Program Shedule

Live News

8Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 14 दिसंबर 2018 तक भायंदर मुंबई में आयोजित 108श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 14 दिसंबर 2018 तक भायंदर मुंबई में आयोजित 108श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। भागवत कथा के दूसरे दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई। भागवत आरती मुख्य यजमान श्री रजनीश त्रिपाठी जी, श्रीमती विजया रजनीश त्रिपाठी जी, सहयजमान श्रीमती माया मुरारी लाल पांडला जी, श्रीमती हेमलता दिनेश शर्मा जी, श्रीमती इंदु सुभाष चेजारा जी, श्रीमती माया रमा प्रसाद सक्सैना जी ने उतारी, साथ में श्री अयोध्या प्रसाद सेठ जी, श्री राम जीवन लाल सोनी जी एवं आयोजक समिति के सभी सदस्य उपस्थित रहे। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान हमे कभी वेद के माध्यम से, वेदी की श्रुतियों के माध्यम से, पुराणों के माध्यम से, गुरू और संतों की वाणी के माध्यम से बार बार समझाते ही हैं, ना समझ तो हम हैं की सुनने और समझने के बाद भी गलतियां करने से बाज नहीं आते। ऐसा नहीं है की ईश्वर हमें समाझाते नहीं है, ऐसा नहीं है की ईश्वर ने हमें समझने का अवसर नहीं दिया, जब भी आप कथा में इस बात से सहमत होते हो की ये सच है, ईश्वर ने आपके गुरू के द्वारा, संतों के द्वारा वो बात आप तक पहुंचाई ही है। आप कथा पंडाल में सहमत होते हैं और बाहर जाते ही वहीं करते हो जिसके लिए पंडाल में सहमती दी थी की ये मेरी भूल है, यही माया का सच। ईश्वर हमें बार बार कहते हैं अपना ध्यान रखो, गलत दिशा में मत जाओ लेकिन ये पापी मन है की मानने का नाम ही नहीं लेता। महाराज श्री ने आगे कहा कि वेद रूपी पेड़ का भागवत पका हुआ फल है । पके हुए फल की तीन प्रमुख पहचान हैं, पहली पहचान वह नर्म हो जाता है, दूसरी पहचान वो मीठा हो जाता है, तीसरा वो अपना रंग बदल लेता है। भक्ति में परिपक्व, भक्ति में निपुण जो जीव है उसकी भी ये तीन पहचान हैं, जब जीव भक्ति में आगे बढ़ने लगता है तो सबसे पहला गुण वो विनम्र हो जाता है, आप आगे बढ़े या ना बढ़े लेकिन जीवन में आपके विनम्रता आनी चाहिए, झुका हुआ व्यक्ति, विनम्र व्यक्ति जीवन में कही भी मात नहीं खा सकता। दूसरा उसकी वाणी मीठी हो जाती है, उसकी वाणी में कटुता नहीं होती, आप अपने ऊपर सोचिए की आपकी वाणी कैसी है ? कौए और गाय का रंग एक जैसा होता है लेकिन कौए से सब नफरत करते हैं और गाय से प्रेम इसका मुख्य कारण वाणी ही है, इसलिए मीठा बोलिए। तीसरा भक्ति में निपुण व्यक्ति के चेहरे पर आत्मविश्वास झलकता है, जो भगवान की भक्ति करते हैं वो अपने आप को अविश्वासी नहीं बनने देते, पूर्ण विश्वास करते हैं की इसमें उन्हें सफलता मिलेगी ठाकुर जी मिलेंगे ही इसमें कोई दो राय नहीं है। उन्होंने आगे कहा की जीवन में गुरूर नहीं गुरू की जरूरत है और गुरू ऐसे नहीं की कंठी ले ली और फिर झांके ही नहीं। ये सत्संग होता ही उसके लिए है यहां सुनो, पढ़ो और आगे बढ़ो। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है। श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए। यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा। ।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

9Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 06 से 14 दिसंबर 2018 तक प्रतिदिन दोपहर 2:30 बजे से बाला साहेब ठाकरे मैदान, ऑरेंज हॉस्पीटल के सामने, इंद्रलोक फेज-3, भायंदर मुंबई में 108 श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया। कथा के तीसरे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से 06 से 14 दिसंबर 2018 तक प्रतिदिन दोपहर 2:30 बजे से बाला साहेब ठाकरे मैदान, ऑरेंज हॉस्पीटल के सामने, इंद्रलोक फेज-3, भायंदर मुंबई में 108 श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया। कथा के तीसरे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के तीसरे दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई। भागवत आरती मुख्य यजमान रजनीश त्रिपाठी, विजया रजनीश त्रिपाठी, सहयजमान माया मुरारी लाल पांडला, हेमलता दिनेश शर्मा, इंदु सुभाष चेजारा, माया रमा प्रसाद सक्सैना ने उतारी, साथ में अयोध्या प्रसाद सेठ, राम जीवन लाल सोनी एवं आयोजक समिति के सभी सदस्य उपस्थित रहे। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भागवत की कृपा हम सब पर है, हम सभी को भगवान के द्वारा यहाँ भेजा गया है। लेकिन हम में से ये कोई नहीं जानता की किसका जीवन काल कितना है सबको उनके कर्मो के अनुसार जीवन दिया गया है हम जो ये साँसे ले रहें है उनका वहा ऊपर हिसाब किताब रखने वाले बैठा है। इसलिए इस जीवन का सबसे बड़ा सत्य मृत्यु है और जो असत्य है वो जीवन है।महाराज जी ने बताया की हम सब का प्यार जीवन के साथ मृत्यु के साथ नहीं । हमें जीवन में क्या प्यारा लगता है हम मृत्यु से ज्यादा जीवन को प्यार करते है लेकिन सच तो ये है की जीवन सिर्फ और सिर्फ एक धोखा है यह हमें धोखा देगा, जीवन हमारे साथ धोखा करेगा, आज है कल नहीं होगा लेकिन जो आपका साथ देगी और जो इस पृथ्वी का सबसे बड़ा सत्य है वो है मृत्यु। जिसने जन्म लिया है वो उसका मरना तय है समय जगह और कारण सब पहले से तय है। साथ ही पंडित जी ने बताया की अगर मनुष्य को चिंता करनी हो तो अपने जीवन के अन्धकार की करे की कैसे वो अपने जीवन में प्रकाश ला सकता है क्यूंकि इस जीवन में प्रकाश लाना सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी जिम्मेदारी है। इसलिए मेरे प्यारे भगवान् के बनो और अपने धर्म के बनो। क्यूंकि यही तो मोह माया है जो आपको अन्धकार की ओर ले जाती है जीव रहकर भी भगवान को भूल जाता है। और तकलीफ सिर्फ इसी बात की है की हमारे जीवन में अन्धकार है। महाराज श्री ने आगे कहा आज के इस कलयुग में हम भगवान् से ज्यादा लोगों को मनाने में लगे हुए है। और ईश्वर को विस्म्रत कर आनंद लेने की कोशिश कर रहे है। लेकिन मेरे प्यारे अपने जीवन में भक्ति की जिम्मेदारी मेरे ठाकुर की सेवा आपकी ही है। तुम्ही को ये जिम्मेदारी पूरी करनी पड़ेगी वरना बाद में रोना पड़ेगा। अगर आप अपना कल्याण करना चाहते है तो अपनी जिम्मेदारी खुद पूरी करे, और दान पुण्य जरूर करे। इस युग में अनेक संत है और अनेक विचार धारा संतो को संतो के भाव से देखो , ब्राह्मणो को ब्राह्मणो के भाव से देखो, बड़े आदर्श पुरुषो को उस आदर्श की भावना से देखो लेकिन भगवान की भावना किसी में पैदा मत करो लेकिन भगवान सिर्फ भगवान है कोई जीव भगवान नहीं हो सकता। संतो की वजह से ही भगवान की प्राप्ति हो सकती है। महाराज श्री ने बताया की रोज सुबह अपने माता - पिता के हाथ जोड़कर उन्हें नमन करे। क्यूंकि संस्कार ही है जो हमें विष गुरु बनाते है। वरना आज कल तो हमारे संस्कारो में जहर घुल गया है । याद रखिए आपके विचार, संस्कार आपकी वाणी, आपके कार्य आपको महान बनाते है। जो आदर्श से पैर छूता है उसके लिए आशीर्वाद दिल से निकलता है। आशीर्वाद सबसे बड़ी दौलत है। जितना ज्यादा हो सके उतना आशीर्वाद लीजिये। देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है। तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये... अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे। भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं। श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा। ।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

10Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 14 दिसंबर 2018 तक भायंदर मुंबई में आयोजित 108 श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। कथा के चौथे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 14 दिसंबर 2018 तक भायंदर मुंबई में आयोजित 108 श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। कथा के चौथे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। भागवत आरती मुख्य यजमान रजनीश त्रिपाठी, विजया रजनीश त्रिपाठी, सहयजमान माया मुरारी लाल पांडला, हेमलता दिनेश शर्मा, इंदु सुभाष चेजारा, माया रमा प्रसाद सक्सैना ने उतारी, साथ में अयोध्या प्रसाद सेठ, राम जीवन लाल सोनी एवं आयोजक समिति के सभी सदस्य उपस्थित रहे। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि झूठे जगत का त्याग जितनी जल्दी कर दो उतना अच्छा है क्योंकि हम सब के पीछे उसही दिन से काल पड़ा है जिस दिन से हमारा जन्म हुआ है। महाराज श्री ने आगे कहा कि एक भक्त ने प्रशन किया है कि हम भक्ति करते हैं तो हमें परीक्षा क्यों देनी पड़ती है, कितनी परीक्षाएं हमको देनी हैं उन्होंने इसका सुंदर उत्तर देते हुए कहा कि कुछ बातें हमेशा याद रखनी चाहिए की इस संसार में सिर्फ सफल होने वालों को ही परीक्षा देनी पड़ती है, असफल होने वालों को तो देनी ही नहीं पड़ती वो तो आराम से घर बैठते हैं, परीक्षा उसही को देनी है जिसे सफल होना है। संसार रोकता है भक्ति करने से, संसार इसलिए रोकता है क्योंकि तुम रूक जाते हो। मीरा कहां रूक पाई थी, ध्रुव कहां रूक पाए थे, प्रह्लाद कहां रूक पाए थे, जब उनके सर पर धुन सवार हुई तो निकल गए थे वो भक्ति करने को। आप मुझे एक भक्त का नाम बता दो जिसे भक्ति करने से ना रोका गया हो। महाराज श्री ने कहा कि अगर वाकई भक्ति करना चाहते हो तो सबसे बड़ी बात ये है कि तुम्हे पता होना चाहिए की तुम सही कर रहे हो। तुम्हारी आत्मा इस बात की गवाही दे की तुम सही कर रहे हो, तो फिर रूकना मत। गोपियां अगर गवालों के रोकने से रूक जाती तो वो कृष्ण को कभी प्राप्त नहीं कर पाती। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया। शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे। महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”। महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।" जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया। इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा। ।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

11Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 14 दिसंबर 2018 तक भायंदर मुंबई में आयोजित 108 श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के पांचवे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 14 दिसंबर 2018 तक भायंदर मुंबई में आयोजित 108 श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के पांचवे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। भागवत आरती मुख्य यजमान रजनीश त्रिपाठी, विजया रजनीश त्रिपाठी, सहयजमान माया मुरारी लाल पांडला, हेमलता दिनेश शर्मा, इंदु सुभाष चेजारा, माया रमा प्रसाद सक्सैना ने उतारी, साथ में अयोध्या प्रसाद सेठ, राम जीवन लाल सोनी एवं आयोजक समिति के सभी सदस्य उपस्थित रहे। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि कभी कभी जो बड़े नहीं कर पाते वो छोटे छोटे बच्चे कर पाते हैं। समझ आ जाए ये बात, ये भी ठाकुर जी की कृपा ही समझो की ये बात समझ में आ जाए। कभी कभार समय के अनुसार विपरित परिस्थितियों में भगवान पर से भरोसा हमारा छूट जाता है और जब हमारा भरोसा छूटता है तो कई बार तो हम धर्म करने से दूर चले जाते हैं । विपरित परिस्थितियों में भगवान को भूल जाना हमारी कमजोरी है, अगर आपने सत्संग अच्छे से सुना है तो कठिन परिस्थितियों में वो सत्संग आपके काम आएगा ही आएगा। मुश्किलें तब होती हैं जब हम सत्संग में नहीं जाते और जो सत्य है, जो दुनिया में हमें धैर्यवान बनाता है वो हमें प्राप्त नहीं होता। इस संसार में ऐसा कोई नहीं है जिस पर संकट नहीं है, हर इंसान की अलग प्रकार की परिस्थितियां हैं। कोई गरीबी से अमीर हुआ है पर अमीरी में भी खुश नहीं है, कोई अमीरी से गरीबी में चला गया है वहां भी सुखी नहीं है। ना अमीर सुखी है, ना गरीब सुखी है जिसने भगवान के नाम का आश्रय ले लिया वो हर हाल में सुखी है। महाराज श्री ने कहा कि भगवान जब अहित की कृपा करते हैं तो जीव का मन सतकर्मों में लगता है और जीव का मन अगर सतकर्मों में लगता है तो ये मानव के जीवन की सफलताओं की पहली सीढ़ी है। अच्छे कर्मों में मन लगना और अच्छाई करना ये मानव जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। महाराज श्री ने कहा कि अगर तुम जीवन में परोपकार कर सको तो उससे बड़ा पुण्य नहीं, अगर तुम किसी को दुख दे दो तो उससे बड़ा कोई पाप नहीं। आजकल हर व्यक्ति एक दूसरे को दु:ख देने में लगा है, कोई मन से दुख दे रहा है ,कोई वचन से दुख दे रहा है, कोई कर्म से दुख दे रहा है। वेद व्यास जी ने कहा है अगर पुण्य प्राप्त करना चाहते हो तो परोपकार करो, तुम्हारे द्वारा कोई दुखी ना हो पाए, हो सके तो तुम्हारे द्वारा सुखी हों। जब कोई आत्मा आपसे दुखी होती है तो परमात्मा दुखी होते हैं और जब परमात्मा दुखी होते हैं तो पूरी दुनिया में आपको कोई सुखी नहीं कर सकता। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है। भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए। अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है। श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया। श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा। ।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

12Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने 06 से 14 दिसंबर 2018 तक भायंदर मुंबई में आयोजित 108 श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने 06 से 14 दिसंबर 2018 तक भायंदर मुंबई में आयोजित 108 श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर पुतना उद्धार, कृष्ण रुक्मिणी विवाह एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। भागवत आरती मुख्य यजमान रजनीश त्रिपाठी, विजया रजनीश त्रिपाठी, सहयजमान माया मुरारी लाल पांडला, हेमलता दिनेश शर्मा, इंदु सुभाष चेजारा, माया रमा प्रसाद सक्सैना ने उतारी, साथ में अयोध्या प्रसाद सेठ, राम जीवन लाल सोनी एवं आयोजक समिति के सभी सदस्य उपस्थित रहे। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत कहा कि आज के समय में अगर सबसे बड़ी सम्पत्ति कुछ है तो वो है शांति, सच्चा सुख। ना अमीर सुखी है ना गरीब सुखी है, सभी का चित्त अशांत है। उन्होंने कहा कि अगर जीवन में शांति चाहते हो तो जीवन में भार उठाकर मत चलो, हमने जो ये भार उठा रखा है संसार मेरा है, परिवार मेरा है, ये गाड़ी, मकान दुकान मेरा है, ये जो भार उठा रखा है ये हमें सुखी नहीं होने देता ये दुख देता है। साधन दिखावे के लिए अच्छे हैं लेकिन ये सुख नहीं देते। एक संत ने कहा है कि जितने सुख के साधन इकट्ठे करोगे उतने दुखी होगे। हमेशा सुखी रहने के लिए एक उपाय कर लिजिए, ये मान लिजिए की मेरा कुछ नहीं है, सबकुछ उसका है। महाराज श्री ने कहा कि हर व्यक्ति को धर्म को जानना चाहिए, धर्म को जानेंगे तो बहुत कम लोग रह जाएंगे अपराध करने वाले क्योंकि धर्म में सीखाया जाता है बुरा कर्म का बुरा नतीजा होगा, एक जन्म नहीं अनेकों जन्म बिगड़ेंगे। इसलिए आप सब से आग्रह है की कुछ भी भगवान दे अहंकारी मत बनना, अभिमानी मत बनना और अपने बच्चों को धर्मात्मा बनाना क्योंकि बच्चे धर्मात्मा बनेंगे तभी तुम्हारी बुढ़ापे में सेवा करेंगे और अगर बच्चें धर्मात्मा नहीं बने तो बुढ़ापे में तुम्हे रोना पड़ेगा। धर्म ही तो बच्चों को सीखाता है बढ़ों की सेवा करो। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा। ।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

9Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के पावन सानिध्य में भायंदर मुंबई में गुरूदीक्षा एवं आर्शीवचन कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के पावन सानिध्य में भायंदर मुंबई में गुरूदीक्षा एवं आर्शीवचन कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमें हजारों की संख्या में आए हुए भक्तों ने गुरू दीक्षा ली एवं श्रीमुख से निकले हुए आर्शीवचनों का रसपान किया।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

 

7Dec 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 06 से 14 दिसंबर 2018 तक बाला साहेब ठाकरे मैदान, ऑरेंज हॉस्पिटल के सामने, इंद्रलोक फेज-3, भायंदर मुंबई में आयोजित 108श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 06 से 14 दिसंबर 2018 तक बाला साहेब ठाकरे मैदान, ऑरेंज हॉस्पीटल के सामने, इंद्रलोक फेज-3, भायंदर मुंबई में आयोजित 108श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। 

पूज्य महाराज श्री द्वारा दूसरी बार भायंदर, मुंबई में श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करवाया जा रहा है। कथा के एक दिन पहले यानि 06 दिसंबर को कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई जिसमें हजारों की संख्या में माताओं बहनों ने कलश उठाया एवं विभिन्न झांकियों के साथ कलाश यात्रा निकाली गई
भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थान के साथ की गई। दीप प्रज्वलित महाराज श्री, महापौर श्रीमती डिंपल मेहता, श्री गजेंद्र भण्डारी जी, श्री एच.पी अग्रवाल जी, श्री अर्जुन सेलांग जी द्वारा किया गया।

आयोजक समिति द्वारा महाराज श्री को पगड़ी पहनाकर सम्मानित किया गया, कथा पंडाल में महापौर श्रीमती डिंपल मेहता जी ने भी अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई, मिशन द्वारा उन्हे समृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।


पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि हम सब भाग्यशाली है जो हमें भागवत कथा का रसपान करने का सौभाग्य मिल रहा है, ये किशोरी जी की कृपा से ही प्राप्त होता है वरना कुछ लोग तो यहां रहकर भी कथा में नहीं आ पाते। जब आपके पूर्व जन्मों के सतत सतकर्मों का संग्रह एकत्रित होता है तब आप श्रीमद्भागवत कथा सुनने का विचार बनाते हैं, और जैसे ही आप ये धारणा बनाते हैं की कथा सुनने जाना है उसी वक्त पितृ लोक में हमारे पितृ झूमने लग जाते हैं की हमारा परिवार, हमारे वंश कथा सुनने जा रहे हैं। हम जो भी सतकर्म करते हैं उसका फल पितृ को भी प्राप्त होता है और एक बात याद रखना की देवताओं से ज्यादा महत्वपूर्ण पित्र हैं। देवता तो उतना ही देंगे जितना तुम सतकर्म करोगे लेकिन पित्र वो दे सकते हैं जो तुम सोच नहीं सकते। 
महाराज श्री ने भागवत कथा की प्रथम श्लोक सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे! तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नम:..... के उच्चारण के साथ की। उन्होंने श्लोक का अर्थ समझाते हुए कहा की जो सत्य नित्य निरंतर जिनके स्वरूप को प्राप्त करके सत्य होता है, जो नित्य निरंतर हैं। जब शृष्टि नहीं थी तब भी वो थे, जब शृष्टि नहीं रहेगी तब भी वो रहेंगे, सत्य कहते ही उसको हैं जो नित्य निरंतर होता है, जो कभी नहीं मिट सकता। एक ब्रह्म सत्य है, एक कृष्ण सत्य है बाकी सब मिथ्या है। इसका एक प्यारा सा भाव समझे तो वो ये है की जिसका चित्त जिसके वश में है, हमारा चित्त हमारे वश में नहीं है, हमारा चित्त हमें भटकाता रहता है लेकिन उनका चित्त उनके वश में रहता है। 
महाराज जी ने कहा की सुखदेव जी हमारे कल्याण का कितना चिंतन करते है की उन्होंने जीव कल्याण के लिए पांच यज्ञ बताए हैं, पहला यज्ञ है जब भी भोजन बनाएं घर की पहली रोटी निकालकर गऊ को खिलाएं, दूसरा यज्ञ है कुछ मीठा या आटा लेकर चीटियों को खाने के लिए देना चाहिए, तीसरा यज्ञ है पक्षियों को कुछ खाने के लिए देना चाहिए, चौथा यज्ञ है जलाशय में जो मछलियां हो उनको भी खाने के लिए कुछ देना चाहिए, पांचवा यज्ञ है भोजन बनाने के साथ कुछ मीठे के साथ अग्नि देव की पहला ग्रास खिलाना चाहिए, खुद के खाने से पहले। अग्नि देव नारायण का ही स्वरूप हैं जैसे ही आप अग्नि को भोग लगाते हैं स्वयं परमात्मा उसे ग्रहण कर लेते हैं। ये पांच यज्ञ जीव को प्रत्येक दिन करना चाहिए और जो गृहस्थि ये पांचों यज्ञ ना कर पाए उसे भगवान की कथा का आश्रय ले लेना चाहिए।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। 
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। .
श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

6Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में हनुमान मंदिर नवघर रोड़ से कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई। कलश यात्रा में हजारों की संख्या में माताओं बहनो और भाई बंधुओं ने भाग लिया। कलश यात्रा अनेकों प्रकार की झांकियों, बैंड, ढ़ोल नगाड़े, पारंपरिक वाद्य यंत्र, ध्वजा, घोड़े, हाथियों के साथ निकाली गई जिसमें स्वयं पूज्य महाराज श्री एक विशाल रथ में विराजमान होकर सम्मिलित हुए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में हनुमान मंदिर नवघर रोड़ से कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई। कलश यात्रा में हजारों की संख्या में माताओं बहनो और भाई बंधुओं ने भाग लिया। कलश यात्रा अनेकों प्रकार की झांकियों, बैंड, ढ़ोल नगाड़े, पारंपरिक वाद्य यंत्र, ध्वजा, घोड़े, हाथियों के साथ निकाली गई जिसमें स्वयं पूज्य महाराज श्री एक विशाल रथ में विराजमान होकर सम्मिलित हुए। कलश यात्रा जिन मार्गों से होकर गुजरी वहां इस भव्य कलश यात्रा को देखने के लिए लोग थम गए, हर किसी ने इस अद्भुत यात्रा का आनंद लिया। यात्रा में महाराष्ट्र के पारंपरिक वाद्य यंत्रों ने अलग ही समां बांधा, साथ ही नृत्य नाटिकाओं ने भी सभी का मनमोह लिया। कलश यात्रा में कई तरह की झाकियां निकाली गई जिनमें राम सीता, राधा कृष्ण, शिव, हनुमान की झाकियों ने शोभा यात्रा की शोभा बढ़ाई। इसके अलावा अनेक तरह का सांस्कृतिक कार्यक्रम की झाकियों ने भी सबका मन मोह लिया। इस कलश यात्रा की मुख्य विशेषता यह थी की इसमें कई नदियों से लाया गया जल मिलाया गया है। हनुमान मंदिर नवघर रोड़ से शुरू हुई ये कलश यात्रा शहर के विभिन्न क्षेत्रों से होते हुए राधे राधे के गीत गाते हुए, नृत्य करते, झूमते हुए कथा पंडाल तक पहुंची जहां पर कलशों की स्थापना की गई। विशाल कलश यात्रा को देखते हुए प्रशासन द्वारा सुरक्षा के भी कड़े इंतजाम किए गए थे एवं भक्तो को किसी प्रकार की परेशानी ना हो इसका भी ख्याल रखा गया था।

5Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज 06 से 14 दिसंबर तक भायंदर, मुंबई में आयोजित होने जा रही 108 श्रीमद्भागवत कथा के लिए आज मुंबई पहुचंने पर विश्व शांति सेवा समिति मुंबई के सदस्यों द्वारा फूलमाला पहनाकर एयरपोर्ट पर भव्य स्वागत किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज 06 से 14 दिसंबर तक भायंदर, मुंबई में आयोजित होने जा रही 108 श्रीमद्भागवत कथा के लिए आज मुंबई पहुचंने पर विश्व शांति सेवा समिति मुंबई के सदस्यों द्वारा फूलमाला पहनाकर एयरपोर्ट पर भव्य स्वागत किया गया।

 

5Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज मुंबई पहुंचते ही सर्वप्रथम सिद्धिविनायक मंदिर में गणपति बप्पा के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया एवं प्रभु से कथा के सफल आयोजन की कामना की।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज मुंबई पहुंचते ही सर्वप्रथम सिद्धिविनायक मंदिर में गणपति बप्पा के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया एवं प्रभु से कथा के सफल आयोजन की कामना की।

 
 

5Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सम्मान में श्री रजनीश त्रिपाठी जी द्वारा सफायर हाईट्स (क्लब हाउस प्रथम तल) लोखंडवाला कॉम्पलेक्स, कांदिवली ईस्ट, मुंबई में स्वागत एवं आर्शीवचन कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सम्मान में श्री रजनीश त्रिपाठी जी द्वारा सफायर हाईट्स (क्लब हाउस प्रथम तल) लोखंडवाला कॉम्पलेक्स, कांदिवली ईस्ट, मुंबई में स्वागत एवं आर्शीवचन कार्यक्रम का आयोजन किया गया, पूज्य महाराज श्री का भव्य स्वागत किया गया, सभी ने श्रीमुख से निकले आशीष वचनों का श्रवण किया।

 

6Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज का भायंदर मुंबई में कथा स्थल पर पहुंचने पर समस्त माताओ बहनों ने 111 आरती उतारकर महाराज श्री का भव्य स्वागत किया। महाराज श्री के सानिध्य में सैकडों की तादाद में आए हुए भक्तों, समिति सदस्यों, आयोजकों ने सैकड़ो शंख बजाते हुए कथा का शंखनाद किया । पूज्य महाराज श्री ने सभी का इस भव्य स्वागत के लिए धन्यवाद किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज का भायंदर मुंबई में कथा स्थल पर पहुंचने पर समस्त माताओ बहनों ने 111 आरती उतारकर महाराज श्री का भव्य स्वागत किया। महाराज श्री के सानिध्य में सैकडों की तादाद में आए हुए भक्तों, समिति सदस्यों, आयोजकों ने सैकड़ो शंख बजाते हुए कथा का शंखनाद किया । पूज्य महाराज श्री ने सभी का इस भव्य स्वागत के लिए धन्यवाद किया। कथा पंडाल में महाराज श्री के स्वागत के लिए श्री गजेंद्र भण्डारी जी, श्री अर्जुन सेलांग जी, श्री अयोध्या प्रसाद सेठ जी, श्री मुरारी लाल पांडल जी, श्री छुट्टन लाल शरण शर्मा जी, श्री अमर पांडे जी, श्री सुभाष शरण जी, श्री हीराकांत शरण झा जी, श्री पिंटू शरण गुप्ता जी, श्री राकेश शरण शर्मा जी, श्री बनवारी अजय शरण गौड़ सामौता जी, श्री विनोद शरण सिंह जी, श्री जनार्दन शरण पाठक जी, श्री सुशील यादव जी, श्रीमती माया सक्सेना जी, श्री दिनेश शर्मा जी, श्रीमती नीलम चौधरी जी, श्रीमती रेखा शर्मा जी, श्री शेष नारायण गुप्ता जी, श्रीमती कोकिला सोनी जी, श्री राजेश मेवाडा जी, श्री प्रह्लाद सिसोदिया जी, श्रीमती जागृति ठक्कर जी, श्री आयुष शाह जी, श्री मोनू सोनी जी, समस्त विप्र समाज आदि कार्यकर्तागण एवं समर्थक उपस्थित रहे।

6Dec 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में भायंदर मुंबई में आयोजित होने जा रही 108 श्रीमद्भागवत कथा से पूर्व कलश यात्रा की तैयारियां जोरशोर से चल रही है। माताएं बहने बढ़ चढ़ कर कलश यात्रा में सम्मिलित होने हेतु रजिस्ट्रेशन करवा रही हैं। कुछ ही समय पश्चयात भव्य कलश यात्रा का शुभारंभ किया जाएगा।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में भायंदर मुंबई में आयोजित होने जा रही 108 श्रीमद्भागवत कथा से पूर्व कलश यात्रा की तैयारियां जोरशोर से चल रही है। माताएं बहने बढ़ चढ़ कर कलश यात्रा में सम्मिलित होने हेतु रजिस्ट्रेशन करवा रही हैं। कुछ ही समय पश्चयात भव्य कलश यात्रा का शुभारंभ किया जाएगा।

 

2Dec 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 6-14 दिसम्बर 2018 तक भायंदर, मुम्बई में आयोजित होने वाली 108 श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों को लेकर कथा स्थल पर संस्था के सचिव श्री विजय शर्मा जी ने कार्यकर्ताओं के साथ चर्चा की। कार्यकर्ताओं में गज़ब का उत्साह है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 6-14 दिसम्बर 2018 तक भायंदर, मुम्बई में आयोजित होने वाली 108 श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों को लेकर कथा स्थल पर संस्था के सचिव श्री विजय शर्मा जी ने कार्यकर्ताओं के साथ चर्चा की। कार्यकर्ताओं में गज़ब का उत्साह है। पूज्य महाराज श्री के आशीर्वाद और विश्व शांति सेवा समिति मुम्बई के कार्यकर्ताओं के प्रयास से इस बार की कथा पहले से भी विशाल होने वाली है जिसमें भारी संख्या में मुम्बई के भक्तगण कथा का रसपान करेंगे।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

30Nov 2018

आज विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी नागपुर में 22 फरवरी से 01 मार्च तक आयोजित होने जा रही श्रीमद्भागवत कथा की तैयारियों का जायजा लेने एवं कार्यकर्ताओं के साथ मीटिंग करने के लिए नागपुर पहुंचे, जहां एयरपोर्ट पर कार्यकर्ताओं द्वारा उनका स्वागत किया गया।

आज विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी नागपुर में 22 फरवरी से 01 मार्च तक आयोजित होने जा रही श्रीमद्भागवत कथा की तैयारियों का जायजा लेने एवं कार्यकर्ताओं के साथ मीटिंग करने के लिए नागपुर पहुंचे, जहां एयरपोर्ट पर कार्यकर्ताओं द्वारा उनका स्वागत किया गया।

 

28Nov 2018

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 6 से 14 दिसम्बर 2018 तक बाला साहेब ठाकरे मैदान, में आयोजित होने वाली विशाल 108 श्रीमद भागवत कथा के लिए पंडाल प्रारम्भ का भूमि पूजन श्री गजेंद्र भण्डारी जी के कर कमलों द्वारा किया गया।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 6 से 14 दिसम्बर 2018 तक बाला साहेब ठाकरे मैदान, में आयोजित होने वाली विशाल 108 श्रीमद भागवत कथा के लिए पंडाल प्रारम्भ का भूमि पूजन श्री गजेंद्र भण्डारी जी के कर कमलों द्वारा किया गया। आज से विशाल पंडाल का कार्य प्रारंभ हो चुका है, आप सभी भक्त इस विशाल 108 श्रीमद्भागवत कथा में सादर आमंत्रित है।

 

