों को उसी रूप में उनको मिल जाते है। अगर हम सब अपने जीवन में जीपीएस रूल को फॉलो करेंगे तो हमेशा ही खुश रहेंगे। हमारा ये ही मकसद होना चाहिए की हम कैसे उस ब्रह्म को, भगवान को, या परमात्मा को जान सके। हमें सदा ही अपने परमात्मा में खोये रहना चाहिए। बहुत से लोग कहते है कि अगर हम भागवत सुनेंगे तो हमें क्या मिलेगा? सबसे पहले इंसान को अपने धर्म के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा कि पूरी जानकारी तो किसी को भी नहीं है पर लेकिन जितनी ज्यादा से ज्यादा जान सको तो जान लो। तभी हम सब का इस संसार में कल्याण हो सकता है। सतयुग में, द्वापर में और त्रेता इन तीनो युगों में हज़ारों-हज़ारों वर्ष तप करो और तपस्या भी कैसी कि एक पैर पर खड़े हो कर, या जल में खड़े हो कर, पेड़ के नीचे खड़े हो कर आदि इतनी घनघोर तपस्या के बाद भी पता नहीं है की भगवान हमसे प्रसन्न होंगे या नहीं। कलयुग में मात्र केवल नियम से सात दिन भागवत कथा सुनो तो हम वो सब पा सकते है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते है। यहाँ पर व्यक्ति को धर्म पर विश्वास इसलिए नहीं होता है क्योँकि यहाँ पर चमत्कार नहीं होते है। तब महारज श्री ने एक बच्चे की बात बताई। एक बच्चा था पन्द्रह सोलह साल का। डॉक्टरों ने कहा कि उस बच्चे को कैंसर है और वो भी लास्ट स्टेज का कैंसर है जिससे बचाया नहीं जा सकता है। तब वह बच्चा भागवत कथा सुनने की रट करने लगा और सुनी भी उसने कथा। और महाराज श्री मुझे जैसे कथा सुनाएंगे मैं वैसे ही सुनूंगा और पूरी कथा सुनुँगा। भागवत कथा के सुनने से ही उस बच्चे का लास्ट स्टेज का कैंसर भी ठीक हो गया था। ये तो भगवान की महिमा ही है जिसके सुनने मात्र से ही उसके सभी कष्ट दूर हो गए थे। तब वह महाराज श्री के पास आया और कहने लगा की महाराज मैं अब पूरी तरह से ठीक हूँ। मुझे किसी भी तरह की कोई भी प्रॉब्लम नहीं है। इस पर कोई भरोसा भी नहीं करेगा पर जिस व्यक्ति के साथ ये सब हुआ है वो आकर महाराज श्री को बता रहा है और आकर डॉक्टर का सर्टिफिकेट दिखा रहा है की मुझे लास्ट स्टेज का कैंसर था जो अब पूरी तरह से ठीक है। सही को गलत और गलत को सही करने की ताकत तो केवल उस परमात्मा में ही है। चाँद को छुपा दे, बादलों में छुपा दे , दिन में रात कर दे, रात में दिन कर दे ये सब ताकत तो केवल उस परमात्मा में ही है तो कैंसर कौनसी बड़ी चीज है। पर सबसे पहले हम सब को चाहिए की हमें उस परमात्मा में पक्का विश्वास करना चाहिए। उसमें पक्का भरोसा करना चाहिए। तभी यह सब संभव हो सकता है। महाराज श्री ने कहा की जो लोग भागवत कथा सुनते है तो रोगी निरोगी काया को प्राप्त होगा, गरीब लोग धनवान हो जायेंगे, पापी हमेशा के लिए निष्पाप हो जायेंगे। तब वह बोला की महाराज जिसको किसी भी चीज की जरुरत न हो, जिसके पास सब कुछ हो तो। तब महाराज श्री बोले की जिसको कुछ नहीं चाहिए वही मोक्ष को प्राप्त करता है और भगवान उन लोगों को ही प्राप्त होते है जिन व्यक्तियों का मन सदा ही निर्मल होता है। जिनका मन निर्मल नहीं होता है उन व्यक्तियों को भगवान के दर्शन कभी भी नहीं होते है। भगवान बोले की हमें वो लोग बहुत ही अच्छे लगते है जिनका मन निर्मल होता है। जो लोग झूठ का सहारा कभी भी नहीं लेते है और छल कपट से सदा ही दूर रहते है। अगर आप झूठ का सहारा लोगे तो दूसरे लोग आप से सदा के लिए किनारा करने लग जायेंगे। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

27Aug 2017

"भगवान हमारे जीवन का सबसे बड़ा पासपोर्ट है।"

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में एप्पल वैली, कैलिफोर्निया-अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस में भगवत कथा के महत्व का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कहा कि भादों के महीने में श्रीमद भागवत कथा सुनना कोई आसान काम नहीं है। भादों के महीने में ही समय है राधा अष्टमी का। कृष्ण जन्माष्टमी हमने वृंदावन में मनाई थी और राधा अष्टमी हम अमेरिका में अपने भक्तों के साथ मना रहे है। भागवत भी हमको आसानी से सुनने को नहीं मिलती है ये भी हमें अपने बहुत ही जन्मो के पुण्य करने के बाद प्राप्त होता है। हम और आप बहुत ही भाग्यशाली है जिन्हे घर बैठे ही भागवत कथा सुनने का अवसर मिल रहा है। पांच तत्व से हमारा शरीर चल रहा है और उन पांच तत्वों को जिसने बनाया है वह है भगवान श्री कृष्ण और उन सब का संहार करने वाले भी श्री कृष्ण ही है। हमारे अंदर जीव तीन तरह से जीवित रहता है ये है दैहिक, जैविक और भौतिक। दैहिक होता है शारीरिक कष्ट, शारीरिक सुख। दैविक होता है देवताओं द्वारा दिया हुआ कष्ट और देवताओं के द्वारा दिया हुआ सुख। भौतिक होता है हमारे अपने लोग, समाज के लोग जिनसे कभी हम सुख की अनुभूति करते है और कभी दुःख की अनुभूति करते है। इन त्रितापों को जन्म देने वाला भी कोई और नहीं है वो तो हमारे भगवान श्री कृष्ण ही है। वही श्री कृष्ण जो हमको इस धरती पर भेजते है, हमारा पालन पोषण करते है और हम सब का संहार भी करते है। वही ही इन तीनो वजहों का जन्म का, पालन का और मृत्यु का कारण है। जीव सबसे ज्यादा दुःख कब पता है जानते हो? जब उस कारण को भूल कर अन्य यत्र तत्र भटकता रहता है। हमको उस कारण को कभी भी भूलना नहीं चाहिए। जब जीव इस कारण को भूलता है तो उसे इन कष्टों को भुगतना पड़ता है। उदहारण के तौर पर महाराज श्री ने कहा कि यदि आप विदेश चले जाये और अपना पासपोर्ट खो दो तो आपको सुख मिलेगा या दुःख मिलेगा। तब महाराज बोले की हमको काफी परेशानी होगी और भगवान हमारे जीवन का सबसे बड़ा पासपोर्ट है। हम इस दुनिया में आये है और भगवान रुपी पासपोर्ट हमने अगर खो दिया तो निश्चित ही हमें सदा ही अपने जीवन में कष्टों का सामना ही करना पड़ेगा। यहाँ पर व्यक्ति अपनी वजह से ही खुद भी दुःख पाता है और दूसरों को भी दुःख देता है। कई बार हम ये कहते है की हमको तो इसने दुःख दे दिया है या उसने दुःख दे दिया है पर ऐसा नहीं है। हम तो दुःख अपनी वजह से ही पाते है। इसके लिए हम दूसरों को दोषी नहीं ठहरा सकते है। महाराज श्री ने कहा कि आप जो भी करते है भगवान उसी का फल हमको देता है। संत को महाराज श्री ने भगवान की उपाधि दी है। अगर मानव जीवन आपको मिला है तो सबसे पहले उस ब्रह्म को, उस श्री कृष्ण को जानने की कोशिश करो, उस परमात्मा को जानने की कोशिश कीजिये। वो निराकार वादियों के लिए ब्रह्म है, साकार वादियों के लिए कृष्ण है और भक्तों के लिए वो परमात्मा है। भगवान तो केवल एक ही होता है केवल उसके रूप अलग-अलग हो सकते है। लोग जिस भी रूप में उसे याद करते है तो भगवान अपने भक्तों को उसी रूप में उनको मिल जाते है। अगर हम सब अपने जीवन में जीपीएस रूल को फॉलो करेंगे तो हमेशा ही खुश रहेंगे। हमारा ये ही मकसद होना चाहिए की हम कैसे उस ब्रह्म को, भगवान को, या परमात्मा को जान सके। हमें सदा ही अपने परमात्मा में खोये रहना चाहिए। बहुत से लोग कहते है कि अगर हम भागवत सुनेंगे तो हमें क्या मिलेगा? सबसे पहले इंसान को अपने धर्म के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा कि पूरी जानकारी तो किसी को भी नहीं है पर लेकिन जितनी ज्यादा से ज्यादा जान सको तो जान लो। तभी हम सब का इस संसार में कल्याण हो सकता है। सतयुग में, द्वापर में और त्रेता इन तीनो युगों में हज़ारों-हज़ारों वर्ष तप करो और तपस्या भी कैसी कि एक पैर पर खड़े हो कर, या जल में खड़े हो कर, पेड़ के नीचे खड़े हो कर आदि इतनी घनघोर तपस्या के बाद भी पता नहीं है की भगवान हमसे प्रसन्न होंगे या नहीं। कलयुग में मात्र केवल नियम से सात दिन भागवत कथा सुनो तो हम वो सब पा सकते है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते है। यहाँ पर व्यक्ति को धर्म पर विश्वास इसलिए नहीं होता है क्योँकि यहाँ पर चमत्कार नहीं होते है। तब महारज श्री ने एक बच्चे की बात बताई। एक बच्चा था पन्द्रह सोलह साल का। डॉक्टरों ने कहा कि उस बच्चे को कैंसर है और वो भी लास्ट स्टेज का कैंसर है जिससे बचाया नहीं जा सकता है। तब वह बच्चा भागवत कथा सुनने की रट करने लगा और सुनी भी उसने कथा। और महाराज श्री मुझे जैसे कथा सुनाएंगे मैं वैसे ही सुनूंगा और पूरी कथा सुनुँगा। भागवत कथा के सुनने से ही उस बच्चे का लास्ट स्टेज का कैंसर भी ठीक हो गया था। ये तो भगवान की महिमा ही है जिसके सुनने मात्र से ही उसके सभी कष्ट दूर हो गए थे। तब वह महाराज श्री के पास आया और कहने लगा की महाराज मैं अब पूरी तरह से ठीक हूँ। मुझे किसी भी तरह की कोई भी प्रॉब्लम नहीं है। इस पर कोई भरोसा भी नहीं करेगा पर जिस व्यक्ति के साथ ये सब हुआ है वो आकर महाराज श्री को बता रहा है और आकर डॉक्टर का सर्टिफिकेट दिखा रहा है की मुझे लास्ट स्टेज का कैंसर था जो अब पूरी तरह से ठीक है। सही को गलत और गलत को सही करने की ताकत तो केवल उस परमात्मा में ही है। चाँद को छुपा दे, बादलों में छुपा दे , दिन में रात कर दे, रात में दिन कर दे ये सब ताकत तो केवल उस परमात्मा में ही है तो कैंसर कौनसी बड़ी चीज है। पर सबसे पहले हम सब को चाहिए की हमें उस परमात्मा में पक्का विश्वास करना चाहिए। उसमें पक्का भरोसा करना चाहिए। तभी यह सब संभव हो सकता है। महाराज श्री ने कहा की जो लोग भागवत कथा सुनते है तो रोगी निरोगी काया को प्राप्त होगा, गरीब लोग धनवान हो जायेंगे, पापी हमेशा के लिए निष्पाप हो जायेंगे। तब वह बोला की महाराज जिसको किसी भी चीज की जरुरत न हो, जिसके पास सब कुछ हो तो। तब महाराज श्री बोले की जिसको कुछ नहीं चाहिए वही मोक्ष को प्राप्त करता है और भगवान उन लोगों को ही प्राप्त होते है जिन व्यक्तियों का मन सदा ही निर्मल होता है। जिनका मन निर्मल नहीं होता है उन व्यक्तियों को भगवान के दर्शन कभी भी नहीं होते है। भगवान बोले की हमें वो लोग बहुत ही अच्छे लगते है जिनका मन निर्मल होता है। जो लोग झूठ का सहारा कभी भी नहीं लेते है और छल कपट से सदा ही दूर रहते है। अगर आप झूठ का सहारा लोगे तो दूसरे लोग आप से सदा के लिए किनारा करने लग जायेंगे। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

28Aug 2017

" भगवान को सच्ची भक्ति से ही प्राप्त किया जा सकता है "

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में एप्पल वैली, कैलिफोर्निया-अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस में श्री शुकदेवजी महाराज की लीलाओं का वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कथा की शुरआत "मीठी रस सो भरी राधा रानी लागे, महरानी लागे भजन से की। महाराज श्री ने कहा की मेरे प्यारे प्रभु प्रेमिओ आप सब भद्रा पक्ष में राधा अष्ठमी के समय पर भागवत कथा श्रवण कर रहें है। भगवान श्री कृष्णा के गौ लोक प्रस्थान के बाद राजा परीक्षित को प्रथम बार श्रीमद्भागवत कथा को श्रवण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। तब से चली आ रही ये परंपरा आज तक हम सब के मध्य उपस्थित है और अनेकों-अनेक विद्वानों के द्वारा ऋषि मुनि ब्राह्मण के द्वारा हमको श्रीमद भागवत कथा प्राप्त होती है। कथा मैं आपको नया सुनने को मिलता है ये हमारा और आप सबका सौभाग्य है। महाराज श्री ने कहा -श्री शुक जब कथा सुन रहे थे तब उनकी आंखों से अश्रु बह रहा थे इसलिए अश्रु बह रहे थे क्योंकि श्री कृष्ण की विदाई का प्रसंग चल रहा था। श्री कृष्ण इस धरा धाम को तयाग कर अपने धाम के लिए जा रहे है ये सुनते हुए शुक रो पड़े। ठाकुर की कथा सुन कर ठाकुर का हो गया निश्चित तौर पर उसके संस्कार अच्छे होंगे। महाराज श्री जीे ने कहा की कथा उन्हीं को अच्छी लगती है जिनके संस्कार अच्छे होते है, हर किसी को कथा अच्छी नहीं लग सकती है। जिन्हें अपने माँ बाप से, बुजुरुर्गों से अच्छे कर्मो से जो मिला है उन्हीं को कथा अच्छी लग सकती है। बाबा ने सोचा की शुक कथा चोरी से सुन रहा है हाथ मैं त्रिशूल लेके बाबा दौड़े श्री शुक आगे-आगे बाबा पीछे-पीछे आत्म रूप से दौड़े। शुक व्यास पत्नी के मुख से गर्भ अस्थान में प्रवेश कर गए और बाबा भोले नाथ व्यास जी आश्रम में डट के बैठ गए की जब आएगा तब मारूंगा। 9महीने बाद तो आओगे न तब मार के जाऊँगा शुकदेव बोले मैं 9 साल तक नहीं आने वाला ये भक्त और भगवान् की लड़ाई है, 9 साल नहीं 12 साल हो गए शुक देव जी को माँ के गर्भ में उसके बाद ही उन्होंने धरा पर जन्म लिया। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

25Aug 2017

"धर्म आत्मा का एक ऐसा आभूषण है जिसे एक बार धारण कर लिया तो उतारा नहीं जा सकता है।"

