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PURNIMA MAHOTSAV - 28 JUNE 2018 - VRINDAVAN

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21Jun 2018

अंबुबाची महोत्सव धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 21 जून से 27 जून 2018 तक स्थान – सोनाराम प्लेग्राउण्ड, ए.टी.रोड, भरलुमुख, गुवाहाटी ,असम में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भक्ति में धैर्य की आवश्यकता होती। कि इतने लोगों को आपने सुना जिनको सुनने आप नहीं आये, 
और इंतजार करते रहे उसका जिसको आप सुनने के लिए आये है श्रीमद भगवत कथा। सर्वप्रथम महाराज श्री ने विश्व शांति के लिए ठाकुर जी से प्रार्थना की और उसके बाद भागवत कथा में प्रवेश किया। महाराज जी ने भागवत के प्रथम श्लोक का पाठ किया।

" सच्चिदानन्दरूपाय विश्वोत्पत्त्यादिहेतवे। तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुम:।। "

उन भगवान को प्रणाम है जो सृष्टि के रचयिता है, जो सृष्टि के पालनहार है, ऐसे सच्चिानन्द को कोटि - कोटि नमन है। महाराज श्री ने सच्चिानन्द भगवान को प्रणाम कर प्रथम दिवस की कथा प्रारंभ किया। बहुत से लोगो के मन में विशेष तौर पर आज कल की युवा पीढ़ी के मन है एक बात आती है की कथा सुनना क्यों आवश्यक है। वेद पुराण श्रावण करना हमारे लिए क्यों जरुरी है।

धर्म को जानने के लिए हम शास्त्रों की शरण में जाते है। धर्म किसे कहते है ? ये समझने के लिए धर्म क्या करता है ? धर्म ही जो हमें जीना सिखाता है क्या करे क्या ना करे ये समझाने का जो माध्यम है। 
वो संत गुरुवाणी वेद पुराण रामायण संतो के मुख से निकला हुआ वाक्य है। यही हमें समझाता है की क्या करने योग्य है क्या करने योग्य नहीं है। धर्म क्या है ? जो वेद विदित है जो वेद में कहा गया पुराणों में कहा गया शास्त्रों में कहा गया उसके अनुसार अगर हम काम करे तो वह धर्म है और उसके विपरीत अगर हम काम करे तो वह अधर्म है। और महाराज जी कहा की वेद क्या है। वेद संविधान है सृष्टि को चलाने के लिए। और कहा की पूरे विश्व का चलाने के लिए ही वेद सविधान लागु किया गया।

20Jun 2018

आज पूज्य महाराज श्री गुवाहाटी,असम एयरपोर्ट पहुँचे तो भारी संख्या में भक्तों ने महाराज श्री का स्वागत किया।

आज पूज्य महाराज श्री गुवाहाटी,असम एयरपोर्ट पहुँचे तो भारी संख्या में भक्तों ने महाराज श्री का स्वागत किया। भक्तों ने महाराज श्री को फूल माला, पुष्प गुच्छ आदि अर्पित किए। पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 21-27 जून 2018 तक गुवाहाटी, असम में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

18Jun 2018

"सांस्कृतिक महोत्सव 2018" का आयोजन पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में तालकटोरा स्टेडियम, दिल्ली में आयोजित किया जा रहा है।

आज विश्व शान्ति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विश्व शान्ति सेवा समिति दिल्ली के तत्वावधान में 28-30 जुलाई 2018 को होने वाला विशाल "सांस्कृतिक महोत्सव" 28 के संदर्भ में श्री विजय शर्मा जी की अध्यक्षता में बैठक की गई। श्री शर्मा जी ने कहा कि यह महोत्सव ऐतिहासिक महोत्सव होगा जिसके लिए सभी सदस्यों और कार्यकर्ताओं को अपना सहयोग देना है।

"सांस्कृतिक महोत्सव 2018" का आयोजन पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में तालकटोरा स्टेडियम, दिल्ली में आयोजित किया जा रहा है। जिसमे देश-विदेश की जानी-मानी हस्तियां भी आएंगी।

14Jun 2018

कल विश्व शांति सेवा चैरीटेबल ट्रस्ट के द्वारा वृंदावन नगर में विभिन्न स्थानों पर बुजुर्ग महिलाओं एवं निर्धन महिलाओं को वस्त्र वितरण किये गये।

कल विश्व शांति सेवा चैरीटेबल ट्रस्ट के द्वारा वृंदावन नगर में विभिन्न स्थानों पर बुजुर्ग महिलाओं एवं निर्धन महिलाओं को वस्त्र वितरण किये गये । राधे राधे।।

10Jun 2018

पूज्य महाराज श्री ने खाटूश्याम से निकलकर जयपुर में भगवान गोविंद देव जी के दर्शन किए।

पूज्य महाराज श्री ने खाटूश्याम से निकलकर जयपुर में भगवान गोविंद देव जी के दर्शन किए।

 

10Jun 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 03 जून से 10 जून तक राजकीय आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय का खेल मैदान, खाटूश्याम जी में 108 श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया गया। अष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई।

भागवत कथा के अष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत में सर्वप्रथम सांस्कृतिक आतंकवाद पर बात करते हुए कहा कि ये पाश्चात्य कल्चर का ही असह है की आज हमारे माथे पर तिलक नहीं है। पाश्चात्य पढ़ाई का ही असर है की हमारे हाथ में कलावा, सर पर चोटी और गले में तुलसी नहीं है। हमे लगता है कि यह पुरानी बात है, यह पुराना कल्चर है, यह आधुनिक युग में ठीक नही है, लेकिन यह सब मिथ्या है। क्योंकि जीन लोगों को हमारा धर्म समझ में आ रहा है, जिन्होंने वेद पढ़े है, शास्त्र पढ़ा है और जिनको थोड़ा बहुत समझ में आ गया आप यकीन नहीं करेंगे की पाश्चात्य समाज के लोग भी माथे पर तिलक लगाने लगे हैं। दुर्भाग्य हमारा है की हम अपने सभ्य संस्कारों को भूलते जा रहे हैं जिससे मानव बनता है। आज आप स्वत: ही देखिए हमारे मन में अपने लिए जितनी चिंता रहती है दूसरों के लिए उतनी नहीं रहती। वेद, पुराण, रामायण, गीता की ये जो पढ़ाई है ये सही मायने में मानव का निर्माण करती है।

महाराज श्री ने कहा कि संसार एक नदिया है, जीव एक पथिक है और माया और ईश्वर दो किनारे हैं, सिर्फ भगवान ही इसे पार कर सकता है ओर कोई नहीं। जो माया का किनारा छोड़कर ईश्वर के किनारे हो जाता है गोविंद उसे पार लगा देते हैं।
महाराज श्री ने कथा के कल के क्रम को आगे बढाते हुए कहा कि भगवान ब्रज से मथुरा गए, साढे ग्यारह वर्ष ब्रज में रहे और साढ़े 12वर्ष मथुरा में रहे। कंस इत्यादि का वध किया । कंस की दो पत्निया थी अस्ति और प्राप्ति ये दोनों जरासंध की पुत्रियां थी। जब यह दोनों अपने पिता की पास जाकर रोने लगी तो जरासंध ने 17 वां मथुरा पर चढाई करी और हर बार कन्हैया ने उन्हे प्राप्त किया और 18वीं बार जरासंध ने ब्राह्मणों को बंदी बनाया और कहा कि तुम मेरी विजय के लिए यज्ञ करो और मेरी विजय नहीं हुई तो तुम सब को मृत्यु दंड मिलेगा। बेचारे ब्राह्मण मृत्यु के डर से यज्ञ करने लगे। यज्ञ का उद्देश्य है कृष्ण की पराजय और जरासंध की विजय। सोचने वाली बात यह है की संसार में कोई है जो कृष्ण को परास्त करे फिर भी कृष्ण ने अपनी हार स्वीकार की, रण छोड़कर भाग गए। वो इसलिए नहीं भागे की हरा नहीं सकते थे बल्कि वो इसलिए भागे क्योंकि वो चाहते हैं धर्म की रक्षा करना चाहते हैं, जरासंध ने ब्राह्मणों को बंद बना रखा है अगर उनहे कुछ हुआ तो धर्म का नुकसान होगा।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि रुकमणी जी ने श्रीकृष्ण से प्रेम विवाह किया। भगवान ने 16 हजार 100 विवाह किए हैं लेकिन 8 विवाह अलग अलग हुए। ये 8 पटरानियां साधारण नहीं हैं लक्ष्मी जी बनी हैं रूकमणी, पार्वती जी आधे अंश से बनी हैं जामवंती और बाके आधे अंश से बनी हैं महामाया, तुलसी बनी हैं लक्ष्मणा, यमुना बनी हैं सूर्य की पूत्री कालिंदी, लज्जा बनी हैं भद्रा, गंगा बनी हैं मित्रव्रिंदा, सावित्री जी बनी हैं सत्या और पृथ्वी बनी हैं सत्यभामा। ये सांसारिक विवाह नहीं है ये पूरी प्रकृति के साथ ठाकुर जी ने विवाह किया है।
महाराज श्री ने आगे क
हा कि भगवान ने 16100 विवाह इसलिए नहीं किए की उन्हे बहुत सारी पत्नियां चाहिए थी। उन्होंने इतने विवाह इसलिए किए क्योंकि उन स्त्रियों को जरूरत थी। भौमासुर नामक राक्षस ने 16 हज़ार 100 कन्याओं को बंदी बना रखा था। नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा की समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। इस कारण भगवान ने १६१०० रूप बनाकर सबके साथ एक मुहूर्त में एक साथ विवाह किया था। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने इतने विवाह किये। भगवान ने कामनावश विवाह नहीं किया था, करुणावश किया था। भगवान कहते हैं जिसको कोई नहीं अपनाता अगर वो मेरी शरण में आये तो मैं उसे अपना लेता हूँ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंततः सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

।। राधे-राधे कहना पड़ेगा ।।

9Jun 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 03 जून से 10 जून तक प्रतिदिन राजकीय आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय का खेल मैदान, खाटूश्याम जी में 108 श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्री कृष्ण- रूक्मिणी विवाह का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।


आज पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर से राजकीय आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय के स्कूल बच्चों की पढ़ाई में आ रही रूकावट को दूर करने के लिए 1,21,000 रूपए की राशि का चेक भेंट किया गया ताकि बच्चों के उज्जवल भविष्य की राह में आ रही रूकावट को दूर किया जा सके।
कथा के मध्य में नवीन दशहरा समिति खाटू श्याम जी द्वारा पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज को भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए किए जा रहे प्रयासो को देखते हुए “भारतीय संस्कृति गौरव सम्मान की उपाधी से अलंकृत किया गया। यह सम्मान समिति के अध्यक्ष पप्पू शर्मा खाटू वाले के द्वारा दिया गया। इस मौके पर संरक्षक सुरेश तिवाड़ी, प्रताप सिंह चौहान, लक्ष्मीनारायण सैन, समिति मंत्री गोवर्धन सैन, कोषाध्यक्ष दीनदयाल शर्मा उपस्थित रहे। 


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि मॉर्डन एज्यूकेशन जो आजकल हमारे बच्चे स्कूलों में पढ़ाई जा रही है, ध्यान दें की वहां से बच्चे सीख कर क्या आ रहे हैं ? पहले यह बात प्रच्चलित थी की तुम्हारी कलम में वो ताकत है कि बड़े से बड़े विवाद को, आतंकवाद को समाप्त कर सकती है। पहले व्यक्ति शस्त्र नहीं, शास्त्र उठाते थे। कलम से बिना गोली चलाए समाज का कितना बडा कल्याण कर सकते हैं। पहले हमारे गुरूजन पैसा कमाने वाला इंसान नहीं बनाते थे, वो एक सच्चा मानव बनाते थे और वो मानव ऐसा होता ना सिर्फ घर का पालन करता था, ना सिर्फ अपने समाज की देखभाल करता था बल्कि देश और धर्म पर कुर्बान होने के लिए एक समय भी सोचता नहीं था। लेकिन आज आतंकवाद को समाप्त करने में नहीं आतंकवाद को बढ़ाने में शिक्षा काम कर रही है। आजकल होने वाली ज्यादातर आतंकी घटनाओं में पढ़े लिखे लोग ही शामिल है। हम बड़े बड़े स्कूल कॉलेजों में अपने बच्चों को इंसान बनने के लिए भेजते हैं और वही उच्च शिक्षा हमारे बच्चों को आतंकवादी बना कर लौटाती है। दूसरे धर्म के गुरू शिक्षा देते है की जेहादी बनो क्या ये शिक्षा है ? बड़े बड़े डॉक्टर, इंजिनियर, पढ़े लिखे बच्चे आतंकवादी बन रहे हैं। गलती वहां नहीं है, दरअसल शिक्षा इसका मूल आधार है। मूल आधार ऐसे है कि बच्चा मन लगा कर नहीं पढ़ता है मां बाप कहते हैं कि पढ़ोगे नहीं तो नौकरी नहीं मिलेगी, नौकरी नहीं मिलेगी तो पैसा नहीं मिलेगा और पैसा नहीं तो कौन पूछेगा। बचपन से ही हमारे बच्चों के दिमाग में पैसा बूरी तक डाल दिया जाता है। इंटरनेट की माध्यम से बडे बड़े ऑफर दिए जाते हैं, तुम यह काम कर दो तुमहे भरपूर पैसा मिलेगा, तुम मर भी गए तो तुम्हारे घर वाले चैन से आनंद लेंगे। इस आतंकवाद को रोका जा सकता है, युवाओं को उचित संस्कार देकर, अगर संस्कार होंगे तो व्यक्ति को सही गलत का बोध होगा। अपने बच्चो को संस्कार दिजिए, उन्हे सही गलत का ज्ञान दिजिए उनसे सिर्फ पैसा बनाने की मशीन मत बनाइए वरना हाथ मलते रह जाओगे।


महाराज श्री ने कहा कि अपने मन में गुरू और गोविंद के लिए कभी गांठ मत रखना। गुरू और गोविंद में कोई अंतर नहीं है। गुरू गोविंद के प्रति जब आपकी गांठ नहीं होगी तो गोविंद से मिलने के लिए आप तैयार हो जाओगे। उन्होंने कहा कि मौन भी एक साधना है इसलिए बिना वजह कभी बोलना नहीं चाहिए, जहां जरूरत हो वही बोलो।
महाराज श्री ने कहा कि महंगे कपड़े पहनने से कोई बड़ा नहीं होता जिसके विचार महान होते हैं वही बड़ा होता है। 


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

8Jun 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिधय में 03 जून से 10 जून तक प्रतिदिन राजकीय आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय का खेल मैदान, खाटूश्याम जी में श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि जीवन का एक मात्र उद्देश्य होना चाहिए अपने जीवन में रहते हुए भगवान को मना लेना। हमारे दुख का एक कारण यह भी है कि हम अपना पूरा जीवन दुनिया का मनाने में निकाल देते हैं। लेकन संसार कभी माना नहीं है किसी से, कितनी भी आप कोशिश कर लो, 99 बात आप मानो लेकिन 1 बात नहीं मानोगे तो कह देंगे तुझसे बुरा इंसान कोई नहीं है दुनिया में। ये संसार का स्वभाव है कि इनकी हर इच्छा को पूरी करती रहो तो आप इनके अपने हो और जिस दिन आप इनकी बात पूरी ना करो उस दिन वो आपकी हर अच्छाई भूल जाते हैं और सिर्फ बुराई याद रखते हैं। लेकिन हमारे प्रभु का स्वभाव अलग है, हम जन्मों से उन्हें भूल बैठे हैं अपने बल के, जीवन के, धन के, रूप के अभिमान पर। ना जाने कितने अभिमानों के कारण हम उन्हे भूले बैठे हैं लेकिन फिर भी हमारे मरने तक इंतजार करते हैं कि ये मरेगा मुझे याद करेगा। ईश्वर को मनाना बहुत आसान है और जीव को मनाना बहुत मुश्किल है इसलिए आओ आज अपने जीवन में से कुछ समय निकालें भगवान को मनाने के लिए। 


महाराज श्री ने सांस्कृतिक आतंकवाद पर भी अपनी बात रखी, उन्होंने कहा कि यहां पर जिनते भी बुजुर्ग बैठे हैं उन्होंने अपने समय में संगीत के माध्यम से भी नृत्य के माध्यम से भी अपनी कल्चर को देखा होगा। यूपी मे चले जाओ, राजस्थान में चले जाओ, मध्य प्रदेश में चले जाओ, झारखंड में चले जाओ, झारखंड में चले जाओ हर प्रदेश की भाषा अलग, नृत्य अलग, गायन अलग, अनेकता में एकता की पहचान है हमारा भारत। जहां पर हमारे भारत में भरत नाट्यम जैसे नृत्य है, ऐसे ऐसे नृत्य हैं जिसमें बिना कुछ कहे राम कथा और पूरा महाभारत वो नृत्य के माध्यम से हम सब को प्रस्तुत कर देते हैं, इतनी सुंदर हमारी संस्कृति है, संस्कार हैं, कल्चर है। लेकिन आप देख रहे होंगे आजकल पाश्चात्य संगीत और फिल्मी धूनों ने हमारे संगीत और नृत्य के कल्चर पर जो आघात किया है, अब धीरे धीरे वो हमारे प्रदेशों से गायब होता जा रहा है। हमारे वहां ऐसी कलाएं हैं जिसने पूरे विश्व का ध्यान हमारी और आकृषित किया है। कई कलाओं ने तो विदेश में जाकर झंडे गाडे हैं, अवॉर्ड जीते हैं लेकिन आज अपने ही देश में वो उपेक्षित हैं। आज हर जगह रिमिक्स छाया है, पहले फिल्मी गाने भी पूरे राग में हुआ करते थे। वो करण प्रिय संगीत आज करण को दुख देने वाला संगीत होता जा रहा है। आज कल के फिल्मों के डांस देखो आप वो डांस नही रहे उन्हे देख कर जैसे हमारे बच्चे बन रहे हैं इसके बारे में भी आप सोचिए। आज हमारे देश की नृत्य कला, गायन संस्कृति खत्म होती चली जा रही है, मृत्यु की कगार पर खड़ी है। विदेशों से कई लोग आते हैं इन कलाओं को सीखने के लिए लेकिन अपने ही देश में अपनी भाषा, अपना नृत्य उपेक्षित है। मैं यह नहीं कर रहा हूं की हम महान बन जाएं पर इतना जरूर कह रहा हूं की क्या हमारे बच्चे वो पुरातन नृत्य देख पाएंगे, वो शास्त्रीय संगीत सुन पाएंगे, ये सांस्कृतिक आतंकवाद नहीं तो क्या ? संस्कृति, सभ्यता, संस्कार यह हमारे देश की सबसे बड़ी समपत्ति है और इसे बचा कर रखना हमारी जिम्मेदारी है। 


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने षष्ठम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

महाराज श्री ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

7Jun 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 03 जून से 10 जून तक प्रतिदिन राजकीय आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय का खेल मैदान, खाटूश्याम जी में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 108 श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

भागवत कथा के पांचवे दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि धर्म का प्रचार करना सिर्फ साधु संतो, महात्माओं, कथा वाचकों, ब्राह्मणों का काम नहीं है, ये हम सब की जिम्मेदारी है। भगवान ने भी आज्ञा दी है की अपने धर्म की रक्षा किसी भी कीमत पर किजिए। हम से पूर्व के लोगों ने अपना बलिदान देकर भी धर्म की रक्षा की है। आप लोग अपने धर्म को आगे बढ़ाने का अपनी तरफ से भी प्रयास किजिए। सबसे पहला काम यह किजिए की अपनी आने वाली पीढ़ी को इतना धर्मात्मा बना दिजिए की आपके जाने के बाद भी आपके मंदिर में आरती और पूजा होती रहे। दूसरा काम यह किजिए की ठाकुर की कथाओं को लोगों तक पहुंचाइए, ये आपकी तरफ से धर्म की सेवा होगी।

महाराज जी ने कहा कि आप और हम उस पुनित पावन देश के लोग हैं जिस देश में ना सिर्फ अपना अपितु ओरों का भी ख्याल रखा जाता है। आजकल हमारे देश के लोग एक चीज को बहुत अच्छे से जानते है उसका नाम है मैनेजमेंट। पाश्चात्य कल्चर में बिजनेस मैनेजमेंट में सेलफिस व्यक्ति का निर्माण करते हैं, वह सिखाते हैं कि झूठ बोलकर पैसा कैसे कमाया जाएं। आप गीता को पढिए, कई विशेषज्ञों का मानना है कि गीता में दिया गया ज्ञान आधुनिक मैनेजमेंट के लिए भी एकदम सटीक है और उससे काफी कुछ सीखा जा सकता है। गीता में ज्ञान दिया गया है कि तुम क्या कर सकते हो, तुम्हारे किए हुए कर्म तुम्हे और दुसरों को सुख पहुंचा सकते हैं। गीता जैसा मैनेजमेंट तुम्हे पूरे विश्व में कही नहीं मिलेगा। महाराज जी ने आगे कहा कि कान्वेंट स्कूलों में बाइबिल पढ़ाई जाती है लेकिन भारतीय स्कूलों में रामायण गीता नहीं पढ़ाई जा सकती क्योंकि अगर रामायण पढ़ाई गई तो भगवाकरण विद्या का हो जाएगा ऐसा कुछ लोग मानते हैं। मैं एक बात कहता हूं कि गीता पढ़ने से भगवाकरण नहीं होगा बल्कि मानवता का एक उद्धार होगा।

महाराज जी ने कहा कि हमारे हाथ कि शोभा कंगन से नहीं है हमारे हाथ की शोभा दान से है, हमारे कान की शोभा कुण्डल से नहीं है, हमारे कान की शोभा भगवान की कथा सुनने से है। हाथ तब सुंदर लगते हैं जब दान दिए जाते हैं, कान तब सुंदर लगते हैं जब भगवान की कथा सुनी जाती है। दयावानों का शरीर परोपकार के लिए होता है, हमारे शरीर की इत्र से नहीं बल्कि परोपकार से बढ़ेगी।

महाराज जी ने कहा कि भगवान तुम्हे कुछ भी दे दे उसका अहंकार मत करो, बल्कि उसमें सरलता बनी रहनी चाहिए। अगर तुम सरल बने हुए हो तो उसका मतलब है कि भगवान के प्रसाद को सही मायने में आपने स्वीकार किया है।

देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा पांचवे दिन के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।

महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।

शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।

बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।

इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।

इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।

महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।

महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।

उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।

महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"

जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।

दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।

महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"

भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।

।। राधे-राधे बोलना पडेगा ।।

6Jun 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 03 जून से 10 जून तक प्रतिदिन राजकीय आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय का खेल मैदान, हॉस्पिटल चौराहा के पास, खाटूश्याम जी में 108 श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के चतुर्थ दिवस पर भी हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत सांस्कृतिक आतंकवाद पर चर्चा से की। उन्होंनवे कहा कि किसी भी देश के निर्माण के लिए वहां की कुछ चीजें महत्वपूर्ण होती हैं, यदि हम देश को शरीर समझे तो संस्कृति उसकी आत्मा होती है। जैसा की आप जानते हैं बिना आत्मा के शरीर किसी काम का नहीं है, ठीक वैसे ही बिना संस्कृति के देश किसी काम का नहीं है। किसी भी संस्कृति के आदर्श होते हैं, मूल्य होते हैं, इन मूल्यों की संवाहक संस्कृति होती है। भारतीय संस्कृति में चार मूल्य प्रमुख हैं— धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इनही पर चलकर जीव अपने चरित्र का निर्माण करता है। ये संस्कृति नहीं है जीता जागता एक सनातन धर्म है जो हमें नेक इंसान बनाता है। लेकिन आधुनिकता की जो आंधी चल रही है उसमें हमारी संस्कृत, संस्कृति, कलचर उड़ता चला जा रहा है। आज हम एक ऐसी अंधी दौड़ में लग गए हैं जिसका हमें अंत नहीं पता, बस भागे जा रहे हैं। आप प्रत्यक्ष रूप से देख सकते हैं सामाजिक बदलाव, चाहे वो बोलने का स्टाइल हो, चलने का स्टाइल हो, पश्चिमी सभ्यता हमारे ऊपर जोर शोर से हावी है। आज का युवा अगर धर्म की बात करता भी है तो बाकि के उसके मित्र हीन दृष्टि से उसे देखते हैं। अपनी भारतीय संस्कृति का विनाश हम लोग अपनी आंखो से होता हुआ देख रहे हैं। 


महाराज श्री ने कहा कि कौन व्यक्ति कितना जीएगा यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण बात यह है कि तुम जीए कैसे हो, किस प्रकार से तुमने अपना जीवन जीय है। किसी के लिए अच्छा करो या ना करो लेकिन अपनी आत्मा के लिए तो अच्छा करो। 


महाराज श्री ने कहा कि बचपन में किया हुआ भजन बहुत महत्वपूर्ण होता है, पूरा जीवन संवार देता है। जितने भी लोग यहां बैठे हैं और जो कहते हैं कि अभी भजन करने का समय नहीं है वो तुम्हारे हितैषी नहीं है वो तुम्हारे शत्रु है। भजन करने की कोई उम्र नहीं होती, जिस दिन तुम्हे लग जाए की मैं प्रभु का हूं, प्रभु मेरे हैं उस दिन से ही भजन शुरू कर देना चाहिए।
महाराज श्री ने कहा कि इतिहास वही अच्छा लिख सकते हैं जिस अपनी प्रशंसा सुनने की इच्छ ना हो। वहीं सच्चा और अच्छा इतिहास लिख सकते हैं। हमारे वहां तो इतिहास बच्चों को पढ़ाया जाता है वो पूरा सच नही है उसमे मिलवाट है। कुछ लोग सिर्फ पैसों के लिए कुछ भी लिख देते हैं, आप पैसा दो वो कुछ भी लिख देंगे। लिखने वाला वहीं अच्छा लिख सकता है जिसे धन का लालच ना हो। हमारे जिन ऋषि मुनियों ने जो इतिहास लिखा है शास्त्र लिखे हैं, पुराण लिखे हैं, उनको ना अपनी प्रशंसा सुनने की इच्छा थी और ना ही पैसों का लालच। 
महाराज श्री ने कहा कि अच्छा मानव वही है, जो बड़े बुजुर्गों ने कह दिया उसे स्वीकार कर ले, वहां किंतु परंतु नहीं होनी चाहिए। महाराज जी ने कहा कि स्त्री की पहचान तीन जगह से होती है बालयावस्था में किसी बेटी है, युवा अवस्था में किसकी पत्नी है, वृद्धावस्था में किसकी मां है। 


देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।

तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

5Jun 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 03 जून से 10 जून तक प्रतिदिन राजकीय आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय का खेल मैदान, हॉस्पिटल चौराहा के पास, खाटूश्याम जी में 108 श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।


कथा से पूर्व बजरंग दल खाटूश्याम के सदस्यों द्वारा महाराज श्री को पगड़ी पहानकर एवं स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। 


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि संस्कृत, संस्कृति और संस्कार इस देश की वो धरोहर है जिसकी वजह से हमारे देश का मान सम्मान सिर्फ भूमंडल पर ही नहीं अपितु इस की वजह से भारत जैसे पुनित देश का डंका स्वर्ग में भी बजता है। मेकाले जब भारत आया तो उसने अपने सदन में एक बात कही थी कि मैने भारत के हर एक कोने को जा जाकर देखा है और इस भारत को हम गुलाम बनाने के लायक नहीं है। यह इतना संपन्न देश है कि मुझे इस देश में एक भी भिखारी नजर नहीं आया। इस देश की सबसे बड़ी सपत्ति इसके संस्कार है, यहां एक से एक आदर्श व्यक्तित्व रहता है। मेकाले उस देश की बात कर रहा है जहां आज एक भी लड़की सुरक्षित नहीं है। मेकाले कहता था यह देश तब तक गुलाम नहीं बन सकता जब तक हम इसकी संस्कृति, संस्कृत और संस्कार को खत्म नहीं कर देते। आजकल अगर कहीं हम अगर दो अंग्रेजी बोलने वालों के बीच में हिंदी बोलने लग जाएं तो लोग समझते हैं हम अनपढ़ आदमी हैं। अपने देश में जैसी दुर्दशा भारतीयों की है वो शायद ही किसी देश में हो। इस देश में हिंदी बोलने वालों को हीन भावना से देखा जाता है। संस्कृति को बचाने की जो बाते करे हम उसे संस्कृति बचाने वाला ऐजेंट समझने लगते हैं। दुनिया मे कई देश ऐसे हैं जो इंग्लिश तो जानते हैं लेकिन बोलना नहीं चाहते वो अपने राष्ट्रीय भाषा बोलते हैं। चीन वाले चीनी भाषा बोलते हैं, जापान में जापानी बोलते हैं लेकिन भारत में हिंदी बोलने वाले को अनपढ़ समझते हैं। विश्व का एक पावरपुल देश ही चीन क्योंकि उसने अपनी संस्कृति को नहीं छोड़ा। भारत आज भी दूसरों के आगे गिडगिडाता हैं क्योंकि हमने अपनी संस्कृति का अपमान अपने हाथों से किया है। मेकाले की यह रणनिती थी की इनको मेंटेली ऐसा तैयार कर दो कि यह शरीर से तो आजाद हो जाएं लेकिन दिमागी तौर पर कभी आजाद ना हो पाएं उसके लिए उसने कॉन्वेंट की व्यवस्था की क्योंकि उसको पता था की यह संस्कार गुरूकुलम से आते हैं वहां ऋषि मुनी, योगी उनको ज्ञान देते हैं। महाराज जी ने कहा कि आज आप अपने दिल से पूछिए की क्या आप अपने बच्चों के चरित्र पर ध्यान देते हैं, बस ही चीज पर ध्यान देते हैं मार्क्स कितने आए, दूसरा यह बनेगा क्या, कभी भी इस बात पर ध्यान नहीं रहता है कि इसका चरित्र कैसा है ? जिस चरित्र को पाश्चात्य कल्चर ने कुछ नहीं समझा वहीं चरित्र हमारी संपत्ति है।


महाराज जी ने कहा कि जब गुरूकुलम की पद्दति थी तब 90 प्रतिशत लोग साक्षर थे और जब से कॉवेंट आएं है तो देख लो कितने प्रतिशत लोग साक्षर हैं। उस समय ऋषि मुनी पढ़ाया करते थे और साक्षर बनाया करते थे। उस समय हमारे यहां सोने चांदी की सिक्के चला करते थे, भारत को सोने की चिडिया कहा जाता था। हर कोई यह चाहता है कि हमारे देश में बहन बेटियां सुरक्षित हो लेकिन कोई यह जानना नहीं चाहता की क्यों सुरक्षित नहीं है। वो इसलिए सुरक्षित नहीं है क्योंकि आपके बच्चे चरित्रवान नहीं है। हमारे बेटे चरित्रवान हो जाएंगे तो हमारी बेटियां सुरक्षित हो जाएंगी। आपकी बेटियां सुरक्षित हो उसके लिए आपके बेटे का चरित्रवान होना जरूरी है।


महाराज जी ने आगे कहा कि श्रीमद्भागवत कथा वेद रूपी वृक्ष का पका हुआ फल है। विश्व में जितने भी फल में उसमें कुछ ना कुछ त्यागने योग्य वस्तुए हैं लेकिन इस फल में कुछ भी त्यागने योग्य नहीं है। भागवत हमें सब कुछ देती है, जिसे भक्ति चाहिए भक्ति लो, जिसे ज्ञान चाहिए ज्ञान लो, जिसे वैराग्य चाहिए वैराग्य लो और जिसे कुछ नहीं चाहिए उसे मोक्ष तो सहज में प्राप्त करा देती है भागवत। 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।


श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।


यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

4Jun 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 03 जून से 10 जून तक प्रतिदिन राजकीय आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय का खेल मैदान, हॉस्पिटल चौराहा के पास, खाटूश्याम जी में 108 श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत में कल्चर टेरेरिजम पर बात की उन्होंने कहा कि हमारी जो संस्कृत भाषा है यह संस्कृति को बनाती है, संस्कृत कोई साधारण भाषा नहीं है। संसार में जितनी भी भाषाएं है वो किसी ना किसी के द्वारा बनाई गई है लेकिन संस्कृत भाषा देव भाषा है। संस्कृत भाषा जोड़ना सिखाती है, संस्कृत भाषा पढ़ने वाले बच्चे तीव्र बुद्धि के होते हैं, उनमे हर एक भाषा समझने की शक्ति होती है। यह दुर्भाग्य का विषय ही है कि आज संस्कृत की बात करने वालों की बाते अनसुनी की जाती हैं और सिर्फ अंग्रेजी पढ़े लिखे बच्चों को भी बुद्धिमान समझा जाता है। लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा की बाहरी देशों में संस्कृत भाषा की विशेषता को समझते हुए उन्होंने पाठय क्रम में बच्चों को संस्कृत अनिवार्य कर दिया। एक ओर बात सुनकर आपको आश्चर्य होगा की 7वीं जेनरेशन का जो महाकंप्यूटर बन रहा है उसका बेस ही संस्कृत में रखा जा रहा है। दुर्भाग्य यह है कि हम अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं, आजकल तो संस्कृत को मरी हुई भाषा कहा जाता है। लेकिन याद रखिए संस्कृत कभी मर नहीं सकती जब तक यह धरती रहेगी संस्कृत रहेगी। संस्कृत पढ़ने वाले बच्चे संस्कारी होते हैं, घर परिवार को जोड़ने वाले होते हैं। 


महाराज जी ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा वो है जिस भागवत को लिखने के बाद वेद व्यास जी महाराज को कुछ और लिखने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी इसलिए भागवत को कहा गया है सर्व वेदांत सारिणी यानि यह सभी वेदों का सार है। 


महाराज जी ने कहा कि भगवान ज्ञान सिद्ध नहीं है, भगवान वैराग्य से मिलेंगे गारंटी नहीं है, ज्ञान से मिलेंगे गारंटी नहीं है, लेकिन प्रेम से मिलेग इस बात की पूरी गारंटी है। 
महाराज जी ने आगे कहा कि जो देवताओं के लिए दुर्लभ है वो आप लोगों के लिए सुलभ है। आप लोग जो भी सतकर्म करते हैं उससे सुख की प्राप्ति तो हो सकती है लेकिन भागवत की प्राप्ति नहीं हो सकती। 100 अश्वमेघ यज्ञ करने से इंद्र तो बन जाओगे, स्वर्ग की प्राप्ति कर लोगे लेकिन भागवत मिल जाएगी यह संभव नहीं है। 


महाराज जी ने कहा कि जैसे ही मनुष्य भागवत सुनने का संकल्प लेता है उसी वक्त प्रभु उसके ह्रदय में विराजमान हो जाते हैं, ऐसी है भागवत की महिमा। अमृत अमर कर सकता है लेकिन निर्भय नहीं कर सकता, जो अमृत नहीं कर सकता वो भागवत आपको एक बार ही कथा सुनने से कर देती है। लेकिन यह उसके लिए ही संभव है जो सच्चे मन से कथा सुने। 


देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो ? राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। 
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।


श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।


यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

3Jun 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 03 जून से 10 जून 2018 तक राजकीय आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय का खेल मैदान, हॉस्पिटल चौराहा के पास, खाटूश्याम जी में आयोजित 108 श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया

कथा के पहले दिन सर्वप्रथम सुबह श्री खाटू श्याम जी मंदिर से कथा स्थल तक कलश यात्रा निकाली जिसमें सैकड़ों माताओं बहनों ने कलश उठाया।


कथा से पूर्व महाराज श्री ने सभी 108 यजमान ब्राह्मणों के साथ पूजा अर्चना की जिसके बाद दोपहर 12:30 बजे महाराज जी के साथ श्री पवन जी, पुजारी अध्यक्ष, श्री श्याम सुंदर शर्मा जी, प्रधानाचार्य, श्री पप्पू शर्मा जी ने दीप प्रज्जवलित कर 108 श्रीमद्भागवत कथा की शुरूआत की। यजमानों द्वारा महाराज श्री को पगड़ी पहनाकर सम्मानित किया गया।
भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि हमेशा मीठी बाते सुनिए अगर कटु वाणी सुनोगे तो तुम्हारा ह्रदय जहरीला हो जाएगा और मधुर वाणी सुनोगे तो आपका ह्रदय रस युक्त, स्वस्थ, निर्मल पवित्र हो जाएगा।


महाराज जी ने कहा कि आजकल मां बाप की जिम्मेदारी कम होती जा रही है क्योंकि वो सोचते हैं कि अध्यापक सबकुछ सीखा देंगे। उन्होंने कहा कि बच्चे आपके हैं टीचर के नहीं , अपने बच्चों को सही राह पर ले जाने के लिए मां बाप का कर्तव्य है उन्हे अच्छी बात समझाएं। 


महाराज जी ने कहा कि श्रद्धावान किसे कहते हैं ? अगर आप यहां आए हो तो आपको विश्वास होना चाहिए की जिस भाव से यहां आए हैं वो भाव यहां पूरा होगा ही कोई टाल नहीं सकता। महाराज जी ने श्रद्धा किसे कहते हैं इसका उदहारण देते हुए कहा कि महाराष्ट्र में एक जगह सूखा पड़ा, तो सब गांव के लोगों ने सोचा की अब करें क्या ? पहले सोचा की गांव छोड़े लेकिन इतनी खेती बाड़ी थी उसका क्या करते, दूसरे किसी बुजुर्ग ने कहा इस दुनिया में सब कुछ मिलता है अगर हम भगवान से दिल से मांगे तो, चलो हम सब गांव के लोग चलते हैं और मंदिर में बैठ कर भगवान से प्रार्थना करते हैं। गांव के लोग मंदिर में जाकर एकत्रित हो गए और भगवान से प्रार्थना करने लगे, सभी लोग प्रार्थना कर ही रहे थे की तभी एक दृश्य देखा की एक बच्चा छतरी ताने हुए आ रहा है। उसके देख कर कुछ लोगों ने कहा कि पागल हो गया है क्या इतनी धूप में छतरी लेकर आया है। तो उस बच्चे ने कहा जब संत हमारे वहां आते हैं तो कहते हैं भगवान के वहां जो दिल से मांगा जाए तो भगवान देता है और तो और जब हम साधारण व्यक्ति हमारे सामने खड़ा हो जाए और उसका भी अच्छा स्वभाव हो तो वो भी हमें खाली नहीं लौटाता कुछ ना कुछ देता है, अगर हम भगवान के वहां आए हैं तो इसी इच्छा से आए हैं कि भगवान हम पर कृपा करो कि हमारे वहां बारिश हो जाए, जब हम यह इच्छा लेकर आएं तो क्या भगवान बारिश नहीं करेंगे । जब भगवान बारिश करेंगे तो कहीं मैं बारिश में भीग ना जाऊं इसलिए मैं छतरी लेकर आया हूं। आप विश्वास नहीं करेगे की उस बच्चे की यह बात पूरी हुई ही थी की बारिश शुरू हो गई। भले ही पूरे गांव की प्रार्थना नामंजूर हो गई हो लेकिन उस बच्चे के विश्वास ने भगवान को बारिश करने पर मजबूर कर दिया। 


महाराज जी ने कहा कि आपको ऐसे देश के बारे में बताना चाहता हूँ जिसे जानकर आपको पहले क्षण बहुत खुशी होगी दूसरे क्षण बहुत दुख होगा। विश्व में एक ऐसा देश है जिसका धर्म तो इस्लाम है और संस्कृति है रामायण और यह देश है इंडोनेशिया। मुस्लिम बहुल इंडोनेशिया में लोग न केवल बेहतर इंसान बनने के लिए रामायण पढ़ते हैं बल्कि इसके पात्र वहां की स्कूली शिक्षा का भी अभिन्न हिस्सा हैं। इंडोनेशिया के किसी गांव में एक मुस्लिम शिक्षक को रामायण पढ़ते देखकर पूछा गया कि आप रामायण क्यों पढ़़ते हैं? उत्तर मिला, ‘मैं और अच्छा मनुष्य बनने के लिए रामायण पढ़ता हूँ। दरअसल रामकथा इंडोनेशिया की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा है। बहुत से लोग हैं जिन्हें यह देखकर हैरानी होती है, लेकिन सच यही है कि दुनिया में सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाला यह देश रामायण के साथ जुड़ी अपनी इस सांस्कृतिक पहचान के साथ बहुत ही सहज है। इतना ही नहीं इंडोनेशिया के स्कूलों में प्रत्येक सप्ताह बच्चो के माता पिता को स्कूल बुलाया जाता है और बच्चों को अपने माता पिता के पैर धोने के लिए कहा जाता है। ताकि बच्चों में आने माता पिता के प्रति सम्मान आदर बढे और वे अपने संस्कारों को जान सके।आपको बहुत खुशी हुई होगी कि रामायण को विदेशी धरती पर पढ़ाया जाता है। लेकिन दुख की बात ये है कि ये सब कुछ राम की धरती, रामायण की धरती, रामायण के रचनाकार वाल्मीकि की धरती, तुलसीदास की धरती पर पर नही हो रहा है। ना जाने ऐसा क्या है जो हमारे स्कूल, कॉलेज, हमारी सरकार अपने संस्कारों को साथ नहीं लेकर चल सकती है। ना जाने वो कौन सी ताकते हैं जो हमे अपनी जड़ों से जुड़ने से रोक रही है। इस पर हम सभी को विचार करना चाहिए। मेरा इस पावन धरती श्री खाटूश्यामजी की धरती से सभी माताओं पिताओं को निवेदन है की अपने बच्चो को रामायण जरूर पढ़ाए, भागवत जरूर पढ़ाये। संस्कृत, संस्कृति और अपने संस्कारों से अवगत जरूर कराए और इस पर विचार करे या प्रयास जरूर करें कि स्कूल में भी बच्चो की पढ़ाई में रामायण हमारे वेद शास्त्र सम्मलित हो उसके लिए स्कूल कॉलेज में बात करें और हर संभव प्रयास करे। 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। 