16Nov 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के षष्ठम दिवस पर हजारों की संख्या में आए भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत कहा कि जीवन में कुछ भी चीज ज्यादा एकत्रित नहीं करना चाहिए, जो भी मिले उसमें ही संतोष करना चाहिए और अधिक हो जाए तो सेवा भाव धर्म में अधिक लगाना शुरू कर दिजिए। विचार अधिक हों तो विचारों से अपने धर्म को आगे बढ़ाइए, बल अधिक हो तो धर्म की रक्षा किजिए, धन अधिक हो तो अपना धन धार्मिक कार्यों में लगाइए। जो भी आपके पास है उसकी अधिकता बढ़ जाए तो सिर्फ भगवान के लिए, धर्म के लिए, सेवा के लिए लगाइए।

महाराज श्री ने कहा कि भगवान को अहंकार प्रिय नहीं है और जब जब किसी जीव को अहंकार होता है, किसी वस्तु का अभिमान होता है तो मेरे ठाकुर उससे उस वस्तु को छीन लेते हैं। जब प्रिय वस्तु व्यक्ति से छिनती है तो उसके मन में वैराग्य उत्पन्न होता है और जब वैराग्य उत्पन्न होता है तो भगवान के प्रति उसका आक्रषण बढ़ जाता है।

महाराज श्री ने कहा कि कुछ लोग कहते हैं की भगवान को किसने देखा है । महाराज श्री ने उनसे सवाल पूछा की क्या तुम्हारी आत्मा किसी ने देखी है, अगर नहीं देखी तो क्या नहीं है । बिना आत्मा के आप 1 सेकेंड के लिए भी जी नहीं सकते और आज तक तुमने अपनी आत्मा को नहीं देखा की वो लाल है की पीली है, मोटी है या पतली है। जिस आत्मा पर तुम जिंदा हो उस आत्मा को आजतक नहीं देखा और भगवान को ना देख पाने पर सवाल उठाते हो। ना देख पाना वो आपकी समस्या है, आपके ना देखने की वजह से वो नहीं है ये गलत है। हम यहां बैठे बैठे अमेरिका नहीं देख सकते, हम यहां बैठे बैठे कई लोगों को नहीं देख पाते तो क्या वो नहीं है, उनका अस्तित्व नहीं है। उनका अस्तित्व है लेकिन मेरी नजर वहां तक नहीं पहुंच पा रही है। लोग यह भी कहते हैं की हमने नहीं देखा अमेरिका तो क्या हुआ किसी ने तो देखा है। महाराज श्री ने कहा कि यही तो मैं भी कह रहा हूं हमने नहीं देखा ईश्वर तो क्या हुआ, हमारे कुछ लोगों ने तो देखा है । अब आप पुछेंगे किसने देखा है, उनको बता दूं हनुमान ने देखा है, विभिषण ने देखा है, अयोध्या वासियों ने देखा है, गोपियों ने देखा है, गवालों ने देखा है, मीरा ने देखा है, तुलसी ने देखा है, इन सब ने देखा है, अगर आप नहीं देख सके तो ये आपकी समस्या है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।

श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस द्वारिका लीला, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष, व्यास पूजन पूर्णाहुति का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

17Nov 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई।

कथा के सप्तम दिवस पर हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि अगर हम चाहते हैं की मानव जीवन सफल होना तो कुछ बातें अहम होती है। सबसे पहले बात ईश्वर को कभी ना भूलें, अपने लक्ष्य को कभी ना भूलें, दूसरी बात अपने विचारों को कभी गिरने ना दें। आप अपने विचारों को ऊंचा ही रखिए, इसिलिए हमारे बुजुर्ग कहते हैं साधा जीवन ऊच्च विचार। लेकिन आज कल उलटा हो रहा है फैंसी जीवन, नीचा विचार, जीवन फैंसी हो गया है और विचार गिर गए हैं। जीवन में अच्छा बनने के लिए जरूरी है की आप का विचार श्रेष्ठ हो। कबीरदास बाबा ने कहा है निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय यानि अपने निंदकों को अपने आंगन में रखिए क्योंकि वो निंदा करेंगे तो तुम्हें सुधारने का मौका मिलेगा। लेकिन आजकल के निंदक भी वैसे नहीं रहे हैं, निंदक सुधारने वाले नहीं रहे मिटाने वाले हो गए हैं। पहले निंदा लोग करते थे आपको सुधारने के लिए, आजकल लोग मिटाने के लिए निंदा करते हैं। आप अच्छा कर रहे हो, आप आगे बढ़ रहे हो, आप कुछ कर ना सको इसके लिए मिटा देंगे आपको। निंदा नहीं करते बल्कि पूरा षडयंत्र करते हैं की कैसे मिटा दिया जाए इस शख्स को। लेकिन मिटाने वाले ये भूल जाते हैं की मिटाने का काम और बनाने का काम किसी ओर का है, आप सिर्फ प्रयास कर सकते हो सफल नहीं हो सकते। इसिलिए मैं आप सब से कह रहा हूं किसी को मिटा कर के आगे मत बढ़िए, जिस दिन आप किसी को मिटाने का प्रयास करेंगे उस दिन खुद मिट जाएंगे क्योंकि उसी दिन आप चाहे किसी की नजरों में ना गिरें हो लेकिन भगवान की नजरों में तो उस दिन गिर ही जाओगे।

महाराज श्री ने कहा कि जब जब संसार में अधर्म बढ़े, धर्म की कमी हो, तब तब उस युग में भगवान अवतार लेकर आते हैं और अवतार लेकर धर्म की स्थापना करते हैं। आज व्यक्ति धर्म को जानना नहीं चाहता है, हम भगवान की औलाद हैं, हम सब की ड्यूटी है की धर्म का प्रचार प्रसार करें। आज के इस युग में धर्म का प्रचार करने वाले को ठग कहते हैं, ढोंगी कहते हैं और ना जाने क्या क्या कहते हैं, खुद करते नहीं और दूसरों को करने देते नहीं।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंत: सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

18Nov 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 14 दिसंबर तक भायंदर (पूर्व) में आयोजित होने जा रही 108 श्रीमद्भागवत कथा की तैयारियों का जायजा लेने के लिए विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी मुंबई पहुंचे, एयरपोर्ट पहुंचने पर माल, पगड़ी, शॉल, गुलदस्ते देकर उनका भव्य स्वागत किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 06 से 14 दिसंबर तक भायंदर (पूर्व) में आयोजित होने जा रही 108 श्रीमद्भागवत कथा की तैयारियों का जायजा लेने के लिए विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी मुंबई पहुंचे, एयरपोर्ट पहुंचने पर माल, पगड़ी, शॉल, गुलदस्ते देकर उनका भव्य स्वागत किया गया। श्री विजय शर्मा जी ने मुंबई एयरपोर्ट पर कदम रखते ही सर्वप्रथम 108 श्रीमद्भागवत कथा को भव्य बनाने के लिए हरी झंडी दिखाई और मुम्बई के समस्त समिति सदस्यों का हौसला बुलंद किया।

18Nov 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के अष्टम दिवस पर भजन संध्या का आयोजन किया गया। महाराज श्री के श्रीराम के चरित्र का वर्णन किया, महाराज के श्रीमुख से निकले सुंदर भजनों पर भक्त खूब झूमें।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के अष्टम दिवस पर भजन संध्या का आयोजन किया गया। महाराज श्री के श्रीराम के चरित्र का वर्णन किया, महाराज के श्रीमुख से निकले सुंदर भजनों पर भक्त खूब झूमें।

भागवत कथा के अष्टम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने शुरूआत करते हुए कहा कि बलवान होना, पद्वान होना, धनवान होना, ज्ञानवान होना कोई बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात तभी है जब आपको धन, पद, बल, ज्ञान, भगवान की तरफ लग जाए, भगवान की तरफ लेकर जाए तो समझना की ये बड़ी बात है। यूं तो संसार में एक से एक व्यक्ति हैं, कितने आए, कितने चले गए, किसी भी वस्तु का सदुपयोग ईश्वरमय होने पर ही है। जब तक जीव ईश्वरमय ना हो तब तक जीव किसी काम का नहीं है। ईश्वर की सेवा में ना लगे, ईश्वर के काम ना आए, ईश्वर को पाने की कोशिश ना करे तो ये जीवन जीवन नहीं है। पशुओं में और हम में फिर अंतर क्या रह गया वो भी पेट भरने के लिए प्रयास करें और हम भी पेट भरने के लिए प्रयास करें।

महाराज श्री ने कहा कि भगवान की कथा सुनने के बाद यह चिंतन लगा रहे की भगवान में ही हमारा मन लगा रहे, भगवान को छोड़कर ये मन कहीं जाए ना । वो जीवन ही ध्न्य है, वो समय ही पवित्र है जिस समय में हमारा मन भगवान में लगता है और कथाओं के माध्यम से सहज में लगता है।

महाराज श्री ने प्रभु श्री राम के चरित्र का वर्णन करते हुए बताया की कैसे वह पूरे विश्व के एक आदर्श सद्चरित्र हैं. भगवान श्री राम की ऐसी क्या विशेष्ताएं हैं जो उन्हें राम बनाती हैं। उन्होंने कहा कि पूरे विश्व के युवाओं को श्रीराम का चरित्र वर्णन सुनना चाहिए। उन्होंने कहा कि भगवान श्री राम जिनको हम अपना आदर्श मानते हैं, समझने की कोशिश करें की वो भगवान श्री राम कौन हैं ? कैसे हैं ? क्यो त्रेता युग से लेकर आज तक प्रभु श्री राम हमारे दिलों में बसे हुए हैं ? आजतक हम राम को भुला नहीं सके हैं। जिस राशी के राम थे उसही राशी का रावण भी था लेकिन दोनों में कितना अंतर था ।

उन्होंने आगे कहा कि किसी भी धर्म की महिला से पूछा जाए की उसे कैसा पुत्र चाहिए तो वो राम जैसा ही कहेंगी। भगवान श्री राम ने कभी भी अपनी माता पिता की इच्छा को नजर अंदाज नहीं किया । वो श्री राम जो बाल्यकाल से ही अपने माता पिता के आज्ञाकारी पुत्र हैं, वेदों से उनका जुड़ाव है, बचपन से ही संत महात्माओं का आदर करना जानते हैं। वो अपने गुरू के वहां पड़ने गए और सभी विद्याओं में निपुण हो गए।

महाराज श्री ने आगे कहा कि पहले गुरूकुलम पद्ति थी आजकल स्कूल और कॉलेज पद्ती है। गुरूकुलम में बच्चों को गुरूकुलम में ही भेजा जाता था अपने माता पिता से दूर। भगवान श्री राम भी अपने माता पिता से दूर गए थे पड़ने के लिए। आज कल उन्हे हॉस्टल कहा जाता है लेकिन हॉस्टल में केवल पढ़ाया जाता है उन्हें पूरा नियम नहीं बताया जाता की जीवन में सुबह उठ कर क्या करें ? भोजन कितने बजे करें, भजन कब करें ये चीजे नहीं बताई जाती। आजकल के बच्चों की दिनचर्या ठीक नहीं है। गुरूकुलम में आप जाइए वहां बच्चों को सुर्य उदय से पूर्व उठा दिया जाता है और स्नान इत्यादि कराकर या तो योग के द्वारा या भजन के द्वारा हरि से मिलाने की कोशिश करते हैं। जब तक आप पढ़ाई में कठिन परिश्रम नहीं करेंगे आप श्रेष्ठ नहीं बन पाएंगे। केवल पास होने के लिए पढ़ना है वो अलग बात है लेकिन जीवन में फेल ना हो जाऊं उसके लिए पढ़ना है तो गुरू के गुरूकुलम में जाना ही पड़ेगा।

पूज्य महाराज श्री ने अपने श्रीमुख से निकले हुए भजनों से समुचे वातावरण को कृष्णमय बना दिया। सभी भक्त भजनों पर खुब झूमें और प्रभु के रंग में रंग गए। महाराज श्री ने राधा कृष्ण के सुंदर भजनों की प्रस्तुती दी।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

19Nov 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में अखण्ड भारत मिशन के बैनर तले दिनाक 18 नवंबर को राम मंदिर के निर्माण हेतु विशाल पद यात्रा निकाली गई। यह यात्रा मोतीझील ग्राउंड कानुपर से आनंदेश्वर धाम परमठ गंगा घाट तक निकाली गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में अखण्ड भारत मिशन के बैनर तले दिनाक 18 नवंबर को राम मंदिर के निर्माण हेतु विशाल पद यात्रा निकाली गई। यह यात्रा मोतीझील ग्राउंड कानुपर से आनंदेश्वर धाम परमठ गंगा घाट तक निकाली गई। यह यात्रा मोतीझील ग्राउंड से प्रारंभ होकर मधुराज नर्सिंग होम, आर्यनगर चौराहा, राजीव पेट्रोल पंप, रानीघाट चौराहा, होकर आनंदेश्वर धाम गंगा घाट पहुंची। वहां पर महाराज श्री ने शंकर भगवान के दर्शन कर भगवान से अयोध्या में जल्द से जल्द राम मंदिर का निर्माण हो इसके लिए प्रार्थना की। यात्रा में हजारों की संख्या में राम भक्त और संत समाज के व्यक्ति शामिल हुए। आनन्देश्वर मंदिर के रमेश पुरी जी महाराज ने महाराज श्री का स्वागत किया एवं गंगा जी की महा आरती की गई।

 

14Nov 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

कथा के चौथे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत कहा कि जीव अपने ही किए हुए कर्मों का फल भोगता है, जो बीज हम बोते हैं वहीं फसल के रूप में हमें प्राप्त होता है। इसका एक उदाहरण यह है की कई बार हम सोचते हैं की हमने किसी का बुरा नहीं किया, इसके बाद में हमें तकलीफ क्यों झेलनी पड़ रही है, हमे इतने दुखी क्यों है, हमने किसी का क्या बिगाड़ा है। एक बात आप ये समझ लिजिए की किसी को डंडा मारने को ही बिगाड़ना नहीं कहते हैं, किसी का खुन कर देना ही किसी का बुरा करना नहीं होता है, किसी के घर में चोरी करने को ही बुरा नहीं कहते हैं। बहुत सारी चीजें हैं जो हम रोज कर रहे हैं।

महाराज श्री ने आगे कहा कि इस संसार का नाम ही है दुखालय जहां आकर दुख मिलेंगे ये निश्चित है। वस्त्रालय में जाओगे वस्त्र मिलेंगे, विद्यालय में जाओगे विद्या मिलेगी और दुखालय में जाओगे तो दुख मिलेंगे । इस संसार में आए हो तो दुख निश्चित तौर पर मिलेंगे लेकिन उस दुख से निकलने का एक तरीका है अपने आप को गोविंद का कहो और गोविंद को अपना। जीव जब संसार में आता है तो ऐसा बंधनों में बंधता है की जिसने भेजा है उस ही को भूलता है।

महाराज श्री ने कहा कि भगवान कहते हैं जो मेरा नाम जपता है उसको तो मैं तार ही देता हूं लेकिन जो मेरा नाम जपे और कोई उसके चरण पकड़ ले उसे पहले तार देता हूं। भगवान के स्वरूप का दर्शन करवाने वाले कौन हैं, भगवान के भक्त ही तो हैं, जिनको हम गुरू, कथाकार, संत, भक्त के रूप में जानते हैं। भगवान भले ही दिखाई ना पड़ें लेकिन जो भगवान को गुणों का गुणगान करते हैं वो तो दिखाई पड़ते हैं।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।
महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।
शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।
इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।
दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।
महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर भगवान कृष्ण की बाललीला, गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे- राधे बोलना पड़ेगा ।।

15Nov 2018

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सम्मान में सी.एम.एस कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज, कानपुर द्वारा नागरिक अभिनंदन सम्मान समारोह का आयोजन किया गया।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सम्मान में सी.एम.एस कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज, कानपुर द्वारा नागरिक अभिनंदन सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। पूज्य महाराज श्री ने कार्यक्रम में सम्मिलित होकर छात्र छात्राओं का अपने आशीष वचनों से मार्गदर्शन किया एवं छात्र छात्राओं द्वारा पूछे गए सवालों का उत्तर सरल भाषा में दिया।

 

15Nov 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के पांचवे दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत कहा कि जब राम कृपा करते हैं तो संत मिलते हैं और जब संत कृपा करते हैं तो राम मिलते हैं, ये एक दूसरे के पूरक हैं। समाज की व्यवस्था अच्छी रहे इसही का चिंतन संत और कथाकार करते हैं। यहां किसी बात को कहने का मतलब ये नहीं होता की हम किसी से द्वेष करते हैं। हम सब का उद्देश्य यही है की भारत अखण्ड बना रहे और हम सब को उस ही के लिए प्रयास करना चाहिए।

महाराज श्री ने अयोध्या में राम मंदिर बनने के समर्थन में भी अपने बात रखते हुए कहा कि राम मंदिर तोड़ने वालों ने किसी से अनुमति नहीं मांगी थी उन्होंने तोड़ दिया था। वो आक्रमणकारी थे, बाहरी देश से आए हुए चोर लुटेरे थे जिन्होंने हमारे प्रभु पर आक्रमण किया, देवस्थानों पर आक्रमण किया। ये हमारा भारत कितना सहनशील देश है जिसके देवता के ऊपर उसही के देश में जबरदस्ती उससे वो स्थान छिन लिया गया हो तब से लेकर आजतक हम लोग शांति के साथ ये प्रार्थना कर रहे हैं की हमारा राम मंदिर बन जाए। उन्होंने आगे कहा कि पत्नी का हरण करने वाले रावण के भी चरणों में प्रणाम वो इसलिए करते हैं क्योंकि रावण ब्राह्मण है और वो क्षत्रिय, ये है राम का चरित्र। हम उस राम को चाहते हैं, राम के चरित्र को, राम के मंदिर को इसलिए चाहते हैं क्योंकि वहां प्रणाम करने वाले लोग सीखें मानवता नाम किस चीज का है।

महाराज श्री ने कहा कि भगवान हमें वो सब देते हैं जो हम चाहते हैं, जीव ही है कही ना कही भटक जाता है। ईश्वर अंतर्यामी है घट घट की जानते हैं, आप जब चाहते हैं तभी तो कथा होती है, आप जब गोविंद से कहते हैं हे गोविंद कृपा करो आपकी कथा हो जाए, हमारा भी मन आपकी कथा में लग जाए। हम ठीक वैसे ही आपके हो जाएं जैसे मीरा हो गई, जैसे धुर्व हो गए, जैसे प्रहलाद हो गए। भगवा का नाम लिजिए, भगवान की कथा सुनिए हमारा कल्याण होगा ही इसके कोई दो राय नहीं है। कुछ लोग कहते हैं भगवान की कथा क्या देती है अरे भरोसा करके तो देखो सबकुछ देती है।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। 
महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

श्रीमद् भागवत कथा के षष्टम दिवस पर उद्धव चरित्र, रूक्मिणी विवाह, रास पंचाध्यायी का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

13Nov 2018

आज दामोदर नगर, बर्रा, कानपुर नगर में प्रयाग कॉलेज ऑफ स्पेशल एजूकेशन स्कूल द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सम्मान में अभिवादन समारोह का आयोजन किया गया।

आज दामोदर नगर, बर्रा, कानपुर नगर में प्रयाग कॉलेज ऑफ स्पेशल एजूकेशन स्कूल द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सम्मान में अभिवादन समारोह का आयोजन किया गया जिसमें पूज्य महाराज श्री ने सम्मिलित होकर दिव्यांग छात्र छात्राओं के साथ समय व्यतित किया एवं अपने आशीष वचनों से उनका मार्ग दर्शन किया। महाराज श्री ने सभी बच्चों को फूलमाला पहनाकर उन्हे अपना आशीर्वाद दिया।

13Nov 2018

आज दामोदर नगर, खाईपुर, कानपुर में गुरूकुल इंग्लिश स्कूल द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सम्मान में समारोह का आयोजन किया गया।

आज दामोदर नगर, खाईपुर, कानपुर में गुरूकुल इंग्लिश स्कूल द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सम्मान में समारोह का आयोजन किया गया। पूज्य महाराज श्री ने स्कूल के छोटे बच्चों के साथ दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का उद्घाटन किया। महाराज श्री का फूल माला पहनाकर भव्य स्वागत किया गया । पूज्य महाराज श्री ने स्कूल के छात्र छात्राओं को आशीर्वाद देते हुए अपने आशीष वचनों से उनका मार्गदर्शन किया।

12Nov 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।
भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि शूद जी महाराज कहते हैं ये श्रीमद्भागवत अत्यंत ही गोपनीय है, रहस्यात्मक पुराण है। यह भगवत स्वरूप का दर्शन कराने वाला ग्रंथ है, जो जीव इस संसार सागर में फंसे हुए हैं, अंधकार में फंसे हुए है उनके लिए दीपक के समान है। 
महाराज श्री ने आगे कहा कि निश्चित तौर पर यह संसार अंधकारमय ही तो है जो अपना दिखता है वो है नहीं और जो गैर दिखता है वो गैर नहीं । इस संसार में यत्र तत्र सर्वत्र सब अपने ही तो हैं क्योंकि सब भगवत स्वरूप हैं, भगवान ने बनाए हैं। ऐसी भावना हर किसी जीव के मन में नहीं आ पाती है। इस अंधकार में जो अपने नहीं है उन्हें अपना समझ बैठते हैं और जो अपने हैं उन्हें हम अपना कह ही नहीं पाते हैं। 
महाराज श्री ने कहा कि श्रीमद्भागवत सभी का कल्याण करने वाली है, ये नहीं है की ब्राह्मण सुनेंगे तो कल्याण होगा, क्षत्रिय सुनेंगे तो कल्याण होगा। भागवत अगर कोई पक्षी भी सुन लेगा तो उसका कल्याण हो जाएगा। भागवत से अगर कुछ मांगोगे तो मिलेगा, अगर नहीं मांगोगे तो मोक्ष मिलेगा। ऐसा पावन ग्रंथ ये श्रीमद्भागवत है। इस भागवत के शरण में आने के बाद इसे केवल ग्रंथ ही नहीं समझना चाहिए साक्षात श्रीकृष्ण हैं ये भाव मन में रखना चाहिए और जब इस भाव से श्रीमद्भागवत कथा सुनेंगे तो उसी क्षण श्रीकृष्ण आपके ह्रदय में आकर विराजमान हो जाएंगे।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। 
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर जड़भरत संवाद, नृसिंह अवतार, वामन अवतार का वृतांत सुनाया जाएगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

13Nov 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 18 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत एक शायरी से कि उन्होंने कहा मुश्किल है दौर इतना और उम्र थक गई ।
अब किससे जाके पूछे की मंजिल किधर गई ।।
बाजार में पूछा था मैने इंसानियत मिलेगी।
सब ने हंसते हुए कहा वह तो कब की मर गई ।।
महाराज श्री ने कहा कि यह कितना कठिन युग है। पहले सोच से डर लगता था कि हम किसी को दुख देंगे तो क्या होगा आजकल तो लोग चैलेंज के साथ दुख देते हैं। लेकिन सच यही है की ये कठिन युग है, मुश्किल घड़ी है जहां अपने और पराए का भी पता नहीं है। लेकिन एक बात याद रखना जो हरि के होते हैं उनके सब होते हैं, जो हरि के नहीं होते उनका कोई नहीं होता है। इसलिए अगर मेरी बात मानो तो सबसे पहले हरि के बन जाओ और जो हरि के बन गए उन्हें और किसी के बनने की इच्छा बिल्कुल भी नहीं है।

महाराज श्री ने कथा पंडाल में आए हुए सभी बालक बालिकाओं को सीख देते हुए कहा की आपको प्रत्येक दिन 10 से 15 मिनट भगवान के सामने बैठकर कुछ भी ना कर सको तो ऊँ नमों भगवते वासुदेवाय इस मंत्र का जाप जरूर किजिए। सिर्फ 10 मिनट का समय बचपन में लगा दोगे तो मैं दावे से कहता हूं आपकी पूरी जवानी सुधर जाएगी।

महाराज श्री ने आगे कहा कि भक्ति करने की कोई उम्र नहीं होती, बल्कि बड़े होने पर व्यवस्थाएं बड़ जाती हैं। बचपन में भजन करने का फल बहुत अधिक होता है। माता पिता अपने बच्चों को भले की 10 मिनट के लिए लेकिन भगवान के आगे उसे बैठाइए। जो बच्चा बचपन से भक्ति करेगा उसका चरित्र बड़े होकर 98% नहीं जाएगा। बच्चों के भविष्य का निर्माण बचपन से करना चाहिए।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।

तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्री राम एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का वृतांत सुनाया जाएगा।
।। राधे – राधे बोलना पड़ेगा ।।

11Nov 2018

विश्व शांति सेवा समिति कानपुर के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 11 नवंबर से 18 नवंबर 2018 तक प्रतिदिन दोपहर 1:30 बजे से मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया।  पूज्य महाराज श्री द्वारा 1 साल कानपुर में कथा का श्रवण करवाया जा रहा है। कथा के एक दिन पहले यानि 10 नवंबर को कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई जिसमें हजारों की संख्या में माताओं बहनों ने कलश उठाया। 

विश्व शांति सेवा समिति कानपुर के द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में 11 नवंबर से 18 नवंबर 2018 तक प्रतिदिन दोपहर 1:30 बजे से मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के मुखारबिंद से श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के प्रथम दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज जी के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। 
पूज्य महाराज श्री द्वारा 1 साल कानपुर में कथा का श्रवण करवाया जा रहा है। कथा के एक दिन पहले यानि 10 नवंबर को कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई जिसमें हजारों की संख्या में माताओं बहनों ने कलश उठाया। 
भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि शास्त्रों में वेदो में पुराणों में जो वर्णन किया गया है उसे उसी के तरीके से समझना चाहिए। उस भाषा को ये भागवत कथा समझाती है। ईश्वर कौन है ? ईश्वर को पहचाने की इच्छा आती है तो धरा ही बदल जाती है, फिर होटल का खाना नहीं अच्छा लगता, मंदिर का प्रसाद अच्छा लगता है।

महाराज श्री ने बताया कि हर व्यक्ति को अपने जीवन में भगवान की भक्ति जरूर ही करनी चाहिए। क्योंकि भक्ति से ही मनुष्य का जीवन सदा के लिए सुधर सकता है। उसके सभी पाप धुल जाते है। जो खेल बीत गया है उसको याद मत करो। अब जो बचा है हम और तुम उसका सदुपयोग कर ले तो हमारे और तुम्हारे जीवन का सदुपयोग हो सकता है। मानव योनि हमे मिली है हम लोग ही बहुत ही भाग्यवान है। जिसको सब तरह के अंगों से भगवान् ने संपन्न किया हुआ है।
महाराज श्री ने कहा कि ईश्वर को कैसे पहचाना जाये, उसे पाए कैसे उसे मिले कैसे? दो प्रश्न- अपने आप से कीजिए तुम कौन हो और वो कौन है जिसने तुम्हारी रचना की है। ये दो प्रश्न आपने आप से कीजिये ये संसार बड़ा कोमल लगने लगेगा। भगवत की रचना हुई इस ब्रहम की पहचान करने के लिए। सत,चित और आनंद ये तीन रूप है परमात्मा के और आनद भी दो प्रकार के होते है। एक आनद दो साधनो में मिलता है लेकिन साधन के समाप्त हो जाने पर वो आनंद ख़तम हो जाता है। एक आनन्द वो होता है जो किसी साधन का मुताज नहीं होता। एक भीतरी आनन्द है जो परमात्मा को सोचते रहते है। जहां गोविन्द के नाम का गुणगान है वह सच्चा आनन्द है। सच्चा आनद कही अगर है तो वो भगवान की कथाओ में। श्रीमद भागवत कथा में ही सच्चा सुख है। जो संत महात्मा कथाकार भक्त होते है वो सब के कल्याण की बात करते है। श्रीमद भागवत कथा साधारण नहीं है ये हमारी सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाला ग्रन्थ है। जीव को संवेदनहीन नहीं होना चाहिए।

महाराज श्री ने अपनी बात रखते हुए कहा कि आज मैं आप लोगों से एक बात शेयर करना चाहता हूं, ये मेरे मन की बात है जो मैं आप लोगों से शेयर कर रहा हूं इसका राजनैतिक मतलब ना निकाले, बहुत दिनों से कुछ लोग अफवाहें फैला रहे हैं की अब तो देवकीनंदन राजनैतिक आदमी हो गए हैं अब वो कथा कहां करेंगे....उन्होंने अपनी पार्टी बना ली है, राजनीति में उतर गए हैं....लेकिन मैं आप लोगों को बता दूं की ना ही मैं राजनीति में उतरा हूं और ना ही कभी उतरूंगा। 
मैं कोई राजनैतिक व्यक्ति नहीं हूं। मेरा राजनीति से कोई लेना देना नही है......मैं हर उस बात के विरुद्ध हूँ जो देशहित और समाज हित मे ना हो।
हमने अखण्ड भारत मिशन का निर्माण किया जो की एक सामाजिक संस्था है जिसका उद्देश्य है जाति धर्म वर्ग के भेदभाव को खत्म कर एक अखण्ड भारत का निर्माण करना तो इसमें राजनीति कहां से आई ?
अखण्ड भारत मिशन कोई राजनैतिक पार्टी नहीं है बल्कि सामाजिक संस्था है जो राष्ट्रहित के लिए कार्य कर रही है। अगर आपको किसी की कोई बात बुरी लगती है और आप उसका विरोध कर रहे हैं तो उसका विरोध करना राजनिती तो नहीं होती..... 
मेरा सभी से अनुरोध है की आप इसे राजनैतिक रूप ना दें और संस्था का साथ दे चाहे वो किसी भी रूप में क्यों ना हो.....यह आपका देशहित में एक योगदान होगा।
मैं आपको यह भी बताना चाहता हूं की मेरा किसी भी रूप में राजनैतिक इस्तेमाल ना करें क्योंकि सोशल मीडिया पर मेरे नाम से कई अफवाहें चल रही हैं, मेरी फोटो का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है, मैं सब से अपील करता हूं की यह सब ना करें.... मेरा फ़ोटो और नाम कोई भी राजनीतिक पार्टी या प्रत्याशी इस्तेमाल ना करें। मेरा किसी भी पार्टी से कोई संबंध नहीं है मैं ना किसी पार्टी के विरुद्ध हूँ ना ही समर्थन में हूँ। मैं कथावाचक हूँ और कथा ही करता रहूंगा 
इस व्यास पीठ के माध्यम से देश विदेश में धर्म का शांति का, संस्कृत, संस्कृति और संस्कारों का संदेश देता रहूंगा।
कुछ लोगों ने समाज को भृमित करने की भी कोशिश की, की मैं समाज को बांट रहा हूँ। मेरे भाईयों से मुझे अलग करने की कोशिश की, मेरे बारे में कहा गया की मैं दलित विरोधी हूं, इस तरह का कोई भी बयान मैन नहीं दिया है। ना ही मैंने समाज को बांटने का कोई काम किया है। इसीलिए मेरा सभी से निवेदन है कि ऐसी अफवाहों पर ध्यान ना दे। कोई भी कथावाचक या संत किसी जाति, धर्म वर्ग विशेष का नही होता अपितु वो सभी का होता है और सभी उसके परिवार है।
सनातन धर्म मे सबसे पहले यही सिखाया जाता है कि वसुधैव कुटुम्बकम। अर्थात पूरा संसार एक परिवार है। तो ऐसे में कोई समाज को बांटने की बात कैसे कर सकता है।
मैं हमेशा देशहित में कार्य करता हूं, मैं हमेशा दलित भाईयों के साथ था, हूं और रहूंगा., मैं सब को साथ लेकर चलने में विश्वास रखता हूं......मैं ना ही किसी पार्टी के विरोध में हूं ना ही मैं उनके पक्ष में हूं और ना ही विपक्ष में.....
मेरा सीधा सीधा से मतलब यह है की जो भी पार्टी देशहित के लिए कार्य करेगी मेरा पूरा समर्थन उस पार्टी के लिए रहेगा।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा। 
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। .
श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कपिल देवहूती संवाद, सती चरित्र, ध्रुव चरित्र का वृतांत सुनाया जाएगा।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