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में नार्थ कैरोलिना, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के सप्तम दिवस में श्री कृष्ण की लीलाओं का सुन्दर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। "ये संसार किसी का हुआ नहीं, आगे होगा नहीं" इस भजन के साथ महाराज श्री ने आज की कथा प्रारम्भ की। महाराज श्री ने कहा की यह भजन बहुत ही प्यारा भजन है। हम एक दूसरे से बहुत ही उम्मीद करते है लेकिन उम्मीदें कहाँ कब किसकी पूरी होती है? सिर्फ भगवान ही उम्मीदों को पूरा करते है बाकि के लोग तो सिर्फ अपना टाइम पास करते है। "ओ दाता तेरा मेरा प्यार कभी न बदले, ओ कान्हा तेरा मेरा प्यार कभी न बदले" भजन सुना कर वहां पर मौजूद सभी भक्तों को मन्त्रमुग़्ध कर दिया। जिंदगी जब निकलती है हमें तब अपनी गलती का अहसास होता है कि हमने अपना क्या खोया है। लोग अपने अपने हिसाब से धर्म का अर्थ बताते है। किसी की नजर में भोजन कराना धर्म है। किसी की नजर में कथा सुनना धर्म है। किसी की नजर में किसी को गाली देना ही धर्म है। तो अपने अपने सिद्धांत के हिसाब से धर्म की परिभाषा बताई है। लेकिन धर्म तो वो है जो गोस्वामी तुलसीदास बाबा ने रामायण में लिखा है तुम किसी को दुःख दो उसके बराबर पाप नहीं है और तुम किसी को सुख दो उसके बराबर कोई पुण्य नहीं है। अगर तुम दुसरो की सेवा करोगे तो भगवान तुम्हारी सेवा करेंगे। तुम किसी को दुःख मत दो तुम्हारे लिए यही सबसे बड़ा पुण्य है। तो धर्म कभी भी चलाय मान नहीं है। लेकिन धर्म की गति ऐसी है जो हमें सुख प्रदान करने वाली है। जो जीव या मनुष्य केवल धर्म के बताये हुए मार्ग पर चलते है, उनका सदा ही कल्याण होता है। धर्म केवल वस्त्रों की तरह नहीं है जब चाहा उसे उतार लिया और जब चाहा उसे पहन लिया। धर्म एक ऐसा आभूषण है आत्मा का, जिसे एक बार धारण कर लिया तो उतारा नहीं जा सकता है। धर्म को केवल धारण करो इसे उतारने की कोशिश मत करों। शरीर पर से तो वस्त्र उतर भी सकते है और उनको फिर से पहना भी जा सकता है लेकिन आत्मा का जो वस्त्र है धर्म उसे यदि उतार दिया तो उसे हम दोबारा पहन नहीं सकते है। धर्म के अनुसार ही हमें अपना जीवन जीना चाहिए। धर्म से ही हमें सब कुछ सीखना चाहिए। कई व्यक्तियों की जिंदगी केवल दूसरों को दुःख देने में ही निकल जाती है। वो लोग केवल उसी में ही अपना सुख समझने लगते है। पैसे के लिए व्यक्ति क्या नहीं करता है। लोग अपना जमीर तक बेच देते है पैसे के लिए। केवल धर्म ही है जो मरने के बाद भी हमारे साथ ही जायेगा। सिर्फ एक धर्म ही है जो हमेशा हमारा साथ निभाएगा और जितनी भी संसार में वस्तुएं है वो सब तो यही पर रह जाती है। तो हमें अपने जीवन में धर्म के अनुसार ही कर्म करने चाहिए। भगवान राम आये हो या भगवान कृष्ण आये हो सभी ने अपने चरित्र से इस बात का दर्शन हमें कराया है। अपने चरित्र से उन्होंने हमें बताया कि हमको क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। भगवान राम जब बड़े होते है तो स्वयं ही वेदों का श्रवण करते है और पुराणों को सुनते है। और जो भी कथा स्वयं सुनते है तो अपने छोटे भाई बहनो को भी सुनाते है। जो भी अच्छी बात आज हमने सीखी है तो हमको उस बात को अपनों से छोटो को समझानी चाहिए। अगर कोई बुरी बात आपको लगे तो उस बात को अपने छोटे भाई बहन को नहीं बतानी चाहिए। भगवान् श्री कृष्ण के सोलह हज़ार एक सो आठ विवाह हुए। भगवान् की जो कुल संताने है वो एक लाख सत्ततर हज़ार एक सो अट्ठासी थी। उनके साथ बैठ कर श्री कृष्ण ब्राहम्णो को बालते है कथा सुनते है और अपने उन बच्चों को सुनाते है। और जो कथा हमारे राम भगवान् सुनते है, जो कथा हमारे कृष्ण सुनते है ,जिन कथाओं से हमें कुछ सिखने को मिलता है। एकबार की बात है भगवान् श्री कृष्ण अपने बाल गोपालों के साथ भृमण करने के वन में गए। वन में जाकरके अपने बल गोपालों को कुछ ऐसी कथा सुना रहे थे तो वहां पर एक बच्चे ने कहा कि "मैं प्यासा हूँ"। तो उन्होंने कहा की जाओ और देख के आओ के कही आस पास में कोई जल स्तोत्र है तो। अब बच्चे गए तो उन्हें वहां पर एक कुआ मिला। लेकिन कुए में एक बहुत ही बड़ा गिरगिट पड़ा हुआ था। तब उन बच्चों ने भगवान से आकर कहा की वहां पर पास ही में एक कुआ तो है पर उसमें बहुत बड़ा गिरगिट गिरा पड़ा है। तब भगवान ने उनसे कहा चलो में तुम्हारे साथ चलता हूँ। और जैसे ही भगवान् ने उस गिरगिट को बाहर निकलना चाहा तो उस गिरगिट का रूप बदल गया। और उसका आकर एक मनुष्य के रूप में बदल गया। और वह भगवान् श्री कृष्ण के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। तब भगवान् श्री कृष्ण ने उससे पूछा की आप कौन है। तब उस व्यक्ति ने कहा की मैं पूर्व जन्म में राजा नृग था। और मेरा हमेशा एक काम था की मैं हमेशा ब्राह्मणो को दान देता था। ब्राह्मणो को गाय दान में देता था। और गाय के सींगों को और गाय के पैरों के खुरों को सोने में मांडवा कर दान देता था। बस एक बार गलती ये हो गयी थी की जो गाय मैंने दान में दी थी तो वो उस ब्राह्मण के यहाँ से खुल कर आ गयी और उन सभी दान देने वाली गायों में आकर मिलकर कड़ी हो गयी थी। और उसी गाय को मैंने दोबारा से दान कर दिया। तो जहाँ पर मैंने पहले गाय दान में दी थी तो वो वहां पर आ रहे थे जो दूसरे वाले ब्राह्मण उस गे को लेकर वहां पर से जा रहे थे। और उन्होंने उस गाय को पहचान लिया। और कहने लगे की ये गाय तो मेरी है। तब दूसरा ब्राह्मण कहने लगा की नहीं ये आपकी नहीं हो सकती है इसे तो अभी राजा ने मुझे दान में दिया है। तब पहले वाला ब्राह्मण बोलै अरे नहीं इसे भी तो मुझे राजा ने एक दिन पहले दिया था। तब वो दोनों बोले चालों इस बारे में राजा से ही पता कर लेते है। तब दोनों ब्राह्मण राजा के यहाँ पर गए। और राजा से जाकर बोले की राजा जी ये गाय तो आपने परसो मुझे दान में दी थी और दूसरा बोले की नहीं ये गाय तो आज आपने मुझे दान में दी है। तो अब बताइये राजा जी की ये गाय आखिर है किसकी। तब राजा बोलै की महाराज गलती से सायद ऐसा हो गया है आप दोनों मुझे छमा कर दीजिये। एक ब्राह्मण इस गाय को छोड़ दे और जिसको इसकी ज्यादा जरुरत है वो ले ले। पर वो दोनों ब्राह्मण कहने लगे नहीं महाराज हमें तो यही गाय ही चाहिए। और कहने लगे की महाराज हमने तो दान लिया है कोई भीख नहीं ली है। हम तो संतोषी ब्राह्मण है। और राजा ने फिर कहाँ की नहीं महाराज आप एक हज़ार गाय ले लो या एक लाख गाय ले लो। इन बातों को सुनकर राजा को गुस्सा आ गया। राजन आप हमें ब्राह्मण नहीं समझते हो आप तो हमें लोभी और लालची समझते हो। तो इस सब को सुन कर ब्राह्मण बोलै जाओ हम तुम्हे श्राप देते है जिस तरह तुम गिरगिट की तरह रंग बदल रहे रहो तुमको गिरगिट बनना पड़ेगा। तब राजा उन ब्राहम्णो के कहरनो मरण गिर पड़े और माफ़ी मांगने लगे की महाराज इसमें मेरी कोई गलती नहीं है। मुझे छमा कर दो। राजा जब छमा मांगने लगा तो ब्राह्मणो को दया आयी और बोले की हे राजन अभी तो आपको गिरगिट बनना पड़ेगा लेकिन द्वापर युग के अंत में आपको भगवान् के साक्षात् दर्शन होंगे। जो तुमने इतने पुण्य के काम करे है उसी के फलीभूत तुमको भगवान् के साक्षात् दर्शन होंगे। और उनके दर्शन के बाद ही तुम्हारा उद्धार हो जायेगा। और तुम वापिस इंसान के रूप में आ जाओगे। अगर कोई बुरी बात आपको लगे तो उस बात को अपने छोटे भाई बहन को नहीं बतानी चाहिए। भगवान श्री कृष्ण के सोलह हज़ार एक सो आठ विवाह हुए। भगवान की जो कुल संताने है वो एक लाख सत्ततर हज़ार एक सो अट्ठासी थी। उनके साथ बैठ कर श्री कृष्ण ब्राहम्णो को बालते है कथा सुनते है और अपने उन बच्चों को सुनाते है। जो कथा हमारे राम भगवान सुनते है, जो कथा हमारे कृष्ण सुनते है जिन कथाओं से हमें कुछ सिखने को मिलता है। एकबार की बात है भगवान श्री कृष्ण अपने बाल गोपालों के साथ भ्रमण करने के वन में गए। वन में जाकर के अपने बाल गोपालों को कुछ ऐसी कथा सुना रहे थे तो वहां पर एक बच्चे ने कहा कि "मैं प्यासा हूँ" तो उन्होंने कहा की जाओ और देख के आओ के कही आस पास में कोई जल स्तोत्र है तो अब बच्चे गए उन्हें वहां पर एक कुआ मिला। लेकिन कुए में एक बहुत ही बड़ा गिरगिट पड़ा हुआ था। तब उन बच्चों ने भगवान से आकर कहा की वहां पर पास ही में एक कुआ तो है पर उसमें बहुत बड़ा गिरगिट गिरा पड़ा है। तब भगवान ने उनसे कहा चलो में तुम्हारे साथ चलता हूँ और जैसे ही भगवान ने उस गिरगिट को बाहर निकलना चाहा तो उस गिरगिट का रूप बदल गया। उसका आकार एक मनुष्य के रूप में बदल गया। वह भगवान श्री कृष्ण के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। तब भगवान श्री कृष्ण ने उससे पूछा की आप कौन है? उस व्यक्ति ने कहा की मैं पूर्व जन्म में राजा नृग था। और मेरा हमेशा एक काम था की मैं हमेशा ब्राह्मणो को दान देता था। ब्राह्मणो को गाय दान में देता था। गाय के सींगों को और गाय के पैरों के खुरों को सोने में मंडवा कर दान देता था। बस एक बार गलती ये हो गयी थी की जो गाय मैंने दान में दी थी तो वो उस ब्राह्मण के यहाँ से खुल कर आ गयी और उन सभी दान देने वाली गायों में आकर मिलकर खड़ी हो गयी थी। उसी गाय को मैंने दोबारा से दान कर दिया। जहाँ पर मैंने पहले गाय दान में दी थी तो वो वहां से आ रहे थे तो दूसरे वाले ब्राह्मण ने उस गाय को पहचान लिया और कहने लगे की ये गाय तो मेरी है। तब दूसरा ब्राह्मण कहने लगा की नहीं ये आपकी नहीं हो सकती है इसे तो अभी राजा ने मुझे दान में दिया है। तब पहले वाला ब्राह्मण बोले अरे नहीं इसे भी तो मुझे राजा ने एक दिन पहले दिया था। तब वो दोनों बोले चलों इस बारे में राजा से ही पता कर लेते है। तब दोनों ब्राह्मण राजा के यहाँ पर गए और राजा से जाकर बोले की राजा जी ये गाय तो आपने परसो मुझे दान में दी थी और दूसरा बोले की नहीं ये गाय तो आज आपने मुझे दान में दी है। तो अब बताइये राजा जी की ये गाय आखिर है किसकी? तब राजा बोले की महाराज गलती से शायद ऐसा हो गया है आप दोनों मुझे क्षमा कर दीजिये। एक ब्राह्मण इस गाय को छोड़ दे और जिसको इसकी ज्यादा जरुरत है वो ले ले। पर वो दोनों ब्राह्मण कहने लगे नहीं महाराज हमें तो यही गाय ही चाहिएऔर कहने लगे की महाराज हमने तो दान लिया है कोई भीख नहीं ली है। हम तो संतोषी ब्राह्मण है। राजा ने फिर कहा की नहीं महाराज आप एक हज़ार गाय ले लो या एक लाख गाय ले लो। इन बातों को सुनकर ब्राह्मण को गुस्सा आ गया। राजन आप हमें ब्राह्मण नहीं समझते हो आप तो हमें लोभी और लालची समझते हो। तो इस सब को सुन कर ब्राह्मण बोले जाओ हम तुम्हे श्राप देते है जिस तरह तुम गिरगिट की तरह रंग बदल रहे रहो तुमको गिरगिट बनना पड़ेगा। तब राजा उन ब्राहम्णो के चरणों गिर पड़े और माफ़ी मांगने लगे की महाराज इसमें मेरी कोई गलती नहीं है। मुझे क्षमा कर दो। राजा जब क्षमा मांगने लगा तो ब्राह्मणो को दया आयी और बोले की हे राजन अभी तो आपको गिरगिट बनना पड़ेगा लेकिन द्वापर युग के अंत में आपको भगवान के साक्षात दर्शन होंगे। जो तुमने इतने पुण्य के काम करे है उसी के फलीभूत तुमको भगवान के साक्षात दर्शन होंगे और उनके दर्शन के बाद ही तुम्हारा उद्धार हो जायेगा और तुम वापिस इंसान के रूप में आ जाओगे। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

24Aug 2017

" भगवान की भक्ति हमें ब्लाइंड फेथ के साथ करनी चाहिए "

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में नार्थ कैरोलिना, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के षष्टम दिवस में श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुन्दर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कहा कि अच्छा समय न जाने कब निकल जाता है इसका हमको पता भी नहीं चल पाता है। भगवान से सदा ही अपने मन की बात करते रहनी चाहिए। कुछ बातें उनसे करनी चाहिए और कुछ बातें उनसे हमें सुननी चाहिए। तभी तो हमारे जीवन का हर प्रकार से उद्धार हो सकता है। भगवान का नाम हमारे मुख से तब तक नहीं निकलता है जब तक भगवान स्वयं हम पर अपनी कृपा नहीं करते है। हर चीज हमारे मुख से आसानी से निकल जाती है लेकिन भगवान का नाम आसानी से नहीं निकलता है। "सुन बरसाने बारी दूर बड़ी दूर नगरी,कैसे मैं मिलने आऊं बड़ी दूर नगरी" भजन श्रवण कराकर महाराज श्री ने सभी भक्तों को मंत्रमुग्ध कर दिया। महाराज श्री ने कहा की मानव जीवन का उद्देश्य ये नहीं है की खाओ कमाओ और सो जाओ। उसका तो एक ही उद्देश्य होना चाहिए की वह भगवान को कैसे प्राप्त कर सके। इस दुनिया में एक साकार ब्रह्म को मानने वाले लोग होते है और एक निराकार ब्रह्म को मानने वाले लोग होते है। महाराज श्री ने कहा कि हमारे कर्मकांड के 84 हज़ार श्लोक है। किसी ने भगवान से पूछा की आप कैसे हो? आपका आकर कैसा है? आप निराकार हो या साकार हो? भगवान ने कहा कि जो लोग मुझे निराकार रूप में भजते है उनके लिए मैं निराकार हूँ और जो लोग मुझे साकार रूप में भजते है उनके लिए मैं साकार हूँ। क्योँकि कई बार राधा कहती है कि "बंसी बजाते हुए क्या किसी ने मेरे शयाम देखे" जो चीजे हमारे लिए जीवन है और जो चीजे हमारे लिए मृत्यु का एक मार्ग बन जाती है। वही सब चीजें भगवान के चरणों में बंधन करती है क्योँकि ये सब चीजे ही उनसे प्रकट हुई है। जिन लोगों को भगवान पर डाउट हो वो या तो किसी संत के चरणों में जा कर बैठे। जो भगवान के बारे में सब कुछ जानते हो और उनसे भगवान के बारे में जानने की कोशिश करो उन पर कुछ थोपो नहीं। पार्वती माता ने भी एक प्रश्न किया था की साकार ब्रह्म निराकार कैसे हुआ? यहाँ पर महाराज श्री ने भगवान राम के बारे में भी उदाहरण दिया है कि भगवान राम कौन है। अब भगवान पर संदेह करना कहाँ की सही बात है उसको तो हमें मिटाना ही पड़ेगा। इसके लिए हमें किसी जानकर या संत के चरणों में जाकर बैठना पड़ेगा। जिससे हमें भगवान के सही रूप के बारे में सही से जानकारी मिल सके। हम भगवान के सही रूप को जान सके। हमें भी तो भगवान के बारे में जानने अपनी जिज्ञासा दिखानी पड़ेगी। क्योँकि जैसे ही हम किसी ज्ञानी पुरुष या संत के पास ये प्रश्न लेकर जायेंगे की भगवान कौन है तो वह ज्ञानी हमें उस ईश्वर की सभी लीलाओं के बारे में बताता है। तब हम को उस ज्ञानी से उस भगवान का बहुत ही सुन्दर वर्णन प्राप्त हो जाता है। जिसके बाद हमें अपने उस प्रभु के बारे में जानने की और जिज्ञासा नहीं रहती है। भगवान का एक स्वाभाव और है कि भगवान किसी का अहंकार बर्दाश्त नहीं करता है। आज के इस जीवन में या समय में हमें अपनी छोटी छोटी चीजों पर अहंकार हो जाता है। अगर हम कोई नई गाड़ी भी घर में ले आते है तो अपने रिश्तेदारों को चिढ़ाने के लिए एकबार जरूर ही उनके पास जाते है कि तुम्हारे पास इतनी बड़ी गाडी नहीं है मेरे या हमारे पास तो है। तो हम अपने अहंकार के कारण उस को चिढ़ाते है की तुम इतनी बड़ी गाडी नहीं ले सकते है पर लेकिन हम ले सकते है और उसको इसी बात से जलन कराते है। महाराज श्री ने बताया की भगवान हर इंसान से कहता है कि आप सब को अहंकार से दूर रहना चाहिए। क्योँकि जो लोग अहंकार करते है मैं उन लोगों से कोशों दूर रहता हूँ। जहाँ पर अभिमान होता है वहां पर भगवान का वास नहीं होता है। और दूसरी बात ये है की भगवान अहंकार को भी नहीं रहने देता है। जीव जिस भी चीज का अभिमान करता है भगवान उससे उस चीज को ही छीन लेता है। यहाँ पर महाराज श्री ने बहुत ही सुन्दर पंक्तियों का वर्णन किया है कि "बनतो को भी बिगड़ते देखा है बिगड़तों को भी बनते देखा है,जो खूब अकड़के चलते थे उनको मिटटी में भी मिलते देखा है ".इन पंक्तियों के द्वारा महाराज श्री ने वहां पर मौजूद सभी लोगों को अहंकार को छोड़ने के लिए कहा है। क्योँकि अहंकार से मनुष्य का हर प्रकार से नाश ही होता है। उसका भला कभी भी नहीं हो सकता है। कल आप सभी ने गोवर्धन की परिक्रमा की थी। पर भगवान ने आप सभी से गोवर्धन की परिक्रमा कराई क्योँ थी। इसकी तो आवश्यकता ही नहीं थी। अगर भगवान श्री कृष्ण नहीं होते तो क्या वहां पर भगवान इंद्र की पूजा नहीं छुड़वा सकते थे। जब स्वयं बनाने वाला ही मिटाने पर आ जाये तो कोई भी आपको बचा नहीं सकता है। इस बात को आप देर से मानो या जल्दी से मानो, जितनी जल्दी से मान लोगे तो आप का ही भला हो सकता है। क्योँकि जितनी जल्दी ही मान लोगे तो उतना ज्यादा समय ही आप के पास मिल जाता है कुछ अच्छा करने के लिए। देवराज इंद्र ने वहां पर घनघोर वर्षा की। वहां पर इंद्र ये चाहते थे की इस भारी वर्षा से पूरा का पूरा ब्रज ही बह जाना चाहिए यमुना नदी में और इन लोगों का नामो निशान ही मिट जाना चाहिए। जब वहां पर काले काले बदल घुमड़ कर आये तो सब ब्रज वासी भगवान कान्हा से कहने लगे की आज तो आप हमारा सूपड़ा ही साफ करा दिया है। बादलों को देखकर सभी लोग काफी परेशान हो गए। सभी लोग कन्हैया से कहने लगे की देखो कान्हा कितने भयंकर बादल बन कर आ रहे है। अब तो यहाँ पर काफी बाहरी बारिश होगी और सब कुछ ही ख़त्म हो जायेगा। तब भगवान श्री कृष्ण सभी ब्रज वासियों से कहते है कि कमाल करते हो की जिस भगवान की पूजा करते हो उस पर तो भरोसा करो। इसलिए ही तो हमारी पूजा इतनी फलीभूत नहीं है जितनी होनी चाहिए। लोग कहते है कि पूजा करो पर ब्लाइंड फेथ मत करो। पर मैं कहता हूँ की ब्लाइंड फेथ करके ही पूजा करो। अगर आप का भगवान में भरोसा नहीं होगा तो इसमें आपका ही नुक्सान होगा। भगवान का कुछ नहीं बिगड़ेगा। अगर तुम चार पांच व्यक्ति भगवान को नहीं मानोगे तो इससे भगवान को मानने वालों की कमी नहीं होगी। तो इससे कौनसे भगवान की पूजा होनी बंद हो जाएगी। क्योँकि मेरे ऋषियों ने मुझसे कहा है, मेरे वेदों ने मुझसे कहा है, मेरे पुराणों ने मुझसे कहा है, ग्रंथों ने मुझसे कहा है ,मेरे गुरुओं ने मुझसे कहा है कि कृष्ण भगवान है। तभी तो बालभाचार्य ने कहा है कि इस पृथ्वी के कण कण में हमारे प्रभु श्री कृष्ण बसते है। फिर अगर हमको इस बात का ब्रह्म है तो हमने भगवान को जानने की कोशिश नहीं की है। क्योँकि आज का व्यक्ति काफी फ़ास्ट सर्विस चाहता है। अगर आज हमने पूजा की है तो आज शाम तक ही हमको उस पूजा का फल मिल जाये तभी हम यकीन करेंगे की पूजा का कोई असर हुआ है। नहीं फल मिला तो हम जानेंगे की हमारी पूजा का बेकार ही चली गयी है। यहाँ पर महाराज श्री एक दृष्टांत सुना रहे है। एक व्यक्ति एक संत के पास गए और कहने लगे की महाराज मुझे कोई ऐसा देवता बताओ जल्दी से प्रसन्न हो जाये। क्योँकि मैं चाहता हूँ की कोई देवता जल्दी से प्रसन्न हो और जो मैं चाहता हूँ वो मुझे जल्दी से प्राप्त हो जाए। तब संत ने कहा की तुम एक काम करो की तुम नारायण की पूजा करो और नारायण भगवान से आप जो मांगोगे आपको मिल जायेगा। फिर वह व्यक्ति भगवान नारायण की मूर्ति ले आया और पूजा शुरू कर दी। इस तरह से एक के बाद दो और दो के बाद एक सप्ताह हो गया तो व्यक्ति काफी नाराज हो गया और बोला की संत ने तो मुझे गलत देवता बता दिया है। एक हफ्ते से मैं पूजा कर रहा हूँ पर अगले ने मुझे ये तक नहीं पूछा है की आप कैसे हो ,प्रसन्न होने की तो बात दूर है। ये देवता तो मुझे ठीक नहीं लगता है। तब वह व्यक्ति सोचने लगा की शायद कलयुग में देवताओं की कम चलती है तो मुझे देविओं की पूजा करनी चाहिए। तब महाराज जी उस व्यक्ति से कहने लगे की चलों तो आप देवी की पूजा करों। नारायण भगवान तो शायद देर से तुम्हारी सुनेंगे पर देवी जल्दी ही सुन लेंगी। तो इस तरह से वह व्यक्ति एक देवी जी की भी मूर्ति ले आया। पर मंदिर में जगह तो काफी छोटी थी। अब या तो मंदिर में नारायण भगवान रहे या देवी रहे। दोनों एक मंदिर में नहीं रह सकते। तब उस व्यक्ति ने भगवान नारायण की मूर्ति को हटा कर वहां पर देवी की मूर्ति को लगा दिया और वहीँ पास में दीवार पर एक कील लगा कर भगवान नारायण की मूर्ति को उस पर टांक दिया। उसने उसी दिन से देवी माता की पूजा करनी शुरू कर दी। फिर एक दिन उस व्यक्ति ने देवी की मूर्ति के सामने धुप बत्ती जलाई और सयोंगवश उस धूपबत्ती का धुआँ भगवान नारायण की मूर्ति की तरफ जा रहा था। तो इस को देखकर उस व्यक्ति के मन में काफी टेंशन हो रही थी। तो उसने सोचा की लो जी हो गया कबाड़ा इनकी पूजा हमने करी थी तो खुद तो आये नहीं और अब कहीं देवी जी भी न आ जाये तो इनकी भी धुप ले रहे है। अगर मेरी धूपबत्ती के धुंए को भी नारायण ले गए तो मेरे पास देवी कहाँ से आ पाएंगी। तब वह व्यक्ति तुरंत गया और वहां से रुई ले आया और उस रुई को भगवान नारायण की नाक में लगा दिया और कहने लगा की अब देखता हूँ की कैसे लोगे धुआँ धुप का। इतना उसका कहना था की भगवान नारायण स्वयं वहां पर उसके सामने प्रकट हुए और कहने लगे की वरदान मांगो। अब वहां पर जो व्यक्ति मौजूद था वह ये देखकर काफी हैरान हो गया। वह कहने लगा की "यह क्या हुआ" और कहने लगा की वरदान देंगे आप! तब नारायण भगवान कहने लगे हाँ देंगे हम वरदान आपको! पर मेरे मन में एक प्रश्न है? तब भगवान बोले पूछो क्या है? तब वह व्यक्ति बोला की जब मैं आपकी पूजा कर रहा था तब तो आप वरदान देने के लिए नहीं आये और जब मैं देवी की पूजा करने लगा तो तब आपके मन में बड़ा वरदान देने की बात उमड़ आयी है। मैंने तो आपकी नाक में रुई तक लगा दी थी तो फिर भी आप मुझे वरदान देने के लिए क्योँ आ गए है। तब भगवान नारायण ने उस व्यक्ति को जो उत्तर दिया था वह बड़ा ही गजब का था। नारायण ने कहा कि जब तक तुम मेरी पूजा कर रहे थे तब तक तुम मुझे केवल मूर्ति समझ रहे थे। फिर जब तुम मुझे मूर्ति समझ कर पूजा करते रहे तो मैं केवल मूर्ति बनकर ही बैठा रहा। आज पहली बार तुम्हे अहसास हुआ की मैं तुम्हारी धूपबत्ती का धुआँ ग्रहण कर रहा हूँ। इसका मतलब ये है की आज तुमने पहली बार मुझे नारायण समझा है और अपने हाथों से आपने मेरी नाक में रुई लगा दी है तो अब मुझे लगा है की अब तुम्हे ये लग गया है की मैं नारायण हूँ। इसलिए आज में तुम्हारे सामने प्रकट हो गया हूँ और तुमसे वरदान मांगने के लिए कह रहा हूँ। इसलिए मैं तुम्हे वरदान देना चाहता हूँ। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