।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

29May 2018

कल पूर्णिमा के पावन अवसर पर ठा. श्री प्रियाकान्त जू मन्दिर में संकीर्तन का आयोजन किया गया।

राधे राधे,
कल पूर्णिमा के पावन अवसर पर ठा. श्री प्रियाकान्त जू मन्दिर में संकीर्तन का आयोजन किया गया जिसमें कि हजारों की संख्या में भक्तों ने भंडारा प्रसाद पाया पूर्णिमा के पावन अवसर पर हर महीने ट्रस्ट के द्वारा हजारों भक्तों के लिए भंडारा किया जाता हैं । राधे राधे।।

29May 2018

विश्व शान्ति सेवा चैरीटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में भूतगली स्थित मीरा सहभागिनी आश्रय सदन में वृद्ध माताओं को वस्त्र वितरण किया गए ।

वृद्ध माताओं को वस्त्र वितरण कर लिया आशीष भजनालम्बी संतजनों से भक्ति का मान ऊँचा- पूज्य महाराज श्री । विश्व शान्ति सेवा चैरीटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में भूतगली स्थित मीरा सहभागिनी आश्रय सदन में वृद्ध माताओं को वस्त्र वितरण किया गए । मंगलवार को पूज्य महाराजश्री ने सभी माताओं को साडियाँ प्रदान कर उनका आशीर्वाद ग्रहण किया । इस बीच माताओं ने भजन कीर्तन प्रारम्भ किया तो महाराज जी भी उसमें शामिल हो गये । 


महाराजश्री ने कहा कि भजनालम्बी माताओं और संतजनों से वृन्दावन की भक्ति का मान और ऊँचा होता है । ऐसे भगवद्जनों का सम्मान और सहयोग का अवसर हमारे पुण्यकर्मों का फल है । इस अवसर पर संस्था के श्री विष्णु शर्मा जी ने कहा कि पुरूषोत्तम माह के पर्व पर विश्व शान्ति सेवा चैरीटेबल ट्रस्ट द्वारा विभिन्न सेवा कार्य किये जा रहे हैं । इसके अन्तर्गत परिक्रमार्थियों के लिये मीठे जल की प्याऊ लगायी गयी है । कई स्थानों पर वस्त्र वितरण किये गये हैं । आश्रय अधीक्षया श्रीमती किरण बाला जी , जगदीश वर्मा, दिनेश तरकर, दिवाकर पचहरा, अमित पाण्डेय जी आदि उपस्थित थे ।

25May 2018

पुरूषोत्तम मास के पावन अवसर पर विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा वृन्दावन एवं मथुरा में शीतल जल एवं मीठे जल की प्याऊ का शुभारंभ किया।

पुरूषोत्तम मास के पावन अवसर पर विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा वृन्दावन एवं मथुरा में शीतल एवं मीठे जल की प्याऊ लगाकर जल सेवा की जा रही है। चौरासी कोस परिक्रमा एवं ब्रज दर्शन को आने वाले श्रद्धालुओं को भीषण गर्मी में शीतल जल से राहत प्रदान करने हेतु वृन्दावन परिक्रमा मार्ग, प्रियाकान्त जू मंदिर, छटीकरा मार्ग एवं मथुरा में गोवर्धन चौराहा पर प्याऊ का शुभारम्भ किया गया है। शुक्रवार को संस्था सचिव श्री विजय शर्मा जी ने श्रद्धालुओं को मीठा जल पिलाकर सेवा कार्य किया । भीषण गर्मी में राहगीरों ने अपनी प्यास बुझाते हुये संस्था के सेवा प्रकल्पों की सराहना की । पूज्य महाराज श्री की प्रेरणा से विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा समय-समय पर इसी प्रकार के सेवाकार्य किये जाते रहे हैं और आगे भी किये जाते रहेंगे।

25May 2018

पुरुषोत्तम मास एवं एकादशी के पावन अवसर पर पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने आज वृन्दावन धाम की परिक्रमा की।

पुरुषोत्तम मास एवं एकादशी के पावन अवसर पर पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने आज वृन्दावन धाम की परिक्रमा की। इस अवसर पर उनके साथ भक्त एवं संस्था के सदस्य भी मौजूद रहे।

24May 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 18 मई से 24 मई 2018 तक भारत माता मंदिर, विद्यापीठ रोड, कैंट, वाराणसी में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई। भागवत कथा के सातवें दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा के अंतिम दिन कथा से पूर्व विभिन्न संगठनों द्वारा महाराज श्री को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा कि शुरूआत करते हुए कहा कि जीवन में दो बाते हैं कि एक तो आप अपने विचारों से लोगों को अच्छा बना सकते हो, दूसरा आप अपने बिचारों से दूसरों को बुरा बना सकते हो। ये आपके उपर निर्भर करता है कि आप चाहते क्या हो और हमें यह चाहत रखनी चाहिए की हमें अपने विचारों से लोगों को अच्छा बनाएं और भगवान की ओर लेकर चलें क्योंकि यह हमारे जीवन का सबसे बड़ा आनन्द भी है।

महाराज श्री ने कहा कि काफी युवाओं को यह संदेह होता है कि भगवान को इतने विवाह करने की क्या आवश्यकता पड़ी ? सबसे पहले यह समझ लिजिए भगवान भगवान हैं, उन्हें जगपति कहा जाता है। जगत में जितने लोग हैं उनके पति जगत पति हैं वो सब के पति है और यही बात समझने के लिए गुरू की आवश्यकता होती है। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि गुरू की क्या जरूरत है ? रोटी कमाना कौन सिखाता है ? धन कमाना कौन सिखता है ? जो यह सिखाता है कि रोटी कमाने के लिए, धन कमाने के लिए क्या करना पडेगा जो यह सिखाता है वो तुम्हारा गुरू है। जिस प्रकार से रोटी कमाने के लिए, धन कमाने के लिए गुरू की जरूरत होती है ठीक वैसे ही भक्ति करने, कर्म करने, ज्ञान अर्जित करने के लिए, सदमार्ग पर चलने के लिए गुरू की आवश्यकता होती है।

महाराज श्री ने कहा कि आजकल लोगों में दिक्कत है यह है कि लोग सोचते हैं कि लोग हमें पहचाने इसलिए बड़ा काम करते हैं। बड़ा काम करने से रूकना नहीं चाहिए, एक से बढ़कर एक बढ़ा काम करना चाहिए लेकिन मुझे लोग जाने इसलिए नहीं बल्कि मेरा कल्याण हो जाए इसलिए करना चाहिए। कथा करवाने वाले आप, पैसा लगाने वाले आप, व्यवस्था करने वाले आप सब तो वही है बस भाव बदलना है। मेरा नाम हो यह भाव नहीं बल्कि मेरा कल्याण हो जाए यह भाव होना चाहिए और जब आप ऐसा कार्य कल्याण के लिए तो पूरी दुनिया अपने आप जान जाएगी। आपका कर्म ही आपकी पहचान है, आपका कर्म जब श्रेष्ठ होता है लोग आपको अपने आप पहचान जाते है, पहचान करवाने की जरूरत नहीं पड़ती।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि रुकमणी जी ने श्रीकृष्ण से प्रेम विवाह किया। भगवान ने 16 हजार 100 विवाह किए हैं लेकिन 8 विवाह अलग अलग हुए। ये 8 पटरानियां साधारण नहीं हैं लक्ष्मी जी बनी हैं रूकमणी, पार्वती जी आधे अंश से बनी हैं जामवंती और बाके आधे अंश से बनी हैं महामाया, तुलसी बनी हैं लक्ष्मणा, यमुना बनी हैं सूर्य की पूत्री कालिंदी, लज्जा बनी हैं भद्रा, गंगा बनी हैं मित्रव्रिंदा, सावित्री जी बनी हैं सत्या और पृथ्वी बनी हैं सत्यभामा। ये सांसारिक विवाह नहीं है ये पूरी प्रकृति के साथ ठाकुर जी ने विवाह किया है।
महाराज श्री ने आगे कहा कि भगवान ने 16100 विवाह इसलिए नहीं किए की उन्हे बहुत सारी पत्नियां चाहिए थी। उन्होंने इतने विवाह इसलिए किए क्योंकि उन स्त्रियों को जरूरत थी। भौमासुर नामक राक्षस ने 16 हज़ार 100 कन्याओं को बंदी बना रखा था। नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा की समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। इस कारण भगवान ने १६१०० रूप बनाकर सबके साथ एक मुहूर्त में एक साथ विवाह किया था। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने इतने विवाह किये। भगवान ने कामनावश विवाह नहीं किया था, करुणावश किया था। भगवान कहते हैं जिसको कोई नहीं अपनाता अगर वो मेरी शरण में आये तो मैं उसे अपना लेता हूँ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंततः सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

22May 2018

आज प्रातः महाराज श्री ने काशी दशाश्वमेध घाट पर गंगा स्नान किया।

आज प्रातः महाराज श्री ने काशी दशाश्वमेध घाट पर गंगा स्नान किया। उसके बाद मणिकर्णिका घाट पर स्थित सतुआ बाबा जी के आश्रम पर गए एवं श्री सतुआ बाबाजी के साथ बाबा विश्वनाथ जी के दर्शन एवं अभिषेक किया तथा अंत में काशी विद्दुत परिषद में जाकर श्री रामयत्न शुक्ल जी का सम्मान किया। इस अवसर पर कार्ष्णि नागेंद्र जी महाराज एवं एस.के.सेठ, अयोध्या प्रसाद सेठ, नारायण सेठ, विजय शर्मा, श्याम सुंदर शर्मा, एच.पी अग्रवाल, अंतरिक्ष शुक्ला आदि सम्मानित गण मौजूद थे।

22May 2018

आज पूज्य महाराज श्री को काशी विद्वत परिषद द्वारा “सनातन धर्म संरक्षक” की उपाधी से सम्मानित किया गया।

आज पूज्य महाराज श्री को काशी विद्वत परिषद द्वारा “सनातन धर्म संरक्षक” की उपाधी से सम्मानित किया गया। इस उपाधी को प्रदान करने के लिए काशी विद्वत परिषद के महामहोपाध्याय प्रो० रामयत्न शुक्ल जी, महामंत्री पूर्व कुलपति संपूर्णानंद विश्वविद्यालय प्रोफेसर शिव जी उपाध्याय, प्रवक्ता प्रो० दिनेश कुमार गर्ग, मंत्री प्रो० राम नारायण द्विवेदी, डॉ०ब्रज भूषण ओझा, पश्चिमी भारत के प्रभारी कार्ष्णि नागेंद्र महाराज, आचार्य राकेश महाराज पराशर, आचार्य दीपक मालवीय, प्रोफेसर हरप्रसाद दीक्षित एवं अन्य विद्वत समाज के सम्मानित व्यक्ति उपस्थित थे।

 
 

22May 2018

भगवान शिव की नगरी काशी में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 18 मई से 24 मई 2018 तक भारत माता मंदिर, विद्यापीठ रोड, कैंट, वाराणसी में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के पांचवे दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
कथा प्रारम्भ से पूर्व आज पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज को काशी विद्वत परिषद द्वारा “सनातन धर्म संरक्षक” की उपाधी से सम्मानित किया गया। इस उपाधी को प्रदान करने के लिए काशी विद्वत परिषद के महामहोपाध्याय प्रो० रामयत्न शुक्ल जी, महामंत्री पूर्व कुलपति संपूर्णानंद विश्वविद्यालय प्रोफेसर शिव जी उपाध्याय, प्रवक्ता प्रो० दिनेश कुमार गर्ग, मंत्री प्रो० राम नारायण द्विवेदी, डॉ०ब्रज भूषण ओझा, पश्चिमी भारत के प्रभारी कार्ष्णि नागेंद्र महाराज, आचार्य राकेश महाराज पराशर, आचार्य दीपक मालवीय, प्रोफेसर हरप्रसाद दीक्षित एवx अन्य विद्वत समाज के सम्मानित व्यक्ति उपस्थित थे। 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा कि शुरूआत करते हुए कहा कि जब प्रभु की कृपा जीव पर होती है तब उन्हे श्रीमद्भागवत कथा श्रवण करने का सौभाग्य प्राप्त होता है और जब अवरणीय सतगुणों का जब संग्रह होता है तब जीव श्रीमद्भागवत कथा करवाने के लिए प्रयत्नशील होता है। 


महाराज जी ने कल के कथा क्रम को याद दिलाते हुए कहा कि भगवान प्रकट क्यों होते हैं ? जिस समय पर पृथ्वी पर अत्याचार बढ़ते हैं, पाप बढ़ता है तो पृथ्वी व्याकुल होती है । जब कंस के अत्याचार बढ़े तो पृथ्वी मां गऊ माता का रूप धारण करके ब्रह्मा जी की सभा में गई और वहां पहुंचकर वो रोने लगी, ब्रह्मा जी उस समय श्रीकृष्ण के नाम का जाप कर रहे थे। उन्होंने अचानक से देखा की पृथ्वी आई है तो पूछा पुत्री तुम दुखी क्यों हो ? मैं कोशिश करूंगा तुम्हारे दुख का निवारण करने का। तब पृथ्वी मां ने कहा आप मेरे निर्माता है, आपने मेरा निर्माण किया है इसलिए मैं आपको दुख बताती हूं। पृथ्वी मां कहती है ऐसे लोगों का भार मुझसे सहन नहीं होता जो अपने धर्म के आचरण से शून्य है तथा अपने नित्य कर्म से रहित हैं, जिनकी वेदों में श्रद्धा नहीं है उनके भार से मैं पीडित हूं, हरि की कथा हरि भक्ति से द्वेष करने वाले से मैं बहुत दुखी हूं। ये सुनकर ब्रह्मा जी बोले चलो शंकर भगवान के पास चलते हैं, शंकर भगवान के पास गए तो वो बोले सुनो हमारी पास भी ये काम नहीं चलेगा चलो नारायण भगवान के पास चलते हैं, वहां पहुंचे तो उन्होंने कहा चिंता मत करो हम द्वापर युग के अंत में कृष्ण अवतार लेकर आएंगे और उस अवतार में सभी दुष्टों को समाप्त करेंगे और धर्म की स्थापना करेंगे। नारायण के वचनों को सुनकर सभी देवी देवता प्रसन्न हुए। 


महाराज जी ने कहा कि इस दुनिया में पूर्णत: प्रसन्न कोई भी नहीं है। लोग कहते हैं भगवान का दिया सब कुछ है बस एक कमी है, बस उसी एक कमी ने सब कुछ खराब कर रखा है। जीवन में सुखी वो ही हो सकता है जो बाबा का, जो राम का, हनुमान का, कन्हैया का हो गया, जो भक्ति के पथ पर निकल पड़ा वो सुखी हो गया । दुनिया का बन कर सुखी कोई नहीं हो सका, रात दिन चिंता सताती है चाहे बैंक में लाखो करोड़ो पडे हो इसके बावजूद भी कल के काम की चिंता रहती है।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराजा ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। 


महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा।।

 

23May 2018

पूज्य महाराज जी द्वारा बीती रात काशी की विश्वविख्यात पतित पावनी मां गंगा की भव्य आरती के दर्शन किए एवं मां गंगा की आरती की।

पूज्य महाराज जी द्वारा बीती रात काशी की विश्वविख्यात पतित पावनी मां गंगा की भव्य आरती के दर्शन किए एवं मां गंगा की आरती की।

 

23May 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 18 मई से 24 मई 2018 तक भारत माता मंदिर, विद्यापीठ रोड, कैंट, वाराणसी में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने श्री कृष्ण- रूक्मिणी विवाह का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा शुरू होने से पूर्व आज विश्व शांति मिशन की ओर से सिंगरा में फार्म में करने वाले संजय कुमार सिंह जिनकी किसी कारणवश नौकरी चली गई है, उनकी दो बेटियां जो पढ़ने में बहुत अच्छी है लेकिन पैसे की तंगी की वजह से फीस के पैसे नहीं जूटा पा रहे थे, तो उनकी दो बेटियां की स्कूली शिक्षा में रूकावट ना हो इसके लिए मिशन की ओर से सकारात्मक कदम उठाते हुए, दोनों बेटियों को पूरे एक साल के पढ़ाई के खर्चे की राशि प्रदान की गई ताकि वो अपने उज्जवल भविष्य की ओर कदम बढ़ा सकें ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा कि शुरूआत करते हुए कहा कि जब अपनी पूजा कराने का शौक चढ़ जाए और पूजा ना हो तो गुस्सा आना स्वाभाविक है। हम हमेशा कहते हैं किसी जीव की पूजा मत करो जीव के चरित्र की पूजा करो। गुरू वो नहीं है जो अपने आप को पूजवाने की बात करता हो बल्कि गुरू वो है जो भगवान की शरणागति प्राप्त करवाता हो। भगवान भजन और सतकर्मों से मिलते हैं। उन्होंने कहा कि वैसे तो हम गुरू से बहुत उम्मीद रखते हैं लेकिन गुरू के बताए हुए मार्ग पर नहीं चलते हैं। जब आपको भगवान से मिलने की इच्छा हो तो गुरू का बताया हुआ मार्ग ही आपके लिए सर्वोत्तम मार्ग है, उस मार्ग पर चलिए गोविंद मिलेंगे। आप सच्चे शिष्य तब बनोगे जब आप गुरू के बताए हुए एक एक शब्द को भगवान का बताया हुआ शब्द समझकर स्वीकार करें। 
महाराज जी ने कहा कि सभी धर्मों का सम्मान किजिए, जो अपने धर्म का सम्मान नहीं करता वो चाहे किसी भी धर्म का हो वो धर्मात्मा हो ही नहीं सकता। जो ओरो के धर्म का सम्मान ना कर सके वो अपने धर्म का भी सम्मान कहा करता है, धर्मात्मा वही है तो सब का सम्मान करे ।


महाराज जी ने कहा कि जब जीव गंगा में स्नान करता है तो वो पाप मुक्त हो जाता है लेकिन इनते सारे लोग गंगा में स्नान करते हैं तो वो पाप कहां जाते हैं ? जब लोग गंगा में स्नान करते हैं तो लोगों के पाप धूलते हैं लेकिन जब कोई साधू गंगा स्नान करता है तो गंगा के द्वारा एकत्रित पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते है। 


महाराज जी ने कहा हमेशा भगवान से वस्तुएं नहीं मांगनी चाहिए कभी कभी भगवान से भगवान को भी मांगना चाहिए, भगवान के चरणों की धूल मांगनी चाहिए। वस्तु मांग लोगे तो एक दिन यहीं छूट जाएगी लेकिन भक्ति मांग ली तो कही नहीं छूटेगी तुम्हारे साथ जाएगी। 


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

23May 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 18 मई से 24 मई 2018 तक भारत माता मंदिर, विद्यापीठ रोड, कैंट, वाराणसी में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने श्री कृष्ण- रूक्मिणी विवाह का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

कथा शुरू होने से पूर्व आज विश्व शांति मिशन की ओर से सिंगरा में फार्म में करने वाले संजय कुमार सिंह जिनकी किसी कारणवश नौकरी चली गई है, उनकी दो बेटियां जो पढ़ने में बहुत अच्छी है लेकिन पैसे की तंगी की वजह से फीस के पैसे नहीं जूटा पा रहे थे, तो उनकी दो बेटियां की स्कूली शिक्षा में रूकावट ना हो इसके लिए मिशन की ओर से सकारात्मक कदम उठाते हुए, दोनों बेटियों को पूरे एक साल के पढ़ाई के खर्चे की राशि प्रदान की गई ताकि वो अपने उज्जवल भविष्य की ओर कदम बढ़ा सकें ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा कि शुरूआत करते हुए कहा कि जब अपनी पूजा कराने का शौक चढ़ जाए और पूजा ना हो तो गुस्सा आना स्वाभाविक है। हम हमेशा कहते हैं किसी जीव की पूजा मत करो जीव के चरित्र की पूजा करो। गुरू वो नहीं है जो अपने आप को पूजवाने की बात करता हो बल्कि गुरू वो है जो भगवान की शरणागति प्राप्त करवाता हो। भगवान भजन और सतकर्मों से मिलते हैं। उन्होंने कहा कि वैसे तो हम गुरू से बहुत उम्मीद रखते हैं लेकिन गुरू के बताए हुए मार्ग पर नहीं चलते हैं। जब आपको भगवान से मिलने की इच्छा हो तो गुरू का बताया हुआ मार्ग ही आपके लिए सर्वोत्तम मार्ग है, उस मार्ग पर चलिए गोविंद मिलेंगे। आप सच्चे शिष्य तब बनोगे जब आप गुरू के बताए हुए एक एक शब्द को भगवान का बताया हुआ शब्द समझकर स्वीकार करें। 
महाराज जी ने कहा कि सभी धर्मों का सम्मान किजिए, जो अपने धर्म का सम्मान नहीं करता वो चाहे किसी भी धर्म का हो वो धर्मात्मा हो ही नहीं सकता। जो ओरो के धर्म का सम्मान ना कर सके वो अपने धर्म का भी सम्मान कहा करता है, धर्मात्मा वही है तो सब का सम्मान करे ।


महाराज जी ने कहा कि जब जीव गंगा में स्नान करता है तो वो पाप मुक्त हो जाता है लेकिन इनते सारे लोग गंगा में स्नान करते हैं तो वो पाप कहां जाते हैं ? जब लोग गंगा में स्नान करते हैं तो लोगों के पाप धूलते हैं लेकिन जब कोई साधू गंगा स्नान करता है तो गंगा के द्वारा एकत्रित पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते है। 


महाराज जी ने कहा हमेशा भगवान से वस्तुएं नहीं मांगनी चाहिए कभी कभी भगवान से भगवान को भी मांगना चाहिए, भगवान के चरणों की धूल मांगनी चाहिए। वस्तु मांग लोगे तो एक दिन यहीं छूट जाएगी लेकिन भक्ति मांग ली तो कही नहीं छूटेगी तुम्हारे साथ जाएगी। 


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

20May 2018

भगवान शिव की नगरी काशी में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 18 मई से 24 मई 2018 तक भारत माता मंदिर, विद्यापीठ रोड, कैंट, वाराणसी में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के तीसरे दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा कि शुरूआत करते हुए कहा कि जब आप कुछ अच्छा करने जाते हो तो कुछ ना कुछ सवाल आपसे पुछे जरूर जाते हैं, क्यों जा रहे हो ? यही कर लेतें ? लेकिन याद रखना अच्छे कार्य के लिए कभी सोचना नहीं चाहिए। महाराज जी ने एक शायरी करते हुए कहा कि 
जिन्दगी ने कई सवालात कर डाले, वक्त ने मेरे हालात बदल डाले।


मैं तो आज भी वहीं हूं जो पहले था, बस मेरे लिए लोगों ने अपने ख्यालात बदल डाले।।


इसलिए जब भी कहीं जाओ अच्छा काम करने के लिए और उसके बावजूद भी लोग आपसे सवाल पूछे तो फिक्र मत करो बस चलते जाओ। उन्होंने अभी विचार बदले हैं, फिर आकर आपके साथ मिल जाएंगे लेकिन अच्छे काम के लिए आप अपने विचार मत बदलिए। आप अच्छे कार्य करते रहोगे तो गोविंद आपके साथ में रहेंगे।
महाराज जी ने कहा कि हम सब की जिंदगी सात दिन की है। पता नहीं कब बुलावा आ जाए और हमें जाना पड़े, इसलिए जीवन में किसी को दुख मत दो। जो दुसरों के दुख को समझता है वो मानव है और जो दुसरे के दुख को बढ़ा दे वही राक्षस है।


महाराज जी ने कहा कि बहुत से लोग सत्संग करते है, बहुत से लोग सत्संग करवाते हैं और बहुत से लोग सत्संग सुनते हैं लेकिन इन सब के बाद भी जब जीवन में बदलाव नहीं आता है तो वो सब व्यर्थ है। सत्संग में जाने का, सत्संग करवाने का, सत्संग सुनने का मतलब ही यह है कि आपके जीवन में, कर्मो में बदलाव आना चाहिए। सत्संग आपको सुधरने के लिए कहता है बिगड़ने के लिए नहीं, सत्संग शान्त रहने के लिए कहता है क्रोध करने के लिए नहीं, सत्संग आपको साधु बनने को कहता है दुष्ट बनने के लिए नहीं कहता। सत्संग करवाकर, सुनकर अगर आपके जीवन में बदलाव ना आए, मन में शांति ना हो, कुछ अच्छाई की तरफ कदम ना बढ़े तो आपका सत्संग में आना ना आना बराबर है, कथा करवाना ना करवाना बराबर है। 


महाराज जी ने कहा कि हम सब की जिंदगी सात दिनों की है और इसमें अच्छा करना या बुरा करना ये आपकी जिम्मेदारी है, जो कर्म करोगे उसका फल आपको भोगना पड़ेगा। 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।

तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा।।

21May 2018

भगवान शिव की नगरी काशी में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 18 मई से 24 मई 2018 तक भारत माता मंदिर, विद्यापीठ रोड, कैंट, वाराणसी में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
कथा के चतुर्थ दिवस पर पाताल पूरी के पीठाधीश्वर पूज्य बालक दास जी महाराज जी ने कथा पंडाल में अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई एवं व्यास पीठ से आशीर्वाद प्राप्त किया। 
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा कि शुरूआत करते हुए कहा कि यह मानव शरीर दुर्लभ है, देवताओं के लिए दो चीजे दुर्लभ हैं जो हमारे लिए सुलभ हो गई हैं। उनके लिए मानव शरीर दुर्लभ है हमे वो प्राप्त है, उनके लिए कथा दुर्लभ है हमे वो भी प्राप्त हो गई।
महाराज जी ने एक कथा सुनाते हुए कहा कि एक बार ब्रह्मा जी को अहंकार हो गया यहां जो कुछ कर रहे हैं हम कर रहे हैं, ये हर किसी को हो जाता है। हर घर का मुखिया सोचता है की मैं इस घर में नहीं होता तो इस घर का पालन पोषण नहीं होता। ब्रह्मा जी ने सोचा की जो कर रहे हैं हम कर रहे हैं हमे ओर मान सम्मान मिलना चाहिए। वो नारायण भगवान के पास गए और बोले हम ब्रह्मा जी के पद से हटना चाहते हैं, तो नारायण भगवान जी ने कहा की जैसा आप को सही लगे। वहां से ब्रह्मा जी निकले तो एक रेगिस्तान में पहुंचे और वहां देखा की हजारों ऊंटों की लाइन लगी है और सब पर बुढ़े लोग बैठे हुए हैं। ब्रह्मा जी ने ऊंट वाले से पूछा ये सब कौन है, उसने बताया की जितने भी ये लोग बैठे हुए हैं ये लोग पूर्व के ब्रह्मा हैं और अंहकार से वशीभूत होकर त्याग पत्र देकर यहां चले आते थे और अब जब उनकी जगह खाली होगी तो इनको मिलेगी, तब से ही यह भटक रहे हैं और अभी अभी सूचना मिली है की ब्रह्मा का पद खाली हुआ है तो यह सब लाइन में लगे है उस पद को पाने के लिए। यह सुनते ही ब्रह्मा उलटे पैर भागे नारायण के पास और बोले प्रभु क्षमा किजिए, हम इस पद से त्याग नहीं लेना चाहते, बहुत लंबी लाइन लगी है फिर ना जाने नंबर कब आए। महाराज जी ने कहा कि इस कथा का अभिप्राय यह है कि भगवान को भी मानव शरीर मिलेगा या नहीं संभावना नहीं है। जैसे ही सतकर्म से चित हो जाओगे ब्रह्म लोक से, स्वर्ग लोक से भी आपको वापस आना पड़ेगा। लेकिन मानव योनी में आपको देवतुल्य बनने का सौभाग्य प्राप्त हो सकता है अगर तुम सतकर्म करो तो। 
महाराज जी ने कहा कि पुत्र का होना, घर का होना, बंगला-गाड़ी का होना, धनवान होना बड़ी बात नहीं है ये सब तुच्छ बात है लेकिन सबसे बड़ी बात है एक तो मानव जन्म का होना और दूसरी भगवान की कृपा से भगवान की कथा का और संत का मिलना ये सबसे बड़ी बात है। 
महाराज जी ने कहा कि दुर्योधन को कोई अच्छा नहीं दिखता और धर्मराज को कोई बुरा नहीं दिखता दुनिया यही है। जब तो कोई व्यक्ति हमारी बात मानता रहता है तब तक उसमें कोई बुराई नजर नहीं आती और जब वो व्यक्ति हमारी बात मानने से मना कर देता है तो उसमे हमे कोई भलाई नजर नहीं आती। मैं आपके एक ही बात कहूंगा की परमात्मा की बनाई दुनिया में बुराई देखने की कोशिश मत करो बल्कि भलाई देखने की कोशिश करो। यहां हर एक वस्तु में भगवान का दर्शन करो। 
देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।


महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।


शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।


बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।


इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।


इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।


महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।


महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।


उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"


जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।


दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।


महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।

।। राधे- राधे बोलना पड़ेगा ।।

19May 2018

भगवान शिव की नगरी काशी में 18 मई से 24 मई 2018 तक भारत माता मंदिर, विद्यापीठ रोड, कैंट, वाराणसी में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा कि शुरूआत करते हुए कहा कि जब से सृष्टि का सृजन हुआ है तब से काशी का उल्लेख हमारे शास्त्रों में है, यहां बाबा भोलेनाथ स्वयं विराजमान होते हैं। ये सांस्कृतिक आध्यात्मिक राजधानी है। पूरे ब्रह्माण्ड में जो ज्ञान का दर्शन होता है वो काशी की कृपा से हो रहा है। 


महाराज जी ने कहा कि खूब यहां अपने पन की रित निभाई अपनो ने”, यही संसार है यह किसी का नहीं है, इस संसार में कोई किसी का है तो वो सिर्फ परमात्मा है। परमात्मा से रिश्ता जोड लो तर जाओगे। इस संसार में कोई किसी को दुख नहीं देता है, अगर कोई दुख देता है तो वो तुम्हारी आशा है, जो तुम किसी से उम्मीद करते हो आशा रखते हो वो दुख देती है। इसलिए हमारे संतो ने कहा था “आशा एक राम जी से दूजी आशा छोड़ दे, नाता रख एक राम जी से दूजा नाता तोड़ दे, सुख दुख हानि लाभ सब मिल सहिए, जाई विध राखे राम ताई विधि रहिये”। ये कलयुग है यहां सब त्रस्त्र है, मस्त वो है जो राम के हो गए और त्रस्त वो है जो राम के हो गए। 


देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। 


भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।


श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।


यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

17May 2018

वाराणसी प्रस्थान करने से पूर्व श्री गिरिराज महाराज की 21 किलोमीटर की परिक्रमा लगाई एवं आशिर्वाद प्राप्त किया।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज एवं श्री विजय शर्मा जी द्वारा अधिक मास के पावन पर्व के प्रथम दिवस पर कल रात्रि वाराणसी प्रस्थान करने से पूर्व श्री गिरिराज महाराज की 21 किलोमीटर की परिक्रमा लगाई एवं आशिर्वाद प्राप्त किया।

17May 2018

कानपुर समितियों और भक्तों ने महाराज श्री का भव्य स्वागत किया एवं आशीर्वाद प्राप्त किया।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज वाराणसी जाते हुए समय निकालकर कानपुर मे रूके, सभी कानपुर समितियों और भक्तों ने महाराज श्री का भव्य स्वागत किया एवं आशीर्वाद प्राप्त किया।

 

17May 2018

पूज्य महाराजश्री के श्रीमुख से 18 से 24 मई 2018 तक श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन भारत माता मन्दिर, विद्यापीठ रोड, केंट वाराणसी में आयोजित किया जा रहा है।

राधे राधे ,पूज्य महाराजश्री पहुँचे बनारस जहाँ पर आयोजक परिवार एस. के.सेठ. प्रमुख श्री मोहन लाल सेठ जी, श्री आयोध्या प्रसाद सेठ जी, श्री नारायण सेठ परिवार ने पूज्य महाराजश्री का भव्य स्वागत कर आशीर्वाद प्राप्त किया। पूज्य महाराजश्री के श्रीमुख से 18 से 24 मई 2018 तक श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन भारत माता मन्दिर, विद्यापीठ रोड, केंट वाराणसी में आयोजित किया जा रहा है। आप सभी भक्त सपरिवार सादर आमन्त्रित हैं। राधे राधे।।

18May 2018

भगवान शिव की नगरी काशी में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 18 मई से 24 मई 2018 तक भारत माता मंदिर, विद्यापीठ रोड, कैंट, वाराणसी में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भगवान शिव की नगरी काशी में पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 18 मई से 24 मई 2018 तक भारत माता मंदिर, विद्यापीठ रोड, कैंट, वाराणसी में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई।
महाराज जी द्वारा वाराणसी में हुए पुल हादसे के मृतकों को श्रद्धांजली देते हुए बाबा भोलेनाथ से प्रार्थना करते हुए दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए कथा के दौरान 1 मिनट का मौन रखा गया। महाराज जी ने भगवान भोले नाथ से प्रार्थना कि की दिवंगत आत्माओं को प्रभु अपने चरणों में शरण दें।


देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत भागवत के प्रथम श्लोक उच्चारण “सच्चिदानन्द रूपाय विश्वोत्पत्यादि हेतवे तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयम नुमः” से की। उन्होंने कहा कि भागवत के प्रथम श्लोक में वर्णन किया गया है त्रिकालों का, देहिक, दैविक, भौतिक। ये तीन प्रकार के ताप है दैहिक देह के द्वारा, दैविक देवताओं के द्वारा, भौतिक समाज के द्वारा दिया हुआ सुख हो या दुख हो और इन तीन तापों से जीव ग्रसित रहता है। इन त्रितापों को जन्म देने वाले, पोसित करने वाले, संहार करने वाले सच्चिदानंद परमपिता परमात्मा है।


महाराज जी ने कहा कि पूरे विश्व का ध्यान रखने वाले बाबा भोलेनाथ से बड़ा कथा का प्रेमी कोई नहीं है, ना पहले हुआ, ना बाद में होगा। आज के लोग कहते हैं अभी उम्र नहीं है कथा सुनने की अभी तो समय है। जीवन के एक मिनट का भी पता नहीं है की अगले एक मिनट में क्या होगा और लोग कहते है समय है। उन्होंने कहा कि मैं तो कहता हूं जब तुम्हे समझ आ जाए वहीं समय है कथा सुनने का। महाराज जी ने कहा कि लोग पूछते हैं कथाएं क्यों सुननी चाहिए ? कथाएं करती क्या है ? कथाएं हमें परमात्मा का ज्ञान कराती हैं, हमें परमात्मा से मिलाती है। 


महाराज जी ने कहा की गंगा के तट पर, यमुना के तट पर, नर्मदा के तट पर किया हुआ सतकर्म हमें 10 गुना ज्यादा लाभ देता है इसलिए हमारे पूर्वज तीर्थों में कथा कराते थे क्योंकि तीर्थों में किया हुआ सतकर्म हमें कई ज्यादा लाभ देता है। उन्होंने कहा कि हमने एक संत के मुख से सुना था जीव वो है जो समय के भाव में बहता हुआ चला जाता है और सतपुरूष वो है जो समय को अपने साथ चलने को विवश कर देता है। इसलिए सात दिनों के लिए सतपुरूष बन जाइए।


महाराज जी ने कहा कि आज के युवा पूछते हैं कि भगवान है तो दिखता क्यों नहीं है ? महाराज जी जवाब देते हुए कहा कि जब कमरे में अंधेरा होता है तो क्या आपको आपका हाथ दिखता है, इसका मतलब ये नहीं है की हाथ नहीं है, अगर है तो दिखता क्यों नहीं है ? जैसे अंधेरे में हाथ नजर नहीं आता है वैसे ही जीवन में जब तक पाप का अंधेरा मन में छाया रहेगा तब तक परमात्मा हमको दर्शन नहीं दे सकते, लेकिन वो है इसका अनुभव हो रहा है क्योंकि तुम जिंदा है। अंधेरे में चले जाओ तो खुद को नहीं देख पाते हैं, तो भगवान कहां से दिखेंगे। जब कमरे में लाइट जलेगी, उजाला होगा तब हाथ दिखेगा वैसे ही जब भीतर से ज्ञान का प्रकाश होगा, मन में ज्ञान जागृत हो जाएगा, जब अंधकार से प्रकाश की ओर चलेगो तो कह नहीं पाओगे की भगवान नहीं है। 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। .


।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

16May 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने "स्ट्रीट चिल्ड्रन स्कूल" के बच्चों को प्राचीन स्थल का भ्रमण कराया तथा उपहार वितरण किये।

आज विश्व शांति सेवा चैरीटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने "स्ट्रीट चिल्ड्रन स्कूल" के बच्चों को प्राचीन स्थल का भ्रमण कराया तथा उपहार वितरण किये। सड़क किनारे झौंपड़ियों में रहने वाले एवं अवधपुरी, गोपाल नगर में संचालित "स्ट्रीट स्कूल" में पढ़ने वाले बच्चों ने भी महोली मधुवन में वनभोज कर पिकनिक का आंनद लिया।

अधिकमास के प्रथम दिवस के पावन अवसर पर एक सैकड़ा से ज्यादा बच्चों के साथ पूज्य महाराजश्री ने महोली ग्राम स्थित प्राचीन ध्रुव मंदिर पहुँचे तथा दर्शन किये। यहाँ मंदिर महंत निन्नूबाबा ने महाराज जी का माल्यापर्ण कर स्वागत किया। महाराजश्री ने मंदिर प्रांगण में बच्चों को स्वयं भोजन परोसा तथा उनके साथ ही बैठकर वनभोज ग्रहण किया। इसके पश्चात ट्रस्ट की ओर से सभी बच्चों को वस्त्रादि उपहार भेंट किये गये।

इस अवसर पर पूज्य महाराज श्री ने कहा कि अधिकमास में परमात्मा ने मौका दिया है कि सेवा करके अपने आपको सही मायनों में मानव बना सके। मानवता जिंदा रहेगी तभी मानव जिन्दा रह पायेगा। बाल-गोपालों में भगवान बसता है। वसुधैव कुटम्बम का चिंतन भी यही कहता है कि हम सभी अमीर-गरीब, ऊँच-नीच, जाति-पाति से ऊपर उठकर एक दूसरे में बंधुभाव रखें।

विश्व शांति सेवा चैरीटेबल ट्रस्ट से श्री रवि रावत जी, श्री दिनेश तरकर जी, श्री चन्द्रप्रकाश शर्मा जी, मीडिया प्रभारी श्री जगदीश वर्मा जी, श्री महेन्द्र जी, श्री दिवाकर, श्री भारत सिंह जी, शरू योगेश कुमार जी आदि मौजूद रहे।

स्ट्रीट स्कूल संचालक श्री सतीश शर्मा जी, प्रधानाचार्य शशि सक्सैना जी, वन्दना जी, आरती जी, पुनीत जी, ज्योति जी आदि मौजूद रहें ।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

14May 2018

राधे राधे , कल शाम वृंदावन में पूज्य महाराज श्री ने ऐतिहासिक परशुराम शोभायात्रा का शुभारंभ कर सभी भक्त वृन्दों को बहुत - बहुत शुभकामनाएं दी।

राधे राधे , कल शाम वृंदावन में पूज्य महाराज श्री ने ऐतिहासिक परशुराम शोभायात्रा का शुभारंभ कर सभी भक्त वृन्दों को बहुत - बहुत शुभकामनाएं दी। भगवान श्री परशुराम जी की ऐतिहासिक शोभायात्रा वृन्दावन में हर वर्ष निकाली जाती हैं। राधे राधे।।

 

8May 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने सिंगापुर में दो दिवसीय श्री कृष्ण कथा का समापन कर भारत के लिए प्रस्थान किया।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने सिंगापुर में दो दिवसीय श्री कृष्ण कथा का समापन कर भारत के लिए प्रस्थान किया। महाराज श्री को विदाई देने एवं आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए भक्तगणन भी एयरपोर्ट पर मौजूद रहे। श्री कृष्ण कथा का सुंदर श्रवण करवाने के लिए महाराज श्री का सह्रदय धन्यवाद किया।

 

8May 2018

राधे राधे, कल रात्रि पूज्य महाराजश्री एवं विजय शर्मा जी ऑस्ट्रेलिया, फिजी,एवं सिंगापुर में लगभग डेढ़ महीने शान्ति संदेश देने के बाद भारत लौटे।

राधे राधे, कल रात्रि पूज्य महाराजश्री एवं विजय शर्मा जी ऑस्ट्रेलिया, फिजी,एवं सिंगापुर में लगभग डेढ़ महीने शान्ति संदेश देने के बाद भारत लौटे , एयरपोर्ट पर भारी संख्या में भक्तगण गुरु दर्शन के लिए लालाहित दिखे सभी भक्तों ने पूज्य महाराजश्री का माला पहनाकर स्वागत कर आशीर्वाद प्राप्त किया , पूज्य महाराजश्री ने सभी का हृदय से अभिवादन स्वीकार कर एयपोर्ट से मथुरा के लिए प्रस्थान किया। राधे राधे।।

6May 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 06 और 07 मई को श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर, 5 चंदर रोड़, सिंगापुर में आयोजित श्रीकृष्ण कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भगवान श्रीकृष्ण की लिलाओं को सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीकृष्ण कथा के प्रथम दिवस की शुरूआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। 

धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि व्यक्ति धर्म को बाद में देखता है जीवन को पहले देखता है, संसार की व्यवस्थाओं को पहले देखता है लेकिन मैं आपको बतादूं की जिसको आप टाल रहे हो वो टालने योग्य नहीं है। किसी से भी कहो आप सत्कर्म करो, भक्ति करो, कथा सुनो, आप अपने आप को पहचानो तो व्यक्ति कहता है अभी तो मेरे पास बहुत समय है, अभी तो मैं कुछ भी कर सकता हूं लेकिन ऐसा नहीं है। जैसे जैसे हमारी आयु बढ़ेगी, तो हमारे शरीर में रोग बढ़ना शुरू हो जाता है, इतना ही नहीं कफ, पित्त हमारे शरीर को तंग करने लग जाते हैं, इंद्रियां स्थिल होने लगती हैं धीरे धीरे और जब इंद्रियां स्थिल होती हैं, कफ पित्त आदि तंग करता है तो वो कंठ में आकर अटक जाता है और जब हम कोई नाम भी लेना चाहते हैं तो भगवान का नाम तो छोड़ दिजिए उससे अपना ही नाम उच्चारण नहीं हो पाता। भगवान का स्मरण हम कैसे करेंगे जहां हमारी सोचने की क्षमता कमजोर हो जाएगी, बोलने की शक्ति, सुनने के शक्ति कमजोर हो जाएगी।

महाराज जी ने कहा कि ऋषि मुनी जीवन भर तपस्या करते हैं ताकि अंत समय में मुंह से हरि का नाम निकल सके लेकिन नहीं निकलता है फिर हम तो भोगो में लिप्त रहने वाले, रोज इधर उधर के भोगों में जीवन व्यतित करने वाले, क्या हमारे मुंह से भगवान का नाम निकल पाएगा ? 