7Nov 2018

#दीपावली के पावन पर्व पर पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने ग़रीब एवं अनाथ बच्चों को सर्दियों के वस्त्र और मिठाइयां बाँटकर पर्व मनाया।

#दीपावली के पावन पर्व पर पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने ग़रीब एवं अनाथ बच्चों को सर्दियों के वस्त्र और मिठाइयां बाँटकर पर्व मनाया। साथ ही बच्चों को भोजन ग्रहण करवाया और उनके साथ समय व्यतीत किया। #DiwaliCelebration #HappyDeepavali

10Nov 2018

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 17 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा से पूर्व आज विशाल कलश यात्रा निकाली गई।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 11 से 17 नवंबर तक मोतीझील ग्राउंड, कानपुर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा से पूर्व आज विशाल कलश यात्रा निकाली गई, जिसमें हजारों की संख्या में आई माताओं बहनों ने काली मठिया (हनुमान मंदिर), 80 फीट रोड से कथा स्थल तक कलश उठाकर यात्रा निकाली। कलश यात्रा जिस जिस मार्ग निकली वहां का वातावरण राधे राधे की धुन से गूंजायमान हो उठा।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

27Oct 2018

अमेरिका से डेढ़ महीने की यात्रा के बाद आज जब पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज शांति सेवा धाम,वृन्दावन पहुंचे तो यहां मौजूद सैंकड़ो भक्तो ने महाराज श्री का माल्यापर्ण करके उनका भव्य स्वागत किया।

अमेरिका से डेढ़ महीने की यात्रा के बाद आज जब पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज शांति सेवा धाम,वृन्दावन पहुंचे तो यहां मौजूद सैंकड़ो भक्तो ने महाराज श्री का माल्यापर्ण करके उनका भव्य स्वागत किया।

पूज्य महाराज श्री ने सर्वप्रथम ठा. प्रियाकांत जू भगवान के दर्शन किए। डेढ़ महीने तक अपने प्रिय ठा. श्री प्रियाकांत जू भगवान से दूर रहने का दुःख महाराज श्री के चेहरे पर दिख रहा था। उन्होंने कुछ समय भगवान के चरणों में बिताया और उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया।

लगातार 36 घंटे से भी लंबी यात्रा करने के पश्चात भी महाराज श्री आश्रम में आये सभी भक्तों से मिले और उन्हें अपने प्रवचनों श्रवण करवाये। भक्त भी महाराज श्री की एक झलक पाने के लिए सुबह से ही इंतजार कर रहे थे। देह के कोने कोने से भक्त महाराज श्री से मिलने आये।#WelcomeThakurJi

27Oct 2018

इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट दिल्ली पर भारी संख्या में विश्व शांति सेवा चैरिटबल ट्रस्ट और अखण्ड भारत मिशन के सदस्य एवं कार्यकर्ता पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज का स्वागत करने के पहुंच गए है। कुछ ही क्षणों में पूज्य महाराज श्री आने वाले है।

इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट दिल्ली पर भारी संख्या में विश्व शांति सेवा चैरिटबल ट्रस्ट और अखण्ड भारत मिशन के सदस्य एवं कार्यकर्ता पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज का स्वागत करने के पहुंच गए है। कुछ ही क्षणों में पूज्य महाराज श्री आने वाले है।

 

27Oct 2018

इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट दिल्ली पर भारी संख्या में विश्व शांति सेवा चैरिटबल ट्रस्ट के सदस्यों, भक्तों एवं कार्यकर्ताओं द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज का स्वागत किया गया।

इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट दिल्ली पर भारी संख्या में विश्व शांति सेवा चैरिटबल ट्रस्ट के सदस्यों, भक्तों एवं कार्यकर्ताओं द्वारा पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज का स्वागत किया गया। इस दौरान पूरा एयरपोर्ट राधे-राधे के स्वर से गूंज उठा। #WelcomeThakurJi

27Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 19 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 2018 तक Shiv Shakti Peeth, 264-12 Hillside Avenue Queens, NY11004, NewYork, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 19 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 2018 तक Shiv Shakti Peeth, 264-12 Hillside Avenue Queens, NY11004, NewYork, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
कथा की शरुआत करते हुए महाराज श्री ने बताया की आज का युग कलयुग है और अगर इस कलयुग में आज कोई लड़की किसी को बिना बताये मंदिर में पूजा करने चली जाए तो कोई भी उस लड़की का विश्वास नहीं करेगा और उससे कोई शादी नहीं करेगा जब आज कलयुग में ये स्थिति है तो आप पांच हजार वर्षो पीछे जाइये और सोचिये की वहा क्या स्थिति होगी जिन कन्याओं को बंधी बना कर रखा गया था उन कन्याओं से शादी कौन करता। इसलिए उन सभी कन्याओं ने ठाकुर जी से कहा की अब आप ही हमें बताये की हम क्या करें या तो हम गलत काम करें अपना पेट पालने के लिए या फिर मर जाए। महाराज श्री ने धर्म और अधर्म का पाठ पढ़ाते हुए बताया की आत्महत्या करना अधर्म है और भगवान् का प्राकट ही धर्म की रक्षा के लिए हुआ है इस लिए मेरे ठाकुर जी ने धर्म की रक्षा करते हुए उन सभी गोपियों को अपनाया और उनका उद्धार किया इसी लिए कहा जाता है की श्री कृष्ण जी की 16 हजार एक सौ 8 पटरानियां और एक लाख 61 हजार 80 पुत्र और 1 लाख 77 हजार 188 कन्याये थी।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की। और भागवत को सम्पूर्ण किया। पूज्य महाराज श्री ने भागवत कथा को सम्पूर्ण कर भागवत जी को विदा किया।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

25Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 19 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 2018 तक Shiv Shakti Peeth, 264-12 Hillside Avenue Queens, NY11004, NewYork, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 19 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 2018 तक Shiv Shakti Peeth, 264-12 Hillside Avenue Queens, NY11004, NewYork, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
कथा की शुरुआत करते हुए महाराज श्री ने बताया की हमारे जीवन में हमारे पितरों का बड़ा अहम रोल है अगर हमारे पितर हम से रूठ जाएँ तो घर में खुशहाली नहीं आती बच्चे बीमार पड़ जाते हैबिजनेस में लॉस हो जाता है घर में लड़ाईया शुरू हो जाती है। इसलिए हमें पितरो के लिए सत्कर्म समय समय पर करते रहना चाहिए और पितृ पक्ष में श्राद्ध में जो अपने पितरो का स्मरण नहीं करते है उनके पितृ उनसे रूठते ही है। और अगर आपके पितृ आपसे खुश हो तो आपकी आधी समस्याओं का निवारण तो ऐसे ही हो जाता है, इसलिए हमें अपने पितरो के प्रति हमेशा जागरूक रहना चाहिए। तत्पश्चात महाराज श्री ने कल का कथा प्रसंग याद दिलाते हुए कंश और देवकी प्रसंग से कथा क्रम को आगे बढ़ाया पंडित जी ने कंस का उदहारण देते हुए बताया की जैसे ही आकाशवाणी के द्वारा पता चला की देवकी का आठवा पुत्र कंश की मौत का कारण बनेगा तब कंस ने सोचा की अगर देवकी का आठवा पुत्र मेरी मौत का कारण बनेगा तो क्यों न में देवकी को ही मार दू। लेकिन क्या आज तक मौत को कोई हरा पाया है। हमारे जन्म से पहले ही हमारी मृत्यु तय है वो कहा होगी क्यों होगी और कैसे होगी किस समय होगी सब भगवान् के घर में पहले से ही तय है। साथ ही महाराज श्री ने बताया की एक बार महाराज यक्ष ने एक बार धर्म राज जी से प्रश्न किया की संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य बताओ की सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है तब धर्मराज जी महाराज से कहते है की महाराज जी सबसे बड़ा आश्चर्य ये है की ये प्राणी खुद अपने परिवार वालों को समशान घाट में अपने हाथो से जला कर आते है, अपनी आँखों के सामने उन्हें सुवाह होते हुए देखते है भस्म होते हुए देखते है इसके बाद भी खुद ऐसे जिन्दा रहते है की जैसे खुद कभी मरेंगे ही नहीं, तो इंसान इस बात को क्यों नहीं समझता की ऊपर कोई बैठा हुआ है जो हमें यहां निचे भेजता है और हमारा समय पूरा होने पर हमें ऊपर बुला लेता है। इसलिए हमारे जन्म से पहले हमारी मृत्यु तय है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

24Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 19 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 2018 तक Shiv Shakti Peeth, 264-12 Hillside Avenue Queens, NY11004, NewYork, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
कथा की शुरुआत करते हुए महाराज जी ने चतुर्थ दिवस का ध्रव प्रसंग भक्तों को याद दिलाते हुए बताया की भगवान् ने किस प्रकार प्रह्लाद जी की रक्षा की और निश्चित बात तो ये हैं की भगवान् के भक्तों को पग पग पर सहारा मिलता है। अगर तुम्हारे अंदर सच्चाई है और तुम भगवान् से बहुत प्यार करते हो तो भगवान् दुनिया छोड़ सकते है तुम्हे नहीं छोड़ सकते है। हमारा एक मात्र सहारा ईश्वर ही है बस शर्त ये है की आपको उनमे विश्वास रखना होगा। और जैसे जैसे आपका विश्वास बढ़ता जायगा वैसे वैसे ठाकुर जी आप पर कृपा करते जायँगे। लेकिन आज के मानव की सबसे बड़ी कमी ये है की उसका विश्वास डगमगा जाता है और यही सबसे बड़ी समस्या है अगर आप इस विश्वास से निजात पा ले तो अनंत बढ़ता चला जाता है एक विश्वास ही तो था प्रहलाद जी का जब हिरणकश्यप ने पूछा की बताओ तुम्हारा भगवान् कहा है तो प्रह्लाद जी ने कहा की पिताजी आप ये मत पूछो की मेरा भगवान कहा है आप ये पूछो की मेरा भगवान् कहा कहा नहीं है। परमात्मा तो हर जगह है बस आपकी दृष्टि होनी चाहिए उन्हें देखने की। इसलिए हमारी भक्ति और दृष्टि प्रह्लाद जी जैसी होनी चाहिए ताकि भगवान् आपकी रक्षा करने के लिए कही भी उपस्थित हो जाए।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली ने भगवान ब्रह्मा वरदान मांगा की मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने उसे वरदान दे दिया। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने विष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाशकरें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली से कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" 
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का सुंदर वर्णन श्रवण कराया। सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

23Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 19 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 2018 तक Shiv Shakti Peeth, 264-12 Hillside Avenue Queens, NY11004, NewYork, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 19 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 2018 तक Shiv Shakti Peeth, 264-12 Hillside Avenue Queens, NY11004, NewYork, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।
भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जीवन में जो आपके आदरणीय लोग हैं उनका आदर करना सीख लें। हम जो भी किसी को देते हैं वो ही हमें वापस मिलता है, अगर हम सम्मान देंगे तो हमें भी सम्मान ही मिलेगा। सम्मान एक ऐसा विषय है जो आप किसी से छीन नहीं सकते, आपके डर से कोई आपको सम्मान नहीं देगा, आपके कर्म से प्रभावित होकर वो आपको सम्मान देता है। 
महाराज श्री ने कहा कि जीवन में तीन लोगों का अपमान कभी नहीं करना चाहिए, साधु-संत, भक्त और ब्राह्मण। अनजाने में भी इनका अपराध नहीं होना चाहिए, अगर आपने अनजाने में भी इनका अपराध किया तो वो आपके विनाश की शुरूआत होगी। आप मुझ पर यकीन मत किजिए, पुराण पढिए, धार्मिक किताबें पढिए। भगवान के बनाए हुए नियम कभी गलत नहीं होते, हम भगवान के बनाए हुए नियमों में जी रहे हैं। हमें उनही के नियमों का पालन करना चाहिए वही हमारे लिए बेहतर है।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।
राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...
अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।
भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

22Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 19 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 2018 तक Shiv Shakti Peeth, 264-12 Hillside Avenue Queens, NY11004, NewYork, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 19 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 2018 तक Shiv Shakti Peeth, 264-12 Hillside Avenue Queens, NY11004, NewYork, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।
भागवत कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भागवत कथा के रहस्य को हर कोई नहीं जान पाता केवल भक्त लोग ही जान पाते हैं। भगवान का विषय, भक्ति को विषय साधारण नहीं है, ना जाने कितने जन्मों के अच्छे कर्मों का फल भगवान की भक्ति ह्रदय में प्रकट होना है। जब तक अच्छे कर्मों का फल हम लोग एकत्रित ना कर ले तब तक भगवान की भक्ति हमारे ह्रदय में प्रकट नहीं हो सकती। भगवान की भक्ति सभी शूलों को मिटाने वाली है, हरि का दर्शन कराने वाली है, वो भगवान की भक्ति को प्रकट करने वाली है भागवत हमारे ह्रदय में। लेकिन कब जब हमारे उतने श्रेष्ठ कर्म हों कि हम कथा में जा सकें, कथा में पहुंच सके, कथा में हमारा मन लग सके। 
महाराज श्री ने कहा कि किसी भी चीज का अहंकार नहीं करना चाहिए चाहे वो भक्ति या भजन ही क्यों ना हो। उन्होंने आगे कहा कि भागवत क्या है ? व्यास जी ने लिखा है भागवत साक्षात कृष्ण हैं। भागवत सुनते वक्त सीधे सामने आकर बैठे और एक एक वाक्य को ध्यान से सुनते रहें। भगवत कृपा समझ कर उसे ग्रहण करते रहें। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। 
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

21Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 19 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 2018 तक Shiv Shakti Peeth, 264-12 Hillside Avenue Queens, NY11004, Newyork, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के प्रथम दिवस पर महाराज जी ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 19 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 2018 तक Shiv Shakti Peeth, 264-12 Hillside Avenue Queens, NY11004, Newyork, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के प्रथम दिवस पर महाराज जी ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
भागवत कथा प्रारंभ से पूर्व प्रात:काल में मदिर परिसर से कथा स्थल तक माताओं बहनों द्वारा कलश यात्रा निकाली गई।

पूज्य महाराज श्री ने सर्वेश्वर भगवान को प्रणाम कर कथा की शुरुआत की और कहा की जब तक हमारी बुराइयों का विनाश नहीं होगा तब तक हमारी अच्छाइयों का विकास नहीं हो सकता। बुराइयों के विनाश अच्छाइयों के विकास का सबसे बड़ा उदाहरण राम और रावण का युद्ध है। हम लोग अपने देश से दूर रहकर अगर मन भागवत में हमारा मन ठाकुर जी में है तो समझ लेना चाहिए की जरूर हमारे ठाकुर जी की कृपा हम सब के ऊपर बनी हुई है तभी हमें ये सुन्दर अवसर मिला है।

महाराज श्री ने कहा की आसान नहीं धर्म का प्रचार करना और कहा की कथा सबसे बड़ा कार्य करती है, हमारा मन ठाकुर जी के चरणों में लगाती है। हमारे जब तक पाप रहते है तब तक हमारा मन कथा में नहीं लग सकता। आइये हम सब मिलकर पाप काटने के लिए संकीर्तन कर ले, पाप कटेंगे तो हमारा मन भागवत में लगेगा। सात दिन की भागवत कथा हमें क्या नहीं दे सकती ? भागवत श्रवणमात्र ही वो सब दे सकती है जो कही से प्राप्त नहीं हो सकता।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की एक बात सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगो का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा ।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

21Oct 2018

पूज्य महाराज श्री द्वारा Newyork USA में आयोजित प्रथम दिवस की भागवत कथा से पूर्व कथा स्थल Shiv Shakti Peeth में पूजा अर्चना कर भगवान से आशीर्वाद लिया। महाराज श्री के सानिध्य में भक्तो द्वारा कथा स्थल तक कलश यात्रा निकालकर कथा का शुभारंभ किया गया।

पूज्य महाराज श्री द्वारा Newyork USA में आयोजित प्रथम दिवस की भागवत कथा से पूर्व कथा स्थल Shiv Shakti Peeth में पूजा अर्चना कर भगवान से आशीर्वाद लिया। महाराज श्री के सानिध्य में भक्तो द्वारा कथा स्थल तक कलश यात्रा निकालकर कथा का शुभारंभ किया गया।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

18Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 12 अक्टूबर से 18 अक्टूबर 2018 तक Sri Krishna Cultural Centre 13356 Apple Valley rd, Apple Valley, California में श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने राम कथा का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 12 अक्टूबर से 18 अक्टूबर 2018 तक Sri Krishna Cultural Centre 13356 Apple Valley rd, Apple Valley, California में श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने राम कथा का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया ।
राम कथा के पंचम दिवस की शुरुआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि बंदर राम के या बंदर काम के, हम सभी बंदर है चाहे राम के बन जाएं, चाहे काम के बन जाएं। राम के बंदर हैं तो श्री हनुमान जी जो पूज्यनीय हैं और काम के बंदर जो जो बने है वो काम के नहीं रहे। जो कामनाओं की पूर्ति में लगे रहत हैं वो काम के बंदर हैं, उनका जीवन पूरा हो जाता है लेकिन कामना पूरी नहीं होती।
महाराज श्री ने कहा कि रामचरित्रमानस एक बहुत ही प्यारा ग्रंथ है। रामायण में दो चरित्रों को आप याद किजिए, उन दो चरित्रों पर टीका है पूरा रामचरित्रमानस, एक है दशरथ एक है दशानन। दशरथ जिसने अपनी दशों इंद्रियों को अपने कंट्रोल में कर रखा है, जिसने अपनी दशों इंद्रियों को कंट्रोल में कर रखा है उसके घर में राम पैदा होते हैं और दशानन जिसने अपनी दशों इंद्रियों को खोल रखा है भोगों के लिए, उसका जाकर राम वध करते हैं। भोग कभी भोगे नहीं जाते अपितु यह भोग हमे भोग रहे हैं इसमें हम चाहे माने या ना माने। 
महाराज श्री ने कहा कि विषयों से कभी वैराग्य नहीं होता, पूरा जीवन मेरा प्रभु की भक्ति के बिना व्यतीत हो रहा है जब इस तरह का वैराग्य मन में आए तो फिर इंतजार नहीं करना चाहिए क्योंकि वैराग्य आसानी से नहीं आता है। कभी कभी जब भगवान कृपा करें तब वैराग्य होता है, वैराग्य किसी ठोकर लगने के बाद ही होता है, किसी घटना के बाद वैराग्य होता है, कोई ना कोई घटना घटती है जब हम वैरागी होते हैं। बहुत से लोग कहते हैं हम ये सब छोड़े देंगे, हमारे दुख का कारण ही ये है की हम छोड़ना चाहते हैं, छोडिए मत छोड़ने की कोशिश मत किजिए, अपने आप को वैराग्य से जोड़ने की कोशिश किजिए। जब आप वैराग्य को सुमिरण करने लग जाएंगे, ईमानदारी से मन में वो आ जाएगा आपको कुछ छोड़ने नहीं पड़ेगा, अपने आप छुट जाएगा।

19Oct 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में Apple Valley, CA में आयोजित श्री राम कथा का भव्य समापन हुआ, श्रोताओं ने कथा का रसपान कराने के लिए महाराज श्री को धन्यवाद दिया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में Apple Valley, CA में आयोजित श्री राम कथा का भव्य समापन हुआ, श्रोताओं ने कथा का रसपान कराने के लिए महाराज श्री को धन्यवाद दिया एवं अगले वर्ष पुन: मिलने की कामना के साथ भव्य विदाई दी, तत्पश्चात महाराज श्री ने न्यूयॉर्क के लिए प्रस्थान किया।

15Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 12 अक्टूबर से 18 अक्टूबर 2018 तक Sri Krishna cultural Centre 13356 Apple Valley rd, Apple Valley, California में श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के तृतीया दिवस पर महाराज श्री ने राम कथा का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया और प्रभु की दूसरी भक्ति के बारे में बताया।

राम कथा के तृतीया दिवस की शुरुआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुवात करते हुए कहा कि तुलसीदास जी ने लिखा है की जो दुष्ट प्रवर्ति के लोग वह यहाँ कथा सुनने नहीं आते है। तो फिर यहां कौन आते है "राम कृपा बिन सुलभ न सोये " जिनके ऊपर भगवान की कृपा होगी वही यहाँ आ सकते है। 
बिनु सत्संग विवेक न होई। रामकृपा बिनु सुलभ न सोई।। भगवान की कथा, सत्संग राम की कृपा के बिना सुलभ नहीं हो सकता। 
महाराज जी ने कहा की जीवन भर बात याद रखो अच्छी बात कोई कहे मान लो बुरी बात कोई कहे किसी की भी मत मानो। कथा सुनने से मिलता क्या है ? कथा सुनने वाले ही जानते है की कथा से क्या मिलता है। जिन्होंने कभी कथा सुनी न हो उन्हें क्या मतलब पड़ा है। राम कथा के सबसे बड़े श्रोता कौन है ? स्वयं भोले नाथ। स्वयं शंकर भगवान वो खुद भी कथा कहते भी है जब कोई जिज्ञासु आता है तो भगवान श्री राम की कथा कहते है और जब मन करता है तो कैलाश पर्वत का त्याग करके संत महात्माओं के आश्रमों में चले जाते है। जो स्वयं महादेव हो उनको कथा सुनने की क्या जरुरत है। वैष्णवों में सर्वश्रेष्ठ अगर कोई है तो वह बाबा भोले नाथ है।

पूज्य महाराज श्री ने कहा की भगवान श्री राम की ये पावन कथा जीवन के सारे द्वंदों को दूर करती है और सही मायनो में कहा जाए तो भगवान की कथा ही है जो मानव को मानव बनाती है। जिन्होंने श्री राम कथा को थोडा भी अपने जीवन में उतार लिया है तो उसका कल्याण होना निश्चित है।

पूज्य महाराज श्री ने कहा की भगवान की दूसरी भक्ति है भगवान की कथा सुनना। इसका असर ये होता है की पहले तो ये कथा सुनने वालो को संसार की वस्तुएं मिलने लगती हैं और लगातार सुनने से संसार की वस्तुओं को पाने की इच्छा नहीं होती बल्कि इच्छा बड़ी होकर भगवान से मिलने की इच्छा जगा जाती है। भगवान की कथा सुनने के लिए जिगयासा जागनी चाहिए।

14Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 12 अक्टूबर से 18 अक्टूबर 2018 तक Sri Krishna cultural Centre 13356 Apple Valley rd, Apple Valley, California में श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने राम कथा का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया और प्रभु की दूसरी भक्ति के बारे में बताया।

राम कथा के द्वितीय दिवस की शुरुआत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुवात करते हुए कहा कि तुलसीदास जी ने लिखा है की जो दुष्ट प्रवर्ति के लोग वह यहाँ कथा सुनने नहीं आते है। तो फिर यहां कौन आते है "राम कृपा बिन सुलभ न सोये " जिनके ऊपर भगवान की कृपा होगी वही यहाँ आ सकते है। 
बिनु सत्संग विवेक न होई। रामकृपा बिनु सुलभ न सोई।। भगवान की कथा, सत्संग राम की कृपा के बिना सुलभ नहीं हो सकता। 
महाराज जी ने कहा की जीवन भर बात याद रखो अच्छी बात कोई कहे मान लो बुरी बात कोई कहे किसी की भी मत मानो। कथा सुनने से मिलता क्या है ? कथा सुनने वाले ही जानते है की कथा से क्या मिलता है। जिन्होंने कभी कथा सुनी न हो उन्हें क्या मतलब पड़ा है। राम कथा के सबसे बड़े श्रोता कौन है ? स्वयं भोले नाथ। स्वयं शंकर भगवान वो खुद भी कथा कहते भी है जब कोई जिज्ञासु आता है तो भगवान श्री राम की कथा कहते है और जब मन करता है तो कैलाश पर्वत का त्याग करके संत महात्माओं के आश्रमों में चले जाते है। जो स्वयं महादेव हो उनको कथा सुनने की क्या जरुरत है। वैष्णवों में सर्वश्रेष्ठ अगर कोई है तो वह बाबा भोले नाथ है।

पूज्य महाराज श्री ने कहा की भगवान श्री राम की ये पावन कथा जीवन के सारे द्वंदों को दूर करती है और सही मायनो में कहा जाए तो भगवान की कथा ही है जो मानव को मानव बनाती है। जिन्होंने श्री राम कथा को थोडा भी अपने जीवन में उतार लिया है तो उसका कल्याण होना निश्चित है।

पूज्य महाराज श्री ने कहा की भगवान की दूसरी भक्ति है भगवान की कथा सुनना। इसका असर ये होता है की पहले तो ये कथा सुनने वालो को संसार की वस्तुएं मिलने लगती हैं और लगातार सुनने से संसार की वस्तुओं को पाने की इच्छा नहीं होती बल्कि इच्छा बड़ी होकर भगवान से मिलने की इच्छा जगा जाती है। भगवान की कथा सुनने के लिए जिगयासा जागनी चाहिए।

13Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 12 अक्टूबर से 18 अक्टूबर 2018 तक Sri Krishna cultural Centre 13356 Apple Valley rd, Apple Valley, California में श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने राम कथा का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 12 अक्टूबर से 18 अक्टूबर 2018 तक Sri Krishna cultural Centre 13356 Apple Valley rd, Apple Valley, California में श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने राम कथा का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया ।

राम कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने प्रथम दिवस की कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि हमारे जीवन में तमाम ऐसी परिस्थितियां होती है, हम ऐसी लड़ाई लड़ते हैं जिस लड़ाई का हमे पता नहीं होती है की अंत क्या है ? लेकिन आप अपने मन से पूछ लिजिए की जहां सत्य है वहां विजय है क्योंकि परमात्मा सत्य स्वरूप है, जहां सत्य होता है वहां विजय होती है। 
महाराज श्री ने आगे कहा कि कहा जाता है कि राम जी रावण से युद्ध में इसलिए जीत गए क्योंकि उनके साथ उनका भाई था और रावण इसलिए हार गया क्योंकि उसके भाई ने उसका साथ छोड़ दिया। आप अपने परिवार को अपने साथ रखते हैं तो आपकी जीत होती है। रावण जैसा पराक्रमी हार गया क्योंकि भाई साथ में नहीं था लेकिन आजकल भाई भाई में बनती नहीं है, बात बात पर लड़ाई होती है। इसिलिए जीवन भी और ज्यादा कठिन परिस्थितियों में घिर जाता है। भगवान श्री राम सिखाते हैं अगर तुम जीवन में सीखना चाहते हो तो सबसे पहले एक शर्त है की अपने भाईयों को अपने साथ में लेकर चलो, अपने समाज को साथ लेकर चलो, सत्य को साथ लेकर चलो, धर्म को अपने साथ मे लेकर चलो अगर धर्म साथ होगा तो तुम्हारी विजय होगी।
महाराज श्री ने कहा कि जीवन में भगवत कृपा बेहद जरूरी है “ जापर कृपा राम की होई तापर कृपा करें सब कोई” यानि जिसपर भगवान की कृपा है उसपर सब कृपा करते हैं । 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि आपको सबको पता है की रामचरित्र मानस तुलसीदास ने लिखि और बाल्मिकी रामायण ऋषि बाल्मिकी ने लिखी लेकिन यह बात आप नहीं जानते होगे की बाल्मिकी रामायण राम जी के आने से पहले लिख दी गई थी । हमारे संत कितने त्रिकाल दर्शी हैं की भगवान आकर क्या करेंगे यह बाल्मिकी रामायण में पहले ही लिखकर चले गए। कलयुग में भगवान का कल्कि अवतार होगा वेद व्यास जी ने भागवत में पहले ही लिख दिया और हम उन ऋषि मुनियों की बातों पर यकीन नहीं करते। ऐसे संत जो भगवान के आने से पहले भगवान की कथा लिख दे और वो हो तो उन ऋषियों के चरणों में लूट जाने को मन करता है। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

12Oct 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए ये मां बाप की जिम्मेदारी है, हम अपने बच्चों को कैसे संस्कार दे रहे हैं। सिर्फ बच्चे हो जाएं, वो पढ़ लिख जाएं, जो सही मायने में मानव ना हों क्योंकि जो सिर्फ अपने बारे में सोचता है और यह जीवन व्यतित कर देता है उसको कहा जाएगा तो मतलबी कहा जाएगा वो ढ़ग का मानव नहीं है। मानव किसे कहते है ? मानव तो सब हैं लेकिन मानवता किस किस में है ? अगर इंसान होकर इंसानियत ना हो तो उससे कोई फायदा नहीं है। आप अगर किसी के भले की ना सोच सकें, किसी के भले के बारे में ना सोच सकें, धर्म का हित ना कर सकें, अपना आत्म कल्याण ना कर सकें तो फिर ऐसा जीवन मिलने से लाभ भी क्या ? और ऐसा जीवन व्यतित करने से भी लाभ नहीं है। हम सब मानव जीवन में आए हैं तो अपने बच्चों को संस्कार देना बहुत जरूरी है।
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 
श्रीमद्भागवत कथा, सप्तम दिवस, Chicago USA.
23 Photos

12Oct 2018

पूज्य महाराज श्री ने शिकागो में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के बाद कैलिफोर्निया के लिए प्रस्थान किया जहां 12 अक्टूबर से 18 अक्टूबर तक Shri Krishna Ccultural Centre 13356 Apple Valley Rd., Apple Valley, CA- 92308 में श्री राम कथा का आयोजन किया जाएगा।

पूज्य महाराज श्री ने शिकागो में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के बाद कैलिफोर्निया के लिए प्रस्थान किया जहां 12 अक्टूबर से 18 अक्टूबर तक Shri Krishna Ccultural Centre 13356 Apple Valley Rd., Apple Valley, CA- 92308 में श्री राम कथा का आयोजन किया जाएगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

9Oct 2018

ज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि पति समझदार हो तो मकान जल्द बन जाता है और पत्नी समझदार हो तो बहुत जल्दी घर बन जाता है और बच्चे अगर समझदार हो तो घर ही स्वर्ग बन जाता है । यह सब समझदारी आती कहां से है ? यह सब समझदारी आती है धर्म से। आपके धर्मज्ञ लोग ही ये सारी चीजे बताते हैं और सिर्फ सुनने भर से काम नहीं चलता है, इसे अपने जीवन में उतारना पड़ता है। 
महाराज श्री ने आगे कहा कि आज हमारे पास सारी सुविधाएं उपलब्ध है लेकिन क्या जीवन में शांति है ? हमारे पास पहले के जमाने से ज्यादा अच्छी सड़के हैं, अच्छे मकान हैं, सारी सुविधाएं हैं लेकिन मन अशांत है आखिर क्यों ? वो इसलिए है क्योंकि संस्कारों की कमी है, हमने उन लोगों की नकल की जो साधन युक्त तो हैं लेकिन साधना युक्त नहीं हैं और साधन सुख नहीं दे सकते, साधना ही सुख दे सकती है। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