23Aug 2017

" भगवान छल से नहीं पवित्र मन से प्राप्त किये जा सकते है "

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में नार्थ कैरोलिना, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के पंचम दिवस में श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुन्दर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। महाराज श्री ने कहा कि हमें अपने भगवान की भक्ति में ही अपना तन-मन-धन लगा देना चाहिए। तभी हमको इस लालची संसार से सदा के लिए मुक्ति मिल सकती है। इसके बाद महाराज श्री ने एक भजन "मीठों रस से भरों री राधा रानी लागे, महारानी लागे" सुनाकर मौजूद सभी भक्तों को मंत्रमुग्ध कर दिया। क्यों लोग ब्रज की लीलाओं में बहुत ही आनंद लेते है क्योँकि ब्रज की लीला हम सब के संदेह का निवारण करती है। जो लोग सिर्फ भगवान को रास रचैया समझते है, बंसी बजैया समझते है उन लोगों को दशम स्कन्द की कथा मन लगा कर सुननी चाहिए। भागवत कथा के दशम स्कन्द में श्री कृष्ण ने अपनी भगवत्ता का दर्शन लोगों को कराया है। मैं भगवान हूँ ये बार-बार लोगों को दर्शन कराया है। लेकिन मेरे गोविन्द का ना समझने वाले लोग कहते है की वो तो चोर थे। कहते है कि वो तो गोपियों के साथ रास रचाते थे। उन्हें रास रचाने वाले तो याद होते है लेकिन गीता का ज्ञान देने वाले याद नहीं रहते है। विष का पान करने वाले याद नहीं रहते है। कालिया नाग को नाथने वाले याद नहीं रहते है। गिर्राज पर्वत को उठाने वाले याद नहीं रहते है। और न जाने ऐसी कितनी लीला है ,उनकी इन लीलाओं को ये सब याद नहीं रखते है। क्योँकि इन सब को वो लोग स्वयं जानना नहीं चाहते है। एक व्यक्ति ने मुझसे किसी अन्य धर्म के ग्रन्थ के विषय में बात की और वो लड़का कहने लगा की क्या फर्क पड़ता है महाराज जी हम ये पढ़े या वो पढ़े। हाँ मुझे ये धर्म बहुत ही पसंद है। महाराज श्री ने कहा कि तुम्हे जो धर्म पसंद हो तुम उसका पालन करों। पर सबसे पहले हमने जिस धर्म में जन्म लिया है हमें उस धर्म का पालन करना चाहिए। अगर उस धर्म को जानने में कोई प्रॉब्लम हो तो उस धर्म को जानने वालों के पास बैठे। अगर तब भी आपके वह धर्म समझ में न आये तो तुम अपना धर्म बदल सकते हो। अपनी सोच को बदल सकते हो। तब महाराज श्री ने उससे कहा कि क्या तुमने कभी गीता को पढ़ा है। तब वो लड़का बोला नहीं महाराज नहीं पढ़ा है। तब महाराज बोले की फिर तुम ये कैसे कह सकते हो की क्या अच्छा है क्या बुरा है। महाराज श्री ने बताया की उनसे एक लड़की ने पूछा था कि भगवान को दुध नहीं चढ़ाना चाहिए। हमें उस दूध को गरीबों में बाँट देना चाहिए। तब महाराज ने उस लड़की से पूछा की हम कितना दूध शिवजी को चढ़ाते है। आपको गरीबों में शिवजी वाला दूध ही क्योँ बाटना है। जब आपको शिवजी पर दूध चढ़ाते है तो आपको गरीब याद आते है और पूरी ज़िंदगी भर आप दूध चढ़ाते है तो आपको गरीब याद नहीं आते है। जब भगवान को थोड़ा सा भोग लगाना है तो आपके मन में नए नए विचार आ जाते है। कि भगवान को इस दूध की क्या जरुरत है और जब आप दिन में चार-पांच बार खाना खाते हो तो तब आपको गरीब याद नहीं आते है। इतना सारा दूध भगवान पर चढ़ा कर आप बर्बाद कर देते है तब आपको भगवान याद नहीं आते है। क्योँ नहीं याद आते है महाराज श्री ने लोगों से पूछा। ये एक सोची समझी रणनीति के तहत इन लोगों को भटकाया जाता है। वो कहते है कि क्या वो भगवान हमारे दूध का भूखा है, वो भी इतना बड़ा भगवान। तब महाराज श्री ने कहा कि न भगवान किसी भी चीज का भूखा नहीं है। उन्होंने कहा की यदि भगवान हम सब पर अपनी कृपा न करे तो हम सब लोग ही भूखा मर जाएंगे और सोचते है की हम सब भगवान को भोग क्योँ लगाते है? प्रसाद क्योँ लेते है? उस प्रसाद को ग्रहण करके ही हम सब निरोगी रहते है। यहाँ पर प्रसाद और भोजन में बहुत ही अंतर होता हैं। तब उन्होंने कहा की श्रावण मास में लोग या हम सब दूध दही नहीं खाते है। इस महीने में दूध दही खाने से हम सब को कोई भी लाभ नहीं होता है और दूसरा शिवजी के वेग को खत्म करने के लिए हम सब उन पर दूध चढ़ाते है। जहाँ पर भी वो अभिषेक किया हुआ दूध निकलता है तो हम सब को वहां से नहीं निकलना चाहिए या उसको क्रॉस नहीं करना चाहिए क्योँकि अगर हम उस दूध को क्रॉस करेंगे तो हमको बीमारी लगने का डर लगा रहता है। इसलिए ही हम उस दूध का उपयोग नहीं करते है और न ही उसका इस्तेमाल ही करते है और जब वह दूध नदी या तालाब में मिल जाता है तो वो हमारे लिए औषधि का काम करता है। हमारे ऋषि मुनियों ने जो भी परम्पराए स्थापित की है वो सब मानव जाती के कल्याण के लिए की है। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा की न तो भगवान को किसी भी चीज की जरुरत होती है। हम तो केवल उस दूध का प्रयोग करके उसका शुद्धिकरण करते है। यहाँ पर दूध चढ़ाना और दूध बाँटना एक अलग-अलग विषय है। अगर आप दूध चढ़ाना चाहते है तो चढ़ाइये। अगर आप दूध बाँटना चाहते है तो उस से भी हज़ार गुना दूध बाँटना चाहिए। "हरी जी मेरी लागि लगन मत तोडना ,गहरी नदिया नाव पुरानी, बीच भंवर मत छोड़ना" भजन सुनकर महाराज श्री ने भक्तों को भक्ति में सदा के लिए डूब जाने के लिए कहा। आप सोचिये की हमने भगवान को किसके लिए छोड़ा है। महाराज ने वहां पर मौजूद सभी लोगों से पूछा। एक गांव में एक नौजवान की मृत्यु हो गयी। उसके छोटे छोटे बच्चे थे और गाँव वाले सभी उसकी सब यात्रा में जा रहे थे। जो भी लोग आगे-आगे चल रहे थे तो वो सब राम नाम सत्य कह रहे थे और जो पीछे चल रहे थे तो वो कुछ भी बोल रहे थे। कोई भगवान-भगवान नहीं है। वो कह रहे थे की अगर भगवान होते तो इसको नहीं बुलाते अपने पास। जिसके इतने छोटे छोटे बच्चे है। तब भगवान स्वयं एक संत का रूप बन कर वहां पर आये और पूछा की तुम ऐसे भगवान को क्योँ बोल रहे हो। वो बोले की क्योँ नहीं बोले की क्या एक जवान व्यक्ति की ऐसे मौत होनी चाहिए। जैसी इस व्यक्ति की हो गयी है। क्या ये भगवान का न्याय है? नहीं ये तो भगवान का अन्याय है। कोई भगवान नाम की चीज नहीं है। वो बोले की अगर ये व्यक्ति अभी ज़िंदा हो जाए तो हम मान लेंगे की हाँ भगवान है। तब महाराज ने उस मरे हुए को स्पर्श किया और वो मरा हुआ व्यक्ति ज़िंदा हो गया। वहां पर मौजूद सभी लोग भगवान को भूल गए और उन संत की जय जयकार करने लग गए। सब लोग कह रहे थे की महाराज की जय हो। बाबा की जय हो और शव यात्रा शोभा यात्रा में बदल गयी। महाराज को अपने गाँव में लेकर गए हुए पुरे गाँव में घुमाया और जय जयकार करते रहे। तब बाबा ने कहा की अगर तुम्हारी सभी बधाइयाँ पूरी हो गयी हो तो मैं तुमसे एक बात कहना चाहता हूँ। वो बोले की अच्छा बाबा बताओ। अब तो तुम खुश हो की तुम्हारा बच्चा जीवित हो गया है तो वो सब बोले की हाँ महाराज हम सब तो बहुत ही खुश है। आप जैसे संतों के कारण ही ये पृथ्वी टिकी हुई है। तब बाबा बोला की तुम लोगों के कहने पर मैंने इस व्यक्ति को जीवित कर दिया है। ये तभी जीवित रहेगा जब कोई भी व्यक्ति इसके बदले अपने प्राण दे और जो इसको सबसे ज्यादा प्रेम करता है वो इसके बदले अपने प्राण दे दे तो ये हमेशा ही जीवित रहेगा। सबसे पहले पिता जी पूछा की आप तो अब बूढ़े हो गए हो आप ही अपने प्राण दे दो। तब पिता जी ने अलग-अलग बहाने बना कर कहा की अगर मैंने अपने प्राण दे दिए तो ये पीछे से सारे परिवार को ही मरवा देगा। इस लिए मेरा मरना ठीक नहीं है। उसके बाद माता जी पूछा की आप ही दे दो तो माता जी ने भी ऐसे ही बहाना बना दिया। महाराज श्री ने बताया की कन्हैया का जन्म हुआ और सभी ब्रजवासी उनका दर्शन करने के लिए वहां पर आये। जब कंस को पता चला की मुझे मारने वाला ब्रज में जन्म ले चूका है तो कंस ने अपनी मुँह बोली बहन पूतना को ब्रज में भेज कर कहा की जाओ और जितने भी वहां पर नवजात शिशु है उन सब को मार दो। पूतना भेष बदलकर श्री कृष्ण के पास गयी। भगवान को झूंठे लोग बिलकुल भी पसंद नहीं है। दो लोगों को भगवान बिलकुल भी नहीं देखता है। कृष्ण अवतार में भगवान कृष्ण ने पूतना को नजरें उठाकर नहीं देखा था। और राम अवतार में भगवान् राम ने शूर्पणखा को नहीं देखा था। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।। .

22Aug 2017

" मनुष्य को भगवान से सदा प्रेम करना चाहिए, घृणा कभी नहीं करनी चाहिए "

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में नार्थ कैरोलिना, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस में राजा बलि की कथा रसपान भक्तों को कराया। महाराज श्री ने कहा कि हमें हमेशा ही अपने ईश्वर से प्यार करना चाहिए। हमें अपने इष्ट देव का कभी भी अपमान नहीं करना चाहिए क्योंकि अपने ईश्वर से जो भी व्यक्ति घृणा करता है उसका कभी भी कल्याण नहीं हो सकता है। हमें सदा ही अपने उस परमात्मा से प्रेम करते रहना चाहिए तभी तो हमारा कल्याण वो करेंगे। यदि हम वेद, पुराण, साधु, संत, ब्राह्मण आदि से प्रेम नहीं करेंगे और उनका अपमान करेंगे तो हमारा कभी भी भला नहीं हो सकता है। हमारे प्रभु हमसे सदा के लिए रूठ जायेंगे और कभी भी हमारा उद्धार नहीं हो सकता है। हमारा प्रेमी तो वो कान्हा है जो हमें हर मुसीबत से बचाता है। जब प्रह्लाद भक्ति करने के लिए जाते है उनका पिता हिरण्यकशपु उनको सताता है तो भगवान विष्णु नरसिंघ का रूप लेकर के खम्बा चीर के प्रकट हो जाते है। भगवान उन लोगों की सदा ही मदद करते है जो भगवान के नाम पर अपने आप को न्योछावर कर देता है। तो इसलिए हमें ये नहीं सोचना चाहिए कि अगर हम भक्ति करेंगे तो हमें क्या मिलेगा। आप ये सोचिये की अगर हम भगवान के हो गए तो ऐसा कुछ नहीं है जो हमसे बच जायेगा। सबकुछ हमारे इष्टदेव भगवान कन्हैया हमको दे देंगे। हमारी देखभाल भी करेंगे। क्योंकि वो तो उनकी जिम्मेदारी बन जाएगी। श्री शुकदेव महाराज गंगा के तट पर विराजमान राजा परीक्षित को कथा श्रवण करा रहे है। उसके बाद महाराज श्री बताते है की भगवान वामन का रूप धर के राजा बलि को छलने के लिए जाते है और राजा बलि से कहते है कि तीन पग धरती हमको दान में दे दो। तब महाराज बलि ने कहा की महाराज आप देखने में बहुत ही छोटे से दिख रहे हो। आप इससे भी ज्यादा भी मांग सकते हो। तीन पग धरती में तो कुछ भी नहीं होगा। महाराज श्री ने कहा की आज कल का दानी कहता है की कम मांगों। जो लोग ये समझते है की देने से कुछ ख़त्म होता है तो वो सब व्यक्ति मुर्ख है। हम जब तक बीज नहीं बोते है तो हमको फसल की भी इच्छा नहीं करनी चाहिए। तब राजा बलि ने भगवान वामन से कहा की महाराज आप इसे ज्यादा भी मांग सकते हो तो महाराज वामन ने कहा की नहीं महाराज आप केवल मुझे तीन पग धरती ही दे दो। फिर राजा बलि ने कहा की नहीं महाराज आप इससे ज्यादा ही मांग लो में दे दूंगा। तब भगवान वामन ने कहा नहीं महाराज में तो एक संतोषी ब्राह्मण हूँ। मुझे तो केवल तीन पग धरती ही चाहिए। तब राजा बलि ने कहा की तो लीजिये में आपको तीन पग धरती देता हूँ ,लेकिन तभी वहां पर राक्षसों के गुरु शुक्राचार्य जी वहां पर आ जाते है। उन्होंने कहा की नहीं राजन आप तीन पग धरती तो क्या इनको एक पग धरती भी मत देना और शुक्राचार्य ने राजा बलि से कहा की तुम जानते नहीं हो कि ये कौन है? तब राजा बलि बोले की ये कौन है तब गुरु शुक्राचार्य बोले की ये तिर्लोकिनाथ है ये तुम्हारा सब कुछ हरण करने के लिए यहाँ पर आये है। तभी राजा बलि काफी खुश हो गए की मेरा तो भाग्य ही खुल गया है। "दाता एक राम भिखारी सारी दुनिया, राम एक देवता पुजारी दुनिया सारी" भजन सुना कर महाराज श्री ने सभी भक्तों को मंत्रमुग्ध कर दिया। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा कि आप मुझे अपना समय दो मैं तुमको आनंद दूंगा। मैं आपके सभी दुखों को नष्ट करने की राह दिखा दूंगा। तब राजा बलि ने कहा कि आज तो मेरा भाग्य ही जाग गया है जो सारी दुनिया को देने वाला है आज मेरे दर पर आकर मुझसे ही कुछ मांग रहे है। अगर आज मैंने इनको खाली हाथ लौटा दिया तो मेरा तो सब जीवन ही व्यर्थ हो जायेगा। तभी महाराज को एक दृष्टांत याद आया और बताने लगे कि एक मंदिर के बाहर एक भिखारी बैठा रहता था। वो काफी ही बुजुर्ग था। वह एकदम शांत बैठा रहता था। और उनके शरीर से खून बह रहा था। उनके पुरे शरीर को कोड लगा हुआ था और उनकी दशा बड़ी ही दयनीय थी। जवान लड़का उस मंदिर में हर रोज आता और उस को कुछ न कुछ हर रोज देता था। फिर एक दिन वह व्यक्ति हर रोज की तरह वहां पर आया और रोज की तरह उसको देने लगा। आज उस यंग व्यक्ति के मन में एक प्रश्न उठ रहा था। तब उस जवान व्यक्ति ने उस बूढ़े व्यक्ति से कहा की बाबा बुरा न मनो तो मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ। तब बूढ़ा व्यक्ति बोला की पूछो बेटा। बाबा आप इस दयनीय अवस्था में भीख क्योँ मांगते हो? तब वह बूढ़ा आदमी बोला की बेटा अपना पेट भरने के लिए। अगर हमें ज़िंदा रहना है तो अपना पेट तो किसी न किसी तरह भरना ही होगा। तब वो जवान व्यक्ति बोला की आप ज़िंदा रहना चाहते हो तो बूढ़ा व्यक्ति बोला की ज़िंदा कौन नहीं रहना चाहता है। तब उस जवान व्यक्ति ने कहा की इस उम्र में आपको इस अवस्था में भी ज़िंदा रहने के लिए भीख मांगनी पड़ती है। आप भगवान से अपने लिए मौत ही क्योँ नहीं मांग लेते हो? आपके सभी दुःख नष्ट हो जायेंगे। तब उस बूढ़े व्यक्ति ने बड़े ही गजब का जवाब दिया कि बेटा जीवन और मृत्यु किसी भी जीव के हाथ में नहीं है। जीवन और मृत्यु तो केवल उस भगवान के हाथ में ही है। तब उस बच्चे कहा की क्या वो भगवान आपको मरना नहीं चाहता है तो उसने कहा की नहीं वो मुझे नहीं मारना चाहता है। वो मुझे इसलिए नहीं मारना चाहता है की कल तुम मेरी जगह पर न आ जाओ जहाँ पर आज मैं बैठा हूँ। तुम जानते नहीं हो की कल मैं वहां था जहाँ पर आज तुम हो। कहते है कि जो भी व्यक्ति अपने दर से किसी व्यक्ति को खाली हाथ लौटा देता है या उस व्यक्ति के दर से कोई भी खली हाथ लौट जाता है तो उसके सभी पुण्य कर्मों को ले जाता है और जीवन भर के अपने पापों को उसके दर पर ही छोड़ जाता है। तभी तो गृहस्थ आश्रम सबसे बड़ा आश्रम होता है की जो भी हमारे घर पर आता है हम उनकी सेवा करते है। हमें अपने गुरु की हर बात माननी चाहिए। क्योंकि गुरु की हर बात को मानना तो हर शिष्य का फर्ज होता है। गुरु के बिना तो मनुष्य का जीवन ही बेकार है। उसके सभी काम बेकार जाते है। कभी भी उसका भला नहीं हो सकता है। राधे राधे बोलना पड़ेगा!!