महाराज श्री ने कहा कि जब इंसान बड़ा हो जाता है तो अपने लोग उसे थोड़ा सा दिखाते हैं। जब आप बढ़े हो जाएं और लोग इधर उधर से आपकी बाते करें तो समझ लिजिएगा ठाकुर आपको समझा रहे हैं इतना तेज मत भागो, सावधान रहो। कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हे बडप्पन का कोई अहंकार नहीं होता, ऐसे लोग बहुत कम होते हैं। ऐसे लोग सागर की तरह होते हैं जिसमें कितनी भी नदियां मिल जाएं वो एक समान रहता है।

महाराज श्री ने कथा सुनाते हुए कहा कि कुंती का वो वाक्य याद किजिए जो कुंती ने श्रीकृष्ण से कहा था। जब धर्म राज का राज्यभिषेक हुआ। राजा धर्मराज बने और कुंती बन गई राजमाता। श्रीकृष्ण राजमाता के पास जाते हैं और कहते हैं हे राजमाता आपका कृष्ण आपको प्रणाम करता है। कुंती माता बोली हे जगदगुरू मैं तुमको प्रणाम करती हूं, आप उलटी गंगा मत चलाओ, पूरी दुनिया आपको प्रणाम करती है आप मुझको क्यों प्रणाम कर रहे हो ? श्रीकृष्ण बोले आप मेरी बुआ हो इसलिए प्रणाम कर रहा हूं। श्रीकृष्ण कुंती से कहते हैं की आप मुझसे कोई वरदान मांग लो। कुंती बोली अगर मुझे कुछ देना ही चाहते हो तो दुख दे दो, मुझे सुख नही चाहिए। आप जरा सोचिए हम भगवान से क्या मांगते ? हम भगवान से सुख मांगते हैं लेकिन क्या हम आजतक सुखी हुए, इसका मतलब आजतक भगवान ने सुख नहीं दिया। हमने भगवान से सुख मांगा ही नहीं बल्कि हमने भगवान से साधन मांगे और साधन क्या है सुख के ? किसी को लगा घर सुख है, किसी को लगा गाड़ी सुख है, किसी को फैमिली में, किसी को बैंक बैलेंस में सुख लगा। भगवान से जिसने जो मांगो उन्होंने उसको वो सब दिया लेकिन फिर भी ना सुखी तुम तब थे ना अब हो क्योंकि तुमने भगवान से सिर्फ साधन मांगे हैं। सुखी होने के लिए आपकी मनस्थिती मजबूत होनी चाहिए और आपके मन का कनेक्शन ठाकुर से होना चाहिए। जिस दिन ठाकुर से मन का कनेक्शन हो गया उस दिन आप सुखी हो जाओगे। कुंती द्वारिकाधीश के सामने खड़ी है जिसमें क्षमता है पूरी दुनिया को बदल दे, उनसे कुंती कहती है मुझे दुख दे दो क्यों ? कुंती जीवन में सुखी नहीं थी, ऐसे ऐसे कलंक लगे है उनपर, कुवारे में पुत्र हो गया कर्ण। और जब से शादी हुई है तब से पति ऐसा मिला जिसको श्राप मिला है कि स्त्री को स्पर्श नहीं कर सकता, अगर कर लिया तो उसी वक्त मर जाएगा। देव कृपा से पुत्र हो भी गए तो जन्म से उनको दुख झेलने पड़े, जिसकी पुत्रवधू को भरी सभा में निर्वस्त्र करने की कोशिश की गई हो क्या वो सुखी होगी ? इसके बावजूद भी कुंती कहती है हे कृष्ण मुझे दुख दे दो। कृष्ण बोले ये आप क्या मांग रही हो अभी तक तो आपने दुख ही सहे हैं तो अब क्यों दुख चाहिए। कुंती कहती है हे कृष्ण मुझे वो सुख नहीं चाहिए जिस सुख में तेरी याद ना हो, मुझे वो दुख चाहिए जिस दुख में तेरी याद आती हो। सुख जब आता है तो जीव को घमंडी बना देता है, सुख जब आता है तब जीव को तुमसे दूर कर देता है। श्रीकृष्ण बोले आपको दुख ही क्यों चाहिए ? तो कुंती बोली हे कृष्ण सुनो जब तक मेरे जीवन में दुख थे तो आप हर पल मेरे साथ थे, मुझे एक दुख बता दो जिसमें आप मेरे साथ नहीं थे, अब जिस दुख में मेरा कृष्ण मेरे साथ हो तो वो दुख कैसे हो सकता है वहीं तो सुख है।
मानव जीवन जिसे हम खुबसूरत जीवन कहते हैं वो कृष्ण के लिए ही तो है, अगर इस जीवन को खुबसूरत बनाए रखना है तो कृष्ण को अपना लो। जिसने ठाकुर को अपना लिया वो जीवन में कभी दुखी नहीं रह सकता।


।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा।।

6May 2018

विश्व शांति सेवा चैरीटेबल ट्रस्ट के सदस्यों ने निर्धन परिवारों में किया साड़ी वितरण।

मथुरा । विश्व शांति सेवा चैरीटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में नगर के विभिन्न स्थानों पर निर्धन महिलाओं को वस्त्र वितरण किये गये । पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुरजी महाराज के निर्देश पर संस्था पदाधिकारियों ने सड़क किनारे रहने वाले निर्धन परिवारों एवं जस्टिस फाॅर चिल्ड्रन स्ट्रीट स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के परिजनों को साड़ियाँ प्रदान की । संस्थान के सदस्यों ने अवधपुरी, ट्रान्सपोर्ट नगर, गोपाल नगर, महोली रोड  के अलावा भूतेश्वर स्टेशन के पास रहने वाली सैकड़ों निर्धन महिलाओं को साड़ियाँ बाँटीं गयीं । सड़क किनारे झोपड़ियों में रहने वाले परिवारों ने नये वस्त्र एवं उपहार प्राप्त कर खुशी जताई ।

विश्व शांति सेवा चैरीटेबल ट्रस्ट के आचार्य श्री श्यामसुन्दर शर्मा जी ने कहा कि निराश्रितों की सेवा ईश्वर सेवा के समान हैं । इस मौके पर कमल शर्मा, विष्णु शर्मा, जगदीश वर्मा, महेन्द्र ने सेवा कार्य में भाग लिया । स्ट्रीट स्कूल के सतीश शर्मा, प्रधानाचार्य शशी कुमारी एवं अन्य वालियन्टियर मौजूद रहे ।

4May 2018

फिजी में श्रीमद् भागवत कथा के समापन के बाद महाराज श्री ने सिंगापुर के लिए प्रस्थान किया।

फिजी में श्रीमद् भागवत कथा के समापन के बाद महाराज श्री ने सिंगापुर के लिए प्रस्थान किया। सिंगापुर में महाराज श्री के सानिध्य में 6 और 7 मई को श्रीकृष्ण कथा का भक्तों को श्रवण करवाया जाएगा।

3May 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 27 अप्रैल से 03 मई 2018 तक Shiv Mandir, Rewa St. Sambula, Suva, Fiji में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण और रुक्मणी जी के विवाह का सुन्दर वर्णन सभी भक्तों को सुनाया।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि गृहस्थ और सन्यासी जीवन दोनों की महानता अपनी अपनी जगह पर है। गृहस्थ वो है जो अपने द्वार पर आए हुए अतिथि का प्राण देकर भी उस धर्म का पालन करता है उस गृहस्थ का धर्म सर्वश्रेष्ठ धर्म है और वो अपनी जगह पर सर्वश्रेष्ठ है। दूसरा सन्यासी ऐसा हो पीछे कितनी भी सुंदर स्त्री हो और कितना भी खजाना क्यों ना हो लेकिन उसको दृढ़वत समझ कर, मिट्टी के समान समझ कर उसकी तरफ मुढ़कर नहीं देखना चाहिए। अगर सन्यास लेने के बाद भी हम किसी स्त्री के मोह में पड़ जाएं अथवा किसी संपत्ति के मोह में आ जाएं तो वो सन्यास आश्रम सर्वश्रेष्ठ आश्रम नहीं है।

महाराज जी ने कहा कि भगवान राम कहते हैं जो परोपकार करना चाहते हैं उनके लिए दुनिया में कोई भी चीज दुर्लभ नहीं है।

महाराज जी ने कहा कि आप इतिहास के पन्नों को पलट कर देखिए कठनाई हमेशा उन लोगों को हुई है जो सच्चाई के मार्ग पर चलते हैं। अच्छाई के मार्ग पर चलने वालों को कठनाई इसलिए हुई है क्योंकि बुरे वक्त में भी वो सच्चाई छोड़ते नहीं हैं, चाहे दुनिया उनका साथ छोड़ दे। बुरे वक्त में भी जो अच्छाई नहीं छोड़ते हैं उन्हें ही अच्छा व्यक्ति कहा जाता है।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम आगे बढाते हुए कहा कि रुकमणी जी ने श्रीकृष्ण से प्रेम विवाह किया। श्रीकृष्ण रुकमणी जी को हरण करके लेकर गए। रूकमणी जी के भाई रुकमी को भगवान बलराम ने परास्त किया। रुकमी ये प्रण लेकर आया था कि अगर मैं अपनी बहन को वापस नहीं लेकर आया तो वापस नहीं आऊंगा नगर में। तो उन्होंने उसी स्थान पर जहां वो परास्त हुए थे वहीं भोजकट नाम का नगर बसाया और वहीं ठाकुर जी का विवाह बड़ी धूमधाम से करवाया। भगवान ने 16 हजार 100 विवाह किए हैं लेकिन 8 विवाह अलग अलग हुए। ये 8 पटरानियां साधारण नहीं हैं लक्ष्मी जी बनी हैं रूकमणी, पार्वती जी आधे अंश से बनी हैं जामवंती और बाके आधे अंश से बनी हैं महामाया, तुलसी बनी हैं लक्ष्मणा, यमुना बनी हैं सूर्य की पूत्री कालिंदी, लज्जा बनी हैं भद्रा, गंगा बनी हैं मित्रव्रिंदा, सावित्री जी बनी हैं सत्या और पृथ्वी बनी हैं सत्यभामा। ये सांसारिक विवाह नहीं है ये पूरी प्रकृति के साथ ठाकुर जी ने विवाह किया है।
महाराज श्री ने आगे कहा कि पुराणों की कथा के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि को नरकासुर नाम के असुर का वध किया। नरकासुर ने 16 हज़ार 100 कन्याओं को बंदी बना रखा था। नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा की समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। इस कारण भगवान ने १६१०० रूप बनाकर सबके साथ एक मुहूर्त में एक साथ विवाह किया था। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने इतने विवाह किये। भगवान ने कामनावश विवाह नहीं किया था, करुणावश किया था। भगवान कहते हैं जिसको कोई नहीं अपनाता अगर वो मेरी शरण में आये तो मैं उसे अपना लेता हूँ।
भगवान श्री कृष्ण ने कामदेव पर विजय प्राप्त की है। उनके संकल्प मात्र से उनके पुत्रों की गिनती एक लाख इकसठ हजार अस्सी थी। भगवान श्री कृष्ण ने आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन किया। भगवान अपने मुकुट पर मोर पंख इसीलिए लगाते हैं क्योंकि मोर एकमात्र ऐसा प्राणी है जो सम्पूर्ण जीवन में ब्रह्मचर्य का पालन करता है। मोरनी का गर्भ भी मोर के आंसुओ को पीकर ही धारण होता है। इत: इतने पवित्र पक्षी के पंख भगवान खुद अपने सर पर सजाते है।
भगवान कृष्ण मित्र और शत्रु के लिए समान भावना रखते है इसके पीछे भी मोरपंख का उद्दारण देखकर हम यह कह सकते है। कृष्ण के भाई थे शेषनाग के अवतार बलराम और नागो के दुश्मन होते है मोर। अत: मोरपंख सर पर लगाके कृष्ण का यह सभी को सन्देश है की वो सबके लिए समभाव रखते है। मोरपंख में सभी रंग है गहरे भी और हलके भी। कृष्णा अपने भक्तो को ऐसे रंगों को देखकर यही सन्देश देते है जीवन ही इस तरह सभी रंगों से भरा हुआ है कभी चमकीले रंग तो कभी हलके रंग, कभी सुखी जीवन तो कभी दुखी जीवन।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा बढ़ाते हुए कहा कि श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंततः सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

2May 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 27 अप्रैल से 03 मई 2018 तक Shiv Mandir, Rewa St. Sambula, Suva, Fiji में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि भगवत कृपा के बगैर प्रभु की कथा सुनने का सौभाग्य हमें नहीं मिलता है और ना ही सत्संग मिलता है। सत्संग क्या करता है ? सत्संग हमे खरा सोना बना देता है, सत्संग हमे हमसे रूबरू करवाता है, सत्संग हमे मौका देता है की हम ये सोचे समझे की हमसे कहां गलती हो रही है। संसार में एक भी व्यक्ति नहीं है जिसमें कमियां ना हों, कोई कितना भी महान क्यों ना हो और आज के कलयुग के लोग तो भगवान में भी कमियां निकाल देते हैं। 


महाराज जी ने कहा कि जीवन में किसी की बुराई नहीं करनी चाहिए, दूसरों की बुराई करने के पाप भी आपको ही लगते हैं और आपके पुण्य उसको लग जाते हैं। ना तो बुराई करनी चाहिए और ना ही बुराई सुननी चाहिए क्योंकि सुनने की भी एक आदत है की आप कैसा सुनना चाहते हैं। जब आपको सुनने की आदत हो जाती है तो आप उसको सुने बगैर नहीं रह सकते। इस संसार में आपको ही निर्णय लेना है की आपको करना क्या है ? आपके जीवन का मालिक कोई ओर नहीं हो सकता। क्या देखना है ? क्या सुनना है ? क्या सोचना है ? यह आपकी अपनी पसंद है। 


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा।।

30Apr 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 27 अप्रैल से 03 मई 2018 तक Shiv Mandir, Rewa St. Sambula, Suva, Fiji में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि भगवान ने बड़ी कृपा की है हमे मानव जीवन दिया है। मानव जीवन देकर हम पर जो करूणा की है उस करूणा का मोल हम कभी चुका नहीं सकते। हमारी आस्था कभी भी किसी के शब्दों को सुनकर डगमगा जाती है जबकि एक बच्चे का विश्वास अपने मां बाप से डगमगाता नहीं है। लोग कहते हैं भगवान से मोहब्बत कैसे करें, विश्वास कैसे हो भगवान पर ? भगवान पर ऐसा विश्वास होना चाहिए जैसे एक अबोध बालक घने जंगल में अपने मां बाप के साथ जा रहा हो और सामने से सिंह आ जाए तो बच्चा सिर्फ और सिर्फ इतना जानता है की मेरी मां मुझको कुछ नहीं होने देगी। जैसे अवोध बच्चे को अपने मां बाप पर भरोसा होता है वैसा ही भरोसा अपने भगवान पर, अपने गुरू पर, संतो पर, वाणी पर होना चाहिए। 
महाराज जी ने कहा कि जीवन भर आप याद रखिए सुखों और दुखों की स्थिति जीवन में बनी रहेगी। सुख भी आएंगे और दुख भी, ना सुख स्थायी है ना दुख ये दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए मोती हैं। लेकिन सही मायनों में सुखी कौन है और दुखी कौन हो वो सोचने वाली बात है। सुखी वो है जो प्रभु का हो गया और दुखी वो है जो माया का हो गया। जब तक आप प्रभु के नहीं होंगे आप सुखी हो ही नहीं सकते। जब हम संसार के होते हैं हमें वेदों की, पुराणों की बात अच्छी नहीं लगती, गुरूजनों, संतो की बात पर अविश्वास होता है लेकिन कभी उसी अविश्वास से जीवन में दुख आता है। आप वेदों पर, पुराणों पर विश्वास किजिए, संतों, महात्माओं की वाणी पर विश्वास किजिए जीवन सुख से भर जाएगा। 


महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि पूज्य महाराज श्री ने कथा प्रारम्भ करते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक बौने के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बलि को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।
महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। महाबली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।

शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि महाबली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।
इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर महाबली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।
दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने भगवान ने सभी भक्तो के साथ श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

1May 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 27 अप्रैल से 03 मई 2018 तक Shiv Mandir, Rewa St. Sambula, Suva, Fiji में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि भगवान अपने अच्छे भक्तों की परीक्षा अवश्य लेते हैं लेकिन साथ कभी नहीं छोड़ते और भगवान बुरे लोगों को बहुत कुछ देते हैं बस साथ कभी नहीं देते।
महाराज जी ने कहा कि जब तक जीवन में मुसीबते ना आएं तब तक आप निखर नहीं सकते और मुसीबतें आपको निखारने के साथ साथ समझदार भी बनाती हैं, साथ ही यह दिखाती भी हैं कि कौन आपके साथ है और कौन नहीं। सच मानो तो सिर्फ कृष्ण तुम्हारा है। 
महाराज जी ने कहा कि जब तक सत्संग नहीं होता तब तक कल्याण नहीं होता है। पुतना भगवान के सामने आई लेकिन भगवान ने उसे देखा तक नहीं क्योंकि वो कपट रूप बनाकर आई थी। हम भगवान के समक्ष जब भी जाते हैं तो जैसे हैं वैसे नहीं जाते, दिखाने के लिए जाते हैं। कभी कभार तो भक्ति भी दूसरों को दिखाने के लिए करते हैं खुद के लिए तो भक्ति भी नहीं करते। 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि भगवान नारायण वासुदेव और देवकी के घर में प्रकट हुए और वहां से गोकुल पहुंचे मईयां यशोदा के घर। 85 वर्ष की उम्र में बाबा के घर में लल्ला हुआ तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। पूरा ब्रज मंडल में गीत गूंज उठे नंद के आनन्द भयो, जय कन्हैया लाल की। मेरे कन्हैया को दिखावा नहीं पसंद जैसे हो वैसे ही उसके सामने जाओ वो तुमको अपना लेगा। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, क्यूंकि पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतनाका वध कर उसका कल्याण किया।
महाराज जी ने एक कृष्ण को चाहने वाले व्यक्ति की कहानी सुनाते हुए बताया की किसी ने श्री कृष्ण से पूछा की हे कृष्ण तुम्हारा नाम टेढ़ा, खड़े होने का स्टाइल टेढ़ा, हमेशा झूट बोलता है उसके सारे काम टेढ़े क्या अच्छा है तुममे, तब श्री कृष्ण मुस्कुराते हुए उस व्यक्ति को एक खूंटी का उदहारण देते हुए कहाँ की ये लो इस सीधी खूंटी पर ये वस्त्र टांगो तो वह व्यक्ति जब वस्त्र टांगने गया तो वो वस्त्र गिर गए फिर श्री कृष्ण ने उस व्यक्ति को टेढी खूंटी पर वस्त्र टांगने के लिए दिए तो वस्त्र आसानी से टंग गए। तब श्री कृष्ण ने मुस्कुरात हुए उस व्यक्ति को उनकी बात का जवाब देते हुए कहते है की जब श्री राम जी त्रेता युग में आये थे तब लोग एक दम सीधे हुआ करते थे और आसानी से मान जाया करते थे। लेकिन में द्वापर युग के अंत में कलयुग के कल्याण के लिए आया हूँ और इनको तारने के लिए सीधा बनने से काम नहीं चलेगा इनको भवसागर से पार करने के लिए मुझे टेड़ा बनना पड़ेगा।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? 
यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्व ही पहचान लिया है।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

29Apr 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 27 अप्रैल से 03 मई 2018 तक Shiv Mandir, Rewa St. Sambula, Suva, Fiji में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। 
धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि रामायण में एक प्रमाण मिलता है कि इस संसार में ना तो कोई ज्ञानी है, ना ही मुर्ख है। जिस समय भगवान जिसको जैसा बना देते हैं वो व्यक्ति उसी समय वैसा हो जाता है। कई बार महाज्ञानी मुर्खता का काम करते हुए पकड़े जाएंगे और कई बार महामुर्ख भी ऐसी बड़ी बात बोल कर चले जाएंगे की हमारी समझ में नहीं आता की आखिर ये क्या है ? यह सब करने वाले ठाकुर जी हैं।


महाराज जी ने कहा कि मैं भी गृहस्थी हूं और आप सब भी गृहस्थी हैं लेकिन गृहस्थ जीवन में भी परमात्मा को याद रखना ही मानवता की जरूरत है। अगर सिर्फ गृहस्थ जीवन का पालन पोषण करने में हम लोग रह गए और जीवन उसमें निकाल दिया तो 84 लाख योनियों में एक ही योनी ऐसी है जो भगवान तक पहुंचा सकती है वो मानव है। 
महाराज जी ने कहा कि 84 लाख योनियों में भटकने के बाद, एक-एक पुण्य एकत्रित करने के बाद मानव जैसा जीवन मिलता है और इस मानव जीवन के पवित्र समय का सदुपयोग ईश्वर प्राप्ति के लिए लगाना चाहिए। भक्त लोग ईश्वर की प्राप्ति करते हैं और ज्ञानी हैं वो मोक्ष प्राप्ति के उद्देश्य में लग जाते हैं। जीवन भर क्या करना चाहिए ? जीवन भर भगवान को मनाने की कोशिश करनी चाहिए। 


देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल की कथा क्रम याद कराया की जिस वयक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये । अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे। भगवान को मनाने की कोशिश करते रहना चाहिए क्योंकि मानव जीवन द्वार है परमात्मा मिलन का, सतकर्म का और मोक्ष प्राप्ति का। जितना जतन अपने तन को सजाने में करते हो, उसका थोड़ा भी यदि मन को सजाने में लगा दो तो परिणाम देखना। तन की सुंदरता पर दुनिया मोहित होती है और मन की सुंदरता पर मोहन मोहित होते हैं। अपने अपमान करने वालों को भी सम्मान देने वाला ही सुंदर मन वाला होता है। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा की देवहुति ने कपिल मुनि से पूछा पुत्र मैनें सुना है की तुम साक्षात् भगवान के अवतार हो और मेरा ये सौभाग्य है की तुमने मेरे यहाँ जन्म लिया और मैनें तुम्हें अपना दूध पिलाया। कपिल जी महाराज ने कहा की माँ आपने सही सुना है। देवहुति बोली पुत्र मुझे कृपा कर बताइए की मानव जीवन का लक्ष्य क्या है। मानव जीवन मिल जाने के बाद जीव को जीवन भर क्या करना चाहिए। किस पर विश्वास करना चाहिए और किस पर विश्वास नहीं करना चाहिए। कपिल महाराज बोले माँ मानव जीवन मिलने के बाद जीव को जीवन पर्यन्त भगवान को मनाने की कोशिश करते रहना चाहिए। क्योंकि मानव जीवन द्वार है परमात्मा मिलन का ,सतकर्म का और मोक्ष प्राप्ति का। जानती हो माँ बच्चा जब माँ के गर्भ में होता है तो मास का एक लोथड़ा होता है धीरे धीरे उस में से अंग बनाना शुरू होता है। इस पर ऊपरी त्वचा नहीं होती और माँ जो भी खाती है वो सीधा बच्चे को जाकर चुभता है और जो बच्चे इस चुभन को नहीं सह पाते उनकी गर्भ में ही मृत्यु हो जाती है। माँ के गर्भ में बच्चे का स्थान मल- मूत्र के पास होता है। बच्चा इस पीड़ा को सह नहीं पाता वह चिल्लाता है भगवान मुझे बचाओ मुझे यहाँ से बाहर निकालो तब प्रभु कहते हैं की मैं तम्हे यहाँ से बहार निकाल दूँगा लेकिन तुम्हे एक वादा करना होगा की जन्म लेने के बाद तुम्हे अपने धर्म को आगे बढ़ना होगा। धर्म का प्रचार करना होगा। लेकिन बच्चा जन्म लेने के बाद प्रभु से किया हुआ वादा भूल जाता है और संसार की मोहमाया में लिप्त हो जाता है और फिर मृत्यु के बाद दुबारा उसी कष्ट से होकर गुजरना पड़ता है।
।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

28Apr 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 27 अप्रैल से 03 मई 2018 तक Shiv Mandir, Rewa St. Sambula, Suva, Fiji में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा का एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि जीवन में कोई ऐसा काम ना करें की आपकी वजह से आपके मां, बाप, गुरू के आंखों में आंसू आ जाएं या उनका दिल दुख जाएं। मां बाप ये ना सोचे की इसको पैदा करके हमने गलती की है क्या ? अगर तुम्हारी वजह से मां बाप के मन में यह आ गया तो इसका मतलब है तुम्हारा जीवन व्यर्थ है, तुम हो या ना हो कोई फर्क नहीं पड़ता। 


महाराज जी ने कहा कि कथा का चाहे एक ही क्रम क्यों ना हो लेकिन मानवता का दर्शन पूरा होना चाहिए। जैसे आप लोगों को अपने बच्चों की चिंता रहती है ठीक उसी तरह हमारे परम पिता परमात्मा को हम सब की चिंता रहती है। यह मत सोचना की आप अपनी फैमिली चला रहे हो जो यह सोचता है वह मुर्ख है, कोई आएगा कोई जाएगा दुनिया किसी के लिए रूकी नहीं है। 
महाराज जी ने कहा कि दुनिया में दो तरह की गंगा है एक भगवती गंगा है और एक ज्ञान गंगा है। भगवती गंगा गौमुख से गंगा सागर तक जाती है उसकी यात्रा वो है और एक है यह ज्ञान गंगा जो श्रीमद्भागवत है इसिलिए कहा जाता है श्रीमद्भागवत ज्ञान यज्ञ। भगवती गंगा उनहीं का कल्याण करेगी जिन जिन क्षेत्रों में होकर वो गई है या फिर उनका कल्याण करेगी जो उनके क्षेत्र में पहुंचते हैं। कहते हैं सिर्फ अस्थियां भी गंगा में बहा दी जाएं तो बेडा पार हो जाता है, जब तक अस्थियां गंगा में रहती हैं तब तक वह व्यक्ति प्रभु के धाम में वास करता है इतना बड़ा फल है। एक है ज्ञान गंगा इसका कोई दायरा नहीं है यह असिमित है, श्रीमद्भागवत गंगा ज्ञान यज्ञ यह गंगा तो ऐसी है जो इसमें डूबकी लगा लेता है उसकी सात दिनों में मुक्ति निश्चित है।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि कल का कथा क्रम में आपने भागवत का महात्यम जाना और आज की कथा प्रसंग में कलयुग की बात करेंगे। कलयुग के प्राणी का स्वभाव ही पाप कर्म में लिप्त रहना। कलयुग के लोगों में धर्म की प्रवृति बढ़ा कर उनका उद्धार करने की जिम्मेदारी श्री शुक जी को सौंपी गई और वह इसके लिए तैयार भी हो गए। भगवान की कथा वहीं कर सकता है जिसने भगवान का सानिध्य किया हो। श्री शुक जी महाराज जो राधा और कृष्ण के सम्मुख हमेशा रहे जिनको सानिध्य प्राप्त है उनको कहा कि आप जाओ और हमारी कथाओं का गायन करो। तो श्री शुक प्रभु की कथाओं का गायन करने के लिए कैलाश की ओर से आ रहे थे। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को
निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में राम नहीं, श्याम नहीं तो आराम नहीं।


श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज नेबताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुपगए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहरआने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी, उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।


महाराज श्री ने कहा कि हमको तो सदा ही अच्छे और बुरे का फर्क लेकर हीभगवान की भक्ति को करते रहना चाहिए। क्योँकि उसी के अनुसार ही हम अपने सभी कार्यों को कर सकते है। हमको तो सदैव ही अच्छे कार्य ही करने चाहिए और बुरे कार्यों से सदा के लिए ही दूर रहना चाहिए। तभी हमारा इस संसार में सही रूप से गुजारा हो सकता है। भगवान भी उन्ही का साथ देते है जो सदा अच्छे कर्मों में लिप्त रहते है। जो लोग सदा ही बुरे कार्य करते है उनसे तो भगवान सदा ही दूरी बनाये रखते है। तो आप सभी अच्छे कार्य करते रहो तो ठाकुर हमेशा ही तुमको अपना बनाये रखेंगे।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

29Apr 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज से फिजी के पूर्व प्रधानमंत्री श्री महेंद्र चौधरी जी मिलने आए।

आज फिजी में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज से फिजी के पूर्व प्रधानमंत्री श्री महेंद्र चौधरी जी मिलने आए और महाराज श्री को शॉल भेंट किया।

27Apr 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 27 अप्रैल से 03 मई 2018 तक Shiv Mandir, Rewa St. Sambula, Suva, Fiji में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरूआत कलश यात्रा, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि श्रीमद् भागवत कथा सुनने के दौरान भगवान में रम जाना चाहिए, संसार की कोई वस्तु नहीं मांगनी चाहिए। सातों दिन सुनना और भागवत से वस्तु कुछ मत मांगना, जब कुछ नहीं मांगोगे तो दावा है ठाकुर के धाम में आपका स्थान पक्का हो जाएगा। भागवत इतना बड़ा फल देती है।

महाराज जी ने कहा कि प्रभु से अपने जीवन के लिए कुछ मांगो तो ये मांगो की हे मेरे प्रभु मुझे ऐसा जीवन मत देना की मुझे किसी की सेवा की जरूरत पड़े, जीवन देना है तो ऐसा देना की जब तक मैं जिंदा रहूं मानवता की और धर्म की सेवा करता रहूं। आजकल लोग नासमझ होते जा रहे हैं, समाज सेवा, धर्म सेवा, मानवता की सेवा को वो लोग व्यक्तिगत सेवा समझ लेते हैं। सेवा मेरी हो ये आवश्यक नहीं है लेकिन मैं जीवनभर सेवा करता रहूं ये जरूर ईश्वर से मांगे।

महाराज जी ने कहा कि जीवन में किसी भी परिस्थिती में नकारात्मक नहीं होना चाहिए, हमेशा सकारात्मक सोच रखनी चाहिए। अगर नकारात्मक सोचोगे तो नकारात्मक चीजे ही होंगी और सकारात्मक सोचोगे तो सकारात्मक चीजें होंगी। कभी कभी जीवन में बुरा वक्त भी अच्छा होता है, ये बुरा वक्त ही आपको बताता है की आपके अपने कौन हैं ? अच्छे वक्त में तो सब आपके बन जाते हैं लेकिन जब वक्त आपके विरूद्ध हो तब सही मायने में आपको पता चलता है आपके अपने कौन हैं ? इसलिए बुरे वक्त का शुक्रिया अदा करना।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि भागवत का महात्यम क्या है ? एक बार नेमिषासरणय में 88 हजार सनकादिक ऋषि विराजमान थे और सभी ऋषियों के बीच में मंथन चल रहा था की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? शूद जी महाराज जब पधारे तो उन्हे दिव्य आसन दिया गया और उनसे कुछ प्रशन किए गए। ऋषियों के प्रशन का उत्तर देते हुए शूद जी महाराज कहते हैं सनाकदिक मुनियों से कहा हे ऋषियों तुम धन्य हो जो तुमने जन कल्याण के लिए प्रशन किया है। शूद जी महाराज ने कहा जीन लोगों को कल काल में अपना कल्याण करना हो उन लोगों को श्रीमद् भागवत कथा सुननी चाहिए। जिन लोगों को बार बार जन्म नहीं लेना, बार बार मरना नहीं है, जिन्हें मोक्ष चाहिए उन्हें भागवत कथा सुननी चाहिए। ऋषियों ने कहा कि हे प्रभु ये भागवत सुनने से क्या किसी का कल्याण हुआ है इसका महात्यम क्या है ? शूद जी महाराज ने कथा का महात्यम सुनाते हुए कहा कि एक आत्म देव नाम के ब्राह्मण थे, भगवत भजन करते थे गाने वाले, वेद पाठी ब्राह्मण थे, उनकी पत्नी का नाम धूंधली था जो उनकी उलट थी, पति की बात नहीं मानती थी। वो बहुत दुखी थे बच्चे भी नहीं थे, गाय लाते थे तो दूध नहीं देती थी, वृक्ष लगाता हूं तो फल नहीं देता, कुछ भी काम बनने से पहले बिगड़ जाता था, अपने दुखों को देखकर उन्हे आत्मदाह का विचार आया। जब वह आत्मदाह के लिए जाने लगे तो एक ब्राह्मण वहां से गुजरे उन्होंने आत्मदेव की पूछा की तुम्हारे दुखों का कारण क्या है, तो उन्होंने कहा कि मेरा कोई पुत्र नहीं है इसलिए मैं दुखी हूं, मेरा कुछ भी काम नहीं बनता है, मैं रोज भगवान की पूजा पाठ करता हूं फिर भी मुझे इतना दुख दे रहे है, मुझसे अब यह सब बर्दाशत नहीं होता है। संत बोले चलो मैं तुम्हे बताता हूं, संत ने आत्मदेव का हाथ देखा तो पता चला कि उनके सात आगे और सात पीछे जन्म तक कोई संतान नहीं है। तो संत ने बात को घूमाते हुए पूछा की बताओ तुमहे संतान क्यों चाहिए। आत्मदेव बोले इसकी तीन वजह हैं पहली वो मेरा वंश बढ़ाएगा, दूसरा बुढ़ापे में मेरी सेवा करेगा और तीसरा मेरे बुढ़ापे का सहारा बनेगा। आत्मदेव की बाते सुनकर संत ने दया करते हुए उन्हें फल दिया और कहा की ये अपनी पत्नी को खिला देना, आत्मदेव वो फल लेकर आए और अपनी पत्नी को कहा कि ये फल खा लेना लेकिन तभी उनकी बहन आ गई ओर उसने बोल की ये फल मत खाना पता नहीं संत ने इसमें कुछ मिला दिया हो तो, तू इस फल को गाय को खिला दे इसकी भी तो संतान नहीं हो रही है और मैं गर्भ से हूं जो भी संतान होगी मैं तुझे लाकर दे दूंगी तू अपने पति को कह देना यही हूई है। आत्मदेव की पत्नी गर्भवती होने का नाटक करने लगी और उन्हें तीर्थ पर भेज दिया। जब उसकी बहन का पुत्र हुआ तो उसका नाम रख दिया धूंधकारी और गाय को जो फल खिलाया था उससे भी एक पुत्र हुआ लेकिन उसके कान गऊ जैसे थे तो उसका नाम रखा गऊकर्ण। संत के दिए फल का असर है की गऊकर्ण संस्कारी हुआ और धूंधकारी महाखल हुआ। धूंधकारी की दुष्टता देखकर आत्मदेव रोने लगे ओर कहने लगे की इससे तो मैं पहले ही अच्छा था जो मेरे घर में पुत्र नहीं था। धूंधकारी दिन प्रतिदिन बिगड़ता चला गया, वेश्यावृति करने लगा, मदिरापान करने लगा, अपनी मां को पीटने लगा। जब धूंधली को पीटा तो उसे लगा की जो मैने अपने पति की बात नहीं मानी ये उसका दुष्परिणाम है, अगर मैने अपने पति की बात मान ली होती तो ये दिन नहीं देखना पड़ता, मेरा पुत्र गऊकर्ण होता धूंधकारी नहीं होता, ये सोचकर उन्होंने भी कुएं में कूदकर खुदकुशी कर ली। गऊकर्ण भी तीर्थ पर निकल पड़े। धूंधकारी ने देखा की अब तो कोई भी नहीं है तो वो ओर बिगड़ गया उसने 4-5 गर्णिकाओं को अपने साथ रख लिया लेकिन ऐसे बुरे लोगों से तो बुरे लोग भी दुखी हो जाते हैं तो एक दिन उन्होंने धूंधकारी को चारपाई से बांध दिया और जलती हुई लकड़ी लेकर उसे पीटने लगी। वो चीखने लगा उसकी चीखे सब ने सुनी लेकिन बचाने कोई नहीं गया। पीटने से वो मर गया और प्रेत बन गया। जब गऊकर्ण को पता चला की मेरा भाई प्रेत बन गया है तो उन्होंने सूर्यनारायण से पूछा के मैं अपने भाई के कल्याण के लिए क्या करू तो सूर्य नारायण भगवान ने कहा कि श्रीमद् भागवत कथा उन्हें सुनाओ। तो जब भागवत कथा शुरू होने वाली थी तो धूंधकारी का प्रेत एक बांस में आकर बैठ गया, तो सांतवे दिन उस बांस के दो भाग हो गए और आकाश से धूंधकारी को लेने के लिए आकाश के विमान आया, जब देवदूत धूंधकारी को ले जाने लगे तो गऊकर्ण ने पूछा कि कथा तो हम सब ने सूनी है तो तुम एक को ही क्यों ले जा रहे हो, जब कथा सब ने एक समान सुनी है तो फल भी तो एक समान मिलना चाहिए सभी को। तो देवदूतों ने कहा कि कथा तो सबने सुनी है लेकिन श्रवण भेद है। कोई जिसने जिस इच्छा को लेकर कथा सुनी है उसकी वहीं इच्छा पूरी हुई है। धूंधकारी ने भागवत मुक्ति के लिए सुनी है इसलिए इसकी मुक्ति हुई है। धन्य है ये भागवत ग्रंथ जिसको सुनकर प्रेत का भी कल्याण हो गया।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

26Apr 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 20 अप्रैल से 26 अप्रैल 2018 तक FIJI SEVASHRAM SANGHA 10 NASOKI STREET, LAUTOKA, FIJI में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण और रुक्मणी जी के विवाह का सुन्दर वर्णन सभी भक्तों को सुनाया।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम आगे बढाते हुए कहा कि रुकमणी जी ने श्रीकृष्ण से प्रेम विवाह किया। श्रीकृष्ण रुकमणी जी को हरण करके लेकर गए। रूकमणी जी के भाई रुकमी को भगवान बलराम ने परास्त किया। रुकमी ये प्रण लेकर आया था कि अगर मैं अपनी बहन को वापस नहीं लेकर आया तो वापस नहीं आऊंगा नगर में। तो उन्होंने उसी स्थान पर जहां वो परास्त हुए थे वहीं भोजकट नाम का नगर बसाया और वहीं ठाकुर जी का विवाह बड़ी धूमधाम से करवाया। भगवान ने 16 हजार 100 विवाह किए हैं लेकिन 8 विवाह अलग अलग हुए। ये 8 पटरानियां साधारण नहीं हैं लक्ष्मी जी बनी हैं रूकमणी, पार्वती जी आधे अंश से बनी हैं जामवंती और बाके आधे अंश से बनी हैं महामाया, तुलसी बनी हैं लक्ष्मणा, यमुना बनी हैं सूर्य की पूत्री कालिंदी, लज्जा बनी हैं भद्रा, गंगा बनी हैं मित्रव्रिंदा, सावित्री जी बनी हैं सत्या और पृथ्वी बनी हैं सत्यभामा। ये सांसारिक विवाह नहीं है ये पूरी प्रकृति के साथ ठाकुर जी ने विवाह किया है।
महाराज श्री ने आगे कहा कि पुराणों की कथा के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि को नरकासुर नाम के असुर का वध किया। नरकासुर ने 16 हज़ार 100 कन्याओं को बंदी बना रखा था। नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा की समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। इस कारण भगवान ने १६१०० रूप बनाकर सबके साथ एक मुहूर्त में एक साथ विवाह किया था। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने इतने विवाह किये। भगवान ने कामनावश विवाह नहीं किया था, करुणावश किया था। भगवान कहते हैं जिसको कोई नहीं अपनाता अगर वो मेरी शरण में आये तो मैं उसे अपना लेता हूँ।
भगवान श्री कृष्ण ने कामदेव पर विजय प्राप्त की है। उनके संकल्प मात्र से उनके पुत्रों की गिनती एक लाख इकसठ हजार अस्सी थी। भगवान श्री कृष्ण ने आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन किया। भगवान अपने मुकुट पर मोर पंख इसीलिए लगाते हैं क्योंकि मोर एकमात्र ऐसा प्राणी है जो सम्पूर्ण जीवन में ब्रह्मचर्य का पालन करता है। मोरनी का गर्भ भी मोर के आंसुओ को पीकर ही धारण होता है। इत: इतने पवित्र पक्षी के पंख भगवान खुद अपने सर पर सजाते है।
भगवान कृष्ण मित्र और शत्रु के लिए समान भावना रखते है इसके पीछे भी मोरपंख का उद्दारण देखकर हम यह कह सकते है। कृष्ण के भाई थे शेषनाग के अवतार बलराम और नागो के दुश्मन होते है मोर। अत: मोरपंख सर पर लगाके कृष्ण का यह सभी को सन्देश है की वो सबके लिए समभाव रखते है। मोरपंख में सभी रंग है गहरे भी और हलके भी। कृष्णा अपने भक्तो को ऐसे रंगों को देखकर यही सन्देश देते है जीवन ही इस तरह सभी रंगों से भरा हुआ है कभी चमकीले रंग तो कभी हलके रंग, कभी सुखी जीवन तो कभी दुखी जीवन।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा बढ़ाते हुए कहा कि श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंततः सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