10Oct 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान ने हमे दो सॉफ्टवेयर दिए हैं एक है दिन और दूसरा दिमाग । दिल, दिमाग देने के बाद परमात्मा ने उसका उपयोग भी बताया है। प्रभु ने बताया की दिमाग का इस्तेमाल दुनिया के लिए करना और दिल का इस्तेमाल मेरे लिए करना, हमने ये बात मान ली और चले आए लेकिन जरा ध्यान से सोचिए क्या आपने उसका इस्तेमाल वैसे ही किया जैसा भगवान ने कहा ? हमने उसका उलट कर दिया, हमने दिमाग तो इस्तेमाल किया भगवान के लिए और दिल इस्तेमाल किया दुनिया के लिए । लोग कहते हैं की हमारा दिल टूट गया है, दिल के हजार टूकड़े हो गए हैं, आपसे किसने कहा था दिल का उपयोग करो, भगवान ने कहा था क्या दिल का उपयोग दुनिया के लिए करो ? भगवान ने जो कहा था आपने उससे उलटा किया। ये दुनिया दिल से नही चलती हैं, दुनिया दिमाग से चलती है, आप दिल को सिर्फ यहां फसा रहे हो। दिल का रिश्ता हमेशा भगवान के साथ होना चाहिए क्योंकि जब आप दिल से भगवान से जुड जाते हो तो उसे पता होता है की दिल कहां है। 
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

7Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि यह कटू सत्य है चाहे कोई इसे माने या ना माने, इस जीवन में कुछ भी निश्चित नहीं है, अगर इस संसार में जीवन में कुछ चीज निश्चित है तो उसका नाम हैं मृत्यु। अनिश्चित्ताओं के लिए अनेकों काम करते हैं हम और आप लेकिन जो निश्चिक है उसके बारे में कुछ नहीं सोचते हैं। जब हमारा जन्म भी नहीं हुआ उससे पहले हमारी मृत्यु निर्धारित है। मृत्यु जब आती है तो उसके लिए तीन चीजें निर्धारित रहती हैं समय, स्थान और वजह । 
महाराज श्री ने कहा कि 
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।
राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...
अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।
भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

8Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के चतुर्थ दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के चतुर्थ दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

कथा के चतुर्थ दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।महाराज श्री ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि आज आपका अच्छा वक्त है तो जरूरी नहीं कि कल भी रहेगा मुर्ख है वो लोग जो बुरे समय के आने का इन्तजार करते है और कहते है की भक्ति करेंगे जब हमारा वक्त बुरा आएगा या बुढ़ापा आएगा। काल करे सो आज कर आज करे सो अब। अच्छे काम कल नहीं आज करें और बुरे काम में कभी जल्दबाजी मत करें। बुरे काम को टालें, अच्छे वक्त में इतना अच्छा काम करो की बुरा वक्त आपको परेशान न कर सके।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली ने भगवान ब्रह्मा वरदान मांगा की मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने उसे वरदान दे दिया। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने विष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली से कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।

महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"

जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"

भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का सुंदर वर्णन श्रवण कराया। सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

7Oct 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।कथा के द्वितीय दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है ।कथा के द्वितीय दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
भागवत कथा के दूसरे दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि हमारे संत महात्मा जो हैं इनका जन्म, लीला भ्रमण, संसार में रहना परोपकार के लिए है। हमेशा उनके मन में एक ही भावना रहती है की जनकल्याण कैसे हो ? और उस दिव्य जनकल्याणकारी भावना के लिए वह प्रायसरत रहते हैं। उन्होंने कहा कि जो आपको सदमार्ग दिखाते हैं वहीं आपके शुभचिंतक हैं। लेकिन समाज में दुर्भाग्य यह है कि बुरे विचार देने वाले जो लोग हैं उन्हे हम अपने शुभचिंतक समझते हैं और अच्छे विचार देने वालों को हम अपना शत्रु समझते हैं। यह जो नकारात्मक भावना हमारे मन में भर गई हैं यही हमे दुख देती है। 

महाराज श्री ने कहा कि वैराग्य और ज्ञान से भक्ति पुष्ट होती है इसलिए वैराग्य और ज्ञान जरूर होना चाहिए। पहले भक्ति हो भक्ति आपको ज्ञान प्राप्त करा देगी और भक्ति ही आपको वैराग्य भी स्वयं करा देगी। लेकिन भक्ति दुनिया को दिखाने के लिए ना हो भक्ति खुद के लिए हो। 

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए। 

यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

5Oct 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के प्रथम दिवस पर महाराज जी ने भागवत कथा के महात्म का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 05 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple Of Greater Chicago, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के प्रथम दिवस पर महाराज जी ने भागवत कथा के महात्म का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया ।

भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने प्रथम दिवस की कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जिन श्राद्ध प्रक्षों में हम ये श्रीमद्भागवत कथा सुन रहे हैं यह भी अपने आप में बहुत बड़ी बात है, जिस श्रीमद्भागवत कथा को देवता नहीं सुन पाए वो भागवत कथा हमको श्रवण करने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है। जब हमारे पित्रों को ये पता चलता है की हमारे वंशज कथा सुनने जा रहे हैं इतना सुनने मात्र से हमारे पित्र खुशी से झूमने लगते हैं, खुशियां मनाते हैं की हमारे बच्चे श्रीमद्भागवत सुनने जा रहे हैं। हम जो भी सुक्रित करते हैं वो हमारे पुर्वजों तक सीधा जाता है। भगवान जब स्वयं कृपा करें तब हमे भागवत कथा सुनने का अवसर प्राप्त होता है। 

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की एक बात सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगो का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा । 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

4Oct 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 28 सितंबर से 04 अक्टूबर 2018 तक Colorado, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत एक शायरी के साथ करते हुए कहा कि आपको और हमको एक बात समझनी चाहिए की चार दिन की है जिंदगी, हंसी खुशी में काट ले, मत किसी का दिल दुखा, दर्द सब के बांट ले, कुछ नहीं है साथ जाना एक नेकी के सिवा, कर भला होगा भला ये गांठ अब तू बांध ले। उन्होंने आगे कहा कि बड़ी मुश्किल से ये मानव जीवन मिला है, कौन जानता है ईश्वर हमें यहां के बाद कहां ले जाने वाला है, अगर हमारे हाथ में होता तो हम वही करते जो हम चाहते हैं। लेकिन ये हमारे हाथ में नहीं है, अगर हमारे हाथ में अगर कुछ है तो ये है की कर भलो तो हो भला, इस बात को गांठ बांध लो कि तुम्हारा भला तब होगा जब तुम किसी का भला करोगे। यही जीवन का सार है और अपना भला करने के लिए सबसे अच्छी बात है ईश्वर का भजन, हरि का नाम, कुछ भी छूटे हरि का नाम ना छूटे । 

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

2Oct 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 28 सितंबर से 04 अक्टूबर 2018 तक Colorado, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया। भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि शास्त्रों में कहा गया है कि सबको समझना आसान है लेकिन भगवान कृष्ण को समझना बहुत मुश्किल है । उनकी लीलाएं विचित्र हैं, भगवान श्याम सुंदर का प्राक्ट्य मथुरा में कारागार में हुआ, बधाई बाजी गोकुल में, गऊएं चराई नंदगांव, बरसाने, वृंदावान, ब्रज क्षेत्र में, कुछ समय मथुरा में भी रहे, भगवान श्री कृष्ण की जीवन में इतना संघर्ष है जितना हम और आप सोच भी नहीं सकते, हम लोगों में इतनी क्षमता ही नहीं है। इसके बावजूद भी वो इतने खुश हैं की हालात कोई भी हों चैन की बंशी वो ही बजा सकते हैं। वरना थोडी सी भी परेशानी आ जाए तो इंसान बहुत हताश हो जाता है और वो भगवान हैं कंश कोई ना कोई राक्षस भेजता है बावजूद इसके उसे मारके चैन की बंसी बजाते हैं । इसका मतलब यह है की भगवान श्रीकृष्ण हमको सीखाते हैं की मुश्किलें तो आएंगी और जाएंगी लेकिन अपने आप में जो मगन रहता है, अपने आप में जो खुश रहता है उसे संसार की कोई भी मुसीबत दु:खी नहीं कर सकती । 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

29Sep 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 28 सितंबर से 04 अक्टूबर 2018 तक Colorado, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया। भागवत कथा के द्वितीय की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य महाराज श्री ने कथा की शुरुवात करते हुए कहा कि अपने धर्म की अच्छाई को बढ़ाना चाहिए। कुछ तो चीज है सतयुग से लेकर द्वापर तक द्वापर से त्रेता तक, त्रेता से द्वापर से कलयुग तक हम लोग आज भी उसी के गीत गा रहे है। अपने धर्म का प्रचार प्रसार करे, अपने धर्म की रक्षा करें, ये हम लोगों का कर्तव्य है जब कलयुग हमारे सर विराज मान होता है तो निश्चित बात है हमसे अपने से बड़ो का अनादर होता ही है। हम लोग अपने माँ पाप के प्रति उतने संस्कारी नहीं रहे हैं जो हमारे संस्कार हैं।

महाराज श्री आगे कहा कि 84 लाख युनियो के सुक्रतो को एकत्रित करके एक एक सुक्रतो को एकत्रित करके उस करुणा वरुणा सागर ने आपार करुणा करके अकारण ही कृपा करके ही हमें ये मानव जीवन दिया है। ये मानव शरीर में ही ऐसा मार्ग है जहाँ से हम 84 युनियों में जाने से बच सकते हैं। परन्तु जैसे ही मानव जीवन मिलता है सत्संग छूट जाता है, संसार की व्यवस्थाओं में ही अटेचमेंट हो जाती है, भगवान से बहुत दूर हो जाते हैं। हमारे ब्रज में एक बात कहते है सबसे बड़ी संपत्ति अगर जीवन में सत्संग मिल जाये तो उससे बड़ी संपत्ति नहीं, अगर भगवान आपको सब कुछ दे और सत्संग न दे तो समझ लेना की भगवान ने हम को सबकुछ दे कर सबकुछ छीन लिया।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। 
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

30Sep 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 28 सितंबर से 04 अक्टूबर 2018 तक Colorado, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया। भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते एक शायरी के साथ की, उन्होंने कहा ऐ जिंदगी तेरे जज्बे को सलाम, पता है की मंजिल मौत है, फिर भी दौड़ रही है तू । महाराज श्री ने आगे कहा कि जो श्राप राजा को लगा वो हमको भी लगा है हफ्ते में सात ही दिन होते हैं और ना जाने कब हमारी मौत हो जाएगी, राजा को तो मालूम था की सात दिन हैं हमको तो ये भी नहीं पता की सात मिनट भी है की नहीं हमारे पास, कौन जानता है कब तक जियेंगे। 
महाराज श्री ने कहा कि हर व्यक्ति को सत्संग में जाना चाहिए, बहुत से लोग कहते हैं सत्संग में जाकर क्या मिलता है ? जो मॉर्डन शिक्षा नहीं देती वो सत्संग देती है, जो हमारे बुजुर्गों के पास पहले से था । हमारे बुजुर्ग A for Apple नहीं जानते थे लेकिन जानकार वो तीनों कालों के थे । आज हम उन ऋषि मुनियों का मजाक उड़ाते हैं, उनका उपवास उड़ाते हैं जिनके पैर की धूल के कण के बराबर नहीं हैं हम लोग। एक जगह पर बैठे बैठे बता देते थे की दूसरी जगह क्या हो रहा है ?
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।
राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...
अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।
भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

1Oct 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 28 सितंबर से 04 अक्टूबर 2018 तक Colorado, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भागवत कथा जीव के पापों को काटती है, भागवत में नरक का वर्णन है की प्राणी कौन से पाप करके कौन से नरक में जाता है। कहने को मॉर्डन एज्यूकेशन हासिल करने वाले कुछ मॉर्डन लोग ये कहते हैं की मरने के बाद किसने देखा है क्या होगा ? सही बात को सही तरीके से समझोगे तो बच जाओगे और किसी भी सही बात को आप समझना ना चाहें वहीं सबसे बड़ी गलती है। हमे ये बात समझनी चाहिए की उचित क्या है और अनुचित क्या है ? 
देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली ने भगवान ब्रह्मा वरदान मांगा की मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने उसे वरदान दे दिया। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने विष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली से कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" 
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का सुंदर वर्णन श्रवण कराया। सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

28Sep 2018

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 28 सितंबर से 04 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple and cultural center of the Rockies 7201 S.Potomac Road Centennial, Colorado, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के प्रथम दिवस पर महाराज जी ने भागवत कथा के महात्म का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया । भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 28 सितंबर से 04 अक्टूबर 2018 तक Hindu Temple and cultural center of the Rockies 7201 S.Potomac Road Centennial, Colorado, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है । कथा के प्रथम दिवस पर महाराज जी ने भागवत कथा के महात्म का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया ।
भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने प्रथम दिवस की कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि श्रीमद्भागवत कथा सुनने का जो महात्म है ये बहुत बड़ा महात्म है। हमारे इतिहास में श्रीमद्भागवत कथा नारायण के श्रीमुख से निकली, नारायण के मुख से निकलकर ब्रह्मा जी तक गई, ब्रह्मा जी से सनकादिक ऋषि, सनकादिक ऋषियों से नारद जी और नारद जी से वेद व्यास जी तक और फिर इसका विस्तार हुआ। ये जो भागवत है जिसके समक्ष आप बैठे हैं ये भगवान के मुख से ही निकल कर आई है, भगवान ने ही इसको हम सबके लिए इसको उपस्थित किया और भगवान ने भागवत कथा हम सब तक इसलिए पहुंचाई क्योंकि कलयुग के लोगों का कल्याण हो सके।


महाराज श्री ने तीर्थ के महत्व के बारे में बताया कि अगर आप तीर्थ में इस भावना के साथ गए हो की तीर्थ में जाने से मेरे पाप कम होंगे होंगे, अगर इस भावना के साथ आप तीर्थ में गए हो तो निश्चित है की आपके पास उस दिन तक के नष्ट हो जाएंगे, तीर्थ जाया ही इसलिए जाता है, सत्कर्म किया ही इसलिए जाता है। तीर्थ जाना चाहिए मानव जीवन मिल जाने के बाद और एक निश्चित उम्र हो जाने के बाद तीर्थ में ही वास करना चाहिए। कुछ ऐसे स्थान हैं जहां पर जीवन के अंतिम यात्रा हो जैसे काशी, काशी में अगर व्यक्ति समाप्त होता है तो मोक्ष निश्चित होगा ही, उसका पुर्नजन्म नहीं होगा। इसमें कोई शंका नहीं है की जो लोगों दूसरों के विषय में बुरा सोचते हैं, बुरी योजनाएं बनाते हैं उनके दिमाग में गोबर के सिवा कुछ नहीं होता है और जो दूसरों को सुख देने की सोचते हैं उनके दिमाग में सुगंधित पुष्प रहते हैं।
महाराज श्री ने आगे कहा कि जितनी योजना आप दूसरों को तकलीफ देने में लगाते हो, जिनता नेगेटिव सोचते हो उतना पोजिटिव सोचो तो समाज को सुख दे पाओगे, परिवार को सुख दे पाओगे औरों की तो छोड़ो उतना ही अपने आप को सुख दे पाओगे। आपके दिमाग की जो स्थिति आपका स्तर बयां करती है की आपके दिमाग में भरा क्या है, गोबर भरा है या पुष्प भरा है ?


पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की एक बात सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगो का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।


व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा । 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

29Sep 2018

पूज्य महाराज श्री द्वारा Colarrado USA में आयोजित प्रथम दिवस की कथा से पूर्व कथा स्थल Hindu Temple and cultural center of the Rockies में पूजा अर्चना कर भगवान से आशीर्वाद लिया।

पूज्य महाराज श्री द्वारा Colarrado USA में आयोजित प्रथम दिवस की कथा से पूर्व कथा स्थल Hindu Temple and cultural center of the Rockies में पूजा अर्चना कर भगवान से आशीर्वाद लिया।

 

22Sep 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 22 से 23 सितंबर तक Portland, Oregon में श्रीकृष्ण कथा का आयोजन किया गया।

 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 22 से 23 सितंबर तक Portland, Oregon में श्रीकृष्ण कथा का आयोजन किया गया। महाराज श्री ने भक्तों को श्री कृष्ण कथा का श्रवण करवाते हुए बताया की हमारी जो संस्कृत भाषा है सबसे पवित्र भाषा है और यह संस्कृति को बनाती है और कहा की हर रिश्ते की खूबसूरती ही हिंदी में है। महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण की बाल लिलाओ का भी वर्णन किया।
 
 

21Sep 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

19Sep 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

19Sep 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

18Sep 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली ने भगवान ब्रह्मा वरदान मांगा की मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने उसे वरदान दे दिया। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने विष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली से कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" 
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का सुंदर वर्णन श्रवण कराया। सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

17Sep 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते।

इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।
भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

16Sep 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।


भागवत कथा के द्वितीय की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।


देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। 
भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 


।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

14Sep 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के पहले दिन महाराज जी ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 14 सितंबर से 20 सितंबर 2018 तक Durga Mandir 4240 Route 27 Princeton NJ 08540 New Jersey, USA में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के पहले दिन महाराज जी ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।
भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
भागवत कथा प्रारंभ से पूर्व प्रात:काल में मदिर परिसर से कथा स्थल तक माताओं बहनों द्वारा कलश यात्रा निकाली गई। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की एक बात सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगो का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा । 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

12Sep 2018

आप महाराज जी ने अपने 40वें जन्मदिवस के अवसर पर सुबह पूज्य माता श्री से आशीर्वाद लेकर ठा. प्रियाकांत जू जी के दर्शन किए, उसके बाद बांके बिहारी जी के दर्शन करने के बाद वृंदावन में चातुर्मास कर रहे।

आप महाराज जी ने अपने 40वें जन्मदिवस के अवसर पर सुबह पूज्य माता श्री से आशीर्वाद लेकर ठा. प्रियाकांत जू जी के दर्शन किए, उसके बाद बांके बिहारी जी के दर्शन करने के बाद वृंदावन में चातुर्मास कर रहे पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज से आशीर्वाद प्राप्त कर आगे के लिए प्रस्थान किया।

 

12Sep 2018

कल पूज्य महाराज श्री अपने पूर्व निर्धारित कथा कार्यक्रमों को करने हेतु अमेरिका के लिए प्रस्थान किया।

कल पूज्य महाराज श्री अपने पूर्व निर्धारित कथा कार्यक्रमों को करने हेतु अमेरिका के लिए प्रस्थान किया।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

8Sep 2018

आज पूज्य पिताजी की प्रथम पुण्यतिथि पर महाराज श्री ने पूज्य पिताजी की प्रतिमा स्थापित कर ब्राह्मणो को भोजन प्रसाद ग्रहण कराया।।

आज पूज्य पिताजी की प्रथम पुण्यतिथि पर महाराज श्री ने पूज्य पिताजी की प्रतिमा स्थापित कर ब्राह्मणो को भोजन प्रसाद ग्रहण कराया।।

 

3Sep 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 03 सितंबर 2018 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का ठा. प्रियाकांत जू मंदिर, शांति सेवा धाम, वृंदावन में भव्य आयोजन किया गया। महोत्सव की शुरूआत महाराज श्री द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ की गई। कथा पंडाल में हजारों की संख्या में आए भक्तो ने रंगारंग कार्यक्रमों के बीच कन्हैया के आने की खुशियां मनाई।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 03 सितंबर 2018 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का ठा. प्रियाकांत जू मंदिर, शांति सेवा धाम, वृंदावन में भव्य आयोजन किया गया। महोत्सव की शुरूआत महाराज श्री द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ की गई। कथा पंडाल में हजारों की संख्या में आए भक्तो ने रंगारंग कार्यक्रमों के बीच कन्हैया के आने की खुशियां मनाई। देश के कोने कोने से आए कलाकारों ने नृत्य नाटिकाओं के माध्यम से कन्हैया के अलग अलग रूपों को पेश किया। पूज्य महाराज श्री के मुखाबिंद से निकले कृष्ण भजनों पर भक्त खूब झूमे और कृष्ण के जन्म की खुशियां मनाई। रंगारंग रोशनी में चमक रहे ठा. प्रियाकांत जू मंदिर की भव्यता भी मन मोह रही थी। रात 12 बजते ही प्रभु श्री कृष्ण का जन्म होते ही समूचा परिसर श्री कृष्ण के जयकारों से गूंज उठा। पूज्य महाराज श्री द्वारा ठा. प्रियाकांत जू मंदिर में बाल गोपाल का अभिषेक किया गया और 108 श्रीमद्भावत कथा के समस्त यजमानों के द्वारा भी बाल गोपाल का मंत्रोचारण के साथ अभिषेक किया गया एवं जन्माष्टमी आयोजन में उपस्थित सभी कृष्ण भक्तों के द्वारा महाआरती की गई। पूज्य महाराज श्री के साथ देर रात तक चले भजनों में हर कोई उल्लास में डूबा रहा।

3Sep 2018

आज पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में शांति सेवा धाम, वृंदावन में युवा शांति सेवा संदेश का आयोजन किया गया

जिसमें महाराज श्री ने सभी युवाओं एवं बच्चों के धर्म और संस्कृति से जुड़े सवालों का एक-एक करके जवाब दिया। युवा शांति संदेश के इस आयोजन में युवाओं ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। युवाओं ने देश के धर्म, संस्कृत, संस्कृति और संस्कारों से जुड़े हुए कई सवाल किए जिनका महाराज श्री द्वारा युवाओं की ही भाषा में बड़ी ही सरलता से उत्तर दिया गया। पूज्य महाराज श्री ने सभी युवाओं गलत संगत एवं प्रव्रतियों को त्यागने और धर्म, देश व समाज के प्रति समर्पित रहने के लिए प्रेरित किया और सनातन धर्म का इतिहास एवं संस्कारों की जानकारी दी।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

 

2Sep 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 27 अगस्त से 03 सितंबर 2018 तक शांति सेवा धाम, वृंदावन में 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

भागवत कथा के सप्तम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
कथा की शुरूआत से आज विप्र समाज ब्रज साहित्य सेवा मंडल श्रीधाम वृंदावन एवं संयोजक पंडित बिहारी लाल वशिष्ठ जी के द्वारा महाराज श्री को ब्रज की संस्कृति को कृष्ण लीलाओं एवं श्रीमद्भागवत के माध्यम से विश्व में प्रसारित करने के अद्वितीय योगदान एवं उत्कृष्ट सेवाओं के लिए ब्रज पदम सिरोमणी की उपाधी से अलंकृत किया गया एवं प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि ये दुनिया दो चीजों से बनी है गुण से और अवगुण से, बिना अवगुणों के तो सोना भी नहीं बनता है, अगर इसमें गुण ही गुण होते तो ये दुनिया नहीं होती ये एकनिया होता। एक बात याद रखिए कहीं गर्मी, कहीं सर्दी ये कुदरत के नजारे हैं, उनहे भी प्यास लगती है जो दरिया के किनारे हैं। इस दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जिसमें सिर्फ गुण ही गुण हो, ये संसार बना ही गुण और अवगुण से है। ये जीवन एक गुण हैं और मृत्यु अवगुण। 
महाराज श्री ने आगे कहा कि संत में और असंत में एक अंतर होता है, संत सिर्फ गुण ग्रहण करते हैं और असंत सिर्फ दुर्गुण ही ग्रहण करते हैं। आप अपने आप निर्धारित किजिए की आप क्या है कौन हो। अगर हम किसी का अवगुण उठा कर ले जाते हैं तो हम असंत है, अगर हम किसी का गुण ग्रहण कर लेते हैं तो हम संत हैं और भागवत कथा हमें संत बनाती है। इसिलिए आपको संत बनना चाहिए, अपना नजरिया बदलिए. जब आपका नजरिया बदलेगा तो आपको नजारे बदल जाएंगे। 
महाराज श्री ने कहा कि हर किसी के जीवन में एक पल ऐसा आता है की जो हम नहीं करते उसका इल्जाम लगता है, यह पल हर किसी के जीवन में आता है, भगवान के जीवन में भी ये पल आएं है, भगवान श्री राम के जीवन में भी आया.....राम जी भगवान थे सब जानते हैं, माता सीता कितनी पतिव्रता थी उसे बावजूद भी राम राज में एक था जिसने इल्जाम लगाया था। याद रखिए जीवन में जो कार्य आपने ना किए हो और वो इल्जाम भी आप पर लगे तो समझना तुम्हारा वक्त थोड़ा सा बुरा चल रहा है, शांत रहो, भगवान का भजन करो, उस वक्त को निकल जाने दो, ठाकुर जी एक अच्छा वक्त फिर तुम्हारे सामने ला कर खड़ा कर देंगे। जीव को बुरे वक्त में धैर्य रखना चाहिए।
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

1Sep 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 27 अगस्त से 03 सितंबर 2018 तक शांति सेवा धाम, वृंदावन में 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

महाराज श्री ने कथा प्रारंभ करने से पूर्व जैन धर्म के परम श्रेष्ठ क्रांतिकारी राष्ट्रसंत तरूण सागर जी महाराज के देहांत पर शोक संवेदना व्यक्त की एवं समस्त श्रोतागणों के साथ 2 मिनट का मौन रख पुण्यात्मा की आत्म शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की। उन्होंने कहा की उनका इस तरह से लीला पूरी करना यह सिर्फ जैन समाज के लिए नुकसान नहीं है ये पूरे अध्यात्मिक जगत का बहुत बड़ा नुकसान है। वो खुद कहते थे कड़वे प्रवचन पर कहां थे उनके कड़वे प्रवचन, वो कड़वे प्रवचन के माध्यम से मीठा ही प्रवचन करते थे, सबके कल्याण के लिए करते थे। 
महाराज श्री ने आगे कहा कि यह भागवत कथा क्या है ? यह वैष्णवों का परम धन है। भगवान से बड़ा धन, भगवान के नाम से बड़ा धन इस संसार में दूसरा नहीं हो सकता, यही सबसे बड़ा धन है। 
महाराज श्री ने कहा कि वृंदावन का वास, संतों की झूठन प्रसादि, जमुना मईया का दर्शन और स्नान, प्रियाप्रितम का नित्य दर्शन, वृंदावन की परिक्रमा और राधे राधे गायन यह अपने आप में दर्शाता है की ठाकुर की कितनी असीम कृपा हम पर हुई है। 

महाराज श्री ने कहा कि मन में अगर अच्छे संकल्प हों तो ठाकुर सारी इच्छाएं पूरी करते हैं, ध्यान श्रीकृष्ण पर हो, गुरू के बताए हुए मंत्र जिसपर पूर्ण ऐसी निष्ठा हो की इसके अलावा तो कुछ है ही नहीं और तब हमे रास का सौभाग्य प्राप्त होता है। 

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा। पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवान श्री कृष्ण ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण। इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े- 1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श 4. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया। श्रीमद भागवत कथा को आगे बढ़ाते हुए ठाकुर जी महाराज ने कहा कि हमारी इच्छाएं ही सारे पापों की जड़ हैं। इसलिए इन इच्छाओं को ही छोड़ दे। दुनिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। हर भक्त के मन में यह भाव होना चाहिए कि हमें श्री कृष्ण मिले, भले ही मेरे जीवन के अंतिम साँस से पहले ही क्यों ना मिले। उन्होंने कहा कि सद्कर्मों से आत्मा खुश होती है। इसका प्रमाण देखना हो तो कभी किसी का छीन करके खाओ, देखना आत्मा खुश नहीं होगी। फिर किसी ज़रूरतमंद को कुछ खिलाकर देखना कि आत्मा कितनी खुश होती है। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

1Sep 2018

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के द्वारा ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर शांति सेवा धाम, वृंदावन में 01 एवं 2 सितंबर 2018 को नि:शुल्क नेत्र एवं स्वास्थ्य परीक्षण कैंप का आयोजन किया जा रहा है।

विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के द्वारा ठा. श्री प्रियाकांत जू मन्दिर शांति सेवा धाम, वृंदावन में 01 एवं 2 सितंबर 2018 को नि:शुल्क नेत्र एवं स्वास्थ्य परीक्षण कैंप का आयोजन किया जा रहा है जिसमें ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर, ब्लड ग्रुप की जांच की जाएगी। आज प्रथम दिन हजारों की संख्या में आए लोगों का डॉक्टरों द्वारा परीक्षण किया गया एवं नि:शुल्क चश्मा एवं दवा वितरित की गई।

 

2Sep 2018

आज विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के द्वारा शांति सेवा धाम, वृंदावन में आयोजित नि:शुल्क नेत्र एवं स्वास्थ्य परीक्षण शिविर का दूसरे दिन पूज्य महाराज श्री द्वारा निरीक्षण किया।

आज विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के द्वारा शांति सेवा धाम, वृंदावन में आयोजित नि:शुल्क नेत्र एवं स्वास्थ्य परीक्षण शिविर का दूसरे दिन पूज्य महाराज श्री द्वारा निरीक्षण किया गया एवं हजारों की संख्या में आए रोगियों का डॉक्टरों द्वारा इलाज किया गया एवं चश्मे और दवा वितरित की गई।

2Sep 2018

आज पूज्य महाराज श्री ने शांति सेवा धाम, वृंदावन में 108 श्रीमद्भागवत कथा के मुख्य यजमानों एवं ब्राह्मणों के साथ ग्रुप फोटोग्राफी की एवं भण्डारे का प्रसाद वितरित किया।

आज पूज्य महाराज श्री ने शांति सेवा धाम, वृंदावन में 108 श्रीमद्भागवत कथा के मुख्य यजमानों एवं ब्राह्मणों के साथ ग्रुप फोटोग्राफी की एवं भण्डारे का प्रसाद वितरित किया।

 

31Aug 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 27 अगस्त से 03 सितंबर 2018 तक शांति सेवा धाम, वृंदावन में 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के पंचम दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की विनम्रता छोटे से छोटे इंसान को महान बना देती है और बड़े से बड़े इंसान को अहंकार मिट्टी में मिला देता है। हमने कई बार कहा है जो खुब अकड़ के चलते थे उनको मिट्टी में मिलते देखा है। भगवान ने स्वयं ने कहा है मोहे कपट छल छिद्र ना भावा, निर्मल मन जन सो मोही पावा, जिसका मन निर्मल है वहीं मुझे प्राप्त कर सकता है, जिसका मन निर्मल नहीं है, जो अकड़ के चलता है वो मुझ तक नहीं पहुंच सकता, अकड़ तो मुर्दे की पहचान होती है। जीवन में विनम्रता लाओ और सभी आत्माओं में भगवान का ही दर्शन करो।

महाराज श्री ने आगे कहा कि कृष्ण धन मिल जाए, नाम धन मिल जाए तो उसके बाद तो सब धन धूल के समान है, यह धूल ही है आप इसको साथ नहीं ले जा सकते लेकिन कृष्ण नाम आपके साथ जाएगा, नाम धन तुम्हारे साथ जाएगा इसलिए गुरू सदैव पूज्यनीय होता है। दुनिया में जो भी व्यक्ति जो भी वस्तु देता है वो दुनिया तक सिमित रहती है लेकिन गुरू जो देते हैं वो दुनिया तक सिमित नहीं रहती है, वो ब्रह्माण्ड के किसी भी कौने में चले जाओ, वो असिमित है।

महाराज श्री ने कहा कि दुनिया की हर चीज झूठी है, सच्चा धन है तो सिर्फ परमात्मा ही सबसे सच्चा धन है, यह बात हमेशा याद रखना। कलयुग में हमेशा दान देना चाहिए, शास्त्रों में लिखा है कल काल में जो चरण बचा है धर्म का वो दान ही है। दान से धर्म आगे बढ़ता है

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 

30Aug 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 27 अगस्त से 03 सितंबर 2018 तक शांति सेवा धाम, वृंदावन में 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