19Aug 2017

" हर एक भारतीय को अपनी संस्कृति से प्रेम करना चाहिए "

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में नार्थ कैरोलिना, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस महाराज श्री ने आत्मदेव की कथा का रसपान भक्तों को कराया। महाराज श्री ने कहा कि आजकल हम हम अपने बच्चों को अपनी संस्कृति से नहीं जोड़ते हैं फिर हम कहते ही कि हमारे बच्चे हमारा सम्मान या सेवा नही कर रहे है। महारज श्री ने कहा कि श्रीमती सहानी मुम्बई में मर गई लेकिन उसके बच्चे ने उसको 1 साल के बाद देखा जब उसकी बॉडी कंकाल बन गई थी। पूर्व काल में एक नगर में एक ब्राह्मण रहता था। उसका नाम आत्मदेव था। वह बहुत ज्ञानी और तेजस्वी था। उसकी पत्नी धुन्धुली कुलीन होने पर भी अपनी बात पर अड़नेवाली थी। वह क्रूर, झगडालू और कंजूस थी। बहुत समय बीत जाने के बाद भी उन दोनों के यहाँ संतान नही हुई। उन्होंने बहुत तरह से दान धर्म निभाया पर कुछ नही हुआ। एक दिन आत्मदेव दुखी होकर घर छोड़ कर वन को चला गया। वह एक तालाब के पास पंहुचा। पानी पी कर बैठा तो उसने एक सन्यासी महात्मा को वहाँ आते देखा। आत्मदेव ने सन्यासी के चरणों में प्रणाम किया और लम्बी लम्बी साँसे लेने लगा। सन्यासी ने उसके दुःख का कारण पूछा तो वह बोला कि अब देवता और ब्राह्मण भी उसका दिया प्रसन्न मन से स्वीकार नही करते। उसके संतान न होने से वह बहुत दुखी है और आत्महत्या करने आया है। उसके संतानहीन जीवन, घर और धन को धिक्कार है। जब आत्मदेव सन्यासी के सामने ये सब कहकर रोने लगा तब महात्मा को बहुत दया आई। उन्होंने आत्मदेव से कहा कि मैनें तुम्हारे माथे कीलकीरों में पढ़ा है कि सात जन्मों तक तुम्हारे कोई संतान नही हो सकती इसलिए तुम संसार की वासना छोड़ कर संन्यास ले लो। परन्तु ब्राह्मण ने कहा कि जिसमें पुत्र और स्त्री का सुख नही है वह संन्यास भी नीरस है। महात्मा ने समझाते हुए कहा कि विधाता का लेख मिटाने पर भी तुम्हे संतान से सुख नही मिलेगा। जब वह ब्राह्मण किसी प्रकार नही माना, तब सन्यासी ने उसे एक फल दिया और कहा कि ये अपनी पत्नी को खिला देना। इससे एक पुत्र होगा। अगर तुम्हारी पत्नी एक साल तक सत्य, शौच, दया, दान और एक समय एक ही अन्न खाने का नियम रखेगी तो बालक बहुत शुद्ध स्वभाव वाला होगा। ब्राह्मण ने वह फल अपनी पत्नी को दिया और कहीं चला गया। उसकी पत्नी कुटिल स्वभाव कि थी। उसने अपनी सखी से कहा कि मैं यह फल खाऊँगी तो मुझे बहुत कष्ट सहने पड़ेंगे। प्रसव कि पीड़ा, नियमों का पालन आदि सब करना होगा। इसलिए मैं ये फल नही खाऊँगी। उसके पति ने जब घर आकर पूछा कि फल खा लिया तो उसने कहा हाँ खा लिया। धुन्धुली ने अपनी बहन को सब बात बतायी तो वह बोली कि मेरे पास एक उपाए है। उसकी बहन ने कहा कि मेरे पेट में जो बच्चा है वो मैं तुझे दे दूँगी। तक तक तू गर्भवती के समान घर में गुप्त रूप से रह। तू मेरे पति को कुछ धन दे देगी तो वो तुझे अपना बालक दे देंगे। हम ऐसी युक्ति करेंगे जिससे सब यही कहें कि मेरा बालक छेह महीने का होकर मर गया। फिर मैं तेरे घर आकर उस बालक का पालन पोषण करती रहूंगी। और यह फल तू गौ को खिला दे। ब्राह्मणी ने सब कुछ अपनी बहन के कहे अनुसार किया। जब उसकी बहन को पुत्र हुआ तो उसकेपति ने चुपचाप उसे धुन्धुली को दे दिया। आत्मदेव बालक के होने ही ख़बर सुनकर बहुत आनंदित हुआ। उसकी स्त्री ने कहा कि बालक के पालन पोषण के लिए मैं अपनी बहन को यहाँ बुला लेती हूँ। आत्मदेव ने कहा ठीक है। उस बच्चे का नाम धुंधकारी रख दिया। तीन महीने बाद उस गौ ने भी एक मनुष्य के आकार के बच्चे को जन्म दिया। लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ और आत्मदेव के भाग्य कीसराहना करने लगे। आत्मदेव ने बालक के गौ के से कान देखकर उसका नाम गोकर्ण रख दिया। जब वे दोनों बालक जवान हुए तो गोकर्ण बहुत बड़ा पंडित और ज्ञानी हुआ किंतु धुंधकारी बहुत दुष्ट निकला। चोरी करना, सबसे द्वेष बढाना, दूसरे के बालकों को कुएं में डालना और सबको तंग करना यही उसका स्वभाव था। उसने वेश्याओं के जाल में फँस कर अपने पिता की सारी संपत्ति नष्ट कर दी। जब सब कुछ ख़तम हो गया तो आत्मदेव बहुत दुखी हुआ और कहने लगा कि इससे तो मेरी पत्नी बाँझ ही रहती। अब मैं कहाँ जाऊं और क्या करूं। उसी समय गोकर्ण ने आकर अपने पिता को समझाया कि यह संसार असार है। यह अत्यन्त दुखरूप और मोह में डालने वाला है। सुख न तो इन्द्र को है और न ही चक्रवर्ती राजा को। सुख केवल एकांतजीवी विरक्त मुनि को है। "यह मेरा पुत्र है" इस अज्ञान-को छोड़ दीजिये। मोह से नरक कीप्राप्ति है। इसलिए सबकुछ छोड़ कर वन में चले जाइए। गोकर्ण की बात सुनकर आत्मदेव को बहुत अच्छा लगा। उसने अपने पुत्र से उसे और उपदेश देने को कहा। गोकर्ण ने कहा यहशरीर हड्डी, मांस और रुधिर का पिंड है। इसे मैं मानना छोड़ दीजिये। स्त्री पुत्र आदि को अपना कभी ना मानें। भगवान् का भजन सबसे बड़ा धर्म है। निरंतर उसी का आश्रय लिए रहे। आत्मदेव ने अपने पुत्र की बात सुनकर घर त्याग दिया और वन में रात दिन भगवान् की सेवा- पूजा करने लगा। नियमपूर्वक भागवत के दशम स्कंध का पाठ करने से उसने भगवान् श्री कृष्ण चंद्र को प्राप्त कर लिया।

20Aug 2017

" हमें अपने ईश्वर की भक्ति में ही विश्वास रखना चाहिए "

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में नार्थ कैरोलिना, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस में भगवान शुक की कथा रसपान भक्तों को कराया। महाराज श्री ने कहा कि इस संसार में मेरे प्रभु अगर कृपा करे तभी श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करने का मज़ा आता है। कभी-कभी कथा के सुनने में आस पास का ट्रैफिक भी बाधा पहुंचाता है। कई अन्य चीजे भी बाधा पहुंचाती है। हमारी नींद भी कभी-कभी बाधा पहुंचाती है। कई बार वहां का भोजन प्रबंध भी बाधा पहुंचा सकता है। कथा के सुनने में बाधा कहीं से भी आ सकती है। आप कल्पना नहीं कर सकते है बाधा कहाँ-2 से आ सकती है। महाराज श्री ने बताया कि केवल जब हमारे प्रभु अपनी कृपा हम पर करते है तभी ही श्रीमद भागवत कथा को सुनने का मज़ा आता है। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा कि भगवान श्री कृष्ण ने आपको कथा को सुनने के लिए चुना है। तभी तो आपको इसके सुनने का फल प्राप्त होगा और जब भगवान हरी स्वयं हमें अपनी कथा को सुनाये तो इससे बड़ा हमारे लिए और क्या हो सकता है कि मेरे इष्ट देव स्वयं आ कर मुझे अपनी इस कथा का रसपान करा रहे है। महाराज श्री ने कहा कि कल आपने भागवत कथा में आत्मदेव की कथा को सुना था। जब हम धर्म के विरुद्ध कार्य करते है तो हम धुंधकारी है। हम सब में धुंधकारी मनुष्य मौजूद होता है और जब हम धर्म में रह कर कार्य करते है तो हम गौकर्ण होते है। गौकर्ण का मतलब है की विद्वान मनुष्य। वह मनुष्य समझदार होता है। सत कर्म करता है और सदा ही माँ बाप की सेवा करते है। धर्म की सेवा करते है। सदा ही सत्य का अनुशरण करते है। महाराज श्री ने बताया कि किसी को भी उसकी वाणी से कष्ट न हो ऐसी वाणी का प्रयोग करते है और इसके विपरीत ही धुंधकारी अपना कार्य करते है। सभी को कष्ट देते है। धर्म के विरुद्ध अपना कार्य करते है। सदा ही दुसरो से उल्टा सीधा बोलते रहते है। उनके जो भी मन में आता है उनसे वैसा ही बोलते है। धुंधकारी कभी भी दुसरो का भला नहीं कर सकता है। वह अपने आप को ही सबसे ऊपर मानता है। वह सोचता है कि में ही सबसे ऊपर हूँ बाकि सभी उससे निचे है। वह मनुष्य भगवान को नहीं मानता है। वह कहता है कि भगवान कुछ नहीं होता है। भगवान ने गीता में अर्जुन से कहा था कि हे अर्जुन इस संसार का पालनकर्ता मैं ही हूँ और तब कृष्ण भगवान ने कहा कि जो लोग मेरी माया से वशीभूत है आज मुझे को नहीं पहचान पाते है। मुझे को भला बुरा कहते है। वो मुझे केवल अपनी तरह का ही साधारण सा समझने लगते है। मुझे जान लेना या मेरी शक्ति को पहचान लेना कोई साधारण सी बात नहीं है। ये आसान काम नहीं है। इस संसार में जो भी कुछ है उनसब का मूल मैं ही तो हूँ। जो व्यक्ति मेरी पूजा करता है तो केवल मुझ को प्राप्त करता है और मेरे धाम में ही निवास करता है। मुझे पहचान पाना आसान काम नहीं है। कोई भी साधारण सा व्यक्ति मुझे आसानी से पहचान भी नहीं सकता है। जब जब मुझे इस पापी पृथ्वी पर धर्म को बचाना था तो मैंने तब तब इस धरती पर अवतार लिया है। महाराज श्री ने कहा कि एक दिन भगवान श्री कृष्ण गोकुल में अकेले और चुपचाप शांत बैठे है तो राधा उनसे पूछती है आप इस तरह से उदास क्योँ बैठे हैं? भगवान कहते है कि मैं अपने इन कलयुग के बच्चों को देख कर दुखी हो रहा हूँ। तब किशोरी राधा जी ने कहा की ऐसा क्योँ। तब उन्होंने कहा की सभी को पता होता है की मेरा बुरा किसमें है और भला किसमें है। तब भी आज का मनुष्य इन सब बातों को नजर अंदाज कर रहा है। हर मनुष्य को सदा ही सत्य बोलना चाहिए और धर्म के मार्ग पर ही चलना चाहिए। तभी तो इस संसार में उसका भला हो सकता है। लेकिन आज का मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए न जाने कितने ही झूठ बोल जाता है और अपने आने वाले जीवन को संकट में डाल देता है। जब भी हमारे माँ बाप हमसे किसी भी चीज के लिए माना करते है तो हम नहीं मानते है और उसी को करते है। तब महाराज श्री ने कहा कि क्या शास्त्र हमसे कहता है कि हमें झूठ बोलना चाहिए। क्या पुराण हमसे कहता है कि हमें झूठ बोलना चाहिए। क्या एक भी पुराण ऐसा है जो कहता है कि हमें अपने माँ बाप का अपमान करना चाहिए? एक पुराण क्या कहता है कि हमें अपने पड़ोसियों को हर्ट करना चाहिए या एक भी पुराण ऐसा है की जो कहता है कि हमें अपने बच्चों को हर्ट करना चाहिए? एक भी पुराण ऐसा नहीं होता है? लेकिन फिर भी हम ये सब करते है। इन सब को न जाने कौन हम सब को सीखा देता है। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा कि हमसे जिस भी काम को करने के लिए मना किया जाता है हम उसी काम को करते है और जिस भी काम को करने के लिए कहा जाता है हम उस काम को नहीं करते है। भगवान श्री कृष्ण सोचते है कि इन सब मनुष्यों का कल्याण कैसे किया जाए? तब श्री कृष्ण ने भगवान शुक से कहा की आप पृथ्वी पर जाओ और हमारी कथाओं को लोगों को सुनाओ। हमने यहाँ पर जन्म ले करके क्या क्या लीलाये की है जब ये जानेगे और हमारी कथाओं को सुनेगे तो कथा को सुन सुनकर वो सभी मनुष्य सत मार्ग पर चलेंगे और धर्म के मार्ग पर अपने आप ही चलने लगेंगे। तब भगवान श्री कृष्ण ने शुक से कहा कि तुम जाओ और हमारी इन कथाओं का प्रचार और प्रसार करो। तभी ही इन सब का भला हो सकता है। जब शुक आ रहे थे तो रास्ते में कैलाश पर्वत पड़ा। इसी पर्वत पर माँ पार्वती और भगवान भोलेनाथ रहते थे। तो पार्वती माता भोले नाथ से कथा सुन रही है। तब भोलेनाथ ने माता पार्वती से कहा की पहले आप जाओ और देख कर आओ की इस वक़्त यहाँ पर कोई और तो नहीं है। जब मध्य में कथा पहुंची तो माता पार्वती को नींद आ गयी और वो वहीँ पर सो गयी लेकिन शुक ने पूरी कथा सुनी। अब प्रश्न ये उठता है कि माता पार्वती को नींद कैसे आ गयी तब गोस्वामी तुलसी दास कहते है की पिछले जन्म के पाप के कारण उनको कथा अच्छी नहीं लगती है। यहाँ पर महर्षि ने कहा की उनके जीवन में तीन चीजे होती है पहले तो वो कथा में जाएँगी ही नहीं, अगर चले भी गयी तो वो वहां पर सो जायेगा, अगर नहीं भी सोया तो वह वहां पर सब से लड़ाई ही कर देगा। जब भी आप का कोई बड़ा या सम्मानीय व्यक्ति आप को समझाए और आप को तब भी कुछ भी समझा में नहीं आता है तो समझ लेना की अब आपका अभी से बुरा वक़्त शुरू हो चुका है। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

21Aug 2017

"भगवान ना ज्ञान से मिलते हैं ना दौलत से मिलते हैं। जिसका मन पवित्र है भगवान उसी को मिलते हैं।"

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में नार्थ कैरोलिना, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस में भगवान शुक की कथा रसपान भक्तों को कराया। पूज्य महाराज श्री ने परीक्षित जी महाराज के प्रसंग को प्रारम्भ करते हुए कहा की जब परीक्षित जी महाराज को पता चला कि सातवें दिन उनकी मृत्यु निश्चित है तो अपना सब कुछ त्याग दिया। राजा परीक्षित ने संतो से पूछा की जिसकी मृत्यु सातवे दिन हो तो उस क्या करना चाहिए? इस पर कोई कहता है भजन करो,कोई कहता है गंगा स्नान करे, किसी संत ने कहा मोन करो, स्मरण करो ध्यान करो, उपासना करो। अनेको संत से उन्हें अनेकों विचार प्राप्त हुए। उसी समय भगवान नारद के आदेश पर भगवान शुकदेव जी वहाँ पर पधारें। उनके मुख पर बहुत तेज था सभी संतो ने उनको प्रणाम किया। शुकदेव जी महाराज जब आये तब राजा परीक्षित ने उन्हें साष्टांग दंडवत प्रणाम किया। और शुकदेव जी से पूछा जिसकी मृत्यु निश्चित हो उसे क्या करना चाहिए और मृत्यु हमारे जीवन का कटु सत्य है। हम इस संसार में खाली हाथ आए थे और खाली हाथ ही जायंगे। यह पता होने के बावजूद भी हम अपना सारा जीवन सांसारिक भोगविलास में गुजार देते हैं और प्रभु ने हमें जिस कार्य के लिए मानव जीवन दिया है उससे हम भटक जाते हैं। शुकदेव जी ने परीक्षित जी महाराज से कहा हे राजन जिस की मृत्यु निश्चित हो उसे भागवत कथा श्रवण करनी चाहिए। उसी हमें भी सच्चे मन से भागवत कथा श्रवण करनी चाहिए और भगवान की भक्ति करनी चाहिए। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

21Aug 2017

"भगवान ना ज्ञान से मिलते हैं ना दौलत से मिलते हैं। जिसका मन पवित्र है भगवान उसी को मिलते हैं।"