25Apr 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 20 अप्रैल से 26 अप्रैल 2018 तक FIJI SEVASHRAM SANGHA 10 NASOKI STREET, LAUTOKA, FIJI में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि श्रीकृष्ण के रहस्य को समझना बिल्कुल भी आसान नहीं है। जिस ब्रह्म को मैं पुराणों वेदों में ढूंढता हूं मुझे मिलता नहीं, कोई कहता है वो निर्गुण है, कोई कहता है वो निराकार है, कोई कहता है सगुण है, कोई कहता है साकार है। निर्गुण वाले कहते हैं भगवान की पूजा नहीं करनी चाहिए । सगुण, साकार वाले कहते हैं जब पूजा ही नहीं करनी है तो फिर हमारा शरीर भी तो सगुण है। जिसमें हम यह कहे की उसमें कोई गुण नहीं है, लेकिन कोई गुण नहीं है कहना भी तो एक गुण है तो फिर वो निर्गुण कैसे हो गया। कृष्ण के रहस्य को अगर ज्ञानी बनकर समझना चाहोगे तो कभी नहीं समझ पाओगे और प्रेमी बनकर जब समझना चाहोगे तो देर नहीं लगेगी कृष्ण को समझने में। कृष्ण को वहीं जान पाते हैं जिन्हें कृष्ण जनाना चाहते हैं, जिन्हे भगवान नहीं जनाना चाहते वो कभी नहीं जान पाते हैं। 


महाराज जी ने कहा कि गाय में 33 करोड़ देवी देवताओं का वास होता है। गौ माता की सेवा किजिए, गौ सेवा से हरि कन्हैया प्रसन्न होते हैं। आज कल घरों में गाय की जगह कुत्तों की सेवा होने लगी है। पहले पहली रोटी गाय के लिए निकाली जाती थी लेकिन आजकल कुत्तों के लिए निकाली जाती है। 


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा।।

23Apr 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 20 अप्रैल से 26 अप्रैल 2018 तक FIJI SEVASHRAM SANGHA 10 NASOKI STREET, LAUTOKA, FIJI में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि भगवान को ऐसे समर्पित भक्त बहुत अच्छे लगते हैं तो भगवान के चरणों में न्यौछावर हो जाएं। ऐसे भक्तों को भगवान अपने गले से लगा कर रखते हैं, अपने आप से एक क्षण के लिए भी अलग नहीं करते हैं। 


महाराज जी ने कहा कि एकादशी का व्रत नारायण की प्रसन्नता के लिए रखा जाता है। जो साल में एकादशी के 24 व्रत रखते हैं उन्हें सारे व्रतों का फल मिल जाता है। प्रभु राम जी को भी एकादशी का व्रत बहुत प्रिय है। आप सब से आग्रह है कि अगर सच में ईश्वर से मिलना चाहते हो तो नारायण के लिए एकादशी का व्रत शुरू कर दिजिए। शास्त्रों में कहा गया है कि एकादशी के व्रत के दिन अन्न नहीं खाना चाहिए और ना ही खिलाना चाहिए, खास तौर पर चावलों का इस्तेमाल ना करें। 


महाराज जी ने कहा कि याद रखे ब्राह्मणों को, संतों को, अतिथियों को जब भी आमंत्रित करें सबसे पहले उन्हें भोजन कराएं उसके बाद भोजन करना चाहिए। 
महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि पूज्य महाराज श्री ने कथा प्रारम्भ करते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक बौने के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बलि को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।
महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। महाबली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।


शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि महाबली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।
इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर महाबली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।


महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"


जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।


दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने भगवान ने सभी भक्तो के साथ श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

24Apr 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 20 अप्रैल से 26 अप्रैल 2018 तक FIJI SEVASHRAM SANGHA 10 NASOKI STREET, LAUTOKA, FIJI में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि भगवान ने रामायण में कहा है कि मोहे कपट छल छिद्र ना भावा, मुझे कपट अच्छा नहीं लगता है, लेकिन आज का व्यक्ति भक्ति भी करता है तो कपट के साथ करता है। भक्ति तो करते है चाहे डर की वजह से करे, भाव की वजह से करे लेकिन दिल में जो चीजे चाहिए वो नहीं होती। मांगने की बारी आती है तो भगवान से मांगते है, जब देने की बारी आती है तो बहुत कम दिख पाते हैं।


महाराज जी ने कहा कि अपना समय प्रभु की भक्ति में लगाइए क्योंकि संसार को दिया हुआ समय, संसार को दिया हुआ धन यह आपके साथ नहीं जाएगा लेकिन भगवान को दिया हुआ समय, धन यही आपका है जो आपके साथ जाएगा। भागवत कथा में जो आप समय बिता रहे हैं इस समय कि कीमत है जो आपको वहां जाकर मिलेगी।
महाराज जी ने कहा कि मानवता के प्रति हम सबको संवेदनशील होना चाहिए। सबके मन में मानवता के लिए दया रहनी चाहिए। मानवता होगी तभी हम मानव बन पाएंगे, वरना मानव से दैत्य बनने में कितनी देर लगती है। किसी पर दया करना, किसी पर उपकार करना, किसी का बुरा ना करना यही मानवता है। 


देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि भगवान नारायण वासुदेव और देवकी के घर में प्रकट हुए और वहां से गोकुल पहुंचे मईयां यशोदा के घर। 85 वर्ष की उम्र में बाबा के घर में लल्ला हुआ तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। पूरा ब्रज मंडल में गीत गूंज उठे नंद के आनन्द भयो, जय कन्हैया लाल की। मेरे कन्हैया को दिखावा नहीं पसंद जैसे हो वैसे ही उसके सामने जाओ वो तुमको अपना लेगा। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, क्यूंकि पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतनाका वध कर उसका कल्याण किया।


महाराज जी ने एक कृष्ण को चाहने वाले व्यक्ति की कहानी सुनाते हुए बताया की किसी ने श्री कृष्ण से पूछा की हे कृष्ण तुम्हारा नाम टेढ़ा, खड़े होने का स्टाइल टेढ़ा, हमेशा झूट बोलता है उसके सारे काम टेढ़े क्या अच्छा है तुममे, तब श्री कृष्ण मुस्कुराते हुए उस व्यक्ति को एक खूंटी का उदहारण देते हुए कहाँ की ये लो इस सीधी खूंटी पर ये वस्त्र टांगो तो वह व्यक्ति जब वस्त्र टांगने गया तो वो वस्त्र गिर गए फिर श्री कृष्ण ने उस व्यक्ति को टेढी खूंटी पर वस्त्र टांगने के लिए दिए तो वस्त्र आसानी से टंग गए। तब श्री कृष्ण ने मुस्कुरात हुए उस व्यक्ति को उनकी बात का जवाब देते हुए कहते है की जब श्री राम जी त्रेता युग में आये थे तब लोग एक दम सीधे हुआ करते थे और आसानी से मान जाया करते थे। लेकिन में द्वापर युग के अंत में कलयुग के कल्याण के लिए आया हूँ और इनको तारने के लिए सीधा बनने से काम नहीं चलेगा इनको भवसागर से पार करने के लिए मुझे टेड़ा बनना पड़ेगा।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? 
यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्व ही पहचान लिया है।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

22Apr 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 20 अप्रैल से 26 अप्रैल 2018 तक FIJI SEVASHRAM SANGHA 10 NASOKI STREET, LAUTOKA, FIJI में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि मानव जीवन का उद्देश्य सिर्फ बच्चे पालना ही नहीं है, शरीर का देखभाल करना ही नहीं है, बल्कि मानव जीवन का उद्देश्य है “पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी जठरे शयनम्” बार बार चौरासी लाख योनियों में भटकना ना पड़े, उससे मुक्ति पाकर यहां से निकलना है और जो अच्छे कर्म करते हैं, जो बार बार जन्म ना लेना पड़े ऐसे प्रयास करते हैं वही लोग मानव जीवन का सदुपयोग कर पाते हैं।

महाराज जी ने कहा कि जो भी बचपन में भजन करता है उसे अमृत के समान फल मिलता है, जो जवानी में भजन करता है उसे फल मिलता है घी, दूध के समान और जो बुढ़ापे में भजन करता है उसे फल मिलता है पानी के समान इसलिए भजन बचपन से ही करना चाहिए। हमारे समाज का दुर्भाग्य है की आजकल हम बच्चों को अच्छा इंसान नहीं बनाना चाहते बल्कि पैसे कमाने की मशीन बनाना चाहते हैं।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल की कथा क्रम याद कराया की जिस वयक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये । अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे। भगवान को मनाने की कोशिश करते रहना चाहिए क्योंकि मानव जीवन द्वार है परमात्मा मिलन का, सतकर्म का और मोक्ष प्राप्ति का। जितना जतन अपने तन को सजाने में करते हो, उसका थोड़ा भी यदि मन को सजाने में लगा दो तो परिणाम देखना। तन की सुंदरता पर दुनिया मोहित होती है और मन की सुंदरता पर मोहन मोहित होते हैं। अपने अपमान करने वालों को भी सम्मान देने वाला ही सुंदर मन वाला होता है। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा की देवहुति ने कपिल मुनि से पूछा पुत्र मैनें सुना है की तुम साक्षात् भगवान के अवतार हो और मेरा ये सौभाग्य है की तुमने मेरे यहाँ जन्म लिया और मैनें तुम्हें अपना दूध पिलाया। कपिल जी महाराज ने कहा की माँ आपने सही सुना है। देवहुति बोली पुत्र मुझे कृपा कर बताइए की मानव जीवन का लक्ष्य क्या है। मानव जीवन मिल जाने के बाद जीव को जीवन भर क्या करना चाहिए। किस पर विश्वास करना चाहिए और किस पर विश्वास नहीं करना चाहिए।

कपिल महाराज बोले माँ मानव जीवन मिलने के बाद जीव को जीवन पर्यन्त भगवान को मनाने की कोशिश करते रहना चाहिए। क्योंकि मानव जीवन द्वार है परमात्मा मिलन का ,सतकर्म का और मोक्ष प्राप्ति का। जानती हो माँ बच्चा जब माँ के गर्भ में होता है तो मास का एक लोथड़ा होता है धीरे धीरे उस में से अंग बनाना शुरू होता है। इस पर ऊपरी त्वचा नहीं होती और माँ जो भी खाती है वो सीधा बच्चे को जाकर चुभता है और जो बच्चे इस चुभन को नहीं सह पाते उनकी गर्भ में ही मृत्यु हो जाती है। माँ के गर्भ में बच्चे का स्थान मल- मूत्र के पास होता है। बच्चा इस पीड़ा को सह नहीं पाता वह चिल्लाता है भगवान मुझे बचाओ मुझे यहाँ से बाहर निकालो तब प्रभु कहते हैं की मैं तम्हे यहाँ से बहार निकाल दूँगा लेकिन तुम्हे एक वादा करना होगा की जन्म लेने के बाद तुम्हे अपने धर्म को आगे बढ़ना होगा। धर्म का प्रचार करना होगा। लेकिन बच्चा जन्म लेने के बाद प्रभु से किया हुआ वादा भूल जाता है और संसार की मोहमाया में लिप्त हो जाता है और फिर मृत्यु के बाद दुबारा उसी कष्ट से होकर गुजरना पड़ता है।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

21Apr 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 20 अप्रैल से 26 अप्रैल 2018 तक FIJI SEVASHRAM SANGHA 10 NASOKI STREET, LAUTOKA, FIJI में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा का एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि जो लोग भगवान का नाम जपते हैं उनकी शरणागति स्वीकार कर लेते हैं उनको फिर माया नहीं सताती। माया में इतनी प्रबलता होती है कि हम भजन भी कर रहे होते हैं तो माया ही घूमती रहती है किस ने मेरे बारे में क्या कहा था ? मेरा नुकसान किस ने कर दिया ? कौन मेरा भला कर रहा है ? ये माया ही है जो हमें भगवान से दूर करती है।


महाराज जी ने कहा कि जब हमें तकलीफ होती है तब भगवान के चरणों में ज्यादा मन लगता है, जब विषम परिस्थितियां हो, तकलीफ चारों तरफ से घेर ले तो मन ज्यादा भक्तिमय हो जाता है। फिर कहते हैं प्रभु तू ही तू है, अब आपके अलावा हमारा कोई नहीं तब भगवान आकर आपको तकलीफों से बचाते हैं। 
महाराज जी ने कहा कि अच्छे काम करने के लिए जब तक आप दूसरों को मनाना चाहोगे आप कभी अच्छा काम कर नहीं सकोगे। बुरा काम करने के लिए किसी से नहीं पूछते, जुआ खेलने, मदिरा पीने के लिए किसी से नहीं पूछते लेकिन अच्छा काम करने के लिए कहते हो पूछ कर बताता हूं। इसलिए अच्छे काम करने के लिए किसी से मत पूछो और बुरे काम के लिए हो सके तो अच्छे शुभचिंतक से पूछ लो, हो सकता है वो आपको रोक ले और आप बच जाओ बुरे काम करने से। 


महाराज जी ने कहा कि आज हमारी भक्ति में शुद्धता नहीं है वो इसलिए क्योंकि हमारे हाथों से सेवा छिन गई है। अब हम सेवा नहीं करते, अब इच्छा होती है कि लोग हमारी सेवा करें और जब तक जीव छोटी से छोटी सेवा नहीं करेगा तब तक अहंकार समाप्त नहीं होगा और जब तक अहंकार समाप्त नहीं होगा तब तक आप भगवान के भक्त नहीं हो सकते। अहंकार करना है तो एक बात का करो कि मैं गोविंद का हूं और गोविंद मेरा। 


देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि कल का कथा क्रम में आपने भागवत का महात्यम जाना और आज की कथा प्रसंग में कलयुग की बात करेंगे। कलयुग के प्राणी का स्वभाव ही पाप कर्म में लिप्त रहना। कलयुग के लोगों में धर्म की प्रवृति बढ़ा कर उनका उद्धार करने की जिम्मेदारी श्री शुक जी को सौंपी गई और वह इसके लिए तैयार भी हो गए। भगवान की कथा वहीं कर सकता है जिसने भगवान का सानिध्य किया हो। श्री शुक जी महाराज जो राधा और कृष्ण के सम्मुख हमेशा रहे जिनको सानिध्य प्राप्त है उनको कहा कि आप जाओ और हमारी कथाओं का गायन करो। तो श्री शुक प्रभु की कथाओं का गायन करने के लिए कैलाश की ओर से आ रहे थे। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को
निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में राम नहीं, श्याम नहीं तो आराम नहीं।


श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज नेबताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुपगए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के
ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहरआने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी, उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
महाराज श्री ने कहा कि हमको तो सदा ही अच्छे और बुरे का फर्क लेकर हीभगवान की भक्ति को करते रहना चाहिए। क्योँकि उसी के अनुसार ही हम अपने सभी कार्यों को कर सकते है। हमको तो सदैव ही अच्छे कार्य ही करने चाहिए और बुरे कार्यों से सदा के लिए ही दूर रहना चाहिए। तभी हमारा इस संसार में सही रूप से गुजारा हो सकता है। भगवान भी उन्ही का साथ देते है जो सदा अच्छे कर्मों में लिप्त रहते है। जो लोग सदा ही बुरे कार्य करते है उनसे तो भगवान सदा ही दूरी बनाये रखते है। तो आप सभी अच्छे कार्य करते रहो तो ठाकुर हमेशा ही तुमको अपना बनाये रखेंगे।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

20Apr 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 20 अप्रैल से 26 अप्रैल 2018 तक FIJI SEVASHRAM SANGHA 10 NASOKI STREET, LAUTOKA, FIJI में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि जो भी श्रद्धालु ऐसा मन बना लेते हैं कि काश हमें भी भगवान की कथा सामने बैठ कर सुनने को मिल जाए, वो इतने मन से मांगते हैं कि भगवान उनकी भावना को मानने के भागवत कथा वहां पर आयोजित होती है और उस भागवत कथा को श्रवण करने मात्र से मनुष्य का सहज रूप में ही कल्याण हो जाता है। 
महाराज जी ने कहा की हर चीज का एक फल होता है, नौकरी करेंगे तो सेलरी मिलेगी ये उसका फल है, सेलरी मिलेगी तो घर के साधन आएंगे ये उसका फल है, भजन करेंगे तो मन को शांति मिलती है ये उसका फल है, सत्संग का फल है की वहां आओगे तो लोक और परलोक दोनों सुधर जाएंगे। भागवत सुनने का विशेष फल है कि जिसको हम हजारों हजारों वर्ष तपस्या करने के बाद भी प्राप्त नहीं कर सके वो मुक्ति, मोक्ष महज सात दिन भागवत कथा सुनने से प्राप्त हो जाती है।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि नेमिषासरणय में 88 हजार सनकादिक ऋषि विराजमान हैं और सभी ऋषियों के बीच में एक ही बात पर विचार हो रहा है की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? जितने भी ग्रंथ हुए है, पुराण हुए हैं सभी में एक ही बात की चर्चा हुई है, कलयुग के लोगों की चर्चा हुई है। क्योंकि वो जानते हैं की कलयुग के लोग ही ऐसे है जो कहते हैं हमे भगवान पर, धर्म पर विश्वास नहीं है। कलयुग का व्यक्ति स्वाभाविक तौर पर पापी होता है तो ऋषियों ने कहा महाराज कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा, इनके पास समय का अभाव है। इसके अलावा ओर प्रशन किए कि भगवान अगर सर्वसामर्थयवान है तो उसे अवतार लेने की क्या जरुरत है ? एक ओर प्रशन है कि भगवान के अवतार हुए तो कितने हुए ? एक ओर प्रशन है कि भगवान श्रीकृष्ण जब पृथ्वी छोड़ कर गए तो धर्म किसकी शरण में गया ?

महाराज श्री ने कथा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि शूद जी महाराज कहते हैं सनाकदिक मुनियों से कहा हे ऋषियों तुम धन्य हो जो तुमने जन कल्याण के लिए प्रशन किया है। शूद जी महाराज ने कहा जीन लोगों को कल काल में अपना कल्याण करना हो उन लोगों को श्रीमद् भागवत कथा सुननी चाहिए। जिन लोगों को बार बार जन्म नहीं लेना, बार बार मरना नहीं है, जिन्हें मोक्ष चाहिए उन्हें भागवत कथा सुननी चाहिए। ऋषियों ने कहा कि हे प्रभु ये भागवत सुनने से क्या किसी का कल्याण हुआ है इसका महात्यम क्या है ? शूद जी महाराज ने कथा का महात्यम सुनाते हुए कहा कि एक आत्म देव नाम के ब्राह्मण थे, भगवत भजन करते थे गाने वाले, वेद पाठी ब्राह्मण थे, उनकी पत्नी का नाम धूंधली था जो उनकी उलट थी, पति की बात नहीं मानती थी। वो बहुत दुखी थे बच्चे भी नहीं थे, गाय लाते थे तो दूध नहीं देती थी, वृक्ष लगाता हूं तो फल नहीं देता, कुछ भी काम बनने से पहले बिगड़ जाता था, अपने दुखों को देखकर उन्हे आत्मदाह का विचार आया। जब वह आत्मदाह के लिए जाने लगे तो एक ब्राह्मण वहां से गुजरे उन्होंने आत्मदेव की पूछा की तुम्हारे दुखों का कारण क्या है, तो उन्होंने कहा कि मेरा कोई पुत्र नहीं है इसलिए मैं दुखी हूं, मेरा कुछ भी काम नहीं बनता है, मैं रोज भगवान की पूजा पाठ करता हूं फिर भी मुझे इतना दुख दे रहे है, मुझसे अब यह सब बर्दाशत नहीं होता है। संत बोले चलो मैं तुम्हे बताता हूं, संत ने आत्मदेव का हाथ देखा तो पता चला कि उनके सात आगे और सात पीछे जन्म तक कोई संतान नहीं है। तो संत ने बात को घूमाते हुए पूछा की बताओ तुमहे संतान क्यों चाहिए। आत्मदेव बोले इसकी तीन वजह हैं पहली वो मेरा वंश बढ़ाएगा, दूसरा बुढ़ापे में मेरी सेवा करेगा और तीसरा मेरे बुढ़ापे का सहारा बनेगा। आत्मदेव की बाते सुनकर संत ने दया करते हुए उन्हें फल दिया और कहा की ये अपनी पत्नी को खिला देना, आत्मदेव वो फल लेकर आए और अपनी पत्नी को कहा कि ये फल खा लेना लेकिन तभी उनकी बहन आ गई ओर उसने बोल की ये फल मत खाना पता नहीं संत ने इसमें कुछ मिला दिया हो तो, तू इस फल को गाय को खिला दे इसकी भी तो संतान नहीं हो रही है और मैं गर्भ से हूं जो भी संतान होगी मैं तुझे लाकर दे दूंगी तू अपने पति को कह देना यही हूई है। आत्मदेव की पत्नी गर्भवती होने का नाटक करने लगी और उन्हें तीर्थ पर भेज दिया। जब उसकी बहन का पुत्र हुआ तो उसका नाम रख दिया धूंधकारी और गाय को जो फल खिलाया था उससे भी एक पुत्र हुआ लेकिन उसके कान गऊ जैसे थे तो उसका नाम रखा गऊकर्ण। संत के दिए फल का असर है की गऊकर्ण संस्कारी हुआ और धूंधकारी महाखल हुआ। धूंधकारी की दुष्टता देखकर आत्मदेव रोने लगे ओर कहने लगे की इससे तो मैं पहले ही अच्छा था जो मेरे घर में पुत्र नहीं था। धूंधकारी दिन प्रतिदिन बिगड़ता चला गया, वेश्यावृति करने लगा, मदिरापान करने लगा, अपनी मां को पीटने लगा। जब धूंधली को पीटा तो उसे लगा की जो मैने अपने पति की बात नहीं मानी ये उसका दुष्परिणाम है, अगर मैने अपने पति की बात मान ली होती तो ये दिन नहीं देखना पड़ता, मेरा पुत्र गऊकर्ण होता धूंधकारी नहीं होता, ये सोचकर उन्होंने भी कुएं में कूदकर खुदकुशी कर ली। गऊकर्ण भी तीर्थ पर निकल पड़े। धूंधकारी ने देखा की अब तो कोई भी नहीं है तो वो ओर बिगड़ गया उसने 4-5 गर्णिकाओं को अपने साथ रख लिया लेकिन ऐसे बुरे लोगों से तो बुरे लोग भी दुखी हो जाते हैं तो एक दिन उन्होंने धूंधकारी को चारपाई से बांध दिया और जलती हुई लकड़ी लेकर उसे पीटने लगी। वो चीखने लगा उसकी चीखे सब ने सुनी लेकिन बचाने कोई नहीं गया। पीटने से वो मर गया और प्रेत बन गया। जब गऊकर्ण को पता चला की मेरा भाई प्रेत बन गया है तो उन्होंने सूर्यनारायण से पूछा के मैं अपने भाई के कल्याण के लिए क्या करू तो सूर्य नारायण भगवान ने कहा कि श्रीमद् भागवत कथा उन्हें सुनाओ। तो जब भागवत कथा शुरू होने वाली थी तो धूंधकारी का प्रेत एक बांस में आकर बैठ गया, तो सांतवे दिन उस बांस के दो भाग हो गए और आकाश से धूंधकारी को लेने के लिए आकाश के विमान आया, जब देवदूत धूंधकारी को ले जाने लगे तो गऊकर्ण ने पूछा कि कथा तो हम सब ने सूनी है तो तुम एक को ही क्यों ले जा रहे हो, जब कथा सब ने एक समान सुनी है तो फल भी तो एक समान मिलना चाहिए सभी को। तो देवदूतों ने कहा कि कथा तो सबने सुनी है लेकिन श्रवण भेद है। कोई जिसने जिस इच्छा को लेकर कथा सुनी है उसकी वहीं इच्छा पूरी हुई है। धूंधकारी ने भागवत मुक्ति के लिए सुनी है इसलिए इसकी मुक्ति हुई है। धन्य है ये भागवत ग्रंथ जिसको सुनकर प्रेत का भी कल्याण हो गया।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

19Apr 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 13 अप्रैल से 19 अप्रैल 2018 तक श्री सनातन धर्म रामलीला मंदिर, बुलिलेका, लबासा में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण और रुक्मणी जी के विवाह का सुन्दर वर्णन सभी भक्तों को सुनाया।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि भागवत पढ़ लिजिए, रामायण पढ़ लिजिए चाहे तुलसीदास बाबा ने व्यास जी महाराज ने कलयुग के बारे में जो भी कहा है वो सब हो रहा है और अभी तो शुरूआत है सोचिए अंत कैसा होगा ? जो महात्माओं ने लिखा है कलयुग के लोगों के बारे में की कोई वेद पुराण पर विश्वास नहीं करेगा, कोई राम का नाम नहीं जानेगा, सारे रिश्ते नष्ट हो जाएंगे, आयु कम होती चली जाएगी, बुद्धि पापमय होती चली जाएगी। महाराज जी ने प्रशन किया कि आप ही बताइए ये जो लिख कर गए हैं क्या ये नहीं हो रहा है ? महाराज जी ने कहा कि ये तो अभी शुरूआत है कलयुग की। वो तो अभी भी समय अच्छा है कि हम इस समय में भगवान की कथा सुन सकते हैं, भगवान का नाम जप सकत है, भजन कर सकत हैं, सत्संग कर सकते हैं, अपने कल्याण का सुंदर मार्ग प्रसस्त कर सकते हैं। अभी भी सुंदर समय है इसलिए अपने समय का सदुपयोग आप किजिए दुरूपयोग किया तो पछतावा करके कुछ नहीं होगा। इसलिए आने वाले समय को सुंदर बनाने के लिए अपनी पीढ़ी को धर्मात्मा बनाइए।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम आगे बढाते हुए कहा कि रुकमणी जी ने श्रीकृष्ण से प्रेम विवाह किया। श्रीकृष्ण रुकमणी जी को हरण करके लेकर गए। रूकमणी जी के भाई रुकमी को भगवान बलराम ने परास्त किया। रुकमी ये प्रण लेकर आया था कि अगर मैं अपनी बहन को वापस नहीं लेकर आया तो वापस नहीं आऊंगा नगर में। तो उन्होंने उसी स्थान पर जहां वो परास्त हुए थे वहीं भोजकट नाम का नगर बसाया और वहीं ठाकुर जी का विवाह बड़ी धूमधाम से करवाया। भगवान ने 16 हजार 100 विवाह किए हैं लेकिन 8 विवाह अलग अलग हुए। ये 8 पटरानियां साधारण नहीं हैं लक्ष्मी जी बनी हैं रूकमणी, पार्वती जी आधे अंश से बनी हैं जामवंती और बाके आधे अंश से बनी हैं महामाया, तुलसी बनी हैं लक्ष्मणा, यमुना बनी हैं सूर्य की पूत्री कालिंदी, लज्जा बनी हैं भद्रा, गंगा बनी हैं मित्रव्रिंदा, सावित्री जी बनी हैं सत्या और पृथ्वी बनी हैं सत्यभामा। ये सांसारिक विवाह नहीं है ये पूरी प्रकृति के साथ ठाकुर जी ने विवाह किया है।

महाराज श्री ने आगे कहा कि पुराणों की कथा के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि को नरकासुर नाम के असुर का वध किया। नरकासुर ने 16 हज़ार 100 कन्याओं को बंदी बना रखा था। नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा की समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। इस कारण भगवान ने १६१०० रूप बनाकर सबके साथ एक मुहूर्त में एक साथ विवाह किया था। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने इतने विवाह किये। भगवान ने कामनावश विवाह नहीं किया था, करुणावश किया था। भगवान कहते हैं जिसको कोई नहीं अपनाता अगर वो मेरी शरण में आये तो मैं उसे अपना लेता हूँ।

भगवान श्री कृष्ण ने कामदेव पर विजय प्राप्त की है। उनके संकल्प मात्र से उनके पुत्रों की गिनती एक लाख इकसठ हजार अस्सी थी। भगवान श्री कृष्ण ने आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन किया। भगवान अपने मुकुट पर मोर पंख इसीलिए लगाते हैं क्योंकि मोर एकमात्र ऐसा प्राणी है जो सम्पूर्ण जीवन में ब्रह्मचर्य का पालन करता है। मोरनी का गर्भ भी मोर के आंसुओ को पीकर ही धारण होता है। इत: इतने पवित्र पक्षी के पंख भगवान खुद अपने सर पर सजाते है।

भगवान कृष्ण मित्र और शत्रु के लिए समान भावना रखते है इसके पीछे भी मोरपंख का उद्दारण देखकर हम यह कह सकते है। कृष्ण के भाई थे शेषनाग के अवतार बलराम और नागो के दुश्मन होते है मोर। अत: मोरपंख सर पर लगाके कृष्ण का यह सभी को सन्देश है की वो सबके लिए समभाव रखते है। मोरपंख में सभी रंग है गहरे भी और हलके भी। कृष्णा अपने भक्तो को ऐसे रंगों को देखकर यही सन्देश देते है जीवन ही इस तरह सभी रंगों से भरा हुआ है कभी चमकीले रंग तो कभी हलके रंग, कभी सुखी जीवन तो कभी दुखी जीवन।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा बढ़ाते हुए कहा कि श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंततः सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

18Apr 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 13 अप्रैल से 19 अप्रैल 2018 तक श्री सनातन धर्म रामलीला मंदिर, बुलिलेका, लबासा में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि हर एक योनी में परमात्मा ही है, लेकिन ये बात समझने के लिए बहुत बड़ा दिल चाहिए, सत्संग चाहिए, गुरूजनों की कृपा चाहिए, आपका मन शुद्ध होना चाहिए। जब आपका मन शुद्ध होगा तो निश्चित तौर पर आपको ये बात समझ में आ जाएगी। 
महाराज जी ने कहा कि आजकल लोग किसी को भी बदनाम करने के लिए कुछ भी बोल देते हैं, यह लोगों की फितरत है क्योंकि वह अपनी छवि बना नहीं पाते तो दूसरों की बुराई करने लगते हैं। अगर आपको ईमानदारी से बड़ा बनना है तो विवेकानंद की तरह बनो, किसी की रेखा को मिटाओ मत बल्कि उसकी रेखा से बड़ी अपनी रेखा खींच कर दिखाओ। 
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा।।

17Apr 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 13 अप्रैल से 19 अप्रैल 2018 तक श्री सनातन धर्म रामलीला मंदिर, बुलिलेका, लबासा में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि आजकल लोगों की विचारधार बदल रही है, उसके पीछे केवल एक ही कारण है कि उनका खानपान अशुद्ध हुआ है। हमारे बुजुर्ग, संत-महात्मा कहा करते थे आहार शुद्ध होगा तो विचार शुद्ध होगा, विचार शुद्ध होगा तो व्यवहार शुद्ध होगा, व्यवहार शुद्ध होगा तो फल भी उसका शुद्ध ही मिलेगा। आज के स्थिति यह है कि खानपान की व्यवस्था एकदम खराब हो गई है। इससे हमारी परंपरागत विचारधारा धीरे धीरे बदल रही है। आपके आहार का असर आपके व्यवहार और आपके विचार पर पड़ता है। 
महाराज जी ने कहा कि रामायण में एक भाव है “निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा। भगवान कहते हैं जिस व्यक्ति का मन निर्मल है वो मुझे प्रिय है और जिसके मन में छल, छिद्र, दिखावा है वो मुझे बिल्कुल भी प्रिय नहीं है। महाराज जी ने कहा कि अगर आप पापी हैं तो पापी बनकर प्रभु के समक्ष जाइए, दिखावा करने की जरूरत नहीं है क्योंकि प्रभु सब जानते हैं। इस संसार से आपकी बुराईयां छिप सकती हैं लेकिन परमात्मा से नहीं क्योंकि उनके अरबों नेत्र हैं, वो सब में व्याप्त हैं।


देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि भगवान नारायण वासुदेव और देवकी के घर में प्रकट हुए और वहां से गोकुल पहुंचे मईयां यशोदा के घर। 85 वर्ष की उम्र में बाबा के घर में लल्ला हुआ तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। पूरा ब्रज मंडल में गीत गूंज उठे नंद के आनन्द भयो, जय कन्हैया लाल की। मेरे कन्हैया को दिखावा नहीं पसंद जैसे हो वैसे ही उसके सामने जाओ वो तुमको अपना लेगा। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, क्यूंकि पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतनाका वध कर उसका कल्याण किया।


महाराज जी ने एक कृष्ण को चाहने वाले व्यक्ति की कहानी सुनाते हुए बताया की किसी ने श्री कृष्ण से पूछा की हे कृष्ण तुम्हारा नाम टेढ़ा, खड़े होने का स्टाइल टेढ़ा, हमेशा झूट बोलता है उसके सारे काम टेढ़े क्या अच्छा है तुममे, तब श्री कृष्ण मुस्कुराते हुए उस व्यक्ति को एक खूंटी का उदहारण देते हुए कहाँ की ये लो इस सीधी खूंटी पर ये वस्त्र टांगो तो वह व्यक्ति जब वस्त्र टांगने गया तो वो वस्त्र गिर गए फिर श्री कृष्ण ने उस व्यक्ति को टेढी खूंटी पर वस्त्र टांगने के लिए दिए तो वस्त्र आसानी से टंग गए। तब श्री कृष्ण ने मुस्कुरात हुए उस व्यक्ति को उनकी बात का जवाब देते हुए कहते है की जब श्री राम जी त्रेता युग में आये थे तब लोग एक दम सीधे हुआ करते थे और आसानी से मान जाया करते थे। लेकिन में द्वापर युग के अंत में कलयुग के कल्याण के लिए आया हूँ और इनको तारने के लिए सीधा बनने से काम नहीं चलेगा इनको भवसागर से पार करने के लिए मुझे टेड़ा बनना पड़ेगा।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? 


यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्व ही पहचान लिया है।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

16Apr 2018

आज पूज्य महाराज श्री में फिजी में 100 वर्ष पुराने नाग देवता के मंदिर के किए दर्शन।

आज पूज्य महाराज श्री में फिजी में 100 वर्ष पुराने नाग देवता के मंदिर के किए दर्शन। यहां नाग देवता स्वंयभू प्रकट हुए हैं और इनका आकार बढ़ता रहता है, देश विदेश से कई श्रद्धालु नाग देवता के दर्शन करने के लिए आते हैं।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

16Apr 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 13 अप्रैल से 19 अप्रैल 2018 तक श्री सनातन धर्म रामलीला मंदिर, बुलिलेका, लबासा में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि आप और हम धर्म के बिना जिंदा नहीं रह सकते, पल पल हमे धर्म की आवश्यकता पड़ती है। हमारे लिए धर्म महत्वपुर्ण है और आप का धर्म कहता है कि हम श्रद्धावान बन कर इतना अच्छा जरूर कर दें कि आने वाली पीढ़ी को धर्मात्मा बना जाएं ताकि हमारे जाने के बाद भी हमारे मंदिरों में दरवाजे बंद ना हो, हमारे घर में ठाकुर पूजा बंद ना हो, हमारे घर में आने वाले अतिथियों का आदर सत्कार बंद ना हो, हमारे घरों में बड़ो का आदर बंद ना हो। इतना तो हमे हमारे धर्म के लिए करना ही चाहिए, अगर ना कर सके तो यह कहने में बड़ा कष्ट हो रहा है कि हमने मानव जीवन के लिए बहुत बड़ा काम नहीं किया। 
महाराज जी ने कहा कि सृष्टि के आरंभ से दान लेने और देने की प्रथा है। हमारे सनातन धर्म में दान लेना और देना दोनों ही पवित्र माने गए हैं। कलयुग में माया से ग्रसित प्राणी जिनके ऊपर माया का केचुली लगी हो उन्हें दान लेने-देने की पवित्र प्रथा में भी दोष और अवगुण नजर आता है। कलयुगी व्यक्ति की नजरें केवल माया पर रहती हैं, वो माया को छोड़ना नहीं चाहता, भगवान से मिलना नहीं चाहता। 


महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि पूज्य महाराज श्री ने कथा प्रारम्भ करते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक बौने के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बलि को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।
महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। महाबली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।


शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि महाबली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।
इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर महाबली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"


जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।


दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने भगवान ने सभी भक्तो के साथ श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

15Apr 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 13 अप्रैल से 19 अप्रैल 2018 तक श्री सनातन धर्म रामलीला मंदिर, बुलिलेका, लबासा में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि जब आपकी यश किर्ति बढती है तो देवता भी आपको परेशानी में डालते है तब आपका आराध्य आपको बचाता है ।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल की कथा क्रम याद कराया की जिस वयक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये । अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे। भगवान को मनाने की कोशिश करते रहना चाहिए क्योंकि मानव जीवन द्वार है परमात्मा मिलन का, सतकर्म का और मोक्ष प्राप्ति का। जितना जतन अपने तन को सजाने में करते हो, उसका थोड़ा भी यदि मन को सजाने में लगा दो तो परिणाम देखना। तन की सुंदरता पर दुनिया मोहित होती है और मन की सुंदरता पर मोहन मोहित होते हैं।

अपने अपमान करने वालों को भी सम्मान देने वाला ही सुंदर मन वाला होता है। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा की देवहुति ने कपिल मुनि से पूछा पुत्र मैनें सुना है की तुम साक्षात् भगवान के अवतार हो और मेरा ये सौभाग्य है की तुमने मेरे यहाँ जन्म लिया और मैनें तुम्हें अपना दूध पिलाया। कपिल जी महाराज ने कहा की माँ आपने सही सुना है। देवहुति बोली पुत्र मुझे कृपा कर बताइए की मानव जीवन का लक्ष्य क्या है। मानव जीवन मिल जाने के बाद जीव को जीवन भर क्या करना चाहिए। किस पर विश्वास करना चाहिए और किस पर विश्वास नहीं करना चाहिए। कपिल महाराज बोले माँ मानव जीवन मिलने के बाद जीव को जीवन पर्यन्त भगवान को मनाने की कोशिश करते रहना चाहिए। क्योंकि मानव जीवन द्वार है परमात्मा मिलन का ,सतकर्म का और मोक्ष प्राप्ति का। जानती हो माँ बच्चा जब माँ के गर्भ में होता है तो मास का एक लोथड़ा होता है धीरे धीरे उस में से अंग बनाना शुरू होता है। इस पर ऊपरी त्वचा नहीं होती और माँ जो भी खाती है वो सीधा बच्चे को जाकर चुभता है और जो बच्चे इस चुभन को नहीं सह पाते उनकी गर्भ में ही मृत्यु हो जाती है। माँ के गर्भ में बच्चे का स्थान मल- मूत्र के पास होता है। बच्चा इस पीड़ा को सह नहीं पाता वह चिल्लाता है भगवान मुझे बचाओ मुझे यहाँ से बाहर निकालो तब प्रभु कहते हैं की मैं तम्हे यहाँ से बहार निकाल दूँगा लेकिन तुम्हे एक वादा करना होगा की जन्म लेने के बाद तुम्हे अपने धर्म को आगे बढ़ना होगा। धर्म का प्रचार करना होगा। लेकिन बच्चा जन्म लेने के बाद प्रभु से किया हुआ वादा भूल जाता है और संसार की मोहमाया में लिप्त हो जाता है और फिर मृत्यु के बाद दुबारा उसी कष्ट से होकर गुजरना पड़ता है।


।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

14Apr 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 13 अप्रैल से 19 अप्रैल 2018 तक श्री सनातन धर्म रामलीला मंदिर, बुलिलेका, लबासा में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा का एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि भगवान के संदर्भ में पूरा ज्ञान हो यह संभव नहीं है, भगवान को भगवान के अलावा पूरा कोई जान नहीं सकता। उन्होंने कहा कि कलयुग के लोग कहते हैं कि हम भगवान को नहीं मानते और मांगते भी भगवान से ही हैं। 
महाराज जी ने कहा कि कलयुग के लोगों का स्वभाव है पाप कर्म करना और पाप में रत रहना। कलयुग के लोगों का मन बुरी जगह पर लगता है और अच्छी जगह से उठ जाने को मन करता है। 
महाराज जी ने कहा कि कथा हमेशा पूरी सूननी चाहिए, कथा को कभी भी बीच में नहीं छोड़ना चाहिए। हमारे संत कहते हैं हजार काम छोड़कर भोजन करना चाहिए, लाख काम छोड़कर भजन करना चाहिए और दुनिया का हर काम छोड़कर कथा सुननी चाहिए। बहुत से लोग कहते हैं हम कथा बुढ़ापे में सुनेंगे, अगर बुढ़ापे में सुनोगे तो जीवन में उसे लागू कब करोगे। बचपन में सीख लोगे, जवानी में सीख लोगे तो जीवन भर उसे लागू करोगे, फिर लोक भी सुधरेगा और परलोक भी सुधरेगा। इसलिए जो लोग सोचते हैं बुढ़ापे में कथा सुनेगे वो गलत सोचते हैं, उनकी विचारधारा गलत है। 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि कल का कथा क्रम में आपने भागवत का महात्यम जाना और आज की कथा प्रसंग में कलयुग की बात करेंगे। कलयुग के प्राणी का स्वभाव ही पाप कर्म में लिप्त रहना। कलयुग के लोगों में धर्म की प्रवृति बढ़ा कर उनका उद्धार करने की जिम्मेदारी श्री शुक जी को सौंपी गई और वह इसके लिए तैयार भी हो गए। भगवान की कथा वहीं कर सकता है जिसने भगवान का सानिध्य किया हो। श्री शुक जी महाराज जो राधा और कृष्ण के सम्मुख हमेशा रहे जिनको सानिध्य प्राप्त है उनको कहा कि आप जाओ और हमारी कथाओं का गायन करो। तो श्री शुक प्रभु की कथाओं का गायन करने के लिए कैलाश की ओर से आ रहे थे। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को
निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में राम नहीं, श्याम नहीं तो आराम नहीं।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज नेबताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुपगए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के
ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहरआने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी, उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
महाराज श्री ने कहा कि हमको तो सदा ही अच्छे और बुरे का फर्क लेकर हीभगवान की भक्ति को करते रहना चाहिए। क्योँकि उसी के अनुसार ही हम अपने सभी कार्यों को कर सकते है। हमको तो सदैव ही अच्छे कार्य ही करने चाहिए और बुरे कार्यों से सदा के लिए ही दूर रहना चाहिए। तभी हमारा इस संसार में सही रूप से गुजारा हो सकता है। भगवान भी उन्ही का साथ देते है जो सदा अच्छे कर्मों में लिप्त रहते है। जो लोग सदा ही बुरे कार्य करते है उनसे तो भगवान सदा ही दूरी बनाये रखते है। तो आप सभी अच्छे कार्य करते रहो तो ठाकुर हमेशा ही तुमको अपना बनाये रखेंगे।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

13Apr 2018

कथा से पूर्व भव्य कलश यात्रा निकाली गई।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी के सानिध्य में 13 अप्रैल से 19 अप्रैल 2018 तक श्री सनातन धर्म रामलीला मंदिर, बुलिलेका, लबासा में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा से पूर्व भव्य कलश यात्रा निकाली गई। इस भव्य कलश यात्रा में माताएं बहने कलश उठाकर कथा पंडाल पहुंची।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

13Apr 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 13 अप्रैल से 19 अप्रैल 2018 तक श्री सनातन धर्म रामलीला मंदिर, बुलिलेका, लबासा में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि लबासा में भारतीयों की आबादी तो बहुत है लेकिन आप ही कथा सुनने आए हैं वो इसलिए क्योंकि ठाकुर जी ने आपको बुलाया है। ठाकुर की कृपा जिस पर हो जाती है उसके सारे पाप मिट जाते हैं।

महाराज जी ने कहा कि भगवान के दर पर जब भी जाओं अभिमान के बिना जाओं, अगर अभिमान के संग जाओगे तो भगवान तुम्हारे ऊपर कृपा नहीं करेंगे। आज हम लोग सिर्फ दो कारणों से दूर हैं एक है माया दूसरा अभिमान। लोग कहते हैं कि दूसरों को भगवान दिखता है हमें भगवान नहीं दिखता, भगवान तब दिखेंगे जब मन से माया का, अभिमान का पर्दा हटेगा। जिस दिन ये दोनों पर्दे हटेंगे भगवान हमें जरूर दिखेगा।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि नेमिषासरणय में 88 हजार सनकादिक ऋषि विराजमान हैं और सभी ऋषियों के बीच में एक ही बात पर विचार हो रहा है की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? जितने भी ग्रंथ हुए है, पुराण हुए हैं सभी में एक ही बात की चर्चा हुई है, कलयुग के लोगों की चर्चा हुई है। क्योंकि वो जानते हैं की कलयुग के लोग ही ऐसे है जो कहते हैं हमे भगवान पर, धर्म पर विश्वास नहीं है। कलयुग का व्यक्ति स्वाभाविक तौर पर पापी होता है तो ऋषियों ने कहा महाराज कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा, इनके पास समय का अभाव है। इसके अलावा ओर प्रशन किए कि भगवान अगर सर्वसामर्थयवान है तो उसे अवतार लेने की क्या जरुरत है ? एक ओर प्रशन है कि भगवान के अवतार हुए तो कितने हुए ? एक ओर प्रशन है कि भगवान श्रीकृष्ण जब पृथ्वी छोड़ कर गए तो धर्म किसकी शरण में गया ?