भागवत कथा के चतुर्थ दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।


देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की मानव जीवन में अगर लक्ष्य प्राप्त नहीं हुआ तो मानव जीवन होना ना होना सब बराबर है। महाराज श्री ने प्रश्न किया की मानव जीवन मिल जाना क्या हमको मानव होना साबित करता है ? मानव योनी में आ जाना अलग बात है और मानव होना एक अलग बात है। हम सब को कुछ समय निकाल कर ऐसा चिंतन करना चाहिए की हम मानव बन सके, हम मानव बन पाएं है, हम अपने आप को मानव कह सकेंगे ? यह सवाल अपने आप से किजिए क्योंकि तुमसे ज्यादा अच्छे से तुम्हे कोई नहीं जानता है। तो एक मानव होना और एक मानव योनी में होना दो अलग बात हैं। मेरा आप सब से आग्रह है की महीने में एक बार अपने आप से प्रशन किजिए की हम मानव हैं क्या ? हम मानव बन सके हैं क्या ? क्योंकि जब तक हम मानव नहीं बन पाएंगे तब तक हमें मोहन नहीं मिलेगा, भक्त बनना तो बहुत दूर की बात है अच्छे मानव ही बन जाओ। 


महाराज श्री ने आगे कहा कि शास्त्रों में, पुराणो में, रामायण में हर जगह पर मानव जीवन की विशेष बाते लिखी है की मानव जैसा जीवन किसी ओर का नहीं है। जब भगवान मानव जीवन देते हैं इसका मतलब है भगवान तुम्हे मुक्ति प्राप्त करने का, ईश्वर को प्राप्त करने का अवसर देते हैं। अगर तुम मानव जीवन में आ गए हो तो भगवान ने कह दिया है की मैं तुमसे मिलने के लिए तैयार हूं लेकिन ये तुम्हारे कर्मों पर निर्भर करता है की तुम अच्छे मानव बन पाए, भक्त बन पाए तो तुम मुझसे मिलने के अधिकारी हो जाओगे। 


महाराज श्री ने कहा की इतिहास गवाह है की प्रभु हमेशा वहां पहुंचे हैं जहां दिल से भक्त ने पुकारा है, उन्होंने कहा की मुझे कहते हुए तकलीफ होती है की आज का व्यक्ति दोहरे मापदंड अपनाता है, खुद के साथ दोहरा खेल खेलता है। भक्ति भी करता है और अधर्म भी करता है, धर्म और अधर्म दोनों करता है तो फिर प्रभावशील कैसे होगा, गुरू मंत्र भी ले लेते हैं लेकिन मंत्र में निष्ठा भी नहीं होती, कथा भी सुनते हैं लेकिन कथा सच है या झूठ है किंतु परंतु भी होता है। राजा परिक्षित ने एक बार कथा सुनी तो मोक्ष हो गया, आपने इतनी बार कथा सुनली लेकिन जीवन में बदलाव नहीं आया , याद रखना कथा सुनने का लाभ तभी है जब तुम्हे नहीं तुम्हारे घरवालों को महसूस होने लगे आप में परिवर्तन हो रहा है। 


देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली ने भगवान ब्रह्मा वरदान मांगा की मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने उसे वरदान दे दिया। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने विष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली से कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।


महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"


जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" 


भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का सुंदर वर्णन श्रवण कराया। सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

27Aug 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 27 अगस्त से 03 सितंबर 2018 तक प्रतिदिन दोपहर 3 बजे से वृंदावन में 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। कथा के पहले दिन महाराज जी ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।


भागवत कथा के प्रथम दिवस पर कथा पंडाल में आचार्य श्री बदरीश जी, श्री नेत्रपाल जी महाराज, श्री अशोक शास्त्री जी महाराज, श्री बिपिन बापू जी, विप्र समाज को लेकर चलने वाले श्री नागेंद्र जी महाराज, श्री उदेन शर्मा जी, श्री सुधीर शुक्ला जी और ब्रज तीर्थ विकास परिषद के उपाध्यक्ष श्री शैलजा कांत मिश्र जी ने अपनी गरिमामयी उपस्थिती दर्ज करवाई एवं अपने विचार व्यक्त किए ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की ब्रज के महात्यम की बात बताते हुए कहा कि ब्रज भूमि जिसमें हम वास कर रहे हैं यह इतना आसान नहीं है, इसका वर्णन इतना सुंदर है । जिस भूमि में ब्रह्मा जी अपनी मर्जी से नहीं आ सकते, चाह कर भी अपनी मर्जी से यहां जन्म नहीं ले सकते उस ब्रज में हम और आप बैठे हैं। इस ब्रज का महात्यम क्या है, आते तो यहां बहुत से लोग है लेकिन वास नहीं कर सकते। वैसे तो यहां आसान भी आसान नहीं है, अगर आएं है तो निश्चित है कुछ अच्छा काम किया होगा। किशोरी की अहित की कृपा है की आपको यहां पर वास मिल रहा है। 

महाराज श्री ने आगे कहा कि सच चित आनंद सच्चिदानंद, दैहिक, दैविक, भौतिक त्रितापों को जन्म देने वाले, उनका पालन और संहार करने वाले ऐसे सच्चिदानंद परमात्मा को हम नमन करते हैं। महाराज श्री ने कहा कि भागवत क्या है ? भागवत का अर्थ क्या है ? भागवत कहते किसको हैं....भगवान के भक्त को ही भागवत कहते हैं। इस भागवत के बारह के बारह स्कंदों को आप पडिए, उन बारह के बारह स्कंदों में भक्तों की विशेषता का ही वर्णन किया गया है। वो इसलिए क्योंकि भक्त भगवान को नमन करता है और भगवान भक्तों को नमन करते है, अगर भगवान ना हों, संत ना हों, भक्त ना हों, तो भगवान को प्रतिपादित कौन करेगा, भगवान को भगवान घोषित कौन करेगा ? उन्होंने आगे कहा कि आप किसी तीर्थ में जाते हो, वहां जल तत्व होता है कोई कुंड, कोई सरोवर होता है, प्रत्येक तीर्थ में होता है, कहीं ना कहीं मूर्ति के रूप में भगवान मौजूद रहते हैं लेकिन वो तीर्थ तीर्थ नहीं है जिस तीर्थ में संत नहीं हैं, भक्त नहीं हैं। हर वो तीर्थ श्रेष्ठ है जिस तीर्थ में संत जाकर वास करते हैं । संत वास करेंगे तो पूजा पाठ होगी, भजन होगा, भजन होगा तो उस स्थान का प्रभाव बढ़ता चला जाएगा और जितना प्रभाव बढ़ता चला जाएगा उतने लोगों की आस्था बढ़ती चली जाएगी ।
महाराज श्री ने कहा कि आप गौशाला में चले जाइए वहां गोबर भी पड़ा है, गौमूत्र भी पड़ा है, मक्खियां भी भिन भिना रही हैं लेकिन गौशाला में जाओगे तो आप उसको पवित्र ही कहोगे क्यों. क्योंकि वो वेद प्रमाणित बात है की जहां गऊ रहती है वहां 33 करोड़ देवी देवता तो गऊ में ही वास करते हैं, वह सुंदर और पवित्र स्थान है। पवित्रता यह है जिसे वेद प्रतिपादित करें।
महाराज श्री ने कहा कि हमे अपने कर्मों में सुधार करना चाहिए या फिर अपने कर्मों को ऐसा बना देना चाहिए जो कर्म ठाकुर को प्रिय लगते हों, गोविंद को प्रिय लगते हों, प्रियाकांत जू को प्रिय लगते हों, हमे वो काम करना चाहिए जिससे वो प्रसन्न हों। भागवत सुनने का मतलब ये नहीं है की सात दिन सुने और फिर बदलने की कोई कोशिश ही नहीं ।
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की एक बात सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलियुग के लोगो का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगो के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है। और फिर कलियुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।
व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा । 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

28Aug 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 27 अगस्त से 03 सितंबर 2018 तक शांति सेवा धाम, वृंदावन में 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।


देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की कुछ लोग कहते हैं की महाराज भगवान की कथा में मन नहीं लगता, महाराज सतकर्मों में मन नहीं लगता, भजन करने का मन नहीं करता है। ये बताइए ये कैसा विचित्र मन है हमारा हर उस काम में लगता है जिसे संत, गुरू, महात्मा मना करते हैं , पुराण, वेद वर्जित करते हैं, मनाही कर दी गई है की ये तो करना ही नहीं है किसी भी प्रकार से उसमें लग जाता है । बताइए कहीं पुराणों में लिखा गया है की झूठ बोलना है, मदिरा पान करना है कही सिखाया गया है, बड़ो का अपमान करना है कही सिखाया गया है, गाली देना, अपशब्द बोलना हम अपनी कला समझते हैं लेकिन ये कला नहीं है ये हमारे मां बाप की कमजोरी है जिन्होंने हमे सिखाया ही नहीं है की किसी को अपशब्द बोलना आपका अपनी कम बुद्धि होने का परिचय है। आप अगर किसी को अपशब्द बोलते हो तो आपके मां बाप ने आपको संस्कार देने में कमी रखी है और इसमें अपमान आपका नहीं आपके मां बाप का है।


महाराज जी ने आगे कहा कि कलयुग की प्रवृति ही हमारे मन में अविश्वास प्रकट करती है, इस बात का हमेशा ध्यान रखें। जब कभी भी हमारे मन में अविश्वास होता है चाहे वो धर्म के प्रति अविश्वास हो, चाहे गुरू के प्रति अविश्वास हो, चाहे भगवान के प्रति अविश्वास हो, धर्म से संबंधित अविश्वास कलयुग का ही प्रभाव है। इसका प्रभाव ही हमें पापी बनने पर विवश करता है। जब जब हमारा मन अधर्म की ओर बढ़े और सज्जनों के प्रति विश्वास ना रहे तो समझ लेना चाहिए की कलयुग हम पर हावी हो रहा है। 


महाराज श्री ने भागवत की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि यह भगवान की भागवत, भक्तों की कथा, ये पुराण है, पुराण ही नहीं महापुराण है, महापुराण ही नहीं पंचम वेद निराला है, ये पांचवा वेद है। वेद व्यास जी महाराज ने सभी वेदों का सार इसमें डाल दिया है और सबसे आखिर में लिखा ये पुराण है इसलिए पुराणों का भी सार है, सर्व वेदांत सारम है ये, सभी सारों का निचोड़ इसमें रखा है। 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई। और वो कथा शुक ने पूरी सुनली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।


श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।
यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

29Aug 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 27 अगस्त से 03 सितंबर 2018 तक शांति सेवा धाम, वृंदावन में 108 श्रीमद् भागवत कथा एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया। भागवत कथा के तृतीय दिवस की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा की भगवान की भक्ति प्राप्त करने के लिए बहुत जरूरी है की कम बोलें। आपके अधिक बोलने से और व्यर्थ बोलने से आपकी भजन की शक्ति भी कम होती है, आपकी खुद की पावर कम होती है, ईश्वर को पाने की इच्छा भी कम होती है। आप कम बोले, अधिक बोलने से सर पर मुसीबतें ही आती हैं। अगर बोलना ही हो तो अच्छा बोलें, मीठा बोलें, कम बोलें, अधिक बोलने की आवश्यकता नहीं है। ऐसा मत बोलिए जो तुम सुनना पसंद नहीं करते हो, वही बोलिए जिससे तुम भी सुनना पसंद करते हो।


महाराज श्री ने कहा कि यहां अनेक संत है अनेक पंथ है, कई लोग ऐसे होते हैं जो एक संत की वाणी को सत्य करने के लिए दूसरे को झूठा बता देते हैं ऐसा नहीं है। आपको जिस संत, महात्मा, गुरू की वाणी पर विश्वास हो जाएगा वहीं वाक्य आपके लिए ब्रह्म बनकर आपका कल्याण कर देगा, वहीं गोविंद बनकर आपके जीवन में आयेगा। आपका विश्वास किस पर है यह जरूरी है, जब तक आपका विश्वास नहीं होगा जब तक भक्ति नहीं होगी, जब तक भक्ति नहीं होगी तब तक भगवत प्राप्ति नहीं होगी और बिना विश्वास के भक्ति दृढ़ नहीं हो सकती।


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कल के कथा क्रम याद कराया की जी वयक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। पर आज तो आपको यह भी नहीं मालूम की आपकी मृत्यु कब होगी , मृत्यु तो निश्चित है पर कब ये आपको नहीं पता तो आप जीवित रहते हुए अपने समय को क्यों बर्बाद करते हो। मानव जीवन सबसे श्रेष्ठ है क्योकि इसमें हमे नाम सुमिरन करने का मार्ग उपलब्ध होता है अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। तो इस मानव जीवन का मोल पहचाने और इसको प्रभु के चरणों में सोप दे तो कल्याण निश्चित ही होगा। भगवान अपने बारे में मानव से हुई भूल को तो भुला सकते हैं लेकिन संतों को लेकर की गई भूल के दुष्परिणाम से वह भी नहीं बचाते। इसका उदाहरण है कि राजा परीक्षित ने जब संत का अपमान किया तो राजा परीक्षित को भी काल के काल में जाने के लिए छोड़ दिया।
राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...
अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।
भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

24Aug 2018

आज विश्व शांति सेवा समिति प्रयाग के तत्वाधान में सरदार पटेल संस्थान, अलोपी बाग में बैठक आयोजित की गई । सबसे पहले प्रयाग समिति द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी का स्वागत किया गय।

आज विश्व शांति सेवा समिति प्रयाग के तत्वाधान में सरदार पटेल संस्थान, अलोपी बाग में बैठक आयोजित की गई । सबसे पहले प्रयाग समिति द्वारा विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी का स्वागत किया गया, तत्पश्चात बैठक की शुरुआत की गई इस बैठक में आगामी कुंभ मेले में ट्रस्ट की ओर से लगने वाले शांति सेवा शिविर के बारे में विस्तारपूर्वक बताया गया। यह शिविर 10 जनवरी 2019 से प्रारंभ होकर 19 फरवरी 2019 तक प्रयाग कुंभ नगरी में रहेगा। इस दौरान परम् पूज्य धर्मरत्न शांतिदूत श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज द्वारा प्रयाग में 3 कथाओं का लाभ प्रयागवासियों एवं कल्पवासियों को मिलेगा। इस बैठक में तीनों कथाओं के बारे में विस्तृत रुप से चर्चा की गई एवं बताया गया कि 10 जनवरी को शिविर का उद्घाटन किया जाएगा जिसमें 18 से 25 जनवरी को विशाल श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया जाएगा। पुनः 3 फरवरी से 5 फरवरी तक तीन दिवसीय कृष्ण कथा का भी आयोजन किया जाएगा। इसी क्रम में महाराज श्री द्वारा 8 फरवरी से 16 फरवरी तक नौ दिवसीय राम कथा का भव्य आयोजन ट्रस्ट के द्वारा किया जाएगा। इस दौरान अनेक अनेक धार्मिक कार्य एवं गरीब नि: शक्तजनों के कल्याणार्थ कार्यक्रम शिविर द्वारा संचालित किए जाएंगे। इस शिविर में अनेक भक्तों के देश विदेश से आने की संभावना है। सभी के रुकने रहने की व्यवस्था ट्रस्ट द्वारा शांति सेवा शिविर में ही की जाएगी। इस बैठक में समिति के अध्यक्ष भोला सिंह, कुलदीप सिंह, एस०पी०श्रीवास्तव श्रीवास्तव, दीपू मिश्रा, मानिक चंद्र श्रीवास्तव, डॉ शरद शांगलू, डॉ०वी.के. पांडेय, अम्बुज गर्ग आदि उपस्थित रहे।

 

23Aug 2018

"विश्व शांति सेवा समिति कानपुर" "विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली" के तत्वाधान में परम पूज्य "धर्मरत्न शांतिदूत श्रद्धेय श्री देवकीनंदन ठाकुर जी" महाराज के श्री मुख से "श्रीमद् भागवत कथा" का भव्य एवं विशाल आयोजन "11 से 18 नवंबर 2018 मोतीझील ग्राउंड कानपुर उत्तर प्रदेश" में होना सुनिश्चित हुआ है।

"विश्व शांति सेवा समिति कानपुर" "विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली" के तत्वाधान में परम पूज्य "धर्मरत्न शांतिदूत श्रद्धेय श्री देवकीनंदन ठाकुर जी" महाराज के श्री मुख से "श्रीमद् भागवत कथा" का भव्य एवं विशाल आयोजन "11 से 18 नवंबर 2018 मोतीझील ग्राउंड कानपुर उत्तर प्रदेश" में होना सुनिश्चित हुआ है, इस कथा की तैयारियों का जायजा लेने के लिए "विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट" के सचिव "श्री विजय शर्मा जी" आज "कानपुर कार्यालय" पहुंचे और आयोजक मंडल के सभी सदस्य एवं सभी स्वयंसेवकों के साथ बैठक की जिसमें श्री शर्मा जी ने बताया कि कथा को कैसे भव्य, विशाल एवं ज्यादा से ज्यादा लोगों तक कथा की जानकारी किस प्रकार से पहुंचायी जाए, एवं कथा से संबंधित अन्य पहलुओं पर चर्चा की, इसके बाद श्री विजय शर्मा जी ने प्रयाग के लिए प्रस्थान किया ।
कानपुर समिति के सचिव "श्री विपिन बाजपाई जी" ने बताया कि परम पूज्य "धर्मराज शांतिदूत श्री देवकीनंदन ठाकुर जी" महाराज का "जन्मोत्सव 12 सितंबर 2018" दिन बुधवार को बड़े ही भव्य एवं धूमधाम से "कानपुर कार्यालय" में मनाया जाएगा एवं "2 अक्टूबर 2018 गांधी जयंती" के शुभ अवसर पर एक विशाल रैली कथा से संबंधित जो कि कानपुर कार्यालय से उठकर कानपुर के विभिन्न मार्गों से होते हुए निकाली जाएगी जिसमें कथा की जानकारी के साथ-साथ कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होंगे सम्मिलित होंगे, आप सभी भक्तों से निवेदन है कि भारी से भारी संख्या में आकर कथा की जानकारी को जन जन तक पहुंचाने में सहयोग करें।


आप सभी भक्त प्रेमियों से निवेदन है कि इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक कमेंट एवं Facebook , WhatsApp इत्यादि ग्रुपों में शेयर अवश्य करें।
।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

19Aug 2018

*राधे राधे जी, प्रियाकांत जु भगवान की कृपा और गुरुजी के आशिर्वाद से 6 से 14 दिसम्बर 2018 भायंदर-मुम्बई में विशाल 108 श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों के लिए आज सुबह 11:30 बजे से विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्माजी ने मुम्बई आयोजक समिति के साथ मीटिंग की।

*राधे राधे जी, प्रियाकांत जु भगवान की कृपा और गुरुजी के आशिर्वाद से 6 से 14 दिसम्बर 2018 भायंदर-मुम्बई में विशाल 108 श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों के लिए आज सुबह 11:30 बजे से विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्माजी ने मुम्बई आयोजक समिति के साथ मीटिंग की, फिर शाम 3 बजे से सभी कार्यकर्ताओ एव शिष्य परिवार के साथ मीटिंग की जिसमे सर्व प्रथम भारत के पूर्व प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपई जी और मेजर कौस्तुभ प्रकाश कुमार राणे जी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी गई। इसके बाद कलश यात्रा की जानकारी प्रदान की गई, कथा में और भी भक्तो को कैसे जोड़ा जाए इसके ऊपर विचार विमर्श किया गया, कथा को भव्य विशाल रूप देने के लिए श्री विजय शर्माजी द्वारा मार्ग दर्शन प्रदान किया गया।
शाम 5 बजे श्री विजय शर्माजी ने नारियल चढ़ाकर प्रचार रथ की सुरुआत की एव 2 किलोमीटर तक कथा के प्रचार की रैली की गई।*

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

18Aug 2018

श्री राधे राधे, मुम्बई में 6 से 14 दिसम्बर 2018 में होने वाली विशाल श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों में मार्गदर्शन देने आज विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्माजी पहुचे मुम्बई एयरपोर्ट, मुम्बई समिति ने किया उनका दमाकेदार सुआगत।

श्री राधे राधे, मुम्बई में 6 से 14 दिसम्बर 2018 में होने वाली विशाल श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों में मार्गदर्शन देने आज विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्माजी पहुचे मुम्बई एयरपोर्ट, मुम्बई समिति ने किया उनका दमाकेदार सुआगत, कल श्री विजय शर्मा जी ने बैंगलोर और नागपुर समितियों से मिलकर वहां होने वाली विशाल श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों में मजबूती प्रदान की और आज सुबह नागपुर से मुम्बई के लिए प्रस्थान किया

18Aug 2018

जय श्री राधे, 6 से 14 दिसम्बर 2018 भायंदर-मुम्बई में होने वाली विशाल 108 श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों को करवाने हेतु विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्माजी आज सुबह नागपुर से मुम्बई पहुचे।

जय श्री राधे, 6 से 14 दिसम्बर 2018 भायंदर-मुम्बई में होने वाली विशाल 108 श्रीमद भागवत कथा की तैयारियों को करवाने हेतु विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्माजी आज सुबह नागपुर से मुम्बई पहुचे, और मुम्बई पहुचते ही बिना किसी विलंब के सबसे पहले कथा स्थल का निरक्षण किया, क्योंकि 2017 की कथा में जितनी बड़ी संख्या में भक्तो ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी उसको देखते हुए लगता है कि इस बार पिछले साल के मैदान से भी बड़े मैदान की जरूरत पड़ेगी। कल सुबह 11:30 बजे से आयोजक समिति के साथ महत्वपूर्ण मीटिंग है और उसके तुरंत बाद 3 बजे से सभी स्वम सेवक एव शिष्य परिवार के साथ मीटिंग है, श्री प्रियाकांत जु भगवान और श्री सद्गुरुदेव भगवान के आशिर्वाद से इस बार कथा को और भी भव्य रूप देने के लिए सभी स्वम सेवक दिन रात परिश्रम कर रहे है, और इन सबको मार्ग दर्शन प्रदान कर रहे है हम सबके प्यारे भइया श्री विजय शर्माजी, राधे राधे।

18Aug 2018

रेशम बाग मैदान नागपुर में विश्व शांति सेवा समिति के द्वारा आगामी 21 से 28 फरवरी 2019 तक होने जा रही श्रीमद्भागवत कथा की तैयारियों को लेकर मीटिंग की गई जिसमें बेंगलुरु से पहुंचकर विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी ने भाग लिया जिनका एयरपोर्ट पहुंचने पर स्वागत किया गया।

रेशम बाग मैदान नागपुर में विश्व शांति सेवा समिति के द्वारा आगामी 21 से 28 फरवरी 2019 तक होने जा रही श्रीमद्भागवत कथा की तैयारियों को लेकर मीटिंग की गई जिसमें बेंगलुरु से पहुंचकर विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी ने भाग लिया जिनका एयरपोर्ट पहुंचने पर स्वागत किया गया। मीटिंग में किस प्रकार से कथा को सफल बनाना है, लोगों तक किस तरह से कार्यक्रम की जानकारी पहुंचानी है, किस तरह से कार्यक्रम का आयोजन करना है इस विषय पर चर्चा की गई ताकी किसी को भी किसी प्रकार की परेशानी का सामना ना करना पड़े। इसके अलावा भारत रतन एवं पूर्व प्रधानमंत्री श्रद्धेय श्री अटलबिहारी वाजपेयी जी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि भी दी गई। मीटिंग में समिति के सभी सम्मानित सदस्यों ने भाग लिया

17Aug 2018

रेशम बाग मैदान नागपुर में विश्व शांति सेवा समिति की मीटिंग में भारत रतन एवं पूर्व प्रधानमंत्री श्रद्धेय श्री #अटल_बिहारी_वाजपेयी जी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि भी दी गई। अटल जी आप सदैव हमारे दिलों में जीवित रहेंगे।

रेशम बाग मैदान नागपुर में विश्व शांति सेवा समिति की मीटिंग में भारत रतन एवं पूर्व प्रधानमंत्री श्रद्धेय श्री #अटल_बिहारी_वाजपेयी जी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि भी दी गई। अटल जी आप सदैव हमारे दिलों में जीवित रहेंगे। #AtaljiAmarRahen

17Aug 2018

आज बैंगलोर के प्लेस ग्राउंड गेट नं 9 में विश्व शांति सेवा समिति के द्वारा आगामी 25 से 31 जनवरी 2019 तक होने जा रही श्रीमद्भागवत कथा की तैयारियों को लेकर मीटिंग की गई।

आज बैंगलोर के प्लेस ग्राउंड गेट नं 9 में विश्व शांति सेवा समिति के द्वारा आगामी 25 से 31 जनवरी 2019 तक होने जा रही श्रीमद्भागवत कथा की तैयारियों को लेकर मीटिंग की गई जिसमें पूना से पहुंचकर विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव श्री विजय शर्मा जी ने भाग लिया। मीटिंग में किस प्रकार से कार्यक्रम को सफल बनाना है, लोगों तक किस तरह से कार्यक्रम की जानकारी पहुंचानी है, किन किन और किस तरह से कार्यक्रम का आयोजन करना है इस विषय पर चर्चा की गई ताकी किसी को भी किसी प्रकार की परेशानी का सामना ना करना पड़े। इसके अलावा हर माह होने वाले पूर्णिमा महोत्सव की जानकारी लोगों तक किस प्रकार से दी जाए ताकी ज्यादा से ज्यादा लोग इस आयोजन में भाग ले सकें इस बारे में भी समिति के सदस्यों द्वारा विचार रखे गए। मीटिंग में विश्व सेवा समिति के द्वारा कैसे जरूरतमंदों की मदद की जाए, कैसे उन तक जरूरत का सामान पहुंचाया जाए इस बारे में भी चर्चा की गई। मीटिंग के बाद श्री विजय शर्मा जी ने नागपुर के लिए प्रस्थान किया। मीटिग में समिति के अध्यक्ष श्री मुकेश शर्मा जी, सचिव श्री महेश कुमावत जी, कोषाध्यक्ष श्री सुरेश झांगिड जी, श्री संजय अग्रवाल जी, श्री खीमाराम जी, श्री संतोष महाराज जी, श्री गोपाल लाल जी, श्री संजय चतुर्वेदी जी, श्री रवि दत्त बरवारिया जी, श्री शिवम पाण्डेय जी, श्री ओम प्रकाश ठाकुर जी एवं समस्त कार्यकर्ता शामिल हुए।

15Aug 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 72वें स्वतंत्रता दिवस पर रंगारंग कार्यक्रमों का आयोजन शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड़, वृंदावन में किया गया। प्रात: काल में पूज्य महाराज श्री द्वारा ठा. प्रियाकांत जू प्रांगण में ध्वजारोहण किया गया और देश के लिए बलिदान देने वाले वीर जवानों को याद किया गया। 

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 72वें स्वतंत्रता दिवस पर रंगारंग कार्यक्रमों का आयोजन शांति सेवा धाम, छटिकरा रोड़, वृंदावन में किया गया। प्रात: काल में पूज्य महाराज श्री द्वारा ठा. प्रियाकांत जू प्रांगण में ध्वजारोहण किया गया और देश के लिए बलिदान देने वाले वीर जवानों को याद किया गया। 

कार्यक्रम की शुरूआत विभिन्न स्कूलों के बच्चों द्वारा देश भक्ति के विभिन्न नृत्य नाटिकाओं, देशभक्ति गीतों, कविताओं की प्रस्तुती दी गई जिसका वहां उपस्थित सभी लोगों ने आनन्द लिया। महाराज श्री द्वारा सभी बच्चों का उत्साहवर्धन किया गया।

स्वतंत्रता दिवस के इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पूज्य स्वामी गोविंदानंद तीर्थ जी महाराज ने भी अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई, पूज्य महाराज श्री द्वारा उनका शॉल उड़ाकर सम्मान किया गया। 

पूज्य महाराज श्री ने स्वतंत्रता दिवस पर अपने विचार रखते हुए कहा कि सिर्फ आज के दिन झंडा फहराने से हम उन शहीदों के ऋण से उण नहीं हो सकते, हम इस धरती में आए भी नहीं थे उससे पहले उन्होंने अपने प्राणों की परवाह किए बगैर उन्होंने हमारे आने की प्रवाह की और हमारे जीवन की प्रवाह की, हम आजादी में जी सकें, जन्म ले सकें और आजादी भरे इस महौल में हम अपनी मृत्यु को स्वीकार कर सकें इसके लिए उन्होंने समय से पहले जाना स्वीकार किया, आज हमे उन्हे जानने की जरूरत है। अगर हमारी युवा पीढ़ी ने आजादी का मोल नहीं समझा तो तुम्हारी आने वाली पीढ़ी तुम्हे कभी माफ नहीं करेगी। 

महाराज श्री ने आगे कहा कि कॉनवेंट स्कूल में पढ़ाना, दोस्त बनाना, अच्छी नौकरी पाना, पैसा कमाना, बच्चे पैदा करना फिर उनकों अच्छी परवरिश देना सिर्फ यही जीवन नहीं है। आज के युवाओं का रोल मॉडल कौन है ? कोई एक्टर एक्ट्रेस रोल मॉडल नहीं हो सकते ये तो मनोरंजन का एक माध्यम हो सकता है रोल मॉडल नहीं, लड़कियों के लिए अगर कोई रोल मॉडल है तो वो लक्ष्मीबाई है, मीराबाई है, सावित्री है वो हमारा रोल मॉडल है और पुरूषो में प्रभु राम आपका रोल मॉडल होने चाहिए। 
महाराज श्री ने कहा कि आजकल जो रेप हो रहे हैं, महिलाओं के साथ अभद्रता हो रही है इसका मुख्य कारण है धार्मिक शिक्षा की कमी। हमारे बच्चों को इतिहास के बारे में बताया नहीं जाता है इसिलिए तो हमारी बहनों की रोल मॉडल हो गई हैं एक्ट्रेस जो विदेशों में कुछ और करती थी यहां आकर एक्ट्रेस बन गई हैं। 
महाराज श्री एक कविता भी सुनाई उन्होंने कहा कि 
आजादी की कभी हम शाम नहीं होने देंगे ।
शहीदों की कुर्बानी को बदनाम नहीं होने देंगे ।। 
बची हो गर एक बूंद भी एक लहू की ।
तब तक भारत माता का आंचल नीलाम नहीं होने देंगे ।।
कुछ नशा तिरंगे की आन का है ।
कुछ नशा मातृभूमि की मान का है ।। 
हर जगह पर लहराता हुए तिरंगा । 
नशा यही तो मेरे हिंदुस्तान की शान का है ।।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

13Aug 2018

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने यूपी के मा. मुख्यमंत्री महंत श्री योगी आदित्यनाथ जी से मिलकर इलाहाबाद का नाम "प्रयागराज" करने के लिए धन्यवाद दिया एवं उनसे अनेकों विषयों पर चर्चा की।

आज पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने यूपी के मा. मुख्यमंत्री महंत श्री योगी आदित्यनाथ जी से मिलकर इलाहाबाद का नाम "प्रयागराज" करने के लिए धन्यवाद दिया एवं उनसे अनेकों विषयों पर चर्चा की।

जैसा कि आप सभी को ज्ञात है कि पूज्य महाराज श्री कई वर्षों से इलाहाबाद का नाम "प्रयागराज" करने का अभियान चला रहे थे। जिस पर उत्तर प्रदेश सरकार ने 2019 के कुम्भ मेले के पावन अवसर पर इलाहाबाद का नाम प्रयागराज करने का निर्णय लिया है।

महाराज श्री ने महंत श्री योगी आदित्यनाथ जी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर ठा. प्रियाकान्त जू मंदिर, वृन्दावन के लिए भी आमंत्रित किया।

9Aug 2018

गोविंद देव जी की नगरी जयपुर में न्यूगेट स्थित रामलीला मैदान, संगानेरी गेट में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के सातवें दिन पूज्य महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा का श्रोताओं का श्रवण कराया।

कथा के सातवें दिन की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। कथा में हजारों की संख्या में भक्त पधारे।