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में नार्थ कैरोलिना, अमेरिका में शुरू हुई श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस में भगवान शुक की कथा रसपान भक्तों को कराया। पूज्य महाराज श्री ने परीक्षित जी महाराज के प्रसंग को प्रारम्भ करते हुए कहा की जब परीक्षित जी महाराज को पता चला कि सातवें दिन उनकी मृत्यु निश्चित है तो अपना सब कुछ त्याग दिया। राजा परीक्षित ने संतो से पूछा की जिसकी मृत्यु सातवे दिन हो तो उस क्या करना चाहिए? इस पर कोई कहता है भजन करो,कोई कहता है गंगा स्नान करे, किसी संत ने कहा मोन करो, स्मरण करो ध्यान करो, उपासना करो। अनेको संत से उन्हें अनेकों विचार प्राप्त हुए। उसी समय भगवान नारद के आदेश पर भगवान शुकदेव जी वहाँ पर पधारें। उनके मुख पर बहुत तेज था सभी संतो ने उनको प्रणाम किया। शुकदेव जी महाराज जब आये तब राजा परीक्षित ने उन्हें साष्टांग दंडवत प्रणाम किया। और शुकदेव जी से पूछा जिसकी मृत्यु निश्चित हो उसे क्या करना चाहिए और मृत्यु हमारे जीवन का कटु सत्य है। हम इस संसार में खाली हाथ आए थे और खाली हाथ ही जायंगे। यह पता होने के बावजूद भी हम अपना सारा जीवन सांसारिक भोगविलास में गुजार देते हैं और प्रभु ने हमें जिस कार्य के लिए मानव जीवन दिया है उससे हम भटक जाते हैं। शुकदेव जी ने परीक्षित जी महाराज से कहा हे राजन जिस की मृत्यु निश्चित हो उसे भागवत कथा श्रवण करनी चाहिए। उसी हमें भी सच्चे मन से भागवत कथा श्रवण करनी चाहिए और भगवान की भक्ति करनी चाहिए। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

14Aug 2017

"भगवान की भक्ति करने से ही व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते है।"

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर श्री कृष्ण की जन्मभूमि से परम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने अपने मुखारविंद से पंचम दिवस की श्रीमद्भागवत कथा का रसपान भक्तों को कराया। इस बार हम जन्माष्टमी महा महोत्सव मना रहे हैं इस बार जन्माष्टमी 15 अगस्त को है। इतना ही नहीं देश को आजाद हुए भी 70 साल पुरे हो जाएंगे। तो यह मात्र जन्माष्टमी महोत्सव नहीं है बल्कि देश की आजादी का भी पर्व है। इस बार स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर श्री कृष्ण भगवान् हमे कोई न कोई तो सन्देश देना चाहते होंगे तभी तो स्वतंत्रता दिवस पर जन्माष्टमी का पर्व आया है। महाराज श्री ने कहा कि हर मनुष्य को अपने जीवन में भक्ति जरूर ही करनी चाहिए। क्योँकि भक्ति के द्वारा ही उस मनुष्य का जीवन सफल हो सकता है। जो व्यक्ति अपने इस जीवन में भक्ति नहीं करता है उस मनुष्य का जीवन कभी भी सफल नहीं हो सकता है। इसलिए अपने इस जीवन को सुखी और सफल बनाने के लिए मनुष्य को अपने जीवन में भक्ति का मार्ग जरूर ही अपनाना चाहिए। महाराज श्री ने बताया कि जिस प्रकार से मनुष्य के जीवन में भक्ति जरुरी है ,उसी प्रकार से उसे देशभक्ति का मार्ग भी अपनाना बहुत ही जरुरी है। क्योँकि इसके द्वारा ही मनुष्य अपने जीवन को और अपने देश को हर प्रकार से खुशहाल बना सकता है। मनुष्य को अपने जीवन में सदा ही दुसरो की सेवा जरूर ही करनी चाहिए तभी तो हम अपना और दुसरो का भला कर सकते है। जो व्यक्ति दुसरो की सेवा करते है बह सदा ही उस व्यक्ति की मदद जरूर ही करते है और उसका जीवन सफल बना देते है। महाराज श्री ने बताया कि हमें अपने इष्ट देव की पूजा में सदा के लिए अपने जीवन को लगा देना चाहिए। तभी हम सब का अच्छी तरह से भला हो सकता है। हमें भगवान से अच्छी अच्छी बातें सीखनी चाहिए। हमें अपने ठाकुर जी की भक्ति में लग जाना चाहिए ताकि हमारे जीवन के सभी कष्टों को हमारे ठाकुर जी हर ले। भगवान भी उन्ही लोगों का साथ देते है जो सत्य और भलाई के रस्ते पर चलते है। इसलिए हमें सदा ही सत्य और भलाई का रास्ता अपनाना चाहिए। महाराज श्री ने कहा कि हर व्यक्ति को अपने जीवन में सदा ही सत्य कर्म करना चाहिए। सत्य कर्म ही उस मनुष्य को इस जीवन में हर तरह से सुखी बना सकते है। मनुष्य को सदा ही सत्य और अच्छी का मार्ग अपनाना चाहिए। इस मार्ग को अपना कर ही यह मनुष्य इस कपटी और लालची संसार में हर तरह से सुखी रह सकता है। मानव को कभी भी कपट और लालच का रास्ता नहीं अपनाना चाहिए। क्योँकि इस मार्ग को अपना कर मनुष्य अपना तो बुरा करता है ही साथ ही वह इस मार्ग से दुसरो का बुरा भी बैठता है। इसलिए मनुष्य को सदा ही अपने इष्ट देव से सत्य और अच्छी का मार्ग देने की अपील करनी चाहिए। इसके बाद महाराज श्री ने " हे गोविन्द ये जीवन है तेरे हवाले , बाके मुरलिया वाले " भजन गाकर अपने सभी भक्तों को मंत्र मुग्ध कर दिया। यहाँ पर बैठे सभी व्यक्तियों को भगवान के प्रति अपने आप को समर्पित कर देने को कहा। तभी हमारा इस संसार में सहीं प्रकार से जीवन काट सकता है। महाराज श्री ने बताया कि जब भी आप वृंदावन में जाए तो अपने ठाकुर जी से सच्ची प्रीत रखते है। ये भूमि बहुत ही पवित्र भूमि है। यहाँ पर आकर सभी मनुष्य अपने आप को और अपने पाप को धोते है। मनुष्य को देखने के लिए प्रेम रुपी नेत्र चाहिए होते है। जो भी सच्चा रसिक होता है तो वह आप से भगवान् की पूजा के लिए जरूर ही बोलेगा। यहाँ पर आकर बहुत से राजाओं ने शादी की थी। तभी तो वहां पर भी इस ब्रज भूमि की महक मिलती है। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा की अगर भगवान कृष्ण का नाम जपने से हम नर्क में जायेंगे तो हम अपने इस इष्ट देव एक नाम जरूर ही जपेंगे। चाहे हम नर्क में ही क्योँ न चले जाए। खुदा नहीं कहता है की तुम कृष्ण की निंदा करो और कृष्ण नहीं कहता है की तुम खुदा की निंदा करो। हम जब भी वृंदावन में रहे तो हमारे हर अंग में ब्रज की छाप लगी होनी चाहिए। हर घडी हमें अपने ठाकुर जी का नाम जपते रहना चाहिए। तभी हमारा यह जीवन सफल हो सकता है।

15Aug 2017

" मनुष्य को सदा के लिए अपने प्रभु की भक्ति में डूब जाना चाहिए "

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर श्री कृष्ण की जन्मभूमि से परम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने अपने मुखारविंद से षटम दिवस की श्रीमद्भागवत कथा का रसपान भक्तों को कराया। महाराज श्री ने बताया कि जिस प्रकार से मनुष्य के जीवन में भक्ति जरुरी है, उसी प्रकार से उसे देशभक्ति का मार्ग भी अपनाना बहुत ही जरुरी है। क्योँकि इसके द्वारा ही मनुष्य अपने जीवन को और अपने देश को हर प्रकार से खुशहाल बना सकता है। मनुष्य को अपने जीवन में सदा ही दुसरो की सेवा जरूर ही करनी चाहिए तभी तो हम अपना और दुसरो का भला कर सकते है। जो व्यक्ति दुसरो की सेवा करते है बहगवां सदा ही उस व्यक्ति की मदद जरूर ही करते है और उसका जीवन सफल बना देते है। महाराज श्री ने बताया कि हमें अपने इष्ट देव की पूजा में सदा के लिए अपने जीवन को लगा देना चाहिए। तभी हम सब का अच्छी तरह से भला हो सकता है। हमें भगवान से अच्छी अच्छी बातें सीखनी चाहिए। हमें अपने ठाकुर जी की बहकती में लग जाना चाहिए। ताकि हमारे जीवन के सभी कष्टों को हमारे ठाकुर जी हर ले। भगवान भी उन्ही लोगों का साथ देते है जो सत्य और भलाई के रास्ते पर चलते है। इसलिए हमें सदा ही सत्य और भलाई का रास्ता अपनाना चाहिए। महाराज श्री ने कहा कि भगवान अपने अपने में ही खोया हुआ रहता है। उसे व्यर्थ ही में इस सब की चिंता नहीं करनी चाहिए। जब कंस ने अक्रूर जी से कहा की जाओ और बलराम और कृष्ण को लिवा ले आओ। तब अक्रूर जी वृंदावन के लिए चल दिए। मनुषय व्यर्थ में ही अपने इस सब को सोच कर रोटा रहता है। उसे ऐसा नहीं करना चाहिए। क्योँकि जो ऐसा करता है वह कभी भी खुश नहीं रह सकता है। जब अक्रूर जी के साथ बलराम और कृष्ण जी वृंदावन से चले तो वहां पर लोगों की काफी भीड़ लग गयी थी। और उनसे वहां से नहीं जाने की प्रार्थना करने लगे। इस पर जब वो दोनों जब यमुना के तट पर पहुंचे तो वहां पर एक धोबी कपडे धो रहा था तब कृष्ण भगवन ने उससे कपडे पहनने के लिए मांगे थे। तब वो धोबी ने उनको कपडे देने से माना कर दिया। इस पर भगवान कृष्ण ने उस धोबी को वही पर पटक दिया और उसका खात्मा कर दिया। महाराज श्री ने बताया कि जब भगवान कृष्ण के पास जाने के लिए तैयार हो गए तो वो काफी खुश हो गए। जब कृष्ण बलराम के साथ कंस की नगरी में पहुँच गए तो वहां पर उन दोनों को एक दासी मिली जो कंस को चन्दन लगाने के लिए जा रही थी। तब उसको देख भगवान कृष्ण ने उससे रोक कर कहा की आप किसको चन्दन लगाने के लिए जा रही थी तो भगवान् ने उसे कहा की आप कंस को किया चन्दन लगाती हो आप मुझे ही चन्दन लगा दो। आपका भाग्य चमक जायेगा। और इस प्रकार से भगवान ने पहले हाथी को मारा ,फिर दरबार में सभी पहलवानो को बढ़ कर दिया। इससे कंस दर कर अपनी गद्दी पर बैठ गया। तब कृष्ण भगवान् ने कंस का वध कर दिया। और उस पापी राक्षस का नट कर दिया और अपनी माता देवकी और नाना को उस आतातायी के चंगुल से आज़ाद कराया। इससे वहां पर मौजूद सभी नगरवासी काफी खुश हो गए। महाराज श्री ने कहा कि उसके बाद जब भगवान कृष्ण जब शिक्षा के लिए गए तो वो गए तो ज्ञान के लिए थे लेकिन वो वहां से प्रेम की शिक्षा ग्रहण करके आये। और जब जरासंध से भगवान कृष्ण का सत्रह बार युद्ध हुआ था तो हर बार उनकी हार हुई थी। और वो रण को छोड़ कर चले गए। इसलिए ही तो उनको रणछोड़ के नाम से पुकारा जाता है। और अंत में जब फिर से कृष्ण ने द्वारका में अपनी नगरी बसै तो इससे जरासंध काफी गुस्सा हो गया था। और जब भगवान कृष्ण ने कंस के दरबार में अर्जुन और भीम को लेकर गए तो उनको द्वंध युद्ध के लिए ललकारा। तो जरासंध ने भीम को युद्ध के लिए ललकारा। और इस तरह से भगवान कृष्ण ने जरासंध का वध भीम के हाथों से करवाया। इस राज्य को उस आतातायी के चंगुल से आज़ाद करवाया। और कई देवी देवताओं को वहां से आज़ाद करवाया। फिर जब भगवान श्री कृष्ण रुक्मणि से विवाह करने के लिए गए तो वहां पर भगवान का काफी अपमान किया क्या था। उनको काफी भला बुरा कहा गया था। तब भगवान ने रुक्मणि का हरण कर लिया और उनको उठा कर के हरण करके अपनी नगरी द्वारका के लिए चल दिए। तब रुकमणी के भाई रुक्मी ने उनको रोकने की काफी कोशिश की लेकिन रुक्मी उनको रोकने में सफल नहीं हो सके। और भगवान ने रुक्मी को हरा कर के द्वारका ले गए और उनसे विवाह कर लिया। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

16Aug 2017

" मनुष्य को अपनी मित्रता के बीच अमीरी गरीबी को नहीं देखना चाहिए "

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर श्री कृष्ण की जन्मभूमि से परम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने अपने मुखारविंद से सप्तम दिवस की श्रीमद्भागवत कथा का रसपान भक्तों को कराया। आज महाराज श्री ने "प्रभु मुझे बता दो चरणों में कैसे आना?" भजन से कथा प्रारम्भ की। पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने मित्रता की परिभाषा समझाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंततः सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की थी।

16Aug 2017

" मनुष्य को अपनी मित्रता के बीच अमीरी गरीबी को नहीं देखना चाहिए "

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर श्री कृष्ण की जन्मभूमि से परम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने अपने मुखारविंद से सप्तम दिवस की श्रीमद्भागवत कथा का रसपान भक्तों को कराया। आज महाराज श्री ने "प्रभु मुझे बता दो चरणों में कैसे आना?" भजन से कथा प्रारम्भ की। पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज ने मित्रता की परिभाषा समझाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंततः सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की थी।

12Aug 2017

"भगवान की भक्ति कहीं भी की जा सकती है उसके लिए इधर-उधर भटकने की ज़रूरत नहीं है।"

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर श्री कृष्ण की जन्मभूमि से परम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने अपने मुखारविंद से चतुर्थ दिवस की श्रीमद्भागवत कथा का रसपान भक्तों को कराया। महाराज श्री ने कहा कि इस बार हम जन्माष्टमी महा महोत्सव 15 अगस्त को मना रहे है। इतना ही नहीं देश को आजाद हुए भी 70 साल पुरे हो जाएंगे। तो यह मात्र जन्माष्टमी महोत्सव नहीं है बल्कि देश की आजादी का भी पर्व है। इस बार स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर श्री कृष्ण भगवान हमे कोई न कोई तो सन्देश देना चाहते होंगे तभी तो स्वतंत्रता दिवस पर जन्माष्टमी का पर्व आया है। महाराज श्री ने कहा कि हमें सदा ही अपने माता पिता का हर जगह पर सम्मान करना चाहिए। तभी हमारा हर प्रकार से कल्याण हो सकता है। जो व्यक्ति अपने माता पिता का सम्मान नहीं करते है। इस व्यक्ति का कभी भी भला नहीं हो सकता है। अतः हर व्यक्ति को अपने माता पिता और गुरओं का हर जगह पर सम्मान करना चाहिए। तभी हम सब का भला हो सकता है। भगवान भी उन्ही लोगों का साथ देते है जो अपने माता पिता और गुरुओं का सम्मान करते है। महाराज श्री ने कहा कि हम सब से इस भारत देश में जन्म लिया है। जिस देश में अनेक चमत्कार हुए है। यही पर सभी देवी देवताओं ने जन्म लिया है। यही पर उनके सभी चमत्कारों का उल्लेख हम सब को मिलता है और किसी देश में इस तरह के चमत्कार हमें नहीं मिलते है। भारत में ही इस तरह का वाकया हमें मिलता है। भारत की संस्कृति भी काफी विशाल है। यहाँ पर अनेक धर्मों को मानने वाले लोग रहते है। इस सब के बावजूद यहाँ पर सभी लोग मिलजुल कर रहते है। महाराज श्री ने बताया कि हमें अपने इष्ट देव की पूजा में सदा के लिए अपने जीवन को लगा देना चाहिए। तभी हम सब का अच्छी तरह से भला हो सकता है। हमें भगवान से अच्छी-अच्छी बातें सीखनी चाहिए। हमें अपने ठाकुर जी की भक्ति में लग जाना चाहिए। ताकि हमारे जीवन के सभी कष्टों को हमारे ठाकुर जी हर ले। भगवान भी उन्ही लोगों का साथ देते है जो सत्य और भलाई के रस्ते पर चलते है। इसलिए हमें सदा ही सत्य और भलाई का रास्ता अपनाना चाहिए। महाराज श्री ने कहा कि हम सब ने इस भारत जैसे विशाल देश में जन्म लिया है जहाँ पर कृष्ण और राम जैसे देवताओं ने जन्म लिया है। हमें सदा ही अपने भगवान के चरणों की सेवा में लग जाना चाहिए। अपने जीवन को उनकी ही भक्ति में लगा देना चाहिए। चाहे वो कोई भी देवता हो। उसी की भक्ति में पूरी तरह डूब जाना चाहिए। तभी हम सब का भला हो सकता है। हमें अपनी भक्ति से उस अपने इष्ट देव को सदा ही प्रसन्न करते रहना चाहिए ताकि वो हमारे जीवन में आने वाले सभी कष्टों को आसानी से हर ले। महाराज श्री ने एक सूंदर भजन "मेरे गिनियों ना अपराध लाड़ली श्री राधे" सुनाकर वहां पर मौजूद सभी भक्तों को मंत्र मुग्ध कर दिया। इस गीत के माध्यम से महाराज श्री ने अपने भक्तों को कई सन्देश दिए ताकि वह आने वाले जीवन की आने वाली कठिनाइयों को आसानी से पार कर सके। इस भजन से महाराज श्री ने भगवान कृष्ण और राधा के प्रेम का भी वर्णन किया है। महाराज श्री ने बताया कि इस भजन के माध्यम से एक भक्त अपने इष्ट देव से प्रार्थना करता है की वह कितने भी अपराध कर ले लेकिन उनके इष्टदेव उसके द्वारा किये गए अपराधों को ना गिने। उसे पूजा और पाठ करना नहीं आता है। फिर भी आपकी भक्ति में लगा हुआ है। उसको पूजा और पाठ करना तो आप ही उसे बताओगे। अगर आप मेरे अवगुण देखोगे तो आप मेरा भला नहीं कर सकते है। इसलिए आप को मुझे हर तरह से सच्चाई के मार्ग पर चलाना ही होगा। तभी आप मेरा हर प्रकार से उद्धार कर सकते है। महाराज श्री ने कहा कि जिस व्यक्ति ने कभी पूजा नहीं की हो ,जिसने कभी सत्संग नहीं किया हो ,जिसने कभी भक्ति नहीं की हो उस व्यक्ति का जीवन बेकार है। उस व्यक्ति का कभी भी भला नहीं हो सकता है। महाराज श्री ने बताया की जिस तरह से हिरण कस्तूरी के चक्कर में जगह जगह भटकता रहता है लेकिन वह कस्तूरी उसी की नाभि में ही होती है। उसी तरह ही हमें अपने भगवान की भक्ति के लिए जगह जगह नहीं भटकना चाहिए। अपनी जगह पर ही उस की भक्ति में ही लगे रहना चाहिए। संसार की सत्यता को समझ कर अपने जीवन को उस ठाकुर की भक्ति में साद के लिए लगा देना चाहिए। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा कि हम सब को जगह जगह भटकना छोड़ देना चाहिए। अपने आप को गोविन्द की भक्ति में लगा देना चाहिए। ये हमारे गोविन्द ही हमें इस उलझन से निकल सकते है। हमें इस विपदा से सदा के लिए अलग कर देते है। महाराज श्री ने बताया कि इस बार जन्माष्टमी का पर्व भी 15 अगस्त के दिन ही पद रहा है। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा की यह तुम पर ही निर्भर करता है है तुम गुलाम बनना चाहते हो या राजा बन कर जीना चाहते हो। तभी तो इस बार जन्माष्टमी का त्यौहार आज़ादी के दिवस के दिन पड़ रहा है। इसीलिए हमें पूर्ण रूप से आज़ाद रूप में जीना चाहिए। महाराज श्री ने बताया कि हमें अपने ठाकुर जी के प्रति अपनी भक्ति को सुदृढ़ करना चाहिए। ताकि हम सब अपनी भक्ति में कमजोर ना हो सके। हमें कभी भी गलत कामों को नहीं करना चाहिए। हमसब को हमेशा अच्छे काम करते रहना चाहिए। हमें अपने सम्बन्ध अपने ठाकुर से मजबूत करने चाहिए। कोई भी कठिनाई चाहे हम सब के सामने क्यों ना हो। आज का भक्त तो यह चाहता है की गुरु जी अपने भक्त का हाथ जोड़ कर स्वागत करता रहे। लेकिन ये सब गलत है। भक्ति करते वक़्त तो हम सब को अनेक परीक्षा देनी पड़ती है। लेकिन हम सब को उन परीक्षाओं से नहीं घबराना चाहिए। हमें तो अपने भगवान की भक्ति में सदा के लिए लग जाना चाहिए। कभी भी अपनी परीक्षा से नहीं घबराना चाहिए। जिस प्रकार राजा बलि के पास भगवान वामन गए थे तो उन्होंने राजा बलि से तीन पग धरती मांगी थी। तो राजा बलि ने उनसे कहा था की तीन पग से ज्यादा धरती भी आप मांग सकते हो। लेकिन भगवान वामन ने कहा नहीं राजन मुझे तो केवल तीन पग ही धरती चाहिए। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा की जिस व्यक्ति के पास धन हो तो उसको समय समय पर भंडारा करते रहना चाहिए। महाराज श्री ने कहा कि हमें समय समय पर उन अनाथ लोगों की मदद करते रहना चाहिए जिनको दो वक़्त का खाना भी नसीब नहीं होता है ताकि उनका जीवन आराम से कट सके। हम सब को भूमि दान जरूर करना चाहिए। ताकि आगे आने वाले समय में हमारे लिए इस सब का लाभ मिल सके। ।।राधे राधर बोलना पड़ेगा ।।