महाराज श्री ने कथा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि शूद जी महाराज कहते हैं सनाकदिक मुनियों से कहा हे ऋषियों तुम धन्य हो जो तुमने जन कल्याण के लिए प्रशन किया है। शूद जी महाराज ने कहा जीन लोगों को कल काल में अपना कल्याण करना हो उन लोगों को श्रीमद् भागवत कथा सुननी चाहिए। जिन लोगों को बार बार जन्म नहीं लेना, बार बार मरना नहीं है, जिन्हें मोक्ष चाहिए उन्हें भागवत कथा सुननी चाहिए। ऋषियों ने कहा कि हे प्रभु ये भागवत सुनने से क्या किसी का कल्याण हुआ है इसका महात्यम क्या है ? शूद जी महाराज ने कथा का महात्यम सुनाते हुए कहा कि एक आत्म देव नाम के ब्राह्मण थे, भगवत भजन करते थे गाने वाले, वेद पाठी ब्राह्मण थे, उनकी पत्नी का नाम धूंधली था जो उनकी उलट थी, पति की बात नहीं मानती थी। वो बहुत दुखी थे बच्चे भी नहीं थे, गाय लाते थे तो दूध नहीं देती थी, वृक्ष लगाता हूं तो फल नहीं देता, कुछ भी काम बनने से पहले बिगड़ जाता था, अपने दुखों को देखकर उन्हे आत्मदाह का विचार आया। जब वह आत्मदाह के लिए जाने लगे तो एक ब्राह्मण वहां से गुजरे उन्होंने आत्मदेव की पूछा की तुम्हारे दुखों का कारण क्या है, तो उन्होंने कहा कि मेरा कोई पुत्र नहीं है इसलिए मैं दुखी हूं, मेरा कुछ भी काम नहीं बनता है, मैं रोज भगवान की पूजा पाठ करता हूं फिर भी मुझे इतना दुख दे रहे है, मुझसे अब यह सब बर्दाशत नहीं होता है। संत बोले चलो मैं तुम्हे बताता हूं, संत ने आत्मदेव का हाथ देखा तो पता चला कि उनके सात आगे और सात पीछे जन्म तक कोई संतान नहीं है। तो संत ने बात को घूमाते हुए पूछा की बताओ तुमहे संतान क्यों चाहिए। आत्मदेव बोले इसकी तीन वजह हैं पहली वो मेरा वंश बढ़ाएगा, दूसरा बुढ़ापे में मेरी सेवा करेगा और तीसरा मेरे बुढ़ापे का सहारा बनेगा। आत्मदेव की बाते सुनकर संत ने दया करते हुए उन्हें फल दिया और कहा की ये अपनी पत्नी को खिला देना, आत्मदेव वो फल लेकर आए और अपनी पत्नी को कहा कि ये फल खा लेना लेकिन तभी उनकी बहन आ गई ओर उसने बोल की ये फल मत खाना पता नहीं संत ने इसमें कुछ मिला दिया हो तो, तू इस फल को गाय को खिला दे इसकी भी तो संतान नहीं हो रही है और मैं गर्भ से हूं जो भी संतान होगी मैं तुझे लाकर दे दूंगी तू अपने पति को कह देना यही हूई है। आत्मदेव की पत्नी गर्भवती होने का नाटक करने लगी और उन्हें तीर्थ पर भेज दिया। जब उसकी बहन का पुत्र हुआ तो उसका नाम रख दिया धूंधकारी और गाय को जो फल खिलाया था उससे भी एक पुत्र हुआ लेकिन उसके कान गऊ जैसे थे तो उसका नाम रखा गऊकर्ण। संत के दिए फल का असर है की गऊकर्ण संस्कारी हुआ और धूंधकारी महाखल हुआ। धूंधकारी की दुष्टता देखकर आत्मदेव रोने लगे ओर कहने लगे की इससे तो मैं पहले ही अच्छा था जो मेरे घर में पुत्र नहीं था। धूंधकारी दिन प्रतिदिन बिगड़ता चला गया, वेश्यावृति करने लगा, मदिरापान करने लगा, अपनी मां को पीटने लगा। जब धूंधली को पीटा तो उसे लगा की जो मैने अपने पति की बात नहीं मानी ये उसका दुष्परिणाम है, अगर मैने अपने पति की बात मान ली होती तो ये दिन नहीं देखना पड़ता, मेरा पुत्र गऊकर्ण होता धूंधकारी नहीं होता, ये सोचकर उन्होंने भी कुएं में कूदकर खुदकुशी कर ली। गऊकर्ण भी तीर्थ पर निकल पड़े। धूंधकारी ने देखा की अब तो कोई भी नहीं है तो वो ओर बिगड़ गया उसने 4-5 गर्णिकाओं को अपने साथ रख लिया लेकिन ऐसे बुरे लोगों से तो बुरे लोग भी दुखी हो जाते हैं तो एक दिन उन्होंने धूंधकारी को चारपाई से बांध दिया और जलती हुई लकड़ी लेकर उसे पीटने लगी। वो चीखने लगा उसकी चीखे सब ने सुनी लेकिन बचाने कोई नहीं गया। पीटने से वो मर गया और प्रेत बन गया। जब गऊकर्ण को पता चला की मेरा भाई प्रेत बन गया है तो उन्होंने सूर्यनारायण से पूछा के मैं अपने भाई के कल्याण के लिए क्या करू तो सूर्य नारायण भगवान ने कहा कि श्रीमद् भागवत कथा उन्हें सुनाओ। तो जब भागवत कथा शुरू होने वाली थी तो धूंधकारी का प्रेत एक बांस में आकर बैठ गया, तो सांतवे दिन उस बांस के दो भाग हो गए और आकाश से धूंधकारी को लेने के लिए आकाश के विमान आया, जब देवदूत धूंधकारी को ले जाने लगे तो गऊकर्ण ने पूछा कि कथा तो हम सब ने सूनी है तो तुम एक को ही क्यों ले जा रहे हो, जब कथा सब ने एक समान सुनी है तो फल भी तो एक समान मिलना चाहिए सभी को। तो देवदूतों ने कहा कि कथा तो सबने सुनी है लेकिन श्रवण भेद है। कोई जिसने जिस इच्छा को लेकर कथा सुनी है उसकी वहीं इच्छा पूरी हुई है। धूंधकारी ने भागवत मुक्ति के लिए सुनी है इसलिए इसकी मुक्ति हुई है। धन्य है ये भागवत ग्रंथ जिसको सुनकर प्रेत का भी कल्याण हो गया।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

5Apr 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 30 मार्च से 5 अप्रैल 2018 तक Sri Mandir Cumberland Road, Auburn, NSW, Sydney (Australia) में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण और रुक्मणी जी के विवाह का सुन्दर वर्णन सभी भक्तों को सुनाया।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि कभी अगर फुरस्त मिले तो अपने आप से बात किया करो। हमेशा कोई तुमसे बात करे तभी तुम बात करोगे ये जरूरी नहीं है। कभी कभार अकेले में अपने आप से बात किया करो की मैं कौन हूं ? मैं कहां से आया हूं ? मेरा लक्ष्य क्या है ? जब यह प्रशन अपने आप से करोगे अकेले में तो कुछ बाते दिमाग में घूमने लगेंगी भागवत की तो आपने 7 दिन सुनी हैं।

महाराज जी ने कहा कि हमारी दिक्कत यह है की हम अपने मन को नहीं रोकते हैं, हम दुनिया को रोकते हैं। कहीं खाने का मन करता है, कही घूमने जाने का मन करता है तो निकल पड़ते हैं। अभी हम मन के गुलाम हैं, मजा उस दिन आएगा जिस दिन मन हमारा गुलाम हो जाएगा, तब जीवन जीने का असली आनन्द आएगा। बादशाह बनो मेरे प्यारे और बादशाह उसी दिन बनोगे जिस दिन मन को वश में कर लोगे।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम आगे बढाते हुए कहा कि रुकमणी जी ने श्रीकृष्ण से प्रेम विवाह किया। श्रीकृष्ण रुकमणी जी को हरण करके लेकर गए। रूकमणी जी के भाई रुकमी को भगवान बलराम ने परास्त किया। रुकमी ये प्रण लेकर आया था कि अगर मैं अपनी बहन को वापस नहीं लेकर आया तो वापस नहीं आऊंगा नगर में। तो उन्होंने उसी स्थान पर जहां वो परास्त हुए थे वहीं भोजकट नाम का नगर बसाया और वहीं ठाकुर जी का विवाह बड़ी धूमधाम से करवाया। भगवान ने 16 हजार 100 विवाह किए हैं लेकिन 8 विवाह अलग अलग हुए। ये 8 पटरानियां साधारण नहीं हैं लक्ष्मी जी बनी हैं रूकमणी, पार्वती जी आधे अंश से बनी हैं जामवंती और बाके आधे अंश से बनी हैं महामाया, तुलसी बनी हैं लक्ष्मणा, यमुना बनी हैं सूर्य की पूत्री कालिंदी, लज्जा बनी हैं भद्रा, गंगा बनी हैं मित्रव्रिंदा, सावित्री जी बनी हैं सत्या और पृथ्वी बनी हैं सत्यभामा। ये सांसारिक विवाह नहीं है ये पूरी प्रकृति के साथ ठाकुर जी ने विवाह किया है।

महाराज श्री ने आगे कहा कि पुराणों की कथा के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि को नरकासुर नाम के असुर का वध किया। नरकासुर ने 16 हज़ार 100 कन्याओं को बंदी बना रखा था। नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा की समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। इस कारण भगवान ने १६१०० रूप बनाकर सबके साथ एक मुहूर्त में एक साथ विवाह किया था। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने इतने विवाह किये। भगवान ने कामनावश विवाह नहीं किया था, करुणावश किया था। भगवान कहते हैं जिसको कोई नहीं अपनाता अगर वो मेरी शरण में आये तो मैं उसे अपना लेता हूँ।

भगवान श्री कृष्ण ने कामदेव पर विजय प्राप्त की है। उनके संकल्प मात्र से उनके पुत्रों की गिनती एक लाख इकसठ हजार अस्सी थी। भगवान श्री कृष्ण ने आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन किया। भगवान अपने मुकुट पर मोर पंख इसीलिए लगाते हैं क्योंकि मोर एकमात्र ऐसा प्राणी है जो सम्पूर्ण जीवन में ब्रह्मचर्य का पालन करता है। मोरनी का गर्भ भी मोर के आंसुओ को पीकर ही धारण होता है। इत: इतने पवित्र पक्षी के पंख भगवान खुद अपने सर पर सजाते है।
भगवान कृष्ण मित्र और शत्रु के लिए समान भावना रखते है इसके पीछे भी मोरपंख का उद्दारण देखकर हम यह कह सकते है। कृष्ण के भाई थे शेषनाग के अवतार बलराम और नागो के दुश्मन होते है मोर। अत: मोरपंख सर पर लगाके कृष्ण का यह सभी को सन्देश है की वो सबके लिए समभाव रखते है। मोरपंख में सभी रंग है गहरे भी और हलके भी। कृष्णा अपने भक्तो को ऐसे रंगों को देखकर यही सन्देश देते है जीवन ही इस तरह सभी रंगों से भरा हुआ है कभी चमकीले रंग तो कभी हलके रंग, कभी सुखी जीवन तो कभी दुखी जीवन।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा बढ़ाते हुए कहा कि श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी।
सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंततः सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया।

महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा।

श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया।

भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे।
भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई।

कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी।

इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे।

परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी।
उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

4Apr 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 30 मार्च से 5 अप्रैल 2018 तक Sri Mandir Cumberland Road, Auburn, NSW, Sydney (Australia) में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

भारतीय संस्कृति जोड़ना सिखाती है तोड़ना नहीं।

हमारी इन्द्रीयां ही गोपियाँ हैं और हमारा मन ही कृष्ण है। मन जितना मजबूत होगा, जितना विशाल और गहरा होगा,

इन्द्रीयाँ उतनी ही मन के वश में रहेंगी और मन के आस पास ही नृत्य करेंगी, खुश रहेंगी, यही सच्चा महारास है। महाराज श्री ने महारास का वृतांत सुनाते हुए कहा की भगवान ने गोपियों से कहा-

जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं।

दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के, गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं।

लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं-

आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता है।
पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं।
कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं।
गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं।
गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाइ जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।

पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवन ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण।

यहां महाराज श्री ने भक्तो को एक दिना भोले भंडारी भजन श्रवण कराया।

जब महारास की गूंज सारी त्रिलोकी में गई तो हमारे भोले बाबा के कानों में भी महारास की गूंज गई। भगवान शिव की भी इच्छा हुई के मैं महारास में प्रवेश करूँ। भगवान शिव बावरे होकर अपने कैलाश को छोड़कर ब्रज में आये । पार्वती जी ने मनाया भी लेकिन त्रिपुरारि माने नहीं। भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त श्रीआसुरि मुनि, पार्वती जी, नन्दी, श्रीगणेश, श्रीकार्तिकेय के साथ भगवान शंकर वृंदावन के वंशीवट पर आ गये।

महाराज श्री ने एक बहुत सुन्दर भजन श्रोताओं के श्रवण कराया, भजन के बोल हैं "एक दिन भोले भंडारी, बन के ब्रज की नारी वृन्दावन आ गए" जिसे सुन सभी श्रद्धालु मन्त्र मुग्ध हो गए।

वंशीवट जहाँ महारास हो रहा था, वहाँ गोलोक वासिनी गोपियाँ द्वार पर खड़ी हुई थीं। पार्वती जी तो महारास में अंदर प्रवेश कर गयीं, किंतु द्वारपालिकाओं श्री ललिता जी ने ने श्री महादेव जी और श्री आसुरि मुनि को अंदर जाने से रोक दिया, बोलीं, “श्रेष्ठ जनों” श्रीकृष्ण के अतिरिक्त अन्य कोई पुरुष इस एकांत महारास में प्रवेश नहीं कर सकता।
भगवान शिव बोले की तो क्या करना पड़ेगा?

ललिता सखी बोली की आप भी गोपी बन जाओ। भगवान शिव बोले की जो बनाना हैं जल्दी बनाओ लेकिन मुझे महारास में प्रवेश जरूर दिलाओ।

भगवान शिव को गोपी बनाया जा रहा हैं। मानसरोवर में स्नान कर गोपी का रूप धारण किया है। श्री यमुना जी ने षोडश श्रृंगार कर दिया, तो सुन्दर बिंदी, चूड़ी, नुपुर, ओढ़नी और ऊपर से एक हाथ का घूँघट भी भगवान शिव का कर दिया। साथ में युगल मन्त्र का उपदेश भगवान शिव के कान में किया है। भगवान शिव अर्धनारीश्वर से पूरे नारी-रूप बन गये। बाबा भोलेनाथ गोपी रूप हो गये। फिर क्या था, प्रसन्न मन से वे गोपी-वेष में महारास में प्रवेश कर गये।

भगवान ने जब भगवान शिव को देखा तो समझ गए। भगवान ने सोचा की चलो भगवान शिव का परिचय सबसे करवा देते हैं जो गोपी बनकर मेरे महारास का दर्शन करने आये हैं। सभी गोपियाँ भगवान शिव के बारे में सोच के कह रही हैं ये कौन सी गोपी है। है तो लम्बी तगड़ी और सुन्दर। कैसे छम-छम चली जा रही है। भगवान कृष्ण शिव के साथ थोड़ी देर तो नाचते रहे लेकिन जब पास पहुंचे तो भगवान बोले की रास के बीच थोड़ा हास-परिहास हो जाएं तो रास का आनंद दोगुना हो जायेगा। भगवान बोले की अरी गोपियों तुम मेरे साथ कितनी देर से नृत्य कर रही हो लेकिन मैंने तुम्हारा चेहरा देखा ही नहीं हैं। क्योंकि कुछ गोपियाँ घूंघट में भी हैं।

गोपियाँ बोली की प्यारे आपसे क्या छुपा है? आप देख लो हमारा चेहरा। लेकिन जब भगवान शंकर ने सुना तो भगवान शंकर बोले की ये कन्हैया को रास के बीच क्या सुझा, अच्छा भला रास चल रहा था मुख देखने की क्या जरुरत थी। ऐसा मन में सोच रहे थे की आज कन्हैया फजती पर ही तुला हैं।

भगवान कृष्ण बोले की गोपियों तुम सब लाइन लगा कर खड़ी हो जाओ। और मैं सबका नंबर से दर्शन करूँगा। भगवान शिव बोले अब तो काम बन गया। लाखों करोड़ों गोपियाँ हैं। मैं सबसे अंत में जाकर खड़ा हो जाऊंगा।कन्हैयाँ मुख देखते देखते थक जायेगा। और मेरा नंबर भी नही आएगा।

सभी गोपियाँ एक लाइन में खड़ी हो गई। और अंत में भगवान शिव खड़े हो गए। जो कन्हैया की दृष्टि अंत में पड़ी तो कन्हैया बोले नंबर इधर से शुरू नही होगा नंबर उधर से शुरू होगा।

भगवान शिव बोले की ये तो मेरा ही नंबर आया।

श्रीराधा आदि श्रीगोपीश्वर महादेव के मोहिनी गोपी के रूप को देखकर आश्चर्य में पड़ गयीं। तब श्रीकृष्ण ने कहा, “राधे, यह कोई गोपी नहीं है, ये तो साक्षात् भगवान शंकर हैं। हमारे महारास के दर्शन के लिए इन्होंने गोपी का रूप धारण किया है। तब श्रीराधा-कृष्ण ने हँसते हुए शिव जी से पूछा, “भगवन! आपने यह गोपी वेश क्यों बनाया? भगवान शंकर बोले, “प्रभो! आपकी यह दिव्य रसमयी प्रेमलीला-महारास देखने के लिए गोपी-रूप धारण किया है।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा

3Apr 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 30 मार्च से 5 अप्रैल 2018 तक Sri Mandir Cumberland Road, Auburn, NSW, Sydney (Australia) में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि संसार में बहुत से चीजे दुर्लभ होती हैं लेकिन जब भगवान कृपा करता है तो छप्पर फाड़ कर करता है। उन्होंने कहा की पुत्र का होना, धन का होना, गाड़ी का होना, घर का होना बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात है संत का समागम, संत का मिलना, संत के दर्शन और संत मिलेंगे तो हरि चर्चा होगी। संत का मिलना दुर्लभ है लेकिन अगर संत मिल जाए और हरि कथा मिल जाए तो समझ लेना भगवान ने अपने कृपा के द्वार तुम्हारे लिए खोल दिए हैं।

महाराज श्री ने कहा कि जब भी कोई भक्ति के मार्ग पर चलता है तो उसे कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ता है और इसका सामना उन्हीं को करना पड़ता है जो अच्छी राह पर चलते हैं। महाराज श्री ने एक वाक्या सुनाते हुए कहा कि एक बार ब्रह्मा जी ने भगवान से पूछा कि हे प्रभु जो आपके भजन करता है आपकी उसकी ही परीक्षा क्यों लेते हो ? भगवान ने बहुत अच्छा जवाब देते हुए कहा कि जो भी व्यक्ति भक्ति करता है उसमें अहंकार होता है। उसमें अहंकार इस प्रकार से होने लगता है कि वो व्यक्ति कहने लग जाता है कि मैं भजन बहुत करता हूं, मैं कथा बहुत सुनता हूं, ये मंदिर मैं ही चला रहा हूं दूसरा कोई चला ही नहीं सकता, ये जो अंहकार रूपी कैंसर हैं इसकी वजह से जीव परमात्मा से दूर होता चला जाता है। लेकिन भगवान को जिसके ऊपर विशेष कृपा होने लगती है उसका इलाज करते है। प्रभु कहते हैं कि जिस वस्तु पर व्यक्ति अहंकार करता है मैं उसकी वस्तु को धीरे धीरे छीन लेता हूं।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि भगवान नारायण वासुदेव और देवकी के घर में प्रकट हुए और वहां से गोकुल पहुंचे मईयां यशोदा के घर। 85 वर्ष की उम्र में बाबा के घर में लल्ला हुआ तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। पूरा ब्रज मंडल में गीत गूंज उठे नंद के आनन्द भयो, जय कन्हैया लाल की। मेरे कन्हैया को दिखावा नहीं पसंद जैसे हो वैसे ही उसके सामने जाओ वो तुमको अपना लेगा। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, क्यूंकि पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतनाका वध कर उसका कल्याण किया।
महाराज जी ने एक कृष्ण को चाहने वाले व्यक्ति की कहानी सुनाते हुए बताया की किसी ने श्री कृष्ण से पूछा की हे कृष्ण तुम्हारा नाम टेढ़ा, खड़े होने का स्टाइल टेढ़ा, हमेशा झूट बोलता है उसके सारे काम टेढ़े क्या अच्छा है तुममे, तब श्री कृष्ण मुस्कुराते हुए उस व्यक्ति को एक खूंटी का उदहारण देते हुए कहाँ की ये लो इस सीधी खूंटी पर ये वस्त्र टांगो तो वह व्यक्ति जब वस्त्र टांगने गया तो वो वस्त्र गिर गए फिर श्री कृष्ण ने उस व्यक्ति को टेढी खूंटी पर वस्त्र टांगने के लिए दिए तो वस्त्र आसानी से टंग गए। तब श्री कृष्ण ने मुस्कुरात हुए उस व्यक्ति को उनकी बात का जवाब देते हुए कहते है की जब श्री राम जी त्रेता युग में आये थे तब लोग एक दम सीधे हुआ करते थे और आसानी से मान जाया करते थे। लेकिन में द्वापर युग के अंत में कलयुग के कल्याण के लिए आया हूँ और इनको तारने के लिए सीधा बनने से काम नहीं चलेगा इनको भवसागर से पार करने के लिए मुझे टेड़ा बनना पड़ेगा।


अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।


श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? 
यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्व ही पहचान लिया है।
।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

31Mar 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 30 मार्च से 5 अप्रैल 2018 तक Sri Mandir Cumberland Road, Auburn, NSW, Sydney (Australia) में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा का एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया

श्रीमद् भागवत कथा के दूसरे दिन की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की कल के क्रम को आज याद दिलाते हुए कहा की प्रेतों का भी कल्याण कर देने वाली ये भागवत कथा जो बुरे से बुरे पापी का भी कल्याण कर देती है। जो व्यक्ति भागवत सुनता है उसके पाप को कटते ही है साथ ही पापों से लड़ने के लिए दो दिन मिलते हैं जिसने भी दो दिन पापों से लड़ लिया तीसरे दिन उसका मन घर में नहीं लग सकता इस बात की गारंटी है।

महाराज श्री ने कहा कि संसार में जब भी कुछ मन करता है हम तुरंत पहुंच जाते हैं लेकिन जब आत्म कल्याण की बारी आती है हम सोचने लग जाते हैं।

महाराज श्री ने जीवन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रशन पूछा की हमारे जीवन का लक्ष्य क्या है ? उन्होंने कहा कि हम हर चीज की योजना बनाते हैं, शादी के बाद जीवन में पार्टनर कैसा चाहिए ? बच्चे कितने चाहिए ? कौन से स्कूल में बच्चों को पढ़ाना चाहिए ? नौकरी कहा करनी है ? व्यापार क्या करना है ? गाड़ी कौन सी लेनी है ? मोबाइल लेने तक के लिए योजना बनाते है, हर चीज के लिए प्लानिंग करते हैं लेकिन जीवन कैसे जीना है इसकी प्लानिंग नहीं करते।

महाराज जी ने कहा कि जब व्यक्ति भगवान के बताए हुए कर्मों को नहीं करता और उनके द्वारा वर्जित कर्मों को करता है तो भगवान दुखी होते है फिर उसके परिणामों को भी भगवान को देना पड़ता है।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि कल का कथा क्रम में आपने भागवत का महात्यम जाना और आज की कथा प्रसंग में कलयुग की बात करेंगे। कलयुग के प्राणी का स्वभाव ही पाप कर्म में लिप्त रहना। कलयुग के लोगों में धर्म की प्रवृति बढ़ा कर उनका उद्धार करने की जिम्मेदारी श्री शुक जी को सौंपी गई और वह इसके लिए तैयार भी हो गए। भगवान की कथा वहीं कर सकता है जिसने भगवान का सानिध्य किया हो। श्री शुक जी महाराज जो राधा और कृष्ण के सम्मुख हमेशा रहे जिनको सानिध्य प्राप्त है उनको कहा कि आप जाओ और हमारी कथाओं का गायन करो। तो श्री शुक प्रभु की कथाओं का गायन करने के लिए कैलाश की ओर से आ रहे थे। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को

निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में राम नहीं, श्याम नहीं तो आराम नहीं।

श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज नेबताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुपगए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के
ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहरआने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी, उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।

महाराज श्री ने कहा कि हमको तो सदा ही अच्छे और बुरे का फर्क लेकर हीभगवान की भक्ति को करते रहना चाहिए। क्योँकि उसी के अनुसार ही हम अपने सभी कार्यों को कर सकते है। हमको तो सदैव ही अच्छे कार्य ही करने चाहिए और बुरे कार्यों से सदा के लिए ही दूर रहना चाहिए। तभी हमारा इस संसार में सही रूप से गुजारा हो सकता है। भगवान भी उन्ही का साथ देते है जो सदा अच्छे कर्मों में लिप्त रहते है। जो लोग सदा ही बुरे कार्य करते है उनसे तो भगवान सदा ही दूरी बनाये रखते है। तो आप सभी अच्छे कार्य करते रहो तो ठाकुर हमेशा ही तुमको अपना बनाये रखेंगे।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा

30Mar 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 30 मार्च से 05 अप्रैल 2018 तक Sri Mandir, Cumberland Road, Auburn, NSW, Sydney (Australia) में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरूआत विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत भागवत के प्रथम श्लोक उच्चारण के साथ की सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे! तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नम: !! महाराज श्री ने कहा सच्चिदानंद का काम है श्रृष्टि की रचना करना, पालन भी वहीं करते हैं, रचना भी वही करते हैं और वक्त गुजर जाने पर संहार भी वहीं करते हैं। जो पालन, सृजन और संहार के इक्लौते कारण हैं ऐसे सच्चिदानंद परमात्मा को हम कोटि कोटि नमन करते हैं।

महाराज श्री ने कहा कि श्रीमद् भागवत कोई साधारण ग्रंथ नहीं है। यह ग्रंथ प्रभु से निकला है, सर्वप्रथम नारायण, नारायण से ब्रह्मा, ब्रह्मा जी से नारद जी, नारद जी से वेद व्यास जी, वेद व्यास जी से शुकदेव जी उसके बाद आगे बढ़ा है। महाराज श्री ने कहा जिसके करोड़ो करोड़ो जन्मों के पुण्य एकत्रित हो वो व्यक्ति भागवत समपूर्ण सुन पाता है। जैसे ही जीव के मन में यह भावना आती है कि मुझे भागवत सुनना है भगवान उसी वक्त उसके ह्रदय में कैद हो जाते हैं। यह कथा देवताओं को नसीब नहीं हुई लेकिन हमें नसीब हुई है। 
महाराज श्री ने कहा कि शास्त्रों में लिखा है जो व्यास जी हमें कथा सुनाते हैं वो साक्षात भगवान होते हैं क्योंकि भगवान की चर्चा भगवान के अलावा कोई कर ही नहीं सकता है। जब शुकदेव जी कथा सुना रहे थे तो उस वक्त शुकदेव जी को श्रीकृष्ण कहा गया, वो इसलिए कहा गया क्योंकि कृष्ण के अलावा कृष्ण को कोई गा ही नहीं सकता। ये भागवत आपको गोपी बना देती है, कृष्ण का दिवाना बना देती है। 
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि नेमिषासरणय में 88 हजार सनकादिक ऋषि विराजमान हैं और सभी ऋषियों के बीच में एक ही बात पर विचार हो रहा है की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? जितने भी ग्रंथ हुए है, पुराण हुए हैं सभी में एक ही बात की चर्चा हुई है, कलयुग के लोगों की चर्चा हुई है। क्योंकि वो जानते हैं की कलयुग के लोग ही ऐसे है जो कहते हैं हमे भगवान पर, धर्म पर विश्वास नहीं है। कलयुग का व्यक्ति स्वाभाविक तौर पर पापी होता है तो ऋषियों ने कहा महाराज कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा, इनके पास समय का अभाव है। इसके अलावा ओर प्रशन किए कि भगवान अगर सर्वसामर्थयवान है तो उसे अवतार लेने की क्या जरुरत है ? एक ओर प्रशन है कि भगवान के अवतार हुए तो कितने हुए ? एक ओर प्रशन है कि भगवान श्रीकृष्ण जब पृथ्वी छोड़ कर गए तो धर्म किसकी शरण में गया ? 


महाराज श्री ने कथा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि शूद जी महाराज कहते हैं सनाकदिक मुनियों से कहा हे ऋषियों तुम धन्य हो जो तुमने जन कल्याण के लिए प्रशन किया है। शूद जी महाराज ने कहा जीन लोगों को कल काल में अपना कल्याण करना हो उन लोगों को श्रीमद् भागवत कथा सुननी चाहिए। जिन लोगों को बार बार जन्म नहीं लेना, बार बार मरना नहीं है, जिन्हें मोक्ष चाहिए उन्हें भागवत कथा सुननी चाहिए। ऋषियों ने कहा कि हे प्रभु ये भागवत सुनने से क्या किसी का कल्याण हुआ है इसका महात्यम क्या है ? शूद जी महाराज ने कथा का महात्यम सुनाते हुए कहा कि एक आत्म देव नाम के ब्राह्मण थे, भगवत भजन करते थे गाने वाले, वेद पाठी ब्राह्मण थे, उनकी पत्नी का नाम धूंधली था जो उनकी उलट थी, पति की बात नहीं मानती थी। वो बहुत दुखी थे बच्चे भी नहीं थे, गाय लाते थे तो दूध नहीं देती थी, वृक्ष लगाता हूं तो फल नहीं देता, कुछ भी काम बनने से पहले बिगड़ जाता था, अपने दुखों को देखकर उन्हे आत्मदाह का विचार आया। जब वह आत्मदाह के लिए जाने लगे तो एक ब्राह्मण वहां से गुजरे उन्होंने आत्मदेव की पूछा की तुम्हारे दुखों का कारण क्या है, तो उन्होंने कहा कि मेरा कोई पुत्र नहीं है इसलिए मैं दुखी हूं, मेरा कुछ भी काम नहीं बनता है, मैं रोज भगवान की पूजा पाठ करता हूं फिर भी मुझे इतना दुख दे रहे है, मुझसे अब यह सब बर्दाशत नहीं होता है। संत बोले चलो मैं तुम्हे बताता हूं, संत ने आत्मदेव का हाथ देखा तो पता चला कि उनके सात आगे और सात पीछे जन्म तक कोई संतान नहीं है। तो संत ने बात को घूमाते हुए पूछा की बताओ तुमहे संतान क्यों चाहिए। आत्मदेव बोले इसकी तीन वजह हैं पहली वो मेरा वंश बढ़ाएगा, दूसरा बुढ़ापे में मेरी सेवा करेगा और तीसरा मेरे बुढ़ापे का सहारा बनेगा। आत्मदेव की बाते सुनकर संत ने दया करते हुए उन्हें फल दिया और कहा की ये अपनी पत्नी को खिला देना, आत्मदेव वो फल लेकर आए और अपनी पत्नी को कहा कि ये फल खा लेना लेकिन तभी उनकी बहन आ गई ओर उसने बोल की ये फल मत खाना पता नहीं संत ने इसमें कुछ मिला दिया हो तो, तू इस फल को गाय को खिला दे इसकी भी तो संतान नहीं हो रही है और मैं गर्भ से हूं जो भी संतान होगी मैं तुझे लाकर दे दूंगी तू अपने पति को कह देना यही हूई है। आत्मदेव की पत्नी गर्भवती होने का नाटक करने लगी और उन्हें तीर्थ पर भेज दिया। जब उसकी बहन का पुत्र हुआ तो उसका नाम रख दिया धूंधकारी और गाय को जो फल खिलाया था उससे भी एक पुत्र हुआ लेकिन उसके कान गऊ जैसे थे तो उसका नाम रखा गऊकर्ण। संत के दिए फल का असर है की गऊकर्ण संस्कारी हुआ और धूंधकारी महाखल हुआ। धूंधकारी की दुष्टता देखकर आत्मदेव रोने लगे ओर कहने लगे की इससे तो मैं पहले ही अच्छा था जो मेरे घर में पुत्र नहीं था। धूंधकारी दिन प्रतिदिन बिगड़ता चला गया, वेश्यावृति करने लगा, मदिरापान करने लगा, अपनी मां को पीटने लगा। जब धूंधली को पीटा तो उसे लगा की जो मैने अपने पति की बात नहीं मानी ये उसका दुष्परिणाम है, अगर मैने अपने पति की बात मान ली होती तो ये दिन नहीं देखना पड़ता, मेरा पुत्र गऊकर्ण होता धूंधकारी नहीं होता, ये सोचकर उन्होंने भी कुएं में कूदकर खुदकुशी कर ली। गऊकर्ण भी तीर्थ पर निकल पड़े। धूंधकारी ने देखा की अब तो कोई भी नहीं है तो वो ओर बिगड़ गया उसने 4-5 गर्णिकाओं को अपने साथ रख लिया लेकिन ऐसे बुरे लोगों से तो बुरे लोग भी दुखी हो जाते हैं तो एक दिन उन्होंने धूंधकारी को चारपाई से बांध दिया और जलती हुई लकड़ी लेकर उसे पीटने लगी। वो चीखने लगा उसकी चीखे सब ने सुनी लेकिन बचाने कोई नहीं गया। पीटने से वो मर गया और प्रेत बन गया। जब गऊकर्ण को पता चला की मेरा भाई प्रेत बन गया है तो उन्होंने सूर्यनारायण से पूछा के मैं अपने भाई के कल्याण के लिए क्या करू तो सूर्य नारायण भगवान ने कहा कि श्रीमद् भागवत कथा उन्हें सुनाओ। तो जब भागवत कथा शुरू होने वाली थी तो धूंधकारी का प्रेत एक बांस में आकर बैठ गया, तो सांतवे दिन उस बांस के दो भाग हो गए और आकाश से धूंधकारी को लेने के लिए आकाश के विमान आया, जब देवदूत धूंधकारी को ले जाने लगे तो गऊकर्ण ने पूछा कि कथा तो हम सब ने सूनी है तो तुम एक को ही क्यों ले जा रहे हो, जब कथा सब ने एक समान सुनी है तो फल भी तो एक समान मिलना चाहिए सभी को। तो देवदूतों ने कहा कि कथा तो सबने सुनी है लेकिन श्रवण भेद है। कोई जिसने जिस इच्छा को लेकर कथा सुनी है उसकी वहीं इच्छा पूरी हुई है। धूंधकारी ने भागवत मुक्ति के लिए सुनी है इसलिए इसकी मुक्ति हुई है। धन्य है ये भागवत ग्रंथ जिसको सुनकर प्रेत का भी कल्याण हो गया।


।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

29Mar 2018

आज पूज्य महाराज श्री का सिडनी, ऑस्ट्रेलिया एयरपोर्ट पर भक्तों ने स्वागत किया।

आज पूज्य महाराज श्री का सिडनी, ऑस्ट्रेलिया एयरपोर्ट पर भक्तों ने स्वागत किया। यहां पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 30 मार्च - 5 अप्रैल 2018 तक श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।

28Mar 2018

ऑस्ट्रेलिया-न्यूज़ीलैंड-फिजी यात्रा पर जाने से पहले पूज्य महाराज श्री ने श्री बांके बिहारी जी मंदिर में ठाकुर जी के दर्शन कर उनसे आशीर्वाद लिया।

ऑस्ट्रेलिया-न्यूज़ीलैंड-फिजी यात्रा पर जाने से पहले पूज्य महाराज श्री ने श्री बांके बिहारी जी मंदिर में ठाकुर जी के दर्शन कर उनसे आशीर्वाद लिया। तत्पश्चात मंदिर के बाहर भिक्षुओं को दक्षिणा प्रदान कर सफल यात्रा की कामना की।

28Mar 2018

पूज्य महाराज श्री ने ऑस्ट्रेलिया-फिजी की यात्रा से पूर्व सर्वप्रथम ठा. श्री प्रियाकान्त जू भगवान के दर्शन कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया।

आज पूज्य महाराज श्री ने ऑस्ट्रेलिया-फिजी की यात्रा से पूर्व सर्वप्रथम ठा. श्री प्रियाकान्त जू भगवान के दर्शन कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद दिल्ली एयरपोर्ट के लिए प्रस्थान किया। दिल्ली एयरपोर्ट पर भक्तों ने महाराज श्री को ऑस्ट्रेलिया के लिए विदा किया।