कथा से पूर्व प्रात: में महाराज श्री द्वारा युवाओं को संस्कारों का ज्ञान देने हेतु युवा शांति संदेश का भी आयोजन किया गया जिसमें कई युवाओं ने महाराज श्री के समक्ष अपने प्रश्न रखे और उन्होंने बड़ी सरलता से सभी प्रश्नो का उत्तर दिया।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि आपको अपनी वाणी को संभालकर रखना चाहिए । कभी भी अपनी वाणी से कटू शब्द मत निकालो। ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय, औरन को शीतल करै, आपहु शीतल होय। भगवान से प्रेम करने वाले लोग कटू शब्द नहीं बोलते क्योंकि एगर हम कटू बोलेंगे तो जिसको कटू बोल रहे हैं उसमें भी तो भगवान ही है। भगवान ने गीता में कहा है ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः यानि मैं प्रत्येक आत्मा में वास करता हूं । जिसको मैं बुरा बोल रहा हूं उसमें भी तो भगवान बसा हुआ है । एक तरफ मंदिर वाले भगवान को प्रसन्न करने की कोशिश दूसरी तरह उसी भगवान को उलटा सीधा बोलते हैं। जीव की वाणी ऐसी होनी चाहिए की किसी के प्रति बुरा ना बोले, वो आपकी मजबूरी नहीं ये आपकी आदत हो किसी को बुरा ना बोलने की।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया । दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

8Aug 2018

भगवान गोविंद देव जी की नगरी जयपुर में न्यूगेट स्थित रामलीला मैदान, संगानेरी गेट में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भगवान गोविंद देव जी की नगरी जयपुर में न्यूगेट स्थित रामलीला मैदान, संगानेरी गेट में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के षष्ठम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। कथा में हजारों की संख्या में भक्त पधारे।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि व्यक्ति को नेत्रों पर संयम रखना चाहिए, ये नेत्र सिर्फ रास्ता ही नहीं दिखाते बल्कि रास्ता भटकाते भी हैं। अपने नेत्रों को इतना समझा दो की क्या देखना है ? और क्या नहीं देखना ? ना देखने वाला चित्र अगर देख लें तो चरित्र खराब हो जाता है। नेत्रों से अच्छा देखिए, जब आप नेत्रों से अच्छा देखेंगे तो मन में संकल्प अच्छा करने का होगा। जो देखने योग्य नहीं है अगर वो देखोगे तो वो भी कर बैठोगे तो देखने योग्य नहीं है। 
महाराज श्री ने कहा कि एक संत ने क्या खूब कहा है कि जितना प्रेम एक पुरूष नारी से करते हो, नारी की सुंदरता से करते हो, उतना या उससे आधा प्रेम भी प्रभु से हो जाए तो कोई भी हमारा कल्याण होने से रोक नहीं सकता। उन्होंने आगे कहा कि एक साधु का तो भेष ही आदरणीय है इसलिए जब भी कही भी साधु संत मिलें अगर कुछ ना कर सको तो आदर पूर्वक सर झुकाकर प्रणाम करो। 
पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा ।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

7Aug 2018

भगवान गोविंद देव जी की नगरी जयपुर में न्यूगेट स्थित रामलीला मैदान में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भगवान गोविंद देव जी की नगरी जयपुर में न्यूगेट स्थित रामलीला मैदान में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

कथा के पंचम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। कथा में हजारों की संख्या में भक्त पधारे।

महाराज श्री ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि अपने कानों पर संयम रखे, हमेशा यह मत सोचो की जो भी व्यक्ति आए वो आपकी प्रशंसा करे। प्रशंसा सुनने से कानों की आदत बिगड़ जाती है, जब हम प्रशंसा सुनते हैं तो फिर निंदा सुनने की क्षमता समाप्त हो जाती है, एक व्यक्ति भी हमारी निंदा कर दे तो हम उसे अपना शत्रु समझ लेते हैं। प्रशंसा सुनने की आदत व्यक्ति को गर्त में ले जाती है। 
महाराज श्री ने आगे कहा कि भगवत प्राप्ति बिना साधना के नहीं हो सकती । संसार की वस्तु तुम्हारे कर्म का फल हो सकता है लेकिन ऐसा कोई कर्म नहीं जिसके बाद भगवत दर्शन प्राप्त हो सके वो तो गुरू कृपा और तुम्हारे ऊपर ठाकुर जी के अहित की कृपा हो जाए तभी संभव है। 


देवकीनंदन ठाकुर जी महाराजा ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया।

महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

6Aug 2018

भगवान गोविंद देव की नगरी जयपुर में न्यूगेट स्थित रामलीला मैदान, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

कथा के चतुर्थ दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। कथा में हजारों की संख्या में भक्त पधारे।महाराज श्री ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवत कृपा का प्रत्यक्ष दर्शन हमारे जीवन में अगर कुछ है तो यह है कि हमे भगवान की भागवत कथा का श्रवण करने का भी सौभाग्य प्राप्त हो जाए, हम भगवान की कथा सुनने के लिए तैयार हो जाएं। हमे भगवान का शुक्रिया करना चाहिए की हे प्रभु आपने हमारे ऊपर कितनी बड़ी कृपा की है, सबसे बड़ी कृपा आपने यह की हमें मानव जीवन दिया और उससे भी बड़ी कृपा यह की मानव जीवन देने के उपरान्त भी आपने हमारे ह्रदय घट में यह भावन उतपन्न कर दी की भगवान की भागवत कथा सुननी चाहिए। जैसे ही मन में यह भावना आती है कि भागवत सुनने जाना है उसी समय भगवान हमारे ह्रदय में कैद हो जाते हैं।
महाराज श्री ने कहा कि हो सके तो आप जीवन में किसी के सार्थी बनो स्वार्थी मत बनो, आज हमारे दुख की वजह यही है की हम स्वार्थी तो बन गए है लेकिन सार्थी हम खुद के भी नहीं बने हैं। दूसरों का ना सही खुद का हित कर लो, लेकिन खुद का हित दूसरों को नीचा दिखाकर मत करो। जिस दिन से हम दूसरों के लिए जीना शुरू कर देंगे उस ही दिन से जीवन में सुख आना शुरू हो जाएगा।
देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली ने भगवान ब्रह्मा वरदान मांगा की मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने उसे वरदान दे दिया। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने विष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया। इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया। महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”। उस बालक ने महाबली से कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया। दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ। महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।" 
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
इसके बाद पूज्य महाराज श्री ने भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का सुंदर वर्णन श्रवण कराया। सभी भक्तों ने श्री कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

5Aug 2018

भगवान गोविंद देव जी की नगरी में महाराज श्री के सानिध्य में न्यूगेट स्थित रामलीला मैदान, संगानेरी गेट जयपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

भगवान गोविंद देव जी की नगरी में महाराज श्री के सानिध्य में न्यूगेट स्थित रामलीला मैदान, संगानेरी गेट जयपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

कथा के तृतीय दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई। कथा में हजारों की संख्या में भक्त पधारे।

कथा के तृतीय दिवस पर कथा पंडाल में जयपुर के माननीय सांसद श्री रामचरण बोहरा जी ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाकर महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। संस्था की ओर से उन्हे स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

महाराज श्री ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जो लोग जीवन में सफल होते हैं उनकी सफलता के पीछे अगर बहुत बड़ा किसी का हाथ है तो वो है आपके सलाहकार का, आपके गुरू का। जीवन में सभी सफलता पाने चाहते हैं लेकिन बहुत सोच समझकर आपको किसी की सलाह माननी चाहिए क्योंकि आजकल जिस की खूद की नाव डूब गई है वो भी सलाह देते हैं। गुरू अगर जीवन में गलत सलाह देते तो धर्म चला जाता है, वैद्य गलत सलाह दे तो जीवन चला जाता है, आपके सलाहकार जैसे होंगे आपका जीवन उसी दिशा में चल पड़ेगा। 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...
अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा।।

4Aug 2018

"विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली"  के तत्वधान में समिति के सभी पदाधिकारी गंण, सदस्य एवं सभी स्वयंसेवकों ने मिलकर भारी बारिश के चलते कानपुर में आई बाढ़ से पीड़ित लोगों के लिए खाद्य सामग्री एवं कंबल आदि चीजों का वितरण किया तथा बाढ़ पीड़ित लोगों को जरूरत पड़ने पर मदद की,

विश्व शांति सेवा समिति कानपुर",
"विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली" 
के तत्वधान में समिति के सभी पदाधिकारी गंण, सदस्य एवं सभी स्वयंसेवकों ने मिलकर भारी बारिश के चलते कानपुर में आई बाढ़ से पीड़ित लोगों के लिए खाद्य सामग्री एवं कंबल आदि चीजों का वितरण किया तथा बाढ़ पीड़ित लोगों को जरूरत पड़ने पर मदद की,
आप सभी लोगों से निवेदन है आप लोग भी अपने आस पास की जरूरत वाली जगहों मे जाकर लोगों की मदद करें।

।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

4Aug 2018

भगवान श्री गोविंद देव जी की नगरी जयपुर में न्यूगेट, रामलीला मैदान, में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

हेडलाइन :- “संत महात्माओं के मन में हमेशा जनकल्याण की दिव्य भावना रहती है : देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज”
भगवान श्री गोविंद देव जी की नगरी न्यूगेट, रामलीला मैदान, संगानेरी गेट जयपुर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने भागवत कथा में अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

कथा के दूसरे दिन भी हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। 
भागवत कथा के दूसरे दिन की शुरुआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि हमारे संत महात्मा जो हैं इनका जन्म, लीला भ्रमण, संसार में रहना परोपकार के लिए है। हमेशा उनके मन में एक ही भावना रहती है की जनकल्याण कैसे हो ? और उस दिव्य जनकल्याणकारी भावना के लिए वह प्रायसरत रहते हैं। उन्होंने कहा कि जो आपको सदमार्ग दिखाते हैं वहीं आपके शुभचिंतक हैं। लेकिन समाज में दुर्भाग्य यह है कि बुरे विचार देने वाले जो लोग हैं उन्हे हम अपने शुभचिंतक समझते हैं और अच्छे विचार देने वालों को हम अपना शत्रु समझते हैं। यह जो नकारात्मक भावना हमारे मन में भर गई हैं यही हमे दुख देती है।

महाराज श्री ने कहा कि वैराग्य और ज्ञान से भक्ति पुष्ट होती है इसलिए वैराग्य और ज्ञान जरूर होना चाहिए। पहले भक्ति हो भक्ति आपको ज्ञान प्राप्त करा देगी और भक्ति ही आपको वैराग्य भी स्वयं करा देगी। लेकिन भक्ति दुनिया को दिखाने के लिए ना हो भक्ति खुद के लिए हो।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओंका गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।

श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।

यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

3Aug 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में मुख्य यजमान मोहिनी देवी एवं सुरेश चंद्र गोयल जी के द्वारा 03 से 09 अगस्त 2018 तक प्रतिदिन रामलीला मैदान, न्यू गेट, संगानेरी गेट, जयपुर (राजस्थान) में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के पहले दिन महाराज जी ने भागवत कथा के महात्यम का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

 

कथा के पहले दिन हजारों की संख्या में भक्तों ने महाराज के श्रीमुख से कथा का श्रवण किया। 
भागवत कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत दीप प्रज्वलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरुआत करते हुए कहा कि गोविंद देव जी की कृपा के बगैर यह संभव नहीं है की श्रावण मास में श्रीमद्भागवत कथा सुनने को मिल सके। श्रावण मास अति सुंदर मास है और इस पवित्र मास में जो भी सतकर्म किए जाते हैं उनका कई गुना फल मिलता है। यह श्रावण मास भगवान शिव को तो प्यारा है ही श्याम को भी प्यारा है।

महाराज श्री ने कांवड के द्वारा जल लाकर भगवान शिव पर चढ़ाने का महत्व भी समझाया, उन्होंने कहा कि इस श्रावण मास में आपने देखा होगा पूरे देश में कांवडिएं गंगा से जल लेकर आते हैं और भगवान शिव पर चढ़ाते हैं। इसका एक विशेष महत्म हैं जिस समय समुंदर मंथन हुआ सर्वप्रथम विष निकला जिसे ना तो दैत्य लेने का तैयार हुए, ना ही देवता। यही समाज का नियम है की जब बुराई सामने आती है तब कोई नहीं लेना चाहता है लेकिन जब अच्छाई सामने आती है तो सब ले लेना चाहते हैं। जब कोई भी इस विष को लेने को तैयार नहीं हुआ तो भगवान शिव शंकर ने देवताओं का हित समझते हुए विषपान कर लिया और विष का पान करने के बाद बाबा के तन का ताप बढने लगा। बाबा ने शितलता प्राप्त करने के लिए चंद्रमा को अपने मस्तिष्क पर धारण किया, इंद्र देव ने घनघोर वर्षा की, अनेकों कोशिशें होने लगी और तभी से बाबा भोलेनाथ के ऊपर पंचामृत का अभिषेक होने लगा। यह विष का पान बाबा भोले नाथ ने श्रावण मास में किया था इसलिए तब से ही भक्तों द्वारा बाबा का ताप करने के लिए कावंड लाकर जलाभिषेक किया जाता है।

महाराज श्री ने आगे कहा कि भागवत के प्रथम श्लोक के उच्चारण सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे! तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नुम:। से की। उन्होंने कहा कि भागवत का यह प्रथम श्लोक भागवत का स्वरूप कैसा है, सत् घन चित घन और आनन्द स्वरूप है ऐसे भगवान सच्चिदानंद स्वरूप है, जो पूरे विश्व का पालन, सृजन और संघारण करते हैं। तीनों के जो हेतु हैं तथा जिनकी पावन चरण शरण ग्रहण करते ही जीव का तापत्र अपने आप समाप्त हो जाता है। दैहिक, दैविक, भौतिक ये तीन प्रकार के ताप हैं इन तीनों तापों को अगर कोई समाप्त कर सकता है तो सिर्फ परमात्मा का नाम और प्रभाव ही है और कुछ भी नहीं।

महाराज श्री ने आगे कहा कि ये भागवत कोई साधारण नहीं है ये दुनिया का सबसे बड़ा औषधालय है लेकिन मिलता उन्ही को है जो रोगी श्रद्धा से आते हैं। यहां हर कोई रोगी है किसी को काम का रोग लगा है, किसी को क्रोध का, किसी को मोह का, किसी को तृष्णा है और कैंसर, ब्लड प्रेशर जैसे रोग तो एक जन्म खत्म करते हैं लेकिन काम, क्रोध, मोह तो जन्म जन्मांतर को समाप्त कर देते हैं। उन रोगों को भी मिटाने की क्षमता इस भागवत रूपी औषधालय में है।

महाराज श्री ने कहा कि ध्यान देने योग्य बात है कि तन के बाहर का अंधकार उस अंधकार को हम प्रकाश से दूर कर सकते हैं लेकिन मन के भीतर जो अंधकार है उसे कैसे मिटाया जाए। हमारे बाहर इतना अंधकार नहीं है जितना हमारे भीतर अंधकार है, जहां कोई लाइट नहीं है, जहां कोई सूर्य की किरणें नहीं पहुंच सकती। सूर्य की किरणें जहां पहुंचने में असक्षम हैं वहां पर सद् गुरूदेव भगवान की वाणी ही है जो ज्ञान रूपी प्रकाश करके हमारे मन के अंधकार को समाप्त करती हैं।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार सनकादिक ऋषि और सूद जी महाराज विराजमान थे तो उन्होंने ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।

व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। .

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

31Jul 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के द्वारा सांस्कृतिक महोत्सव 2018 का 28 से 30 जुलाई 2018 तक तालकटोरा स्टेडियम दिल्ली में भव्य आयोजन किया गया। हमारे देश की युवा पीढ़ी को संस्कृति का बोध कराने और एक नए भारत का निर्माण करने हेतु इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य था हमारी आने वाली पीढ़ी संस्कृति को जाने, हमारी विरासत से रूबरू हो।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के द्वारा सांस्कृतिक महोत्सव 2018 का 28 से 30 जुलाई 2018 तक तालकटोरा स्टेडियम दिल्ली में भव्य आयोजन किया गया। हमारे देश की युवा पीढ़ी को संस्कृति का बोध कराने और एक नए भारत का निर्माण करने हेतु इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य था हमारी आने वाली पीढ़ी संस्कृति को जाने, हमारी विरासत से रूबरू हो। 


तीन दिवसीय इस कार्यक्रम का विषय हर दिन अलग रखा गया था। प्रथम दिवस का विषय नारी शक्ति पर आधारित था जिसमें अपने क्षेत्र में विशिष्ठ योगदान देने वाली नारी शक्ति को स्मृति चिन्ह एवं सहयोग राशि देकर सम्मानित किया गया। इस आयोजन में देश की राजनीति की दिग्गज हस्तियां ने भी शिरकत की जिनमें प्रथम दिवस मुख्य अतिथि के रूप में महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती मेनका गांधी, एवं विशिष्ठ अतिथि के रूप में संसदीय मामलों के राज्य मंत्री श्री विजय गोयल जी एवं सांसद श्री साक्षी महाराज जी ने कार्यक्रम में अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई। (PHOTO 1 to 14)
द्वितीय दिवस का विषय हमारे देश के लिए प्राणों का बलिदान देने वाले वीर जवानों को समर्पित था जिसमें हमारे वीर जवानों और शहीदों के परिवार वालों को स्मृति चिन्ह एवं सहयोग राशि देकर सम्मानित किया गया। द्वितीय दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में कानून एवं न्याय मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद एवं विशिष्ठ अतिथि के रूप में श्रीमती मीनाक्षी लेखी, सांसद एवं भाजपा राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं सांसद श्री साक्षी महाराज जी ने कार्यक्रम में अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई। (PHOTO 15 to 30)


तृतीय दिवस का विषय था संस्कृत, संस्कृति और संस्कार, भारत वर्ष का एक आधार, आओ करें एक नए भारत का निर्माण। तृतीय दिवस पर मुख्य अतिथियों में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री गिरिराज सिंह जी, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री विजय सांपला जी, राज्यसभा सांसद श्री सत्यनारायण जाटिया, सांसद श्रीमती प्रियंका रावत, एवं सांसद श्री साक्षी महाराज जी ने कार्यक्रम में अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज द्वारा सभी अतिथियों को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। (PHOTO 31 to 44 )

30Jul 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में तालकटोरा स्टेडियम, दिल्ली में सांस्कृतिक महोत्सव 2018 का आयोजन 28 से 30 जुलाई 2018 तक किया गया। हमारे देश की युवा पीढ़ी को संस्कृति का बोध कराने और एक नए भारत का निर्माण करने हेतु इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के तृतीय दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री Giriraj Singh जी, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री श्री Vijay Sampla जी, राज्यसभा सांसद श्री Dr Satyanarayan Jatiya जी, सांसद श्रीमती Priyanka Singh Rawat जी एवं सांसद श्री Dr. Swami Sakshi Ji Maharaj जी ने कार्यक्रम में अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज द्वारा उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। । 

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में तालकटोरा स्टेडियम, दिल्ली में सांस्कृतिक महोत्सव 2018 का आयोजन 28 से 30 जुलाई 2018 तक किया गया। हमारे देश की युवा पीढ़ी को संस्कृति का बोध कराने और एक नए भारत का निर्माण करने हेतु इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के तृतीय दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री Giriraj Singh जी, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री श्री Vijay Sampla जी, राज्यसभा सांसद श्री Dr Satyanarayan Jatiya जी, सांसद श्रीमती Priyanka Singh Rawat जी एवं सांसद श्री Dr. Swami Sakshi Ji Maharaj जी ने कार्यक्रम में अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज द्वारा उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। । 


तीन दिवसीय यह कार्यक्रम में हर दिन एक अलग विषय पर रहा। तीन दिवसीय इस कार्यक्रम की थीम हर दिन अलग रखी गई थी। पहले दिन की थीम नारी शक्ति पर आधारित थी जिसमें अपने क्षेत्र में विशिष्ठ योगदान देने वाली नारी शक्ति को स्मृति चिन्ह एवं सहयोग राशि देकर सम्मानित किया गया, तो वहीं दूसरे दिन की थीम हमारे देश के लिए प्राणों का बलिदान देने वाले वीर जवानों को समर्पित थी जिसमें हमारे वीर जवानों और शहीदों के परिवार वालों को स्मृति चिन्ह एवं सहयोग राशि देकर सम्मानित किया गया। तीसरे दिन की थीम संस्कृत, संस्कृति और संस्कार, भारत वर्ष का एक आधार, आओ करें एक नए भारत का निर्माण है।


पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कार्यक्रम में सभी जनता को संबोधित किया एवं कार्यक्रम में मौजूद सम्मानित जनता और अतिथियों का कार्यक्रम में अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाने के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति विश्व की सर्वाधिक प्राचीन एवं समृद्ध संस्कृति है। भारत देश संस्कृत, संस्कृति और संस्कार के समावेश वाला देश है, हमारी परंपराएं, भाषाएं और कलाएं ही हमारी पहचान है। प्राचीन सभ्यता के बलबूते ही आज हम एक सभ्य समाज में जी रहे है। हमारे ऋषि परंपराओं ने ही हमे संस्कृत, संस्कृति और संस्कार का बोध कराया है। भारतीय संस्कृति में इतनी ताकत है कि पाश्चात्य संस्कृति भी भारतीय संस्कृति से प्रभावित रही है। भारतीय संस्कृति के प्रति पाश्चात्य लोगों में जिज्ञासा बढ़ रही है और वो भारतीय संस्कृति को जानने समझने भारत आते हैं। भारतीय संस्कृति के महत्वपूर्ण तत्व शिष्टाचार, सभ्य संवाद, धार्मिक संस्कार, मान्यताएँ और मूल्य आदि हैं। आज कल हर व्यक्ति की जीवन शैली आधुनिक हो रही है लेकिन भारतीय पूरे विश्व में जहां भी है वहां वह आज भी अपनी परंपरा और मूल्यों को बनाए हुए हैं। 


पूज्य महाराज श्री ने कलचर टेरेरिजम पर भी अपनी बात रखते हुए कहा कि आज के युवा आइटम सांग देखते हैं क्या वो बच्चे संस्कारी बनेंगे, अगर बच्चों को संस्कारी बनाना है तो गीता पढ़ाओ, रामायण पढ़ो, आप आइटम सान्ग देखकर संस्कारी नहीं बन सकते। उन्होंने कहा कि आजकल कान्वेट में पढ़ने वालें बच्चों को कहा जाता है कि आप चोटी नहीं रख सकते, हाथ में कलेवा नहीं बांध सकते, तिलक नहीं लगा सकते अगर आपने ऐसा किया तो आपको स्कूल से निकाल दिया जाएगा। क्या यह हमारे संस्कारों, संस्कृति को खत्म करने की साजिश है। महाराज श्री ने मा. मंत्री श्री गिरिराज सिंह जी के समक्ष यह बात रखी तो मंत्री जी ने कहा की अगर मिशिनरी का स्कूल हमारे संस्कारों का विरोध करता है त पूरे देश को उसका विरोध करना चाहिए।
महाराज श्री ने कहा कि हमारे नए देश का निर्माण वो युवा करेगा जिसके एक हाथ में कम्प्यूटर और एक हाथ में गीता होगी। उन्होंने कहा कि अगर हॉलैंड में गीता पढ़ाई जा सकती है, विदेशी धरती पर गीता के उपदेश दिए जा सकते हैं तो भारत में क्यों नहीं पढ़ाई जाती।


महाराज श्री ने कहा कि हर महीने ऐसे आयोजन होने चाहिएऐ ताकि भारतीय युवाओं को भारत की संस्कृति को जानने का अवसर मिल सके। महाराज श्री ने युवाओं को सफल होने का मंत्र भी दिया, उन्होंने कहा कि जीवन में सबसे सरल उपाय है कि अपने माता पिता के चरणों का आशीर्वाद हर दिन लिया करों और सफलता आने के बाद अहंकार मत आने दो क्योंकि अहंकार हमे फिर से गर्त में ले जाता है। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा।।

30Jul 2018

कार्यक्रम के तृतीय दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री Giriraj Singh जी, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री श्री Vijay Sampla जी, राज्यसभा सांसद श्री Dr Satyanarayan Jatiya जी, सांसद श्रीमती Priyanka Singh Rawat जी एवं सांसद श्री Dr. Swami Sakshi Ji Maharaj जी ने कार्यक्रम में अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज द्वारा उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम के तृतीय दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री Giriraj Singh जी, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री श्री Vijay Sampla जी, राज्यसभा सांसद श्री Dr Satyanarayan Jatiya जी, सांसद श्रीमती Priyanka Singh Rawat जी एवं सांसद श्री Dr. Swami Sakshi Ji Maharaj जी ने कार्यक्रम में अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज द्वारा उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

29Jul 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में तालकटोरा स्टेडियम, दिल्ली में सांस्कृतिक महोत्सव 2018 का आयोजन किया जा रहा है। हमारे देश की युवा पीढ़ी को संस्कृति का बोध कराने और एक नए भारत का निर्माण करने हेतु इस कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। कार्यक्रम के द्वितीय दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में कानून एवं न्याय मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद एवं विशिष्ठ अतिथि के रूप में श्रीमती मीनाक्षी लेखी, सांसद एवं भाजपा राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं सांसद श्री साक्षी महाराज जी ने कार्यक्रम में अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज द्वारा उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। 

तीन दिवसीय इस कार्यक्रम में हर दिन एक अलग थीम है। दूसरे दिन की थीम हमारे देश के लिए प्राणों का बलिदान देने वाले वीर जवानों को समर्पित रही जिसमें हमारे वीर जवानों और शहीदों के परिवार वालों को मुख्य अतिथि श्री रविशंकर प्रसाद जी द्वारा स्मृति चिन्ह एवं सहयोग राशि देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में देश भक्ति के कई नृत्य नाटिकाओं की प्रस्तुती दी गई। 

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कार्यक्रम में सभी जनता को संबोधित किया एवं देशभक्ति के गीतों से देशप्रेम की भावन को व्यक्त किया। उन्होंने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि 15 अगस्त 1947 वो ऐतिहासिक लम्हा जब हम आज़ाद हुए और उस आज़ादी को पाने के लिए हमारे देश के वीरों ने अपना लहू बहाया। महात्मा गाँधी, भगत सिंह, सुखदेव, चंद्र शेखर आज़ाद जैसे शूरवीरों ने अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। उनके अद्मय साहस, पराक्रम, का ही परिणाम है कि ही भारत आज एक आजाद देश के साथ साथ विश्व शक्ति बनने की राह में खड़ा है। भारत के शहीदों ने जहां हमे आजादी दिलाई, वहीं देश की वीर जवानों ने सरहदों पर अपने प्राणों का बलिदान देते हुए इस देश की रक्षा की है। भारत आज एक विकसित देश के रूप में खड़ा है, भारत की सैन्य शक्ति किसी भी देश का सामना करने में सक्षम है। इतिहास गवाह है की जिसने भी भारत से टकराने की कोशिश की है उसे मुंह की खानी पड़ी है। भारत जमीन से लेकर आसमान तक अपना वर्चस्व रखता है। भारत की जमीं जहां सोना उगलती है वहीं आसमानी निगाहें देश की रक्षा करती है। सरहदों पर हमारे वीर जवान देश की हिफाजत के लिए दिन रात ना देखते हुए अपनी छाती को ढ़ाल बनाते हुए हमारी रक्षा करते हैं। आज देश के कोने कोने में "भारत " माता की जय के नारे गुंज़ेते है। हम सबको हिंदुस्तानी होने पर गर्व होता है और क्यों न हो? आज शायद ही दुनिया का ऐसा कोई कोना है जहां भारतीयों ने अपनी कला काबिलियत से दुनिया को नतमस्तक न किया हो। आज हम सब अपने अपने घरो में देश दुनिया की बाते करते है, त्यौहार मानते है, हम सब अपनी अपनी ज़िंदगियों में परिवार के साथ अपना भविष्य तय करते है, रात को चैन की नींद सोते है, क्योकि हम सब यह बात अच्छी तरह से जानते है की कोई है जो हमारे लिए परिवार से दूर, हर सुख सुविधा से दूर अपनी धरती माँ की रक्षा ले लिए जाग रहा है हमारे देश के वीर जवान जिन पर हम सब को गर्व है। हमारी गीता में "निष्काम कर्म" पर ज़ोर दिया गया है यहां कहा भी जाता है की चाहे जिस्म में खून की बूँद न रहे सासों से नाता टूट जाये, पर योद्धा का धर्म है लड़ना। इस युक्ति को यदि कोई आज भी सिद्ध कर रहा है तो वो है हमारे देश के जवान, बॉर्डर पर वो अपना काम पूरी निष्ठा और ईमानदारी कर रहे है।

29Jul 2018

सांस्कृतिक महोत्सव के द्वितीय दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में कानून एवं न्याय मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद एवं विशिष्ठ अतिथि के रूप में सांसद एवं भाजपा राष्ट्रीय प्रवक्ता श्रीमती मीनाक्षी लेखी, सांसद श्री साक्षी महाराज जी ने कार्यक्रम में अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई।

सांस्कृतिक महोत्सव के द्वितीय दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में कानून एवं न्याय मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद एवं विशिष्ठ अतिथि के रूप में सांसद एवं भाजपा राष्ट्रीय प्रवक्ता श्रीमती मीनाक्षी लेखी, सांसद श्री साक्षी महाराज जी ने कार्यक्रम में अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज करवाई। पूज्य महाराज श्री के द्वारा उन्हें स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

 

28Jul 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 28 से 30 जुलाई 2018 तक तालकटोरा स्टेडियम में सांस्कृतिक महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। महोत्सव का उद्देश्य हमारी संस्कृत, संस्कृति और संस्करों को एक मंच के माध्यम से परोसकर देश के युवाओं को इस लोक परंपराओं का बोध करना है। महोत्सव का प्रथम दिवस नारी शक्ति को समर्पित रहा जिसमें देशहित के कार्य करने वाली हमारी नारी शक्तियों को सम्मानित किया गया।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में 28 से 30 जुलाई 2018 तक तालकटोरा स्टेडियम में सांस्कृतिक महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। महोत्सव का उद्देश्य हमारी संस्कृत, संस्कृति और संस्करों को एक मंच के माध्यम से परोसकर देश के युवाओं को इस लोक परंपराओं का बोध करना है। महोत्सव का प्रथम दिवस नारी शक्ति को समर्पित रहा जिसमें देशहित के कार्य करने वाली हमारी नारी शक्तियों को सम्मानित किया गया। महोत्सव में कई राजनितिक हस्तियों ने भी शिरक्त की जिनमें महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती Maneka Gandhi जी, संसदीय कार्यों के राज्यमंत्री श्री Vijay Goel जी, सांसद श्री Dr. Swami Sakshi Ji Maharaj जी ने अपनी गिरमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई।

सांस्कृतिक महोत्सव में नारी शक्ति को समर्पित कई कार्यक्रमों का भी आयोजन किया गया।
पूज्य महाराज श्री ने महोत्सव को संबोधित करते हुए कहा कि विषय महिला सशक्तिकरण का है तो पहले हम ये बात समझें की आखिर ये सशक्तिकरण क्या है ? क्या वाकई इस शब्द का प्रयोग महिलाओं के लिए उचित है। सशक्तिकरण यानि सश्कत बनना यानि शक्ति देना। इस शब्द के गूढ़ में जाएं तो हास्यपद लग सकता है कि सृष्टि को जन्म देने वाली उसका भरण पोषण करने वाली महिला को सशक्त बनाने के लिए अभियान आंदोलन चलाए जाएं, जो स्वयं में सृष्टि है, जो स्वयं नियता क्या वो आशक्त हो सकती है कदापि नहीं।