12Aug 2017

"भगवान की भक्ति कहीं भी की जा सकती है उसके लिए इधर-उधर भटकने की ज़रूरत नहीं है।"

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर श्री कृष्ण की जन्मभूमि से परम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने अपने मुखारविंद से चतुर्थ दिवस की श्रीमद्भागवत कथा का रसपान भक्तों को कराया। महाराज श्री ने कहा कि इस बार हम जन्माष्टमी महा महोत्सव 15 अगस्त को मना रहे है। इतना ही नहीं देश को आजाद हुए भी 70 साल पुरे हो जाएंगे। तो यह मात्र जन्माष्टमी महोत्सव नहीं है बल्कि देश की आजादी का भी पर्व है। इस बार स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर श्री कृष्ण भगवान हमे कोई न कोई तो सन्देश देना चाहते होंगे तभी तो स्वतंत्रता दिवस पर जन्माष्टमी का पर्व आया है। महाराज श्री ने कहा कि हमें सदा ही अपने माता पिता का हर जगह पर सम्मान करना चाहिए। तभी हमारा हर प्रकार से कल्याण हो सकता है। जो व्यक्ति अपने माता पिता का सम्मान नहीं करते है। इस व्यक्ति का कभी भी भला नहीं हो सकता है। अतः हर व्यक्ति को अपने माता पिता और गुरओं का हर जगह पर सम्मान करना चाहिए। तभी हम सब का भला हो सकता है। भगवान भी उन्ही लोगों का साथ देते है जो अपने माता पिता और गुरुओं का सम्मान करते है। महाराज श्री ने कहा कि हम सब से इस भारत देश में जन्म लिया है। जिस देश में अनेक चमत्कार हुए है। यही पर सभी देवी देवताओं ने जन्म लिया है। यही पर उनके सभी चमत्कारों का उल्लेख हम सब को मिलता है और किसी देश में इस तरह के चमत्कार हमें नहीं मिलते है। भारत में ही इस तरह का वाकया हमें मिलता है। भारत की संस्कृति भी काफी विशाल है। यहाँ पर अनेक धर्मों को मानने वाले लोग रहते है। इस सब के बावजूद यहाँ पर सभी लोग मिलजुल कर रहते है। महाराज श्री ने बताया कि हमें अपने इष्ट देव की पूजा में सदा के लिए अपने जीवन को लगा देना चाहिए। तभी हम सब का अच्छी तरह से भला हो सकता है। हमें भगवान से अच्छी-अच्छी बातें सीखनी चाहिए। हमें अपने ठाकुर जी की भक्ति में लग जाना चाहिए। ताकि हमारे जीवन के सभी कष्टों को हमारे ठाकुर जी हर ले। भगवान भी उन्ही लोगों का साथ देते है जो सत्य और भलाई के रस्ते पर चलते है। इसलिए हमें सदा ही सत्य और भलाई का रास्ता अपनाना चाहिए। महाराज श्री ने कहा कि हम सब ने इस भारत जैसे विशाल देश में जन्म लिया है जहाँ पर कृष्ण और राम जैसे देवताओं ने जन्म लिया है। हमें सदा ही अपने भगवान के चरणों की सेवा में लग जाना चाहिए। अपने जीवन को उनकी ही भक्ति में लगा देना चाहिए। चाहे वो कोई भी देवता हो। उसी की भक्ति में पूरी तरह डूब जाना चाहिए। तभी हम सब का भला हो सकता है। हमें अपनी भक्ति से उस अपने इष्ट देव को सदा ही प्रसन्न करते रहना चाहिए ताकि वो हमारे जीवन में आने वाले सभी कष्टों को आसानी से हर ले। महाराज श्री ने एक सूंदर भजन "मेरे गिनियों ना अपराध लाड़ली श्री राधे" सुनाकर वहां पर मौजूद सभी भक्तों को मंत्र मुग्ध कर दिया। इस गीत के माध्यम से महाराज श्री ने अपने भक्तों को कई सन्देश दिए ताकि वह आने वाले जीवन की आने वाली कठिनाइयों को आसानी से पार कर सके। इस भजन से महाराज श्री ने भगवान कृष्ण और राधा के प्रेम का भी वर्णन किया है। महाराज श्री ने बताया कि इस भजन के माध्यम से एक भक्त अपने इष्ट देव से प्रार्थना करता है की वह कितने भी अपराध कर ले लेकिन उनके इष्टदेव उसके द्वारा किये गए अपराधों को ना गिने। उसे पूजा और पाठ करना नहीं आता है। फिर भी आपकी भक्ति में लगा हुआ है। उसको पूजा और पाठ करना तो आप ही उसे बताओगे। अगर आप मेरे अवगुण देखोगे तो आप मेरा भला नहीं कर सकते है। इसलिए आप को मुझे हर तरह से सच्चाई के मार्ग पर चलाना ही होगा। तभी आप मेरा हर प्रकार से उद्धार कर सकते है। महाराज श्री ने कहा कि जिस व्यक्ति ने कभी पूजा नहीं की हो ,जिसने कभी सत्संग नहीं किया हो ,जिसने कभी भक्ति नहीं की हो उस व्यक्ति का जीवन बेकार है। उस व्यक्ति का कभी भी भला नहीं हो सकता है। महाराज श्री ने बताया की जिस तरह से हिरण कस्तूरी के चक्कर में जगह जगह भटकता रहता है लेकिन वह कस्तूरी उसी की नाभि में ही होती है। उसी तरह ही हमें अपने भगवान की भक्ति के लिए जगह जगह नहीं भटकना चाहिए। अपनी जगह पर ही उस की भक्ति में ही लगे रहना चाहिए। संसार की सत्यता को समझ कर अपने जीवन को उस ठाकुर की भक्ति में साद के लिए लगा देना चाहिए। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा कि हम सब को जगह जगह भटकना छोड़ देना चाहिए। अपने आप को गोविन्द की भक्ति में लगा देना चाहिए। ये हमारे गोविन्द ही हमें इस उलझन से निकल सकते है। हमें इस विपदा से सदा के लिए अलग कर देते है। महाराज श्री ने बताया कि इस बार जन्माष्टमी का पर्व भी 15 अगस्त के दिन ही पद रहा है। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा की यह तुम पर ही निर्भर करता है है तुम गुलाम बनना चाहते हो या राजा बन कर जीना चाहते हो। तभी तो इस बार जन्माष्टमी का त्यौहार आज़ादी के दिवस के दिन पड़ रहा है। इसीलिए हमें पूर्ण रूप से आज़ाद रूप में जीना चाहिए। महाराज श्री ने बताया कि हमें अपने ठाकुर जी के प्रति अपनी भक्ति को सुदृढ़ करना चाहिए। ताकि हम सब अपनी भक्ति में कमजोर ना हो सके। हमें कभी भी गलत कामों को नहीं करना चाहिए। हमसब को हमेशा अच्छे काम करते रहना चाहिए। हमें अपने सम्बन्ध अपने ठाकुर से मजबूत करने चाहिए। कोई भी कठिनाई चाहे हम सब के सामने क्यों ना हो। आज का भक्त तो यह चाहता है की गुरु जी अपने भक्त का हाथ जोड़ कर स्वागत करता रहे। लेकिन ये सब गलत है। भक्ति करते वक़्त तो हम सब को अनेक परीक्षा देनी पड़ती है। लेकिन हम सब को उन परीक्षाओं से नहीं घबराना चाहिए। हमें तो अपने भगवान की भक्ति में सदा के लिए लग जाना चाहिए। कभी भी अपनी परीक्षा से नहीं घबराना चाहिए। जिस प्रकार राजा बलि के पास भगवान वामन गए थे तो उन्होंने राजा बलि से तीन पग धरती मांगी थी। तो राजा बलि ने उनसे कहा था की तीन पग से ज्यादा धरती भी आप मांग सकते हो। लेकिन भगवान वामन ने कहा नहीं राजन मुझे तो केवल तीन पग ही धरती चाहिए। यहाँ पर महाराज श्री ने कहा की जिस व्यक्ति के पास धन हो तो उसको समय समय पर भंडारा करते रहना चाहिए। महाराज श्री ने कहा कि हमें समय समय पर उन अनाथ लोगों की मदद करते रहना चाहिए जिनको दो वक़्त का खाना भी नसीब नहीं होता है ताकि उनका जीवन आराम से कट सके। हम सब को भूमि दान जरूर करना चाहिए। ताकि आगे आने वाले समय में हमारे लिए इस सब का लाभ मिल सके। ।।राधे राधर बोलना पड़ेगा ।।

11Aug 2017

"भगवान ना ज्ञान से मिलते हैं ना दौलत से मिलते हैं। जिसका मन पवित्र है भगवान उसी को मिलते हैं।"

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर श्री कृष्ण की जन्मभूमि से परम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने अपने मुखारविंद से तृतीय दिवस की श्रीमद्भागवत कथा का रसपान भक्तों को कराया। महाराज श्री ने कथा प्रारम्भ करते हुए कहा की इस बार हम जन्माष्टमी महा महोत्सव 15 अगस्त को मना रहे है। इतना ही नहीं देश को आजाद हुए भी 70 साल पुरे हो जाएंगे तो यह मात्र जन्माष्टमी महोत्सव नहीं है बल्कि देश की आजादी का भी पर्व है। इस बार स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर श्री कृष्ण भगवान हमे कोई न कोई तो सन्देश देना चाहते होंगे तभी तो स्वतंत्रता दिवस पर जन्माष्टमी का पर्व आया है। महाराज श्री ने कहा कि वृंदावन भूमि एक पवित्र भूमि है ,जहाँ पर भगवान श्री कृष्ण ने अनेकों बाल लीलाएं की थी तथा अनेक राक्षसों का नाश किया था। हमें भी सदा ही अपने इष्ट देव के चरणों में सारा ध्यान लगा देना चाहिए। सदा ही भगवान की भक्ति में लगे रहना चाहिए और अपने जीवन से उस राक्षस रूपी दानव का सदा के लिए नाश कर देना चाहिए। महाराज श्री ने अपने बच्चे और माँ बाप के बीच के रिश्ते के बारे में अपने भक्तों को बताते हुए कहा की हमें सदा ही श्रवण कुमार की तरह ही अपने माता पिता की आज्ञा का पालन करना चाहिए तथा सदा ही अपने माता पिता का हर जगह सम्मान करना चाहिए। मुंबई घटना के बारे में बताते हुए महाराज श्री ने कहा की एक माँ घर में अकेले ही मर गई और उसका अंतिम संस्कार करने वाला बेटा अमेरिका में ही नौकरी करता रह गया। जब बेटा मुंबई घर वापिस आया तो पता चला की माँ का कंकाल घर के अंदर था और माँ की मृत्यु हुए 9-10 महीने हो चुके हैं। इसमें किसकी गलती है? महाराज श्री ने सभी से पूछा। इसमें गलती है भारतीय शिक्षा की, इसमें गलती है माँ बाप की। क्यूंकि आजकल माता पिता अपने बच्चों को भी पैसा कमाने की मशीन समझते हैं। इसलिए सभी रिश्ते नाते हमारे समाज से ख़त्म होते जा रहे हैं। इसके बाद महाराज श्री ने "पत्थर की राधा प्यारी" भजन सुनाकर सभी भक्तों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस गीत के द्वारा महाराज श्री ने अपने भक्तों को भगवान की भक्ति को ही भक्त के जीवन का आधार बताया। जिसमें भगवान की सच्ची भक्ति के बिना उस भक्त का सारा जीवन बेकार है। उसे सदा ही सच्चे मन से अपने जीवन को सदा ही अपने प्रभु के चरणों में लगा देना चाहिए। तभी तो उस भक्त के जीवन के सभी पाप मिट सकते है। महाराज श्री ने बताया कि वृंदावन की भूमि हम सब को प्रेम प्रदान करने वाली भूमि है। जो भी भक्त कृष्ण नाम नहीं जपता है उस का जीवन व्यर्थ ही जाता है और जो भक्त कृष्ण नाम जपता है उस का जीवन बड़े ही अच्छे रूप में कटता है। हमें सदा ही संतो की वाणी को अपनाना चाहिए तभी हमारा उद्धार हो सकता है। हमें अपने मन पर सदा ही काबू रखना चाहिए। तभी हम कामयाब हो सकते है। जो व्यक्ति अपने मन पर काबू नहीं रख सकता है वह व्यक्ति कभी भी अपने जीवन में सफल नहीं हो सकता है। महाराज श्री ने बताया कि हमारी मृत्यु सदा ही आनी ही होती है। ये तो परम सत्य है की जिस व्यक्ति का जीवन हुआ है उसकी मृत्यु अवश्य ही होगी। इसलिए हमें अच्छे काम करके अपने जीवन को सफल बना लेना चाहिए। जितने भी भगवान के धाम होते है वैसे ही उसमें पाप और क्रोध भी रहना चाहता है। ये तो आप पर निर्भर करता है की आप किसको अपनाते है। जिसकी मृत्यु आती है उसको भागवत कथा को सुनना चाहिए। पूज्य महाराज श्री ने परीक्षित जी महाराज के प्रसंग को प्रारम्भ करते हुए कहा की जब परीक्षित जी महाराज को पता चला कि सातवें दिन उनकी मृत्यु निश्चित है तो अपना सब कुछ त्याग दिया। राजा परीक्षित ने संतो से पूछा की जिसकी मृत्यु सातवे दिन हो तो उस क्या करना चाहिए? इस पर कोई कहता है भजन करो,कोई कहता है गंगा स्नान करे, किसी संत ने कहा मोन करो, स्मरण करो ध्यान करो, उपासना करो। अनेको संत से उन्हें अनेकों विचार प्राप्त हुए।

9Aug 2017

"जो भी मांगोगे वो मिलेगा, अगर कुछ नहीं मांगोगे तो कृष्ण मिलेंगे।"

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर श्री कृष्ण की जन्मभूमि से परम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने अपने मुखारविंद से प्रथम दिवस की श्रीमद्भागवत कथा का रसपान भक्तों को कराया। महाराज श्री ने अपने भक्तों के साथ कलश यात्रा में भाग लिया है। यहाँ पर महाराज श्री ने कथा शुरू करने से पहले अपने सभी भक्तों के साथ पुरे मंदिर में परिक्रमा की। सबसे पहले महाराज श्री ने हाल में अंदर पहुँचते ही भगवान श्री गणेश की पूजा अर्चना की। उसके बाद महाराज श्री ने भगवान हनुमान जी की पूजा भी की। सबसे पहले महाराज श्री ने वहां पर दीप प्रज्वलित किये तथा बाद में भगवान श्री गणेश के चरणों में पुष्प अर्पित किये। महाराज श्री ने कहा कि हमें सदा ही भगावन की भक्ति में लगे रहना चाहिए। क्योंकि उससे ही हम अपने जीवन को सुचारु रूप से चला सकते है यहाँ महाराज श्री ने बताया की मानव सेवा करना ही भगवान की सेवा करना है। सभी बहन-बेटियों को मेरा साधुवाद जो उन्होंने इस बार भारतीय सभ्यता-संस्कृति की रक्षा हेतु भारतीय राखियों को महत्व दिया। ऐसे ही हम सबने मिलकर भारतीय संस्कारों को बचाना है। यहाँ बैठी सभी माताए, बहने बेटियों को मैं आज कुछ कहना चाहता हूँ। इस समय आस्था चैनल के माध्यम से सोशल मीडिया के माध्यम से जो कोई भी मुझे सुन रहा हैं मैं उनसे एक बात कहना चाहता हूँ की आप सभी को मेरा साधुवाद। आप सभी का धन्यवाद। मेरे एक बार कहने पर आपने भारतीय सभ्यता-संस्कृति की रक्षा हेतु भारतीय राखियों को महत्व दिया। माताऐं घर में सभी त्योहारों, व्रत व परवों को नियम अनुसार करना शुरु करें। सभी संस्कार घर में हो तो बच्चा बहुत जल्द उन से जुड़ता है हमारी पढ़ाई तो बिल्कुल संस्कार विहीन है पर अगर हम अपने घर को भी संस्कारविहीन बना देंगे संस्कार नहीं देंगे तो आने वाली पीढ़ियां धर्म, संस्कृति और बुजुर्गों का सम्मान बिल्कुल भूल जाएंगी फिर वह विदेशियों जैसे बनना चाहेंगे क्योंकि स्कूल की पढ़ाई हमें शुद्ध स्वदेशी नहीं विदेशी बनने की ओर धकेलती है । अगर माताएं सभी संस्कारों को सीख लें, सभी पर्वों पर ब्राह्मण को बुलाकर घर में पूजा पाठ व पर्वों की कथाएं एंव मंत्रोच्चारण हो और ब्राह्मण से कहा जाए कि इसका सार आज की भाषा के अनुसार समझाएं ताकि आज की भाषा के अनुसार पहले बच्चे उसका मतलब समझेंगे, तब जाकर बच्चों का इंटरेस्ट क्रिएट होगा । उसके बाद बच्चा संस्कारों के द्वारा संस्कृत से जुड़ेगा, और जो बच्चा एक बार संस्कृत से जुड़ गया, उसके अंदर यहां की संस्कृति की उत्पत्ति होगी, बीजारोपण होगा। महाराज श्री ने कहा कि हमें सदा ही अपने भगवान की भक्ति में लगे रहना चाहिए। यहाँ पर महाराज श्री ने वेदों के बारे में भी लोगों को बताया। सबसे पहले महाराज श्री ने अपने परमपूज्य गुरुदेव जी का धन्यवाद किया। महाराज श्री ने बताया की जो भी गुरु जी ने हमें बताया है ये बहुत ही मुश्किल से हम सब को प्राप्त होता है। जो भी गुरूजी ने थोड़ा बहुत भी हम सब को ज्ञान दिया है वो हम सब के लिए अनमोल है।महाराज श्री ने बताया कि जब भी कभी हम वृंदावन धाम में जाए तो बिना राधा के वृंदावन की यात्रा अधूरी मानी जाती है। हमें यहाँ पर आकर राधा रानी की सदा ही जयकार करनी चाहिए।