25Mar 2018

महाराज श्री के सानिध्य में इंदौर में मनाया गया होली महोत्सव।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी के सानिध्य में बाणेश्वर कुंड, बाणगंगा, उज्जैन नाका, इंदौर में श्रीमद् भागवत कथा के समापन के बाद 25 मार्च 2018 को राम नवमी के शुभ अवसर पर होली महोत्सव का आयोजन किया गया।

होली का आनन्द लेने से पूर्व महाराज श्री ने पंडाल में मौजूद लाखों की संख्या में आए श्रोताओं को राम नवमी की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि श्रीराम जैसा आदर्श, अद्भुत चरित्र ना पहले हुआ है और ना आगे होगा। आज हमारे भारतीय समुदाय में जो युवाओं में भारी बदलाव आया है उसका कारण है रामायण को भुलना। श्रीराम हम लोगों के लिए सिर्फ भगवान ही नहीं हैं, आज भारत में रहकर इस बात का विवाद होता है कि राम मंदिर बनना चाहिए की नहीं बनना चाहिए। महाराज श्री ने कहा कि मैं तो चाहूंगा भारत सरकार को राम नवमी पर यह उपहार दे देना चाहिए था भारतवासियों को, तो राम मंदिर बन कर तैयार हो गया होता अब तक। हम भगवान राम से यह प्रार्थना करेंगे कि भगवान इतनी सामर्थ दे की भारत को इतना भव्य राम मंदिर प्राप्त हो की आने वाली पीढ़ी उस मंदिर में दर्शन करने के बाद अपने चरित्र को सदमार्ग पर लेकर चल सके, ऐसा भव्य राम मंदिर बनना चाहिए।

महाराज श्री ने होली महोत्सव की शुरुआत राधा कृष्ण और होली के सुंदर भजनों के साथ की। श्रीमुख से निकले भजनों पर समस्त भक्तगण नाचने से खुद को रोक ना सके और होली के भजनों में जमकर झूमे। ब्रज मंडल से आए कलाकारों ने रंगारंग कार्यक्रम और श्रीकृष्ण-राधा रानी की लीलाओं से महोत्सव में चार चांद लगा दिए।

महाराज श्री ने सुंदर भजनों के लठ्मार होली के साथ फाग महोत्सव की शुरुआत की। लठ्मार होली में गोपियों ने गवालों पर खूब लठ्ठों की बरसात की। लठ्मार होली के बाद लड्डूओं की होली खेली गई जिसमें श्रद्धालुओं पर लठ्ठुओं की बरसात की गई। फिर बारी आई फूलों कि होली की, राधारानी और बाकें बिहारी पर महाराज श्री के भजनों के साथ फूलों की बरसात की गई। महाराज श्री ने भी श्रद्धालुओं के साथ फूलों की होली का आनन्द लिया और उनपर फूल बरसाएं। बाकें बिहारी की आरती के साथ होली महोत्सव का समापन किया गया।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

24Mar 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 18 मार्च से 25 मार्च तक बाणेश्वर कुंड, बाणगंगा, उज्जैन नाका, इंदौर में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु ने रुकमणी-श्रीकृष्ण विवाह और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

महाराज श्री ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि ये भागवत कथा कल्पवृक्ष है जो मांगोगे वो मिलेगा लेकिन पहले नियमों का पालन करो। सिद्धांत के साथ कथा सुनो। भागवत हमे थोड़ा नहीं बल्कि बहुत कुछ देती है बस लेना आना चाहिए। 


महाराज जी ने कहा कि हर किसी महिला का सम्मान करना चाहिए। भारत ही नहीं पूरे विश्व की महिलाएं भोग की वस्तु नहीं हैं। अगर सही मायनों में हम देवियों का सम्मान करें तो भोग नहीं यह योग करा दें और तुम्हे ईश्वर से मिला दें, यह ऐसी हैं भारत की देवी। सभी स्त्रियों का सम्मान करें । उन्होंने कहा कि युवाओं को ध्यान देना चाहिए कि अगर तुम सिर्फ अपनी बहन का सम्मान करोंगे तो तुम्हारी बहन मार्केट में जाते ही असुरक्षित हो जाएगी। 


महाराज श्री ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि पुराणों की कथा के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि को नरकासुर नाम के असुर का वध किया। नरकासुर ने 16 हज़ार 100 कन्याओं को बंदी बना रखा था। नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा की समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। इस कारण भगवान ने 16000 रूप बनाकर सबके साथ एक मुहूर्त में एक साथ विवाह किया था। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने इतने विवाह किये। भगवान ने कामनावश विवाह नहीं किया था, करुणावश किया था। भगवान कहते हैं जिसको कोई नहीं अपनाता अगर वो मेरी शरण में आये तो मैं उसे अपना लेता हूँ।

महाराज जी ने कहा कि कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने इतने विवाह किये। भगवान ने कामनावश विवाह नहीं किया था, करुणावश किया था। भगवान कहते हैं जिसको कोई नहीं अपनाता अगर वो मेरी शरण में आये तो मैं उसे अपना लेता हूँ।
भगवान श्री कृष्ण ने कामदेव पर विजय प्राप्त की है। उनके संकल्प मात्र से उनके पुत्रों की गिनती एक लाख इकसठ हजार अस्सी थी। भगवान श्री कृष्ण ने आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन किया। भगवान अपने मुकुट पर मोर पंख इसीलिए लगाते हैं क्योंकि मोर एकमात्र ऐसा प्राणी है जो सम्पूर्ण जीवन में ब्रह्मचर्य का पालन करता है। मोरनी का गर्भ भी मोर के आंसुओ को पीकर ही धारण होता है। इत: इतने पवित्र पक्षी के पंख भगवान खुद अपने सर पर सजाते है।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

24Mar 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में बाणेश्वर कुंड, बाणगंगा उज्जैन नाका, इंदौर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा का 24 मार्च को समापन हुआ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में बाणेश्वर कुंड, बाणगंगा उज्जैन नाका, इंदौर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा का 24 मार्च को समापन हुआ। कथा समापन के उपरांत महाराज श्री ने कथा पंडाल एवं पंडाल के बाहर उपस्थित भक्तों से व्यक्तिगत तौर पर भेट कर अभिनंदन स्वीकार किया। भक्तों का इतना प्यार देख कर महाराज श्री अभिभूत हो गए। महाराज श्री ने सभी भक्तों का धन्यवाद करते हुए अगले वर्ष पुन: मिलने के वचन के साथ विदा ली। इंदौर में आयोजित इस वर्ष की कथा में प्रतिदिन डेढ़ लाख लोगों ने कथा का रसपान किया।

23Mar 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 18 मार्च से 25 मार्च तक बाणेश्वर कुंड, बाणगंगा, उज्जैन नाका, इंदौर में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

“पद प्रतिष्ठा मिलने पर अभिमान नहीं करना चाहिए, अभिमान करोगे तो सबकुछ बेकार हो जाएगा : देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”

महाराज श्री ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कंचन तजना सहज है, सहज तिया का नेह, मान बढ़ाई ईर्ष्या दुर्लभ तजना येह अर्थात सोना त्यागना सरल है और घर छोड़ना भी सरल है लेकिन मैं कहीं जाऊं और लोग मुझे प्रणाम ना करें और इससे मुझे दुख ना हो ये तजना मुश्किल है। किसी बहुत अच्छा काम करने वाले या किसी बड़े नामधारी व्यक्ति से मुझे जलन ना हो ये मुश्किल है। महाराज श्री ने कहा कि हमारे कान हमारी प्रशंसा सुनना चाहते हैं लेकिन हाथ अच्छा काम नहीं करते जिससे प्रशंसा हो। प्रशंसा उनकी ही होगी जो प्रशंसनीय कार्य करेंगे हर किसी की प्रशंसा नहीं हो सकती। 
महाराज जी ने कहा कि संसार में कुछ पद मिल जाए, प्रतिष्ठा मिल जाए, सम्मान मिल जाए कुछ भी मिलने के बाद आप अभिमानी हो जाओ तो सबकुछ बेकार है। भगवान ने तुम्हे जो भी दिया है प्रसाद समझ कर स्वीकार करो। विन्रम बने रहो अगर विन्रम रहोगे तो आज तो तुम्हारे पास है वो रात दिन ओर बढ़ेगा। हमसब को भगवान के शरण में शत् शत् नमन करना चाहिए और अभिमान नहीं करना चाहिए। जहां अभिमान होता है वहां भगवान नहीं होता और जहां भगवान नहीं होता वहां यश नहीं होता, सम्मान नहीं होता। 


महाराज जी ने कल की कथा का प्रसंग याद कराते हुए कहा कि श्री श्याम सुंदर ने सभी ब्रज वासियों से गिरिराज भगवान की पूजा करवाई जिससे देवराज इंद्र क्रोधित हो उठे। उन्होंने प्रल्यकारी मेघो से कहा जाओ और ब्रज के ऊपर इतनी घनघोर वर्षा करो कि एक भी ब्रजवासी जीवित ना बचे, आदेश पाकर मेघो ने प्रलयकारी वर्षा की। श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठ ऊंगली पर गिरिराज पर्वत उठाया और सभी ब्रजवासियों को सुरक्षित किया। महाराज जी ने कहा सच यह है काम, क्रोध, ईर्ष्या, लोभ, मोह यही प्रलयकारी मेघ हैं जो हम सब को भगवान से दूर करत हैं लेकिन जब श्रीकृष्ण अपने कृपा रुपी पर्वत को उठा लें और हम सब पर्वत के नीचे आ जाएं तो हम सब सुरक्षित हो जाते हैं हमे कुछ नहीं होता। देवराज इंद्र को अभिमान हो गया था कि मेरी पूजा कोई कैसे छीन सकता है, वो सब को डूब देना चाहते हैं, सब को मिटा देना चाहते हैं, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने कनिष्ठ उंगली पर पर्वत उठा कर बता दिया कि यहां जो भी होता है मेरे इशारे पर होता है तुम कुछ नहीं कर सकते। अंत: इंद्र त्राहि माम् करते हुए भगवान की शरण में पहुंचे और क्षमा मांगी। 


महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं।

2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

22Mar 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 18 मार्च से 25 मार्च तक बाणेश्वर कुंड, बाणगंगा, उज्जैन नाका, इंदौर में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने श्री कृष्ण के जन्म की खुशी, पुतना चरित्र, श्रीकृष्ण की लिलाओं वृतांत सुनाया।

महाराज श्री ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि रे मन हरि चरणन नित सुमिरन कीजे, ये जो मानव जीवन है ठाकुर ने बड़ी कृपा करके हमें दिया है और ठाकुर की कृपा को व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए। भगवान ने जो कृपा की है उसका सदुपयोग करें। प्रभु ने कितनी भारी कृपा करके हमें भारत में जन्म दिया, अगर भारत में हम नहीं जन्म लेते कहीं ओर लेते तो राम और कृष्ण के बारे में क्या जान पाते। प्रभु ने हमें भारत का मानव बना कर भागवत कथा पंडाल में बैठा दिया।

महाराज श्री ने कहा कि अपने गुरू मंत्र में सच्ची निष्ठा रखना, दुनिया बदल जाए पर तुम्हारा भाव नहीं बदलना चाहिए। मंत्र में तुम्हारी जितनी निष्ठा होगी पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण किसी भी दिशा में से भगवान तुम्हारी रक्षा करने के लिए उपस्थित होगा इसमे कोई दो राय नहीं।


देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हम दुनिया में आते ही रिश्ते बनने लग जाते हैं, लेकिन भगवान से संबंध बनाने में देर कर देते हैं। देर नहीं करना चाहिए जिस दिन ठाकुर ये सोच दे दे की मैं ठाकुर का हूं और ठाकुर मेरे उस ही दिन संबंध मुझे ठाकुर से जोड़ लेने की जिद्द कर लेनी चाहिए। एक विश्वास के साथ कर्म जोड़ लेना चाहिए।


आज पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करने से पूर्व महाराज श्री ने कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा।।

21Mar 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 18 मार्च से 25 मार्च तक बाणेश्वर कुंड, बाणगंगा, उज्जैन नाका, इंदौर में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में वामन अवतार का वृतांत सुनाया एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव को धूमधाम से मनाया।

महाराज श्री ने कथा की शुरुआत एक शायरी के साथ कि उन्होंने कहा
बनतो को बिगड़ते देखा है, बिगड़ो को भी बनते देखा है ।
जो खूब अकड़ के चलते थे उन्हें मिट्टी में मिलते देखा है ।। 
तमन्ना अगर है तुझे आनन्द की, तो फिर फिकरत कर फकीरों की ।
नहीं वो लाल मिलता है अमीरों के खजाने में ।।

महाराज श्री ने कहा कि जिस सुख की तलाश में यह दुनिया है मेरे प्यारे वह सुख बड़े महलों में नहीं मिलता बल्कि किसी की सेवा में मिलता है, फकीरों की सेवा में मिलता है। सुख वो नहीं है जो आलिशान महलों में मिलता है बल्कि सुख वो है जो यहां जमीन में बैठे हुए आनन्द ले रहे हो।
महाराज जी ने कहा है कि अगर इस भवसागर से पार होना चाहते हो तो अपने जीवन में भगवत नाम की शरण ग्रहण कर लेनी चाहिए।

महाराज श्री ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हँप कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।
शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।


इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।

महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।


दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।
महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

20Mar 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 18 मार्च से 25 मार्च तक बाणेश्वर कुंड, बाणगंगा, उज्जैन नाका, इंदौर में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस मनुष्य की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

महाराज श्री ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि संसार में तीन तरह के लोग होते है, एक आम के वृक्ष की तरह, एक कटहेर के वृक्ष की तरह, एक गुलाब के पुष्प की तरह। जो कटहेर की तरह होते हैं वो सिर्फ करते हैं कहते नहीं है, जो आम के वृक्ष की तरह होते हैं वो जो कहते हैं वो ही करते हैं और जो गुलाब के फूल की तरह होते हैं वो करते कुछ नहीं हैं सिर्फ कहते रहते हैं। इनमें से सर्वश्रेष्ठ श्रेणी है कटहेर के वृक्ष की तरह करो कहो मत, अच्छे कर्म कभी किसी से कहने नहीं चाहिए। हम लोगों में ऐसे लोगों की आबादी बहुत है जो कहते तो बहुत कुछ हैं लेकिन करते कुछ नहीं हैं।
महाराज श्री ने आगे कहा कि आज हमारे सत्य सनातन धर्म को हम सब की आवश्यकता है। सनातन धर्म के लिए अगर कुछ ना कर सको तो बस इतना करो कि अपनी आने वाली पीढ़ी को धर्मात्मा बना दो। हमारे जाने के बाद भी हमारे घर में ठाकुर जी की पूजा बंद नहीं होनी चाहिए, कृष्ण की भक्ति होती रहे, मंदिर में घंटी बजती रहे कम से कम अपने धर्म के ऊपर ऐसा उपकार जरुर करो। इसलिए मैं कहता हूं बच्चों को लेकर कथा में बैठा करो क्या पता किस बाल गोपाल में भक्त भक्ति जागृत हो जाए और हमारी सात पीढ़ीयों को तार दे।

महाराज श्री ने कहा कि जो लोग यह कहते हैं कि भजन हम बुढ़ापे में करेंगे वो अपने साथ सबसे बड़ा धोखा कर रहे हैं। भगवान का भजन अगर करना है तो बचपन से शुरु कर दो क्योंकि बचपन से शुरु कर दिया भजन तो तुम्हारी जवानी सुधर जाएगी और जवानी सुधर गई तो जिंदगानी सुधर जाएगी। 
महाराज जी ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।

राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

19Mar 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 18 मार्च से 25 मार्च तक बाणेश्वर कुंड, बाणगंगा, उज्जैन नाका, इंदौर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

“भागवत नाम जीवन में सबसे बहुमूल्य संपत्ति हैं "

महाराज श्री ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि संतो के आशिर्वाद रुपी वृक्ष के नीचे जो विराजमान हो जाते हैं वो देश, जाति, धर्म भूलकर एक ही परिवार के नजर आते हैं और कृष्ण की कथा और संतो के मुख से निकली बाते भगवान के दर्शन तो कराते ही है साथ ही इस लायक बना देते ही की परमात्मा भी उस जीव के बिना फिर रह नहीं पाते हैं।

महाराज श्री ने कहा की गीता ना सिर्फ हमे गोविंद का बनाती है बल्कि हमें जीवन जीना सीखाती है। उन्होंने कहा की गीता ना सिर्फ हिंदूओं का ग्रंथ है बल्कि गीता पूरे मानव जाती का ग्रंथ है जिसने गीता को अपना लिया है वो पूरे जीवन में विजयी हो गया है।

महाराज श्री ने कहा की भागवत में कहा गया है जो फल हमें कल्प वृक्ष से नहीं मिल सकता वो फल हमें गुरु कृपा से मिल सकता है। अगर परमात्मा का साक्षात्कार करना है तो उसके लिए गुरू कृपा आवश्यक है। संत वहीं होता है जो गोविंद से मिलाता है।

महाराज श्री ने कहा की जितने भी हमारे ग्रंथ है वो हमें भगवान से मिलाते हैं। आपका विश्वास उन संतों में होना चाहिए वो आपको हरि से मिलाए।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

18Mar 2018

आज इंदौर, मध्यप्रदेश में कथा से पहले विशाल कलश यात्रा निकाली गई।

आज इंदौर, मध्यप्रदेश में कथा से पहले विशाल कलश यात्रा निकाली गई। इस भव्य कलश यात्रा में सैंकड़ों माताएं बहनें कलश उठाकर कथा पंडाल पहुंची। जहाँ तक दृष्टी जा रही थी वहीं तक माताएं बहने सिर पर कलश उठाये दिख रही थी मानो यूँ लग रहा था कि पूरे इंदौर की माताएं बहने कलश यात्रा में आ गई हो। यह दृश्य देखने योग्य था।

महाराज श्री के सानिध्य में इंदौर में 18 - 25 मार्च 2018 तक श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। सभी इंदौर वासियों से निवेदन है की बढ़-चढ़ कर कथा पंडाल में आकर कथा का रसपान करें।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

18Mar 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 18 मार्च से 25 मार्च तक बाणेश्वर कुंड, बाणगंगा, उज्जैन नाका, इंदौर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

"केवल भागवत ही ऐसा औषधालय है जहां सभी रोगों का इलाज है। यह भागवत ग्रंथ सभी रोगों का इलाज करता है।"

धर्मरत्न, शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि आज से सनातन धर्म का नववर्ष शुरू हो गया है। एक अरब 96 करोड़, 53 हजार 119 वर्ष पुराना है हमारा सत्य सनातन धर्म और हम कितने भाग्यशाली है कि हम इस धर्म के कण हैं और हमे इस बात पर गर्व होना चाहिए। महाराज जी ने कहा कि उनका नववर्ष रात में शुरू होता है और हमारा नववर्ष सूर्य उदय के साथ शुरू होता है। वो रात से ही नशा करके गिर पड़ते हैं और हम देवी मां की पूजा करके नवरात्र के साथ प्रारंभ नववर्ष करते हैं। हमारे ऋषि मुनियों का नववर्ष यही है। महाराज जी ने समस्त देशवासियों को हिंदू नववर्ष की शुभकामनाएं दी।

महाराज जी ने कहा कि कोई काम का रोगी है, कोई क्रोध का रोगी है, कोई लोभ का रोगी है, कोई लालच का रोगी है, रोगी तो हम सब हैं। केवल भागवत ही ऐसा औषधालय है जहां सभी रोगों का इलाज है। यह भागवत ग्रंथ सभी रोगों का इलाज करता है।

महाराज जी ने कहा कि दूसरों को दुख देना पाप है और दूसरों को सुख देना पुण्य है और जो दूसरों को सुख देना जानते हैं उन्ही को परमात्मा याद करते हैं। जो दूसरो को दुख देना जानते हैं उन्हें परमात्मा छोडिए समाज भी याद करना नहीं चाहता। महाराज जी ने कहा कि संतो का संग करोगे तो इस लायक बनोगे दुनिया भगवान को याद करती है, भगवान तुमहे याद करें ऐसा संत बना देते हैं, भगवान की कथा इस लायक बना देती है।

महाराज जी ने कहा की हरि अंनत है और हरि की कथा भी अनंत है। हमारी और आपकी कथाओं का अंत होता है लेकिन हरि की कथा का अंत किसी भी युग में नही हुआ। जैसे प्रभु नित्य नुतन है वैसे ही प्रभु की कथा भी नित्य नुतन है, भगवान की कथा जब भी सुनो नई ही लगती है।

ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत का महात्यम क्या है ? एक बार सनकादिक ऋषि और शुक जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। इस सांसारिक जीवन में जो कुछ भी प्राप्त किये हो सब किराए के मकान की तरह है। खाली करना ही पड़ेगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा।

।। राधे-राधे बोलना पडेगा।।

15Mar 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 07 मार्च से 15 मार्च 2018 तक गर्दनीबाग संजय गांधी स्टेडियम, पटना में आयोजित विशाल श्री राम कथा के नवम दिवस पर महाराज श्री ने राम कथा में आज नवधा भक्ति से नवमी भक्ति का वर्णन, सबरी का प्रेम , लंका दहन , रावण का वध और राम का राज्य अभिषेक आदि सुन्दर वृतांतों का विस्तार से वर्णन किया और सुन्दर भजनो का भक्तों को श्रवण कराया।

|| नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना॥
||नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरुष सचराचर कोई ||

आज महाराज जी ने कथा में बताया की राम कथा हमे ईश्वरवादी बनाती है, सत्यवादी बनाती है और प्रेमवादी बनाती है। आज महाराज जी ने नवी भक्ति को बताया की रामायण में नवी भक्ति है सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्षित रहना। इन नवों में से जिनके एक भी होती है, वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो वो मुझे पा लेता है।

महाराज जी ने कथा प्रसंग बताया की भक्ति हो तो सबरी जैसी जिसने हज़ारों वर्ष इंतज़ार किया प्रभु श्री राम का क्योकि सबरी एक अछूत थी और वह साधु - संतों की सेवा करना चाहती थी पर कोई उसकी सेवा कोई स्वीकार नहीं करता था परन्तु वह साधु- संतों के आने जाने वाले मार्ग में झाड़ू लगाकर उसको साफ़ करती थी। इस बात से प्रसन्न हो कर मतंग ऋषि ने उसको अपने आश्रम में सबरी को स्थान दिया जब गुरु जी वैकुंठ धाम को प्रस्थान करने लगे तो सबरी ने कहा गुरु जी आप के सिवा मेरा कोई नहीं है अब आप भी जा रहे हो अब में किसके सहारे रहूँगी। तब उसके गुरु जी कहा की तुम यह आश्रम छोड़ कर कही नहीं जाना दुनिया भगवान् को ढूंढ़ती पर सबरी प्रभु राम तो स्वयं ढूंढते हुए आएंगे। तो देखिये सबरी को अपने गुरु के वाक्यों पर कितना विश्वास है कि उसने हज़ारो वर्ष तक भगवान् की राह देखि और भगवान श्री राम माता सीता को खोजते हुए लक्ष्मण के साथ सबरी के आश्रम आये और देखिये सबरी के प्रेमभाव में डुवे हुए झूठे बेर खाये। ऐसा है भक्त का भाव और प्रभु का प्रेम। 
श्री रघुनाथजी फिर आगे चले। ऋष्यमूक पर्वत निकट आ गया। वहाँ मंत्रियों सहित सुग्रीव रहते थे। अतुलनीय बल की सीमा श्री रामचंद्रजी और लक्ष्मणजी को आते देखकर,सुग्रीव अत्यंत भयभीत होकर बोले- हे हनुमान्‌! सुनो, ये दोनों पुरुष बल और रूप के निधान हैं। तुम ब्रह्मचारी का रूप धारण करके जाकर देखो। हनुमान जी जब उनके पास गए तो प्रभु को पहचानकर हनुमान्‌जी उनके चरण पकड़कर पृथ्वी पर गिर पड़े। हनुमान जी ने सुग्रीव से प्रभु की मित्रता कराई और बाली का वध कर सुग्रीव की किष्किंधा का राजा बनाया।सुग्रीव ने अपनी सभी बानर सेना को चारो दिशाओं में भेजा धीरबुद्धि और चतुर नील, अंगद, जाम्बवान्‌ और हनुमान! तुम सब श्रेष्ठ योद्धा मिलकर दक्षिण दिशा को जाओ और सब किसी से सीताजी का पता पूछना।

हनुमान जी ने समुद्र लाँघ कर रावण के भाई बिभीषन से मिले जिन्होंने बताया की माता जानकी को रावण ने अशोक वाटिका में रखा है।तब हनुमान्‌जी विदा लेकर चले सीताजी को देखकर हनुमान्‌जी ने उन्हें मन ही में प्रणाम किया। उन्हें बैठे ही बैठे रात्रि के चारों पहर बीत जाते हैं। शरीर दुबला हो गया है, सिर पर जटाओं की एक वेणी (लट) है। हृदय में श्री रघुनाथजी के गुण समूहों का जाप (स्मरण) करती रहती हैं। हनुमान जी ने सीता को राम जी की मुद्रिका दी और उनकी चूड़ामणि ले कर लंका में आग लगाकर प्रभु राम के पास पहुंचे।

राम जी ने समुद्र पर सेतु का निर्माण किया और लंका पर चढाई की और रावण सहित सारे कुल का नाश कर दिया और सीता जी को लेकर अयोध्या लौटे अपने चौदह वर्ष का वनवास को पूरा कर। उधर भरत जी ने अयोध्या के सिंहासन से प्रभु की पादुका को हटा कर रख दिया। और पूरे विधि विधान से राम जी का राजतिलक किया गया और राम ऐसे अयोध्या के राजा बने अपनी सारी मर्यादा को निर्वाह करते हुए। राम जी का सारा जीवन एक सीख है मानव जीवन को जीने के लिए हमे प्रभु श्री राम का अनुसरण करते हुए जीवन को जीये तो हमारा कल्याण हो जायेगा।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

14Mar 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 07 मार्च से 15 मार्च 2018 तक गर्दनीबाग संजय गांधी स्टेडियम, पटना में आयोजित विशाल श्री राम कथा के अष्टम दिवस पर महाराज श्री ने राम कथा में आज आठवीं भक्ति, राम जी द्वारा भरत जी को चरण पादुका देना,अनुसुइया चरित्र, सुपर्णखा का सुन्दर वृतांतों का विस्तार से वर्णन किया और सुन्दर भजनो का भक्तों को श्रवण कराया।

|| आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा॥

महाराज श्री ने बताया कि मानव जीवन का वह अनमोल समय जो बचपन में खेलकूद में खोया, भरी जवानी जी भर सोया, देख बुढ़ापा फिर क्यों रोया। अगर सही समय पर हम प्रभु का ध्यान कर लगे तो बुढ़ापे मे कभी रोना नहीं पड़ेगा। संतों ने मानव जीवन बहुत को महत्वपूर्ण बताया है जब हमे सही चीज़े समझ नहीं आती तो यह हमारा दुर्भाग्य है और जब सही चीज़े समझ आजाये तो वही हमारा सौभाग्य है। आज आठवे दिन भक्ति का आठवां स्परूप है जो कुछ मिल जाए, उसी में संतोष करना और स्वप्न में भी पराए दोषों को न देखना। पर आज कलयुग में तो व्यक्ति जो है उसमे संतोष नहीं करता और केवल दूसरे पर क्या है इससे ही दुखी होते है। और अपने दोष कभी नहीं दिखाई देते बस दूसरों के की दोष ही देखने में ही लगा रहता है।

कथा के प्रसंग को बढ़ाते हुए महाराज जी ने कहा की कल भरत और राम का वन में मिलाप हुआ तो राम जी भरत जी को समझाते है की पिता की आज्ञा का पालन करना ही हमारा धर्म है और मुझे ही वन में रहना होगा क्योकि भरत जी को अयोध्या का राज सम्हालना होगा ये ही पिता की आज्ञा है। तो भरत जी अयोध्या वापस जाने के को तैयार नहीं थे क्योकि वो राम जी को छोड़ कर नहीं रहना चाहते। 
क्योकि भरत जी बोलते है अब पिता का हाथ हमारे सर पर नहीं है और तात अब आप भी वन में रहेंगे तो मै अकेले कैसे रहुँगा तब श्री राम ने उनको समझाया की तुम अकेले नहीं तो अनुज गुरु , राजा जनक और सभी माताओ का हाथ तुम्हारे साथ है तुम निश्चिन्त होकर राज्य करो क्योकि प्रजा को देखना अब तुम्हारा कर्तव्य है। तब भारत जी ने कहा की आपकी आज्ञा शिरोधार्य है पर आप तात आप मुझे कुछ ऐसा दीजिये जिनको लेकर में आपकी संरक्षण में राज्य का पालन पोषण कर सकूँ। तब राम जी ने अपने चरण पादुका भरत जी को दी और भरत जी ने उनको अपने सिर पर रखा और वहां से लेकर अयोध्या के सिंहासन पर रखा और राम जी का सेवक बन उनकी अनुपस्थिति में राज्य की देख रेख की। राम जी ने वन में कष्ट सहे और उधर भरत जी ने अयोध्या में रहकर कष्ट सहे।

एक बार सीता जी का राम जी श्रृंगार कर रहे थे तभी इंद्र का पुत्र जयंत ने कौआ का वेश बनाया और सीता जी के पैर में चोंच मार दी यह देखने के लिए की राम में कितना बल है तभी भगवान् ने उसके पीछे छोड़ दिया और जयंत भागा पर पुरे ब्रह्मांड में किसी ने उसकी रक्षा नहीं की तब उसने राम जी के चरण में आया तो भगवान् ने उसको क्षमा कर दिया पर उसकी एक आँख फोड़ दी। इसका अर्थ यह है कि आपको अपनी किये का फल तो भुगतना ही पड़ेगा पर भगवान् की शरण में आजाने से उनका दंड कुछ कम हो जाता है। इस लिए हमे भगवान के शरण में हमेशा ही रहना चाहिए जिससे जाने अनजाने हुए पापो के फंद कटजाये।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

12Mar 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 07 मार्च से 15 मार्च 2018 तक गर्दनीबाग संजय गांधी स्टेडियम, पटना में आयोजित विशाल श्री राम कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने राम कथा में आज परशुराम - लक्ष्मण संवाद, सीता - राम विवाह, सीता विदाई, राम का राज्याभिषेक कैकई - राम संवाद आदि वृतांतों का विस्तार से वर्णन किया और सुन्दर भजनो का भक्तों को श्रवण कराया।

|| छठ दम सील बिरति बहु करमा ||

महाराज जी के कहा की छठवीं भक्ति है, जो शीलवान पुरुष अपने ज्ञान और कर्मेन्द्रियों पर नियंत्रण रखते हुए भगवद् सुमिरन करते हैं। पर हम लोग तो पाने अंदर से मै को ही नहीं निकाल पाते तो भगवान् की प्राप्ति कैसे होगी। मनुष्य जब इस संसार में आता है तो सभी चीजों पर ध्यान रखता है, खाना भी समय पर खाता है, नहाना भी समय पर करता है, लेकिन अगर कही कटौती करता है तो भगवान के भजन में करता है। दुनिया का हर काम पहले करता है भजन पीछे रह जाता है। ऐसा नहीं करना चाहिए। दुनिया के सारे काम को छोड़कर जो सबसे पहले जो नाम जपे वो ही मानव जीवन के लिए सचेत है और जागरुक है।जिनके ह्रदय में कुछ नहीं होता, छल कपट नहीं होता ऐसे भक्तों के भगवान दिवाने हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया भगवान की दिवानी है लेकिन जो सरल ह्रदय वाले होते हैं उनके भगवान दिवाने हो जाते हैं।

महाराज जी ने कल के कथा क्रम को याद करते हुए कहा कि ऋषि विश्वामित्र ने राम और लक्ष्मण को राजा दशरथ से मांग कर लेगये और तड़का का वध किया। उधर जनक राजा ने सीता का स्वयंवर रखा जहां शिव धनुष तोड़ने वाले की साथ सीता का विवाह होगा। गुरु की आज्ञा पाकर राम जी ने उस धनुष को तोड़ दिया और उस धनुष की भयंकर ध्वनि सुन परशुराम वहां पधारे और क्रोधित हुए की उनका दिया हुआ शिव धनुष किसने तोडा ? फिर लक्ष्मण जी से उनका विवाद हुआ और अंत में राम जी ने परशुराम जी से विनय की और उन्होंने राम को पहचान लिया की वो स्वयं विष्णु का अवतार है। इस तरह सीता - राम स्वयंवर का हुआ।

उधर राजा दशरथ को समाचार मिला और वो बारात लेकर अयोध्या से मिथिला की और प्रस्थान किया। और चारो बहनों का विवाह चारों भाइयों के साथ संपन्न हुआ। विवाह के बाद राजा जनक ने अति भारी ह्रदय से अपने ह्रदय के टुकड़े को अयोध्या के लिए विदा किया। उधर अयोध्या में चारो ऒर मंगल ध्वनि गूंज रही थी और सभी रानियों ने चारो बेटे और बहुओ का स्वागत किया। सभी और प्रसन्नता थी पर ये खुशियाँ अधिक दिन तक कही नहीं टिकती है। एक दिन राजा दशरथ सभा में बैठे थे की उनका मुकुट थोड़ा हिल गया तो दर्पण में देखा राजा ने तो उनको अपने केश सफ़ेद दिखाई दिए तो उनके मन में विचार आया कि राम का राज्याभिषेक कर दिया जाये और अयोध्या का राजा बना दिया जाये गुरुओं से परामर्श के बाद यह निर्णय लिया गया की कर राम का राजतिलक किया जायेगा।

प्रत्येक अयोध्यावासी प्रसन्न था परन्तु केवल एक को छोड़ कर वो थी मंथरा उसने जब यह समाचार सुना तो वो कैकई के पास जाकर बोली की तुम यह क्या होने दे रही हो राम अगर राजा होगा तो तुम और तुम्हारा पुत्र सदैव के लिए राम के दास हो जाओगे उसने कैकई के कान भरे और इस तरह भूमिका बनी राम के वनबास जाने की। क्योकि यदि राम को वनबास नहीं होगा तो रावण का वध कैसे होगा ? ऐसी है प्रभु की लीला। इस संसार में प्रत्येक काम के पीछे कोई न कोई कारण निहित होता है पर हम अज्ञानी लोग इस बात को समझ नहीं पाते और दुखी होते है। ये अज्ञान को दूर करने के लिए निश्छल होकर भगवान् की भक्ति करे तो बड़े से बड़ा संकट भी सहने की क्षमता आजाती है।

|| राधे - राधे बोलना पड़ेगा ||

13Mar 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 07 मार्च से 15 मार्च 2018 तक गर्दनीबाग संजय गांधी स्टेडियम, पटना में आयोजित विशाल श्री राम कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने राम कथा में आज सातवीं भक्ति,निषाद राज का प्रभु को गंगा पार उतरना, राम - भरत मिलन, भ्रात प्रेम आदि सुन्दर वृतांतों का विस्तार से वर्णन किया और सुन्दर भजनो का भक्तों को श्रवण कराया।

|| सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा ||

आज कथा का सातवां दिन था महाराज श्री ने सातवीं भक्ति के विषय में बताया की अगर व्यक्ति इन नौ भक्ति में से एक भक्ति भी पाले तो ईश्वर को निश्चित पा लेगा। सातवीं भक्ति में व्यक्ति सारे संसार को प्रभु रूप में देखते हैं। और संतों को सबसे अधिक मान देता है वो प्रभु की सातवीं भक्ति को प्राप्त करता है। हमे किसी से लड़ने से पहले, किसी को अपशब्द कहने से पहले किसीका बुरा करने से पहले ये सोचना चाहिए की उसमे भी उसी ईश्वर का अंश है जो मुझमे है। तो आप किसी का बुरा नहीं कर सकते क्योकि भगवान् का दर्शन आपको प्रत्येक जीव में होगा। और कभी संतों का अपमान नहीं करना चाहिए।

महाराज श्री ने कथा के प्रसंग को बताया की प्रभु राम माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वन को प्रस्थान कर गए तो जब निषादराज ने यह खबर पाई, तब आनंदित होकर उसने अपने प्रियजनों और भाई-बंधुओं को बुला लिया और भेंट देने के लिए फल, मूल (कन्द) लेकर प्रभु से मिलने के लिए चला। उसके हृदय में हर्ष का पार नहीं था। निषाद राज ने प्रभु राम की चरण वंदना की और भगवान् से बोले कृपा करके श्रृंगवेरपुर में पधारिए और इस दास की प्रतिष्ठा बढ़ाइए। श्री रामचन्द्रजी ने कहा- हे सुजान सखा! तुमने जो कुछ कहा सब सत्य है, परन्तु पिताजी ने मुझको और ही आज्ञा दी है मुझे चौदह वर्ष तक मुनियों का व्रत और वेष धारण कर और मुनियों के योग्य आहार करते हुए वन में ही बसना है, गाँव के भीतर निवास करना उचित नहीं है। यह सुनकर निषाद राज को बड़ा दुःख हुआ। रात्रि विश्राम किया और सुबह श्री रामचन्द्रजी ने जबर्दस्ती सुमंत्र को लौटाया। और गंगा के तीर पर आए वह केवट से नाव माँगी पर केवट ने मना कर दिया क्योकि आप को मैंने पहचान लिया है आपके पाँव के छूते ही मेरी नाव भी अहिल्या के सामान स्त्री रूप हो जाएगी फिर हम क्या करेंगे ये नाव ही हमारी रोज़ी है। तब प्रभु ने पूँछा की आप ही बताओ केवट राज की हम गंगा को कैसे पार करे ? तब केवट ने कहा हे प्रभु! यदि आप अवश्य ही पार जाना चाहते हो तो मुझे पहले अपने चरणकमल पखारने के लिए कह दो। श्री राम जी की आज्ञा पाकर केवट ने चरणों को धोकर और सारे परिवार सहित स्वयं उस चरणोदक को पीकर फिर आनंदपूर्वक प्रभु श्री रामचन्द्रजी को गंगाजी के पार ले गया।

गंगा पार कर प्रभु प्रयाग पहुंचे और वहाँ अनेक ऋषियों से मिले वहां वाल्मीकि मुनि से भेट की और उनसे पूछा की हे मुनि वर यह बताइये की हम कहा निवास करे तब मुनिवर बोले आप तो हर जगह निवास करते है आपको निवास की क्या चिंता फिर भी प्रभु आप चित्रकूट में अपनी कुटिया बनाई। उधर भरत जी को बुलावा भेजा तो वह अपनी ननिहाल से वापस आये और जब अयोध्या का यह हाल देखा तो, समझ नहीं पारहे की आखिर क्या हुआ अयोध्या में मातम क्यों है ? दशरथ जी के स्वर्गवासी होने का समाचार मिला और यह जब पता चला की सब के पीछे का कारण जाना तो अपनी माता को खरी खोटी सुनाई और यह कहा की तुम कैसी माता हो की तुमने राज्य और बैभव के लिए अपने पुत्र को ही त्याग कर दिया तो आप ही इस राज्य का भोग करे। यह राज्य भाई राम का है पिता जी के वचन के खातिर भैया ने बनवास को स्वीकार किया तो में भी उसी रघुकुल का ही पुत्र हूँ मै भी प्रतिज्ञा करता हूँ की यह अयोध्या का राज भैया राम का ही है और उनका ही रहेगा मै भी इस सिंहासन का परित्याग करता हूँ। ऐसा है भ्रात प्रेम।

आज हमारे समाज को जरूरत है इसी भ्रात प्रेम की आज भाई भाई का दुश्मन बन गया है लोगो का चरित्र ही इतना गिर गया है कि दो गज भूमि के लिये आज भाई भाई की हत्या तक कर देता है। और वहाँ भाई - भाई की खातिर सिंहासन को ठुकरा रहा है ऐसा है रामायण में एक एक चरित्र जो हमे जीवन जीने का सही मार्ग दिखता है। इसलिए हमे अपने घरों में फिर से रामायण को लाना होगा और अपने युवाओ को चरित्रवान बनाना होगा।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

9Mar 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 07 मार्च से 15 मार्च 2018 तक गर्दनीबाग संजय गांधी स्टेडियम, पटना में आयोजित विशाल श्री राम कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने राम कथा में आज भक्ति का दूसरा प्रकार, सती चरित्र आदि रामकथा के सुन्दर वृतांतों का विस्तार से वर्णन किया और सुन्दर भजनो का भक्तों को श्रवण कराया।

महाराज जी ने कहा की राम की कथा जीवन के सारे द्वंदों को समाप्त करती है। राम की कथा मानव को मानव बनती है। जिसने भी अपने जीवन में एक अंश भी राम की कथा को उतार लिया तो उस व्यक्ति को असल में जीना आगया।

महाराज जी ने कथा का प्रसंग बताते हुए कहा कि श्री राम का सम्मान करिये, श्री राम का गुरगान करिये, भगवान श्री राम ने जो मानव को दिया हैं कोई नहीं दे सकता, भगवान श्री राम ने अपने चरित्र से उपदेश दिए हैं।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

 

10Mar 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 07 मार्च से 15 मार्च 2018 तक गर्दनीबाग संजय गांधी स्टेडियम, पटना में आयोजित विशाल श्री राम कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने राम कथा में आज भक्ति का चौथा प्रकार, राम के जन्मोत्सव, राम जी की बाल लीलाओ का आदि सुन्दर वृतांतों का विस्तार से वर्णन किया और सुन्दर भजनो का भक्तों को श्रवण कराया।

|| गुर पद पकंज सेवा तीसरि भगति अमान। चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान ||