महाराज श्री ने कहा कि ऋगवेद में वर्णित है यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते तत्र रमन्ते देवता यानि जहां नारी की पूजा होती है वहां देवताओं का वास होता है और देवताओं का वास स्थान यानि स्वर्ग तो अर्थ यह है कि नारी का सम्मान हो तो वह जगह देवस्थान है। महर्षि मनु ने कहा कि दस उपाध्यायों के बराबर एक आचार्य, सौ आचार्यों के बराबर एक पिता, एक हजार पिताओं से अधिक गौरवपूर्ण माँ होती है। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

28Jul 2018

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में आयोजित सांस्कृतिक महोत्सव का प्रथम दिवस नारी शक्ति को समर्पित रहा।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में आयोजित सांस्कृतिक महोत्सव का प्रथम दिवस नारी शक्ति को समर्पित रहा। महोत्सव में कई राजनितिक हस्तियों ने भी शिरक्त की जिनमें महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती Maneka Gandhi जी, संसदीय कार्यों के राज्यमंत्री श्री Vijay Goel जी, सांसद श्री Dr. Swami Sakshi Ji Maharaj जी ने अपनी गिरमामयी उपस्थिति दर्ज करवाई।

 

27Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के पावन सानिध्य में 26 और 27 जुलाई 2018 को "गुरु पूर्णिमा महोत्सव" का सुंदर एवं भव्य आयोजन ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर के प्रांगण में गुरु पूर्णिमा महोत्सव का आयोजन बड़ी हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।

पूज्य महाराज श्री के पावन सानिध्य में 26 और 27 जुलाई 2018 को "गुरु पूर्णिमा महोत्सव" का सुंदर एवं भव्य आयोजन ठा. श्री प्रियाकान्त जू मंदिर के प्रांगण में गुरु पूर्णिमा महोत्सव का आयोजन बड़ी हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। जिसमें हजारों की तादाद में देश विदेश से भक्त पधारे। जिसमें सभी भक्तों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया एवं सर्वप्रथम गणेश वंदना कर कार्यक्रम की शुरुआत की गई तथा ठाकुर श्री प्रियाकांतजू भगवान, सर्वेश्वरीश्री राधा रानी के प्यारे प्यारे भजनों की प्रस्तुति दी गई। महाराज श्री द्वारा गाये गये भजनो पर सभी भक्तगण झूमते नाचते रहे। अंत में ठाकुर श्री प्रियाकांतजू भगवान की आरती का कार्यक्रम का समापन किया गया।

26Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के पावन सानिध्य में 26 और 27 जुलाई को शांति सेवा धाम, वृंदावन में गुरू पूर्णिमा महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। गुरू पूर्णिमा महोत्सव के प्रथम दिवस पर हजारों की तादाद में देश विदेश से भक्त पधारे। महाराज श्री ने गुरू पूर्णिमा के महत्व और गुरू महिमा का वृतांत भक्तों को श्रवण कराया। 

पूज्य महाराज श्री के पावन सानिध्य में 26 और 27 जुलाई को शांति सेवा धाम, वृंदावन में गुरू पूर्णिमा महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। गुरू पूर्णिमा महोत्सव के प्रथम दिवस पर हजारों की तादाद में देश विदेश से भक्त पधारे। महाराज श्री ने गुरू पूर्णिमा के महत्व और गुरू महिमा का वृतांत भक्तों को श्रवण कराया। 


प्रथम दिवस की शुरूआत विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने गुरू पूर्णिमा महोत्सव की शुरूआत करते हुए कहा कि अगर हमे कोई गाड़ी चलाना ना सीखाए तो हमे कैसे पता चलेगा की गाड़ी कैसे चलानी है, उसके लिए कोई गुरू होता है जो बताता है की क्लच दबा, गेयर डाल, स्टेयरिंग संभाल, साइड देख, तब हम आगे बढ़ते हैं। कोई तो है जो मुझे ड्राइव करना सिखाता है, शुरू में मेरी माँ मुझे सीखाती थी खाना कैसे खाना है, बोलना कैसे है, कोई तो है जो मुझे कपड़े पहना सीखाता है, कोई तो है जो मुझे मेरे हाथ में किताब देकर सीखाता है पढ़ना कैसे है, लिखना कैसे हैं। जीवन में आपके पास जो है वो किसी ना किसी के माध्यम से है, सीधे नहीं है। कही से तो आपने सीखा है, किसी को देख कर सीखा है, कोई अगर यह कहे की ये मैने खुद कर लिया ऐसा नहीं होता है, कहीं से हम सीखते हैं, कही से हम लेते हैं।
महाराज श्री ने कहा कि जीवन में आप बिना गुरू के कुछ नहीं कर सकते, अनपढ़ ही रह जाओगे अगर आपको जीवन में गुरू नहीं मिलेगा। बोल नहीं पाओगे अगर जीवन में माँ रूपी पहला गुरू ना मिले, अध्यात्म में ईश्वर से नहीं मिल पाओगे अगर कोई सद्गुरू ना मिले। 
पूज्य महाराज श्री के श्रीमुख से निकले हुए भजनों पर भी सभी भक्त खूब झूम, सभी भक्तों ने गुरू पूर्णिमा का प्रथम दिवस बड़ी ही धूमधाम से मनाया।

26Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में गुरू पूर्णिमा महोत्सव से पूर्व श्रीधाम वृंदावन में गुरू दीक्षा का आयोजन किया गया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में गुरू पूर्णिमा महोत्सव से पूर्व श्रीधाम वृंदावन में गुरू दीक्षा का आयोजन किया गया जिसमें देश विदेश से आएं सैकड़ो भक्तों ने महाराज श्री से दीक्षा प्राप्त की। गुरू दीक्षा प्राप्त करने के पश्चयात सभी भक्तों ने महाराज श्री के आशीष वचनों पर अमल कर सच्चाई के पथ पर चलने और अपनी संस्कृत, संस्कृति और संस्कारों को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।

27Jul 2018

आज सुबह 7 बजे पूज्य महाराजश्री पहुँचे वृन्दावन अपने सद्गुरुदेव वृन्दावन भागवत पीठाधीश्वर भागवत सम्राट निम्बार्क रत्न शास्त्रार्थ महारथी श्री पुरुषोत्तम शास्त्री जी महाराज के पूजन के लिए पूज्य सद्गुरुदेव का पूजन कर पूज्य महाराजश्री ने आशीर्वाद प्राप्त किया।

गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । 

गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥

आज सुबह 7 बजे पूज्य महाराजश्री पहुँचे वृन्दावन अपने सद्गुरुदेव वृन्दावन भागवत पीठाधीश्वर भागवत सम्राट निम्बार्क रत्न शास्त्रार्थ महारथी श्री पुरुषोत्तम शास्त्री जी महाराज के पूजन के लिए पूज्य सद्गुरुदेव का पूजन कर पूज्य महाराजश्री ने आशीर्वाद प्राप्त किया। सद गुरुदेव भगवान की जय।। राधे राधे।

 

27Jul 2018

गुरू पूर्णिमा के विशेष पर्व पर "गुरु पूजन" करने हजारों की तादाद में देश विदेश से भक्त पधारे। सभी भक्तों ने महाराज श्री के श्री चरणों में पूजन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

 

पूज्य महाराज श्री के पावन सानिध्य में 26 और 27 जुलाई को शांति सेवा धाम, वृंदावन में गुरू पूर्णिमा महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। गुरू पूर्णिमा के विशेष पर्व पर "गुरु पूजन" करने हजारों की तादाद में देश विदेश से भक्त पधारे। सभी भक्तों ने महाराज श्री के श्री चरणों में पूजन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

 

27Jul 2018

गुरू पूर्णिमा के पावन अवसर पर गुरू पूजन के लिए भक्तों की लंबी कतार लगी। भारी बारिश की परवाह किए बगैर भक्त पूज्य महाराज श्री का आशीर्वाद लेने के लिए घंटो कतार में लगे रहे।

गुरू पूर्णिमा के पावन अवसर पर गुरू पूजन के लिए भक्तों की लंबी कतार लगी। भारी बारिश की परवाह किए बगैर भक्त पूज्य महाराज श्री का आशीर्वाद लेने के लिए घंटो कतार में लगे रहे।भक्तों ने महाराज श्री का पूजन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। और गुरू पूर्णिमा के पावन अवसर पर ठा. श्री प्रियाकान्त जू मन्दिर में भंडारा का आयोजन किया गया जिसमें कि हजारों की संख्या में भक्तों ने प्रसाद पाया गुरू पूर्णिमा के पावन अवसर पर हर महीने ट्रस्ट के द्वारा हजारों भक्तों के लिए भंडारा किया जाता हैं ।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

26Jul 2018

"गुरु पूजन" के पावन अवसर पर "भजन कीर्तन" का सुंदर एवं भव्य आयोजन किया गया।

"विश्व शांति सेवा समिति कानपुर"
के तत्वाधान में आज कानपुर कार्यालय मे "गुरु पूजन" के पावन अवसर पर "भजन कीर्तन" का सुंदर एवं भव्य आयोजन किया गया जिसमें सभी भक्तों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया एवं सर्वप्रथम पूज्य गुरुदेव जी का पूजन किया गया तथा ठाकुर श्री प्रियाकांतजू भगवान, सर्वेश्वरीश्री राधा रानी के प्यारे प्यारे भजनों की प्रस्तुति दी गई एवं अंत में ठाकुर श्री प्रियाकांतजू भगवान की आरती कर कार्यक्रम का समापन किया गया तदोपरांत प्रसाद का वितरण किया गया, जिसमें समिति के सभी पदाधिकारी गण, भक्तगणं, कार्यकर्ता आदि मौजूद रहे,
इस जानकारी को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए इस पोस्ट को शेयर अवश्य करें ,
आप सभी भक्त प्रेमी पूज्य गुरुदेव जी से आशीर्वाद लेने के लिए वृन्दावन अवश्य पहुंचे।
।। राधे राधे बोलना पड़ेगा ।।

25Jul 2018

दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचने पर महाराज श्री का फूलमाला पहनाकर स्वागत किया गया।

पूज्य महाराज श्री कनाडा में श्रीमद्भागवत कथा का समापन कर भारत वापस लौटे, दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचने पर महाराज श्री का फूलमाला पहनाकर स्वागत किया गया।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

25Jul 2018

कनाडा में आयोजित भागवत कथा के समापन के बाद भारत लौटते ही विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव विजय शर्मा जी द्वारा तालकटोरा स्टेडियम, दिल्ली पहुंचकर सांस्कृतिक महोत्सव 2018 की तैयारियों का जायजा लिया गया।

कनाडा में आयोजित भागवत कथा के समापन के बाद भारत लौटते ही विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के सचिव विजय शर्मा जी द्वारा तालकटोरा स्टेडियम, दिल्ली पहुंचकर सांस्कृतिक महोत्सव 2018 की तैयारियों का जायजा लिया गया। विजय जी ने सभी कार्यकर्ताओं को महोत्सव को भव्य बनाने का निवेदन किया एवं सुनिश्चित किया की किसी प्रकार की कोई कमी ना रह जाए। कार्यक्रम में राजनीति से जुड़ी कई दिग्गज हस्तियां शिरकत करेंगी उनकी सुरक्षा एवं समस्त इंट्री गेटों में सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद हो इसका भी निरिक्षण किया। सांस्कृतिक महोत्सव में प्रवेश केवल पास के जरिए ही संभव हो पाएगा। अपने पास लेने के लिए आप विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के दिल्ली कार्यालय एवं तालकटोरा स्टेडियम में कार्यक्रम के दिन इंट्री गेट पर बनाए गए कार्यालय से प्राप्त कर सकते हैं। इंट्री पास लिमिटेड है तो आप अपने पास पहले से ही सुनिश्चित करने का कष्ट करें।

22Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 15 से 21 जुलाई 2018 तक PCAE Community Center 9226 39 Avenue NW, Near Hindu Temple, Edmonton, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई।

भागवत के सप्तम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि श्रीमद्भागवत प्रत्यक्ष श्री कृष्ण हैं, श्रीमद्भागवत के शरण में विराजमान होने का अभिप्राय है हम साक्षात श्रीकृष्ण की शरण में बैठे हुए हैं, इसमें किंचित मात्र भी संदेह नहीं होना चाहिए क्योंकि ये सद् बह्रम हैं, सद कृष्ण हैं। कलयुग के जीवों का कल्याण करने के श्रीकृष्ण भागवत के रूप में ही हमारे सामने उपस्थित हैं और जो भी भागवत श्रवण करते हैं उन्हे भौतिकवादी चीजें तो मिलती ही हैं साथ ही वो मिलता है जो कठिन तपस्या करके भी प्राप्त नहीं होता वो है मोक्ष। 
महाराज श्री ने कहा कि भक्ति करनी है तो बचपन से शुरू करो, जवानी तक करो ताकि बुढापे में किसी की जरूरत ही ना पड़े, तो यह कहना की बुढ़ापे में हम भागवत कथा सुनेंगे यह सबसे बड़ी गलती है। भगवान की कथा हर दिन सुनो क्योंकि ये आपको जीना सीखाती है, आपको सुधारती है, जीवन में क्या करना चाहिए क्या नहीं ये कथा आपको सीखाती है। 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कल के कथा का क्रम को आगे बढ़ाते हुए कहा कि रुकमणी जी ने श्रीकृष्ण से प्रेम विवाह किया। भगवान ने 16 हजार 100 विवाह किए हैं लेकिन 8 विवाह अलग अलग हुए। ये 8 पटरानियां साधारण नहीं हैं लक्ष्मी जी बनी हैं रूकमणी, पार्वती जी आधे अंश से बनी हैं जामवंती और बाके आधे अंश से बनी हैं महामाया, तुलसी बनी हैं लक्ष्मणा, यमुना बनी हैं सूर्य की पूत्री कालिंदी, लज्जा बनी हैं भद्रा, गंगा बनी हैं मित्रव्रिंदा, सावित्री जी बनी हैं सत्या और पृथ्वी बनी हैं सत्यभामा। ये सांसारिक विवाह नहीं है ये पूरी प्रकृति के साथ ठाकुर जी ने विवाह किया है।
महाराज श्री ने आगे कहा कि भगवान ने 16100 विवाह इसलिए नहीं किए की उन्हे बहुत सारी पत्नियां चाहिए थी। उन्होंने इतने विवाह इसलिए किए क्योंकि उन स्त्रियों को जरूरत थी। भौमासुर नामक राक्षस ने 16 हज़ार 100 कन्याओं को बंदी बना रखा था। नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा की समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। इस कारण भगवान ने १६१०० रूप बनाकर सबके साथ एक मुहूर्त में एक साथ विवाह किया था। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने इतने विवाह किये। भगवान ने कामनावश विवाह नहीं किया था, करुणावश किया था। भगवान कहते हैं जिसको कोई नहीं अपनाता अगर वो मेरी शरण में आये तो मैं उसे अपना लेता हूँ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंततः सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।

22Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 15 से 21 जुलाई 2018 तक PCAE Community Center 9226 39 Avenue NW, Near Hindu Temple, Edmonton, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा का समापन करने के पश्चात विजय शर्मा जी और महाराज श्री ने Toronto के लिए प्रस्थान किया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 15 से 21 जुलाई 2018 तक PCAE Community Center 9226 39 Avenue NW, Near Hindu Temple, Edmonton, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा का समापन करने के पश्चात विजय शर्मा जी और महाराज श्री ने Toronto के लिए प्रस्थान किया।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

23Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में Edmonton हिंदू मंदिर में श्री कृष्ण कथा के साथ कनाडा की यात्रा पूरी हुई।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में Edmonton हिंदू मंदिर में श्री कृष्ण कथा के साथ कनाडा की यात्रा पूरी हुई। पूज्य महाराज श्री ने भक्तो को भजनों का आनंद दिलाया।

 

21Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 15 से 21 जुलाई 2018 तक PCAE Community Center 9226 39 Avenue NW, Near Hindu Temple, Edmonton, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत के षष्ठम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि अहंकार और अभिमान सबसे बुरी बलाएं हैं और धर्म का सबसे बड़ा रोड़ा है अहंकार । अभिमानी के शब्दो से पता चल जाता है कि कौन अभिमानी है, जो अभिमानी नहीं होता वो विनमर्ता से बात करता है। हर चीज का एक अलग ही अभिमान होता है, जब हम जवान होते हैं तो जवानी का भी एक अलग अहंकार होता है। जवानी के अहंकार में अपने माता पिता से कहते है कि आपको कुछ पता ही नहीं है, समय बदल चुका है, मुझे सिखाने की कोशिश मत करो। लेकिन इतना याद रखिए की आप अपने माता पिता की उम्र का अनुभव कभी प्राप्त नहीं कर सकते। आपके माता पिता के उम्र का जो अनुभव है वो आपका है और अगर आप उसे सीढ़ी बना लें तो अगर आप श्रेष्ठ है तो उनके अनुभव लेने के बाद आप प्रतिभाशाली हो सकते हैं। 


महाराज श्री ने कहा कि अगर जीवन में कोई समस्या आ जाए तो दो ही रास्ते हैं आपके पास, आपको या तो गोविंद के पास चले जाना चाहिए या गुरू के पास चले जाना चाहिए । गुरू दूर हैं तो गोविंद के पास चले जाओ वो सारी परेशानियां समाप्त कर देंगे, गोविंद दूर हो तो गुरू के पास चले जाओ वहां से सारी परेशानियां समाप्त हो जाएंगी। 


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

20Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 15 से 21 जुलाई 2018 तक PCAE Community Center 9226 39 Avenue NW, Near Hindu Temple, Edmonton, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत के पंचम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा कि शुरूआत करते हुए कहा कि सादा जीवन उच्च विचार, जीवन में जीने के लिए हमारा जीवन सरल और सीधे मार्ग से गुजरना चाहिए। व्यक्ति खुद ही मार्ग चुनता है, चाहे वो ऊंचे हों, ढेडे हों या सीधे हो यह व्यक्ति के खुद के ऊपर है। एक बात और यह मानना पड़ेगा की जितना कठिन मार्ग हम चुनेंगे उतनी ही कठनाईयों का सामना हमे करना पड़ेगा। लेकिन एक बात है सादे तरीके से जी कर हमे अपने विचार ऊंचे रखने चाहिए।
महाराज श्री ने कहा कि दूसरों को सुख दो यह सबसे बड़ा सतकर्म है और दूसरों को दुख दो यह सबसे बड़ा पाप है। व्यक्ति अपने सुख की खातिर दूसरों को दुख देने से भी चुकता नहीं है। हमे अपने श्रेष्ठ विचारों को और श्रेष्ठ करना चाहिए, अपने आप को प्रभु का दिवाना बनाना चाहिए। जितने आपके विचार श्रेष्ठ होंगे उतने आगे जाकर आप श्रेष्ठ होंगे, हमारी आने वाली पीढ़ी है वो भी आगे जाकर श्रेष्ठ होगी इसमें कोई शंका नहीं है। 
महाराज श्री ने कहा कि कन्हैया अपने भक्तों को तारने का बहाना ढूंढते हैं, जो पुतना का कल्याण कर सकते हैं वो हमारा भी कल्याण करेंगे।
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। 
महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

19Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 15 से 21 जुलाई 2018 तक PCAE Community Center 9226 39 Avenue NW, Near Hindu Temple, Edmonton, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया। भागवत के चतुर्थ दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि बहुत कुछ फर्क पड़ता है कि हम लोग अपने दिमाग से क्या सोचते हैं। कई लोग होते हैं जो हमेश नेगेटिव सोचत रहते हैं और कई लोग पॉजिटिव सोचते रहते हैं। इसिलिए लोग कहते हैं हमेशा सकारात्मक सोचिए क्योंकि हमारा दिमाग चुंबक की तरह है, अगर आप हमेशा अच्छा सोचेंगे तो आपके साथ हमेशा अच्छा ही होगा, अगर आप हमेशा परेशानियों के बारे में सोचेंगे तो आपके पास परेशानियां ही आएंगी। तो इसके लिए यह करें कि हमेशा सकारात्मक सोचे, अच्छे विचार अपने मन में लाएं। 


महाराज श्री ने कहा जब भी जीवन में परेशानियां आए तो समझ लेना की तुम्हारे अपने कर्मों का मंथन चल रहा है लेकिन देव भावना से आपने ये मंथन किया है तो अमृत आपको ही मिलेगा, दैत्य विचारधारा के साथ अगर मंथन किया है तो अमृत नहीं मिलेगा। इसलिए हमेशा सकारात्मक सोचें, ईश्वर हमेशा आपके साथ है, वो तुम्हारा हमेशा से था, है और रहेगा। तो विचारों का, कर्मों का जब मंथन होगा तो फल रूपी अमृत तुम्हे जरू मिलेगा बस शर्त यह है की देवताओं वाली भावना हो। 


महाराज श्री ने कहा कि हम सब भारतीय जितने भी सनातन धर्म को मानने वाले हैं वो सब एक स्वर में काम किया करें और जहां कही भी सनातन धर्म का कार्य हो रहा हो वहां हम सब को एकसाथ जाना चाहिए इस इच्छा से की वो मेरे प्रियतम का कार्य है, मेरे ठाकुर का कार्य है। 


देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।


महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।


शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।


इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।


उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"


जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।


दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।
महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
।। राधे- राधे बोलना पड़ेगा ।।

17Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 15 से 21 जुलाई 2018 तक PCAE Community Center 9226 39 Avenue NW, Near Hindu Temple, Edmonton, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

भागवत के द्वितीय दिवस की शुरूआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

एडमॉनटन कनाडा में चल रहीं श्रीमद्भागवत कथा में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने भक्तों को कथा की शुरूआत सुंदर भजन से कराई। और कथा की शुरुआत में बताया कि जितना भगवान को देना है उतना ही आपको मिंलना है। फिर चाहे वो कथामृत ही क्यों ना हो।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा की श्रीकृष्ण दुखी है की इस कलयुग के व्यक्ति का कल्याण कैसे हो, राधारानी ने पूछा क्या आपने इनके लिए कुछ सोचा है। प्रभु बोले एक उपाय है हमारे वहां से कोई जाए और हमारी कथाओं का गायन कराए और जब ये सुनेंगे तो इनका कल्याण निश्चित हो जाएगा। बात आई की कौन जाएगा, तो बोले की शुक जी जा सकते हैं, शुक को कहा गया वो जाने के लिए तैयार हो गए। श्री शुक भगवान की कथाओं का गायन करने के लिए जा रहे हैं तो मार्ग में कैलाश पर्वत पड़ा, कैलाश में भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। 

भागवत वही अमर कथा है जो भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। कथा सुनना भी सबके भाग्य में नहीं होता जब भगवान् भोलेनाथ से माता पार्वती ने उनसे अमर कथा सुनाने की प्रार्थना की तो बाबा भोलेनाथ ने कहा की जाओ पहले यह देखकर आओ की कैलाश पर तुम्हारे या मेरे अलावा और कोई तो नहीं है क्योकि यह कथा सबको नसीब में नहीं है। माता ने पूरा कैलाश देख आई पर शुक के अपरिपक्व अंडो पर उनकी नज़र नहीं पड़ी। भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को जो अमर कथा सुनाई वह भागवत कथा ही थी। लेकिन मध्य में पार्वती जी को निद्रा आ गई और वो कथा शुक ने पूरी सुन ली। यह भी पूर्व जन्मों के पाप का प्रभाव होता है कि कथा बीच में छूट जाती है। भगवान की कथा मन से नहीं सुनने के कारण ही जीवन में पूरी तरह से धार्मिकता नहीं आ पाती है। जीवन में श्याम नहीं तो आराम नहीं। भगवान को अपना परिवार मानकर उनकी लीलाओं में रमना चाहिए। गोविंद के गीत गाए बिना शांति नहीं मिलेगी। धर्म, संत, मां-बाप और गुरु की सेवा करो। जितना भजन करोगे उतनी ही शांति मिलेगी। संतों का सानिध्य हृदय में भगवान को बसा देता है। क्योंकि कथाएं सुनने से चित्त पिघल जाता है और पिघला चित ही भगवान को बसा सकता है।
श्री शुक जी की कथा सुनाते पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने बताया कि श्री शुक जी द्वारा चुपके से अमर कथा सुन लेने के कारण जब शंकर जी ने उन्हें मारने के लिए दौड़ाया तो वह एक ब्राह्मणी के गर्भ में छुप गए। कई वर्षों बाद व्यास जी के निवेदन पर भगवान शंकर जी इस पुत्र के ज्ञानवान होने का वरदान दे कर चले गए। व्यास जी ने जब श्री शुक को बाहर आने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि जब तक मुझे माया से सदा मुक्त होने का आश्वासन नहीं मिलेगा। मैं नहीं आऊंगा। तब भगवान नारायण को स्वयं आकर ये कहना पड़ा की श्री शुक आप आओ आपको मेरी माया कभी नहीं लगेगी ,उन्हें आश्वासन मिला तभी वह बाहर आए।


यानि की माया का बंधन उनको नहीं चाहिए था। पर आज का मानव तो केवल माया का बंधन ही चारो ओर बांधता फिरता है। और बार बार इस माया के चक्कर में इस धरती पर अलग अलग योनियों में जन्म लेता है। तो जब आपके पास भागवत कथा जैसा सरल माध्यम दिया है जो आपको इस जनम मरण के चक्कर से मुक्त कर देगा और नारायण के धाम में सदा के लिए आपको स्थान मिलेगा। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

18Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 15 से 21 जुलाई 2018 तक PCAE Community Center 9226 39 Avenue NW, Near Hindu Temple, Edmonton, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया।

 

भागवत के तृतीय दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कि कहा गया है कि हरि अनंत हरि कथा अनंता, कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता । भगवान की कथा एक नहीं है अनंत है, भगवान की कथा जितनी बार भी सुनो उतनी बार नई लगती है, जितना सुनो यह मन को मोह लेती है। लेकिन यह रसिकों की बात है, जो रसिक नहीं होते उन्हे तो भगावत कथा सुननी ही नहीं चाहिए। 
महाराज श्री ने कहा कि हम लोग भगवान के दिए हुए मानव जीवन को भी सिर्फ पैसा पाने की कोशिश में गंवा देते हैं। आप धन कमाईए क्योंकि जितना धन होगा उतना धर्म होगा लेकिन भगवान ने आपको जो भी दिया है आप अपने आप को उसका मालिक मत समझो, आप उसके मुनीम हो। जो व्यक्ति भगवान की दी हुई सम्पत्ति को अपने आप को मालिक समझता है वही अपने साथ सबसे बड़ा घाटा करता है। जब हम अपने आप को मालिक समझेंगे तो धन का दुरूपयोग करेंगे और जब हम अपने आप को इसका मुनीम समझेंगे तो जो भी भगवान ने हमे दिया है उसका हिसाब देना पड़ेगा।
महाराज श्री ने कहा कि किसी भी संत का मत झूठा नहीं होता, आप जिस भी संत की वाणी पर विश्वास कर लेंगे, उसकी वाणी से आपका कल्याण हो जाएगा, वही वाक्य आपका बेड़ा पार कर देगा। महाराज श्री ने आगे कहा कि हमे उस मार्ग को अपनाना चाहिए जिस मार्ग से हमारे ऋषि जन गए हैं, नए मार्ग का निर्माण नहीं करना चाहिए। आजकल कलयुग में देखिए नए नए मार्गों का निर्माण हो रहा है, जिनके भी 2-4 हजार समर्थक हो जाते हैं वो अपना नया पंथ बना लेते हैं और समर्थक उसे स्वीकर भी कर लेते हैं। जो ऋषि परंपराओं के द्वारा पहले से मार्ग प्रशस्त किए गए है उसी परंपरा को स्वीकार करते हुए उसी के अनुसार हमें आगे बढ़ना चाहिए। 

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।

तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा।।

16Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 15 से 21 जुलाई 2018 तक PCAE Community Center 9226 39 Avenue NW, Near Hindu Temple, Edmonton, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस पर महाराज श्री ने भागवत महात्म्य का सुंदर वर्णन श्रोताओं को श्रवण कराया।

भागवत के प्रथम दिवस की शुरूआत दीप प्रज्जवलन, भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।


कथा से पूर्व पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई, जिसमें मातओं बहनों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।


पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भागवत कथा जीव को श्रेष्ठ ज्ञान देती है। यह भागवत भक्ति ज्ञान वैराग्य से पूर्ण है, जीवन जीने के लिए ज्ञान होना जरूरी है, भगवान को पाने के लिए भक्ति का होना जरूरी है और भगवान से ना मिटने वाला प्रेम हो सके उसके लिए थोड़ा वैराग्य भी जरूरी है। यह जरूरी नहीं कि हम घर छोड़ देंगे तो वैरागी होंगे , कई बार तो हम घर में रहते हुए भी वैरागी हो जाते हैं। कुछ भी खाने का, इस्तेमाल करने का मन नहीं करता सिर्फ श्याम से मिलने की इच्छा दिल में प्रकाट होती चली जाती है, इतनी प्रगाट हो जाती है कि उस इच्छा को लेकर रात दिन हमारी आंखों से अश्रु बिंदू बहते रहते हैं और वही वैरागी है तो दुनिया के लिए ना रोए, कृष्ण के लिए जिसकी आंखों में आंसू रहते हों। दुनिया का कोई भी आक्रषण उसे अपनी ओर ना आकृषित कर सके अपितु कृष्ण की याद, कृष्ण की कथा, कृष्ण का दर्शन, कृष्ण का श्रवण जीवन का एकमात्र उद्देश्य बन जाए। और मानव जीवन में ही हम लोग कृष्ण को पा सकते हैं और कोई विकल्प नहीं है कि किसी ओर जीवन में हम उसे पा सकें सिर्फ मानव जीवन में ही यह उपलब्धि हमें प्राप्त हो सकती है।


महाराज श्री ने आगे कहा कि ईश्वर को आप तब तक नहीं जान सकते जब तक ईश्वर की जानने की जिज्ञासा आपके मन में नहीं है। ईश्वर को जानने की जिज्ञासा आपमें होनी चाहिए, ईश्वर को जानने की जिज्ञासा का मतलब है अपने आपको जानने की जिज्ञासा। दो में से किसी एक को जान लो तो दोनों को जान जाओगे। या तो ईश्वर को जानने की कोशिश करो या तो ईश्वर को जानने की कोशिश करो। व्यक्ति इन दोनों को जानने की कोशिश नहीं करता बाकि सबको जानने की कोशिश करता है। कभी कोशिश किजिए की मैं कौन हूं ?, कहां से आया हूं ?, मेरा मकसद क्या है ? इसिलिए भगवान की कथाएं सुननी चाहिए, भगवान की कथाएं तुमहे तुमसे मिला देती हैं। जो लोग भगवान की कथाएं सुनते हैं, जानना चाहते हैं वो लोग कई बार खुद को जानना नहीं चाहते उसके बावजूद खुद को जान जाते हैं। 
देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि एक बार नैमिषारणय में सनकादिक ऋषि विराजमान थे तभी वहां परम श्रद्धेय सूद जी महाराज पधारे। जब सूद जी महाराज वहां पधारे तो उन्हें एक बहुत सुंदर आसन दिया और वहां पर उनको बैठाया। तो सभी ऋषियों ने सूद जी महाराज से ये प्रश्न किया की कलयुग के लोगों का कल्याण कैसे होगा ? आप देखिये किसी भी पुराण में किसी और युग के लोगो की चिंता नहीं की पर कलयुग के लोगों के कल्याण की चिंता हर पुराण और वेद में की गई कारण क्या है ? क्योकि कलयुग का प्राणी अपने कल्याण के मार्ग को भूल कर केवल अपने मन की ही करता है जो उसके मन को भाये वह बस वही कार्य करता है और फिर कलयुग के मानव की आयु कम है और शास्त्र ज्यादा है तो फिर एक कल्याण का मार्ग बताया भागवत कथा। श्रीमद भागवत कथा सुनने मात्र से ही जीव का कल्याण हो जाता है महाराज श्री ने कहा कि व्यास जी ने जब इस भगवत प्राप्ति का ग्रंथ लिखा, तब भागवत नाम दिया गया। बाद में इसे श्रीमद् भागवत नाम दिया गया। इस श्रीमद् शब्द के पीछे एक बड़ा मर्म छुपा हुआ है श्री यानी जब धन का अहंकार हो जाए तो भागवत सुन लो, अहंकार दूर हो जाएगा।