10Aug 2017

"दुःख संसार देता है भगवान तो बस सुख देते हैं।"

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर श्री कृष्ण की जन्मभूमि से परम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने अपने मुखारविंद से द्वितीय दिवस की श्रीमद्भागवत कथा का रसपान भक्तों को कराया। कितना बड़ा संयोग है की हम जन्माष्टमी महा महोत्सव मना रहे हैं इस बार जन्माष्टमी 15 अगस्त को है। इतना ही नहीं देश को आजाद हुए भी 70 साल पुरे हो जाएंगे। तो यह मात्र जन्माष्टमी महोत्सव नहीं है बल्कि देश की आजादी का भी पर्व है। इस बार स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर श्री कृष्ण भगवान् हमे कोई न कोई तो सन्देश देना चाहते होंगे तभी तो स्वतंत्रता दिवस पर जन्माष्टमी का पर्व आया है। हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने स्वच्छ भारत अभियान चलाया है मेरा उन्हें इस अभियान के लिए साधुवाद है। मोदी जी ने टारगेट रखा है की 2019 तक भारत में हर घर में शौचालय बनाना है और देश को शौच मुक्त बनाना है। मेरा यहाँ पर एक सवाल यह भी है की बाहरी स्वछता का लक्ष्य तो हम २-३ साल में पूरा कर लेंगे। लेकिन क्या हम में से कोई आंतरिक स्वच्छता की कोई बात करेगा उसका कोई लक्ष्य निर्धारित करेगा। शायद कोई ऐसा नहीं करने वाला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2017 से 2022 तक संकल्प वर्ष मनाने का संकल्प लेने का आह्वान किया है। पीएम मोदी ने 2017 से 2022 तक देश को न्यू इंडिया बनाने का संकल्प लिया है। मेरा मोदी जी से एक निवेदन है और यहाँ बैठे सभी भक्तों से एक निवेदन है की 2022 में भारत को आजाद हुए 75 साल हो जाएंगे तब हम एक न्यू इंडिया बनाने का संकल्प ले लेकिन वो न्यू इंडिया क्या होगा? वह न्यू इंडिया होगा मेरे देश में संस्कृत भाषा बोली जाए - पढ़ी जाए। देश की संस्कृति को हम सभी अच्छे से जाने, चाहे वो किसी भी धर्म से हो वह अपने धर्म को संस्कृति को जाने, उसे समझे। मेरे देश के सभी युवा, बच्चे, बड़े सभी अपने संस्कारों को जाने और उनका पालन करें। जो हिन्दू है वह गीता पढ़े, रामायण पढ़े, जो मुसलमान भाई है वह कुरआन पढ़े। जब ऐसा होगा तभी हमारा पूर्ण विकास होगा। आज अमेरिका, रूस, यूरोप के देश विकसित देश तो हैं लेकिन क्या वहां के सभी नागरिक भी विकसित है क्या? नहीं है। मेरा सभी से एक ही निवेदन है की देश की 70 साल की आजादी के उपलक्ष्य पर आप सभी ये संकल्प लें की अपने बच्चों को आप संस्कृत, संस्कृति और संस्कार अवश्य देंगे। आजकल के स्कूल में यह सब नहीं सिखाया जाता है। आप सभी को पता है की श्री कृष्ण भगवान् जेल में पैदा हुए थे। और उनके जन्म लेते ही उनके माता पिता की बेड़िया स्वयं खुल गई थी तो इस बार इस महोत्सव में हम यह संकल्प ले की विदेशी शिक्षा की बेड़ियों को हमने तोडना है, उनसे अपने बच्चों को बचाना है। जिस फल में तोते के चोंच लगी होती हैं वो फल मीठा होता हैं ..ये कथा तो स्वयं ही वेद रूपी वृक्ष के फल भगवान शुकदेव जी के मुँह से निकले हुए हैं तो सोचो ये फल कितना मीठा होगा।हर फल में कुछ न कुछ फेकने के लिए होता हैं लेकिन इस कथा रूपी फल में ऐसा कुछ नहीं है फेंकने लायक हो , ये वो फल हैं जो आपके साथ हमेशा रहेंगे।

10Aug 2017

"दुःख संसार देता है भगवान तो बस सुख देते हैं।"

जन्माष्टमी के पावन अवसर पर श्री कृष्ण की जन्मभूमि से परम पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने अपने मुखारविंद से द्वितीय दिवस की श्रीमद्भागवत कथा का रसपान भक्तों को कराया। कितना बड़ा संयोग है की हम जन्माष्टमी महा महोत्सव मना रहे हैं इस बार जन्माष्टमी 15 अगस्त को है। इतना ही नहीं देश को आजाद हुए भी 70 साल पुरे हो जाएंगे। तो यह मात्र जन्माष्टमी महोत्सव नहीं है बल्कि देश की आजादी का भी पर्व है। इस बार स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर श्री कृष्ण भगवान् हमे कोई न कोई तो सन्देश देना चाहते होंगे तभी तो स्वतंत्रता दिवस पर जन्माष्टमी का पर्व आया है। हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने स्वच्छ भारत अभियान चलाया है मेरा उन्हें इस अभियान के लिए साधुवाद है। मोदी जी ने टारगेट रखा है की 2019 तक भारत में हर घर में शौचालय बनाना है और देश को शौच मुक्त बनाना है। मेरा यहाँ पर एक सवाल यह भी है की बाहरी स्वछता का लक्ष्य तो हम २-३ साल में पूरा कर लेंगे। लेकिन क्या हम में से कोई आंतरिक स्वच्छता की कोई बात करेगा उसका कोई लक्ष्य निर्धारित करेगा। शायद कोई ऐसा नहीं करने वाला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2017 से 2022 तक संकल्प वर्ष मनाने का संकल्प लेने का आह्वान किया है। पीएम मोदी ने 2017 से 2022 तक देश को न्यू इंडिया बनाने का संकल्प लिया है। मेरा मोदी जी से एक निवेदन है और यहाँ बैठे सभी भक्तों से एक निवेदन है की 2022 में भारत को आजाद हुए 75 साल हो जाएंगे तब हम एक न्यू इंडिया बनाने का संकल्प ले लेकिन वो न्यू इंडिया क्या होगा? वह न्यू इंडिया होगा मेरे देश में संस्कृत भाषा बोली जाए - पढ़ी जाए। देश की संस्कृति को हम सभी अच्छे से जाने, चाहे वो किसी भी धर्म से हो वह अपने धर्म को संस्कृति को जाने, उसे समझे। मेरे देश के सभी युवा, बच्चे, बड़े सभी अपने संस्कारों को जाने और उनका पालन करें। जो हिन्दू है वह गीता पढ़े, रामायण पढ़े, जो मुसलमान भाई है वह कुरआन पढ़े। जब ऐसा होगा तभी हमारा पूर्ण विकास होगा। आज अमेरिका, रूस, यूरोप के देश विकसित देश तो हैं लेकिन क्या वहां के सभी नागरिक भी विकसित है क्या? नहीं है। मेरा सभी से एक ही निवेदन है की देश की 70 साल की आजादी के उपलक्ष्य पर आप सभी ये संकल्प लें की अपने बच्चों को आप संस्कृत, संस्कृति और संस्कार अवश्य देंगे। आजकल के स्कूल में यह सब नहीं सिखाया जाता है। आप सभी को पता है की श्री कृष्ण भगवान् जेल में पैदा हुए थे। और उनके जन्म लेते ही उनके माता पिता की बेड़िया स्वयं खुल गई थी तो इस बार इस महोत्सव में हम यह संकल्प ले की विदेशी शिक्षा की बेड़ियों को हमने तोडना है, उनसे अपने बच्चों को बचाना है। जिस फल में तोते के चोंच लगी होती हैं वो फल मीठा होता हैं ..ये कथा तो स्वयं ही वेद रूपी वृक्ष के फल भगवान शुकदेव जी के मुँह से निकले हुए हैं तो सोचो ये फल कितना मीठा होगा।हर फल में कुछ न कुछ फेकने के लिए होता हैं लेकिन इस कथा रूपी फल में ऐसा कुछ नहीं है फेंकने लायक हो , ये वो फल हैं जो आपके साथ हमेशा रहेंगे।

21Jul 2017

"धर्म आत्मा का श्रंगार होता है। हमें सदा ही सत्य और सच्चे धर्म का पालन करना चाहिए।"

परम श्रध्देय श्री देवकी नन्दन ठाकुर जी महाराज की जयपुर में आयोजित श्रीमद भागवत कथा में सभी भक्तों को सप्तम दिवस भागवत कथा में भगवान श्री कृष्ण के विवाह का सुन्दर वर्णन श्रोताओं के श्रवण कराया। महाराज श्री ने कहा कि अगर इंसान को किसी भी प्रकार का कष्ट होता है तो भगवान की भक्ति से सभी प्रकार के कष्टों को भक्त दूर कर सकता है। वह इस भक्ति से कठिन से कठिन विपदा को भी दूर कर लेता है। इसलिए हमें सदा ही भगवान की भक्ति सच्चे मन से करनी चाहिए। जिस व्यक्ति भगवान के प्रति सच्चे मन से होती है वह हर विपदा को पार कर लेता है। महाराज श्री ने बताया कि कैसे हम भगवान की भक्ति से अपने सभी कष्टों को दूर कर सकते है। यहाँ महाराज श्री ने भजन श्रवण कराया। इस भजन को सुन कर वहां पर मौजूद सभी भक्तगण झूम उठे। यह भजन था "मेरी बिगड़ी तू बना दे दुनिया बनाने वाले " महाराज श्री ने बताया कि हर भक्त के मन में सदा भगवान के सच्ची भावना होनी चाहिए। जिससे की उस भक्त का आने वाला जीवन सदा अच्छा रहे। यहाँ पर महाराज श्री ने अपने भक्तों को कल्चरल टेरेरिज्म के बारे में भी बताया। हमें सदा ही सच्ची और अच्छी शिक्षा लेनी चाहिए। हमें सदा ही अपने चरित्र को अच्छा बनाना चाहिए। अपने बच्चो को अच्छे स्कूलों में कॉलेजों में भेजना चाहिए। महाराज श्री ने कहा कि जन्माष्टमी पर होने वाले अवसर पर हम लोगों को भारत की सभ्यता से अवगत कराएँगे और लोगों को गुरुकुल में ही ज्यादा से ज्यादा शिक्षा लेनी चाहिए। क्योंकि गुरुकुल की शिक्षा आजकल के स्कूलों की शिक्षा से ज्यादा अच्छी होती है। यहाँ महाराज श्री ने GST के बारे में भी लोगों को बताया। उन्होंने हमें बताया की पूजा के सामान पर किसी भी तरह का टैक्स नहीं होना चाहिए। यहाँ पर देवी देवताओं की मूर्तियों पर किसी भी प्रकार का टैक्स नहीं होना चाहिए।

19Jul 2017

"भगवान प्रेम के बिना नहीं मिलते है। प्रेम से मनुष्य अपने भगवान के दर्शन आसानी से प्राप्त कर लेता है।"

परम श्रध्देय श्री देवकी नन्दन ठाकुर जी महाराज की जयपुर में आयोजित श्रीमद भागवत कथा में सभी भक्तों को पंचम दिवस भागवत कथा में भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुन्दर वर्णन श्रोताओं के श्रवण कराया। महाराज श्री ने कथा प्रारम्भ करते हुए कहा की मनुष्य को सदा ही सत्य का मार्ग अपनाना चाहिए। इस मार्ग पर चल कर ही हम सब अपना जीवन सदा के लिए सफल बना सकते हैं। सत्य पर चल कर हम अपने जीवन की सभी कठिनाइयों को दूर कर सकते है। सत्यवान पुरुष सदा ही अपने जीवन से सबका चहिता बन जाता है। सब उसको प्यार करने लगते है। महाराज श्री ने बताया कि हम कैसे भगवान की भक्ति करके अपने जीवन का उद्धार कर सकते है। हमें सदा ही भगवान की भक्ति में लीन रहना चाहिए। अपने इष्टदेव की सदा ही भक्ति करते रहना चाहिए। ताकि आगे आने वाले समय में हमें किसी भी तरह की समस्या न आये। उसके लिए हमें सदा तैयार रहना चाहिए। हमें अपने जीवन को गोविन्द के चरणों में समर्पित कर देना चाहिए। फिर तो हमारे जीवन के सभी कष्टों को हमारे इष्टदेव गोविन्द जी पल भर में ही दूर कर देंगे और हमें सदा ही अपने जीवन में सत्य और अच्छाई का रास्ता अपनाना चाहिए। ताकि आने वाले समय में हमें किसी भी तरह की कोई परेशानी न आये।

20Jul 2017

"सत्य क्या है? माया से दूर रहना, भगवान के चरणों की सेवा करना ही सत्य है।"

परम श्रध्देय श्री देवकी नन्दन ठाकुर जी महाराज की जयपुर में आयोजित श्रीमद भागवत कथा में सभी भक्तों को षष्टम दिवस भागवत कथा में भगवान श्री कृष्ण की गोपियों संग लीलाओं का सुन्दर वर्णन श्रोताओं के श्रवण कराया। आज महाराज श्री ने "हो मनरो लागे ना सखी, म्हारो घनश्याम के बिना" भजन से कथा प्रारम्भ की। इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने कहा की मोदी जी देश में जीएसटी ले आये हैं उन्हें एक और जीएसटी लाना चाहिए। "गौ सेवा तुरंत" शुरू की जाए। हमारे देश में जितने भी विधायक, सांसद, वकील, जज आदि सबको गाय घर में पालनी चाहिए। महाराज श्री ने कहा की यदि आप 7 दिन तक भागवत कथा मन से श्रवण करते हैं तो आपको माया से विरक्ति और कान्हा में आसक्ति हो जायेगी। कथा का काम है आपको भगवान के चरणों की सेवा में लगा दे ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सत्य का बोध हो जाता है। सत्य क्या है? सत्य है माया से दूर रहना, भगवान के चरणों की सेवा करना यही सत्य है। इस कलयुग में हम कभी भी माया से दूर नहीं जा सकते हैं लेकिन माया को प्रयोग तो करो लेकिन मन में माया ना रखो। गोविन्द को पाना है तो माया को छोड़ना पड़ेगा। इस आत्मा पर, मन पर माया को हावी मत होने दो। महाराज श्री ने कहा श्री कृष्ण ने ब्रजवासियों से कहा की इन्द्र देव की पूजा ना करें और गिरिराज पर्वत की पूजा करें। इस पर देवराज इंद्र क्रोधित हो गए और उन्होंने लगातार कई दिन तक ब्रज में वर्षा की जिससे ब्रज में बाढ़ आ गई। ब्रजवासियों को बचाने के लिए श्री कृष्ण भगवान ने अपनी कनिष्क ऊँगली पर गिरिराज पर्वत को उठा लिया जिसकी शरण में सभी ब्रजवासी आ गए। बहुत वर्षा करने के बाद भी ब्रजवासी सुरक्षित रहे क्योंकि वे सब भगवान श्री कृष्ण द्वारा उठाये गए पर्वत गिरिराज की शरण में थे।

18Jul 2017

कठिन से कठिन समय में मनुष्य को भगवान का श्रवण करते रहना चाहिए

परम श्रध्देय श्री देवकी नन्दन ठाकुर जी महाराज की जयपुर में आयोजित श्रीमद भागवत कथा में सभी भक्तों को चतुर्थ दिवस भागवत कथा में प्रहलाद जी, भगवान के वामन अवतार आदि की लीलाओं का सुन्दर वर्णन श्रोताओं के श्रवण कराया। "तेरी बिगड़ी बना देगा" इस सुन्दर भजन से महाराज श्री ने आज की कथा प्रारम्भ की महाराज श्री ने कहा की व्यक्ति भगवान की भक्ति करके अपने जीवन को सभी प्रकार से सम्पन्न कर सकता है। व्यक्ति को सदा ही सत्य और सच्चाई का मार्ग अपनाना चाहिए। मनुष्य को सदा ही भगवान की भक्ति में लगे रहना चाहिए तभी हमारा जीवन हर प्रकार से सुखी रह सकता है। हमें सदा ही परिश्रम का मार्ग अपनाना चाहिए। हमें कठिनाइयों से कभी भी घबराना नहीं चाहिए। हमें सदा ही भगवन की भक्ति में डूबे रहना चाहिए। हमें प्रह्लाद की तरह ही भगवान की भक्ति करनी चाहिए। कभी भी अपनी भक्ति से नहीं हटना चाहिए। सदा ही सत्य का मार्ग अपनाना चाहिए। भक्त प्रह्लाद की तरह ही कठिनाइयों को झेलते हुए अपनी भक्ति का रास्ता नहीं छोड़ा था और अंत में प्रह्लाद को अपने प्रभु के दर्शन हुए थे और उनका जीवन सफल हो गया था। जो माता गर्भवती होती है उसको कथा जरूर ही सुननी चाहिए। अभिमन्यु ने अपनी माता के गर्भ में ही चक्रव्यूह को तोड़ने का राज जान लिया था। महाराज श्री ने बताया की कैसे भक्त प्रह्लाद ने अनेक कठिनाइयों को झेलते हुए भी अपनी भक्ति नहीं छोड़ी थी उसी तरह ही हमें भी भगवान का अनुशरण करते ही रहना चाहिए। प्रह्लाद को पहाड़ से निचे गिराया गया था और आग में जलाया गया था फिर भी प्रह्लाद ने अपनी भक्ति को नहीं छोड़ा था। प्रह्लाद के विश्वास से ही भगवान ने खम्बे को फाड़ कर राक्षस का वध किया था और अपने भक्त को नरसिंह रूप में दर्शन दिए थे। भगवान ने समय-समय पर अनेक अवतार लेकर अपने भक्तों और इस पृथ्वी का उद्धार किया था। केवल भगवान का नाम रट लेने से ही सब कुछ ठीक नहीं हो जाता है हमें उनका अनुशरण भी करना चाहिए। कितना भी सूंदर मनुष्य हो या स्त्री हो बुढ़ापे में सब नष्ट हो जाता है लेकिन गोविन्द की सुंदरता तो सदा ही बढ़ती ही जाती है और उसकी सुंदरता बढ़ती ही जा रही है। जो व्यक्ति भजन नहीं करता है वो आंतरिक रूप से कमजोर होता है। और जो भजन करता है वो आंतरिक रूप से मजबूत होता है। भगवान की कथा में कभी भी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए और न ही कथा से खाली हाथ आना चाहिए। वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था जिसमे भगवान विष्णु ने एक बौने के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रस्सन करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।“ भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया। शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीति कार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई | देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे। महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।