महाराज जी ने कथा के चतुर्थ दिवस में बताया कि तीसरी भक्ति है अभिमान रहित होकर गुरु के चरण कमलों की सेवा और चौथी भक्ति यह है कि कपट छोड़कर मेरे गुण समूहों का गान करें। महाराज जी ने कहा की भगवान् की जब भक्ति करो तब चल कपट को त्याग कर जाओ। तो भगवान् आपको अपनायेगे जैसे हो वैसे ही जाओ अगर सुपर्णखा की तरह छल कपट कर जाओगे तो भगवान् कभी अपने पास भी नहीं भटकने देंगे। कल के कथा में आपने नारद मुनि का प्रसंग सुना जब नारद मुनि ने नारायण भगवान् को तीन श्राप दिए पहला की आपको मानव योनि में जन्म लेना होगा। दूसरा बंदरो से आपको सहायता लेनी होगी और तीसरा आपको भी स्त्री वियोग सहना होगा।आज कथा क्रम में महाराज जी ने बताया कि राजा मनु अपने पुत्र का राजपाट सौंपकर पत्नी के साथ भगवान की भक्ति करने के लिए वन में चले गए। उन्होंने भगवान विष्णु की तपस्या की और जब भगवान प्रसन्न होकर सामने आए तो दोनों ने भगवान से वर मांगा कि हमें आप जैसा पुत्र चाहिए। इस पर भगवान ने कहा कि मेरे जैसा तो मैं ही हो सकता हूं। इसलिए आपके अगले जन्म में ही आपके पुत्र के रूप में जन्म लूंगा। यही कारण था कि मनु और शतरूपा अगले जन्म में दशरथ व कौशल्या बने और भगवान विष्णु ने राम के रूप में उनके यहां जन्म लिया। 


अवधपुरी में रघुकुल शिरोमणि दशरथ नाम के राजा हुए, जिनका नाम वेदों में विख्यात है। वे धर्मधुरंधर, गुणों के भंडार और ज्ञानी थे। उनके हृदय में शांर्गधनुष धारण करने वाले भगवान की भक्ति थी और उनकी बुद्धि भी उन्हीं में लगी रहती थी। उनके तीन रानियां थी पर उनको एक ही दुःख था की उनके कोई संतान नहीं थी। राजा के मन में बड़ी ग्लानि हुई कि मेरे पुत्र नहीं है। राजा तुरंत ही गुरु के घर गए और चरणों में प्रणाम कर बहुत विनय की कभी भी अपना दुःख दुनिया के आगे न सुनाओ हमेशा अपना दुःख गुरु और गोविन्द के आगे ही सुनना। राजा ने अपना सारा सुख-दुःख गुरु को सुनाया। गुरु वशिष्ठजी ने उन्हें बहुत प्रकार से समझाया और वशिष्ठजी ने श्रृंगी ऋषि को बुलवाया और उनसे शुभ पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराया। मुनि के भक्ति सहित आहुतियाँ देने पर अग्निदेव हाथ में चरु (हविष्यान्न खीर) लिए प्रकट हुए। वशिष्ठ ने हृदय में जो कुछ विचारा था, तुम्हारा वह सब काम सिद्ध हो गया। हे राजन्‌! (अब) तुम जाकर इस हविष्यान्न (पायस) को, जिसको जैसा उचित हो, वैसा भाग बनाकर बाँट दो। इस प्रकार सब स्त्रियाँ गर्भवती हुईं। वे हृदय में बहुत हर्षित हुईं। उन्हें बड़ा सुख मिला। जिस दिन से श्री हरि (लीला से ही) गर्भ में आए, सब लोकों में सुख और सम्पत्ति छा गई। 
पवित्र चैत्र का महीना था, नवमी तिथि थी। शुक्ल पक्ष और भगवान का प्रिय अभिजित्‌ मुहूर्त था। दोपहर का समय था। न बहुत सर्दी थी, न धूप (गरमी) थी। वह पवित्र समय सब लोकों को शांति देने वाला था तब-

' भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥ 
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुजचारी।
भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी || '

वेद कहते हैं कि तुम्हारे प्रत्येक रोम में माया के रचे हुए अनेकों ब्रह्माण्डों के समूह भरे हैं। वे तुम मेरे गर्भ में रहे- इस हँसी की बात के सुनने पर धीर (विवेकी) पुरुषों की बुद्धि भी स्थिर नहीं रहती (विचलित हो जाती है)। जब माता को ज्ञान उत्पन्न हुआ, तब प्रभु मुस्कुराए। वे बहुत प्रकार के चरित्र करना चाहते हैं। प्रभु राम के जन्म के साथ साथ और तीनो भाइयो का भी जन्म हुआ। बच्चे के रोने की बहुत ही प्यारी ध्वनि सुनकर सब रानियाँ उतावली होकर दौड़ी चली आईं। दासियाँ हर्षित होकर जहाँ-तहाँ दौड़ीं। सारे पुरवासी आनंद में मग्न हो गए। छः महीने तक सूर्य अस्त नहीं हुआ इतना आंनद था।

इस प्रकार कुछ दिन बीत गए। दिन और रात जाते हुए जान नहीं पड़ते। तब नामकरण संस्कार का समय जानकर राजा ने ज्ञानी मुनि श्री वशिष्ठजी को बुला भेजा। और चारों भाइयों का नाम कारण किया कौशल्या के राम, कैकई के भरत और सुमित्रा के भरत और शत्रुघ्न। 
श्री रघुनाथजी से विमुख रहकर मनुष्य चाहे करोड़ों उपाय करे, परन्तु उसका संसार बंधन कौन छुड़ा सकता है। जिसने सब चराचर जीवों को अपने वश में कर रखा है, वह माया भी प्रभु से भय खाती है।
श्री रघुनाथजी प्रातःकाल उठकर माता-पिता और गुरु को मस्तक नवाते हैं और आज्ञा लेकर नगर का काम करते हैं। उनके चरित्र देख-देखकर राजा मन में बड़े हर्षित होते हैं। ऐसा है मेरे राम का चरित्र जो हर लीला में आज के युवको के लिए सीखने को कहती है कियोकि आज का युवा भटक रहा है कारण हमारे घरों में से रामयण नहीं रही तो चरित्र कहाँ बचेगा। इसलिए आप सभी अपने बच्चो को रामकथा जरूर सुनाये ताकि आपके घर से भी राम निकले नाकी रावण।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

11Mar 2018

आज धर्म रत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में युवा शांति संदेश का आयोजन गर्दनीबाग संजय गांधी स्टेडियम, पटना में किया गया।

आज धर्म रत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में युवा शांति संदेश का आयोजन गर्दनीबाग संजय गांधी स्टेडियम, पटना में किया गया जहाँ बहुत अधिक संख्या में बच्चों एवं युवाओं ने आकर इस आयोजन में अपने धर्म से सम्बंधित शंकाओं को महाराज जी के समक्ष रखा और पूज्य महाराज श्री ने बहुत ही सरलता से युवाओ की सभी शंकाओं का निवारण किया।

11Mar 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 07 मार्च से 15 मार्च 2018 तक गर्दनीबाग संजय गांधी स्टेडियम, पटना में आयोजित विशाल श्री राम कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने राम कथा में आज मुनी विश्वामित्र जी के यज्ञ, आदि सुन्दर वृतांतों का विस्तार से वर्णन किया और सुन्दर भजनो का भक्तों को श्रवण कराया।

मंत्र जाप मम दृढ़ विश्वासा । पंचम भक्ति सो बेद प्रकासा ।।

महाराज श्री ने कथा के पंचम दिवस में बताया कि पांचवी भक्ति है मंत्र जाप। महाराज जी ने कहा मंत्र जाप मम दृढ़ विश्वासा । पंचम भजन सो बेद प्रकासा ।। भगवान श्री राम ने कहा कि जो भी व्यक्ति दृढ विश्वास के साथ मंत्र का जाप करेगा मेरी भक्ति को प्राप्त होगा।

महाराज श्री ने कथा आज कथा क्रम में बताया श्रीराम अध्ययन करके वापस लोटे, मुनी विश्वामित्र जी ने सौ यज्ञ करने का संकल्प लिया। लेकिन जब भी वह यज्ञ करते तो राक्षस उनके यज्ञ में विघ्न डाल देते, पूजा सामग्री को तहस नहस कर देता। विश्वामित्र जी ने सोचा कि अब क्या किया जाए सौ यज्ञ कैसे पूरे होंगे। तभी उनहें राम जी का ख्याल आया। मुनी विश्वामित्र जी श्री राम जी को लेने अयोध्या चले गए। दशरथ जी ने जब उन्हे देखा तो वो बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने अपने सभी पुत्रों को उनसे मिलने के लिए बुलाया। प्रभु श्रीराम ने आकर विश्वामित्र जी को प्रणाम किया, प्रभु का दर्शन पाकर विश्वामित्र धन्य हो गए। महाराज दशरद ने पूछा कहिए प्रभु मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं तो विश्वामित्र जी ने कहा कि मैं आपके सहायता और रक्षा दोनों लेने आया हू। आप सहायता किजिए, रक्षा राम करेंगे। आप श्रीराम और लक्षमण को मेरे साथ भेज दिजिए। विश्वामित्र का कथन सुन दशरथ बोले आप मुझसे धन, दौलत, वैभव, मेरा राज्य, सब कुछ ले लिजिए लेकिन राम को मुझसे मत मांगिए। राजा की वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि विश्वामित्रजी ने हृदय में बड़ा हर्ष माना। तब वशिष्ठजी ने राजा को बहुत प्रकार से समझाया, जिससे राजा का संदेह नाश को प्राप्त हुआ। राजा ने बड़े ही आदर से दोनों पुत्रों को बुलाया और राजा ने बहुत प्रकार से आशीर्वाद देकर पुत्रों को ऋषि के हवाले कर दिया। फिर प्रभु माता के महल में गए और उनके चरणों में सिर नवाकर चल दिए।

महाराज श्री ने कहा कि जब मन में संदेह हो तो सत्संग में जाकर बैठ जाना चाहिए, जब भी हम सत्संग में जाकर बैठते है तो सारे संशय रुपी सर्प समाप्त हो जाते हैं

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

6Mar 2018

आज पूज्य महाराज श्री पटना एयरपोर्ट पहुँचे तो भारी संख्या में भक्तों ने महाराज श्री का स्वागत किया।

आज पूज्य महाराज श्री पटना एयरपोर्ट पहुँचे तो भारी संख्या में भक्तों ने महाराज श्री का स्वागत किया। भक्तों ने महाराज श्री को फूल माला, पुष्प गुच्छ आदि अर्पित किए। पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 7-15 मार्च 2018 तक पटना, बिहार में श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है।

7Mar 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 07 मार्च से 15 मार्च 2018 तक गर्दनीबाग संजय गांधी स्टेडियम, पटना में आयोजित विशाल श्री राम कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने राम कथा में आज भक्ति के प्रकार, महर्षि “वाल्मीकि” का चरित्र, गोस्वामी तुलसीदास जी का चरित्र आदि रामकथा के सुन्दर वृतांतों का विस्तार से वर्णन किया और सुन्दर भजनो का भक्तों को श्रवण कराया।

|| बिनु सत्संग विवेक न होई। रामकृपा बिनु सुलभ न सोई ||

श्री राम कथा के प्रथम दिवस पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा को प्रारम्भ करते हुए सर्वप्रथम भक्ति के विषय में कहा की नौ प्रकार की भक्ति का वर्णन शास्त्रों में किया गया है उसमे सबसे पहली भक्ति है संतो का संग। जब प्रभु की कृपा होती है तो सबसे पहले हमारे जीवन में किसी संत को भेजता है और वो संत का जब हमे संग मिलता है तो हमारे ह्रदय में भक्ति का जन्म होता है। 
परमात्मा की प्राप्ति और प्रभु के प्रति प्रेम उत्पन्न करने एवं बढ़ाने के लिए साधु पुरूष का संग करना और उनके उपदेशों को श्रद्धा व प्रेम से सुनकर तदनुसार आचरण करना, यह सत्संग है। जैसा संग, वैसा रंग। संग से ही मनुष्य की पहचान की जाती है। अतः अपनी उन्नति एवं वास्तविक सुख की प्राप्ति के लिए सदैव सत्संग करना चाहिए। शास्त्र कहते हैं कि मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है।

महाराज जी ने भक्ति और संत संग पर वृतांत सुनाया जिसमे एक डाकू को कैसे संत के संग ने राम के चरित्र का रचियता बना दिया। एक बार रत्नाकर नाम का एक डाकू हुआ करता था। एक बार की बात है, दिन छिप चुका था और थोड़ा अँधेरा हो रहा था, उस समय नारद मुनि उस जंगल में विचरण कर रहे थे कि तभी डाकू रत्नाकर ने अपने साथियों के साथ नारद जी को घेर लिया। नारद मुनि अपने आप में मग्न थे उनके मन में किसी प्रकार का कोई डर नहीं था।

रत्नाकर ने नारद जी से पूछा – सुनो ब्राह्मण, मैं रत्नाकर डाकू हूँ। क्या तुमको मुझसे भय नहीं लग रहा? नारद मुनि ने कहा – रत्नाकर मुझे किसी भी बात का भय नहीं है। मैं ना तो किसी असफलता से डरता हूँ और ना मुझे अपने प्राणों का भय है, ना कल का और ना कलंक का…..लेकिन शायद तुम डरे हुए हो….रत्नाकर ने गुस्से में कहा – मैं डरा हुआ नहीं हूँ, मुझे भला किसका डर है ?
नारद मुनि – अगर डरे नहीं हो तो इन जंगलों में छिप कर क्यों बैठे हो ? शायद तुम राजा से डरते हो या फिर प्रजा से रत्नाकर – नहीं मैं किसी से भी नहीं डरता नारद मुनि ने मुस्कुरा के कहा – तुम पाप करते हो और तुम पाप से ही डरते हो इसलिए तुम यहाँ छिप कर बैठे हो लेकिन शायद तुमको नहीं पता कि इस पाप के केवल तुम ही भागीदार हो। इसका दण्ड तुमको अकेले भुगतना होगा कोई भी तुम्हारा साथ नहीं देगा।

रत्नाकर ने गुस्से में कहा – तुम मुझे उकसा रहे हो ब्राह्मण….मैं ये सब काम अपने परिवार का पेट पलने के लिए करता हूँ और मेरी पत्नी, मेरे बच्चे, मेरे पिता सभी इस काम में मेरे साथ हैं
नारद मुनि ने कहा – सुनो रत्नाकर, मुझे अपने प्राणों का भय नहीं है, तुम मुझे यहाँ पेड़ से बांध कर अपने घर जाओ और अपने सभी परिवार से पूछो कि क्या वह इस पाप में तुम्हारे साथ हैं?

रत्नाकर को नारद मुनि की बात सही लगी और वह उनको पेड़ से बाँधकर अपने घर की ओर चल दिया। घर जाकर उसने सबसे पहले अपनी पत्नी से पूछा कि मैं जो ये पाप करता हूँ क्या तुम उस पाप में मेरे साथ हो ? तो पत्नी ने उत्तर दिया कि स्वामी आप इस परिवार के पालक हैं ये तो आपका कर्तव्य है इस पाप में मेरा कोई हिस्सा नहीं है।

रत्नाकर बेचारा उदास सा होकर अपने पिता के पास पहुँचा और उनसे भी यही सवाल पूछा तो पिता ने कहा – बेटा ये तो तेरी कमाई है, इस पाप में हमारा कोई हिस्सा नहीं है।डाकू रत्नाकर के प्राण सूख गए उसे ये सब सुनकर बहुत बड़ा धक्का लगा कि वह जिनके लिए ये पाप कर रहा है वो उसके पाप में भागीदार होने को तैयार नहीं हैं। रत्नाकर हताश होकर वापस नारद मुनि के पास गया और नारद मुनि के पाँव में गिर पड़ा और क्षमा मांगने लगा।

नारद मुनि ने उसे उठाया और सत्य का ज्ञान दिया। नारद मुनि ने कहा – सुनो रत्नाकर, इस धरती पर तुम जो भी कार्य करते हो, चाहे गलत या सही, सबका पाप और पुण्य तुमको ही मिलेगा। अपने सभी कुकृत्यों के लिए तुम ही जिम्मेदार हो। तुमने पुराने जीवन में जो कुछ पाप किये उसके जिम्मेदार भी तुम हो और आगे आने वाले जीवन में जो भी करोगे उसके भी जिम्मेदार अकेले तुम ही होंगे।

नारद मुनि ने रत्नाकर को सत्य से परिचित कराया और उन्हें “राम” का नाम जपने का उपदेश भी दिया। रत्नाकर से “राम” नाम लिया ही नहीं जाता था तो नारद मुनि ने उसे “मरा मरा” का उच्चारण करने को कहा और “मरा मरा” जपते हुए यही रत्नाकर राम नाम का जाप करने लगा और आगे जाकर यही रत्नाकर महर्षि “वाल्मीकि” के नाम ये प्रसिद्ध हुए महर्षि वाल्मीकि ने ही हिंदुओं के सबसे प्रसिद्ध ग्रन्थ “रामायण” को संस्कृत में लिखा।

ये सब कैसे हुआ की राम के जन्म होने से पहले ही उनके चरित्र को लिखने वाले महर्षि “वाल्मीकि” के मन में प्रभु नाम की भक्ति का जन्म हुआ वो त्रिकालदर्शी हो गए कियोंकि गुरु का संग मिला। और रत्नाकर को भी अपने गुरु पर पूर्ण विश्वास था तभी तो उल्टा नाम जपकर भी राम को पा लिया और आप तो इतने भाग्यशाली हो की आपके गुरु ने तो आपको भगवान का सीधा नाम जपना सीखाया आप भी अपने गुरु पर पूर्ण विश्वास करे निष्काम कर्म और उपासना से अंतःकरण शुद्ध होता है और रामकृपा मिलती है। सदगुरू के उपदेश को जीवन में उतारने से उनकी कृपा मिलती है। संत-महात्माओं की बिना किसी स्वार्थ के, सच्चे प्रेम से सेवा करनी चाहिए। भगवान् की प्राप्ति के लिए प्रयास करे तो राम जी आपको भी निश्चित प्राप्त होंगे।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

1Mar 2018

होली के पावन अवसर पर आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर के प्रांगण में होली महोत्सव मनाया गया।

होली के पावन अवसर पर आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर के प्रांगण में होली महोत्सव मनाया गया। जिसमें देश-विदेश से हजारों भक्त मौजूद रहे। इस अवसर पर भगवान ठा. प्रियाकान्त जू के दर्शन करने और पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में होली मनाने के लिए बॉलीवुड के जाने माने अभिनेता श्री गजेंद्र चौहान जी भी आये। प्रातः 7 बजे से मंदिर में हजारों भक्त पहुंच गए थे। सबसे पहले पारंपरिक ढोल नगाड़ों के साथ होली महोत्सव शुरू हुआ। इसके बाद बृज गोपियों कवितो की होली, लठ-मार होली, फूलों की होली, लड्डुओं की होली, रंग-गुलाल की होली मनाई गई। सभी भक्त महाराज श्री के भजनों में झूम उठे। इसके बाद महाराज श्री ने पिचकारी से सभी भक्तों पर भक्ति का रंग डाला लगभग 70-80 फ़ीट की ऊंचाई से इस पिचकारी की बौझार भक्तो पर पड़ रही थी। ।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

28Feb 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 22 फरवरी से 1 मार्च 2018 तक शांति सेवा धाम, वृन्दावन में आयोजित होली महोत्सव कार्यक्रम के अंतर्गत 108 श्रीमद भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत में आज रासपंचाध्यायी, श्री कृष्ण - रुक्मणि विवाह का सुन्दर वृतांत विस्तार से वर्णन किया और सुन्दर भजनो का भक्तों को श्रवण कराया।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करने से पहले कांची पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती जी के परम पिता परमेश्वर के धाम के लिए प्रस्थान करने पर शंकराचार्य जी को २ मिनट मौन धारण कर उनको भावभीनी श्रद्धांजलि दी।

पूज्य श्री ठाकुर जी महाराज ने कहा कि आपको कलयुग का प्रत्यक्ष दर्शन करना है तो आज करिये आज कल दो दिन से टीवी चैनल पर एक समाचार बार बार प्रसारित हो रहा है लेकिन सनातन धर्म के महान संरक्षक, वेदांती गुरु का निधन हुआ और सुबह से एक समाचार उनके लिए प्रसारित नहीं हुआ ये केवल कलयुग में ही संभव है। 
ठाकुर जी महाराज ने कहा कि यह मानव शरीर भगवान् की असीम अनुकम्पा से प्राप्त हुआ है और समय रहते हमे अपने लोक और परलोक सुधार लेने चाहिए और समय निकलने के बाद केवल पछतावा ही रह जायेगा। क्योकि धन - दौलत, घर -परिवार सब यही रह जायेगा बस प्रभु की भक्ति ही आपके साथ जायेगा। जो जगत पति जगन्नाथ की शरण में है वो कभी अनाथ नहीं होता है।

कल के क्रम में ठाकुर का विवाह रुक्मणि जी के साथ हुआ। द्वारिका में भगवान् ने अपना राज्य स्थापित किया। महाराज श्री ने आगे कहा कि पुराणों की कथा के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि को नरकासुर नाम के असुर का वध किया। नरकासुर ने 16 हज़ार 100 कन्याओं को बंदी बना रखा था। नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा की समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। इस कारण भगवान ने १६१०० रूप बनाकर सबके साथ एक मुहूर्त में एक साथ विवाह किया था। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने इतने विवाह किये। भगवान ने कामनावश विवाह नहीं किया था। श्री कृष्ण के 18 हजार से अधिक विवाहों के कारणों पर विस्तार से प्रकाश डालते महाराज जी ने कहा कि मोर आजीवन ब्रह्मचारी होता है। उसके आंसुओं को धारण करके मोरनी गर्भ धारण करती है। श्री कृष्ण भी मोर पंख धारी हैं। भगवान श्री कृष्ण की भी शादियों और पुत्रों की कुछ ऐसी ही लीलाये हैं। वे गोपियों के साथ तो रहते हैं। लेकिन उनका संग नहीं चाहते। करुणावश किया था। भगवान कहते हैं जिसको कोई नहीं अपनाता अगर वो मेरी शरण में आये तो मैं उसे अपना लेता हूँ। भगवान श्री कृष्ण ने कामदेव पर विजय प्राप्त की है। उनके संकल्प मात्र से उनके पुत्रों की गिनती एक लाख इकसठ हजार अस्सी थी। भगवान श्री कृष्ण ने आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन किया।

भगवान कृष्ण मित्र और शत्रु के लिए समान भावना रखते है इसके पीछे भी मोरपंख का उद्दारण देखकर हम यह कह सकते है। कृष्ण के भाई थे शेषनाग के अवतार बलराम और नागो के दुश्मन होते है मोर। अत: मोरपंख सर पर लगाके कृष्ण का यह सभी को सन्देश है की वो सबके लिए समभाव रखते है। मोरपंख में सभी रंग है गहरे भी और हलके भी। कृष्णा अपने भक्तो को ऐसे रंगों को देखकर यही सन्देश देते है जीवन ही इस तरह सभी रंगों से भरा हुआ है कभी चमकीले रंग तो कभी हलके रंग, कभी सुखी जीवन तो कभी दुखी जीवन।
इस मायावी दुनिया में देखा गया है कि जो प्यारा लगता है, हमें उसके अवगुण नहीं दिखाई देते और जिसे नापसंद करते हैं, हम उसके गुण नहीं देखते। नज़रिये के अनुसार ही नज़ारे दिखते हैं। लेकिन ध्यान रखना धर्म के विरुद्ध कभी मत जाना। बुराइयाँ खुद के लिए गड्ढा खोदती हैं। लेकिन जो सच प्रभु को प्रसन्न करना चाहते हो तो हमेशा दूसरों को खुशियाँ देना सीखो तुम्हें अपने आप खुशियाँ मिलती जाएँगी। अगर आपको कोई गलत बोले तो भी बुरा न मानो क्योकि वो कही न कही हमारे ही कर्म ही काट रहा है। क्योकि संसार में आने से पहले ही हमारा मृत्यु का समय , स्थान और कारन निश्चित कर देता है इसलिए अपने कर्मो को हमेशा सही रखना तो ईश्वर सदैव आपका हाथ थामे रखेगा।कथा के अंत में श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरण भी किया गया।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

27Feb 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 22 फरवरी से 1 मार्च 2018 तक शांति सेवा धाम, वृन्दावन में आयोजित होली महोत्सव कार्यक्रम के अंतर्गत 108 श्रीमद भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत में आज रासपंचाध्यायी, श्री कृष्ण - रुक्मणि विवाह का सुन्दर वृतांत विस्तार से वर्णन किया और सुन्दर भजनो का भक्तों को श्रवण कराया।

" जिस प्रकार पेड़ का स्वभाव फल देना, छांव देना होता है उस ही तरह संत का स्वभाव अपने बालकों पर दया करना होता है |"

श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की अपने शिशुओं का संरक्षण करना, उनकी देखभाल करना, उन्हें संस्कारवान बनाना, उन्हें आगे बढ़ाना यही बड़ो का बडप्पन है। बड़े तो पेड़ भी होते है लेकिन जो फल नहीं देता उसको तो हम सम्मान भी नहीं देते, सम्मान योग्य वही है जो फल भी दे, छांव भी दे, इस ही तरह माता - पिता का भी यह कर्तव्य है की वो बालक को केवल जन्म ही न दे अपितु उन्हें संस्कारवान भी बनाये। आज कलयुग में संस्कार की ही कमी दिखाई पड़ती है जो हमारे बच्चो को चारित्रिक पतन की और ले जारही है। ऐसे में संस्कार और प्रभु की भक्ति द्वारा बच्चों को नैतिकता की और ले चले। महाराज जी ने कहा की वृंदावन की भूमि प्रेम की खान है। सोने की खान में सोना मिलेगा, कोयले की खान में कोयला मिलेगा, हीरे की खान में हीरा मिलेगा वैसे ही प्रेम की खान में आ जाओ तो ठाकुर का प्रेम मिलेगा। उन्होंने कहा की अगर कहीं भक्ति महारानी सशरीर दिखाई दी तो वो वृंदावन धाम है।

महाराज ने कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। 


महाराज जी ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 .दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे।
3. तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कौन से व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के, गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया।

श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है। मंगलवार की कथा में श्री कृष्ण- रुक्मिणी विवाह का वर्णन हुआ। आज कृष्ण-रुक्मणि विवाहोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया गया एवं सभी भक्तों ने भगवान श्री कृष्ण-रुक्मणी की सुन्दर झांकी के दर्शन किये। कथा के मुख्य यजमान एवं सहयजमान व उत्सव यजमान ने कन्यादान की रश्म पूरी की और महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। भगवान श्री कृष्ण के विवाह में पूरा पंडाल झूम उठा भक्तों ने नृत्य कर बड़ी धूमधाम से भगवान श्री कृष्ण के विवाह के आयोजन का मनाया। कथा के दौरान पूज्य श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज के मंत्रमुग्ध कर देने वाले श्री कृष्ण के भजनों पर श्रोता झूमते नजर आए |

" राधे राधे बोलना पड़ेगा। "

26Feb 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 22 फरवरी से 1 मार्च 2018 तक शांति सेवा धाम, वृन्दावन में आयोजित होली महोत्सव कार्यक्रम के अंतर्गत 108 श्रीमद भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत में आज पूतना वध और श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुन्दर वृतांत विस्तार से वर्णन किया और सुन्दर भजनो का भक्तों को श्रवण कराया।

मन को साफ़ रखो, मर्यादा का पालन करों तो वृंदावन मे गोविंद की कृपा का अनुभव होगा।

पूज्य महाराज श्री ने कथा का प्रारम्भ करते हुए कहा की हम लोग ही बहुत ही भाग्यवान है क्योंकि हमे सब तरह के अंगों से भगवान ने संपन्न किया हुआ है। भगवान ने हमको हाथ, पैर, आँख, नाक, दिमाग सभी कुछ दिया हुआ है। मेरे ठाकुर जी ने हमको इतनी सुन्दर जिंदगी दी है। तो हमको उनके इस वरदान को कभी भी नहीं भूलना चाहिए। इस मानव योनि को प्राप्त करने के बाद भी अगर मानव मेरे प्रभु को याद न करे तो हमसे बड़ा आत्मघाती या पापी इस दुनिया में और कोई नहीं है। महाराज श्री ने कहा कि भगवान ने हर व्यक्ति को अपनी एक अलग ही समझ दी है। उसी के अनुसार ही हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार ही हर कार्य को करता है। कई अपनी समझ से अपने हर कार्य को भगवान की इच्छा मानकर ही करते है और सदा ही स्वच्छ मन से कार्य को करते है ताकि उनसे कोई भी गलती न हो और कुछ लोग अपने गंदे विचारो से ही कार्य को करते है और उन्ही में सदैव लिप्त रहते है। वो अच्छे और बुरे का फर्क नहीं समझते है। हमको तो सदा ही अच्छे और बुरे का फर्क लेकर ही भगवान की भक्ति को करते रहना चाहिए। क्योँकि उसी के अनुसार ही हम अपने सभी कार्यों को कर सकते है। हमको तो सदैव ही अच्छे कार्य ही करने चाहिए और बुरे कार्यों से सदा के लिए ही दूर रहना चाहिए। तभी हमारा इस संसार में सही रूप से गुजारा हो सकता है। भगवान भी उन्ही का साथ देते है जो सदा कर्मों में लिप्त रहते है। जो लोग सदा ही बुरे कार्य करते है उनसे तो भगवान सदा ही दूरी बनाये रखते है। 


महाराज जी ने कहा की माटी की भी कीमत होती है लेकिन मरने के बाद आपकी क्या कीमत है। इंसान के मरते ही उसके शरीर को जो किसी नाम से जाना जाता था पल भर में ही उसको डेडबॉडी कहने लगते है। 50- 100 वर्ष तक जो आपने नाम कमाया वो भी यही रह जायेगा लेकिन इंसान का चरित्र है जो कभी समाप्त नहीं होता। इंसान के कर्म ही हैं जो याद रहते हैं, इसलिए अच्छे कर्म करते रहिए।
वृंदावन में ठाकुर जी महाराज आज भी है बस आपको यहां अपना दिल साफ रखना होगा, यहा मर्यादा का पालन करना होगा, फिर निश्चित तौर पर गोविंद की कृपा अनुभव करोगे। यह भूमि का वरदान है, यहां प्रेम के खजाने में से जो ले जा सकते हो लेकर जाओ।


पूज्य महाराज श्री ने कृष्ण जन्म पर नंद बाबा नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। अब देखिये मेरे ठाकुर की माया की वो अपने भक्तो का ख्याल कैसे रखता है? जिसके घर 75 साल के उम्र में बालक का जन्म हो तो उसकी ख़ुशी का क्या ठिकाना होगा अनुमान लगाइये। क्योंकि मेरा ठाकुर को जो प्रेम से बुलाता है तो वो वहाँ जाये बिना नहीं रह सकते। इसी तरह आप नाम तो लेकर देखो मेरे कन्हैया का, पर मेरे कन्हैया को दिखावा नहीं पसंद जैसे हो वैसे ही उसके सामने जाओ वो तुमको अपना लेगा। जब पूतना भगवान के जन्म के 6 दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं। आप जैसे हो वैसे आओ रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के वेश रख कर शत्रुता निभाने आई थी। आज के युग में भी तो यही हो रहा है हम दिखते कुछ है और होता कुछ है। इसलिए आज प्रभु को पाने में कठिनाई है तुम जैसे हो लालची हो तो वैसे ही जाओ, कामी हो तो वैसे ही, पापी हो तो भी मेरा ठाकुर तुमको अपना लेगा। क्योंकि हो तो आखिर तुम उसके ही। रोज बोलो ठाकुर से जो हूँ जैसा हूँ तुम्हारा ही हूँ वो कब तक नज़र बचाएगा। मेरा ठाकुर इतना दयालु है तार ही देगा। जैसे माँ को बालक जैसा भी हो प्यारा लगता है वैसे तुम जैसे हो वैसे ही मेरे ठाकुर के हो जाओ तो वो तुमको अपना प्यारा बना ही लेगा। 
।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

25Feb 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 22 फरवरी से 1 मार्च 2018 तक शांति सेवा धाम, वृन्दावन में आयोजित होली महोत्सव कार्यक्रम के अंतर्गत 108 श्रीमद भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने भागवत में वामन अवतार, अजामिल कथा,भगवान् श्री कृष्ण का जन्मोत्सव आदि का वृतांत विस्तार से वर्णन किया और सुन्दर भजनो का भक्तों को श्रवण कराया।

" प्रभु की विशेष कृपा होती है तब पापों का नाश करने के लिए भागवत कथा प्राप्त होती है। "

पूज्य महाराज श्री ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की प्रभु की असीम अनुकम्पा का दर्शन यह है की हम सभी श्री वृन्दावन धाम में है और ये ही नहीं प्रियकांत जू की कथा उन्ही के प्रांगड़ में बैठ कर सुनने का सौभाग्य आप सभी भक्तो को प्राप्त हो रहा है। निश्चित ही कुछ पाप ऐसे होते है जो हमे अच्छे कर्मो से , भगवान की कथा से दूर करते है। और कुछ विशेष कृपा जब प्रभु की होती है तो हमारे पापो को नष्ट करने का प्रयास किया जाता है और वह भागवत कथा के माध्यम से होता है

चुतर्थ दिवस की कथा का वृतांत में महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण के प्राक्ट्य की कथा सुनाई मथुरा नगरी में राजा उग्रसेन जिनका एक पुत्र था कंस जो अपनी बहन देवकी को जब विवाह के बाद विदा करने जा रहे थे तो रस्ते में आकाशवाणी हुई की हे कंस तू जिस बहन को इतने आदर के साथ विदा कर रहा है उसीका आठवाँ पुत्र तेरा काल होगा इतना सुनते ही कंस ने देवकी के केश पकडे और रथ से नीचे उतर लिया। और देवकी से बोला की जब तू ही नहीं होगी तो तेरा पुत्र कैसे होगा तब वासुदेव जी कहा की तुम इतने कमजोर हो की स्त्री पर हाथ उठाते हो। जहाँ स्त्रियों का सम्मान होता है वह देवता वास करते है इसलिए कभी स्त्री पर हाथ नहीं उठाना चाहिये। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता भी वास करते है और जहाँ नारी का निरादर होता है वहां से लक्ष्मी रूठ कर चली जाती है। इसी परंपरा के अनुसार वसुदेव जी ने कंस से कहा की तुमको देवकी को मरने से क्या लाभ तुम्हारा काल तो उसका आठवाँ पुत्र है में तुमको वचन देता हूँ की मैं स्वयं तुमको देवकी के सभी पुत्रो को तुम्हें सौंप दूँगा परन्तु देवकी के प्राण मत लो। ऐसा सुन कंस ने उनको कारगर में डाल दिया। जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी के बंधन अपने आप खुल गए और वासुदेव जी कंस कारागार से भगवान् को लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। अब देखिये मेरे ठाकुर की माया की वो अपने भक्तो का ख्याल कैसे रखता है? जिसके घर ८५ साल के उम्र में बालक का जन्म हो तो उसकी ख़ुशी का क्या ठिकाना होगा अनुमान लगाइये। नन्द बाबा के घर बधाइयों का ताता लग गया। क्योंकि मेरा ठाकुर को जो प्रेम से बुलाता है तो वो वहाँ जाये बिना नहीं रह सकते। इसी तरह आप नाम तो लेकर देखो मेरे कन्हैया का, पर मेरे कन्हैया को दिखावा नहीं पसंद जैसे हो वैसे ही उसके सामने जाओ वो तुमको अपना लेगा। महाराज श्री ने कहा की हम और आप कैसे पुत्र की कामना करते है कंस जैसे पुत्र या राम जैसे पुत्र की , तो सभी अपने घर में राम जैसा पुत्र ही चाहेंगे। तो मेरे प्यारे आपको भी दसरथ और कौशल्या बना ही पड़ेगा कियोकि राम में संस्कार देने वाले उनके माता पिता ही थे। तो मेरे प्यारे आपको भी अपने बच्चों को संस्कारी बनाना होगा तब हर घर में राम और भरत होगा।

" राधे राधे बोलना पड़ेगा। "

24Feb 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 22 फरवरी से 1 मार्च 2018 तक शांति सेवा धाम, वृन्दावन में आयोजित होली महोत्सव कार्यक्रम के अंतर्गत 108 श्रीमद भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत में शुकदेव जी एवं परीक्षित संवाद , पृथ्वी की उत्पत्ति , ध्रुव चरित्र आदि का वृतांत विस्तार से वर्णन किया और सुन्दर भजनो का भक्तों को श्रवण कराया।

महाराज श्री ने कथा का प्रारम्भ एक जीवन के दर्शन कराते हुए एक मार्मिक भजन के साथ किया - " ये अद्भुत संसार, हमने देख लिया । " जब तक भगवान् की कृपा नहीं होती तब तक हमे भागवत सुनने का सौभाग्य भी प्राप्त नहीं होता। हम जीवन में हर छोटी - छोटी बात की योजना बनाते है। जैसे - खाना क्या है ? पढ़ना क्या है , कमाना कैसे है , परिवार कैसे चलाये आदि पर ये जीवन जो परमात्मा ने हमे दिया है हम उसको वास्तव में कैसे जीये ये योजना नहीं बनाते। भौतिक जीवन की योजना में असली जीवन के उदेश्य को भूले बैठे है।

कल के कथा क्रम को याद कराते हुए कहा कि राजा परीक्षित को श्राप लगा की सातवें दिन उनकी मृत्यु हो जाएगी। वैसे श्राप तो हम सब को भी सातवें दिन मृत्यु का लगा है क्योकि भगवान ने आठवां दिन नहीं बनाया तो जन्म तो हमारा हो चुका और मृत्यु सातवें दिन में से किस दिन होगी यह किसी को पता नहीं तो अपने कर्मो अच्छा बनाये ताकि , मृत्यु का भय समाप्त हो जाये। अपनी मृत्यु को सातवें दिन जानकर राजा परीक्षित ने उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया।राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं। महाराज श्री ने बताया की संध्या समय हमे शास्त्र अनुसार कुछ बातों को निषिद्ध किया गया है भोजन , स्वाध्याय , निंद्रा और स्त्री -पुरुष मिलन नहीं करना चाहिए।

कारण क्या है इन बातो को मना करने का अगर आप संध्या समय भोजन करेंगे तो वो आपका उदर खराब करेगा , स्वाधयाय करने से याद किया भूल जाते है , संध्या समय सोने से घर में दरिद्रता आती है और संध्या समय स्त्री- पुरुष का मिलान होने पर निश्चित रूप से दुष्ट संतति ही जन्म लेती है। तो हमको भी अपने धर्म की बातो का पालन करना चाहिए क्योकि समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

23Feb 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज और माननीय मुख्यमंत्री श्री मनोहर लाल खट्टर जी ने विश्व शांति सेवा मिशन द्वारा गोद ली गई 125 कन्याओं को चेक भेंट किया।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर से कथा के आए लोगों से कन्या भ्रूण हत्या ना करने के संकल्प फॉर्म भरवाए गए और माननीय मुख्यमंत्री श्री मनोहर लाल खट्टर जी और पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज की मौजूदगी में संकल्प दिलवाया गया।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज और माननीय मुख्यमंत्री श्री मनोहर लाल खट्टर जी ने विश्व शांति सेवा मिशन द्वारा गोद ली गई 125 कन्याओं को चेक भेंट किया।

23Feb 2018

कैबिनेट मंत्री श्रीमती रीता बहुगुणा जोशी जी ने द्वितीय दिवस की कथा पंडाल में पहुंच कर कथा का रसपान किया एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया।

वृंदावन में 108 श्रीमद् भागवत कथा के दूसरे दिन उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री श्रीमती रीता बहुगुणा जोशी जी ने कथा पंडाल में पहुंच कर कथा का रसपान किया एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। श्रीमती रीता बहुगुणा जोशी जी ने भागवत् पुराण पर पुष्प माला अर्पित किए। मिशन की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

23Feb 2018

वृंदावन में 108 श्रीमद् भागवत कथा के दूसरे दिन हरियाणा के माननीय मुख्यमंत्री श्री मनोहर लाल खट्टर जी ने कथा पंडाल में पहुंच कर कथा का रसपान किया।

वृंदावन में 108 श्रीमद् भागवत कथा के दूसरे दिन हरियाणा के माननीय मुख्यमंत्री श्री मनोहर लाल खट्टर जी ने कथा पंडाल में पहुंच कर कथा का रसपान किया एवं महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। माननीय मुख्यमंत्री श्री मनोहर लाल खट्टर जी ने भागवत पुराण पर पुष्प माला अर्पित की। मिशन की ओर से उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

23Feb 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 22 फरवरी से 1 मार्च 2018 तक शांति सेवा धाम, वृन्दावन में आयोजित होली महोत्सव कार्यक्रम के अंतर्गत 108 श्रीमद भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत में अमर कथा का एवं शुकदेव जी का जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया और सुन्दर भजनो का भक्तों को श्रवण कराया।

आज श्रीमद भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री मनोहर लाल खट्टर जी एवं उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री रीता बहुगुणा जोशी जी ने कथा पंडाल में पहुंच कर कथा का रसपान किया एवं महाराज जी से आशीर्वाद प्राप्त किया।

कथा श्रवण करने आए भक्तो से महाराज जी ने कहा की कथा को कभी भी फल प्राप्ति के लिए ही नहीं सुनना चाहिए, फल तो मिलेगा ही, कथा का श्रवण मेरे चित्त में मेरे प्रभु के अलावा कोई ओर ना हो इसके लिए कथा सुननी चाहिए। कथा प्रभु के स्वभाव को बताती है। महाराज जी ने कथा सुनने आएं श्रोताओं से कहा की कथा स्थल पर आने की जल्दी करो लेकिन यहां से जाने की कभी जल्दी मत करो।

महाराज जी ने कहा की अगर जीव के मन में बस भागवत कथा सुनना है का भाव भी आ जाए तो प्रभु उनके ह्रदय में कैद हो जाते हैं और सच्चे श्रोताओं को इसका अनुभव भी होता है। महाराज जी ने कहा की कथा सुनने की एक ही शर्त है इसे नियम से सुना जाए।

महाराज जी ने मोबाइल से होने वाले नुकसानों के बारे में भी बताया। महाराज जी ने कहा की आज के दौर में बच्चो की याददाशत कमजोर होती जा रही है, उसका सबसे बड़ा कारण है मोबाइल। मोबाइल मानसिक विनाश कर रहा है। बच्चे मां बाप से छुपकर इस्तेमाल करते हैं। पढ़ने के बजाय सोशल मीडिया पर ऑनलाइन रहते हैं। उन्होंने कहा की अगर अच्छे से इसका इस्तेमाल किया जाए तो ठीक लेकिन ज्यादा इस्तेमाल से आपकी मेमोरी के लिए ये घातक है।

महाराज जी ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कहा कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।

पूज्य महाराज जी ने बताया कि श्री शुक देव जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।

राधे राधे बोलना पड़ेगा।।

23Feb 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 22 फरवरी से 1 मार्च 2018 तक शांति सेवा धाम, वृन्दावन में आयोजित होली महोत्सव कार्यक्रम के अंतर्गत 108 श्रीमद भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत के महात्यम का विस्तार से वर्णन किया और सुन्दर भजनो का भक्तों को श्रवण कराया।

सर्वप्रथम महाराज श्री ने विश्व शांति के लिए ठाकुर जी से प्रार्थना की और उसके बाद भागवत कथा में प्रवेश किया। महाराज जी ने भागवत के प्रथम श्लोक का पाठ किया

" सच्चिदानन्दरूपाय विश्वोत्पत्त्यादिहेतवे। तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुम:।। "

महाराज श्री ने बताया की भागवत में आने से हमे सभी तीर्थो का पुण्य प्राप्त हो जाता है। क्योकि जहाँ भागवत कथा होती है वहां सभी पवित्र नदिया , सभी देवता , सारे तीर्थ वास करते है। और कथा पंडाल में आकर भागवत सुनने मात्रा से ही हमे सभी तीर्थो का पुण्य लाभ हमको प्राप्त हो जाता है। पूर्व के युगो में जो हजारों वर्षो की तपस्या करके भगवान की प्राप्ति होती थी। परन्तु कलियुग में केवल नाम संकीर्तन व कथा श्रवण मात्र से ही मनुष्य को ईश्वर की प्राप्ति हो जाती है। प्रत्येक पुराण में कलियुग के प्राणियों के लिए चिंता वयक्त की, कि किस प्रकार कलयुगी मनुष्य का उद्धार हो कारण बस इतना है की आज का मानव धर्म को सर्वोपरि नहीं धन को सर्वोपरि मानता है

भागवत नाम उच्चारण करने से सारे पाप नष्ट हो जाते है। अब प्रश्न ये उठता है की बात कौन गारंटी देगा तो मै आपको ये बात निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि जो व्यक्ति ठाकुर की कथा मन लगा कर सुनता है तो उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है। अब प्रश्न की भागवत सुनने से क्या मिलता है ? तो मेरे प्यारे भागवत एक कल्प वृक्ष है इससे जो मांगों वो मिलेगा पर शर्त यह है की भागवत में सच्ची श्रद्धा और विश्वास रखे तो निर्धन को धन , रोगी को निरोगी काया ,निसंतान को संतान सब कुछ ठाकुर देता है।

" सत्यं परम धीमहि " यानि भागवत ही परम सत्य है क्योकि सत्य कभी भी नहीं बदलता वो कल भी था , आज भी है और कल भी रहेगा। सत्य कभी खंडित नहीं होता तीनो काल में रहता है तो यह कथा भी सत्य की कथा है इसके प्रारम्भ सत्य , मध्य में सत्य और अंत भी सत्य है तो इसको सुनने से सत्य का ज्ञान हो जाता है। जो भी भागवत की शरण में आएगा उस की मुक्ति निश्चित है। भगवान को जानने की इच्छा ही भागवत है। इसलिए भगवान को जानने और उनसे संबंध बनाने की कोशिश जरुर करना। क्योंकि दुनिया के सारे संबंध भले साथ छोड़ देंगे। लेकिन भगवान तुम्हारा साथ कभी नहीं छोडेंगे।

प्रारम्भ में यह की भागवत का महात्यम क्या है ? एक बात सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगो का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। इस सांसारिक जीवन में जो कुछ भी प्राप्त किये हो सब किराए के मकान की तरह है। खाली करना ही पड़ेगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भागवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। .