व्यक्ति इस संसार से केवल अपना कर्म लेकर जाता है। इसलिए अच्छे कर्म करो। भाग्य, भक्ति, वैराग्य और मुक्ति पाने के लिए भगवत की कथा सुनो। केवल सुनो ही नहीं बल्कि भागवत की मानों भी। सच्चा हिन्दू वही है जो कृष्ण की सुने और उसको माने , गीता की सुनो और उसकी मानों भी , माँ - बाप, गुरु की सुनो तो उनकी मानो भी तो आपके कर्म श्रेष्ठ होंगे और जब कर्म श्रेष्ठ होंगे तो आप को संसार की कोई भी वस्तु कभी दुखी नहीं कर पायेगी। और जब आप को संसार की किसी बात का फर्क पड़ना बंद हो जायेगा तो निश्चित ही आप वैराग्य की और अग्रसर हो जायेगे और तब ईश्वर को पाना सरल हो जायेगा। 
।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

15Jul 2018

आज पूज्य महाराज श्री Edmonton,Canada एयरपोर्ट पहुँचे तो भारी संख्या में भक्तों ने महाराज श्री का स्वागत किया।

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 08 से 14 जुलाई 2018 तक Vedic Hindu Cultural Society, Surrey, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा का समापन करने के पश्चात महाराज श्री ने Edmonton के लिए प्रस्थान किया। वहां 15 से 21 जुलाई तक कथा का आयोजन किया जा रहा है।

|| राधे राधे बोलना पड़ेगा ||

15Jul 2018

आज Edmonton, Canada में भागवत कथा शुरू होने से पूर्व महाराज श्री के सानिध्य में कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई।

आज Edmonton, Canada में भागवत कथा शुरू होने से पूर्व महाराज श्री के सानिध्य में कथा स्थल तक भव्य कलश यात्रा निकाली गई। माताएं बहनें बढ़ चढ़कर कलश यात्रा में शामिल हुई।

14Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 08 से 14 जुलाई 2018 तक Vedic Hindu Cultural Society Surrey, CANADA में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर महाराज श्री प्रभु के रसमय स्वरुप और श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत के षष्ठम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि भगवान सर्वत्र व्याप्त, हमारे ह्रदय में नित्य निरंतर वास करने वाले भगवान की जब कृपा होती है तो हमें भागवत सुनने का परम सौभाग्य प्राप्त होता है। भगवान के उत्सव में पहुंचना ये साधारण विषय नहीं है, लाख कृपा जब ईश्वर करें और हमारे सत्कर्मों की कृपा हो तब भगवान के उत्सवों में सम्मिलित होने का सौभाग्य मिलता है। एक बात जीवन भर बात रखना ये जो भगवत उत्सव होते हैं, ये भगवान के उत्सव सब पृथ्वी पर ही होते हैं और कही नहीं होते हैं, स्वर्ग में यह उत्सव करने का सौभाग्य प्राप्त नहीं होता। मृत्युलोक में करवाए गए भगवान के उत्सव हमें भगवान के धाम तक पहुंचा देते हैं। 


महाराज श्री ने कहा कि मनुष्य में ज्ञान होना चाहिए अभिमान नहीं, ज्ञान बहुत अच्छा है लेकिन ज्ञान का अभिमान बहुत बुरा। ज्ञान के माध्यम भगवान को प्राप्त किया जा सकता है। लेकिन एक भगवान ने कहा है कि अगर तुम अभिमानी हुए तो मुझसे नहीं मिल सकते। और ऐसे कई उदाहरण है कि जब ज्ञान हुआ तो ज्ञान के माध्यम से भगवान को प्राप्त करने की कोशिश की है और कईयों को भगवान मिले भी हैं लेकिन जब अभिमानी हो गए तो भगवान ने उनको छोड़ भी दिया। इसिलिए व्यक्ति को ज्ञानी होना चाहिए अभिमानी नहीं, इस बात को अपने जीवनें में उतारना चाहिए।


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज जी ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कहा कि बिना साधना के भगवान का सानिध्य नहीं मिलता। द्वापर युग में गोपियों को भगवान श्री कृष्ण का सानिध्य इसलिए मिला, क्योंकि वे त्रेता युग में ऋषि - मुनि के जन्म में भगवान के सानिध्य की इच्छा को लेकर कठोर साधना की थी। शुद्ध भाव से की गई परमात्मा की भक्ति सभी सिद्धियों को देने वाली है। जितना समय हम इस दुनिया को देते हैं, उसका 5% भी यदि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लगाएं तो भगवान की कृपा निश्चित मिलेगी। पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कहा कि गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए त्याग किया परंतु हम चाहते हैं कि हमें भगवान बिना कुछ किये ही मिल जाये, जो की असम्भव है। महाराज श्री ने बताया कि शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से 3 प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा। 1 . एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं। 2 . दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे। 3 . तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही। आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो? भगवान ने कहा की गोपियों! जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं। दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं। लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं- आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं। कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं। श्री कृष्ण कहते हैं की गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाई जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

 
 

15Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 08 से 14 जुलाई 2018 तक Vedic Hindu Cultural Society, Surrey, Canada में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के सप्तम दिवस पर महाराज श्री ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की सुंदर कथा श्रोताओं को श्रवण कराई।

भागवत के सप्तम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि आज के युवा एक बात कहते हैं कि सत्संग जरूरी क्यों है ? हमारा मन शुद्ध है तो हम सत्संग में क्यों जाएं ? लेकिन मैं युवाओं से पूछना चाहूंगा की ये कौन निर्धारित करते हैं कि हमारा मन शुद्ध है। आपके विचारधारा बताती है कि आपका मन शुद्ध है कि नहीं और कथाएं इसमें आपकी मदद करती हैं। बिनु सत्संग विवेक ना होई, जीवन में कर्मों की सफलता लाने के लिए भगवान की कथाएं, सत्संग जरूरी है यह हमारे जीवन को आगे बढ़ाती हैं।

महाराज श्री ने कहा कि सत्य की राह बढ़ी कठिन होती है, सत्य की राह हमेशा कांटों भरी होती है इसलिए लोग इस राह पर चल नहीं पाते हैं, पहले तो सब दम भरते हैं की हम सच्चें है लेकिन जब वह राह आती है कांटों भरी तो छोड कर भाग जाते हैं, क्योंकि हमें सत्य भी तभी स्वीकार है जब उसमें सुख हों लेकिन हमेशा सत्य में सुख नहीं होते, कभी कभी सत्य की राह में बढ़ी परेशानियां भी होती हैं और तब याती है कि ठाकुर जी आप ही संभालो और ठाकुर जी संभालते भी हैं।

देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कल के कथा का क्रम को आगे बढ़ाते हुए कहा कि रुकमणी जी ने श्रीकृष्ण से प्रेम विवाह किया। भगवान ने 16 हजार 100 विवाह किए हैं लेकिन 8 विवाह अलग अलग हुए। ये 8 पटरानियां साधारण नहीं हैं लक्ष्मी जी बनी हैं रूकमणी, पार्वती जी आधे अंश से बनी हैं जामवंती और बाके आधे अंश से बनी हैं महामाया, तुलसी बनी हैं लक्ष्मणा, यमुना बनी हैं सूर्य की पूत्री कालिंदी, लज्जा बनी हैं भद्रा, गंगा बनी हैं मित्रव्रिंदा, सावित्री जी बनी हैं सत्या और पृथ्वी बनी हैं सत्यभामा। ये सांसारिक विवाह नहीं है ये पूरी प्रकृति के साथ ठाकुर जी ने विवाह किया है।

महाराज श्री ने आगे कहा कि भगवान ने 16100 विवाह इसलिए नहीं किए की उन्हे बहुत सारी पत्नियां चाहिए थी। उन्होंने इतने विवाह इसलिए किए क्योंकि उन स्त्रियों को जरूरत थी। भौमासुर नामक राक्षस ने 16 हज़ार 100 कन्याओं को बंदी बना रखा था। नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा की समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः आप ही कोई उपाय करें। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया। इस कारण भगवान ने १६१०० रूप बनाकर सबके साथ एक मुहूर्त में एक साथ विवाह किया था। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने इतने विवाह किये। भगवान ने कामनावश विवाह नहीं किया था, करुणावश किया था। भगवान कहते हैं जिसको कोई नहीं अपनाता अगर वो मेरी शरण में आये तो मैं उसे अपना लेता हूँ।

पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का क्रम सुनाते हुए श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा श्रोताओं के श्रवण कराई। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खाकर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्रीकृष्ण, जो उस समय द्वारका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्रीकृष्ण एक साथ रहते थे तथा सांदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्रीकृष्ण बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्रीकृष्ण एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता मांग सकता हूं ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता मांगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंततः सुदामा श्रीकृष्ण के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल मांगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारका के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुंचने पर वहां के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह वहां के राजा श्रीकृष्ण का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहां से नहीं जाएगा। श्रीकृष्ण के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पांव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण की पत्नियां भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्रीकृष्ण ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्रीकृष्ण ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहां बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्रीकृष्ण ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारीजनों के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्रीकृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्रीकृष्ण की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्रीकृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्रीकृष्ण सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।

 

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

13Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 08 से 14 जुलाई 2018 तक Vedic Hindu Cultural Society Surrey, CANADA में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के पंचम दिवस पर महाराज श्री ने ने पुतना उद्धार एवं श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।

भागवत के पंचम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।


पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा कि शुरूआत करते हुए कहा कि जीवन का सफल दिन होता है जब आप प्रभु के भजन में व्यस्त रहते हैं। संसार की दिन चर्याओं को तो आप रोक नहीं सकते ये तो दिन प्रतिदिन चलेगी ही चलेगी। कोई दिन आपका अच्छा जाएगा कोई दिन आपका बुरा जाएगा लेकिन दिन वहीं श्रेष्ठ है जिस दिन आप भगवान की कथा गायन में और श्रवण करने में जो लगा देते हैं उस दिन से श्रेष्ठ कोई दिन नहीं हो सकता। 


महाराज श्री ने पूछा कि सबसे ज्यादा आवश्यक क्या है ? भगवान ने गीता में अर्जुन को कहा है सबसे ज्यादा आवश्यक है ये जो मोह माया का सघन वन है इससे पार पाकर गोविंद की तरफ जाना। जब तक व्यक्ति मोह रूपी जंगल को पार नही करेगा तब तक वह गोविंद से नहीं मिल सकता। जब इस घने जंगल में फंस जाएं और रास्ता नजर ना आए तो गुरू के चरणों में बैठ कर भटकाव को दूर करने की कोशिश करो। गुरू के बताए हुए मार्ग पर चलकर अपने जीवन में पवित्रता लाओ। 


महाराज श्री ने कहा कि जीवन में लोगों को थोड़ी थोड़ी खुशियां मिलती हैं लेकिन आनंद नहीं मिलता, कभी खुशियां आती हैं, कभी गम भी आते हैं पर अपने तो हमेशा गम में ही पहचाने आते हैं। बड़े बुजुर्ग कह गए हैं किसी के सुख में सम्मिलित होओ या नहीं किसी के गम में सम्मिलित जरूर होना चाहिए। पहले के लोग समाज में जो अन्याय फैलता था उसके खिलाफ खड़े होते थे लेकिन आज कल सब तमाशा देखते हैं। इस संसार में वही आपके हैं जो दुख में खड़े हों और ऐसे लोग बहुत ज्यादा नहीं है। 


देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने पंचम दिवस की कथा प्रारंभ करते हुए कृष्ण जन्म पर नंद बाबा की खुशी का वृतांत सुनाते हुए कहा की जब प्रभु ने जन्म लिया तो वासुदेव जी कंस कारागार से उनको लेकर नन्द बाबा के यहाँ छोड़ आये और वहाँ से जन्मी योगमाया को ले आये। नंद बाबा के घर में कन्हैया के जन्म की खबर सुन कर पूरा गोकुल झूम उठा। महाराज ने कथा का वृतांत बताते हुए पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की पुतना कंस द्वारा भेजी गई एक राक्षसी थी और श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी। पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर वृंदावन में पहुंची थी। जब पूतना भगवान के जन्म के ६ दिन बाद प्रभु को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट विष लगा कर आई तो मेरे कन्हैया ने अपनी आँखे बंद कर ली, कारण क्या था? क्योकि जब एक बार मेरे ठाकुर की शरण में आ जाता है तो उसका उद्धार निश्चित है। परन्तु मेरे ठाकुर को दिखावा, छलावा पसंद नहीं, आप जैसे हो वैसे आओ। रावण भी भगवान श्री राम के सामने आया परन्तु छल से नहीं शत्रु बन कर, कंस भी सामने शत्रु बन आया पर भगवान ने उनका उद्दार किया। लेकिन जब पूतना और शूपर्णखा आई तो प्रभु ने आखे फेर ली क्योंकि वो मित्र के भेष रख कर शत्रुता निभाने आई थी। मौका पाकर पुतना ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। 
महाराज जी ने कहा संतो ने कई भाव बताए है कि भगवान ने नेत्र बंद किस लिए किए ? इसका तो नाम ही है पूतना, इसके तो पूत है ही नहीं, कितना अशुभ नाम है पूतना। एक ओर भाव है कि इसे किसी के पूत पसंद भी नहीं हैं इसलिए बच्चों को मारने जाती है।

भगवान जो भी लीला करते हैं वह अपने भक्तों के कल्याण या उनकी इच्छापूर्ति के लिए करते हैं। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है, पर आगे अनेक राक्षसों का संहार करना है। अत: दुष्टों के दमन के लिए रजोगुण की आवश्यकताहै। इसलिए व्रज की रज के रूप में रजोगुण संग्रह कर रहे हैं। पृथ्वी का एक नाम ‘रसा’ है। श्रीकृष्ण ने सोचा कि सब रस तो ले चुका हूँ अब रसा (पृथ्वी) रस का आस्वादन करूँ। पृथ्वी का नाम ‘क्षमा’ भी है। माटी खाने का अर्थ क्षमा को अपनाना है। भगवान ने सोचा कि मुझे ग्वालबालों के साथ खेलना है,किन्तु वे बड़े ढीठ हैं। खेल-खेल में वे मेरे सम्मान का ध्यान भी भूल जाते हैं। कभी तो घोड़ा बनाकर मेरे ऊपर चढ़ भी जाते हैं। इसलिए क्षमा धारण करके खेलना चाहिए।

अत: श्रीकृष्ण ने क्षमारूप पृथ्वी अंश धारण किया। भगवान व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। अत: उसका कुछ अंश द्विजों (दांतों) को दान कर दिया। गोपबालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां ! कन्हैया ने माटी खायी है।’ उन भोले-भाले ग्वालबालों को यह नहीं मालूम था कि पृथ्वी ने जब गाय का रूप धारणकर भगवान को पुकारा तब भगवान पृथ्वी के घर आये हैं। पृथ्वी माटी,मिट्टी के रूप में है अत: जिसके घर आये हैं उसकी वस्तु तो खानी ही पड़ेगी। इसलिए यदि श्रीकृष्ण ने माटी खाली तो क्या हुआ? ‘बालक माटी खायेगा तो रोगी हो जायेगा’ ऐसा सोचकर यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़कर डाँटते हुये कहा–‘क्यों रे नटखट ! तू अब बहुत ढीठ हो गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा–‘मैया ! मैंने माटी कहां खायी है।’ यशोदामैया ने कहा कि अकेले में खायी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि अकेले में खायी है तो किसने देखा? यशोदामैया ने कहा–ग्वालों ने देखा। श्रीकृष्ण ने मैया से कहा–’तू इनको बड़ा सत्यवादी मानती है तो मेरा मुंह तुम्हारे सामने है। तुझे विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। भगवान के साथ ऐश्वर्यशक्ति सदा रहती है। उसने सोचा कि यदि हमारे स्वामी के मुंह में माटी निकल आयी तो यशोदामैया उनको मारेंगी और यदि माटी नहीं निकली तो दाऊ दादा पीटेंगे। इसलिए ऐसी कोई माया प्रकट करनी चाहिए जिससे माता व दाऊ दादा दोनों इधर-उधर हों जाएं और मैं अपने स्वामी को बीच के रास्ते से निकाल ले जाऊं। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप,समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज अर्थात्प्रकृति, महतत्त्व, अहंकार, देवगण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, त्रिगुण, जीव, काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्त्व भी मूर्त दीखने लगे। पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्बूद्वीप है, उसमें भारतवर्ष है, और उसमें यह ब्रज, ब्रज में नन्दबाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्रीकृष्ण का हाथ पकड़े। बड़ा विस्मय हुआ माता को। अब श्रीकृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा ।।

12Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य 08 से 14 जुलाई 2018 तक Vedic Hindu Cultural Society Surrey, CANADA में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर महाराज श्री ने प्रभु के वामन अवतार के वृतांत का विस्तार पूर्वक वर्णन भक्तों को करवाया एवं कृष्ण जन्मोत्सव को बड़ी धूमधाम से मनाया।

भागवत के चतुर्थ दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि जैसी श्री वृंदावन में प्रिया प्रीतम रमण करते हैं, लीला करते हैं, वैसे ही भागवत महापुराण में भी भगवान लीला करते हैं, रमण करते हैं। श्रीमद् भागवत महापुराण यह परम हंसों की संगता है, यह भक्तों की संगता है, यह भक्तों का विषय है। जैसे हंस दुध में और पानी में अंतर कर लेता है ठीक वैसे ही भागवत परमहंसों की संगता है ना सिर्फ कहने वाला अपितु सुनने वाला भी इतना श्रेष्ठ होना चाहिए कि महापुरूषों की कही गई बातों में से जो अच्छा लगा हो उसे ले ले और जो अच्छा ना लगा हो उसे छोड़ दे। अगर हम सच्चे वक्ता हैं, सच्चे श्रोता है तो भागवत महापुराण ही श्रीकृष्ण हैं ऐसा भाव मानकर भागवत को श्रवण करना चाहिए और जो जो अच्छा लगे वो सब जीवन में उतारना चाहिए। 
महाराज श्री ने कहा कि सबसे बड़ा सत्कर्म है दूसरों को सुख देना और सबसे बड़ा पाप है दुसरों को दुख देना। आज व्यक्ति खुद को सुखी देखने के चक्कर में, सुख प्राप्ति के चक्कर में दूसरों को तकलीफ देने से नहीं चुकता। आप अगर किसी को सुख नहीं दे सकते तो कम से कम दुख मत दिजिए, इतना काम तो हमको करना ही चाहिए अगर हम अपने आप को धरमात्मा बनाना चाहते हैं, ठाकुर को मनाना चाहते हैं। जो परोपकार करना जानते हैं उनके लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं है। 
महाराज श्री ने कहा कि आज के बच्चों को भम्र होता है कि धर्म है क्या ? तो धर्म है आपका कर्म और देश, काल परिस्थिति के हिसाब से आपको ये निर्णय लेना होगा कि क्या करूं, क्या ना करूं ? कई बार वही कर्म तो धर्म है वो अधर्म बन सकता है आपके लिए । जैसे झूठ बोलना पाप है लेकिन आपके सत्य से किसी की जान चली जाए तो वो सत्य ही पाप बन जाएगा आपके लिए, अब यहां झूठ बोलना पड़े तो झूठ बोलों क्योंकि झूठ बोलने से किसी की जान बच रही है। वेद जिसे स्विकृति देता है वो धर्म है और वेद जिसे स्विकृति नही देता वो अधर्म है। 
देवकीनंदन ठाकुर जी ने श्रीमद्भागवत कथा चतुर्थ दिवस के प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए बताया कि वामन अवतार भगवान विष्णु के दशावतारो में पांचवा अवतार और मानव रूप में अवतार था। जिसमें भगवान विष्णु ने एक वामन के रूप में इंद्र की रक्षा के लिए धरती पर अवतार लिया। वामन अवतार की कहानी असुर राजा महाबली से प्रारम्भ होती है। महाबली प्रहलाद का पौत्र और विरोचना का पुत्र था। महाबली एक महान शासक था जिसे उसकी प्रजा बहुत स्नेह करती थी। उसके राज्य में प्रजा बहुत खुश और समृद्ध थी। उसको उसके पितामह प्रहलाद और गुरु शुक्राचार्य ने वेदों का ज्ञान दिया था। समुद्रमंथन के दौरान जब देवता अमृत ले जा रहे थे तब इंद्रदेव ने बाली को मार दिया था जिसको शुक्राचार्य ने पुनः अपन मन्त्रो से जीवित कर दिया था।
महाबली ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा ने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। बाली भगवान ब्रह्मा के आगे नतमस्तक होकर बोला “प्रभु, मै इस संसार को दिखाना चाहता हूँ कि असुर अच्छे भी होते हैं। मुझे इंद्र के बराबर शक्ति चाहिए और मुझे युद्ध में कोई पराजित ना कर सके।" भगवान ब्रह्मा ने इन शक्तियों के लिए उसे उपयुक्त मानकर बिना प्रश्न किये उसे वरदान दे दिया।
शुक्राचार्य एक अच्छे गुरु और रणनीतिकार थे जिनकी मदद से बाली ने तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। बाली ने इंद्रदेव को पराजित कर इंद्रलोक पर कब्जा कर लिया। एक दिन गुरु शुक्राचार्य ने बाली से कहा अगर तुम सदैव के लिए तीनो लोकों के स्वामी रहना चाहते हो तो तुम्हारे जैसे राजा को अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए।
बाली अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए यज्ञ की तैयारी में लग गया। बाली एक उदार राजा था जिसे सारी प्रजा पसंद करती थी। इंद्र को ऐसा महसूस होने लगा कि बाली अगर ऐसे ही प्रजापालक रहेगा तो शीघ्र सारे देवता भी बाली की तरफ हो जायेंगे।
इंद्रदेव देवमाता अदिति के पास सहायता के लिए गए और उन्हें सारी बात बताई। देवमाता ने बिष्णु भगवान से वरदान माँगा कि वे उनके पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लेकर बाली का विनाश करें। जल्द ही अदिति और ऋषि कश्यप के यहाँ एक सुंदर बौने पुत्र ने जन्म लिया। पांच वर्ष का होते ही वामन का जनेऊ समारोह आयोजित कर उसे गुरुकुल भेज दिया।
इस दौरान महाबली ने 100 में से 99 अश्वमेध यज्ञ पुरे कर लिए थे। अंतिम अश्वमेध यज्ञ समाप्त होने ही वाला था कि तभी दरबार में दिव्य बालक वामन पहुँच गया।
महाबली ने कहा कि आज वो किसी भी व्यक्ति को कोई भी दक्षिणा दे सकता है। तभी गुरु शुक्राचार्य महाबली को महल के भीतर ले गये और उसे बताया कि ये बालक ओर कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु हैं वो इंद्रदेव के कहने पर यहाँ आए हैं और अगर तुमने इन्हें जो भी मांगने को कहा तो तुम सब कुछ खो दोगे।
महाबली अपनी बात पर अटल रहे और कहा मुझे वैभव खोने का भय नहीं है बल्कि अपन प्रभु को खोने का है इसलिए मै उनकी इच्छा पूरी करूंगा।
महाबली उस बालक के पास गया और स्नेह से कहा “आप अपनी इच्छा बताइये”।
उस बालक ने महाबली की और शांत स्वभाव से देखा और कहा “मुझे केवल तीन पग जमीन चाहिए जिसे मैं अपने पैरों से नाप सकूं”।
महाबली ने हँसते हुए कहा “केवल तीन पग जमीन चाहिए, मैं तुमको दूँगा।"
जैसे ही महाबली ने अपने मुँह से ये शब्द निकाले वामन का आकार धीरे धीरे बढ़ता गया। वो बालक इतना बढ़ा हो गया कि बाली केवल उसके पैरों को देख सकता था। वामन आकार में इतना बढ़ा था कि धरती को उसने अपने एक पग में माप लिया।
दुसरे पग में उस दिव्य बालक ने पूरा आकाश नाप लिया। अब उस बालक ने महाबली को बुलाया और कहा मैंने अपने दो पगों में धरती और आकाश को नाप लिया है। अब मुझे अपना तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तुम बताओ मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ।
महाबली ने उस बालक से कहा “प्रभु, मैं वचन तोड़ने वालों में से नहीं हूँ आप तीसरा कदम मेरे शीश पर रखिये।"
भगवान विष्णु ने भी मुस्कुराते हुए अपना तीसरा कदम महाबली के सिर पर रख दिया। वामन के तीसरे कदम की शक्ति से महाबली पाताल लोक में चला गया। अब महाबली का तीनो लोकों से वैभव समाप्त हो गया और सदैव पाताल लोक में रह गया। इंद्रदेव और अन्य देवताओं ने भगवान विष्णु के इस अवतार की प्रशंशा की और अपना साम्राज्य दिलाने के लिए धन्यवाद दिया।
।। राधे- राधे बोलना पड़ेगा ।।

11Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 08 से 14 जुलाई 2018 तक Vedic Hindu Cultural Society Surrey, CANADA में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस पर महाराज श्री ने भागवत कथा में बताया की जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन हो उसको क्या करना चाहिए ? इस वृतांत का विस्तार से वर्णन किया

भागवत के तृतीय दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।

 में कभी ऐसी परेशानियां आ जाती हैं जहां से मायुसी दिल में छा जाती है और कुछ भी ना करने का मन करता है और दुनिया छोड़ देने का भी मन करता है ? महाराज जी ने आगे कहा कि दुनिया पर भरोसा करके हम जो गलती करते हैं, जिन पर भरोसा करें और वो ही आपको धोखा दे दें तब लगता है कि काश हम ये दुनिया छोड कर चले जाएं ये दिन देखने से पहले। लेकिन हम ये क्यों भूल जाते हैं कि इसी का नाम ही तो जिंदगी है। जिंदगी में हमेशा अच्छा ही नहीं होता है, कभी कभी ऐसे भी दिन आते हैं जिसकी हम कल्पना भी नहीं करते। कभी कभार ऐसा भी होता है कि किसी के कर्मों का फल हमें भोगना पड़ता है। इसलिए यह याद रखो की जीवन में अगर भरोसा किसी पर करना है तो भगवान पर किजिए। ईश्वर पर भरोसा करोगे तो धोखा नहीं खाओगे, दुनिया से चाहे जो भी मिले लेकिन धोखा नहीं मिलेगा भगवान से। भागवत ही हमको भगवान से भरोसा करना सिखाती है। 


महाराज श्री ने कहा कि सुख में भगवान को भूलना नहीं चाहिए, अगर सुख में भी भगवान को याद करोगे तो दुख की मजाल नहीं है कि वो तुम्हे छू ले। सभी बच्चों को महाराज श्री ने ज्ञान देते हुए कहा कि बचपन में भक्ति का फल मिलता है अमृत के समान, जो बचपन से भक्ति करते हैं भजन करते हैं उन्हें सौ गुना फल मिलता है।, बुढापे की सौ माला और बचपन की एक माला बराबर है। 
महाराज श्री ने कहा कि मृत्यु तीन चीजों के बगैर नहीं आती। पहली समय, दूसरी जगह और तीसरी वजह, जब यह तीनों चीजे मिलती है तो मृत्यु आती है। मानव जीवन अनमोल है लेकिन एक क्षण का भी भरोसा नहीं है की हम अगले क्षण रहेंगे या नहीं। 


देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा का वृतांत सुनाते हुए कल का कथा क्रम याद कराया की राजा परिक्षित को श्राप लगा कि सातवें दिन तुम्हारी मृत्यु सर्प के डरने से हो जाएंगी। जिस व्यक्ति को यहाँ पता चल जाये की उसकी मृत्यु सातवें दिन हो वो क्या करेगा क्या सोचेगा ? राजा परीक्षित ने यह जान कर उसी क्षण अपना महल छोड़ दिया। राजा परीक्षित ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े गंगा के तट पर। गंगा के तट पर पहुंचकर जितने भी संत महात्मा थे सब से पूछा की जिस की मृत्यु सातवें दिन है उस जीव को क्या करना चाहिए। किसी ने कहा गंगा स्नान करो, किसी ने कहा गंगा के तट पर आ गए हो इससे अच्छा क्या होगा, हर की अलग अलग उपाय बता रहा है।

तभी वहां भगवान शुकदेव जी महाराज पधारे, जब राजा परीक्षित भगवान शुकदेव जी महाराज के सामने पहुंचे तो उनको राजा ने शाष्टांग प्रणाम किया। शाष्टांग प्रणाम करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शुकदेव जी महाराज जो सबसे बड़े वैरागी है चूड़ामणि है उनसे राजा परीक्षित जी ने प्रश्न किया कि हे गुरुदेव जो व्यक्ति सातवें दिन मरने वाला हो उस व्यक्ति को क्या करना चाहिए? किसका स्मरण करना चाहिए और किसका परित्याग करना चाहिए? कृपा कर मुझे बताइये...

अब शुकदेव जी ने मुस्कुराते हुए परीक्षित से कहा की हे राजन ये प्रश्न केवल आपके कल्याण का ही नहीं अपितु संसार के कल्याण का प्रश्न है। तो राजन जिस व्यक्ति की मृत्यु सातवें दिन है उसको श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए तो उसका कल्याण निश्चित है। श्रीमद भागवत में 18000 श्लोक, 12 स्कन्द और 335 अध्याय है जो जीव सात दिन में सम्पूर्ण भागवत का श्रवण करेगा वो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति करता है। राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से प्रार्थना की हे गुरुवर आप ही मुझे श्रीमद भागवत का ज्ञान प्रदान करे और मेरे कल्याण का मार्ग प्रशस्थ करे।

भगवान मानव को जन्म देने से पहले कहते हैं ऐसा कर्म करना जिससे दोबारा जन्म ना लेना पड़े। मानव मुट्ठी बंद करके यह संकल्प दोहराते हुए इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। प्रभु भागवत कथा के माध्यम से मानव का यह संकल्प याद दिलाते रहते हैं। भागवत सुनने वालों का भगवान हमेशा कल्याण करते हैं। भागवत ने कहा है जो भगवान को प्रिय हो वही करो, हमेशा भगवान से मिलने का उद्देश्य बना लो, जो प्रभु का मार्ग हो उसे अपना लो, इस संसार में जन्म-मरण से मुक्ति भगवान की कथा ही दिला सकती है। भगवान की कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। राजा परीक्षित के कारण है भागवत कथा पृथ्वी के लोगो को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समाज द्वारा बनाए गए नियम गलत हो सकते हैं किंतु भगवान के नियम ना तो गलत हो सकते हैं और नहीं बदले जा सकते हैं।

।। राधे-राधे बोलना पड़ेगा।।

विश्व के सबसे छोटे टापू पर The Capital Post

10Jul 2018

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य में 08 से 14 जुलाई 2018 तक Vedic Hindu Cultural Society Surrey, CANADA में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर महाराज श्री ने अमर कथा एवं शुकदेव जी के जन्म का वृतांत विस्तार से वर्णन किया।

भागवत के द्वितीय दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर कथा स्थल में पूज्यनीय श्री गोविंद गिरी जी महाराज पधारे, उन्होंने महाराज श्री का सम्मान किया एवं व्यास पीठ से आशीर्वाद लिया और अपने आशीष वचन से सभी को कृतार्थ किया। 
पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने कथा की शुरूआत करते हुए कहा कि मानव जीवन में दो चीजे बहुत दुर्लभ हैं, ए