16Jul 2017

इंसान को अच्छे गुणों को धारण करना चाहिए और बुरे गुणों से दूर रहना चाहिए

"इंसान को ऐसे गुणों को अपनाना चाहिए जिसे लोग पसंद करे, ना की नापसंद।" परम श्रध्देय श्री देवकी नन्दन ठाकुर जी महाराज की जयपुर में आयोजित श्रीमद भागवत कथा में सभी भक्तों को द्वितीय दिवस भागवत कथा में राधा-रानी, भगवान् शुकदेव आदि की लीलाओं का सुन्दर वर्णन श्रोताओं के श्रवण कराया। महाराज श्री ने इस मधुर भजन से कथा प्रारम्भ की "भगवान इतना कीजिये की मुझे अपनी ही भक्ति दीजिये... हे प्रभु आपको मैं न भूल पाऊँ.. माया के बांधों से मैं मुक्ति कैसे पाऊँ.." महाराज श्री ने कहा की श्रीमद भगवत कथा के पहले ही दिन जयपुर में वर्षा हो गयी और सबको राहत मिली। दिल ये जो मांगे वो मिलता हैं और मिलता उन्ही को, जो पाना चाहता हैं। सारे काम प्लानिंग से होते हैं... प्लानिंग ऑफ़ हाउ टू लिव लाइफ, ये सबसे बड़ी प्लानिंग होती है हाउ टू लिव लाइफ - "फ्रॉम बर्थ टू डेथ।" जिंदगी के रास्तो को समझने में समय लगता हैं और जब रास्ते समझ आते हैं तो समय ख़त्म हो जाता है। हमें कथाये अपने बच्चो के साथ सुननी चाहिए। अपने जीवन के महत्त्व को समझे। राजस्थान वीरों की भूमि के साथ-साथ भक्तों की भूमि है। यकीन है की जो औरतें पुराने वस्त्रों में आई हैं उनमें से कोई न कोई मीरा बाई है। जिस समय जीव का भागवत कथा सुनने का मन बनता है उसी समय भगवान उस जीव के कल्याण करने का मन बना लेता है और जिस समय जीव कथा सुनने के लिए पंडाल में आते हैं उसी समय भगवन उनके मन में समां जाता हैं। जिस फल में तोते के चोंच लगी होती हैं वो फल मीठा होता है। ये कथा तो स्वयं ही वेद रूपी वृक्ष के फल भगवान शुकदेव जी के मुँह से निकले हुए हैं तो सोचो ये फल कितना मीठा होगा। हर फल में कुछ न कुछ फेंकने के लिए होता हैं लेकिन इस कथा रूपी फल में ऐसा कुछ नहीं है जो फेंकने लायक हो। ये वो फल हैं जो आपके साथ हमेशा रहेंगे।

17Jul 2017

"ज्ञान कृपा से मिलता है चाहे गुरु कृपा हो या गोविन्द की कृपा हो।"

परम श्रध्देय श्री देवकी नन्दन ठाकुर जी महाराज की जयपुर में आयोजित श्रीमद भागवत कथा में सभी भक्तों को तृतीय दिवस भागवत कथा में कपिल देव जी महाराज की लीलाओं का सुन्दर वर्णन श्रोताओं के श्रवण कराया। महाराज श्री ने "तेरे चरणों की धुल मैं बन जाऊ, है आशा कहीं दुर न जाऊँ ऐसा भक्ति के रंग चढ़ा दे की तेरे बिन एक पल न रहूं। भजन से कथा प्रारम्भ की। पूज्य महाराज श्री ने कहा की कथा को हमें एकाग्रचित होकर सुनना चाहिए और जितने विश्वास के साथ हम भगवान की कथा सुनते हैं उतना ही फल हमें अधिक प्राप्त होता है और दुनिया में कोई भी ऐसा कार्य नहीं है जो भगवान की कथा से बड़ा है। जिसने हमें ये मानव जीवन दिया, जिसका दिया हुआ हम खाते हैं उसी की भक्ति के लिए हमारे पास समय नहीं है। पूज्य महाराज श्री ने परीक्षित जी महाराज के प्रसंग को प्रारम्भ करते हुए कहा की जब परीक्षित जी महाराज को पता चला कि सातवें दिन उनकी मृत्यु निश्चित है तो अपना सब कुछ त्याग दिया। राजा परीक्षित ने संतो से पूछा की जिसकी मृत्यु सातवे दिन हो तो उस क्या करना चाहिए? इस पर कोई कहता है भजन करो,कोई कहता है गंगा स्नान करे, किसी संत ने कहा मोन करो, स्मरण करो ध्यान करो, उपासना करो। अनेको संत से उन्हें अनेकों विचार प्राप्त हुए। उसी समय भगवान नारद के आदेश पर भगवान शुकदेव जी वहाँ पर पधारें। उनके मुख पर बहुत तेज था सभी संतो ने उनको प्रणाम किया। मेरा सभी बच्चों से निवेदन है की जब भी आपके घर में आये उनका खड़े होकर प्रणाम कर सम्मान करना चाहिए। भारत की संस्कृति है "अतिथि देवो भवः" अतिथि भगवान के समान है। मेरा सभी माताओं और बहनों से निवेदन है की आपके घर में जब भी कोई अतिथि आये तो उनका सम्मान करें पता नहीं भगवान कब मेहमान बन आपके घर आ जाए। यह सब तभी संभव है जब आप अपने बच्चों को संस्कार दोगे। शुकदेव जी महाराज जब आये तब राजा परीक्षित ने उन्हें साष्टांग दंडवत प्रणाम किया। और शुकदेव जी से पूछा जिसकी मृत्यु निश्चित हो उसे क्या करना चाहिए और मृत्यु हमारे जीवन का कटु सत्य है। हम इस संसार में खाली हाथ आए थे और खाली हाथ ही जायंगे। यह पता होने के बावजूद भी हम अपना सारा जीवन सांसारिक भोगविलास में गुजार देते हैं और प्रभु ने हमें जिस कार्य के लिए मानव जीवन दिया है उससे हम भटक जाते हैं। शुकदेव जी ने परीक्षित जी महाराज से कहा हे राजन जिस की मृत्यु निश्चित हो उसे भागवत कथा श्रवण करनी चाहिए। उसी प्रकार हमें भी सच्चे मन से भागवत कथा श्रवण करनी चाहिए और भगवान की भक्ति करनी चाहिए।

15Jul 2017

"भगवान का भजन सबसे बड़ा धर्म है"

परम श्रध्देय श्री देवकी नन्दन ठाकुर जी महाराज की जयपुर में आयोजित श्रीमद भागवत कथा में सभी भक्तों को प्रथम दिवस भागवत कथा में करमेती बाई, मीरा बाई, आत्मदेव आदि की लीलाओं का सुन्दर वर्णन श्रोताओं के श्रवण कराया। अमरनाथ यात्रा के दौरान आतंकवादी हमला कर 7 श्रद्धालुओं की जान ले ली गई। तीन अलग अलग जगहों पर आतंकियों ने अमरनाथ यात्रियों के जत्थे पर सबसे कायराना और क्रूर हमला किया। निहत्थे श्रद्धालु जिनकी जुबान पर भोले का भजन और हाथों में पूजा-आरती का समान था उन पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसा दी गईं। उनका कसूर सिर्फ इतना था कि वो कभी जन्नत रही घाटी के रास्तों से अपने भोलेनाथ के दर्शन करने बिना खौफ जा रहे थे क्योंक वो भक्ति में डूबे थे और आस्था में लीन थे। अमरनाथ यात्रियों से भरी बस पर आतंकियों ने फायरिंग की। दहशतगर्दों का न कोई मुल्क है और न मज़हब. लेकिन कम से कम ये आतंकी इतना तो जान लेते कि जिस अमरनाथ गुफा में महादेव के दर्शन के लिये यात्री रवाना हुए हैं उस मंदिर को ढूंढने वाला कोई काफिर नहीं बल्कि एक गडरिया मुसलमान ही था। अमरनाथ गुफा को करीब 500 साल पहले खोजा गया था और इसे खोजने का श्रेय एक मुस्लिम, बूटा मलिक को दिया जाता है। बूटा मलिक एक गड़रिए थे। पहाड़ पर ही भेड़-बकरियां वगैरह चराते थे। वहां उनकी मुलाकात एक साधु से हुई और दोनों की दोस्ती हो गई। एक बार उन्हें सर्दी लगी तो वो उस गुफा में चले गए। गुफा में ठंड लगी तो साधु ने उन्हें एक कांगड़ी दिया जो सुबह में सोने की कांगड़ी में तब्दील हो गया।

12Jul 2017

गुरु पूर्णिमा महोत्सव "युवा शांति सन्देश"

गुरु पूर्णिमा की संध्या को युवा शांति संदेश में पूज्य महाराज श्री ने युवा पीढ़ी को धर्म के प्रति जवाबदेह बताते हुये कहा कि हमारे युवा सनातन धर्म और देश का भविष्य हैं। आधुनिकता का ताना देकर इन्हें दोषी मानकर छोड़ा नहीं जा सकता। युवा शक्ति केवल तब तक ही अदृश्य रहती है जब तक कि उन्हें जीवन के असली अर्थ से परिचित ना कराया जाये। यह जिम्मेदारी गुरू के साथ-साथ माता-पिता की भी बनती है। जिसने भागवत न सुनी हो, जिसने रामायण का सार न समझा हों उसे आध्यात्म का मर्म कैसे पता चलेगा। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

12Jul 2017

गुरु पूर्णिमा महोत्सव (प्रथम दिवस)

ठा. प्रियाकांत जू मंदिर, शांति सेवा धाम, वृन्दावन में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में "गुरु पूर्णिमा महोत्सव" में गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर महाराज श्री से दीक्षा लेने के लिए 2-3 दिन पहले से हजारों भक्त आश्रम में आ गए थे।

12Jul 2017

गुरूपूर्णिमा महोत्सव (प्रथम दिवस) - गुरूकृपा के लिये शिष्य में श्रद्धाभाव जरूरी

ठा. प्रियाकान्तजू मंदिर पर दो दिवसीय गुरू पूर्णिमा महोत्सव का प्रारम्भ हुआ। श्रोताओं को सम्बोधित करते हुये पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने गुरू और शिष्य का सम्बन्ध बताया। उन्होने कहा मनुष्य जीवन का एक मात्र लक्ष्य परमात्मा से मिलन कर मोक्ष की प्राप्ति है और इस आत्मा को परमात्मा से मिलाने का माध्यम गुरू है। परमात्मा की ओर ले जाने वाले सद्मार्ग से भटके हुये लोगों को राह दिखाने का कार्य गुरू करता है। उन्होने कहा कि जन्म-जन्म के बंधन से मुक्त होने के लिये ही यह मानव जीवन मिला है। गुरू द्वारा दिया गया मंत्र ही जीव को कठिनाईयों से मुक्त करता है। अगर गुरूमंत्र में श्रद्धा ना हो तो उसे ग्रहण नहीं करें अन्यथा प्राणी पाप का भागी होता है। गुरू निस्वार्थ होना चाहिये तो शिष्य के लिये श्रद्धा का भाव जरूरी है। जो निस्वार्थ है, परमार्थ है वही गुरू है। इससे पूर्व प्रातः देश-विदेश से आये श्रद्धालुओं ने ठा. प्रियाकान्तजू भगवान के दर्शन कर गुरू पूजन किया। श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने उन्हें कंठी धारण कराकर गुरूदीक्षा प्रदान की। शांति सेवा सभागृह में आर्शीवचन में भक्तों ने अच्छाई के मार्ग पर चलने की सीख ग्रहण की। ठा. प्रियाकान्तजू मंदिर कल पुर्णिमा की रात्रि 8 बजे से प्रातः मंगला आरती तक महासंकीर्तन आयोजित होगा। श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के साथ प्रसिद्ध भजन गायिका अलका गोयल, राजकुमार लक्खा, पूरन पागल आदि विभिन्न भजन गायक अपनी मधुर वाणी से भगवान के प्रति भक्तों की मूक वन्दना को भावों के स्वर प्रदान करेगें। इस अवसर पर एचपी अग्रवाल, रामधन वशिष्ठ, महेश कुमावत, अनिल त्यागी, प्रवीन कुमार, बनवारी, श्यामसुन्दर शर्मा, अजय, मुरारी, रवि रावत आदि उपस्थित रहे ।

12Jul 2017

हजारों भक्तों ने पूरी रात अपने प्रिय ठा. प्रियाकांत जू के सानिध्य में किया महासंकीर्तन

ठा. प्रियाकान्तजू मंदिर पुर्णिमा की रात्रि 8 बजे से प्रातः मंगला आरती तक महासंकीर्तन आयोजित किया गया। श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के साथ प्रसिद्ध भजन गायिका श्रीमती अलका गोयल जी, श्री राजकुमार लक्खा जी, श्री पूरन पागल जी, श्री गोपाल जिंदल जी, श्रीमती मीनू शर्मा जी, श्री तिलक वर्मा जी, सुश्री संध्या तोमर जी आदि विभिन्न भजन गायक अपनी मधुर वाणी से भगवान के प्रति भक्तों की मूक वन्दना को भावों के स्वर प्रदान किये। जिसे सुन कर भक्त मंत्रमुग्ध हो गये। इस अवसर पर महाराज श्री ने कहा की जो कोई भक्त 11 पूर्णिमा लगातार ठा. प्रियाकांत जू मंदिर में अपनी हाजिरी लगाता है उसकी हर इच्छा पूर्ण होती है। भक्तों ने कई बार बताया है की उन्हें तो मात्रा 1-2 या 3 पूर्णिमा की हाजिरी में ही इच्छा पूर्ण हो गई। इस अवसर पर संस्था के सचिव श्री विजय शर्मा जी, श्री एचपी अग्रवाल जी, श्री धमेन्द्र कुमार जी, श्री धन्नू भईया जी, श्री प्रवीन कुमार जी, श्री जगदीश वर्मा जी , श्री रवि रावत जी, श्री विष्णु शर्मा जी, श्री शंकर लाल एम कुमावत जी, श्री कीर्ती सिंघल जी, श्री गजेंद्र चौहान जी आदि उपस्थित रहे।

8Mar 2017

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के तहत 125 गरीब कन्याओं को दी गई राशि

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर पूज्य महाराज श्री ने 125 गरीब कन्याओं को शिक्षा हेतु प्रति कन्या 5100 रूपए की सहयोग सेवा राशि ट्रस्ट के द्वारा प्रदान की। गत वर्ष 8 फरवरी 2016 को भी श्री प्रियाकान्त जू मन्दिर के उदघाटन के अवसर पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह जी के हाथों से विश्व शान्ति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के द्वारा 125 गरीब कन्याओं को प्रति कन्या साईकिल एवं शिक्षा हेतु 5100 रूपए की सहयोग सेवा राशि ट्रस्ट के द्वारा प्रदान की गई थी।

2Feb 2017

श्री श्याम शरण देव जी महाराज बने निम्बार्क पीठ के 49वें जगद्गुरु

परम पूज्य निम्बार्कपीठ जगद्गुरु श्री श्यामशरणदेव जी महाराज का जगद्गुरु पदाभिषेक बसंत पंचमी के पावन अवसर पर प्रातः 11.30 बजे किया गया। इसी के साथ वे निम्बार्क पीठ के 49वें जगद्गुरु बन गए है। आज उन्हें श्री "श्रीजी महाराज" की उपाधि भी दी गई। सांय के समय में श्री "श्रीजी महाराज" के पदाभिषेक के अवसर पर बाबा श्री रामदेव जी, परम् पूज्य श्री देवकी नंदन ठाकुर जी महाराज जी, राजस्थान की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे सिंधिया जी आदि पहुंचे। इसी के साथ सांय में भोजन-प्रसाद के कार्यक्रम साथ यह तीन दिवसीय पूण्य समारोह सम्पन्न हुआ।

25Jan 2017

प्रथम पाटोत्सव पर संत सम्मलेन

श्री प्रियकांत जू भगवान के प्रथम पाटोत्सव पर आशीर्वाद देने पहुचे बृजभूमि के दिव्य संत 5 घंटे से ज्यादा मंच पर मौजूद रहे। उन्होंने श्रद्धालुओं को अपने प्रवचनों से मंत्र मुग्ध करने के साथ-साथ पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज को ढेरों बधाईयाँ और अपना आशीर्वाद भी देते रहे। पाटोत्सव की कुछ यादगार झलकियां अगले कुछ दिनों तक हम आपके साथ साझा करते रहेंगे।

26Jan 2017

पूज्य महाराज श्री ने स्कूल के बच्चों के साथ मनाया गणतंत्र दिवस

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महारज ने आज गणतंत्र दिवस के अवसर पर श्री जी बाबा सरस्वती विद्या मंदिर स्कूल, मथुरा में ध्वजारोहण किया। महाराज श्री ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम की शुरुवात की। पूज्य महाराज श्री ने कहा की प्यारे-प्यारे बच्चों को, देश के होनहारों को, देश के इन छोटे-छोटे गणों को, मासूम से मनो को गणतंत्र दिवस की बहुत-बहुत बधाई। आओ मेरे साथ तीन बार बोलो जय हिन्द.....जय हिन्द........जय हिन्द। आप देश का भविष्य हो, मेरे सामने जितने भी नन्हे-नन्हे हाथ हैं। मैं महसूस कर रहा हूँ कि ये देश का भविष्य बनाने के काम आएंगे, आपकी मासूम आँखों में मैं भारत की सुनहरी तस्वीर देख पा रहा हूँ। हे नन्हे वीरों आने वाले दिनों में आपके कन्धों पर यह ज़िम्मेदारी है की आप देश की प्रगति करें, अपनी संस्कृति को पूरे विश्व में फैलाएं व धर्म की रक्षा करें क्योंकि आपका जन्म ब्रज भूमि पर हुआ है तो आपकी ज़िम्मेदारी और बढ़ जाती है क्योंकि पूरा विश्व ब्रज भूमि से प्रेरणा लेने के लिए आता है। मेरा आपको शुभ आशीर्वाद और एक बार फिर से गणतंत्र दिवस की बहुत-बहुत बधाई।

27Jan 2017

महाराज श्री ने श्री प्रियाकांत जू भगवान के भक्तों को दिया उपहार

प्रथम पाटोत्सव के पावन अवसर पर पूज्य महाराज श्री ने अपने भक्तों के लिए मासिक पत्रिका का विमोचन देश की दिव्य आत्माओं, दिव्य संतों के साथ किया। अब सभी भक्त श्री प्रियाकांत मंदिर, पूज्य महाराज श्री एवं विश्व शान्ति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट की सभी जानकारी इस पत्रिका के द्वारा जान पाएंगे। इस पत्रिका में भारतवर्ष की संस्कृति, संस्कार, संतानत धर्म के गूढ़ बातें और महाराज श्री के सन्देश भी पढ़ पाएंगे। यदि आप भी इस पत्रिका के पाठक बनना चाहते है और अपने घर बैठे मंगवाना चाहते हैं तो आप ऑनलाइन भी बुक कर सकते हैं। नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें और पत्रिका को अभी बुक करें। आइये इस पत्रिका से जाने अपनी संस्कृति और संस्कार के बारे में।

17Jan 2017

Facebook LIVE Question Answer

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11Jan 2017

Media

मीरापुर मैं श्रीमद्भागवत कथा के दौरान बोले कथावयास देवकी नंदन ठाकुर जी

11Jul 2017

अब आपको रोज नित्य सुबह प्रियकांत जू भगवान का संदेश मिलेगा आपके फोन पर।

आपकी हर सुबह सूहानी हो। आपका हर दिन शुभ हो।। अब आपको रोज नित्य सुबह प्रियकांत जू भगवान का संदेश मिलेगा आपके फोन पर। जिसे स्वयं पूज्य महाराज श्री भेजेंगे आपको पूज्य श्री महाराज का सन्देश प्राप्त करने के लिए आप ये नंबर सेव कर लिजिए और आपको सन्देश प्राप्त हो उसके लिए आप अपना नंबर, नाम, शहर का पता, ईमेल आईडी सहित भेज दीजिये।

11Jul 2017

श्री प्रियाकांतजू भगवान जी की संध्या आरती के लाइव दर्शन करें

जिनके दर्शन मात्र से हो जाता है सभी दुखों का नाश, मिट जाते है सभी कष्ट, ऐसे हैं भगवान श्री प्रियाकांतजू। अपने नेत्रों से हृदय में उतारें कष्ट हरने वाले श्री प्रियाकांतजू भगवान जी की संध्या आरती के लाइव दर्शन करें, आप सभी भक्त प्रियाकांतजू भगवान के दर्शन फेसबुक के पेज पर देख सकते है। यह आप आज से यानि 9.4.2016 से शाम को 7:30 बजे देख सकते है।