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

21Feb 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 से 20 फरवरी 2018 तक हुड्डा ग्राउंड न. 1, करनाल (हरियाणा) में आयोजित श्रीमद भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने कंस वध, उद्धव चरित्र एवं भगवान श्री कृष्ण और रुक्मणि जी के विवाह का सुन्दर वर्णन सभी भक्तों को सुनाया।

" अपने कर्मो को हमेशा सही रखना तो ईश्वर सदैव आपका हाथ थामे रखेगा।"

राजा परीक्षित को की भागवत का ज्ञान सुनने के वो स्वयं अपनी मृत्यु का इंतज़ार कर रहे है। उनको अब काल का यानि तक्षक का कोई भय नहीं रहा। जिसने जन्म लिया है वो मृत्यु को प्राप्त होगा ही। प्रत्येक जीव के जन्म से पहले ही उसकी मृत्यु का समय , स्थान और कारन ये निश्चित हो जाता है।

कथा के क्रम को आगे बढ़ाया और बताया की रुक्मणि और भगवान् श्याम सुन्दर का विवाह हुआ और उनका प्रथम पुत्र को जन्म होते ही एक संभरासुर नामक राक्षस उठा ले गया क्योकि उसको पता था की श्री कृष्ण का प्रथम पुत्र उसकी मृत्यु का कारन होगा। तो वो प्रद्युम्न समुद्र में फेक देता है वहां एक मछली उसको निगल जाती है और वो फिर संभरासुर की रसोई में ही पहुँच जाती है और उसका पालन पोषण काम देव की पत्नी ने स्वयं माँ की तरह कर उसको बड़ा किया। प्रद्युम्न कामदेव का जी जन्म है और ये पहली पत्नी थी जिसने अपने पति को माँ की तरह पला। जब प्रद्युम्न बड़े हुए तो संभरासुर का वध कर के द्वारिका को पत्नी सहित प्रस्थान किया।

महाराज श्री ने आगे कहा कि पुराणों की कथा के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि को नरकासुर नाम के असुर का वध किया। नरकासुर ने 16 हज़ार 100 कन्याओं को बंदी बना रखा था। नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा की समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। इस कारण भगवान ने 16000 रूप बनाकर सबके साथ एक मुहूर्त में एक साथ विवाह किया था। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने इतने विवाह किये। भगवान ने कामनावश विवाह नहीं किया था, करुणावश किया था। भगवान कहते हैं जिसको कोई नहीं अपनाता अगर वो मेरी शरण में आये तो मैं उसे अपना लेता हूँ।

भगवान कृष्ण मित्र और शत्रु के लिए समान भावना रखते है इसके पीछे भी मोरपंख का उद्दारण देखकर हम यह कह सकते है। कृष्ण के भाई थे शेषनाग के अवतार बलराम और नागो के दुश्मन होते है मोर। अत: मोरपंख सर पर लगाके कृष्ण का यह सभी को सन्देश है की वो सबके लिए समभाव रखते है। मोरपंख में सभी रंग है गहरे भी और हलके भी। कृष्णा अपने भक्तो को ऐसे रंगों को देखकर यही सन्देश देते है जीवन ही इस तरह सभी रंगों से भरा हुआ है कभी चमकीले रंग तो कभी हलके रंग, कभी सुखी जीवन तो कभी दुखी जीवन।

इस मायावी दुनिया में देखा गया है कि जो प्यारा लगता है, हमें उसके अवगुण नहीं दिखाई देते और जिसे नापसंद करते हैं, हम उसके गुण नहीं देखते। नज़रिये के अनुसार ही नज़ारे दिखते हैं। लेकिन ध्यान रखना धर्म के विरुद्ध कभी मत जाना। बुराइयां खुद के लिए गड्ढा खोदती हैं। लेकिन जो सच प्रभु को प्रसन्न करना चाहते हो तो हमेशा दूसरों को खुशियां देना सीखो तुम्हें अपने आप खुशियाँ मिलती जाएँगी। अगर आपको कोई गलत बोले तो भी बुरा न मानो क्योकि वो कही न कही हमारे ही कर्म ही काट रहा है। क्योकि संसार में आने से पहले ही हमारा समय , स्थान और कारन निश्चित कर देता है इसलिए अपने कर्मो को हमेशा सही रखना तो ईश्वर सदैव आपका हाथ थामे रखेगा।

महाराज श्री ने कथा क्रम को आगे बढ़ाते हुए बताया कि बलराम जी के देह त्यागने के बाद जब एक दिन श्रीकृष्ण जी पीपल के नीचे ध्यान की मुद्रा में बैठे हुए थे, तब उस क्षेत्र में एक जरा नाम का बहेलिया आया हुआ था। जरा एक शिकारी था और वह हिरण का शिकार करना चाहता था। जरा को दूर से हिरण के मुख के समान श्रीकृष्ण का तलवा दिखाई दिया। बहेलिए ने बिना कोई विचार किए वहीं से एक तीर छोड़ दिया जो कि श्रीकृष्ण के तलवे में जाकर लगा। जब वह पास गया तो उसने देखा कि श्रीकृष्ण के पैरों में उसने तीर मार दिया है। इसके बाद उसे बहुत पश्चाताप हुआ और वह क्षमायाचना करने लगा। तब श्रीकृष्ण ने बहेलिए से कहा कि जरा तू डर मत, तूने मेरे मन का काम किया है। अब तू मेरी आज्ञा से स्वर्गलोक प्राप्त करेगा। बहेलिए के जाने के बाद वहां श्रीकृष्ण का सारथी दारुक पहुंच गया। दारुक को देखकर श्रीकृष्ण ने कहा कि वह द्वारिका जाकर सभी को यह बताए कि पूरा यदुवंश नष्ट हो चुका है और बलराम के साथ कृष्ण भी स्वधाम लौट चुके हैं। अत: सभी लोग द्वारिका छोड़ दो, क्योंकि यह नगरी अब जल मग्न होने वाली है। मेरी माता, पिता और सभी प्रियजन इंद्रप्रस्थ को चले जाएं। यह संदेश लेकर दारुक वहां से चला गया। इसके बाद उस क्षेत्र में सभी देवता और स्वर्ग की अप्सराएं, यक्ष, किन्नर, गंधर्व आदि आए और उन्होंने श्रीकृष्ण की आराधना की। आराधना के बाद श्रीकृष्ण ने अपने नेत्र बंद कर लिए और वे सशरीर ही अपने धाम को लौट गए। श्रीमद भागवत के अनुसार जब श्रीकृष्ण और बलराम के स्वधाम गमन की सूचना इनके प्रियजनों तक पहुंची तो उन्होंने भी इस दुख से प्राण त्याग दिए। देवकी, रोहिणी, वसुदेव, बलरामजी की पत्नियां, श्रीकृष्ण की पटरानियां आदि सभी ने शरीर त्याग दिए। इसके बाद अर्जुन ने यदुवंश के निमित्त पिण्डदान और श्राद्ध आदि संस्कार किए। महाराज श्री ने आगे कहा कि यहां पर कुछ मूर्ख लोग ये कहते है कि ऐसे कैसे भगवान थे जो एक तीर से मर गए, उनको ये समझना चाहिए कि भगवान धर्म की सत्यापन करने के लिए धरती पर आए थे और वे स्वयं द्वारा बनाये गए कालचक्र को कैसे तोड़ सकते थे। इसीलिए ये उनके द्वारा रचित लीला थी।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

20Feb 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 से 20 फरवरी 2018 तक हुड्डा ग्राउंड न. 1, करनाल (हरियाणा) में आयोजित श्रीमद भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने कंस वध , उद्धव चरित्र एवं भगवान श्री कृष्ण और रुक्मणि जी के विवाह का सुन्दर वर्णन सभी भक्तों को सुनाया।

महाराज जी ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की आजकल डॉक्टर पैदा होते है, इंजिनियर पैदा होते है लेकिन देशभक्त पैदा नहीं होते। उन्होंने कहा की जो देशभक्त पैदा होते भी है झंडा लेकर चलते भी है तो लोग उन्हे गोली मार देते हैं। महाराज श्री ने कहा की मैं उन माताओ को प्रणाम करता हूँ, जो देश के लिए बलिदान देने वाले पुत्रों को जन्म देती हैं। महाराज जी ने कहा की सात दिन लगातार जो भी व्यक्ति कथा का श्रवण करता है उसके जीवन में बदलाव जरुर आते हैं इस बात की गारंटी है। महाराज जी ने युवाओं से कहा कि कथा का श्रवण जरुर करें क्योंकि जो आप अभी सीखेंगे वहीं आपके आने वाली पीढ़ी में जाएगा और कोई भी व्यक्ति ये नहीं चाहेगा की उसका बेटा धर्मात्मा ना बने। सरकार कहती है की बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओं लेकिन मैं कहता हूँ की बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओं लेकिन पहले बेटों का संस्कारी बनाओं। महाराज ने कहा की माता पिता को अपने बच्चों को चरित्र का उपदेश देना चाहिए।

"बिना साधना के प्रभु का सानिध्य नहीं।" श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है। मंगलवार की कथा में श्री कृष्ण- रुक्मिणी विवाह का वर्णन हुआ। आज कृष्ण-रुक्मणि विवाहोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया गया एवं सभी भक्तों ने भगवान श्री कृष्ण-रुक्मणी की सुन्दर झांकी के दर्शन किये। कथा के मुख्य यजमान एवं सहयजमान व उत्सव यजमान ने कन्यादान की रश्म पूरी की और महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। भगवान श्री कृष्ण के विवाह में पूरा पंडाल झूम उठा भक्तों ने नृत्य कर बड़ी धूमधाम से भगवान श्री कृष्ण के विवाह के आयोजन का मनाया।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

 

18Feb 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 से 20 फरवरी 2018 तक हुड्डा ग्राउंड न. 1, करनाल (हरियाणा) में आयोजित श्रीमद भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में पूतना का चरित्र एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुन्दर वर्णन विस्तार से किया।

पूज्य महाराज श्री ने कथा प्रारम्भ करते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक बौने के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बलि को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।

महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। महाबली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।

शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि महाबली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।

इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर महाबली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।

इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।

महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।

महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"

जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।

दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"

भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया।इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।

इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने भगवान ने सभी भक्तो के साथ श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

19Feb 2018

करनाल के हुड्डा ग्राउंड नंबर 1 सुपर मॉल, नजदीक हुड्डा कार्यालय, में विश्व शांति सेवा चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में कथा वाचक पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पूतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के पांचवे दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।आज कथा में मुख्य अतिथि के तौर पर लिबर्टी के एम्.डी श्रीमान शम्मी बंसल जी ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और पंचम दिवस की कथा का रसपान किया।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की हम अगर संस्कारी बनेंगे तो हमारे बच्चे भी संस्कारी बनेंगे और अगर हम अपने धर्म का सम्मान करेंगे तो आने वाली पीढ़ी भी धर्म का सम्मान करेगी। महाराज श्री ने बताया की अगर धर्मं के ऊपर कोई उपकार करना चाहते हो तो अपनी आने वाली पीढ़ी को ऐसे संस्कार दे कर जाए की वो आपके इस दुनिया से जाने के बाद भी हमारे घरो में रोजाना पूजा होती रहे भगवान् की आरती होती रहे भगवान् को भोग लगता रहें, क्यूंकि घर केवल ईंट-पत्थर का नहीं होता हैं। घर को घर बनाने में हमारे परिवार का बड़ा हाथ होता हैं घर- भवन वही होते हैं जहाँ संतो का आना- जाना हो और भजन सिमरन होता रहें।

महाराज जी ने बताया की हमें लड़को को अच्छे संस्कार देने चाहिए क्यूंकि आज के समय में लड़को से ज्यादा फ़िक्र अपने माँ बाप की "लड़की" को होती हैं। एक कहानी का उदाहरण देते हुए पंडित जी ने बताया की हमें लड़के होने पे बधाई नहीं देनी चाहिए बल्कि लड़की होने पर बधाई देनी चाहिए।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहाँ की धरती पर यमुना नदी श्री कृष्ण के लिए ही धरती पर आई हैं। साथ ही महाराज श्री ने बताया की माया आपको अपनी और आकर्षित करती है इसलिए आपको इसका ख़ास ध्यान रखना चाहिए क्यूंकि भगवान् को माया नहीं भक्ति पसंद हैं इसलिए हमें माया के लोभ से हमेशा दूर रहना चाहिए। साथ ही माताओं बहनो को भी हिदायत दी की रसोई में किसी सेविका को ना आने दें अपने परिवार के लिए खाना खुद पकायें और और प्रेम से उन्हें खाना बना कर खिलाएं क्यूंकि जिस भाव से आप खाना बनाती हैं वही भाव खाना खाने वाला खाने के साथ ग्रहण करता हैं।

देवकीनंदन ठाकुर जी ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि आज पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करने से पूर्व महाराज श्री ने कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। अब देखिये मेरे ठाकुर की माया की वो अपने भक्तो का ख्याल कैसे रखता है? जिसके घर ८५ साल के उम्र में बालक का जन्म हो तो उसकी ख़ुशी का क्या ठिकाना होगा अनुमान लगाइये। क्योंकि मेरा ठाकुर को जो प्रेम से बुलाता है तो वो वहाँ जाये बिना नहीं रह सकते। इसी तरह आप नाम तो लेकर देखो मेरे कन्हैया का,पर मेरे कन्हैया को दिखावा नहीं पसंद जैसे हो वैसे ही उसके सामने जाओ वो तुमको अपना लेगा। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, क्यूंकि पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतनाका वध कर उसका कल्याण किया।

महाराज जी ने एक कृष्ण को चाहने वाले व्यक्ति की कहानी सुनाते हुए बताया की किसी ने श्री कृष्ण से पूछा की हे कृष्ण तुम्हारा नाम टेढ़ा, खड़े होने का स्टाइल टेढ़ा, हमेशा झूट बोलता है उसके सारे काम टेढ़े क्या अच्छा है तुममे, तब श्री कृष्ण मुस्कुराते हुए उस व्यक्ति को एक खूंटी का उदहारण देते हुए कहाँ की ये लो इस सीधी खूंटी पर ये वस्त्र टांगो तो वह व्यक्ति जब वस्त्र टांगने गया तो वो वस्त्र गिर गए फिर श्री कृष्ण ने उस व्यक्ति को टेढी खूंटी पर वस्त्र टांगने के लिए दिए तो वस्त्र आसानी से टंग गए। तब श्री कृष्ण ने मुस्कुरात हुए उस व्यक्ति को उनकी बात का जवाब देते हुए कहते है की जब श्री राम जी त्रेता युग में आये थे तब लोग एक दम सीधे हुआ करते थे और आसानी से मान जाया करते थे। लेकिन में द्वापर युग के अंत में कलयुग के कल्याण के लिए आया हूँ और इनको तारने के लिए सीधा बनने से काम नहीं चलेगा इनको भवसागर से पार करने के लिए मुझे टेड़ा बनना पड़ेगा।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्व ही पहचान लिया है।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

17Feb 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 से 20 फरवरी 2018 तक हुड्डा ग्राउंड न. 1, करनाल (हरियाणा) में आयोजित श्रीमद भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस मनुष्य की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

जब तक भगवान् की कृपा नहीं होती तब तक हमे भागवत सुनने का सौभाग्य भी प्राप्त नहीं होता। हम जीवन में हर छोटी - छोटी बात की योजना बनाते है। जैसे - खाना क्या है ? पढ़ना क्या है , कमाना कैसे है , परिवार कैसे चलाये आदि पर ये जीवन जो परमात्मा ने हमे दिया है हम उसको वास्तव में कैसे जीये ये योजना नहीं बनाते। भौतिक जीवन की योजना में असली जीवन के उदेश्य को भूले बैठे है। आप अपने जीवन के असली उदेश्य को जाने और आज से जब तक आपका जीवन है भगवान की कृपा पाने के लिए प्रयास करे। क्योकि मानव जीवन का असली उदेश्य केवल परमपिता परमात्मा को पाना ही है।

महाराज जी सुन्दर भजन से भगवान की स्तुति की और कल का कथा क्रम याद कराया की जी वयक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।

राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

जब तक भगवान् की कृपा नहीं होती तब तक हमे भागवत सुनने का सौभाग्य भी प्राप्त नहीं होता। हम जीवन में हर छोटी - छोटी बात की योजना बनाते है। जैसे - खाना क्या है ? पढ़ना क्या है , कमाना कैसे है , परिवार कैसे चलाये आदि पर ये जीवन जो परमात्मा ने हमे दिया है हम उसको वास्तव में कैसे जीये ये योजना नहीं बनाते। भौतिक जीवन की योजना में असली जीवन के उदेश्य को भूले बैठे है। आप अपने जीवन के असली उदेश्य को जाने और आज से जब तक आपका जीवन है भगवान की कृपा पाने के लिए प्रयास करे। क्योकि मानव जीवन का असली उदेश्य केवल परमपिता परमात्मा को पाना ही है।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

16Feb 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 से 20 फरवरी 2018 तक हुड्डा ग्राउंड न. 1, करनाल (हरियाणा) में आयोजित श्रीमद भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत में भगवान शिव द्वारा सुनाई गई अमर कथा का विस्तार से वर्णन किया।

महाराज श्री ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की संतो के आशिर्वाद रुपी वृक्ष के नीचे जो विराजमान हो जाते हैं वो देश, जाति, धर्म भूलकर एक ही परिवार के नजर आते हैं और कृष्ण की कथा और संतो के मुख से निकली बाते भगवान के दर्शन तो कराते ही है साथ ही इस लायक बना देते ही की परमात्मा भी उस जीव के बिना फिर रह नहीं पाते हैं।गीता ना सिर्फ हमे गोविंद का बनाती है बल्कि हमें जीवन जीना सीखाती है। उन्होंने कहा की गीता ना सिर्फ हिंदूओं का ग्रंथ है बल्कि गीता पूरे मानव जाती का ग्रंथ है जिसने गीता को अपना लिया है वो पूरे जीवन में विजयी हो गया है। भागवत में कहा गया है जो फल हमें कल्प वृक्ष से नहीं मिल सकता वो फल हमें गुरु कृपा से मिल सकता है। अगर परमात्मा का साक्षात्कार करना है तो उसके लिए गुरू कृपा आवश्यक है। संत वहीं होता है जो गोविंद से मिलाता है।

जितने भी हमारे ग्रंथ है वो हमें भगवान से मिलाते हैं। आपका विश्वास उन संतों में होना चाहिए वो आपको हरि से मिलाए।भागवत का फल इतना है की सात दिनों तक सच्चे मन से इसका श्रवण करने मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।

महाराज श्री ने कहा कि जो फल ओर युगो में यज्ञ, तप करने से मिलता है वो फल कलयुग में भगवान का कीर्तन करने से मिलता है, भगवान की कथा श्रवण से वो फल सहज ही प्राप्त हो जाता है। कलयुग सर्प की तरह है हमारी तरफ बढ़ रहा है, हर इंसान को खा जाना चाहता है, इससे बचने के लिए एक ही उपाय है वो ये है की श्री शुकदेव जी द्वारा कही गई श्री भागवत कथा की शरण ग्रहण कर लेनी चाहिए।अगर बचपन में कथा सुनोगे तो जवानी सुधर जाएगी और अगर जवानी सुधर जाए तो बुढ़ापा सुधरने की शत् प्रतिशत गारंटी है।

कल का कथा क्रम में आपने भागवत का महात्यम जाना और आज की कथा प्रसंग में कलयुग की बात करेंगे। कलयुग के प्राणी का स्वभाव ही पाप कर्म में लिप्त रहना। कलयुग की चर्चा करते हुए बताया कलयुग में लोगों की स्थिति विचित्र होगी। लोग अशुभ को समझ नहीं पाएंगे।कलयुग के बारे में कहा गया है कि बेटा बाप को आदेश देगा, बहुएँ सास पर हुक्म चलाएंगी, शिष्य वचन रुपी बाण से गुरु का दिल भेदन करेंगे। सभी ब्राह्मण बनने की कोशिश करेंगे। उन्हें दान लेने में भी हिचक नहीं होगी। अपने मत के अनुसार किए गए कर्म को ही लोग अपना धर्म बताएंगे। भुखमरी बढ़ेगी और संबंधों की अहमियत खत्म होती जाएगी। लोग पशुओं जैसे आचरण करते मिलेंगे। मांसाहार बढ़ेगा, सिर्फ धन के लिए ही लोग जिएंगे, भजन के बिना तेज कम होगा, लोगों की उम्र कम होगी। लेकिन अंत में जब इसका आभास होने लगेगा तब फिर धर्म की और लोगों की प्रवृत्ति बढ़ेगी। कलयुग के लोगों में धर्म की प्रवृति बढ़ा कर उनका उद्धार करने की जिम्मेदारी श्री शुक जी को सौंपी गई और वह इसके लिए तैयार भी हो गए।

कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित्र ही भगवान को बसा सकता है।

श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।

महाराज श्री ने कहा कि हमको तो सदा ही अच्छे और बुरे का फर्क लेकर ही भगवान की भक्ति को करते रहना चाहिए। क्योँकि उसी के अनुसार ही हम अपने सभी कार्यों को कर सकते है। हमको तो सदैव ही अच्छे कार्य ही करने चाहिए और बुरे कार्यों से सदा के लिए ही दूर रहना चाहिए। तभी हमारा इस संसार में सही रूप से गुजारा हो सकता है। भगवान भी उन्ही का साथ देते है जो सदा अच्छे कर्मों में लिप्त रहते है। जो लोग सदा ही बुरे कार्य करते है उनसे तो भगवान सदा ही दूरी बनाये रखते है। तो आप सभी अच्छे कार्य करते रहो तो ठाकुर हमेशा ही तुमको अपना बनाये रखेंगे।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

15Feb 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 से 20 फरवरी 2018 तक हुड्डा ग्राउंड न. 1, करनाल (हरियाणा) में आयोजित श्रीमद भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत के महात्यम का विस्तार से वर्णन किया और सुन्दर भजनो का भक्तों को श्रवण कराया।

सर्वप्रथम महाराज श्री ने विश्व शांति के लिए ठाकुर जी से प्रार्थना की और उसके बाद भागवत कथा में प्रवेश किया। महारज जी ने भागवत के प्रथम श्लोक का पाठ किया

" सच्चिदानन्दरूपाय विश्वोत्पत्त्यादिहेतवे। तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुम:।। "

महाराज श्री ने बताया की भागवत में आने से हमे सभी तीर्थो का पुण्य प्राप्त हो जाता है। क्योकि जहाँ भागवत कथा होती है वहां सभी पवित्र नदिया , सभी देवता , सारे तीर्थ वास करते है। और कथा पंडाल में आकर भागवत सुनने मात्रा से ही हमे सभी तीर्थो का पुण्य लाभ हमको प्राप्त हो जाता है। पूर्व के युगो में जो हजारों वर्षो की तपस्या करके भगवान की प्राप्ति होती थी। परन्तु कलियुग में केवल नाम संकीर्तन व कथा श्रवण मात्र से ही मनुष्य को ईश्वर की प्राप्ति हो जाती है। प्रत्येक पुराण में कलियुग के प्राणियों के लिए चिंता वयक्त की, कि किस प्रकार कलयुगी मनुष्य का उद्धार हो कारण बस इतना है की आज का मानव धर्म को सर्वोपरि नहीं धन को सर्वोपरि मानता है

भागवत नाम उच्चारण करने से सारे पाप नष्ट हो जाते है। अब प्रश्न ये उठता है की बात कौन गारंटी देगा तो मै आपको ये बात निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि जो व्यक्ति ठाकुर की कथा मन लगा कर सुनता है तो उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है। अब प्रश्न की भागवत सुनने से क्या मिलता है ? तो मेरे प्यारे भागवत एक कल्प वृक्ष है इससे जो मांगों वो मिलेगा पर शर्त यह है की भागवत में सच्ची श्रद्धा और विश्वास रखे तो निर्धन को धन , रोगी को निरोगी काया ,निसंतान को संतान सब कुछ ठाकुर देता है।

" सत्यं परम धीमहि " यानि भागवत ही परम सत्य है क्योकि सत्य कभी भी नहीं बदलता वो कल भी था , आज भी है और कल भी रहेगा। सत्य कभी खंडित नहीं होता तीनो काल में रहता है तो यह कथा भी सत्य की कथा है इसके प्रारम्भ सत्य , मध्य में सत्य और अंत भी सत्य है तो इसको सुनने से सत्य का ज्ञान हो जाता है। जो भी भागवत की शरण में आएगा उस की मुक्ति निश्चित है। भगवान को जानने की इच्छा ही भागवत है। इसलिए भगवान को जानने और उनसे संबंध बनाने की कोशिश जरुर करना। क्योंकि दुनिया के सारे संबंध भले साथ छोड़ देंगे। लेकिन भगवान तुम्हारा साथ कभी नहीं छोडेंगे।

प्रारम्भ में यह की भागवत का महात्यम क्या है ? एक बात सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगो का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। इस सांसारिक जीवन में जो कुछ भी प्राप्त किये हो सब किराए के मकान की तरह है। खाली करना ही पड़ेगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भागवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। .

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

15Feb 2018

करनाल (हरियाणा) में हो रही श्रीमद भागवत कथा के प्रथम दिवस पर पहुंचे माननीय मुख्यमंत्री श्री मनोहर लाल खट्टर जी।

करनाल कथा में पहुंचे मुख्यमंत्री श्री मनोहर लाल खट्टर जी।

धर्मरत्न शांतिदूत पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 14-20 फरवरी 2018 तक करनाल में आयोजित श्रीमद भागवत कथा के प्रथम दिवस अनेकों विशेष अतिथियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज की और महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। कुरुक्षेत्र के माननीय सांसद श्री राज कुमार सैनी जी एवं करनाल महापौर श्रीमती रेनू बाला गुप्ता जी ने दीप प्रज्वलित किया। इसके बाद सांय आरती में माननीय मुख्यमंत्री हरियाणा सरकार श्री मनोहर लाल खट्टर जी ने श्री भागवत जी को प्रणाम किया और भागवत भगवान को पुष्प माला अर्पण की साथ ही ठाकुर जी महाराज ने माननीय मुख्यमंत्री जी को शोल एवं स्मृति चिन्ह भेंट किया। विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर से आचार्य श्री श्याम सुन्दर शर्मा जी और श्री एच. पी. अग्रवाल जी ने पुष्पगुच्छ भेंट कर माननीय मुख्यमंत्री जी का स्वागत किया। इसके बाद माननीय मुख्यमंत्री श्री मनोहर लाल खट्टर जी ने ABC WORLD MEDIA के सीईओ श्री अजय भाटीवाल जी को मीडिया और धर्म के क्षेत्र में कार्य करने के लिए उनकी समस्त टीम को बधाई दी एवं श्री भाटीवाल जी को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया।

माननीय मुख्यमंत्री जी ने कहा की किताबी ज्ञान आज हमारा अधूरा है क्योंकि हमें संस्कार और इस तरह की कथाओ का ज्ञान पूरी तरह नहीं मिल पता। तो मैं आप सभी से यही कहूँगा की आप सभी अपने बच्चो को किताबी ज्ञान के साथ यह संस्कारी ज्ञान भी दे तभी यह जीवन सार्थक होगा।

14Feb 2018

महाराज श्री के करनाल पहुंचने पर सभी कार्यकर्ताओं एवं भक्तों द्वारा महाराज श्री का भव्य स्वागत किया गया।

धर्मरत्न पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में करनाल में 14 फरवरी से 20 फरवरी 2018 तक श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। महाराज श्री के करनाल पहुंचने पर सभी कार्यकर्ताओं एवं भक्तों द्वारा महाराज श्री का भव्य स्वागत किया गया।

14Feb 2018

आज करनाल (हरियाणा) में विशाल कलश यात्रा निकाली। इस भव्य कलश यात्रा में सैंकड़ों माताएं बहने कलश उठाकर कथा पंडाल पहुंची।

आप देख रहे हैं करनाल (हरियाणा) से कलश यात्रा की कुछ झलकियां..
धर्मरत्न पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में करनाल में 14 फरवरी से 20 फरवरी 2018 तक श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।
!! राधे राधे बोलना पड़ेगा !!

13Feb 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 06 फरवरी से 12 फरवरी 2018 तक ऊना (हिमाचल) में आयोजित श्रीमद भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

“अच्छे कर्म करिए, मरने के बाद शरीर छूटता है कर्म याद रहते हैं।"

ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की संतो का दर्शन और भागवत कथा आपको मिल जाए तो आपके ज्यादा धनवान कोई नहीं है इस संसार में, ये दो दुर्लभ वस्तुएं आपको मिली हुई हैं।

महाराज जी ने कहा की अगर आपके अच्छे कर्मों को आपके मरने के बाद लोग याद रखते हैं तो भले ही आपका शरीर ना रहे पर आप कर्मों के हिसाब से लोगों के दिलो दिमाग में हमेशा अमर रहते हैं। उन्होंने कहा की हमे सोचना चाहिए की शरीर मरता है कर्म नहीं मरते। इसलिए घर बड़ा हो या ना हो फर्क नहीं पड़ता लेकिन कर्म बडे होने चाहिए।

महाराज जी ने कहा की बच्चों को संस्कार देना मां बाप की जिम्मेदारी है। जिन घरो के बडे बुजुर्ग अपने बच्चों को संस्कार नहीं देते हैं वो अपने लिए आने वाला समय खतरनाक बनाते हैं। ये कह देना आसान है की हमारे बच्चे बिगड़ रहे हैं पर ये समझ पाना बहुत मुश्किल है की उनके मां बाप कहां उन्हें संस्कार दे पा रहे हैं।

महाराज जी महाराज ने कहा की जिसका पूरा घर ऋणी है वो है गृहिणी, गृहिणी का ऋण पूरा परिवार भी मिल कर नहीं उतार सकता। मां को, गृहिणी को कभी छूट्टी नहीं मिलती है, उन्हें 24 घंटे, 12 महीने काम करना पड़ता है।

महाराज जी ने कहा की भगवान को प्राप्त करने के लिए एक सुंदर मार्ग है और वो है सेवा। महाराज जी ने कहा की भगवान को प्राप्त करना चाहते हो तो सेवा करो। जो लोग संतो की, अनाथों की, बुजुर्गों की सेवा करते हैं वो धीरे धीरे भगवान की करीब होने लगते है, जितनी सेवा करोगे अहंकार उतना ही कम होगा लेकिन अहंकार तब ही कम होगा जब आप स्वयं जा कर सेवा करेंगे ना की किसी को पैसे देकर।

महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि पुराणों की कथा के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि को नरकासुर नाम के असुर का वध किया। नरकासुर ने 16 हज़ार 100 कन्याओं को बंदी बना रखा था। नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा की समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। इस कारण भगवान ने 16100 रूप बनाकर सबके साथ एक मुहूर्त में एक साथ विवाह किया था। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने इतने विवाह किये। भगवान ने कामनावश विवाह नहीं किया था, करुणावश किया था। भगवान कहते हैं जिसको कोई नहीं अपनाता अगर वो मेरी शरण में आये तो मैं उसे अपना लेता हूँ।

भगवान श्री कृष्ण ने कामदेव पर विजय प्राप्त की है। उनके संकल्प मात्र से उनके पुत्रों की गिनती एक लाख इकसठ हजार अस्सी थी। भगवान श्री कृष्ण ने आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन किया। भगवान अपने मुकुट पर मोर पंख इसीलिए लगाते हैं क्योंकि मोर एकमात्र ऐसा प्राणी है जो सम्पूर्ण जीवन में ब्रह्मचर्य का पालन करता है। मोरनी का गर्भ भी मोर के आंसुओ को पीकर ही धारण होता है। इत: इतने पवित्र पक्षी के पंख भगवान खुद अपने सर पर सजाते है।

भगवान कृष्ण मित्र और शत्रु के लिए समान भावना रखते है इसके पीछे भी मोरपंख का उद्दारण देखकर हम यह कह सकते है। कृष्ण के भाई थे शेषनाग के अवतार बलराम और नागो के दुश्मन होते है मोर। अत: मोरपंख सर पर लगाके कृष्ण का यह सभी को सन्देश है की वो सबके लिए समभाव रखते है। मोरपंख में सभी रंग है गहरे भी और हलके भी। कृष्णा अपने भक्तो को ऐसे रंगों को देखकर यही सन्देश देते है जीवन ही इस तरह सभी रंगों से भरा हुआ है कभी चमकीले रंग तो कभी हलके रंग, कभी सुखी जीवन तो कभी दुखी जीवन।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा बढ़ाते हुए कहा कि श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी।

सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंततः सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया।

महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा।

श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए ।

" राधे राधे बोलना पड़ेगा। "

12Feb 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 06 फरवरी से 12 फरवरी 2018 तक ऊना (हिमाचल) में आयोजित श्रीमद भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण के जन्म की लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

आज कथा में हिमाचल प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री श्री जय राम ठाकुर जी एवं हमीरपुर से माननीय सांसद श्री अनुराग ठाकुर जी ने भी कथा का रसपान किया और पूज्य महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया।

महाराज श्री ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि जो लोग श्री कृष्ण को प्राप्त करना चाहते हैं उन्हें एकादशी का व्रत रखना चाहिए, बहुत से लोग हैं जो भ्रांतिया पैदा करते हैं कि इनको करना चाहिए और इनको नहीं करना चाहिए अरे जो होना हैं वो होगा ही उसको कोई नहीं रोक सकता, व्रत करो व्रत करने से ठाकुर जी की प्राप्ति होगी ही होगी।

हम ये नहीं छोड़ सकते हम वो नहीं सकते हमें मोह माया ही छोड़ देना चाहिए बस भगवान को प्राप्त करना चाहिए, अगर प्रभु को प्राप्त करना हैं तो छोटी छोटी चीजों में मोह मत करो , हम ये नहीं छोड़ सकते कहते हैं ठाकुर जी ने कहा की जब एक कन्या का विवाह होता हैं तो वह सब कुछ छोड़कर आती हैं यभी हाँ तक की अपनी पहचान अपना सर नाम भी छोड़ कर जाती हैं किसके लिए उस इंसान के लिए जो पीकर तुम्हारा नहीं रहता उस हाड मॉस के इंसान के लिए सब छोड़ देते हो और जो दया का सागर हैं दया का भंडार हैं उसके लिए छोटी छोटी चीजे नहीं छोड़ सकते, एक दिन भोजन नहीं छोड़ सकते, लहसुन प्याज नहीं छोड़ सकते ,और जो लोग लहसुन प्याज भी नहीं छोड़ सकते और भगवान को प्राप्त करने की बात करते हैं तो मजाक नहीं हैं तो क्या हैं पति को पाने के लिए सब छोड़ दिया और प्रभु को पाने के लिए कुछ नहीं छोड़ सकते याद रखो कुछ बड़ा पाने के लिए बड़ा त्याग करना पड़ता हैं जीभ को अगर स्वाद देना हैं तो कृष्ण नाम का स्वाद दीजिये।

महाराज श्री ने कथा का वृतांत बताते हुए बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा।।

11Feb 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 06 फरवरी से 12 फरवरी 2018 तक ऊना (हिमाचल) में आयोजित श्रीमद भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण के जन्म की लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

महाराज जी ने कहा की भगवान के धरती पर भक्तों के हित के लिए, भक्तों को आनन्द देने के लिए आते हैं। उन्होंने कहा की भगवानों को भी कथा सुनने को नहीं मिली लेकिन मृत्यु लोक में आपको कथा सुनने को मिल गई वो इसलिए मिल गई क्योंकि भगवान से हमें उपयुक्त समझा है, जिसे प्रभु उपयुक्त समझते हैं उसे अपने आप से पहले अपनी कथा प्रदान करते हैं।

महाराज जी ने कहा की जो लोग कहते है हम भगवान से मिलना चाहते हैं वो ये जान ले की भगवान को शुद्ध ह्रदय पसंद है, जब तुम्हारा दिल शुद्ध होगा तब भगवान के दर्शन स्वयं ही हो जाएंगे।जो लोग कपट कर के भगवान के पास जाते हैं भगवान उनकी तरह देखते ही नहीं है, भगवान की देखने वालों की लाइन लगी पड़ी है किस्मत वाले तो वो है जिनको भगवान देखता है, जिनके आने का इंतजार भगवान को रहता है। अब आप खुद तय करिए की आपको क्या बनना है आपको भगवान को देखना है या भगवान आपको देखे।

महाराज जी ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। प